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भारत के भाषाई परिवार
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2026-04-24T08:32:09Z
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/* हिन्द आर्य भाषा परिवार */ व्याकरण में सुधार किया।
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[[चित्र:South Asian Language Families.png|right|thumb|300px|वृहद भारत के भाषा परिवार]]
[[भारत]] में विश्व के सबसे चार प्रमुख [[भाषा-परिवार|भाषा परिवारों]] की [[भाषा|भाषाएँ]] बोली जाती है। सामान्यत: उत्तर भारत में बोली जाने वाली भारोपीय भाषा परिवार की भाषाओं को आर्य भाषा समूह, दक्षिण की भाषाओं को द्रविड़ भाषा समूह, ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषाओं को मुंडारी भाषा समूह तथा पूर्वोत्तर में रहने वाले तिब्बती-बर्मी, नृजातीय भाषाओं को चीनी-तिब्बती (नाग भाषा समूह) के रूप में जाना जाता है।
==हिन्द-आर्य भाषा परिवार ==
यह परिवार भारत का सबसे बड़ा भाषाई परिवार है। इसका विभाजन 'इन्डो-युरोपीय' ([[हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार|हिन्द यूरोपीय]]) भाषा परिवार से हुआ है, इसकी दूसरी शाखा 'इन्डो-इरानी' भाषा परिवार है जिसकी प्रमुख भाषायें [[फ़ारसी भाषा|फारसी]], [[ईरानी]], [[पश्तो भाषा|पश्तो]], बलूची इत्यादि हैं। भारत की दो तिहाई से अधिक आबादी हिन्द आर्य भाषा परिवार की कोई न कोई भाषा विभिन्न स्तरों पर प्रयोग करती है। जिसमें [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] समेत मुख्यत: उत्तर भारत में बोली जानेवाली अन्य भाषायें जैसे: [[हिन्दी]], [[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[मराठी भाषा|मराठी]], [[नेपाली (बहुविकल्पी)|नेपाली]], [[बंगाली भाषा|बांग्ला]], [[गुजराती भाषा|गुजराती]], [[कश्मीरी]], [[डोगरी भाषा|डोगरी]], [[पंजाबी]], [[ओड़िया भाषा|उड़िया]], [[असमिया भाषा|असमिया]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[मारवाड़ी]], [[गढ़वाली भाषा|गढ़वाली]], [[कोंकणी भाषा|कोंकणी]] इत्यादि भाषायें शामिल हैं।
[[File:Major Indo-Aryan languages.png|thumb|हिन्द-आर्य भाषा परिवार]]
== द्रविड़ भाषा परिवार ==
यह भाषा परिवार भारत का दूसरा सबसे बड़ा भाषायी परिवार है। इस परिवार की सदस्य भाषाऍं ज्यादातर दक्षिण भारत में बोली जाती हैं। इस परिवार का सबसे बड़ा सदस्य [[तमिल]] है जो तमिलनाडु में बोली जाती है। इसी तरह [[कर्नाटक]] में [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]], केरल में [[मलयालम भाषा|मलयालम]] और [[आन्ध्र प्रदेश|आंध्रप्रदेश]] में [[तेलुगू भाषा|तेलुगू]] इस परिवार की बड़ी भाषायें हैं। इसके अलावा [[तुलू भाषा|तुलू]] और अन्य कई भाषायें भी इस परिवार की मुख्य सदस्य हैं। [[अफ़ग़ानिस्तान|अफ़गानिस्तान]], [[पाकिस्तान]] और भारतीय कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसी परिवार की [[ब्राहुई भाषा|ब्राहुई]] भाषा भी बोली जाती है जिसपर [[बलोच भाषा और साहित्य|बलूची]] और [[पश्तो भाषा|पश्तो]] जैसी भाषाओं का असर देखने को मिलता है।
[[File:Dravidian subgroups.png|thumb|द्रविड़ भाषा परिवार]]
== आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार ==
[[आग्नेय भाषापरिवार]] मुख्य रूप से भारत में [[झारखण्ड|झारखंड]], [[छत्तीसगढ़]], [[ओडिशा|उड़ीसा]] और [[पश्चिम बंगाल]] के ज्यादातर हिस्सों में बोली जाती है। संख्या की दृष्टि से इस परिवार की सबसे बड़ी भाषा [[संथाली भाषा|संथाली]] या संताली है। यह [[पश्चिम बंगाल]], [[ओडिशा|उड़ीसा]], [[झारखण्ड|झारखंड]] और असम में मुख्यरूप से बोली जाती है। इस परिवार की अन्य प्रमुख भाषाओं में [[हो भाषा|हो]], [[मुंडारी भाषा|मुंडारी]], [[भूमिज भाषा|भूमिज]], [[संथाली भाषा|संथाली]], [[खड़िया भाषा|खड़िया]], [[सावरा]] इत्यादी भाषायें हैं।
[[File:Munda-Sprachen.png|thumb|आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार]]
== चीनी-तिब्बती भाषा परिवार ==
इस परिवार की ज्यादातर भाषाएँ भारत के सात उत्तर-पूर्वी राज्यों जिन्हें 'सात-बहनें' भी कहते हैं, में बोली जाती है। इन राज्यों में [[अरुणाचल प्रदेश]], [[मेघालय]], [[मणिपुर]], [[नागालैण्ड|नागालैंड]], [[मिज़ोरम]], [[त्रिपुरा]] और [[असम]] का कुछ हिस्सा शामिल है। इस परिवार पर चीनी और आर्य परिवार की भाषाओं का मिश्रित प्रभाव पाया जाता है और सबसे छोटा भाषाई परिवार होने के बावज़ूद इस परिवार के सदस्य भाषाओं की संख्या सबसे अधिक है। इस परिवार की मुख्य भाषाओं में [[नागा]], [[मिज़ो लोग|मिज़ो]], [[म्हार]], [[मणिपुरी]], [[तांगखुल भाषा|तांगखुल]], [[खासी]], [[दफ़ला]], [[चम्बा]], [[बोडो]], [[तिब्बती भाषा|तिब्बती]],[[लद्दाखी]] ,[[लेव्या]] तथा [[आओ]] इत्यादि भाषाऍं शामिल हैं।
[[File:Sino-Tibetan language groups.svg|thumb|चीनी-तिब्बती भाषा परिवार]]
== अंडमानी भाषा परिवार ==
जनसंख्या की दृष्टि से यह भारत का सबसे छोटा भाषाई परिवार है। इसकी खोज पिछले दिनों मशहूर भाषा विज्ञानी प्रो॰ अन्विता अब्बी ने की। इसके अंतर्गत अंडबार-निकाबोर द्वीप समूह की भाषाएँ आती हैं, जिनमें प्रमुख हैं- अंडमानी, ग्रेड अंडमानी, ओंगे, जारवा आदि।
== इन्हें भी देखें==
* [[हिंदी की विभिन्न बोलियाँ और उनका साहित्य]]
* [[भारत की भाषाएँ]]
* [[भारत की बोलियाँ]]
* [[भाषा-परिवार|भाषा परिवार]]
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://books.google.co.in/books?id=OHY8FaNqzboC&printsec=frontcover#v=onepage&q=&f=false भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी] (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ राम बिलास शर्मा)
* [https://web.archive.org/web/20100417231948/http://www.friesian.com/cognates.htm "Knowing" Words inIndo-European Languages]
[[श्रेणी:भाषा]]
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अवधी
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~2026-25044-40
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text/x-wiki
[[चित्र:Awadhi language.png|अंगूठाकार|'''अवधी क्षेत्र''' ]]
'''अवधी''' [[हिन्दी|हिंदी]] क्षेत्र की एक [[उपभाषा|भाषा]] है। यह [[उत्तर प्रदेश]] के "अवध क्षेत्र" ([[लखनऊ]], [[रायबरेली]], [[सुल्तानपुर]], [[बाराबंकी]], [[उन्नाव]], [[हरदोई]], [[सीतापुर]], [[लखीमपुर]], [[अयोध्या]], [[जौनपुर]], [[प्रतापगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश|प्रतापगढ़]], [[इलाहाबाद|प्रयागराज]], [[मिर्ज़ापुर|मिर्जापुर]], [[कौशाम्बी (बहुविकल्पी)|कौशाम्बी]], [[अम्बेडकर नगर ज़िला|अम्बेडकर नगर]], [[गोण्डा|गोंडा]],[[बस्ती]], [[बहराइच]],[[बलरामपुर]], [[सिद्धार्थनगर जिला|सिद्धार्थनगर]], [[श्रावस्ती जिला|श्रावस्ती]] तथा [[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]]) में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त इसकी एक शाखा [[बघेलखंड]] में [[बघेली]] नाम से प्रचलित है। 'अवध' शब्द की [[व्युत्पत्तिशास्त्र|व्युत्पत्ति]] "[[अयोध्या]]" से है। इस नाम का एक सूबा के राज्यकाल में था। [[तुलसीदास]] ने अपने "मानस" में [[अयोध्या]] को 'अवधपुरी' कहा है। इसी क्षेत्र का पुराना नाम '[[कोशल|कोसल]]' भी था जिसकी महत्ता प्राचीन काल से चली आ रही है।<ref>{{cite news
|url=http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/guestcolumn/article1-Union-Public-Service-Commission-Civil-Service-Exam-controversy-Hindi-50-62-451729.html
|title=कल की बोली आज की भाषा
|date=17 सितम्बर 2014
|work=लाइव हिंदुस्तान
|language=hi
|access-date=19 सितंबर 2014
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}}</ref><ref>{{cite news
|url=http://naidunia.jagran.com/magazine/tarang-hindi-is-struggling-with-regional-languages-182086
|title=हिंदी से भिड़ती बोलियां
|date=13 सितम्बर 2014
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}}</ref><ref>{{cite news
|url=http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/vimarsh-program-in-mayaram-surjan-bhawan-183281
|title=भाषाओं में न हो प्रतिस्पर्धा का भाव
|date=15 सितम्बर 2014
|work=[[नईदुनिया|नई दुनिया]]
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|url=http://www.jagran.com/uttar-pradesh/bulandshahr-11628663.html
|title=निज भाषा उन्नति है सब धर्मों का मूल
|date=14 सितम्बर 2014
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|language=hi
|access-date=19 सितंबर 2014
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|archive-date=25 अप्रैल 2017
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}}</ref>
भाषा शास्त्री डॉ॰ सर "जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन" के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार अवधी बोलने वालों की कुल आबादी 1615458 थी जो सन् 1971 की जनगणना में 28399552 हो गई। मौजूदा समय में शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 6 करोड़ से ज्यादा लोग अवधी बोलते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त के 21 जिलों- [[सुलतानपुर जिला|सुल्तानपुर]], [[अमेठी]], [[बाराबंकी]], [[प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश|प्रतापगढ़]], [[इलाहाबाद|प्रयागराज]], [[मिर्ज़ापुर|मिर्जापुर]], [[कौशाम्बी जिला|कौशांबी]], [[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]], [[रायबरेली]], [[उन्नाव]], [[लखनऊ]], [[हरदोई]], [[सीतापुर]], [[लखीमपुर, उत्तर प्रदेश|लखीमपुर खीरी]], [[बहराइच]], [[श्रावस्ती]], [[बलरामपुर]], [[गोण्डा|गोंडा]],[[अम्बेडकर नगर ज़िला|अंबेडकर नगर]] व [[अयोध्या]] में पूरी तरह से यह बोली जाती है। जबकि 7 जिलों- [[जौनपुर]], [[कानपुर]], [[शाहजहाँपुर जिला|शाहजहांपुर]], आजमगढ़,[[सिद्धार्थनगर जिला|सिद्धार्थनगर]], [[बस्ती, उत्तर प्रदेश|बस्ती]] और [[बांदा, उत्तर प्रदेश|बांदा]] के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग होता है। देश [[नेपाल]] के कई जिलों - बांके जिला, बर्दिया जिला, दांग जिला, [[कपिलवस्तु]] जिला, पश्चिमी नवलपरासी जिला, रुपन्देही जिला, कंचनपुर जिला आदि में यह काफी प्रचलित है। इसी प्रकार दुनिया के अन्य देशों- [[मॉरिशस]], त्रिनिदाद एवं टुबैगो, [[फ़िजी|फिजी]], गयाना, [[सूरीनाम]] सहित [[ऑस्ट्रेलिया|आस्ट्रेलिया]], [[न्यूज़ीलैण्ड|न्यूजीलैंड]] व [[हॉलैंड (नीदरलैंड)]] में भी लाखों की संख्या में अवधी बोलने वाले लोग हैं।
== अवधी भाषी क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार ==
अवधी प्रमुख रूप से [[भारत]], [[नेपाल]] और [[फ़िजी|फिजी]] में बोली जाती है।
भारत में अवधी मुख्यतः उत्तर प्रदेश राज्य में बोली जाती है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार के कुछ जिलों में बोली जाती है।
उत्तर प्रदेश के अवधी भाषी जिले:
अमेठी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, रायबरेली, प्रयागराज, मिर्जापुर, कौशांबी, अम्बेडकर नगर, सिद्धार्थ नगर, गोंडा, बलरामपुर, बाराबंकी, अयोध्या, लखनऊ, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बस्ती एवं फतेहपुर।
नेपाल के अवधी भाषी जिले कपिलवस्तु, बर्दिया, डांग, रूपनदेही, नवलपरासी, कंचनपुर, बांके आदि तराई नेपाल के जिले।
इसी प्रकार दुनिया के अन्य देशों- मॉरिशस, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, फिजी, गयाना, सूरीनाम सहित आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व हॉलैंड (नीदरलैंड) में भी लाखों की संख्या में अवधी बोलने वाले लोग हैं।
== परिचय ==
गठन की दृष्टि से हिंदी क्षेत्र की भाषाओं को दो वर्गों-पश्चिमी और पूर्वी में विभाजित किया जाता है। अवधी पूर्वी के अंतर्गत है। पूर्वी की दूसरी भाषा [[छत्तीसगढ़ी भाषा|छत्तीसगढ़ी]] है। अवधी को कभी-कभी बैसवाड़ी भी कहते हैं। परंतु बैसवाड़ी अवधी की एक बोली मात्र है जो [[उन्नाव]], [[लखनऊ]], [[रायबरेली]],[[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]] और [[सिंगरौली, मध्यप्रदेश|सिंगरौली]] जिले के कुछ भागों में बोली जाती है।
[[तुलसीदास]] कृत [[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]] एवं [[मलिक मोहम्मद जायसी|मलिक मुहम्मद जायसी]] कृत [[पद्मावत]] सहित कई प्रमुख ग्रंथ इसी बोली की देन है।<ref>{{cite news
|url=http://www.jagran.com/uttar-pradesh/aligarh-city-11589070.html
|title=अवध की मिट्टी में प्रेम-सौहार्द की महक
|date=१४ सितम्बर २०१४
|work=महाराष्ट्र टाइम्स
|language=hi
|access-date=19 सितंबर 2014
|archive-url=https://web.archive.org/web/20170422134648/http://www.jagran.com/uttar-pradesh/aligarh-city-11589070.html
|archive-date=22 अप्रैल 2017
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}}</ref><ref>{{cite news
|url=http://maharashtratimes.indiatimes.com/maharashtra/nagpur-vidarbha/bhasha/articleshow/42400396.cms
|title=भाषा सक्तीने नव्हे, हृदयातून समृद्ध होते
|date=29 अगस्त 2014
|work=जागरण
|language=hi
}}{{Dead link|date=सितंबर 2024 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> इसका केन्द्र [[अयोध्या]] है। अयोध्या [[लखनऊ]] से १२० किमी की दूरी पर पूर्व में है। [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'|सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला']], [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|पं महावीर प्रसाद द्विवेदी]], [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]], [[राममनोहर लोहिया]], [[कुँवर नारायण|कुंवर नारायण]], [[दिवाकर द्विवेदी]] की यह जन्मभूमि है। उमराव जान, [[नरेन्द्र देव|आचार्य नरेन्द्र देव]] और [[राम प्रकाश द्विवेदी]] की कर्मभूमि भी यही है। [[रमई काका]] की लोकवाणी भी इसी भाषा में गुंजरित हुई। हिंदी के रीतिकालीन कवि द्विजदेव के वंशज अयोध्या का राजपरिवार है। इसी परिवार की एक कन्या का विवाह दक्षिण कोरिया के राजघराने में अरसा पहले हुआ था। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ्ा त्रिपाठी ने अवधी भाषा और व्याकरण पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। [[फ़ाहियान|फाह्यान]] ने भी अपने विवरण में अयोध्या का जिक्र किया है। आज की अवधी प्रवास और संस्कृतिकरण के चलते खड़ी बोली और अंग्रेजी के प्रभाव में आ रही है।<ref>{{cite news
|url=http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/article1-story-0-0-245320.html
|title=गोस्वामी तुलसीदास अवधी भाषा के श्रेष्ठतम कवि
|date=२५ जुलाई २०१४
|work=लाइव हिंदुस्तान
|language=hi
|access-date=19 सितंबर 2014
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}}</ref>
अवधी के पश्चिम में पश्चिमी वर्ग की बुंदेली और ब्रज का, दक्षिण में छत्तीसगढ़ी का और पूर्व में भोजपुरी बोली का क्षेत्र है। इसके उत्तर में नेपाल की [[तराई क्षेत्र|तराई]] है ।
== व्याकरण ==
हिंदी खड़ीबोली से अवधी की विभिन्नता मुख्य रूप से व्याकरणात्मक है। इसमें कर्ता कारक के परसर्ग (विभक्ति) "ने" का नितांत अभाव है। अन्य परसर्गों के प्राय: दो रूप मिलते हैं- ह्रस्व और दीर्घ। (कर्म-संप्रदान-संबंध : क, का; करण-अपादान : स-त, से-ते; अधिकरण : म, मा)।
'''[[संज्ञा]]ओं''' की खड़ीबोली की तरह दो विभक्तियाँ होती हैं- विकारी और अविकारी। अविकारी विभक्ति में संज्ञा का मूल रूप (राम, लरिका, बिटिया, मेहरारू) रहता है और विकारी में बहुवचन के लिए "न" प्रत्यय जोड़ दिया जाता है (यथा रामन, लरिकन, बिटियन, मेहरारुन)। कर्ता और कर्म के अविकारी रूप में व्यंजनान्त संज्ञाओं के अंत में कुछ बोलियों में एक ह्रस्व "उ" की श्रुति होती है (यथा रामु, पूतु, चोरु)। किंतु निश्चय ही यह पूर्ण स्वर नहीं है और भाषाविज्ञानी इसे फुसफुसाहट के स्वर-ह्रस्व "इ" और ह्रस्व "ए" (यथा सांझि, खानि, ठेलुआ, पेहंटा) मिलते हैं।
संज्ञाओं के बहुधा दो रूप, ह्रस्व और दीर्घ (यथा नद्दी नदिया, घोड़ा घोड़वा, नाऊ नउआ, कुत्ता कुतवा) मिलते हैं। इनके अतिरिक्त अवधी क्षेत्र के पूर्वी भाग में एक और रूप-दीर्घतर मिलता है (यथा कुतउना)। अवधी में कहीं-कहीं खड़ीबोली का ह्रस्व रूप बिलकुल लुप्त हो गया है; यथा बिल्ली, डिब्बी आदि रूप नहीं मिलते बेलइया, डेबिया आदि ही प्रचलित हैं।
'''[[सर्वनाम]]''' में खड़ीबोली और ब्रज के "मेरा तेरा" और "मेरो तेरो" रूप के लिए अवधी में "मोर तोर" रूप हैं। इनके अतिरिक्त पूर्वी अवधी में पश्चिमी अवधी के "सो" "जो" "को" के समानांतर "से" "जे" "के" रूप प्राप्त हैं।
'''[[क्रिया]]''' में भविष्यकाल रूपों की प्रक्रिया खड़ीबोली से बिलकुल भिन्न है। खड़ीबोली में प्राय: प्राचीन वर्तमान (लट्) के तद्भव रूपों में- गा-गी-गे जोड़कर (यथा होगा, होगी, होंगे आदि) रूप बनाए जाते हैं। ब्रज में भविष्यत् के रूप प्राचीन भविष्यत्काल (लट्) के रूपों पर आधारित हैं। (यथा होइहैंउ भविष्यति, होइहोंउ भविष्यामि)। अवधी में प्राय: भविष्यत् के रूप तव्यत् प्रत्ययांत प्राचीन रूपों पर आश्रित हैं (होइबाउ भवितव्यम्)। अवधी की पश्चिमी बोलियों में केवल उत्तमपुरुष बहुवचन के रूप तव्यतांत रूपों पर निर्भर हैं। शेष ब्रज की तरह प्राचीन भविष्यत् पर। किंतु मध्यवर्ती और पूर्वी बोलियों में क्रमश: तव्यतांत रूपों की प्रचुरता बढ़ती गई है। क्रियार्थक संज्ञा के लिए खड़ीबोली में "ना" प्रत्यय है (यथा होना, करना, चलना) और ब्रज में "नो" (यथा होनो, करनो, चलनो)। परंतु अवधी में इसके लिए "ब" प्रत्यय है (यथा होब, करब, चलब)। अवधी में निष्ठा एकवचन के रूप का "वा" में अंत होता है (यथा भवा, गवा, खावा)। [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] में इसके स्थान पर "ल" में अंत होनेवाले रूप मिलते हैं (यथा भइल, गइल)। अवधी का एक मुख्य भेदक लक्षण है अन्यपुरुष एकवचन की सकर्मक क्रिया के भूतकाल का रूप (यथा करिसि, खाइसि, मारिसि)। य-"सि" में अंत होनेवाले रूप अवधी को छोड़कर अन्यत्र नहीं मिलते। अवधी की सहायक क्रिया में रूप "ह" (यथा हइ, हइं), "अह" (अहइ, अइई) और "बाटइ" (यथा बाटइ, बाटइं) पर आधारित हैं।
ऊपर लिखे लक्षणों के अनुसार अवधी की बोलियों के तीन वर्ग माने गए हैं : पश्चिमी, मध्यवर्ती और पूर्वी। पश्चिमी बोली पर निकटता के कारण ब्रज का और पूर्वी पर भोजपुरी का प्रभाव है। इनके अतिरिक्त [[बघेली]] बोली का अपना अलग अस्तित्व है।
विकास की दृष्टि से अवधी का स्थान [[बृज|ब्रज]], [[कन्नौजी भाषा|कन्नौजी]] और [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] के बीच में पड़ता है। ब्रज की व्युत्पत्ति निश्चय ही [[शौरसेनी]] से तथा भोजपुरी की [[मागधी]] [[प्राकृत]] से हुई है। अवधी की स्थिति इन दोनों के बीच में होने के कारण इसका अर्धमागधी से निकलना मानना उचित होगा। खेद है कि अर्धमागधी का हमें जो प्राचीनतम रूप मिलता है वह पाँचवीं शताब्दी ईसवी का है और उससे अवधी के रूप निकालने में कठिनाई होती है। [[पालि भाषा|पालि]] भाषा में बहुधा ऐसे रूप मिलते हैं जिनसे अवधी के रूपों का विकास सिद्ध किया जा सकता है। संभवत: ये रूप प्राचीन अर्धमागधी के रहे होंगे।
== अवधी साहित्य ==
'''{{main|अवधी साहित्य}}'''
प्राचीन अवधी साहित्य की दो शाखाएँ हैं : एक भक्तिकाव्य और दूसरी प्रेमाख्यान काव्य। भक्तिकाव्य में गोस्वामी तुलसीदास का "रामचरितमानस" (सं. 1631) अवधी साहित्य की प्रमुख कृति है। इसकी भाषा संस्कृत शब्दावली से भरी है। "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" के अतिरिक्त तुलसीदास ने अन्य कई ग्रंथ अवधी में लिखे हैं। इसी भक्ति साहित्य के अंतर्गत लालदास का "[[अवधबिलास]]" आता है। इसकी रचना संवत् 1700 में हुई। इनके अतिरिक्त कई और भक्त कवियों ने रामभक्ति विषयक ग्रंथ लिखे।
संत कवियों में बाबा मलूकदास भी अवधी क्षेत्र के थे। इनकी बानी का अधिकांश अवधी में है। इनके शिष्य बाबा मथुरादास की बानी भी अधिकतर अवधी में है। बाबा धरनीदास यद्यपि छपरा जिले के थे तथापि उनकी बानी अवधी में प्रकाशित हुई। कई अन्य संत कवियों ने भी अपने उपदेश के लिए अवधी को अपनाया है।
प्रेमाख्यान काव्य में सर्वप्रसिद्ध ग्रंथ [[मलिक मोहम्मद जायसी|मलिक मुहम्मद जायसी]] रचित "पद्मावत" है जिसकी रचना "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" से 34 वर्ष पूर्व हुई। दोहे चौपाई का जो क्रम "[[पद्मावत]]" में है प्राय: वही "मानस" में मिलता है। प्रेमाख्यान काव्य में मुसलमान लेखकों ने सूफी मत का रहस्य प्रकट किया है। इस काव्य की परंपरा कई सौ वर्षों तक चलती रही। मंझन की "[[मधुमालती]]", उसमान की "चित्रावली", आलम की "माधवानल कामकंदला", नूरमुहम्मद की "इंद्रावती" और शेख निसार की "यूसुफ जुलेखा" इसी परंपरा की रचनाएँ हैं। शब्दावली की दृष्टि से ये रचनाएँ हिंदू कवियों के ग्रंथों से इस बात में भिन्न हैं कि इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की उतनी प्रचुरता नहीं है।
प्राचीन अवधी साहित्य में अधिकतर रचनाएँ देशप्रेम, समाजसुधार आदि विषयों पर और मुख्य रूप से व्यंग्यात्मक हैं। कवियों में [[प्रतापनारायण मिश्र]], बलभद्र दीक्षित "पढ़ीस", [[वंशीधर शुक्ल]], चंद्रभूषण द्विवेदी "[[रमई काका]]", गुरु प्रसाद सिंह "[[कवि मृगेश|मृगेश]]" और शारदाप्रसाद "भुशुंडि" विशेष उल्लेखनीय हैं।
प्रबंध की परंपरा में "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" के ढंग का एक महत्वपूर्ण आधुनिक ग्रंथ [[द्वारका प्रसाद मिश्र|द्वारिकाप्रसाद मिश्र]] का "[[कृष्णायन]]" है। इसकी भाषा और शैली "मानस" के ही समान है और ग्रंथकार ने कृष्णचरित प्राय: उसी तन्मयता और विस्तार से लिखा है जिस तन्मयता और विस्तार से [[तुलसीदास]] ने रामचरित अंकित किया है। मिश्र जी ने इस ग्रंथ की रचना द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि प्रबंध के लिए अवधी की प्रकृति आज भी वैसी ही उपादेय है जैसी तुलसीदास के समय में थी।
== अवधी लोक साहित्य ==
अवधी लोक साहित्य की एक समृद्ध परम्परा है। अवधी लोक साहित्य पर कई शोध हुए हैं। इनमें कुछ प्रमुख हैं-
#'''अवधी लोक साहित्य''' : डा॰ सरोजिनी रोहतगी (१९७१) द्वारा लिखित
== अवधी लोक गायन ==
प्राचीन काल में अवधी साहित्य केवल पद्द के रूप में फला फूला है। अतः अवधी लोक गायकी भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है।
अवधी कलाकारों को बिरहा, नौटंकी नाच, अहिरवा नृत्य, कंहरवा नृत्य, चमरवा नृत्य, कजरी आदि नाट्य विधाओं का आविष्कारक माना जाता है तथा इसमें इन्हे अभी भी महारत हासिल है।
अवधी की गारी तो पूरे अवध में प्रसिद्ध है, इसे विवाह के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाया जाता है। अवधी के सुप्रसिद्ध गायक [[दिवाकर द्विवेदी]] हैं।
== अवधी भाषा का संघर्ष ==
विश्व भर में 6 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा अवधी को अभी तक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिल सकी है।
इसी प्रकार फिजी में अवधी भाषा को फिजी हिंदी के रूप में प्रस्तुत करके भारत सरकार ने फिजी में भी अवधी के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है।
किन्तु इन्हीं सब के बीच नेपाल ने प्रांत संख्या ५ में अवधी को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान करके अवधी साहित्यकारों की कलम में जान फूंकने का कार्य किया है। इससे भारत के अवधी भाषी भी काफी उत्साहित हैं।
==इन्हें भी देखें==
* [[अवधी साहित्य]]
* [[अवधी दिवस]]
* [[रामचरितमानस]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{InterWiki|code=awa}}
* [https://web.archive.org/web/20190508071119/http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%A7%E0%A5%80 अवधी कविता कोश]
* [https://web.archive.org/web/20140808060959/http://books.google.co.in/books?id=BfYWgO-dnn0C&printsec=frontcover#v=onepage&q=&f=false अवधी ग्रन्थावली] (गूगल पुस्तक)
* [https://web.archive.org/web/20140808061027/http://books.google.co.in/books?id=aupRtbV8-2gC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false अवधी ग्रन्थावली, भाग - २ ] (गूगल पुस्तक ; लेखक - जगदीश पीयूष)
*[[:iso639-3:awa|एसआईएल इंटरनेशनल पर अवधी की प्रविष्टि]]
*[https://hi.wiktionary.org/wiki/विक्षनरी:अवधी_शब्दकोश अवधी शब्दकोश] (हिन्दी विक्षनरी पर)
*[https://hi.wiktionary.org/wiki/विक्षनरी:अवधी_साहित्य_कोश अवधी साहित्य कोश] (हिन्दी विक्षनरी पर)
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[[चित्र:Awadhi language.png|अंगूठाकार|'''अवधी क्षेत्र''' ]]
'''अवधी''' [[हिन्दी|हिंदी]] क्षेत्र की एक [[उपभाषा|भाषा]] है। यह [[उत्तर प्रदेश]] के "अवध क्षेत्र" ([[लखनऊ]], [[रायबरेली]], [[सुल्तानपुर]], [[बाराबंकी]], [[उन्नाव]], [[हरदोई]], [[सीतापुर]], [[लखीमपुर]], [[अयोध्या]], [[जौनपुर]], [[प्रतापगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश|प्रतापगढ़]], [[इलाहाबाद|प्रयागराज]], [[मिर्ज़ापुर|मिर्जापुर]], [[कौशाम्बी (बहुविकल्पी)|कौशाम्बी]], [[अम्बेडकर नगर ज़िला|अम्बेडकर नगर]], [[गोण्डा|गोंडा]],[[बस्ती]], [[बहराइच]],[[बलरामपुर]], [[सिद्धार्थनगर जिला|सिद्धार्थनगर]], [[श्रावस्ती जिला|श्रावस्ती]] तथा [[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]]) में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त इसकी एक शाखा [[बघेलखंड]] में [[बघेली]] नाम से प्रचलित है। 'अवध' शब्द की [[व्युत्पत्तिशास्त्र|व्युत्पत्ति]] "[[अयोध्या]]" से है। इस नाम का एक सूबा के राज्यकाल में था। [[तुलसीदास]] ने अपने "मानस" में [[अयोध्या]] को 'अवधपुरी' कहा है। इसी क्षेत्र का पुराना नाम '[[कोशल|कोसल]]' भी था जिसकी महत्ता प्राचीन काल से चली आ रही है।<ref>{{cite news
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|title=कल की बोली आज की भाषा
|date=17 सितम्बर 2014
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}}</ref><ref>{{cite news
|url=http://naidunia.jagran.com/magazine/tarang-hindi-is-struggling-with-regional-languages-182086
|title=हिंदी से भिड़ती बोलियां
|date=13 सितम्बर 2014
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|title=भाषाओं में न हो प्रतिस्पर्धा का भाव
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|title=निज भाषा उन्नति है सब धर्मों का मूल
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भाषा शास्त्री डॉ॰ सर "जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन" के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार अवधी बोलने वालों की कुल आबादी 1615458 थी जो सन् 1971 की जनगणना में 28399552 हो गई। मौजूदा समय में शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 6 करोड़ से ज्यादा लोग अवधी बोलते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त के 21 जिलों- [[सुलतानपुर जिला|सुल्तानपुर]], [[अमेठी]], [[बाराबंकी]], [[प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश|प्रतापगढ़]], [[इलाहाबाद|प्रयागराज]], [[मिर्ज़ापुर|मिर्जापुर]], [[कौशाम्बी जिला|कौशांबी]], [[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]], [[रायबरेली]], [[उन्नाव]], [[लखनऊ]], [[हरदोई]], [[सीतापुर]], [[लखीमपुर, उत्तर प्रदेश|लखीमपुर खीरी]], [[बहराइच]], [[श्रावस्ती]], [[बलरामपुर]], [[गोण्डा|गोंडा]], [[अम्बेडकर नगर ज़िला|अंबेडकर नगर]] व [[अयोध्या]] में पूरी तरह से यह बोली जाती है। जबकि 7 जिलों- [[जौनपुर]], [[कानपुर]], [[शाहजहाँपुर जिला|शाहजहांपुर]], आजमगढ़,[[सिद्धार्थनगर जिला|सिद्धार्थनगर]], [[बस्ती, उत्तर प्रदेश|बस्ती]] और [[बांदा, उत्तर प्रदेश|बांदा]] के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग होता है। देश [[नेपाल]] के कई जिलों - बांके जिला, बर्दिया जिला, दांग जिला, [[कपिलवस्तु]] जिला, पश्चिमी नवलपरासी जिला, रुपन्देही जिला, कंचनपुर जिला आदि में यह काफी प्रचलित है। इसी प्रकार दुनिया के अन्य देशों- [[मॉरिशस]], त्रिनिदाद एवं टुबैगो, [[फ़िजी|फिजी]], गयाना, [[सूरीनाम]] सहित [[ऑस्ट्रेलिया|आस्ट्रेलिया]], [[न्यूज़ीलैण्ड|न्यूजीलैंड]] व [[हॉलैंड (नीदरलैंड)]] में भी लाखों की संख्या में अवधी बोलने वाले लोग हैं।
== अवधी भाषी क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार ==
अवधी प्रमुख रूप से [[भारत]], [[नेपाल]] और [[फ़िजी|फिजी]] में बोली जाती है।
भारत में अवधी मुख्यतः उत्तर प्रदेश राज्य में बोली जाती है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार के कुछ जिलों में बोली जाती है।
उत्तर प्रदेश के अवधी भाषी जिले:
अमेठी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, रायबरेली, प्रयागराज, मिर्जापुर, कौशांबी, अम्बेडकर नगर, सिद्धार्थ नगर, गोंडा, बलरामपुर, बाराबंकी, अयोध्या, लखनऊ, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बस्ती एवं फतेहपुर।
नेपाल के अवधी भाषी जिले कपिलवस्तु, बर्दिया, डांग, रूपनदेही, नवलपरासी, कंचनपुर, बांके आदि तराई नेपाल के जिले।
इसी प्रकार दुनिया के अन्य देशों- मॉरिशस, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, फिजी, गयाना, सूरीनाम सहित आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व हॉलैंड (नीदरलैंड) में भी लाखों की संख्या में अवधी बोलने वाले लोग हैं।
== परिचय ==
गठन की दृष्टि से हिंदी क्षेत्र की भाषाओं को दो वर्गों-पश्चिमी और पूर्वी में विभाजित किया जाता है। अवधी पूर्वी के अंतर्गत है। पूर्वी की दूसरी भाषा [[छत्तीसगढ़ी भाषा|छत्तीसगढ़ी]] है। अवधी को कभी-कभी बैसवाड़ी भी कहते हैं। परंतु बैसवाड़ी अवधी की एक बोली मात्र है जो [[उन्नाव]], [[लखनऊ]], [[रायबरेली]],[[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]] और [[सिंगरौली, मध्यप्रदेश|सिंगरौली]] जिले के कुछ भागों में बोली जाती है।
[[तुलसीदास]] कृत [[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]] एवं [[मलिक मोहम्मद जायसी|मलिक मुहम्मद जायसी]] कृत [[पद्मावत]] सहित कई प्रमुख ग्रंथ इसी बोली की देन है।<ref>{{cite news
|url=http://www.jagran.com/uttar-pradesh/aligarh-city-11589070.html
|title=अवध की मिट्टी में प्रेम-सौहार्द की महक
|date=१४ सितम्बर २०१४
|work=महाराष्ट्र टाइम्स
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|access-date=19 सितंबर 2014
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|title=भाषा सक्तीने नव्हे, हृदयातून समृद्ध होते
|date=29 अगस्त 2014
|work=जागरण
|language=hi
}}{{Dead link|date=सितंबर 2024 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> इसका केन्द्र [[अयोध्या]] है। अयोध्या [[लखनऊ]] से १२० किमी की दूरी पर पूर्व में है। [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'|सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला']], [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|पं महावीर प्रसाद द्विवेदी]], [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]], [[राममनोहर लोहिया]], [[कुँवर नारायण|कुंवर नारायण]], [[दिवाकर द्विवेदी]] की यह जन्मभूमि है। उमराव जान, [[नरेन्द्र देव|आचार्य नरेन्द्र देव]] और [[राम प्रकाश द्विवेदी]] की कर्मभूमि भी यही है। [[रमई काका]] की लोकवाणी भी इसी भाषा में गुंजरित हुई। हिंदी के रीतिकालीन कवि द्विजदेव के वंशज अयोध्या का राजपरिवार है। इसी परिवार की एक कन्या का विवाह दक्षिण कोरिया के राजघराने में अरसा पहले हुआ था। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ्ा त्रिपाठी ने अवधी भाषा और व्याकरण पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। [[फ़ाहियान|फाह्यान]] ने भी अपने विवरण में अयोध्या का जिक्र किया है। आज की अवधी प्रवास और संस्कृतिकरण के चलते खड़ी बोली और अंग्रेजी के प्रभाव में आ रही है।<ref>{{cite news
|url=http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/article1-story-0-0-245320.html
|title=गोस्वामी तुलसीदास अवधी भाषा के श्रेष्ठतम कवि
|date=२५ जुलाई २०१४
|work=लाइव हिंदुस्तान
|language=hi
|access-date=19 सितंबर 2014
|archive-date=1 दिसंबर 2021
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}}</ref>
अवधी के पश्चिम में पश्चिमी वर्ग की बुंदेली और ब्रज का, दक्षिण में छत्तीसगढ़ी का और पूर्व में भोजपुरी बोली का क्षेत्र है। इसके उत्तर में नेपाल की [[तराई क्षेत्र|तराई]] है ।
== व्याकरण ==
हिंदी खड़ीबोली से अवधी की विभिन्नता मुख्य रूप से व्याकरणात्मक है। इसमें कर्ता कारक के परसर्ग (विभक्ति) "ने" का नितांत अभाव है। अन्य परसर्गों के प्राय: दो रूप मिलते हैं- ह्रस्व और दीर्घ। (कर्म-संप्रदान-संबंध : क, का; करण-अपादान : स-त, से-ते; अधिकरण : म, मा)।
'''[[संज्ञा]]ओं''' की खड़ीबोली की तरह दो विभक्तियाँ होती हैं- विकारी और अविकारी। अविकारी विभक्ति में संज्ञा का मूल रूप (राम, लरिका, बिटिया, मेहरारू) रहता है और विकारी में बहुवचन के लिए "न" प्रत्यय जोड़ दिया जाता है (यथा रामन, लरिकन, बिटियन, मेहरारुन)। कर्ता और कर्म के अविकारी रूप में व्यंजनान्त संज्ञाओं के अंत में कुछ बोलियों में एक ह्रस्व "उ" की श्रुति होती है (यथा रामु, पूतु, चोरु)। किंतु निश्चय ही यह पूर्ण स्वर नहीं है और भाषाविज्ञानी इसे फुसफुसाहट के स्वर-ह्रस्व "इ" और ह्रस्व "ए" (यथा सांझि, खानि, ठेलुआ, पेहंटा) मिलते हैं।
संज्ञाओं के बहुधा दो रूप, ह्रस्व और दीर्घ (यथा नद्दी नदिया, घोड़ा घोड़वा, नाऊ नउआ, कुत्ता कुतवा) मिलते हैं। इनके अतिरिक्त अवधी क्षेत्र के पूर्वी भाग में एक और रूप-दीर्घतर मिलता है (यथा कुतउना)। अवधी में कहीं-कहीं खड़ीबोली का ह्रस्व रूप बिलकुल लुप्त हो गया है; यथा बिल्ली, डिब्बी आदि रूप नहीं मिलते बेलइया, डेबिया आदि ही प्रचलित हैं।
'''[[सर्वनाम]]''' में खड़ीबोली और ब्रज के "मेरा तेरा" और "मेरो तेरो" रूप के लिए अवधी में "मोर तोर" रूप हैं। इनके अतिरिक्त पूर्वी अवधी में पश्चिमी अवधी के "सो" "जो" "को" के समानांतर "से" "जे" "के" रूप प्राप्त हैं।
'''[[क्रिया]]''' में भविष्यकाल रूपों की प्रक्रिया खड़ीबोली से बिलकुल भिन्न है। खड़ीबोली में प्राय: प्राचीन वर्तमान (लट्) के तद्भव रूपों में- गा-गी-गे जोड़कर (यथा होगा, होगी, होंगे आदि) रूप बनाए जाते हैं। ब्रज में भविष्यत् के रूप प्राचीन भविष्यत्काल (लट्) के रूपों पर आधारित हैं। (यथा होइहैंउ भविष्यति, होइहोंउ भविष्यामि)। अवधी में प्राय: भविष्यत् के रूप तव्यत् प्रत्ययांत प्राचीन रूपों पर आश्रित हैं (होइबाउ भवितव्यम्)। अवधी की पश्चिमी बोलियों में केवल उत्तमपुरुष बहुवचन के रूप तव्यतांत रूपों पर निर्भर हैं। शेष ब्रज की तरह प्राचीन भविष्यत् पर। किंतु मध्यवर्ती और पूर्वी बोलियों में क्रमश: तव्यतांत रूपों की प्रचुरता बढ़ती गई है। क्रियार्थक संज्ञा के लिए खड़ीबोली में "ना" प्रत्यय है (यथा होना, करना, चलना) और ब्रज में "नो" (यथा होनो, करनो, चलनो)। परंतु अवधी में इसके लिए "ब" प्रत्यय है (यथा होब, करब, चलब)। अवधी में निष्ठा एकवचन के रूप का "वा" में अंत होता है (यथा भवा, गवा, खावा)। [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] में इसके स्थान पर "ल" में अंत होनेवाले रूप मिलते हैं (यथा भइल, गइल)। अवधी का एक मुख्य भेदक लक्षण है अन्यपुरुष एकवचन की सकर्मक क्रिया के भूतकाल का रूप (यथा करिसि, खाइसि, मारिसि)। य-"सि" में अंत होनेवाले रूप अवधी को छोड़कर अन्यत्र नहीं मिलते। अवधी की सहायक क्रिया में रूप "ह" (यथा हइ, हइं), "अह" (अहइ, अइई) और "बाटइ" (यथा बाटइ, बाटइं) पर आधारित हैं।
ऊपर लिखे लक्षणों के अनुसार अवधी की बोलियों के तीन वर्ग माने गए हैं : पश्चिमी, मध्यवर्ती और पूर्वी। पश्चिमी बोली पर निकटता के कारण ब्रज का और पूर्वी पर भोजपुरी का प्रभाव है। इनके अतिरिक्त [[बघेली]] बोली का अपना अलग अस्तित्व है।
विकास की दृष्टि से अवधी का स्थान [[बृज|ब्रज]], [[कन्नौजी भाषा|कन्नौजी]] और [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] के बीच में पड़ता है। ब्रज की व्युत्पत्ति निश्चय ही [[शौरसेनी]] से तथा भोजपुरी की [[मागधी]] [[प्राकृत]] से हुई है। अवधी की स्थिति इन दोनों के बीच में होने के कारण इसका अर्धमागधी से निकलना मानना उचित होगा। खेद है कि अर्धमागधी का हमें जो प्राचीनतम रूप मिलता है वह पाँचवीं शताब्दी ईसवी का है और उससे अवधी के रूप निकालने में कठिनाई होती है। [[पालि भाषा|पालि]] भाषा में बहुधा ऐसे रूप मिलते हैं जिनसे अवधी के रूपों का विकास सिद्ध किया जा सकता है। संभवत: ये रूप प्राचीन अर्धमागधी के रहे होंगे।
== अवधी साहित्य ==
'''{{main|अवधी साहित्य}}'''
प्राचीन अवधी साहित्य की दो शाखाएँ हैं : एक भक्तिकाव्य और दूसरी प्रेमाख्यान काव्य। भक्तिकाव्य में गोस्वामी तुलसीदास का "रामचरितमानस" (सं. 1631) अवधी साहित्य की प्रमुख कृति है। इसकी भाषा संस्कृत शब्दावली से भरी है। "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" के अतिरिक्त तुलसीदास ने अन्य कई ग्रंथ अवधी में लिखे हैं। इसी भक्ति साहित्य के अंतर्गत लालदास का "[[अवधबिलास]]" आता है। इसकी रचना संवत् 1700 में हुई। इनके अतिरिक्त कई और भक्त कवियों ने रामभक्ति विषयक ग्रंथ लिखे।
संत कवियों में बाबा मलूकदास भी अवधी क्षेत्र के थे। इनकी बानी का अधिकांश अवधी में है। इनके शिष्य बाबा मथुरादास की बानी भी अधिकतर अवधी में है। बाबा धरनीदास यद्यपि छपरा जिले के थे तथापि उनकी बानी अवधी में प्रकाशित हुई। कई अन्य संत कवियों ने भी अपने उपदेश के लिए अवधी को अपनाया है।
प्रेमाख्यान काव्य में सर्वप्रसिद्ध ग्रंथ [[मलिक मोहम्मद जायसी|मलिक मुहम्मद जायसी]] रचित "पद्मावत" है जिसकी रचना "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" से 34 वर्ष पूर्व हुई। दोहे चौपाई का जो क्रम "[[पद्मावत]]" में है प्राय: वही "मानस" में मिलता है। प्रेमाख्यान काव्य में मुसलमान लेखकों ने सूफी मत का रहस्य प्रकट किया है। इस काव्य की परंपरा कई सौ वर्षों तक चलती रही। मंझन की "[[मधुमालती]]", उसमान की "चित्रावली", आलम की "माधवानल कामकंदला", नूरमुहम्मद की "इंद्रावती" और शेख निसार की "यूसुफ जुलेखा" इसी परंपरा की रचनाएँ हैं। शब्दावली की दृष्टि से ये रचनाएँ हिंदू कवियों के ग्रंथों से इस बात में भिन्न हैं कि इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की उतनी प्रचुरता नहीं है।
प्राचीन अवधी साहित्य में अधिकतर रचनाएँ देशप्रेम, समाजसुधार आदि विषयों पर और मुख्य रूप से व्यंग्यात्मक हैं। कवियों में [[प्रतापनारायण मिश्र]], बलभद्र दीक्षित "पढ़ीस", [[वंशीधर शुक्ल]], चंद्रभूषण द्विवेदी "[[रमई काका]]", गुरु प्रसाद सिंह "[[कवि मृगेश|मृगेश]]" और शारदाप्रसाद "भुशुंडि" विशेष उल्लेखनीय हैं।
प्रबंध की परंपरा में "[[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]]" के ढंग का एक महत्वपूर्ण आधुनिक ग्रंथ [[द्वारका प्रसाद मिश्र|द्वारिकाप्रसाद मिश्र]] का "[[कृष्णायन]]" है। इसकी भाषा और शैली "मानस" के ही समान है और ग्रंथकार ने कृष्णचरित प्राय: उसी तन्मयता और विस्तार से लिखा है जिस तन्मयता और विस्तार से [[तुलसीदास]] ने रामचरित अंकित किया है। मिश्र जी ने इस ग्रंथ की रचना द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि प्रबंध के लिए अवधी की प्रकृति आज भी वैसी ही उपादेय है जैसी तुलसीदास के समय में थी।
== अवधी लोक साहित्य ==
अवधी लोक साहित्य की एक समृद्ध परम्परा है। अवधी लोक साहित्य पर कई शोध हुए हैं। इनमें कुछ प्रमुख हैं-
#'''अवधी लोक साहित्य''' : डा॰ सरोजिनी रोहतगी (१९७१) द्वारा लिखित
== अवधी लोक गायन ==
प्राचीन काल में अवधी साहित्य केवल पद्द के रूप में फला फूला है। अतः अवधी लोक गायकी भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है।
अवधी कलाकारों को बिरहा, नौटंकी नाच, अहिरवा नृत्य, कंहरवा नृत्य, चमरवा नृत्य, कजरी आदि नाट्य विधाओं का आविष्कारक माना जाता है तथा इसमें इन्हे अभी भी महारत हासिल है।
अवधी की गारी तो पूरे अवध में प्रसिद्ध है, इसे विवाह के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाया जाता है। अवधी के सुप्रसिद्ध गायक [[दिवाकर द्विवेदी]] हैं।
== अवधी भाषा का संघर्ष ==
विश्व भर में 6 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा अवधी को अभी तक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिल सकी है।
इसी प्रकार फिजी में अवधी भाषा को फिजी हिंदी के रूप में प्रस्तुत करके भारत सरकार ने फिजी में भी अवधी के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है।
किन्तु इन्हीं सब के बीच नेपाल ने प्रांत संख्या ५ में अवधी को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान करके अवधी साहित्यकारों की कलम में जान फूंकने का कार्य किया है। इससे भारत के अवधी भाषी भी काफी उत्साहित हैं।
==इन्हें भी देखें==
* [[अवधी साहित्य]]
* [[अवधी दिवस]]
* [[रामचरितमानस]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{InterWiki|code=awa}}
* [https://web.archive.org/web/20190508071119/http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%A7%E0%A5%80 अवधी कविता कोश]
* [https://web.archive.org/web/20140808060959/http://books.google.co.in/books?id=BfYWgO-dnn0C&printsec=frontcover#v=onepage&q=&f=false अवधी ग्रन्थावली] (गूगल पुस्तक)
* [https://web.archive.org/web/20140808061027/http://books.google.co.in/books?id=aupRtbV8-2gC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false अवधी ग्रन्थावली, भाग - २ ] (गूगल पुस्तक ; लेखक - जगदीश पीयूष)
*[[:iso639-3:awa|एसआईएल इंटरनेशनल पर अवधी की प्रविष्टि]]
*[https://hi.wiktionary.org/wiki/विक्षनरी:अवधी_शब्दकोश अवधी शब्दकोश] (हिन्दी विक्षनरी पर)
*[https://hi.wiktionary.org/wiki/विक्षनरी:अवधी_साहित्य_कोश अवधी साहित्य कोश] (हिन्दी विक्षनरी पर)
{{हिन्दी की बोलियाँ}}
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[[श्रेणी:विश्व की भाषाएँ]]
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{{खराब अनुवाद|अंग्रेजी|English}}{{अंतरजाल}}
'''अंतरजाल''' या '''भू-जाल''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: Internet) एक वैश्विक [[कम्प्यूटर नेटवर्क|संगणक संजाल]] है जो विभिन्न प्रकार की [[सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी]] सुविधाएँ प्रदान करता है, जिसमें मानकीकृत [[संचार प्रोटोकॉल|संचार प्रोटोकॉलों]] का उपयोग करके परस्पर जुड़े जाल-तन्त्र शामिल हैं। यह [[इंटर-नेटवर्किंग|संजालों का एक संजाल]] है जिसमें स्थानीय से वैश्विक स्तर के निजी, सार्वजनिक, शैक्षणिक, व्यवसाय और सरकारी संजाल शामिल हैं, जो वैद्युतिक, तार-रहित और प्रकाशीय संजालीकरण तकनीकों की एक विस्तृत शृंखला से जुड़े हैं। अन्तर्जाल में सूचना संसाधनों और सेवाओं की एक विशाल शृंखला होती है, जैसे कि संयोजित [[हाइपरटेक्स्ट|अतिपाठ]] दस्तावेज़ और [[विश्व व्यापी वेब|विश्वव्यापी जाल]] के [[वेब ऐप्लीकेशन|अनुप्रयोगों]], [[ईमेल|वैद्युतिक पत्र]], [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|दूरभाषी]] और फ़ाइल साझाकरण।
1960 के दशक में ''अंतरजाल नेटवर्क'' की उत्पत्ति [[संयुक्त राज्य अमेरिका|संयुक्त राज्य]] संघीय सरकार द्वारा ''कंप्यूटर नेटवर्क'' के माध्यम से मज़बूत, ग़लती-सहिष्णु संचार के निर्माण के लिए शुरू की गई थी। 1985 के शुरुआती दिनों में वाणिज्यिक नेटवर्क और उद्यमों को जोड़ने से आधुनिक ''अंतरजाल'' पर संक्रमण की शुरुआत हुई, और तेजी से वृद्धि के कारण संस्थागत, व्यक्तिगत और ''मोबाइल कंप्यूटर नेटवर्क'' से जुड़े थे। 2000 के दशक के अंत तक, इसकी सेवाओं और प्रौद्योगिकियों को रोजमर्रा की जिंदगी के लगभग हर पहलू में शामिल किया गया था।
टेलीफ़ोनी, रेडियो, [[दूरदर्शन|टेलीविज़न]], पेपर मेल और अखबारों सहित अधिकांश पारंपरिक संचार मीडिया, [[ईमेल]] द्वारा पुनर्निर्मित, पुनर्निर्धारित, या अंतरजाल से दूर किए जाने वाले ईमेल सेवाओं, अंतरजाल टेलीफ़ोनी, अंतरजाल टेलीविजन, ऑनलाइन संगीत, डिजिटल समाचार पत्र, और ''वीडियो स्ट्रीमिंग वेबसाइटें'' अखबार, पुस्तक, और अन्य प्रिंट प्रकाशन वेबसाइट प्रौद्योगिकी के अनुकूल हैं, या ''ब्लॉगिंग'', ''वेब फ़ीड्स'' और ''ऑनलाइन समाचार एग्रीगेटर्स'' में पुन: स्थापित किए जा रहे हैं। ''अंतरजाल'' ने त्वरित ''मैसेजिंग'', ''अंतरजाल फ़ौरम'' और ''सोशल नेटवर्किंग'' के माध्यम से व्यक्तिगत इंटरैक्शन के नए रूपों को सक्षम और त्वरित किया है। ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं और छोटे व्यवसायों और उद्यमियों के लिए [[ऑनलाइन क्रय|ऑनलाइन खरीदारी]] तेजी से बढ़ी है, क्योंकि यह कंपनियों को एक बड़े बाजार की सेवा या पूरी तरह से ऑनलाइन वस्तुओं और सेवाओं को बेचने के लिए अपनी "ईंट और मोर्टार" उपस्थिति बढ़ाने में सक्षम बनाता है। ''अंतरजाल'' पर व्यापार से व्यापार और वित्तीय सेवाओं को पूरे उद्योगों में आपूर्ति शृंखला पर असर पड़ता है।
''अंतरजाल'' का उपयोग या उपयोग के लिए तकनीकी कार्यान्वयन या नीतियों में कोई केंद्रीकृत शासन नहीं है; प्रत्येक घटक ''नेटवर्क'' अपनी नीतियाँ निर्धारित करता है। ''अंतरजाल'', ''अंतरजाल प्रोटोकॉल एड्रेस'' (आए पी एड्रेस), ''स्पेस'' और ''डोमेन नेम सिस्टम'' (डी एन एस) में दो प्रमुख नाम रिक्त स्थान की केवल अति परिभाषा परिभाषाएँ एक रखरखाव संगठन, ''अंतरजाल कॉरपोरेशन फॉर असाइन्ड'' नाम और नंबर (आए सी ए एन एन)। मुख्य [[प्रोटोकॉल]] के तकनीकी आधारभूत और मानकीकरण, ''अंतरजाल इंजीनियरिंग टास्क फ़ोर्स'' (आए ई टी एफ़) की एक गतिविधि है, जो कि किसी भी गैर-लाभप्रद संगठन के साथ संबद्ध अंतरराष्ट्रीय सहभागी हैं, जो किसी को भी तकनीकी विशेषज्ञता में योगदान दे सकते हैं।
== इतिहास ==
{{main|अन्तरजाल का इतिहास}}''
पॉल बैरन और डोनल्ड डेविस द्वारा पैकेट स्विचिंग में संशोधन 1960 के दशक के मध्य में शुरू हुआ, और पैकेट ने एन पी एलनेटवर्क, ए आर पी ए एन ए टी, टायनेट, मेरिट नेटवर्क, टेलनेट, साइक्लेड्स जैसे नेटवर्क स्विच किए , 1960 के दशक और 1970 के दशक में विभिन्न [[प्रोटोकॉल]] का उपयोग करके विकसित किया गया था। ए आर पी ए एन ई टी परियोजना ने अंतरजालवर्किंग के लिए प्रोटोकॉल के विकास के लिए नेतृत्व किया, जिससे कई अलग-अलग नेटवर्क नेटवर्क के एक नेटवर्क में शामिल हो सकें। ए आर पी एन ई टी विकास दो नेटवर्क नोडों से शुरू हुआ, जो [[कैलिफ़ोर्निया]] , [[लॉस एंजेलिस|लॉस एंजिल्स]] (यू सी एल ए) हेनरी सैमुएरी स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग और लियोनार्ड क्लेनरॉक द्वारा निर्देशित एप्लाइड साइंस और एस आर आए अंतरराष्ट्रीय (एस आर आए) में एन एल एस सिस्टम में नेटवर्क मापन केंद्र के बीच जुड़े थे। 29 अक्टूबर 1969 को मेनलो पार्क, [[कैलिफ़ोर्निया]] में डगलस एंजेलबार्ट। तीसरी साइट यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, सांता बारबरा में कल्लेर फ्राइड इंटरएक्टिव मैथमेटिक्स सेंटर थी, इसके बाद यूटा विश्वविद्यालय यूटा ग्राफिक्स डिपार्टमेंट के पास था। भविष्य के विकास के शुरुआती संकेत में, 1971 के अंत तक पंद्रह स्थल युवा ए आर पी ए एन ए टी से जुड़े हुए थे। ये प्रारंभिक वर्ष 1972 की फ़िल्म कंप्यूटर नेटवर्क: द हेरल्ड्स ऑफ़ रिसोर्स शेयरिंग में प्रलेखित किए गए थे।
[[चित्र:Internet users by country world map.PNG|अंगूठाकार|436x436पिक्सेल|वर्ष २००९ में प्रति देश में अंतरजाल उपयोगकर्ता]]
ए आर पी ए एन ई टी पर प्रारंभिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग दुर्लभ थे। यूरोपीय डेवलपर्स एक्स 25 नेटवर्क विकसित करने के लिए चिंतित थे। उल्लेखनीय अपवाद १)1973 में नॉर्वेजियन सिज़्मिक अर्रे (नोर्स) थे, इसके बाद 1973 में स्वीडन ने तनुम पृथ्वी स्टेशन से उपग्रह लिंक और ब्रिटेन में पीटर टी। क्रिस्टीन के अनुसंधान समूह के साथ, शुरू में लंदन विश्वविद्यालय, कंप्यूटर विज्ञान संस्थान और बाद में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में। दिसंबर 1974 में, विनटन सर्फ़, योजोन दलाल और कार्ल सनशाइन द्वारा आर एफ़ सी 625 (अंतरजाल ट्रांसमिशन नियंत्रण कार्यक्रम की विशिष्टता) ने अंतरजाल को इस्तेमाल करने के लिए लघुकथ के रूप में अंतरजाल का इस्तेमाल किया और बाद में आरएफसी ने इस प्रयोग को दोहराया। 1981 में राष्ट्रीय विज्ञान फ़ाउंडेशन (एन एस एफ़) ने कम्प्यूटर साइंस नेटवर्क (सी एस एन ई टी) को वित्त पोषित करने के लिए ए आर पी ए एन ए टी तक पहुँच का विस्तार किया था। 1982 में, अंतरजाल प्रोटोकॉल सूट (टी सी पी / आए पी) को मानकीकृत किया गया था, जिससे दुनिया भर में इंटरकनेक्टेड नेटवर्क्स की अनुमति थी।
1983 में टी सी पी / आए पी नेटवर्क का विस्तार फिर से विस्तार हुआ, जब राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन नेटवर्क (एन एस एफ़ नेट) ने शोधकर्ताओं के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में [[महासंगणक|सुपरकंप्यूटर]] साइटों तक पहुंच प्रदान की, पहले ५६ केबीटी / एस की रफ्तार और बाद में 2.5 एमबीटी / एस और 45 एमबीटी / एस। वाणिज्यिक अंतरजाल सेवा प्रदाता (आए एस पी) 1990 के दशक के उत्तरार्ध में और 1990 के दशक के आरंभ में उभरा। 1990 में एआरपीएनेट को निष्क्रिय कर दिया गया था। 1995 तक, संयुक्त राज्य में अंतरजाल का पूरी तरह से व्यावसायीकरण किया गया था जब एन एस एफ़ एन टी को डिकमीशन किया गया था, जिससे वाणिज्यिक ट्रैफ़िक लेने के लिए अंतरजाल के इस्तेमाल पर अंतिम प्रतिबंध हटा दिया गया था। १९८० के दशक के उत्तरार्ध में और १९८० के दशक के उत्तरार्ध में और १९९० की शुरुआत में यूरोप में अंतरजाल का तेजी से विस्तार हुआ। दिसंबर १९९८ में एन एस एफ़ एन ई टी और यूरोप में नेटवर्क के बीच समर्पित ट्रान्साटलांटिक संचार की शुरुआत [[प्रिंसटन विश्वविद्यालय]] और [[स्टॉकहोम]], [[स्वीडन]] के बीच एक कम गति वाले उपग्रह रिले के साथ की गई थी। यद्यपि अन्य नेटवर्क प्रोटोकॉल जैसे कि यू यू पी पी इस समय से पहले अच्छी तरह से वैश्विक पहुँच थे, इसने इंटरकाँटिनेंटल नेटवर्क के रूप में अंतरजाल की शुरुआत की।
१९८९ के मध्य में अंतरजाल का सार्वजनिक [[वाणिज्य क्षेत्र|वाणिज्यिक]] उपयोग अंतरजाल के ५००,००० उपयोगकर्ताओं को एम सी आए मेल और कंपोसर्व की ईमेल क्षमताओं के साथ हुआ। बस महीने बाद 1 जनवरी १९९० को, पी एस आई नेट ने वाणिज्यिक उपयोग के लिए वैकल्पिक अंतरजाल रीढ़ की शुरुआत की; एक ऐसा नेटवर्क जो वाणिज्यिक अंतरजाल में बढ़ेगा जिसे आज हम जानते हैं मार्च १९९० में, एन एस एफ़ एन ई टी और यूरोप के बीच पहली उच्च गति वाली टी १ (१.५ एमबीटी / एस) लिंक, [[कॉर्नेल विश्वविद्यालय|कॉर्नेल यूनिवर्सिटी]] और [[यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान संगठन|सर्न]] के बीच स्थापित किया गया था, उपग्रहों में सक्षम होने की तुलना में बहुत अधिक मजबूत संचार की अनुमति थी। छः महीने बाद टिम बर्नर्स-ली, वर्डवेब, सीईआरएन प्रबंधन के दो साल के लॉबिंग के बाद पहला वेब ब्राउज़र लिखना शुरू कर देंगे। १९९० के दशक तक, बर्नर्स-ली ने काम कर रहे वेब: हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल (एचटीटीपी ०.९), हाइपरटेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज (एच टी एम एल), पहला वेब ब्राउज़र (जो कि एक एच टी एम एल एडिटर भी था, के लिए आवश्यक सभी उपकरण तैयार किए थे यूज़नेट समाचारसमूहों और एफ़टीपी फाइलों तक पहुंच सकता है), पहले एच टी टी पी सर्वर सॉफ़्टवेयर (बाद में सर्न एच टी टी पी डी के रूप में जाना जाता है), पहला वेब सर्वर, और पहला वेब पेज जो परियोजना को खुद ही वर्णित करता है १९९१ में वाणिज्यिक अंतरजाल एक्सचेंज की स्थापना की गई थी, जो पी एस आए नेट को अन्य वाणिज्यिक नेटवर्क सीईआरएफनेट और अल्टरनेट के साथ संवाद करने की अनुमति दे रहा था। १९९५ से अंतरजाल ने संस्कृति और वाणिज्य पर काफी प्रभाव डाला है, जिसमें ईमेल, त्वरित संदेश, टेलीफोनी (वॉयस ओवर अंतरजाल प्रोटोकॉल या वी ओ आए पी), दो-तरफा इंटरैक्टिव वीडियो कॉल, और वर्ल्ड वाइड वेब के पास त्वरित संचार की वृद्धि शामिल है इसकी चर्चा मंच, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग, और ऑनलाइन शॉपिंग साइटें डेटा की बढ़ती मात्रा १-जी बी आए टी / s, १०-जी बी आए टी, या अधिक पर काम कर फ़ाइबर ऑप्टिक नेटवर्क पर उच्च और उच्च गति पर प्रेषित होती है।
[[चित्र:Tim Berners-Lee.jpg|अंगूठाकार|टिम बर्नर्स ली अंतरजाल के निर्माता]]
अंतरजाल ऑनलाइन बढ़ने और ज्ञान, वाणिज्य, मनोरंजन और सोशल नेटवर्किंग से कहीं अधिक बढ़ती जा रही है। १९९० के अंत के दौरान, अनुमान लगाया गया कि सार्वजनिक अंतरजाल पर यातायात में प्रति वर्ष १०० प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि अंतरजाल उपयोगकर्ताओं की औसत वार्षिक वृद्धि २०% और ५०% के बीच थी। यह विकास अक्सर केंद्रीय प्रशासन की कमी के कारण होता है, जो नेटवर्क के जैविक विकास की अनुमति देता है, साथ ही साथ अंतरजाल प्रोटोकॉल की गैर-स्वामित्व वाली प्रकृति, जो विक्रेता अंतर को प्रोत्साहित करती है और किसी एक कंपनी को नेटवर्क पर बहुत अधिक नियंत्रण करने से रोकती है। ३१ मार्च २०११ तक, अंतरजाल उपयोगकर्ताओं की अनुमानित कुल संख्या २.०९५ अरब (विश्व जनसंख्या का ३०.२%) थी। यह अनुमान लगाया गया है कि १९९३ में अंतरजाल ने २-रास्ता दूरसंचार के माध्यम से बहने वाली जानकारी का केवल १% ही किया, २००० तक यह आँकड़ा ५१% हो गया, और २००७ तक अंतरजाल पर सभी दूरसंचार सूचनाओं में ९७% से अधिक डेटा लिया गया।
====== संक्षिप्त इतिहास ======
* '''१९६९''' [[टिम बर्नर्स ली]] ने अंतरजाल बनाया था। ''अंतरजाल'' ''अमेरिकी रक्षा विभाग'' के द्वारा ''यू सी एल ए'' के तथा ''स्टैनफोर्ड अनुसंधान संस्थान कंप्यूटर्स'' का ''नेटवर्किंग'' करके ''अंतरजाल'' की संरचना की गई।
* '''१९७९''' ''ब्रिटिश डाकघर'' पहला अंतरराष्ट्रीय ''कंप्यूटर नेटवर्क'' बना कर नये प्रौद्योगिकी का उपयोग करना आरम्भ किया।
* '''१९८०''' [[बिल गेट्स]] का आए बी एम के ''कंप्यूटर्स'' पर एक ''माइक्रोसॉफ़्ट ऑपरेटिंग सिस्टम'' लगाने के लिए सौदा हुआ।
* '''१९८४''' [[ऍप्लिकेशन सॉफ्टवेयर|ऐप्पल]] ने पहली बार फ़ाइलों और फ़ोल्डरों, ''ड्रॉप डाउन मेन्यू'', [[माउस]], ग्राफ़िक्स का प्रयोग आदि से युक्त "''आधुनिक सफल कम्प्यूटर''" लांच किया।
* '''१९८९''' ''टिम बेर्नर ली'' ने ''अंतरजाल'' पर संचार को सरल बनाने के लिए ''ब्राउज़रों'', पन्नों और ''लिंक'' का उपयोग कर के [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]] बनाया।
* '''१९९६''' [[गूगल]] ने ''स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय'' में एक अनुसंधान परियोजना शुरू किया जो कि दो साल बाद औपचारिक रूप से काम करने लगा।
* '''२००९''' ''डॉ स्टीफ़न वोल्फ़रैम'' ने "''[[वॉलफ्रेम अल्फा]]''" लाँच किया।
[[चित्र:Submarine cable map umap.png|center|thumb|500px|विश्व के समुद्री संचार केबल का मानचित्र (२०१५)]]
== प्रोटोकॉल ==
जबकि अंतरजाल इंफ्ऱास्ट्रक्चर में [[हार्डवेयर]] घटकों का उपयोग अक्सर अन्य सॉफ्टवेयर सिस्टमों का समर्थन करने के लिए किया जा सकता है, यह सॉफ्टवेयर का मानदंड और डिजाइन है जो अंतरजाल की विशेषता देता है और इसकी स्केलेबिलिटी और सफलता के लिए नींव प्रदान करता है। अंतरजाल सॉफ़्टवेयर सिस्टम के वास्तुशिल्प डिज़ाइन के लिए जिम्मेदारी अंतरजाल इंजीनियरिंग टास्क फ़ोर्स (आए ई टी एफ़) द्वारा धारित की गई है। आए ई टी एफ़ अंतरजाल वास्तुकला के विभिन्न पहलुओं के बारे में, किसी भी व्यक्ति के लिए मानक-सेटिंग वाले काम समूहों का आयोजन करता है। परिणामस्वरूप योगदान और मानक आए ई टी एफ़ वेब साइट पर टिप्पणियों के लिए अनुरोध (आर एफ़ सी) दस्तावेजों के रूप में प्रकाशित किए गए हैं। नेटवर्किंग के मुख्य तरीकों जो अंतरजाल को सक्षम करते हैं विशेष रूप से नामित आर एफ़ सी में निहित हैं जो कि अंतरजाल मानकों का गठन करते हैं। अन्य कम कठोर दस्तावेज केवल सूचनात्मक, प्रयोगात्मक या ऐतिहासिक हैं, या अंतरजाल तकनीकों को कार्यान्वित करते समय सर्वोत्तम वर्तमान प्रथाओं (बी सी पी) को दस्तावेज देते हैं।
अंतरजाल मानक अंतरजाल प्रोटोकॉल सूट के रूप में जाना जाता है एक रूपरेखा का वर्णन करता है। यह एक मॉडल वास्तुकला है जो तरीकों को एक प्रोटोकॉल के स्तरित सिस्टम में विभाजित करता है, मूल रूप से आरएफसी ११२२ और आर एफ़ सी ११२३ में प्रलेखित किया गया है। परतें पर्यावरण या क्षेत्र के अनुरूप होती हैं जिसमें उनकी सेवाएँ संचालित होती हैं। शीर्ष पर एक आवेदन परत है, सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में उपयोग किए गए एप्लिकेशन-विशिष्ट नेटवर्किंग विधियों के लिए स्थान। उदाहरण के लिए, एक वेब ब्राउज़र प्रोग्राम क्लाइंट-सर्वर एप्लिकेशन मॉडल और सर्वर और क्लाइंट के बीच इंटरैक्शन के एक विशिष्ट प्रोटोकॉल का उपयोग करता है, जबकि कई [[संगणक संचिका|फ़ाइल]] साझाकरण सिस्टम एक पीयर-टू-पीयर प्रतिमान का उपयोग करता है इस शीर्ष परत के नीचे, ट्रांसपोर्ट लेयर विभिन्न होस्ट्स पर अनुप्रयोगों को उचित डेटा विनिमय पद्धतियों के साथ नेटवर्क के माध्यम से तार्किक चैनल के साथ जोड़ता है।
[[चित्र:प्रोटोकौल स्टौक.png|पाठ=प्रोटोकौल स्टौक|अंगूठाकार|186x186पिक्सेल|चूँकि उपयोगकर्ता डेटा प्रोटोकॉल स्टैक के माध्यम से संसाधित होता है, प्रत्येक अमूर्त परत भेजने वाले मेज़बान पर सांकेतिकरण जानकारी जोड़ती है। मेज़बान और रूटर के बीच लिंक स्तर पर तार पर डेटा प्रेषित होता है प्राप्त होस्ट द्वारा इनकिप्सुलेशन हटा दी जाती है। प्रत्येक हॉप पर इंटरमीडिएट रिले लिंक लिंक को अपडेट करते हैं, और रूटिंग उद्देश्यों के लिए आईपी परत का निरीक्षण करते हैं।]]
इन परतों को समझना नेटवर्किंग प्रौद्योगिकियां हैं जो नेटवर्क को अपनी सीमाओं पर एक दूसरे से जुड़ते हैं और उनके बीच यातायात का आदान-प्रदान करते हैं। अंतरजाल स्तर [[अंतरजाल नियमावली|अंतरजाल प्रोटोकॉल]] (आए पी) पते के माध्यम से एक दूसरे को पहचानने और खोजने के लिए कंप्यूटरों को सक्षम बनाता है, और मध्यवर्ती (ट्रांज़िट) नेटवर्क के माध्यम से अपने ट्रैफिक को रूट करता है। अंतिम, आर्किटेक्चर के निचले भाग में लिंक परत है, जो समान नेटवर्क लिंक पर मेजबानों के बीच लॉजिकल कनेक्टिविटी प्रदान करता है, जैसे स्थानीय क्षेत्र नेटवर्क (एल ए एन) या डायल-अप कनेक्शन। मॉडल, जिसे टी सी पी / आए पी के रूप में भी जाना जाता है, को शारीरिक कनेक्शन के लिए उपयोग किए जाने वाले अंतर्निहित हार्डवेयर से अलग होने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो कि मॉडल किसी भी विस्तार से संबंधित नहीं है। अन्य मॉडलों को विकसित किया गया है, जैसे कि ओ एस आए मॉडल, जो संचार के हर पहलू में व्यापक होने का प्रयास करता है। हालांकि कई समानताएँ मॉडल के बीच मौजूद हैं, वे विवरण या कार्यान्वयन के विवरण में संगत नहीं हैं। फिर भी, टीसीपी / आए पी प्रोटोकॉल आमतौर पर ओ एस आए नेटवर्किंग की चर्चा में शामिल हैं।
अंतरजाल मॉडल का सबसे प्रमुख घटक अंतरजाल प्रोटोकॉल (आए पी) है, जो नेटवर्क पर कंप्यूटरों के लिए एड्रेसिंग सिस्टम, आए पी पते सहित, प्रदान करता है। आए पी अंतरजालवर्किंग को सक्षम करता है और संक्षेप में, अंतरजाल खुद को स्थापित करता है। अंतरजाल प्रोटोकॉल संस्करण ४ (आए पी वी ४) अंतरजाल की पहली पीढ़ी पर प्रयुक्त प्रारंभिक संस्करण है और अभी भी प्रमुख उपयोग में है। यह ४.३ अरब (१०९) मेजबानों को संबोधित करने के लिए डिजाइन किया गया था हालांकि, अंतरजाल के विस्फोटक वृद्धि ने आए पी वी ४ पते के थकावट को जन्म दिया है, जो २०११ में अपने अंतिम चरण में प्रवेश किया था, जब वैश्विक पता आवंटन पूल समाप्त हो गया था। एक नया प्रोटोकॉल संस्करण, [[अंतरजाल प्रोटोकॉल संस्करण ६|आए पी वी ६]], १९९० के दशक के मध्य में विकसित किया गया था, जो काफी बड़े पते क्षमताओं को प्रदान करता है और अंतरजाल यातायात के अधिक कुशल मार्ग प्रदान करता है। वर्तमान में [[अंतरजाल प्रोटोकॉल संस्करण ६|आए पी वी ६]] दुनिया भर में बढ़ते तैनाती में है, क्योंकि अंतरजाल ऐड्रेस रजिस्ट्री (आर आए आर) ने सभी संसाधन प्रबंधकों को त्वरित अपनाने और रूपांतरण की योजना बनाने के लिए आग्रह किया।
आए पी वी ७ आए पी वी ४ के साथ डिज़ाइन से सीधे इंटरऑपरेट नहीं है। संक्षेप में, यह अंतरजाल के एक समानांतर संस्करण को स्थापित करता है जो सीधे आए पी वी ४ सॉफ्टवेयर से सुलभ नहीं होता है। इस प्रकार, अंतरजालवर्किंग या नोड्स के लिए अनुवाद सुविधा मौजूद होने चाहिए, दोनों नेटवर्क के लिए डुप्लिकेट नेटवर्किंग सॉफ़्टवेयर होना चाहिए। मूल रूप से सभी आधुनिक कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम [[अंतरजाल नियमावली|अंतरजाल प्रोटोकॉल]] के दोनों संस्करणों का समर्थन करते हैं। हालांकि, नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर इस विकास में कम हो गया है। इसके बुनियादी ढाँचे को बनाने वाले भौतिक कनेक्शन के जटिल सरणी के अलावा, अंतरजाल को द्वि- या बहु-पार्श्व व्यावसायिक अनुबंधों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, उदाहरण के लिए, पीयरिंग समझौतों, और तकनीकी विनिर्देशों या प्रोटोकॉल द्वारा जो नेटवर्क पर डेटा के आदान-प्रदान का वर्णन करते हैं। दरअसल, अंतरजाल को इसके इंटरकनेक्शन और रूटिंग नीतियों द्वारा परिभाषित किया गया है।
== अभिशासन ==
अंतरजाल एक वैश्विक नेटवर्क है जिसमें कई स्वेच्छा से जुड़े हुए स्वायत्त नेटवर्क हैं। यह केंद्रीय शासी निकाय के बिना संचालित होता है कोर प्रोटोकॉल (आईपीवी ४ और [[अंतरजाल प्रोटोकॉल संस्करण ६|आईपीवी ६]]) की तकनीकी आधारभूत और मानकीकरण, अंतरजाल इंजीनियरिंग टास्क फोर्स (आईईटीएफ) की एक गतिविधि है, जो कि ढीला जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहभागियों का एक गैर-लाभकारी संगठन है जो किसी को भी तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान दे सकती है। इंटरऑपरेबिलिटी बनाए रखने के लिए, अंतरजाल का प्रमुख नाम रिक्त स्थान असाइन किया गया नाम और नंबर (आईसीएएनएन) के लिए अंतरजाल कॉरपोरेशन द्वारा प्रशासित किया जाता है। आईसीएएनएनएन एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा संचालित है जो अंतरजाल तकनीकी, व्यापार, अकादमिक और अन्य गैर-वाणिज्यिक समुदायों से प्राप्त है। आईसीएएनएन अंतरजाल प्रोटोकॉल में [[डोमेन नाम प्रणाली|डोमेन नाम]], [[अंतरजाल नियमावली|अंतरजाल प्रोटोकॉल]] (आईपी) पते, अनुप्रयोग पोर्ट नंबरों और अन्य कई मापदंडों सहित, अंतरजाल पर उपयोग के लिए अद्वितीय पहचानकर्ता के असाइनमेंट का समन्वयन करता है। अंतरजाल की वैश्विक पहुँच को बनाए रखने के लिए विश्व स्तर पर एकीकृत नाम रिक्त स्थान आवश्यक हैं। आईसीएएनएन की यह भूमिका वैश्विक अंतरजाल के लिए शायद केवल एक केंद्रीय समन्वयकारी संस्था है।
[[चित्र:ICANN headquarters in Playa Vista.jpg|अंगूठाकार|प्लेया विस्टा, लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में आएसीएएनएन मुख्यालय]]
क्षेत्रीय अंतरजाल रजिस्ट्री (आरआईआर) आईपी पते:
* अफ्रीका के लिए अफ्रीकी नेटवर्क सूचना केंद्र (ऐफ़्री एनआएसी)
* उत्तरी अमेरिका के लिए अंतरजाल नंबर (एआरआईएन) के लिए अमेरिकी रजिस्ट्री
* एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए एशिया-प्रशांत नेटवर्क सूचना केंद्र (एपीएनआईसी)
* लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के लिए लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई अंतरजाल पते रजिस्ट्री (एलएसीएनआईसी)
* रीसेओ आईपी यूरोफेन्स - यूरोप, मध्य पूर्व और मध्य एशिया के लिए नेटवर्क कोऑर्डिनेशन सेंटर (आरआईपीई एनसीसी)
संयुक्त राज्य के वाणिज्य विभाग की एक एजेंसी, राष्ट्रीय दूरसंचार और सूचना प्रशासन को १ अक्टूबर २०१६ को आएएएनए के नेतृत्व में संक्रमण तक डीएनएस रूट ज़ोन में परिवर्तन के लिए अंतिम स्वीकृति मिली थी। अंतरजाल सोसाइटी (आएएसओसी) की स्थापना १९९२ में "पूरे विश्व के सभी लोगों के लाभ के लिए अंतरजाल के खुले विकास, विकास और उपयोग को आश्वस्त करने" के लिए किया गया था। इसके सदस्यों में व्यक्तियों (किसी में शामिल हो सकते हैं) के साथ-साथ निगमों, संगठनों, सरकारें, और विश्वविद्यालय शामिल हैं अन्य गतिविधियों में अएएसओसी एक कम औपचारिक रूप से संगठित समूहों के लिए एक प्रशासनिक घर प्रदान करता है जो अंतरजाल के विकास और प्रबंधन में शामिल हैं, जिनमें शामिल हैं: अंतरजाल इंजीनियरिंग टास्क फोर्स (आएईटीएफ), अंतरजाल आर्किटेक्चर बोर्ड (आएएबी), अंतरजाल इंजीनियरिंग स्टीयरिंग ग्रुप (आएईएसजी) ), अंतरजाल रिसर्च टास्क फोर्स (आईआरटीएफ), और अंतरजाल रिसर्च स्टीयरिंग ग्रुप (आएआरएसजी)। १६ नवंबर २००५ को, [[तूनिस|तुनिस]] में संयुक्त राष्ट्र-प्रायोजित विश्व सम्मेलन ने अंतरजाल से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए अंतरजाल गवर्नेंस फोरम (आएजीएफ) की स्थापना की।
== दुष्प्रभाव ==
[[देव संस्कृति विश्वविद्यालय|देवसंस्कृती संस्कृति विश्वविद्यालय]] की शोध के अनुसार [[सोशल मीडिया|सोशल मिडिया]] के व्यसन का शिकार होने वाले विद्यार्थियों के निद्रा चक्र , भावनात्मक परिपक्वता और शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । जो युवा प्रतिदिन सोशल मीडिया पर ज्यादा समय व्यतीत करते हैं , उनमें अनिद्रा की समस्या उत्पन्न हो जाती है । अच्छी नींद का सामान्य स्वास्थ्य से गहरा संबंध होता है । अतः नींद की अवधि में कमी अथवा व्यवधान आने से संपूर्ण स्वास्थ्य असंतुलित हो जाता है और धीरे - धीरे अनेक समस्याएँ प्रकट होने लगती हैं । अध्ययन के परिणामों में यह भी पाया गया है कि सोशल मीडिया की आदत में महिला वर्ग की अपेक्षा पुरुष वर्ग में नींद की गुणवत्ता ज्यादा प्रभावित होती है । शोध के द्वितीय मापदंड में भावनात्मक परिपक्वता के स्तर का सर्वेक्षण किया है । इस संदर्भ में यह देखा गया कि सोशल मीडिया का एडिक्शन युवाओं की भावनात्मक योग्यता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है । क्रोध , चिड़चिड़ापन , आवेश , आलस्य , निराशा , आत्महीनता , आत्मविश्वास में कमी जैसी अनेक मनोव्याधियों के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण भावनात्मक परिपक्वता के स्तर में कमी ही है । अकेलापन महसूस करना , अवसाद , तनाव जैसी गंभीर समस्याएँ सोशल मीडिया के व्यसनी लोगों में सामान्य बात है । महिला वर्ग की भावनात्मक योग्यता पुरुष वर्ग की तुलना में ज्यादा प्रभावित होती है । विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों पर भी सोशल मीडिया की आदत का अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । शैक्षणिक गतिविधियों में लगने वाला कीमती समय जब सोशल साइट्स पर व्यतीत होने लगता है तो निश्चित रूप से विद्यार्थी के परीक्षा परिणाम पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । इसमें भी महिला वर्ग की तुलना में पुरुष वर्ग की शैक्षणिक योग्यता ज्यादा प्रभावित होती है । विद्यार्थियों में यह देखा गया है कि पढ़ाई की आवश्यक गतिविधियों ; जैसे- कक्षाओं में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य सामग्री , अध्यापकों से संवाद , पढ़ाई को लेकर सहपाठियों से पारस्परिक चर्चा जैसी अनेक महत्त्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ाने वाली गतिविधियों में न्यूनता आ जाती है । फलस्वरूप इसका सीधा दुष्परिणाम विद्यार्थी की शैक्षणिक उपलब्धि पर दिखाई देता है । विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों पर भी सोशल मीडिया की आदत का अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । शैक्षणिक गतिविधियों में लगने वाला कीमती समय जब सोशल साइट्स पर व्यतीत होने लगता है तो निश्चित रूप से विद्यार्थी के परीक्षा परिणाम पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । इसमें भी महिला वर्ग की तुलना में पुरुष वर्ग की शैक्षणिक योग्यता ज्यादा प्रभावित होती है ।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/akhand-jyoti-june-2023|title=Akhand Jyoti June 2023|last=All World Gayatri Pariwar|date=|year=2023|access-date=2023-06-20}}</ref>
== भूमिकारूप व्यवस्था ==
अंतरजाल के संचार बुनियादी ढाँचे में अपने [[हार्डवेयर]] घटकों और [[सॉफ्टवेयर]] परतों की एक प्रणाली होती है जो आर्किटेक्चर के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करती हैं।
==== रूटिंग और सेवा स्तर ====
[[चित्र:World map of submarine cables.png|अंगूठाकार|334x334पिक्सेल|दुनिया भर के पनडुब्बी फाइबरओप्टिक दूरसंचार केबल्स दिखा २००७ मानचित्र।]]
[[अन्तर्जाल सेवा प्रदाता|अंतरजाल सेवा प्रदाताओं]] के दायरे के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग नेटवर्क के बीच विश्वव्यापी कनेक्टिविटी की स्थापना अंतिम उपयोगकर्ता जो फ़ंक्शन करने या जानकारी प्राप्त करने के लिए केवल अंतरजाल तक पहुँचते हैं, रूटिंग पदानुक्रम के निचले भाग को दर्शाते हैं। रूटिंग पदानुक्रम के शीर्ष पर स्तरीय १ नेटवर्क हैं, बड़े दूरसंचार कंपनियाँ जो पीयरिंग समझौतों के माध्यम से सीधे एक-दूसरे के साथ यातायात का आदान-प्रदान करते हैं। टीयर २ और निचले स्तर के नेटवर्क्स अन्य प्रदाताओं के अंतरजाल ट्रांज़िट को वैश्विक अंतरजाल पर कम से कम कुछ पार्ट्स तक पहुंचाने के लिए खरीदते हैं, हालांकि वे पीयरिंग में भी व्यस्त हो सकते हैं। एक आईएसपी कनेक्टिविटी के लिए एक एकल अपस्ट्रीम प्रदाता का उपयोग कर सकता है, या अतिरेक और लोड संतुलन प्राप्त करने के लिए मल्टीहोमिंग को लागू कर सकता है अंतरजाल एक्सचेंज अंक भौतिक कनेक्शन के साथ कई आईएसपी के लिए प्रमुख यातायात एक्सचेंज हैं। शैक्षणिक संस्थानों, बड़े उद्यमों और सरकारों जैसे बड़े संगठन, [[भारतीय मानक समय|आईएसपी]] के रूप में समान कार्य कर सकते हैं, अपने आंतरिक नेटवर्क की ओर से पीयरिंग और क्रय ट्रांज़िट में शामिल हो सकते हैं। अनुसंधान नेटवर्क बड़े उप-नेटवर्क जैसे कि जीईएन्ट, ग्लोरियाड, अंतरजाल २ और [[यूनाइटेड किंगडम|यूके]] के राष्ट्रीय अनुसंधान और शिक्षा नेटवर्क, जेनेट के साथ आपस में जुड़े होते हैं। [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाईड वेब]] के अंतरजाल आईपी रूटिंग संरचना और हाइपरटेक्स्ट लिंक दोनों पैमाने पर मुक्त नेटवर्क के उदाहरण हैं। कंप्यूटर और रूटर अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में रूटिंग टेबल का उपयोग आईपी पैकेट को अगली-हॉप राउटर या गंतव्य के लिए डायल करने के लिए करते हैं। रूटिंग टेबल मैनुअल कॉन्फ़िगरेशन द्वारा या स्वचालित रूप से प्रोटोकॉल रूटिंग द्वारा बनाए जाते हैं। अंत-नोड्स आम तौर पर एक डिफ़ॉल्ट मार्ग का उपयोग करते हैं जो आईएसपी की तरफ पारगमन प्रदान करता है, जबकि आईएसपी रूटर्स ने बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल का उपयोग करने के लिए वैश्विक अंतरजाल के जटिल कनेक्शन भर में सबसे कुशल मार्ग स्थापित करने के लिए उपयोग किया है।
==== पहुँच ====
[[चित्र:Internet Access at Home.png|अंगूठाकार|311x311पिक्सेल|यह चित्र दिखाता है कि कैसे घर पर अंतरजाल का उपयोग समय के साथ बढ़ गया है]]
उपयोगकर्ताओं द्वारा अंतरजाल एक्सेस के सामान्य तरीके में टेलीफोन सर्किट, समाक्षीय केबल, [[फाइबर-ऑप्टिक संचारण|फाइबर ऑप्टिक]] या [[ताम्र|तांबे]] के तार, [[वाई-फ़ाई|वाई-फाई]], सैटेलाइट और सेलुलर टेलिफोन टेक्नोलॉजी (3 जी, 4 जी) के माध्यम से कंप्यूटर मॉडेम के साथ डायल-अप शामिल हैं। अक्सर पुस्तकालयों और अंतरजाल कैफे में कंप्यूटर से अंतरजाल को एक्सेस किया जा सकता है। अंतरजाल का उपयोग अंक कई सार्वजनिक स्थानों जैसे कि हवाई अड्डे के हॉल और कॉफी की दुकानों में मौजूद हैं। विभिन्न शब्दों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि सार्वजनिक अंतरजाल कियोस्क, सार्वजनिक एक्सेस टर्मिनल, और वेबपॉफोन। कई होटल में सार्वजनिक टर्मिनल भी हैं, हालांकि ये आमतौर पर शुल्क आधारित हैं। इन टर्मिनलों को विभिन्न उपयोगों, जैसे टिकट बुकिंग, बैंक जमा, या ऑनलाइन भुगतान के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। वाई-फाई स्थानीय कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से अंतरजाल के लिए वायरलेस एक्सेस प्रदान करता है। ऐसे पहुंच प्रदान करने वाले हॉटस्पॉट्स में वाई-फाई कैफे शामिल हैं, जहाँ उपयोगकर्ताओं को अपने वायरलेस उपकरणों जैसे [[लैपटॉप]] या [[पर्सनल डिजिटल एसिस्टेंट|पीडीए]] लाने की जरूरत है ये सेवाएँ सभी के लिए निःशुल्क, केवल ग्राहकों के लिए निःशुल्क या शुल्क-आधारित हो सकती हैं।
बड़े पैमाने पर प्रयासों ने वायरलेस कम्युनिटी नेटवर्क के लिए नेतृत्व किया है [[न्यूयॉर्क]], [[लंदन]], [[वियना|विएना]], [[टोरोंटो|टोरंटो]], [[सैन फ़्रांसिस्को|सैन फ्रांसिस्को]], [[फ़िलाडेल्फ़िया|फिलाडेल्फिया]], [[शिकागो]] और [[पिट्सबर्ग, पेन्सिलवेनिया|पिट्सबर्ग]] में बड़े शहर क्षेत्रों को कवर करने वाले वाणिज्यिक वाई-फाई सेवाओं को जगह दी गई है। तब पार्क को पार्क बेंच के रूप में अंतरजाल से एक्सेस किया जा सकता है। [[वाई-फ़ाई|वाई-फाई]] के अलावा, मालिकाना मोबाइल वायरलेस नेटवर्क जैसे रिकोशेट, सेलुलर फोन नेटवर्क पर विभिन्न उच्च गति वाली डेटा सेवाओं और निश्चित वायरलेस सेवाओं के साथ प्रयोग हुए हैं। उच्च अंत वाले मोबाइल फोन जैसे सामान्य रूप से स्मार्टफोन फ़ोन नेटवर्क के माध्यम से अंतरजाल एक्सेस के साथ आते हैं। ओपेरा जैसे [[वेब ब्राउज़र]] इन उन्नत हैंडसेट पर उपलब्ध हैं, जो कि कई अन्य अंतरजाल सॉफ़्टवेयर चला सकते हैं। अधिक मोबाइल फोन के पास पीसी की तुलना में अंतरजाल का उपयोग होता है, हालांकि यह व्यापक रूप से प्रयोग नहीं किया जाता है। एक अंतरजाल एक्सेस प्रदाता और प्रोटोकॉल मैट्रिक्स ऑनलाइन प्राप्त करने के लिए उपयोग किए जाने वाले तरीकों को अलग करता है।
== उपयोग के मुख्य क्षेत्रों ==
==== ई-व्यापार ====
[[चित्र:IBM head office Bangalore.jpg|अंगूठाकार|बैंगलोर में एक आईबीएम कार्यालय]]
ऑनलाइन व्यापार या ई-व्यवसाय एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग किसी भी प्रकार के व्यवसाय या व्यावसायिक लेनदेन के लिए किया जा सकता है जिसमें अंतरजाल पर सूचना साझा करना शामिल है वाणिज्य व्यवसायों, समूहों और व्यक्तियों के बीच उत्पादों और सेवाओं के आदान-प्रदान का गठन करता है और किसी भी व्यवसाय की आवश्यक गतिविधियों में से एक के रूप में देखा जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स आईसीटी के इस्तेमाल के लिए व्यक्तियों, समूहों और अन्य व्यवसायों के साथ बाहरी गतिविधियों और व्यापार के संबंधों को सक्षम करने के लिए केंद्रित करता है। अंतरजाल नेटवर्क की मदद से व्यवसाय करना। "ई-बिज़नेस" शब्द को १९९६ में [[आईबीएम]] के मार्केटिंग और अंतरजाल टीम ने बनाया था।
==== मास मीडिया ====
अंतरजाल प्रकाशन की शैली ऑफ़लाइन प्रकाशनों से अलग नहीं होती हैं - समाचार साइटें, साहित्यिक, गैर-कल्पना, बच्चों, महिलाओं, आदि हैं। हालांकि, अगर ऑफ़लाइन प्रकाशनों को समय-समय पर जारी किया जाता है (एक दिन, सप्ताह, महीने में), तो ऑनलाइन प्रकाशन अपडेट हो जाते हैं नई सामग्री के रूप में यहाँ अंतरजाल रेडियो और अंतरजाल टीवी भी है। अंतरजाल मीडिया के विकास के लिए धन्यवाद, पेपर प्रेस को पढ़ना पसंद करते लोगों की संख्या साल दर साल घट रही है। इसलिए, २००९ के सर्वेक्षणों ने दिखाया था कि १८ से ३५ वर्ष के अमेरिकी निवासियों के केवल १९% पेपर प्रेस के माध्यम से देखते हैं अमेरिका में कागज [[समाचारपत्र|समाचार पत्रों]] के पाठकों की औसत आयु ५५ साल है। १९९८ से २००९ तक अमेरिका में अखबारों का कुल परिचालन ६२ लाख से घटकर ४९ मिलियन प्रतियाँ हो गया है।
==== साहित्य, संगीत, सिनेमा ====
अंतरजाल के माध्यम से पहुँचने वाले इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकालयों में बड़ी संख्या में काम करता है उसी समय, [[वेब २.०|वेब]] पर उपलब्ध कई किताबें लंबे समय तक ग्रैबिलोग्राफ़िक दुर्लभता बन गई हैं, और कुछ भी प्रकाशित नहीं हुई हैं। नौसिखिए लेखकों और कवियों के रूप में, और कुछ प्रसिद्ध लेखक अंतरजाल पर अपनी रचनाएँ डालते हैं। अंतरजाल पर संगीत का प्रसार एमपी ३ प्रारूप के रूप में शुरू हुआ, फिर [[ऍमपी ४|एमपी ४]] आया। रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता को संरक्षित करते हुए अंतरजाल पर संचरण के लिए उपयुक्त आकारों में ऑडियो फाइलों को संकुचित करना। कलाकार की नई डिस्क से अलग-अलग गाने के अंतरजाल पर दिखने पर उसे एक अच्छा विज्ञापन माना जाता है और रिकॉर्डों की बिक्री के स्तर में काफी बढ़ोतरी होती है। अंतरजाल पर कई फिल्में भी पोस्ट की गई हैं, ज्यादातर अवैध रूप से व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले फ़ाइल-साझाकरण नेटवर्क तक पहुँचने के लिए (विशेष रूप से, प्रौद्योगिकी बिटटॉरेंट के उपयोग के साथ) प्रतिलिपि बनाने और अंतरजाल साहित्य, संगीत और फिल्में पोस्ट करने में आसानी के साथ, कॉपीराइट सुरक्षा की समस्या ने विशेष प्रासंगिकता हासिल कर ली है।
==== लिंक ====
[[ईमेल|ई-मेल]] वर्तमान में संचार के सर्वाधिक इस्तेमाल किए जाने वाले साधनों में से एक है इसके अलावा लोकप्रिय आईपी टेलीफोनी और इस तरह [[स्काइप]] (बंद स्रोत के साथ मुक्त मालिकाना सॉफ्टवेयर के रूप में कार्यक्रमों के उपयोग, एन्क्रिप्टेड ध्वनि और वीडियो संचार कंप्यूटर (वीओआईपी) के बीच अंतरजाल पर मोबाइल और लैंडलाइन पर कॉल के लिए, भुगतान सेवाओं को उपलब्ध कराने प्रौद्योगिकी सहकर्मी का उपयोग कर, और साथ ही फोन के लिए। हाल के वर्षों में, त्वरित संदेशवाहक, अंतरजाल के जरिए संदेश प्रेषित करते हुए, लोकप्रियता हासिल हुई है, वे रोजमर्रा की जिंदगी से सेल्युलर संचार को विस्थापित करना शुरू कर देते हैं, जो उनकी तुलना में अक्सर कार्यशीलता, गति और लागत में निम्नतर है। अंतरजाल का विकास, संचार के साधन के रूप में उपयोग किया जाता है, एक दूरस्थ नौकरी के रूप में रोजगार के इस फ़ॉर्म का एक बढ़ती प्रसार की ओर जाता है।
==== संचार ====
[[चित्र:Crowdsourcing.png|अंगूठाकार|255x255पिक्सेल|इस चित्र के द्वारा क्राऊडसोर्सिंग को दर्शाया गया है]]
अंतरजाल लोगों के बड़े पैमाने पर [[संचार]] का एक तरीका है, विभिन्न हितों से एकजुट है इसके लिए, [[अंतरजाल फोरम|अंतरजाल फ़ोरम]], [[चिट्ठा|ब्लॉग]] और सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है। सोशल नेटवर्क एक प्रकार का अंतरजाल हेवन बन गया है, जहाँ हर कोई अपने आभासी बनाने के लिए तकनीकी और सामाजिक आधार ढूँढ सकता है। इसी समय, प्रत्येक उपयोगकर्ता के पास न केवल संचार और बनाने का अवसर होता है, बल्कि एक विशेष सोशल नेटवर्क के बहुसंख्यक दर्शकों के साथ उनकी रचनात्मकता के फल भी साझा करता है।
==== क्राउडसोर्सिंग ====
अंतरजाल कई स्वयंसेवकों की शक्तियों द्वारा सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण कार्यों को हल करने के लिए एक अच्छा उपकरण साबित हुआ, जो अपनी गतिविधियों का समन्वय करते हैं। [[विकिपीडिया]], स्वयंसेवक बलों द्वारा बनाई गई एक [[ऑनलाइन विश्वकोषों की सूची|ऑनलाइन विश्वकोश]], अपनी तरह की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है। तथाकथित सिविल साइंस कार्यक्रमों के उदाहरण, विश्व जल शोध दिवस, स्टारडस्ट @ होम और क्लिकवर्कर्स, नासा के तत्वावधान में हैं, आकाशगंगा ज़ू, आकाशगंगाओं के वर्गीकरण के लिए एक परियोजना। वितरित कंप्यूटिंग परियोजनाओं जैसे फ़ोल्डिंग @ होम, वर्ल्ड कम्युनिटी ग्रिड, आइंस्टीन @ होम और अन्य लोगों को एक नागरिक विज्ञान के रूप में भी माना जा सकता है, हालांकि कंप्यूटिंग का मुख्य कार्य स्वयंसेवा कंप्यूटर्स की मदद से किया जाता है।
== सेवाएँ ==
अंतरजाल में कई नेटवर्क सेवाएँ होती हैं, सबसे प्रमुख रूप से [[मोबाइल अनुप्रयोग|मोबाइल ऐप]] जैसे सोशल मीडिया एप्लिकेशन, [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]], [[इलेक्ट्रॉनिक मेलिंग सूची|इलेक्ट्रॉनिक मेल]], मल्टीप्लेयर ऑनलाइन गेम्स, अंतरजाल टेलीफोनी, और फ़ाइल साझाकरण सेवाएँ।
==== वर्ल्ड वाइड वेब ====
[[चित्र:Microsoft Dubai.jpg|अंगूठाकार|दुबई में माईक्रोसौफ़्ट का एक कार्यालय]]
बहुत से लोग शब्द अंतरजाल और [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]], या सिर्फ वेब का उपयोग करते हैं, परन्तु दो शब्दों का पर्याय नहीं है। [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]] प्राथमिक अनुप्रयोग प्रोग्राम है, जो अरबों लोग अंतरजाल पर उपयोग करते हैं, और यह उनके जीवन को अतीत में बदल चुका है। हालांकि, अंतरजाल कई अन्य सेवाएँ प्रदान करता है। वेब दस्तावेजों, छवियों और अन्य संसाधनों का एक वैश्विक समूह है, जो तार्किक रूप से [[हाइपरलिंक]] से जुड़े हुए हैं और वर्दी संसाधन पहचानकर्ता (यूआरआई) के साथ संदर्भित हैं। यूआरआई ने सांकेतिक रूप से सेवाएँ, [[सर्वर]], और अन्य [[डेटाबेस]], और [[दस्तावेज़|दस्तावेजों]] और संसाधनों की पहचान की है जो वे प्रदान कर सकते हैं। [[हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल|हायपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल]] (एचटीटीपी) [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]] का मुख्य एक्सेस [[प्रोटोकॉल]] है वेब सेवा भी सॉफ्टवेयर सिस्टम को व्यापारिक तर्क और सामाग्री साझा करने और विनिमय करने के लिए संवाद करने के लिए [[हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल|एचटीटीपी]] का उपयोग करती है।
[[माइक्रोसॉफ़्ट|माइक्रोसॉफ्ट]] के [[इण्टरनेट ऍक्सप्लोरर|अंतरजाल एक्सप्लोरर]] / एज, [[मोज़िला फ़ायरफ़ॉक्स]], [[ऑपेरा|ओपेरा]], ऐप्पल सफारी और [[गूगल क्रोम]] जैसे [[वेब ब्राउज़र|वर्ल्ड वाइड वेब ब्राउज़र सॉफ्टवेयर]], दस्तावेजों में एम्बेडेड [[हाइपरलिंक]] के जरिए उपयोगकर्ताओं को एक [[वेबपेज|वेब पेज]] से दूसरे पर नेविगेट करने देता है। इन दस्तावेजों में कंप्यूटर सामाग्री का कोई भी संयोजन हो सकता है, जिसमें ग्राफिक्स, आवाज, पाठ, वीडियो, [[मल्टीमीडिया]] और इंटरैक्टिव सामग्री शामिल होती है, जबकि उपयोगकर्ता पृष्ठ के साथ इंटरैक्ट कर रहा है। क्लाइंट साइड सॉफ़्टवेयर में [[एनिमेशन]], गेम, ऑफिस एप्लिकेशन और वैज्ञानिक प्रदर्शन शामिल हो सकते हैं। खोजशब्द-संचालित अंतरजाल अनुसंधान के जरिए खोज इंजन जैसे याहू !, [[बिंग]] और [[गूगल]] के उपयोग से, दुनियाभर में उपयोगकर्ताओं को एक विशाल और विविध मात्रा में ऑनलाइन जानकारी के लिए आसान, त्वरित पहुँच है मुद्रित मीडिया, किताबें, विश्वकोश और पारंपरिक पुस्तकालयों की तुलना में, [[विश्व व्यापी वेब|वर्ल्ड वाइड वेब]] ने बड़े पैमाने पर जानकारी के विकेंद्रीकरण को सक्षम किया है।
[[वेब २.०|वेब]] ने व्यक्तियों और संगठनों को बहुत कम व्यय और समय के देरी पर संभावित बड़े दर्शकों के लिए विचारों और जानकारी को प्रकाशित करने के लिए भी सक्षम किया है। एक वेब पेज प्रकाशित करने, एक [[चिट्ठा|ब्लॉग]], या एक [[वेबसाइट]] बनाने में थोड़ा प्रारंभिक लागत शामिल है और कई लागत-मुक्त सेवाएँ उपलब्ध हैं हालांकि, आकर्षक, विविध और अप-टू-डेट सूचनाओं के साथ बड़े, पेशेवर [[वेबसाइट|वेब साइट्स]] को प्रकाशित करना और बनाए रखना अभी भी कठिन और महंगी प्रस्ताव है। कई व्यक्तियों और कुछ कंपनियाँ और समूह वेब लॉग्स या [[चिट्ठा|ब्लॉग]] का उपयोग करते हैं, जो कि आसानी से आसानी से अपडेट करने योग्य ऑनलाइन डायरी के रूप में उपयोग किया जाता है। कुछ वाणिज्यिक संगठन कर्मचारियों को उम्मीद करते हैं कि विशेषज्ञ ज्ञान और निःशुल्क जानकारी से प्रभावित होंगे और नतीजे के रूप में निगम को आकर्षित करेंगे।
लोकप्रिय [[वेबपेज|वेब पेजों]] पर [[विज्ञापन]] आकर्षक हो सकता है, और [[ई-वाणिज्य|ई-कॉमर्स]], जो सीधे [[वेब २.०|वेब]] के माध्यम से उत्पादों और सेवाओं की बिक्री होती है, बढ़ती रहती है। ऑनलाइन विज्ञापन विपणन और विज्ञापन का एक रूप है जो उपभोक्ताओं को प्रचार विपणन संदेश देने के लिए अंतरजाल का उपयोग करता है। इसमें ईमेल विपणन, खोज इंजन विपणन (एसईएम), सोशल मीडिया मार्केटिंग, कई प्रकार के प्रदर्शन विज्ञापन (वेब बैनर विज्ञापन सहित), और मोबाइल विज्ञापन शामिल हैं। 2011 में, संयुक्त राज्य में अंतरजाल विज्ञापन राजस्व ने केबल टीवी के उन लोगों को पीछे छोड़ दिया और लगभग सभी प्रसारण टेलीविजन से अधिक थे। १९ कई आम [[ऑनलाइन विज्ञापन]] प्रथा विवादास्पद हैं और नियमित रूप से कानून के अधीन हैं।
जब [[वेब २.०|वेब]] १९९० के दशक में विकसित हुआ, तो एक विशिष्ट [[वेबपेज|वेब पेज]] को [[वेब सर्वर]] पर पूरा फ़ॉर्म में संग्रहित किया गया था, जो [[एचटीएमएल]] में प्रारूपित है, एक अनुरोध के जवाब में एक [[वेब ब्राउज़र]] के संचरण के लिए पूरा किया गया था। समय के साथ, वेब पेज बनाने और पेश करने की प्रक्रिया गतिशील हो गई है, एक लचीली डिजाइन, लेआउट, और सामग्री बना रही है। [[वेबसाइट|वेबसाइटों]] को अक्सर सामग्री प्रबंधन सॉफ्टवेयर का उपयोग करके, शुरू में, बहुत कम सामग्री के साथ बनाया जाता है। इन सिस्टमों के योगदानकर्ता, जो भुगतान किया जा सकता कर्मचारी, किसी संगठन या जनता के सदस्य, उस प्रयोजन के लिए डिज़ाइन किए गए संपादन पृष्ठों का उपयोग करके अंतर्निहित डाटाबेस को भरें, जबकि कैज़ुअल विज़िटर्स [[एचटीएमएल]] प्रपत्र में इस सामग्री को देखने और पढ़ें। नये प्रविष्टि सामग्री को लेने की प्रक्रिया में निर्मित संपादकीय, अनुमोदन और सुरक्षा व्यवस्था हो सकती है या नहीं हो सकती है और इसे लक्ष्य के लिए उपलब्ध कर सकती है।
==== संचार ====
[[ईमेल]] एक महत्वपूर्ण संचार सेवा है जो अंतरजाल पर उपलब्ध है। मेलिंग पत्र या मेमो के समान एक तरह से पार्टियों के बीच इलेक्ट्रॉनिक पाठ संदेश भेजने की अवधारणा अंतरजाल के निर्माण की भविष्यवाणी करती है। चित्र, दस्तावेज, और अन्य फ़ाइलें [[ईमेल]] संलग्नक के रूप में भेजी जाती हैं।
[[चित्र:Gmail logo.png|अंगूठाकार|जीमेल का लोगो [[जीमेल|(जीमेल का आर्टिकल खोलें)]]]]
अंतरजाल टेलीफोनी अंतरजाल के निर्माण के द्वारा एक और आम संचार सेवा संभव है। वीओआईपी [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वॉयस-ओवर-अंतरजाल प्रोटोकॉल]] का अर्थ वह प्रोटोकॉल है जो कि सभी अंतरजाल संचार के अंतर्गत आता है। यह विचार १९९० की शुरुआत में निजी कंप्यूटरों के लिए वॉकी-टॉकी जैसी आवाज अनुप्रयोगों के साथ शुरू हुआ हाल के वर्षों में कई [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] सिस्टम सामान्य टेलीफोन के रूप में उपयोग करने में आसान और सुविधाजनक हो गए हैं लाभ यह है कि, अंतरजाल आवाज यातायात के रूप में है, [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] एक पारंपरिक टेलीफोन कॉल की तुलना में बहुत कम या मुफ्त हो सकती है, खासकर लंबी दूरी पर और खासकर उन अंतरजाल कनेक्शन जैसे केबल या एडीएसएल के लिए। [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] परंपरागत टेलीफोन सेवा के लिए एक प्रतिस्पर्धी विकल्प में परिपक्व हो रहा है। विभिन्न प्रदाताओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी में सुधार हुआ है और पारंपरिक टेलीफोन से कॉल करने या प्राप्त करने की क्षमता उपलब्ध है। सरल, सस्ती [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] नेटवर्क एडाप्टर उपलब्ध हैं जो एक निजी कंप्यूटर की आवश्यकता को समाप्त करते हैं।
कॉल करने के लिए वॉयस गुणवत्ता अभी भी भिन्न हो सकती है, लेकिन अक्सर पारंपरिक कॉल्स के बराबर होती है और इससे भी अधिक हो सकती है। [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] के लिए शेष समस्याओं में आपातकालीन टेलीफोन नंबर डायलिंग और विश्वसनीयता शामिल है। वर्तमान में, कुछ [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] प्रदाता एक आपातकालीन सेवा प्रदान करते हैं, लेकिन यह सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध नहीं है। "अतिरिक्त सुविधाओं" वाले पुराने पारंपरिक फोन केवल पावर विफल होने के दौरान ही संचालित होते हैं और संचालित होते हैं; वीओआईपी फोन उपकरण और अंतरजाल एक्सेस डिवाइसेज़ के लिए बैकअप पावर स्रोत के बिना ऐसा कभी नहीं कर सकता है खिलाड़ियों के बीच संचार के एक रूप के रूप में, वीओआईपी गेमिंग अनुप्रयोगों के लिए तेजी से लोकप्रिय हो गया है। [[ग्यालशिंग|गेमिंग]] के लिए लोकप्रिय [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] ग्राहकों में वेंत्रिलो और टीमेंपीक शामिल हैं आधुनिक वीडियो गेम कंसोल भी [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] चैट सुविधाओं की पेशकश करते हैं।
==== डेटा स्थानांतरण ====
फ़ाइल साझा करना अंतरजाल पर बड़ी मात्रा में डेटा स्थानांतरित करने का एक उदाहरण है एक कंप्यूटर फाइल ग्राहकों, सहयोगियों और मित्रों को एक अनुलग्नक के रूप में [[ईमेल]] कर सकती है। यह एक [[वेबसाइट]] या [[संचिका स्थानांतरण प्रोटोकॉल|फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल]] (एफ़टीपी) सर्वर पर अन्य लोगों द्वारा आसानी से डाउनलोड करने के लिए अपलोड किया जा सकता है। सहकर्मियों द्वारा तत्काल उपयोग के लिए इसे "साझा स्थान" या फ़ाइल सर्वर पर रखा जा सकता है कई उपयोगकर्ताओं के लिए थोक डाउनलोड का लोड "मिरर" सर्वर या पीयर-टू-पीयर नेटवर्क के उपयोग से आसान हो सकता है। इनमें से किसी एक मामले में, फ़ाइल तक पहुँच को उपयोगकर्ता प्रमाणीकरण के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, अंतरजाल पर फ़ाइल का पारगमन एन्क्रिप्शन द्वारा छिपा हुआ हो सकता है, और पैसे फ़ाइल को एक्सेस करने के लिए हाथ बदल सकते हैं। कीमत से धन के रिमोट चार्जिंग द्वारा भुगतान किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, एक [[क्रेडिट कार्ड]] जिसका विवरण भी पारित किया जाता है - आमतौर पर पूरी तरह से एन्क्रिप्ट किया गया - अंतरजाल पर प्राप्त फाइल की उत्पत्ति और प्रामाणिकता डिजिटल हस्ताक्षर द्वारा या एमडी ५ या अन्य संदेश डाईजेस्ट्स द्वारा जाँच की जा सकती है। अंतरजाल की ये सरल विशेषताओं, दुनिया भर के आधार पर, संचरण के लिए कंप्यूटर फ़ाइल में कम की जा सकने वाली किसी भी वस्तु का उत्पादन, बिक्री और वितरण बदल रहे हैं। इसमें सभी तरह के प्रिंट प्रकाशन, सॉफ्टवेयर उत्पाद, समाचार, संगीत, फिल्म, वीडियो, फोटोग्राफी, [[चित्रालेख|ग्राफिक्स]] और अन्य कला शामिल हैं। इसके बदले में उन मौजूदा उद्योगों में भूकंपीय बदलाव हुए हैं जो पहले इन उत्पादों के उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करते थे।
[[स्ट्रीमिंग मीडिया]] अंत उपयोगकर्ताओं द्वारा तत्काल खपत या आनंद के लिए डिजिटल मीडिया का वास्तविक समय वितरण है कई रेडियो और टेलीविज़न ब्रॉडकास्टर्स अपने लाइव ऑडियो और वीडियो प्रस्तुतियों के अंतरजाल फ़ीड प्रदान करते हैं। वे टाइम-शिफ्ट देखने या सुनने जैसे कि पूर्वावलोकन, क्लासिक क्लिप्स और सुनो फिर की सुविधा भी दे सकते हैं। इन प्रदाताओं को एक शुद्ध अंतरजाल "ब्रॉडकास्टर्स" की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिनके पास ऑन-एयर लाइसेंस नहीं था। इसका मतलब यह है कि एक अंतरजाल से जुड़े डिवाइस, जैसे कंप्यूटर या अधिक विशिष्ट, का प्रयोग उसी तरह उसी तरह से ऑन-लाइन मीडिया तक पहुँचने के लिए किया जा सकता है जितना पहले संभवतः केवल टेलीविज़न या रेडियो रिसीवर के साथ था उपलब्ध प्रकार की सामग्रियों की श्रेणी, विशेष तकनीकी वेबकास्ट से मांग-लोकप्रिय मल्टीमीडिया सेवाओं के लिए बहुत व्यापक है। ब्रॉडकास्टिंग इस विषय पर एक भिन्नता है, जहाँ आम तौर पर ऑडियो-सामग्री डाउनलोड की जाती है और कंप्यूटर पर वापस खेला जाता है या स्थानांतरित करने के लिए सुने जाने वाले पोर्टेबल मीडिया प्लेयर में स्थानांतरित हो जाता है। साधारण उपकरण का इस्तेमाल करते हुए ये तकनीक दुनिया भर में ऑडियो-विज़ुअल सामग्री को प्रसारित करने के लिए, छोटे सेंसरशिप या [[लाइसेंस]] नियंत्रण के साथ किसी को भी अनुमति देती हैं।
[[डिजिटल मीडिया स्ट्रीमिंग]] नेटवर्क बैंडविड्थ की मांग को बढ़ाती है उदाहरण के लिए, मानक छवि गुणवत्ता के लिए एसडी ४८० पी के लिए १ एमबीटी / एस लिंक गति की आवश्यकता होती है, एचडी ७२० पी की गुणवत्ता में 2.५ एमबीटी / एस की आवश्यकता होती है, और उच्चतम-एचडीएक्स गुणवत्ता को १०८० पी के लिए ४.५ एमबीटी / एस की आवश्यकता होती है।
[[वेबकैम]] इस घटना का एक कम लागत वाला विस्तार है। जबकि कुछ [[वेबकैम]] पूरा-फ़्रेम-दर वीडियो दे सकता है, तो चित्र आमतौर पर छोटा होता है या धीरे-धीरे अपडेट होता है अंतरजाल उपयोगकर्ता एक अफ्रीकी वॉटरहो के आसपास पशुओं को देख सकते हैं, पनामा नहर में जहाजों, स्थानीय राउंडअबाउट पर ट्रैफ़िक या अपने स्वयँ के परिसर की निगरानी, लाइव और वास्तविक समय में देख सकते हैं। वीडियो चैट रूम और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी लोकप्रिय हैं, कई व्यक्तिगत वेबकैम के लिए उपयोग किए जा रहे उपयोग के साथ, बिना और बिना दो-तरफ़ा ध्वनि [[यूट्यूब]] १५ फ़रवरी २००५ को स्थापित किया गया था और अब एक विशाल संख्या में उपयोगकर्ताओं के साथ मुफ्त [[स्ट्रीमिंग वीडियो]] की अग्रणी [[वेबसाइट]] है। यह एक फ्लैश आधारित [[वेब प्लेयर]] का उपयोग करता है जो वीडियो फ़ाइलों को स्ट्रीम और दिखाती है। पंजीकृत उपयोगकर्ता असीमित मात्रा में वीडियो अपलोड कर सकते हैं और अपनी व्यक्तिगत प्रोफ़ाइल बना सकते हैं। [[यूट्यूब]] का दावा है कि इसके उपयोगकर्ता सैकड़ों मिलियन देखते हैं, और हर दिन लाखों वीडियो अपलोड करते हैं। वर्तमान में, [[यूट्यूब]] एक [[एचटीएमएल फाइव|एचटीएमएल 5]] प्लेयर का उपयोग भी करता है।
== उप-संस्कृतियाँ ==
आधुनिक अंतरजाल में बहुत से सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी हैं। यह एक सार्वभौमिक वैश्विक सूचना पर्यावरण है।
==== अंतरजाल समुदाय ====
अंतरजाल संचार के लिए सबसे व्यापक तकनीकी अवसर प्रदान करता है। इसके अलावा, अंतरजाल पर समान रुची तथा समान दुनिया के विचार रखने वालों को ढूंढना , या पिछले परिचितों को ढूंढना, जो जीवन परिस्थितियों के कारण पृथ्वी पर अलग - अलग जगह बिखरे हुए थे, आसान है। इसके अलावा, [[वेब २.०|वेब]] पर संवाद शुरू करना, व्यक्तिगत बैठक में बैठकर शुरू करने से [[मनोविज्ञान|मनोवैज्ञानिक रूप]] से आसान है। ये कारण वेब समुदायों के निर्माण और सक्रिय विकास को निर्धारित करते हैं। अंतरजाल समुदाएँ उन लोगों का [[समुदाय]] है जो आम शौक को साझा करते हैं, और मुख्य रूप से अंतरजाल के माध्यम से संवाद करते हैं। ऐसे अंतरजाल समुदाय धीरे-धीरे पूरे समाज के जीवन में एक मूर्त भूमिका निभाने लगे हैं।
==== अंतरजाल का लत ====
अंतरजाल का लत अंतरजाल का उपयोग करने और नेटवर्क पर बहुत समय व्यतीत करने की एक जुनूनी इच्छा है। अंतरजाल का लत, चिकित्सा मानदंडों के अनुसार मानसिक रोग नहीं है।
== विश्व के देशों में अंतरजाल ==
==== भारत में अंतरजाल ====
[[भारत]] में ''अंतरजाल'' ८० के दशक में आया, जब [[एर्नेट]] (शैक्षिक और अनुसंधान नेटवर्क'')'' को सरकार, इलेक्ट्रौनिक्स विभाग और संयुक्त राष्ट्र उन्नति कार्यक्रम ''(यू एन डी पी)'' की ओर से प्रोत्साहन मिला। सामान्य उपयोग के लिये जाल [[१५ अगस्त]] [[१९९५]] से उपलब्ध हुआ, जब [[भारत संचार निगम लिमिटेड]] (वी एस एन एल) ने गेटवे सर्विस शुरू की। भारत में ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करने वालों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ है। यहाँ १.३२ बिलियन लोगों तक ''अंतरजाल'' की पहुँच हो चुकी है, जो कि कुल जनसंख्य का करीब ३४.८ %[https://web.archive.org/web/20160408192200/http://www.internetlivestats.com/internet-users/india/] फीसदी है। पूरी दुनिया के सभी ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करतों में भारत का योगदान [https://web.archive.org/web/20160408192200/http://www.internetlivestats.com/internet-users/india/ १३.५ %] फीसदी है। साथ ही ''अंतरजाल'' का इस्तेमाल व्यक्तिगत जरूरतों जैसे बैंकिंग, [[रेल मंत्रालय, भारत|ट्रेन इंफॉर्मेशन-रिज़र्वेशन]] और अन्य सेवाओं के लिए भी होता है। आज ''अंतरजाल'' की पहुँच लगभग सभी गाँव एवं कस्बो और दूर दराज के इलाको तक फ़ैल चुकी है l आज लगभग सभी जगहों पर इसका उपयोग हो रहा है l और वो दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया में ''अंतरजाल'' के उपयोग के मामले में सबसे आगे हो l और २०१५ से सरकार भी पूरी तरह से ''ऑनलाइन'' होने के तैयारी में लग गई है l अब भारत के करीब लोग पूरे देश से अपने पैसे को लेंन-देंन कर सकते हैं। और घर बैठे खरीदारी कर रहे हैं। भारत पूरी तरह से ''अंतरजाल'' से जुड़ने की तैयारी में है। २०१५ से २०१८ तक भारत के ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करने वालों की करीब १०% बढ़ोत्तरी हुई है। २०१६ में टेलिकॉम कंपनी जियो ने करीब १ साल तक ''इन्टरनेट'' मुफ्त कर दिया था। जियो आने के बाद ''अंतरजाल'' को इस्तेमाल करने वालों की लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही है। भारत में अभी भी कई जगह मोबाइल ''नेटवर्क'' न होने के कारण लोग परेशान हैं।
वर्तमान में भारत में एक नई अंतरजाल तकनीक का भी विकास हो रहा है जिसका नाम सैटेलाइट अंतरजाल<ref>{{cite news|url=https://bazartak.in/tech/satellite-internet-kya-hai-kaise-kam-karta-hai/|title=सैटेलाइट अंतरजाल क्या होता है?|last1=Bhanu|first1=Saran|date=9/10/2023|accessdate=9/10/2023|publisher=Bazartak|agency=Bazartak|archive-date=10 अक्तूबर 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20231010112913/https://bazartak.in/tech/satellite-internet-kya-hai-kaise-kam-karta-hai/|url-status=dead}}</ref> है, जो पश्चिमी देशों में पहले से एक विकसित तकनीक है लेकिन अब भारत में भी इसके परीक्षण शुरू हो चुका है। यह अंतरजाल की इस तकनीक को विकसित करने के लिए रिलायंस जियो और वनवेब कंपनी अग्रणी है, जिन्हे दूरसंचार विभाग से परीक्षण डेको की भी अनुमति मिल चुकी है। अमेरिका में सैटेलाइट अंतरजाल पर काम करने वाली कंपनी स्टारलिंक भी अपनी सेवाएं देने के लिए भारत में आने की कोशिश कर रही है, जिसे जल्द ही स्वीकृति भी मिल सकती है.
==== इस्टोनिया में अंतरजाल ====
यहाँ पूरे देश में ''वायरलेस अंतरजाल'' (वाई फ़ाई) की पहुँच है। चाहे आप हवाई अड्डा में हो या समुद्रतट या जंगल में, हर जगह ''अंतरजाल'' की पहुँच है। यहाँ पहुँच भी मुफ्त है। [[एस्टोनिया|इस्टोनिया]] में २५ फीसदी वोटिंग ''ऑनलाइन'' होती है। यहाँ माता-पिता अपने बच्चों की स्कूल की दैनिक गतिविधि, परीक्षा के अंक और कक्षेतर कार्य को ''ऑनलाइन'' देख सकते हैं। यहाँ एक व्यापार ''ऑनलाइन सेटप'' तैयार करने में महज १८ मिनट का समय लगता है। इस्टोनिया में ९९३,७८५ ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करते हैं, जो कि इस देश की पूरी आबादी का लगभग ७८ फीसदी है। यहाँ की जनसंख्या १, २७४,७०९ है। इस्टोनिया में ''अंतरजाल'' पर सबसे अधिक स्वतंत्रता है।<ref name="दैनिक भास्कर">{{cite web|url=http://www.bhaskar.com/article/GAD-top-internet-users-in-all-over-world-4185194-PHO.html?seq=1&HT3|title=अंतरजाल, अमेरिकी देखते हैं लाइव टीवी|publisher=[[दैनिक भास्कर]]|author=|date=21 मार्च 2013|accessdate=29 जून 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20130615063557/http://www.bhaskar.com/article/GAD-top-internet-users-in-all-over-world-4185194-PHO.html?seq=1&HT3|archive-date=15 जून 2013|url-status=live}}</ref>
*उपयोग: अधिकतर उपयोग ''ई कॉमर्स'' और ''ई-सरकार'' सेवाओं के लिए होता है। यहाँ प्रेस और ''ब्लॉगर ऑनलाइन'' कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं। इस्टोनिया ने अमेरिका को पीछे कर दूसरे स्थान पर छोड़ा है। यह छोटा सा देश तकनीकी तौर पर बिजली घर बन गया है। यहाँ ''ऑन लाइन'' वोटिंग, इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड ''अंतरजाल'' के माध्यम से दूसरों के पास पहुँचते हैं। ''ब्रॉडबैंड'' से अधिकतर सुसज्जित यह देश [[डिजिटल]] दुनिया का एक मिथक बन कर उभरा है।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== संयुक्त राज्य में अंतरजाल ====
[[संयुक्त राज्य अमेरिका|संयुक्त राज्य]] की जनसंख्या ३१३ मिलियन, यानी ३१३० लाख हैं, जहां २४५ मिलियन, यानी २४५० लाख लोग ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करते हैं। यहाँ पर ''अंतरजाल'' की पहुँच ७८ फीसदी है और इस देश के लोग विश्व की ११ फीसदी आबादी ''अंतरजाल'' के उपयगकर्ता के तौर पर शामिल हैं। इस्टोनिया के बाद अंतरजाल पर सबसे अधिक स्वतंत्रता अमेरिका, जर्मन, ऑस्ट्रेलिया, हंगरी, इटली और फ़िलीपींस को है। यह देश दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ''अंतरजाल'' पर अधिक स्वतंत्रता देते हैं। यहाँ पर काॅन्ग्रेसनल बिल का विरोध हो रहा है, जिसका इरादा ''प्राइवेसी'' और ''नॉन अमेरिकी वेबसाइट होस्टिंग'' को लेकर है। आधे से अधिक अमेरिकी अंतरजाल पर ''टीवी'' देखते हैं। यहाँ पर मोबाइल पर ''अंतरजाल'' का उपयोग स्वास्थ, ''ऑन लाइन बैंकिंग'', बिलों का पेमेंट और सेवाओं के लिए करते हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== जर्मनी में अंतरजाल ====
[[जर्मनी]] में ''अंतरजाल'' का उपयोग सबसे अधिक ''सोशल मीडिया'' के लिए किया जा रहा है। वहाँ अब अपनी अन्य जरूरतों, बैंकिग, निजी कार्य आदि के लिए भी किया जा रहा है। पिछले पांच वर्षो में जर्मनी में ''ब्राॅडबैंड'' सेवाएँ काफी सस्ती उपलब्ध हो रही हैं। इसके रेट इसकी गति आदि पर निर्भर करती है। यहाँ पर ''अंतरजाल'' से ''टीवी'' और ''टेलीफ़ोन'' सेवाएँ भी एक साथ मिलती हैं। यहाँ की ७३ फीसदी आबादी के घरों तक ''इंटनेट'' की पहुंच उपलब्ध है। जर्मनी के पाठशालों में छात्रों को मुफ्त में कंप्यूटर और ''अंतरजाल'' की सुविधा उपलब्ध कराई जाती हैं। जर्मनी में ९३ फीसदी इस्तेमाल करतों के पास ''डीएलएस कनेक्शन'' है। जर्मनी की आबादी ८१ मिलियन है और ६७ मिलियन इंटनेट इस्तेमाल करते हैं। यहाँ ८३ फीसदी अंतरजाल की एक्सेस है और विश्व के अंतरजाल उपयोगकर्ता की संख्या में यहाँ के लोगों की तीन फीसदी हिस्सेदारी है।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== इटली में अंतरजाल ====
[[इटली]] में ''अंतरजाल'' तक ५८.७ फीसदी लोगों की पहुँच है। यहाँ ३५,८००,००० लोग ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करते हैं। यहाँ ७८ फीसदी लोग ईमेल भेजने और पाने के लिए ''अंतरजाल'' का प्रयोग करते हैं। इसके दूसरे नंबर पर ६७.७ फीसदी उपयोगकर्ता ने ज्ञान के लिए और ६२ फीसदी उपयोगकर्ता ने वस्तुओं एवं सेवाँओं के लिए किया है। एक सर्वे के अनुसार ३४.१ मिलियन ''मोबाइल'' उपयोगी ने ''अंतरजाल'' तक अपनी पहुँच बनाई। इटली में ''अंतरजाल'' (६ एमबीपीज, असीमित डेटा केबिल्स/ एडीएसएल) २५ यूरो डॉलर में प्रतिमाह के रेट से उपलब्ध है।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== फ़िलीपींस में अंतरजाल ====
[[फ़िलीपीन्स|फ़िलीपींस]] में १० लोगों में से केवल तीन लोगों तक ही ''अंतरजाल'' की पहुँच है। हालाकि इस देश का दावा है कि यह ''सोशल मीडिया'' के लिए विश्व का एक बड़ा केंद्र है। फ़िलीपींस में उपयोगकर्तों को ''अंतरजाल'' पर सबसे अधिक स्वतंत्रता मिली हुई है। यहाँ के लोग बिना किसी बाधा के ''अंतरजाल'' का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। फंलीपींस की कुल जनसंख्या (२०११ के अनुसार) १,६६०,९९२ है। इसमें में ३२.४ फीसदी लोगों तक ''अंतरजाल'' की पहुंच है। फिलीपींस के ''अंतरजाल'' इस्तमाल करने वालों की संख्या ३३,६००,००० हैं। यहाँ पर लोग सबसे अधिक ''अंतरजाल'' का उपयोग [[सामाजिक मीडिया|सोशल मीडिया]] के लिए करते हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== ब्रिटेन में अंतरजाल ====
[[ब्रिटेन]] की आबादी लगभग ६३ मिलियन है और यहाँ पर लगभग ५३ मिलियन ''अंतरजाल'' इस्तेमाल करते हैं। ''अंतरजाल'' की पहुँच ८४ फीसदी लोगों तक है, जो विश्व के कुल उपयोगी की संख्या का दो फीसदी हैं। यहाँ पर उच्च स्तर पर ''अंतरजाल'' पर अभिव्यक्ति की स्वातंत्रता मिली हुई है। लेकिन हाल के वर्षो में ''सोशल मीडिया ट्विटर'' और ''फेसबुक'' पर लगाए आंशिक प्रतिबंध ने ''अंतरजाल'' पर पूर्ण स्वतंत्रता वाले देश की श्रेणी से बाहर कर दिया है। यहाँ पर इन ''सोशल मीडिया'' के सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। [[यूनाइटेड किंगडम|यूके]] में ८६ फीसदी ''अंतरजाल'' उपयोगकर्ता ''वीडियो साइट्स'' पर आते हैं। यहाँ २४० मियिलयन घंटे उपयोगकर्ता ''ऑन लाइन वीडियो'' ''सामग्री'' देखते हैं। ''गूगल'' के बाद यहाँ ''यूट्यूब'' और ''फ़ेसबुक'' को सबसे ज़्यादा देखा जाता है।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== हंगरी में अंतरजाल ====
[[हंगरी]] में ५९ फीसदी लोग ''अंतरजाल'' के उपयोगकर्ता हैं। पिछले १९९० से ''डायल अप कनेक्शनों'' की संख्या बढ़ी है। यहाँ वर्ष २००० से ''ब्राॅडबैंड कनेक्शनों'' की संख्या में काफी तेजी आई। यहां ६,५१६,६२७ ''अंतरजाल'' उपयोगकर्ता हैं। यहाँ के उपयोगकर्ता अधिकतर व्यावसायिक और ''विपणन मैसेज'' के लिए ''अंतरजाल'' का उपयोग करते हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
====ऑस्ट्रेलिया में अंतरजाल ====
[[ऑस्ट्रेलिया]] की जनसंख्या : २२,०१५, ५७६ है, जिसमें से १९, ५५४,८३२ ''अंतरजाल'' उपयोगकर्ता हैं। ऑस्ट्रेलिया में ''अंतरजाल'' पर ''ऑनलाइन सामाग्री'' में उपयोगकर्ता को काफी हद तक स्वतंत्रता मिली हुई है। वह सभी राजनीतिक, सामाजिक प्रवचन, मनुष्य राइट के उल्लंघर आदि की जानकारी हासिल कर लेता है। ऑस्ट्रेलिया में ''अंतरजाल'' की उपलब्धता दर ७९ फीसदी है। ऑस्ट्रेलिया के लोग अपने घरों से कई काम अपने ''मोबाइल'' पर कर लेते हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== अर्जेंटीना में अंतरजाल ====
[[अर्जेण्टीना|अर्जेंटीना]] में पहली बार १९९० में ''अंतरजाल'' का उपयोग वाणिज्यक उपयोग के लिए शुरू किया गया था, हालाकि पहले इस पर शैक्षिक दृष्टिकोण से फोकस किया जा रहा था। [[दक्षिण अमेरिका|दक्षिणी अमेरिका]] का यह अब सबसे बड़ा ''अंतरजाल'' का उपयोग करने वाला देश है। यहाँ की अनुमानित जनसंख्या ४२,१९२,४९२ है, जिसमें २८,०००, ००० लोग ''अंतरजाल'' उपयोगकर्ता हैं। यह कुल संख्या के लगभग ६६.४ फीसदी है। यहाँ २०,०४८,१०० लोग [[फेसबुक|फ़ेसबुक]] पर हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== दक्षिण-अफ़ीका में अंतरजाल ====
[[दक्षिण अफ़्रीका|दक्षिण-अफ़्रीका]] में पहला ''अंतरजाल'' कनेक्शन १९९८ में शुरू किया गया था। इसके बाद ''अंतरजाल'' का व्यावसायिक उपयोग १९९३ से शुरू हुआ। [[अफ़्रीका|अफ़्रीका महाद्वीप]] में विकास की तुलना में दक्षिण अफ्रीका तेरवाँ सबसे अधिक ''अंतरजाल'' की पहुँच वाला देश है। ''अंतरजाल'' के उपयोग के मामले में यह देश अफ़्रीका के अन्य देशों से कहीं आगे है। एक अनुमान के अनुसार यहाँ की जनसंख्या ४८,८१०,४२७ है, जिनमें से ८,५००,००० ''अंतरजाल'' उपयोगकर्ता हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
==== जापान में अंतरजाल ====
[[जापान]] में ''अंतरजाल'' का उपयोग अधिकतर ''ब्लाॅगिंग'' के लिए करते हैं। जापान के संस्कृति में ''ब्लॉग'' बड़ा भूमिका अदा करते हैं। औसतन जापन का एक उपयोगी ६२.६ मिनट अपने समय का उपयोग ''ब्लॉग'' पर करता है। इसके बाद [[दक्षिण कोरिया]] के उपयोगी हैं, जो ४९.६ मिनट और तीसरे स्थान पर [[पोलैंड]] के उपयोगी हैं, जो ४७.७ मिनट अपना वक्त ''ब्लाॅग'' पर देते हैं।<ref name="दैनिक भास्कर" />
== संदर्भ ==
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[[श्रेणी:अंतरजाल|अंतरजाल]]
[[श्रेणी:कंप्यूटर]]
[[श्रेणी:सूचना प्रौद्योगिकी|अंतरजाल]]
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'''क़ुरआन''' ({{lang-ar|القرآن}}, '''अल-क़ुर्'आन''') [[इस्लाम]] की पाक किताब है [[मुसलमान]] मानते हैं कि इसे [[अल्लाह]] ने फ़रिश्ते [[जिब्रईल |जिब्रईल अलैहिस्सलाम]] द्वारा पैगम्बर [[मुहम्मद]] साहब को सुनाया था।<ref name="Britannica">{{cite encyclopedia | last=Nasr | first=Seyyed Hossein | authorlink=Seyyed Hossein Nasr | title=Qurʼān | year=2007 | encyclopedia=Encyclopædia Britannica Online | accessdate=2007-11-04 | location= | publisher= | url=http://www.britannica.com/eb/article-68890/Quran | archiveurl=https://web.archive.org/web/20071016200056/http://www.britannica.com/eb/article-68890/Quran | archivedate=16 अक्तूबर 2007 | url-status=live }}</ref> मुसलमान मानते हैं कि क़ुरआन ही अल्लाह की भेजी अन्तिम और सर्वोच्च और आखरी आसमानी किताब है।<ref name=Lambert>{{cite book|last1=Lambert|first1=Gray|title=The Leaders Are Coming!|date=2013|publisher=WestBow Press|isbn=9781449760137|page=287|url=https://books.google.com/books?id=sV0mAgAAQBAJ&pg=PA287|access-date=2 मई 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20190403142050/https://books.google.com/books?id=sV0mAgAAQBAJ&pg=PA287|archive-date=3 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref><ref name="Williams & Drew">{{cite book|author1=Roy H. Williams|author2=Michael R. Drew|title=Pendulum: How Past Generations Shape Our Present and Predict Our Future|date=2012|publisher=Vanguard Press|isbn=9781593157067|page=143|url=https://books.google.com/books?id=mygRHh6p40kC&pg=PA143|access-date=2 मई 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20161219194220/https://books.google.com/books?id=mygRHh6p40kC&pg=PA143|archive-date=19 दिसंबर 2016|url-status=live}}</ref> हालाँकि आरम्भ में इसका प्रसार मौखिक रूप से हुआ पर पैगम्बर मुहम्मद साहब के विसाल (स्वर्गवास) के बाद सन् 633 में इसे पहली बार लिखा गया था और सन् 653 में इसे मानकीकृत कर इसकी प्रतियाँ इस्लामी साम्राज्य में वितरित की गईं थी। मुसलमानों का मानना है कि अल्लाह द्वारा भेजे गए पाक संदेशों के सबसे अन्तिम संदेश कुरआन में लिखे गए हैं। इन संदेशों की शुरुआत [[आदम]] से हुई थी। हज़रत [[आदम]] इस्लामी (और [[यहूदी]] तथा [[ईसाई]]) मान्यताओं में सबसे पहले [[नबी]] (पैगम्बर या पयम्बर) थे।
क़ुरआन [[अल्लाह]]/ईश्वर का कलाम (सन्देश) है, जो आखिरी सन्देष्टा [[पैगंबर मोहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम#:~:text=%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%22%D8%B5%D9%8E%D9%84%D9%8E%D9%91%D9%89%D9%B0%20%D9%B1%D9%84%D9%84%D9%8E%D9%91%D9%B0%D9%87%D9%8F,%E0%A4%AD%E0%A5%80%20%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%20%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%20%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE%20%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A5%A4|ﷺ]] पर अवतरित हुआ। सम्पूर्ण क़ुरआन वही के माध्यम से पूरे 23 साल में नाज़िल (अवतरित) हुआ। क़ुरआन सूरह अल-फातिहा से शुरू हो कर सूरह अन-निसा पर समाप्त होता है। सम्पूर्ण कुरान 30 पारो (खंडों) में विभाजित किया गया है तथा इसमें 114 सूरतें (अध्याय) हैं। क़ुरआन की कुल 114 सूरतो में 558 [[रुकू]] है तथा सम्पूर्ण क़ुरआन में 6236 आयत (छंद या '''''<small>Verses)</small>''''' है तथा क़ुरआन में कलिमात यानी (वाक्यों) की संख्या 77439 है <small>''(शेख़ मुज़मद रज्जब की किताब "हक़ायक़ हौल-अल-क़ुरआन)''</small> तथा क़ुरआन में हुरूफ़ यानी शब्दों की संख्या 340740 है''<small>(स्पष्ट नहीं है)</small>''। सम्पूर्ण कुरान में कुल 14 सजदे है।
[[File:Aivazovsky Passage of the Jews through the Red Sea.jpg|250px|thumb|इस्राएलियों के पलायन की कहानियों का "स्वैम्पलैंड" (यम सुफ)<ref>http://archive.wikiwix.com/cache/index2.php?url=http%3A%2F%2Fba.21.free.fr%2Fseptuaginta%2Fexode%2Fexode_13.html</ref> (हिब्रू टोरा में एक अस्थायी पड़ाव के रूप में दर्ज) पौराणिक लाल सागर क्रॉसिंग बन जाता है<ref>Slackman, Michael (3 April 2007). "Did the Red Sea Part? No Evidence, Archaeologists Say". The New York Times. Retrieved 27 October 2016.</ref>(क़ुरआन 26:52-68) (Aivazovsky)]]
==व्युत्पत्ति और अर्थ==
"क़ुरआन" शब्द का पहला ज़िक्र ख़ुद क़ुरआन में ही मिलता है जहाँ इसका अर्थ है - ''उसने पढ़ा'', या ''उसने उचारा''। यह शब्द इसके [[सीरियाई भाषा|सिरियाई]] समानांतर ''कुरियना'' का अर्थ लेता है जिसका अर्थ होता है ग्रंथों को पाठ करना। हालाँकि पाश्चात्य जानकार इसको सीरियाई शब्द से जोड़ते हैं, अधिकांश मुसलमानों का मानना है कि इसका मूल क़ुरा शब्द ही है। पर चाहे जो हज़रत मुहम्मद के जन्मदिन के समय ही यह एक अरबी शब्द बन गया था।
ख़ुद क़ुरआन में इस शब्द का कोई 70 बार ज़िक्र हुआ है। इसके अलावे भी क़ुरआन के कई नाम हैं। इसे ''अल फ़ुरक़ान'' (कसौटी), ''अल हिक्मः'' (बुद्धिमता), ''धिक्र/ज़िक्र'' (याद) और ''मस्हफ़'' (लिखा हुआ) जैसे नामों से भी संबोधित किया गया है। क़ुरआन में अल्लाह ने 25 [[इस्लाम के पैग़म्बर|अम्बिया]] का ज़िक्र किया है।
क़ुरआन शब्द कुरान में लगभग 70 बार प्रकट होता है, जो विभिन्न अर्थों को मानता है। यह अरबी क्रिया ''क़रा'' (قرأ) का एक मौखिक संज्ञा (मसदर) है, जिसका अर्थ है "वह पढ़ता है"। सिरिएक समतुल्य (ܩܪܝܢܐ) क़रयाना है, जो "शास्त्र पढ़ने" या "सबक" को संदर्भित करता है। जबकि कुछ पश्चिमी विद्वान इस शब्द को सिरिएक से प्राप्त करने पर विचार करते हैं, मुस्लिम अधिकारियों के बहुमत में शब्द की उत्पत्ति ''क़रा'' ही होती है। भले ही, यह मुहम्मद के जीवनकाल में अरबी शब्द बन गया था। शब्द का एक महत्वपूर्ण अर्थ "पाठ का कार्य" है, जैसा कि प्रारंभिक कुरआनी मार्ग में दर्शाया गया है: "यह हमारे लिए इसे इकट्ठा करना और इसे पढ़ना है (क़ुरआनहू)।
अन्य छंदों में, शब्द "एक व्यक्तिगत मार्ग [मुहम्मद द्वारा सुनाई गई]" को संदर्भित करता है। इसका कई संदर्भ में कई प्रकार से अदब किया जाता है। उदाहरण के तौर पर: "जब अल-क़ुरआन पढ़ा जाता है, तो इसे सुनें और चुप रहें।" अन्य धर्मों के ग्रन्थ जैसे तोराह और सुसमाचार के साथ वर्णित अर्थ भी ग्रहण कर सकता है।
इस शब्द में समानार्थी समानार्थी शब्द भी हैं जो पूरे क़ुरआन में नियोजित हैं। प्रत्येक समानार्थी का अपना अलग अर्थ होता है, लेकिन इसका उपयोग कुछ संदर्भों में कुरान के साथ मिल सकता है। इस तरह के शब्दों में किताब (पुस्तक), [[आयत|आयह]] (इशारा); और [[सूरा]] (ग्रान्धिक रूप) शामिल हैं। बाद के दो शब्द भी प्रकाशन की इकाइयों को दर्शाते हैं। संदर्भों के बड़े बहुमत में, आमतौर पर एक निश्चित लेख (अल-) के साथ, शब्द को "प्रकाशन" (वही) के रूप में जाना जाता है, जिसे अंतराल पर "भेजा गया" (तंज़ील) दिया गया है। अन्य संबंधित शब्द हैं: ज़िकर (स्मरण), क़ुरआन को एक अनुस्मारक और चेतावनी के अर्थ में संदर्भित करता है, और हिकमह (ज्ञान), कभी-कभी प्रकाशन या इसके हिस्से का जिक्र करता है।
क़ुरआन खुद को "समझदारी" (अल-फ़ुरकान),"गाइड" (हुदा), "ज्ञान" (हिकमा), "याद" (ज़िक्र) के रूप में वर्णित करता है। और "रहस्योद्घाटन" (तंज़ील ; कुछ भेजा गया है, एक वस्तु के वंश को एक उच्च स्थान से कम जगह पर संकेत)। एक और शब्द अल-किताब (शास्त्र/ग्रंथ) हैं, जैसे तोरात और बाइबिल के लिए अरबी भाषा में भी प्रयोग होता है। मुस्हफ़ ('लिखित कार्य') शब्द का प्रयोग अक्सर विशेष कुरआनी लिपियों के संदर्भ में किया जाता है लेकिन क़ुरआन में भी पहले की किताबों की पहचान करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
== क़ुरआन के उतरने और संग्रह व संकलन के बारे में ==
क़ुरआन एक पवित्र किताब है जो अंतिम नबी हज़रत मुहम्मद [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] पर उतारी गयी। यह [[अल्लाह]]/ईश्वर का कलाम (सन्देश) है जिसे अल्लाह ने अपने [[मुहम्मद|पैग़म्बर मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] पर नाज़िल (अवतरित) किया। इस्लाम का आधार इसी आसमानी फ़रमान (आदेश) पर है जिसने इसका अनुपालन किया वह इस्लाम के दायरे में दाख़िल (प्रवेश) हुआ। जब पैग़म्बर [[मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] की उम्र 40 साल की हुई उस समय आप को नबुव़त प्रदान की गयी और रिसालत (रसूल अर्थात् दूत का काम,पद) का ताज आप के सर पर रखा गया। इसी ज़माने से क़ुरआन के उतरने की शुरुआत हुई। यदा कदा यथा क़ुरआन ज़रूरत के अवसर पर थोड़ा-थोड़ा 23 साल तक नाज़िल होता रहा है। पिछली आसमानी किताबों (तौरात,इंजील,ज़बूर) की तरह पूरा एक ही बार में नहीं उतरा (हज़रत मूसा अलैहि○ पर तौरात, हज़रत ईसा अलैहि○ पर इंजील और हज़रत दाऊद अलैहि○ पर ज़ुबूर ये सब किताबें एक ही बार में उतरी गयी और सौभाग्य से ये सब किताबें रमज़ान ही के महीने में उतरी)
सही यह है कि आप ([[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|सल्ल0]]) की नबुवत (नबी होने का एलान या घोषणा) के बात रमज़ान की शबे-क़द्र (पवित्र रजनी) में पूरा क़ुरआन लौहे महफूज़ (अल्लाह के पास से) उस आसमान पर जिसे हम देख रहे हैं अल्लाह के हुक्म (आदेश) से उतारा गया और इसके बाद हज़रत [[जिब्रईल|जिब्रील]] अलैहि○(देवदूत) को जिस समय हुक्म हुआ उन्होंने पवित्र कलाम को बिल्कुल वैसा ही बिना किसी परिवर्तन या कमी-बेशी के नबी [[मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] तक पहुंचाया। कभी दो आयतें (छंद या '''''<small>Verses)</small>''''', कभी तीन आयतें और कभी एक आयत से भी कम, कभी दस-दस आयतें और कभी पूरी-पूरी सूरतें (अध्याय)। इसी को इस्लाम में '''''वह्यी واحي''''' या वह्य कहते हैं। उलमा (विद्वानों) ने वह्यी के विभिन्न तरीके [[हदीस|हदीसों]] से पेश किए हैं –
* फ़रिश्ता (देवदूत) वह्यी लेकर आए और एक आवाज़ घंटी जैसी मालूम हो। यह स्थिति अनेक हदीसों से साबित है और यह क़िस्म (प्रकार) वह्यी की सभी क़िस्मों में सख़्त थी। बहुत कष्ट नबी [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|सल्ल0]] को होता था यहां तक कि आपने ([[मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]]) ने फ़रमाया (बताया) कि जब कभी ऐसी वह्यी आती है तो मैं समझता हू कि अब जान निकल जाएगी।
* फ़रिश्ता दिल में कोई बात डाल दे।
* फ़रिश्ता इंसान के रूप में आ कर बात करे। यह क़िस्म बहुत आसान थी इसमें कष्ट न होता था।
* अल्लाह तआला जागते में [[मुहम्मद|नबी सल्ल0]] से कलाम (वार्ता या आदेश) फ़रमाए जैसे कि शबे मेअराज (मेअराज की रत) में।
*अल्लाह तआला सपने की हालत में कलाम फ़रमाए। यह क़िस्म भी सही हदीसों से साबित है।*
*फ़रिश्ता सपने की हालत में आकर कलाम करे।* ⇒ परन्तु अंतिम दो क़िस्मों से क़ुरआन खाली है। पूरा क़ुरआन जागने की स्थिति में नाज़िल हुआ।
क़ुरआन के बदफ़आत (थोड़ा-थोड़ा या धीरे-धीरे) नाज़िल होने में यह भी हिक्मत (उत्तम युक्ति) थी कि इस में कुछ आयतें वे थीं जिन का किसी समय रद्द कर देना अल्लाह को मंज़ूर था। कुरान में तीन प्रकार के मंसूखात (रद्द करना) हुए हैं। कुछ वे जिनका हुक्म भी मंसूख (रद्द) और तिलावत (उच्चारण) भी मंसूख (रद्द) ।
जब साफ़अे क़ियामत (क़ियामत के दिन सिफ़ारिश करने वाले) और [[उम्मत]] को पनाह देने वाले हुज़ूर [[मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] ने रफ़ीके आला जल्ल मुजद्दहू की रहमत में सकूनत अख़्तियार फ़रमाई अर्थात इस दुनिया से रुख़्सत (इंतिक़ाल, वफ़ात) फ़रमाई और वह्यी उतरना बंद हो गयी। कुरान किसी किताब में, जैसा कि आजकल है जमा नहीं था अलग-अलग चीजों पर सूरतें और आयतें लिखी हुई थीं और वे अलग-अलग लोगों के पास थीं। अधिकांश [[सहाबा]] ([[मुहम्मद|पैग़म्बर मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] के साथी) को क़ुरआन पूरा ज़बानी (मौखिक) याद था। अब से पहले कुरान को एक जगह जमा करने का ख़्याल (विचार) हज़रत अमीरुल मोमिनीन फ़ारुक़ आज़म रज़ि0 के दिल में पैदा हुआ और अल्लाह ने उन के ज़रिए (माध्यम) से अपने सच्चे वायदे (वचन) को पूरा किया जो अपने पैग़म्बर से किया था अर्थात कुरान के हम (अल्लाह) हाफ़िज़ है इस का जमा करना और हिफाज़त करना हमारे ज़िम्मे है। यह ज़माना (काल) हज़रत अमीरुल मोमिनीन सिद्दीक अक़बर रज़ि0 की [[ख़िलाफ़त|ख़िलाफ़ते]] राशिदा का था। हज़रत फ़ारुक़ रज़ि0 ने उन की सेवा में अर्ज़ (निवेदन) किया क़ुरआन के हाफ़िज़ (जिन्हें कुरान मौखिक याद हो) शहीद होते जा रहे हैं और बहुत से यमाना की जंग में शहीद हो गए। मुझे डर है कि यदि यही हाल रहेगा तो बहुत बड़ा हिस्सा कुरान का हाथ से चला जायेगा। अतः मैं उचित समझता हू कि आप इस तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) दें और कुरान के जमा करने का प्रबंध करें। हज़रत सिद्दीक़ ने फ़रमाया कि जो काम [[मुहम्मद|नबी सल्ल0]] ने नहीं किया उसको हम कैसे कर सकते हैं ? हज़रत उमर फ़ारुख़ ने अर्ज़ किया कि ख़ुदा की क़सम यह बहुत अच्छा काम है। फिर कभी-कभी हज़रत फ़ारुक़ रज़ि0 इसकी याद दिलाते रहे यहां तक कि हज़रत सिद्दीक़ रज़ि0 के दिले मुबारक अर्थात ह्रदय में भी यह बात जम गयी। उन्होंने ज़ैद बिन साबित रज़ि0 को तलब किया और यह सब क़िस्सा बयान करके फ़रमाया कि कुरान को जमा करने के लिए मैंने आप को चुना है, आप (ज़ैद बिन साबित रज़ि0) क़ातिब-इ-वह्यी (वह्यी को लिखने वाले थे) और जवान व नेक (सज्जन) थे। उन्होंने भी वही बात कही कि जो काम [[मुहम्मद|नबी सल्ल0]] ने नहीं किया, उसको हम लोग कैसे कर सकते हैं ? अन्त में वह राज़ी (सहमत) हो गए और उन्होंने बड़े अह्तमाम (बहुत प्रबन्धित ज़िम्मेदारी) से क़ुरआन को जमा करना शुरू किया।
ज़ैद बिन साबित रज़ि0 को चुने जाने की वजह उलमा (विद्वानों) ने यह लिखी है कि हर साल रमज़ान में हज़रत [[जिब्रईल|जिब्रील]] अलैहिस्सलाम से [[मुहम्मद|नबी सल्ल0]] क़ुरआन का दौर (पढ़ कर सुनना) किया करते थे और इंतक़ाल के साल में दो बार क़ुरआन का दौर हुआ और ज़ैद बिन साबित रज़ि0 इस अंतिम दौरे में शरीक (उपस्थित) थे और इस अंतिम दौर के बाद फिर कोई आयत मंसूख (रद्द) नहीं हुई जितना कुरान इस दौरे में पढ़ा गया, वह सब बाक़ी रहा अर्थात यही पूरा क़ुरआन था अतः उनको (ज़ैद बिन साबित रज़ि0) उन आयतों का ज्ञान था जिनकी तिलावत मंसूख हुई थी अर्थात जिनका पढ़ना मना था और ये आयते क़ुरआन में शामिल नहीं थी। (शरह सन्न:)
जब क़ुरआन सहाबा रज़ि0 ([[मुहम्मद|पैग़म्बर मुहम्मद]] [[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम|ﷺ]] के साथीगण) के प्रबन्ध से जमा हो चुका था अर्थात किताब की शक्ल में, हज़रत फ़ारुक़ रज़ि0 ने अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में उसकी नज़र सानी (दोबारा देखना) की और जहां कहीं किताब (लिखने में) ग़लती हो गयी थी उसको ठीक किया। सालों इस चिंता में रहे और कभी-कभी सहाबा रज़ि0 से मुनाज़िरा (चर्चा) किया। कभी कहीं गलती (लिखने में) दिखती तो फ़ौरन उसको सही कर देते थे फिर जब ये सब दर्जे (पैमाने) तै हो चुके तो हज़रत फ़ारुक़ रज़ि0 ने इस के पढ़ने-पढ़ाने की सख़्त व्यवस्था की और हाफ़िज़ सहाबा रज़ि0 (कुरान के विद्वान) को दूर के देशों में कुरान व [[फ़िक़्ह|फ़िक़्ह]] की शिक्षा के लिए भेजा, जिसका सिलसिला आज पूरे विश्व में पंहुचा। सच यह है कि हज़रत फ़ारुक़ रज़ि0 का एहसान (कृतज्ञता) इस बारे में पूरी उम्मते मुहम्मदिया (मुसलमानों) पर है। उन्हीं के कारण आज कुरान मुसलमानों के क़िताबी शक़्ल में मौजूद है और आज कुरान की तिलावत (पढ़ना) हर मुस्लिम घरों में की जाती है।
फ़िर हज़रत उस्मान रज़ि0 ने अपनी खिलाफ़त के ज़माने में उन्होंने इस मसहफ़ शरीफ़ (क़ुरआन) की सात नक़लें (प्रतियाँ) करा कर दूर-दूर के देशों में भेज दीं। और तिलावत क़िरआत (क़ुरआन पाठ करने के तरीक़ो) की वजह से जो मतभेद और झगड़े हो रहे थे और एक दूसरे की क़िरआत को हक़ के ख़िलाफ़ और ग़लत समझा जाता था, इस सब झगड़ों से इस्लाम को पाक कर दिया अर्थात झगड़ों को ख़त्म कर दिया। केवल एक क़िरआत (कुरान पाठ करने के तरीक़ो) पर सब को सहमत कर दिया।
==इतिहास==
{{Main|इस्लाम का इतिहास}}
[[File:Cave Hira.jpg|thumb|upright=0.7|हिरा की गुफ़ा जहाँ पैगंबर मुहम्मद पर पहला क़ुरआन उतरा था।]]
===नबी का दौर ===
इस्लामी परंपरा से संबंधित है कि [[मुहम्मद]] ने पहाड़ों पर [[ग़ार ए हिरा|हिरा]] की गुफा में अपनी इबादत के दौरान अपना पहला प्रकाशन प्राप्त किया था। इसके बाद, उन्हें 23 वर्षों की अवधि में पूरा क़ुरआन का खुलासा प्राप्त हुआ। [[हदीस]] और मुस्लिम इतिहास के मुताबिक, मुहम्मद मदीना में आकर एक स्वतंत्र मुस्लिम समुदाय का गठन करने के बाद, उन्होंने अपने कई साथी क़ुरआन को पढ़ने और कानूनों को सीखने और सिखाने का आदेश दिया, जिन्हें दैनिक बताया गया था। यह संबंधित है कि कुछ कुरैश जिन्हें बद्र की लड़ाई में कैदियों के रूप में ले जाया गया था, उन्होंने कुछ मुसलमानों को उस समय के सरल लेखन को सिखाए जाने के बाद अपनी आजादी हासिल कर ली। इस प्रकार मुसलमानों का एक समूह धीरे-धीरे साक्षर बन गया। जैसा कि शुरू में कहा गया था, क़ुरआन को तख्तों, खालों, हड्डियों, और के तने के चौड़े लकड़ियों पर दर्ज किया गया था। मुसलमानों के बीच ज्यादातर सूरे उपयोग में थे क्योंकि सुन्नी और शिया दोनों स्रोतों द्वारा कई हदीसों और इतिहास में उनका उल्लेख किया गया है, मुहम्मद के इस्लाम के आह्वान के रूप में क़ुरआन के उपयोग से संबंधित, प्रार्थना करने और पढ़ने के तरीके के रूप में। हालांकि, क़ुरआन 632 में मुहम्मद की मृत्यु के समय पुस्तक रूप में मौजूद नहीं था। <ref name=tabatabai5>{{cite book|last=Tabatabai|first=Sayyid M. H.|title=The Qur'an in Islam : its impact and influence on the life of muslims|year=1987|publisher=Zahra Publ.|isbn=0710302665|url=http://www.al-islam.org/quraninislam/5.htm|url-status=dead|archiveurl=https://web.archive.org/web/20130826003329/http://www.al-islam.org/quraninislam/5.htm|archivedate=26 August 2013|df=dmy-all}}</ref><ref name=watt>{{cite book|last=Richard Bell (Revised and Enlarged by W. Montgomery Watt)|title=Bell's introduction to the Qur'an|year=1970|publisher=Univ. Press|isbn=0852241712|pages=31–51}}
</ref><ref name=chi>{{cite book|last=P. M. Holt, Ann K. S. Lambton and Bernard Lewis|title=The Cambridge history of Islam|year=1970|publisher=Cambridge Univ. Press|isbn=9780521291354|page=32|edition=Reprint.}}</ref> विद्वानों के बीच एक समझौता है कि मुहम्मद ने खुद को रहस्योद्घाटन नहीं लिखा था। <ref name=denffer>{{cite book|last=Denffer|first=Ahmad von|title=Ulum al-Qur'an : an introduction to the sciences of the Qur an|year=1985|publisher=Islamic Foundation|isbn=0860371328|page=37|edition=Repr.}}</ref>
[[File:Surat al-Fatiha inscribed upon the shoulder blade of a camel.jpg|thumb|left|upright=0.5|कुरान की कविता सुलेख , स्याही के साथ ऊंट के कंधे ब्लेड पर अंकित है।]]
'''वैज्ञानिक अध्ययन:''' इस्लामी इतिहास के शोधकर्ताओं ने समय के साथ इस्लाम के जन्मस्थान और किबला के परिवर्तन की जांच की है। [[पेट्रीसिया क्रोन]], [[माइकल कुक]] और कई अन्य शोधकर्ताओं ने पाठ और पुरातात्विक अनुसंधान के आधार पर यह मान लिया है कि "मस्जिद अल-हरम" मक्का में नहीं बल्कि उत्तर-पश्चिमी अरब प्रायद्वीप में स्थित था।<ref>{{Cite web |url=https://bora.uib.no/bora-xmlui/bitstream/handle/1956/12367/144806851.pdf?sequence=4&isAllowed=y |title=संग्रहीत प्रति |access-date=31 मार्च 2021 |archive-date=12 अप्रैल 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210412071521/https://bora.uib.no/bora-xmlui/bitstream/handle/1956/12367/144806851.pdf?sequence=4&isAllowed=y |url-status=dead }}</ref><ref>Meccan Trade And The Rise Of Islam, (Princeton, U.S.A: Princeton University Press, 1987</ref><ref>https://repository.upenn.edu/cgi/viewcontent.cgi?article=5006&context=edissertations</ref><ref> https://dergipark.org.tr/tr/download/article-file/592002</ref> [[डैन गिब्सन]] ने कहा कि पहले इस्लामिक मस्जिद और कब्रिस्तान झुकाव ([[क़िबलाह|क़िबला]]) ने [[पेट्रा]] की ओर इशारा किया, यहाँ मुहम्मद को अपने पहले रहस्योद्घाटन प्राप्त हुए, और यहाँ इस्लाम की स्थापना हुई।<ref>Dan Gibson: Qur'ānic geography: a survey and evaluation of the geographical references in the qurãn with suggested solutions for various problems and issues. Independent Scholars Press, Surrey (BC) 2011, ISBN 978-0-9733642-8-6</ref>
[[मक्का (शहर)|मक्का नगर]] और [[इस्लाम|धरम-इ-इस्लाम]] के बारे [[पेट्रीसिया क्रोन|पेट्रिसिया क्रोन]], डैन गिब्सन व़ माइकेल कूक के अनुसंधान और उन्के नतीजा पर '''मुस्लिम गवेषक, विद्वानों''' ने कई सारे ग्रंथेँ और व़ैब सैट पर जव़ाब दे कर उन्के अभियोगों को खंडन करने की प्रयास किया।<ref>https://archive.today/20230224124452/https://islamicauthors.com/view/6022279d3408f72049486234/Answering%20to%20the%20propaganda%20video%20in%20the%20name%20of%20%E2%80%9CThe%20Sacred%20City%E2%80%9D%20of%20Dan%20Gibson.html</ref>
[[सहीह अल-बुख़ारी]] हदीस में मुहम्मद को रहस्योद्घाटन का वर्णन करते हुए बताया, "कभी-कभी यह घंटी बजने की तरह (प्रकट होता है)" और आइशा ने बताया, "मैंने देखा कि पैगंबर बहुत ही ठंडे दिन में [[वही (नबी)|वही]] से प्रेरित हो रहे हैं और उनके माथे से पसीना निकल रहा था। जैसे ही वही की प्रेरणा खत्म हो जाती तो उनकी बेचैनी दूर होजाती। " कुरान के अनुसार मुहम्मद का पहला प्रकाशन, एक दृष्टि के साथ था। प्रकाशन के माध्यम "एक शक्तिशाली" के रूप में वर्णित किया गया है, वह व्यक्ति जो "सबसे ऊपर क्षितिज पर था जब देखने के लिए स्पष्ट हुआ। फिर वह निकट आ गया और मुहम्मद से बात करने लगा। " इस्लामी अध्ययन विद्वान वेल्च विश्वकोष में बताते हैं कि उनका मानना है कि इन क्षणों पर मुहम्मद की हालत और विवरणों को वास्तविक माना जा सकता है, क्योंकि इन रहस्योद्घाटनों के बाद उन्हें गंभीर रूप से परेशान किया गया था। वेल्च के मुताबिक, मुहम्मद की प्रेरणाओं की अतिमानवी उत्पत्ति के लिए उनके आस-पास के लोगों ने इन दौरे को देखा होगा। हालांकि, मुहम्मद के आलोचकों ने उन्हें एक व्यक्ति, एक कवी या जादूगर होने का आरोप लगाया क्योंकि उनके अनुभव प्राचीन अरब में ऐसे आंकड़ों द्वारा दावा किए गए लोगों के समान थे। वेल्च अतिरिक्त रूप से बताता है कि यह अनिश्चित है कि मुहम्मद के भविष्यवाणियों के प्रारंभिक दावे से पहले या बाद में ये अनुभव हुए थे।
[[File:Iqra.jpg|thumb|upright=0.95|अल-अलाक का हिस्सा - क़ुरआन' का 96 वां [[सूरा]] - मुहम्मद द्वारा प्राप्त पहला प्रकाशन।]]
क़ुरआन मुहम्मद को "उम्मी" के रूप में वर्णित करता है, जिसे परंपरागत रूप से "अशिक्षित" के रूप में व्याख्या किया जाता है, लेकिन इसका अर्थ अधिक जटिल है। मध्यकालीन टिप्पणीकारों जैसे अल-तबरी ने कहा कि इस शब्द ने दो अर्थों को प्रेरित किया: पहला, सामान्य रूप से पढ़ने या लिखने में असमर्थता; दूसरा, पिछली किताबों या ग्रंथों की अनुभवहीनता या अज्ञानता (लेकिन उन्होंने पहले अर्थ को प्राथमिकता दी)। मुहम्मद की निरक्षरता को उनकी भविष्यवाणी की वास्तविकता के संकेत के रूप में लिया गया था। उदाहरण के लिए, फखरुद्दीन अल-राज़ी के अनुसार, यदि मुहम्मद ने लेखन और पढ़ाई में महारत हासिल की थी तो संभवतः उन्हें पूर्वजों की किताबों का अध्ययन करने का संदेह होता। वाट जैसे कुछ विद्वान "उम्मी" का दूसरा अर्थ पसंद करते हैं - वे इसे पहले पवित्र ग्रंथों के साथ अपरिचितता को इंगित करने के लिए लेते हैं।
क़ुरआन की अंतिम आयत वर्ष 10वीं हिजरी में धू अल-हिजजाह के इस्लामी महीने के 18 वीं तारीख़ को प्रकट हुई थी, जो एक तारीख है जो मोटे तौर पर फरवरी या मार्च 632 से मेल खाती है । पैगंबर ने गदीर ए खुम्म में अपना उपदेश देने के बाद यह खुलासा किया था।
===संकलन===
{{Main|क़ुरआन का इतिहास }}
[[File:Blue koran sanaa.jpg|thumb|[[पराबैंगनी प्रकाश]], [[सना की पांडुलिपियों]] के तहत कुरान; U.V और X किरणों का उपयोग करके, उप-पाठ और पाठ पर किए गए बदलाव जो नग्न आंखों से नहीं देखे जा सकते हैं, प्रकट किया जा सकता है।]]
632 में मुहम्मद की मृत्यु के बाद, पहले ख़लीफ़ा, [[अबु बक्र|अबू बक्र]] (634 ई), बाद में पुस्तक को एक ग्रन्थ में इकट्ठा करने का फैसला किया ताकि इसे संरक्षित किया जा सके। [[ज़ैद इब्न थाबित]] (655ई) क़ुरआन को इकट्ठा करने वाले पहले व्यक्ति थे क्योंकि वह अल्लाह के नबी मुहम्मद से पढ़े गए अयातों और सूरों को लिखा करते थे। इस प्रकार, शास्त्रीय समूह, सबसे महत्वपूर्ण ज़ैद बिन थाबित (ज़ैद बिन साबित) ने छंद एकत्र किए और पूरी किताब का संकलन करके कुरआन को किताब का रूप दिया था। इस तरह क़ुरआन एक ग्रन्थ के रूप में आगई और उसकी प्रती अबू बक्र के साथ ही रही। इस कार्य के लिए ज़ैद ने उन तमाम पन्ने जिन्हें हड्डी पर, पत्तों पर, पत्थरों पर लिखा गया था और कई लोग कंठस्त भी किये थे उन सब का क्रोडीकरण किया। अबू बकर के बाद, मुहम्मद की विधवा हफसा बिन्त उमर को लगभग 650 में इस पांडुलिपि को सौंपा गया था। तीसरे खलीफ उथमान इब्न अफ़ान (डी 656) ने कुरान के उच्चारण में मामूली मतभेदों को ध्यान में रखना शुरू किया क्योंकि इस्लाम अरब प्रायद्वीप से परे फारस , लेवंट और उत्तरी अफ्रीका में फैला था। पाठ की पवित्रता को संरक्षित करने के लिए, उन्होंने जयद की अध्यक्षता में एक समिति का आदेश दिया ताकि अबू बकर की प्रतिलिपि का उपयोग किया जा सके और क़ुरआन की एक मानक प्रति तैयार की जा सके। <ref name=tabatabai5/><ref name=sbukhari1>{{cite web|last=al-Bukhari|first=Muhammad|title=Sahih Bukhari, volume 6, book 61, narrations number 509 and 510|url=http://www.sahih-bukhari.com/Pages/Bukhari_6_61.php|year=810–870|website=sahih-bukhari.com|accessdate=16 February 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20160204172409/http://sahih-bukhari.com/Pages/Bukhari_6_61.php|archive-date=4 फ़रवरी 2016|url-status=dead}}</ref> इस प्रकार, मुहम्मद की मृत्यु के 20 वर्षों के भीतर, क़ुरआन लिखित रूप में प्रतिबद्ध था। यह पाठ उस मॉडल बन गया जहां से मुस्लिम दुनिया के शहरी केंद्रों में प्रतियां बनाई गईं और प्रक्षेपित की गईं, और अन्य संस्करणों को नष्ट कर दिया गया माना जाता है। <ref name=tabatabai5/><ref name=rippin>{{cite book|last=Rippin, Andrew|title=The Blackwell companion to the Qur'an|year=2006|publisher=Blackwell|isbn=978140511752-4|edition=[2a reimpr.]|display-authors=etal|url-access=registration|url=https://archive.org/details/blackwellcompani00ripp_0}}
* see section ''Poetry and Language'' by Navid Kermani, p.107-120.
* For eschatology, see ''Discovering (final destination)'' by Christopher Buck, p.30.
* For writing and printing, see section ''Written Transmission'' by François Déroche, p.172-187.
* For literary structure, see section ''Language'' by Mustansir Mir, p.93.
* For the history of compilation see ''Introduction'' by Tamara Sonn p.5-6
* For recitation, see ''Recitation'' by Anna M. Gade p.481-493
</ref><ref>Mohamad K. Yusuff, [http://www.irfi.org/articles/articles_251_300/zayd_ibn_thabit_and_the_glorious.htm Zayd ibn Thabit and the Glorious Qur'an] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170726122228/http://www.irfi.org/articles/articles_251_300/zayd_ibn_thabit_and_the_glorious.htm |date=26 जुलाई 2017 }}</ref> क़ुरआन पाठ का वर्तमान रूप मुस्लिम विद्वानों द्वारा अबू बकर द्वारा संकलित मूल संस्करण माना जाता है। <ref name=watt/>
[[File:Quran by Imam ali.JPG|thumb|क़ुरआन - मशहाद , ईरान में - अली ने लिखा था]]
शिया के अनुसार, अली इब्न अबी तालिब (डी। 661) ने मुहम्मद की मृत्यु के तुरंत बाद कुरान का एक पूर्ण संस्करण संकलित किया। इस पाठ का क्रम उथमान के युग के दौरान बाद में इकट्ठा हुआ था कि इस संस्करण को कालक्रम क्रम में एकत्रित किया गया था। इसके बावजूद, उन्होंने मानकीकृत क़ुरआन के खिलाफ कोई आपत्ति नहीं की और क़ुरआन को परिसंचरण में स्वीकार कर लिया। क़ुरआन की अन्य व्यक्तिगत प्रतियां इब्न मसूद और उबे इब्न काब के कोडेक्स समेत मौजूद हो सकती हैं, जिनमें से कोई भी आज मौजूद नहीं है।
क़ुरआन मुहम्मद के जीवनकाल के दौरान बिखरी हुई लिखित रूप में सबसे अधिक संभावना है। कई स्रोत बताते हैं कि मुहम्मद के जीवनकाल के दौरान बड़ी संख्या में उनके साथी ने खुलासा याद किया था। प्रारंभिक टिप्पणियां और इस्लामी ऐतिहासिक स्रोत क़ुरआन के शुरुआती विकास की उपर्युक्त समझ का समर्थन करते हैं। क़ुरआन अपने वर्तमान रूप में अकादमिक विद्वानों द्वारा मुहम्मद द्वारा बोली जाने वाले शब्दों को रिकॉर्ड करने के लिए आम तौर पर माना जाता है क्योंकि वेरिएंट की खोज ने बहुत महत्व नहीं दिया है। शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ्रेड डोनर ने कहा कि "... क़ुरआन के एक समान व्यंजन पाठ को स्थापित करने का एक बहुत ही शुरुआती प्रयास था, जो संभवतः संचरण में संबंधित ग्रंथों का एक व्यापक और अधिक विविध समूह था। इस मानकीकृत कैननिकल पाठ के निर्माण के बाद, पहले आधिकारिक ग्रंथों को दबा दिया गया था, और सभी मौजूदा पांडुलिपियों - उनके कई रूपों के बावजूद-इस मानक व्यंजन पाठ की स्थापना के बाद एक समय की तारीख लगती है। " हालांकि क़ुरआन के पाठ के अधिकांश संस्करण रीडिंग को प्रसारित करना बंद कर दिया गया है, कुछ अभी भी हैं। वहां कोई महत्वपूर्ण पाठ नहीं हुआ है जिस पर क़ुरआनी पाठ का विद्वान पुनर्निर्माण आधारित हो सकता है। ऐतिहासिक रूप से, क़ुरआन की सामग्री पर विवाद शायद ही कभी एक मुद्दा बन गया है, हालांकि इस विषय पर बहस जारी है।
1972 में, [[यमन]] के शहर [[सना]] की एक मस्जिद में, पांडुलिपियों की खोज की गई थी जो बाद में उस समय मौजूद सबसे प्राचीन क़ुरआनी पाठ साबित हुए थे। सना की पांडुलिपियों में एक पृष्ठ है जिसमें से चर्मपत्र पुन: प्रयोज्य बनाने के लिए धोया गया है- एक अभ्यास जो प्राचीन समय में लेखन सामग्री की कमी के कारण आम था। हालांकि, बेहोश धोया हुआ अंतर्निहित पाठ ( स्क्रिप्टियो अवरुद्ध ) अभी भी मुश्किल से दिखाई देता है और इसे "पूर्व-उथमानिक" क़ुरआनी सामग्री माना जाता है, जबकि शीर्ष पर लिखे गए पाठ (स्क्रिप्टियो श्रेष्ठ) को उथमानिक समय माना जाता है। रेडियोकार्बन डेटिंग का उपयोग करने वाले अध्ययन से पता चलता है कि चर्मपत्र 671 सीई से पहले की अवधि के लिए 99 प्रतिशत संभावना के साथ दिनांकित हैं।
[[File:Birmingham Quran manuscript.jpg|thumb|बर्मिंघम कुरान पांडुलिपि, दुनिया में सबसे पुराने में दिनांकित।]]
2015 में, 1370 साल पहले डेटिंग करने वाले बहुत ही शुरुआती कुरान के टुकड़े इंग्लैंड के बर्मिंघम विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में खोजे गए थे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट द्वारा किए गए परीक्षणों के मुताबिक, "95% से अधिक की संभावना के साथ, चर्मपत्र 568 और 645 के बीच था"। पांडुलिपि लिजा अरबी के प्रारंभिक रूप हिजाजी लिपि में लिखी गई है। यह संभवतः क़ुरआन का सबसे पुराना उदाहरण है, लेकिन परीक्षणों की एक विस्तृत तारीख की अनुमति है, इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मौजूदा संस्करणों में से कौन सा सबसे पुराना है। सऊदी विद्वान सौद अल-सरहान ने टुकड़ों की उम्र में संदेह व्यक्त किया है क्योंकि उनमें डॉट्स और अध्याय विभाजक शामिल हैं जिन्हें माना जाता है कि बाद में इसका जन्म हुआ था।
==इस्लाम में महत्व==
मुस्लिमों का मानना है कि क़ुरआन 23 साल की अवधि में अल्लाह ने जिब्रील के माध्यम से मुहम्मद से दिव्य मार्गदर्शन की पुस्तक बन गया है और कुरान को मानवता के लिए अल्लाह के अंतिम प्रकाशन के रूप में देखता है। <ref name = LivRlgP338/><ref name="autogenerated1">Watton, Victor, (1993), ''A student's approach to world religions:Islam'', Hodder & Stoughton, pg 1. {{ISBN|978-0-340-58795-9}}</ref> इस्लामी और क़ुरआनी संदर्भों में प्रकाशितवाक्य का मतलब है कि अल्लाह का कार्य किसी व्यक्ति को संबोधित करना, प्राप्तकर्ताओं की एक बड़ी संख्या के लिए संदेश भेजना। जिस प्रक्रिया से अल्लाह के संदेशवाहक के दिल में दैवीय संदेश आता है वह तंजिल (नीचे भेजने के लिए) या नुज़ुल (नीचे आना) है। जैसा कि क़ुरआन कहता है, "सच्चाई के साथ हमने इसे नीचे भेज दिया है और सच्चाई के साथ यह नीचे आ गया है।" <ref>See:
*Corbin (1993), p.12{{full citation needed|date=November 2012}}
*Wild (1996), pp. 137, 138, 141 and 147{{full citation needed|date=November 2012}}
*{{Cite quran|2|97|style=nosup}}
*{{Cite quran|17|105|style=nosup}}</ref>
क़ुरआन अक्सर अपने पाठ में जोर देता है कि इसे अल्लाह रूप से नियुक्त किया जाता है। क़ुरआन में कुछ छंद यह इंगित करते हैं कि अरबी बोलने वाले भी लोग क़ुरआन को समझेंगे अगर उन्हें सुनाया जाता है। क़ुरआन एक लिखित पूर्व-पाठ, "संरक्षित टैबलेट" को संदर्भित करता है, जो इसे भेजने से पहले भी भगवान के भाषण को रिकॉर्ड करता है।
क़ुरआन बनाया गया मुद्दा यह मुद्दा नौवीं शताब्दी में एक मज़हबी बहस (कुरान की रचना) बन गया। तर्क और तर्कसंगत विचारों के आधार पर एक इस्लामी स्कूल मुताजिलस ने कहा कि क़ुरआन बनाया गया था, जबकि मौलाना की सबसे व्यापक किस्में क़ुरआन को अल्लाह के मानते थे और इसलिए अकुशल थे। सूफी दार्शनिक इस सवाल को कृत्रिम या गलत तरीके से तैयार करते हैं। <ref>Corbin (1993), p.10</ref>
मुसलमानों का मानना है कि क़ुरआन का वर्तमान शब्द मुहम्मद को पता चला है, और क़ुरआन 15: 9 की उनकी व्याख्या के अनुसार, यह भ्रष्टाचार से संरक्षित है ("दरअसल, यह वह है जिसने क़ुरआन को भेजा और वास्तव में, हम होंगे इसके अभिभावक। ")। <ref>{{cite book|author1=Mir Sajjad Ali |author2=Zainab Rahman |title=Islam and Indian Muslims|year=2010|publisher=Kalpaz Publications|isbn=8178358050|page=21}}</ref> मुस्लिम क़ुरआन को मार्गदर्शक मानते हैं, मुहम्मद की भविष्यवाणी और मजहब की सच्चाई का संकेत की है, और क़ुरआन का अध्ययन करने के लिए भाषाई दृष्टिकोण का उपयोग किया है। अन्य लोग तर्क देते हैं कि क़ुरआन में महान विचार हैं, आंतरिक अर्थ हैं, उम्र के माध्यम से अपनी ताजगी बनाए रखते हैं। और क़ुरआन के ज़रिये व्यक्तिगत स्तर पर और इतिहास में बड़े बदलाव हुए हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि क़ुरआन में वैज्ञानिक जानकारी है जो आधुनिक विज्ञान से सहमत है। कुरान की चमत्कारीता के सिद्धांत पर मुहम्मद की निरक्षरता पर जोर दिया गया है क्योंकि अज्ञात भविष्यद्वक्ता को क़ुरआन लिखने की क्षमता कैसे होगी। इस लिए यह अल्लाह वाणी है। <ref name=leaman/><ref name=sophia>{{cite journal|last=Vasalou|first=Sophia|title=The Miraculous Eloquence of the Qur'an: General Trajectories and Individual Approaches|journal=Journal of Qur'anic Studies|year=2002|volume=4|issue=2|pages=23–53|doi=10.3366/jqs.2002.4.2.23}}</ref>
=== शरीयत===
इस क़ानून की परिभाषा दो स्रोतों से होती है। पहली इस्लाम का धर्मग्रन्थ क़ुरआन है और दूसरा इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा दी गई मिसालें हैं (जिन्हें सुन्नाह कहा जाता है)। इस्लामी क़ानून को बनाने के लिए इन दो स्रोतों को ध्यान से देखकर नियम बनाए जाते हैं। इस क़ानून बनाने की प्रक्रिया को 'फ़िक़्ह' (<small>{{Nastaliq|ur|فقه}}, fiqh</small>)।<ref>{{cite web|url=https://www.bbc.com/hindi/news/030527_sharia_law_mk.shtml|title=क्या है इस्लामी क़ानून-शरिया?}}{{Dead link|date=जून 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> शरीयत में बहुत से विषयों पर मत है, जैसे कि स्वास्थ्य, खानपान, पूजा विधि, व्रत विधि, विवाह, जुर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था इत्यादि।<ref name="ref74poyiz">[http://books.google.com/books?id=uWR_4BTqtBYC शरीया - द इस्लामिक लॉ]। स्टॅण्डके कॉरिना। GRIN Verlag, २००८, ISBN 978-3-640-14967-4</ref>
पारंपरिक [[शरिया]] प्रथाओं में से कुछ में गंभीर "मानवाधिकारों" का उल्लंघन है।<ref>http://www.etc-graz.eu/wp-content/uploads/2020/08/insan_haklar__305_n__305__anlamak_kitap_bask__305_ya_ISBNli_____kapakli.pdf</ref><ref>{{Cite web |url=https://www.gedik.edu.tr/wp-content/uploads/insan-haklari-ve-demokrasi-ders-notu.pdf |title=संग्रहीत प्रति |access-date=11 मार्च 2021 |archive-date=29 सितंबर 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200929000813/https://www.gedik.edu.tr/wp-content/uploads/insan-haklari-ve-demokrasi-ders-notu.pdf |url-status=dead }}</ref>
===नमाज़ या सलात में===
{{मुख्य|नमाज़}}
क़ुरआन का पहला सूरा [[अल-फ़ातिहा|सूरा ए फ़ातिहा]] दैनिक प्रार्थनाओं ([[नमाज़]]) और अन्य अवसरों में पढ़ा और दोहराया जाता है। यह सूरा, जिसमें सात छंद होते हैं, कुरान का सबसे अधिक बार पढ़ा जाने वाला सूरा है: <ref name=Britannica />
शुरू करता हूँ ख़ु़दा के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है; सब तारीफ ख़ु़दा ही के लिए हैं ज़ो सबक़ा रब अौर मालिक़ है; और सारे जहाँन का पालने वाला बड़ा मेहरबान रहम वाला है; रोज़े जज़ा का मालिक है; ख़ु़दाया हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझ ही से मदद चाहते हैं; तो हमको सीधी राह पर साबित क़दम रखवा; उनकी राह जिन्हें तूने (अपनी) नेअमत अता की है न उनकी राह जिन पर तेरा ग़ज़ब ढ़ाया गया और न गुमराहों की। " <ref>Quran {{Cite quran|1|1|e=7|b=n|s=ns}}</ref>
क़ुरआन को अन्य वर्ग भी दैनिक प्रार्थनाओं में पढ़ते हैं।
क़ुरआन के लिखित पाठ का सम्मान कई मुसलमानों द्वारा धार्मिक विश्वास का एक महत्वपूर्ण तत्व है, और कुरान को सम्मान के साथ माना जाता है। परंपरा के आधार पर और कुरान की एक शाब्दिक व्याख्या 56:79 ("कोई भी स्पर्श नहीं करेगा लेकिन जो शुद्ध हैं"), कुछ मुसलमानों का मानना है कि उन्हें कुरान की एक प्रति छूने से पहले [[वज़ू]] (पानी के साथ एक अनुष्ठान साफ) करना होगा, हालांकि यह विचार नहीं है सार्वभौमिक। पुराणी बोसीदा कुरान की प्रतियां कपड़े में लपेटी जाती हैं और एक सुरक्षित जगह में अदब के साथ अनिश्चित काल तक संग्रहीत की जाती हैं। कभी मस्जिद या एक मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया जाता है, या जला दिया जाता है और राख को दफन किया जाता है या पानी पर बिखरा हुआ होता है। <ref>{{cite web|url=http://www.slate.com/articles/news_and_politics/explainer/2012/02/afghan_quran_burning_protests_what_s_the_right_way_to_dispose_of_a_quran_.html|title=Afghan Quran-burning protests: What's the right way to dispose of a Quran?|work=Slate Magazine|access-date=4 मई 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20171018134606/http://www.slate.com/articles/news_and_politics/explainer/2012/02/afghan_quran_burning_protests_what_s_the_right_way_to_dispose_of_a_quran_.html|archive-date=18 अक्तूबर 2017|url-status=live}}</ref>
इस्लाम में, [[इस्लामी धर्मशास्त्र|धर्मशास्त्र]], दर्शन, [[इस्लामी रहस्यवाद|रहस्यवाद]] और [[इस्लामी न्यायशास्त्र|न्यायशास्त्र]] समेत अधिकांश बौद्धिक विषयों, कुरान से चिंतित हैं या उनकी शिक्षाओं में उनकी नींव रखते हैं। मुसलमानों का मानना है कि क़ुरआन के प्रचार या पढ़ना अधिक प्राधान्यता रखता है। इस के प्रचार और पढने वालों को दिव्य पुरस्कारों से पुरस्कृत किया जाता है। ऐसा करना विभिन्न प्रकार के अजहर, [[सवाब]] या हसनह (हसनत) कहा जाता है। <ref>{{cite book|last1=Sengers -|first1=Erik|title=Dutch and Their Gods|date=2005|page=129}}</ref>
===इस्लामी कला में===
क़ुरआन ने इस्लामी कलाओं और विशेष रूप से सुलेख और रोशनी के तथाकथित क़ुरआनी कलाओं को भी प्रेरित किया। क़ुरआन को चित्रकारी छवियों से कभी सजाया नहीं जाता है, लेकिन कई कुरानों को पृष्ठ के मार्जिन में या लाइनों के बीच या सूरे की शुरुआत में सजावटी पैटर्न के साथ सजाया जाता है। इस्लामिक छंद कई अन्य मीडिया, भवनों और मस्जिदों या एल्बमों के लिए मस्जिद लैंप, बर्तनों पर, मिट्टी के बर्तनों और सुलेख के पृष्ठों जैसे सभी आकारों की वस्तुओं पर दिखाई देते हैं।
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चित्र:Brooklyn Museum - Calligraphy - 3.jpg|18 वीं शताब्दी में सुलेख । ब्रुकलिन संग्रहालय ।
चित्र:Quran inscriptions on wall, Lodhi Gardens, Delhi.jpg|कुरान के शिलालेख, बारा गुंबद मस्जिद , दिल्ली, भारत।
चित्र:Mosque lamp Met 91.1.1534.jpg|अयत एन-नूर या "प्रकाश की श्लोक" (24:35) के साथ विशिष्ट ग्लास और तामचीनी मस्जिद दीपक।
चित्र:Mausolées du groupe nord (Shah-i-Zinda, Samarcande) (6016470147).jpg|क़ुरआनी छंद, शाहिज़िंडा मकबरे, समरकंद, उजबेकिस्तान।
चित्र:Muhammad ibn Mustafa Izmiri - Right Side of an Illuminated Double-page Incipit - Walters W5771B - Full Page.jpg|क़ुरआन पेज सजावट कला, तुर्क अवधि।
चित्र:4.8-17-1990-Guld-koranside-recto-og-verso.jpg|इस क़ुरआन की पत्तियों को सोने में लिखा गया है और भूरे रंग की स्याही के साथ एक क्षैतिज प्रारूप है। यह शास्त्रीय कुफिक सुलेख के लिए सराहनीय रूप से उपयुक्त है, जो प्रारंभिक अब्बासिद खलीफा के तहत आम हो गया।
चित्र:Brooklyn Museum - Manuscript of the Qur'an.jpg|ब्रुकलिन संग्रहालय में क़ुरआन की पांडुलिपि
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== क़ुरआन कथ्य ==
क़ुरआन में कुल 114 अध्याय हैं जिन्हें [[सूरा]] कहते हैं। बहुचन में इन्हें सूरत कहते हैं। अपने सत्ता समय में हज़रत सिद्दीक़्क़ी अकबर (रज़ि.) द्वारा संकलित क़ुरआन की 9 प्रतियाँ तैयार करके कई देशों में भेजी थी उनमें से दो क़ुरआन की प्रतियाँ अभी भी पूर्ण सुरक्षित हैं। एक [[ताशक़ंद]] में और दूसरी [[तुर्की]] में मौजूद है। यह 500 साल पुरानी हैं, इसकी भी जाँच वैज्ञानिक रूप से काराई जा सकती है। फिर यह भी एतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि इस किताब में एक मात्रा का भी अंतर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के समय से अब तक नहीं आया है।
===पाठ और व्यवस्था===
* मुख्य लेख: [[सूरा]] और [[आयत (क़ुरआन)|आयत]]
[[File:FirstSurahKoran (fragment).jpg|thumb|upright=1.05|कुरान का पहला [[सूरा]] [[अल फ़ातिहा]], जिसमें सात आयत शामिल हैं।]]
कुरान में अलग-अलग लंबाई के 114 अध्याय हैं, जिन्हें हर प्रत्येक को सूरा के नाम से जाना जाता है। सुरा को मक्की या मदनी के रूप में वर्गीकृत किया गया है, इस पर निर्भर करता है कि मुहम्मद के मदीना के प्रवास से पहले या बाद में आयात प्रकट किए गए थे या नहीं। हालांकि, मदनी के रूप में वर्गीकृत एक सूरे में मक्की आयत हो सकती है और इसके विपरीत भी। सूरा शीर्षक टेक्स्ट में चर्चा किए गए नाम या गुणवत्ता से, या सूर्या के पहले अक्षर या शब्दों से प्राप्त होते हैं। घटते आकार के क्रम में सूरज मोटे तौर पर व्यवस्थित होते हैं। इस प्रकार सूर्य व्यवस्था प्रकाशन के अनुक्रम से जुड़ी नहीं है। नौवें सूरे को छोड़कर प्रत्येक सूरा बिस्मिल्लाह (بسم الله الرحمن الرحيم) के साथ शुरू होता है, जिसका अर्थ अरबी वाक्यांश है जिसका अर्थ है "अल्लाह के नाम पर"। हालांकि, कुरान में रानी शेबा को सुलैमान के पत्र के उद्घाटन के रूप में (कुरान 27:30) बिस्मिल्लाह मौजूद है। इस तरह कुरान में बिस्मिल्लाह की 114 घटनाएं अभी भी मौजूद हैं। <ref>See:
*"Kur`an, al-," ''Encyclopaedia of Islam Online''
*Allen (2000) p. 53</ref>
[[File:Surah95-Tin.png|thumb|upright=1.05|अत-तीन (अंजीर), कुरान के 95 वां [[सूरा]]।]]
प्रत्येक सूरा में कई छंद होते हैं, जिन्हें अयत कहा जाता है, जिसका मूल रूप से भगवान द्वारा भेजा गया "संकेत" या "सबूत" होता है। छंदों की संख्या हर सूरा में अलग है। एक व्यक्तिगत कविता केवल कुछ अक्षर या कई लाइनें हो सकती है। कुरान में छंदों की कुल संख्या 6,236 है; हालांकि, संख्या भिन्न होती है यदि बिस्मिल्लाह अलग-अलग गिना जाता है।
सूरों में विभाजन के अलावा और स्वतंत्र होने के अलावा, कुरान को पढ़ने में सुविधा के लिए लगभग बराबर लंबाई के हिस्सों में विभाजित करने के कई तरीके हैं। एक महीने में पूरे कुरान के माध्यम से पढ़ने के लिए 30 जुज़ '(बहुवचन अजज़ा) का उपयोग किया जा सकता है। इनमें से कुछ हिस्सों को नामों से जाना जाता है- जो पहले कुछ शब्द हैं जिनके द्वारा जुज़ शुरू होता है। एक जुज़ ' कभी-कभी दो हिज़्ब (बहुवचन हज़ाब) में विभाजित होता है, और प्रत्येक हिजब चार रूब' अल-अहज़ब में विभाजित होता है। एक सप्ताह में कुरान को पढ़ने के लिए कुरान को लगभग सात बराबर भागों, मंजिल (बहुवचन मनाज़िल) में विभाजित किया गया है।
अनुच्छेदों के समान अर्थात् इकाइयों द्वारा एक अलग संरचना प्रदान की जाती है और इसमें लगभग दस आयत शामिल होते हैं। इस तरह के एक खंड को रुकू कहा जाता है।
'''[[हुरुफ़ मुक़त्तआत]]''' (अंग्रेज़ी Abbreviations) (अरबी : حروف مقطعات) "बेजुड़े अक्षर"; "रहस्यमय पत्र") 114 सूरहों में से 29 की शुरुआत में एक और पांच अरबी अक्षरों के संयोजन के संयोजन हैं (अध्याय) [कुरान] के [[बिस्मिल्लाह|बिस्मिल्ला हिर्रहमा / निर्रहीम|बसमला]] के बाद। अक्षरों को फवातीह (فواتح) या "सलामी अक्षर" के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि वे अपने संबंधित [[सूरा|सूरों]] के उद्घाटन बनाते हैं। चार सूरों का नाम उनके [[मुक़त्ततात]], [[ता हा|ता-हा]], [[या सिन|या-सीन]], सआद और क़ाफ़ के लिए रखा गया है। अक्षरों का मूल महत्व अज्ञात है। तफसीर ने उन्हें अल्लाह के नाम या गुणों या संबंधित सूरों के नाम या सामग्री के लिए संक्षेप में व्याख्या की है ।
एक अनुमान के मुताबिक कुरान में 77,430 शब्द, 18,994 अद्वितीय शब्द, 12,183 उपजी, 3,382 लीमा और 1,685 मूल शब्द शामिल हैं । <ref>{{cite web|last=Dukes|first=Kais|title=RE: Number of Unique Words in the Quran|url=http://www.mail-archive.com/comp-quran@comp.leeds.ac.uk/msg00223.html|work=www.mail-archive.com|accessdate=29 October 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20150930121816/http://www.mail-archive.com/comp-quran@comp.leeds.ac.uk/msg00223.html|archive-date=30 सितंबर 2015|url-status=dead}}</ref>
==अंतर्वस्तु==
मुख्य लेख: [[इस्लाम में ईश्वर]], [[इस्लामी पैग़म्बर]]
[[File: Noah's ark and the deluge.JPG|thumb|left|150px|[[नूह]] नूह का जहाज (Zubdetü't-Tevarih); [[गिलगमेश]] बाढ़ की कथा को टोरा और कुरान में फिर से व्याख्यायित किया गया है।.<ref> http://sssjournal.com/DergiTamDetay.aspx?ID=811&Detay=Ozet </ref><ref>https://dergipark.org.tr/tr/download/article-file/557354 </ref>]]
[[File:Moses - Alta-Tadema.jpg|thumb|250px|समानांतर कहानियाँ;[[मूसा]], जिनके नाम का क़ुरआन में १३६ बार उपयोग किया गया है, उन्हें नील नदी से बचाया गया है। ([[Lawrence Alma-Tadema|Alma-Tadema]]).यह [[:en:Sargon of Akkad|द ग्रेट सरगुन]] के लिए एक समान कहानी है।(क़ुरआन 28: 7-9) / निर्गमन 1, 15-22)]]
क़ुरआन की सामग्री बुनियादी इस्लामी मान्यताओं से संबंधित है जिसमें भगवान और पुनरुत्थान के अस्तित्व शामिल हैं। शुरुआती भविष्यद्वक्ताओं, नैतिक और कानूनी विषयों के कथाएं, मुहम्मद के समय, दान और प्रार्थना की ऐतिहासिक घटनाएं कुरान में भी दिखाई देती हैं। कुरान के छंदों में सही और गलत और ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में सामान्य उपदेश शामिल हैं, सामान्य नैतिक पाठों की रूपरेखा से संबंधित हैं। प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित वर्सेज मुसलमानों द्वारा कुरान के संदेश की प्रामाणिकता के संकेत के रूप में व्याख्या की गई है। <ref name=saeed>{{cite book|last=Saeed|first=Abdullah|title=The Qurʼan : an introduction|year=2008|publisher=Routledge|location=London|isbn=9780415421249|page=62}}</ref>
===टियोलॉजी ===
कुरान का केंद्रीय विषय एकेश्वरवाद है। भगवान को जीवित, शाश्वत, सर्वज्ञानी और सर्वज्ञ के रूप में चित्रित किया गया है वह सब कुछ, स्वर्ग और पृथ्वी का निर्माता है और उनके बीच क्या है (देखें, उदाहरण के लिए, कुरान 13:16 , 50:38 , आदि)। सभी मनुष्य ईश्वर पर उनकी पूर्ण निर्भरता के बराबर हैं, और उनका कल्याण उनके तथ्य को स्वीकार करने और तदनुसार रहने पर निर्भर करता है। <ref name=watt/><ref name=saeed/>
कुरान भगवान के अस्तित्व को साबित करने के लिए शर्तों का जिक्र किए बिना विभिन्न छंदों में ब्रह्माण्ड संबंधी और आकस्मिक तर्कों का उपयोग करता है। इसलिए, ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है और उसे उत्प्रेरक की आवश्यकता है, और जो भी अस्तित्व में है उसके अस्तित्व के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए। इसके अलावा, ब्रह्मांड के डिजाइन को अक्सर चिंतन के बिंदु के रूप में जाना जाता है: "यह वह है जिसने सद्भाव में सात स्वर्ग बनाए हैं। आप भगवान की सृष्टि में कोई गलती नहीं देख सकते हैं, फिर फिर देखें: क्या आप कोई दोष देख सकते हैं?" <ref>Quran {{Cite quran|67|3|b=n|s=ns}}</ref></span><ref name=leaman/>
यहूदी, ईसाई और इस्लामी विचारों के इतिहास में "ईश्वर के बारे में एक मानवशास्त्रीय भाषा" का उपयोग करना या न करना "गहन बहस का विषय" रहा है। एक पर विश्वास, अद्वितीय ईश्वर इस्लामी तौहीद का आधार है अब्राहमिक धर्मों की पवित्र पुस्तकों में मानवरूपी उदाहरण हैं, साथ ही ऐसे भाव भी हैं जो ईश्वर को प्राणियों से अलग करते हैं। एक सामान्य दृष्टिकोण से, यह कहा जा सकता है कि कुरान और बाइबिल में तंजीह की तुलना में अधिक उपमाएं हैं।<ref>{{Cite web |url=http://www.tlck.org.tr/wp-content/uploads/2015/04/III_TLCK_2._kitap_BASKI.pdf |title=संग्रहीत प्रति |access-date=30 जुलाई 2021 |archive-date=18 अप्रैल 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170418081619/http://www.tlck.org.tr/wp-content/uploads/2015/04/III_TLCK_2._kitap_BASKI.pdf |url-status=dead }}</ref>
पैगंबर और उनकी किताबें (जिन्हें कुरान में अल्लाह द्वारा भेजे जाने के बारे में कहा गया है) खुद को अन्य देवताओं (जैसे, यहोवा) के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।<ref>"The original Hebrew texts use YHVH 6,828 times." Wilhelm Gesenius (Hrsg.): Hebräisches und Aramäisches Handwörterbuch über das Alte Testament. Zweite Teillieferung. 18. Auflage. Springer, 1995, ISBN 3-540-58048-4, S. 446.</ref> उदाहरण के लिए, एलिय्याह (अरबी में इलियास) एक हिब्रू शब्द है जिसका अर्थ है "मेरा भगवान याहू/जाह है"<ref>''New Bible Dictionary''. 1982 (second edition). Tyndale Press, Wheaton, IL, USA. ISBN 0-8423-4667-8, p. 319</ref> कुरान में गेब्रियल (जिब्रिल) और मिकेल जैसे एंजेल नाम अन्य अब्राहमिक धर्मों की तरह एल (या इल) से जुड़े हैं।
कुरान में गेब्रियल (जिब्रिल) और मिकेल जैसे एंजेल नाम अन्य अब्राहमिक धर्मों की तरह एल (या इल) से जुड़े हैं। अल्लाहुम्मा, कुरान में भी उल्लेख किया गया है और पारंपरिक रूप से दुआ शुरू करने के लिए इस्लाम में इस्तेमाल किया जाता है, (संभवतः) हिब्रू शब्द एलोहिम का अरबी उच्चारण था<ref>{{Kitap kaynağı |editör1-soyadı=Hastings |editör1-ad=James |başlık=Encyclopædia of Religion and Ethics, Volume VI: Fiction–Hyksos |tarih=1913 |yayıncı=T. & T. Clark |yer=Edinburgh |sayfa=248}}</ref><ref>https://archive.org/stream/foreignvocabular030753mbp#page/n84/mode/1up/search/allahumma</ref> एलोहीम का इस्तेमाल हिब्रू में अभिवादन बहुवचन (जिसका अर्थ है "भगवान!") के रूप में किया गया था, जैसे "आपकी महिमा!" वाक्यांश में है। शब्द ''''Rab''''' (भगवान, मास्टर), ("जो [[दस आज्ञाओं | आज्ञा]] के कारण यहोवा के बजाय प्रयोग किया जाता है" "तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ नहीं बोलना चाहिए , "पवित्र पुस्तक" में)<ref>https://kutsal-kitap.net/bible/tr/index.php?id=75&mc=1&sc=55</ref> अक्सर कुरान में भगवान के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
[[File:Rembrandt - Moses Smashing the Tablets of the Law - WGA19132.jpg|thumb|150 px|left|क्रोधित मूसा ने पत्थर की प्लेट तोड़ दी। (यहूदी धर्म के अनुसार [[यहोवा]] की उंगलियों से लिखा गया है।<ref>https://dergipark.org.tr/tr/download/article-file/154631</ref>)रेम्ब्रांट, १६५९]]
===परलोक सिद्धांत===
[[File:Muhammad and "shameless women" in Hell.jpg|thumb|150 px|आख़िरत के लिए मुहम्मद की यात्रा; प्राचीन इज़राइल (जे-बेन हिन्नोम में, जिन बच्चों को जला दिया गया था और मोलेक (यिर्मयाह 32:35) को बलिदान कर दिया गया था) में बनाए गए डरावने और डर के तत्व कुरान के नर्क में इसी तरह से दिखाई देते हैं (मोलेक-मलिक).(43:77)<ref>Bernstein, Alan E. “Islam: The Mockers Mocked.” Hell and Its Rivals: Death and Retribution among Christians, Jews, and Muslims in the Early Middle Ages, 1st ed., Cornell University Press, 2017, pp. 319–54, http://www.jstor.org/stable/10.7591/j.ctt1qv5q7k.15.</ref>]]
पुराने नियम में "गेहिन्नोम" या हिन्नोम के पुत्र की घाटी यरूशलेम में एक शापित घाटी है (जहां बच्चों की बलि दी गई थी (यिर्मयाह 32:35))। सुसमाचारों में, यीशु "गेहन्ना" के बारे में एक ऐसे स्थान के रूप में बात करते हैं जहाँ "कीड़ा कभी नहीं मरता और आग कभी नहीं बुझती"। (मरकुस 9:48) दूसरी शताब्दी के आसपास लिखी गई एज्रा की अपोक्रिफल पुस्तक में, गेहिन्नोम सजा के एक पारलौकिक स्थान के रूप में प्रकट होता है। यह परिवर्तन बेबीलोन के तल्मूड में पूरा होता है। (लगभग 500 ईस्वी सन् में लिखा गया) "जहानम" को अक्सर कुरान में अनन्त सजा के स्थान के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।<ref>Bernstein, Alan E. “Islam: The Mockers Mocked.” Hell and Its Rivals: Death and Retribution among Christians, Jews, and Muslims in the Early Middle Ages, 1st ed., Cornell University Press, 2017, pp. 319–54, http://www.jstor.org/stable/10.7591/j.ctt1qv5q7k.15.</ref>
अंतिम दिन [[यौम अल-क़ियामा]] और आकिरत (ब्रह्मांड के अंतिम भाग्य) के सिद्धांत कुरान के दूसरे महान सिद्धांत के रूप में माना जा सकता है। <ref name=watt/> यह अनुमान लगाया गया है कि कुरान का लगभग एक तिहाई आकिरात है, अगली दुनिया में बाद के जीवन के साथ और समय के अंत में निर्णय के दिन से निपटने। <ref name=rippin/> कुरान के अधिकांश पृष्ठों पर बाद के जीवन का एक संदर्भ है और बाद में जीवन में विश्वास को आम अभिव्यक्ति के रूप में भगवान में विश्वास के साथ संदर्भित किया जाता है: "भगवान और अंतिम दिन में विश्वास करें"। 44, 56, 75, 78, 81 और 101 जैसे कई [[सूरा|सूरे]] सीधे जीवन के बाद और इसकी तैयारी से संबंधित हैं। कुछ सूर्या इस घटना के निकटता को इंगित करते हैं और आने वाले दिनों के लिए लोगों को तैयार होने की चेतावनी देते हैं। उदाहरण के लिए, सूर्या 22 के पहले छंद, जो शक्तिशाली भूकंप और उस दिन लोगों की परिस्थितियों से निपटते हैं, दिव्य पते की इस शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं: "हे लोग! अपने भगवान का सम्मान करें। समय का भूकंप एक शक्तिशाली है चीज़।"
कुरान अक्सर अपने चित्रण में स्पष्ट होता है कि अंत में क्या होगा। वाट ने अंत समय के कुरान के दृष्टिकोण का वर्णन किया: <ref name=watt/>
"इतिहास की समाप्ति, जब वर्तमान दुनिया खत्म हो जाती है, को विभिन्न तरीकों से संदर्भित किया जाता है। यह 'न्याय का दिन', 'अंतिम दिन,' 'पुनरुत्थान का दिन' या बस 'घंटा' है। ' कम बार यह 'भेद का दिन' होता है (जब अच्छे बुरे से अलग होते हैं), 'इकट्ठा करने का दिन' (मनुष्यों की उपस्थिति में पुरुषों के) या 'बैठक का दिन' (भगवान के साथ पुरुषों का) )। समय अचानक आ जाता है। यह एक चिल्लाहट से, एक गरज से, या तुरही के विस्फोट से घिरा हुआ है। तब एक ब्रह्माण्ड उथल-पुथल होता है। पहाड़ धूल में भंग हो जाते हैं, समुद्र उबलते हैं, सूरज अंधकारमय हो जाता है, सितारे गिरते हैं और आकाश लुढ़का जाता है। भगवान न्यायाधीश के रूप में प्रकट होते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति को वर्णित करने के बजाय संकेत दिया जाता है। केंद्रीय हित, ज़ाहिर है, न्यायाधीश के समक्ष सभी मानव जाति को इकट्ठा करने में है। सभी उम्र, जीवन में बहाल, जोर से शामिल हो गए। अविश्वासियों की अपमानजनक आपत्तियों के लिए कि पूर्व पीढ़ी लंबे समय से मर चुके थे और अब धूल और मोड़ने वाली हड्डियां थीं, जवाब यह है कि भगवान उन्हें फिर भी जीवन में बहाल करने में सक्षम हैं। "
क़ुरआन मानव आत्मा की प्राकृतिक अमरता पर जोर नहीं देता है , क्योंकि मनुष्य का अस्तित्व ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है: जब वह चाहता है, तो वह मनुष्य को मरने का कारण बनता है; और जब वह चाहता है, तो वह शारीरिक पुनरुत्थान में उसे फिर से जीवन में ले जाता है। <ref name=rcmartin/>
===प्रेषित (पैगम्बर या नबी)===
[[File:'The Visit of the Queen of Sheba to King Solomon', oil on canvas painting by Edward Poynter, 1890, Art Gallery of New South Wales.jpg|thumb|200px|[[शबा की रानी]] की [[सुलैमान]] की यात्रा। (Edward Poynter, 1890) तोराह के अनुसार, सोलोमन, जो अपनी सात सौ पत्नियों और तीन सौ उपासनाओं और भक्तों के साथ भटक गया,<ref>https://www.biblegateway.com/passage/?search=1%20Kings%2011&version=NIV</ref> कुरान में पैगंबर के रूप में प्रवेश करता है, जो लोगों, जिन्न और प्रकृति पर राज करता है।]]
कुरान के मुताबिक, भगवान ने मनुष्य के साथ संवाद किया और अपनी इच्छा को संकेतों और रहस्योद्घाटनों के माध्यम से जाना। [[नबी|पैगम्बरों]], या 'भगवान के संदेशवाहक', रहस्योद्घाटन प्राप्त किया और उन्हें मानवता के लिए पहुंचा दिया। संदेश समान है और सभी मानव जाति के लिए। "तुमसे कुछ भी नहीं कहा गया है कि आपके सामने दूतों से यह नहीं कहा गया था कि आपके भगवान के पास उसकी कमांड क्षमा और साथ ही साथ सबसे गंभीर दंड भी है।" रहस्योद्घाटन सीधे ईश्वर से भविष्यद्वक्ताओं तक नहीं आता है। भगवान के संदेशवाहक के रूप में कार्य करने वाले एन्जिल्स उन्हें दिव्य प्रकाशन प्रदान करते हैं। यह कुरान 42:51 में आता है, जिसमें यह कहा गया है: "यह किसी भी प्राणघातक के लिए नहीं है कि भगवान को उनसे बात करनी चाहिए, प्रकाशन के अलावा, या पर्दे के पीछे से, या किसी भी संदेश को प्रकट करने के लिए एक संदेश भेजकर वह होगा।" <ref name=rippin/><ref name=rcmartin>{{cite book|last=Martin|first=Richard C.|title=Encyclopedia of Islam and the Muslim world|year=2003|publisher=Macmillan Reference USA|isbn=0028656032|pages=568–62 (By Farid Esack)|url=https://books.google.com/books?isbn=0028656032|edition=[Online-Ausg.].}}</ref>
===नीति-धार्मिक अवधारणाएं===
क़ुरान पर विशवास नैतिकता का एक मौलिक पहलू है, और विद्वानों ने कुरान में "विश्वास" और "आस्तिक" की अर्थपूर्ण सामग्री निर्धारित करने की कोशिश की है। <ref name=toshihiko>{{cite book|last=Izutsu|first=Toshihiko|title=Ethico-religious concepts in the Qur'an|year=2007|publisher=McGill-Queen's University Press|isbn=0773524274|page=184|edition=Repr. 2007}}</ref> धार्मिक आचरण से निपटने वाली नैतिक-कानूनी अवधारणाओं और उपदेशों को ईश्वर के प्रति गहन जागरूकता से जोड़ा जाता है, जिससे विश्वास, उत्तरदायित्व और भगवान के साथ प्रत्येक इंसान के अंतिम मुठभेड़ में विश्वास पर जोर दिया जाता है। लोगों को विशेष रूप से जरूरतमंदों के लिए दान के कृत्य करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। विश्वास करने वाले "रात और दिन में, गुप्त और सार्वजनिक रूप से" अपनी संपत्ति का खर्च करने का वादा किया जाता है कि वे "अपने भगवान के साथ अपना इनाम लेंगे, उन पर कोई डर नहीं होगा, न ही वे दुखी होंगे"। यह शादी, तलाक और विरासत के मामलों पर कानून बनाकर पारिवारिक जीवन की पुष्टि भी करता है। ब्याज और जुए जैसे कई अभ्यास प्रतिबंधित हैं। कुरान इस्लामी कानून ([[शरीयत|शरिया]]) के मौलिक स्रोतों में से एक है। कुछ औपचारिक धार्मिक प्रथाओं को कुरान में औपचारिक प्रार्थनाओं ([[नमाज़|सलात]]) और रमजान के महीने में उपवास सहित महत्वपूर्ण ध्यान मिलता है। जिस तरह से प्रार्थना आयोजित की जानी है, कुरान प्रस्तुति को संदर्भित करता है। चैरिटी, जकात के लिए शब्द का शाब्दिक अर्थ है शुद्धिकरण। कुरान के अनुसार चैरिटी आत्म-शुद्धिकरण का साधन है।
आज मानव अधिकारों की दृष्टि से युद्धों में बंदी महिलाओं की स्थिति एक गंभीर मुद्दा है। कुरान की पारंपरिक व्याख्याओं के अनुसार, इन महिलाओं को कब्जा की गई वस्तु (युद्ध लूट) के रूप में माना जाता है। इन महिलाओं की शादी हुई है या नहीं, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है, और अन्य अर्जित दास महिलाओं की तरह, अधिकार-धारक (योद्धा या खरीदार) उनकी सहमति के बिना उनके शरीर पर यौन व्यवहार कर सकते हैं।(23:5-6)(देखें:[[युद्ध अपराध]])
===विज्ञान में रुचि ===
'''ब्रह्मांड विज्ञान'''; कुरान की आयतों के शाब्दिक और प्रत्यक्ष अर्थों के अनुसार, दुनिया को अल्लाह ने सपाट बनाया था।<ref>https://dergipark.org.tr/tr/download/article-file/179948</ref> कुरान की कथा में, अल्लाह [[अर्श]] पर बैठता है और ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, (जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी शामिल है), उसने 6 दिनों में बनाया। इस ब्रह्मांड में [[देवदूत]] एस, [[दानव]] एस, [[जिन्न]] एस, [[शैतान]] जैसे जीव हैं। सितारों को कभी-कभी राक्षसों को बाहर निकालने के लिए पत्थरों को फेंकने के रूप में उपयोग किया जाता है "जो समाचार चुराने के लिए आकाश में चढ़ते हैं"। (सूरह 67: 1-5) [[प्रलय का दिन]] दृश्य भी कुरान के ब्रह्मांड और ईश्वर के मॉडल का प्रतिबिंब है। जब [[सर्वनाश]] आएगा, तारे पृथ्वी पर गिरेंगे, गर्भवती महिलाओं का गर्भपात होगा, और लोग डर के मारे भागते रहेंगे। फिर एक वर्ग स्थापित किया जाता है और भगवान को न्याय के वर्ग में लाया जाता है जो एन्जिल्स द्वारा उठाए गए सिंहासन पर होता है और अपने बछड़े को दिखाता है।(68:42)<ref>https://www.halveti.tc/hadisler.php?pid=243</ref>
[[File:Universum.jpg | thumbnail | right | 200px |पृथ्वी केंद्रित या पृथ्वी ब्रह्मांड के ऊपर। (C. Flammarion, Holzschnitt, Paris 1888)यह माना जाता है कि कुरान में ब्रह्मांड को पृथ्वी-केंद्रित (ऊपर का) ब्रह्मांड मॉडल के रूप में परिभाषित किया गया है।<ref>{{Cite web |url=http://wikiislam.net/wiki/The_Geocentric_Qur'an |title=संग्रहीत प्रति |access-date=19 अप्रैल 2021 |archive-date=12 जुलाई 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150712102135/http://wikiislam.net/wiki/The_Geocentric_Qur%27an |url-status=dead }}</ref>]]
[[File:Moroccan Atlantic cedar.jpg|thumb|left|130px|कुरान के मुहावरों में से एक, सिदरेट'उल मुन्तेहा, आखिरी बिंदु है जो चमत्कारिक कथाओं (इस्लामी ब्रह्मांड विज्ञान) में बनाए गए लोगों द्वारा पहुंचा जा सकता है। शब्द का अनुवाद केवल "परम देवदार के पेड़" के रूप में किया जा सकता है<ref>{{Web kaynağı |url=http://www.indianmuslimobserver.com/2012/11/cedar-or-lote-tree-in-light-of-al-quran.html#.UOBB6qx3uP8 |başlık=Arşivlenmiş kopya |erişimtarihi=25 Eylül 2020 |arşivurl=https://web.archive.org/web/20130801232144/http://www.indianmuslimobserver.com/2012/11/cedar-or-lote-tree-in-light-of-al-quran.html#.UOBB6qx3uP8 |arşivtarihi=1 Ağustos 2013 |ölüurl=hayır}}</ref>]]
कुरान के बारे में छद्म-वैज्ञानिक दावों की अत्यधिक आलोचना करते हुए खगोलशास्त्री निधल गॉसौम ने कुरान के बारे में प्रोत्साहित किया है कि कुरान "ज्ञान की अवधारणा" विकसित करके प्रदान करता है। <ref>{{cite book|ref=harv|author=Nidhal Guessoum|title=Islam's Quantum Question: Reconciling Muslim Tradition and Modern Science|page=174|publisher=I.B.Tauris|isbn=978-1848855175}}</ref> वह लिखते हैं: "कुरान सबूत के बिना अनुमान लगाने के खतरे पर ध्यान खींचता है (और उस अनुयायियों का पालन न करें जिसके बारे में आपने (निश्चित) ज्ञान नहीं किया है ... 17:36) और कई अलग-अलग छंदों में मुसलमानों से पूछता है प्रमाणों की आवश्यकता के लिए (कहो: यदि आप सत्य हैं 2: 111), तो सबूत की आवश्यकता है, दोनों धार्मिक विश्वास और प्राकृतिक विज्ञान में। " गुएससोम कुरान के अनुसार "सबूत" की परिभाषा पर Ghaleb हसन उद्धृत "स्पष्ट और मजबूत ... दृढ़ सबूत या तर्क।" साथ ही, इस तरह का सबूत प्राधिकरण से तर्क पर निर्भर नहीं हो सकता है, पद 5: 104 का हवाला देते हुए। आखिरकार, पद 4: 174 के अनुसार, दोनों दावे और अस्वीकृति के सबूत की आवश्यकता होती है। इस्माइल अल- फ़रुकी और ताहा जबीर अलालवानी इस विचार से हैं कि मुस्लिम सभ्यता का कोई भी पुनरुत्थान कुरान के साथ शुरू होना चाहिए; हालांकि, इस मार्ग पर सबसे बड़ी बाधा "ताफसीर (एक्जेजेसिस) और अन्य शास्त्रीय विषयों की सदियों पुरानी विरासत है जो कुरान के संदेश की" सार्वभौमिक, महामारी विज्ञान और व्यवस्थित अवधारणा "को रोकती है। दार्शनिक मोहम्मद इकबाल ने कुरान की पद्धति और महाद्वीप को अनुभवजन्य और तर्कसंगत माना।
यह आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि लगभग 750 छंद हैं कुरान में प्राकृतिक घटना से निपटने में। इनमें से कई छंदों में प्रकृति का अध्ययन "प्रोत्साहित और अत्यधिक अनुशंसित" है, और अल-बिरूनी और अल-बट्टानी जैसे ऐतिहासिक इस्लामिक वैज्ञानिकों ने कुरान के छंदों से अपनी प्रेरणा ली। मोहम्मद हाशिम कमली ने कहा है कि "वैज्ञानिक अवलोकन, प्रयोगात्मक ज्ञान और तर्कसंगतता" प्राथमिक साधन हैं जिनके साथ मानवता कुरान में इसके लिए निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती है। ज़ियाउद्दीन सरदार ने कुरान की बार-बार बुलाए जाने वाले प्राकृतिक घटनाओं पर ध्यान देने और प्रतिबिंबित करने के लिए मुसलमानों के लिए आधुनिक विज्ञान की नींव विकसित करने का मामला बनाया।
[[File:Kroisos stake Louvre G197.jpg | thumb | right | 200px |लिडियन राजा, अपने धन के साथ प्रसिद्ध, मध्य पूर्व के लोगों के बीच करेन, (लौवर संग्रहालय) के रूप में। कुरान में, वह मूसा के गोत्र का एक व्यक्ति था (कुरान के टिप्पणीकार भी कहते हैं कि वह उसके चाचा का पुत्र है), उसकी संपत्ति से खराब हो गया। ([[लीडिया]])]]
भौतिक विज्ञानी अब्दुस सलाम ने अपने नोबेल पुरस्कार भोज पते में कुरान (67: 3-4) की एक प्रसिद्ध कविता उद्धृत की और फिर कहा: "यह प्रभाव सभी भौतिकविदों का विश्वास है: जितना गहरा हम चाहते हैं, उतना ही अधिक हमारे आश्चर्य उत्साहित, हमारे नज़र का चमक है "। सलाम की मूल मान्यताओं में से एक यह था कि इस्लाम और खोजों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है कि विज्ञान मानवता को प्रकृति और ब्रह्मांड के बारे में बताता है। सलाम ने यह भी राय रखी कि कुरान और अध्ययन और तर्कसंगत प्रतिबिंब की इस्लामी भावना असाधारण सभ्यता के विकास का स्रोत थी। सलाम विशेष रूप से, इब्न अल-हेथम और अल-बिरूनी का अनुभव अनुभवजन्य के अग्रदूतों के रूप में करते थे जिन्होंने प्रयोगात्मक दृष्टिकोण पेश किया, अरिस्टोटल के प्रभाव से तोड़ दिया और इस प्रकार आधुनिक विज्ञान को जन्म दिया। सलाम आध्यात्मिक विज्ञान और भौतिकी के बीच अंतर करने के लिए भी सावधान थे, और अनुभवी रूप से कुछ मामलों की जांच करने के खिलाफ सलाह दी गई थी, जिन पर "भौतिकी चुप है और ऐसा ही रहेगी," जैसे कि सलम के विचार में विज्ञान की सीमाओं के बाहर है और इस प्रकार धार्मिक विचारों को "रास्ता देता है"।
==साहित्यिक शैली==
[[File:Touba3.jpg|thumb|upright=0.9|[[तौबा, सेनेगल]] में बालक क़ुरआन पढ़ रहे हैं।]]
कुरान का संदेश विभिन्न साहित्यिक संरचनाओं और उपकरणों के साथ व्यक्त किया गया है। मूल अरबी में, सूर्या और छंद ध्वन्यात्मक और विषयगत संरचनाओं को नियोजित करते हैं जो पाठ के संदेश को याद करने के लिए दर्शकों के प्रयासों में सहायता करते हैं। मुस्लिम जोर दें (कुरान के अनुसार) कि कुरान की सामग्री और शैली अनुचित है। <ref name="Issa">[[Issa Boullata]], "Literary Structure of Quran", ''Encyclopedia of the Qurʾān, vol.3 p.192, 204''</ref>
कुरान की भाषा को "कविता गद्य" के रूप में वर्णित किया गया है क्योंकि यह कविता और गद्य दोनों का हिस्सा है; हालांकि, यह विवरण कुरानिक भाषा की लयबद्ध गुणवत्ता को व्यक्त करने में विफल होने का जोखिम चलाता है, जो कुछ हिस्सों में अधिक काव्य है और दूसरों में अधिक गद्य जैसा है। कुरान, जबकि पूरे कुरान में पाया गया था, पहले के कई मक्का सूरस में विशिष्ट है, जिसमें अपेक्षाकृत कम छंद गायन के शब्दों को प्रमुखता में फेंक देते हैं। इस तरह के रूप की प्रभावशीलता उदाहरण के लिए सूरा 81 में स्पष्ट है, और इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन मार्गों ने श्रोताओं के विवेक को प्रभावित किया। छंदों के एक सेट से दूसरे सिग्नल में अक्सर कविता का परिवर्तन चर्चा के विषय में एक बदलाव होता है। बाद के खंड भी इस फॉर्म को संरक्षित करते हैं लेकिन शैली अधिक एक्सपोजिटरी है। <ref name=rippin /><ref>[http://www.jewishencyclopedia.com/view.jsp?artid=369&letter=K&search=Quran Jewishencyclopedia.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110716023840/http://www.jewishencyclopedia.com/view.jsp?artid=369&letter=K&search=Quran |date=16 जुलाई 2011 }} – Körner, Moses B. Eliezer</ref>
कुरान के पाठ में कोई शुरुआत, मध्य या अंत नहीं है, इसकी गैरलाइन संरचना एक वेब या नेट के समान है। पाठ्यचर्या व्यवस्था को कभी-कभी निरंतरता की कमी, किसी भी कालक्रम या विषयगत क्रम और दोहराव की अनुपस्थिति को प्रदर्शित करने के लिए माना जाता है। आलोचक नॉर्मन ओ। ब्राउन के काम का हवाला देते हुए माइकल बेल्स , ब्राउन के अवलोकन को स्वीकार करते हैं कि कुरानिक साहित्यिक अभिव्यक्ति के प्रतीत होने वाले विघटन - बिक्री के वाक्यांश में इसकी बिखरी हुई या खंडित मोड - वास्तव में एक साहित्यिक डिवाइस सक्षम है गहरा प्रभाव देने के लिए जैसे भविष्यवाणी संदेश की तीव्रता मानव भाषा के वाहन को तोड़ रही थी जिसमें इसे संप्रेषित किया जा रहा था। बेचना कुरान की अधिक चर्चा की पुनरावृत्ति को भी संबोधित करता है, इसे एक साहित्यिक उपकरण के रूप में भी देखता है।
एक पाठ आत्म-संदर्भित होता है जब यह स्वयं के बारे में बोलता है और खुद को संदर्भित करता है। स्टीफन वाइल्ड के अनुसार, कुरान संचरित होने वाले शब्दों को समझाने, वर्गीकृत करने, व्याख्या करने और न्यायसंगत करके इस मेटाटेक्स्टिलिटी को दर्शाता है। उन अनुच्छेदों में आत्म- रेफरेंसियलिटी स्पष्ट है जहां कुरान स्वयं को एक आत्मनिर्भर तरीके से (प्रकाशन (स्पष्ट रूप से अपनी दिव्यता पर जोर देते हुए, ' (स्मरण), समाचार ( नाबा'), मानदंड (फरकन) के रूप में स्वयं को प्रकट करने के रूप में संदर्भित करता है। एक धन्य याद है जिसे हमने नीचे भेज दिया है, तो क्या आप अब इसे अस्वीकार कर रहे हैं? "), या" कहें "टैग की लगातार उपस्थिति में, जब मुहम्मद को बोलने का आदेश दिया जाता है (उदाहरण के लिए," कहो: "भगवान का मार्गदर्शन सच मार्गदर्शन है "," कहो: 'क्या आप हमारे साथ भगवान के विरुद्ध विवाद करेंगे?' ")। जंगली के अनुसार कुरान अत्यधिक आत्म-संदर्भित है। प्रारंभिक मक्का सुरस में यह सुविधा अधिक स्पष्ट है। <ref>{{cite book|last=Wild|first=ed. by Stefan|title=Self-referentiality in the Qur'an|year=2006|publisher=Harrassowitz|location=Wiesbaden|isbn=3447053836}}</ref>
==व्याख्या==
मुख्य लेख: [[तफ़्सीर|तफ़सीर]]
[[File:Tapurian Qur'an (Al-Kusar).PNG|thumb|upright=1.25|कुरान के सूर्या 108 की प्रारंभिक व्याख्या।]]
कुरान ने कुरान के छंदों के अर्थों को समझाने, उनके आयात को स्पष्ट करने और उनके महत्व को जानने के उद्देश्य से टिप्पणी और व्याख्या (तफ़सीर) का एक विशाल निकाय उड़ाया है। <ref name="auto1">{{cite web|url=http://www.almizan.org/|title=Tafsir Al-Mizan|work=almizan.org|access-date=4 मई 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20090617232037/http://almizan.org/|archive-date=17 जून 2009|url-status=dead}}</ref>
[[File:Alexander-Coin.jpg|thumb|left|150px|[[सिकंदर महान]] को दर्शाने वाला एक सिक्का। सिकंदर के सिर पर [[अमुन]] सींग हैं।, अधिकांश टीकाकारों के अनुसार, अलेक्जेंडर को कुरान में ज़िल-कारनेन के रूप में संदर्भित किया जाता है (शब्द का अर्थ है दो सींग वाले आदमी)।<ref>http://turkoloji.cu.edu.tr/mine_mengi_sempozyum/ismail_avci_iskenderi_zulkarneyn_ve_hizir.pdf</ref>]]
तफसीर मुसलमानों की सबसे शुरुआती शैक्षणिक गतिविधियों में से एक है। कुरान के अनुसार, मुहम्मद पहला व्यक्ति था जिसने प्रारंभिक मुसलमानों के लिए छंदों के अर्थों का वर्णन किया था। अन्य शुरुआती निकायों में मुहम्मद के कुछ साथी शामिल थे, जैसे ' अली इब्न अबी तालिब ,' अब्दुल्ला इब्न अब्बास , अब्दुल्ला इब्न उमर और उबेय इब्न काब । उन दिनों में एक्जेजेसिस कविता के साहित्यिक पहलुओं, इसके प्रकाशन की पृष्ठभूमि और कभी-कभी, दूसरे की मदद से एक कविता की व्याख्या के स्पष्टीकरण तक ही सीमित था। यदि कविता एक ऐतिहासिक घटना के बारे में थी, तो कभी-कभी मुहम्मद की कुछ परंपराओं ([[हदीस]]) को इसका अर्थ स्पष्ट करने के लिए वर्णित किया गया था। <ref name="auto1"/>
चूंकि कुरान शास्त्रीय अरबी में बोली जाती है, बाद में कई इस्लाम (ज्यादातर गैर-अरब) में परिवर्तित नहीं होते थे, वे हमेशा कुरानिक अरबी को नहीं समझते थे, उन्होंने उन मुसलमानों को नहीं पकड़ा जो मुसलमानों के अरबी में धाराप्रवाह थे और वे सुलझाने से चिंतित थे कुरान में विषयों के स्पष्ट संघर्ष। अरबी में टिप्पणी करने वाले टिप्पणीकारों ने संकेतों को समझाया, और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझाया कि मुहम्मद के भविष्यवाणियों के कैरियर में कुरान के छंदों का खुलासा किया गया था, जो कि सबसे शुरुआती मुस्लिम समुदाय के लिए उपयुक्त था, और जिसे बाद में प्रकट किया गया था, रद्द करना या " निरस्त करना " नासख ) पहले के पाठ (मानसख)। हालांकि, अन्य विद्वानों का कहना है कि कुरान में कोई निरसन नहीं हुआ है। अहमदीय मुस्लिम समुदाय ने कुरान पर दस खंड वाली उर्दू टिप्पणी प्रकाशित की है, जिसका नाम ताफसीर ई कबीर है । <ref>{{cite web |author=Mirza Bashiruddin Mahmood Ahmad |url=https://archive.org/details/TafseerKabeerMirzaBashiruddinMahmoodAhmad |title=Tafseer-e-Kabeer Urdu Vol. 1 |format=PDF |date= |accessdate=2016-08-26 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171018134609/https://archive.org/details/TafseerKabeerMirzaBashiruddinMahmoodAhmad |archive-date=18 अक्तूबर 2017 |url-status=live }}</ref>
===गूढ़ व्याख्या===
गूढ़ व्याख्या या सूफी व्याख्या कुरान के आंतरिक अर्थों का अनावरण करने का प्रयास करती है। सूफीवाद छंदों के स्पष्ट ( ज़हीर ) बिंदु से आगे बढ़ता है और इसके बजाय कुरान के छंद को आंतरिक या गूढ़ (बातिन) और चेतना और अस्तित्व के आध्यात्मिक आयामों से संबंधित करता है। <ref name=alangodlas>{{cite book|last=Godlas|first=Alan|title=The Blackwell companion to the Qur'an|year=2008|publisher=Wiley-Blackwell|isbn=1405188200|pages=350–362|edition=Pbk.}}</ref> सैंड्स के अनुसार, गूढ़ व्याख्याएं घोषणात्मक से अधिक सूचक हैं, वे स्पष्टीकरण (तफसीर) के बजाय संकेत (इशारात) हैं। वे संभावनाओं को इंगित करते हैं जितना कि वे प्रत्येक लेखक की अंतर्दृष्टि का प्रदर्शन करते हैं। <ref name=kristin>{{cite book|last=Sands|first=Kristin Zahra|title=Sufi commentaries on the Qur'an in classical Islam|year=2006|publisher=Routledge|isbn=0415366852|edition=1. publ., transferred to digital print.}}</ref>
एनाबेल केलर के अनुसार सूफी व्याख्या, प्यार के विषय के उपयोग का भी उदाहरण है, उदाहरण के लिए कुरैरी की कुरान की व्याख्या में देखा जा सकता है। कुरान 7: 143 कहता है:
जब मूसा उस वक्त आया जब हमने नियुक्त किया, और उसके अल्लाह ने उससे बात की, तो उसने कहा, 'हे मेरे अल्लाह, मुझे अपने आप को दिखाओ! मुझे तुम्हे देखने दो!' उसने कहा, 'तुम मुझे नहीं देखोगे, लेकिन उस पहाड़ को देखो, अगर यह दृढ़ रहता है तो आप मुझे देखेंगे।' जब उसके भगवान ने पहाड़ पर खुद को प्रकट किया, तो उसने इसे खराब कर दिया। मूसा बेहोश हो गया। जब वह ठीक हो गया, उसने कहा, 'जय हो! मैं तुमसे पश्चाताप करता हूँ! मैं विश्वास करने वाला पहला व्यक्ति हूं!
7: 143 में मूसा, प्रेम में रहने वालों का मार्ग आता है, वह एक दृष्टि मांगता है लेकिन उसकी इच्छा से इनकार किया जाता है, उसे पहाड़ के अलावा अन्य देखने के लिए आज्ञा दी जाती है, जबकि पर्वत देखने में सक्षम होता है परमेश्वर। पर्वत पर भगवान के प्रकट होने की दृष्टि से पर्वत चूर और मूसा बेहोश होजाते हैं। कुशायरी के शब्दों में, मूसा हजारों पुरुषों की तरह आया जिन्होंने महान दूरी की यात्रा की, और मूसा के मूसा को कुछ भी नहीं बचा था। खुद से उन्मूलन की स्थिति में, मूसा को वास्तविकताओं का अनावरण दिया गया था। सूफी के दृष्टिकोण से, भगवान हमेशा प्रिय और रास्ते में रहने वाले की इच्छा और पीड़ा सच्चाई को साकार करने का कारण बनती है। <ref name=keeler>{{cite journal|last=Keeler|first=Annabel|title=Sufi ''tafsir'' as a Mirror: al-Qushayri the murshid in his Lataif al-isharat|journal=Journal of Qur'anic Studies|year=2006|volume=8|issue=1|pages=1–21|doi=10.3366/jqs.2006.8.1.1}}</ref>
मुहम्मद हुसैन ताबाबातेई कहते हैं कि बाद के उत्थानों के बीच लोकप्रिय स्पष्टीकरण के अनुसार, ताविल का अर्थ है कि एक कविता का निर्देश दिया गया है। तावल के विरोध में, प्रकाशन ( तंजिल ) का अर्थ, शब्दों के स्पष्ट अर्थ के अनुसार स्पष्ट है, जैसा कि उन्हें बताया गया था। लेकिन यह स्पष्टीकरण इतना व्यापक हो गया है कि, वर्तमान में, यह ताविल का प्राथमिक अर्थ बन गया है, जिसका मूल रूप से "वापसी करने" या "वापसी स्थान" का अर्थ था। तबाताई के विचार में, जिसे ताइविल या कुरान की हर्मेन्यूटिक व्याख्या कहा जाता है, को शब्दों के संकेत के साथ चिंतित नहीं है। इसके बजाय, यह कुछ सच्चाई और वास्तविकताओं से संबंधित है जो पुरुषों के सामान्य भाग की समझ से परे है; फिर भी यह इन सत्यों और वास्तविकताओं से है कि सिद्धांत के सिद्धांत और कुरान के व्यावहारिक निषेध जारी हैं। व्याख्या कविता का अर्थ नहीं है बल्कि यह उस अर्थ के माध्यम से पारगमन के एक विशेष प्रकार में पारदर्शी है। एक आध्यात्मिक वास्तविकता है- जो एक कानून का पालन करने का मुख्य उद्देश्य है, या दैवीय गुण का वर्णन करने का मूल उद्देश्य है- और फिर एक वास्तविक महत्व है कि एक कुरान की कहानी का संदर्भ है। <ref name="Ta'wil">[http://almizan.org/new/special/principles.asp Tabataba'I, Tafsir Al-Mizan, The Principles of Interpretation of the Quran] {{webarchive |url=https://web.archive.org/web/20081201023355/http://almizan.org/new/special/principles.asp |date=1 December 2008 }}</ref><ref name="The Meaning">[http://almizan.org/Discourses/QD21.asp Tabataba'I, Tafsir Al-Mizan, Topic: Decisive and Ambiguous verses and "ta'wil"] {{webarchive |url=https://web.archive.org/web/20081208164643/http://almizan.org/Discourses/QD21.asp |date=8 December 2008 }}</ref>
शिया मान्यताओं के अनुसार, जो मुहम्मद और इमाम जैसे ज्ञान में दृढ़ता से निहित हैं, कुरान के रहस्यों को जानते हैं। तबाताई के अनुसार, बयान "कोई भी भगवान को छोड़कर इसकी व्याख्या को जानता है" किसी भी विरोधी या योग्यता खंड के बिना मान्य रहता है। इसलिए, जहां तक इस कविता का सवाल है, कुरान की व्याख्या का ज्ञान भगवान के लिए आरक्षित है। लेकिन Tabatabaei अन्य छंदों का उपयोग करता है और निष्कर्ष निकाला है कि जो लोग भगवान द्वारा शुद्ध हैं कुरान की व्याख्या कुछ हद तक पता है।
तबाताई के अनुसार, स्वीकार्य और अस्वीकार्य गूढ़ व्याख्याएं हैं। स्वीकार्य ता'विल अपने शाब्दिक अर्थ से परे एक कविता के अर्थ को संदर्भित करता है; बल्कि अंतर्निहित अर्थ, जो अंततः केवल भगवान के लिए जाना जाता है और अकेले मानव विचारों के माध्यम से सीधे समझा नहीं जा सकता है। प्रश्न में छंद यहां आने, जाने, बैठने, संतुष्टि, क्रोध और दुःख के मानवीय गुणों को संदर्भित करते हैं, जिन्हें स्पष्ट रूप से भगवान के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है । अस्वीकार्य ta'wil वह है जहां एक सबूत के माध्यम से एक अलग अर्थ के लिए एक कविता का स्पष्ट अर्थ "स्थानांतरित" होता है; यह विधि स्पष्ट विसंगतियों के बिना नहीं है। यद्यपि यह अस्वीकार्य ता'विल ने काफी स्वीकृति प्राप्त की है, यह गलत है और कुरानिक छंदों पर लागू नहीं किया जा सकता है। सही व्याख्या यह है कि वास्तविकता एक कविता को संदर्भित करती है। यह सभी छंदों में पाया जाता है, निर्णायक और अस्पष्ट एक जैसे; यह शब्द का अर्थ नहीं है; यह एक तथ्य है कि शब्दों के लिए बहुत शानदार है। भगवान ने उन्हें अपने दिमाग में थोड़ा सा लाने के लिए शब्दों के साथ तैयार किया है; इस संबंध में वे कहानियों की तरह हैं जिनका उपयोग दिमाग में एक तस्वीर बनाने के लिए किया जाता है, और इस प्रकार श्रोता को स्पष्ट रूप से इच्छित विचार को समझने में मदद मिलती है।
===सूफी की टिप्पणियों का इतिहास===
12 वीं शताब्दी से पहले गूढ़ व्याख्या के उल्लेखनीय लेखकों में से एक सुलामी (डी। 1021) है जिसका काम बिना शुरुआती सूफी की अधिकांश टिप्पणियों को संरक्षित नहीं किया गया था। सुलामी की प्रमुख टिप्पणी हैकिक अल-ताफसीर (" एक्जेजेसिस के सत्य") की एक पुस्तक है जो पहले सूफी की टिप्पणियों का संकलन है। 11 वीं शताब्दी से कुशायरी (डी। 1074), दयालम (डी। 1193), शिराज़ी (डी। 1209) और सुहरावर्दी (डी। 1234) की टिप्पणियों सहित कई अन्य काम सामने आए। इन कार्यों में सुलामी की किताबों और लेखक के योगदान से सामग्री शामिल है। कई काम फारसी में लिखे गए हैं जैसे कि मबड़ी (डी। 1135) कश्फ अल-असर ("रहस्यों का अनावरण") के काम। रुमी (डी। 1273) ने अपनी पुस्तक मथनावी में विशाल रहस्यमय कविता लिखी थी। रुमी अपनी कविता में कुरान का भारी उपयोग करता है, एक ऐसी विशेषता जिसे कभी-कभी रुमी के काम के अनुवाद में छोड़ दिया जाता है। मथनावी में बड़ी संख्या में कुरानिक मार्ग पाए जा सकते हैं, जिनमें से कुछ कुरान की एक सूफी व्याख्या पर विचार करते हैं। रुमी की पुस्तक कुरान पर उद्धरण और विस्तार के लिए असाधारण नहीं है, हालांकि, रुमी कुरान का अधिक बार उल्लेख करता है। सिमनानी (डी। 1336) ने कुरान पर गूढ़ exegesis के दो प्रभावशाली कार्यों को लिखा था। उन्होंने सुन्नी इस्लाम की भावनाओं के साथ और भौतिक संसार में भगवान के अभिव्यक्ति के विचारों को सुलझा लिया। 18 वीं शताब्दी में इस्माइल हाकी बुर्सवी (डी। 1725) के काम जैसे व्यापक सूफी टिप्पणियां दिखाई देती हैं। उनके काम रूह अल-बायान (स्पष्टता की आत्मा) एक विशाल मारिफ़त है। अरबी में लिखा गया है, यह लेखक के अपने विचारों को उनके पूर्ववर्तियों (विशेष रूप से इब्न अरबी और गजली ) के साथ जोड़ता है। <ref name=jelias>{{cite journal|last=Elias|first=Jamal|title=Sufi ''tafsir'' Reconsidered: Exploring the Development of a Genre|journal=Journal of Qur'anic Studies|year=2010|volume=12|pages=41–55|doi=10.3366/jqs.2010.0104}}</ref>
===अर्थ के स्तर===
[[File:Quran rzabasi1.JPG|thumb|रेजा अब्बासी संग्रहालय में 9वीं शताब्दी कुरान।]]
[[File:IslamicGalleryBritishMuseum3.jpg |thumb|ब्रिटिश संग्रहालय में 11 वीं शताब्दी के उत्तरी अफ्रीकी कुरान।]]
सलफ़ी और ज़ाहिरी के विपरीत, [[शिया]] और [[सूफ़ी]] के साथ-साथ कुछ अन्य मुस्लिम दार्शनिकों का मानना है कि कुरान का अर्थ शाब्दिक पहलू तक ही सीमित नहीं है। <ref name="Corbin 1993, p.7">Corbin (1993), p.7</ref> उनके लिए, यह एक आवश्यक विचार है कि कुरान में भी आंतरिक पहलू हैं। हेनरी कॉर्बिन एक हदीस का वर्णन करता है जो मुहम्मद वापस जाता है:
क़ुरआन में बाहरी उपस्थिति और एक छिपी गहराई, एक असाधारण अर्थ और एक गूढ़ अर्थ है। बदले में यह गूढ़ अर्थ एक गूढ़ अर्थ छुपाता है (इस गहराई में खगोलीय क्षेत्रों की छवि के बाद गहराई होती है, जो एक-दूसरे के भीतर संलग्न होती हैं)। तो यह सात गूढ़ अर्थों (छिपी गहराई की सात गहराई) के लिए चला जाता है। <ref name="Corbin 1993, p.7"/>
इस विचार के अनुसार, यह भी स्पष्ट हो गया है कि कुरान का आंतरिक अर्थ अपने बाहरी अर्थ को खत्म या अमान्य नहीं करता है। इसके बजाय, यह आत्मा की तरह है, जो शरीर को जीवन देता है। कॉर्बिन इस्लामिक दर्शन में एक भूमिका निभाने के लिए कुरान को मानता है, क्योंकि नैनोविज्ञान स्वयं भविष्यवक्ता के साथ हाथ में आता है।
पाठ के ज़हीर (बाहरी पहलुओं) से निपटने वाली टिप्पणियों को ताफसीर कहा जाता है, और बैटिन से निपटने वाली हर्मेनेटिक और गूढ़ टिप्पणियों को ताविल ("व्याख्या" या "स्पष्टीकरण" कहा जाता है), जिसमें पाठ को इसकी शुरुआत में वापस लेना शामिल है। एक गूढ़ स्लंट के साथ टिप्पणीकारों का मानना है कि कुरान का अंतिम अर्थ केवल भगवान के लिए जाना जाता है।<ref name="Britannica"/> इसके विपरीत, कुरानिक शाब्दिकता , इसके बाद सलाफिस और जहीरिस , यह विश्वास है कि कुरान को केवल इसके स्पष्ट अर्थ में ही लिया जाना चाहिए।
===पुनर्विनियोजन===
पुनर्मूल्यांकन कुछ पूर्व मुसलमानों की हर्मेनियुटील शैली का नाम है जो ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं। उनकी शैली या पुनरावृत्ति विज्ञापन और गैर-व्यवस्थित है और माफी मांगने की दिशा में तैयार है। व्याख्या की यह परंपरा निम्नलिखित प्रथाओं पर आधारित है: व्याकरण संबंधी पुनर्विचार, पाठ्यचर्या वरीयता, पुनर्प्राप्ति, और रियायत का पुनर्विचार। <ref>{{cite journal|last1=Miller|first1=Duane Alexander|title=REAPPROPRIATION: AN ACCOMMODATIONIST HERMENEUTIC OF ISLAMIC CHRISTIANITY|journal=St Francis Magazine|date=June 2009|volume=5|issue=3|pages=30–33|url=https://www.academia.edu/1482551/REAPPROPRIATION_AN_ACCOMMODATIONIST_HERMENEUTIC_OF_ISLAMIC_CHRISTIANITY|accessdate=17 December 2014|archive-url=https://web.archive.org/web/20181106211839/http://www.academia.edu/1482551/REAPPROPRIATION_AN_ACCOMMODATIONIST_HERMENEUTIC_OF_ISLAMIC_CHRISTIANITY|archive-date=6 नवंबर 2018|url-status=live}}</ref>
==अनुवाद==
मुख्य लेख: [[कुरआन के अनुवादों की सूची]]
यह भी देखें: कुरान के अनुवादों की सूची
कुरान का अनुवाद हमेशा समस्याग्रस्त और कठिन रहा है। कई लोग तर्क देते हैं कि कुरानिक पाठ को किसी अन्य भाषा या रूप में पुन: उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। <ref name="slate">{{cite web | accessdate=21 November 2008 | url=http://www.slate.com/id/2204849/?from=rss | work=[[Slate (magazine)|Slate]] | last=Aslan | first=Reza | title=How To Read the Quran | date=20 November 2008 | archive-url=https://web.archive.org/web/20110728133104/http://www.slate.com/id/2204849/?from=rss | archive-date=28 जुलाई 2011 | url-status=live }}</ref> इसके अलावा, एक अरबी शब्द के संदर्भ के आधार पर कई अर्थ हो सकते हैं, सटीक अनुवाद को और भी कठिन बनाते हैं। <ref name =leaman />
फिर भी, कुरान का अनुवाद अधिकांश अफ्रीकी, एशियाई और यूरोपीय भाषाओं में किया गया है।<ref>{{cite web |title=Quran Text/ Translation - (93 Languages - Largest Collection - AUSTRALIAN ISLAMIC LIBRARY |url=https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html |website=www.australianislamiclibrary.org |access-date=15 March 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200730204334/https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html |archive-date=30 जुलाई 2020 |url-status=dead }}</ref> <ref name =leaman /> कुरान का पहला अनुवादक सलमान फारसी था , जिसने सातवीं शताब्दी के दौरान सूरत अल-फतिहा का अनुवाद फारसी में किया था। <ref name =leaman /> हिंदू राजा मेहरक के अनुरोध पर अब्दुल्ला बिन उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के आदेशों से कुरान का एक और अनुवाद अलवर ( सिंध , भारत , अब पाकिस्तान ) में 884 में पूरा हुआ था। <ref>{{cite web|title=English Translations of the Quran|date=July 2009|work=[[Crescent (magazine)|Crescent]]|archiveurl=https://web.archive.org/web/20140429213509/http://www.monthlycrescent.com/understanding-the-quran/english-translations-of-the-quran/|archivedate=29 April 2014 |url=http://www.monthlycrescent.com/understanding-the-quran/english-translations-of-the-quran/|publisher=Monthlycrescent.com}}</ref>
कुरान के पहले पूर्ण प्रमाणित पूर्ण अनुवाद फारसी में 10 वीं और 12 वीं सदी के बीच किए गए थे। सामनिद राजा, मंसूर प्रथम (961- 976) ने कोरसैन के विद्वानों के समूह को मूल रूप से अरबी में, ताफसीर अल- ताबारी का अनुवाद करने का आदेश दिया। बाद में 11 वीं शताब्दी में, अबू मंसूर अब्दुल्ला अल-अंसारी के छात्रों में से एक ने फारसी में कुरान के एक पूर्ण ताफसीर को लिखा। 12 वीं शताब्दी में, नजम अल-दीन अबू हाफ्स अल-नासाफी ने कुरान का अनुवाद फारसी में किया था। सभी तीन पुस्तकों की पांडुलिपियां बचे हैं और कई बार प्रकाशित हुई हैं।
इस्लामी परंपरा में यह भी कहा गया है कि अनुवाद एबीसिनिया और बीजान्टिन सम्राट हेराकेलियस के सम्राट नेगस के लिए किए गए थे, क्योंकि दोनों को मुहम्मद द्वारा कुरान से छंद युक्त पत्र प्राप्त हुए थे । सदियों की शुरुआत में, अनुवादों की अनुमति एक मुद्दा नहीं था, लेकिन क्या कोई प्रार्थना में अनुवाद का उपयोग कर सकता था।
1936 में, 102 भाषाओं में अनुवाद ज्ञात थे। 2010 में, हुर्रियेट डेली न्यूज एंड इकोनॉमिक रिव्यू ने बताया कि कुरान को तेहरान में 18 वें अंतरराष्ट्रीय कुरान प्रदर्शनी में 112 भाषाओं में प्रस्तुत किया गया था।
पीटर के आदरणीय , लेक्स महुमेट स्यूडोप्रोफेट के लिए कुरान के केटटन के 1143 अनुवाद के रॉबर्ट , पश्चिमी भाषा ( लैटिन ) में सबसे पहले थे। अलेक्जेंडर रॉस ने एंड्रयू डु रियर द्वारा एल 'अलकोरन डी महोमेट (1647) के फ्रांसीसी अनुवाद से 1649 में पहला अंग्रेजी संस्करण पेश किया। 1734 में, जॉर्ज सेल ने कुरान के पहले विद्वानों का अनुवाद अंग्रेजी में किया; दूसरा 1937 में रिचर्ड बेल द्वारा और 1 9 55 में आर्थर जॉन आर्बेरी द्वारा एक और उत्पादित किया गया था। ये सभी अनुवादक गैर-मुसलमान थे। मुसलमानों द्वारा कई अनुवाद हुए हैं। अहमदीय मुस्लिम समुदाय ने 50 अलग-अलग भाषाओं में कुरान के अनुवाद प्रकाशित किए हैं पांच खंड वाली अंग्रेजी कमेंट्री और कुरान का अंग्रेजी अनुवाद ।
बाइबिल के अनुवाद के साथ, अंग्रेजी अनुवादकों ने कभी-कभी अपने आधुनिक या पारंपरिक समकक्षों पर पुरातन अंग्रेजी शब्दों और निर्माण का पक्ष लिया है; उदाहरण के लिए, दो व्यापक रूप से पढ़ने वाले अनुवादक, ए यूसुफ अली और एम। मार्मड्यूक पिकथल, अधिक आम " आप " के बजाय बहुवचन और एकवचन "ye" और "तू" का उपयोग करते हैं।
गुरुमुखी में कुरान शरीफ का सबसे पुराना गुरुमुखी अनुवाद पंजाब के मोगा जिले के गांव लैंडे में पाया गया है, जिसे 1911 में मुद्रित किया गया था।
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File:Ilkhanid Quran.jpg|Ilkhanid युग से interlinear फारसी अनुवाद के साथ अरबी कुरान
File:Alcoran de Mahomet 1647.jpg|यूरोपीय स्थानीय भाषा में पहला मुद्रित कुरान: एल 'अलकोरन डी महोमेट , एंड्रे डु रियर , 1647
File:Koran by Megerlein 1772.jpg|कुरान के पहले जर्मन अनुवाद (1772) का शीर्षक पृष्ठ
File:Chinese quran.jpg|कुरान के इस चीनी अनुवाद में सूरत या सीन के 33 और 34 के संस्करण
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==सस्वर पाठ==
===पठन के नियम===
देखें: [[तजवीद]]
कुरान का उचित पाठ ताजविद नामक एक अलग अनुशासन का विषय है जो विस्तार से निर्धारित करता है कि कुरान को कैसे पढ़ा जाना चाहिए, प्रत्येक व्यक्ति के अक्षर को कैसे उच्चारण किया जाना चाहिए, उन स्थानों पर ध्यान देने की आवश्यकता जहां विराम होना चाहिए, elisions के लिए , जहां उच्चारण लंबा या छोटा होना चाहिए, जहां अक्षरों को एक साथ सुनाया जाना चाहिए और जहां उन्हें अलग रखा जाना चाहिए, आदि। यह कहा जा सकता है कि यह अनुशासन कुरान के उचित पाठ के नियमों और विधियों का अध्ययन करता है और तीन मुख्य क्षेत्रों: व्यंजनों और स्वरों का उचित उच्चारण (कुरानिक ध्वनियों की अभिव्यक्ति), पठन में विराम के नियम और पठन की बहाली, और पाठ की संगीत और सुन्दर विशेषताएं।
गलत उच्चारण से बचने के लिए, अभिलेख जो अरबी भाषा के देशी वक्ताओं नहीं हैं मिस्र या सऊदी अरब जैसे देशों में प्रशिक्षण के कार्यक्रम का पालन करते हैं। कुछ मिस्र के पाठकों के पठन पढ़ने की कला के विकास में अत्यधिक प्रभावशाली थे। दक्षिणपूर्व एशिया विश्व स्तरीय पाठ के लिए जाना जाता है, जो कि जकार्ता के मारिया उलफाह जैसी महिला पाठकों की लोकप्रियता में प्रमाणित है।
दो प्रकार के पाठ हैं: मुरत्तल धीमी रफ्तार से है, जो अध्ययन और अभ्यास के लिए उपयोग किया जाता है। मुजावाड़ एक धीमी पठन को संदर्भित करता है जो प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में तकनीकी कलात्मकता और सुन्दर मॉडुलन को बढ़ाता है। मुजवाड़ पाठक श्रोताओं को शामिल करने की इच्छा रखने के लिए दर्शकों पर निर्देशित और निर्भर है।
===संस्करण पाठ===
देखें: [[क़िरात]]
[[File:Qur'an folio 11th century kufic.jpg|thumb|upright=1.15|Vocalization अंकों के साथ कुरान का पृष्ठ]]
9वीं शताब्दी के अंत तक विशिष्ट स्वर ध्वनियों को इंगित करने वाले वोकलाइजेशन मार्कर अरबी भाषा में पेश किए गए थे। पहली कुरानिक पांडुलिपियों में इन अंकों की कमी थी, इसलिए कई पाठ स्वीकार्य रहते हैं। दोषपूर्ण स्वर की प्रकृति द्वारा अनुमत पाठ के रीडिंग में भिन्नता 10 वीं शताब्दी के दौरान क़राअत की संख्या में वृद्धि हुई। [[बग़दाद|बगदाद]], इब्न मुजाहिद से 10 वीं शताब्दी के मुस्लिम विद्वान कुरान के सात स्वीकार्य पाठ क़राअत स्थापित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने विभिन्न क़राअत और उनकी भरोसेमंदता का अध्ययन किया और [[मक्का]], [[मदीना]], [[कूफ़ा]], [[बसरा]] और [[दमिश्क]] के शहरों से सात 8 वीं शताब्दी के क़रीयों को चुना। इब्न मुजाहिद ने यह नहीं समझाया कि उन्होंने छः या दस की बजाय सात पाठकों को क्यों चुना, लेकिन यह एक भविष्यवाणी परंपरा (मुहम्मद की कहानियों ) से संबंधित हो सकता है कि कुरान को सात " अरुफ " (अर्थात् सात अक्षरों या मोड) में प्रकट किया गया था। आज, सबसे लोकप्रिय क़ारी हाफ़िज़ (डी। 796) और वारश (डी। 812) द्वारा प्रेषित हैं जो इब्न मुजाहिद के दो पाठकों, आसिम इब्न अबी अल-नजुद (कुफा, डी। 745) और नफी अल के अनुसार हैं -मदानी (मदीना, डी। 785) क्रमशः। काहिरा के प्रभावशाली मानक कुरान (1924) संशोधित स्वर संकेतों और मिनटों के विवरण के लिए अतिरिक्त प्रतीकों का एक सेट का उपयोग करता है और 'असिम के पाठ, कुफा के 8 वीं शताब्दी के पाठ पर आधारित है। यह संस्करण कुरान के आधुनिक प्रिंटिंग के लिए मानक बन गया है।
कुरान के संस्करण रीडिंग एक प्रकार का टेक्स्ट संस्करण हैं। मेलचेर के मुताबिक, अधिकांश असहमतिओं को स्वरों के साथ आपूर्ति करने के लिए करना पड़ता है, उनमें से अधिकतर अंततः डायलेक्टल मतभेदों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं और लगभग आठ असहमतिओं में से एक को ऊपर या नीचे बिंदुओं को रखना है या नहीं लाइन।
नासर विभिन्न उपप्रकारों में भिन्न क़राअत को वर्गीकृत करता है, जिसमें आंतरिक स्वर, लंबे स्वर, रत्न (शद्दाह), आकलन और परिवर्तन शामिल हैं।
कभी-कभी, एक प्रारंभिक कुरान एक विशेष पढ़ने के साथ संगतता दिखाता है। 8 वीं शताब्दी से एक सीरियाई पांडुलिपि इब्न अमीर विज्ञापन-दीमाशकी के पढ़ने के अनुसार लिखी गई है। एक और अध्ययन से पता चलता है कि इस पांडुलिपि में हेसी क्षेत्र का मुखरता है।
==लेखन और मुद्रण==
===लेखन===
19वीं शताब्दी में मुद्रण को व्यापक रूप से अपनाया जाने से पहले, कुरान को कॉलिग्राफर्स और प्रतिवादियों द्वारा बनाई गई पांडुलिपियों में प्रसारित किया गया था। सबसे पुरानी पांडुलिपियों को इजाजी- टाइप स्क्रिप्ट में लिखा गया था। हिजाजी शैली पांडुलिपियों ने फिर भी पुष्टि की है कि लेखन में कुरान का प्रसारण शुरुआती चरण में शुरू हुआ था। शायद नौवीं शताब्दी में, स्क्रिप्टों में मोटे स्ट्रोक की सुविधा शुरू हुई, जिन्हें परंपरागत रूप से कुफिक स्क्रिप्ट के रूप में जाना जाता है। नौवीं शताब्दी के अंत में, कुरान की प्रतियों में नई स्क्रिप्ट दिखाई देने लगे और पहले की लिपियों को प्रतिस्थापित किया। पिछली शैली के उपयोग में विघटन का कारण यह था कि उत्पादन के लिए बहुत लंबा समय लगा और प्रतियों की मांग बढ़ रही थी। इसलिए कॉपीिस्ट सरल लेखन शैलियों का चयन करेंगे। 11 वीं शताब्दी की शुरुआत में, नियोजित लेखन की शैलियों मुख्य रूप से नाख , मुक्काक , रेयनी और दुर्लभ मौकों पर, थुलुथ लिपि थीं । नाख बहुत व्यापक उपयोग में था। उत्तरी अफ्रीका और स्पेन में, मगरीबी शैली लोकप्रिय थी। बिहारी लिपि अधिक विशिष्ट है जिसका उपयोग पूरी तरह से भारत के उत्तर में किया जाता था। फारसी दुनिया में नास्तिक शैली का शायद ही कभी इस्तेमाल किया जाता था। <ref name=rippin/><ref>Peter G. Riddell, Tony Street, Anthony Hearle Johns, [https://books.google.com/books?id=H3nHpsDBm6QC&pg=PA170 ''Islam: essays on scripture, thought and society : a festschrift in honour of Anthony H. Johns''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161219180757/https://books.google.com/books?id=H3nHpsDBm6QC&pg=PA170 |date=19 दिसंबर 2016 }}, pp. 170–174, BRILL, 1997, {{ISBN|978-90-04-10692-5}}, {{ISBN|978-90-04-10692-5}}</ref>
शुरुआत में, कुरान में वोकलिज़ेशन चिह्न नहीं था। जैसा कि हम आज जानते हैं, वोकलाइजेशन की प्रणाली, नौवीं शताब्दी के अंत में पेश की गई प्रतीत होती है। चूंकि अधिकांश मुसलमानों के लिए एक पांडुलिपि खरीदने के लिए यह बहुत महंगा होता, इसलिए कुरान की प्रतियां मस्जिदों में लोगों के लिए सुलभ बनाने के लिए आयोजित की जाती थीं। ये प्रतियां अक्सर 30 भागों या जुज़ की श्रृंखला का रूप लेती हैं । उत्पादकता के मामले में, तुर्क प्रतिवादी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रदान करते हैं। यह व्यापक मांग, मुद्रण विधियों की अलोकप्रियता और सौंदर्य कारणों के जवाब में था। <ref>Suraiya Faroqhi, [https://books.google.com/books?id=cQ8ZLZh9WjwC&pg=PA95 ''Subjects of the Sultan: culture and daily life in the Ottoman Empire''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161219200256/https://books.google.com/books?id=cQ8ZLZh9WjwC&pg=PA95 |date=19 दिसंबर 2016 }}, pp, 134–136, I.B.Tauris, 2005, {{ISBN|978-1-85043-760-4}}, {{ISBN|978-1-85043-760-4}};[https://books.google.com/books?id=PvwUAAAAIAAJ&pg=PA803 The Encyclopaedia of Islam: Fascicules 111–112 : Masrah Mawlid] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161219203923/https://books.google.com/books?id=PvwUAAAAIAAJ&pg=PA803 |date=19 दिसंबर 2016 }}, Clifford Edmund Bosworth</ref>
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File:Brooklyn Museum - Folio from the "Blue" Qur'an.jpg|"ब्लू" कुरान से फोलियो। ब्रुकलिन संग्रहालय ।
File:Folio_from_a_Koran_(8th-9th_century).jpg|कूफिके लिपि, आठवीं या नौवीं शताब्दी।
File:Qur%27anic_Manuscript_-_Maghribi_script.jpg|मग़रिबी लिपि, 13 वीं -14 वीं शताब्दी।
File:Muhaqqaq_script.gif|मुहक्कक लिपि, 14 वीं -15 वीं शताब्दी।
File:Shikastah script.jpg|शिकस्त नास्तलीक लिपि, 18 वीं -19 वीं शताब्दी।
|बॉर्डर सजावट के साथ, कूफिक लिपि।
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===मुद्रण===
[[File:Quran divided into 6 books.jpg|thumb|कुरान 6 किताबों में बांटा गया। दार इब्न कथिर, दमिश्क-बेरूत द्वारा प्रकाशित।]]
कुरान से अर्क की लकड़ी-ब्लॉक मुद्रण 10 वीं शताब्दी के शुरू में रिकॉर्ड पर है। <ref>{{cite web|url=http://www.muslimheritage.com/topics/default.cfm?ArticleID=940|title=Muslim Printing Before Gutenberg|work=muslimheritage.com|access-date=4 मई 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20131103034450/http://www.muslimheritage.com/topics/default.cfm?ArticleID=940|archive-date=3 नवंबर 2013|url-status=live}}</ref>
मध्य पूर्वी ईसाईयों के बीच वितरण के लिए पोप जूलियस द्वितीय (आर 1503-1512) द्वारा अरबी जंगम प्रकार के मुद्रण का आदेश दिया गया था। <ref>{{harvnb|Krek|1979|p=203}}</ref> चलने वाले प्रकार के साथ मुद्रित पहला पूर्ण कुरान वेनिस में 1537/1538 में पगिनिनो पागनिनी और एलेसेंड्रो पागनिनी द्वारा तुर्क बाजार के लिए बनाया गया था। दो और संस्करणों पादरी द्वारा प्रकाशित किए जाते शामिल अब्राहम हिंकेलमैन में हैम्बर्ग 1694 में, और इतालवी पुजारी द्वारा लुडोविको मराककी में पडुआ लैटिन अनुवाद व टीका के साथ 1698 में।
इस अवधि के दौरान कुरान की मुद्रित प्रतियां मुस्लिम कानूनी विद्वानों से मजबूत विरोध के साथ मुलाकात की : अरबी में कुछ भी प्रिंट करना 1483 और 1726 के बीच तुर्क साम्राज्य में प्रतिबंधित था -शुरुआत में, मृत्यु के दंड पर भी। 1726 में अरबी लिपि में छपाई पर तुर्क प्रतिबंध पर इब्राहिम म्यूटेरिकिका के अनुरोध पर गैर-धार्मिक ग्रंथों के लिए उठाया गया था , जिन्होंने 1729 में अपनी पहली पुस्तक मुद्रित की थी। बहुत कम किताबें, और कोई धार्मिक ग्रंथ मुद्रित नहीं किया गया था एक और शताब्दी के लिए तुर्क साम्राज्य में।
1786 में, रूस के कैथरीन द ग्रेट ने सेंट पीटर्सबर्ग में "तातार और तुर्की ऑर्थोग्राफी" के लिए एक प्रिंटिंग प्रेस प्रायोजित किया , जिसमें एक मुल्ला उस्मान इस्माइल अरबी प्रकार के उत्पादन के लिए ज़िम्मेदार था। 1787 में इस प्रेस के साथ एक कुरान मुद्रित किया गया था, 1790 और 1793 में सेंट पीटर्सबर्ग में और 1 99 3 में कज़ान में पुनर्निर्मित किया गया था । ईरान में मुद्रित पहला संस्करण तेहरान (1828) में दिखाई दिया, तुर्की में एक अनुवाद 1842 में काहिरा में मुद्रित किया गया था, और पहली आधिकारिक स्वीकृत ओटोमन संस्करण अंततः कॉन्स्टेंटिनोपल में 1875 और 1877 के बीच दो खंडों के सेट के रूप में मुद्रित किया गया था, पहले संवैधानिक युग के दौरान । <ref>{{Cite book|title=The Palgrave Dictionary of Transnational History: From the mid-19th century to the present day|last=Iriye|first=A.|last2=Saunier|first2=P.|publisher=Springer|year=2009|isbn=978-1-349-74030-7|location=|pages=627}}</ref><ref>{{Cite book|title=The Politics of Language and Nationalism in Modern Central Europe|last=Kamusella|first=T.|publisher=Springer|year=2012|isbn=978-0-230-58347-4|location=|pages=265–266}}</ref>
गुस्ताव फ्लूजेल 1834 में कुरान के एक संस्करण प्रकाशित में लीपज़िग है, जो एक सदी के करीब के लिए आधिकारिक बने रहे, जब तक कैरो के अल अजहर विश्वविद्यालय कुरान के एक संस्करण प्रकाशित 1924 में इस संस्करण एक लंबे तैयारी के परिणाम के रूप में यह कुरआन मानकीकृत था ऑर्थोग्राफी और बाद के संस्करणों का आधार बना हुआ है। <ref name=rippin />
==आलोचना==
* मुख्य लेख: [[क़ुरआन की आलोचना]]
ब्रह्मांड और पृथ्वी के निर्माण पर क़ुरआन के बयान, मानव जीवन की उत्पत्ति, जीवन-ज्ञान, पृथ्वी विज्ञान और इतने पर आलोचकों की आलोचना की गई है।<ref>Cook, Michael, ''The Koran: A Very Short Introduction'', Oxford University Press, (2000), p.30</ref><ref>see also: Ruthven, Malise, ''A Fury For God'', London ; New York : Granta, (2002), p.126</ref> <ref>{{cite book |last=Leirvik |first=Oddbjørn |date=27 May 2010 |title=Images of Jesus Christ in Islam: 2nd Edition |url=https://books.google.com/books?hl=en&lr=&id=IEUdCgAAQBAJ&oi=fnd&pg=PR5&dq=child+jesus+islam&ots=T1M_h4A1eD&sig=uheCj8W2SALj4mzZ1VMl40jCZ1s#v=onepage&q=child%20jesus%20islam&f=false |location=New York |publisher=[[Bloomsbury Publishing|Bloomsbury Academic]]; 2nd edition |pages=33–66 |isbn=1441181601 |access-date=4 मई 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190331231347/https://books.google.com/books?hl=en&lr=&id=IEUdCgAAQBAJ&oi=fnd&pg=PR5&dq=child+jesus+islam&ots=T1M_h4A1eD&sig=uheCj8W2SALj4mzZ1VMl40jCZ1s#v=onepage&q=child%20jesus%20islam&f=false |archive-date=31 मार्च 2019 |url-status=live }}</ref><ref>Gerd Puin is quoted in the Atlantic Monthly, January, 1999:«The Koran claims for itself that it is 'mubeen' or 'clear'. But if you look at it, you will notice that every fifth sentence or so simply doesn't make sense... the fact is that a fifth of the Koranic text is just incomprehensible...«</ref>
==अन्य साहित्य के साथ संबंध==
[[File:Maryam.jpg|thumb|150px|वर्जिन मैरी, जिसका जन्म करीब आ रहा है, पेड़ को ताजा खजूर के फल के लिए हिलाता है, विषय [[:en:Gospel of Pseudo-Matthew|मैथ्यू के झूठे-सुसमाचार]] से लिया गया है। <ref>Leirvik 2010, pp. 33–34.</ref>]]
===बाइबल===
यह भी देखें: बाइबिल के वर्णन और कुरान और तोरात
{{Quote|यह वह है जिसने आपको भेजा (कदम दर कदम), सच में, पुस्तक, यह पुष्टि करते हुए कि इससे पहले क्या हुआ; और उसने मानव जाति के लिए एक गाइड के रूप में, इस से पहले कानून (मूसा के) और सुसमाचार (यीशु के) को भेजा, और उसने मानदंड (सही और गलत के बीच निर्णय) भेजा।- कुरान 3: 3 ( यूसुफ अली )}}
कुरान पूर्व पुस्तकों ([[तौरात|तोराह]] और [[बाइबिल|इंजील]] (सुसमाचार)) के साथ संबंधों के बारे में अच्छी तरह से बोलता है और उनकी समानताओं को उनके अद्वितीय उत्पत्ति के गुण देता है और कहता है कि उन सभी को एक अल्लाह (ईश्वर) ने प्रकट किया है। <ref>{{Cite quran|2|285|style=nosup}}</ref>
कुरान की भाषा थी समान करने के लिए सिरिएक भाषा। कुरान यहूदी और ईसाई पवित्र किताबों (तनाख, बाइबिल) और भक्ति साहित्य (अपोक्राफा, मिड्रैश) में सुनाई गई कई लोगों और घटनाओं की कहानियों को याद करता है, हालांकि यह कई विवरणों में भिन्न है। [[आदम]], [[इदरीस]], [[नूह]], [[एबर]], [[सालिह|सालेह]], [[अब्राहम|इब्राहीम]], [[लूत]], [[इश्माईल]], [[इसहाक़]], [[याकूब]], [[यूसुफ़]], [[अय्यूब]], [[शोएब]], [[दाऊद]], [[सुलैमान]], [[एलिय्याह]], [[एलीशा]], [[यूनुस]], [[हारून]], [[मूसा]], [[ज़कारिया]], [[यूहन्ना]] [[ईसा]] का उल्लेख कुरान में रसूल के और नबी के रूप में किया गया है ([[इस्लाम के पैग़म्बर|इस्लाम के पैगम्बर]] को देखें)। वास्तव में, कुरान में किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में मूसा का अधिक उल्लेख किया गया है। मुहम्मद की तुलना में कुरान में ईसा का अक्सर उल्लेख किया गया है, जबकि मरियम (मैरी) का उल्लेख क़ुरान में किया गाया है और इंजील में नहीं। <ref>Esposito, John L. ''The Future of Islam''. Oxford University Press US, 2010. {{ISBN|978-0-19-516521-0}} [https://books.google.com/books?id=-UxRoBmUnsYC&pg=PA40&dq=%22Christians+are+often+surprised+to+discover+that%22&hl=en&ei=jsDETYv6AY-asAOt57HrAQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=2&ved=0CC8Q6AEwAQ#v=onepage&q=%22Christians%20are%20often%20surprised%20to%20discover%20that%22&f=false p. 40] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161219181035/https://books.google.com/books?id=-UxRoBmUnsYC&pg=PA40&dq=%22Christians+are+often+surprised+to+discover+that%22&hl=en&ei=jsDETYv6AY-asAOt57HrAQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=2&ved=0CC8Q6AEwAQ#v=onepage&q=%22Christians%20are%20often%20surprised%20to%20discover%20that%22&f=false |date=19 दिसंबर 2016 }}</ref>
===रिश्ते===
[[बहाई धर्म|बहाई]] और [[द्रूस]] जैसे कुछ गैर-मुस्लिम समूह कुरान को पवित्र मानते हैं। यूनिटियन यूनिवर्सलिस्ट भी कुरान को अपवित्र मानता हैं। डायटेसेरॉन, जेम्स की प्रोटेवांगेलीन, इन्फंसी गोस्पेल ऑफ़ थॉमस, गोस्पेल ऑफ़ सूडो मैथ्यूस जैसी किताबों के सारांश कुरआन से असमानताएं रखते हैं। <ref>"On pre-Islamic Christian strophic poetical texts in the Koran" by Ibn Rawandi, found in ''What the Koran Really Says: Language, Text and Commentary'', Ibn Warraq, Prometheus Books, ed. {{ISBN|978-1-57392-945-5}}</ref>
==अरब लेखन==
[[File:Large Koran.jpg|thumb|right|upright|upright=0.7|कुरान से पृष्ठ ('उमर-ए अकता')। ईरान, अफगानिस्तान, तिमुरीद राजवंश, लगभग 1400. पेपर मुकाक्काक लिपि पर ओपेक वॉटरकलर, स्याही और सोना। 170 × 109 सेमी (66 15 / 16 × 42 15 / 16 में)। ऐतिहासिक क्षेत्र: उजबेकिस्तान।]]
कुरान के अवतरण के बाद, और इस्लाम के सामान्य उदय, अरबी वर्णमाला तेजी से एक कला रूप में विकसित हुआ। <ref name =leaman />
शिकागो विश्वविद्यालय में पास पूर्वी भाषाओं और सभ्यताओं के प्रोफेसर वदाद कादी, और यंगस्टाउन स्टेट यूनिवर्सिटी में इस्लामी अध्ययन के प्रोफेसर मुस्तसिर मीर, के मुताबिक: <ref>Wadad Kadi and Mustansir Mir, ''Literature and the Quran'', Encyclopaedia of the Qur'an, vol. 3, pp. 213, 216</ref>
{{quote|यद्यपि अरबी, एक भाषा और साहित्यिक परंपरा के रूप में, मुहम्मद की भविष्यवाणी गतिविधि के समय काफी अच्छी तरह से विकसित हुई थी, यह इस्लाम के उद्भव के बाद ही अरबी में स्थापित संस्थापक के साथ थी, कि भाषा अभिव्यक्ति की अपनी अत्यधिक क्षमता तक पहुंच गई, और साहित्य जटिलता और परिष्कार का उच्चतम बिंदु है। दरअसल, शायद यह कहना बेहद जबरदस्त नहीं है कि कुरान शास्त्रीय और बाद के शास्त्रीय अरबी साहित्य के निर्माण में सबसे विशिष्ट ताकतों में से एक था।
मुख्य क्षेत्रों जिसमें कुरान ने अरबी साहित्य पर ध्यान देने योग्य प्रभाव डाला, वे डिक्शनरी और थीम हैं; अन्य क्षेत्र कुरान के साहित्यिक पहलुओं से विशेष रूप से शपथ (क्यूवी), रूपक, रूपरेखा और प्रतीकों से संबंधित हैं। जहां तक उपन्यास का सवाल है, कोई भी कह सकता है कि कुरान के शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्तियां, विशेष रूप से "भारित" और सूत्रवादी वाक्यांश, व्यावहारिक रूप से साहित्य के सभी शैलियों में दिखाई देते हैं और इस तरह के बहुतायत में कि उनके पूर्ण रिकॉर्ड को संकलित करना असंभव है। कुरान ने न केवल अपने संदेश को व्यक्त करने के लिए एक पूरी तरह से नई भाषाई कॉर्पस बनाया है, बल्कि यह पुराने अर्थों के साथ पुरानी, पूर्व इस्लामी शब्दों को भी संपन्न करता है और यह उन अर्थों से है जो भाषा में और बाद में साहित्य में जड़ें लेते हैं ...}}
== मान्यताएँ ==
अल्लाह ने इस धरती पर मनुष्य को अपना ख़लीफ़ा (प्रतिहारी) बनाकर भेजा है। भेजने से पूर्व उसने हर व्यक्ति को ठीक ठीक समझा दिया था कि वे थोड़े समय के लिए धरती पर जा रहे हैं, उसके बाद उन्हें उसके पास लौट कर आना है। जहाँ उसे अपने उन कार्यों का अच्छा या बुरा बदला मिलेगा जो उसने धरती पर किए।
इस धरती पर मनुष्य को कार्य करने की स्वतंत्रता है। धरती के साधनों को उपयोग करने की छूट है। अच्छे और बुरे कार्य को करने पर उसे तक्ताल कोई रोक या इनाम नहीं है। किन्तु इस स्वतंत्रता के साथ ईश्वर ने धरती पर बसे मनुष्यों को ठीक उस रूप में जीवन गुज़ारने के लिए ईश्वरीय आदेशों के पहुंचाने का प्रबंध किया और धरती के हर भाग में उसने अपने दूत (पैग़म्बर) भेजे, जिन्होंने मनुष्यों तक ईश्वर का संदेश भेजा। कहा जाता है कि ऐसे ईशदूतों की संख्या 1,84,000 के क़रीब रही। इस सिलसिले की अंतिम कड़ी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) थे। आप (सल्ल.) के बाद अब कोई दूत नहीं आएगा किन्तु हज़रत ईसा (अलै.) अपने जीवन के शेष वर्ष इस धरती पर पुन: गुज़ारेंगे। ईश्वर की अंतिम किताब आपके हाथ में है कोई और ईश्वरीय किताब अब नहीं आएगी।
हज़ारों वर्षों तक निरंतर आने वाले पैग़म्बरों का चाहे वे धरती के किसी भी भाग में अवतरित हुए हों, उनका संदेश एक था, उनका मिशन एक था, ईश्वरीय आदेश के अनुसार मनुष्यों को जीना सिखाना। हज़ारों वर्षों का समय बीतने के कारण ईश्वरीय आदेशों में मनुष्य अपने विचार, अपनी सुविधा जोड़ कर नया धर्म बना लेते और मूल धर्म को विकृत कर एक आडम्बर खड़ा कर देते और कई बार तो ईश्वरीय आदेशों के विपरित कार्य करते। क्यों कि हर प्रभावी व्यक्ति अपनी शक्ति के आगे सब को नतमस्तक देखना चाहता था।
आख़िर अंतिम नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) क़ुरआन के साथ इस धरती पर आए और क़ुरआन ईश्वर के इस चैलेंज के साथ आया कि इसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करेगा। 1500 वर्ष का लम्बा समय यह बताता है कि क़ुरआन विरोधियों के सारे प्रयासों के बाद भी क़ुरआन के एक शब्द में भी परिवर्तन संभव नहीं हो सका है। यह किताब अपने मूल स्वरूप में प्रलय तक रहेगी। इसके साथ क़ुरआन का यह चैलेंज भी अपने स्थान पर अभी तक क़ायम है कि जो इसे ईश्वरीय ग्रंथ नहीं मानते हों तो वे इस जैसी पूरी किताब नहीं उसका एक छोटा भाग ही बना कर दिखा दें।
क़ुरआन के इस रूप को जानने के बाद यह जान लीजिए कि यह किताब रूप में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को नहीं दी गई कि इसे पढ़कर लोगों को सुना दें और छाप कर हर घर में रख दें। बल्कि समय समय पर 23 वर्षों तक आवश्यकता अनुसार यह किताब अवतरित हुई और आप (सल्ल.) ने ईश्वर की मर्ज़ी से उसके आदेशों के अनुसार धरती पर वह समाज बनाया जैसा ईश्वर का आदेश था।
पश्चिमी विचारक [[एच.जी.वेल्स]] के अनुसार इस धरती पर प्रवचन तो बहुत दिए गए किन्तु उन प्रवचनों के आधार पर एक समाज की रचना पहली बार हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने करके दिखाई। यहाँ यह जानना रूचिकर होगा कि वेल्स इस्लाम प्रेमी नहीं बल्कि इस्लाम विरोधी है और उसकी किताबें इस्लाम विरोध में प्रकाशित हुई हैं।
वैज्ञानिक तथ्य जो अब तक हमें ज्ञात हैं, क़ुरआन में छुपे हैं और ऐसे सैकड़ों स्थान है जहां लगता है कि मनुष्य ज्ञान अभी उस हक़ीक़त तक नहीं पहुंचा है। बार बार क़ुरआन आपको विचार करने की दावत देता है। [[पृथ्वी|ज़मीन]] और [[अंतरिक्ष|आसमान]] के रहस्यों को जानने का आमंत्रण देता हैं।
एक उलझन और सामने आती है। कुरआन के दावे के अनुसार वह पूरी धरती के मनुष्यों के लिए और शेष समय के लिए है, किन्तु उसके संबोधित उस समय के [[अरब लोग|अरब]] नज़र आते हैं। सरसरी तौर पर यही लगता है कि क़ुरआन उस समय के अरबों के लिए ही अवतरित किया गया था लेकिन आप जब भी किसी ऐसे स्थान पर पहुँचें जब यह लगे कि यह बात केवल एक ख़ास काल तथा देश के लिए है, तब वहाँ रूक कर विचार करें या इसे नोट करके बाद में इस पर विचार करें तो आप को हर बार लगेगा कि मनुष्य हर युग और हर भू भाग का एक है और उस पर वह बात ठीक वैसी ही लागू होती है, जैसी उस समय के [[अरब|लोग|अरबों]] पर लागू होती थी।
== मुसलमानों के लिए ==
मुसलमानों के लिए क़ुरआन के संबंध में बड़ी बड़ी किताबें लिखी गई हैं और लिखी जा सकती हैं। यहां उ¬द्देश्य क़ुरआन का एक संक्षिप्त परिचय और उसके उम्मत पर क्या हक़ हैं, यहा स्पष्ट करना है।
हज़रत अली (रज़ि.) से रिवायत की गई एक हदीस है। हज़रत हारिस फ़रमाते हैं कि मैं मस्जिद में दाखिल हुआ तो देखा कि कुछ लोग कुछ समस्याओं में झगड़ा कर रहे हैं। मैं हज़रत अली (रज़ि.) के पास गया और उन्हें इस बात की सूचना दी। हज़रत अली (रज़ि.) ने फरमाया- क्या यह बातें होने लगीं? <br>मैंने कहा, जी हां। <br>हज़रत अली (रज़ि.) ने फरमाया- याद रखो मैंने रसूल अल्लाह (सल्ल.) से सुना है। आप (सल्ल.) ने फरमाया- खबरदार रहो निकट ही एक बड़ा फ़ितना सर उठाएगा मैंने अर्ज़ किया- इस फ़ितने में निजात का ज़रिया क्या होगा? <br> फरमाया-अल्लाह की किताब।
* इसमें तुमसे पूर्व गुज़रे हुए लोगों के हालात हैं।
* तुम से बाद होने वाली बातों की सूचना है।
* तुम्हारे आपस के मामलात का निर्णय है।
* यह एक दो टूक बात हैं, हंसी दिल्लगी की नहीं है।
* जो सरकश इसे छोड़ेगा, अल्लाह उसकी कमर तोड़ेगा।
* और जो कोई इसे छोड़ कर किसी और बात को अपनी हिदायत का ज़रिया बनाएगा। अल्लाह उसे गुमराह कर देगा।
* ख़ुदा की मज़बूत रस्सी यही है।
* यही हिकमतों से भरी हुई पुन: स्मरण (याददेहानी) है, यही सीधा मार्ग है।
* इसके होते इच्छाऐं गुमराह नहीं करती हैं।
* और ना ज़बानें लड़खड़ाती हैं।
* ज्ञानवान का दिल इससे कभी नहीं भरता।
* इसे बार बार दोहराने से उसकी ताज़गी नहीं जाती (यह कभी पुराना नहीं होता)।
* इसकी अजीब (विचित्र) बातें कभी समाप्त नहीं होंगी।
* यह वही है जिसे सुनते ही जिन्न पुकार उठे थे, निसंदेह हमने अजीबोग़रीब क़ुरआन सुना, जो हिदायत की ओर मार्गदर्शन करता है, अत: हम इस पर ईमान लाऐ हैं।
* जिसने इसकी सनद पर हां कहा- सच कहा।
* जिसने इस पर अमल किया- दर्जा पाएगा।
* जिसने इसके आधार पर निर्णय किया उसने इंसाफ किया।
* जिसने इसकी ओर दावत दी, उसने सीधे मार्ग की ओर राहनुमाई की।
क़ुरआन का सारा निचोड़ इस एक हदीस में आ जाता है। क़ुरआन धरती पर अल्लाह की अंतिम किताब उसकी ख्याति के अनुरूप है। यह अत्यंत आसान है और यह बहुत कठिन भी है। आसान यह तब है जब इसे याद करने (तज़क्कुर) के लिए पढ़ा जाए। यदि आप की नियत में खोट नहीं है और क़ुरआन से हिदायत चाहते हैं तो अल्लाह ने इस किताब को आसान बना दिया है। समझने और याद करने के लिए यह विश्व की सबसे आसान किताब है। खुद क़ुरआन मे है 'और हमने क़ुरआन को समझने के लिए आसान कर दिया है, तो कोई है कि सोचे और समझे?' (सूर: अल क़मर:17)
दूसरी ओर दूरबीनी (तदब्बुर) की दृष्टि से यह विश्व की कठिनतम किताब है पूरी पूरी ज़िंदगी खपा देने के बाद भी इसकी गहराई नापना संभव नहीं। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह एक समुद्र है। सदियां बीत गईं और क़ुरआन का चमत्कार अब भी क़ायम है। और सदियां बीत जाऐंगी किन्तु क़ुरआन का चमत्कार कभी समाप्त नहीं होगा।
केवल हिदायत पाने के लिए आसान तरीक़ा यह है कि अटल आयतों (मुहकमात) पर ध्यान रहे और आयतों (मुतशाबिहात) पर ईमान हो कि यह भी अल्लाह की ओर से हैं। दुनिया निरंतर प्रगति कर रही है, मानव ज्ञान निरंतर बढ़ रहा है, जो क़ुरआन में कल मुतशाबिहात था आज वह स्पष्ट हो चुका है, और कल उसके कुछ ओर भाग स्पष्ट होंगे।
इसी तरह ज्ञानार्जन के लिए भी दो विभिन्न तरीक़े अपनाना होंगे। आदेशों के लिहाज़ से क़ुरआन में विचार करने वाले को पीछे की ओर यात्रा करनी होगी। क़ुरआन के आदेश का अर्थ धर्म शास्त्रियों (फ़ुह्लाँहा), विद्वानों (आलिमों) ने क्या लिया, तबाताबईन (वे लोग जिन्होने ताबईन को देखा। ), ताबईन (वे लोग जिन्होने सहाबा (हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)) के साथियों को देखा। ) और सहाबा ने इसका क्या अर्थ लिया। यहां तक कि ख़ुद को हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के क़दमों तक पहुंचा दे कि ख़ुद साहबे क़ुरआन का इस बारे में क्या आदेश था?
दूसरी ओर ज्ञानविज्ञान के लिहाज़ से आगे और निरंतर आगे विचार करना होगा। समय के साथ ही नहीं उससे आगे चला जाए। मनुष्य के ज्ञान की सतह निरंतर ऊंची होती जा रही है। क़ुरआन में विज्ञान का सर्वोच्च स्तर है उस पर विचार कर नए अविष्कार, खोज और जो वैज्ञानिक तथ्य हैं उन पर कार्य किया जा सकता है।
=== ख़ुदा का चमत्कार (क़ुदरत) ===
मौअजज़ा उस चमत्कार को कहते हैं जो किसी नबी या रसूल के हाथ पर हो और मानव शक्ति से परे हो, जिस पर मानव बुध्दि हैरान हो जाए।
हर युग में जब भी कोई रसूल (ईश दूत) ईश्वरीय आदेशों को मानव तक पहुँचता, तब उसे अल्लाह की ओर से चमत्कार दिए जाते थे। हज़रत मूसा (अलै.) को असा (हाथ की लकड़ी) दी गई, जिससे कई चमत्कार दिखाए गये। हज़रत ईसा (अलै.) को मुर्दों को जीवित करना, बीमारों को ठीक करने का मौअजज़ा दिया गया। किसी भी नबी का असल मौअजज़ा वह है जिसे वह दावे के साथ पेश करे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के हाथ पर सैकड़ों मौअजज़े वर्णित हैं, किन्तु जो दावे के साथ पेश किया गया और जो आज भी चमत्कार के रूप में विश्व के समक्ष मौजूद है, वह है क़ुरआन जिसका यह चेलेंज़ दुनिया के समक्ष अनुत्तरित है कि इसके एक भाग जैसा ही बना कर दिखा दिया जाए। यह दावा क़ुरआन में कई स्थान पर किया गया।
क़ुरआन पूर्ण रूप से सुरक्षित रहेगा, इस दावे को 1500 वर्ष बीत गए और क़ुरआन सुरक्षित है, पूर्ण सुरक्षित है। यह सिद्ध हो चुका है, जो एक चमत्कार है।
क़ुरआन विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरा है, और उसके वैज्ञानिक वर्णनों के आगे वैज्ञानिक नतमस्तक हैं। यह भी एक चमत्कार है। 1500 वर्ष पूर्व अरब के रेगिस्तान में एक अनपढ़ व्यक्ति ने ऐसी किताब प्रस्तुत की जो बीसवीं सदी के सारे साधनों के सामने अपनी सत्यता ज़ाहिर कर रही है। यह कार्य क़ुरआन के अतिरिक्त किसी अन्य किताब ने किया हो तो विश्व उसका नाम जानना चाहेगा। क़ुरआन का यह चमत्कारिक रूप आज हमारे लिए है और हो सकता है आगे आने वाले समय के लिए उसका कोई और चमत्कारिक रूप सामने आए।
जिस समय क़ुरआन अवतारित हुआ उस युग में उसका मुख्य चमत्कार उसका वैज्ञानिक आधार नहीं था। उस युग में क़ुरआन का चमत्कार था उसकी भाषा, साहित्य, वाग्मिता, जिसने अपने समय के अरबों के भाषा ज्ञान को झकझोर दिया था। यहां स्पष्ट करना उचित होगा कि उस समय के अरबों को अपने भाषा ज्ञान पर इतना गर्व था कि वे शेष विश्व के लोगों को अजमी (गूंगा) कहते थे। क़ुरआन की शैली के कारण अरब के भाषा ज्ञानियों ने अपने घुटने टेक दिए।
=== इंक़लाबी किताब ===
क़ुरआन ऐसी किताब है जिसके आधार पर एक क्रांति लाई गई। रेगिस्तान के ऐसे अनपढ़ लोगों को जिनका विश्व के नक्शे में उस समय कोई महत्व नहीं था। क़ुरआन की शिक्षाओं के कारण, उसके प्रस्तुतकर्ता की ट्रेनिंग ने उन्हे उस समय की महान शाक्तियों के समक्ष ला खड़ा किया और एक ऐसे क़ुरआनी समाज की रचना मात्र 23 वर्षों में की गई जिसका उत्तर विश्व कभी नहीं दे सकता।
आज भी दुनिया मानती है कि क़ुरआन और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक आदर्श समाज की रचना की। इस दृष्टि से यदि क़ुरआन का अध्ययन किया जाए तो आपको उसके साथ क़दम मिला कर चलना होगा। उसकी शिक्षा पर अमल करें। केवल निजी जीवन में ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनैतिक और क़ानूनी क्षैत्रों में, तब आपके समक्ष वे सारे चरित्र जो क़ुरआन में वर्णित हैं, जीवित नज़र आऐंगे। वे सारी कठिनाई और वे सारी परेशानी सामने आजाऐंगी। तन, मन, धन, से जो गिरोह इस कार्य के लिए उठे तो क़ुरआन की हिदायत हर मोड़ पर उसका मार्ग दर्शन करेगी।
=== अल्लाह की रस्सी ===
क़ुरआन अल्लाह की रस्सी है। इस बारे में तिरमिज़ी में हज़रत ज़ैद बिन अरक़म (रज़ि.) द्वारा वर्णित हदीस है जिसमें कहा गया है कि क़ुरआन अल्लाह की रस्सी है जो ज़मीन से आसामान तक तनी है। यह शब्द हुज़ूर (सल्ल.) के है जिन्हे हज़रत ज़ैद (रज़ि.) ने वर्णित किया है।
तबरानी में वर्णित एक और हदीस है जिसमें कहा गया है कि एक दिन हुज़ूर (सल्ल.) मस्जिद में तशरीफ लाए तो देखा कुछ लोग एक कोने में बैठे क़ुरआन पढ़ रहे हैं और एक दूसरे को समझा रहे हैं। यह देख कर आप (सल्ल.) के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। आप (सल्ल.) सहाबा के उस गुट के पास पहुंचे और उन से कहा- क्या तुम मानते हो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई अन्य माबूद (ईश) नहीं है, मैं अल्लाह का रसूल हुँ और क़ुरआन अल्लाह की किताब है? सहाबा ने कहा, या रसूल अल्लाह हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई माबूद नहीं, आप अल्लाह के रसूल हैं और क़ुरआन अल्लाह की किताब है। तब आपने कहा, खुशियां मानाओ कि क़ुरआन अल्लाह की वह रस्सी है जिसका एक सिरा उसके हाथ में है और दूसरा तुम्हारे हाथ में।
क़ुरआन अल्लाह की रस्सी इस अर्थ में भी है कि यह मुसलमानों को आपस में बांध कर रखता है। उनमें विचारों की एकता, मत भिन्नता के समय अल्लाह के आदेशों से निर्णय और जीवन के लिए एक आदर्श नमूना प्रस्तुत करता है।
ख़ुद क़ुरआन में है कि अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकड़ लो। क़ुरआन के मूल आधार पर मुसलमानों के किसी गुट में कोई टकराव नहीं है।
क़ुरआन का हक़ क़ुरआन के हर मुसलमान पर पांच हक़ हैं, जो उसे अपनी शाक्ति और सामर्थ्य के अनुसार पूर्ण करना चाहिए।
# ईमान: हर मुसलमान क़ुरआन पर ईमान रखे जैसा कि ईमान का हक़ है अर्थात केवल ज़बान से इक़रार नहीं हो, दिल से यक़ीन रखे कि यह अल्लाह की किताब है।
# तिलावत: क़ुरआन को हर मुसलमान निरंतर पढ़े जैसा कि पढ़ने का हक़ है अर्थात उसे समझ कर पढ़े। पढ़ने के लिए तिलावत का शब्द खुद क़ुरआन ने बताया है, जिसका अरबी में शाब्दिक अर्थ है To Follow (पीछा करना)। पढ़ कर क़ुरआन पर अमल करना (उसके पीछे चलना) यही तिलावत का सही हक़ है। खुद क़ुरआन कहता है ''और वे इसे पढ़ने के हक़ के साथ पढ़ते हैं। (2:121) इसका विद्वानों ने यही अर्थ लिया है कि ध्यान से पढ़ना, उसके आदेशों में कोई फेर बदल नहीं करना, जो उसमें लिखा है उसे लोगों से छुपाना नहीं। जो समझ में नहीं आए वह विद्वानों से जानना। पढ़ने के हक़ में ऐसी समस्त बातों का समावेश है।
# समझना: क़ुरआन का तीसरा हक़ हर मुसलमान पर है, उसको पढ़ने के साथ समझना और साथ ही उस पर विचार ग़ौर व फिक्र करना। खुद क़ुरआन ने समझने और उसमें ग़ौर करने की दावत मुसलमानों को दी है।
# अमल: क़ुरआन को केवल पढ़ना और समझना ही नहीं। मुसलमान पर उसका हक़ है कि वह उस पर अमल भी करे। व्यक्तिगत रूप में और सामजिक रूप मे भी। व्यक्तिगत मामले, क़ानून, राजनिति, आपसी मामलात, व्यापार सारे मामले क़ुरआन के प्रकाश में हल किए जाऐं।
# प्रसार: क़ुरआन का पांचवां हक़ यह है कि उसे दूसरे लोगों तक पहुंचाया जाए। हुज़ूर (सल्ल.) का कथन है कि चाहे एक आयत ही क्यों ना हो। हर मुसलमान पर क़ुरआन के प्रसार में अपनी सार्मथ्य के अनुसार दूसरों तक पहुंचाना अनिवार्य है।
=== समझने के लिए ===
क़ुरआन को समझने के लिए उसके अवतीर्ण (नुज़ूल) की पृष्ठ भूमि जानना ज़रूरी है। यह इस तरह की किताब नहीं है कि इसे पूरा लिख कर पैग़म्बर (सल्ल.) को देकर कह दिया गया हो कि जाओ इसकी ओर लोगों को बुलाओ। बल्कि क़ुरआन थोड़ा थोड़ा उस क्रांति के अवसर पर जो हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने अरब में आरंभ की थी, आवश्यकता के अनुसार अवतरित किया गया। आरंभ से जैसे ही क़ुरआन का कुछ भाग अवतरित होता आप (सल्ल.) उसे लिखवा देते और यह भी बता देते कि यह किसके साथ पढ़ा जाएगा।
अवतीर्ण के क्रम से विद्वानों ने क़ुरआन को दो भागों में बांटा है। एक मक्की भाग, दूसरा मदनी भाग। आरंभ में मक्के में छोटी छोटी सूरतें नाज़िल हुईं। उनकी भाषा श्रेष्ठ, प्रभावी और अरबों की पसंद के अनुसार श्रेष्ठ साहित्यिक दर्जे वाली थी। उसके बोल दिलों में उतर जाते थे। उसके दैविय संगीत (Divine Music) से कान उसको सुनने में लग जाते और उसके दैविय प्रकाश (Divine Light) से लोग आकर्षित हो जाते या घबरा जाते। इसमें सृष्टि के वे नियम वर्णित किए गए जिन पर सदियों के बाद अब भी मानव आश्चर्य चकित है, किन्तु इसके लिए सारे उदाहरण स्थानीय थे। उन्हीं के इतिहास, उन्ही का माहौल। ऐसा पांच वर्ष तक चलता रहा।
इसके बाद मक्के की राजनैतिक तथा आर्थिक सत्ता पर क़ब्ज़े वाले लोगों ने अपने लिए इस खतरे को भांप का ज़ुल्म व ज्यादती का वह तांडव किया कि मुसलमानों की जो थोड़ी संख्या थी उसमें भी कई लोगों को घरबार छोड़ कर हब्शा (इथोपिया) जाना पड़ा। खुद नबी (सल्ल.) को एक घाटी में सारे परिवारजनों के साथ क़ैद रहना पड़ा और अंत में मक्का छोड़ कर मदीना जाना पड़ा।
मुसलमानों पर यह बड़ा सख्त समय था और अल्लाह ने इस समय जो क़ुरआन नाज़िल किया उसमें तलवार की काट और बाढ़ की तेज़ी थी। जिसने पूरा क्षैत्र हिला कर रख दिया। मुसलमानों के लिए तसल्ली और इस कठिन समय में की जाने वाली प्रार्थनाऐं हैं जो इस आठ वर्ष के क़ुरआन का मुख्य भाग रहीं। इस हिंसात्मक प्रकरण से स्पष्ट होता है कि मानवीय रचनाधर्मिता एवं भावनाओं का प्रभाव इस ग्रंथ की रचना में रहा।
मक्की दौर के तेरह वर्ष बाद मदीने में मुसलमानों को एक केन्द्र प्राप्त हो गया। जहाँ सारे ईमान लाने वालों को एकत्रित कर तीसरे दौर का अवतीर्ण शुरू हुआ। यहाँ मुसलमानों का दो नए प्रकार के लोगों से परिचय हुआ। प्रथम यहूदी जो यहाँ सदियों से आबाद थे और अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार अंतिम नबी (सल्ल.) की प्रतिक्षा कर रहे थे। किन्तु अंतिम नबी (सल्ल.) को उन्होंने अपने अतिरिक्त दूसरी क़ौम में देखा तो उत्पात मचा दिया। क़ुरआन में इस दौर में अहले किताब (ईश्वरीय ग्रंथों को मानने वाले विषेश कर यहूदी तथा ईसाई) पर क़ुरआन में सख्त टिप्पणियाँ की गईं। इसी युग में कुटाचारियों (मुनाफिक़ों) का एक गुट मुसलमानों में पैदा हो गया जो मुसलमान होने का नाटक करते और विरोधियों से मिले रहत
यहीं मुसलमानों को सशस्त्र संघर्ष की आज्ञा मिली और उन्हें निरंतर मक्का वासियों के हमलों का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर एक इस्लामी राज्य की स्थापना के साथ पूरे समाज की रचना के लिए ईश्वरीय नियम अवतरित हुए। युध्द, शांति, न्याय, समाजिक रीति रिवाज, खान पान सबके बारे में ईश्वर के आदेश इस युग के क़ुरआन की विशेषता हैं। जिनके आधार पर समाजिक बराबरी का एक आदर्श राज्य अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने खड़ा कर दिया। जिसके आधार पर आज सदियों बाद भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का क्रम विश्व नायकों में प्रथम माना जाता है। उन्होंने जीवन के हर क्षैत्र में ज़बानी निर्देश नहीं दिए, बल्कि उस पर अमल करके दिखाया।
इस पृष्ठ भूमि के कारण ही क़ुरआन में कई बार एक ही बात को बार बार दोहराया जाना लगता है। एकेश्वरवाद, धार्मिक आदेश, स्वर्ग, नरक, सब्र (धैर्य), धर्म परायणता (तक्वा) के विषय हैं जो बार बार दोहराए गए।
क़ुरआन ने एक सीधे साधे, नेक व्यापारी इंसान को, जो अपने परिवार में एक भरपूर जीवन गुज़ार रहा था। विश्व की दो महान शक्तियों (रोमन तथा ईरानी साम्राज्य) के समक्ष खड़ा कर दिया। केवल यही नहीं उसने रेगिस्तान के अनपढ़ लोगों को ऐसा सभ्य बना दिया कि पूरे विश्व पर इस सभ्यता की छाप से सैकड़ों वर्षों बाद भी पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। क़ुरआन ने युध्द, शांति, राज्य संचालन इबादत, परिवार के वे आदर्श प्रस्तुत किए जिसका मानव समाज में आज प्रभाव है।
== कुरआन पर शोध ==
कुछ वर्षों पूर्व अरबों के एक गुट ने भ्रुण शास्त्र से संबंधिक क़ुरआन की आयतें एकत्रित कर उन्हे इंग्लिश में अनुवाद कर, प्रो. [[कीथ एल० मूर]] के समक्ष प्रस्तुत की जो भ्रूण शास्त्र (embryology) के प्रोफेसर और टोरंटो विश्वविद्यालय (कनाडा) के विभागाध्यक्ष हैं। इस समय विश्व में भ्रूण शास्त्र के सर्वोच्च ज्ञाता माने जाते हैं।
उनसे कहा गया कि वे क़ुरआन में भ्रूण शास्त्र से संबंधित आयतों पर अपने विचार प्रस्तुत करें। उन्होंने उनका अध्ययन करने के पश्चात कहा कि भ्रूण शास्त्र के संबंध में क़ुरआन में वर्णन ठीक आधुनिक खोज़ों के अनुरूप हैं। कुछ आयतों के बारे में उन्होंने कहा कि वे इसे ग़लत या सही नहीं कह सकते क्यों कि वे खुद इस बात में अनभिज्ञ हैं। इसमें सबसे पहले नाज़िल की गई क़ुरआन की वह अयात भी शामिल थी जिसका अनुवाद है।
अपने परवरदिगार का नाम ले कर पढ़ो, जिसने (दुनिया को) सृजन किया। जिसने इंसान को खून की फुटकी से बनाया।
इसमें अरबी भाषा में एक शब्द का उपयोग किया गया है अलक़ इस का एक अर्थ होता खून की फुटकी (जमा हुआ रक्त) और दूसरा अर्थ होता है जोंक जैसा।
डॉ. मूर को उस समय तक यह ज्ञात नहीं था कि क्या माता के गर्भ में आरंभ में भ्रूण की सूरत जोंक की तरह होती है। उन्होंने अपने प्रयोग इस बारे में किए और अध्ययन के पश्चात कहा कि माता के गर्भ में आरंभ में भ्रूण जोंक की आकृति में ही होता है। डॉ कीथ मूर ने भ्रूण शास्त्र के संबंध में 80 प्रश्नों के उत्तर दिए जो क़ुरआन और हदीस में वर्णित हैं।
उन्ही के शब्दों में, ''यदि 30 वर्ष पूर्व मुझसे यह प्रश्न पूछे जाते तो मैं इनमें आधे भी उत्तर नहीं दे पाता। क्यों कि तब तक विज्ञान ने इस क्षैत्र में इतनी प्रगति नहीं की थी।''
1981 में सऊदी मेडिकल कांफ्रेंस में डॉ. मूर ने घोषणा की कि उन्हें क़ुरआन की भ्रूण शास्त्र की इन आयतों को देख कर विश्वास हो गया है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ईश्वर के पैग़म्बर थे। क्यों कि सदियों पूर्व जब विज्ञान खुद भ्रूण अवस्था में हो इतनी सटीक बातें केवल ईश्वर ही कह सकता है।
डॉ. मूर ने अपनी किताब के 1982 के संस्करण में सभी बातों को शामिल किया है जो कई भाषाओं में उपलब्ध है और प्रथम वर्ष के चिकित्साशास्त्र के विद्यार्थियों को पढ़ाई जाती है। इस किताब (The developing human) को किसी एक व्यक्ति द्वारा चिकित्सा शास्त्र के क्षैत्र में लिखी किताब का अवार्ड भी मिल चुका है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिन्हे क़ुरआन की इस टीका में आप निरंतर पढ़ेंगे।
मत भिन्नता एक एतराज़ किया जाता है कि जब क़ुरआन इतनी सिध्द किताब है तो उसकी टीका में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से अब तक विद्वानों में मत भिन्नता क्यों है।
यहां इतना कहना काफी होगा कि पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने अनुयायियों में सेहतमंद विभेद को बढ़ावा दिया किन्तु मतभिन्नता के आधार पर कट्टरपन और गुटबंदी को आपने पसंद नहीं किया। सेहतमंद मतभिन्नता समाज की प्रगति में सदैव सहायक होती है और गुटबंदी सदैव नुक़सान पहुंचाती है।
इसलिए इस्लामी विद्वानों की मतभिन्नता भी क़ुरआन हदीस में कार्य करने और आदर्श समाज की रचना में सहायक हुई है किन्तु नुक़सान इस मतभिन्नता को कट्टर रूप में विकसित कर गुटबंदी के कारण हुआ है।
शाब्दिक वह्य क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) पर अवतरित हुआ वह ईश्वरीय शब्दों में था। यह वह्य शाब्दिक है, अर्थ के रूप में नहीं। यह बात इसलिए स्पष्ठ करना पड़ी कि ईसाई शिक्षण संस्थाओं में यह शिक्षा दी जाती है कि वह्य ईश्वरीय शब्दों में नहीं होती बल्कि नबी के हृदय पर उसका अर्थ आता है जो वह अपने शब्दों में वर्णित कर देता है। ईसाईयों के लिए यह विश्वास इसलिए ज़रूरी है कि बाईबिल में जो बदलाव उन्होंने किए हैं, उसे वे इसी प्रकार सत्य बता सकते थे। पूरा ईसाई और यहुदी विश्व सदियों से यह प्रयास कर रहा है कि किसी प्रकार यह सिध्द कर दे कि क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के शब्द हैं और उनकी रचना है। इस बारे में कई किताबें लिखी गई और कई तरीक़ों से यह सिध्द करने के प्रयास किए गए किन्तु अभी तक किसी को यह सफलता नहीं मिल सकी।
डॉ. डेनियल ब्रुबेकर ने सबसे पुराने कुरान के ग्रंथों पर किए गए परिवर्तनों, सुधारों और परिवर्धन (स्वर और विराम चिह्नों जैसे शब्दों के मामूली पढ़ने के अंतर से परे) के बारे में इंटरनेट पर एक वीडियो श्रृंखला ("वैरिएंट क़ुरआन" नाम से) प्रकाशित की।<ref>https://www.danielbrubaker.com/daniel-brubaker-quran-and-islam/</ref>
== कुरआन की आलोचना ==
{{मुख्य|क़ुरआन की आलोचना}}
== इन्हें भी देखें ==
*[[हदीस]]
*[[आयत (क़ुरआन)|आयत]]
*[[सूरा]]
*[[इस्लाम के पैग़म्बर|इस्लाम के नबी]]
* [[सूरा|क़ुरआन में सूरह की सूची]]
* [[इस्लामी पवित्र ग्रन्थ]]
* [[कुरान में महिलाओं का ज़िक्र]]
* [[कुरान और चमत्कार]]
* [[क़ुरान की तफ़सीर]]
* [[डिजिटल क़ुरआन]]
* [[बांग्ला भाषा में कुरआन का अनुवाद]]
* [[क़ुरआन के हिंदी अनुवाद]]
* [[कुरान की आलोचना]]
* [[द जर्नल ऑफ क़ुरआनिक स्टडीज़]]
* [[क़ुरआन का एकीकृत विश्वकोश ]]
* [[क़ुरआन कोड]]
==सन्दर्भ==
{{सन्दर्भ}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{Sister project links}}
* [https://www.aquran.com/ क़ुरआन हिंदी में ऑनलाइन पढ़ें]]
* [http://hi.quranacademy.org/quran/1 Quran Word by Word] // QuranAcademy.org
* [https://web.archive.org/web/20090129090725/http://al-quran.info/ Al-Quran] कुरान ऑनलाइन पढ़िए (हिन्दी 'Abubakar Mahmoud Gumi') - 35 भाषाओं (हिंदी स्मिथ और स्मिथ सहित) में 140 से अधिक अनुवाद
* [https://web.archive.org/web/20091216025332/http://www.zikr.co.uk/books/Quran.html कुरान शरीफ़ ऑनलाइन पढ़िए: संवादात्मक अरबी कुरान]
* [https://web.archive.org/web/20180425183153/http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/112:2 कुरआन का सरल हिन्दी अनुवाद ]
* [[iarchive:1.2_20211230_202112/page/n17/mode/2up|कुरआन मजीद की इन्साइक्लोपीडिया]] हिंदी पीडीऍफ़
* [https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html क़ुरआन के अनुवाद 93 भाषाओं में ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200730204334/https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html |date=30 जुलाई 2020 }}
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'''कज़ाख़स्तान''' अथवा '''कज़ाख़िस्तान''' ({{Langx|kk|Қазақстан}}, {{Langx|ru|Казахстан}}, {{Langx|en|Kazakhstan}}) [[यूरेशिया]] में स्थित एक [[देश]] है। क्षेत्रफल के आधार से ये दुनिया का नवाँ सबसे बड़ा देश है। एशिया में एक बड़े भूभाग में फैला हुआ यह देश पहले [[सोवियत संघ]] का हिस्सा हुआ करता था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के उपरांत इसने सबसे अंत में अपने आपको स्वतंत्र घोषित किया। सोवियत प्रशासन के दौरान यहाँ कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ संपन्न हुईं, जिसमें कई रॉकेटों का प्रक्षेपण से लेकर क्रुश्चेव का वर्ज़िन भूमि परियोजना शामिल हैं। देश की अधिकाँश भूमि [[स्तॅपी|स्तेपी]] घास मैदान, जंगल तथा पहाड़ी क्षेत्रों से ढकी है।
यहाँ के मुख्य निवासी [[कज़ाख़ लोग]] हैं जो [[तुर्क]] मूल के हैं। अपने इतिहास के अधिकांश हिस्से में कज़ाख़स्तान की भूमि यायावर जातियों के साम्राज्य का हिस्सा रही है। इसकी राजधानी सन १९९८ में अस्ताना को बनाई गई जो सोवियत कालीन राजधानी [[अलमाती|अल्माती]] से बदलकर बनाई गई थी। यहां की [[कज़ाख़ भाषा]] और [[रूसी भाषा]] मुख्य- और राजभाषाएँ हैं। देश को [[रूसीकरण]] से बहुत नुकसान हुआ।
== भूगोल ==
कज़ाख़स्तान का अधिकांश भूभाग (जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है) [[स्तॅपी|स्तेपी]], पहाड़, जंगल या मरुस्थलों से ढका है। मरुस्थल तो पड़ोसी [[तुर्कमेनिस्तान]] तथा [[उज़्बेकिस्तान|उज्बेकिस्तान]] तक फैले हैं। दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में कैस्पियन सागर स्थित है, जबकि अरलसागर की सीमा उज्बेकिस्तान के साथ सम्मिलित है। देश के मध्य में स्थित [[बाल्काश झील|बलख़श झील]] विशालकाय झीलों में से एक है। उत्तरी तिएन शान क्षेत्र की कोलसाई झीलें पर्वतीय झीलों की श्रेणी में आती हैं।
यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा क्षेत्रों में अक्सू-ज़बागली, अलमाटी, बरसा-केल्मेस, बयान-आउल, मारकोकल उस्तिर्त तथा पश्चिमी अल्ताई के नाम प्रमुखता से गिनाए जाते हैं। [[संयुक्त राष्ट्र|संयुक्त राष्ट्र संघ]] की विश्व धरोहरों में स्टेपी क्षेत्र सर्यरका का नाम 2008 में शामिल हुआ है। नम क्षेत्रों में गुलाबी फ्लेमिंगो, साइबेरियाई व्हाइट क्रेन, डलमाटियन पेलिकन तथा पलाशी फिश ईगल जैसी पक्षियाँ पाई जाती हैं।
कज़ाकिस्तान दुनिया का नौवां सबसे बड़ा देश है, क्षेत्र में 2.7 मिलियन वर्ग किलोमीटर (1.05 मिलियन वर्ग मील) पर है। उस क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई सूखा मैदान है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में घास के मैदान या रेतीले रेगिस्तान हैं।
उत्तर में [[रूस]] पर कज़ाखस्तान सीमाएं, पूर्व में [[चीन]], और [[किर्गिज़स्तान|किर्गिस्तान]], [[उज़्बेकिस्तान|उजबेकिस्तान]] और [[तुर्कमेनिस्तान]] दक्षिण में सीमाएं हैं। यह पश्चिम में [[कैस्पियन सागर]] पर सीमा भी है।
कजाकिस्तान में सबसे ऊंचा बिंदु खान तांगिरी शिनजी है, जो 6,995 मीटर (22, 9 4 9 फीट) पर है। निम्नतम बिंदु वपदीना कुंडा है, समुद्र तल से 132 मीटर (-433 फीट) पर।
==जलवायु==
कज़ाखस्तान में शुष्क महाद्वीपीय जलवायु है, जिसका अर्थ है कि सर्दी काफी ठंडी होती है और गर्मी गर्म होती है। सर्दियों में कम -20 डिग्री सेल्सियस (-4 डिग्री फारेनहाइट) हिट हो सकता है और बर्फ आम है।
ग्रीष्मकालीन ऊंचे 30 डिग्री सेल्सियस (86 डिग्री फ़ारेनहाइट) तक पहुंच सकते हैं, जो पड़ोसी देशों की तुलना में काफी हल्का है।
==जनसंख्या==
कज़ाख़स्तान की जनसंख्या 2019 में 18.5 मिलियन है। अधिकांश कज़ाख नागरिक शहरी क्षेत्रों में रहते हैं।
कज़ाख़स्तान में सबसे बड़ा जातीय समूह कजाख है, जो आबादी का 63.1% बनाते हैं। अगला रूसी हैं, 23.7% पर। छोटे अल्पसंख्यकों में उज्बेक्स (2.8%), यूक्रेनियन (2.1%), उइघुर (1.4%), तातार (1.3%), जर्मन (1.1%), और बेलारूसियों, एजेरिस, पोल्स, लिथुआनियाई, कोरियाई, कुर्द, चेचनसंद तुर्क की छोटी आबादी।
==अर्थव्यवस्था==
कजाकिस्तान की प्रति व्यक्ति जीडीपी $ 12,800 यूएस है। बेरोजगारी केवल 5.5% है, और आबादी का 8.2% गरीबी रेखा से नीचे रहता है।
कजाखस्तान पेट्रोलियम उत्पादों, धातुओं, रसायन, अनाज, ऊन, और मांस निर्यात करता है। यह मशीनरी और भोजन आयात करता है।
कज़ाकिस्तान की मुद्रा को डॉलर में परिवर्तित किया जाये तो मई, 2011 तक, 1 अमरीकी डालर = 145.7 टेंगे थे।
== धरोहर ==
तरज़, यास्ये (तुर्किस्तान) तथा ओटरार सरसब्ज़ (जलस्थल) को रेशम मार्ग के महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थलों में गिना जाता है। ओटरार प्रथम शती से चीन और यूरोप के व्यापार में महत्वपूर्ण रहा है। इसके अलावे ओटरार में चौदहवीं सदी में निर्मित मस्ज़िद भी बहुत प्रसिद्ध है।.
== जनवृत्त ==
वर्ष 2019 की जनगणना के मुताबिक देश की जनसंख्या 1,85,51,427 थी।
=== भाषा ===
[[कज़ाख़ भाषा|क़ज़ाख़ भाषा]] राजभाषा है। [[रूसी भाषा]] को आधिकारिक दर्ज़ा प्राप्त है जो कि तुर्क भाषा है, जो 64.5% आबादी है। रूसी व्यवसाय की आधिकारिक भाषा है।
=== धर्म ===
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कज़ाकिस्तान के नागरिक का सत्तर प्रतिशत मुस्लिम, ज्यादातर सुन्नी हैं। ईसाई 26.6% आबादी बनाते हैं, ज्यादातर रूसी रूढ़िवादी, कैथोलिकों की छोटी संख्या और विभिन्न प्रोटेस्टेंट संप्रदायों के साथ।
बौद्धों, यहूदियों, हिंदुओं, मॉर्मन और बहाई की छोटी संख्या भी हैं।
== खानपान ==
क़ज़ाख़ खानों में ब्रेड (पावरोटी), सूप तथा सब्जियों का प्रमुख स्थान है। नूडल्स अक्सर मांस के सॉसेज खाए जाते हैं। खाने में मांस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बकरे तथा गाय के मांस के अलावे मछली को बनाने के कई तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। पिलाव (या पुलाव) खट्टा तथा मीठा दोनों स्वाद में मांस के साथ खाया जाता है। इसके अलावा सूखे फलों का भी इस्तेमाल किया जाता है। दूध तथा दही जैसे व्यंजन भी खाए जाते हैं। पीने में चाय बहुत लोकप्रिय है। भारत की तरह ही लोग चाय में दूध या नींबू मिलाते हैं। पत्तियों वाली चाय बिना चीनी और दूध के भी पसंद की जाती है। स्थानीय शराब 'वोदका' भी लोकप्रिय है।
== विभाग ==
कज़ाख़स्तान में [[क़ज़ाख़स्तान के प्रांत|कुल १४ प्रांत]] हैं। इनके विवरण इस प्रकार हैं :
# [[अकमोला प्रांत|अकमोला]]
# [[अकतोबे प्रांत|अकतोबे]]
# [[अलमाती प्रांत|अलमाती]]
# [[नूर-सुल्तान|अस्ताना]]
# [[अतिरऊ प्रांत|अतिरऊ]]
# [[बायकोनूर|बैकोनुर]]
# [[पूर्व क़ज़ाख़स्तान प्रांत|पूर्व कज़ाख़स्तान]]
# [[काराग़ान्दी प्रांत|काराग़ान्दी]]
# [[कोस्तानय प्रांत|कोस्तानय]]
# [[किज़िलओरदा प्रांत|किज़िलओरदा]]
# [[मान्गीस्तऊ प्रांत|मान्गीस्तऊ]]
# [[उत्तर क़ज़ाख़स्तान प्रांत|उत्तर कज़ाख़स्तान]]
# [[पाव्लोदार प्रांत|पाव्लोदार]]
# [[दक्षिण क़ज़ाख़स्तान प्रांत|दक्षिण कज़ाख़स्तान]]
# [[पश्चिम क़ज़ाख़स्तान प्रांत|पश्चिम कज़ाख़स्तान]]
# [[झ़ामबिल प्रांत|झ़ामबिल]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[क़ज़ाख़स्तान के प्रांत]]
* [[कज़ाख़ भाषा]]
* [[कज़ाख़ लोग]]
==सन्दर्भ==
{{सन्दर्भ}}
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Sister project links|Kazakhstan|voy=Kazakhstan}}
* [https://web.archive.org/web/20160101051159/https://repository.library.georgetown.edu/handle/10822/552643 Caspian Pipeline Controversy] from the [https://web.archive.org/web/20160115205405/https://repository.library.georgetown.edu/handle/10822/552494 Dean Peter Krogh Foreign Affairs Digital Archives]
* [https://web.archive.org/web/20170601223919/http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/country_profiles/1298071.stm कंट्री प्रोफाइल] बी.बी.सी। न्यूज़.
* {{CIA World Factbook link|kz|Kazakhstan}}
* [https://web.archive.org/web/20110918163017/http://www.state.gov/p/sca/ci/kz/ Kazakhstan] information from the [[United States Department of State]]
* [https://web.archive.org/web/20100309085822/http://www.loc.gov/rr/international/amed/kazakhstan/kazakhstan.html Portals to the World] from the United States [[Library of Congress]].
{{स्वतंत्र देशों का राष्ट्रकुल}}
{{एशिया}}
{{यूरोप}}
[[श्रेणी:क़ाज़ाक़्स्तान|कज़ाख़िस्तान]]
[[श्रेणी:एशिया के देश|कज़ाख़िस्तान]]
[[श्रेणी:यूरोप के देश|कज़ाख़िस्तान]]
[[श्रेणी:स्थलरुद्ध देश]]
[[श्रेणी:यूरेशियाई
कजाकिस्तान की नई राजधानी अस्थाना है
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अम्बेडकर नगर ज़िला
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{{Infobox settlement
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}}
'''आम्बेडकर नगर''' [[भारत]] के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक ज़िला है। यह [[अवध]] क्षेत्र में आता है। ज़िले का मुख्यालय [[अकबरपुर, अम्बेडकर नगर|अकबरपुर]] है। इस ज़िले की स्थापना 29 सितंबर 1995 को हुई थी। इसका निर्माण तत्कालीन मुख्यमंत्री [[मायावती]] ने किया था और इसका नाम [[भीमराव आम्बेडकर]] की याद में रखा गया था, जिन्होंने वंचित वर्गों, महिलाओं और समाज के अन्य कमज़ोर वर्गों की उन्नति के लिए काम किया था। आम्बेडकर नगर में मुख्य बोली जाने वाली भाषाएँ [[हिन्दी]] और [[अवधी]] हैं। आम्बेडकर नगर ज़िले का कुल क्षेत्रफल 2350 वर्ग किलोमीटर है।<ref>"[https://books.google.com/books?id=qzUqk7TWF4wC Uttar Pradesh in Statistics]," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716</ref><ref>"[https://books.google.com/books?id=S46rbUL6GrMC Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170423083533/https://books.google.com/books?id=S46rbUL6GrMC|date=23 अप्रैल 2017}}," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975</ref>
== स्थापना व नामकरण ==
यह ज़िला उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमन्त्री [[मायावती]] के द्वारा २९ सितम्बर १९९५ को बनाया गया था। इसका नाम भारतीय संविधान निर्मात्री सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. [[भीमराव आम्बेडकर]] के नाम पर रखा गया है।
== भूगोल ==
ज़िले का कुल क्षेत्रफल २३५० वर्ग किमी है। लगभग ९०% जनसंख्या गाँव में रहती है। ओएमएमएस आंकड़ों के अनुसार आम्बेडकर नगर ज़िले में ३९५५ गाँव हैं। इन छोटे गाँवों के अलग-थलग होने की वजह से ज़िला दस प्रशासकीय ब्लॉकों में विभाजित है: अकबरपुर, बेवाना, बसखारी, भीटी, भियाँव, जहाँगीरगंज, जलालपुर, कटेहरी, रामनगर और [[टाण्डा]]।
अकबरपुर शहर, तमसा नदी के किनारे बसा है जो शहर को दो भागों अकबरपुर और शहज़ादपुर में विभक्त करती है, जो शहर के मुख्य वाणिज्यिक केंद्र हैं। सरयू नदी मुख्य नदी है और ज़िले के उत्तरी सीमा पर स्थित है। टाण्डा, जहाँगीरगंज, रामनगर और बसखारी के ब्लॉक इस नदी के किनारे स्थित हैं और सिंचाई के लिए इसका पानी का उपयोग करते हैं। बसखारी ब्लॉक में सिंचाई देवहट और हँसवर झील से भी होती है। झील दरवन, टाण्डा और कटेहरी ब्लॉक में पानी उपलब्ध कराता है। अकबरपुर, भीटी, भियाँव और जलालपुर ब्लॉक छोटी नदियों और मौसमी नदियों पर निर्भर करते हैं।
अकबरपुर, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के आम्बेडकर नगर ज़िले का मुख्यालय है।
===तहसील सूची===
* [[अकबरपुर (तहसील), अम्बेडकर नगर|अकबरपुर (तहसील)]]
== प्रशासनिक विभाग ==
आम्बेडकर नगर ज़िले का मण्डल अयोध्या है, जिसकी 5 तहसीलें अकबरपुर, टाण्डा, जलालपुर, आलापुर और भीटी हैं।
इस ज़िले में 5 विधानसभा क्षेत्र हैं:
# कटेहरी
# भीटी
# अकबरपुर
# जलालपुर
# आलापुर (अनुसूचित)
# टाण्डा
== अर्थव्यवस्था ==
आम्बेडकर नगर टाण्डा टेरीकाट के लिए विख्यात है। खेती और बिजली के करघे का इस्तेमाल लोगों की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में शुमार है। ज़िले में एनटीपीसी से संबंधित एक थर्मल पावर स्टेशन तथा जेपी ग्रूप से संबंधित एक सीमेंट निर्माण संयंत्र भी है। ज़िले में एक चीनी कारखाने अकबरपुर चीनी मिल, जो ज़िला मुख्यालय से सोलह किलोमीटर की दूरी पर, मिझौड़ा में स्थित है। अकबरपुर में कई चावल मिलें मौजूद हैं। 2006 में पंचायती राज देश के 250 सबसे पिछड़े ज़िलों (बाहर के एक कुल 640) के नाम आम्बेडकर नगर एक मंत्रालय [2] यह उत्तर प्रदेश में 34 जिलों में वर्तमान में पिछड़ा क्षेत्र से धन प्राप्त अनुदान निधि कार्यक्रम में से एक हैं। (बीआरजीएफ़) [2].
== शिक्षा ==
आम्बेडकर नगर में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी शिक्षण संस्थान है, जो ज़िले में स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शिक्षण कार्य कराते हैं।
== प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थान ==
* मान्यवर कांशीराम राजकीय इंजिनियरिंग कॉलिज (उत्तर प्रदेश के 10 सरकारी इंजिनियरिंग कॉलिजों में से एक), अकबरपुर
*[[महामाया राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कालेज|महामाया राजकीय ऐलोपैथिक मेडिकल कॉलिज]]
*शाहूजी महाराज राजकीय पॉलीटेक्नीक काॅलिज, शिवबाबा, आम्बेडकर नगर
*राजकीय पॉलीटेक्नीक काॅलिज, बैजपुर, भीटी
*राजकीय कृषि इंजिनियरिंग काॅलिज, अकबरपुर
*पं. रामलखन शुक्ल राजकीय पीजी काॅलिज, आलापुर
*चित बहाल आदर्श बालिका इन्टर कालेज, पूरनपुर, आम्बेडकर नगर
*सी. आर. इंटर कॉलिज, पांती, मंसापुर, आम्बेडकर नगर
*नरेन्द्र देव इंटर काॅलिज, जलालपुर
== पर्यटन ==
# श्रवण क्षेत्र में एक वार्षिक मेले में माघ पूर्णिमा (फ़रवरी पूर्ण चंद्रमा) पर आयोजित किया जाता है। किंवदंती है कि श्रवण कुमार, राजा दशरथ के द्वारा श्रवण क्षेत्र में मारा गया। महादेव मंदिर बीड़ी ग्राम, रामपुर सकरवारी है जो मालीपुर रेलवे स्टेशन से दोस्तपुर रोड पर 7 किमी दूर स्थित है। आस्था भक्ति की जगह झालखण्ड (पीपल के पेड़ से स्वयंभूत शिवलिङ) मालीपुर रेलवेस्टेशन के दक्षिण, राम जानकी मंदिर धवरूआ तिराहा (प्राचीन पोखरा) जलालपुर-सुल्तानपुर रोड पर मालीपुर से 5 किमी दक्षिण, तथा लोरपुर अपने किले के लिए जाना जाता हैं। हनुमान मंदिर, कटहरी से अनिरुद्ध नगर, बेनीपुर गाँव, अकबरपुर से 18 किलोमीटर पश्चिम और 10 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। गोविन्द साहब बाबा आज़मगढ़–आम्बेडकर नगर राष्ट्रीय मार्ग टोल टैक्स से 500 मीटर पहले दक्षिण 2 किलोमीटर पर गोविन्द साहब बाबा का स्थान स्थित है।
8. अकबरपुर मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूर फ़ैज़ाबाद–गोसाईगंज सड़क मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध "शिव बाबा धाम" है, जो वह अपने आप में एक अलौकिक पर्यटक स्थल है। वहाँ पर हर सप्ताह सोमवार और शुक्रवार को भव्य मेला लगता है, जो एक अपने आप में भव्यता का स्वरूप देता है।
जहाँगीरगंज के पास स्थित भुजाहिया माई मंदिर भी एक धार्मिक स्थल है। कटघर नरियाँव में स्थित बुढ़ऊ बाबा धाम भी एक रमणीक स्थल है।
== जनसंख्या ==
2011 में, आम्बेडकर नगर की जनसंख्या 2,397,888 थी, जिसमें पुरुष और महिलाएँ क्रमशः 1,212,410 और 1,185,478 थीं। 2024 में आम्बेडकर नगर ज़िले की अनुमानित जनसंख्या 2,860,000 है |<ref>{{Cite web|url=https://www.census2011.co.in/census/district/549-ambedkar-nagar.html|title=Ambedkar Nagar District Population Census 2011 - 2021 - 2024, Uttar Pradesh literacy sex ratio and density|website=www.census2011.co.in|access-date=2024-10-25}}</ref>
==नगर पालिका/नगर पंचायत==
*[[अकबरपुर]]
*[[जलालपुर]]
*[[टान्डा|टाण्डा]]
*अशरफ़पुर किछौछा
*इल्तिफ़ातगंज
*राजेसुल्तानपुर
*जहाँगीरगंज
==विकास खण्ड==
*[[अकबरपुर]]
*कटेहरी
*जहाँगीरगंज
*[[जलालपुर]]
*[[टाण्डा]]
*बसखारी
*भियांव
*भीटी
*रामनगर
== उल्लेखनीय व्यक्तित्व ==
* शहज़ादपुर, अकबरपुर ज़िला मुख्यालय पर भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी और राजनीतिक नेता [[राममनोहर लोहिया|डॉ॰ राम मनोहर लोहिया]] (23 मार्च 1910 को जन्म) का जन्मस्थान है।
*[[अरूणिमा सिन्हा]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[अकबरपुर, अम्बेडकर नगर|अकबरपुर, आम्बेडकर नगर]]
* [[उत्तर प्रदेश]]
* [[उत्तर प्रदेश के ज़िले]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
{{उत्तर प्रदेश के मंडल और जिले}}
[[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के जिले]]
[[श्रेणी:अम्बेडकर नगर ज़िला|*]]
[[श्रेणी:भीमराव आम्बेडकर के नाम पर चीजें]]
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सच्चिदानंद राउतराय
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'''सच्चिदानंद राउतराय''' एक [[ओड़िया भाषा|उड़िया]] साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक [[कविता–संग्रह]] ''[[कविता–1962 ]]'' के लिये उन्हें सन् १९६३ में [[साहित्य अकादमी पुरस्कार]] ([[साहित्य अकादमी पुरस्कार ओड़िया|ओड़िया]]) से सम्मानित किया गया।<ref name="sahitya">{{cite web | url=http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | title=अकादमी पुरस्कार | publisher=साहित्य अकादमी | accessdate=11 सितंबर 2016 | archive-url=https://web.archive.org/web/20160915135020/http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | archive-date=15 सितंबर 2016 | url-status=dead }}</ref> इन्हें १९८६ में [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] से सम्मानित किया गया था। स्वाधीनता-संग्राम सहित अनेक आन्दोलनों में भाग लेने के कारण कई बार जेल-यात्रा। स्नातक करने के उपरान्त बीस वर्ष [[कोलकाता]] में नौकरी और फिर [[कटक]]-वास।
== व्यक्तिगत जीवन ==
राउतराय का जन्म 13 मई 1916 को [[ओडिशा|उड़ीसा]] स्थित खुर्दा पास गुरुगंज में हुआ था। उनकी परवरिश और [[शिक्षा]]-दीक्षा तत्कालीन बंगाल (वर्तमान में [[पश्चिम बंगाल]]) में हुयी। उन्होने गोलापल्ली के शाही परिवार की [[तेलुगू भाषा|तेलुगू]] राजकुमारी से शादी की। उन्होने अपनी पहली [[काव्य|कविता]] स्कूली छात्र के रूप में लिखी थी। 12 वर्ष की आयु से लेखन में प्रवृत्त सची राउतराय का 1932 में मात्र 16 वर्ष की आयु में पहला कविता संग्रह 'पाथेय' प्रकाशित हुआ। राउतराय की प्रसिद्धि 1939 में प्रकाशित उनकी लंबी कविता "बाजी राउत" के प्रकाशन से हुयी। इस कविता में एक 12 वर्षीय नाविक बालक की शहादत का वर्णन है, जो ब्रिटिश शासन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया था। यह पुस्तक एक लघु महाकाव्य के रूप में प्रख्यात हुई तथा उड़ीसा के नव युवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। 1942 में हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने बाजी राउत तथा कुछ अन्य कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जिससे राउत राय को उड़ीसा से बाहर भी ख्याति मिली। राउत राय को साहित्य के शिखर पर ले जानेवाला एक अन्य कविता संग्रह पल्लीश्री (1942) था, जिसमें उड़ीसा के ग्रामीण जीवन एवं समाज से संबंधित कवितायें हैं।<ref>भारत ज्ञानकोश, खंड-5, पृष्ठ संख्या-52, प्रकाशक- पोप्युलर प्रकाशन मुंबई, आई एस बी एन 81-7154-993-4</ref>
ग्रामी सादगी और ग्राम्य जीवन के काव्यात्मक आनंद को अभिव्यक्ति देने वाली श्रेष्ठ रचनाओं में आज भी इन कविताओं की गिनती की जाती है। पाण्डुलिपि और अभिजान जैसे अन्य काव्य संग्रहों के प्रकाशन के साथ राउत राय [[ओडिशा|उड़ीसा]] में आधुनिक और प्रगतिशील रचनाकारों में अग्रणी बन गए।
== कार्यक्षेत्र ==
आधुनिक उड़िया कविता के भगीरथ के रूप में प्रख्यात ये कथा-शिल्पी, नाट्यकार एवं साहित्य-मनीषी की हैसियत से भी भारतीय साहित्यकारों में अग्रगण्य माने जाते हैं। कथा-शिल्पी और साहित्य-चिंतक होने के साथ ही साहित्य के क्षेत्र में इन्होने अनेक नए प्रयोग किए और फ्रायड तथा युंग के मनोविश्लेषण का [[ओड़िया भाषा|उड़िया]] [[साहित्य]]-जगत में प्रवेश कराया। 1935 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'चित्रग्रीव' अ-उपन्यास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। स्मरणीय है कि विश्वसाहित्य में ऐण्टी नॉवल का आन्दोलन बाद में शुरू हुआ था। जनकवि सची राउतराय ने अपनी कहानियों के लिए भी विषय और पात्र जनजीवन से ही उठाये हैं। उनकी अधिकतर कहानियाँ श्रमिक, कृषक तथा अन्य पिछड़े वर्गो के संघर्षों, अभावों और उत्पीड़नों के बारे में हैं जो समसामयिक जीवन की विद्रूपता और विकृतियों पर तीखा व्यंग्य करती हैं। उनका साहित्य एक क्षयी सामाजिक व्यवस्था के विरूद्ध मानव-अधिकारों का आक्रोशी घोषणा-पत्र है। वह मानव-गरिमा और भय-मुक्ति के मन्त्रदाता हैं। आपकी साहित्य-साधना का कार्यकाल 50 से अधिक वर्षो का है।<ref>{{Cite web |url=http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/s/sachchidanand_rautroy.htm |title=वेब पत्रिका अभिव्यक्ति, हमारे लेखक स्तंभ के अंतर्गत सची राउतराय का परिचय |access-date=30 अगस्त 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130527100029/http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/s/sachchidanand_rautroy.htm |archive-date=27 मई 2013 |url-status=dead }}</ref>
== उपलब्धि ==
राउत राय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि उन्होने आधुनिक [[ओड़िया भाषा|उड़िया]] [[काव्य|कविता]] को नया [[मुहावरा]] तथा नई संवेदना प्रदान की। उनकी कृति पाण्डुलिपि उस नव काव्य की अग्रदूत थी, जिसने [[ओड़िया भाषा|उड़िया]] [[काव्य|कविता]] को काव्य स्वातंत्रय, गद्य काव्य और बोलचाल की भाषा जैसे नए रूप प्रदान किए। इस [[पुस्तक]] की विद्वतापूर्ण भूमिका में उन्होने उडिया की नई [[काव्य|कविता]] का महत्वपूर्ण घोषणा पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होने कावयिक रीति के स्थान पर वाक रीति अपनाने की वकालत की है।
नए-नए काव्य रूपों में प्रयोग करने के साथ राउत राय ने अपनी कविता में विषयों की विविधता को भी अपनाया है। प्रारंभिक रचनाओं की रूमानी भावभूमि से निकलकर परवर्ती रचनाओं में उन्होने यथार्थवाद, समाजवाद, यहाँ तक कि मार्कस्वाद को भी स्थान दिया। वास्तव में यह प्रकृति उनकी प्रारम्भिक रचनाओं में भी परिलक्षित होती थी।
== कृतियां==
18 काव्य-संकलन, 4 कहानी-संग्रह, 1 उपन्यास, 1 काव्य-नाटक, साहित्य-समीक्षा की तीन पुस्तकें तथा साहित्यिक मूल्यों पर एक महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य प्रकाशित।
'''काव्य संग्रह'''
* पाथेय (1932)
*पूर्णिमा (1933)
*रक्त शिखा (1939)
*बाजी राऊत (132,42)
*अभिजान (1938)
*हांसत (1948)
*एशियार स्वप्न (1969)
'''कथा संग्रह'''
*मसानीर फूला (1947)
*माटीर ताज (1947)
*छई (1948)
चित्रग्रीवा (1935)
'''समालोचना'''
*साहित्य विचार और मूल्यबोध (1972)
*आधुनिक साहित्य (1983)
== सम्मान ==
*[[पद्म श्री|पद्मश्री]]
*[[साहित्य अकादमी पुरस्कार]]
*सोवियत लैंड पुरस्कार
*[[आन्ध्र विश्वविद्यालय]] एवं [[ब्रह्मपुर]] विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित।
*अध्यक्ष, उड़िसा साहित्य अकादमी; सदस्य, फिल्म सेन्सर बोर्ड।
*विभिन्न देशों में आयोजित साहित्य-संगोष्ठियों में प्रतिनिधित्व।
*उड़िया कला परिषद का संस्थापन
*वर्ष 1986 के [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] से सम्मानित।
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ==
*[https://web.archive.org/web/20130828204705/http://www.gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B8%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF#.UiA0MtL9uFk गद्यकोश में सच्चिदानंद राउतराय की रचना]
*[https://web.archive.org/web/20080915173248/http://www.webindia123.com/government/award/jnanpith.htm ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले साहित्यकारों की सूची]
*[https://web.archive.org/web/20070529142823/http://www.jnanpith.net/ ज्ञानपीठ का आधिकारिक जालस्थल]
{{ज्ञानपीठ पुरस्कार}}
[[श्रेणी:ज्ञानपीठ सम्मानित]]
[[श्रेणी:साहित्य अकादमी फ़ैलोशिप से सम्मानित]]
[[श्रेणी:साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत ओड़िया भाषा के साहित्यकार]]
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|notable_ideas = [[फ्रेडरिक एंगेल्स]] संग [[मार्क्सवाद]] का प्रतिपादन, [[अतिरिक्त मूल्य]], [[ऐतिहासिक भौतिकवाद]] |}}
{{पूंजीवाद साइडबार}}
'''कार्ल हेनरिख मार्क्स''' ([[जर्मन भाषा|जर्मन]]<nowiki/>- Karl Heinrich Marx ; 5 मई 1818 - 14 मार्च 1883) जर्मन [[दार्शनिक]], [[अर्थशास्त्री]], [[इतिहासकार]], [[राजनीतिक दर्शन|राजनीतिक सिद्धांतकार]], [[समाजशास्त्र|समाजशास्त्री]], [[पत्रकार]] [[राजनैतिक अर्थव्यवस्था|राजनीतिक अर्थव्यवस्था]] के [[आलोचनात्मक चिन्तन|आलोचक]], [[समाजवाद|समाजवादी क्रांतिकारी]] और [[वैज्ञानिक समाजवाद]] के प्रणेता थे।<ref>{{Cite journal|last=Wolff|first=Jonathan|last2=Leopold|first2=David|date=2003-08-26|title=Karl Marx|url=https://plato.stanford.edu/Entries/marx/}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.britannica.com/biography/Karl-Marx|title=Karl Marx {{!}} Books, Theory, Beliefs, Children, Communism, Sociology, Religion, & Facts {{!}} Britannica|website=www.britannica.com|language=en|access-date=2023-04-20}}</ref>उनके सबसे प्रसिद्ध शीर्षक 1848 के पैम्फलेट "[[कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र|द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो]]" और चार-खंड "[[दास कैपिटल|दास कपिटल]]" (1867-1883) हैं। मार्क्स के राजनीतिक और दार्शनिक विचारों का बाद के [[बौद्धिक इतिहास|बौद्धिक]], [[अर्थशास्त्र|आर्थिक]] और [[राजनीति विज्ञान|राजनीतिक इतिहास]] पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनका नाम एक विशेषण, एक संज्ञा और [[सामाजिक सिद्धांत]] के स्कूल के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
इनका जन्म 5 मई 1818 को [[जर्मनी]] के [[राइन नदी|राइन]] प्रांत के ट्रियर नगर में एक [[यहूदी]] परिवार में हुआ था। 1824 में इनके परिवार ने [[ईसाई धर्म]] स्वीकार कर लिया। 17 वर्ष की अवस्था में मार्क्स ने [[विधि|कानून]] का अध्ययन करने के लिए [[बॉन विश्वविद्यालय|बॉन विश्वविद्यालय जर्मनी]] में प्रवेश लिया। तत्पश्चात् उन्होंने [[बर्लिन]] और जेना विश्वविद्यालयों में [[साहित्य]], [[इतिहास]] और [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] का अध्ययन किया। इसी काल में वह [[हीगेल]] के दर्शन से बहुत प्रभावित हुए। 1839-41 में उन्होंने [[डेमी क्रिट्स|दिमॉक्रितस]] और [[एपिकुरुस|एपीक्यूरस]] के [[प्राकृतिक दर्शनशास्त्र|प्राकृतिक दर्शन]] पर [[शोध-प्रबन्ध|शोध-प्रबंध]] लिखकर [[डॉक्टरेट|डॉक्टरेट की उपाधि]] प्राप्त की। उन्होंने 1843 में जर्मन थिएटर समीक्षक और राजनीतिक कार्यकर्ता जेनी वॉन वेस्टफेलन से शादी की । अपने राजनीतिक प्रकाशनों के कारण, मार्क्स राज्यविहीन हो गए और दशकों तक [[लंदन]] में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ [[निर्वासन]] में रहे, जहाँ उन्होंने जर्मन दार्शनिक [[फ्रेडरिक एंगेल्स]] के साथ मिलकर अपने विचार विकसित करना जारी रखा और [[ब्रिटिश संग्रहालय|ब्रिटिश म्यूजियम रीडिंग रूम]] में शोध करते हुए उनके लेखन को प्रकाशित करते रहे ।
[[समाज]], [[अर्थशास्त्र]] और [[राजनीति]] के बारे में मार्क्स के [[समालोचनात्मक सिद्धांत|आलोचनात्मक सिद्धांत]] , जिन्हें सामूहिक रूप से [[मार्क्सवाद]] के रूप में समझा जाता है , मानते हैं कि मानव समाज [[वर्ग संघर्ष]] के माध्यम से विकसित होते हैं । [[उत्पादन का पूंजीवादी तरीका (मार्क्सवादी सिद्धांत)|उत्पादन के पूंजीवादी मोड]] में , यह शासक वर्गों ([[बुर्जुआ वर्ग|पूंजीपति वर्ग ,बॉर्जियोसी या बुर्जुआ]] के रूप में जाना जाता है ) जो [[उत्पादन के साधन|उत्पादन के साधनों]] को नियंत्रित करता है और श्रमिक वर्गों ([[सर्वहारा|सर्वहारा वर्ग, प्रोलेट्रिएट]] के रूप में जाना जाता है ) जो अपनी मजदूरी के वापसी के लिए [[श्रम|श्रम-शक्ति]] को बेचकर इन साधनों को सक्षम बनाता है,के बीच संघर्ष में प्रकट होता है। [[ऐतिहासिक भौतिकवाद]] के रूप में जाना जाने वाला एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण का उपयोग कर, मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि [[पूंजीवाद]] ने पिछली सामाजिक [[आर्थिक प्रणाली|आर्थिक प्रणालियों]] की तरह आंतरिक तनाव पैदा किए हैं और ये तनाव इसके आत्म-विनाश और उत्पादन के [[समाजवाद|समाजवादी]] मोड के रूप में जाने वाली एक नई प्रणाली द्वारा प्रतिस्थापन की ओर ले जाएंगे । मार्क्स के लिए, पूँजीवाद के तहत वर्ग विरोध - इसकी अस्थिरता और संकट -प्रवण प्रकृति के कारण - श्रमिक वर्ग की [[वर्ग चेतना]] के विकास को आगे बढ़ाएगा , जिससे उनकी राजनीतिक सत्ता पर विजय होगी और अंततः एक वर्गहीन उत्पादकों के मुक्त संघ, [[साम्यवाद|साम्यवादी]] समाज की स्थापना होगी।<ref>{{cite book |first=Karl |last=Marx |author-link=Karl Marx |chapter-url=http://www.marxists.org/archive/marx/works/1875/gotha/index.htm |chapter=Index |title=[[Critique of the Gotha Program]] |archive-url=https://web.archive.org/web/20071027041955/http://www.marxists.org/archive/marx/works/1875/gotha/index.htm |archive-date=27 October 2007 |via=[[Marxists Internet Archive]]}}</ref>मार्क्स ने सक्रिय रूप से इसके कार्यान्वयन के लिए दबाव डाला, यह तर्क देते हुए कि मजदूर वर्ग को पूंजीवाद को खत्म करने और सामाजिक-आर्थिक मुक्ति लाने के लिए संगठित सर्वहारा [[क्रांतिकारी]] कार्रवाई करनी चाहिए ।
मार्क्स को [[इतिहास|मानव इतिहास]] में सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है , और उनके काम की प्रशंसा और आलोचना दोनों की गई है । अर्थशास्त्र में उनके काम ने [[श्रम]] और [[पूँजी|पूंजी]] के संबंध के बारे में कुछ मौजूदा सिद्धांतों के लिए आधार तैयार किया। दुनिया भर में कई [[बुद्धजीवि|बुद्धिजीवियों]], [[श्रमिक संघ|श्रमिक संघों]], [[कलाकार|कलाकारों]] और [[राजनीतिक दल|राजनीतिक दलों]] को मार्क्स के काम से प्रभावित हुए हैं, जो अक्सर उनके विचारों को संशोधित या अनुकूलित करते हैं। मार्क्स को आमतौर पर आधुनिक [[सामाजिक विज्ञान]] के प्रमुख वास्तुकारों में से एक के रूप में उद्धृत किया जाता है । <ref>{{cite book |last=Unger |first=Roberto Mangabeira |author-link=Roberto Mangabeira Unger |title=Free Trade Reimagined: The World Division of Labor and the Method of Economics |url=https://archive.org/details/freetra_ung_2007_00_0641 |location=Princeton |publisher=[[Princeton University Press]] |date=2007}}</ref><ref>{{cite journal|first=John |last=Hicks |author-link=John Hicks |title=Capital Controversies: Ancient and Modern |url=https://archive.org/details/sim_american-economic-review_1974-05_64_2/page/307 |journal=[[The American Economic Review]] |volume=64 |number=2 |date=May 1974 |pages=307 |quote=The greatest economists, Smith or Marx or Keynes, have changed the course of history ...}}</ref><ref>{{cite book |first=Joseph |last=Schumpeter |author-link=Joseph Schumpeter |title=Ten Great Economists: From Marx to Keynes |volume=26 |series=Unwin University books |edition=4th |publisher=[[Taylor & Francis]] |date=1952 |isbn=0-415-11078-5}}, {{isbn|978-0-415-11078-5}}</ref> <ref>{{cite web |url=http://www-personal.umd.umich.edu/~delittle/Marxism%20and%20Method%203.htm |title=Marxism and Method |last=Little |first=Daniel |access-date=10 December 2017 |url-status=live |archive-date=10 December 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171210095117/http://www-personal.umd.umich.edu/~delittle/Marxism%20and%20Method%203.htm}}</ref><ref>{{cite book |title=Stanford Encyclopaedia of Philosophy |chapter-url=https://plato.stanford.edu/archives/win2017/entries/weber/ |chapter=Max Weber |last=Kim |first=Sung Ho |year=2017 |editor-last=Zalta |editor-first=Edward N. |publisher=Metaphysics Research Lab, [[Stanford University]] |access-date=10 December 2017 |quote=Max Weber is known as a principal architect of modern social science along with Karl Marx and Emil Durkheim. |archive-url=https://web.archive.org/web/20190318101547/https://plato.stanford.edu/archives/win2017/entries/weber/ |archive-date=18 March 2019 |url-status=live}}</ref>
==जीवनी==
शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् 1842 में मार्क्स उसी वर्ष कोलोन से प्रकाशित राइन समाचार पत्र में पहले लेखक और तत्पश्चात् संपादक के रूप में सम्मिलित हुए किंतु सर्वहारा क्रांति के विचारों के प्रतिपादन और प्रसार करने के कारण 15 महीने बाद ही 1843 में उस पत्र का प्रकाशन बंद करवा दिया गया। मार्क्स पेरिस चले गए, वहाँ उन्होंने 'द्यूस फ्रांजोसिश' जारबूशर पत्र में हीगेल के नैतिक दर्शन पर अनेक लेख लिखे। 1845 में वह फ्रांस से निष्कासित होकर ब्रूसेल्स चले गये और वहीं उन्होंने जर्मनी के मजदूर सगंठन और 'कम्युनिस्ट लीग' के निर्माण में सक्रिय योग दिया। 1847 में एजेंल्स के साथ 'अंतराष्ट्रीय समाजवाद' का प्रथम घोषणापत्र ([[कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र|कम्युनिस्ट मॉनिफेस्टो]]) प्रकाशित किया।
1848 में मार्क्स ने पुन: कोलोन में 'नेवे राइनिशे जीतुंग' का संपादन प्रारंभ किया और उसके माध्यम से जर्मनी को समाजवादी क्रांति का संदेश देना आरंभ किया। 1849 में इसी अपराघ में वह प्रशा से निष्कासित हुए। वह पेरिस होते हुए लंदन चले गए और जीवन पर्यंत वहीं रहे। लंदन में सबसे पहले उन्होंने 'कम्युनिस्ट लीग' की स्थापना का प्रयास किया, किंतु उसमें फूट पड़ गई। अंत में मार्क्स को उसे भंग कर देना पड़ा। उसका 'नेवे राइनिश जीतुंग' भी केवल छह अंको में निकल कर बंद हो गया।
[[चित्र:Marxengelskolkata (9).JPG|thumb|[[कोलकाता]], [[भारत]]]]
1859 में मार्क्स ने अपने अर्थशास्त्रीय अध्ययन के निष्कर्ष 'जुर क्रिटिक दर पोलिटिशेन एकानामी' नामक पुस्तक में प्रकाशित किये। यह पुस्तक मार्क्स की उस बृहत्तर योजना का एक भाग थी, जो उन्होंने संपुर्ण राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखने के लिए बनाई थी। किंतु कुछ ही दिनो में उनको लगा कि उपलब्ध साम्रगी उसकी योजना में पूर्ण रूपेण सहायक नहीं हो सकती। अत: उन्होंने अपनी योजना में परिवर्तन करके नए सिरे से लिखना आंरभ किया और उसका प्रथम भाग 1867 में [[दास कैपिटल]] (द कैपिटल, हिंदी में ''पूंजी'' शीर्षक से प्रगति प्रकाशन मास्को से चार भागों में) के नाम से प्रकाशित किया। 'द कैपिटल' के शेष भाग मार्क्स की मृत्यु के बाद [[एंजेल्स]] ने संपादित करके प्रकाशित किए। '[[वर्गसंघर्ष]]' का सिद्धांत मार्क्स के '[[वैज्ञानिक समाजवाद]]' का मेरूदंड है। इसका विस्तार करते हुए उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या और बेशी मूल्य (सरप्लस वैल्यू) के सिद्धांत की स्थापनाएँ कीं। मार्क्स के सारे आर्थिक और राजनीतिक निष्कर्ष इन्हीं स्थापनाओं पर आधारित हैं।
1864 में लंदन में 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' की स्थापना में मार्क्स ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघ की सभी घोषणाएँ, नीतिश् और कार्यक्रम मार्क्स द्वारा ही तैयार किये जाते थे। कोई एक वर्ष तक संघ का कार्य सुचारू रूप से चलता रहा, किंतु बाकुनिन के अराजकतावादी आंदोलन, फ्रांसीसी जर्मन युद्ध और पेरिस कम्यूनों के चलते 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो गया। किंतु उनकी प्रवृति और चेतना अनेक देशों में समाजवादी और श्रमिक पार्टियों के अस्तित्व के कारण कायम रही।
'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो जाने पर मार्क्स ने पुन: लेखनी उठाई। किंतु निरंतर अस्वस्थता के कारण उनके शोधकार्य में अनेक बाधाएँ आईं। मार्च 14, 1883 को मार्क्स के तूफानी जीवन की कहानी समाप्त हो गई। मार्क्स का प्राय: सारा जीवन भयानक आर्थिक संकटों के बीच व्यतीत हुआ। उनकी छह संतानो में तीन कन्याएँ ही जीवित रहीं।
== पूँजीवाद ==
मजदूरो की तहरीक में एक नए तूफ़ान की पेशबीनी करते हुए मार्क्स ने कोशिश की कि अपनी अर्थशास्त्रीय रचना करने की गति तेज़ कर दे। अठारह माह की इंतजार के बाद जब उसने अपने अर्थशास्त्रीय अध्ययन का फिर से आग़ाज़ किया तो उसने इस रचना को अIज नए सिरे से तर्तीब देने का फ़ैसला किया। और उसको 1859 में प्रकाशित "द क्रिटिक ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी" में हिस्से के रूप में ना छापा जाये, बल्कि ये एक अलग किताब हो। 1867 में उसे "दास कैपिटल" नाम से जर्मन भाषा मे प्रकाशित किया गया। अमरीकी ख़ानाजंगी की वजह से मार्क्स अपनी आमदनी का बड़ा ज़रीया खो चुका था। अब वो न्यूयार्क के रोज़नामा द ट्रिब्यून के लिए नहीं लिख सकता था। उस के बाल बच्चों के लिए इंतिहाई मुश्किलों का ज़माना फिर आ गया। ऐसी हालत में अगर एंगल्स की तरफ़ से मुतवातिर और बेग़रज़ माली इमदाद ना मिलती तो मार्क्स कैपिटल की तकमील ना कर सकता।
द कैपिटल में कार्ल मार्क्स का प्रस्ताव है कि पूंजीवाद के प्रेरित बल श्रम, जिसका काम अवैतनिक लाभ और अधिशेष मूल्य के परम स्रोत के शोषण करने में है।
== यह भी देखें ==
* [[मार्क्सवाद की समालोचना]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
*[https://web.archive.org/web/20110225094743/http://marxists.org/ मार्क्सवादी]
*[https://lastdoubt.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa/कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीपति]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}
{{अर्थशास्त्र}}
[[श्रेणी:मार्क्सवाद]]
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{{Infobox revolution biography
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'''एर्नेस्तो''' "'''चे'''" '''गेवारा''' ([[स्पेनी भाषा|स्पेनी]]: Ernesto Che Guevara; १४ जून १९२८ – ९ अक्टूबर १९६७), [[अर्जेण्टीना|अर्जेन्टीना]] के [[मार्क्सवाद|मार्क्सवादी]] [[क्रांतिकारी]] थे जिन्होंने [[क्यूबा]] की क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई। इन्हें '''एल चे''' या सिर्फ '''चे''' भी बुलाया जाता है। ये डॉक्टर, लेखक, गुरिल्ला नेता, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे, जिन्होंने [[दक्षिण अमेरिका|दक्षिणी अमरीका]] के कई राष्ट्रों में क्रांति लाकर उन्हें स्वतंत्र बनाने का प्रयास किया। इनकी मृत्यु के बाद से इनका चेहरा सारे संसार में सांस्कृतिक विरोध एवं वामपंथी गतिविधियों का प्रतीक बन गया है।<ref>[[#refCasey2009|Casey 2009]], p. 128.</ref>
चिकित्सीय शिक्षा के दौरान चे पूरे [[लातिनी अमरीका]] में काफी घूमे। इस दौरान पूरे महाद्वीप में व्याप्त गरीबी ने इन्हें हिला कर रख दिया।<ref name="RevMedicine">[http://www.marxists.org/archive/guevara/1960/08/19.htm On Revolutionary Medicine] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100307163722/http://www.marxists.org/archive/guevara/1960/08/19.htm |date=7 मार्च 2010 }} Speech by Che Guevara to the Cuban Militia on August 19, 1960</ref> इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण थे एकाधिप्तय [[पूंजीवाद]], [[नवउपनिवेशवाद]] और [[साम्राज्यवाद]], जिनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका था - [[विश्व क्रांति]]।<ref name="AfroAsian1965">[http://www.marxists.org/archive/guevara/1965/02/24.htm At the Afro-Asian Conference in Algeria] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100405092257/http://www.marxists.org/archive/guevara/1965/02/24.htm |date=5 अप्रैल 2010 }} A speech by Che Guevara to the Second Economic Seminar of Afro-Asian Solidarity in Algiers, Algeria on February 24, 1965</ref> इसी निष्कर्ष का अनुसरण करते हुए इन्होंने [[ग्वाटेमाला|गुआटेमाला]] के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज़ गुज़मान के द्वारा किए जा रहे समाज सुधारों में भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी सोच और मजबूत हो गई जब १९५४ में गुज़मान को [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमरीका]] की मदद से हटा दिया गया। इसके कुछ ही समय बाद [[मेक्सिको नगर|मेक्सिको सिटी]] में इन्हें [[राऊल कास्त्रो]] और [[फिदेल कास्त्रो]] मिले और ये क्यूबा की [[२६ जुलाई क्रांति]] में शामिल हो गए।<ref>[[#refBeaubien2009|Beaubien, NPR Audio Report, 2009]], 00:09-00:13</ref> चे शीघ्र ही क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान तक पहुँच गए और [[बातिस्ता]] के राज्य के विरुद्ध दो साल तक चले अभियान में इन्होंने मुख्य भूमिका निभाई।<ref name="Castrosbrain1960">''"[[#refCastrosbrain1960|Castro's Brain]]"'' 1960.</ref> {{Quote box|width=246px|bgcolor=#ACE1AF|align=right|quote=“Do not shoot! I am Che Guevara and I am worth more to you alive than dead......!”|salign=centre|source=—'''गोली मारने जा रहे सैनिकों को संबोधित करते हुए चे ग्वेरा कहा कि'''}}
क्यूबा की क्रांति के पश्चात चे और चंदन जिन्हें गोलू बिष्ट भी कहते थे इन्होंने ने नई सरकार में कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए और साथ ही सारे विश्व में घूमकर क्यूबा के [[समाजवाद]] के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया। इनके द्वारा प्रशिक्षित सैनिकों ने [[पिग्स की खाड़ी आक्रमण]] को सफलतापूर्वक पछाड़ा।<ref name="Kellner89pg69">[[#refKellner1989|Kellner 1989]], p. 69-70.</ref> ये [[सोवियत संघ]] से नाभिकीय प्रक्षेपास्त्र ले कर आए, जिनसे १९६२ के क्यूबन प्रक्षेपास्त्र संकट की शुरुआत हुई और सारा विश्व नाभिकीय युद्ध के कगार पर पहुँच गया।<ref>[[#refAnderson1997|Anderson 1997]], p. 526-530.</ref> साथ ही चे ने बहुत कुछ लिखा भी है, इनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियाँ हैं - ''गुरिल्ला युद्ध की नियम-पुस्तक'' और दक्षिणी अमरीका में इनकी यात्राओं पर आधारित ''मोटरसाइकल डायरियाँ''। १९६५ में चे क्यूबा से निकलकर [[कांगो]] पहुंचे जहाँ इन्होंने क्रांति लाने का विफल प्रयास किया। इसके बाद ये [[बोलिविया]] पहुँचे और क्रांति उकसाने की कोशिश की, लेकिन पकड़े गए और इन्हें गोली मार दी गई।<ref>[[#refRyan1998|Ryan 1998]], p. 4</ref>
मृत्यु के बाद भी चे को आदर और धिक्कार दोनों ही भरपूर मिले हैं। [[टाइम (अंग्रेज़ी पत्रिका)|टाइम पत्रिका]] ने इन्हें २०वीं शताब्दी के १०० सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सूची में शामिल किया।<ref>[[#refDorfman1999|Dorfman 1999]].</ref> चे की तस्वीर ''गेरिलेरो एरोइको'' (स्पेनी: ''Guerrillero Heroico'', वीर गुरिल्ला) को विश्व की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर माना गया है।<ref>Maryland Institute of Art, referenced at [[#refBBCNews2001b|BBC News May 26, 2001]]</ref>
==जीवन परिचय==
क्रांतिकारियों की गैलेक्सी के एक चमकते सितारे का नाम अर्नेस्टो चे ग्वेरा है। एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही नसें तन जाती हैं। दिलो-दिमाग उत्तेजना से भर जाता है। हर तरह के अन्याय के खिलाफ लड़ने और न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के ख्वाब तैरने लगते हैं। उम्र छोटी हो, लेकिन खूबसूरत हो, यह कल्पना हिलोरे मारने लगती है।
:कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन यह सच है सिर्फ और सिर्फ 39 साल में शहीद हो जाने वाला एक नौजवान इतना कुछ कर गया जिसे करने के लिए सैकड़ों वर्षों की उम्र नाकाफी लगती है। वह फिदेल कास्त्रो के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर क्यूबा में क्रांति करता है, अमेरिकी कठपुतली बातिस्ता का तख्ता पलट देता है। ठीक अमेरिका ( यूएसए) के सटे छोटे से देश में क्रांति की चौकी स्थापित कर देता है, जिसका भय आज भी अमेरिका को सताता रहता है।
:एक ऐसा क्रांतिकारी जो आज भी दुनिया के युवाओं का प्रेरणास्रोत है। जिसका जन्म अर्जेंटीना में होता, क्रांति क्यूबा में करता है और वोलोबिया में क्रांति की तैयारी करते अमेरिकी जासूसी एजेंसी सीआईए के हाथों शहीद होता है। कोई अकेला व्यक्ति अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया, तो उसका नाम चे ग्वेरा है। जिसे मारने के लिए अमेरिका ने अपनी सारी ताकत लगा दी। मरने के बाद भी जिसका भूत अमेरिका और उसके पिट्ठू शासकों को सताता रहता है। वे चे ग्वेरा का मारने में सफल हो गए लेकिन उसके क्रांति के सपने को नहीं मार पाए।
:दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप की आदिम लोगों का कत्लेआम कर स्पेन ने पहले इन देशों को गुलाम बना लिया। ये देश स्पेन से संघर्ष कर आजाद हो ही रहे थे कि अमेरिका ने अपने कठपुतली शासक बैठाकर इन देशों पर नियंत्रण कर लिया। [[दक्षिण अमेरिका]] के क्रांतिकारी निरंतर स्पने और बाद में अमेरिका के खिलाफ संघर्ष करते रहे। इन्हीं कांतिकारियों में से दो को आज पूरी दुनिया जानती है। एक का नाम फिदेल क्रास्त्रो और दूसरे का नाम चे ग्वेरा है।
:जन्मजात विद्रोही। उनके पिता कहते थे कि मेरे बेटे की रगों में आयरिश विद्रोहियों का खून बहता रहता है। चे के पिता स्पेन के खिलाफ पूरे दक्षिण अमेरिका में चल रहे संघर्षों के समर्थक थे। चे को अपने देश और अपने महाद्वीप के लोगों की गरीबी बेचैन कर देती थी। होश संभालते ही उनके दिलो-दिमाग में यह प्रश्न उठता था कि आखिर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न और कड़ी मेहनत करने वाले मेरे देश और मेरे महाद्वीप के लोग इतने गरीब, लाचार, वेबस और गुलाम क्यों हैं? क्यों और कैसे स्पेन और बाद में अमेरिका ने हमारे महाद्वीप पर कब्जा कर लिया और यहां की संपदा को लूटा।
:चे ग्वेरा पेशे से डाक्टर थे। बहुत कम उम्र में उन्होंने करीब 3 हजार किताबें पढ़ डाली थीं। पाल्बो नेरूदा और जॉन किट्स उनके प्रिय कवि थे। रूयार्ड किपलिंग उनके पसंदीदा लेखकों में शामिल थे। कार्ल मार्क्स और लेनिन के साथ बुद्ध, अरस्तू और वर्ट्रेड रसेल उनके प्रिय दार्शनिक और चिंतन थे। खुद चे एक अच्छे लेखक थे। वह नियमित डायरी लिखते थे। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका की अकेले अपनी मोटर साईकिल से य़ात्रा की। इस यात्रा पर आधारित उनकी मोटर साईकिल डायरी है। जो बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई। जिस पर एक खूबसूरत फिल्म इसी नाम से बनी।
:[[दक्षिण अमेरिका]] के कई देशों में क्रांतिकारी संघर्षों मे शामिल हुए। बाद में वे कास्त्रो के साथ क्यूबा की क्रांति (1959) के नायक बने। जिस क्रांति ने क्यूबा में [[अमेरिका]] की कठपुतली बातिस्ता की सरकार को उखाड फेका। क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार में विभिन्न जिम्मेदारियों को संभालते हुए उन्होंने क्यूबी की जनता की जिंदगी में आमूल-चूल परिवर्तन करने में अहम भूमिका निभाई। क्यूबा दुनिया के लिए आदर्श देश बन गया। इस सब में चे ग्वेरा की अहम भूमिका थी।
:[[क्यूबा]] में अपने कामों को पूरा करने के बाद चे [[लैटिन अमेरिका]] के अन्य देशों में क्रांति को अंजाम देने निकल पड़े। वोलोबिया में क्रांतिकारी संघर्ष करते हुए 1967 में वे 39 वर्ष की उम्र में शहीद हुए।
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{विकिसूक्ति|चे ग्वेरा}}
* [https://web.archive.org/web/20120331075759/http://www.scribd.com/doc/58315974/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B-%E0%A4%9A%E0%A5%87-%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-by-%E0%A4%93%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA अर्नेस्टो चे ग्वेरा : प्रखर साम्यवादी, छापामार योद्धा]
* मोहल्ला चिट्ठे पर ओम थानवी के लिखे चे-संबंधी लेख - [https://web.archive.org/web/20101231171256/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_10.html], [https://web.archive.org/web/20101231170807/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_27.html], [https://web.archive.org/web/20101231172239/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_28.html]
* [https://web.archive.org/web/20101231171010/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_11.html चे की नज़र में भारत - विशद विविधताओं का देश भारत]
* [https://web.archive.org/web/20160305130113/http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2007/10/blog-post_8523.html फिदेल के नाम चे का विदाई पत्र]
* [https://web.archive.org/web/20071011081214/http://www.bbc.co.uk/hindi/news/story/2007/10/071009_che_anniversary.shtml चे ग्वेरा की चालीसवीं बरसी] - बीबीसी हिन्दी
* [https://web.archive.org/web/20120307112751/http://pratibhakatiyar.blogspot.com/2009/10/blog-post_09.html प्रतिभा की दुनिया - चे को सलाम]
* [https://web.archive.org/web/20110816202636/http://wangmaya.blogspot.com/2007/10/blog-post_09.html चे ग्वेरा की अंतिम यात्रा]
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text/x-wiki
{{Infobox revolution biography
|name = चे गेवारा
|lived = जून 14, 1928 – अक्तूबर 9, 1967
|dateofbirth = जून 14, 1928
|placeofbirth = [[रोज़ारियो, सांता फ़े|रोज़ारियो]], [[अर्जेण्टीना|अर्जेंटीना]]
|dateofdeath = {{death date and age|1967|10|9|1928|6|14}}
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|religion = कोई नहीं<ref>[[#refHall2004|Hall 2004]]</ref>
|image = [[चित्र:Che Guevara - Guerrillero Heroico by Alberto Korda.jpg|290px]]
|caption = "''[[गेरिलेरो एरोइको]]/वीर गुरिल्ला''" <br /> [[ला कूब्र विस्फोट]] की श्रद्धांजलि सभा में चे
'' मार्च 5, 1960''
|organizations = [[२६ जुलाई आंदोलन]], क्यूबन समाजवादी आंदोलन संयुक्त पार्टी<ref>Partido Unido de la Revolución Socialista de Cuba, aka PURSC</ref> [[राष्ट्रीय मुक्ति सेना (बोलिविया)]]
}}
'''एर्नेस्तो''' "'''चे'''" '''गेवारा''' ([[स्पेनी भाषा|स्पेनी]]: Ernesto Che Guevara; १४ जून १९२८ – ९ अक्टूबर १९६७), [[अर्जेण्टीना|अर्जेन्टीना]] के [[मार्क्सवाद|मार्क्सवादी]] [[क्रांतिकारी]] थे जिन्होंने [[क्यूबा]] की क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई। इन्हें '''एल चे''' या सिर्फ '''चे''' भी बुलाया जाता है। ये डॉक्टर, लेखक, गुरिल्ला नेता, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे, जिन्होंने [[दक्षिण अमेरिका|दक्षिणी अमरीका]] के कई राष्ट्रों में क्रांति लाकर उन्हें स्वतंत्र बनाने का प्रयास किया। इनकी मृत्यु के बाद से इनका चेहरा सारे संसार में सांस्कृतिक विरोध एवं वामपंथी गतिविधियों का प्रतीक बन गया है।<ref>[[#refCasey2009|Casey 2009]], p. 128.</ref>
चिकित्सीय शिक्षा के दौरान चे पूरे [[लातिनी अमरीका]] में काफी घूमे। इस दौरान पूरे महाद्वीप में व्याप्त गरीबी ने इन्हें हिला कर रख दिया।<ref name="RevMedicine">[http://www.marxists.org/archive/guevara/1960/08/19.htm On Revolutionary Medicine] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100307163722/http://www.marxists.org/archive/guevara/1960/08/19.htm |date=7 मार्च 2010 }} Speech by Che Guevara to the Cuban Militia on August 19, 1960</ref> इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण थे एकाधिप्तय [[पूंजीवाद]], [[नवउपनिवेशवाद]] और [[साम्राज्यवाद]], जिनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका था - [[विश्व क्रांति]]।<ref name="AfroAsian1965">[http://www.marxists.org/archive/guevara/1965/02/24.htm At the Afro-Asian Conference in Algeria] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100405092257/http://www.marxists.org/archive/guevara/1965/02/24.htm |date=5 अप्रैल 2010 }} A speech by Che Guevara to the Second Economic Seminar of Afro-Asian Solidarity in Algiers, Algeria on February 24, 1965</ref> इसी निष्कर्ष का अनुसरण करते हुए इन्होंने [[ग्वाटेमाला|गुआटेमाला]] के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज़ गुज़मान के द्वारा किए जा रहे समाज सुधारों में भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी सोच और मजबूत हो गई जब १९५४ में गुज़मान को [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमरीका]] की मदद से हटा दिया गया। इसके कुछ ही समय बाद [[मेक्सिको नगर|मेक्सिको सिटी]] में इन्हें [[राऊल कास्त्रो]] और [[फिदेल कास्त्रो]] मिले और ये क्यूबा की [[२६ जुलाई क्रांति]] में शामिल हो गए।<ref>[[#refBeaubien2009|Beaubien, NPR Audio Report, 2009]], 00:09-00:13</ref> चे शीघ्र ही क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान तक पहुँच गए और [[बातिस्ता]] के राज्य के विरुद्ध दो साल तक चले अभियान में इन्होंने मुख्य भूमिका निभाई।<ref name="Castrosbrain1960">''"[[#refCastrosbrain1960|Castro's Brain]]"'' 1960.</ref> {{Quote box|width=246px|bgcolor=#ACE1AF|align=right|quote=“Do not shoot! I am Che Guevara and I am worth more to you alive than dead......!”|salign=centre|source=—'''गोली मारने जा रहे सैनिकों को संबोधित करते हुए चे ग्वेरा कहा कि'''}}
क्यूबा की क्रांति के पश्चात चे ने नई सरकार में कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए और साथ ही सारे विश्व में घूमकर क्यूबा के [[समाजवाद]] के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया। इनके द्वारा प्रशिक्षित सैनिकों ने [[पिग्स की खाड़ी आक्रमण]] को सफलतापूर्वक पछाड़ा।<ref name="Kellner89pg69">[[#refKellner1989|Kellner 1989]], p. 69-70.</ref> ये [[सोवियत संघ]] से नाभिकीय प्रक्षेपास्त्र ले कर आए, जिनसे १९६२ के क्यूबन प्रक्षेपास्त्र संकट की शुरुआत हुई और सारा विश्व नाभिकीय युद्ध के कगार पर पहुँच गया।<ref>[[#refAnderson1997|Anderson 1997]], p. 526-530.</ref> साथ ही चे ने बहुत कुछ लिखा भी है, इनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियाँ हैं - ''गुरिल्ला युद्ध की नियम-पुस्तक'' और दक्षिणी अमरीका में इनकी यात्राओं पर आधारित ''मोटरसाइकल डायरियाँ''। १९६५ में चे क्यूबा से निकलकर [[कांगो]] पहुंचे जहाँ इन्होंने क्रांति लाने का विफल प्रयास किया। इसके बाद ये [[बोलिविया]] पहुँचे और क्रांति उकसाने की कोशिश की, लेकिन पकड़े गए और इन्हें गोली मार दी गई।<ref>[[#refRyan1998|Ryan 1998]], p. 4</ref>
मृत्यु के बाद भी चे को आदर और धिक्कार दोनों ही भरपूर मिले हैं। [[टाइम (अंग्रेज़ी पत्रिका)|टाइम पत्रिका]] ने इन्हें २०वीं शताब्दी के १०० सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सूची में शामिल किया।<ref>[[#refDorfman1999|Dorfman 1999]].</ref> चे की तस्वीर ''गेरिलेरो एरोइको'' (स्पेनी: ''Guerrillero Heroico'', वीर गुरिल्ला) को विश्व की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर माना गया है।<ref>Maryland Institute of Art, referenced at [[#refBBCNews2001b|BBC News May 26, 2001]]</ref>
==जीवन परिचय==
क्रांतिकारियों की गैलेक्सी के एक चमकते सितारे का नाम अर्नेस्टो चे ग्वेरा है। एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही नसें तन जाती हैं। दिलो-दिमाग उत्तेजना से भर जाता है। हर तरह के अन्याय के खिलाफ लड़ने और न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के ख्वाब तैरने लगते हैं। उम्र छोटी हो, लेकिन खूबसूरत हो, यह कल्पना हिलोरे मारने लगती है।
:कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन यह सच है सिर्फ और सिर्फ 39 साल में शहीद हो जाने वाला एक नौजवान इतना कुछ कर गया जिसे करने के लिए सैकड़ों वर्षों की उम्र नाकाफी लगती है। वह फिदेल कास्त्रो के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर क्यूबा में क्रांति करता है, अमेरिकी कठपुतली बातिस्ता का तख्ता पलट देता है। ठीक अमेरिका ( यूएसए) के सटे छोटे से देश में क्रांति की चौकी स्थापित कर देता है, जिसका भय आज भी अमेरिका को सताता रहता है।
:एक ऐसा क्रांतिकारी जो आज भी दुनिया के युवाओं का प्रेरणास्रोत है। जिसका जन्म अर्जेंटीना में होता, क्रांति क्यूबा में करता है और वोलोबिया में क्रांति की तैयारी करते अमेरिकी जासूसी एजेंसी सीआईए के हाथों शहीद होता है। कोई अकेला व्यक्ति अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया, तो उसका नाम चे ग्वेरा है। जिसे मारने के लिए अमेरिका ने अपनी सारी ताकत लगा दी। मरने के बाद भी जिसका भूत अमेरिका और उसके पिट्ठू शासकों को सताता रहता है। वे चे ग्वेरा का मारने में सफल हो गए लेकिन उसके क्रांति के सपने को नहीं मार पाए।
:दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप की आदिम लोगों का कत्लेआम कर स्पेन ने पहले इन देशों को गुलाम बना लिया। ये देश स्पेन से संघर्ष कर आजाद हो ही रहे थे कि अमेरिका ने अपने कठपुतली शासक बैठाकर इन देशों पर नियंत्रण कर लिया। [[दक्षिण अमेरिका]] के क्रांतिकारी निरंतर स्पने और बाद में अमेरिका के खिलाफ संघर्ष करते रहे। इन्हीं कांतिकारियों में से दो को आज पूरी दुनिया जानती है। एक का नाम फिदेल क्रास्त्रो और दूसरे का नाम चे ग्वेरा है।
:जन्मजात विद्रोही। उनके पिता कहते थे कि मेरे बेटे की रगों में आयरिश विद्रोहियों का खून बहता रहता है। चे के पिता स्पेन के खिलाफ पूरे दक्षिण अमेरिका में चल रहे संघर्षों के समर्थक थे। चे को अपने देश और अपने महाद्वीप के लोगों की गरीबी बेचैन कर देती थी। होश संभालते ही उनके दिलो-दिमाग में यह प्रश्न उठता था कि आखिर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न और कड़ी मेहनत करने वाले मेरे देश और मेरे महाद्वीप के लोग इतने गरीब, लाचार, वेबस और गुलाम क्यों हैं? क्यों और कैसे स्पेन और बाद में अमेरिका ने हमारे महाद्वीप पर कब्जा कर लिया और यहां की संपदा को लूटा।
:चे ग्वेरा पेशे से डाक्टर थे। बहुत कम उम्र में उन्होंने करीब 3 हजार किताबें पढ़ डाली थीं। पाल्बो नेरूदा और जॉन किट्स उनके प्रिय कवि थे। रूयार्ड किपलिंग उनके पसंदीदा लेखकों में शामिल थे। कार्ल मार्क्स और लेनिन के साथ बुद्ध, अरस्तू और वर्ट्रेड रसेल उनके प्रिय दार्शनिक और चिंतन थे। खुद चे एक अच्छे लेखक थे। वह नियमित डायरी लिखते थे। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका की अकेले अपनी मोटर साईकिल से य़ात्रा की। इस यात्रा पर आधारित उनकी मोटर साईकिल डायरी है। जो बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई। जिस पर एक खूबसूरत फिल्म इसी नाम से बनी।
:[[दक्षिण अमेरिका]] के कई देशों में क्रांतिकारी संघर्षों मे शामिल हुए। बाद में वे कास्त्रो के साथ क्यूबा की क्रांति (1959) के नायक बने। जिस क्रांति ने क्यूबा में [[अमेरिका]] की कठपुतली बातिस्ता की सरकार को उखाड फेका। क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार में विभिन्न जिम्मेदारियों को संभालते हुए उन्होंने क्यूबी की जनता की जिंदगी में आमूल-चूल परिवर्तन करने में अहम भूमिका निभाई। क्यूबा दुनिया के लिए आदर्श देश बन गया। इस सब में चे ग्वेरा की अहम भूमिका थी।
:[[क्यूबा]] में अपने कामों को पूरा करने के बाद चे [[लैटिन अमेरिका]] के अन्य देशों में क्रांति को अंजाम देने निकल पड़े। वोलोबिया में क्रांतिकारी संघर्ष करते हुए 1967 में वे 39 वर्ष की उम्र में शहीद हुए।
== सन्दर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
{{विकिसूक्ति|चे ग्वेरा}}
* [https://web.archive.org/web/20120331075759/http://www.scribd.com/doc/58315974/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B-%E0%A4%9A%E0%A5%87-%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-by-%E0%A4%93%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA अर्नेस्टो चे ग्वेरा : प्रखर साम्यवादी, छापामार योद्धा]
* मोहल्ला चिट्ठे पर ओम थानवी के लिखे चे-संबंधी लेख - [https://web.archive.org/web/20101231171256/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_10.html], [https://web.archive.org/web/20101231170807/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_27.html], [https://web.archive.org/web/20101231172239/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_28.html]
* [https://web.archive.org/web/20101231171010/http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_11.html चे की नज़र में भारत - विशद विविधताओं का देश भारत]
* [https://web.archive.org/web/20160305130113/http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2007/10/blog-post_8523.html फिदेल के नाम चे का विदाई पत्र]
* [https://web.archive.org/web/20071011081214/http://www.bbc.co.uk/hindi/news/story/2007/10/071009_che_anniversary.shtml चे ग्वेरा की चालीसवीं बरसी] - बीबीसी हिन्दी
* [https://web.archive.org/web/20120307112751/http://pratibhakatiyar.blogspot.com/2009/10/blog-post_09.html प्रतिभा की दुनिया - चे को सलाम]
* [https://web.archive.org/web/20110816202636/http://wangmaya.blogspot.com/2007/10/blog-post_09.html चे ग्वेरा की अंतिम यात्रा]
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कर्कट रोग
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'''कर्कट रोग''' या '''अलकृ रोग''' (चिकित्सकीय पद: दुर्दम [[फुलाव|नववृद्धि]]) [[रोग|रोगों]] का एक वर्ग है जिसमें [[कोशिका|कोशिकाओं]] का एक समूह ''अनियंत्रित वृद्धि'' (सामान्य सीमा से अधिक [[कोशिका विभाजन|विभाजन]]), ''रोग आक्रमण'' (आस-पास के उतकों का विनाश और उन पर आक्रमण) और कभी कभी ''अपररूपांतरण'' अथवा ''मेटास्टैसिस'' (लसिका या रक्त के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है) प्रदर्शित करता है।<ref>{{Cite web|url=https://noncommunicabledisease.com/cancer-causes-types-symptoms-diagnosis-and-treatment/|title=Cancer: Causes, Types, Symptoms, Diagnosis, and Treatment|last=Kumar|first=Atul|date=2025-08-27|website=NCDs: Chronic Disease Prevention, Management, and Wellness|language=en-US|access-date=2025-11-21}}</ref> कर्क के ये तीन दुर्दम लक्षण इसे [[सौम्य गाँठ या सौम्य अबुर्द|सौम्य गाँठ (ट्यूमर या अबुर्द)]] से विभेदित करते हैं, जो स्वयं सीमित हैं, आक्रामक नहीं हैं या अपररूपांतरण प्रर्दशित नहीं करते हैं। अधिकांश कर्क एक [[गाँठ या अबुर्द|गाँठ या अबुर्द (ट्यूमर)]] बनाते हैं, लेकिन कुछ, जैसे [[रक्त का कैंसर (ल्यूकेमिया)|रक्त कर्कट (श्वेतरक्तता)]] गाँठ नहीं बनाता है। चिकित्सा की वह शाखा जो कर्क के अध्ययन, निदान, उपचार और रोकथाम से सम्बंधित है, [[अर्बुदविज्ञान|ऑन्कोलॉजी या अर्बुदविज्ञान]] कहलाती है।
{{Infobox disease
| Name = Cancer
| Image = Tumor_Mesothelioma2_legend.jpg
| Caption = A coronal [[CT scan]] showing [[malignant]] [[mesothelioma|cancer of the lung sac]].<br />Legend: → tumor ←, ★ central [[pleural effusion]], 1&3 lungs, 2 spine, 4 ribs, 5 [[aorta]], 6 [[spleen]], 7&8 kidneys, 9 liver.
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हमारा शरीर अनेक प्रकार की कोशिकाओं मिलकर बना है, ठीक सी तरह जिस तरह अनेक प्रकार की ईंटों से मकान बनाया जाती हैं। कोशिकाओं से शरीर के अंग भी बनते हैं, और यही अंग मिलकर एक स्वस्थ शरीर का निर्माण करते हैं। ये कोशिकाएँ शरीर के [[डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल|डी॰एन॰ए॰]] के द्वारा नियंत्रित होती हैं, [[डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल|डी॰एन॰ए॰]] एक कंप्यूटर साॅफ्टवेयर की तरह काशिकाओं को नियंत्रित करता है। कोशिकाएं शरीर में हमेशा विभाजित होती रहती है, और नई कोशिकाएं बनती जाती हैं, जैसा कि आपने पढ़ा की यह सब [[डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल|डी॰एन॰ए॰]] के माध्यम से होता, पर कभी-कभी [[डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल|डी॰एन॰ए॰]] से ग़लतियाँ हो जाती हैं, और ख़राब कोशिकाएं बन जाती हैं, और ये भी विभाजीत होती रहती हैं, उनकी संख्या भी बढ़ती जाती है, और शरीर का कोई अंग ठीक तरीके से काम नहीं करता और आगे चलके कर्कट का रुप ले लेता है।
हमारे शरीर के सभी अंग एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं, यही ख़राब कोशिकाएँ दूसरे अंग में भी प्रवेश करती हैं, और उसको भी काम करने में अड़चन आती है। और कर्कट पूरे शरीर में फैलता है। शुरुआत में शरीर एक ही अंग में बनने वाले ख़राब कोशिकाओं यानी कर्कट कोशिकाओं को पहले चरण का कर्कट (primary stage cancer) और बाद में दूसरे अंग में प्रवेश करने पर यह द्वितीय (secondary cancer) या मेटैस्टक कैंसर (metastatic cancer) कहते हैं।
कर्कट सभी उम्र के लोगों को, यहाँ तक कि [[भ्रूण]] को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन अधिकांश किस्मों का जोखिम उम्र के साथ बढ़ता है।<ref name="Cancer Research UK">{{cite web | last =Cancer Research UK | title =UK cancer incidence statistics by age | year =2007 | url =http://info.cancerresearchuk.org/cancerstats/incidence/age/ | accessdate =2007-06-25 | archive-date =18 अगस्त 2012 | archive-url =https://web.archive.org/web/20120818115015/http://info.cancerresearchuk.org/cancerstats/incidence/age/ | url-status =dead }}</ref> कर्क
में से १३% का कारण है।<ref name="WHO">{{cite web | last =WHO | authorlink =World Health Organization | title =Cancer | publisher =World Health Organization |month=February | year=2006 | url =http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs297/en/ | accessdate =2007-06-25 }}</ref> अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, २००७ के दौरान पूरे विश्व में ७६ लाख लोगों की मृत्यु कर्क के कारण हुई। <ref name="American Cancer Society">{{cite web | last =American Cancer Society | authorlink =Reuters | title =Report sees 7.6 million global 2007 cancer deaths | publisher =Reuters |month=December | year=2007 | url =http://www.reuters.com/article/healthNews/idUSN1633064920071217 | accessdate =2008-08-07 }}</ref> कर्क सभी जानवरों को प्रभावित कर सकता है।
लगभग सभी अलकृ रूपांतरित कोशिकाओं के [[संजीन|आनुवंशिक पदार्थ]] में असामान्यताओं के कारण होते हैं।<ref name="Kinz">{{cite book | author = Kinzler, Kenneth W.; Vogelstein, Bert | title = The genetic basis of human cancer | edition = 2nd, illustrated, revised| language = | publisher = McGraw-Hill, Medical Pub. Division | location = New York | year = 2002 | page = 5| isbn = 978-0-07-137050-9 | url = http://books.google.co.uk/books?id=pYG09OPbXp0C| chapter=Introduction |chapterurl=http://books.google.co.uk/books?id=pYG09OPbXp0C&pg=PA5&dq=%22from+defects+in+oncogenes%22&lr=&ei=EJ8pSujtDYWKygSqj8ikBw#PPA6,M1}}</ref> ये असामान्यताएं [[कैंसरजनक|कार्सिनोजन या का कर्कटजन]] (कर्कट पैदा करने वाले कारक) के कारण हो सकती हैं जैसे [[तम्बाकू धूम्रपान]], [[विद्युत चुम्बकीय विकिरण|विकिरण]], [[रसायन]], या [[रोगजनक|संक्रामक कारक]]. कर्कट को उत्पन्न करने वाली अन्य आनुवंशिक असामान्यताएं कभी कभी [[डीएनए प्रतिकृति|DNA कर्कट (डीएनए) प्रतिकृति]] में त्रुटि के कारण हो सकती हैं, या [[आनुवंशिक विकार|आनुवंशिक रूप से प्राप्त]] हो सकती हैं और इस प्रकार से जन्म से ही सभी कोशिकाओं में उपस्थित होती हैं।
कर्कट की [[आनुवंशिकता]] सामान्यतया कार्सिनोजन और पोषक के [[जीनोम]] के बीच जटिल अंतर्क्रिया से प्रभावित होती है। कर्कट रोगजनन की आनुवंशिकी के नए पहलू जैसे [[डीएनए (DNA) मिथाईलिकरण|DNA (डीएनए) मेथिलिकरण]] और [[माइक्रो RNA|माइक्रो RNA (आरएनए)]], का महत्त्व तेजी से बढ़ रहा है।
कर्कट में पाई जाने वाली आनुवंशिक असामान्यताएं आमतौर पर जीन के दो सामान्य वर्गों को प्रभावित करती हैं। कर्कट को बढ़ावा देने वाले ''अर्बुदजीन'' प्रारूपिक रूप से कर्कट की कोशिकाओं में सक्रिय होते हैं, उन कोशिकाओं को नए गुण दे देते हैं, जैसे सामान्य से अधिक वृद्धि और विभाजन, [[क्रमादेशित कोशिका मृत्यु]] से सुरक्षा, सामान्य उतक सीमाओं का अभाव और विविध ऊतक वातावरण में स्थापित होने की क्षमता.
इसके बाद ''[[गाँठ या अबुर्द का शमन करने वाला जीन|गाँठ का शमन करने वाले जीन]]'' कर्कट की कोशिकाओं में निष्क्रिय हो जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन कोशिकाओं की सामान्य क्रियाओं में कमी आ जाती है, जैसे सही DNA (डीएनए) प्रतिकृति, [[कोशिका चक्र]] पर नियंत्रण, ऊतकों के भीतर अभिविन्यास और आसंजन और [[प्रतिरक्षा प्रणाली|प्रतिरक्षा तंत्र]] की सुरक्षात्मक कोशिकाओं के साथ पारस्परिक क्रिया.
आम तौर पर इसके निदान के लिए एक [[संरचनात्मक विकृतिविज्ञान (रोगनिदान विज्ञान)|रोग निदान विज्ञानी]] को एक उतक [[बायोप्सी]] नमूने का [[ऊतक विज्ञान|ऊतक वैज्ञानिक]] परीक्षण करना पड़ता है, यद्यपि दुर्दमता के प्रारंभिक संकेत [[रेडियोग्राफी|विकिरण लेखी]] चित्रण असमान्यता के लक्षण हो सकते हैं।
अधिकांश कर्कट रोगों का इलाज किया जा सकता है, कुछ को ठीक भी किया जा सकता है, यह कर्कट के विशेष प्रकार, स्थिति और [[कैंसर की अवस्थाएं|अवस्था]] पर निर्भर करता है। एक बार निदान हो जाने पर, कर्कट का उपचार [[शल्य चिकित्सा]], [[रसायन चिकित्सा]] और [[विकिरण चिकित्सा]] के संयोजन के द्वारा किया जा सकता है। अनुसंधान के विकास के साथ, कर्कट की विभिन्न किस्मों के लिए उपचार और अधिक विशिष्ट हो रहे हैं।[[लक्षित चिकित्सा|लक्षित थेरेपी]] दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है जो विशिष्ट गाँठ में जांच योग्य आणविक असामान्यताओं पर विशेष रूप से कार्य करती हैं और सामान्य कोशिकाओं में क्षति को कम करती हैं। कर्कट के रोगियों का पूर्व निदान कर्कट के प्रकार से बहुत अधिक प्रभावित होता है, साथ ही रोग की [[कैंसर की अवस्थाएं|अवस्था]] और सीमा का भी इस पर प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, [[औतक विज्ञान|औतक वैज्ञानिक (हिस्टोलोजिक)]] श्रेणीकरण और विशिष्ट [[आणविक चिह्नक]] की उपस्थिति भी रोग के पूर्व निदान में तथा व्यक्तिगत उपचार के निर्धारण में सहायक हो सकती है।
== शब्दकोश ==
निम्नलिखित निकट सम्बंधित शब्दों का उपयोग असामान्य वृद्धि को नामित करने के लिए किया जा सकता है:
* '''[[गाँठ या अबुर्द]]:''' मूलतः, इसका अर्थ है कोई भी असामान्य सूजन, मांस का पिंड या टुकडॉ॰
वर्तमान अंग्रेज़ी में, यद्यपि, शब्द ट्यूमर, नियोप्लास्म, विशेष रूप से ठोस नियोप्लास्म का पर्याय बन गया है। ध्यान दें कि कुछ नियोप्लास्म, जैसे [[ल्यूकेमिया या रक्त कैंसर|रक्त कर्कट (श्वेतरक्तता)]], गाँठ (ट्यूमर) का निर्माण नहीं करते हैं।
* '''[[नियोप्लाजिया|नियोप्लास्म]]''' : एक वैज्ञानिक शब्द जो आनुवंशिक रूप से परिवर्तित कोशिकाओं के असामान्य प्रचुरोदभवन का वर्णन करता है। नियोप्लास्म दुर्दम या सौम्य हो सकता है।
** '''दुर्दम नियोप्लास्म''' या '''दुर्दम गाँठ''' : '''कर्कट''' का पर्याय है।
** '''सौम्य नियोप्लास्म''' या '''[[सौम्य गाँठ]]''' : एक गाँठ (ठोस नियोप्लास्म) जिसकी वृद्धि खुद ही रुक जाती है, यह अन्य उतकों पर आक्रमण नहीं करती है और मेटास्टेसिस प्रर्दशित नहीं करती है।
* '''आक्रामक या संक्रामक''' गाँठ का '''कर्कट''' का एक अन्य पर्याय है। इस नाम का उपयोग आस-पास के उतकों के संक्रमण के लिए किया जाता है।
* '''पूर्व-दुर्दमता''', '''पूर्व कर्कट''' या '''असंक्रामक''' गाँठ: एक नियाप्लास्म जो संक्रामक नहीं है लेकिन उपचार नहीं किए जाने पर कर्कटका रूप ले सकती हैं (संक्रामक हो सकती हैं).ये घाव कर्कटकी क्षमता के बढ़ने के आरोही क्रम में हैं, ये हैं [[एटाईपिया|एटाइपिया]], [[डिसप्लाजिया]] और [[कार्सिनोमा स्वस्थानी]] .
एक कर्कटका वर्णन करने के लिए निम्न शब्दों का उपयोग किया जा सकता है।
* '''स्क्रीनिंग''' : स्वस्थ व्यक्तियों में किया जाने वाला एक परीक्षण जो गाँठ के उत्पन्न होने से पहले ही उनकी जांच के लिए किया जाता है। एक [[मेमोग्राम]] एक स्क्रीनिंग परीक्षण है।
* '''निदान''' : एक गांठ की कर्कट प्रकृति की पुष्टि.इसमें सामान्यतया एक [[बायोप्सी]] या [[शल्य चिकित्सा]] के द्वारा गाँठ को हटाया जाता है, ऐसा एक [[शल्य चिकित्सा रोग निदान विज्ञान|रोगविज्ञानी]] के परीक्षण के बाद किया जाता है।
* '''शल्य विच्छेदन''' : एक ट्यूमर को एक [[शल्य क्रिया|शल्य चिकित्सक]] के द्वारा हटाया जाना.
** '''शल्य हाशिए''' : एक शल्य चिकित्सक के द्वारा हटाये गए उतक के किनारों का एक [[शल्य चिकित्सा रोग निदान विज्ञान|रोगविज्ञानी]] के द्वारा मूल्यांकन जिससे यह निर्धारित किया जाता है कि गाँठ को पूरी तरह से हटा दिया गया है ("नकारात्मक हाशिए") या गाँठ बच गई है ("सकारात्मक हाशिए").
* '''श्रेणी''' : एक [[शल्य चिकित्सा रोग निदान विज्ञान|रोगविज्ञानी]] के द्वारा स्थापित की गयी संख्या (सामान्यतया 3 के पैमाने पर) जो आस पास के सौम्य उतक की गाँठ के साथ समानता के अंश का वर्णन करने के लिए दी जाती है।
* '''अवस्था''' : एक संख्या (सामान्यतया 4 के पैमाने पर) जो एक [[ऑन्कोलॉजी या अबुर्द विज्ञान|कर्कट विज्ञानी]] गाँठ के द्वारा शरीर पर आक्रमण के अंश का वर्णन करने के लिए देता है।
* '''पुनरावृत्ति''' : नई गाँठ जो शल्य चिकित्सा के बाद पहले वाली गाँठ के स्थान पर ही उत्पन्न होती है।
* '''मेटास्टेसिस''' : नयी गाँठ जो कि मूल गाँठ से दूर उत्पन्न होती है।
* '''रूपांतरण''' : अवधारणा जिसके अनुसार समय के साथ एक कम श्रेणी की गाँठ, एक उच्च श्रेणी की गाँठ में रूपांतरित हो जाती है। उदाहरण: [[रिक्टर का रूपांतरण]].
* '''कीमोथैरेपी''' : दवाओं से इलाज.
* '''विकिरण चिकित्सा''' : विकिरण से उपचार.
* '''सहयोगी चिकित्सा''' : उपचार, या तो कीमोथेरपी या विकिरण चिकित्सा, जो शल्य चिकित्सा के बाद शेष कर्कट की कोशिकाओं को मारने के लिए दिया जाता है।
* '''पूर्वानुमान''' : थेरेपी के बाद उपचार की संभावनाइसे सामान्यतया निदान के बाद पाँच साल [[कैंसर पीड़ित|जीवित रहने]] की सम्भावना के रूप में व्यक्त किया जाता है। वैकल्पिक रूप से, इसे वर्षों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जा सकता है जब 50% रोगी अभी भी जीवित हों.दोनों ही संख्याएँ सैंकडों समान रोगियों से संचित किये गए आंकडों से उत्पन्न हुई व्युत्पन्न हुई हैं जो [[कपलान- मेयर अनुमानक|कपलन-मेयर वक्र]] बनाती हैं।
==सबसे आम कैंसर के प्रकार==
कैंसर के मुख्य रूप से दो प्रकार होते हैं ।
1) ब्लड कैंसर ( blood cancer ) :- ल्युकेमिया एक प्रकार का ब्लड कैंसर होता है , इसमें बोर्नमैरो में सफेद कोशिकाएं बेहद जल्दी बढ़ती है, इसमें इसकी जगह , कैंसर कोशिकाएं बढ़ती है और अच्छी कोशिकाओं बढ़ने की जगह नहीं मिलती ।
2) साॅलिड ट्युमर ( solid tumors ) :- इस अवस्था में कैंसर कोशिकाएं शरीर अंग में गुच्छा बनाकर रेहती, जिसे ट्युमर केहते है, यह जिस अंग में रेस्तरां है उस अंग को खराब करती है , शरीर के किसी भी हिस्से में यह बढ़ सकता है, इसके भी दो प्रकार होते हैं,
A) विनाईन ट्युमर ( ) :- यह ट्युमर जान के लिए इतना ख़तरनाक नहीं होता क्योंकि यह बहोत धीरे धीरे बढ़ता है ,
B) मेलगेनीस ट्यमर ( ) :- यह ट्युमर बहोत तेजी से बढ़ता है, और जान के लिए ख़तरनाक होता है, इसलिए इसका तुरंत उपचार करना चाहिए ।
अन्य प्रकार :-
3) साक्रोमा ( sacorma ) :- यह कैंसर हड्डियों , मांसपेशियो , रक्त वाहिकाओं का एक कैंसर हैं ।
4) कार्सीनोमा ( carcinoma ) :- कार्सीनोमा कैंसर त्वचा और ऊतकों से शुरू होता है, और बाद में अन्य अंगों को प्रभावित करता है।
4) लिंफोमा ( lymphoma ) :- यह एक इम्युनिटी का कैंसर होता है। इसके साथ मायलोमा भी इम्युनिटी का ही कैंसर होता है।
कैंसर के 100 से अधिक प्रकार हैं। कैंसर के प्रकार का नाम ,आमतौर पर उन अंगों या ऊतकों के लिए नाम दिया जाता है ,जहां कैंसर शुरू होता हैं, लेकिन उन्हें उन कोशिकाओं के प्रकार के नाम से भी जाना जाता है जिनसे वो बनते है। <ref>{{cite web | title=A to Z List of Cancer Types | website=A to Z List of Cancer Types | date=1980-01-01 | url=https://www.cancer.gov/types | access-date=2025-11-11}}</ref>।
[[सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा]]
[[ब्लैडर कैंसर]]
[[स्तन कैंसर]]
[[कोलोरेक्टल कैंसर]]
[[किडनी कैंसर]] (रेनल सेल)
[[ल्यूकेमिया]]
[[यकृत कैंसर]]
[[फेफड़ों का कैंसर]]
[[लिम्फोमा]]
[[अग्नाशय का कैंसर]]
[[प्रोस्टेट कैंसर]]
[[त्वचा कैंसर]]
[[गलग्रंथि का कैंसर]]
[[गर्भाशय का कैंसर]]
== वर्गीकरण ==
[[चित्र:BreastCancer.jpg|thumb|स्तन के एक नमूने में एक बड़ा आक्रामक डकटल कार्सिनोमा (वाहिनिपरक कर्कट)]]
कर्कट को कोशिका के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है जो गाँठ से समानता रखती है, इसीलिए, उतक को गाँठ से उत्पन्न माना जा सकता है। ये क्रमशः उतक विज्ञान और स्थान हैं। सामान्य श्रेणी के उदाहरणों में शामिल हैं:
* '''[[कार्सिनोमा या कैंसर|कार्सिनोमा]]''' : [[उपकला]] कोशिकाओं से व्युत्पन्न दुर्दम गाँठ.यह समूह सबसे सामान्य कैंसरों को अभिव्यक्त करता है, जिसमें [[स्तन कैंसर|स्तन]], [[प्रोस्टेट कैंसर|प्रोस्टेट]], [[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़े]] और [[कोलोरेक्टल (वृहद आंत्र-मलाशय का) कैंसर|बड़ी आंत के कर्कट]] के सामान्य रूप शामिल हैं।
* '''[[सार्कोमा]]''' : [[संयोजी ऊतक]], या [[मिजेन्काइमा|मध्योतक]] कोशिकाओं से व्युत्पन्न दुर्दम गाँठ.
* '''[[लिम्फोमा (लासिकबुर्द)|लिंफोमा]]''' और '''[[ल्यूकेमिया या रक्त कैंसर|रक्त कर्कट (श्वेतरक्तता)]]''' : दुर्दमता हिमेटोपोयटिक ([[खून|रक्त]]-बनाने वाली) कोशिकाओं से उत्पन्न होती है।
* '''[[जनन कोशिका गाँठ]]''' : [[टोटीपोटेंट (ऎसी कोशिका जो कई प्रकार के उतकों में विकसित होने की क्षमता रखती हो.)|टोटीपोटेंट]] कोशिका से उत्पन्न गाँठ. वयस्कों में अक्सर [[अंडकोष|शुक्र ग्रंथि]] और [[अंडाशय]] में पाया जाता है; भ्रूण, बच्चों और छोटे बच्चों में अधिकांशतया शरीर की मध्य रेखा पर, विशेष रूप से पुच्छ अस्थि के शीर्ष पर पाया जाता है; घोड़ों में अक्सर पोल (खोपड़ी के आधार) पर पाया जाता है।
* '''ब्लास्टिक गाँठ''' या [[ब्लास्टोमा]]: एक गाँठ (आमतौर पर दुर्दम) जो एक अपरिपक्व या भ्रूणीय उतक के समान होती है।
इन में से अधिकंश गांठें बच्चों में आम हैं।
दुर्दम गांठों (कर्कट) के नाम में आम तौर पर '''-कार्सिनोमा''', '''-सार्कोमा''' या '''-ब्लास्टोमा''' जैसे शब्दों का उपयोग प्रत्यय के रूप में किया जाता है, इसके साथ मूल शब्द के रूप में उत्पत्ति के अंग के लिए लैटिन या ग्रीक शब्द का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए, यकृत का कर्कट ''[[हिपेटोकार्सिनोमा]]'' कहलाता है; वसा कोशिकाओं का कर्कट ''लिपोसार्कोमा'' कहलाता है। आम कैंसरों के लिए, अंग के अंग्रेजी नाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए [[स्तन कैंसर]] का सबसे सामान्य प्रकार ''स्तन का वाहिनी परक कार्सिनोमा'' या ''मेमेरी डकटल कार्सिनोमा'' कहलाता है।
यहाँ पर विशेषण डकटल का उपयोग सूक्ष्मदर्शी में दिखायी देने वाले उस कर्कट के सन्दर्भ में किया जाता है, जो सामान्य स्तन की वाहिनियों से समानता रखती हैं।
वाहिनी शब्द का उपयोग, सूक्ष्मदर्शी में दिखाई देने वाली स्तन वाहिनियों के कर्कट के लिए किया गया है।
[[सौम्य गाँठ]] (जो कर्कट नहीं हैं) उनके नाम में '''-ओमा''' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, जिसमें मूल शब्द अंग का नाम होता है। उदाहरण के लिए, गर्भाशय की चिकनी पेशी की एक सौम्य गाँठ ''लियोमायोमा'' कहलाती है। (प्रायः पायी जाने वाली इस गाँठ का सामान्य नाम है ''फाईब्रोइड'' अर्थात रेशेदार).दुर्भाग्य से, कुछ तरह के कैंसरों के लिए भी '''-ओमा''' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, जैसे [[मेलेनोमा]] और [[सेमीनोमा|सेमिनोमा]].
== चिन्ह और लक्षण ==
[[चित्र:Symptoms of cancer
1) वजन ( Weight ) :- अचानक से वजन कम या ज्यादा होना कैंसर का एक लक्षण होता है
2) थकान (tiredness ) :- अगर दिनभर काम करते समय में जरुरत से थकान या कमजोरी महसूस होती हो तो यह भी कैंसर का लक्षण होता है।
3) त्वचा बदलाव ( skin changes ) :- त्वचा के किसी भी हिस्से में बार बार नील पड़ जाती हो या उसके नीचे गाठ मेहसूस हो तो यह भी कैंसर का लक्षण होता है।
4) खांसी ( cuff ) :- लंबे समय से खांसी या सांस लेने में कठिनाइ हो रही हो तो यह भी कैंसर का लक्षण होता है।
5) पाचन रोग ( digestive disease ) :- पाचन रोग भी इसका एक लक्षण होता है, पाचन समस्या में बार बार दस्त , कब्ज़ होते हैं।
6) भुक कम लगना ( loss of appetite ) :- कैंसर के लक्षणों में भुक भी कम होती या खाने की इच्छा ही नहीं होती।
7) बार बार बुखार आना ( frequent fever ) :- अगर बार बार बुखार आने की समस्या होती हो तो यह भी कैंसर का लक्षण होता है।
8) मांसपेशियों में दर्द ( muscle pain ) :- अगर बार बार मांसपेशियों में खिंचाव और दर्द मेहसूस हो, तो यह कैंसर के शुरूवाती लक्षण होते हैं, और साथ ही रात को ज्यादा पसीना आना भी इसमें शामिल हैं ।
9) संक्रमण होना ( getting infected ) :- बार बार संक्रमण होना भी एक कैंसर का लक्षण होता है।
metastasis.svg|thumb|right|विक्षेप कर्कट के लक्षण जो अबुर्द की स्थिति पर निर्भर करते हैं।]]
मोटे तौर पर, कर्कट के लक्षणों को तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है:
* ''स्थानीय लक्षण'' : असामान्य गाँठ या सूजन (''[[गाँठ या अबुर्द|अबुर्द]]''), [[रक्तस्राव]] (खून बहना), [[पीड़ा]] और / या [[अल्सर (त्वचाविज्ञान)|व्रनोदभवन (अल्सर का निर्माण)]]. आसपास के ऊतकों में संपीड़न की वजह से [[पीलिया]] जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं (आंखों और त्वचा का पीलापन).
* ''[[मेटास्टेसिस के लक्षण|मेटास्टेसिस (फैलना) के लक्षण]]'' : [[लसीका पर्व|लसिका पर्वों]] का आकार में बढ़ना, [[खाँसी]] और [[हिमोप्टाइसिस|हिमोपटायसिस]], [[हिपेटोमिगेली]] ([[यकृत]] का आकार में बढ़ना), अस्थि पीडा (हड्डी में दर्द), प्रभावित [[अस्थिभंग (हड्डी टूटना)|अस्थियों का टूटना]] और [[तंत्रिका विज्ञान|तंत्रीकीय]] लक्षण.
यद्यपि विकसित हो चुके कर्कट में [[पीड़ा|दर्द]] हो सकता है, अक्सर यह प्रारंभिक लक्षण नहीं होता है।
* ''प्रणालीगत लक्षण'' : [[वजन घटना]], [[एनोरेक्सिया (लक्षण)|भूख में कमी]], [[थकान (चिकित्सा)|थकान]] और [[कैचेक्सिया]] ([[व्यर्थ|व्यर्थ होना]]), अत्यधिक [[पसीना आना]] ([[स्लीप हाइपरहाइड्रोसिस (सोते समय बहुत अधिक पसीना आना)|रात को पसीना आना]]), [[रक्ताल्पता]] और विशिष्ट [[पेरानियोप्लास्टिक घटना]], अर्थात विशेष परिस्थितियां जो सक्रिय कर्कट के कारण होती हैं जैसे [[घनास्त्रता (किसी रक्त वाहिनी में रक्त का थक्का जम जाना)|घनास्त्रता (थ्रोम्बोसिस)]] या हार्मोन परिवर्तन.
उपरोक्त सूची में से प्रत्येक लक्षण कई प्रकार की स्थितियों के कारण हो सकता है (जिसकी एक सूची [[विभेदक निदान]] के रूप में दी गई है).कर्कट प्रत्येक मद के लिए एक आम या असामान्य कारण हो सकता है।
== कारण ==
कर्क भिन्न रोगों का एक वर्ग है जो अपने कारणों और जैव-विज्ञान में व्यापक भिन्नता रखते हैं। कोई भी जीव, यहां तक कि [[पौधे|पौधों]], में भी कर्कट कैंसर हो सकता है। लगभग सभी कर्कट कैंसर धीरे धीरे बढ़ते हैं, कर्कट और कैंसर की कोशिकाओं और इसकी पुत्री कोशिकाओं में त्रुटि उत्पन्न हो जाती है (सामान्य प्रकार की त्रुटियों के लिए [[कैंसर#क्रियाविधि|क्रियाविधि]] भाग देखें).
कोई भी चीज जो प्रतिकृति करती है (हमारी कोशिकाएं) [[संभाव्यता|संभवतया]] त्रुटियों से पीड़ित हो सकती हैं (उत्परिवर्तन). यदि [[त्रुटि संशोधन|त्रुटि सुधार]] और रोकथाम ठीक प्रकार से न किया जाये त्रुटियां बनी रहेंगी और [[कोशिका विभाजन|पुत्री कोशिकाओं]] को भी स्थानांतरित हो सकती हैं।
आम तौर पर, शरीर कई विधियों के माध्यम से कर्कट के खिलाफ बचने की कोशिश करता है, जैसे: [[एपोपटोसिस|एपोप्टोसिस]], सहायक अणु (कुछ DNA पोलीमरेज), सम्भवतः [[जीर्णता]] आदि। हालांकि ये त्रुटि सुधार विधियां छोटे मायनों में अक्सर असफल हो जाती हैं, विशेष रूप से ऐसे वातावरण में जहां त्रुटियों के उत्पन्न होने और बढ़ने की संभावनाएं अधिक होती हैं।
उदाहरण के लिए, ऐसे वातारण में विघटनकारी तत्व शामिल हो सकते हैं जो [[कार्सिनोजन या कैंसर पैदा करने वाले कारक|कार्सिनोजन]] (कर्कट पैदा करने वाले कारक) कहलाते हैं। या आवधिक चोट (भौतिक, ऊष्मा आदि) हो सकती है, या वातावरण जिसमें कोशिकाएं अपने अस्तित्व के लिए विकसित नहीं हुई हों, जैसे [[हाइपोक्सिया]]<ref>{{cite journal | author = Nelson DA, Tan TT, Rabson AB, Anderson D, Degenhardt K, White E | title = Hypoxia and defective apoptosis drive genomic instability and tumorigenesis | url = https://archive.org/details/sim_genes-development_2004-09-01_18_17/page/2094 | journal = Genes & Development | volume = 18 | issue = 17 | pages = 2095–107 | year = 2004 | month = September | pmid = 15314031 | pmc = 515288 | doi = 10.1101/gad.1204904 | accessdate = 2009-06-06|issn = 0890-9369}}</ref> (देखें उपभाग).
इस प्रकार से कर्कट एक ''प्रगतिशील'' रोग है और ये प्रगतिशील त्रुटियां धीरे धीरे कोशिका में संचित होती रहती हैं जब तक जंतु में उपस्थित कोशिका अपने कार्यों के विपरीत कार्य नहीं करने लगती.
वे त्रुटियां जो कर्कट का कारण होती हैं, अक्सर ''स्व-प्रवर्धनशील'' होती हैं, अंततः एक घातीय दर
(धन की तरह) पर बढ़ती हैं।
उदाहरण के लिए:
* एक कोशिका त्रुटि सुधार मशीनरी में एक उत्परिवर्तन, उस कोशिका और उसकी संतति में त्रुटियों के अधिक तेजी से संचित होने का कारण बन सकता है।
* कोशिका की संकेतन ([[अन्तः स्रावी]]) मशीनरी में एक उत्परिवर्तन, आस पास की कोशिकाओं में त्रुटि उत्पन्न करने वाले संकेत भेज सकता है।
* एक उत्परिवर्तन के कारण कोशिकाएं [[नियोप्लास्टिक]] बन सकती हैं, जिसके कारण वे स्थानांतरित होकर अधिक स्वस्थ कोशिकाओं के कार्य को बाधित कर सकती हैं।
* एक उत्परिवर्तन के कारण कोशिका अमर बन सकती है (देखें [[टेलोमर्स|टेलोमेयर्स]]), जिसके कारण वे हमेशा के लिए स्वस्थ कोशिकाओं को बाधित करती हैं।
इस प्रकार से कर्कट अक्सर कुछ त्रुटियों के कारण एक [[श्रृंखला अभिक्रिया]] के रूप में विस्फोटित होता है, ये त्रुटियां संयुक्त होकर अधिक गंभीर त्रुटियां बनाती हैं।
ऐसी त्रुटियां जो अधिक त्रुटियां उत्पन्न करती हैं, वे प्रभावी रूप से कर्कट का मूल कारण हैं और साथ ही, ये इस बात का कारण भी हैं कि कर्कट का उपचार बहुत मुश्किल है: चाहे कर्कट की 10,000,000,000 कोशिकाओं में से सब को मार देने के बाद, उनमें से (और त्रुटि प्रवण पूर्व कर्कट कोशिकाएं) केवल 10 कोशिकाएं अपनी प्रतिकृति कर सकती हैं या त्रुटि उत्पन्न करने वाले संकेतों को अन्य कोशिकाओं को भेज सकती हैं तो प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है। यह विद्रोह सदृश परिदृश्य अवांछनीय [[योग्यतम की उत्तरजीविता]] है, जहां [[विकास]]वादी बल खुद शरीर के डिजाइन और व्यवस्था को लागू करने के विरुद्ध कार्य करते हैं
वास्तव में, एक बार जब कर्कट विकसित होना शुरू हो जाता है, यही बल निरन्तर अधिक आक्रामक अवस्थाओं की ओर कर्कट की प्रगति में सहायक होता है, ओर यह [[कैंसर#क्लोन विकास|क्लोनल विकास]] कहलाता है।<ref>{{cite journal |author=Merlo LM, Pepper JW, Reid BJ, Maley CC |title=Cancer as an evolutionary and ecological process |journal=Nat. Rev. Cancer |volume=6 |issue=12 |pages=924–35 |year=2006 |month=December |pmid=17109012 |doi=10.1038/nrc2013}}</ref>
कर्कट के कारणों के बारे में अनुसंधान अक्सर निम्नलिखित श्रेणियों में आते हैं:
* कारक (उदाहरण वायरस) ओर घटनाएं (उदाहरण उत्परिवर्तन) जो कोशिकाओं में आनुवंशिक परिवर्तनों के द्वारा कर्कट को जन्म देते हैं।
* आनुवंशिक क्षति की यथार्थ प्रकृति और जीन जो इसके द्वारा प्रभावित होते हैं।
* कोशिका के जीव विज्ञान पर उन आनुवंशिक परिवर्तनों के परिणाम, एक कर्कट कोशिका के लाक्षणिक गुणों को उत्पन्न करने में और साथ ही अतिरिक्त आनुवंशिक घटनाओं को बढ़ावा देने में जो आगे कर्कट के विकास में सहायक हैं।
=== उत्परिवर्तन: रासायनिक कर्सिनोजन (कर्कट पैदा करने वाले कारक) ===
कर्कट रोग जनन का कारण है [[DNA (डीएनए) उत्परिवर्तन]] जो कोशिका वृद्धि और मेटास्टेसिस को प्रभावित करता है।
वे पदार्थ जो [[DNA (डीएनए) उत्परिवर्तन]] का कारण हैं उत्परिवर्तजन कहलाते हैं और वे उत्परिवर्तजन जो कर्कट का कारण हैं, कार्सिनोजन कहलाते हैं। कई विशेष प्रकार के पदार्थ विशिष्ट प्रकार के विक्षेपसे जुड़े हुए हैं।[[तंबाकू धूम्रपान|तम्बाकू धूम्रपान]] कर्कट के कई रूपों से सम्बंधित है,<ref name="Sasco">{{cite journal |author=Sasco AJ, Secretan MB, Straif K |title=Tobacco smoking and cancer: a brief review of recent epidemiological evidence |journal=Lung cancer (Amsterdam, Netherlands) |volume=45 Suppl 2 |issue= |pages=S3–9 |year=2004 |month=August |pmid=15552776 |doi=10.1016/j.lungcan.2004.07.998}}</ref> और 90% [[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़ों के कैंसर]] का कारण है।<ref>{{cite journal |author=Biesalski HK, Bueno de Mesquita B, Chesson A, ''et al.'' |title=European Consensus Statement on Lung Cancer: risk factors and prevention. Lung Cancer Panel |journal=CA: a cancer journal for clinicians |volume=48 |issue=3 |pages=167–76; discussion 164–6 |year=1998 |pmid=9594919 |doi=10.3322/canjclin.48.3.167 |url=http://caonline.amcancersoc.org/cgi/pmidlookup?view=long&pmid=9594919 }}{{Dead link|date=जनवरी 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> लम्बे समय तक [[एस्बेस्टस]] फाइबर के संपर्क में रहने से [[मीजोथेलीओमा|मिजोथेलिओमा]] हो सकता है।<ref>{{cite journal |author=O'Reilly KM, Mclaughlin AM, Beckett WS, Sime PJ |title=Asbestos-related lung disease |journal=American family physician |volume=75 |issue=5 |pages=683–8 |year=2007 |month=March |pmid=17375514 |doi= |url=http://www.aafp.org/afp/20070301/683.html |access-date=15 दिसंबर 2009 |archive-date=29 सितंबर 2007 |archive-url=https://web.archive.org/web/20070929083111/http://www.aafp.org/afp/20070301/683.html |url-status=dead }}</ref>
अनेक [[उत्परिवर्तजन]] [[कार्सिनोजन या कैंसर पैदा करने वाले कारक|कार्सिनोजन]] भी हैं, लेकिन कुछ कार्सिनोजन उत्परिवर्तजन नहीं हैं।[[एल्कोहल]] एक रासायनिक कार्सिनोजन का उदाहरण है जो उत्परिवर्तजन नहीं है।<ref>{{cite journal |author=Seitz HK, Pöschl G, Simanowski UA |title=Alcohol and cancer |journal=Recent developments in alcoholism : an official publication of the American Medical Society on Alcoholism, the Research Society on Alcoholism, and the National Council on Alcoholism |volume=14 |pages=67–95 |year=1998 |pmid=9751943}}</ref> इस प्रकार के रसायन कोशिका विभाजन की दर को उत्प्रेरित करके कैंसर को बढ़ावा देते हैं। प्रतिकृति की तेज दर एंजाइमों की मरम्मत के लिए कम समय देती है जिससे [[DNA (डीएनए) प्रतिकृति]] के दौरान क्षतिग्रस्त DNA (डीएनए) की मरम्मत के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पता है, जिसके कारण एक उत्परिवर्तन की संभावना बढ़ जाती है।
[[चित्र:Cancer smoking lung cancer correlation from NIH.svg|thumb|300px|right|फेफड़ों के कैंसर के मामले धूम्रपान के साथ अत्यधिक संबंधित है। स्रोत: NIH.]]
कई दशकों के अनुसंधान [[तम्बाकू]] के उपयोग और फुफ्फुस, स्वर यंत्र, सिर, गर्दन, आमाशय, मूत्राशय, वृक्क, ग्रसनी और अग्नाशय के कैंसर के बीच सम्बन्ध को प्रर्दशित करते हैं।<ref>{{cite journal |author=Kuper H, Boffetta P, Adami HO |title=Tobacco use and cancer causation: association by tumour type |url=https://archive.org/details/sim_journal-of-internal-medicine_2002-09_252_3/page/206 |journal=Journal of internal medicine |volume=252 |issue=3 |pages=206–24 |year=2002 |month=September |doi=10.1046/j.1365-2796.2002.01022.x |pmid=12270001}}</ref> तम्बाकू धूम्रपान में [[नाइट्रोसेमिन|नाइट्रोसेमाइन]] और [[बहुचाक्रीय एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन|बहुचक्रीय हाइड्रोकार्बन]] सहित पचास ज्ञात कार्सिनोजन पाए जाते हैं<ref name="Kuper"/> तम्बाकू विकसित दुनिया में तीन में से एक कैंसर मृत्यु के लिए उत्तरदायी है,<ref name="Sasco"/> और दुनिया भर में लगभग पांच में से एक मृत्यु के लिए। <ref name="Kuper">{{cite journal |author=Kuper H, Adami HO, Boffetta P |title=Tobacco use, cancer causation and public health impact |url=https://archive.org/details/sim_journal-of-internal-medicine_2002-06_251_6/page/455 |journal=Journal of internal medicine |volume=251 |issue=6 |pages=455–66 |year=2002 |month=June |doi=10.1046/j.1365-2796.2002.00993.x |pmid=12028500}}</ref> दरअसल, संयुक्त राज्य अमेरिका में [[फेफड़ों का कैंसर|फुफ्फुस की कैंसर]] मृत्यु की दर ने [[तंबाकू धूम्रपान|धुम्रपान]] के प्रतिरूप को प्रतिबिंबित किया है, जिसके अनुसार धुम्रपान में वृद्धि के साथ फुफ्फुस कैंसर मृत्यु दर में वृद्धि होती है और अधिक हाल ही में दर्शाया गया कि धुम्रपान में कमी से पुरुषों में फुफ्फुस कैंसर मृत्यु दर में भी कमी होती है।
हालांकि, दुनिया भर में अभी भी धुम्रपान करने वालों की संख्या बढ़ रही है, कुछ संगठनों के द्वारा इसके कारण उत्पन्न वाली स्थिति को ''तम्बाकू महामारी'' के रूप में वर्णित किया गया है।<ref>{{cite journal |author=Proctor RN |title=The global smoking epidemic: a history and status report |journal=Clinical lung cancer |volume=5 |issue=6 |pages=371–6 |year=2004 |month=May |doi=10.3816/CLC.2004.n.016 |pmid=15217537}}</ref>
=== उत्परिवर्तन: आयनीकरण करने वाले विकिरण ===
[[आयनीकरण विकिरण|आयनीकरण करने वाले विकिरण]] के स्रोत जैसे [[रेडोन]] गैस, कैंसर पैदा कर सकते हैं। [[सूरज|सूर्य]] के [[पराबैंगनी विकिरण]] के लंबे समय तक संपर्क में रहने से [[मेलेनोमा]] और अन्य त्वचा दुर्दमताएं हो सकती हैं।<ref>{{cite journal |author=English DR, Armstrong BK, Kricker A, Fleming C |title=Sunlight and cancer |journal=Cancer causes & control : CCC |volume=8 |issue=3 |pages=271–83 |year=1997 |month=May |doi=10.1023/A:1018440801577 |pmid=9498892}}</ref>
[[मोबाइल फोन]] और अन्य स्रोतों से निकलने वाले गैर-आयनीकरण आवृति विकिरण भी कैंसर का कारण माने गए हैं, लेकिन ऐसे सम्बन्ध के बहुत कम प्रमाण मिले हैं।<ref>{{cite journal |author=Feychting M, Ahlbom A, Kheifets L |title=EMF and health |journal=Annual review of public health |volume=26 |issue= |pages=165–89 |year=2005 |pmid=15760285 |doi=10.1146/annurev.publhealth.26.021304.144445}}</ref> फिर भी कुछ विशेषज्ञ [[एहतियाती सिद्धांत]] के आधार पर लम्बे समय तक ऎसी चीजों के संपर्क में रहने से बचने की सलाह देते हैं।<ref>''[http://www.cnn.com/2008/HEALTH/conditions/07/23/cancer.cell.phones.ap/index.html कैंसर विशेषज्ञ सेलफोन पर कर्मचारियों को चेतावनी देते हैं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20081217041420/http://www.cnn.com/2008/HEALTH/conditions/07/23/cancer.cell.phones.ap/index.html |date=17 दिसंबर 2008 }}'', [http://www.cnn.com CNN], 23 जुलाई 2008</ref>
=== वायरस या जीवाणु का संक्रमण ===
कुछ कर्कट [[रोगज़नक़]] के [[संक्रमण]] के कारण हो सकते हैं।<ref>{{cite journal |author=Pagano JS, Blaser M, Buendia MA, ''et al.'' |title=Infectious agents and cancer: criteria for a causal relation |journal=Semin. Cancer Biol. |volume=14 |issue=6 |pages=453–71 |year=2004 |month=December |pmid=15489139 |doi=10.1016/j.semcancer.2004.06.009}}</ref> कई कैंसर एक [[वायरस]] के संक्रमण के कारण होते हैं; यह विशेष रूप से जंतुओं जैसे [[पक्षी|पक्षियों]] में देखा जाता है, लेकिन [[मानव|मनुष्यों]] में भी ऐसा होता है, पूरी दुनिया में 15% मानव कैंसर के लिए वायरस ही जिम्मेदार हैं।
मानव के कैंसर से सम्बंधित मुख्य वायरस हैं [[मानव पेपिलो वायरस|मानव पेपिलोमा वायरस]], [[हेपेटाइटिस बी|हैपेटाइटिस बी]] और [[हेपेटाइटिस सी]] वायरस, [[एपस्तीन-बार वायरस|एपस्टीन-बार वायरस]] और [[मानव T-लिम्फोटरोपिक वायरस|मानव टी -लिम्फोट्रोपिक वायरस]].
प्रायोगिक और महामारी आंकडे वायरस की एक कारक भूमिका का संकेत देते हैं और वे मानव में कैंसर के विकास के लिए दूसरे सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में सामने आये हैं, जबकि पहला कारक तम्बाकू का उपयोग है।<ref name="zur Hausen-viruses">{{cite journal | author = zur Hausen H | title = Viruses in human cancers | url = https://archive.org/details/sim_science_1991-11-22_254_5035/page/1166 | journal = Science | volume = 254 | issue = 5035 | pages = 1167–73 | year = 1991 | pmid = 1659743| doi = 10.1126/science.1659743}}</ref> वायरस-प्रेरित गांठों को दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, ''तीव्रता से रूपांतरित होने वाले'' और ''धीरे धीरे रूपांतरित होने वाले'' .
तीव्रता से रूपांतरित होने वाले वायरसों में वायरस एक अतिसक्रिय ओंकोजीन को संवाहित करता है जिसे वायरल-ओंकोजीन (v-onc) कहा जाता है और संक्रमित कोशिका v-onc की अभिव्यक्ति के साथ तुंरत ही रूपांतरित हो जाती है।
इसके विपरीत, धीरे धीरे रूपांतरित होने वाले वायरस में, वायरस जीनोम, पोषी के जीनोम में एक प्रोटो-ओंकोजीन के पास प्रविष्ट होता है।
अब वायरल [[प्रवर्धक|प्रवर्तक]] या अन्य प्रतिलेखन विनियमन तत्व उस प्रोटो-ओंकोजीन की अति-अभिव्यक्ति का कारण बनते हैं। इसमें अनियंत्रित कोशिका विभाजन शामिल है। क्योंकि प्रविष्टि का स्थान प्रोटो-ओंकोजीन के लिए विशिष्ट नहीं होता है और किसी भी प्रोटो-ओंकोजीन के पास प्रविष्टि की सम्भावना कम होती है, धीमी गति से रूपांतरित होने वाले वायरस, तीव्रता से रूपांतरित होने वाले वायरस की तुलना में, संक्रमण के अधिक लम्बे समय के बाद गाँठ पैदा करते हैं।
[[हेपेटाइटिस बी|हैपेटाइटिस बी]] और [[हेपेटाइटिस सी]] सहित हेपेटाइटिस वायरस, एक दीर्घकालिक (क्रोनिक) वायरल संक्रमण को प्रेरित कर सकता है, जो प्रतिवर्ष [[हेपेटाइटिस बी|हैपेटाइटिस बी]] के 0.47% रोगियों में (विशेष रूप से एशिया में, उत्तरी अमेरिका में ऐसा कम देखा गया है) और प्रति वर्ष [[हेपेटाइटिस सी]] के 1.4% रोगियों में [[यकृतकोशिकी कार्सिनोमा|यकृत कैंसर]] का कारण है। लीवर सिरोसिस, चाहे क्रोनिक वायरल हैपेटाइटिस संक्रमण के कारण हो या शराब पीने के कारण, यह [[यकृत कोशिकी कार्सिनोमा|यकृत कैंसर]] के विकास से सम्बंधित होता है और सिरोसिस और वायरल हैपेटाइटिस का संयोजन [[यकृत कोशिकी कार्सिनोमा|यकृत कैंसर]] विकास के उच्चतम जोखिम का कारण है। दुनिया भर में [[वायरल हेपेटाइटिस|वायरल हैपेटाइटिस]] के संचरण और रोग के भारी बोझ के कारण, [[यकृत कोशिकी कार्सिनोमा|यकृत कैंसर]] सबसे आम और सबसे अधिक घातक कैंसरों में से एक है।
कैंसर अनुसंधान में आधुनिकीकरण ने कैंसर को रोकने के लिए एक वेक्सीन को डिजाइन किया है। 2006 में, [[यू. एस. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन]] ने एक [[मानव पेपिलोमा वायरस]] वेक्सीन को स्वीकृति दी जिसे [[गर्दासिल|गार्दासिल]] कहा जाता है। वेक्सीन चार HPV (एचपीवी) प्रकारों से सुरक्षा करती है, जो 70% गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर और 90% जननांग मस्सों का कारण हैं। मार्च 2007 में, यू. एस. [[रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए केंद्र|सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन]] (CDC) [[प्रतिरक्षा प्रक्रियाओं पर सलाहकार समिटी]] (ACIP) ने अधिकारिक रूप से सलाह दी की 11-12 आयु वर्ग की लड़कियों को वेक्सीन दी जानी चाहिए और इंगित किया कि 9 साल की छोटी लड़कियों से लेकर 26 साल की आयु तक की महिलाएं इस प्रतिरक्षा के लिए पात्र हैं अर्थात उन्हें यह टीका लगाया जा सकता है।
वायरस के अलावा, शोधकर्ताओं ने [[कैंसर के जीवाणु|जीवाणु और कुछ विशेष प्रकार के कर्कट]] के बीच सम्बन्ध पाया है। सबसे प्रमुख उदाहरण है [[आमाशय का कैंसर|आमाशय के कर्कट]] और आमाशय की दीवार के ''[[हेलिकोबेक्टर पायलोरी]]'' के द्वारा जीर्ण संक्रमण के बीच सम्बन्ध.<ref>{{cite journal |author=Peter S, Beglinger C |title=Helicobacter pylori and gastric cancer: the causal relationship |journal=Digestion |volume=75 |issue=1 |pages=25–35 |year=2007 |pmid=17429205 |doi=10.1159/000101564}}</ref><ref>{{cite journal |author=Wang C, Yuan Y, Hunt RH |title=The association between Helicobacter pylori infection and early gastric cancer: a meta-analysis |url=https://archive.org/details/sim_american-journal-of-gastroenterology_2007-08_102_8/page/1789 |journal=Am. J. Gastroenterol. |volume=102 |issue=8 |pages=1789–98 |year=2007 |month=August |pmid=17521398 |doi=10.1111/j.1572-0241.2007.01335.x}}</ref> हालांकि बहुत कम मामलों में ''हेलिकोबेक्टर'' का संक्रमण जीर्णमें विकसित होता है, चूंकि यह रोगजनक बहुत आम है, यह संभवतया इस प्रकार के अधिकांश कर्कटों के लिए उत्तरदायी है।<ref>{{cite journal |author=Cheung TK, Xia HH, Wong BC |title=Helicobacter pylori eradication for gastric cancer prevention |journal=J. Gastroenterol. |volume=42 Suppl 17 |issue= |pages=10–5 |year=2007 |month=January |pmid=17238019 |doi=10.1007/s00535-006-1939-2}}</ref> [[कोरोनावायरस रोग 2019]] को भी कैंसर से जुड़े होने की परिकल्पना की गई है <ref>{{Cite journal|last=Habibzadeh|first=Parham|last2=Dastsooz|first2=Hassan|last3=Eshraghi|first3=Mehdi|last4=Łos|first4=Marek J.|last5=Klionsky|first5=Daniel J.|last6=Ghavami|first6=Saeid|date=2021-01|title=Autophagy: The Potential Link between SARS-CoV-2 and Cancer|url=https://www.mdpi.com/2072-6694/13/22/5721|journal=Cancers|language=en|volume=13|issue=22|pages=5721|doi=10.3390/cancers13225721|issn=2072-6694}}</ref>
=== हार्मोनल असंतुलन ===
इसी प्रकार से कुछ होरमोन गैर-उत्परिवर्तजनिक कर्सिनोजन्स की तरह व्यवहार करते हैं, वे अतिरिक्त कोशिका वृद्धि को उत्तेजित कर सकते हैं। एक अच्छा उदाहरण है-[[एंडोमिट्रियल कैंसर|अन्तर्गर्भाशयकला के कर्कट]] को विकसित करने में [[एस्ट्रोजन|हाइपर एस्ट्रोजेनिक (एस्ट्रोजन होरमोन की मात्रा का बढ़ना)]] अवस्थाओं की भूमिका.
=== प्रतिरक्षा तंत्र की क्रिया प्रणाली में खराबी ===
[[HIV (एचआईवी)]] कई प्रकार की दुर्दमताओं से सम्बंधित है जिसमें शामिल है [[कापोसी सार्कोमा]], [[गैर-होजकिन्स लिम्फोमा]] और [[HPV (एचपीवी)]]-सम्बंधित दुर्दमताएं जैसे [[गुदा कैंसर]] और [[गर्भाशय ग्रीवा कैंसर|गर्भाशय ग्रीवा का कर्कट]] . [[AIDS (एड्स)]]- को परिभाषित करने वाली बीमारियों में लम्बे समय से ये निदान शामिल हैं। HIV (एचआईवी) रोगियों में दुर्दमता की बढ़ती हुई घटनाएं कर्कट की एक संभव इटियोलोजी के रूप में प्रतिरक्षा निगरानी के टूटने की ओर इशारा करती हैं।<ref>{{cite journal |author=Wood C, Harrington W |title=AIDS and associated malignancies |journal=Cell Res. |volume=15 |issue=11-12 |pages=947–52 |year=2005 |pmid=16354573 |doi=10.1038/sj.cr.7290372}}</ref> अन्य विशिष्ट प्रतिरक्षा की कमी की अवस्थाएं (उदाहरण [[आम भिन्न प्रतिरक्षा क्षति]] ओर [[IgA की कमी]]) भी दुर्दमता के जोखिम के बढ़ने से सम्बंधित हैं।<ref>{{cite journal |author=Mellemkjaer L, Hammarstrom L, Andersen V, ''et al.'' |title=Cancer risk among patients with IgA deficiency or common variable immunodeficiency and their relatives: a combined Danish and Swedish study |journal=Clin. Exp. Immunol. |volume=130 |issue=3 |pages=495–500 |year=2002 |pmid=12452841|doi=10.1046/j.1365-2249.2002.02004.x}}</ref>
=== आनुवंशिकता ===
कैंसर के अधिकतर रूप ''विकीर्ण (स्पोरेडिक)'' होते हैं, अर्थात उनका कोई आनुवंशिक कारण नहीं होता है।
हालांकि, ऐसे कई [[सिंड्रोम]] हैं जिनमें कैंसर के लिए अनुवांशिक रूप से प्राप्त पूर्व प्रवृति या विशेष सुग्राह्यता होती है, ऐसा अक्सर एक जीन में दोष के कारण होता है जो [[ट्यूमर या गाँठ का शमन करने वाला.|गाँठ के निर्माण के विरुद्ध रक्षा]] करता है।
प्रसिद्ध उदाहरण हैं:
* ''[[बीआरसीए 1|BRCA1]]'' और ''[[फेफड़ों के कैंसर#गैर छोटे कोशिका फुफ्फुस कार्सिनोमा .28 NSCLC.29|BRCA2]]'' जीनों में निश्चित आनुवंशिक उत्परिवर्तन [[स्तन कैंसर]] और [[डिम्बग्रंथि के कैंसर]] के जोखिम को बढाते हैं।
* [[बहुल अन्तः स्रावी नियोप्लाजिया|एकाधिक अन्तः स्रावी नियोप्लाजिया]] में भिन्न अन्तः स्रावी अंगों की गांठें (MEN प्रकार 1, 2a, 2b)
* [[p53]] के उत्परिवर्तनों के कारण [[ली-फ्रामेनी सिंड्रोम]] (विभिन्न ट्यूमर जैसे [[ओस्टियो सार्कोमा]], स्तन कैंसर, [[कोमल ऊतक सार्कोमा]], [[मस्तिष्क का ट्यूमर]]).
* [[टरकोट सिंड्रोम]] ([[मस्तिष्क का ट्यूम]] और वृहद् आंत्रीय पोली पोसिस)
* [[फेमिलियल एडिनोमेटस पोलीपोसिस]] ''APC'' जीन में एक वंशागत उत्परिवर्तन जो [[बृहदान्त्र कार्सिनोमा]] की शुरुआत का कारण है।
* [[वंशानुगत नॉन पोलीपोसिस वृहद् आंत्र मलाशय कैंसर|वंशानुगत नॉन-पोलिपोसिस बड़ी आंत-मलाशय का कैंसर]] (HNPCC, लिंच सिंड्रोम के रूप में भी जाना जाता है) [[पोलिप (दवा)|बृहदान्त्र पोलिप्स]] की प्रमुखता के बिना [[वृहद् आंत्र मलाशय कैंसर|बड़ी आंत के कैंसर]], [[आमाशय का कैंसर|गर्भाशय के कर्कट]], आमाशय के कैंसर और [[डिम्बग्रंथि का कैंसर|डिम्बग्रंथि के कर्कट]], के परिचित मामले शामिल हो सकते हैं।
* [[दृष्टि पटल]] का प्रसू - अर्बुद, जब छोटे बच्चों में होता है, तो यह [[रेटिनोब्लास्टोमा|दृष्टि पटल का प्रसू - अर्बुद]] जीन में एक वंशानुगत उत्परिवर्तन के कारण होता है।
* [[डाउन सिंड्रोम]] के रोगी, जिनमें एक अतिरिक्त [[गुणसूत्र 21]] होता है, उनमें [[ल्यूकेमिया या रक्त कैंसर|श्वेतरक्तता]] और [[शुक्र ग्रंन्थि का कैंसर|शुक्र ग्रंथि कर्कट]] के मामले देखे गए हैं, यद्यपि इस कारण को ठीक प्रकार से समझा नहीं गया है।
=== अन्य कारण ===
गर्भधारण के साथ और केवल एक सीमांत रूप में कुछ अंग दाताओं के साथ इस रोग का संचरण कभी कभी हो जाता है, अन्यथा कैंसर सामन्यतया एक संक्रामक रोग नहीं है। इसका मुख्य कारण है [[प्रमुख उतक अनुरूपता जटिल]] [[उतक अनुरूपता|असंगति या बेजोड़ता]] के कारण ऊतक ग्राफ्ट अस्वीकृति.<ref name="Tolar">{{cite journal |author=Tolar J, Neglia JP |title=Transplacental and other routes of cancer transmission between individuals |journal=J Pediatr Hematol Oncol. |volume=25 |issue=6 |pages=430–4 |year=2003 |month=June |pmid=12794519 |doi=10.1097/00043426-200306000-00002 |url=http://meta.wkhealth.com/pt/pt-core/template-journal/lwwgateway/media/landingpage.htm?issn=1077-4114&volume=25&issue=6&spage=430}}</ref> मानव और अन्य कशेरुकियों में, प्रतिरक्षी तंत्र "स्व" और "गैर-स्व" कोशिकाओं के बीच विभेदन करने के लिए MHC प्रतिजनों का उपयोग करता है, क्योंकि ये प्रतिजन प्रत्येक व्यक्ति में अलग होते हैं।
जब गैर स्व प्रतिजनों का सामना होता है, तो प्रतिरक्षा तंत्र उपयुक्त कोशिका के खिलाफ प्रतिक्रिया करता है। ऐसी अभिक्रियाएं प्रत्यारोपित कोशिकाओं को नष्ट करके गाँठ कोशिका ग्राफ्टिंग के खिलाफ सुरक्षा करती हैं
संयुक्त राज्य अमेरिका में, प्रतिवर्ष लगभग 3500 गर्भवती महिलाओं में दुर्दमता पायी जाती है, प्लेसंटा (अपरा) के माध्यम से मां से भ्रूण में [[तीव्र रक्त कैंसर]], [[लिम्फोमा]], [[मेलेनोमा|मेलानोमा]] और [[कार्सिनोमा]] के संचरण को देखा गया है।<ref name="Tolar"/> अंग प्रत्यारोपण के द्वारा दाता से व्युत्पन्न गाँठ बहुत कम पायी जाती है।
अंग प्रत्यारोपण से सम्बंधित गाँठ का मुख्य कारण है दुर्दम मेलानोमा, जो अंग को हटाने के समय ज्ञात नहीं था,<ref>{{cite journal |author=Dingli D, Nowak MA |title=Cancer biology: infectious tumour cells |journal=Nature |volume=443 |issue=7107 |pages=35–6 |year=2006 |month=September |pmid=16957717 |doi=10.1038/443035a |url=https://archive.org/details/sim_nature-uk_2006-09-07_443_7107/page/n55}}</ref> हालांकि अन्य मामले उपस्थित थे<ref>{{cite website|title= Cancer Spread By Transplantation Extremely Rare: In Very Rare Case, Woman Develops Leukemia from Liver Transplant|url= http://www.cancer.org/docroot/NWS/content/NWS_1_1x_Cancer_Spread_By_Transplantation_Extremely_Rare.asp|access-date= 15 दिसंबर 2009|archive-date= 15 जुलाई 2009|archive-url= https://web.archive.org/web/20090715175521/http://www.cancer.org/docroot/NWS/content/NWS_1_1x_Cancer_Spread_By_Transplantation_Extremely_Rare.asp|url-status= dead}}</ref>.
वास्तव में, एक जीव से कैंसर आमतौर पर उसी प्रजाति के दूसरे जीव में तभी वृद्धि करता है जब उन दोनों में समान [[उतक अनुरूपता|उतक असंगति]] के जीन हों<ref>{{cite website |title= The Nobel Prize in Physiology or Medicine 1980|url=http://nobelprize.org/nobel_prizes/medicine/laureates/1980/presentation-speech.html}}</ref>, चूहों का उपयोग करके ऐसा सिद्ध किया गया है; हालांकि ऊपर वर्णित स्थिति के अलावा वास्तविक दुनिया में ऐसा कभी नहीं होता है।
मानव के अलावा अन्य जीवों में कुछ ऐसे प्रकार के कैंसर पाए गए हैं जो खुद गाँठ की कोशिकाओं के संचरण के द्वारा होते हैं। यह घटना [[स्टीकर का सार्कोमा|स्टिकर सार्कोमा]] से युक्त कुत्तों में देखि गयी है, जो केनायन ट्रांसमिसिबल वेनरल ट्यूमर<ref>{{cite journal |author=Murgia C, Pritchard JK, Kim SY, Fassati A, Weiss RA |title=Clonal origin and evolution of a transmissible cancer |journal=Cell |volume=126 |issue=3 |pages=477–87 |year=2006 |pmid=16901782 |doi=10.1016/j.cell.2006.05.051}}</ref> और [[Tasmanian Devil|तस्मानियन डेविल]] में [[तस्मानियन डेविल|डेविल चेहरे के ट्यूमर की बीमारी]] के रूप में भी जानी जाती है।
== क्रिया प्रणाली ==
[[चित्र:Cancer requires multiple mutations from NIH.png|thumb|150px|right|कैंसर उत्परिवार्तनों की एक श्रृंखला के कारण होते हैं। प्रत्येक उत्परिवर्तन किसी तरह से कोशिका के व्यवहार को परिवर्तित करता है।]]
कैंसर मूलरूप में ऊतक विकास के विनियमन का एक रोग है। एक सामान्य कोशिका को कैंसर कोशिका में [[दुर्दम रूपांतरण|रूपांतरित]] करने के लिए, कोशिका वृद्धि और विभेदन को नियमित करने वाले [[जीन|जीनों]] में रूपांतरण होना चाहिए। <ref>{{cite journal |author=Croce CM |title=Oncogenes and cancer |journal=The New England journal of medicine |volume=358 |issue=5 |pages=502–11 |year=2008 |month=January |pmid=18234754 |doi=10.1056/NEJMra072367 |url=http://content.nejm.org/cgi/content/full/358/5/502 |access-date=15 दिसंबर 2009 |archive-date=12 फ़रवरी 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100212042052/http://content.nejm.org/cgi/content/full/358/5/502 |url-status=dead }}</ref> आनुवंशिक परिवर्तन कई स्तरों पर हो सकते हैं, ये पूर गुणसूत्र के लाभ या हानि के रूप में हो सकते हैं, जो उत्परिवर्तन का ही एक रूप है और [[एकल न्युक्लियोटाईड बहुरूपता|एक मात्र DNA न्युक्लिओटाइड]] को प्रभावित करता है।
जीन की दो व्यापक श्रेणियां हैं, जो इन परिवर्तनों से प्रभावित होती हैं।[[ओन्कोजीन|ओंकोजीन]] सामान्य जीन हो सकते हैं, जो अनुपयुक्त रूप से उच्च स्तर पर प्रकट होते हैं, या परिवर्तित जीन जिनमें नोवल गुण होते हैं। किसी भी मामले में, इन जीनों की अभिव्यक्ति कैंसर की कोशिकाओं के दुर्दम लक्षण प्रारूप को बढ़ावा देती है। [[गाँठ का शमन करने वाला जीन|गांठ का शमन करने वाले जीन]] वे जीन है जो कैंसर की कोशिकाओं के कोशिका विभाजन, अस्तित्व, या अन्य गुणों को संदमित करते हैं। गांठ का शमन करने वाले जीन अक्सर कैंसर को बढ़ावा देने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों के द्वारा अक्षम हो जाते हैं। आमतौर पर, एक सामान्य कोशिका को कैंसर कोशिका में रूपांतरित करने के लिए कई जीनों में परिवर्तन होने जरुरी हैं।<ref>{{cite journal |author=Knudson AG |title=Two genetic hits (more or less) to cancer |journal=Nature reviews. Cancer |volume=1 |issue=2 |pages=157–62 |year=2001 |month=November |pmid=11905807 |doi=10.1038/35101031}}</ref>
विभिन्न जीनोमिक परिवर्तनों के लिए एक विविध वर्गीकरण योजना है, जो कैंसर कोशिकाओं के उत्पादन में योगदान कर सकती है। इन में से अधिकांश परिवर्तन [[उत्परिवर्तन]] होते हैं, या जीनोमिक DNA के [[न्युक्लिओटाइड|न्युक्लियोटाइड]] अनुक्रमण में परिवर्तन होते हैं। [[एन्यूप्लोईडी|एन्युप्लोइडी]], [[गुणसूत्र|गुणसूत्रों]] की एक असामान्य संख्या की उपस्थिति, एक जीनोमिक परिवर्तन है, जो एक उत्परिवर्तन नहीं है और इसमें [[समसूत्री विभाजन]] में त्रुटि के द्वारा एक या अधिक गुणसूत्रों का लाभ या हानि शामिल हो सकती है।
बड़े पैमाने के उत्परिवर्तनो में शामिल हैं एक गुणसूत्र के एक भाग की क्षति या वृद्धि. [[जीन प्रवर्धन|जीनोमिक प्रवर्धन]] तब होता है जब एक कोशिका एक छोटे गुणसूत्री लोकस की कई प्रतिलिपियां (प्रायः 20 या अधिक) प्राप्त कर लेती है, सामान्यतया इसमें एक या अधिक ओंकोजीन होते हैं और आसन्न आनुवंशिक सामग्री होती है।[[गुणसूत्री स्थानान्तरण|स्थानीकरण (ट्रांसलोकेशन)]] तब होता है जब दो अलग अलग गुणसूत्री क्षेत्र असामान्य रूप से, एक विशिष्ट स्थान पर संगलित हो जाते हैं। इसका एक जाना माना उदाहरण है [[फिलाडेल्फिया गुणसूत्र]] या गुणसूत्र 9 और 22 का स्थानीकरण, जो [[पुराने मज्जा जनित रक्त कैंसर|तीव्र मज्जा जनित रक्त कैंसर]] में होता है, इसके परिणामस्वरूप [[BCR जीन|BCR]]-[[Abl जीन|abl]] [[संलयन प्रोटीन|संग्लन प्रोटीन]], एक ओंकोजेनिक [[थायरोसिन काइनेज|टायरोसिन काइनेज]] का उत्पादन होता है।
छोटे पैमाने के उत्परिवर्तनों में शामिल हैं बिंदु उत्परिवर्तन, कमी या बढोतरी, जो एक जीन के [[प्रवर्धक|प्रवर्तक]] में हो सकती है, यह इसकी [[जीन अभिव्यक्ति|अभिव्यक्ति]] को प्रभावित करती है। या जीन के [[अनुक्रम कोडन]] में हो सकती है और इसके [[प्रोटीन]] उत्पाद के स्थायित्व या क्रिया को रूपांतरित कर सकती है। एकमात्र जीन का विघटन, एक [[DNA (डीएनए) वायरस]] या [[रिट्रोवायरस|रिट्रो वायरस]] से [[पूर्व वायरस|जीनोमिक सामग्री के एकीकरण]] के परिणामस्वरुप हो सकता है और इस प्रकार की घटना के परिणामस्वरूप प्रभावित कोशिका और उसकी संतति में वायरल ओंकोजीन की अभिव्यक्ति हो सकती है।
=== अधि-अनुवांशिकी ===
[[एपीजिनेटिक|अधि-अनुवांशिकी]], DNA (डीएनए) सरंचना में रासायनिक, गैर उत्परिवर्तनीय परिवर्तनों के माध्यम से जीन अभिव्यक्ति के नियमन का अध्ययन है।
कैंसर रोगजनन में [[एपीजिनेटिक्स|अधि-अनुवांशिकी]] का सिद्धांत है कि DNA (डीएनए) में गैर उत्परिवर्तनीय परिवर्तन जीन अभिव्यक्ति में परिवर्तन कर देते हैं।
सामान्य रूप से, [[ओन्कोजीन|ओंकोजीन]] शांत होते हैं, उदाहरण के लिए ऐसा [[डीएनए मेथिलिकरण|DNA (डीएनए) मेथिलिकरण]] के कारण होता है। इस मेथिलिकरण में क्षति [[ओन्कोजीन|ओंकोजीन]] की विपथी अभिव्यक्ति को प्रेरित करती है, जो कैंसर रोगजनन का कारण है। अधि-अनुवांशिक परिवर्तन की ज्ञात प्रणाली में शामिल है [[डीएनए मेथिलिकरण]] और गुणसूत्र के DNA (डीएनए) पर विशेष स्थिति पर जुड़े हुए [[हिस्टोन]] प्रोटीन का मेथिलिकरण या एसिटिलीकरण.
चिकित्सा के वर्ग जो [[HDAC संदमक]] और [[डीएनए मिथाइल ट्रांसफरेस|DNA (डीएनए) मिथाइल ट्रांसफरेज]] संदमक के रूप में जाने जाते हैं, वे कैंसर कोशिका में अधि-अनुवांशिक संकेतन को पुनः नियमित कर सकते हैं।
=== ओंकोजीन्स ===
[[ओन्कोजीन|ओंकोजीन]] कई प्रकार से कोशिका वृद्धि को बढ़ावा देते है। कई [[हार्मोन]] बना सकते हैं, यह कोशिकाओं के बीच एक रासायनिक संदेशवाहक होता है जो [[समसूत्री विभाजन]] को प्रेरित करता है, जिसका प्रभाव ग्राही उतक या कोशिका के [[संकेत ट्रांसडकशन|संकेत पारगमन]] पर निर्भर करता है।
दूसरे शब्दों में, जब एक प्राप्तकर्ता कोशिका पर एक हार्मोन ग्राही उत्तेजित होता है, संकेत कोशिका की सतह से [[कोशिका का केन्द्रक|कोशिका के केन्द्रक]] को संवहित होता है, यह केन्द्रीय स्तर पर जीन प्रतिलेखन विनियमन में कुछ परिवर्तनों को प्रभावित करता है। कुछ ओंकोजीन ख़ुद संकेत पारगमन तंत्र का भाग होते हैं, या कोशिकाओं और ऊतकों में संकेत [[ग्राही (जैव रसायन)|ग्राही]] का एक भाग होते हैं, इस प्रकार से ऐसे होर्मोनों की संवेदनशीलता को नियंत्रित करते हैं। ओंकोजीन अक्सर [[माईटोजन|समसूत्रजन]] उत्पन्न करते हैं, या [[प्रोटीन जैव संश्लेषण|प्रोटीन संश्लेषण]] में DNA (डीएनए) के [[प्रतिलेखन (आनुवंशिकी)|प्रतिलेखन]] में संलग्न होते हैं, जो [[प्रोटीन]] और [[एंजाइम या जैव उत्प्रेरक|एंजाइम]] बनाता है, ये प्रोटीन और एंजाइम उन उत्पादों और [[जैव रसायन|जैव रसायनों]] के निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं, जिनके साथ कोशिकाएं अंतर्क्रिया करती हैं और जिनका कोशिकाएं उपयोग करती हैं।
आद्य-ओन्कोजीन में उत्परिवर्तन, जो सामान्यतया [[ओन्कोजीन]] के स्थिर समकक्ष हैं, उनकी [[जीन अभिव्यक्ति|अभिव्यक्ति]] और क्रिया को संशोधित कर सकते हैं और उत्पाद प्रोटीन की क्रिया या मात्रा को बढ़ाते हैं। जब ऐसा होता है, आद्य-ओन्कोजीन [[ओन्कोजीन]] बन जाते हैं और यह संक्रमण कोशिका में [[कोशिका चक्र]] विनियमन के सामान्य संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे अनियंत्रित कोशिका वृद्धि संभव हो जाती है।
चाहे संभव भी हो जाये तो भी [[जीनोम]] में से आद्य-ओंकोजीन को हटा कर कैंसर कि संभावना को कम नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे जीव की वृद्धि, मरम्मत और [[समस्थापन (होमियोस्टेसिस)|समस्थापन]] के लिए जटिल होते हैं। ऐसा केवल तब होता है जब वे उत्परिवर्तित हो जाते हैं और वृद्धि के संकेत अत्यधिक हो जाते हैं।
कैंसर अनुसंधान में परिभाषित किये जाने वाले पहले [[ओन्कोजीन|ओंकोजीनों]] में से एक है [[रास ओन्कोजीन|रास ओंकोजीन]].[[प्रोटो-ओन्कोजीन|आद्य-ओंकोजीन]] के रास परिवार (H-रास, N-रास और K-रास) में उत्परिवर्तन बहुत आम हैं, ये सभी मानव गांठों के 20% से 30% में पाए जाते हैं।<ref>{{cite journal | author = Bos JL | title = ras oncogenes in human cancer: a review | journal = Cancer Research | volume = 49 | issue = 17 | pages = 4682–9 | year = 1989 | month = September | pmid = 2547513 | url = http://cancerres.aacrjournals.org/cgi/pmidlookup?view=long&pmid=2547513 | accessdate = 2009-06-06}}</ref> रास को मूल रूप से हार्वे सार्कोमा वायरस जीनोम में पहचाना गया था और शोधकर्ता इस बात से आश्चर्यचकित हो गए कि न केवल मानव जीनोम में यह जीन उपस्थिति था बल्कि, एक उत्प्रेरक नियंत्रण तत्व से जुड़ा हुआ था, जो कोशिका रेखा संवर्धन में कैंसर को प्रेरित कर सकता था।<ref name="pmid6283358">{{cite journal |author=Chang EH, Furth ME, Scolnick EM, Lowy DR |title=Tumorigenic transformation of mammalian cells induced by a normal human gene homologous to the oncogene of Harvey murine sarcoma virus |url=https://archive.org/details/sim_nature-uk_1982-06-10_297_5866/page/n49 |journal=Nature |volume=297 |issue=5866 |pages=479–83 |year=1982 |pmid=6283358|doi=10.1038/297479a0}}</ref>
=== गाँठ का शमन करने वाले जीन ===
[[गाँठ का शमन करने वाला जीन]] प्रचुरोदभवन विरोधी संकेतों और प्रोटीनों के लिए अनुकोडन करता है, जो समसूत्री विभाजन और कोशिका वृद्धि का शमन कर देते हैं।
सामान्यतः, गाँठ का शमन करने वाले जीन [[प्रतिलेखन कारक]] हैं जो कोशिकीय [[तनाव (दवा)|तनाव]] या DNA (डीएनए) क्षति के द्वारा सक्रिय होते हैं। अक्सर DNA (डीएनए) क्षति के कारण मुक्त-उत्प्लावी आनुवंशिक पदार्थ की उपस्थिति और साथ ही अन्य लक्षण देखे जा सकते हैं, जो ऐसे एंजाइमों और मार्ग को प्रेरित करते हैं जो [[गाँठ का शमन करने वाला जीन|गाँठ का शमन करने वाले जीन]] के सक्रियण के लिए उत्तरदायी है। ऐसे जीनों का कार्य है DNA (डीएनए) की मरम्मत के लिए कोशिका चक्र के आगे बढ़ने पर नियंत्रण, जो उत्परिवर्तन को पुत्री कोशिका तक स्थानांतरित होने से रोकता है।[[p53]] प्रोटीन, जो सबसे ज्यादा अध्ययन किये गए गाँठ का शमन करने वाले जीनों में से एक है, एक प्रतिलेखन कारक है जो [[हाइपोक्सिया (चिकित्सा)|हाइपोक्सिया]] और [[पराबैंगनी विकिरण|पराबैंगनी विकिरण क्षति]] सहित कई कोशिकीय तनावकारियों के द्वारा सक्रिय होते हैं।
p53 रूपांतरण में शामिल सभी कैंसरों के लगभग आधे के अलावा, इसके गाँठ के शमन कार्य को भली प्रकार से समझा नहीं गया है। स्पष्ट रूप से p53 के दो कार्य हैं: एक प्रतिलेखन कारक के रूप में एक नाभिकीय भूमिका और दूसरा कोशिका चक्र, कोशिका विभाजन और एपोपटोसिस विनियमन में कोशिका द्रव्यी भूमिका.
[[वारबर्ग परिकल्पना]] के अनुसार कैंसर की वृद्धि के लिए उर्जा हेतु ग्लाइकोलाइसिस का अधिमान्य प्रयोग होता है। p53 श्वसन से ग्लाइकोलाइटिक पथ को स्थानांतरण का नियमन करता है।<ref name="Mantoba-Warburg">{{cite journal | author = Matoba S, Kang J, Patino W, Wragg A, Boehm M, Gavrilova O, Hurley P, Bunz F, Hwang P | title = p53 regulates mitochondrial respiration | url = https://archive.org/details/sim_science_2006-06-16_312_5780/page/1650 | journal = Science | volume = 312 | issue = 5780 | pages = 1650–3 | year = 2006 | pmid = 16728594 | doi = 10.1126/science.1126863}}</ref>
हालांकि, एक उत्परिवर्तन, ख़ुद "इसे बंद करते हुए" गाँठ का शमन करने वाले जीन को या इस संकेत मार्ग को क्षति पहुँचा सकता है, जो इसे सक्रिय करता है, इस का अचल परिणाम है कि DNA (डीएनए) की मरम्मत बाधित या संदमित हो जाती है: मरम्मत रहित डीएनए क्षति का संग्रह निश्चित रूप कैंसर का कारण बनता है।
गाँठ का शमन करने वाले जीनों के उत्परिवर्तन जो [[जननस्तर|जनन स्तर]] कोशिकाओं में उत्पन्न होते हैं, वे [[संतति]] में स्थानांतरित हो जाते हैं और अगली पीढियों में कैंसर की संभावना को बढा देते हैं।
इन परिवारों के सदस्यों ने ऐसी घटनाओं में वृद्धि की है और इससे बहुल ट्यूमर की विलंबता में कमी आई है। गाँठ के प्रकार गाँठ का शमन करने वाले उत्परिवर्तन के प्रत्येक प्रकार के लिए प्रारूपिक होते हैं, कुछ उत्परिवर्तन विशेष प्रकार के कैंसर का कारण हैं, जबकि अन्य उत्परिवर्तन अन्य प्रकार के कैंसर का कारण हैं।
उत्परिवर्ती ट्यूमर शामक की वंशागति का प्रकार यह है कि एक प्रभावी सदस्य एक दोषपूर्ण प्रतिलिपि को एक जनक से और सामान्य प्रतिलिपि को दूसरे जनक से प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो एक उत्परिवर्ती ''[[p53]]'' एलील को वंशागत रूप से प्राप्त करता है (और इसलिए उत्परिवर्तित ''p53'' के लिए [[विषम युग्मनज|विषम युग्मजी]] है) वह [[मेलानोमा]] और [[अग्नाशय के कैंसर|अग्नाशयी कैंसर]] विकसित कर सकता है जो [[ली-फ्रामेनी सिंड्रोम]] कहलाता है। अन्य वंशागत गाँठ का शमन करने वाले जीन सिंड्रोम में शामिल है [[रेटिनोब्लास्टोमा|रेटिनो ब्लास्टोमा]] से सम्बंधित ''[[रेटिनोब्लास्टोमा प्रोटीन|Rb]]'' उत्परिवर्तन और [[फेमिलियल एडिनोमेटस पोली पोसिस|ऐडिनोपोलीपोसिस बड़ी आंत के कैंसर]] से जुड़े ''[[फेमिलियल एडिनोमेटस पोली पोसिस#रोग विज्ञान कार्यिकी|APC]]'' जीन उत्परिवर्तन.ऐडिनोपोलीपोसिस [[वृहद् आन्त्र मलाशय का कैंसर|बड़ी आंत का कैंसर]] बचपन की अवस्था में बड़ी आंत में हजारों पोलिप से सम्बंधित हैं, जो अपेक्षाकृत कम उम्र में बड़ी आंत का कैंसर उत्पन्न करते हैं। अंत में, ''[[BRCA1]]'' और ''[[BRCA2]]'' में वंशागत उत्परिवर्तन [[स्तन कैंसर]] की प्रारंभिक शुरुआत का कारण बनते हैं।
1971 में यह प्रस्ताव दिया गया कि कैंसर का विकास कम से कम दो उत्परिवर्तन घटनाओं पर निर्भर करता है। [[अल्फ्रेड जी नुडसन|नुडसन]] की [[नुडसन परिकल्पना|दो चोट की परिकल्पना]] के अनुसार एक [[गाँठ का शमन करने वाला जीन|गाँठ का शमन करने वाले जीन]] में एक वंशागत जनन स्तर उत्परिवर्तन कैंसर को केवल तभी उत्पन्न करेगा जब जीव के जीवन में बाद में कोई अन्य उत्परिवर्तन घटित होता है, यह उस [[tumor suppressor gene|गाँठ का शमन करने वाले जीन]] के अन्य [[गाँठ का शमन करने वाला जीन|एलील]] को निष्क्रिय कर देगा। <ref>{{cite journal |author=Knudson A |title=Mutation and cancer: statistical study of retinoblastoma |journal=[[PNAS|Proc Natl Acad Sci USA]] |volume=68 |issue=4 |pages=820–3 |year=1971 |pmid=5279523 |doi=10.1073/pnas.68.4.820}}</ref>
आमतौर पर, ओंकोजीन [[प्रभावी जीन|प्रभावी]] होते हैं, क्योंकि उनमें [[क्रिया-का-लाभ उत्परिवर्तन]] शामिल होता है, जबकि उत्परिवर्तित ट्यूमर शामक [[अप्रभावी जीन|अप्रभावी]] होते हैं, क्योंकि उनमें [[क्रिया-की-हानि उत्परिवर्तन]] शामिल होता है। हर कोशिका में समान जीन की दो प्रतिलिपियां होती हैं, इनमें से प्रत्येक प्रतिलिपि अभिभावक से प्राप्त की जाती है और अधिकांश मामलों के अंतर्गत एक विशेष प्रोटो-ओंकोजीन की केवल एक प्रतिलिपि में क्रिया-का-लाभ उत्परिवर्तन, उस जीन को एक वास्तविक ओंकोजीन बनाने के लिए पर्याप्त होता है। दूसरी ओर, क्रिया-की-हानि उत्परिवर्तन का, गाँठ का शमन करने वाले जीन की दोनों प्रतिलिपियों में होना आवश्यक है ताकि जीन को पूरी तरह से क्रियाहीन बनाया जा सके। हालांकि, ऐसे मामले हैं जिनमें [[गाँठ का शमन करने वाला जीन|गाँठ का शमन करने वाले जीन]] की एक उत्परिवर्तित प्रतिलिपि अन्य [[जंगली-प्रकार]] प्रतिलिपि को क्रियाहीन बना देती है। यह घटना ''प्रभावी नकारात्मक प्रभाव'' कहलाती है और कई p53 उत्परिवर्तनों में देखी जाती है।
नुडसन के दो चोट के मोडल को हाल ही में कई जांचकर्ताओं द्वारा चुनौती दी गई है। गाँठ का शमन करने वाले कुछ जीनों के एक एलील का निष्क्रियकरण ट्यूमर को उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है। यह घटना [[हप्लोइन्सुफ़्फ़िकिएन्क्य|अगुणित अपर्याप्तता]] कहलाती है और इसे कई प्रयोगात्मक दृष्टिकोणों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है।[[हप्लोइन्सुफ़्फ़िकिएन्क्य|अगुणित अपर्याप्तता]] से उत्पन्न हुई गाँठ की शुरुआत आम तौर पर देर से होती है, जब इसकी तुलना एक एक दो चोट की प्रक्रिया से की जाती है।<ref name="Fodde-Haploinsufficiency">{{cite journal | author = Fodde R, Smits R | title = Cancer biology. A matter of dosage | url = https://archive.org/details/sim_science_2002-10-25_298_5594/page/n69 | journal = Science | volume = 298 | issue = 5594 | pages = 761–3 | year = 2002 | pmid = 12399571 | doi = 10.1126/science.1077707}}</ref>
=== कैंसर कोशिका जीव विज्ञान ===
[[चित्र:Cancer progression from NIH.png|thumb|300px|left|उतक को सामान्य से लेकर कैंसर तक एक सतत स्पेक्ट्रम में संगठित किया जा सकता है।]]
अक्सर, बहुल आनुवंशिक परिवर्तन जिनका परिणाम कैंसर होता है, उन्हें संचित होने में कई साल लग सकते हैं। इस समय के दौरान, पूर्व दुर्दम कोशिकाओं का जैविक व्यवहार धीरे धीरे सामान्य कोशिका से बदल कर कैंसर कोशिका का हो जाता है। [[सूक्ष्मदर्शी]] की सहायता से पूर्व दुर्दम ऊतक में विभेदक गुण देखे जा सकते हैं। विभेदक लक्षणों में है विभाजित होती हुई कोशिकाओं की बढ़ी हुई संख्या, [[केन्द्रक]] के आकार और आकृति में भिन्नता, कोशिका के आकार और आकृति में भिन्नता, विशिष्टीकृत कोशिकाओं के गुणों में कमी और सामान्य उतक संगठन की क्षति. [[डिस्प्लेजिया|दुर्विकासिता (डिस्प्लेजिया)]] अतिरिक्त कोशिका प्रचुरोद भवन का एक असामान्य प्रकार है जो सामान्य उतक व्यवस्था तथा पूर्व दुर्दम कोशिकाओं में कोशिका सरंचना की हानि के द्वारा परिलक्षित होता है। ये प्रारंभिक अर्बुदीय (निओप्लास्टिक) परिवर्तन [[हाइपरप्लासिया|अतिवर्धन (हाइपरप्लाजिया)]] से विभेदित किए जाने चाहियें, जो एक बाहरी उद्दीपन के कारण कोशिका विभाजन में एक उत्परिवर्ती वृद्धि है, जैसे होर्मोनी असंतुलन या पुरानी जलन.
दुर्विकासिता के सबसे गंभीर मामलों को "[[कार्सिनोमा स्वस्थानी|स्वस्थानी कर्कार्बुद (कार्सिनोमा)]]" कहा जाता है। लैटिन में, "स्वस्थानी (in situ)" शब्द का अर्थ है "स्थान में", इसलिए कार्सिनोमा स्वस्थानी शब्द का अर्थ है कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि जो अपने मूल स्थान पर ही बनी रहती है और जिसने अन्य उतकों पर कोई आक्रमण नहीं दर्शाया है।
फिर भी, कार्सिनोमा स्वस्थानी एक आक्रामक दुर्दमता में विकसित हो सकता है और यदि सम्भव हो तो इसे आम तौर पर शल्य क्रिया के द्वारा हटा दिया जाता है।
==== क्लोनी विकास ====
जिस तरह से जानवरों की आबादी में [[विकास]] होता है, ठीक उसी तरह कोशिकाओं की अनियंत्रित आबादी में भी विकास होता है। यह अवांछनीय प्रक्रिया [[कैंसर में कायिक विकास|कायिक विकास]] कहलाती है और इसी तरह से कैंसर उत्पन्न होता है और अधिक दुर्दम बन जाता है।<ref>{{cite journal |author=Nowell PC |title=The clonal evolution of tumor cell populations |journal=Science |volume=194 |issue=4260 |pages=23–8 |year=1976 |month=October |pmid=959840 |doi=10.1126/science.959840 |url=http://www.sciencemag.org/cgi/pmidlookup?view=long&pmid=959840}}</ref>
कोशिकीय उपापचय में अधिकांश परिवर्तन जो कोशिका में अनियमित तरीके से विभाजन का कारण हैं, वे कोशिका मृत्यु का कारण होते हैं। हालांकि एक बार कैंसर शुरू हो जाने पर, कैंसर की कोशिकाएं [[प्राकृतिक वरण]] की एक प्रक्रिया से होकर गुजरती हैं: नए आनुवंशिक परिवर्तनों से युक्त कुछ कोशिकाएं जो अपने जीवन और प्रजनन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर बहुगुणित होती रहती हैं और जल्दी ही विकसित होती हुई गाँठ पर प्रभावी हो जाती हैं, क्योंकि कम अनुकूलित आनुवंशिक परिवर्तनों से युक्त कोशिकाएं प्रतिस्पर्धा से बाहर होती हैं।<ref>{{cite journal |author=Merlo LM, Pepper JW, Reid BJ, Maley CC |title=Cancer as an evolutionary and ecological process |journal=Nat Rev Cancer |volume=6 |issue=12 |pages=924–35 |year=2006 |month=December |pmid=17109012 |doi=10.1038/nrc2013 |url=}}</ref> इसी प्रकार से [[MRSA]] जैसे रोगजनक [[प्रतिजैविक प्रतिरोध|प्रतिजैविक-प्रतिरोधी]] बन जाते हैं (या इसी प्रकार से [[HIV (एचआईवी)|HIV]] [[औषध प्रतिरोध|ड्रग-प्रतिरोधी]] बन जाता है) और यही कारण है कि फसलों के ब्लाईट और कीट [[कीटनाशक प्रतिरोध|कीटनाशक प्रतिरोधी]] बन जाते हैं।
इसी विकास के कारण कैंसर पुनरावृति में ऐसी कोशिकाएं होती हैं जो [[कैंसर में कायिक विकास#चिकित्सात्मक प्रतिरोध में कायिक विकास|कैंसर की दवाओं के लिए प्रतिरोध]] प्राप्त कर लेती हैं (या कुछ मामलों में [[विकिरण चिकित्सा]] के विकिरणों के लिए प्रतिरोधी हो जाती हैं)
==== कैंसर की कोशिकाओं के जैविक गुण ====
हनाहन और [[रॉबर्ट वीन्बर्ग|वीनबर्ग]] के द्वारा 2000 में दिए गए एक लेख में, दुर्दम गाँठ कोशिकाओं के जैविक गुणों को निम्नानुसार संक्षेप में बताया गया:<ref name="pmid10647931">{{cite journal |author=Hanahan D, Weinberg RA |title=The hallmarks of cancer |journal=Cell |volume=100 |issue=1 |pages=57–70 |year=2000 |pmid=10647931|doi=10.1016/S0092-8674(00)81683-9}}</ref>
* [[वृद्धि कारक|वृद्धि के संकेतों]] में स्वयं-प्रचुरता का अधिग्रहण, जो अनियंत्रित विकास को बढ़ावा देता है।
* वृद्धि विरोधी संकेतों की संवेदनशीलता में क्षति, भी अनियंत्रित विकास का कारण होती है।
* [[एपोप्टोसिस|एपोपटोसिस]] के लिए क्षमता में कमी, जो आनुवंशिक त्रुटियों और बाह्य वृद्धि विरोधी संकेतों के बावजूद, वृद्धि को बढ़ावा देती है।
* [[जीर्णता]] के लिए क्षमता में कमी, जो असीमित प्रतिकृति क्षमता का कारण है। (अमरत्व)
* निरंतर [[एंजियोजेनेसिस|वाहिकाजनन]] का अधिग्रहण, जो निष्क्रिय पोषक प्रसार की सीमाओं से परे ट्यूमर की वृद्धि को बढ़ावा देता है।
* आस पास के [[जैविक ऊतक|ऊतकों]] पर आक्रमण करने की क्षमता का अधिग्रहण, जो आक्रामक कार्सिनोमा का परिभाषित गुण है।
* सुदूर स्थानों पर [[मेटास्टेसिस|अपररूपांतरण (मेटास्टेसिस)]] के निर्माण की क्षमता का अधिग्रहण, जो दुर्दम गांठ का मुख्य लक्षण है (कार्सिनोमा या अन्य).
इन बहुल पदों का पूरा होना निम्न के बिना एक बहुत ही दुर्लभ घटना होगी:
* आनुवंशिक त्रुटियों की मरम्मत के लिए क्षमता में कमी, जो [[उत्परिवर्तन]] दर (जीनोमिक अस्थिरता) को बढाती है, इस प्रकार से सभी अन्य परिवर्तनों को त्वरित करती है।
ये जैविक परिवर्तन [[कार्सिनोमा]] में मुख्य हैं; अन्य दुर्दम गांठों को उन सब की प्राप्ति के लिए सभी की जरुरत नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए, ऊतक आक्रमण और दूर के स्थानों पर विस्थापन [[श्वेत रक्त कोशिका|श्वेत रक्त कोशिकाओं]] का सामान्य गुण है; ये पद [[रक्त का कैंसर (ल्यूकेमिया)|श्वेतरक्तता (ल्यूकेमिया या रक्त का कर्कट)]] के विकास के लिए आवश्यक नहीं हैं। विभिन्न पद जरुरी रूप से व्यक्तिगत उत्परिवार्तनों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.उदाहरण के लिए, एक वंशाणु (जीन) का निष्क्रियकरण, [[P53]] प्रोटीन के लिए कोडन, जीनोमिक अस्थिरता, एपोपटोसिस और वाहिकाजनन (एन्जियोजिनेसिस) में वृद्धि का कारण होंगे। कैंसर की सभी कोशिकाएं विभाजित नहीं होती हैं। बल्कि, एक गाँठ में कोशिकाओं का एक उप समुच्चय, कर्कट मूल कोशिकाएं (कैंसर स्टेम कोशिकाएं) कहलाता है, जो अपने आप की प्रतिकृति करता है और विभेदित कोशिकाओं का निर्माण करता है।<ref>{{cite journal |author=Cho RW, Clarke MF |title=Recent advances in cancer stem cells |journal=Curr. Opin. Genet. Dev. |volume=18 |issue=1 |pages=48–53 |year=2008 |month=February |pmid=18356041 |doi=10.1016/j.gde.2008.01.017}}</ref>
== रोकथाम ==
कैंसर की रोकथाम को, कैंसर की घटनाओं में कमी लाने के लिए सक्रिय उपायों के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसके लिए [[कैंसरजनक|कर्कटजन (कैंसर पैदा करने वाले कारकों)]] से बचना या उनके [[उपापचय]] को परिवर्तित करना, ऐसी जीवन शैली या आहार को अपनाना जो कैंसर पैदा करने वाले कारकों को संशोधित करे और/या चिकित्सा हस्तक्षेप ([[रसायन रोकथाम|रासायनिक रोकथाम]], पूर्व दुर्दम घावों का उपचार) उपयोगी हो सकता है।
"रोकथाम" की [[महामारी विज्ञान]] अवधारणा को सामान्यतया या तो उन लोगों के लिए [[प्राथमिक रोकथाम]] के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिनमें किसी विशेष रोग का निदान नहीं किया गया है, या [[द्वितीयक रोकथाम]] के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो पहले से निदान किए गए रोग की जटिलताओं को कम करता है।
=== संशोधन योग्य ("जीवन शैली") जोखिम कारक ===
[[चित्र:Lung cancer.jpg|thumb|left|upright|फुफ्फुस के एक नमूने में श्वसनी के पास एक स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (सफ़ेद गाँठ)]]
कैंसर के जोखिम के अधिकांश कारक पर्यावरण या प्रकृति में जीवन शैली से सम्बंधित हैं, ये दावा करते हैं कि कैंसर व्यापक रूप से रोकथाम किये जाने योग्य एक बीमारी है।<ref name="Danaei"/> संशोधित किये जाने योग्य कैंसर के जोखिम कारकों के उदाहरण हैं [[मादक पेय|एल्कोहल]] का उपभोग, (जो मुख, ग्रसनी, स्तन के और अन्य प्रकार के कैंसरों के जोखिम के बढ़ने से सम्बंधित है), धुम्रपान (हालांकि 10% पुरुषों की तुलना में फुफ्फुस के कैंसर से युक्त 20% महिलाएं ऎसी होती हैं जिन्होंने कभी भी धुम्रपान नहीं किया होता है<ref>{{cite web | title=Lung Cancer in American Women: Facts | url=http://www.nationallungcancerpartnership.org/page.cfm?l=factsWomen | accessdate=2007-01-19 | archive-date=9 जुलाई 2007 | archive-url=https://web.archive.org/web/20070709065209/http://www.nationallungcancerpartnership.org/page.cfm?l=factsWomen | url-status=dead }}</ref>), शारीरिक निष्क्रियता (वृहद् आंत्र, स्तन और संभवतया अन्य कैंसरों से सम्बंधित) और [[अधिक वजन|बहुत अधिक वजन]]/ [[माता|मोटापा]] होना (वृहद् आंत्र, स्तन, अन्तः गर्भाशय कला और संभवतया अन्य कैंसरों से सम्बंधित).
महामारी विज्ञान साक्ष्य के आधार पर, अब यह माना जाता है कि शराब के बहुत अधिक सेवन से बचना विशेष प्रकार के कैंसरों के जोखिम को कम करने में योगदान देता है; हालांकि तंबाकू की तुलना में, प्रभाव की मात्रा बहुत कम है और प्रमाण की क्षमता अक्सर कमजोर होती है। अन्य जीवन शैली और पर्यावरणीय कारक जो कैंसर के जोखिम को प्रभावित करने के लिए जाने जाते हैं, (या तो लाभदायक या हानिकारक रूप में) में शामिल हैं, विशिष्ट यौन संचारित रोग (जैसे [[मानव पापिलोमा वायरस|मानव पेपिलोमा वायरस]] के द्वारा संचरित होने वाले रोग), बहिर्जनित होर्मोनों का उपयोग, [[आयनीकरण विकिरण|आयनीकरण विकिरणों]] और [[पराबैंगनी]] विकिरणों के संपर्क में आना और विशिष्ट व्यवसायिक और रासायनिक पदार्थों के संपर्क में आना.
हर साल पूरी दुनिया में कम से कम 200,000 लोगों की मृत्यु अपने कार्यस्थल से सम्बंधित कैंसर के कारण होती है।<ref name="WHO_occup">{{cite press release |title=WHO calls for prevention of cancer through healthy workplaces |publisher=World Health Organization |date=2007-04-27 |url=http://www.who.int/mediacentre/news/notes/2007/np19/en/index.html |accessdate=2007-10-13}}</ref> कई मिलियन श्रमिक ऐसे हैं जिनमें अपने कार्य स्थल पर निरंतर एस्बेस्टस फाइबर और तम्बाकू के धुएँ के संपर्क में रहने के कारण [[फेफड़ों का कैंसर|फुफ्फुस कैंसर]] और [[मिजोथेलीओमा]] की तरह के कैंसर के विकसित होने का ख़तरा होता है या निरंतर [[बेंजीन]] के संपर्क में रहने के कारण [[ल्यूकेमिया या रक्त कैंसर|रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया)]] का ख़तरा रहता है।<ref name="WHO_occup"/> वर्तमान में, व्यवसायिक जोखिम कारकों की वजह से होने वाले कैंसर के कारण होने वाली मौतें अधिकांशतया विकसित दुनिया में होती हैं।<ref name="WHO_occup"/> ऐसा अनुमान लगाया गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में हर साल लगभग 20,000 कैंसर मौतें और कैंसर के 40,000 नए मामले व्यवसाय से सम्बंधित होते हैं।<ref>{{cite web|url=http://www.cdc.gov/niosh/topics/cancer/|title=National Institute for Occupational Safety and Health- Occupational Cancer |accessdate=2007-10-13|publisher=United States National Institute for Occupational Safety and Health}}</ref>
=== आहार ===
आहार और कैंसर पर आम सहमति है कि [[मोटापा]] कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। भिन्न देशों में आहार की भिन्न प्रथाएं अक्सर कैंसर की घटनाओं में अन्तर को स्पष्ट करती हैं, (उदाहरण [[अमाशय का कैंसर|आमाशय का कैंसर]] जापान में आम है, जबकि [[वृहद आंत्र मलाशय का कैंसर|बड़ी आँत का कैंसर]] संयुक्त राज्य अमेरिका में आम है। इस उदाहरण में [[अगुणित समूह|अगुणित समूहों]] के पूर्ववर्ती विचार शामिल नहीं हैं).अध्ययनों से पता चला है कि अप्रवासी अक्सर एक पीढी तक ही नए देश के जोखिम को विकसित कर लेते हैं, इसके लिए आहार और कैंसर के बीच महत्वपूर्ण कड़ी की संभावना को व्यक्त किया गया है।<ref>{{cite journal |author=Buell P, Dunn JE |title=Cancer mortality among Japanese Issei and Nisei of California |url=https://archive.org/details/sim_cancer_1965-05_18_5/page/656 |journal=Cancer |volume=18 |issue= |pages=656–64 |year=1965 |pmid=14278899|doi=10.1002/1097-0142(196505)18:5<656::AID-CNCR2820180515>3.0.CO;2-3}}</ref> एक आबादी में मोटापे का कम होना कैंसर की घटनाओं को भी कम करता है यह अज्ञात है।
कैंसर के जोखिम पर विशेष पदार्थों (भोजन सहित) के लाभकारी और हानिकारी प्रभावों की रिपोर्टों के बावजूद, इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जिनके साथ कैंसर के सम्बन्ध को स्थापित किया जा चुका है। मेयोक्लिनिक की एक रिपोर्ट के अनुसार, हल्दी में करक्यूमिन (Curcumin) नामक पदार्थ पाया जाता है। यह इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इस गुण की वजह से हल्दी का एशियाई चिकित्सा में विभिन्न प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ शोध बताते हैं कि करक्यूमिन कैंसर को रोकने या उसका इलाज करने में मदद कर सकता है।<ref>{{Cite web|url=https://navbharattimes.indiatimes.com/lifestyle/health/according-to-mayoclinic-report-haldi-or-turmeric-may-kill-cancer-cells-and-stop-tumors-from-forming/articleshow/99982175.cms|title=वैज्ञानिकों ने माना-कैंसर का देसी इलाज है हल्दी, ट्यूमर नहीं होने देगी बड़ा, बस ऐसे खाएं|website=Navbharat Times|language=hi|access-date=2024-05-28}}</ref>
ये रिपोर्टें अक्सर संवर्धित कोशिका माध्यम या जंतुओं में किये गए अध्ययन पर आधारित होती हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य सिफारिशों को इन अध्ययनों के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है, जब तक वे मानव में परीक्षण (या कभी कभी एक अवलोकन हस्तक्षेप) में सही साबित न हो जायें.
[[चित्र:Colon cancer 2.jpg|thumb|एक कोलेक्टोमी नमूने में एक आक्रामक वृहद् आंत्र कार्सिनोमा (शीर्ष केंद्र)]]
महामारी विज्ञान संघ के अध्ययन अक्सर प्राथमिक कैंसर के खतरे को कम करने के लिए प्रस्तावित पथ्य हस्तक्षेप का पक्ष लेते हैं। इस तरह के अध्ययन के उदाहरण हैं, वे रिपोर्टें जो बताती हैं कि मांस का उपभोग कम करने से वृहद् आंत्र के कैंसर का जोखिम कम हो जाता है,<ref name="pmid9663397">{{cite journal |author=Slattery ML, Boucher KM, Caan BJ, Potter JD, Ma KN |title=Eating patterns and risk of colon cancer |journal=Am. J. Epidemiol. |volume=148 |issue=1 |pages=4–16 |year=1998 |pmid=9663397 |doi=}}</ref>
और रिपोर्टें कि कॉफी का सेवन यकृत कैंसर के खतरे को कम करता है।<ref name="pmid17484871">{{cite journal |author=Larsson SC, Wolk A |title=Coffee consumption and risk of liver cancer: a meta-analysis |url=https://archive.org/details/sim_gastroenterology_2007-05_132_5/page/1740 |journal=Gastroenterology |volume=132 |issue=5 |pages=1740–5 |year=2007 |pmid=17484871 |doi=10.1053/j.gastro.2007.03.044}}</ref> अध्ययनों के द्वारा ग्रिल्ड मांस के उपभोग को<ref name="pmid9096659">{{cite journal |author=Ward MH, Sinha R, Heineman EF, ''et al.'' |title=Risk of adenocarcinoma of the stomach and esophagus with meat cooking method and doneness preference |journal=Int. J. Cancer |volume=71 |issue=1 |pages=14–9 |year=1997 |pmid=9096659|doi=10.1002/(SICI)1097-0215(19970328)71:1<14::AID-IJC4>3.0.CO;2-6}}</ref><ref name="pmid9096659"/> [[वृहद् आंत्र मलाशय का कैंसर|बृहदान्त्र कैंसर]],<ref name="pmid16140978">{{cite journal |author=Sinha R, Peters U, Cross AJ, ''et al.'' |title=Meat, meat cooking methods and preservation, and risk for colorectal adenoma |journal=Cancer Res. |volume=65 |issue=17 |pages=8034–41 |year=2005 |pmid=16140978 |url=http://cancerres.aacrjournals.org/cgi/content/full/65/17/8034}}</ref> [[स्तन कैंसर]],<ref name="pmid17435448">{{cite journal |author=Steck SE, Gaudet MM, Eng SM, ''et al.'' |title=Cooked meat and risk of breast cancer--lifetime versus recent dietary intake |journal=Epidemiology (Cambridge, Mass.) |volume=18 |issue=3 |pages=373–82 |year=2007 |pmid=17435448 |doi=10.1097/01.ede.0000259968.11151.06}}</ref> और [[अग्नाशय का कैंसर|अग्नाशय के कैंसर]],<ref name="pmid16172241">{{cite journal |author=Anderson KE, Kadlubar FF, Kulldorff M, ''et al.'' |title=Dietary intake of heterocyclic amines and benzo(a)pyrene: associations with pancreatic cancer |journal=Cancer Epidemiol. Biomarkers Prev. |volume=14 |issue=9 |pages=2261–5 |year=2005 |pmid=16172241 |doi=10.1158/1055-9965.EPI-04-0514}}</ref> के जोखिम के बढ़ने से सम्बंधित किया गया है, ऐसा उच्च ताप पर पकाए जाने वाले भोजन में कार्सिनोजन जैसे [[बेन्जोपायरीन]] की उपस्थिति के कारण होता है।
2005 का एक [[द्वितीयक रोकथाम]] अध्ययन दर्शाता है कि जीवन शैली में परिवर्तन और पौधों पर आधारित आहार के सेवन से प्रोस्टेट कैंसर के रोगी पुरुषों के एक समूह में कैंसर में कमी आई जो उस समय पर किसी परंपरागत उपचार का उपयोग नहीं कर रहे थे।<ref name="Ornish">{{cite journal | author = Ornish D et al. | title = Intensive lifestyle changes may affect the progression of prostate cancer | url = https://archive.org/details/sim_journal-of-urology_2005-09_174_3/page/1065 | journal = The Journal of Urology | volume = 174 | issue = 3 | pages = 1065–9; discussion 1069–70 | year = 2005 | pmid = 16094059 | doi = 10.1097/01.ju.0000169487.49018.73}}</ref>
इन परिणामों को 2006 के अध्ययन से अधिक महत्त्व मिला जिसमें 2400 से अधिक महिलाओं पर अध्ययन किया गया, इस दौरान इनमें से आधी महिलाओं को सामान्य आहार पर रखा गया और शेष को ऐसा आहार दिया गया जिसमें वसा की कैलोरी 20% से कम हो। दिसम्बर, 2006 की अंतरिम रिपोर्ट में बताया गया कि कम वसा आहार पर रखी गई महिलाओं में स्तन कैंसर पुनरावृत्ति की मात्रा कम थी।<ref>{{cite journal |author=Chlebowski RT, Blackburn GL, Thomson CA, ''et al.'' |title=Dietary fat reduction and breast cancer outcome: interim efficacy results from the Women's Intervention Nutrition Study |url=https://archive.org/details/sim_journal-of-the-national-cancer-institute_2006-12-20_98_24/page/n22 |journal=J. Natl. Cancer Inst. |volume=98 |issue=24 |pages=1767–76 |year=2006 |pmid=17179478 |doi=10.1093/jnci/djj494}}</ref>
हाल के अध्ययनों से कैंसर के कुछ रूपों और परिष्कृत शर्करा और अन्य साधारण कार्बोहाईड्रेट के उच्च उपभोग के बीच संभावित कड़ी को प्रदर्शित किया गया है।<ref>{{cite journal |author=Romieu I, Lazcano-Ponce E, Sanchez-Zamorano LM, Willett W, Hernandez-Avila M |title=Carbohydrates and the risk of breast cancer among Mexican women |journal=Cancer Epidemiol Biomarkers Prev |volume=13 |issue=8 |pages=1283–9 |year=2004 |pmid=15298947 |url=http://cebp.aacrjournals.org/cgi/content/full/13/8/1283 |month=Aug |day=01}}</ref><ref>{{cite journal | author=Francesca Bravi, Cristina Bosetti, Lorenza Scotti, Renato Talamini, Maurizio Montella, Valerio Ramazzotti, Eva Negri, Silvia Franceschi, and Carlo La Vecchia | title=Food Groups and Renal Cell Carcinoma: A Case-Control Study from Italy | journal=International Journal of Cancer | year=2006 | month=October | volume=355:1991-2002 | url=http://www3.interscience.wiley.com/cgi-bin/abstract/113412400/ABSTRACT | doi=10.1002/ijc.22225 }}{{Dead link|date=जनवरी 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref><ref>{{cite journal | author= Jee SH, Ohrr H, Sull JW, Yun JE, Ji M, Samet JM | title= Fasting serum glucose level and cancer risk in Korean men and women | url= https://archive.org/details/sim_jama_2005-01-12_293_2/page/n69 | journal=JAMA | volume = 293 |issue=2 | doi= 10.1001/jama.293.2.194 | year= 2005 |pages=194–202 | pmid= 15644546 }}</ref><ref>{{cite journal | author= Michaud DS, Liu S, Giovannucci E, Willett WC, Colditz GA, Fuchs CS | title= Dietary sugar, glycemic load, and pancreatic cancer risk in a prospective study | journal= J Natl Cancer Inst | volume= 94 |issue=17 | url=http://jnci.oxfordjournals.org/cgi/content/full/94/17/1293 | pmid= 12208894 | doi= 10.1093/jnci/94.17.1293 | year= 2002 |pages=1293–300}}</ref><ref>{{cite journal | author= Venkateswaran V, Haddad AQ, Fleshner NE ''et al.'' | title= Association of diet-induced hyperinsulinemia with accelerated growth of prostate cancer (LNCaP) xenografts | volume= 99 |issue=23 |url=http://jnci.oxfordjournals.org/cgi/content/full/99/23/1793 | pmid=18042933| doi=10.1093/jnci/djm231| year=2007| journal=J Natl Cancer Inst |pages=1793–800}}</ref> हालांकि संबंधों के अंश और केजुअल्टी के अंश विवाद का मुद्दा हैं,<ref>[128] ^ फ्रिएबे, रिचर्ड: ''[http://www.time.com/time/health/article/0,8599,1662484,00.html क्या एक उच्च वसा युक्त आहार कैंसर से लड़ने में मदद करता है?] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090220000925/http://www.time.com/time/health/article/0,8599,1662484,00.html |date=20 फ़रवरी 2009 }}'' टाइम मैगजीन, सितम्बर 17, 2007</ref><ref>[129] ^ हित्ती, मिरांडा: ''[http://www.webmd.com/cancer/news/20070227/high-blood-sugar-linked-cancer-risk उच्च रक्त शर्करा लिंक कैंसर के खतरे से सम्बंधित है]'' [http://www.webmd.com WebMD], 22 फ़रवरी 2008</ref><ref>मोयनिहन, टिमोथी: ''[http://www.mayoclinic.com/health/cancer-causes/CA00085 कैंसर के कारण: कैंसर के कारणों के बारे में लोकप्रिय मिथक]'', MayoClinic.com, 22 फ़रवरी 2008 को पुनः प्राप्त</ref> दरअसल कुछ संगठन कैंसर के निवारण के लिए परिष्कृत शर्करा और स्टार्च की खपत को कम करने की सिफारिश करते हैं।<ref>[131] ^ ''[http://www.aicr.org/site/PageServer?pagename=dc_recs_03_avoid_sugary_drinks शर्करा युक्त पेय पदार्थों से बचें] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20081004230758/http://www.aicr.org/site/PageServer?pagename=dc_recs_03_avoid_sugary_drinks |date=4 अक्तूबर 2008 }}'' ''[http://www.aicr.org/site/PageServer?pagename=dc_recs_03_avoid_sugary_drinks अधिक ऊर्जा युक्त खाद्य पदार्थों का उपभोग सिमित करें] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20081004230758/http://www.aicr.org/site/PageServer?pagename=dc_recs_03_avoid_sugary_drinks |date=4 अक्तूबर 2008 }}'', अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर रिसर्च, 20 फ़रवरी 2008 को संशोधित</ref><ref>''[http://www.apha.org/publications/tnh/archives/2005/02-05/WebExclusive/287.htm उच्च शर्करा के स्तर कैंसर और मृत्यु दर के जोखिम को बढ़ते हैं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20081130055831/http://www.apha.org/publications/tnh/archives/2005/02-05/WebExclusive/287.htm |date=30 नवंबर 2008 }}'', देश का स्वास्थ्य: अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के सरकारी समाचार पत्र, फरवरी 2005</ref><ref>{{cite journal |author=Kushi LH, Byers T, Doyle C, ''et al.'' |title=American Cancer Society Guidelines on Nutrition and Physical Activity for cancer prevention: reducing the risk of cancer with healthy food choices and physical activity |journal=CA Cancer J Clin |volume=56 |issue=5 |pages=254–81; quiz 313–4 |year=2006 |pmid=17005596 |doi=10.3322/canjclin.56.5.254 |url=http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/56/5/254 |access-date=27 फ़रवरी 2009 |archive-date=29 नवंबर 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20091129010027/http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/56/5/254 |url-status=dead }}</ref>
नवंबर 2007 में, [[कैंसर अनुसंधान के लिए अमेरिकी संस्थान|अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर रिसर्च]] (AICR), ने [[विश्व कैंसर अनुसन्धान कोष|वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड]] (WCRF) के सहयोग से ''[[:भोजन, पोषण, शारीरिक गतिविधि और कैंसर की रोकथाम: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य.|फ़ूड, न्यूट्रीशियन, फिजिकल एक्टिविटी एंड दी प्रिवेंशन ऑफ़ कैंसर: अ ग्लोबल पर्सपेक्टिव]]'' का प्रकाशन किया, "जो आहार, शारीरिक क्रिया और कैंसर पर सबसे वर्तमान और व्यापक विश्लेषण है".<ref>[135] ^ [http://www.dietandcancerreport.org/?p=historical_overview "ऐतिहासिक अवलोकन"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100108215327/http://www.dietandcancerreport.org/?p=historical_overview |date=8 जनवरी 2010 }} ''dietandcancerreport.org.'' 27 अगस्त 2008 को पुनः प्राप्त.</ref> WCRF / AICR विशेषज्ञ रिपोर्ट 10 सलाहों की सूची देती है जिनका इस्तेमाल लोग कैंसर के विकास के जोखिम को कम करने के लिए कर सकते हैं, जिसमें आहार के निम्न दिशानिर्देश शामिल हैं: (1) ऐसे खाद्य और पेय पदार्थों के सेवन को कम करना जो वजन बढ़ाते हैं, नामतः अधिक ऊर्जा युक्त खाद्य और शर्करा युक्त पेय, (2) अधिकतर पादप उत्पत्ति के खाद्य का उपभोग, (3) लाल मांस के सेवन को सीमित करना और उपचारित मांस से परहेज करना, (4) एल्कोहल युक्त पेय पदार्थों के उपभोग को सीमित करना और (5) नमक के सेवन को कम करना और कालातीत अनाज (अन्न) या दालों (फलियों) से परहेज करना। <ref>[136] ^ [http://www.dietandcancerreport.org/?p=recommendations "अनुशंसाएँ".] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100107025758/http://www.dietandcancerreport.org/?p=recommendations |date=7 जनवरी 2010 }} ''Dietandcancerreport.org.'' 27 अगस्त 2008 को पुनः प्राप्त.</ref><ref>फ़ूड, न्यूट्रीशियन, फिजिकल एक्टिविटी, एंड दी प्रिवेंशन ऑफ़ कैंसर: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य [http://www.dietandcancerreport.org/downloads/chapters/chapter_12.pdf अध्याय 12] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090325045302/http://www.dietandcancerreport.org/downloads/chapters/chapter_12.pdf |date=25 मार्च 2009 }} विश्व कैंसर रिसर्च कोष (2007).आईएसबीएन 978-0-9722522-2-5.</ref>
=== विटामिन ===
प्रारंभिक प्रेक्षणों से प्राप्त विचार कि विटामिन पूरक स्टेम के माध्यम से कैंसर की रोकथाम की जा सकती है, मानव रोगों को विटामिनों की कमी से सम्बंधित करता है, जैसे [[सांघातिक अरक्तता|प्राणाशी रक्ताल्पता]] [[विटामिन B12]] की कमी से सम्बंधित होता है और [[स्कर्वी]] [[विटामिन सी]] की कमी से सम्बंधित होता है।
यह व्यापक रूप से कैंसर के साथ सही साबित नहीं हुआ है और व्यापक रूप से विटामिन अनुपूरण कैंसर की रोकथाम में प्रभावी नहीं साबित नहीं हुआ है।
भोजन के कैंसर से लड़ने वाले अवयव पहले की तुलना में अब अधिक असंख्य और विविध माने जाते हैं, अतः अब रोगियों को ज़्यादा से ज़्यादा स्वास्थ्य लाभ के लिए बड़े पैमाने पर ताजा, अप्रसंस्कृत फल और सब्जियों के उपभोग की सलाह दी जाती है।<ref>{{cite book | author = Pollan, Michael | title = The Omnivore's Dilemma : A Natural History of Four Meals | url = https://archive.org/details/omnivoresdilemma00poll_0 | publisher = Penguin Press | location = New York| year = 2006 | pages = [https://archive.org/details/omnivoresdilemma00poll_0/page/450 450]| isbn = 978-1-59420-082-3}}</ref>
[[महामारी विज्ञान|महामारी विज्ञान के अध्ययन]] दर्शाते हैं कि [[विटामिन डी|विटामिन D]] की कमी कैंसर के जोखिम के बढ़ने से सम्बंधित है।<ref>{{cite journal |author=Giovannucci E, Liu Y, Rimm EB, ''et al.'' |title=Prospective study of predictors of vitamin D status and cancer incidence and mortality in men |url=https://archive.org/details/sim_journal-of-the-national-cancer-institute_2006-04-05_98_7/page/n34 |journal=J. Natl. Cancer Inst. |volume=98 |issue=7 |pages=451–9 |year=2006 |month=April |pmid=16595781 |doi=10.1093/jnci/djj101}}</ref><ref>{{cite web|url=http://www.cancer.org/docroot/NWS/content/NWS_1_1x_Vitamin_D_Has_Role_in_Colon_Cancer_Prevention.asp|title=Vitamin D Has Role in Colon Cancer Prevention|accessdate=2007-07-27|archive-date=4 दिसंबर 2006|archive-url=https://web.archive.org/web/20061204052746/http://www.cancer.org/docroot/NWS/content/NWS_1_1x_Vitamin_D_Has_Role_in_Colon_Cancer_Prevention.asp|url-status=dead}}</ref> हालांकि, इस तरह के अध्ययनों के परिणाम सावधानी से उपचारित किये जाने चाहिए, क्योंकि वे यह नहीं दर्शा सकते कि दो कारकों के बीच सम्बन्ध का अर्थ है कि एक दूसरे का कारण है (''अर्थात'' [[सम्बन्ध कारण का संकेत नहीं देता है।|सम्बन्ध कारण]] की और संकेत नहीं करता है)<ref>{{cite journal |author=Schwartz GG, Blot WJ |title=Vitamin D status and cancer incidence and mortality: something new under the sun |journal=J. Natl. Cancer Inst. |volume=98 |issue=7 |pages=428–30 |year=2006 |month=April |pmid=16595770 |doi=10.1093/jnci/djj127 |url=http://jnci.oxfordjournals.org/cgi/content/full/98/7/428}}</ref> यह संभावना कि विटामिन D कैंसर से रक्षा करता है, इस तथ्य के विपरीत है कि धुप के संपर्क में रहने पर दुर्दमता का जोखिम बढ़ जाता है।
सूर्य के संपर्क में रहने से मनुष्य में विटामिन D के प्राकृतिक उत्पादन में वृद्धि हो जाती है, कुछ कैंसर अनुसंधानकर्ताओं ने तर्क दिया है कि सूर्य के संपर्क में रहने वाली त्वचा में अतिरिक्त विटामिन D संश्लेषण के कैंसर निवारणीय प्रभाव के तुलना में दुर्दमता के प्रभाव के बढ़ने की संभावना अधिक हानिकर होती है। 2002 में, डॉ॰ विलियम बी ग्रांट ने दावा किया कि अमेरिका में सालाना 23,800 समयपूर्व कैंसर मौतों का कारण है अपर्याप्त UVB के संपर्क में रहना (जाहिर तौर पर विटामिन D की कमी).<ref>{{cite journal | author = Grant WB | title = An estimate of premature cancer mortality in the U.S. due to inadequate doses of solar ultraviolet-B radiation | journal = Cancer | volume = 94 | issue = 6 | pages = 1867–75 | year = 2002 | month = March | pmid = 11920550 | doi = 10.1002/cncr.10427}}</ref> यह संख्या मेलेनोमा या स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के कारण हुई 8800 मौतों से कम है, इसलिए कुल मिलाकर सूर्य के संपर्क में रहना लाभकारी ही है।
एक अन्य शोध समूह<ref>{{cite journal | author = Grant WB, Garland CF, Holick MF | title = Comparisons of estimated economic burdens due to insufficient solar ultraviolet irradiance and vitamin D and excess solar UV irradiance for the United States | journal = Photochemistry and Photobiology | volume = 81 | issue = 6 | pages = 1276–86 | year = 2005 | pmid = 16159309 | doi = 10.1562/2005-01-24-RA-424 | accessdate = 2009-06-06}}</ref><ref>
ग्रांट डबल्यू बी, गर्लेंड सी एफ, होर्लिक एमएफ. अपर्याप्त सौर पराबैंगनी विकिर्नो९न और विटामिन D के कारन अनुमानित आर्थिक बोझ की तुलना और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अतिरिक्त सौर यूवी विकिरण.
फोटोकेम फोटोबायोल 2005 नवम्बर-दिसम्बर; 81 (6): 1276-86.</ref> अनुमान है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में 50,000-63,000 और ब्रिटेन में 19,000- 25,000 व्यक्ति विटामिन D की कमी के कारण प्रतिवर्ष समय पूर्व कैंसर से मर जाते हैं।
[[बीटा कैरोटीन]] का मामला [[चिकित्सीय परीक्षण|यद्रिच्चिक नैदानिक परीक्षणों]] के महत्त्व का एक उदाहरण देता है। आहार और सीरम के स्तरों पर अध्ययन करने वाले [[महामारी विज्ञान|महामारी विज्ञानीयों]] के अनुसार [[विटामिन A]] के पूर्ववर्ती [[बीटा कैरोटीन]] के उच्च स्तर, एक सुरक्षात्मक प्रभाव से, सम्बंधित हैं जो कैंसर के जोखिम को कम करते हैं। यह प्रभाव विशेष रूप से [[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़ों के कैंसर]] में अधिक प्रबल है। इस [[परिकल्पना]] के आधार पर 1980 और 1990 के दशकों के दौरान [[फ़िनलैंड]] और संयुक्त राज्य अमेरिका में कई [[चिकित्सीय परीक्षण|नैदानिक परीक्षण]] एक श्रृंखला में किए गए।
इस अध्ययन में 80,000 धूम्रपान करने वालों या पूर्व धूम्रपान वालों को [[प्लेसबो]] या बीटा-केरोटीन का दैनिक पूरक आहार उपलब्ध कराया गया।
उम्मीद के विपरीत, इस परीक्षण के दौरान दिए गए [[बीटा कैरोटीन|बीटा केरोटीन]] के पूरक आहार ने फुफ्फुस कैंसर की घटनाओं या मृत्यु दर को कम करने में कोई भूमिका नहीं निभायी.
वास्तव में, बीटा कैरोटीन, के द्वारा फेफड़ों के कैंसर का खतरा बहुत अधिक नहीं लेकिन बहुत कम ''बढ़ा'', इसने प्रारंभिक अध्ययन को यहीं पर समाप्त कर दिया। <ref>{{cite web |publisher=National Cancer Institute |url=http://www.cancer.gov/PDF/FactSheet/fs4_13.pdf |format=PDF |title=Questions and answers about beta carotene chemoprevention trials |date=1997-06-27 |accessdate=2009-04-23 |archive-date=29 सितंबर 2006 |archive-url=https://web.archive.org/web/20060929042049/http://www.cancer.gov/PDF/FactSheet/fs4_13.pdf |url-status=dead }}</ref>
[[अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन की जर्नल|जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन]] (JAMA) की 2007 में दी गई रिपोर्ट के परिणाम सूचित करते हैं कि फोलिक अम्ल के पूरक आहार बड़ी आँत के कैंसर को रोकने में प्रभावी नहीं हैं और फोलेट का उपभोग करने वालों में बड़ी आँत के पोलिप के बनने की संभावना अधिक होती है।<ref>{{cite journal |author=Cole BF, Baron JA, Sandler RS, ''et al.'' |title=Folic acid for the prevention of colorectal adenomas: a randomized clinical trial |url=https://archive.org/details/sim_jama_2007-06-06_297_21/page/n42 |journal=JAMA |volume=297 |issue=21 |pages=2351–9 |year=2007 |pmid=17551129 |doi=10.1001/jama.297.21.2351}}</ref>
=== रासायनिक रोकथाम ===
यह एक आकर्षक अवधारणा है कि कैंसर को रोकने के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है और कई उच्च श्रेणी के नैदानिक परिक्षण सलाह देते हैं कि ऐसे रासायनिक रोकथाम को विशेष परिस्थितियों में काम में लेना चाहिए।
प्रारूपिक रूप से 5 वर्ष के लिए एक [[टेमोक्सीफेन|चयनात्मक एस्ट्रोजन रिसेप्टर मोड्युलेटर]] (SERM), [[चयनात्मक एस्ट्रोजन ग्राही मोड्युलेटर|टेमोक्सीफेन]] का दैनिक उपयोग उच्च जोखिम युक्त महिलाओं में [[स्तन कैंसर]] के खतरे को लगभग 50% तक कम कर देता है। हाल ही के अध्ययन की एक रिपोर्ट के अनुसार [[चयनात्मक एस्ट्रोजन ग्राही मोड्युलेटर|चयनात्मक एस्ट्रोजन रिसेप्टर मोड्युलेटर]] [[रेलोक्सिफ़ेन]] भी [[टेमोक्सीफेन]] की तरह ही लाभकारी है और उच्च जोखिम युक्त महिलाओं में स्तन कैंसर के खतरे को कम करता है इसके पार्श्व प्रभावों का प्रोफाइल अधिक अनुकूल है।<ref name="STAR-P2">{{cite journal |author=Vogel V, Costantino J, Wickerham D, Cronin W, Cecchini R, Atkins J, Bevers T, Fehrenbacher L, Pajon E, Wade J, Robidoux A, Margolese R, James J, Lippman S, Runowicz C, Ganz P, Reis S, McCaskill-Stevens W, Ford L, Jordan V, Wolmark N |title=Effects of tamoxifen vs raloxifene on the risk of developing invasive breast cancer and other disease outcomes: the NSABP Study of Tamoxifen and Raloxifene (STAR) P-2 trial |journal=JAMA |volume=295 |issue=23 |pages=2727–41 |year=2006 |pmid=16754727 |doi=10.1001/jama.295.23.joc60074}}</ref>
[[रेलोक्सिफ़ेन]] [[टेमोक्सीफेन]] की तरह एक SERM है; उच्च जोखिम युक्त महिलाओं में स्तन कैंसर के खतरे को कम करने में यह टेमोक्सीफेन के समान ही प्रभावी (STAR परीक्षण में) पाया गया है। इस परीक्षण में लगभग 20,000 महिलाओं पर अध्ययन किया गया, [[रेलोक्सिफ़ेन]] के पार्श्व प्रभाव [[टेमोक्सीफेन]] से कम हैं, यद्यपि यह अधिक [[डकटल कार्सिनोमा|DCIS]] बनाने के लिए प्रक्रिया को बढ़ावा देता है।<ref name="STAR-P2"/>
एक [[5-अल्फा-रिड़कटेज संदमक]] [[फिनएसटेराइड|फिनएस्टेराइड]], प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को कम करता है, यद्यपि यह छोटी श्रेणी के ट्यूमर को अधिकांशतया रोक देता है।<ref>{{cite journal |author=Thompson I, Goodman P, Tangen C, Lucia M, Miller G, Ford L, Lieber M, Cespedes R, Atkins J, Lippman S, Carlin S, Ryan A, Szczepanek C, Crowley J, Coltman C |title=The influence of finasteride on the development of prostate cancer |url=https://archive.org/details/sim_new-england-journal-of-medicine_2003-07-17_349_3/page/n39 |journal=N Engl J Med |volume=349 |issue=3 |pages=215–24 |year=2003 |pmid=12824459 |doi=10.1056/NEJMoa030660}}</ref>
बृहदान्त्र पोलिप्स के जोखिम पर [[COX-2 चयनात्मक संदमक|कॉक्स-2 संदमक]] जैसे [[रोफेकोक्सिब]] और [[सिलेकोक्सिब|सलेकोक्सिब]] के प्रभाव का अध्ययन [[फेमिलियल एडिनोमेटस पोली पोसिस|फेमिलियल एडिनोमेटस पोलीपोसि]]स रोगियों में<ref>{{cite journal |author=Hallak A, Alon-Baron L, Shamir R, Moshkowitz M, Bulvik B, Brazowski E, Halpern Z, Arber N |title=Rofecoxib reduces polyp recurrence in familial polyposis |url=https://archive.org/details/sim_digestive-diseases-and-sciences_2003-10_48_10/page/1998 |journal=Dig Dis Sci |volume=48 |issue=10 |pages=1998–2002 |year=2003 |pmid=14627347 |doi=10.1023/A:1026130623186}}</ref>
और आम जनसंख्या में किया गया है।<ref>{{cite journal |author=Baron J, Sandler R, Bresalier R, Quan H, Riddell R, Lanas A, Bolognese J, Oxenius B, Horgan K, Loftus S, Morton D |title=A randomized trial of rofecoxib for the chemoprevention of colorectal adenomas |url=https://archive.org/details/sim_gastroenterology_2006-12_131_6/page/1674 |journal=Gastroenterology |volume=131 |issue=6 |pages=1674–82 |year=2006 |pmid=17087947 |doi=10.1053/j.gastro.2006.08.079}}</ref><ref>{{cite journal |author=Bertagnolli M, Eagle C, Zauber A, Redston M, Solomon S, Kim K, Tang J, Rosenstein R, Wittes J, Corle D, Hess T, Woloj G, Boisserie F, Anderson W, Viner J, Bagheri D, Burn J, Chung D, Dewar T, Foley T, Hoffman N, Macrae F, Pruitt R, Saltzman J, Salzberg B, Sylwestrowicz T, Gordon G, Hawk E |title=Celecoxib for the prevention of sporadic colorectal adenomas |url=https://archive.org/details/sim_new-england-journal-of-medicine_2006-08-31_355_9/page/872 |journal=N Engl J Med |volume=355 |issue=9 |pages=873–84 |year=2006 |pmid=16943400 |doi=10.1056/NEJMoa061355}}</ref>
दोनों समूहों में, [[बृहदान्त्र पोलिप]] की [[घटना (जानपदिक रोग विज्ञान)|घटना]] में बहुत कमी आई, लेकिन इसका असर हृदय संवहनी विषाक्तता की वृद्धि के रूप में दिखाई दिया।
=== आनुवंशिक परीक्षण ===
विशेष कैंसर संबंधी आनुवंशिक उत्परिवर्तनों के लिए उच्च जोखिम युक्त व्यक्तियों का [[आनुवंशिक परीक्षण]] पहले से ही उपलब्ध है। आनुवंशिक उत्परिवर्तनों के वाहक जो कैंसर के जोखिम की घटनाओं को बढाते हैं, उन पर अधिक निगरानी रखी जा सकती है, उनके लिए रासायनिक रोकथाम या जोखिम को कम करने वाली शल्य चिकित्सा का उपयोग किया जा सकता है। कैंसर के वंशागत जोखिम की प्रारंभिक पहचान और कैंसर की रोकथाम के उपाय जैसे शल्य चिकित्सा या निगरानी, उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के जीवन के लिए बहुत अधिक लाभकारी हो सकते हैं।
{| class="wikitable" border="1"
|-
!जीन
!कैंसर के प्रकार
!उपलब्धता
|-
| [[BRCA1]], [[BRCA2]]
| स्तन, डिम्बग्रंथि, अग्नाशयी
| नैदानिक नमूनों के लिए व्यावसायिक रूप से उपलब्ध
|-
| [[MLH1]], [[MSH2]], [[MSH6]], [[PMS1]], [[PMS2]]
| बृहदान्त्र, गर्भाशय, छोटी आंत, आमाशय, मूत्रमार्ग
| नैदानिक नमूनों के लिए व्यावसायिक रूप से उपलब्ध
|}
=== टीकाकरण ===
ओंकोजनिक संक्रामक कारक जैसे वायरस के द्वारा संक्रमण को रोकने के लिए रोग निरोधी [[टीका (वैक्सीन)|वेक्सिनों]] या टीकों का विकास किया गया है और कैंसर विशिष्ट [[एपीटोप|एपिटोप्स]] के खिलाफ प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया को उत्तेजित करने के लिए चिकित्सात्मक टीकों का विकास किया जा रहा है।<ref name="vacc_facts_nci">{{cite web | url=http://www.cancer.gov/cancertopics/factsheet/cancervaccine | title=Cancer Vaccine Fact Sheet | publisher=[[National Cancer Institute|NCI]] | date=2006-06-08 | accessdate=2008-11-15 | archive-date=25 अक्तूबर 2008 | archive-url=https://web.archive.org/web/20081025003130/http://www.cancer.gov/cancertopics/factsheet/cancervaccine | url-status=dead }}</ref>
जैसा की ऊपर बताया गया है कि एक निवारक [[मानव पेपीलोमा वाइरस वेक्सीन|मानव पेपिलोमा वायरस वेक्सीन]] उपस्थित है जो [[मानव पेपीलोमा वाइरस|मानव पेपिलोमा वायरस]] की विशिष्ट यौन संचरित नस्लों को लक्ष्य बनाता है, जो [[गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर|गर्भाशय ग्रीवा कैंसर]] और [[जननांग मस्सा|जननांग मस्सों]] के विकास से सम्बंधित हैं। अक्टूबर 2007 को बाजार में केवल दो HPV टीके उपलब्ध थे [[गार्दासिल|गर्दासिल]] और [[Cervarix|सर्वारिक्स]]. [[सर्वेरिक्स|[168]]] एक [[हेपेटाइटिस बी के टीके|हैपेटाइटिस B वेक्सीन]] भी है, जो हैपेटाइटिस B से वायरस से होने वाले संक्रमण को रोकती है, यह वायरस एक संक्रामक कारक है जो यकृत कैंसर का कारण है।<ref name="vacc_facts_nci"/> एक केनायन मेलेनोमा वेक्सीन का भी विकास किया गया है।<ref name="Liao">{{cite journal |author=Liao JC, Gregor P, Wolchok JD, Orlandi F, Craft D, Leung C, Houghton AN, Bergman PJ. |title=Vaccination with human tyrosinase DNA induces antibody responses in dogs with advanced melanoma |journal=Cancer Immun. |volume=6 |pages=8 |year=2006}}</ref><ref>{{cite press release
| title = USDA Grants Conditional Approval for First Therapeutic Vaccine to Treat Cancer
| publisher = Animal Medical Centre
| date = 2007-03-26
| url = http://www.amcny.org/technology/melanomavaccine.aspx
| accessdate = 2009-06-06
| archive-date = 14 दिसंबर 2009
| archive-url = https://web.archive.org/web/20091214054731/http://www.amcny.org/technology/melanomavaccine.aspx
| archivedate = 14 दिसंबर 2009
| archiveurl = https://web.archive.org/web/20091214054731/http://www.amcny.org/technology/melanomavaccine.aspx
}}</ref>
=== स्क्रीनिंग ===
{{Unreferenced|date=May 2009}}
कैंसर [[स्क्रीनिंग (दवा)|स्क्रीनिंग]] एक प्रयास है जो लक्षण हीन आबादी में शंकाहीन कैंसर की जांच के लिए किया जाता है। बड़ी संख्या में स्वस्थ लोगों के लिए उपयुक्त स्क्रीनिंग टेस्ट अपेक्षाकृत सस्ते, सुरक्षित होने चाहिए, इनकी प्रक्रिया संक्रामक नहीं होनी चाहिए, [[प्रकार I और प्रकार II की त्रुटियां|सकारात्मक झूठे]] परिणाम की दर बहुत कम होनी चाहिए। अगर कैंसर के लक्षण पता लगते हैं, तो निदान को सुनिश्चित करने के लिए अधिक निश्चित परीक्षण किए जाते हैं।
कैंसर के लिए स्क्रीनिंग विशेष मामलों में प्रारंभी निदान में सहायक है। शीघ्र निदान जीवन को बढ़ा सकता है, लेकिन आभासी रूप से मृत्यु तक के समय को [[सीसा समय पूर्वाग्रह]] या [[लंबाई समय पूर्वाग्रह]] के माध्यम से लंबा खींच सकता है।
भिन्न दुर्दमताओं के लिए कई विभिन्न स्क्रीनिंग परीक्षणों का विकास किया गया है। स्तन कैंसर स्क्रीनिंग को [[स्तन स्वयं परीक्षा]], के द्वारा किया जा सकता है, यद्यपि 2005 में किए गए एक अध्ययन में 300,000 से अधिक चीनी महिलाओं में यह दृष्टिकोण गलत साबित हुआ।
[[मेम्मोग्राम|मैमोग्राम]] के द्वारा स्तन कैंसर की स्क्रीनिंग एक जनसंख्या में स्तन कैंसर के निदान की औसत अवस्था को कम करती है। मेमोग्रफिक स्क्रीनिंग कार्यक्रम की शुरूआत के बाद के दस वर्षों के भीतर एक देश में निदान की अवस्था में कमी आयी है।
बड़ी-आँत मलाशय के कैंसर को [[फेकल मनोगत रक्त परीक्षण|फेकल ओकल्ट रक्त परीक्षण]] और [[कोलोनोस्कोपी]] के द्वारा जांचा जा सकता है, जो बड़ी आँत के कैंसर और मृत्यु दर दोनों को कम करता है, पूर्व दुर्दम पोलिप की जांच करके और उसे हटाकर ऐसा संभव है। इसी प्रकार, गर्भाशय ग्रीवा का कोशिका विज्ञान परीक्षण ([[पैप स्मियर|पैप स्मीयर]] का उपयोग करते हुए) पूर्व कैंसर घाव की पहचान में मदद करता है। समय के साथ, ऐसे परीक्षणों के कारण [[गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर|गर्भाशय ग्रीवा कैंसर]] की घटनाओं और मृत्यु दर में कमी आयी है। 15 वर्ष की आयु में शुरुआत में [[शुक्र ग्रंथि का कैंसर|शुक्र ग्रंथि कैंसर]] की जांच के लिए [[वृषनों का स्वयं परीक्षा|शुक्र ग्रंथि स्वयं परीक्षा]] की सलाह दी जाती है। प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग [[डिजिटल गुदा परीक्षा]] के साथ [[प्रोस्टेट विशिष्ट प्रतिजन]] (PSA) रक्त परीक्षण, का उपयोग करके की जा सकती है, हालांकि कुछ अधिकारिक संस्थाएं (जैसे [[यू एस प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स]]) सभी पुरुषों में ऐसी स्क्रीनिंग के ख़िलाफ़ हैं।
कैंसर के लिए स्क्रीनिंग कई मामलों में विवाद का विषय है, जब तक यह पता न हो कि परीक्षण वास्तव में जीवन को बचायेगा.विवाद और अधिक बढ़ जाता है जब यह स्पष्ट न हो कि स्क्रीनिंग के लाभ नैदानिक परीक्षणों और कैंसर के उपचारों के संभावी जोखिम से अधिक प्रभावी हैं। उदाहरण के लिए: [[प्रोस्टेट कैंसर]] की स्क्रीनिंग के समय, [[प्रोस्टेट विशिष्ट प्रतिजन|PSA]] परीक्षण छोटे कैंसरों को पता लगा सकता है, जो कभी भी जीवन के लिए घातक नहीं बनते, लेकिन एक बार पता चल जाने पर उपचार शुरू करना ही होता है। यह स्थिति अति निदान कहलाती है, जो पुरूष को अनावश्यक उपचार जैसे शल्य चिकित्सा और विकिरण की जटिलताओं का सामना करने के लिए मजबूर कर देती है। प्रोस्टेट कैंसर का निदान करने के लिए प्रयुक्त प्रक्रियाएं ([[प्रोस्टेट बायोप्सी]]) पार्श्व प्रभावों का कारण हो सकती हैं जिनमें रक्त प्रवाह और संक्रमण शामिल है। प्रोस्टेट कैंसर का इलाज [[मूत्र असंयम|असंयम]] (मूत्र के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए असमर्थता) और [[इरेक्टाइल डिसफंक्शन|लैंगिक निष्क्रियता]] (इरेक्शन यानि शिश्न की उत्तेजना जो संभोग के लिए अपर्याप्त है) का कारण हो सकता है। इसी प्रकार, [[स्तन कैंसर]] के लिए, हाल ही में यह आलोचना दी गयी है कि कुछ देशों में स्तन स्क्रीनिंग कार्यक्रम समस्याओं को हल करने के बजाय बढ़ा देता है। ऐसा इसलिए है कि सामान्य जनसंख्या में महिलाओं में स्क्रीनिंग कई आभासी धनात्मक परिणाम दे सकती है, जिन्हें अग्रिम जांच की जरुरत होती है, जिसकी वजह से स्तन कैंसर के केवल एक ही मामले का पता लगाने और उसके उपचार के लिए बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं का उपचार (या स्क्रीनिंग) किया जाता है।
एक सार्वजनिक स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य के अनुसार [[पैप स्मियर|पैप स्मीय]]र के माध्यम से ग्रीवा कैंसर स्क्रीनिंग, अन्य सभी प्रकार के कैंसर की तुलना में कीमत की दृष्टि से अधिक लाभकारी है, यह बड़े पैमाने पर एक वायरस के कारण होता है, इसमें स्पष्ट जोखिम कारक (यौन संपर्क) हैं, इस कैंसर के प्राकृतिक प्रसार का तरीका यह है कि यह सामान्यतया धीरे धीरे कई वर्षों में फैलता है, इसलिए स्क्रीनिंग कार्यक्रम को इसे जल्दी पकड़ में ले लेने के लिए अधिक समय मिल जाता है। इसके अलावा, परीक्षण अपने आप में सस्ता और बहुत ही आसान है।
इन्हीं कारणों से, कैंसर स्क्रीनिंग के लिए विचार करते समय नैदानिक प्रक्रिया और उपचार के लाभ तथा जोखिम पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।
स्पष्ट लक्षणों के अभाव युक्त लोगों में कैंसर के लिए [[मेडिकल इमेजिंग]] का उपयोग, समान रूप से समस्या जनक है। हाल ही में खोजे गए ''[[इन्सीडेन्टालोमा|इन्सीडेनटालोमा]]'' की जांच में बहुत जोखिम है- एक सौम्य घाव जिसे दुर्दम समझा जा सकता है और हो सकता है कि इसके लिए सम्भावित खतरनाक जांच की जाए.
धूम्रपान करने वालों में [[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़ों के कैंसर]] के लिए [[CT स्कैन|सीटी स्कैन-]]आधारित स्क्रीनिंग के हाल ही में किये गए अध्ययन के गोलमोल परिणाम सामने आये हैं, जुलाई 2007 से व्यवस्थित स्क्रीनिंग की सलाह नहीं दी जाती है।
सादे-फिल्म के [[सीने का X-रे|छाती के एक्स रे]] के [[याद्रीच्छिक नैदानिक प्रयास|यद्रिच्चिक नैदानिक परीक्षण]], जो धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के लिए स्क्रीन करते हैं, इस दृष्टिकोण के लिए लाभकारी साबित नहीं हुए हैं।
[[कैनाइन कैंसर की जाँच]] के सटीक परिणाम होते हैं, लेकिन यह अभी भी अनुसंधान के प्रारंभिक चरण में है।
== निदान ==
अधिकांश कैंसर या तो अपने लक्षणों और संकेतों के द्वारा प्रारंभिक रूप से पहचाने जाते हैं या स्क्रीनिंग के दौरान प्रकट होते हैं। इनमें से कोई भी निश्चित निदान नहीं है, जिसे आम तौर पर एक [[संरचनात्मक विकृतिविज्ञान|रोगविज्ञानी]] की सलाह की जरुरत होती है, यह रोग विज्ञानी एक प्रकार का फिजिशियन (मेडिकल डॉक्टर) होना चाहिए जो कैंसर और अन्य रोगों के निदान में माहिर है।
=== जांच ===
[[चित्र:Thorax pa peripheres Bronchialcarcinom li OF markiert.jpg|thumb|right|छाती का एक्सरे, बाएं फेफड़े में, फेफड़ों के कैंसर दिखाता हुआ .]]
जिन लोगों में कैंसर का संदेह होता है उनकी [[मेडिकल परीक्षण|चिकित्सा परीक्षण]] के द्वारा जांच की जाती है। इसमें सामान्य हैं [[रक्त परीक्षण]], [[एक्सरे|एक्स किरण]], [[सीटी स्कैन]] और [[एंडोस्कोपी|अंतःदर्शन (एंडोस्कोपी)]].
=== बायोप्सी ===
कई कारणों से कैंसर का संदेह हो सकता है, लेकिन अधिकांश दुर्दमताओं का निश्चित निदान एक [[संरचनात्मक विकृतिविज्ञान|रोग विज्ञानी]] के द्वारा कैंसर की कोशिकाओं के [[उतक विज्ञान|उतक वैज्ञानिक]] परीक्षण के द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
[[बायोप्सी]] या [[शल्य चिकित्सा]] के द्वारा उतक को प्राप्त किया जा सकता है। कई बायोप्सी (जैसे त्वचा, स्तन या यकृत की) एक चिकित्सक के कार्यालय में ही की जा सकती हैं। अन्य अंगों की बायोप्सी एक [[असंवेदनता|निश्चेतक]] की उपस्थिति में की जाती है, इसके लिए [[शल्य चिकित्सा कक्ष|शल्य चिकित्सा के कक्ष]] में [[शल्य चिकित्सा|शल्य क्रिया]] की आवश्यकता होती है।
रोग विज्ञानी के द्वारा दिए गए उतक [[चिकित्सा निदान|निदान]] प्रचुरोद्भवन करने वाली कोशिका के प्रकार को बताते हैं। साथ ही गाँठ की [[उतक विज्ञानी श्रेणी|उतक वैज्ञानिक श्रेणी]], आनुवंशिक असामान्यताओं और अन्य लक्षणों को भी स्पष्ट करते हैं।
साथ ही, यह जानकारी रोगी के [[रोग का लक्षण|पूर्व निदान]] का मूल्यांकन करने में तथा सर्वोत्तम इलाज का चयन करने में उपयोगी है।[[कोशिका अनुवांशिकी|कोशिका आनुवंशिकी]] और [[प्रतिरक्षी उतक रसायन विज्ञान|प्रतिरक्षा उतक रसायन विज्ञान]] परीक्षण के अन्य प्रकार हैं जो एक रोग विज्ञानी एक उतक के नमूने पर कर सकता है। ये परीक्षण उन आण्विक परिवर्तनों (जैसे [[उत्परिवर्तन]], [[संलयन जीन]] और संख्यात्मक [[गुणसूत्र|गुणसूत्री]] परिवर्तन) के बारे में जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं जो कैंसर की कोशिका में हुए हैं और इस प्रकार से कैंसर के भावी व्यवहार (पूर्व निदान) और सर्वोत्तम उपचार को भी इंगित करते हैं।
== उपचार ==
कैंसर का उपचार [[शल्य चिकित्सा]], [[कीमोथेरेपी|रसोचिकित्सा (कीमोथेरपी)]], [[विकिरण चिकित्सा]], [[इम्मयुनो थेरेपी (प्रतिरक्षी चिकित्सा)|प्रतिरक्षा चिकित्सा (थेरेपी)]], [[मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी चिकित्सा|मोनोक्लोनल एंटीबॉडी चिकित्सा]] या अन्य विधियों के द्वारा किया जा सकता है। थेरेपी का चयन गाँठ की स्थिति और श्रेणी तथा रोग की [[कैंसर की अवस्थाएं|अवस्था]] पर निर्भर करता है, साथ ही रोगी की सामान्य अवस्था पर भी निर्भर करता है ([[प्रदर्शन का दर्जा|प्रदर्शन की स्थिति]]).कई [[प्रयोगात्मक कैंसर उपचार]] भी विकसित हो रहे हैं।
शरीर को नुकसान पहुचाये बिना कैंसर को पूरी तरह से ख़त्म करना उपचार का उद्देश्य होता है। कभी कभी इसे शल्य चिकित्सा के द्वारा किया जा सकता है, लेकिन कैंसर की आस-पास के उतकों पर आक्रमण करने की प्रवृति या सूक्ष्म मेटास्टेसिस द्वारा दूर के स्थानों पर फ़ैल जाने की प्रवृति अक्सर इसकी प्रभाविता को सीमित कर देती है। कीमोथेरपी की प्रभावशीलता अक्सर शरीर में अन्य उतकों के विषिकरण के द्वारा सीमित हो जाती है। विकिरण सामान्य ऊतकों को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं।
क्योंकि "कैंसर" का सन्दर्भ रोगों के एक वर्ग से है, ऐसा सम्भव नहीं है कि "[[कैंसर के लिए इलाज|कैंसर का हमेशा एक मात्र उपचार]]" ही रहेगा, फिर भी सभी [[संक्रामक रोग|संक्रामक रोगों]] के लिए एक ही उपचार होता है।
=== शल्य चिकित्सा ===
सैद्धांतिक रूप से गैर [[हिमेटोलोजिकल]] कैंसर का इलाज किया जा सकता है यदि इसे पूरी तरह से [[शल्य चिकित्सा]] के द्वारा हटा दिया जाए, {{Fact|date=March 2009}} लेकिन यह सदा सम्भव नहीं है। जब कैंसर शल्य चिकित्सा से पहले ही [[मेटास्टेसिस]] के द्वारा शरीर के अन्य अंगों तक पहुँच जाता है, तब पूरी तरह से शल्य क्रिया द्वारा इसे हटा देना आम तौर पर असंभव होता है। कैंसर की प्रगति के [[विलियम स्टीवर्ट हाल्सटेड|हाल्सटेड]] नमूने में, गाँठ स्थानिक रूप से बढती है, फ़िर लसिका पर्वों तक फ़ैल जाती है और फ़िर शरीर के अन्य सभी भागों में.इसी कारण से छोटे कैंसरों के लिए स्थानिक उपचार जैसे शल्य चिकित्सा की लोकप्रियता बढ़ गई है। यहाँ तक कि छोटे स्थानीयकृत ट्यूमर में भी मेटास्टेसिस की बहुत अधिक क्षमता होती है।
कैंसर के लिए शल्यचिकित्सा की प्रक्रियाओं के उदाहरणों में शामिल हैं- स्तन कैंसर के लिए [[स्तन-उच्छेदन (मेसेक्टोमी)|स्तनोछेदन]] (स्तन को काट कर हटा देना) और प्रोस्टेट कैंसर के लिए [[प्रोस्टेटेक्टोमी|प्रोस्टेट-छेदन]] (प्रोस्टेट को काट कर हटा देना). शल्य चिकित्सा का लक्ष्य होता है या तो केवल गाँठ को हटाना या पूरे अंग को निकाल देना.एक कैंसर कोशिका नग्न आंखों के लिए अदृश्य होती है, लेकिन फ़िर से वृद्धि कर के नयी गाँठ बना सकती है, यह प्रक्रिया पुनरावृत्ति कहलाती है। इस कारण के लिए, [[संरचनात्मक विकृतिविज्ञान|रोगविज्ञानी]] शल्य क्रिया से निकाले गए नमूने की जांच करते हैं, यदि स्वस्थ उतक की सीमा उपस्थित है, तो इस बात की संभावना कम हो जाती है कि सूक्ष्म कैंसर की कोशिकायें रोगी के शरीर में रह गई हैं।
प्राथमिक गाँठ को निकालने के अलावा, अक्सर शल्य क्रिया [[कैंसर की अवस्थाएं|अवस्था निर्धारण]] के लिए आवश्यक होती है उदाहरण रोग की सीमा का निर्धारण और इस बात का निर्धारण कि यह [[मेटास्टेसिस]] के द्वारा क्षेत्रीय [[लसीका पर्व|लसिका पर्वों]] तक पहुँच गया है या नहीं। अवस्था निर्धारण [[पूर्व निदान]] का मुख्य निर्धारक है और [[सहायक चिकित्सा|सहयोगी चिकित्सा]] की आवश्यकता भी है।
अक्सर, [[मेरीरज्जू संपीड़न|मेरु रज्जू संपीड़न]] या [[आंत्र बाधा]] जैसे लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए शल्य चिकित्सा जरुरी होती है। इसे [[उपशामक उपचार|शमन उपचार]] के रूप में जाना जाता है।
=== विकिरण चिकित्सा ===
[[विकिरण चिकित्सा]] (रेडियोथेरेपी, एक्स रे चिकित्सा, विकिर्णन भी कहलाती है) में कैंसर की कोशिकाओं और संकुचित गांठ को नष्ट करने के लिए आयनीकरण विकिरण का उपयोग किया जाता है। विकिरण चिकित्सा को [[बाह्य किरण रेडियोथेरेपी]] के द्वारा बाहर से ही नियंत्रित किया जाता है या [[ब्रेकिथेरेपी|ब्रेकीथेरेपी]] के द्वारा अन्दर से नियंत्रित किया जा सकता है। विकिरण चिकित्सा का प्रभाव स्थानीकृत होता है और चिकित्सा किए जाने वाले क्षेत्र तक ही सीमित रहता है। विकिरण चिकित्सा, इलाज किए जाने वाले क्षेत्र ("लक्ष्य ऊतक") की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करती है या नष्ट कर देती है, इस क्रिया में इन कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ को नष्ट कर दिया जाता है ताकि कोशिकाओं में आगे विभाजन और वृद्धि न हो पाए.यद्यपि विकिरण कैंसर की कोशिकाओं और सामान्य कोशिकाओं दोनों को नष्ट कर देते हैं, अधिकांश सामान्य कोशिकाएं विकिरण के प्रभाव से उबर आती हैं और ठीक प्रकार से कार्य करने लगती हैं। विकिरण चिकित्सा का लक्ष्य है अधिक से अधिक कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करना, जबकि आस-पास के स्वस्थ उतकों को होने वाले नुकसान को सीमित करना। इसलिए, यह कई भागों में दी जाती है जिससे बीच की अवधि में स्वस्थ उतकों को ठीक होने का मौका मिल जाता है।
विकिरण चिकित्सा, का उपयोग लगभग हर प्रकार की ठोस गांठ के उपचार के लिए किया जा सकता है, जिसमें मस्तिष्क, स्तन, गर्भाशय ग्रीवा, गला, फेफड़े, अग्न्याशय, प्रोस्टेट, त्वचा, पेट, गर्भाशय, या कोमल उतक सार्कोमा के कैंसर शामिल हैं। ल्यूकेमिया (रक्त केंसर) और लिम्फोमा के उपचार में भी विकिरण चिकित्सा का उपयोग किया जा सकता है। प्रत्येक साइट के लिए विकिरण की खुराक कई कारकों पर निर्भर करती है, ये कारक हैं, हर प्रकार के कैंसर की रेडियो संवेदनशीलता और आस-पास के उतक या अंग विकिरण से नष्ट हो सकते हैं या नहीं। इस प्रकार, हर प्रकार के उपचार में, विकिरण चिकित्सा इसके पार्श्व दुष्प्रभावों के बिना नहीं है।
=== रसोचिकित्सा ===
{{main|रसोचिकित्सा}}
[[कीमोथेरेपी|रसोचिकित्सा (कीमोथेरेपी)]] में उन [[दवा देना|दवाओं]] से कैंसर का उपचार किया जाता है ("कैंसर विरोधी दवाएं") जो कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट कर सकती हैं। वर्तमान उपयोग में, शब्द "रसोचिकित्सा" का उपयोग उन ''साइटोटोक्सिक'' या ''कोशिकाविषी'' दवाओं के लिए किया जाता है जो ''लक्षित चिकित्सा'' के विपरीत, सामान्य रूप में तेज़ी से विभाजित होती हुई कोशिकाओं को प्रभावित करती हैं। (नीचे देखें). रसोचिकित्सा दवाएं भिन्न संभव तरीकों से कोशिका विभाजन में बाधा डालती हैं, उदाहरण [[डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल|DNA (डीएनए)]] की प्रतिकृति से या नव निर्मित [[गुणसूत्र|गुणसूत्रों]] के पृथक्करण से.कीमोथेरेपी के अधिकांश रूप तेज़ी से विभाजित होती हुई सभी कोशिकाओं को लक्ष्य बनाते हैं, ये केवल कर्कट की कोशिकाओं के लिए विशिष्ट नहीं हैं, यद्यपि कुछ विशिष्टता इस वजह से आ जाती है कि अधिकांश कर्कट की कोशिकाएं [[डीएनए की क्षति|डीएनए क्षति]] की मरम्मत में सक्षम नहीं होती हैं जबकि सामान्य कोशिकाओं में आम तौर पर पर ये क्षमता होती है। अतः, रसोचिकित्सा में स्वस्थ उतकों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता होती है, विशेष रूप से वे उतक जिनमें उच्च प्रतिस्थापन दर होती है (उदाहरण आंत का आंतरिक स्तर).ये कोशिकाएं आमतौर पर रसोचिकित्सा के बाद अपनी मरम्मत कर लेती हैं।
क्योंकि कुछ दवाएं अकेले की तुलना में एक साथ बेहतर कार्य करती हैं, इसलिए एक ही समय पर दो या अधिक दवाएं दी जाती हैं। इसे "संयोजन रसोचिकित्सा" कहा जाता है; अधिकांश रसोचिकित्सा रेजिमेन एक संयोजन में ही दिए जाते हैं।
कुछ प्रकार के [[ल्यूकेमिया या रक्त कैंसर|ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर)]] और [[लिम्फोमा|लसीकार्बुद (लिंफोमा)]] के उपचार के लिए कीमोथेरपी की उच्च खुराक की या [[पूर्ण शरीर का किरणन|पूरे शरीर के विकीर्णन]] (TBI) की आवश्यकता होती है। यह उपचार अस्थि मज्जा को अलग कर देता है और इसलिए शरीर की ठीक होने और रक्त के पुनर्निमाण की क्षमता पृथक्कृत हो जाती है। इस कारण से, थेरेपी के पृथक्करण प्रभाव से पहले अस्थि मज्जा, या परिधीय रक्त स्तम्भ कोशिका हार्वेस्टिंग की जाती है ताकि उपचार के बाद "बचाव" संभव हो।
इसे ऑटोलॉगस [[स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण]] के रूप में जाना जाता है। वैकल्पिक रूप से, एक मिलान किए गए असंबंधित दाता से ली गयी [[हिमेटोपोयटिक स्टेम कोशिका|हिमेटोपोयटिक स्टेम कोशिकाएं]] प्रत्यारोपित की जा सकती हैं।
=== लक्षित चिकित्सा ===
{{main|Targeted therapy}}
लक्षित थेरेपी जो 1990 के दशक के अंत में सबसे पहले उपलब्ध हुई, का कई प्रकार के कैंसर के उपचार में मुख्य प्रभाव था और वर्तमान में यह एक बहुत ही अधिक सक्रिय अनुसंधान क्षेत्र है। इसमें ऐसे कारकों का उपयोग शामिल है जो कैंसर कोशिकाओं के प्रोटीन को अनियमित करने के लिए विशिष्टीकृत होते हैं। [[छोटे अणु]] लक्षित उपचार दवायें आमतौर पर कैंसर कोशिकाओं के भीतर उत्परिवर्तित, अति अभिव्यक्त, या अन्य जटिल प्रोटीनों पर [[एंजाइम या उत्प्रेरक|एन्जाइमेटिक]] डोमेन की संदमक होती हैं।
प्रमुख उदाहरण हैं थायरोसिन कायनेज संदमक [[इमातिनिब]] (Gleevec/Glivec) और [[गेफितिनिब|जेफितिनिब]] (Iressa).
[[मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी चिकित्सा]] एक अन्य रणनीति है जिसमें उपचार का कारक एक [[प्रतिरक्षी]] होता है जो कैंसर कोशिकाओं की सतह पर एक प्रोटीन के साथ विशेष रूप से बंध बना लेता है। उदाहरणों में शामिल हैं स्तन कैंसर में प्रयुक्त किया जाने वाला एंटी- [[HER2/neu]] प्रतिरक्षी [[ट्रासटूजूमाब|ट्रास्टूज़ुमेब]] (हरसेपटिन) और कई प्रकार की [[B-कोशिका]] दुर्दमताओं में प्रयुक्त किया जाने वाला एंटी CD-20 प्रतिरक्षी [[रीटूक्सीमाब|रितुक्सिमेब]].
[[लक्षित चिकित्सा|लक्षित थेरेपी]] में "होमिंग युक्ति" के रूप में छोटे [[पेप्टाइड]] भी शामिल हो सकते हैं, जो गाँठ के चारों ओर प्रभावित [[बाह्य कोशिकीय मैट्रिक्स|बाह्य कोशिकी मैट्रिक्स]] के साथ या कोशिका की सतह पर ग्राही के साथ बांध बना सकते हैं।
रेडियो न्युक्लीड जो इन पेपटाईडों (उदाहरण RGD) से जुड़े होते हैं, अंततः कैंसर कोशिका को मार देते हैं यदि न्यूक्लीड कोशिका के आस पास अपघटित हो रहा है।
विशेष रूप से इन बंधित पदार्थों के ओलिगो- या मल्टीमर्स बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, चूँकि वे गाँठ की विशिष्टता और उत्कंठा को बढ़ाते हैं।
[[प्रकाश गतिक चिकित्सा]] (PDT) कैंसर के लिए तिहरा उपचार है जिसमें प्रकाश संवेदक, उतक ऑक्सीजन, ओर प्रकाश (अक्सर [[लेज़र|लेजर]] का उपयोग) शामिल हैं। PDT का उपयोग [[आधारी कोशिका कार्सिनोमा]] (BCC) या [[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़ों के कैंसर]] के उपचार के लिए किया जाता है; PDT बड़े ट्यूमर को शल्य चिकित्सा के द्वारा हटा दिए जाने के बाद दुर्दम उतक के बचे हुए अवशेषों को हटाने में भी उपयोगी हो सकता है।<ref>{{cite journal |last=Dolmans |first=DE |author2=Fukumura D, Jain RK |year=2003 |month=May |title=Photodynamic therapy for cancer |journal=Nat Rev Cancer |volume=3 |issue=5 |pages=380–7 |pmid=12724736 |url=http://www.nature.com/nrc/journal/v3/n5/abs/nrc1071_fs.html |doi=10.1038/nrc1071}}</ref>
=== प्रतिरक्षा चिकित्सा ===
[[चित्र:Renal cell carcinoma.jpg|thumb|upright|एक वृक्क के नमूने में एक वृक्क कोशिका कार्सिनोमा (नीचला बायां)]]
कैंसर प्रतिरक्षा थेरेपी भिन्न चिकित्सा रणनीतियों का एक समूह है जिसे रोगी के अपने [[प्रतिरक्षा प्रणाली|प्रतिरक्षा तंत्र]] को प्रेरित करने के लिए डिजाइन किया गया है ताकि वह गाँठ से लड़ सके।
गाँठ के खिलाफ प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए कई विधियां हैं, ये हैं, सतही मुत्राश्यी कैंसर के लिए अंतर धानीय [[बेसिलस कालमेटे-ग्युरिन|BCG]] प्रतिरक्षा चिकित्सा, तथा [[वृक्क कोशिका कार्सिनोमा]] और [[मेलेनोमा|मेलानोमा]] के रोगियों में प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया प्रेरित करने के लिए [[इंटरफेरॉन|इंटरफेरोन]] और अन्य [[साइटोकाइन]] का उपयोग. कई प्रकार की गांठों, खास तौर पर [[घातक मेलेनोमा|दुर्दम मेलानोमा]] और [[वृक्क कोशिका कार्सिनोमा]], के लिए विशिष्ट [[प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया]] उत्पन्न करने के लिए [[वैक्सीन|वेक्सीनों]] पर गहन अनुसंधान किया जा रहा है।
[[सिपुल्युकल-T|सीपुल्यूकल-T]] [[प्रोस्टेट कैंसर]] के लिए आधुनिक नैदानिक परीक्षणों में एक वेक्सीन की तरह की रणनीति है, जिसमें रोगी से ली गयी [[द्रुमाशम (डेनड्रोन) की कोशिका|द्रुमाश्मी कोशिकाओं]] को [[प्रोस्टेटिक अम्ल फोस्फेटेज|प्रोस्टेटिक अम्ल फोस्फेटेज पेप्टाइड्स]] के साथ लोड किया जाता है, ताकि प्रोस्टेट-व्युत्पन्न कोशिकाओं के खिलाफ विशेष प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रेरित किया जा सके।
एल्लोजिनेनिक [[हिमेटोपोयटिक स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण]] (आनुवंशिक रूप से असमान दाता से "अस्थि-मज्जा स्थानान्तरण") को प्रतिरक्षा थेरेपी का एक रूप माना जा सकता है, क्योंकि दाता की प्रतिरक्षा कोशिकाएं [[हिमेटोपोयटिक स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण#पार्श्व दुष्प्रभाव और जटिलताएं|ग्राफ्ट-बनाम-गाँठ प्रभाव]] के तहत गाँठ पर अक्सर आक्रमण करती हैं। इसीलिए, एल्लोजिनेनिक HSCT, कई प्रकार के कैंसर के लिए ऑटोलॉगस प्रत्यारोपण की तुलना में उपचार की उच्च दर का कारण बनती है, यद्यपि पार्श्व दुष्प्रभाव भी अधिक गंभीर होते हैं।
=== हार्मोन थेरेपी (हार्मोन चिकित्सा) ===
कुछ कैंसर की वृद्धि को विशेष होर्मोनों को उपलब्ध करा कर या अवरुद्ध करके संदमित किया जा सकता है। हार्मोन संवेदी गांठों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं- विशेष प्रकार के स्तन और प्रोस्टेट कैंसर.[[एस्ट्रोजन]] या [[टेस्टोस्टेरोन]] को हटा देना या अवरुद्ध कर देना अक्सर एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त उपचार है। विशेष प्रकार के कैंसरों में, हार्मोन का प्रशासन शिथिल हो जाता है, जैसे [[प्रोजेस्टोजन|प्रोजेसटोजन]] चिकित्सा की दृष्टि से लाभकारी हो सकता है।
=== वाहिकाजनन संदमक ===
[[एंजियोजिनेसिस|वाहिकाजनन (एंजियोजिनेसिस]] संदमक रक्त वाहिनियों की व्यापक वृद्धि को रोकता है (एंजियोजिनेसिस) जो ट्यूमर को जीवित रहने के लिए जरुरी है। कुछ, जैसे [[बेवाकीज़ुमेब|बेवासीज़ुमेब]], को मान्यता दे दी गयी है और चिकित्सकीय उपयोग में इनका उपयोग किया जा रहा है। एन्जियोजिनेसिस विरोधी दवाओं के साथ एक मुख्य समस्या यह है कि कई कारक सामान्य और कैंसर युक्त कोशिकाओं में रक्त वाहिनियों की वृद्धि को उत्तेजित करते हैं। एंजियोजिनेसिस विरोधी दवाये केवल एक ही कारक को लक्ष्य बनाती हैं, इसलिए अन्य कारक रक्त वाहिनी की वृद्धि को उत्तेजित करना जारी रखते हैं। अन्य समस्याओं में शामिल हैं [[प्रशासन का मार्ग]], स्थिरता का रख-रखाव और ट्यूमर वाहिका संरचना पर क्रिया और लक्ष्यीकरण.<ref>{{cite journal |author=Kleinman HK, Liau G |title=Gene therapy for antiangiogenesis |journal=J. Natl. Cancer Inst. |volume=93 |issue=13 |pages=965–7 |year=2001 |month=July |pmid=11438554 |doi=10.1093/jnci/93.13.965 |url=http://jnci.oxfordjournals.org/cgi/content/full/93/13/965}}</ref>
=== लक्षण नियंत्रण ===
यद्यपि कैंसर के लक्षणों पर नियंत्रण को कैंसर का उपचार नहीं माना जा सकता है, यह कैंसर रोगियों की [[जीवन की गुणवत्ता]] का एक महत्वपूर्ण निर्धारक है और इस फैसले में मुख्य भूमिका निभाता है कि रोगी अन्य उपचार के लिए सक्षम है या नहीं। हालांकि डॉक्टरों के पास, कैंसर के रोगियों में दर्द, मतली, उल्टी, डायरिया, रक्तस्राव और अन्य आम समस्याओं को कम करने के लिए चिकित्सकीय कौशल होता है, रोगियों के इस समूह की लक्षण नियंत्रण की आवश्यकताओं के लिए प्रतिक्रिया में [[प्रशामक देखभाल]] की बहुल अनुशासनात्मक विशेषता का विकास हुआ है।
[[एनलजेसिया|दर्द की दवाये]], जैसे कि [[अफ़ीम|मोर्फीन]] और [[ओक्सिकोडोन]] और मिचली और उल्टी को रोकने के लिए [[एंटीमेटिक|एंटीएमेटिक्स]] दवाएं, कैंसर से सम्बंधित लक्षणों से युक्त रोगियों में आम तौर पर काम में ली जाती हैं। परिष्कृत [[एंटीमेटिक्स|एंटीएमेटिक्स]] जैसे [[ओनडेनसेट्रोन|ओन्देनसेट्रोन]] और ऐनालोग्युस, साथ ही [[एप्रेपिटेंट|एप्रेपिटेन्ट]] ने कैंसर रोगियों में उग्र उपचार को अधिक सम्भव बना दिया है।
कैन्सर के कारण [[पुराना दर्द]] हमेशा सतत उतक क्षति के कारण होता है जो रोग या उपचार प्रक्रिया से सम्बंधित है (यानी शल्य चिकित्सा, रेडिएशन, कीमोथेरपी) यद्यपि पर्यावरणीय कारकों और दर्द के व्यवहार के उत्पादन में प्रभावी गडबडी की भी भूमिका होती है, कैंसर के दर्द से युक्त रोगियों में आम तौर पर प्रमुख इटियोलोजिक कारण नहीं होते हैं। इसके अलावा, कैंसर से सम्बंधित भयंकर दर्द से युक्त अधिकांश रोगी अपने जीवन की अंतिम अवस्था में होते हैं और उन्हें [[उपशामक|प्रशामक]] चिकित्सा की जरुरत होती है।
मुद्दे जैसे [[ओपीओइड्स|नशीले पदार्थों]] के उपयोग का सामाजिक कलंक, काम और कार्यात्मक स्थिति और स्वास्थ्य देखभाल, समग्र मामले के प्रबंधन में अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं। अतः, कैंसर दर्द प्रबंधन के लिए विशिष्ट रणनीति है नशीले पदार्थों और अन्य दवाओं, शल्य चिकित्सा और भौतिक तरीकों के उपयोग के द्वारा रोगी को अधिक से अधिक आराम पहुँचने की कोशिश करना। डॉक्टर कैंसर के अन्तिम स्थिति के रोगियों में दर्द के लिए मादक पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहते हैं क्यों कि इससे उन्हें इसकी लत हो सकती है या उनकी श्वास क्रिया में बाधा आ सकती है।[[प्रशामक देखभाल]], [[धर्मशाला|देखभाल]] आंदोलन की एक नई शाखा है जो कैंसर के रोगियों में दर्द के उपचार में अधिक व्यापक सहयोग प्रदान करती है।
[[थकान (चिकित्सा)|थकान]] कैंसर रोगियों के लिए एक बहुत ही आम समस्या है और हाल ही में कैंसर चिकित्सा विज्ञानियों के लिए इसका उपचार बहुत महत्वपूर्ण बन गया है, यद्यपि यह कई रोगियों में जीवन की गुणवत्ता को लेकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
=== उपचार के प्रयास ===
[[नैदानिक परीक्षण]], जो अनुसंधान अध्ययन भी कहलाते हैं, कैंसर के रोगियों में नए उपचारों का परीक्षण भी करते हैं। इस शोध का लक्ष्य है कैंसर के इलाज के लिए बेहतर तरीके खोजना और कैंसर रोगियों की मदद करना। नैदानिक परीक्षण कई प्रकार के उपचारों का परीक्षण करते हैं जैसे नयी दवाएं, सर्जरी या विकिरण चिकित्सा के नए दृष्टिकोण, उपचार के नए संयोजन, या नई विधियां जैसे [[जीन थेरेपी]].
एक नैदानिक परीक्षण, एक लम्बी और सतर्क कैंसर अनुसंधान की प्रक्रिया के अंतिम चरणों में से एक है। नए उपचार के लिए खोज प्रयोगशाला में शुरू होती है, जहाँ वैज्ञानिक पहले नए विचारों का परीक्षण और विकास करते हैं। अगर एक दृष्टिकोण उपयोगी प्रतीत होता है तो अगला कदम होता है इसका जानवर पर परीक्षण, जो यह बताता है कि कैंसर रोगी पर इसका क्या प्रभाव होगा और इसके कोई हानिकारक प्रभाव हैं या नहीं। बेशक, कई उपचार जो प्रयोगशाला में या पशुओं में अच्छी तरह से काम करते हैं, वे हमेशा मनुष्य में कारगर साबित नहीं होते हैं। उपयोगी माने जाने वाले उपचार सुरक्षित और प्रभावी हैं या नहीं, इसका पता लगाने के लिए कैंसर के रोगियों में अध्ययन किये जाते हैं।
हो सकता है कि जो रोगी इसमें भाग ले रहा है उसे इस उपचार से व्यक्तिगत रूप से मदद मिले। वे कैंसर विशेषज्ञों से आधुनिकतम सुरक्षा प्राप्त करते हैं और वे या तो जांच किया जा रहा नया इलाज प्राप्त करते हैं या कैंसर के लिए सर्वोत्तम उपलब्ध मानक उपचार प्राप्त करते हैं। साथ ही, नए उपचारों में अज्ञात जोखिम भी हो सकते हैं, लेकिन यदि नए उपचार प्रभावी या मानक उपचारों से अधिक प्रभावी साबित होते हैं, तो अध्ययन किया जाने वाला रोगी इसके लाभ को प्राप्त करने वाला पहला व्यक्ति बन जाता है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि परीक्षण किया जाने वाला नया उपचार या एक मानक उपचार अच्छे परिणाम देगा। कैंसर युक्त बच्चों में, एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि जिन बच्चों पर ऐसे परीक्षण किया गए उनमें औसतन मानक उपचारों की तुलना में बेहतर या बुरे परिणाम नहीं देखे गए; इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी प्रयोगात्मक उपचार की सफलता या असफलता का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है।<ref>{{cite journal |author=Kumar A, Soares H, Wells R ''et al.'' |title=Are experimental treatments for cancer in children superior to established treatments? Observational study of randomised controlled trials by the Children's Oncology Group |journal=BMJ |volume=331 |issue=7528 |page=1295 |year=2005 |pmid=16299015 |pmc=1298846 |doi=10.1136/bmj.38628.561123.7C |url=http://bmj.bmjjournals.com/cgi/content/full/331/7528/1295 |pages=1295}}</ref>
=== पूरक और वैकल्पिक ===
[[वैकल्पिक चिकित्सा|पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा]] (CAM) उपचार, चिकित्सा, स्वास्थ्य रक्षा प्रणालियों, प्रथाओं और उत्पादों के विविध समूह हैं, जो पारम्परिक चिकित्सा के भाग नहीं हैं।<ref name="mnalt">{{cite journal |author=Cassileth BR, Deng G |title=Complementary and alternative therapies for cancer |journal=Oncologist |volume=9 |issue=1 |pages=80–9 |year=2004 |pmid=14755017 |url=http://theoncologist.alphamedpress.org/cgi/content/full/9/1/80 |doi=10.1634/theoncologist.9-1-80 |access-date=27 फ़रवरी 2009 |archive-date=27 अगस्त 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090827004004/http://theoncologist.alphamedpress.org/cgi/content/full/9/1/80 |url-status=dead }}</ref> "पूरक चिकित्सा" का अर्थ उन विधियों और पदार्थों से है, जिनका उपयोग पारम्परिक चिकित्सा के साथ किया जाता है। जबकि "वैकल्पिक चिकित्सा" का अर्थ उन यौगिकों से है जिनका उपयोग पारम्परिक चिकित्सा के स्थान पर किया जाता है।<ref>[193] ^ [http://nccam.nih.gov/health/whatiscam/#2 CAM क्या है?] [[पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा के लिए राष्ट्रीय केंद्र|पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा के लिए राष्ट्रीय केंद्र: 3 फ़रवरी 2008 को पुनः प्राप्त]].</ref> CAM का उपयोग कैंसर से युक्त लोगों में आम है; 2000 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि 69% कैंसर रोगियों ने कम से कम एक CAM चिकित्सा का उपयोग अपने कैंसर उपचार के एक हिस्से के रूप में किया है।<ref name="Richardson2000">{{cite journal |author= Richardson MA, Sanders T, Palmer JL, Greisinger A, Singletary SE |title= Complementary/alternative medicine use in a comprehensive cancer center and the implications for oncology |journal= J Clin Oncol |volume=18 |issue=13 |pages=2505–14 |year=2000 |pmid=10893280 |url=http://jco.ascopubs.org/cgi/content/full/18/13/2505 |month= Jul |day= 01}}</ref> कैंसर के लिए ज्यादातर पूरक और वैकल्पिक चिकित्साओं का कठोर अध्ययन या परीक्षण नहीं किया गया है। कुछ वैकल्पिक उपचार, जिन पर जांच की गयी है और वे निष्प्रभावी हैं, उनका लगातार विपणन हो रहा है और उन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है।<ref name="pmid15061600">{{cite journal |author=Vickers A |title=Alternative cancer cures: 'unproven' or 'disproven'? |journal=CA Cancer J Clin |volume=54 |issue=2 |pages=110–8 |year=2004 |pmid=15061600 |doi=10.3322/canjclin.54.2.110 |url=http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/54/2/110 |access-date=27 फ़रवरी 2009 |archive-date=6 दिसंबर 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20101206151031/http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/54/2/110 |url-status=dead }}</ref>
=== गर्भावस्था में ===
गर्भवती माताओं की बढ़ती हुई उम्र के कारण [[गर्भावस्था]] के दौरान समवर्ती कैंसर की घटनाओं में वृद्धि हुई है,<ref name="curado"/> इन घटनाओं में वृद्धि का एक और कारण है जन्म पूर्व अल्ट्रासाउंड परीक्षणों के दौरान प्रासंगिक रूप से माता में गाँठ की जांच.
मां और उसके भ्रूण/बच्चे दोनों को कम से कम नुकसान पहुंचे, इसके लिए कैंसर उपचार को चयनित करने की आवश्यकता है। कई मामलों में एक [[चिकित्सीय गर्भपात]] की सलाह दी जा सकती है।
विकिरण चिकित्सा पर आमतौर पर कोई सवाल नहीं उठाये जाते हैं और रसायन चिकित्सा (कीमो थेरेपी) में हमेशा गर्भपात और जन्मजात विरूपताओं का ख़तरा बना रहता है।<ref name="curado">{{cite news
| title = Krebstherapie in der Schwangerschaft extrem schwierig
| url = http://www.curado.de/Hautkrebs/Krebstherapie-in-der-Schwangerschaft-extrem-schwierig-11024/
| agency = Associated Press
| publisher = Curado
| date = 2009-02-20
| accessdate = 2009-06-06
| language = de
| archive-date = 6 मार्च 2016
| archive-url = https://web.archive.org/web/20160306074747/http://www.curado.de/hautkrebs/Krebstherapie-in-der-Schwangerschaft-extrem-schwierig-11024/
| url-status = dead
}}</ref> बच्चे पर चिकित्सा के प्रभावों के बारे में बहुत कम ज्ञात है।
यहाँ तक कि एक दवा जिस पर परीक्षण किया गया है कि यह अपरा (प्लेसंटा) से होकर बच्चे तक नहीं पहुंचती है, कैंसर के कुछ रूप अपरा को नुकसान पहुंचा सकते हैं और दवा इसमें से होकर चली जाती है।<ref name="curado"/> त्वचा कैंसर के कुछ रूप मेटास्टेसिस के द्वारा बच्चे के शरीर में भी प्रवेश कर सकते हैं।<ref name="curado"/>
निदान भी ज्यादा कठिन हो गया है, चूंकि इसकी उच्च विकिरण खुराक की वजह से [[कमप्युटेड टोमोग्राफी]] अव्यवहार्य है।
फिर भी, [[चुम्बकीय अनुनाद इमेजिंग|चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग]] सामान्य रूप से काम करता है।<ref name="curado"/> हालांकि [[विपरीत माध्यम|विपरीत मीडिया]] का उपयोग नहीं किया जा सकता है, चूंकि वे अपरा को पार कर जाते हैं।<ref name="curado"/>
गर्भावस्था के दौरान कैंसर के ठीक प्रकार से निदान और उपचार में आने वाली कठिनाइयों के एक परिणाम के रूप में, वैकल्पिक तरीकों का इस्तमाल किया जाता है, इसमें या तो अधिक उग्र कैंसर उपचार शुरू करने के लिए एक [[सीजेरियन सेक्शन]] का उपयोग किया जाता है या यदि कैंसर इतना अधिक दुर्दम हो चुका है कि मां के इलाज में और देरी नहीं की जा सकती है तो कैंसर का उपचार करने के लिए गर्भपात कर दिया जाता है।<ref name="curado"/>
=== गर्भाशये (इन युट्रो)===
कभी कभी गर्भाशय में रहते हुए ही भ्रूणीय गांठों का निदान किया जाता है। [[टेराटोमा]] भ्रूण ट्यूमर का सबसे आम प्रकार है और आमतौर पर सौम्य होता है।
== आयुर्वेद चिकित्सा ==
प्राचीन समय में आचार्य [[सुश्रुत]] के द्वारा हजारों वर्ष पूर्व ही केंसर अर्थात अर्बुद के कारण, लक्षण, प्रकार एवं चिकित्सा का वर्णन किया गया है ।आचार्य सुश्रुत ने [[सुश्रुत संहिता]] चिकित्सा स्थान के 18 वें अध्याय में अर्बुद की चिकित्सा का आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा वर्णन किया है, आचार्य सुश्रुत ने औषधियों के अलावा इसकी शल्य चिकित्सा एवं इसके लिए अग्निकर्म का भी वर्णन किया है।<ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.naidunia.com/magazine/sehat-cancer-treatment-in-ayurveda-it-is-also-possible-to-treat-cancer-with-ayurveda-this-is-how-herbal-chemotherapy-is-done-7598375|title=Cancer Treatment in Ayurveda: आयुर्वेद से भी कैंसर का इलाज संभव, ऐसे की जाती है हर्बल कीमोथेरेपी|date=2022-06-16|website=Nai Dunia|language=hi|access-date=2024-05-28}}</ref>
आचार्य सुश्रुत अग्निकर्म हेतु धातु की शलाका को तप्त गर्म करके अर्बुद की असामान्य कोशिकाओं को नष्ट करते थे, क्योंकि अग्नि कर्मों के द्वारा जिन रोगों की चिकित्सा की जाती है वे रोग भविष्य में उत्पन्न नहीं होते हैं, ऐसा आचार्यों का कथन है एवं प्रायोगिक रूप से ऐसा देखा गया भी है।<ref name=":0" />
सबसे पहले एक ग्रीक सर्जन लियोनिडा ने कैंसर की शल्य चिकित्सा के लिए चाकू का प्रयोग किया था परंतु भारतीय चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद में हजारों वर्ष पूर्व ही इस विधि का वर्णन प्राप्त होता है।<ref name=":0" />
हमारे शरीर में प्रतिदिन सामान्य कोशिकाओं का विभाजन माइटोसिस एक नियमित प्रक्रिया है यह DNA पर आधारित जीन जिनके द्वारा नियंत्रित होती है , यदि कैंसर के कारण जिन्हें हम कार्सिनोजेनिक कहते हैं उनके द्वारा हमारे शरीर की कोशिकाओं का DNA नष्ट होकर जीन में एक परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं और कोशिकाओं का सामान्य विभाजन अनियंत्रित हो जाता है और कोशिकाएं अनियंत्रित वृद्धि करके एक बड़ा मास बना लेती हैं जिन्हें नियोप्लाज्म अथवा मैलिग्नेंट ट्यूमर अथवा सामान्य भाषा में कैंसर कहते हैं।
आचार्य सुश्रुत ने बताया है कि शरीर में अपथ्य आहार-विहार के कारण विकृत हुए दोष वात-पित्त-कफ शरीर की धातुओं को दूषित, संक्रमित करके उत्तकों में गोल, स्थिर, अल्प पीड़ा वाला ,बड़ा ,धीरे धीरे बढ़ने वाला, मांस के उपचार से युक्त शोथ उत्पन्न कर देता है इस रोग को अर्बुद कहते हैं ,यह वात,से ,पित्त से ,कफ़ से ,मांस से, मेद से उत्पन्न होता है।<ref name=":0" />
[[आयुर्वेद]] अपनाकर चौथे स्टेज के कैंसर मामले भी ठीक होते देखे गये हैं।<ref>{{Cite web|url=https://navbharattimes.indiatimes.com/lifestyle/health/anti-cancer-diet-of-navjot-singh-sidhus-wife-know-what-she-eats-and-foods-to-avoid/articleshow/115562468.cms|title=सिद्धू की पत्नी ने 40 दिन में हराया स्टेज 4 कैंसर, सुबह से रात तक ली आयुर्वेदिक डाइट, नीम-हल्दी खाई|website=Navbharat Times|language=hi|access-date=2024-11-23}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://indianexpress.com/article/lifestyle/health/navjot-singh-sidhu-wife-stage-4-cancer-diet-recovery-9684041/|title=Navjot Singh Sidhu shares wife’s stage IV cancer recovery journey; here’s why experts advise caution on diet claims|date=2024-11-22|website=The Indian Express|language=en|access-date=2024-11-23}}</ref>
== पूर्व निदान ==
कैंसर को एक घातक रोग के रूप में जाना जाता है। हालांकि यह बात निश्चित रूप से विशेष प्रकारों पर ही लागू होती है, कैंसर के ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे छुपी हुई सच्चाई चिकित्सा क्षेत्र में आधुनिकीकरण के कारण बदल गई है। कैंसर के कुछ प्रकारों में ऐसे लक्षण पाए गए हैं, जो कुछ अदुर्दम रोगों जैसे [[ह्रदय की विफलता|हृदय का असफल होना]] और हृदय [[आघात]] से बेहतर हैं।
प्रगतिशील और तेजी से फैलते हुए दुर्दम रोग का कैंसर रोगी के जीवन की गुणवत्ता पर काफी प्रभाव पड़ता है और कई कैंसर उपचार (जैसे [[रसायन चिकित्सा (कीमो थेरेपी)|कीमोथेरपी]]) के गंभीर पार्श्व दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कैंसर के उन्नत चरणों में, कई रोगियों को व्यापक देखभाल की जरुरत होती है, यह उसके परिवार के सदस्यों और मित्रों को प्रभावित करता है।[[प्रशामक देखभाल]] समाधान में स्थायी या "राहत" धर्मशाला नर्सिंग शामिल हो सकती है।
=== भावनात्मक प्रभाव ===
कई स्थानीय संगठन कैंसर रोगियों के लिए कई प्रकार की व्यावहारिक सहायतायें और सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। ये सेवाएं हैं [[कैंसर सहायता समूह|सहायता समूह]], [[परामर्श]], सलाह, वित्तीय सहायता, उपचार के स्थान से और वहाँ तक परिवहन, कैंसर के बारे में जानकारी या फिल्में.अस-पास के संगठनों, स्थानीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, या क्षेत्र के अस्पतालों में संसाधन या सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं।
परामर्श कैंसर रोगियों को भावनात्मक सहारा प्रदान कर सकता है, उन्हें अपनी बीमारी समझने में मदद करता है। भिन्न प्रकार के परामर्श मेंशामिल हैं व्यक्तिगत, समूह, परिवार, साथियों के परामर्श, वियोग, रोगी-से-रोगी का परामर्श और कामुकता.
रोगियों को कैंसर से निपटने में मदद करने के लिए कई कई सरकारी और धर्मार्थ संगठन स्थापित किए गए हैं। ये संगठन अक्सर कैंसर की रोकथाम, कैंसर के उपचार और कैंसर अनुसंधान में रत रहते हैं।
== महामारी विज्ञान ==
कैंसर अमेरिका में सभी मौतों में से 25% के लिए जिम्मेदार है और दुनिया के कई भागों में एक प्रमुख [[सार्वजनिक स्वास्थ्य]] समस्या है। अमेरिका में, [[फेफड़ों का कैंसर]], कैंसर मौतों में से 30% का कारण है, लेकिन यह कैंसर के नए मामलों का केवल 15% होता है; पुरुषों में सबसे सामान्य रूप से पाया जाने वाल कैंसर है [[प्रोस्टेट कैंसर]] (नए मामलों का लगभग 25%) और महिलाओं में सबसे सामान्य रूप से पाया जाने वाला कैंसर है [[स्तन कैंसर]] (यह भी लगभग 25% है).
कैंसर छोटे बच्चों और किशोरों में भी हो सकता है, लेकिन ऐसा कम ही होता है (अमेरिका में प्रति मिलियन में लगभग 150 मामले), इसमें [[ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर)|रक्त कैंसर]] (ल्यूकेमिया) सबसे आम है।<ref>{{cite journal |author=Jemal A, Siegel R, Ward E ''et al.'' |title=Cancer statistics, 2008 |journal=CA Cancer J Clin |year=2008 |pages=71–96 |volume=58 |issue=2 |url=http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/58/2/71 |pmid=18287387 |doi=10.3322/CA.2007.0010 |access-date=15 दिसंबर 2009 |archive-date=3 जुलाई 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110703021822/http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/58/2/71 |url-status=dead }}</ref> अमेरिका में जीवन के पहले वर्ष में प्रति मिलियन मामलों में 230 ऎसी [[घटना (जानपदिक रोग विज्ञान)|घटनाएं]] होती हैं, जिनमें सबसे सामान्य है [[नयूरो ब्लास्टोमा|न्यूरोब्लास्टोमा]].<ref>{{cite book |editor= Ries LAG, Smith MA, Gurney JG, Linet M, Tamra T, Young JL, Bunin GR (eds) |year=1999 |title= Cancer Incidence and Survival among Children and Adolescents, United States SEER program 1975–1995 |publisher= National Cancer Institute, SEER Program |version= NIH Pub. No 99-4649 |location= Bethesda, MD |chapterurl=http://seer.cancer.gov/publications/childhood/infant.pdf |author= Gurney JG, Smith MA, Ross JA |chapter=Cancer among infants |pages=149–56}}</ref>
दुनिया भर में कैंसर मौतों का एक तिहाई संभावित संशोधन योग्य जोखिम कारकों के कारण होता है। जिसमें मुख्य हैं, [[तंबाकू धुम्रपान|तम्बाकू धुम्रपान]], [[मादक पेय|शराब]] का उपयोग और आहार में [[फल]] और [[सब्जियां|सब्जियों]] का कम उपभोग.
विकसित देशों में [[अधिक वजन]] और [[मोटापा]] भी कैंसर का एक प्रमुख कारण है और निम्न और माध्यम आय वर्ग वाले देशों में [[मानव पेपिलोमा वायरस]] का लैंगिक संचरण [[ग्रीवा कैंसर]] के लिए मुख्य जोखिम कारक है।<ref name="Danaei">{{cite journal |author= Danaei G, Vander Hoorn S, Lopez AD, Murray CJ, Ezzati M |title= Causes of cancer in the world: comparative risk assessment of nine behavioural and environmental risk factors |journal=Lancet |volume=366 |issue=9499 |pages=1784–93 |year=2005 |pmid=16298215 |doi=10.1016/S0140-6736(05)67725-2}}</ref>
== इतिहास ==
[[चित्र:Breast cancer gross appearance.jpg|thumb|150px|right|कैंसर की विशिष्ट और नेत्रों से ही दिखाई देने वाली उपस्थिति.स्तन का यह आक्रामक वाहिनीपरक कार्सिनोमा (केंद्र में एक पीला क्षेत्र) दर्शाता है कि एक अंडाकार ट्यूमर सफ़ेद दागदार उतक की स्पाइकों से घिरा हुआ है जो चारों और के पीले वसा उतक में हैं। यह सिल्हूट कुछ केकड़े की तरह दिखता है।]]
वर्तमान में [[उपकला]] उतक से व्युत्पन्न एक दुर्दम गाँठ के लिए चिकित्सकीय शब्द के रूप में ग्रीक शब्द [[कार्सिनोमा]] का उपयोग किया जाता है। [[ऑलस कुरनेलियुस सेल्सस|सेल्सस]] ने ''कार्सिनोज'' का [[लैटिन|लेटिन]] में अनुवाद करके शब्द दिया ''कैंसर'', जिसका अर्थ केकडा भी है।
[[गेलन]] ने ''सभी'' गांठों का वर्णन करने के लिए "''ओंकोज'' " का प्रयोग किया, जो आधुनिक शब्द [[ऑन्कोलॉजी|ओन्कोलोजी]] का मूल है।<ref name="Galen">{{cite journal |author=Karpozilos A, Pavlidis N |title=The treatment of cancer in Greek antiquity |journal=Eur. J. Cancer |volume=40 |issue=14 |pages=2033–40 |year=2004 |pmid=15341975 |doi=10.1016/j.ejca.2004.04.036}}</ref>
[[हिप्पोक्रेट्स.|हिप्पोक्रेट्स]] ने कई प्रकार के कैंसर का वर्णन किया। उन्होंने सौम्य ट्यूमर को ''ओंकोस'' कहा, जिसका अर्थ [[ग्रीक भाषा|ग्रीक]] में सूजन से है और दुर्दम ट्यूमर को उन्होंने ''कार्सिनोज'' कहा जिसका अर्थ ग्रीक में [[केकड़ा|केकडा]] या [[क्रेफ़िश|क्रेफिश]] है।
यह नाम एक ठोस घातक ट्यूमर की कटी हुई सतह के कारण उत्पन्न हुआ है, "जिसके चारों और शिराएँ फैली हुई हैं, यह केकड़े के पैरों की तरह दिखती हैं, जिससे इसे यह नाम मिला है"<ref>{{cite web| first = Ralp| last = Moss | title = Galen on Cancer| url = http://www.cancerdecisions.com/speeches/galen1989.html| publisher = CancerDecisions| year = 2004}}</ref> (चित्र देखें) बाद में उन्होंने प्रत्यय ''-ओमा'' जोड़ा, यूनानी में इसका अर्थ है सूजन और इस प्रकार से इसका नाम ''कार्सिनोमा'' हो गया। चूंकि शरीर को खोलना यूनानी परम्परा के खिलाफ था, हिप्पोक्रेट्स ने त्वचा, नाक और स्तन पर बाहर से दिखाई देने वाले ट्यूमरों का ही वर्णन किया और उनके चित्र बनाये। उपचार चार शारीरिक द्रव्यों (काले और पीले पित्त, रक्त और कफ) के [[हुमोरिस्म|ह्यूमर सिद्धांत]] पर आधारित था। रोगी के भाव के अनुसार, इलाज के के लिए आहार, रक्त और/या जुलाब काम में लिया जाता था। सदियों के दौरान यह ज्ञात हो गया कि कैंसर शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है, लेकिन ह्यूमर सिद्धांत पर आधारित उपचार 19 वीं सदी तक लोकप्रिय बना रहा जब [[कोशिका (जीव विज्ञान)|कोशिकाओं]] की खोज की गयी।
हमारे प्राचीनतम वर्णन और कैंसर के [[शल्य चिकित्सा|सर्जिकल]] उपचार की खोज [[मिस्र]] में लगभग 1600 ई.पू. की गयी। [[पेपाइरस]] ने स्तन के 8 अल्सर के मामलों का वर्णन किया जिनका ईलाज "अग्नि ड्रिल" नमक उपकरण की सहायता से दागने के द्वारा किया गया।
इस बीमारी के बारे में लेखन कहता है, "इसका कोई इलाज नहीं है।"<ref name="CancerOrgHistory">{{cite web
| title = The History of Cancer
| url = http://www.cancer.org/docroot/CRI/content/CRI_2_6x_the_history_of_cancer_72.asp
| publisher = American Cancer Society
| year = 2009
| month = September
| access-date = 27 फ़रवरी 2009
| archive-date = 2 मार्च 2010
| archive-url = https://web.archive.org/web/20100302154211/http://www.cancer.org/docroot/CRI/content/CRI_2_6x_the_history_of_cancer_72.asp
| url-status = dead
}}</ref>
कैंसर के लिए अन्य प्रारंभिक [[शल्य चिकित्सा|शल्य]] चिकित्सा का वर्णन 1020 में [[एविसेना|अविसन्ना]] (इब्न सीना) के द्वारा ''[[चिकित्सा का कैनन|दी केनन ऑफ़ मेडिसिन]]'' में किया गया। उन्होंने कहा कि [[छांटना|छंटाई]] ठीक प्रकार से होनी चाहिए और सम्पूर्ण रोग युक्त [[ऊतक (जीव विज्ञान)|उतक]] को हटा देना चाहिए, इसमें [[विच्छेदन]] का उपयोग या [[गाँठ|ट्यूमर]] की दिशा में जाने वाली [[शिरा|शिराओं]] को हटाना शामिल है। उन्होंने सलाह दी कि जरुरत पड़ने पर प्रभावित क्षेत्र के लिए [[दाग़ना|दागने]] की क्रिया का उपयोग भी किया जा सकता है।<ref name="Patricia">[219] ^ पेट्रीसिया स्किनर (2001), [https://archive.today/20120629144443/findarticles.com/p/articles/mi_g2603/is_0007/ai_2603000716 यूनानी-टिब्बी,] ''वैकल्पिक चिकित्सा का विश्वकोश''</ref>
16 वीं और 17 वीं शताब्दियों में, मृत्यु के कारण को खोजने के लिए [[शव परीक्षा|शरीर को काटना]] डॉक्टरों के लिए अधिक स्वीकार्य बन गया। जर्मन प्रोफेसर [[विल्हेम फब्री|विल्हेम फेब्री]] का मानना था कि स्तन कैंसर एक स्तन वाहिनी में दूध के थक्के के कारण होता है। [[डेसकार्टेस]] के एक अनुयायी डच प्राध्यापक [[फ्रंकोईस दे ला बोए सिल्वियस|फ्रेंकोसिस डे ला बोए सिल्वियस]] का मानना था कि सभी बीमारियां रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम हैं और अम्लीय [[लसीका|लसिका]] द्रव्य कैंसर का कारण है।
उसके समकालीन [[निकोल्स तुल्प|निकोलस टल्प]] का मानना था कि कैंसर एक जहर है जो धीरे धीरे फैलता है और उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह [[संक्रामक रोग|संक्रामक]] है।<ref name="Marilyn Yalom">
मेरिलिन यालोम "अ हिस्ट्री ऑफ़ ब्रेस्ट" 1997.न्यू यॉर्क: अल्फ्रेड ए क्नोप्फ़. आईएसबीएन 0-679-43459-3</ref>
कैंसर का पहला ऐसा कारण ब्रिटिश शल्य चिकित्सक [[पेर्सिवल पोट|पेर्किवल पोट]] के द्वारा पहचाना गया, जिसने 1775 में खोज की कि [[चिमनी स्वीप|चिमनी की सफाई]] में संलग्न लोगों में [[वृषणकोश|अंडकोश]] का कैंसर आम है। अन्य व्यक्तिगत चिकित्सकों के कार्य ने कई दृष्टिकोण विकसित किए, लेकिन जब चिकित्सकों ने एक साथ काम करना शुरू किया तब वे ठोस निष्कर्ष पर पहुँच सके।
18 वीं सदी में सूक्ष्मदर्शी के व्यापक उपयोग से यह ज्ञात हुआ कि 'कैंसर का ज़हर' अपने प्राथमिक ट्यूमर से अन्य स्थानों तक लिम्फ पर्वों के माध्यम से फैलता है ("[[मेटास्टेसिस]]").इस रोग का यह दृष्टिकोण सबसे पहले अंग्रेजी शल्य चिकित्सक [[कैम्पबेल डी मॉर्गन]] ने 1871 और 1874 के बीच दिया। <ref>{{cite journal |author=Grange JM, Stanford JL, Stanford CA |title=Campbell De Morgan's 'Observations on cancer', and their relevance today |journal=Journal of the Royal Society of Medicine |volume=95 |issue=6 |pages=296–9 |year=2002 |url=http://www.jrsm.org/cgi/content/full/95/6/296 |pmid=12042378 |doi=10.1258/jrsm.95.6.296 |access-date=27 फ़रवरी 2009 |archive-date=20 फ़रवरी 2008 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080220204843/http://www.jrsm.org/cgi/content/full/95/6/296 |url-status=dead }}</ref> स्वच्छता की समस्या के कारण कैंसर का इलाज करने के लिए [[शल्य चिकित्सा]] का इस्तेमाल करने के परिणाम अच्छे नहीं रहे। मशहूर स्कॉटलैंड के शल्य चिकित्सक [[अलेक्जेंडर मोनरो]] ने दो साल में शल्य चिकित्सा के बाद जीवित साठ मरीजों में से केवल दो में स्तन ट्यूमर को देखा.19 वीं सदी में, [[असेप्सिस]] ने शल्य चिकित्सा में स्वच्छता की दृष्टि से सुधार किया और इससे [[कैंसर पीड़ित|जीवित रहने]] के आँकड़ों में वृद्धि हुई, शल्य चिकित्सा कैंसर का प्रारंभिक उपचार बन गया।[[विलियम कोले|विलियम काले]] अपवाद थे जिन्होंने 1800 के अंत में पाया कि असेप्सिस से ''पहले'' शल्य चिकित्सा के बाद उपचार की दर अधिक थी, (और उन्होंने मिश्रित परिणामों के साथ ट्यूमर में जीवाणु को इंजेक्ट कर दिया), कैंसर का उपचार शल्य चिकित्सक की ट्यूमर को हटाने की कला पर निर्भर हो गया। इसी अवधि के दौरान, यह पता लगा कि शरीर कई [[ऊतक (जीव विज्ञान)|ऊतकों]] से बना है जो कई मिलियन कोशिकाओं से बने हैं, इस विचार से शरीर में रासायनिक असंतुलन के बारे में ह्यूमर सिद्धांतों ने जन्म लिया।[[कोशिका विकृतिविज्ञान]] के युग का जन्म हुआ।
जब 19 वीं सदी के अंत में, [[मारी क्यूरी|मेरी क्युरी]] और [[पियरे क्यूरी|पियरे क्युरी]] ने [[विकिरण]] की खोज की, उन्होंने कैंसर के लिए पहला प्रभावी शल्य चिकित्सा हीन उपचार खोजा.विकिरण के साथ कैंसर के उपचार के लिए बहुल अनुशासनात्मक दृष्टिकोण के पहले लक्षण प्रकट हुए. शल्य चिकित्सक अब सिर्फ़ ऑपरेशन नहीं करते हैं, लेकिन विकिरण विज्ञानी के साथ मिलकर कार्य करते हैं और रोगी की मदद करते हैं। इससे संचार में जटिलताएं आयीं, साथ ही घर के बजाय रोगी के उपचार की जरुरत अस्पताल में महसूस हुई, साथ ही अस्पताल की फाइलों में रोगी से सम्बंधित आंकडों को संकलित किया गया। जिससे पहली बार सांख्यिकीय रोगी अध्ययन की शुरुआत हुई।
जनेत लेन-क्लेपोन की खोज को प्रकाशित किया गया, जिन्होंने 1926 में ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए जीवन शैली और समान पृष्ठ भूमि के 500 नियंत्रित रोगियों और 500 स्तन कैंसर के मामलों के एक तुलनात्मक अध्ययन का प्रकाशन किया।
कैंसर महामारी विज्ञान पर उनके जबरदस्त कार्य को [[रिचर्ड डोल]] और [[ऑस्टिन ब्रेडफोर्ड हिल|ऑस्टिन ब्राडफोर्ड हिल]] के द्वारा आगे बढाया गया, जिन्होंने "[[फेफड़ों का कैंसर|फेफड़ों के कैंसर]] और [[धूम्रपान]] से सम्बंधित मृत्यु के अन्य कारणों को प्रकाशित किया। अमरत्व पर ब्रिटिश डॉक्टरों की दूसरी रिपोर्ट"1956 में दी गई (अन्यथा [[ब्रिटिश डॉक्टरों का अध्ययन]] कहलाता है।) रिचर्ड डोल ने 1968 में [[ऑक्सफ़ोर्ड]] कैन्सर महामारी विज्ञान ईकाई को शुरू करने के लिए [[लंदन|लन्दन]] चिकित्सा अनुसंधान केन्द्र को छोड़ दिया। [[कंप्यूटर]] के उपयोग के साथ, यह पहली ईकाई थी जिसने बड़ी मात्रा में कैंसर पर आंकडों का संकलन किया। आधुनिक महामारी विज्ञान विधियां [[सार्वजनिक स्वास्थ्य]] नीति और रोगों की वर्तमान अवधारणाओं से निकट सम्बंधित हैं। पिछले 50 वर्षों से, चिकित्सा अभ्यास, अस्पताल, प्रांतीय, राज्य और यहाँ तक कि देश की सीमाओं, अदि पर आंकडे एकत्रित करने के लिए बहुत अधिक प्रयास किए गए हैं, साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि पर्यावरण और सांस्कृतिक कारक कैंसर की घटना को कैसे प्रभावित करते हैं।
[[द्वितीय विश्व युद्घ]] तक एक चिकित्सक को व्यक्तिगत रूप से कैंसर रोगी के उपचार और अध्ययन करने की अनुमति नहीं थी, अब चिकित्सा अनुसंधान केन्द्रों ने खोजा कि रोग की घटना में काफी अंतर्राष्ट्रीय अन्तर दिखाई देते हैं। इस अंतर्दृष्टि के कारण राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य निकायों ने अस्पतालों और क्लीनिकों में स्वास्थ्य सम्बन्धी आंकडों को संकलित किया, यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसे आज कई देश करते हैं। जापानी मेडिकल समुदाय ने प्रेक्षित किया कि [[हिरोशिमा और नागासाकी का परमाणु बम विस्फोट|हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोटों]] के शिकार लोगों का अस्थि मज्जा पूरी तरह से नष्ट हो गया था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि रोगग्रस्त [[अस्थि मज्जा]] को भी विकिरण के द्वारा नष्ट किया जा सकता है और इससे [[रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया)]] के लिए अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण की खोज हुई। द्वितीय विश्व युद्घ के बाद से कैंसर उपचार की प्रवृतियों में सुधार हो रहे हैं, इसमें उपस्थित उपचार विधियों में सूक्ष्म स्तर पर सुधार हुआ है, उनका मानकीकरण किया गया है और [[महामारी विज्ञान]] और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से इलाज के तरीके की खोज में उन्हें वैश्वीकृत किया गया है।
== अनुसंधान निर्देश ==
कैंसर अनुसंधान एक गहन वैज्ञानिक प्रयास है जो रोग प्रक्रियाओं को समझने के लिए और संभव उपचार की खोज के लिए किया जाता है। कैंसर अनुसंधान के कारण [[आण्विक जीव विज्ञान]] और [[कोशिका जीव विज्ञान]] के ज्ञान के बढ़ने से कैंसर के कई नए प्रभावी उपचारों की खोज हुई है। ऐसा तब से हुआ जब से 1971 में राष्ट्रपति निक्सन ने "[[कैंसर पर युद्ध]]" की घोषणा की। [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] ने 1971 के बाद से कैंसर अनुसंधान पर 200 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है; यह धन सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के द्वारा और संस्थाओं के द्वारा लगाया गया है।<ref>{{cite web |author=Sharon Begley | url=http://www.newsweek.com/id/157548/page/2 |title=Rethinking the War on Cancer |format= |date=2008-09-16 | work=Newsweek |accessdate=2008-09-08}}</ref> इस भारी निवेश के बावजूद, 1950 और 2005 के बीच देश की कैंसर से मृत्यु दर में केवल एक पाँच प्रतिशत की कमी देखी गई है (आबादी के आकार और आयु के लिए समायोजन करते हुए).<ref>{{cite news|url=http://www.nytimes.com/2009/04/24/health/policy/24cancer.html|title=Advances Elusive in the Drive to Cure Cancer |last=Kolata|first=Gina|date=April 23, 2009 |publisher=''[[दि न्यू यॉर्क टाइम्स]]''|accessdate=2009-05-05}}</ref>
अग्रणी कैंसर अनुसंधान संगठनों और परियोजनाओं में शामिल हैं [[अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च]], [[अमेरिकन कैंसर सोसायटी]] (ACS), [[अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लिनिकल ओन्कोलोजी|दी अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ क्लिनिकल ओन्कोलोजी]], [[कैंसर के अनुसंधान और उपचार के लिए यूरोपीय संगठन|दी यूरोपियन ओर्गनाइजेशन फॉर रिसर्च एंड ट्रीटमेंट ऑफ़ कैंसर]], [[राष्ट्रीय कैंसर संस्थान]], [[राष्ट्रीय व्यापक कैंसर नेटवर्क|नेशनल कोम्प्रिहेन्सिव कैंसर नेटवर्क]] और [[कैंसर जीनोम एटलस|दी कैंसर जीनोम एटलस प्रोजेक्ट]] NCI में,[[पोस्ट ग्रेजुएट इन्सटिट्यूट ऑफ मेडिकल इडूकेशन एण्ड रिसर्च]] [[चण्डीगढ]] [[भारत]], [[राजीव गाँधी कैन्सर इंस्टिट्यूट एण्ड रिसर्च सेन्टर]] [[रोहणी दिल्ली]]।
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची|colwidth=30em}}
=== सामान्य सन्दर्भ ===
* पजदुर आर, वागमन एल डी, केम्प हसन के ऐ, होस्किंस डबल्यू जे, संस्करण. [http://www.cancernetwork.com/cancer-management-11 कैंसर मेनेजमेंट: अ मल्टी डिसीप्लिनेरी अप्रोच] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090515031918/http://www.cancernetwork.com/cancer-management-11 |date=15 मई 2009 }}. ग्यारहवां संस्करण.२००९
* '' दी बेसिक साइंस ऑफ़ ओन्कोलोजी '' तेनोक आई ऍफ़, हिल आरपी ''एट अल'' (संस्करण) चौथा संस्करण 2005 मेक ग्रा हिल.आईएसबीएन 0-07138-774-9.
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* {{cite journal |author=Parkin D, Bray F, Ferlay J, Pisani P |title=Global cancer statistics, 2002 |journal=CA Cancer J Clin |volume=55 |issue=2 |pages=74–108 |year=2005 |doi=10.3322/canjclin.55.2.74 |url=http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/55/2/74 |pmid=15761078 |access-date=27 फ़रवरी 2009 |archive-date=6 जुलाई 2008 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080706042521/http://caonline.amcancersoc.org/cgi/content/full/55/2/74 |url-status=dead }}
* ''फ़ूड, न्यूट्रीशियन, फिजिकल एक्टिविटी, एंड दी प्रिवेंशन ऑफ़ कैंसर: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य'' .विश्व कैंसर रिसर्च कोष (2007).आईएसबीएन 978-0-9722522-2-5.''[http://www.wcrf-uk.org/research_science/expert_report.lasso पूर्ण पाठ ]''
* [http://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/bv.fcgi?call=bv.View.ShowTOC&rid=cmed.TOC&depth=2 कैंसर मेडीसिन, छठा संस्करण] पाठ्यपुस्तक
* [http://www.springer.com/biomed/cancer/book/978-3-540-36847-2 एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ कैंसर ] चौथा खंड सन्दर्भ कार्य
* {{cite journal | author=Robert A. Weinberg | title=How Cancer Arises; An explosion of research is uncovering the long-hidden molecular underpinnings of cancer—and suggesting new therapies | url=http://www.bme.utexas.edu/research/orly/teaching/BME303/Weinberg.pdf | publication=Scientific American | month=September | year=1996 | pages=62–70 | quote=Introductary explanation of cancer biology in layman's language | format=PDF | access-date=27 फ़रवरी 2009 | archive-date=25 फ़रवरी 2009 | archive-url=https://web.archive.org/web/20090225115248/http://www.bme.utexas.edu/research/orly/teaching/BME303/Weinberg.pdf | url-status=dead }}
==इन्हें भी देखें==
* [[रसोचिकित्सा]] (कीमोथिरैपी)
* [[विकिरण चिकित्सा]]
* [[कण चिकित्सा]] (Hadron therapy या particle therapy)
== बाहरी कड़ियाँ ==््
https://www.foryogafitness.in/2021/09/Cancer-types-cause-symptoms-treatment-hindi.html {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20210912133214/https://www.foryogafitness.in/2021/09/Cancer-types-cause-symptoms-treatment-hindi.html |date=12 सितंबर 2021 }}
{{Commons|Cancer (illness)|Cancer}}
* [http://cancerindia.org.in/cp/hindi/index.php/know-about-cancer/cancer-factsheet राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम एवं अनुसंधान संस्थान] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170426032634/http://cancerindia.org.in/cp/hindi/index.php/know-about-cancer/cancer-factsheet |date=26 अप्रैल 2017 }}
* [http://hi.vikaspedia.in/health/91c940935928-915947-93892494d92f/915948902938930-938947-91c902917 कैंसर से जंग] (विकासपीडिया)
* [http://flaxindia.blogspot.in/2011/12/budwig-cancer-treatment.html बुडविग कैंसर आहार चिकित्सा]
* [https://cancertimes.org/ कैन्सर टाइम्स]
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For legends involving lines on a map, see {{tl|legend-line}}.
[[Category:साँचे]]
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असरानी
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{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
| name = असरानी (गोवर्धन असरानी )
| image =Asrani.jpg
| native_name_lang =
| birthname = गोवर्धन असराणी
| birth_date = {{Birth date|1941|01|01|df=yes}}
| birth_place = [[जयपुर]], [[राजस्थान]]
| education = स्नातक
| alma_mater = [[राजस्थान महाविद्यालय]], <br/>[[भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान]], [[पुणे]]
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| spouse = मंजु असरानी
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|death_date={{death date and age|df=yes|2025|10|20|1941|1|1}} [[मुंबई]]}}
'''अपने जन्म नाम गोवर्धन से नहीं बल्कि सरनाम असरानी'''<ref>{{Cite web |url=http://timesofindia.indiatimes.com/tv/news/hindi/Asrani-debuts-with-SAB-TVs-next/articleshow/14805256.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=29 अक्तूबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171203085624/https://timesofindia.indiatimes.com/tv/news/hindi/Asrani-debuts-with-SAB-TVs-next/articleshow/14805256.cms |archive-date=3 दिसंबर 2017 |url-status=live }}</ref> से मशहूर हुए फिल्म कलाकार एक [[हिन्दी]] [[फिल्म]] [[हास्य अभिनेता]] थे। इनका जन्म 1 जनवरी 1941 को [[जयपुर]] में हुआ था। फिल्मों में प्रवेश से पहले वह जयपुर रेडियो स्टेशन के एक लोकप्रिय कलाकार थे और बच्चों के लिए बनाये गए रेडियो-कार्यक्रम 'मुकुल' में चोंच नामक पात्र बनते थे ! उन्होंने पुणे में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अभिनय का पाठ्यक्रम पूरा किया था । उन्होंने अपने करियर में 300 से अधिक हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया था जिनमें से कुछ की सूची नीचे देखें ! बहुत थोड़े समय के लिए 2004 में वह राजनीति में भी सक्रिय हुए। असरानी २००४ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए थे। उन्होंने लोकसभा चुनावों के प्रचार में भाग लिया था। 05 मार्च 2004 को नई दिल्ली में कांग्रेस पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बात करते हुए उनकी एक तस्वीर उपलब्ध है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि वे उस समय कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे।
== फिल्मी सफर ==
* 1977 में असरानी ने फ़िल्म [[आलाप (1977 फ़िल्म)|आलाप]] में दो गाने गाए थे जो उन्ही पर फ़िल्माए गए थे। अगले साल उन्होंने फ़िल्म [[फूल खिले हैं गुलशन गुलशन (1978 फ़िल्म)|फूल खिले हैं गुलशन गुलशन]] में प्रसिद्ध पार्श्वगायक [[किशोर कुमार]] के साथ भी एक गाना गाया। फिल्म शोले में उन्होंने अंग्रेजों के ज़माने के जेलर का जो किरदार निभाया था वह बहुत प्रसिद्ध हुआ!
== व्यक्तिगत जीवन और निधन ==
असरानी का जन्म एक सिन्धी परिवार में हुआ था। देश के बँटवारे के पश्चात उनका परिवार [[जयपुर]] आ गया था। । फिल्म [[आज की ताज़ा ख़बर]] और [[नमक हराम]] के सेट पर काम करते हुए उन्हें अभिनेत्री मंजू बंसल से प्यार हो गया जिसके बाद उन्होंने मुंबई में प्रेम-विवाह किया | 1990 के दशक में मंजू अस्ररानी ने फ़िल्मों और कुछेक धारावाहिकों का निर्देशन भी किया था ।
असरानी का निधन 20 अक्टूबर 2025 को मुंबई के आरोग्य निधि अस्पताल में <mark>फेफड़ों में पानी जमा होने के कारण</mark> हुआ था। वह सांस लेने में तकलीफ के बाद चार दिन पहले अस्पताल में भर्ती हुए थे और 84 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।
== प्रमुख फिल्में==
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" width="60%" style="margin: 1em 1em 1em 0; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;"
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! वर्ष !! फ़िल्म !! चरित्र !! टिप्पणी
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|[[:श्रेणी:1991 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1991]]|| [[धर्म संकट (1991 फ़िल्म)|धर्म संकट]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1991 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1991]]|| [[प्रेम कैदी]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1991 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1991]]|| [[कर्ज़ चुकाना है]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[इज़्ज़तदार]]|| काँस्टेबल ||
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|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[प्यार का कर्ज़ (1990 फ़िल्म)|प्यार का कर्ज़]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[मुकद्दर का बादशाह (1990 फ़िल्म)|मुकद्दर का बादशाह]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[जवानी ज़िन्दाबाद (1990 फ़िल्म)|जवानी ज़िन्दाबाद]]|| बनारसी का बेटा ||
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|-
|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[आज का अर्जुन (1990 फ़िल्म)|आज का अर्जुन]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[प्यार का देवता]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1990 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1990]]|| [[प्यार के नाम कुर्बान (1990 फ़िल्म)|प्यार के नाम कुर्बान]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[नाइंसाफी (1989 फ़िल्म)|नाइंसाफी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[रखवाला (1989 फ़िल्म)|रखवाला]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[घराना (1989 फ़िल्म)|घराना]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[कानून की आवाज़ (1989 फ़िल्म)|कानून की आवाज़]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[नफ़रत की आँधी (1989 फ़िल्म)|नफ़रत की आँधी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[पाप का अंत]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[सिक्का (1989 फ़िल्म)|सिक्का]]|| प्यारेलाल ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[मज़बूर (1989 फ़िल्म)|मज़बूर]]|| पुलिस काँस्टेबल ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[दोस्त (1989 फ़िल्म)|दोस्त]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[जैसी करनी वैसी भरनी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[बड़े घर की बेटी (1989 फ़िल्म)|बड़े घर की बेटी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1989 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1989]]|| [[हम भी इंसान हैं (1989 फ़िल्म)|हम भी इंसान हैं]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[गंगा तेरे देश में (1988 फ़िल्म)|गंगा तेरे देश में]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[मुलज़िम (1988 फ़िल्म)|मुलज़िम]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[चरणों की सौगन्ध (1988 फ़िल्म)|चरणों की सौगन्ध]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[शुक्रिया (1988 फ़िल्म)|शुक्रिया]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[सोने पे सुहागा (1988 फ़िल्म)|सोने पे सुहागा]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[बीवी हो तो ऐसी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[तमाचा (1988 फ़िल्म)|तमाचा]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[दरिया दिल (1988 फ़िल्म)|दरिया दिल]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[मर मिटेंगे (1988 फ़िल्म)|मर मिटेंगे]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[कमांडो (1988 फ़िल्म)|कमांडो]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[अग्नि (1988 फ़िल्म)|अग्नि]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1988 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1988]]|| [[प्यार का मंदिर (1988 फ़िल्म)|प्यार का मंदिर]]|| भिखारी ||
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|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[हिम्मत और मेहनत (1987 फ़िल्म)|हिम्मत और मेहनत]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[मर्द की ज़बान (1987 फ़िल्म)|मर्द की ज़बान]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[जवाब हम देंगे (1987 फ़िल्म)|जवाब हम देंगे]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[मजाल (1987 फ़िल्म)|मजाल]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[औलाद (1987 फ़िल्म)|औलाद]]|| राजा ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[शेर शिवाजी (1987 फ़िल्म)|शेर शिवाजी]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1987 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1987]]|| [[सिंदूर (1987 फ़िल्म)|सिंदूर]]|| चुन्नी लाल ||
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|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[दिलवाला (1986 फ़िल्म)|दिलवाला]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[दोस्ती दुश्मनी (1986 फ़िल्म)|दोस्ती दुश्मनी]]|| वकील ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[आग और शोला (1986 फ़िल्म)|आग और शोला]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[मुद्दत]]|| हीरा ||
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|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[स्वर्ग से सुन्दर]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[धर्म अधिकारी (1986 फ़िल्म)|धर्म अधिकारी]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[लव 86]]|| हनुमान ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[ऐसा प्यार कहाँ (1986 फ़िल्म)|ऐसा प्यार कहाँ]]|| कस्तूरी ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1986 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1986]]|| [[इंसाफ़ की आवाज़ (1986 फ़िल्म)|इंसाफ़ की आवाज़]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[हकीकत (1985 फ़िल्म)|हकीकत]]|| हवलदार महिपाल सिंह ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[मेरा साथी (1985 फ़िल्म)|मेरा साथी]]|| राम कुमार ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[सरफ़रोश (1985 फ़िल्म)|सरफ़रोश]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[सत्यमेव जयते (1985 फ़िल्म)|सत्यमेव जयते]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[यादों की कसम (1985 फ़िल्म)|यादों की कसम]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[होशियार (1985 फ़िल्म)|होशियार]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[देखा प्यार तुम्हारा (1985 फ़िल्म)|देखा प्यार तुम्हारा]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[तेरी मेहरबानियाँ]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[संजोग (1985 फ़िल्म)|संजोग]]|| चंदू ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[आखिर क्यों?]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[सुर संगम (1985 फ़िल्म)|सुर संगम]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[पाताल भैरवी (1985 फ़िल्म)|पाताल भैरवी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[प्यार झुकता नहीं]]|| जैकी ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[मेरा घर मेरे बच्चे (1985 फ़िल्म)|मेरा घर मेरे बच्चे]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[वफ़ादार (1985 फ़िल्म)|वफ़ादार]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1985 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1985]]|| [[तवायफ़ (1985 फ़िल्म)|तवायफ़]]|| काँस्टेबल पाँडया ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[आज का एम एल ए राम अवतार (1984 फ़िल्म)|आज का एम एल ए राम अवतार]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[लव मैरिज (1984 फ़िल्म)|लव मैरिज]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[कैदी (1984 फ़िल्म)|कैदी]]|| शर्मा ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[नया कदम (1984 फ़िल्म)|नया कदम]]|| ||
|
|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[मकसद (1984 फ़िल्म)|मकसद]]|| दास ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[घर एक मन्दिर (1984 फ़िल्म)|घर एक मन्दिर]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[ये इश्क नहीं आसां (1984 फ़िल्म)|ये इश्क नहीं आसां]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[आशा ज्योति (1984 फ़िल्म)|आशा ज्योति]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[झूठा सच (1984 फ़िल्म)|झूठा सच]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1984 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1984]]|| [[मेरा फैसला (1984 फ़िल्म)|मेरा फैसला]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[वान्टेड (1983 फ़िल्म)|वान्टेड]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[बेकरार (1983 फ़िल्म)|बेकरार]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[एक बार चले आओ (1983 फ़िल्म)|एक बार चले आओ]]|| मदन लालबहादुर ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[हिम्मतवाला (1983 फ़िल्म)|हिम्मतवाला]]|| भूषण ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[शुभ कामना (1983 फ़िल्म)|शुभ कामना]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[अगर तुम ना होते]]|| चंदू ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[जानी दोस्त (1983 फ़िल्म)|जानी दोस्त]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[मुझे इंसाफ चाहिये (1983 फ़िल्म)|मुझे इंसाफ चाहिये]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[मवाली (1983 फ़िल्म)|मवाली]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[जस्टिस चौधरी (1983 फ़िल्म)|जस्टिस चौधरी]]|| अलेक्ज़ेंडर ए एंथनी ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[अंधा कानून]]|| काँस्टेबल असरानी ||
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|-
|[[:श्रेणी:1983 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1983]]|| [[प्रेम तपस्या (1983 फ़िल्म)|प्रेम तपस्या]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[राज महल (1982 फ़िल्म)|राज महल]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[आपस की बात (1982 फ़िल्म)|आपस की बात]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[निकाह (1982 फ़िल्म)|निकाह]]|| सैफ़ ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[सितम (1982 फ़िल्म)|सितम]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[मेहंदी रंग लायेगी (1982 फ़िल्म)|मेहंदी रंग लायेगी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[संबंध (1982 फ़िल्म)|संबंध]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[हमारी बहू अलका (1982 फ़िल्म)|हमारी बहू अलका]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1982 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1982]]|| [[मैं इन्तकाम लूँगी (1982 फ़िल्म)|मैं इन्तकाम लूँगी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1981 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1981]]|| [[मेरी आवाज़ सुनो (1981 फ़िल्म)|मेरी आवाज़ सुनो]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1981 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1981]]|| [[जमाने को दिखाना है]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1981 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1981]]|| [[एक ही भूल (1981 फ़िल्म)|एक ही भूल]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1981 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1981]]|| [[आस पास (1981 फ़िल्म)|आस पास]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1981 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1981]]|| [[एक दूजे के लिये]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[द बर्निंग ट्रेन (1980 फ़िल्म)|द बर्निंग ट्रेन]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[टक्कर (1980 फ़िल्म)|टक्कर]]|| प्रीतम ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[एग्रीमेंट (1980 फ़िल्म)|एग्रीमेंट]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[माँग भरो सजना (1980 फ़िल्म)|माँग भरो सजना]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[बंदिश (1980 फ़िल्म)|बंदिश]]|| मुरली ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[यह कैसा इंसाफ़ (1980 फ़िल्म)|यह कैसा इंसाफ़]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1980 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1980]]|| [[स्वयंवर (1980 फ़िल्म)|स्वयंवर]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[जाने-ए-बहार (1979 फ़िल्म)|जाने-ए-बहार]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[सलाम मेमसाब (1979 फ़िल्म)|सलाम मेमसाब]]|| सुन्दर ||
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|-
|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[बातों बातों में (1979 फ़िल्म)|बातों बातों में]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[दो लड़्के दो कड़्के (1979 फ़िल्म)|दो लड़्के दो कड़्के]]|| रामू ||
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|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[जुर्माना (1979 फ़िल्म)|जुर्माना]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[सरगम (1979 फ़िल्म)|सरगम]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[अहिंसा (1979 फ़िल्म)|अहिंसा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[हमारे तुम्हारे (1979 फ़िल्म)|हमारे तुम्हारे]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]]|| [[ढ़ोंगी (1979 फ़िल्म)|ढ़ोंगी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[पति पत्नी और वो (1978 फ़िल्म)|पति पत्नी और वो]]|| दुर्रानी ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[नालायक (1978 फ़िल्म)|नालायक]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[बदलते रिश्ते (1978 फ़िल्म)|बदलते रिश्ते]]|| अनूपचंद्र ठाकुर ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[दिल्लगी (1978 फ़िल्म)|दिल्लगी]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[घर (1978 फ़िल्म)|घर]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[फूल खिले हैं गुलशन गुलशन (1978 फ़िल्म)|फूल खिले हैं गुलशन गुलशन]]|| विशाल का दोस्त ||
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|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[डाकू और जवान (1978 फ़िल्म)|डाकू और जवान]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]]|| [[हीरालाल पन्नालाल (1978 फ़िल्म)|हीरालाल पन्नालाल]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[चला मुरारी हीरो बनने (1977 फ़िल्म)|चला मुरारी हीरो बनने]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[कसम कानून की (1977 फ़िल्म)|कसम कानून की]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[चोर सिपाही (1977 फ़िल्म)|चोर सिपाही]]|| डॉक्टर ||
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|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[अब क्या होगा (1977 फ़िल्म)|अब क्या होगा]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[पलकों की छाँव में (1977 फ़िल्म)|पलकों की छाँव में]]|| ||
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|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[कलाबाज़ (1977 फ़िल्म)|कलाबाज़]]|| चंगू ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[छलिया बाबू (1977 फ़िल्म)|छलिया बाबू]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[आलाप (1977 फ़िल्म)|आलाप]]|| गणेश (गणेशी) ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[साहेब बहादुर (1977 फ़िल्म)|साहेब बहादुर]]|| आइनू ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[अनुरोध (1977 फ़िल्म)|अनुरोध]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[कर्म (1977 फ़िल्म)|कर्म]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[ड्रीम गर्ल (1977 फ़िल्म)|ड्रीम गर्ल]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[जाग्रति (1977 फ़िल्म)|जाग्रति]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[हीरा और पत्थर (1977 फ़िल्म)|हीरा और पत्थर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[आप की खातिर (1977 फ़िल्म)|आप की खातिर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[चाँदी सोना (1977 फ़िल्म)|चाँदी सोना]]|| अब्दुल्ला ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[कोतवाल साब (1977 फ़िल्म)|कोतवाल साब]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[प्रियतमा (1977 फ़िल्म)|प्रियतमा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[खून पसीना (1977 फ़िल्म)|खून पसीना]]|| मोहन शर्मा ||
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|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]|| [[चक्कर पे चक्कर (1977 फ़िल्म)|चक्कर पे चक्कर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[भला मानस (1976 फ़िल्म)|भला मानस]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[फकीरा (1976 फ़िल्म)|फकीरा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[बालिका बधू (1976 फ़िल्म)|बालिका बधू]]|| शरत ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[महबूबा (1976 फ़िल्म)|महबूबा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[भँवर (1976 फ़िल्म)|भँवर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[उधार का सिंदूर (1976 फ़िल्म)|उधार का सिंदूर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[तपस्या (1976 फ़िल्म)|तपस्या]]|| विनोद सिन्हा ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[हेरा फेरी (1976 फ़िल्म)|हेरा फेरी]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[लैला मज़नू (1976 फ़िल्म)|लैला मज़नू]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[चरस (1976 फ़िल्म)|चरस]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1976 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1976]]|| [[आप बीती (1976 फ़िल्म)|आप बीती]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[अपने रंग हज़ार (1975 फ़िल्म)|अपने रंग हज़ार]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[उलझन (1975 फ़िल्म)|उलझन]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[सुनहरा संसार (1975 फ़िल्म)|सुनहरा संसार]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[रफ़ू चक्कर (1975 फ़िल्म)|रफ़ू चक्कर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[छोटी सी बात (1975 फ़िल्म)|छोटी सी बात]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[चुपके चुपके (1975 फ़िल्म)|चुपके चुपके]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[राजा (1975 फ़िल्म)|राजा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[चैताली (1975 फ़िल्म)|चैताली]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[शोले (1975 फ़िल्म)|शोले]]|| जेलर ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[मिली (1975 फ़िल्म)|मिली]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[मज़ाक (1975 फ़िल्म)|मज़ाक]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[उमर कैद (1975 फ़िल्म)|उमर कैद]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[आक्रमण (1975 फ़िल्म)|आक्रमण]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1975 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1975]]|| [[खुशबू (1975 फ़िल्म)|खुशबू]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी गुजराती फ़िल्म|1974]]|| [[आम्दाबाद नो रिकशावालो (1974 फ़िल्म)|आम्दाबाद नो रिकशावालो]]|| || गुजराती फ़िल्म
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[दुनिया का मेला (1974 फ़िल्म)|दुनिया का मेला]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[त्रिमूर्ति (1974 फ़िल्म)|त्रिमूर्ति]]|| भोला ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[पाप और पुण्य (1974 फ़िल्म)|पाप और पुण्य]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[चोर मचाये शोर (1974 फ़िल्म)|चोर मचाये शोर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[प्रेम नगर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[अजनबी (1974 फ़िल्म)|अजनबी]]|| चेतन कुमार ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[चरित्रहीन (1974 फ़िल्म)|चरित्रहीन]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[रोटी (1974 फ़िल्म)|रोटी]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[हमशक्ल (1974 फ़िल्म)|हमशक्ल]]|| चक्रम ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[विदाई (1974 फ़िल्म)|विदाई]]|| मुरली व भास्कर || दोहरी भूमिका
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[पैसे की गुड़िया (1974 फ़िल्म)|पैसे की गुड़िया]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1974 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1974]]|| [[आप की कसम]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[अग्नि रेखा (1973 फ़िल्म)|अग्नि रेखा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[अभिमान (1973 फ़िल्म)|अभिमान]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[अनामिका (1973 फ़िल्म)|अनामिका]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[आज की ताजा खबर (1973 फ़िल्म)|आज की ताजा खबर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[नमक हराम]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[अनहोनी (1973 फ़िल्म)|अनहोनी]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[छलिया (1973 फ़िल्म)|छलिया]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[शरीफ़ बदमाश (1973 फ़िल्म)|शरीफ़ बदमाश]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1973]]|| [[अचानक (1973 फ़िल्म)|अचानक]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[सबसे बड़ा सुख (1972 फ़िल्म)|सबसे बड़ा सुख]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[कोशिश (1972 फ़िल्म)|कोशिश]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[पिया का घर (1972 फ़िल्म)|पिया का घर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[परिचय (1972 फ़िल्म)|परिचय]]|| नारायण ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[सीता और गीता]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[शादी के बाद (1972 फ़िल्म)|शादी के बाद]]|| रामू ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[बावर्ची (1972 फ़िल्म)|बावर्ची]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[यह गुलिस्ताँ हमारा (1972 फ़िल्म)|यह गुलिस्ताँ हमारा]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[रास्ते का पत्थर (1972 फ़िल्म)|रास्ते का पत्थर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1972 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1972]]|| [[शोर (1972 फ़िल्म)|शोर]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1971 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1971]]|| [[बनफूल (1971 फ़िल्म)|बनफूल]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1971 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1971]]|| [[मेमसाब (1971 फ़िल्म)|मेमसाब]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1971 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1971]]|| [[गुड्डी (1971 फ़िल्म)|गुड्डी]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1971 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1971]]|| [[मेरे अपने (1971 फ़िल्म)|मेरे अपने]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1970 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1970]]|| [[पु्ष्पांजली (1970 फ़िल्म)|पु्ष्पांजली]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1969 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1969]]|| [[सत्यकाम (1969 फ़िल्म)|सत्यकाम]]|| ||
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|[[:श्रेणी:1967 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1967]] || [[हरे काँच की चूड़ियाँ (1967 फ़िल्म)|हरे काँच की चूड़ियाँ]] || ||
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|-
|}
=== बतौर निर्देशक ===
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" width="95%" style="margin: 1em 1em 1em 0; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;"
|- bgcolor="#CCCCCC" align="center"
! वर्ष !! फ़िल्म !! टिप्पणी
|-
|[[:श्रेणी:1997 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1997]] || [[उड़ान (1997 फ़िल्म)|उड़ान]] ||
|-
|[[:श्रेणी:1992 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1992]] || [[दिल ही तो है (1992 फ़िल्म)|दिल ही तो है]] ||
|-
|[[:श्रेणी:1979 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1979]] || [[सलाम मेमसाब (1979 फ़िल्म)|सलाम मेमसाब]] ||
|-
|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]] || [[चला मुरारी हीरो बनने (1977 फ़िल्म)|चला मुरारी हीरो बनने]] ||
|-
|[[:श्रेणी:1974 में बनी गुजराती फ़िल्म|1974]] || [[आम्दाबाद नो रिकशावालो (1974 फ़िल्म)|आम्दाबाद नो रिकशावालो]] || गुजराती फ़िल्म
|-
|}
=== बतौर गायक ===
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" width="95%" style="margin: 1em 1em 1em 0; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;"
|- bgcolor="#CCCCCC" align="center"
! वर्ष !! फ़िल्म !! गाना !! टिप्पणी
|-
| rowspan="2"|[[:श्रेणी:1977 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1977]]
| rowspan="2"|[[आलाप (1977 फ़िल्म)|आलाप]]
| बिनती सुन ले तनिक
|-
| हो रामा डर लागे अपनी उमरिया से
|-
|[[:श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1978]] || [[फूल खिले हैं गुलशन गुलशन (1978 फ़िल्म)|फूल खिले हैं गुलशन गुलशन]] || मन्नू भाई मोटर चली पम पम पम || [[किशोर कुमार]] संग
|}
== नामांकन और पुरस्कार ==
* गुजरात सरकार द्वारा "सात कैदी" (गुजराती) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता व सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार<ref>[http://www.rajasthantour4u.com/artists/asrani.html Asrani - Bollywood Actor - Comedian From Pink City Jaipur] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924064010/http://www.rajasthantour4u.com/artists/asrani.html |date=24 सितंबर 2015 }}. Rajasthantour4u.com (1 January 1941).</ref>
{{awards table}}
|-
| 1973
| ''[[अनहोनी (1973 फ़िल्म)|अनहोनी]]''
| शमा-सुषमा पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए
| {{won}}
|-
| rowspan="3"|1974
| ''[[अभिमान (1973 फ़िल्म)|अभिमान]]''
| [[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार]]
| {{nom}}
|-
| ''[[आज की ताजा खबर]]
| rowspan="3"|[[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार]]
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|-
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|-
| 1977
| ''[[बालिका बधू (1976 फ़िल्म)|बालिका बधू]]''
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|}
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार}}
[[श्रेणी:हास्य अभिनेता|असरानी]]
[[श्रेणी:फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार विजेता]]
[[श्रेणी:हिन्दी अभिनेता|असरानी]]
[[श्रेणी:1941 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:२०२५ में निधन]]
[[श्रेणी:जयपुर के लोग]]
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ओक्साना फ़ेदरोवा
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{{Short description|Russian beauty pageant winner}}
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{{Infobox pageant titleholder
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| caption = 2023 में फ़ेदरोवा
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}}
'''ओक्साना गेनाडयेवना बोरोडिना''' (जन्म [[१७ दिसम्बर|17 दिसंबर]] [[१९७७|1977]]), जिन्हें पेशेवर रूप से '''ओक्साना फ़ेदरोवा''' के नाम से जाना जाता है, एक रूसी सौंदर्य प्रतियोगिता विजेता हैं, जिन्हें [[ब्रह्माण्ड सुन्दरी|मिस यूनीवर्स]] [[मिस यूनीवर्स 2002|२००२]] का ताज पहनाया गया था। [[मिस यूनिवर्स]] जीतने वाली पहली रूसी प्रतिभागी बनीं। वह 119 दिनों तक इस पद पर रहीं और फिर जिन्हें गद्दी से उतार दिया गया (कारण अज्ञात) एवं [[पनामा]] की [[जस्टिन पासेक]] को दे दी गई। जिसके बाद उन्होंने टेलीविज़न में अपना करियर शुरू किया। गुड नाइट, लिटिल वन्स! और फ़ोर्ट बॉयर्ड: रूस शो होस्ट किए।
१९९९ में वह मिस सेंट पीटर्सबर्ग बनीं और २००१ में मिस रूस। उन्होंने कई चैरिटी परियोजनाओं में भी भाग लिया है, 2007 में वह यूनिसेफ की सद्भावना राजदूत बनीं। उन्होंने कहा कि 2016 में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति अभियान के दौरान वह परेशान और निराश हो गई थीं, क्योंकि पश्चिमी मीडिया ने अरबपति को बदनाम करने के लिए उनसे जानकारी मांगी थी।<ref>{{Cite web|last=Adu|first=Aletha|date=10 नवम्बर 2016|title=Russian Miss Universe slams Western media for 'harassing her to DERAIL Trump's campaign'|url=https://www.express.co.uk/news/world/730704/Russia-Miss-Universe-Vladimir-Putin-Donald-Trump-Western-media-President-Oxana-Fedorova|access-date=18 दिसम्बर 2020|website=Express.co.uk|language=en}}</ref>उन्हें २०२४ में रूसी संघ के सम्मानित कलाकार की उपाधि दी गई।<ref>{{Cite web|url=http://publication.pravo.gov.ru/document/0001202409190007?index=9|title=Указ Президента Российской Федерации от 18.09.2024 № 800 «О награждении государственными наградами Российской Федерации»|website=publication.pravo.gov.ru|access-date=2024-09-19}}</ref>
[[चित्र:Оксана Фёдорова 2017.jpg|thumb|right|ओक्साना फ़ेदरोवा]]
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
फ़ेदरोवा का जन्म पस्कोव में हुआ था। उनके पिता गेनाडी फ़ेदरोवा एक परमाणु भौतिक विज्ञानी थे, और उनकी माता एलेना फ़ेदरोवा (जन्म ट्रोफिमोविच), एक मनोरोग नर्स थीं। जब वह तीन साल की थी तब उसके माता-पिता का तलाक हो गया। अपने माता पिता की अकेली संतान होने के कारण उनका पालन-पोषण उनकी मां और नाना-नानी ने किया।<ref name="Oxana Fedorova Biography">[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Oxana Fedorova Biography] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref> 1985-1995 तक, उन्होंने पस्कोव में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वॉलीबॉल टीम की कप्तान रहीं तथा स्कूल में रहते हुए उन्होंने गिटार बजाना भी सीखा। स्नातक होने के बाद, उन्होंने मॉडलिंग करियर शुरू करने की कोशिश की लेकिन सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को की विभिन्न मॉडलिंग एजेंसियों ने उनमें रुचि नहीं दिखाई।<ref name="Oxana Fedorova Biography"/>
पस्कोव में पुलिस अधिकारी के रूप में काम करने के बाद वह रूस के आंतरिक मामलों के मंत्रालय सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी में अध्ययन करने के लिए सेंट पीटर्सबर्ग चली गईं। एक छात्र के रूप में, उन्होंने पुलकोवो ट्रांसपोर्ट पुलिस के लिए एक अन्वेषक के रूप में काम किया।<ref name="Oxana Fedorova Police Investigator">[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Oxana Fedorova Police Investigator] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref>
फ़ेदरोवा ने 2000 में विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और उसी विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अध्ययन शुरू किया।<ref>[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Oxana Fedorova's Dissertation] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref> फ़ेदरोवा ने 2003 में रूस के आंतरिक मामलों के मंत्रालय के सेंट पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय से नागरिक कानून में डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की डिग्री प्राप्त की।<ref>[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Ph.D. in Law] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref> डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद, उन्होंने रूस के आंतरिक मंत्रालय के सेंट पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय में पढ़ाना जारी रखा।<ref name="Oxana Fedorova Biography"/>
==करियर==
===पुलिस की नौकरी===
फ़ेदरोवा ने किशोरावस्था में पुलिस अकादमी में दाखिला लिया, जहां उन्होंने अकादमी के ब्रास बैण्ड में सैक्सोफोन बजाया।<ref name="Oxana Fedorova Biography"/> स्नातक होने के बाद, फ़ेदरोवा ने छह महीने तक पस्कोव में एक निरीक्षक के रूप में काम किया।<ref>[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Pskov Militia] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref> सेंट पीटर्सबर्ग में विश्वविद्यालय की छात्रा रहते हुए, उन्होंने पुल्कोवो परिवहन पुलिस में अन्वेषक के रूप में काम किया।<ref name="Oxana Fedorova Police Investigator"/> 2005 में अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पुलिस अधिकारी के रूप में अपना कैरियर जारी रखा, उन्हें सितम्बर 2002 में कैप्टन तथा 2005 में मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया।<ref>[http://ria.ru/society/20061110/55508764.html?id= Обобщения – Самая опасная, но не самая престижная. Почему не идут в милиционеры?]. Лента новостей "РИА Новости" – 10 नवम्बर 2006</ref>
===मॉडलिंग और सौंदर्य प्रतियोगिता===
1999 में, फ़ेदरोवा ने एक मॉडल के रूप में पेशेवर रूप से काम करना शुरू किया, और बाद में सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लिया।<ref>[http://fedorova-oksana.com/private/bio/ Model and Beauty Queen] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120318050307/http://fedorova-oksana.com/private/bio/ |date=18 March 2012 }}</ref>उस वर्ष, उन्हें मिस सेंट पीटर्सबर्ग और मिस कालोकागाथिया नामांकित किया गया था। 2001 में, उन्होंने मिस रूस में सेंट पीटर्सबर्ग का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ उन्हें विजेता घोषित किया गया।
एक मॉडल के रूप में, फ़ेदरोवा ने [[रोम]], [[मिलान]] और [[मॉस्को]] में फैशन वीक में भाग लेने के अलावा टोनी वार्ड और यूलिया यानिना जैसे डिजाइनरों के लिए भी काम किया है।<ref>[http://www.krasotana5.ru/info/news/fashion/Platja-ot-Tony-Ward-pokazala-Oksana-Fedorova/ Платья от Tony Ward показала Оксана Федорова] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160303180337/http://www.krasotana5.ru/info/news/fashion/Platja-ot-Tony-Ward-pokazala-Oksana-Fedorova/ |date=3 मार्च 2016 }}. Krasotana5.ru (20 September 2006). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.pambianconews.com/2009/03/02/a-milano-debutta-anna-direchina-la-giovane-stilista-russa-27941/|title=A Milano debutta Anna Direchina, la giovane stilista russa - Pambianconews notizie e aggiornamenti moda, lusso e made in Italy|date=2 March 2009 |access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[http://www.oreanda.ru/ru/news/20080325/common/lifestyle/article289436/ "Ореанда-Новости" — Стиль жизни / Таша Строгая представила свою коллекцию на Неделе Моды в Москве]. Oreanda.ru (25 March 2008). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>[http://fashionweek.moskva.com/dizajnery/natalia-valevskaya/natalia-valevskaya--sezon-osen-zima-2008-2009/ Natalia Velevskaya, сезон осень-зима 2008/2009 – Natalia Valevskaya – Дизайнеры – Неделя Моды в Москве<!-- Bot generated title -->] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20080411223357/http://fashionweek.moskva.com/dizajnery/natalia-valevskaya/natalia-valevskaya--sezon-osen-zima-2008-2009/ |date=11 April 2008}}</ref>
====मिस यूनीवर्स 2002====
मिस रशिया 2001 के रूप में, फेदोरोवा अपनी पढ़ाई के कारण [[मिस यूनीवर्स 2001]] प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकीं, लेकिन अगले वर्ष [[मिस यूनीवर्स 2002]] में [[सैन जुआन, प्यूर्टो रिको]] में उन्होंने हिस्सा लिया।<ref>[https://www.nydailynews.com/archives/gossip/pitcher-wife-play-hardball-divorce-article-1.490901 PITCHER, WIFE PLAY HARDBALL IN DIVORCE] by [[Rush & Molloy|George Rush, Joanna Molloy]], Kasia Anderson and Lauren Rubin (16 May 2002) from [[New York Daily News|Daily News]] website</ref>
मिस यूनिवर्स ऑर्गनाइजेशन के मालिक [[डोनाल्ड ट्रंप]] ने कहा था —
''“यह एक असामान्य वर्ष है, और ये देश इस समय कई उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं। यह मुश्किल स्थिति है। जब वे सैन जुआन पहुँच जाते हैं तो उन्हें सुरक्षित महसूस होता है, लेकिन वहाँ तक पहुँचना कुछ लोगों के लिए चिंता का विषय है।”''
फेदोरोवा ने स्विमसूट और ईवनिंग गाउन — दोनों प्रतियोगिताओं में अन्य नौ सेमीफाइनलिस्टों को पछाड़ते हुए जीत हासिल की।
मिस यूनिवर्स 2002 का ताज पहनाए जाने के बाद उन्हें कई सम्मान और उपहार मिले।
रूसी डिजाइनर हेलेन यारमक ने उनके सम्मान में एक गुड़िया (डॉल) तैयार की।
अपने कार्यकाल के दौरान फेदोरोवा ने [[कनाडा]], [[फ्रांस]], [[ग्रीस]], [[इंडोनेशिया]], [[इटली]], [[केन्या]], [[पनामा]], [[पोर्टो रीको]] और [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] की यात्रा की।<ref>{{Cite web |url=http://www.hellomagazine.com/celebrities-news-in-pics/18-07-2002/3867/ |title=Miss Universe in Indonesia |access-date=11 October 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120512074402/http://www.hellomagazine.com/celebrities-news-in-pics/18-07-2002/3867/ |archive-date=12 May 2012 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web|url=http://petersburgcity.com/city/personalities/fedorova/|title=Oxana Fedorova / Personalities of St. Petersburg / Petersburg CITY / Guide to St. Petersburg, Russia|website=petersburgcity.com|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[http://archivo.laprensa.com.ni/archivo/2002/julio/25/revista/revista-20020725-10.html Oxana Fedorova en Panamá] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120404121358/http://archivo.laprensa.com.ni/archivo/2002/julio/25/revista/revista-20020725-10.html |date=4 April 2012 }}</ref><ref>[http://mensual.prensa.com/mensual/contenido/2002/09/12/uhora/uhora_farandula.shtml Oxana Fedorova regresa a Puerto Rico] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131109213729/http://mensual.prensa.com/mensual/contenido/2002/09/12/uhora/uhora_farandula.shtml |date=9 November 2013 }}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.life.com/celebrity-pictures/78870096/2002-toronto-film-festival-alliance-atlantis-party|title=Miss Universe 2002 at Toronto International Film Festival|access-date=18 November 2021}}{{Dead link|date=February 2024 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite web|url=https://english.pravda.ru/news/russia/43927-n/|title=Miss Universe will come to Russia|date=7 June 2002|website=PravdaReport|access-date=18 November 2021}}</ref>
[[File:Oxana Fedorova2.jpg|thumb|left|150px|2008 में फेडोरोवा]]
केन्या में फेदोरोवा ने [[नैरोबी]] और उसके आस-पास के क्षेत्रों में [[एचआइवी]]/[[एड्स]] कार्यक्रमों का दौरा किया, जिसमें एड्स अनाथालय भी शामिल थे।<ref>{{Cite web|url=http://www.globalhealth.org/publications/article.php3?id=815|archive-url=https://web.archive.org/web/20100804054618/http://www.globalhealth.org/publications/article.php3?id=815|url-status=dead |title=More Than Just a Pretty Face: Miss Universe Addresses HIV/AIDS in Kenya|archive-date=4 August 2010|access-date=18 November 2021}}</ref>
इंडोनेशिया में उन्होंने [[मध्य जावा]] के बोरोबुदुर मंदिर का भ्रमण किया, जहाँ उनके साथ मिस इंडोनेशिया 2002 मेलानी पुत्रिया देविता सारी भी थीं।<ref>{{Cite web|url=https://translate.google.com/translate?hl=id&langpair=id%7Cen&u=http://www.indonesianfilmcentre.com/pages/profile/profile.php%3Fpid%3D616ff96daeb6/|title=Melanie and Oxana visited Borobudur|access-date=18 November 2021}}</ref><ref name="auto">{{Cite web|url=http://kapanlagi.com/|title=Melanie Putria: Berita Terbaru Hari Ini|website=KapanLagi.com|access-date=18 November 2021}}</ref> दोनों ने [[इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति]] [[मेगावती सुकर्णोपुत्री]] से उनके निवास इस्ताना नेगारा पर मुलाकात की।<ref>{{Cite web|url=https://translate.google.com/translate?hl=id&langpair=id%7Cen&u=http://www.indonesianfilmcentre.com/pages/profile/profile.php%3Fpid%3D616ff96daeb6/|title=Melanie and Oxana met the Megawati Soekarnoputri|access-date=18 November 2021}}</ref><ref name="auto"/>
[[पेरिस]] में फेदोरोवा ने अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी ब्यूरो की 131वीं आम सभा में भाग लिया, जहाँ उन्होंने भौतिकी के [[नोबेल पुरस्कार विजेताओं की सूची|नोबेल पुरस्कार विजेता]] [[ज़ोरेस अल्फेरोव]] से मुलाकात की।<ref>{{Cite web|url=http://visualrian.ru/en/site/gallery/index/id/690649/context/%7B%22lightbox%22:%226184%22%7D/|title=RIA Novosti media library :: Gallery|date=19 October 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20151019090907/http://visualrian.ru/en/site/gallery/index/id/690649/context/%7B%22lightbox%22:%226184%22%7D/|access-date=18 November 2021|archive-date=19 October 2015}}</ref>
इटली में उन्होंने मिस यूनिवर्स इटली 2003 सिल्विया सेक्कोन को ताज पहनाने में मदद की।
कनाडा में अपने दौरे के दौरान फेदोरोवा ने 2002 [[टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह]] में भाग लिया।<ref>{{Cite web|url=https://www.missuniverseitaly.it/default.asp|title=Miss Universe Italy|first=powered by|last=SitoFelice.it|website=www.missuniverseitaly.it|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.wireimage.com/celebrity-pictures/Miss-Universe-Oxana-Fedorova-during-2002-Toronto-Film-Festival/129969360|title=Miss Universe Oxana Fedorova during 2002 Toronto Film Festival... | WireImage | 129969360|website=www.wireimage.com|access-date=18 November 2021}}</ref>
पनामा में उन्होंने उस अनुबंध पर हस्ताक्षर के कार्यक्रम में भाग लिया, जिसके तहत [[मिस यूनीवर्स 2003]] प्रतियोगिता की मेजबानी पनामा को सौंपी गई थी।
सितंबर 2002 में, वह प्यूर्टो रिको लौटीं और मिस प्यूर्टो रिको यूनिवर्स 2003 कार्ला ट्रिकॉली को ताज पहनाने में सहयोग किया।<ref>[http://mensual.prensa.com/mensual/contenido/2002/09/12/uhora/uhora_farandula.shtml Oxana in Puerto Rico for crowning.] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131109213729/http://mensual.prensa.com/mensual/contenido/2002/09/12/uhora/uhora_farandula.shtml |date=9 November 2013 }}</ref>
फेदोरोवा के ताज पहनने के कुछ महीनों बाद ही मिस यूनिवर्स संगठन ने उन्हें उनके पद से हटा दिया।<ref name="smh">[https://www.smh.com.au/articles/2002/09/24/1032734159939.html I'm not married.]. ''The Sydney Morning Herald''. (25 September 2002). Retrieved 27 September 2011.</ref> बाद में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कर्तव्यों को निभाने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि “द हावर्ड स्टर्न शो” में उनके साथ हुए अपमानजनक व्यवहार से वह बेहद आहत हुई थीं।
उन्होंने कहा कि पेजेंट आयोजकों ने उन्हें यह चेतावनी नहीं दी थी कि हावर्ड स्टर्न अक्सर ऐसे अशोभनीय और यौन प्रकार के प्रश्न पूछते हैं।<ref>[https://www.chron.com/CDA/archives/archive.mpl/2002_3585669/newsmakers.html Newsmakers. Houston Chronicle News Services] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100618035636/http://www.chron.com/CDA/archives/archive.mpl/2002_3585669/newsmakers.html |date=18 June 2010 }}. Chron.com (28 September 2002). Retrieved 27 September 2011.</ref>
इसके बाद मिकिमोटो क्राउन को पहली रनर-अप [[जस्टिन पासेक]] (पानामा) को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर अपने देश की पहली मिस यूनिवर्स बनीं।
फेदोरोवा इतिहास की पहली मिस यूनिवर्स थीं जिन्हें उनके कार्यकाल के दौरान पद से हटाया गया।
===फिल्म और टेलीविजन करियर===
2003 में अपना ताज खोने के बाद, फेदोरोवा ने टेलीविजन में करियर बनाना शुरू किया। उन्हें चैनल वन के लिए स्टार फैक्ट्री शो होस्ट करने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। बाद में उन्हें जनवरी 2003 में वीजीटीआरके के लंबे समय से चल रहे रूसी बच्चों के कार्यक्रम ''गुड नाइट, लिटिल वन्स!'' की होस्ट के रूप में चुना गया।<ref>[http://www.rutv.ru/tvpreg.html?d=0&id=360&cid=4 Спокойной ночи, малыши!] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110721074327/http://www.rutv.ru/tvpreg.html?d=0&id=360&cid=4 |date=21 July 2011 }}. Телеканал "РОССИЯ". Rutv.ru. 27 September 2011. Retrieved 27 September 2011.</ref> यह शो अक्टूबर 2003 में सर्वश्रेष्ठ बच्चों का शो के लिए टीईएफआई पुरस्कार जीता।<ref>[http://www.rutv.ru/tvpreg.html?id=360&d=0 Лучшая детская программа] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120101094307/http://www.rutv.ru/tvpreg.html?id=360&d=0 |date=1 January 2012 }}. Rutv.ru. 27 September 2011. Retrieved 27 September 2011.</ref> 2004 से 2010 तक उन्होंने रूसिया-1 चैनल पर सब्बोतनिक नामक शो की सह-मेजबानी की।<ref>[http://www.rutv.ru/tvpreg.html?d=0&id=54990&cid=4 Субботник] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110721074859/http://www.rutv.ru/tvpreg.html?d=0&id=54990&cid=4 |date=21 July 2011 }}. Телеканал "РОССИЯ". Rutv.ru. 27 September 2011. Retrieved 27 September 2011.</ref> उन्होंने जूनियर यूरोविज़न सांग कॉन्टेस्ट 2009 और यूरोविज़न सांग कॉन्टेस्ट 2010 के लिए रूसी राष्ट्रीय चयन कार्यक्रमों की मेजबानी की, और यूरोविज़न सांग कॉन्टेस्ट 2008, 2010 और 2012 में रूस की प्रवक्ता के रूप में भी कार्य किया।<ref>{{Cite web|url=https://domenforum.net/showthread.php?t=202519&highlight=annews.ru|archive-url=https://web.archive.org/web/20110719154013/http://www.annews.ru/news/detail.php?ID=216339|url-status=dead |title=AnNews.ru - Агентство национальных новостей, Тиц2300 - DomenForum.net|archive-date=19 July 2011|website=domenforum.net|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://esckaz.com/jesc/2009/rus.htm|title=Russia at Junior Eurovision Song Contest 2009 - Россия на Детском Евровидении 2009|website=esckaz.com|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[http://www.pageant.com/offstage/archive/offstage2008q1-2.html Eurovision 2008] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20081231013956/http://www.pageant.com/offstage/archive/offstage2008q1-2.html |date=31 December 2008 }}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.missespana.com/newforos/lofiversion/index.php?t68918.html|archive-url=https://web.archive.org/web/20110714102617/http://www.missespana.com/newforos/lofiversion/index.php?t68918.html|url-status=dead |title=Eurovision 2010|archive-date=14 July 2011|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://eurovision.tv/stories|title=Stories|website=Eurovision.tv|access-date=18 November 2021}}</ref> 2014 में, उन्होंने कोरोलेवा क्रासोटी नामक स्टाइल और फैशन कार्यक्रम की मेजबानी शुरू की।<ref>{{Cite web |url=http://www.domashniy.ru/article/razvlecheniya/novosti_telekanala/novoe_shou_koroleva_krasoty_na_domashnem.html |title=Oxana Fedorova new TV show on Domashniy channel |access-date=12 November 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160106160034/http://www.domashniy.ru/article/razvlecheniya/novosti_telekanala/novoe_shou_koroleva_krasoty_na_domashnem.html |archive-date=6 January 2016 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web|url=https://ru.hellomagazine.com/kino-i-televidenie/teleshou/6444-oksana-fedorova-stala-vedushchej-shou-o-shopinge-koroleva-krasoty.html|title=Оксана Федорова стала ведущей шоу о шопинге "Королева красоты"|date=11 May 2014|website=HELLO! Russia|access-date=18 November 2021}}</ref>
2006 में, फेदोरोवा ने रशियन संस्करण डांसिंग विद द स्टार्स के दूसरे सीजन में भाग लिया। वह पांचवें स्थान पर रहीं।<ref>[http://www.kp.ru/daily/23796/59067/ «Танцы со звездами-2»: Оксана Федорова была самой красивой, а Настя Мельникова – самой заводной]. Kp.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref> उन्होंने 2011 में प्रोजेक्ट रनवे के रशियन संस्करण में अतिथि जज के रूप में भी उपस्थिति दी, और 2014 में ''नेम दैट ट्यून'' के रशियन संस्करण में प्रतियोगी के रूप में भाग लिया।<ref>[http://podium.mtv.ru/About/#pgal_Podium_Jury Project Runway-Russia] {{webarchive|url=https://archive.today/20120712130433/http://podium.mtv.ru/About/ |date=12 July 2012 }}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.etvnet.com/tv/teleigra-online/ugadaj-melodiyu-tamara-gverdtsiteli-gleb-matvejchuk-oksana-fedorova/699422/|title=Смотреть "Угадай мелодию. Тамара Гвердцители, Глеб Матвейчук, Оксана Федорова" онлайн - eTVnet|website=www.etvnet.com|access-date=18 November 2021|archive-date=27 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230627030935/https://www.etvnet.com/tv/teleigra-online/ugadaj-melodiyu-tamara-gverdtsiteli-gleb-matvejchuk-oksana-fedorova/699422/|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://svit24.net/culture/54-culture/101168-oksana-fedorova-shokyrovala-zrytelej-svoej-polnotoj|title=Oxana Fedorova "Name That Tune"|access-date=18 November 2021|archive-date=31 March 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180331040158/http://svit24.net/culture/54-culture/101168-oksana-fedorova-shokyrovala-zrytelej-svoej-polnotoj|url-status=dead}}</ref> एक वॉयस अभिनेत्री के रूप में, फेदोरोवा ने [[टॉय स्टोरी 3]] में [[बार्बी]] और टिंकर बेल फिल्म श्रृंखला में क्वीन क्लैरियन के रशियन भाषा संस्करणों में अपनी आवाज दी।<ref>[http://www.rian.ru/culture/20100504/230243106.html В "Истории игрушек" Барби и Кен заговорят голосами Федоровой и Баскова]. Rian.ru (23 September 2011). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cosmo.ru/stars/news/27-01-2014/rossiyskie-zvezdy-ozvuchili-film-fei-zagadka-piratskogo-ostrova/|title=Российские звезды озвучили фильм "Феи: Загадка пиратского острова"|website=Cosmopolitan|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://7days.ru/stars/chronic/oksana-fedorova-snova-stanet-korolevoy.htm|title=Оксана Федорова снова станет королевой|date=6 August 2012|website=7Дней.ру|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[https://archive.today/20120703012445/http://www.volgograd.ru/afishi/169082.release Walt Disney Pictures представляет анимационную сказку «Феи» (Tinker Bell)]. Volgograd.ru (15 April 2011). Retrieved 27 September 2011.</ref>
===संगीत करियर===
फेदोरोवा ने 2009 में अपने संगीत करियर की शुरुआत की, जब उन्होंने निकोलाई बास्कोव के साथ मिलकर सिंगल "प्रावा ल्युबोव" जारी किया। यह गीत 2010 के गोल्डन ग्रामोफोन अवार्ड्स में "डुएट ऑफ द ईयर" का पुरस्कार जीतने में सफल रहा।<ref>[http://www.kp.ru/daily/24316.3/508816/ Права любовь]. Kp.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref>
इसके बाद उन्होंने 2010 में अपना पहला सोलो सिंगल "ना शाग ओदिन" जारी किया।<ref>[http://mapmusic.ru/newsm/1409-fedorova-prezentovala-klip-na-shag-odin.html Оксана Фёдорова презентовала клип на песню "На шаг один"] {{webarchive|url=https://archive.today/20120629171451/http://mapmusic.ru/newsm/1409-fedorova-prezentovala-klip-na-shag-odin.html |date=29 June 2012 }}. Mapmusic.ru (21 July 2010). Retrieved 27 September 2011.</ref>
उनका पहला स्टूडियो एल्बम "ना क्रायु उ ल्युबवी" 2011 में रिलीज़ हुआ।<ref>[http://www.uralweb.ru/news/n378322.html первый сольный альбом "На краю у любви"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110718085130/http://www.uralweb.ru/news/n378322.html |date=18 July 2011 }}. Uralweb.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref>
2013 में, उन्होंने एक और सिंगल "मोया डॉक्ट्रिना" जारी किया।<ref>{{Cite web|url=https://fedorovaoksana.com/index.php|title=Сайт Оксаны Федоровой | Главная страница|website=fedorovaoksana.com|access-date=18 November 2021}}</ref>
2019 में, फेदोरोवा ने रूसी टेनर दिमित्री गालिखिन के साथ मिलकर अपने स्पेनिश डुएट "हिस्तोरिया डे उन आमोर" का ऑफिशियल वीडियो जारी किया।.<ref>{{Cite web|url=https://aif.ru/event/info/oksana_fedorova_i_dmitriy_galihin_rasskazali_v_aif_istoriyu_odnoy_lyubvi|title=Оксана Федорова и Дмитрий Галихин рассказали в АиФ "Историю одной любви"|first=Оксана|last=Морозова|date=24 May 2019|website=aif.ru|access-date=18 November 2021}}</ref>
===अन्य उद्यम===
2008 में, फेदोरोवा ने अपनी पहली किताब "द फॉर्मूला ऑफ स्टाइल" प्रकाशित की। इस किताब में सौंदर्य और स्टाइल से जुड़ी सलाहें थीं, साथ ही फेदोरोवा के जीवन से संबंधित आत्मकथात्मक जानकारी भी शामिल थी।<ref>[http://style.passion.ru/l.php/formula-stilya-ot-oksany-fedorovoi.htm Формула стиля The Formula of Style] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110831173003/http://style.passion.ru/l.php/formula-stilya-ot-oksany-fedorovoi.htm |date=31 August 2011 }}. Style.passion.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref>
2010 में, वह "मोडा टॉपिकल" पत्रिका की प्रधान संपादक बनीं।<ref>[http://www.modatopical.ru/ MODA Topical]. Modatopical.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref>
2014 में, फेदोरोवा ने अपना फैशन ब्रांड "OFERA" लॉन्च किया, जिसका पहला प्रदर्शन मॉस्को में मर्सिडीज-बेंज फैशन वीक (स्प्रिंग/समर 2015) में किया गया।<ref>{{Cite web|url=https://7days.ru/fashion/style/obraz-dnya-oksana-fedorova-v-ofera.htm|title=Образ дня: Оксана Федорова в Ofera|date=13 February 2014|website=7Дней.ру|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://mercedesbenzfashionweek.ru/|archive-url=https://archive.today/20141112052836/http://mercedesbenzfashionweek.ru/ru/gallery/353|url-status=dead |title=Главная / Mercedes-Benz Fashion Week Russia|archive-date=12 November 2014|website=/ Mercedes-Benz Fashion Week Russia|access-date=18 November 2021}}</ref>
फेदोरोवा ने अनेक चैरिटी (परोपकारी) परियोजनाओं में भाग लिया है। वह 2006 से [[यूनिसेफ]] की सदस्य हैं और 2007 में यूनिसेफ गुडविल एंबेसडर बनीं।<ref>{{cite web|title=National ambassadors|url=http://www.unicef.org/people/people_nationalambassadors.html|publisher=UNICEF|access-date=20 February 2012|date=3 February 2012}}</ref> फेदोरोवा रूसी चिल्ड्रन्स वेलफेयर सोसाइटी की सलाहकार समिति की सदस्य भी हैं।<ref>[https://web.archive.org/web/20080704163258/http://www.rcws.org/aboutus_directors.htm RCWS]. RCWS. Retrieved 27 September 2011.</ref>
उन्होंने अक्टूबर 2009 में "स्पेशिते देलात दोब्रो!" (अर्थात् “भलाई करने की जल्दी करो!”) नाम से एक चैरिटी संस्था की स्थापना की, जिसे रूसी रक्षा मंत्रालय की सहायता से शुरू किया गया था। यह संस्था अनाथों और कठिन परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की मदद करती है — विशेष रूप से उन बच्चों की जो रूसी आंतरिक मंत्रालय या रूसी सशस्त्र बलों में सेवा करते हुए मारे गए माता-पिता के अनाथ हैं।<ref>{{Cite web|url=https://fedorovafond.ru/|title=Благотворительный Фонд Оксаны Федоровой|website=fedorovafond.ru|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.1tv.ru/public/pi=20454 |title=Фонд Оксаны Федоровой "Спешите делать добро!" для детей приюта Никита |access-date=29 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131202231445/http://www.1tv.ru/public/pi=20454 |archive-date=2 December 2013 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web|url=http://mockvanews.ru/13554|archive-url=https://web.archive.org/web/20131202223744/http://mockvanews.ru/13554|url-status=dead |title=Оксана Федорова и фонд "Спешите Делать Добро!"пригласили друзей на ужин|archive-date=2 December 2013|access-date=18 November 2021}}</ref>
2011 में, फेदोरोवा ने [[ऊफ़ा|ऊफ़ा शहर]] में 10 से 16 वर्ष की लड़कियों के लिए एक विद्यालय की स्थापना भी की।<ref>{{Cite web|url=http://absolutmir.ru/node/344|title=Йога для женщин "Секреты Шакти" | Абсолютный мир - центр красоты и здоровья|website=absolutmir.ru|access-date=18 November 2021|archive-date=26 दिसंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121226010740/http://absolutmir.ru/node/344|url-status=dead}}</ref>
==व्यक्तिगत जीवन==
फेदोरोवा [[रूसी पारम्परिक ईसाई|रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च]] की अनुयायी हैं।<ref>[http://www.prescottorthodox.org/2010/08/miss-universe-2002real-spiritual-help-only-in-orthodoxy/ Miss Universe 2002: “Spiritual Help Only in Orthodoxy”] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110727184333/http://www.prescottorthodox.org/2010/08/miss-universe-2002real-spiritual-help-only-in-orthodoxy/ |date=27 July 2011 }}. Prescottorthodox.org (7 August 2010). Retrieved 27 September 2011.</ref>
साल 2007 में उन्होंने जर्मन मॉडल फिलिप टोफ्ट से [[म्यूनिख]] में विवाह किया,<ref>[http://www.vz.ru/news/2007/8/13/100820.html ВЗГЛЯД / Оксана Федорова вышла замуж за немецкого бизнесмена]. Vz.ru (13 August 2007). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.nevanews.com/|archive-url=https://web.archive.org/web/20101126054927/http://nevanews.com/index.php?id_article=715§ion=21|url-status=dead |title=NevaNews - einfach gut informiert|archive-date=26 November 2010|website=www.nevanews.com|access-date=18 November 2021}}</ref> लेकिन 2010 में उनका तलाक हो गया।<ref>[http://www.eg.ru/daily/stars/18785/ Оксана Федорова официально развелась с мужем-немцем]. Eg.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>[http://ru.trend.az/life/interesting/1671417.html Оксана Федорова официально развелась с мужем]. Ru.trend.az (17 April 2010). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>[http://www.kp.ru/daily/24474/633188/ Николай Басков: «Оксана Федорова наконец-то развелась с мужем!»]. Kp.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref>
2011 में फेदोरोवा ने आंद्रे बोरोडिन से विवाह किया, जो एक [[केजीबी]] अधिकारी, रूसी राष्ट्रपति प्रशासन के सदस्य और रूसी बॉक्सिंग फेडरेशन के उपाध्यक्ष हैं।<ref>{{Cite web|url=http://www.lifeshowbiz.ru/news/75350|archive-url=https://web.archive.org/web/20111126021553/http://www.lifeshowbiz.ru/news/75350|url-status=dead |title=Оксана гордится тем, что скоро станет мамой|archive-date=26 November 2011|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.woman.ru/relations/marriage/article/64445/|title=Стало известно, за кого вышла замуж Оксана Федорова|website=www.woman.ru|access-date=18 November 2021|archive-date=30 September 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220930153546/https://www.woman.ru/relations/marriage/article/64445/|url-status=dead}}</ref><ref>[http://www.boxing-fbr.ru/publications-view-5098.html Андрей Михайлович Бородин назначен вице-президентом Федерации бокса России]</ref>
फेदोरोवा और बोरोडिन के दो बच्चे हैं।<ref>{{Cite web|url=https://aif.ru/culture/person/272496|title="Мисс Вселенная" Оксана Федорова стала мамой|date=6 March 2012|website=aif.ru|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[http://www.lifenews.ru/news/84774 Мисс Вселенная Оксана Федорова родила сына]. [[LifeNews]].</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.kp.ru/daily/25869/2835114/|title=Оксана Федорова назвала сына Федором|date=17 April 2012|website=kp.ru|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.kp.ru/daily/26110/3006036/|title=Оксана Федорова снова стала мамой|date=24 July 2013|website=kp.ru|access-date=18 November 2021}}</ref><ref>[http://ria.ru/photolents/20130725/952025547.html Оксана Федорова стала мамой во второй раз]</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.womanhit.ru/stars/news/655180-oksana-fedorova-vyibrala-imya-dochke.html|title=Oxana Fedorova and her husband Andrey Borodin name their daughter Elizaveta|access-date=18 November 2021}}</ref>
फेदोरोवा पहले रूसी पार्टी ऑफ लाइफ के अभियानों में भाग ले चुकी थीं।<ref>[http://www.kp.ru/daily/23447/36162/ «Мисс Вселенная» идет в депутаты]. Kp.ru. Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>[http://pryaniki.org/smi-in.htm?id=1263 Тульские PRяники]. Pryaniki.org. Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>[http://www.vesti7.ru/news?id=4045 Выборы-2004. У кандидатов и социологов – горячая пора] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110723003211/http://www.vesti7.ru/news?id=4045 |date=23 July 2011 }}. Vesti7.ru (29 February 2004). Retrieved 27 September 2011.</ref><ref>{{Cite web|url=http://rrpvita.by.ru/oksana.html|title=Rrpvita.by.ru|access-date=18 November 2021}}{{Dead link|date=February 2024 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref>
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची|30em}}
==बाहरी कड़ियाँ==
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:1977 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी: विश्व सुन्दरी]]
[[श्रेणी:मिस यूनिवर्स विजेता]]
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राजगुरु
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
| name = राजगुरु
| image = National Martyrs Memorial Hussainiwala closeup.jpg
| caption = [[भगत सिंह]], राजगुरु और [[सुखदेव]] की प्रतिमा
| birth_date = २४ अगस्त १९०८
| birth_place = [[राजगुरुनगर| खेड]], [[पुणे जिला| पुणे]], [[बंबई प्रेसीडेंसी|बॉम्बे प्रेसिडेंसी]], [[ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]]
| death_date = {{death date and age|df=yes|1931|3|23|1908|8|24}}<br>[[लाहौर]], [[ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]], (अब [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]],[[ पाकिस्तान]] में)
| nationality = भारतीय
}}
[[चित्र:Rajguru456.jpg|thumb|right|200px|अमर शहीद '''शिवराम हरि राजगुरु''']]
'''शिवराम हरि राजगुरु''' ([[मराठी भाषा|मराठी]]: शिवराम हरी राजगुरू, (24 अगस्त 1908 - 23 मार्च 1931) [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वतंत्रता संग्राम]] के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। इन्हें [[भगत सिंह]] और [[सुखदेव]] के साथ 23 मार्च 1931 को [[फाँसी]] पर लटका दिया गया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के [[इतिहास]] में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी।
'''शिवराम हरि राजगुरु''' का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् १९६५ (विक्रमी) तदनुसार सन् १९०८ में [[पुणे]] [[ज़िला|जिला]] के खेडा [[गाँव]] में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ६ वर्ष की आयु में [[पिता]] का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये [[वाराणसी]] विद्याध्ययन करने एवं [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] सीखने आ गये थे। इन्होंने [[हिन्दू]] धर्म-ग्रंन्थों तथा [[वेद]]ों का अध्ययन तो किया ही '''[[लघुसिद्धान्तकौमुदी|लघु सिद्धान्त कौमुदी]]''' जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत ([[व्यायाम]]) का बेहद शौक था और छत्रपति [[शिवाजी]] की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे।
[[वाराणसी]] में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी '''हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ''' से तत्काल जुड़ गये।<ref>[https://panchjanya.com/2025/08/24/426144/rss-news/rajguru-rss-connection-real-history-untold-story/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे राजगुरु? जानिए असली इतिहास, जो बच्चों को कभी पढ़ाया नहीं गया]</ref> आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें '''रघुनाथ''' के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित [[चन्द्रशेखर आज़ाद]], सरदार [[भगत सिंह]] और '''यतीन्द्रनाथ दास''' आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि [[चन्द्रशेखर आज़ाद]] ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।
२३ मार्च १९३१ को इन्होंने [[भगत सिंह]] तथा सुखदेव के साथ [[लाहौर]] सेण्ट्रल जेल में [[फाँसी]] के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को [[हिन्दुस्तान]] के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।
[[File:Statues of Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev.jpg|thumb|भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव ]]
==इन्हें भी देखें==
*[[अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ|अशफाक उल्ला खाँ]]
*[[भगत सिंह सुखदेव राजगुरु]]
==सन्दर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://archive.org/details/rajguruinvincibl00varm Rajguru, the invincible revolutionary]
* [http://vicharonkadarpan.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html ये शहीदों की जय हिन्द बोली...] Jay hind (bhart varma)
*[https://webmaja.in/ Website] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230612024806/https://webmaja.in/ |date=12 जून 2023 }}
[[श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम]]
[[श्रेणी:शहीद]]
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox royalty
|name = कनिष्क
|title =[[कुषाण]] सम्राट
|image= KanishkaCoin3.JPG
|caption = कनिष्क कालीन एक [[स्वर्ण मुद्रा]], [[ब्रिटिश संग्रहालय]]
|reign = द्वितीय शताब्दी (ल. 127–150 इस्वी)<ref>{{cite journal |last1=Bracey |first1=Robert |title=The Date of Kanishka since 1960 (Indian Historical Review, 2017, 44(1), 1-41) |journal=Indian Historical Review |date=2017 |volume=44 |pages=1–41 |url=https://www.academia.edu/32448882 |language=en|url-access=registration}}</ref>
|coronation =
|predecessor =[[विम कडफिसेस]]
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|house = [[कुषाण राजवंश|कुषाण]]
|father =
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|birth_date = ल. 78 ईस्वी
|birth_place = पुरुषपुर (वर्तमान [[पेशावर]])
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}}
{{कुषाण वंश}}
'''कनिष्क प्रथम''' ({{lang-xbc|Κανηϸκο}}, {{Langx|pgd|𐨐𐨞𐨁𐨮𐨿𐨐}})<ref>B.N. Mukhjerjee, ''Shāh-jī-kī-ḍherī Casket Inscription'', The British Museum Quarterly, Vol. 28, No. 1/2 (Summer, 1964), pp. 39–46</ref>
या '''कनिष्क महान''', द्वितीय शताब्दी ईसवी (ल.
78 ईसवी, जन्म से 144 ईसवी, मृत्यु) में भारत के एक [[सम्राट]] थे, इन्होंने ल. 127 से 150 इस्वी तक शासन किया था।<ref>{{cite journal |last1=Bracey |first1=Robert |title=The Date of Kanishka since 1960 (Indian Historical Review, 2017, 44(1), 1-41) |journal=Indian Historical Review |date=2017 |volume=44 |pages=1–41 |url=https://www.academia.edu/32448882 |language=en|url-access=registration}}</ref> यह अपने सैन्य, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों तथा कौशल हेतु प्रख्यात थे। इस सम्राट को [[भारतीय इतिहास]] एवं [[मध्य एशिया का इतिहास|मध्य एशिया के इतिहास]] में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान मिलता है।
कुषाण वंश के संस्थापक [[कुजुल कडफिसेस]] का ही एक वंशज कनिष्क प्रथम था। जो [[बख्त्रिया]] से इस साम्राज्य पर सत्तारूढ हुआ, जिसकी गणना एशिया के महानतम शासकों में की जाती है, क्योंकि इसका साम्राज्य [[तरीम बेसिन]] में तुर्फन से लेकर [[गांगेय मैदान]], [[पाकिस्तान]] और समस्त [[उत्तर भारत]] में [[बिहार]] एवं [[उड़ीसा]] तक आते हैं।<ref name="इन्स्टिजी">[http://instigy.com/tag/kushana इन्स्टिजी] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170215222234/http://instigy.com/tag/kushana |date=15 फ़रवरी 2017 }} पर कुषाण।अभिगमन तिथि: १५ फ़रवरी, २०१७</ref> इस साम्राज्य की मुख्य राजधानी [[पेशावर]] (वर्तमान में पाकिस्तान, तत्कालीन [[भारतवर्ष]] के) [[गंधार]] प्रान्त के नगर '''[[पुरुषपुर]]''' में थी। इसके अलावा दो अन्य बड़ी राजधानियां प्राचीन [[कापीसा प्रान्त|कपिशा]] में भी थीं।
उसकी विजय यात्राओं तथा [[बौद्ध धर्म]] के प्रति आस्था ने [[रेशम मार्ग]] के विकास तथा उस रास्ते गंधार से काराकोरम पर्वतमाला के पार होते हुए चीन तक [[महायान]] बौद्ध धर्म के विस्तार में विशेष भूमिका निभायी।<ref>{{Cite book|last=Dahiya|first=Poonam Dalal|url=https://books.google.com/books?id=tbU6DwAAQBAJ|title=ANCIENT AND MEDIEVAL INDIA EBOOK|date=2017-09-15|publisher=McGraw-Hill Education|isbn=978-93-5260-673-3|pages=278–281|language=en}}</ref>
पहले के इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क ने राजगद्दी 78 ई.पू में प्राप्त की एवं तभी इस वर्ष को [[शक संवत्]] के आरम्भ की तिथि माना जाता था। हालाँकि, इतिहासकारों की नवीन खोजों के अनुसार अब इस तिथि को कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि नहीं मानते हैं, इनका मनाना है कि कनिष्क 127 से 150 इस्वी तक शासन किया था।<ref>फाल्क (२००१), पृ. 121–136. फाल्क (२००४), पृ. 167–176.</ref>
== वंशावली ==
[[File:Kanishka enhanced.jpg|left|thumb|कनिष्क प्रथम, द्वितीय शताब्दी की मूर्ति, [[मथुरा संग्रहालय]]]]
कुषाणों का संबंध [[मध्य एशिया]] कि [[युएझ़ी]] जाती से था। कुषाण भारतवर्ष में पहली शताब्दी इस्वी में आकर बसे थे, इन्ही का वंशज को कनिष्क था।
[[चित्र:Yueh-ChihMigrations.jpg|thumb|समय के साथ [[मध्य एशिया]] में युएझ़ी लोगों का विस्तार, ल.178 ई.पू से 30 इस्वी तक]]
[[राजतरंगिणी]] का लेखक उन्हें तुरुष्क और आधुनिक विद्धान यूहूची व यूचियों की एक शाखा मानते हैं। चीनी इतिहासकारों ने एक राय इनके सम्बन्ध में यह दी है कि कुषाण लोग ‘हिंगनु’ लोग हैं। उनकी स्थानीय भाषा अभी अज्ञात है।
[[File:Rabatak inscription.jpg|thumb|रबातक शिलालेख, अफ़गानिस्तान]]
कुषाणों के [[रबातक शिलालेख|रबातक शिलालेखों]] में [[यूनानी लिपि]] का प्रयोग उस भाषा को लिखने के लिये किया गया है, जिसे [[आर्य]] ([[यूनानी भाषा|यूनानी]]:αρια) कहा गया है, जो कि [[एरियाना]] (आधुनिक [[अफ़गानिस्तान]], ईरान व उज़बेकिस्तान) की मूल भाषा बाख़्त्री का ही एक रूप है। यह एक [[मध्यकालीन]] पूर्वी ईरानियाई भाषा थी।<ref>Gnoli (2002), pp. 84–90.</ref> वैसे इस भाषा का प्रयोग कुषाणों द्वारा स्थानीय लोगों से सम्पर्क करने हेतु किया जाता होगा। कुषाण लोगों के कुलीन लोग किस भाषा विशेष का प्रयोग करते थे, ये अभी निश्चित नहीं है। यदि कुषाण एवं/या युएज़ी लोगों को [[तरीम बेसिन]] के अग्नि कुची (टॉर्चेरियाई) लोगों को जोड़ती विवादास्पद बातें सही हों, तो कनिष्क द्वारा टॉर्चेरियाई लोगों की भाषा – जो एक चेण्टम [[इण्डो-यूरोपियाई]] भाषा थी, बोली जाती रही होगी। (जहां अन्य ईरानियाई भाषाएं जैसे बैक्टीरियाई सेण्टम भाषाएं कहलाती हैं।)
[[File:WimaKadphises.JPG|thumb|[[विम कडफिसेस]] कनिष्क के पिता, [[ब्रिटिश संग्रहालय]]]]
कनिष्क प्रथम [[विम कडफिसेस]] का उत्तराधिकारी था, जैसा [[रबातक शिलालेख|रबातक शिलालेखों]] में कुषाण राजाओं की वंशावली द्वारा दृश्य है।<ref>Sims-Williams and Cribb (1995/6), pp.75–142.</ref><ref>Sims-Williams (1998), pp. 79–83.</ref> कनिष्क का अन्य कुषाण राजाओं से संबन्ध राबातक शिलालेखों में बताया गया है, इसी से कनिष्क के समय तक की वंशावली ज्ञात होती है। उसके प्रपितामह [[कुजुल कडफिसेस]] थे, [[विमा ताक्तु]] उसके पितामह थे। कनिष्क के पिता [[विम कडफिसेस]] थे, तत्पश्चात स्वयं कनिष्क आया।<ref>Sims-Williams and Cribb (1995/6), p. 80.</ref>
== दक्षिण एवं मध्य एशिया में विजय यात्राएं ==
[[File:Map of the Kushan Empire.png|thumb|कुशान साम्राज्य कनिष्क के शासन में अपने चरम विस्तार पर (राबातक शिलालेखों के अनुसार)]]
कनिष्क का साम्राज्य निस्सन्देह विशाल था। यह पाकिस्तान व भारत से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर स्थित अमु दरया के उत्तर में दक्षिणी उज़्बेकिस्तान एवं ताजिकिस्तान से लेकर दक्षिण-पूर्व में मथुरा तक फैला था। राबातक शिलालेखों के अनुसार यह पाटलिपुत्र एवं श्रीचम्पा तक विस्तृत था। उत्तरतम भारत में स्थित कश्मीर भी कनिष्क के अधीन ही था, जहां पर बारामुला दर्रे के निकट ही कनिष्कपुर नामक नगर बसाया गया था। यहाँ से एक बहुत बड़े स्तूप का आधार प्राप्त हुआ है।<ref>"The [[Rabatak inscription]] claims that in the year 1 Kanishka I's authority was proclaimed in India, in all the satrapies and in different cities like Koonadeano (Kundina), Ozeno ([[Ujjain]]), Kozambo (Kausambi), Zagedo ([[Saketa]]), Palabotro ([[Pataliputra]]) and Ziri-Tambo (Janjgir-Champa). These cities lay to the east and south of Mathura, up to which locality Wima had already carried his victorious arm. Therefore they must have been captured or subdued by Kanishka I himself." ''Ancient Indian Inscriptions'', S. R. Goyal, p. 93. See also the analysis of [[Sims-Williams]] and J. Cribb, who had a central role in the decipherment: "A new Bactrian inscription of Kanishka the Great", in ''Silk Road Art and Archaeology'' No. 4, 1995–1996. Also see, Mukherjee, B. N. "The Great Kushanan Testament", Indian Museum Bulletin.</ref>
[[File:Bronze coin of Kanishka found in Khotan.jpg|thumb|आधुनिक चीन के खोतान प्रान्त में मिले कनिष्क के सिक्के।]]
दक्षिण एशिया एवं रोम के बीच भूमि पथ ([[रेशम मार्ग]]) तथा समुद्री मार्ग दोनों पर ही अधिकार बनाये रखना कनिष्क का मुख्य लक्ष्य रहा था।
कनिष्क के मध्य एशिया पर आधिपत्य का ज्ञान अभी सीमित ही है। [[:w:Book of the Later Han|बुक ऑफ़ द लेटर हान, ''हौ हान्शु'']], से ज्ञात होता है कि, चीनी जनरल [[:w:Ban Chao|बान चाओ]] ने ९० ई में खोतान के निकट कनिष्क की ७०,००० सैनिकों की सेना से युद्ध किया, जिसका नेतृत्त्व कुशाण सेनाधिपति ज़ाई (Xie (चीनी: 謝) ने किया था।हालांकि बान चाओ ने विजयी होने का दावा किया है व साथ ही कुशानों की सेना को [[:w:scorched-earth|स्कॉर्च्ड अर्थ]] नीति के अन्तर्गत्त पीछे हटाया, किन्तु यह क्षेत्र द्वितीय शताब्दी के आरम्भ तक कुशानों के अधीन ही हो गया।<ref>Chavannes, (1906), p. 232 and note 3.</ref> परिणामस्वरूप, यह क्षेत्र (जब तक की चीनियों ने १२७ ई० में पुनः अधिकार प्राप्त नहीम कर लिया)<ref>Hill (2009), p. 11.</ref> कुशानों का साम्राज्य कुछ समय के लिये [[:w:Kashgar|कश्गार]], [[खोतान]] एवं [[:w:Yarkent County|यारकंद]] तक भी विस्तृत हुआ, जो कि पहले तरीम बेसिन के चीनी क्षेत्र (आधुनिक ज़िनजियांग) रहे थे। कनिष्क के समय के कई सिक्के तरीम बेसिन में पाये गए हैं।
==कनिष्क के सिक्के ==
[[File:Coin of Kanishka depicting Helios.jpg|thumb|300px|right|कनिष्क की स्वर्ण मुद्राएं, जिनमें यूनानी सूर्य देवता [[हेलिओज़]] का चित्र अंकित है। (ई. १२०).<br/>'''अग्र:''' कनिष्क भारी कुशाण अंगरखे व जूतों में सज्ज खड़े हुए, जिनके कंधों से ज्वाला निकल रही है, बाएं हाथ में मानक धारण किये हुए और वेदी पर आहूति देते हुए। यूनानी कथा ΒΑΣΙΛΕΥΣ ΒΑΣΙΛΕΩΝ ΚΑΝΗ''Ϸ''ΚΟΥ " कनिष्क का सिक्का, राजाओं के राजा "।<br/>'''पृष्ठ:''' हेलियोज़ यूनानी तरीके से खड़े हुए, बाएं हाथ से बैनेडिक्शन मुद्रा बनाए हुए। यूनानी लिपि में अंकित: ΗΛΙΟΣ ''हेलिओज़''। कनिष्क का राजचिह्न (''तमगा'') बायीं ओर।]]
कनिष्क की मुद्राओं में [[हिन्दू देवी देवता|भारतीय हिन्दू]], [[यूनानी धर्म|यूनानी]], [[ईरानी लोग|ईरानी]] और [[सुमेरिया|सुमेरियाई]] देवी देवताओं के अंकन मिले हैं, जिनसे उसकी धार्मिक सहिष्णुता का पता चलता है। उसके द्वारा शासन के आरम्भिक वर्षों में चलाये गए सिक्कों में यूनानी लिपि व भाषा का प्रयोग हुआ है तथा यूनानी दैवी चित्र अंकित मिले। बाद के काल के सिक्कों में बैक्ट्रियाई , ईरानि लिपि व भाषाओं में, जिन्हें वह बोलने में प्रयोग किया करता था, तथा यूनानी देवताओं के स्थान पर ईरानी देवता दिखाई देते हैं। सभी कनिष्क के सिक्कों में, यहाम तक कि उन सिक्कों में भी जो बैक्ट्रियाई में लिखे हैं, एक संशोधित यूनानी लिपि में लिखे गये थे, जिनमें एक अतिरिक्त उत्कीर्ण अक्षर (Ϸ) है, जो 'कु''श''आण' एवं 'कनि''ष''क' में प्रयुक्त /š/ (''श'') दर्शाता है।
सम्राट कनिष्क के सिक्के में सूर्यदेव बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है। सूर्य ईरानी राजसी वेशभूषा में एक लम्बे कोट पहने दाड़ी वाले दिखाये गए हैं, जिसके कन्धों से ज्वालाएं निकलती हैं। वह बड़े गोलाकार जूते पहनते है। उसे प्रायः वेदी पर आहूति या बलि देते हुए दिखाया जाता है। इसी विवरण से मिलती हुई कनिष्क की एक मूर्ति काबुल संग्रहालय में संरक्षित थी, किन्तु कालांतर में उसे तालिबान ने नष्ट कर दिया।<ref>वुड (२००२), illus. p. 39.</ref>
===यूनानी काल ===
कनिष्क के काल के आरम्भ के कुछ सिक्कों पर यूनानी भाषा एवं लिपि में लिखा है : ΒΑΣΙΛΕΥΣ ΒΑΣΙΛΕΩΝ ΚΑΝΗ''Ϸ''ΚΟΥ, ''बैसेलियस बॅसेलियॉन कनेश्कोऊ'' "कनिष्क के सिक्के, राजाओं का राजा" <br/>
इन आरम्भिक मुद्राओं में यूनानी नाम लिखे जाते थे:
* ΗΛΙΟΣ (''ēlios'', [[:w:Helios|हेलिओज़]]), ΗΦΑΗΣΤΟΣ (''ēphaēstos'', [[:w:Hephaistos|हेफास्टोज़]]), ΣΑΛΗΝΗ (''salēnē'', [[:w:Selene|सॅलीन]]), ΑΝΗΜΟΣ (''anēmos'', [[:w:Anemos|ऍनिमोस]])
===ईरानियाई/ इण्डिक काल ===
[[File:AdshoCarnelianSeal.jpg|thumb|250px|कुशान कार्नेलियाई मुहर, जिसमें ईरानियाई देवता आड्शो (ΑΘϷΟ यूनानी लिपि में मुद्रा लेख लिखे हैं) जिसमें बायीं ओर त्रिरत्न चिह्न एवं दायीं ओर कनिष्क का कुलचिह्न है। ये देवता एक प्याला लिये हुए हैं।]]
मुद्राओं पर बैक्ट्रियाई भाषा आने के साथ-साथ ही उन पर यूनानी देवताओं का स्थान ईरानियाई एवं इण्डिक(हिन्दू) देवताओं ने ले लिया:
* ΑΡΔΟΧ''Ϸ''Ο (''ardoxsho'', [[:w:Ashi Vanghuhi|आशी वनघुही]])
* ΛΡΟΟΑΣΠΟ (''lrooaspo'', [[:w:Drvaspa|द्रवस्प]])
* ΑΘ''Ϸ''Ο (''adsho'', [[:w:Atar|अत्तार]])
* ΦΑΡΡΟ (''pharro'', मानवीकृत [[:w:khwarenah|ख्वारेना]])
* ΜΑΟ (''mao'', [[:w:Mah|माह]])
* ΜΙΘΡΟ, ΜΙΙΡΟ, ΜΙΟΡΟ, ΜΙΥΡΟ (''mithro'', ''miiro'', ''mioro'', ''miuro'', variants of [[:w:Mithra|मित्र]])
* ΜΟΖΔΟΟΑΝΟ (''mozdaooano'', "[[:w:Ahura Mazda|माज़्दा]]-विजयी?")
* ΝΑΝΑ, ΝΑΝΑΙΑ, ΝΑΝΑ''Ϸ''ΑΟ (एशिया पर्यन्त ''Nana'', Sogdian ''nny'', ज़रथुस्ट्र सन्दर्भ में [[:w:Aredvi Sura Anahita|अरेद्वीसुर अनाहित]])
* ΜΑΝΑΟΒΑΓΟ (''manaobago'', [[:w:Vohu Manah|वोहु माना]] )
* ΟΑΔΟ (''oado'', [[:w:Vata-Vayu|वात या वायु]])
* ΟΡΑΛΑΓΝΟ (''orlagno'', [[:w:Verethragna|वीरेथ्राग्न]])
बहुत कम किन्तु कुछ बौद्ध देवताओं का अंकन किया गया:
* ΒΟΔΔΟ (''boddo'', [[गौतम बुद्ध|बुद्ध]]),
* ''Ϸ''ΑΚΑΜΑΝΟ ΒΟΔΔΟ (''shakamano boddho'', [[शाक्यमुनि बुद्ध]])
* ΜΕΤΡΑΓΟ ΒΟΔΔΟ (''metrago boddo'', बोधिसत्त्व [[मैत्रेय]])
इनके अलावा कुछ हिन्दू देवताओं के भी अंकन पाये जाते हैं:
* ΟΗ''Ϸ''Ο (''[[:w:oesho|oesho]]'', [[शिव]])। हाल की शोध से अनुमान लगाया जा रहा है कि ''oesho'' संभवतः [[अवस्ता|अवस्तन]] [[वायु देव|वायु]] होंगे, जिन्हें शिव से मिला लिया गया।<ref>Sims-Williams (online) ''Encyclopedia Iranica''.</ref><ref>H. Humbach, 1975, p.402-408. K. Tanabe, 1997, p.277, M. Carter, 1995, p. 152. J. Cribb, 1997, p. 40. References cited in ''De l'Indus à l'Oxus''.</ref>
==कनिष्क एवं बौद्ध धर्म ==
[[File:Coin of Kanishka I.jpg|thumb|300px|right| '''कनिष्क प्रथम''' की स्वर्ण मुद्रा (१२०ई.), जिसमें [[गौतम बुद्ध]] को दर्शाया गया है।<br/>'''आगे:''' कनिष्क खड़े हुए.., कुषाण कोट एवं लंबे जूते पहने, कंधे पर पंख जुड़े हुए हैं, अपने बाएं हाथ में मानक धारण करे हुए वेदी पर आहूति देते हुए। यूनानी लिपि में कुशाण भाषा का मुद्रालेखन (जिसमें कुशाण Ϸ "श" अक्षर प्रयुक्त है): ϷΑΟΝΑΝΟϷΑΟ ΚΑΝΗϷΚΙ ΚΟϷΑΝΟ ("शाओनानोशाओ कनिश्की कोशानो "): "राजाओं का राजा, कनिष्क कुशाण "।<br/>'''पीछे:''' यूनानी शैली में खड़े हुए बुद्ध, दाएं हाथ में अभय मुद्रा एवं बाएं हाथ में अपनी भूषा का छोर पकड़े हुए। यूनानी लिपि में : ΒΟΔΔΟ "बोद्दो", बुद्ध के लिये लिखा है। दाईं ओर कनिष्क का चिह्न: तमघा]]
कनिष्क बौद्ध धर्म में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित है, क्योंकि वह न केवल बौद्ध धर्म में विश्वास रखता था वरन् उसकी शिक्षाओं के प्रचार एवं प्रसार को भी बहुत प्रोत्साहन दिया। इसका उदाहरण है कि उसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध सन्गीति का आयोजन करवाया था, जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र एवं अश्वघोष द्वारा की गयी थी। इसी परिषद में बौद्ध धर्म दो मतों में विभाजित हो गये – हीनयान एवं महायान। इसी समय बुद्ध का २२ भौतिक चिह्नों वाला चित्र भी बनाया गया था।
[[File:Bodhisattava dedicated by Bhikshu Bala at Sarnath dated 123 CE.jpg|thumb|left| upright| कनिष्क के शासन का तृतीय वर्ष बाल बोधिसत्त्व को समर्पित रहा था।]]
उसने यूनानी-बौद्ध कला की प्रतिनिधित्व वाली [[गंधार कला]] को भी उतना ही प्रोत्साहन दिया जितना हिन्दू कला के प्रतिनिधित्व वाली मथुरा कला को दिया। कनिष्क ने निजी रूप से बौद्ध तथा फारसी दोनों की ही विशेषताओ अपना लिया था, किन्तु उसका कुछ झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था। कुषाण साम्राज्य की विभिन्न पुस्तको मे वर्णित बौद्ध शिक्षाओं एवं प्रार्थना शैली के माध्यम से कनिष्क के बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव का पता चलता है।
कनिष्क का बौद्ध स्थापत्यकला को सबसे बड़ा योगदान पेशावर का बौद्ध स्तूप था। जिन पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इसके आधार को १९०८-१९०९ में खोजा, उन्होंने बताया कि इस स्तूप का व्यास २८६ फ़ीट (८७ मी.) था। चीनी तीर्थयात्री [[ज़ुआनजांग]] ने लिखा है कि इस स्तूप की ऊंचाई ६०० से ७०० (चीनी) "फ़ीट" (= लगभग १८०-२१० मी या ५९१-६८९ फ़ीट) थी तथा ये बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ था।<ref>डॉब्बिन्स (१९७१)</ref> निश्चित रूप से ये विशाल अत्यन्त सुन्दर इमारत प्राचीन काल के आश्चर्यों में रही होगी।
कनिष्क को बौद्ध शास्त्री [[अश्वघोष]] के काफ़ी निकट बताया जाता है। यही बाद के वर्षों में उनके धार्मिक परामर्शदाता रहे थे। कनिष्क के राजतिलक के समय एवं जब कुशाण वंश की प्रथम सुवर्ण मुद्रा ढाली गयी थी, तब राजा के आध्यात्मिक सहालकार युज़ असफ़ थे।
===बौद्ध मुद्राएं ===
कनिष्क काल की बौद्ध मुद्राएं अन्य मुद्राओं की तुलना में काफ़ी कम थीं (लगभग सभी मुद्राओं का मात्र १प्रतिशत)। कई मुद्राओं में कनिष्क को आगे तथा बुद्ध को यूनानी शैली में पीछे खड़े हुए दिखाया गया था। कुछ मुद्राओं में शाक्यमुनि बुद्ध एवं मैत्रेय को भी दिखाया गया है। कनिष्क के सभी सिक्कों की तरह; इनके आकार व रूपांकन मोटे-मोटे, खुरदरे तथा अनुपात बिगड़े हुए थे। बुद्ध की आकृति हल्की सी बिगड़ी हुई, बड़े आकार के कानों वाली तथा दोनों पैर कनिष्क की भांति ही फ़ैलाये हुए, यूनानी शैली की नकल में दिखाये गए हैं।
कनिष्क के बौद्ध सिक्के तीन प्रकार के मिले हैं:
====खड़े हुए बुद्ध ====
[[File:BronzeBuddha.JPG|thumb|upright|left|कनिष्क के सिक्कों वाली बुद्ध की आकृति जैसे बुद्ध की कांस्य प्रतिमा, [[गंधार]], ३-४थी शताब्दी। बुद्ध ने यूनानी शैली में अपनी भूषा का बायां कोना हाथ में पकड़ा हुआ है, तथा अभय मुद्रा में हैं।]]
[[File:Kanishka Buddha detail.jpg|thumb| कनिष्क के सिक्कों में [[बुद्ध]] का चित्रण (जिसमें ΒΟΔΔΟ "बोद्दो" लिख है)]]
कुषाण के बुद्ध अंकन वाले मात्र छः स्वर्ण सिक्के हैं, इनमें से भी छठा एक प्राचीन आभूषण का मध्य भाग में जड़ा हुआ भाग था, जिसमें कनिष्क बुद्ध अंकित हैं, तथा हृदयाकार माणिक्यों के गोले से सुसज्जित है। कनिष्क प्रथम काल के सभी ऐसे सिक्के स्वर्ण में ढले हुए हैं; एवं दो भिन्न मूल्यवर्गों में मिले हैं: एक [[दीनार]] लगभग ८ ग्राम की, मोटे तौर पर रोमन ऑरस से मिलता हुआ, एवं एक चौथाई दीनार, लगभग २ ग्राम का, जो लगभग एक [[:w:obol (coin)|ओबोल]] के बराबर का है।)
बुद्ध को भिक्षुकों जैसे चोगे अन्तर्वसक, उत्तरसंग पहने, तथा ओवरकोट जैसी सन्घाटी पहने दिखाया गया है।
उनके कान अत्यधिक बड़े व लम्बे दिखाये गए है, जो किसी मुद्रा में प्रतीकात्मक रूप से अतिश्योक्त हैं, किन्तु बाद के कई गंधार की मूर्तियों (३-४थी शताब्दी ई.) में भी दिखाया गया है। उनके शिखास्थान पर एक बालों का जूड़ा भि बना हुआ है। ऐसा गंधार के बाद के बहुत से शिल्पों में देखने को मिलता है।
इस प्रकार कह सकते हैं कि, बुद्ध के सिक्कों में उनका रूप उच्च रूप से प्रतीकात्मक बनाया गया है, जो कि पहले के गंधार शिल्पाकृतियों से अलग है। ये गंधार शिल्प बुद्ध अपेक्षाकृत अधिक प्राकृतिक दिखाई देते थे। कई मुद्राओं में इनके मूंछ भी दिखाई गई है। इनके दाएं हाथ की हथेली पर चक्र का चिह्न है एवं भवों के बीच उर्ण(तिलक) चिह्न होता है। बुद्ध द्वारा धारण किया गया पूरा चोगा गंधार रूप से अधिक मिलता है, बजाय मथुरा रूप से।
==अन्य धार्मिक संबंध==
=== उपाधि===
कनिष्क ने देवपुत्र शाहने शाही की उपाधि धारण की थी। भारत आने से पहले कुषाण ‘बैक्ट्रिया’ में शासन करते थे, जो कि उत्तरी अफगानिस्तान एवं दक्षिणी उजबेगकिस्तान एवं दक्षिणी तजाकिस्तान में स्थित था और यूनानी एवं ईरानी संस्कृति का एक केन्द्र था।<ref name="इन्स्टिजी" /> कुषाण हिन्द-ईरानी समूह की भाषा बोलते थे और वे मुख्य रूप से मिहिर (सूर्य) के उपासक थे। सूर्य का एक पर्यायवाची ‘मिहिर’ है, जिसका अर्थ है, वह जो धरती को जल से सींचता है, समुद्रों से आर्द्रता खींचकर बादल बनाता है।
===मुद्राओं में अंकन===
सम्राट कनिष्क के सिक्कों पर,यूनानी भाषा और लिपि में मीरों ([[मिहिर]]) को उत्कीर्ण कराया था, जिससे संकेत मिलता है कि ईरान का सौर-पूजक सम्प्रदाय भारत में प्रवेश आया था। [[ईरान]] में मिथ्र या मिहिर पूजा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। भारतीय मुद्रा पर [[सूर्य]] का अंकन किसी शासक द्वारा प्रथम दृष्टया कनिष्क द्वारा हुआ था।<ref name="जागरण">{{cite web
| url = http://m.jagranjunction.com/2013/11/04/%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A4%BF-%E0%A4%9B%E0%A4%A0%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%9C/
| title = शकों की देन है मगध की छठपूजा!
| last = कृष्ण
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| website = जागरण जंक्शन
| publisher = [[दैनिक जागरण]]
| access-date = १५ फ़रवरी, २०१७
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| archive-date = 17 फ़रवरी 2017
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}}</ref> पुरुषपुर (वर्तमान [[पेशावर]]) के पास शाह जी की ढेरी नामक स्थान है, जहां कनिष्क द्वारा निमित एक बौद्ध स्तूप के अवशेषों से एक सन्दूक मिला जिसे ''कनिष्कास कास्केट'' बताया गया है। इस पर सम्राट कनिष्क के साथ [[सूर्य]] एवं [[चन्द्र]] के चित्र का अंकन हुआ है। इस सन्दूक पर कनिष्क के द्वारा चलाये गए शक संवत्सर का संवत का प्रथम वर्ष अंकित है।
===प्रतिमाएं===
[[मथुरा]] के सग्रहांलय में लाल बलुआपत्थर की अनेक सूर्य प्रतिमांए सहेजी हुई है, जो कुषाण काल ([[प्रथम शताब्दी]] से तीसरी शताब्दी ई) की है। इनमें भगवान सूर्य चार घोड़ों के रथ पर आरूढ़ हैं। वे सिंहासन पर बैठने की मुद्रा में पैर लटकाये हुये हैं। उनके दोनों हाथों में [[कमल]] पुष्प है और उनके दोनों कन्धों पर पक्षी गरूड़ जैसे दो पंख लगे हुए हैं। इन्हीं पंखों को कुछ इतिहासवेत्ताओं द्वारा ज्वाला भी बताया गया है। सूर्यदेव ''औदिच्यवेश'' अर्थात् ईरानी पगड़ी, कामदानी के चोगें और सलवार के नीचे ऊंचे ईरानी जूते पहने हैं। उनकी वेशभूषा बहुत कुछ, मथुरा से ही प्राप्त, सम्राट कनिष्क की बिना सिर की प्रतिमा जैसी है। भारत में ये सूर्य की सबसे प्राचीन मूर्तियां है। कुषाण काल से पूर्व की सूर्य की कोई प्रतिमा नहीं मिली है, अतः ये माना जाता है कि भारत में उन्होंने ही सूर्य प्रतिमा की उपासना आरम्भ की और उन्होंने ही सूर्य की वेशभूषा भी वैसी दी थी जैसी वो स्वयं धारण करते थे।<ref name="जागरण" />
भारत में प्रथम सूर्य मन्दिर की स्थापना मूलस्थान (वर्तमान [[मुल्तान]]) में कुषाणों द्वारा की गयी थी।<ref>[http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?volume=१८&objectid=DS405.1.I34_V18_041.gif मुल्तान सिटी - इम्पीरियल गैज़ेटियर ऑफ़ इम्पीरियल गॅज़ेटियर ऑफ़ इण्डिया, संस.१८, पृ.३५।]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}{{अंग्रेज़ी}}</ref><ref name="ReferenceA">अक्षय के मजूमदार, हिन्दू हिस्ट्री, पृ/५४। रूपा एण्ड कं.।{{अंग्रेज़ी}}</ref><ref name="पांचजन्य">{{cite web
| url = http://panchjanya.com/arch/2008/10/26/File17.htm
| title = इस्लामी देशों में भी होती थीसूर्य पूजा
| last = उमर वैश्य
| first = बनवारी लाल
| date =
| website = पांचजन्य.कॉम
| publisher =
| access-date = १६ फ़रवरी, २०१७
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| archive-url = https://web.archive.org/web/20121025234940/http://panchjanya.com/arch/2008/10/26/File17.htm
| archive-date = 25 अक्तूबर 2012
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}}</ref> पुरातत्वेत्ता ए. कनिंघम का मानना है कि मुल्तान का सबसे पहला नाम कश्यपपुर (कासाप्पुर) था और उसका यह नाम कुषाणों से सम्बन्धित होने के कारण पड़ा। भविष्य पुराण, साम्व एवं वराह पुराण के अनुसार भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने मुल्तान में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना की थी। किन्तु भारतीय ब्राह्मणों ने वहाँ पुरोहित का कार्य करने से मना कर दिया, तब नारद मुनि की सलाह पर साम्ब ने संकलदीप (सिन्ध) से मग ब्राह्मणों को बुलवाया, जिन्होंने वहाँ पुरोहित का कार्य किया।<ref name="जागरण" /> भविष्य पुराण के अनुसार मग ब्राह्मण जरसस्त के वंशज है, जिसके पिता स्वयं सूर्य थे और माता नक्षुभा मिहिर गोत्र की थी। मग ब्राह्मणों के आदि पूर्वज जरसस्त का नाम, [[छठी शताब्दी]] ई.पू. में, ईरान में [[पारसी धर्म]] की स्थापना करने वाले जुरथुस्त से साम्य रखता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डी.आर. भण्डारकर (1911 ई0) के अनुसार मग ब्राह्मणों ने सम्राट कनिष्क के समय में ही, सूर्य एवं अग्नि के उपासक पुरोहितों के रूप में, भारत में प्रवेश किया।<ref name="पांचजन्य" /> उसके बाद ही उन्होंने कासाप्पुर (मुल्तान) में पहली सूर्य प्रतिमा की स्थापना की। इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार कनिष्क ढीले-ढाले रूप के ज़र्थुस्थ धर्म को मानता था, वह मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के अतरिक्त अन्य भारतीय एवं यूनानी देवताओ उपासक था। अपने जीवन काल के अंतिम दिनों में बौद्ध धर्म में कथित धर्मान्तरण के बाद भी वह अपने पुराने देवताओ का सम्मान करता रहा।<ref name="जागरण" />
===भारतीय क्षेत्र===
दक्षिणी राजस्थान में स्थित प्राचीन भिनमाल नगर में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। मारवाड़ एवं उत्तरी गुजरात कनिष्क के साम्राज्य का हिस्सा रहे थे। भिनमाल के जगस्वामी मन्दिर के अतिरिक्त कनिष्क ने वहाँ ‘करडा’ नामक झील का निर्माण भी कराया था। भिनमाल से सात कोस पूर्व ने कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। कहते है कि भिनमाल के वर्तमान निवासी देवड़ा/देवरा लोग एवं श्रीमाली ब्राहमण कनक के साथ ही काश्मीर से आए थे। देवड़ा/देवरा, लोगों का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने जगस्वामी सूर्य मन्दिर बनाया था। राजा कनक से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ना गलत नहीं होगा।
कनिष्क ने भारत में कार्तिकेय की पूजा को आरम्भ किया और उसे विशेष बढ़ावा दिया। उसने कार्तिकेय और उसके अन्य नामों-विशाख, महासेना, और स्कन्द का अंकन भी अपने सिक्कों पर करवाया। कनिष्क के बेटे सम्राट हुविष्क का चित्रण उसके सिक्को पर महासेन 'कार्तिकेय' के रूप में किया गया हैं। आधुनिक पंचाग में सूर्य षष्ठी एवं कार्तिकेय जयन्ती एक ही दिन पड़ती है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[कुषाण राजवंश]]
* [[युएझ़ी लोग]]
* [[भारत का इतिहास]]
* [[शक|शक साम्राज्य]]
* [[गुप्त राजवंश]]
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
=== पुस्तक ===
# भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991,
# रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
# ए. कनिंघम आरकेलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864
# के. सी.ओझा, दी हिस्ट्री ऑफ फारेन रूल इन ऐन्शिऐन्ट इण्डिया, इलाहाबाद, 1968
# डी. आर. भण्डारकर, फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन (लेख), इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्ड X L 1911
# जे.एम. कैम्पबैल, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड 1 भाग 1, बोम्बे, 1896
# विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली, 1990
=== अन्य सन्दर्भ ===
{{टिप्पणीसूची|2}}
== संदर्भ ग्रन्थ ==
{{Commonscat|Kanishka|{{PAGENAME}} }}
* स्टेनकोनो : कारपस इंस्क्रिप्शनं इंडिकेरम्, भाग 2;
* रैप्सन : कैंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया, भाग 1;
* मजूमदार ऐंड पुसालकर : दि एज ऑव इंपीरियल यूनिटी;
* नीलकंठ शास्त्री : ए कांप्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑव इंडिया;
* गिशमान : वेगराम;
* स्मिथ : अर्ली हिस्ट्री ऑव इंडिया;
* बै. पुरी : कुषाणकालीन भारत (अप्रकाशित)
[[श्रेणी:कनिष्क| ]]
[[श्रेणी:भारत भारतीय बौद्ध]]
[[श्रेणी:कुषाण सम्राट]]
s83dpcwgawcoobv6ht53iocp8t19z0g
कारक
0
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6543597
6451889
2026-04-24T11:26:29Z
~2026-25115-84
921672
/* कर्ता कारक */
6543597
wikitext
text/x-wiki
क्रिया के साथ संज्ञा या सर्वनाम के सम्बंध को बताने वाले वर्णसमूह को '''कारक''' कहते हैं।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=F7QWEAAAQBAJ&pg=PA30|title=संस्कार हिन्दी व्याकरण|last=सिंह|first=अनुराधा|publisher=तुलसी साहित्य पब्लिकेशन्स|pages=30}}</ref> अर्थात् व्याकरण में संज्ञा या सर्वनाम शब्द की वह अवस्था जिसके द्वारा वाक्य में उसका क्रिया के साथ संबंध प्रकट होता है उसे कारक कहते हैं। संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया से सम्बन्ध जिस रूप से जाना जाता है, उसे कारक कहते हैं। कारक यह इंगित करता है कि वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का काम क्या है। कारक कई रूपों में देखने को मिलता है
विभिन्न भाषाओं में कारकों की संख्या तथा कारक के अनुसार शब्द का रूप-परिवर्तन भिन्न-भिन्न होता है। संस्कृत तथा अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं में आठ कारक होते हैं। [[जर्मन भाषा]] में चार कारक हैं।
'''कारक विभक्ति''' - संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के कारक अनुसार रूप-परिवर्तन को कहते हैं।
== कारक के भेद ==
कारक के निम्नलिखित '''आठ''' भेद होते हैं:
# '''कर्ता''' — ने
# '''कर्म''' — को
# '''करण''' — से, के द्वारा
# '''संप्रदान''' — के लिए
# '''अपादान''' — से (अलग होने पर)
# '''संबंध''' — का, के, की , रा, री, रे
# '''अधिकरण''' — में, पर
# '''संबोधन''' — हे! अरे! भो!
हिन्दी में इनके अर्थ स्मरण करने के लिए इस पद की रचना की गई हैं:
:कर्ता ने अरु कर्म को, करण रीति से जान।
:संप्रदान को, के लिए, अपादान से मान।।
:का, के, की, संबंध हैं, अधिकरणादिक में मान।
:रे! हे! हो! संबोधन, मित्र धरहु यह ध्यान।।
'''विशेष''' - कर्ता से अधिकरण तक विभक्ति चिह्न (परसर्ग) शब्दों के अंत में लगाए जाते हैं, किन्तु संबोधन कारक के चिह्न-हे, रे, आदि प्रायः शब्द से पूर्व लगाए जाते हैं।
=== कर्ता कारक ===
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया (कार्य) के करने वाले का बोध होता है वह ‘कर्ता’ कारक कहलाता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है। जैसे- 1. राम ने रावण को मारा। 2. लड़की स्कूल जाती है।
पहले वाक्य में क्रिया का कर्ता राम है। इसमें ‘ने’ कर्ता जताता है। इस वाक्य में ‘मारा’ भूतकाल की क्रिया है। ‘ने’ का प्रयोग प्रायः भूतकाल में होता है। दूसरे वाक्य में वर्तमानकाल की क्रिया का कर्ता लड़की है। इसमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं हुआ है।
काम करने वाले को कर्त्ता कहते हैं। जैसे – अध्यापक ने विद्यार्थियों को पढ़ाया।
इस वाक्य में ‘अध्यापक’ कर्ता है, क्योंकि काम करने वाला अध्यापक है।
;विशेष–
# भूतकाल में अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ भी ने परसर्ग नहीं लगता है। जैसे- वह हँसा।
# वर्तमानकाल व भविष्यतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है। जैसे- वह फल खाता है। वह फल खाएगा।
# कभी-कभी कर्ता के साथ ‘को’ तथा ‘से’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे- (अ) बालक को सोना चाहिए। (आ) सीता से पुस्तक पढ़ी गई। (इ) रोगी से चला भी नहीं जाता। (ई) उससे शब्द लिखा नहीं गया।
=== कर्म कारक ===
कार्य जिस पर हो रहा होता है, वह कर्म कहलाता है। इसका हिन्दी पर्याय ‘को’ है। यह चिह्न भी बहुत-से स्थानों पर नहीं लगता। कार्य का फल अर्थात प्रभाव जिस पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं;
* जैसे – राम ने आम को खाया। इस वाक्य में ‘आम’ कर्म है।
* जैसे – 1. मोहन ने साँप को मारा। 2. लड़की ने पत्र लिखा।
पहले वाक्य में ‘मारने’ की क्रिया का फल साँप पर पड़ा है। अतः साँप, कर्म कारक है। इसके साथ परसर्ग ‘को’ लगा है। दूसरे वाक्य में ‘लिखने’ की क्रिया का फल पत्र पर पड़ा। अतः पत्र, कर्म है। इसमें कर्म कारक का हिंदी पर्याय ‘को’ नहीं लगा।
=== करण कारक ===
संज्ञा आदि शब्दों के जिस रूप से क्रिया के करने के साधन का बोध हो अर्थात् जिसकी सहायता से कार्य संपन्न हो वह करण कारक कहलाता है। इसके हिन्दी पर्याय ‘से’ के ‘द्वारा’ है। जिसकी सहायता से कोई कार्य किया जाए, उसे करण कारक कहते हैं।
* जैसे – वह कलम से लिखता है। इस वाक्य में ‘कलम’ करण है, क्योंकि लिखने का काम कलम से किया गया है।
* जैसे – 1. अर्जुन ने जयद्रथ को बाण '''से''' मारा। 2.बालक गेंद '''से''' खेल रहे है।
पहले वाक्य में कर्ता अर्जुन ने मारने का कार्य ‘बाण’ से किया। अतः ‘बाण से’ करण पद है। दूसरे वाक्य में कर्ता बालक खेलने का कार्य ‘गेंद से’ कर रहे हैं। अतः ‘गेंद से’ करण पद है।
=== संप्रदान कारक ===
संप्रदान का अर्थ है-देना। अर्थात कर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है, अथवा जिसे कुछ देता है उसे व्यक्त करने वाले रूप को संप्रदान कारक कहते हैं। इसका हिन्दी पर्याय ‘के लिए’ है। जिसके लिए कोई कार्य किया जाए, उसे संप्रदान कारक कहते हैं। जैसे –
* मैं दिनेश के लिए चाय बना रहा हूँ। इस वाक्य में ‘दिनेश’ संप्रदान अवस्था में है, क्योंकि चाय बनाने का काम दिनेश के लिए किया जा रहा।
* 1'''.''' स्वास्थ्य '''के लिए''' सूर्य '''को''' नमस्कार करो। 2. माँ ने बच्चे '''को''' खिलौना दिया ।
इन दो वाक्यों में ‘स्वास्थ्य के लिए’ और ‘बच्चे को’ संप्रदान अवस्था में हैं।
=== अपादान कारक ===
संज्ञा के जिस रूप से एक वस्तु का दूसरी से ''अलग'' होना पाया जाए वह अपादान कारक कहलाता है। इसका हिन्दी पर्याय ‘से’ है। कर्त्ता अपनी क्रिया द्वारा जिससे अलग होता है, उसे अपादान कारक कहते हैं।
* जैसे – पेड़ से आम गिरा। इस वाक्य में ‘पेड़’ अपादान अवस्था में है, क्योंकि आम पेड़ से गिरा अर्थात अलग हुआ है।
* जैसे- 1. बच्चा छत '''से''' गिर पड़ा। 2. संगीता घर '''से''' चल पड़ी।
इन दोनों वाक्यों में ‘छत से’ और घर ‘से’ गिरने में अलग होना प्रकट होता है। अतः घर से और छत से अपादान अवस्था में हैं।
=== संबंध कारक ===
शब्द के जिस रूप से किसी एक वस्तु का दूसरी वस्तु से संबंध प्रकट हो वह संबंध कारक कहलाता है। इसका हिन्दी पर्याय ‘का’, ‘के’, ‘की’, ‘रा’, ‘रे’, ‘री’ है। ये हिन्दी सर्वनामों में अभी भी भिन्न कारक रूप में दिखाई देता है, जैसे – मैं → मेरा।
* उदाहरण – 1. यह राधेश्याम का बेटा है। 2. यह कमला की गाय है।
इन दोनों वाक्यों में ‘राधेश्याम का बेटे’ से और ‘कमला का’ गाय से संबंध प्रकट हो रहा है। अतः यहाँ संबंध अवस्था में हैं।
शब्द के जिस रूप से एक का दूसरे से संबंध पता चले, उसे संबंध कारक कहते हैं। जैसे – यह राहुल की किताब है।
इस वाक्य में ‘राहुल की’ संबंध अवस्था में है, क्योंकि यह राहुल का किताब से संबंध बता रहा है।
=== अधिकरण कारक ===
जिस शब्द से क्रिया के आधार का बोध हो, उसे अधिकरण कारक कहते हैं। जैसे – पानी में मछली रहती है।
इस वाक्य में ‘पानी में’ अधिकरण है, क्योंकि यह मछली के आधार पानी का बोध करा रहा है।
शब्द के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है उसे अधिकरण कहते हैं। इसके हिन्दी पर्याय ‘में’, ‘पर’ हैं। जैसे– 1. भँवरा फूलों पर मँडरा रहा है। 2. कमरे में टीवी रखा है।
इन दोनों वाक्यों में ‘फूलों पर’ और ‘कमरे में’ अधिकरण है।
=== संबोधन कारक ===
जिससे किसी को बुलाने अथवा पुकारने का भाव प्रकट हो उसे संबोधन कारक कहते है और संबोधन चिह्न (!) लगाया जाता है। जैसे- 1.अरे भैया! क्यों रो रहे हो? 2.हे गोपाल! यहाँ आओ।
इन वाक्यों में ‘अरे भैया’ और ‘हे गोपाल’! संबोधन कारक है।
जिस शब्द से किसी को पुकारा या बुलाया जाए उसे सम्बोधन कारक कहते हैं। जैसे –
हे राम! यह क्या हो गया।
इस वाक्य में ‘हे राम!’ सम्बोधन कारक है, क्योंकि यह सम्बोधन है।
यह हिन्दी संज्ञाओं में अभी भी जीवित है।
== हिन्दी में कारक ==
=== संज्ञा ===
हिन्दी में संज्ञाओं के तीन कारक होते हैं– 1. अविकारी, 2. इतर, 3. संबोधन।
इतर कारक परसर्गों से पहले आता है।
लड़का शब्द की विभक्ति-
{| class="wikitable"
! कारक
! एकवचन
! बहुवचन
|-----
| अविकारी || लड़का || लड़के
|-----
| इतर || लड़के || लड़कों
|-----
| संबोधन || लड़के || लड़को
|}
लड़की शब्द की विभक्ति-
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| अविकारी || लड़की || लड़कियाँ
|-----
| इतर || लड़की || लड़कियों
|-----
| संबोधन || लड़की || लड़कियो
|}
आदमी शब्द की विभक्ति-
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| अविकारी || आदमी || अदमी
|-----
| इतर || आदमी || आदमियों
|-----
| संबोधन || आदमी || आदमियो
|}
औरत शब्द की विभक्ति-
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| अविकारी || औरत || औरतें
|-----
| इतर || औरत || औरतों
|-----
| संबोधन || औरत || औरतो
|}
=== सर्वनाम ===
सर्वनाम पाँच कारक रूप में दिखाई देते हैं: 1. कर्ता, 2. कर्म, 3. संबंध, 4. कर्ता (भूतकाल सकर्मक), 5. इतर
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| कर्ता || मैं || हम
|-----
| कर्ता 2. || मैंने || हमने
|-----
| कर्म || मुझे || हमें
|-----
| संबंध || मेरा, मेरे, मेरी || हमारा, हमारे, हमारी
|-----
| इतर || मुझ || हम
|}
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| कर्ता || तू || तुम
|-----
| कर्ता 2. || तूने || तुमने
|-----
| कर्म || तुझे || तुम्हें
|-----
| संबंध || तेरा, तेरे, तेरी || तुम्हारा, तूम्हारे, तुम्हारी
|-----
| इतर || तुझ || तुम
|}
{| class="wikitable"
!कारक
!एकवचन
! बहुवचन
|-----
| कर्ता || यह, वह || ये, वे
|-----
| कर्ता 2. || इसने, उसने|| इन्होंने, उन्होंने
|-----
| कर्म || इसे, उसे || इन्हें, उन्हें
|-----
| संबंध || इसका..., उसका... || इनका..., उनका...
|-----
| इतर || इस, उस || इन, उन
|}
== विभिन्न भाषाओं में कारकों की संख्या ==
{| class="wikitable"
!भाषा
!कारकों की संख्या
!टिप्पणी
|-----
| [[हंगेरियाई भाषा|हंगेरियन ]] || align="center" |29 ||
|-----
| [[फ़िनिश भाषा|फिनिश]] || align="center" |15 ||
|-----
| [[बास्क भाषा|बास्क]] || align="center" |1000||
|-----
| [[असमिया भाषा|असमिया]] || align="center" |8 ||
|-----
| [[चेचन]] || align="center" |8 ||
|-----
| [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] || align="center" |8 || संस्कृत में विभक्ति 8 तथा कारक 6 होते है
|-----
| [[क्रोएशियन भाषा|क्रोएशियन]] || align="center" |7 ||
|-----
| [[पोलिश भाषा|पोलिश]] || align="center" |7 ||
|-----
| [[यूक्रेनी भाषा एवं साहित्य|यूक्रेनी]] || align="center" |7 ||
|-----
| [[लातिन भाषा|लैटिन]] || align="center" |6 ||
|-----
| [[स्लोवाक भाषा|स्लोवाकी]] || align="center" |6 ||
|-----
| [[रूसी भाषा|रूसी]] || align="center" |6 ||
|-----
| [[बेलारूसी]] || align="center" |7 ||
|-----
| [[यूनान|ग्रीक]] || align="center" |5 ||
|-----
| [[रोमानियाई भाषा|रोमानियन]] || align="center" |5 ||
|-----
| [[यूनानी भाषा|आधुनिक ग्रीक]] || align="center" |4 ||
|-----
| [[बुल्गारियाई भाषा|बुल्गारियन]] || align="center" |4 ||
|-----
| [[जर्मन भाषा|जर्मन]] || align="center" |4 ||
|-----
| [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]] || align="center" |3 ||
|-----
| [[अरबी भाषा|अरबी]] || align="center" |3 ||
|-----
| [[नार्वेजी]] || align="center" |2 ||
|-----
| [[प्राकृत]] || align="center" |6 ||
|}
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
{{Authority control}}
[[श्रेणी:आकृति-विज्ञान (भाषा)]]
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कश्मीरी विकिपीडिया
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2026-04-24T01:40:24Z
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6543478
wikitext
text/x-wiki
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'''कश्मीरी विकिपीडिया''' ({{Langx|ks|{{unq|کٲشُر وِکیٖپیٖڈیا}}}}) [[विकिपीडिया]] का [[कश्मीरी भाषा]] का संस्करण है। 29 सितंबर 2021 में, इस विकिपीडिया के लेखों की संख्या 1000 तक पहुंच गई थी।<ref>{{Cite web|title=Wikimedia Statistics|url=https://stats.wikimedia.org/#/ks.wikipedia.org/reading/total-page-views/normal&#124;bar&#124;2-year&#124;~total&#124;monthly|website=[[Wikimedia]]}}</ref><ref>{{Cite web |title=India's 23rd Regional Language Wikipedia Goes Live in Tulu |url=https://gadgets360.com/internet/news/indias-23rd-regional-language-wikipedia-goes-live-in-tulu-870353 |access-date=2022-03-19 |website=NDTV Gadgets 360 |date=8 August 2016 |language=en |archive-date=12 दिसंबर 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231212145209/https://www.gadgets360.com/internet/news/indias-23rd-regional-language-wikipedia-goes-live-in-tulu-870353 |url-status=dead }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |title=Kashmir language Makes it to Wikipedia |url=http://brighterkashmir.com//news/kashmir-language-makes-it-to-wikipedia |access-date=2022-03-19 |website=Brighter Kashmir}}</ref><ref>{{Cite web |last=Iflaq |first=Peerzada |date=2022-03-04 |title=Volunteers keeping Koshur alive! |url=https://kashmirreader.com/2022/03/05/volunteers-keeping-koshur-alive/ |access-date=2022-03-19 |website=Kashmir Reader}}</ref> {{currentmonth}} {{currentyear}} तक इस विकिपीडिया के {{NUMBEROF|ARTICLES|ks|N}} लेख हैं।
== सन्दर्भ ==
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{{भारतीय भाषा विकिपीडिया}}
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आल्मेरिया प्रान्त
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2026-04-23T15:27:43Z
चाहर धर्मेंद्र
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wikitext
text/x-wiki
{{स्पेन का प्रांत
|name = आल्मेरिया
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'''आल्मेरिया''' ([[स्पेनी भाषा|स्पेनी]]: Almería) दक्षिणी [[स्पेन]] में स्थित एक प्रान्त है। [[ग्रानडा]], [[मूर्सिया]] इसके सीमा प्रान्त हैं और [[भूमध्य सागर]] इसका सीमान्त सागर। इस प्रान्त का क्षेत्रफल ८,७६९ किमी<sup>२</sup> है जो तुलना के लिए भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ ज़िले का लगभग साढ़े-तीन गुना है। कुल जनसंख्या है ५,४६,४९९ (सन् २००२) और घनत्व है ६२.३२/किमी<sup>२</sup>। इसके भीतर १०१ नगरनिगम इकाइयाँ हैं। एल्मीरिया, दक्षिणी स्पेन के [[आंदालुसिया]] [[स्पेनी स्वायत्त समुदाय|स्वायत्त समुदाय]] का भाग है। इसकी राजधानी भी "आल्मेरिया" नाम का एक शहर ही है।
== भूगोल ==
आल्मेरिया में एक 50 किमी लम्बी "सिएर्रा दे लोस फ़िलाब्रेस" (Sierra de Los Filabres) नाम की पहाड़ों की शृंखला है जिसमें अल्मेरिया के सबसे ऊंचे पहाड़ हैं। इस प्रान्त में काबो दे गाता-नीहार (Cabo de Gata-Níjar) नाम का [[प्राकृतिक उद्यान]] भी है जिसमें यूरोप के सब से शुष्क इलाक़े पाए जाते हैं। यहाँ का [[मरुस्थल|रेगिस्तानी]], चट्टानी और पहाड़ी वातावरण [[वॅस्टर्न (शैली)|वॅस्टर्न शैली]] की फ़िल्में बनाने के लिए बिलकुल ठीक बैठता है क्योंकि यहाँ का क़ुदरती माहौल [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमेरिका]] के पश्चिमी भूभाग से मिलता-जुलता है। 1960 के दशक में यहाँ बहुत सी वॅस्टर्न फ़िल्में बनाई गई जिनके लिए रेगिस्तान में बहुत से बनावटी अमेरिकी क़स्बे बनाए गए।
आल्मेरिया की मुख्य नदी आन्दाराह नदी है।
== आल्मेरिया के दृश्य ==
<gallery>
File:Plataforma Solar.jpg|<div style="text-align: center;">आल्मेरिया का सौर उर्जा अनुसन्धान केंद्र
File:SierradelosFilabres.JPG|<div style="text-align: center;">सिएर्रा दे लोस फ़िलाब्रेस की पहाड़ शृंखला
File:Landschaft bei San Jose04.jpg|<div style="text-align: center;">काबो दे गाता-नीहार प्राकृतिक उद्यान, जहाँ बहुत सी [[वॅस्टर्न (शैली)|वॅस्टर्न शैली]] की फ़िल्में बनी हैं
File:Flughahn.jpg|<div style="text-align: center;">आल्मेरिया के तट से आगे भूमध्य सागर में पाई जाने वाली एक "फ़्लाइंग गरनार्ड" मछली
</gallery>
== उद्योग ==
आल्मेरिया में "प्लाताफ़ोर्मा सोलार दे अल्मेरिया" (Plataforma Solar de Almería) नाम का एक बड़ा सौर उर्जा अनुसन्धान केंद्र है। यहाँ [[खगोल शास्त्र|खगोलशास्त्रीय]] अनुसन्धान के लिए जर्मन-स्पैनिश तालमेल से बनी "कालार आल्तो [[वेधशाला]]" भी है। फ़्रांस की बड़ी मिशलिन कंपनी भी आल्मेरिया प्रान्त में एक औद्योगिक अनुसंधान केंद्र चलाती है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[आंदालुसिया]]
* [[वॅस्टर्न (शैली)]]
* [[स्पेन]]
{{स्पेन के प्रान्त}}
[[श्रेणी:स्पेन]]
[[श्रेणी:स्पेन के प्रान्त]]
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राष्ट्रीय उद्यान
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चाहर धर्मेंद्र
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विकि कड़ि
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wikitext
text/x-wiki
[[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]]
[[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]]
[[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]]
'''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक पारिस्थितिकी, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण संरक्षण के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं।
सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया।
हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व, जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा बोगद खान उउल पर्वत के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref>
प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया।
[[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है।
इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है।
यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है।
==परिभाषाएं==
[[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]]
[[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]]
[[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]]
वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref>
* इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है।
* इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं।
* इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है।
वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि
* ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके।
* इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
* केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके।
* इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं।
यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप,
* स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है।
* इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है,
* जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है।
* इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है।
* विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है।
* इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है,
* जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है।
इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई।
इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो।
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते।
इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है।
इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है।
===शब्दावली===
[[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]]
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते।
इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है।
==इतिहास==
===प्रारंभिक सन्दर्भ===
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref>
हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी।
इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref>
इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी===
[[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]]
प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी।
हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/>
प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका।
जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref>
इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था।
हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके।
===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन===
[[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]]
वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया।
हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था।
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref>
===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास===
[[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]]
“राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई।
हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया।
[[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]]
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref>
इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई।
[[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]]
यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था।
[[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]]
अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी।
[[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई।
इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है।
इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref>
कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई।
===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ===
विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref>
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया।
[[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग 1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]]
आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है।
==आर्थिक परिणाम==
कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
===पर्यटन===
राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे।
===कर्मचारी===
पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें।
रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/>
==चिंताएँ==
पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref>
किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है।
कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है।
वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है।
आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके।
==इन्हें भी देखें==
* [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]]
* [[जैव संरक्षण]]
* [[संरक्षण आंदोलन]]
* [[भूद्यान]]
* [[राष्ट्रीय स्मारक]]
* [[संधारणीय विकास]]
* [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]]
* [[संरक्षण (नैतिक)]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची|2}}
===सूत्रों का कहना है===
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages.
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages.
* शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}}
==अग्रिम पठन==
* क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080
* अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6
* एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }}
*{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}}
*{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}}
*{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}}
*{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}}
*{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}}
*{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}}
*{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}}
*{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}}
*{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}}
*{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}}
[[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]]
[[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]]
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चाहर धर्मेंद्र
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विकि कड़ि
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[[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]]
[[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]]
[[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]]
'''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक पारिस्थितिकी, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण संरक्षण के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं।
सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया।
हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व, जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref>
प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया।
[[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है।
इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है।
यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है।
==परिभाषाएं==
[[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]]
[[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]]
[[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]]
वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref>
* इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है।
* इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं।
* इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है।
वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि
* ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके।
* इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
* केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके।
* इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं।
यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप,
* स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है।
* इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है,
* जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है।
* इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है।
* विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है।
* इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है,
* जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है।
इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई।
इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो।
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते।
इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है।
इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है।
===शब्दावली===
[[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]]
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते।
इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है।
==इतिहास==
===प्रारंभिक सन्दर्भ===
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref>
हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी।
इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref>
इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी===
[[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]]
प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी।
हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/>
प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका।
जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref>
इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था।
हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके।
===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन===
[[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]]
वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया।
हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था।
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref>
===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास===
[[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]]
“राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई।
हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया।
[[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]]
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref>
इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई।
[[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]]
यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था।
[[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]]
अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी।
[[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई।
इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है।
इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref>
कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई।
===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ===
विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref>
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया।
[[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग 1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]]
आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है।
==आर्थिक परिणाम==
कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
===पर्यटन===
राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे।
===कर्मचारी===
पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें।
रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/>
==चिंताएँ==
पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref>
किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है।
कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है।
वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है।
आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके।
==इन्हें भी देखें==
* [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]]
* [[जैव संरक्षण]]
* [[संरक्षण आंदोलन]]
* [[भूद्यान]]
* [[राष्ट्रीय स्मारक]]
* [[संधारणीय विकास]]
* [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]]
* [[संरक्षण (नैतिक)]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची|2}}
===सूत्रों का कहना है===
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages.
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages.
* शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}}
==अग्रिम पठन==
* क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080
* अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6
* एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }}
*{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}}
*{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}}
*{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}}
*{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}}
*{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}}
*{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}}
*{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}}
*{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}}
*{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}}
*{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}}
[[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]]
[[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]]
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[[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]]
[[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]]
[[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]]
'''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक पारिस्थितिकी, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण संरक्षण के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं।
सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया।
हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व, जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref>
प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया।
[[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है।
इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है।
यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है।
==परिभाषाएं==
[[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]]
[[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]]
[[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]]
वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref>
* इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है।
* इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं।
* इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है।
वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि
* ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके।
* इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
* केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके।
* इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं।
यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप,
* स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है।
* इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है,
* जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है।
* इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है।
* विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है।
* इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है,
* जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है।
इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई।
इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो।
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते।
इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है।
इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है।
===शब्दावली===
[[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]]
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते।
इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है।
==इतिहास==
===प्रारंभिक सन्दर्भ===
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref>
हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी।
इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref>
इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी===
[[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]]
प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी।
हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/>
प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका।
जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref>
इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था।
हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके।
===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन===
[[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]]
वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया।
हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था।
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref>
===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास===
[[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]]
“राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई।
हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया।
[[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]]
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref>
इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई।
[[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]]
यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था।
[[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]]
अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी।
[[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई।
इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है।
इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref>
कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई।
===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ===
विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref>
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया।
[[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग 1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]]
आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है।
==आर्थिक परिणाम==
कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
===पर्यटन===
राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे।
===कर्मचारी===
पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें।
रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/>
==चिंताएँ==
पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref>
किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है।
कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है।
वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है।
आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके।
==इन्हें भी देखें==
* [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]]
* [[जैव संरक्षण]]
* [[संरक्षण आंदोलन]]
* [[भूद्यान]]
* [[राष्ट्रीय स्मारक]]
* [[संधारणीय विकास]]
* [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]]
* [[संरक्षण (नैतिक)]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची|2}}
===सूत्रों का कहना है===
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages.
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages.
* शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}}
==अग्रिम पठन==
* क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080
* अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6
* एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }}
*{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}}
*{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}}
*{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}}
*{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}}
*{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}}
*{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}}
*{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}}
*{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}}
*{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}}
*{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}}
[[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]]
[[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]]
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[[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]]
[[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]]
[[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]]
'''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक पारिस्थितिकी, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण संरक्षण के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं।
सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया।
हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, [[मेन रिज, टोबेगो|टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व]], जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref>
प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया।
[[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है।
इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है।
यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है।
==परिभाषाएं==
[[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]]
[[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]]
[[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]]
वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref>
* इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है।
* इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं।
* इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है।
वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि
* ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके।
* इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
* केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके।
* इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं।
यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप,
* स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है।
* इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है,
* जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है।
* इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है।
* विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है।
* इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है,
* जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है।
इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई।
इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो।
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते।
इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है।
इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है।
===शब्दावली===
[[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]]
प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते।
इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है।
==इतिहास==
===प्रारंभिक सन्दर्भ===
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref>
हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी।
इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref>
इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी===
[[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]]
प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी।
हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/>
प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका।
जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref>
इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था।
हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके।
===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन===
[[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]]
वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया।
हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था।
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref>
===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास===
[[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]]
“राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई।
हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया।
[[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]]
येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref>
इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई।
[[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]]
यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था।
[[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]]
अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी।
[[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई।
इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है।
इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref>
कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई।
===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ===
विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref>
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया।
[[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग 1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]]
आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है।
==आर्थिक परिणाम==
कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
===पर्यटन===
राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे।
===कर्मचारी===
पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें।
रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/>
==चिंताएँ==
पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref>
किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है।
कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है।
वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है।
आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref>
इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके।
==इन्हें भी देखें==
* [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]]
* [[जैव संरक्षण]]
* [[संरक्षण आंदोलन]]
* [[भूद्यान]]
* [[राष्ट्रीय स्मारक]]
* [[संधारणीय विकास]]
* [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]]
* [[संरक्षण (नैतिक)]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची|2}}
===सूत्रों का कहना है===
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages.
* {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages.
* शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}}
==अग्रिम पठन==
* क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080
* अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6
* एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }}
*{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}}
*{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}}
*{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}}
*{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}}
*{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}}
*{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}}
*{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}}
*{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}}
*{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}}
*{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}}
[[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]]
[[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]]
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कर्पूरी ठाकुर
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{{Infobox officeholder
| name = कर्पूरी ठाकुर
| image = Karpoori Thakur 1991 stamp of India.jpg
| caption = भारत के १९९१ के एक डाकटिकट पर कर्पूरी ठाकुर
| birth_date = {{Birth date|df=yes|1924|01|24}}
| birth_place = [[समस्तीपुर जिला|पितौंझिया]], [[बिहार और उड़ीसा प्रांत]], [[ब्रिटिश इंडिया]]
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| death_place =[[पटना]], [[बिहार]], [[भारत]]
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| order1 =
| office1 =[[बिहार के मुख्यमंत्री|ग्यारहवें मुख्यमंत्री, बिहार]]
| term_start
| predecessor1 = [[दरोगा प्रसाद राय]]
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| term_start2 = 24 जुन 1977
| term_end2 = 21 अप्रैल 1979
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| office3 = [[बिहार के उप मुख्यमंत्री|दुसरे उप मुख्यमंत्री, बिहार]]
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| 1blankname3 = मुख्यमंत्री
| 1namedata3 = [[महामाया प्रसाद सिन्हा]]
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| office4 = [http://education.nic.in/cd50years/g/12/1L/121L0101.htm शिक्षा मंत्री बिहार]
| term_start4 = 5 मार्च 1967
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| occupation = [[स्वतंत्रता सेनानी]], [[शिक्षक]], [[राजनीतिज्ञ]]
| awards = [[File:Bharat Ratna.jpg|35px]] [[भारत रत्न]] (2024)
|}}
'''कर्पूरी ठाकुर''' (24 जनवरी 1921 - 17 फरवरी 1988) [[भारत]] के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक एवं राजनीतिज्ञ थे। वे [[बिहार]] [[राज्य]] के दूसरे उपमुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री रहे।<ref name="cm.bih.nic.in">{{Cite web |url=http://cm.bih.nic.in/formercm-bihar.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=12 नवंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110319084817/http://cm.bih.nic.in/formercm-bihar.htm |archive-date=19 मार्च 2011 |url-status=dead }}</ref> लोकप्रियता के कारण उन्हें '''जननायक''' कहा जाता है। 23 जनवरी 2024 को उन्हें मरणोपरान्त भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारतरत्न]] से सम्मानित किया गया था।<ref>[https://www.amarujala.com/columns/opinion/karpuri-thakur-was-a-true-public-leader-our-governance-model-inspired-by-his-vision-pm-modi-on-bharat-ratna-2024-01-24 प्रधानमन्त्री मोदी : कर्पूरी ठाकुर सच्चे जननायक थे, उनकी दृष्टि से ही प्रेरित है हमारे शासन का मॉडल]</ref><ref>{{cite web | last=Sandilya | first=ThakurShaktilochan | title=जननायक कर्पूरी ठाकुर को मिला 'भारत रत्न' सम्मान, राष्ट्रपति भवन के समारोह में CM नीतीश कुमार भी रहे मौजूद | website=प्रभात खबर| date=30 मार्च 2024 | url=https://www.prabhatkhabar.com/state/bihar/bihar-former-cm-karpoori-thakur-bharat-ratna-award-2024-in-rashtrapati-bhavan-skt | language=hi | access-date=9 सितम्बर 2025}}</ref>
== व्यक्तिगत जीवन ==
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को भारत में ब्रिटिश शासन काल में [[समस्तीपुर जिला|समस्तीपुर जिले]] के पितौंझिया गाँव, जिसे अब 'कर्पूरीग्राम' कहा जाता है, में [[नाई (जाति) | नाई]] (ठाकुर) जाति में हुआ था।<ref>{{cite web | last=कुमार | first=प्रदीप | title=कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न: बिहार के कद्दावर नेता कैसे बने थे जननायक | website=BBC News हिंदी | date=23 जनवरी 2024 | url=https://www.bbc.com/hindi/articles/cnknyl5213do | language=hi | access-date=9 सितम्बर 2025}}</ref><ref name="George 2024 d826">{{cite web | last=George | first=Sarahbeth | title=Bharat Ratna to Karpoori Thakur: Why BJP, Nitish, Lalu, are racing to claim a piece of Jan Nayak's legacy | website=The Economic Times | date=24 January 2024 | url=https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/bharat-ratna-to-karpoori-thakur-why-bjp-nitish-lalu-are-racing-to-claim-a-piece-of-jan-nayaks-legacy/articleshow/107102562.cms?from=mdr | access-date=4 February 2024}}</ref><ref name="prabhatbooks.com"/><ref>{{Cite web |url=http://samastipur.bih.nic.in/eminent.aspx |title=संग्रहीत प्रति |access-date=30 नवंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150211024915/http://samastipur.bih.nic.in/eminent.aspx |archive-date=11 फ़रवरी 2015 |url-status=dead }}</ref> उनके पिताजी का नाम श्री गोकुल ठाकुर तथा माता जी का नाम श्रीमती रामदुलारी देवी था। इनके पिता गांव के सीमान्त [[किसान]] थे तथा अपने पारंपरिक पेशा बाल काटने का काम करते थे।
उन्होंने 1940 में मैट्रिक की परीक्षा [[पटना विश्वविद्यालय]] से द्वितीय श्रेणी में पास की। 1942 का [[भारत छोड़ो आंदोलन]] छिड़ गया तो उसमें कूद पड़े। परिणामस्वरूप 26 महीने तक [[भागलपुर]] के कैंप जेल में जेल-यातना भुगतने के उपरांत 1945 में रिहा हुए। 1948 में [[नरेन्द्र देव|आचार्य नरेन्द्रदेव]] एवं [[जयप्रकाश नारायण]] के समाजवादी दल में प्रादेशिक मंत्री बने। सन् 1967 के आम चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में [[संयुक्त समाजवादी दल (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी)]] (संसोपा ) बड़ी ताकत के रूप में उभरी। 1970 में उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1973-77 में वे लोकनायक जयप्रकाश के छात्र-आंदोलन से जुड़ गए। 1977 में समस्तीपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से सांसद बने। 24 जून, 1977 को पुनः मुख्यमंत्री बने। फिर 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ तो कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में लोक दल बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा और कर्पूरी ठाकुर नेता बने।
कर्पूरी ठाकुर सदैव दलित, शोषित और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहे और संघर्ष करते रहे। उनका सादा जीवन, सरल स्वभाव, स्पष्ट विचार और अदम्य इच्छाशक्ति बरबस ही लोगों को प्रभावित कर लेती थी और लोग उनके विराट व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित हो जाते थे। बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उसे प्रगति-पथ पर लाने और विकास को गति देने में उनके अपूर्व योगदान को सदैव स्मरण किया जाएगा।
कर्पूरी ठाकुर दूरदर्शी होने के साथ-साथ एक ओजस्वी वक्ता भी थे। आजादी के समय पटना की कृष्णा टॉकीज हॉल में छात्रों की सभा को संबोधित करते हुए एक क्रांतिकारी भाषण दिया कि "हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक फेंक देने से अंग्रेजी राज बह जाएगा" । इस भाषण के कारण उन्हें दण्ड भी झेलनी पड़ी थी।
वह देशवासियों को सदैव अपने अधिकारों को जानने के लिए जगाते रहे, वह कहते थे-
"संसद के विशेषाधिकार कायम रहें, अक्षुण रहें, आवश्यकतानुसार बढ़ते रहें। परंतु जनता के अधिकार भी। यदि जनता के अधिकार कुचले जायेंगे तो जनता आज-न-कल संसद के विशेषाधिकारओं को चुनौती देगी"
कर्पूरी ठाकुर का चिर परिचित नारा था..
: ''सौ में नब्बे शोषित हैं,शोषितों ने ललकारा है।
: ''धन, धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है॥
यह भी-
: ''अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो
: ''पग पग पर अड़ना सीखो
: ''जीना है तो मरना सीखो।
वह जन नायक कहलाते हैं। सरल और सरस हृदय के राजनेता माने जाते थे। सामाजिक रूप से पिछड़ी किन्तु सेवा भाव के महान लक्ष्य को चरितार्थ करती नाई जाति में जन्म लेने वाले इस महानायक ने राजनीति को भी जन सेवा की भावना के साथ जिया।<ref>{{cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/former-bihar-chief-minister-karpoori-thakur-to-be-awarded-bharat-ratna-posthumously-2492709-2024-01-23|title=Karpoori Thakur, former Bihar Chief Minister, conferred Bharat Ratna posthumously}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/india-news/karpoori-thakur-bihar-chief-minister-who-championed-social-justice-101696331907041.html|title=How Bihar’s caste survey seeks to build on the legacy of Karpoori Thakur}}</ref> उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जन नायक कहा जाता था, वह सदा गरीबों के अधिकार के लिए लड़ते रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पिछड़ों को 12 प्रतिशत [[बिहार में आरक्षण नीति|आरक्षण]] दिया मुंगेरी लाल आयोग के तहत् दिए और 1978 में ये आरक्षण दिया था जिसमें 79 जातियां थी।<ref>{{cite web|url=https://indianexpress.com/article/india/former-bihar-cm-socialist-icon-karpoori-thakur-bharat-ratna-9124253/|title=Two-time Bihar CM Karpoori Thakur to be conferred Bharat Ratna posthumously}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.thehindu.com/news/national/socialist-icon-karpoori-thakur-awarded-bharat-ratna-a-day-before-centenary/article67769726.ece|title=Socialist icon Karpoori Thakur awarded Bharat Ratna, a day before centenary}}</ref> इसमें पिछड़ा वर्ग के 12% और अति पिछड़ा वर्ग के 08% दिया था।<ref>{{cite web|url=https://hindi.news18.com/news/nation/upper-caste-reservation-mungerilal-commission-bihar-politics-bjp-narendra-modi-dlop-1645586.html|title=जानिए, सवर्णों के दस फीसदी आरक्षण की चर्चा के बीच कैसे आ गया 'मुंगेरीलाल'}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.jagran.com/uttar-pradesh/mau-11039795.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=12 नवंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150118080523/http://www.jagran.com/uttar-pradesh/mau-11039795.html |archive-date=18 जनवरी 2015 |url-status=live }}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.jagran.com/bihar/patna-city-karpuri-thakur-becomes-relevant-in-election-year-gave-first-upper-caste-reservation-in-india-jagran-special-18882410.html|title=कर्पूरी ठाकुर ने सबसे पहले दिया था सवर्ण आरक्षण, चुनावी साल में हुए विशेष प्रासंगिक}}</ref> उनका जीवन लोगों के लिया आदर्श से कम नहीं।<ref>{{Cite web |url=http://www.bhaskar.com/news/JHA-120857-2889511.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=12 नवंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20141112112825/http://www.bhaskar.com/news/JHA-120857-2889511.html |archive-date=12 नवंबर 2014 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.jagran.com/bihar/nalanda-10069786.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=12 नवंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150118082026/http://www.jagran.com/bihar/nalanda-10069786.html |archive-date=18 जनवरी 2015 |url-status=live }}</ref>
== राजनीतिक जीवन ==
1977 में कर्पुरी ठाकुर ने बिहार के वरिष्ठतम नेता [[सत्येन्द्र नारायण सिन्हा]] से नेतापद का चुनाव जीता और दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। लोकनायक [[जय प्रकाश नारायण]] एवं समाजवादी चिंतक डॉ [[राममनोहर लोहिया]] इनके राजनीतक गुरु थे। [[राम सेवक यादव]] एवं [[मधु लिमये]] जैसे दिग्गज साथी थे। [[लालू प्रसाद यादव]], [[नितीश कुमार]], [[राम विलास पासवान]] और [[सुशील कुमार मोदी]] के राजनीतिक गुरु हैं। बिहार में पिछड़ा वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था 1977 में की ।
सत्ता पाने के लिए 4 कार्यकम बने-
:1. [[अन्य पिछड़ा वर्ग|पिछड़े वर्ग]] का ध्रुवीकरण
:2. [[हिंदी]] का प्रचार प्रसार
:3. [[समाजवाद|समाजवादी]] विचारधारा
:4. [[कृषि]] का सही लाभ [[किसानों]] तक पहुंचाना।
सन १९६७ में जब वे पहली बार बिहार के उपमुख्यमन्त्री बने तब उन्होने बिहार में मैट्रिक परीक्षा पास करने के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इसके पीछे उनका सुचिंतित तर्क था। उस काल में अंग्रेजी के कारण अधिकांश लड़कियां मैट्रिक पास नहीं कर पाती थीं। इस कारण लड़कियों के विवाह में मैट्रिक की परीक्षा पास करना बड़ी अड़चन बन गया था। कर्पूरी ठाकुर ने इसका आकलन-अध्ययन कराया तो पता चला कि अधिकतर छात्र अंग्रेजी में ही अनुतीर्ण होते हैं। यह वह समय था जब छठी या आठवीं क्लास से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू होती थी। यानी अंग्रेजी का ज्ञान देर से शुरू होता था और मैट्रिक का परिणाम खराब होने का यह कारण बनता। इसी उद्देश्य से उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी विषय में पास करने की अनिवार्यता खत्म कर दी थी। इस प्रकार उन्होंने शिक्षा को आम लोगों तक पहुँचाया। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के सभी विभागों में [[हिंदी]] में काम करने को अनिवार्य बना दिया था।
==ईमानदार व्यक्तित्व ==
*कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था। ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए।
*जब करोड़ो रुपयों के घोटाले में आए दिन नेताओं के नाम उछल रहे हों, कर्पूरी जैसे नेता भी हुए, विश्वास ही नहीं होता। उनकी ईमानदारी के कई किस्से आज भी बिहार में आपको सुनने को मिलते हैं। उनसे जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए। उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।”
*कर्पूरी ठाकुर जब पहली बार उपमुख्यमंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री बने तो अपने बेटे रामनाथ को पत्र लिखना नहीं भूले। इस पत्र में क्या था, इसके बारे में रामनाथ कहते हैं, “पत्र में तीन ही बातें लिखी होती थीं- तुम इससे प्रभावित नहीं होना। कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में मत आना। मेरी बदनामी होगी।” रामनाथ ठाकुर इन दिनों भले राजनीति में हों और पिता के नाम का लाभ भी उन्हें मिला हो, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवन में उन्हें राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाने का काम नहीं किया।
* उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने संस्मरण में लिखा, “कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए देवीलाल ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से कहा था- कर्पूरीजी कभी आपसे पांच-दस हज़ार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना, वह मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा। बाद में देवीलाल ने अपने मित्र से कई बार पूछा- भई कर्पूरीजी ने कुछ मांगा। हर बार मित्र का जवाब होता- नहीं साहब, वे तो कुछ मांगते ही नहीं।
*कर्पूरी जी के मुख्यमंत्री रहते हुये ही उनके क्षेत्र के कुछ सामंती जमींदारों ने उनके पिता को सेवा के लिये बुलाया। जब वे बीमार होने के नाते नहीं पहुंच सके तो जमींदार ने अपने लठैतों से मारपीट कर लाने का आदेश दिया। जिसकी सूचना किसी प्रकार जिला प्रशाशन को हो गयी तो तुरन्त जिला प्रशाशन कर्पूरी जी के घर पहुंच गया और उधर लठैत पहुंचे ही थे। लठैतो को बंदी बना लिया गया किन्तु कर्पूरी ठाकुर जी ने सभी लठैतों को जिला प्रशाशन से बिना शर्त छोडने का आग्रह किया तो अधिकारीगणो ने कहा कि इन लोगों ने मुख्यमंत्री के पिता को प्रताडित करने का कार्य किया इन्हे हम किसी शर्त पर नही छोड सकते थे। कर्पूरी ठाकुर जी ने कहा " इस प्रकार के पता नही कितने असहाय लाचार एवं शोषित लोग प्रतिदिन लाठियां खाकर दम तोडते है काम करते है कहां तक, किस किस को बचाओगे। क्या सभी मुख्यमंत्री के मां बाप है। इनको इसलिये दंडित किया जा रहा है कि इन्होने मुख्यमंत्री के पिता को उत्पीड़ित किया है, सामान्य जनता को कौन बचायेगा। जाऔ प्रदेश के कोने कोने मे शोषण उत्पीड़न के खिलाफ अभियान चलाओ और एक भी परिवार सामंतों के जुल्मो सितम का शिकार न होने पाये" लठैतो को कर्पूरी जी ने छुडवा दिया। इस प्रकार वे पक्षपात एवं मानवता का मसीहा कहा जाना अतिश्योक्ति नहीं है।
*अस्सी के दशक की बात है. बिहार विधान सभा की बैठक चल रही थी. कर्पूरी ठाकुर विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे. उन्होंने एक नोट भिजवा कर अपने ही दल के एक विधायक से थोड़ी देर के लिए उनकी जीप मांगी. उन्हें लंच के लिए आवास जाना था.
उस विधायक ने उसी नोट पर लिख दिया, ‘मेरी जीप में तेल नहीं है. कर्पूरी जी दो बार मुख्यमंत्री रहे. कार क्यों नहीं खरीदते?’ यह संयोग नहीं था कि संपत्ति के प्रति अगाध प्रेम के चलते वह विधायक बाद के वर्षों में अनेक कानूनी परेशानियों में पड़े, पर कर्पूरी ठाकुर का जीवन बेदाग रहा.
*एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर रिक्शे से ही चलते थे. क्योंकि उनकी जायज आय कार खरीदने और उसका खर्च वहन करने की अनुमति नहीं देती
*कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद हेमवंती नंदन बहुगुणा उनके गांव गए थे. बहुगुणा जी कर्पूरी ठाकुर की पुश्तैनी झोपड़ी देख कर रो पड़े थे.
स्वतंत्रता सेनानी कर्पूरी ठाकुर 1952 से लगातार विधायक रहे, पर अपने लिए उन्होंने कहीं एक मकान तक नहीं बनवाया.
*सत्तर के दशक में पटना में विधायकों और पूर्व विधायकों के निजी आवास के लिए सरकार सस्ती दर पर जमीन दे रही थी. खुद कर्पूरी ठाकुर के दल के कुछ विधायकों ने कर्पूरी ठाकुर से कहा कि आप भी अपने आवास के लिए जमीन ले लीजिए.
कर्पूरी ठाकुर ने साफ मना कर दिया. तब के एक विधायक ने उनसे यह भी कहा था कि जमीन ले लीजिए.अन्यथा आप नहीं रहिएगा तो आपका बाल-बच्चा कहां रहेगा? कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि अपने गांव में रहेगा.
*कर्पूरी ठाकुर के दल के कुछ नेता अपने यहां की शादियों में करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं.पर जब कर्पूरी ठाकुर को अपनी बेटी की शादी करनी हुई तो उन्होंने क्या किया था? उन्होंने इस मामले में भी आदर्श उपस्थित किया.
1970-71 में कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे. रांची के एक गांव में उन्हें वर देखने जाना था. तब तक बिहार का विभाजन नहीं हुआ था. कर्पूरी ठाकुर सरकारी गाड़ी से नहीं जाकर वहां टैक्सी से गये थे. शादी समस्तीपुर जिला स्थित उनके पुश्तैनी गांव पितौंजिया में हुई.
कर्पूरी ठाकुर चाहते थे कि शादी देवघर मंदिर में हो, पर उनकी पत्नी की जिद पर गांव में शादी हुई. कर्पूरी ठाकुर ने अपने मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को भी उस शादी में आमंत्रित नहीं किया था.
यहां तक कि उन्होंने संबंधित अफसर को यह निर्देश दे दिया था कि बिहार सरकार का कोई भी विमान मेरी यानी मुख्य मंत्री की अनुमति के बिना उस दिन दरभंगा या सहरसा हवाई अड्डे पर नहीं उतरेगा. पितौंजिया के पास के हवाई अड्डे वहीं थे.आज के कुछ तथाकथित समाजवादी नेता तो शादी को भी ‘सम्मेलन’ बना देते हैं.
भ्रष्ट अफसर और व्यापारीगण सत्ताधारी नेताओं के यहां की शादियों के अवसरों पर करोड़ों का खर्च जुटाते हैं. कर्पूरी ठाकुर के जमाने में भी थोड़ा बहुत यह सब होता था, पर कर्पूरी ठाकुर तो अपवाद थे.
*हालांकि उनकी साधनहीनता भी उन्हें दो बार मुख्यमंत्री बनने से रोक भी नहीं सकी. 1977 में जेपी आवास पर जयप्रकाश नारायण का जन्म दिन मनाया जा रहा था.
पटना के कदम कुआं स्थित चरखा समिति भवन में, जहां जेपी रहते थे,देश भर से जनता पार्टी के बड़े नेता जुटे हुए थे. उन नेताओं में चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख शामिल थे.
मुख्यमंत्री पद पर रहने बावजूद फटा कुर्ता, टूटी चप्पल और बिखरे बाल कर्पूरी ठाकुर की पहचान थे.
उनकी दशा देखकर एक नेता ने टिप्पणी की, ‘किसी मुख्यमंत्री के ठीक ढंग से गुजारे के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए?’ सब निहितार्थ समझ गए. हंसे.
फिर चंद्रशेखर अपनी सीट से उठे. उन्होंने अपने लंबे कुर्ते को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर सामने की ओर फैलाया. वह बारी-बारी से वहां बैठे नेताओं के पास जाकर कहने लगे कि आप कर्पूरी जी के कुर्ता फंड में दान कीजिए. तुरंत कुछ सौ रुपए एकत्र हो गए.
उसे समेट कर चंद्रशेखर जी ने कर्पूरी जी को थमाया और कहा कि इससे अपना कुर्ता-धोती ही खरीदिए. कोई दूसरा काम मत कीजिएगा. चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कर्पूरी ठाकुर ने कहा, ‘इसे मैं मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दूंगा.’
यानी तब समाजवादी आंदोलन के कर्पूरी ठाकुर को उनकी सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था, पर आज के कुछ समाजवादी नेताओं को? कम कहना और अधिक समझना !
==सहज जीवनशैली के धनी==
कर्पूरी जी का वाणी पर कठोर नियंत्रण था। वे भाषा के कुशल कारीगर थे। उनका भाषण आडंबर-रहित, ओजस्वी, उत्साहवर्धक तथा चिंतनपरक होता था। कड़वा से कड़वा सच बोलने के लिए वे इस तरह के शब्दों और वाक्यों को व्यवहार में लेते थे, जिसे सुनकर प्रतिपक्ष तिलमिला तो उठता था, लेकिन यह नहीं कह पाता था कि कर्पूरी जी ने उसे अपमानित किया है। उनकी आवाज बहुत ही खनकदार और चुनौतीपूर्ण होती थी, लेकिन यह उसी हद तक सत्य, संयम और संवेदना से भी भरपूर होती थी। कर्पूरी जी को जब कोई गुमराह करने की कोशिश करता था तो वे जोर से झल्ला उठते थे तथा क्रोध से उनका चेहरा लाल हो उठता था। ऐसे अवसरों पर वे कम ही बोल पाते थे, लेकिन जो नहीं बोल पाते थे, वह सब उनकी आंखों में साफ-साफ झलकने लगता था। फिर भी विषम से विषम परिस्थितियों में भी शिष्टाचार और मर्यादा की लक्ष्मण रेखाओं का उन्होंने कभी भी उल्लंघन नहीं किया। सामान्य, सरल और सहज जीवनशैली के हिमायती कर्पूरी ठाकुर जी को प्रारंभ से ही सामाजिक और राजनीतिक अंतर्विरोधों से जूझना पड़ा। ये अंतर्विरोध अनोखे थे और विघटनकारी भी। हुआ यह कि आजादी मिलने के साथ ही सत्ता पर कांग्रेस काबिज हो गई। बिहार में कांग्रेस पर ऊंची जातियों का कब्जा था। ये ऊंची जातियां सत्ता का अधिक से अधिक स्वाद चखने के लिए आपस में लड़ने लगीं। पार्टी के बजाय इन जातियों के नाम पर वोट बैंक बनने लगे। सन 1952 के प्रथम आम चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर की कुछ संख्या बहुल पिछड़ी जातियों ने भी अलग से एक गुट बना डाला, जिसका नाम रखा गया ‘त्रिवेणी संघ’। अब यह संघ भी उस महानाटक में सम्मिलित हो गया।
शीघ्र ही इसके बुरे नतीजे सामने आने लगे। संख्याबल, बाहुबल और धनबल की काली ताकतें राजनीति और समाज को नियंत्रित करने लगीं। राजनीतिक दलों का स्वरूप बदलने लगा। निष्ठावान कार्यकर्ता औंधे मुंह गिरने लगे। कर्पूरी जी ने न केवल इस परिस्थिति का डटकर सामना किया, बल्कि इन प्रवृत्तियों का जमकर भंडाफोड़ भी किया। देश भर में कांग्रेस के भीतर और भी कई तरह की बुराइयां पैदा हो चुकी थीं, इसलिए उसे सत्ताच्युत करने के लिए सन 1967 के आम चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया गया। कांग्रेस पराजित हुई और बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। सत्ता में आम लोगों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ी। कर्पूरी जी उस सरकार में उप मुख्यमंत्री बने। उनका कद ऊंचा हो गया। उसे तब और ऊंचाई मिली जब वे 1977 में जनता पार्टी की विजय के बाद बिहार के मुख्यमंत्री बने। हुआ यह था कि 1977 के चुनाव में पहली बार राजनीतिक सत्ता पर पिछड़ा वर्ग को निर्णायक बढ़त हासिल हुई थी। मगर प्रशासन-तंत्र पर उनका नियंत्रण नहीं था। इसलिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग जोर-शोर से की जाने लगी। कर्पूरी जी ने मुख्यमंत्री की हैसियत से उक्त मांग को संविधान सम्मत मानकर एक फॉर्मूला निर्धारित किया और काफ़ी विचार-विमर्श के बाद उसे लागू भी कर दिया। इस पर पक्ष और विपक्ष में थोड़ा बहुत हो-हल्ला भी हुआ। अलग-अलग समूहों ने एक-दूसरे पर जातिवादी होने के आरोप भी लगाए। मगर कर्पूरी जी का व्यक्तित्व निरापद रहा। उनका कद और भी ऊंचा हो गया। अपनी नीति और नीयत की वजह से वे सर्वसमाज के नेता बन गए।
*कर्पूरी को कुछ लिखाते समय ही कर्पूरी ठाकुर को नींद आ जाती थी, तो नींद टूटने के बाद वे ठीक उसी शब्द से वह बात लिखवाना शुरू करते थे, जो लिखवाने के ठीक पहले वे सोये हुए थे।
==निधन==
वे राजनीति में कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक चालों को भी समझते थे और समाजवादी खेमे के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को भी। वे सरकार बनाने के लिए लचीला रूख अपना कर किसी भी दल से गठबंधन कर सरकार बना लेते थे, लेकिन अगर मन मुताबिक काम नहीं हुआ तो गठबंधन तोड़कर निकल भी जाते थे। यही वजह है कि उनके दोस्त और दुश्मन दोनों को ही उनके राजनीतिक फ़ैसलों के बारे में अनिश्चितता बनी रहती थी। कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था।
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
*[https://web.archive.org/web/20130125044322/http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/190148/comfortable-lifestyle-mastermind-karpoori-thakur.html सहज जीवनशैली के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर] (समय अलाइव)
*[https://web.archive.org/web/20140306140901/http://surendrakishore.blogspot.in/2009/02/blog-post_2862.html कर्पूरी ठाकुर लाचार थे अपने ही मंत्रियों के समक्ष ]
*[https://www.aajtak.in/bihar/story/100th-birth-anniversary-of-bharat-ratna-karpoori-thakur-he-was-cm-twice-did-politics-for-three-decades-yet-he-left-only-hut-as-his-inheritance-ntc-1865636-2024-01-24 ऐसे थे भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर]
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[[श्रेणी:बिहार के मुख्यमंत्री]]
[[श्रेणी:1924 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:१९८८ में निधन]]
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कान्हेरी गुफाएँ
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'''कान्हेरी गुफाएँ''' [[मुंबई]] शहर के पश्चिमी क्षेत्र में बसे में [[बोरीवली]] के उत्तर में स्थित हैं। ये [[संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान]] के परिसर में ही स्थित हैं और मुख्य उद्यान से ६ कि.मी. और बोरीवली स्टेशन से 7 कि.मी. दूर हैं। ये गुफाएं [[बौद्ध कला]] दर्शाती हैं। कान्हेरी शब्द कृष्णगिरी यानी काला पर्वत से निकला है।<ref name="ancient">{{cite web|url=http://www.bhramanti.com/kanheri.html.|title=कन्हेरी गुफाएं|publisher=|accessdate=2007-01-28|archive-date=12 मई 2001|archive-url=https://web.archive.org/web/20010512115631/http://bhramanti.com/kanheri.html|url-status=dead}}</ref> इनको बड़े बड़े बेसाल्ट की चट्टानों से तराशा गया है।<ref>{{cite web
|url=http://english.ohmynews.com/articleview/article_view.asp?menu=c10400&no=326138&rel_no=1
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|url-status=dead
}}</ref>
== परिचय ==
कान्हेरी का यह गिरिमंदिर मम्बई से लगभग 25 मील दूर [[सालसेट द्वीप]] पर अवस्थित पर्वत की चट्टान काटकर बना बौद्धों का [[चैत्य]] है। [[हीनयान]] संप्रदाय का यह चैत्यमंदिर आंध्रसत्ता के प्राय: अंतिम युगों में दूसरी शती ई. के अंत में निर्मित हुआ था। यह बना प्राय: कार्ले की परंपरा में ही हैं, उसी का सा इसका चैत्य हाल है, उसी के से स्तंभों पर युगल आकृतियों इसमें भी बैठाई गई हैं। दोनों में अतंर मात्र इतना है कि कान्हेरी की कला उतनी प्राणवान् और शालीन नहीं जितनी कार्ली की है। [[कार्ले की गुफा]] से इसकी गुफा कुछ छोटी भी है। फिर, लगभग एक तिहाई छोटी यह गुफा अपूर्ण भी रह गई है। इसकी बाहरी दीवारों पर जो [[बुद्ध]] की मूर्तियाँ बनी हैं, उनसे स्पष्ट है कि इसपर [[महायान]] संप्रदाय का भी बाद में प्रभाव पड़ा और हीनयान उपासना के कुछ काल बाद बौद्ध [[भिक्षु]]ओं का संबंध इससे टूट गया था जो [[गुप्त साम्राज्य|गुप्त काल]] आते-आते फिर जुड़ गया, यद्यपि यह नया संबंध महायान उपासना को अपने साथ लिए आया, जो बुद्ध और [[बोधिसत्त्व|बोधिसत्वों]] की मूर्तियों से प्रभावित है। इन मूर्तियों में बुद्ध की एक मूर्ति 25 फुट ऊँची है।
कान्हेरी के चैत्यमंदिर का प्लान प्राय: इस प्रकार है - चतुर्दिक् फैली वनसंपदा के बीच बहती जलधाराएँ, जिनके ऊपर उठती हुई पर्वत की दीवार और उसमें कटी कन्हेरी की यह गहरी लंबी गुफा। बाहर एक प्रांगण नीची दीवार से घिरा है जिसपर मूर्तियाँ बनी हैं और जिससे होकर एक सोपानमार्ग चैत्यद्वार तक जाता है। दोनों ओर द्वारपाल निर्मित हैं और चट्टानी दीवार से निकली स्तंभों की परंपरा बनती चली गई है। कुछ स्तंभ अलंकृत भी हैं। स्तंभों की संख्या 34 है और समूची गुफा की लंबाई 86 फुट, चौड़ाई 40 फुट और ऊँचाई 50 फुट है। स्तंभों के ऊपर की नर-नारी-मूर्तियों को कुछ लोगों ने निर्माता दंपति होने का भी अनुमान किया है जो संभवत: अनुमान मात्र ही है। कोई प्रमाण नहीं जिससे इनको इस चैत्य का निर्माता माना जाए। कान्हेरी की गणना पश्चिमी भारत के प्रधान बौद्ध गिरिमंदिरों में की जाती है और उसका वास्तु अपने द्वार, खिड़कियों तथा मेहराबों के साथ कार्ली की शिल्पपरंपरा का अनुकरण करता है।
==छविदीर्घा==
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Image:kanheri5.jpg|पहाड़ के आधार से गुफा का दृश्य
Image:Mumbai 03-2016 91 Kanheri Caves.jpg|गुफा सं,३
Image:Kanheri5.jpg|पर्वत पर गुफाएं
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Image:Kanheri6.jpg|गुफा ३
Image:Kanheri-vihara.jpg
Image:Mumbai 03-2016 93 Kanheri Caves.jpg
चित्र:Kanheri steps.jpg|चट्टान काटकर बनाये गये सोपान (सीढ़ियाँ), जो गुफा तक जातीं हैं।
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== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{commonscat|Kanheri Caves|कान्हेरी गुफाएं}}
* [http://mallar.wordpress.com/2010/03/17/कन्हेरी-की-गुफाएं/#comment-2709 कान्हेरी की गुफाएं] (हिन्दी ब्लॉग, मल्हार)
* [http://www.flickr.com/photos/himanshu_sarpotdar/sets/72157600124845223 कान्हेरी गुफाओं के चित्र]
* [http://www.mumbai.org.uk/kanheri-caves.html कान्हेरी गुफाएं, मुंबई] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090903095746/http://www.mumbai.org.uk/kanheri-caves.html |date=3 सितंबर 2009 }}
* [http://www.bhramanti.com/kanheri.html कान्हेरी गुफाएं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090615084707/http://www.bhramanti.com/kanheri.html |date=15 जून 2009 }}
* [http://www.bhramanti.com/locaves.gif गुफाओं का मानचित्र] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110707232649/http://www.bhramanti.com/locaves.gif |date=7 जुलाई 2011 }}
* [http://english.ohmynews.com/articleview/article_view.asp?menu=c10400&no=326138&rel_no=1 मुंबई की प्राचीन कान्हेरी गुफाएं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20080205041733/http://english.ohmynews.com/articleview/article_view.asp?menu=c10400&no=326138&rel_no=1 |date=5 फ़रवरी 2008 }}
* [http://www.tribuneindia.com/2006/20060402/spectrum/main2.htm मुम्बई में गुफाओं पर हमला]
{{मुंबई के निकट गुफाएँ}}{{मुंबई के दर्शनीय स्थल}}
{{मुंबई महानगरीय क्षेत्र}}
{{मुंबई}}
[[श्रेणी:भारत में बौद्ध मंदिर]]
[[श्रेणी:महाराष्ट्र में पर्यटन]]
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{{विषाणु
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}}
'''एफ्थोवायरस''' (अंग्रेज़ी: Aphthovirus) 'पिकोर्नाविरिडे' कुल के [[राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल|आर॰एन॰ए॰]] विषाणुओं का एक वंश है। इसका नाम ग्रीक शब्द "एफ्था" से लिया गया है, जिसका अर्थ '[[मुँह के छाले]]' होता है।
यह विषाणु मुख्य रूप से खुर वाले जानवरों, जैसे— [[गाय]], [[सुअर]], [[भेड़]] और [[बकरी]] को संक्रमित करता है। यह पशुओं में होने वाले अति-संक्रामक 'खुरपका-मुँहपका रोग' का प्रमुख कारण है।<ref name="sobrino1">{{cite book|title=Animal Viruses: Molecular Biology|author=Martinez-Salas|publisher=Caister Academic Press|year=2008|isbn=978-1-904455-22-6|chapter=Foot-and-Mouth Disease Virus|display-authors=etal|chapter-url=}}</ref>
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संरचनात्मक रूप से, एफ्थोवायरस आवरणहीन और आइकोसाहेड्रल होते हैं। इनका जीनोम एकल-रज्जुक सकारात्मक आर॰एन॰ए॰ का बना होता है। इनकी प्रतिकृति कोशिकाद्रव्य में होती है और ये संक्रमण के बाद कोशिका को नष्ट करके बाहर निकलते हैं।
== सन्दर्भ ==
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| वंश = एफ्थोवायरस
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'''एफ्थोवायरस''' (अंग्रेज़ी: Aphthovirus) 'पिकोर्नाविरिडे' कुल के [[राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल|आर॰एन॰ए॰]] विषाणुओं का एक वंश है। इसका नाम ग्रीक शब्द "एफ्था" से लिया गया है, जिसका अर्थ '[[मुंह के छाले|मुँह के छाले]]' होता है।
यह विषाणु मुख्य रूप से खुर वाले जानवरों, जैसे— [[गाय]], [[सुअर]], [[भेड़]] और [[बकरी]] को संक्रमित करता है। यह पशुओं में होने वाले अति-संक्रामक 'खुरपका-मुँहपका रोग' का प्रमुख कारण है।<ref name="sobrino1">{{cite book|title=Animal Viruses: Molecular Biology|author=Martinez-Salas|publisher=Caister Academic Press|year=2008|isbn=978-1-904455-22-6|chapter=Foot-and-Mouth Disease Virus|display-authors=etal|chapter-url=}}</ref>
<ref>{{Cite web|url=http://www.caister.com/avir|title=Animal Viruses: Molecular Biology|website=www.caister.com|language=en|access-date=2026-04-24}}</ref>इस रोगजनक विषाणु के सात प्रमुख सीरोटाइप (A, O, C, SAT 1, SAT 2, SAT 3 और Asia 1) होते हैं।
संरचनात्मक रूप से, एफ्थोवायरस आवरणहीन और आइकोसाहेड्रल होते हैं। इनका जीनोम एकल-रज्जुक सकारात्मक आर॰एन॰ए॰ का बना होता है। इनकी प्रतिकृति कोशिकाद्रव्य में होती है और ये संक्रमण के बाद कोशिका को नष्ट करके बाहर निकलते हैं।
== सन्दर्भ ==
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}}
'''एरेनावायरस''' (अंग्रेज़ी: Arenavirus) 'एरेनाविरिडे' कुल के [[राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल|आर॰एन॰ए॰]] विषाणुओं का एक वंश है। लैटिन भाषा में "एरेना" का अर्थ 'रेत' होता है। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखने पर इस विषाणु के भीतर मौजूद राइबोसोम रेत के कणों के समान प्रतीत होते हैं, जिसके कारण इसे यह नाम दिया गया है।<ref>{{Cite web|url=http://www.quimicaviva.qb.fcen.uba.ar/v5n1/garcia.htm|title=The C2H2 zinc finger is the classical zinc finger domain|website=www.quimicaviva.qb.fcen.uba.ar|access-date=2026-04-24}}</ref>
यह विषाणु मुख्य रूप से [[कृन्तक दाँत|कृन्तकों]] को संक्रमित करता है। मनुष्यों में यह संक्रमित कृन्तकों के मल-मूत्र या लार के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसके संक्रमण से मनुष्यों में 'लासा बुखार' और 'रक्तस्रावी ज्वर' जैसे गंभीर रोग उत्पन्न हो सकते हैं।<ref>{{cite web |publisher=Microsoft Encarta |title=Arenavirus |url=http://es.encarta.msn.com/encyclopedia_961537611/Arenavirus.html |archive-url=https://web.archive.org/web/20071119072709/http://es.encarta.msn.com/encyclopedia_961537611/Arenavirus.html |archive-date=19 नवम्बर 2007 |access-date=24 अप्रैल 2026}}</ref><ref>{{Citation|last=Pfau|first=Charles J.|title=Arenaviruses|date=1996|url=http://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK8193/|work=Medical Microbiology|editor-last=Baron|editor-first=Samuel|edition=4th|publisher=University of Texas Medical Branch at Galveston|isbn=978-0-9631172-1-2|pmid=21413313|access-date=2026-04-24}}</ref> इस वंश की मानक प्रजाति 'लिंफोसाइटिक कोरिओमेनिन्जाइटिस विषाणु' है।
== सन्दर्भ ==
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[[श्रेणी:एरेनाविरिडे]]
[[श्रेणी:विषाणुओं के वंश]]
[[श्रेणी:सूक्ष्मजैविकी]]
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कोट्टयम लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
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'''कोट्टायम लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र''' [[भारत]] के [[केरल]] राज्य का एक [[लोक सभा]] निर्वाचन क्षेत्र है। यह निर्वाचन क्षेत्र कोट्टायम ज़िले को आच्छादित करता है और राज्य के प्रमुख संसदीय क्षेत्रों में से एक है।
== इतिहास ==
कोट्टायम लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का गठन भारतीय संसदीय परिसीमन के अंतर्गत किया गया था। समय-समय पर परिसीमन के कारण इसके क्षेत्रीय दायरे में परिवर्तन हुए हैं।
== क्षेत्रीय संरचना ==
इस निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत कई विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र आते हैं, जो कोट्टायम जिले के विभिन्न भागों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
== प्रतिनिधित्व ==
इस निर्वाचन क्षेत्र से विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार समय-समय पर लोकसभा के लिए निर्वाचित होते रहे हैं।
== सन्दर्भ ==
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{{केरल के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र}}
[[श्रेणी:केरल के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र]]
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AMAN KUMAR
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[[Special:Contributions/~2026-25045-77|~2026-25045-77]] ([[User talk:~2026-25045-77|वार्ता]]) द्वारा किए गए बदलाव [[Special:Diff/6543444|6543444]] को पूर्ववत किया गया
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'''कोट्टयम लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र''' [[भारत]] के [[केरल]] राज्य का एक [[लोक सभा]] निर्वाचन क्षेत्र है।
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AMAN KUMAR
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लेख विस्तार किया तथा 2 संदर्भ भी जोड़े
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'''कोट्टयम लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र''' [[भारत]] के [[केरल]] राज्य का एक महत्वपूर्ण [[लोक सभा]] निर्वाचन क्षेत्र है। इस क्षेत्र के अंतर्गत कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के सात विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं— पीरावम, पाला, कडुथुरुथी, वाइकोम, एट्टूमानूर, कोट्टायम और पुथुपल्ली।<ref>{{Cite web|url=https://upload.indiacode.nic.in/showfile?actid=AC_CEN_3_20_00030_200233_1517807324510&type=order&filename=Delimitation%20Order,2008.pdf|title=Delimitation of Parliamentary and Assembly Constituencies Order, 2008|website=upload.indiacode.nic.in|access-date=2026-04-23}}</ref>
राजनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का गढ़ माना जाता है। 2024 के भारतीय आम चुनावों में, केरल कांग्रेस के उम्मीदवार के॰ फ्रांसिस जॉर्ज ने यहाँ से जीत दर्ज की और वर्तमान संसद सदस्य बने।<ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/kottayam-election-results-2024-kerala-kottayam-lok-sabha-elections-poll-result-updates-key-candidates-major-parties/articleshow/110673509.cms|title=Kottayam election results 2024 live updates: KEC's K Francis George wins|date=2024-06-07|work=The Times of India|access-date=2026-04-23|issn=0971-8257}}</ref> यह क्षेत्र अपनी साक्षरता हेतु विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
{{केरल के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र}}
[[श्रेणी:केरल के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र]]
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करन सिंह ग्रोवर
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{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
|name=करन सिंह ग्रोवर
|image=Karan Singh Grover at Rocky S collection Launch.jpg
|birth_date={{birth date and age|१९८२|०२|२३}}<ref>{{cite web|title=Unknown facts about Karan Singh Grover on his birthday, fans pray for his comeback|url=http://entertainment.oneindia.in/television/news/2014/unknown-facts-about-karan-singh-fans-pray-for-comeback-qubool-hai-132693.html|accessdate=31 July 2014|archive-url=https://web.archive.org/web/20140305080513/http://entertainment.oneindia.in/television/news/2014/unknown-facts-about-karan-singh-fans-pray-for-comeback-qubool-hai-132693.html|archive-date=5 मार्च 2014|url-status=live}}</ref>
|birth_place=[[दिल्ली]], [[भारत]]
|caption=ग्रोवर रॉकी एस के कलेक्शन लॉन्च पर
|residence=[[मुंबई]], [[भारत]]
|राष्ट्रीयता=[[भारतीय]]
|जातीयता=[[सिख]]
|occupation=[[भौतिक मॉडल|मॉडल]], [[अभिनेता]],
|जीवनसाथी=[[बिपाशा बसु]] (२०१६–वर्तमान)<ref>{{cite news|title=First Pics: Bipasha Basu and Karan Singh Grovers Mehendi|url=http://movies.ndtv.com/bollywood/first-pics-bipasha-basu-and-karan-singh-grovers-mehendi-1400743|accessdate=29 April 2016|agency=NDTV|archive-url=https://web.archive.org/web/20160430115620/http://movies.ndtv.com/bollywood/first-pics-bipasha-basu-and-karan-singh-grovers-mehendi-1400743|archive-date=30 अप्रैल 2016|url-status=live}}</ref>
|signature=Karan Singh Grover's Signature.jpg
|relatives=[[जस्करन सिंह]] (चचेरा भाई)
|प्रसिद्धि कारण=[[दिल मिल गए]]<br>[[क़ुबूल है]]<br>[[कसौटी जिदंगी के (२०१८ टीवी धारावाहिक)|कसौटी जिदंगी के]]<br>[[हेट स्टोरी 3|हेट स्टोरी ३]]
}}
'''करन सिंह ग्रोवर''' (जन्म २३ फ़रवरी १९८२) एक भारतीय लोकप्रिय मॉडल, टेलीविजन और फ़िल्म अभिनेता, प्रोड्यूसर है। उन्होंने अपने टेलीविजन करियर की शुरुआत [[एमटीवी इंडिया]] पर [[एकता कपूर]] के [[कितनी मस्त है ज़िंदगी]] की। उनको पहचान [[स्टार वन]] पर [[दिल मिल गए]] में डॉ॰ अरमान मल्लिक की भूमिका निभाने से मिली।
<ref>[http://timesofindia.indiatimes.com/TV_Buzz/I_get_almost_600_calls_every_day_Karan/articleshow/3174996.cms मुझे रोज़ 600 कॉल आती है : करन ]
''[[टाइम्स ऑफ इंडिया,]]'' 28 जून 2008</ref><ref>^ [http://timesofindia.indiatimes.com/TV_Buzz/Know_your_Karan_/articleshow/2309851.cms जानो अपने करन को ! - उसका अंदाज़ ] ''[[टाइम्स ऑफ इंडिया,]]'' 26 अगस्त 2007</ref>
== प्रारंभिक जीवन ==
करन [[अम्बाला]], [[हरियाणा]] के एक [[पंजाबी]] सिख परिवार के सदस्य है। करन का जन्म २३ फरवरी १९८२ को [[नई दिल्ली]], [[भारत]] में हुआ था।<ref>http://entertainment.oneindia.in/television/top-stories/news/2008/karan-singh-grover-cell-phone-300508.html {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20080609014047/http://www.robotstxt.org/ |date=9 जून 2008 }} करन सिंह ग्रोवर सेल फोन से दूर रहते है</ref> उनका परिवार कुछ समय बाद [[सउदी अरब|सऊदी अरब]] चला गया और वह बारह साल तक वहीँ रहे। उनका बचपन और स्कूली शिक्षा [[दम्माम|दम्मम]],[[सउदी अरब|सऊदी अरब]] में बीता। उनकी स्कूली शिक्षा '''इंटरनेशनल इंडियन स्कूल ऑफ दम्मम''' में हुई। सऊदी अरब में अपने कॉलेज के दिनों में उनका '''थाउसंड डेसिबल''' नाम का एक बैंड था। सन् २००० में वे मुंबई वापस चले गए और वहां उन्होंने होटल मेनेजमेंट में '''इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग टेक्नोलॉजी और एप्लाइड न्यूट्रिशन''' मुंबई, से डिग्री प्राप्त की।<ref name="करन">{{Cite web|url=http://getahead.rediff.com/movies/2008/jul/17karan.htm|title='I am just like Dr Armaan': Rediff.com Movies|date=6 मार्च 2010|website=web.archive.org|access-date=16 जून 2020|archive-date=6 मार्च 2010|archive-url=https://web.archive.org/web/20100306134422/http://getahead.rediff.com/movies/2008/jul/17karan.htm|url-status=bot: unknown}}</ref> अपनी डिग्री पूरी करने के बाद करन ओमान में मस्कट चले गए जहां पर उनका परिवार था और वहां '''शेरेटन होटल''' में उन्होंने विपणन अधिकारी के रूप में एक साल काम किया।<ref name="करन"/> बाद में उन्होंने भारत वापस आकर अभिनय में करियर बनाने की कोशिश की और २००४ में '''ग्लैडरैग्स मेगा मॉडल मैनहंट''' प्रतियोगिता में भाग लिया। उन्होंने अभिनय की शुरुआत [[एमटीवी इंडिया]] मे [[बालाजी टेलीफ़िल्म्स|बालाजी टेलीफिल्म्स]] के लिये, '''कितनी मस्त है ज़िंदगी''' के साथ की जिसके लिए उन्हें '''राष्ट्रव्यापी टेलेंट हंट''' मॆ चुनाया गया था। वर्तमान में करन के माता, पिता और भाई दिल्ली में रहते हैं। [[जस्करन सिंह]] जिन्होंने ''[[मिले जब हम तुम]]'' में उदय की भूमिका निभाई है वो करन के वास्तविक जीवन मे चचेरे भाई है।
== निजी जीवन ==
पहले २००५ से २००६ के मध्य तक वे भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री बरखा बिष्ट के साथ थे जो कि '' कितनी मस्त है ज़िंदगी'' में उनकी सह कलाकार थी।<ref>https://web.archive.org/web/20100102135015/http://movies.indiainfo.com/2007/12/20/0712200422_karan.html मैं अशिकमिज़ाज़ हूँ - करन</ref> उनकी सगाई भी हो गयी थी पर २००६ के मध्य में उनमे दरार आ गयी। अप्रैल २००७ में उन्होंने लोकप्रिय टीवी अभिनेत्री [[श्रद्धा निगम]] के साथ डेटिंग शुरू की।<ref>https://web.archive.org/web/20100923032711/http://www.tellychakkar.com/y2k8/dec/5dec/news_highlight.php श्रद्धा व करन ने शादी की।</ref> २ दिसम्बर २००८ मे इन दोनों ने [[गोवा]] के एक [[गुरुद्वारे]] में शादी कर ली। यह समांरोह एक व्यक्तिगत मामला था। विवाह १० महीने बाद तलाक में समाप्त हो गया।<ref>https://web.archive.org/web/20100405120602/http://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/tv-/Shraddha-Karan-part-ways/articleshow/5092639.cms श्रद्धा व करन अलग हुए</ref> ग्रोवर ने शादी कर ली जेनिफर विंगेट , पर ९ अप्रैल २०१२ लेकिन जोड़ी २०१४ में अलग हो गई। ग्रोवर ने शादी अभिनेत्री [[बिपाशा बसु]] से ३० अप्रैल २०१६ को। ग्रोवर स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक है और व्यायामशाला में नियमित रूप से काफी अभ्यास करते है। उन्हे टैटू बहुत पसंद है और उनके शरीर पर बहुत सी टैटूज है। ग्रोवर ने कहा है कि वह है धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है, और वह एक फिटनेस उत्साही है।
== टेलीविजन करियर ==
टेलीविजन में अभिनय के पहले उन्होंने [[मॉडलिंग]], रैंप शो, [[विज्ञापन]] और यहां तक एक [[रेडियो]] शो का आयोजन जैसे कार्य किये। बाद में उन्होंने 2004 में '''ग्लैडरैग्स मेगा मॉडल मैनहंट''' प्रतियोगिता में प्रवेश लिया और अंत में 'सर्वाधिक लोकप्रिय मॉडल' के लिए पुरस्कार हासिल किया।<ref name="करन" /> उसके बाद वह बालाजी टेलेफिल्म्स द्वारा एक राष्ट्रव्यापी प्रतिभा खोज प्रतियोगिता के माध्यम से पांच अन्य लोगों के साथ, एमटीवी के एक शो ''[[कितनी मस्त है ज़िंदगी]]'' मे पात्र के लिए चुने गए। इसके बाद ''प्रिंसेस डौली और उसका मेजिक बैग '' और अंततः ''[[कसौटी ज़िन्दगी के|कसौटी जिंदगी की]]'' में एक नकारात्मक भूमिका में अभिनय किया। उसके बाद उन्होंने [[सहारा वन]] पर ''[[सोलह सिंगार]]'' और [[सीआईडी (धारावाहिक)|सीआईडी]] मे छोटे किरदार और ''[[परिवार]]'' मे काम किया। उसके बाद उन्होंने ''[[दिल मिल गए]]'' मे डॉ॰ अरमान मलिक की भूमिका की जिसने उन्हें एक प्रसिद्ध अभिनेता के रूप मे उभारा। उन्होंने [[स्टार वन]] के यथार्थ टेलीविजन शो ''[[जरा नच के दिखा]]'' कार्यक्रम को प्रस्तुत किया। नृत्य के यथार्थ शो ''[[झलक दिखला जा|झलक दिखला जा सीज़न ३]]'' मे वह द्वितीय स्थान पर रहे। वर्तमान में वह [[कलर्स (टीवी चैनल)|कलर्स टीवी]] पर [[आईडिया रॉक्स इंडिया]] कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे है।
== टीवी शो ==
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" style="margin:1em 1em 1em 0;background:#f9f9f9;border:1px #aaa solid;border-collapse:collapse;font-size:90%"
|- bgcolor="#B0C4DE" align="center"
! वर्ष
! धारावाहिक
! भूमिका
! चैनल
! नोट्स
|-
| २००४ - २००५
| ''कितनी मस्त है ज़िंदगी''
| अर्नव देओल
| [[एमटीवी इंडिया]]
| करन का पहला धारावाहिक, कार्यक्रम के मुख्य पात्रों में से एक।
|-
| २००५
| ''प्रिंसेस ड़ॉली और उसका मैजिक बैग ''
| अमन
| [[स्टार प्लस]]
| काल्पनिक धारावाहिक, थोड़े समय के लिए भूमिका निभाई।
|-
| २००५-२००६
| ''[[कसौटी ज़िन्दगी के|कसौटी जिंदगी की]] ''
| शरद गुप्ता
| [[स्टार प्लस]]
| शुरू में [[जेनिफर विंगेट]] के सम्मुख सकारात्मक भूमिका और पात्रों की शादी के बाद नकारात्मक भूमिका।
|-
| २००६-२००७
| ''[[सोलह सिंगार]] ''
| अभिमन्यु
| [[सहारा वन]]
| शुरुआत में मुख्य पात्र मीरा के सम्मुख भूमिका। लेकिन बाद में कहानी बदल गयी और मीरा ने शादी कर ली। उनके पात्र ने 2007 के मध्य में थोड़े समय के लिए फिर से प्रवेश किया और अगस्त 2007 में ख़त्म हो गया।
|-
| २००७
| ''[[सीआईडी (धारावाहिक)|सीआईडी]]''
| राहुल और समीर (सिड)
| [[सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन]]
| केवल दो एपिसोड में. एक में वह विप्पतिग्रस्त और दूसरे में हत्यारे की भूमिका में थे।
|-
| २००७
| ''[[परिवार]]''
| अधिराज गिल
| [[ज़ी टीवी]]
| केवल एक सप्ताह के लिये संक्षिप्त भूमिका।
|-
| २००७ - २०१०
| ''[[दिल मिल गए]]''
| डॉ॰ अरमान मल्लिक
| [[स्टार वन]]
| मुख्य पुरुष पात्र।
|-
| २०१२
| ''[[तेरी मेरी लव स्टोरीज]]
| रघु
| [[स्टार प्लस]]
| केवल एक एपिसोड में.।
|-
| २०१२
| ''[[दिल दोस्ती डांस]]''
| प्रोफेसर करण मल्लिक
| [[चैनल व]]
| ।
|-
| २०१२-२०१३
| ''[[क़ुबूल है]]''
| असद अहमद खान
| [[ज़ी टीवी]]
| मुख्य पुरुष पात्र।
|-
| २०१९-२०२०
| ''[[कसौटी ज़िन्दगी के]]''
| श्री ऋषभ बजाज
| [[स्टार प्लस]]
| मुख्य पुरुष नकारात्मक भूमिका।
|}
== वास्तविकता शो ==
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|- bgcolor="#B0C4DE" align="center"
! वर्ष
! धारावाहिक
! भूमिका
! चैनल
! नोट्स
|-
| २००८
| ''[[नच बलिये|नच बलिये 3]]''
| खुद
| [[स्टार प्लस]]
| [[श्रद्धा निगम]] के साथ एक प्रकरण में विशेष नृत्य प्रदर्शन |
|-
| २००८
| ''[[ज़रा नचके दिखा|जरा नचके दिखा]]''
| प्रस्तुतकर्ता
| [[स्टार वन]]
| [[श्वेता गुलाटी]] के साथ इस शो का आयोजन किया |
|-
| २००९
| ''[[झलक दिखला जा]]''
| खुद
| [[सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन]]
| सीजन 3 मे नृत्य निर्देशक [[निकोल अल्वर]] के साथ त्तृतीय स्थान पर।
|-
| २००९
| ''आईडिया रोक्स इंडिया''
| प्रस्तुतकर्ता
| [[कलर्स (टीवी चैनल)|कलर्स टीवी]]
| [[मानसी पारेख]] के साथ इस शो के मेजबान की।
|-
|}
== वेब शो ==
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|- bgcolor="#B0C4DE" align="center"
! वर्ष
! धारावाहिक
! भूमिका
! चैनल
! नोट्स
|-
| टीबीए
| ''[[जुदाई (वेब धारावाहिक)]]''
|
| [[ऑल्ट बालाजी]]
|
|-
| २०१९
| ''[[बॉस - बाप ऑफ स्पेशल सर्विसेज (वेब धारावाहिक)]]''
| सुधीर कोहली
| [[ऑल्ट बालाजी]]
| करन का पहला वेब धारावाहिक, कार्यक्रम के मुख्य पात्र।
|-
|}
== विज्ञापन ==
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|- bgcolor="#B0C4DE" align="center"
! वर्ष
! विज्ञापन
! नोट्स
|-
| २००९
| ''रूपा फ्रंटलाइन''
| [[राजपाल यादव]] के साथ रूपा वेस्ट टीवी विज्ञापन।
|-
| २००९
| ''इंडियन जेम एंड ज्वेलरी ''
| पुरुषों के आभूषण कंपनी के लिए प्रिंट विज्ञापन।
|}
== फिल्मोग्राफी ==
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" style="margin:1em 1em 1em 0;background:#f9f9f9;border:1px #aaa solid;border-collapse:collapse;font-size:90%"
|- bgcolor="#B0C4DE" align="center"
! वर्ष
! मूवि
! भूमिका
! नोट्स
|-
| २००८
| ''[[भ्रमासक्ति|भ्रम]] ''
| मुख्य पात्र के मित्र
| प्रदर्शित, सूक्ष्म भूमिका |
|-
| २००८
| ''[[आई एम 24]]''
| चरित्र भूमिका
| 2008 के बाद से पूर्ण, प्रदर्शन प्रतीक्षित ; छोटी हास्य भूमिका।
|-
| २००९
| ''[[बट आदि लव्स संजना]]''
| दूसरा मुख्य पात्र
| मंदी के कारण हटाया, मूल रूप से करन सिंह ग्रोवर और हुसेन कुवाजेर्वाला के साथ मुख्य पात्र।
|-
| २००९
| ''[[भाग जॉनी]]''
| पुरुष मुख्य पात्र
| निर्माणाधीन ; [[विक्रम भट्ट]] द्वारा निर्मित और [[दीपक तिजॊरी]] द्वारा निर्देशित |
|}
== पुरस्कार ==
* ग्लैडरैग्स मेग हंट प्रतियोगिता २००४ मे ”मोस्ट पाप्युलर माडेल” पुरस्कार विजेता
* द कलाकार अवार्ड्स फौंडेशन द्वारा ”सबसे होनहार अभिनेता" पुरस्कार।<ref name="करन" />
== विवाद / अफवाहें ==
* अक्टूबर २००९ में यह खबर आई कि करन और उनकी पत्नी श्रद्धा अलग हो चुके है और करन ने उनका [[वर्सोवा, मुंबई]] [10] का घर छोड़ दिया है।<ref>^ [http://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/tv-/Shraddha-Karan-part-ways/articleshow/5092639.cms श्रद्धा और करन अलग हुए।] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100405120602/http://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/tv-/Shraddha-Karan-part-ways/articleshow/5092639.cms |date=5 अप्रैल 2010 }} ''[[टाइम्स ऑफ इंडिया,]]'' 6 अक्टूबर 2009</ref>
* नवम्बर २००९ में [[मुम्बई|मुंबई मिरर]] के अनुसार ''[[दिल मिल गए]]'' प्रोडक्शन हाउस [[सिनेविस्ता]] ने करन के खिलाफ '''सिने और टी वी आर्टिस्ट एसोसिएशन''' में शिकायत दर्ज कराई थी और उन पर देर से आने और वादे से कम शूटिंग का समय देने से हुए 2 करोड़ रुपयों के नुक्सान की वजह से मानहानि का मुकदमा करने का फैसला लिया है।<ref>https://web.archive.org/web/20091114104911/http://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/tv-/Karan-lands-in-legal-trouble/articleshow/5218644.cms कानूनी मुसीबत में करन</ref>
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{Commonscat|Karan Singh Grover|करन सिंह ग्रोवर}}
* {{IMDb name|2822547}}
* {{Twitter|iamksgofficial}}
{{Authority control}}
{{DEFAULTSORT:Grover, Karan Singh}}
[[श्रेणी:भारतीय अभिनेता]]
[[श्रेणी:भारतीय फ़िल्म अभिनेता]]
[[श्रेणी:भारतीय टेलिविज़न अभिनेता]]
[[श्रेणी:भारतीय सिख]]
[[श्रेणी:1982 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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| label34 = {{longitem|{{Wrap|[[Guthrie classification of Bantu languages|Guthrie code]]}}}}
| data34 = {{#if:{{{guthrie|}}}|<code>{{{guthrie}}}</code><ref name="Guthrie">Jouni Filip Maho, 2009. [https://web.archive.org/web/20180203191542/http://goto.glocalnet.net/mahopapers/nuglonline.pdf New Updated Guthrie List Online]</ref>}}
| label35 = [[Endangered Languages Project|ELP]]
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यह अधिकार विकि के अनुभवी एवं विश्वसनीय सदस्यों को दिया जाता है ताकि स्वतः स्थापित सदस्यों के स्तर तक सुरक्षित पृष्ठों और असुरक्षित पृष्ठों के सम्पादन करने पर उनके योगदान स्वतः ही परीक्षित चिह्नित हो जाएँ। अर्थात इनके संपादन स्वतः ही परीक्षित हो जाते है इसके लिये परीक्षक की आवश्यकता नहीं होगी।
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#विकि पर अच्छा संपादन अनुभव एवं अवधि
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;निवृति
#विकि नीतियों का निरंतर उल्लंघन
#अपने अधिकार का दुरुपयोग करना
# लगातार एक वर्ष तक २५ से कम सकारात्मक सम्पादन। <!--https://hi.wikipedia.org/w/index.php?oldid=2596064 के "सदस्य अधिकारों का पुनः वितरण" अनुभाग के अनुसार-->
;वर्तमान सदस्य
*वर्तमान स्वतः परीक्षित सदस्यों की सूची [{{fullurl:विशेष:ListUsers|group=autopatrolled}} यहाँ] पाई जा सकती है।
{{Center|<big>'''नामांकन'''</big>}}
नामांकन करने हेतु प्रारूप नीचे दिया गया है। इसे कॉपी करके सबसे अंतिम नामांकन के नीचे पेस्ट करें और सदस्य का नाम कखग के जगह भरें
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इन अधिकारों के लिए निवेदन करने या अन्य सदस्य को इसके लिए नामांकित करने से पहले कृपया [[विकिपीडिया:स्वतः परीक्षित सदस्य]] देखें। यदि प्रत्याशियों के पास [[विकिपीडिया:पुनर्निर्देशन|पुनर्निर्देशन]] एवं [[विकिपीडिया:बहुविकल्पी शब्द|बहुविकल्पी शब्दों]] को छोड़कर ''कम से कम'' '''25 नए लेख''' नहीं हैं, तो उन्हें ये अधिकार नहीं दिया जा सकता है। लेख में परीक्षकों द्वारा देखी जाने वाली समस्याओं नहीं होनी चाहिए। ध्यान दें कि ये अधिकार आपको '''लेख बनाने या उनकी परीक्षा करने में मदद नहीं कर सकते हैं'''।</noinclude>}}
=== [[सदस्य:राजकुमार|राजकुमार]] ===
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|user name = राजकुमार
|Purpose = माननीय नमस्कार! मैं काफ़ी समय से हिन्दी विकिपीडिया पर अपना योगदान दें रहा हूँ। मैंने कई सारे प्रष्ठ निर्मित किये है एवम कई सारे पहले से बने हुए पेज का विस्तार, स्त्रोत जोडना और बर्बरता हटाने जैसे कार्य किये हुए है। मुझे बर्बरता को हटाने के लिये रौलबेक का अधिकार भी दिया गया है जो मुझे काफी मदद कर रहा है। मै कई सारे सुरक्षित पृष्ठ पर भी सम्पादन करता हुँ परन्तु उसकी पुनरीक्षक या प्रबंधक द्वारा जाँच में काफी समय लग जाता है। इसलिये मैं चाहता हुं कि मुझे स्वतःपरीक्षित सदस्य का अधिकार दिया जाये ताकी मैरे द्वारा सम्पादन स्वतः ही परीक्षित चिह्नित हो जाएँ। धन्यवाद
}}
;स्वीकृति
;मत
* {{विरोध|असहमत}} (नीचे चर्चा देखें, सदस्य को पता नहीं कि ये क्या माँग रहे और क्यों माँग रहे) --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 14:44, 9 अक्टूबर 2024 (UTC)
;प्रश्न
* [[सदस्य:राजकुमार|राजकुमार]] जी, नमस्ते। आपके जाँचे हुए संपादन स्वतः ही परीक्षित चिह्नित हो जाने के बारे में आपका विशेषाग्रह क्यों है? हम आमतौर पर विश्वस्त एवं हिंदी भाषा के ऊपर अच्छी पकड़ रखने वाले और कुछ बेहतरीन लेख बनाने वाले संपादकों को यह अधिकार प्रदान करते हैं। यह अधिकार अपने आप में स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को भी अपने में समेटे हुए है। जब आप अभी (अपने ऊपर के अनुरोध में देखें) पृष्ठ और स्रोत जैसे शब्द सही नहीं लिख पा रहे, कैसे मान लिया जाय कि आप इस योग्य हैं कि आपको इस तरह की सुविधा दी जाये?<small>— इस [[विकिपीडिया:हस्ताक्षर|अहस्ताक्षरित]] संदेश के लेखक हैं -[[सदस्य:SM7|SM7]] ([[सदस्य वार्ता:SM7|वार्ता]] • [[विशेष:Contributions/SM7|योगदान]]){{#if:15:23, 5 अक्टूबर 2024 (UTC)| 15:23, 5 अक्टूबर 2024 (UTC)|}}</small><!-- साँचा:अहस्ताक्षरित -->
<!-- नया नामांकन इस लाइन के नीचे करें -->
:: नमस्ते! मैं समझता हूँ कि लेख के विवरण में त्रुटियों के बारे में आपका क्या कहना है। कभी-कभी मैं अपने संपादनों की जाँच करते समय इन त्रुटियों को देखता हूँ, और उन्हें ठीक करता हूँ, जिसे आप मेरे पुराने योगदानों में देख सकते हैं। अन्य संपादक भी इन गलतियों को पकड़ते हैं और सुधार करते हैं। ये छोटी-छोटी गलतियाँ मेरे द्वारा जोड़ी गई जानकारी को कम मूल्यवान नहीं बनाती हैं। मैंने पहली पंक्ति में "पृष्ठ" की वर्तनी गलत लिखी, लेकिन मैंने दूसरी पंक्ति में सही लिखा। यह गलती टाइप करते समय हो जाती है। जिस तरह आपने शुरू में "नमस्ते" की वर्तनी गलत लिखी और उसे ठीक किया, मैं भी अपनी गलतियों को ठीक करता हूँ, और कभी-कभी अन्य संपादक भी ऐसा करते हैं।<br>माननीय, मै जानता हूं कि स्थानांतरण का अधिकार कितना महत्वपूर्ण है, और मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि मैं उस अधिकार का उपयोग करते समय सावधान रहूँगा। [[User:राजकुमार|<span style="color: #E63E62;font-family:Georgia;">'''राज'''</span><span style="color: #414A4C;font-family:Georgia;">'''कुमार'''</span>]][[User talk:राजकुमार|<sup style="color: #E63E62">(talk)</sup>]] 01:47, 6 अक्टूबर 2024 (UTC)
:::[[सदस्य:राजकुमार|राजकुमार]] जी, पहला यही तो आपसे पूछा है। सभी के योगदान महत्वपूर्ण हैं छोटे भी और बड़े भी। तो क्या हर ऐसे छोटे सुधार करने वाले को यह अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि वो छोटे-छोटे सुधार करता है? ऐसे तो सैकड़ों संपादक त्रुटि देखकर उन्हें सुधारने की कोशिश करते हैं। सबसे बड़ी बात की इससे आपको क्या फ़ायदा जो यह अधिकार माँग रहे?
:::आपने यह भी लिखा है की आपको रोलबैकर अधिकार भी दिया गया है और आपको मदद मिल रही; मैंने देखा आपको यह अधिकार मिले अभी बमुश्किल 10 दिन हुए हैं। इससे व को भी लाभ मिल रहा और आपके रोलबैक सही हो रहे हैं, कम से कम इसकी प्रतिष्ठा तो हो लेने दें। या केवल अधिकार माँगने की कोई जल्दी पड़ी है?
:::''स्त्रोत'' भी टाइपो के कारण लिखा था? अगर आप वाकई अपनी ग़लतियाँ सुधारते हैं तो आपको टोके जाने के बाद तो उन्हें ऊपर संदेश में सुधार ही लेना चाहिए था। दो उदाहरणों के अलावा और भी कई तथाकथित टाइपो दिख रहे हैं। मैं किसी तरह से आश्वस्त नहीं कि ऐसा हो सकता है की कोई ''स्रोत'' को टाइपो के कारण ''स्त्रोत'' लिख दे।--[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 09:20, 6 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::माननीय, इस अधिकार से क्या फायदा है यह मैंने उद्देश्य में स्पष्ट किया है। मुझे पिछला अधिकार नामांकन के 6 महीने बाद मिला था, इसलिए ऐसा नहीं है कि मैं किसी अधिकार के लिए जल्दी में हूँ। रोलबैक अधिकार और स्व-परीक्षित अधिकार के कार्य अलग-अलग हैं, और मुझे समझ में नहीं आया कि आप यह क्या कहना चाहते है, शायद यह कि रोलबैक अधिकार से किये गये योगदान के आधार पर स्व-परीक्षित अधिकार मिलना चाहिये ।<br>स्रोत और स्त्रोत में सिर्फ एक अतिरिक्त t का इस्तेमाल से गलती हुई है जो एक टाइपो में गलती के कारण हुआ है। मैंने ऊपर दिए गए संदेश को सही नहीं किया क्योंकि आपका प्रश्न उसी गलती के बारे में था, जिसे अन्य प्रशासकों के लिए जानना महत्वपूर्ण था।<br>विकिपीडिया पर योगदानकर्ताओं की कमी के कारण, यह अधिकार उन लोगों को दिया जाना चाहिए जो लंबे समय से हिंदी विकिपीडिया में सकारात्मक योगदान दे रहे हैं जो पुनरीक्षक को जाचँ में देरी होने के बाद भी लेख को सुधार सके जिसे पाठकों को जल्द ही दिखे। [[User:राजकुमार|<span style="color: #E63E62;font-family:Georgia;">'''राज'''</span><span style="color: #414A4C;font-family:Georgia;">'''कुमार'''</span>]][[User talk:राजकुमार|<sup style="color: #E63E62">(talk)</sup>]] 05:09, 7 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::[[सदस्य:राजकुमार|राजकुमार]] जी, आपने जो उद्देश्य में स्पष्ट किया है वो मुझे बिलकुल नहीं समझ में आ रहा। इसीलिए पूछ रहा हूँ। आपके संपादन स्वतः परीक्षित चिह्नित हों या न हों इससे आपको क्या दिक्कत है? अगर चिह्नित नहीं हो रहे तो यह प्रबंधकों और पुनरीक्षक लोगों की समस्या है। पुनरीक्षक की जाँच में देरी से आपको कौन सी समस्या हो रही?--[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 13:26, 7 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::: माननीय, अगर प्रबंधक और पुनरीक्षक को लगता है की मेरे द्वारा सम्पादन में बर्बरता नही है या मैं जानकारी गलत नही जोड़ता हूं तो स्वतः परीक्षित अधिकार देने से भी कोई दिक्कत नही हैं। <br>मुझे लगता है आप जाँच में देरी को एक समस्या मानते ही नही। फिर भी मैं आपको कहना चाहता हूं कि मुझे पुनरीक्षक का अधिकार नही चाहिए।<br>मैंने स्वतः परीक्षित के अधिकार के लिये नामांकन किया है। [[User:राजकुमार|<span style="color: #E63E62;font-family:Georgia;">'''राज'''</span><span style="color: #414A4C;font-family:Georgia;">'''कुमार'''</span>]][[User talk:राजकुमार|<sup style="color: #E63E62">(talk)</sup>]] 04:58, 8 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::::[[सदस्य:राजकुमार|राजकुमार]] जी, तो अपने अनुरोध में यही लिख देते साफ़-साफ़ की आप बर्बरता नहीं करते और सही जानकारी जोड़ते हैं, सुधार करते हैं - इसलिए आपको यह अधिकार दिए जाने में कोई दिक्कत नहीं - इसलिए दिया जाय। बेमतलब पुनरीक्षक जाँच इत्यादि का हवाला देने की क्या आवश्यकता थी? क्यों बहाना बना रहे की पुनरीक्षक जाँच नहीं करते इसलिए आपको यह अधिकार चाहिए?
::::::और सच में मुझे अभी तक समझ में नहीं आया की आप के संपादन की जाँच पुनरीक्षक नहीं करते तो इससे आपको क्या परेशानी है। वो जाँच पुनरीक्षण करने वालों की समस्या है। जब पुनरीक्षक लोगों को लगेगा की आपके संपादन जाँचने की ज़रूरत नहीं है तो वो स्वतः आपको इस अधिकार के लिए नामांकित कर देंगे। आप इसे माँग क्यों रहे यह तो बताइये।--[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 15:58, 8 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::::: माननीय, मैंने बार बार बताया हैं कि मुझे यह अधिकार चाहिए। एक बार फिर - कई सारे ऐसे पृष्ठ होते है जिन पर बर्बरता सामान्य रुप से अधिक होती हैं। इसलिये प्रबंधक उन लेख को पुनरीक्षक के स्तर पर सुरक्षित कर देते है जो केवल पुनरीक्षकों की अनुमति के बाद ही अपडेट होते है। हिन्दी विकिपीडिया पर योगदानकर्ताओं की कमी के कारण यहा पुनरीक्षक भी कम हैं और कई सारे पुनरीक्षक दुसरे कार्यो में व्यस्त रहने के कारण लेखों कि जाँच में काफी समय लग जाता है। कई बार जानकारी अपडेट होने में काफ़ी समय लग जाता हैं। मैंरे द्वारा किये गये सकारात्मक योगदान को देखकर मुझे यह अधिकार दिया जाये ताकि मैंरे द्वारा सम्पादन स्वतः ही परीक्षित चिह्नित हो जाएँ।<br>आप ने इस चर्चा को मेरे मात्रा त्रुटि से आपको क्या समस्या हैं तक बिना वजह ही बढाया हैं।<br>''अपने अनुरोध में यही लिख देते साफ़-साफ़ की आप बर्बरता नहीं करते और सही जानकारी जोड़ते हैं, सुधार करते हैं - इसलिए आपको यह अधिकार दिए जाने में कोई दिक्कत नहीं - इसलिए दिया जाय। बेमतलब पुनरीक्षक जाँच इत्यादि का हवाला देने की क्या आवश्यकता थी?''<br>आप यहा पर मैंरे जिस उत्तर पर सवाल उठा रहे है, यह आपके द्वारा पुछे गये एक बेमतलब पुराने प्रश्न ''आपको कौन सी समस्या हो रही?'' का जवाब था। <br>मैंने कही भी बहाना नही बनाया हैं। <br>अगर कोई अधिकार के लिये अनुरोध करता है तो उसको यह कहकर मना करना कि आप को क्या समस्या हैं, यह आपके अहंवाद को दर्शाता हैं। धन्यवाद [[User:राजकुमार|<span style="color: #E63E62;font-family:Georgia;">'''राज'''</span><span style="color: #414A4C;font-family:Georgia;">'''कुमार'''</span>]][[User talk:राजकुमार|<sup style="color: #E63E62">(talk)</sup>]] 03:48, 10 अक्टूबर 2024 (UTC)
::::::::[[स:राजकुमार|राजकुमार]] जी, मुझे कोई दिक्कत नहीं। यहाँ सब मुझे अहंवादी ही मानते हैं। आपका अनुरोध ग़लत है। आपको पता नहीं की इस अधिकार के साथ क्या मिलता है। बाक़ी आपको निर्णय करने वाले प्रबंधक बताएँगे।--[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 17:18, 10 अक्टूबर 2024 (UTC)
;परिणाम
{{not done}} अभी सदस्य को अनुभव की आवश्यकता है।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 12:40, 12 अक्टूबर 2024 (UTC)
[[श्रेणी:विकिपीडिया सदस्य समूह]]
=== [[स:The Sorter|The Sorter]] ===
{{Sr-request|Status=not done|user name=The Sorter|Purpose=1 साल और 5 महीनों से विकिपीडिया में मैंने अंग्रेज़ी विकिपीडिया से 801 लेखों का अनुवाद किया है, और कई सारे सांचों एवं श्रेणियों को भी बनाया है। मेरे लेख साफ़ और व्यवस्थित हैं, कुछ श्रेष्ठ उदाहरण हैं:
* [[रोलिन' (एयर रेड व्हीकल)]]
* [[ओस्पिसियो काबान्यास]]
* [[तलत जाफ़री]]
* [[कप नूडल]]
* [[जामा मस्जिद, दिल्ली]] (नवीकृत)
* [[गोकुल मेध]]
* [[पुत्रा मस्जिद]]
* [[ग़ालिब की हवेली]]
* [[ज़्वेचान क़िला]]
* [[कोन्स्तांतिनोस तासुलास]]
* [[सायन]]
* [[कोशरी]]
* [[शाह-ए-ज़िंदा]]
* [[सामसा]]
इसके साथ-साथ मैंने दूसरे सदस्यों के लेखों पर बड़े योगदान भी दिया तथा अनेक साँचों के कोड को भी अद्यतन बनाया। इस कारण मैं मानता हूँ कि मैं स्वतः परीक्षित अधिकारों के लिए उचित हूँ। कृपया मेरे अनुवाद पर विचार करें। धन्यवाद![[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 14:38, 9 मार्च 2026 (UTC)}}
;स्वीकृति
;मत
;परिणाम
{{not done}} [[special:diff/3715216/6530087|Module:Convert]] (13 मार्च 2026) में किये गये विघटनकारी बदलावों को देखते हुये यह प्रतीत हो रहा है कि आप इसी तरह के विघटनकारी बदलाव स्थानान्तरण में करोगे। अतः आपको अपनी मशीनी और अन्य भाषा के पाठ डालने की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 12:15, 27 मार्च 2026 (UTC)
:@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, मैंने हाल में मॉड्यूल:Convert/text को ठीक किया है। मैं आपके बात से समझ लिया हूँ कि मुझे (ख़ासकर साँचों में) अंग्रेज़ी पाठ डालने समय सावधान रहना चाहिए। बाद में, मैं मॉड्यूल:Convert/data को भी ठीक करूँगा। [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 16:55, 27 मार्च 2026 (UTC)
=== [[सदस्य:Wikiuser829|Wikiuser829]] ===
{{sr-request
|Status = <!-- यह लाइन न बदलें -->
|user name = Wikiuser829
|Purpose = मैं वर्ष 2022 से विकिपीडिया पर सक्रिय रूप से योगदान कर रहा हूँ और अब तक 100 से अधिक संपादन कर चुका हूँ। वर्ष 2025 में भी मैंने 19 सार्थक संपादन किए हैं।
मैं विकिपीडिया:स्वतः परीक्षित अधिकार हेतु निवेदन कर रहा हूँ। मेरे संपादन मुख्यतः सामग्री सुधार, अद्यतन जानकारी जोड़ने तथा लेखों की गुणवत्ता बेहतर करने पर केंद्रित रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, मैं पृष्ठों के गलत या पुराने नामों को ठीक करने (स्थानांतरण/नाम परिवर्तन) में भी योगदान देना चाहता हूँ, जिसके लिए यह अधिकार उपयोगी होगा।
कृपया मेरे अनुरोध पर विचार करने का कष्ट करें।
}}
;स्वीकृति
;मत
;परिणाम
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=== [[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] ===
{{sr-request
|Status = <!-- यह लाइन न बदलें -->
|user name =चाहर धर्मेंद्र
|Purpose = मैंने वर्ष 2022 में विकिपीडिया से जुड़कर संपादन कार्य आरंभ किया। प्रारंभिक उत्साह के साथ ही मैंने यह समझा कि इस मंच पर सार्थक योगदान देने के लिए उसकी नीतियों और दिशानिर्देशों की गहन समझ अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से मैंने लगभग तीन वर्षों तक विकिपीडिया की विभिन्न नीतियों, प्रक्रियाओं और सामुदायिक चर्चाओं का गंभीर अध्ययन किया। इस अवधि में मैंने विशेष रूप से लेख विलोपन चर्चाएँ तथा विश्वसनीय स्रोतों (RS) से संबंधित विमर्शों का अवलोकन किया और यह समझने का प्रयास किया कि नीतियों का व्यावहारिक अनुप्रयोग किस प्रकार किया जाता है।
मैंने अपने द्वारा निर्मित तथा संपादित प्रत्येक लेख में इन नीतियों और दिशानिर्देशों का यथासंभव पालन करने का प्रयास किया है। मेरा लक्ष्य सदैव निष्पक्ष, प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता की सामग्री प्रदान करना रहा है। मैं विकिपीडिया का एक नियमित और सक्रिय संपादक हूँ तथा सामुदायिक मानकों के अनुरूप कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ।
वर्तमान में मेरा उद्देश्य स्वतः परीक्षित सदस्य के रूप में समुदाय की सेवा करना है। मुझे विश्वास है कि मेरी समझ, अनुभव और कार्यशैली विकिपीडिया की अपेक्षाओं के अनुरूप है। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि मेरी अब तक की गतिविधियों और योगदानों का मूल्यांकन करें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा कार्य विकिपीडिया की नीतियों और मूल सिद्धांतों के अनुरूप रहा है, और मैं भविष्य में भी इसी प्रतिबद्धता के साथ योगदान देता रहूँगा।
}}
;स्वीकृति
;मत
* {{विरोध}} हाल ही में आपके द्वारा "[[कृत्रिम बुद्धिमत्ता संचालित अनुवाद]]" और "[[बौद्ध ग्रंथों की अनुवाद परंपरा]]" जैसे उत्कृष्ट व ससंदर्भ (IEEE जर्नल आदि) लेखों पर 'शीघ्र हटाने (बर्बरता)' और 'हहेच (उल्लेखनीय नहीं)' के अनुचित नामांकन किए गए हैं। उन्नत अधिकारों के लिए 'उल्लेखनीयता' और 'बर्बरता' की सटीक समझ होना अति आवश्यक है, जिसका मुझे आपके हालिया संपादनों में अभाव लगा। अतः अभी के लिए मेरी ओर से पूर्ण विरोध। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 16:35, 10 अप्रैल 2026 (UTC)
:@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] जी, नमस्ते। आपने लिखा है <em>"उन्नत अधिकारों के लिए 'उल्लेखनीयता' और 'बर्बरता' की सटीक समझ होना अति आवश्यक है"</em> ऐसा नियम आपने कहाँ पढ़ लिया? --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 05:53, 22 अप्रैल 2026 (UTC)
::@[[सदस्य:SM7|SM7]] महोदय, आप बिल्कुल सही हैं कि नीति में ऐसा कोई कठोर नियम नहीं है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 08:06, 22 अप्रैल 2026 (UTC)
:::'''मत वापस लिया:''' आदरणीय SM7 जी के स्पष्टीकरण और @[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] के योगदान को देखते हुए|
:::{{समर्थन}} [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:49, 22 अप्रैल 2026 (UTC)
* {{समर्थन}} : '''चाहर धर्मेन्द्र''' पर्याप्त समय से हिन्दी विकिपीडिया पर कार्य कर रहे हैं और वर्तमान एवं इनकी हिन्दी-भाषा-क्षमता एवं विकिपीडिया सम्बन्धी अन्य जानकारी अच्छी है। अतः मैं इनको स्वतः परीक्षित अधिकार देने का समर्थन करता हूँ। -- [[सदस्य:अनुनाद सिंह|अनुनाद सिंह]] ([[सदस्य वार्ता:अनुनाद सिंह|वार्ता]]) 09:48, 21 अप्रैल 2026 (UTC)
*{{समर्थन|पूर्ण समर्थन}} - मैंने चाहर धर्मेन्द्र जी के कार्यों को देखा और उसकी समीक्षा की है, पिछले कुछ महीनों में और इनके द्वारा निर्मित लेख भी देखा जो काफ़ी अच्छे गुणवत्ता के प्रतीत होते है, और इनकी हिन्दी भाषा का स्तर और विकिपीडिया पर इनको कार्य करने का काफ़ी सालों का अनुभव भी प्राप्त हो गया है। इसलिए इनको ये अधिकार स्थायी रूप से दिया जाना चाहिए। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 03:00, 22 अप्रैल 2026 (UTC)
* {{समर्थन}} सदस्य के योगदान देखकर मैं समर्थन करता हूं। -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 16:44, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
;परिणाम
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op2ynblupokvv1fwr46q4fuspflg9rp
विकिपीडिया:अनुवाद अनुरोध
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2026-04-23T23:11:58Z
AMAN KUMAR
911487
Translation cleanup requested on [[:खार्किव यूक्रेनी नाटक थिएटर]] ([[वि:ट्विंकल|ट्विंकल]])
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wikitext
text/x-wiki
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अनुवादकर्ता: लेख बनाने पर अनुरोध के आगे उस लेख का नाम प्रदान करें ताकि अन्य अनुवादकर्ता भी उसी लेख को बढ़ाएँ और एक विषय पर एक से अधिक लेख ना बनें। अनुवादकर्ता अनूदित पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर {{tl|अनूदित पृष्ठ}} साँचे का प्रयोग करें। साथ ही वैकल्पिक रूप से अनुवादकर्ता [[वि:अन्य विकिमीडिया परियोजनाओं से सामग्री लेना]] पढें।
प्रशांत पारस
प्रशांत पारस एक हिंदी वीर रस के कवि है।आपकी एक पुस्तक आज़ादी के पंख ने पाठकों के समक्ष एक नये आयाम के साथ उपस्थित हुई है
* [[यहूदी-ईसाई समझ और सहयोग के लिए केंद्र]] - [[:en:Center for Jewish-Christian Understanding and Cooperation]]
* [[छोटे बुद्ध]] - [[:en:Tiny Buddha]]
#लेख का अनुवाद किया गया था। परंतु विरोध के फलस्वरूप सर्वसहमति से यह लेख मिटा दिया गया है। इंग्लिश विकिपीडिया पर समाज संबंधी लेख उपलब्ध है।
* [[सर्वोदय आश्रम, कुर्सेला]] - [[:en:Sarvoday Ashram, Kursela]]
#इस लेख का अंग्रेजी अनुवाद करें.
:लेख अंग्रेजी विकि पर उपलब्ध नहीं है। यहाँ बनाया जा चुका है। कृपया संदर्भ सहित विस्तार करें और [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीयता]] साबित करें। --[[User:SM7|<font color="#00A300">SM7</font>]]<sup><small>[[User talk:SM7|<font color="#6F00FF">--बातचीत--</font>]]</small></sup>
*[[श्रीकांत राणा]] - [[:sa:श्रीकांत राणा]]
*[[मुकेश मिश्रा]] -[[https://mai.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE]]
== Geology (भू विज्ञान) ==
* [[:en:Types of volcanic eruptions]] [[ज्वालामुखी विस्फोटों के प्रकार]]
===शिक्षा (Education)===
इसमें विद्यालय, विश्वविद्यालय आदि से जुड़े लेख शामिल हैं।
* [[:en:KV2, NSB, Vizag]] [[केंद्रीय विद्यालय नं २, नौसेना बाग, विशाखापट्टणम]]
==अर्थशास्त्र==
*[[:en:Moody's Investors Service]] को [[मूडीज़]] पर अनुवादित करें।
प्रशांत पारस
कवि-वीर रस
पुस्तक-आज़ादी के पंख
== प्रौद्योगिकी (Technology)==
===प्रोग्रामिंग/स्क्रिप्टिंग/मार्कअप भाषायें (Programming/scripting/markup languages)===
*[[:en:Pascal (programming language)]] [[पास्कल (प्रोग्रामिंग भाषा)]]
*[[:en:Perl]] - [[पर्ल]] (मौजूदा लेख छोटा है, नये सिरे से लिखने की ज़रुरत है)
*[[:en:Visual Basic .NET]] - [[विज़ुअल बेसिक डॉटनेट]]
===कम्प्यूटर विज्ञान===
*[[:en:Hard_disk_drive]] - [[हार्ड_डिस्क_ड्राइव]] (इस पृष्ठ को अनुवादित करने के लिए स्वयंसेवकों की सहायता अपेक्षित है। थोड़ा ही अनुवादित हुआ है।)
#इसका अनुवाद लगभग पूरा हो चुका है और यह पृष्ठ ढेर सारी जानकारियों के साथ काफी अच्छा हो चुका है। [[सदस्य:चंद्र शेखर|चंद्र शेखर/Shekhar]] 10:40, 4 जुलाई 2015 (UTC)
*[[:en:ISO 9660]] - [[आईएसओ 9660]] (मौजूदा लेख छोटा है, नये सिरे से लिखने की ज़रुरत है)
<!-- इस आगे के अनुभाग को हमेशा सबसे नीचे रहने दें -->
==नए अश्रेणीकृत अनुरोध==
===रखरखाव टैग लगाते समय प्रेषित अनुरोध===
====[[नन्दिता बेहेरा]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। सामग्री में सुधार करके लेख को विकिपीडिया की नीति के अनुकूल बनाएँ। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 06:46, 2 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[नूरां बहनें]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी[https://en.wikipedia.org/wiki/Nooran_Sisters] थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 07:32, 2 अप्रैल 2020 (UTC)
:yes [[सदस्य:Nagpurjournalism|Nagpurjournalism]] ([[सदस्य वार्ता:Nagpurjournalism|वार्ता]]) 07:12, 20 जून 2025 (UTC)
====[[बिन्ध्याबासिनी देवी]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी[https://en.wikipedia.org/wiki/Bindhyabasini_Devi] थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 07:45, 2 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[जयवंत दलवी]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 15:20, 2 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[देवी एस॰]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 15:33, 2 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[देवकी पंडित]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी[https://en.wikipedia.org/wiki/Devaki_Pandit] थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 13:37, 5 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[गायत्री गोविन्द]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 15:22, 5 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[बैसाली मोहंती]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी[https://en.wikipedia.org/wiki/Baisali_Mohanty] थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 06:44, 6 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[वीना दास (मानव विज्ञानी)]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 09:45, 6 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[आरती अंकलीकर टिकेकर]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 13:25, 6 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[जीजा माधवन हरिसिंह]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी[https://en.wikipedia.org/wiki/Jija_Madhavan_Harisingh] थी। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) 15:09, 6 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[एस्केप प्लान: द एक्सट्रैक्टर्स]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अम्बिका साव|अम्बिका साव]] ([[सदस्य वार्ता:अम्बिका साव|वार्ता]]) 19:07, 11 अप्रैल 2020 (UTC)
==Help with translation==
(''I apologize for posting in English ''):
Dear colleagues, We are organizing a project called WPWP that focus on the use of images collected as part of various contest and photowalks on Wikipedia articles across all languages and our team needs your help with translations into the language of this community. Here is the translation link: https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-Wikipedia+Pages+Wanting+Photos&language=en&action=page&filter= I am sorry if I post in the won't venue. Thanks in anticipation. [[सदस्य:T Cells|T Cells]] ([[सदस्य वार्ता:T Cells|वार्ता]]) 17:30, 13 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[प्रोटीन ( पोषक तत्व )]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) 17:14, 28 अप्रैल 2020 (UTC)
====[[वेनेजुएला के राष्ट्रपति]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 19:44, 14 मई 2020 (UTC)
====[[लडाकू पतंगें]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 07:04, 18 मई 2020 (UTC)
====[[क्रिस्टोफ़ सोग्लो]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 08:17, 27 मई 2020 (UTC)
====[[जीन-बैप्टिस्ट हैचमे]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 08:20, 27 मई 2020 (UTC)
====[[मार्शल सेलेस्टिन]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 10:41, 28 मई 2020 (UTC)
====[[क्रिस्टोफ़र कोलम्बस]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''(🎁)'''</span>]] 10:20, 11 जून 2020 (UTC)
====[[पोरिरुआ]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 13:06, 25 जून 2020 (UTC)
====[[परमहंस योगानन्द]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 09:22, 27 जून 2020 (UTC)
====[[ज़ैनब शब्बीर]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''(🎁)'''</span>]] 11:45, 28 जून 2020 (UTC)
====[[टकाटक]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''(🎁)'''</span>]] 13:21, 28 जून 2020 (UTC)
====[[गावरान मेवा]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow:pink 3px 3px 2px;color: violet">'''(🎁)'''</span>]] 04:55, 29 जून 2020 (UTC)
====[[लियोनेल कर्टिस]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 21:31, 25 अगस्त 2020 (UTC)
====[[अप्रवासी आबादी द्वारा संप्रभु राज्यों और आश्रित प्रदेशों की सूची]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। <span style="font-family: Cambria;">[[सदस्य:Nilesh shukla|<span style="color: teal;">'''निलेश शुक्ला'''</span>]] ([[User talk:Nilesh shukla|वार्ता]])</span> 13:07, 26 अगस्त 2020 (UTC)
====[[फोर्ट सम्टर की दूसरी लड़ाई]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। <span style="font-family: Cambria;">[[सदस्य:Nilesh shukla|<span style="color: teal;">'''निलेश शुक्ला'''</span>]] ([[User talk:Nilesh shukla|वार्ता]])</span> 13:32, 26 अगस्त 2020 (UTC)
====[[2018 मॉस्को-कॉन्स्टेंटिनोपल पत्रकारिता]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 09:41, 27 अगस्त 2020 (UTC)
====[[अदृश्य गुलाबी इकसिंगा]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 13:14, 5 सितंबर 2020 (UTC)
====[[सिद्धार्थ शंकर रे]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 12:40, 11 सितंबर 2020 (UTC)
====[[मिस्र की क्रांति (२०११)]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Ts12rAc|Ts12rAc]] ([[सदस्य वार्ता:Ts12rAc|वार्ता]]) 11:01, 22 अक्टूबर 2020 (UTC)
====[[मिस्र के विदेशी संबंध]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Ts12rAc|Ts12rAc]] ([[सदस्य वार्ता:Ts12rAc|वार्ता]]) 11:07, 22 अक्टूबर 2020 (UTC)
====[[दिल्ली स्कूल ऑफ एक्सीलेंस]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 10:17, 10 दिसम्बर 2020 (UTC)
====[[कोबरा काई]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 21:38, 3 जनवरी 2021 (UTC)
====[[बैक ऑन द बरनार्ड]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] 08:03, 7 जनवरी 2021 (UTC)
== पुनः अनुवादन हेतु ==
[[:en:Alha]] को [[आल्हा]] में, [[:en:Udal of Mahoba]] को [[ऊदल]] में और [[:en:Alha-Khand]] को [[आल्ह-खण्ड]] में पुनः अनुवादन हेतु आवेदन देना चाहते हैं। यह अनुवादित लेख अब POV सम्पादनों के शिकार हो चुके हैं। --[[सदस्य:HinduKshatrana|HinduKshatrana]] ([[सदस्य वार्ता:HinduKshatrana|वार्ता]]) 08:56, 17 जनवरी 2021 (UTC)
====[[ज़ी म्यूजिक कंपनी]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। इस लेख में अत्यधिक अंग्रेजी शब्द है , जिन्हे हिन्दी नहीं लिखा गया है । [[User:Karam06|<span style="font-family:monospace;color:red;text-shadow:-2px 2px 2px gold;">Kᴀʀᴀᴍ</span>]]''<sup>[[User talk:Karam06|<span style="color:red">Lɪᴠᴇ Lᴏɴɢ Iɴᴅɪᴀ</span>]]</sup><sub>[[Special:Contributions/Karam06|c0ntribs]]</sub>'' 02:10, 10 मार्च 2021 (UTC)
====[[2008 में महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश और बिहारी प्रवासियों पर हमला]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 17:32, 20 मार्च 2021 (UTC)
====[[परवीन श्रॉफ]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --<b>[[User:Mala chaubey|<font color="FF990">माला चौबे</font>]]</b><sup>[[User talk:Mala chaubey|<font color="green">वार्ता</font>]]</sup> 13:03, 24 मार्च 2021 (UTC)
====[[अमेरिकन पाई 2]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[सदस्य:LifetimeWiki|LifetimeWiki]] ([[सदस्य वार्ता:LifetimeWiki|वार्ता]]) 07:08, 13 मई 2021 (UTC)
====[[मोमल जी मारी]]====
इस लेख की मूल भाषा en थी। [[सदस्य:Gotitbro|Gotitbro]] ([[सदस्य वार्ता:Gotitbro|वार्ता]]) 14:35, 9 जून 2021 (UTC)
====[[कोड डिवीजन मल्टीपल एक्सेस]]====
इस लेख की मूल भाषा English थी। <b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 05:02, 2 अगस्त 2021 (UTC)
====[[बैक्ट्रियन ऊंट]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Mnhrdng|मनोहर ]] ([[सदस्य वार्ता:Mnhrdng|वार्ता]]) 16:07, 21 जनवरी 2022 (UTC)
====[[चीन में धर्म की स्वतंत्रता]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Mnhrdng|मनोहर ]] ([[सदस्य वार्ता:Mnhrdng|वार्ता]]) 01:19, 23 फ़रवरी 2022 (UTC)
:इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी।हिंदी में जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे https://smartsarkariyojana.in/ [[विशेष:योगदान/2405:204:540F:16D9:F573:BDC4:15A3:C8C4|2405:204:540F:16D9:F573:BDC4:15A3:C8C4]] ([[सदस्य वार्ता:2405:204:540F:16D9:F573:BDC4:15A3:C8C4|वार्ता]]) 16:39, 24 फ़रवरी 2022 (UTC)
====[[धनगर]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। लेख की पूर्ण रूप से अंग्रेजी विकिपीडिया से अनुवाद किए जाने की जरूरत है। [[सदस्य:HinduKshatrana|HinduKshatrana]] ([[सदस्य वार्ता:HinduKshatrana|वार्ता]]) 14:02, 18 अप्रैल 2022 (UTC)
====[[योला मागोगवाना]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 10:01, 6 मई 2022 (UTC)
====[[फातिह बिरोल]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 11:23, 8 मई 2022 (UTC)
====[[ओकेचुकु इबेनु]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 11:37, 8 मई 2022 (UTC)
====[[फातमा ज़ोहरा केसेंटिनी]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 11:41, 8 मई 2022 (UTC)
====[[एलिजाबेथ मरेमा]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 11:42, 8 मई 2022 (UTC)
====[[जोस फ़्रांसिस्को कैली त्ज़े]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 11:50, 8 मई 2022 (UTC)
====[[क्रिस्टा वैन वेलज़ेन]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 15:09, 9 मई 2022 (UTC)
====[[बायजूस]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। <b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 06:10, 7 जुलाई 2022 (UTC)
====[[ऑल ऑफ़ अस आर डेड]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 03:19, 14 दिसम्बर 2022 (UTC)
====[[समीर कुरैशी]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Ritikpraj|<span style="color:green;">☆</span><u><span style="color:Magenta;">Ritik praj</span></u>]] 16:36, 10 अप्रैल 2023 (UTC)
====[[फ़ौजी (टीवी श्रृंखला)]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:हिंदुस्थान वासी|<font color="80 00 80">हिंदुस्थान वासी</font>]]<sup> ''' [[सदस्य वार्ता:हिंदुस्थान वासी|वार्ता]]''' </sup> 04:22, 27 मई 2023 (UTC)
====[[विष्णु विशाल]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 02:29, 6 जून 2023 (UTC)
====[[गोपीचंद मलिनेनी]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 02:35, 6 जून 2023 (UTC)
====[[वेड]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 10:15, 6 जून 2023 (UTC)
====[[वेब ब्राउज़र]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 02:27, 19 जून 2023 (UTC)
====[[लाइमन फ्रैंक बाउम]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:46, 28 जून 2023 (UTC)
====[[भगवा लव ट्रैप]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:48, 28 जून 2023 (UTC)
====[[चीनी ड्रैगन]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:50, 28 जून 2023 (UTC)
====[[प्रबंधन में भारतीय लोकाचार]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:50, 28 जून 2023 (UTC)
====[[हेनरी डेविड थोरो]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:50, 28 जून 2023 (UTC)
====[[गोवाई]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:50, 28 जून 2023 (UTC)
====[[भारतीय एम्बुलेंस कोर]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:51, 28 जून 2023 (UTC)
====[[जीने नहीं दूँगा (२०१२ फिल्म)]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:51, 28 जून 2023 (UTC)
====[[ललित कला स्नातक]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:51, 28 जून 2023 (UTC)
====[[ग्लोबल टेक समिट]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 17:07, 6 जुलाई 2023 (UTC)
====[[बीजू पटनायक प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। <span style="color:gold;">★</span>[[user: Ritikpraj|<u><span style="color: brown;">Ritik Prajapati</span></u>]]<span style="color:gold;">★</span> • [[User talk: Ritikpraj|<span style="color:tan;">✉</span>]] • 14:54, 12 अक्टूबर 2023 (UTC)
====[[चतुर्भुज मंदिर (ओरछा)]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 18:04, 12 नवम्बर 2023 (UTC)
====[[इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। – [[User:DreamRimmer|<big style="color:black; font-family: Tahoma">'''DreamRimmer'''</big>]] ('''[[User talk:DreamRimmer|वार्ता]]''') 07:00, 21 जनवरी 2024 (UTC)
====[[सोप ओपेरा]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:हिंदुस्थान वासी|<font color="80 00 80">हिंदुस्थान वासी</font>]]<sup> ''' [[सदस्य वार्ता:हिंदुस्थान वासी|वार्ता]]''' </sup> 14:12, 6 फ़रवरी 2024 (UTC)
====[[वॉल-ई]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Suyash.dwivedi|सुयश द्विवेदी]] ([[सदस्य वार्ता:Suyash.dwivedi|वार्ता]]) 18:19, 16 फ़रवरी 2024 (UTC)
====[[बर्न-ई]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Suyash.dwivedi|सुयश द्विवेदी]] ([[सदस्य वार्ता:Suyash.dwivedi|वार्ता]]) 18:21, 16 फ़रवरी 2024 (UTC)
====[[2024 वर्ज़क़ान हेलीकॉप्टर दुर्घटना]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[User:चन्द्र वर्धन|<span style="color:#004400;">'''च҉न҉्҉द҉्҉र҉ ҉व҉र҉्҉ध҉न҉'''</span>]] <small><small>[[User talk:चन्द्र वर्धन|वार्तालाप करें]]</small></small> 03:48, 21 मई 2024 (UTC)
====[[रबी पीरज़ादा]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[User:चन्द्र वर्धन|<span style="color:#004400;">'''च҉न҉्҉द҉्҉र҉ ҉व҉र҉्҉ध҉न҉'''</span>]] <small><small>[[User talk:चन्द्र वर्धन|वार्तालाप करें]]</small></small> 03:58, 21 मई 2024 (UTC)
====[[ज़ैनब बिन्त जहश]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेजी थी। [[User:चन्द्र वर्धन|<span style="color:#004400;">'''च҉न҉्҉द҉्҉र҉ ҉व҉र҉्҉ध҉न҉'''</span>]] <small><small>[[User talk:चन्द्र वर्धन|वार्तालाप करें]]</small></small> 03:29, 22 मई 2024 (UTC)
====[[ट्रैविस स्कॉट]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:हिंदुस्थान वासी|<font color="80 00 80">हिंदुस्थान वासी</font>]]<sup> ''' [[सदस्य वार्ता:हिंदुस्थान वासी|वार्ता]]''' </sup> 09:15, 5 जुलाई 2024 (UTC)
====[[मिरांडा केर]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। – [[User:DreamRimmer|<big style="color:black; font-family: Tahoma">'''DreamRimmer'''</big>]] ('''[[User talk:DreamRimmer|वार्ता]]''') 09:09, 14 जुलाई 2024 (UTC)
====[[मिनियन्स (घृणित मी)]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:हिंदुस्थान वासी|<font color="80 00 80">हिंदुस्थान वासी</font>]]<sup> ''' [[सदस्य वार्ता:हिंदुस्थान वासी|वार्ता]]''' </sup> 08:53, 20 जुलाई 2024 (UTC)
====[[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:अजीत कुमार तिवारी|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color:red">'''अजीत कुमार तिवारी'''</span>]]<sup>[[User talk:अजीत कुमार तिवारी|<span style="color:green"> '''बातचीत'''</span>]]</sup> 08:38, 26 जुलाई 2024 (UTC)
====[[सेंट एलिजाबेथ किला (यूक्रेन)]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Suyash.dwivedi|सुयश द्विवेदी]] ([[सदस्य वार्ता:Suyash.dwivedi|वार्ता]]) 14:31, 27 जुलाई 2024 (UTC)
====[[करीवुर्स्ट]]====
इस लेख की मूल भाषा uncertain थी। [[सदस्य:Suyash.dwivedi|सुयश द्विवेदी]] ([[सदस्य वार्ता:Suyash.dwivedi|वार्ता]]) 17:24, 27 जुलाई 2024 (UTC)
====[[अबू सईद (कार्यकर्ता)]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:NXcrypto|<span style="color:#004400;">'''एनएक्स <small>क्रिप्टो</small>'''</span>]] <small><small>[[User talk:NXcrypto|वार्तालाप करें]]</small></small> 01:58, 31 जुलाई 2024 (UTC)
====[[अंतिम पंघाल]]====
इस लेख की मूल भाषा अंग्रेज़ी थी। [[User:NXcrypto|<span style="color:#004400;">'''एनएक्स <small>क्रिप्टो</small>'''</span>]] <small><small>[[User talk:NXcrypto|वार्तालाप करें]]</small></small> 04:33, 7 अगस्त 2024 (UTC)
====[[बलूचिस्तान (पाकिस्तान)]]====
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====[[नाहुआ लोग]]====
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====[[ऐरालो]]====
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====[[मिशेल सोनी]]====
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====[[एक्विनास कॉलेज एडाकोचिन]]====
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====[[द्वितीय बोअर युद्ध]]====
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कंधे की अकड़न
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{{Infobox Disease
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'''फ्रोजेन शोल्डर''' (अकड़े हुए कंधे), जिसे चिकित्सकीय रूप से '''आसंजी सम्पुट-प्रदाह''' (कैप्सूलाइटिस) कहा जाता है, एक विकार है, जिसमें कंधे का कैप्सूल, कंधे के अंसगत तथा प्रगण्डिका संबंधी जोड़ को घेरने वाला संयोजी ऊतक सूजा हुआ एवं कठोर बन जाता है, जो गति को अत्यधिक नियंत्रित कर देता है एवं तीव्र दर्द उत्पन्न करता है।
आसंजी सम्पुट-प्रदाह (कैप्सूलाइटिस) कष्टदायक एवं असमर्थकारी स्थिति होती है, जो धीमे स्वास्थ्य लाभ के कारण अक्सर रोगियों एवं देखभाल करने वाले व्यक्तियों के लिए निराशा उत्पन्न करती है। कंधे की गति अत्यधिक सीमित हो जाती है। दर्द आम तौर पर अनवरत होता है, जो रात के समय अधिक बुरा होता है, जब मौसम ठंडा होता है एवं सीमित गति के साथ-साथ छोटे से छोटे कार्यों को भी असंभव बना देता है। कुछ गतियां या सूजन तीव्र दर्द की अचानक शुरु हो सकते हैं एवं ऐंठन उत्पन्न कर सकते हैं, जो कई मिनटों तक जारी रह सकते हैं।
यह स्थिति, जिसके सही-सही कारण का पता नहीं है, पांच महीने से तीन वर्षों या अधिक समय तक जारी रह सकती है एवं कुछ स्थितियों में इसे संबंधित हिस्से में चोट या आघात के द्वारा उत्पन्न हुआ माना जाता है। यह माना जाता है कि इसका एक स्व-प्रतिरक्षित अवयव हो सकता है, जिसमें शरीर कैप्सूल में स्थित स्वस्थ ऊतकों पर हमला करता है। जोड़ में तरल पदार्थ का भी अभाव होता है, जो गति को और अधिक सीमित करता है।
रोजमर्रा के कार्यों में कठिनाई के अलावा, आसंजी सम्पुट-प्रदाह (कैप्सूलाइटिस) से प्रभावित होने वाले लोग रात के समय और भी तेज होने वाले दर्द के कारण अधिक लंबे समय तक सोने की समस्याओं एवं सीमित गतियों/स्थितियों का अनुभव करते हैं। यह स्थिति अवसाद, दर्द और गर्दन तथा पीठ में में समस्याएं भी उत्पन्न कर सकती है।
फ्रोजेन शोल्डर के जोखिम वाले कारकों में मधुमेह, [[पक्षाघात|दौरा पड़ना]], दुर्घटनाएं, फेंफड़े का रोग, संयोजी ऊतक विकार और [[हृदय रोग]] शामिल हैं। 40 वर्ष से कम उम्र के लोगों में यह स्थिति शायद ही कभी दिखाई देती है।
इलाज कष्टदायक एवं भार डालने वाला हो सकता है एवं इसमें [[फिजियोथिरैपी|शारीरिक चिकित्सा]], औषधि, मालिश चिकित्सा, शोथ संबंधी फैलाव या शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) शामिल हो सकता है। एक डॉक्टर संज्ञाहरण के बाद हेरफेर भी कर सकता है, जो गति की कुछ सीमा वापस लौटाने के लिए जोड़ में आसंजनों तथा क्षतिग्रस्त उतक को तोड़ता है। दर्द और सूजन को दर्दनाशक दवाओं और एनएसएआईडी (NSAIDs) के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। इस स्थिति स्वत:-सीमित करने वाली होती है: यह आम तौर पर बिना शल्य-चिकित्सा के समय के साथ विघटित करती है, लेकिन इसमें दो वर्षों तक का समय लग सकता है। अधिकांश लोग समय के साथ लगभग 90% कंधे की गति पुन: प्राप्त करते हैं।
जो लोग आसंजी सम्पुट-प्रदाह (कैप्सूलाइटिस) से पीड़ित होते हैं, उन्हें कई महीनों तक या अधिक लंबे समय तक काम करने में एवं सामान्य जीवन की गतिविधियों के संबंध में अत्यधिक कठिनाई होती है।
== प्रस्तुति ==
कंधे की गति गंभीर रूप से सीमित हो जाती है। यह अवस्था कभी-कभी चोट के कारण उत्पन्न होती है जो [[दर्द]] के कारण प्रयोग की कमी उत्पन्न करती है लेकिन यह अक्सर स्वत: बिना किसी स्पष्ट पिछले कारण पैदा करने वाले कारक के कारण भी उत्पन्न होती है (बिना किसी कारण के उत्पन्न होने वाला फ्रोजेन शोल्डर). आमवाती रोग का विकास एवं हाल के कंधे की [[शल्यचिकित्सा|शल्य-चिकित्सा]] भी दर्द का स्वरूप एवं फ्रोजेन शोल्डर के समान ही सीमाएं उत्पन्न कर सकती है। सविराम उपयोग की अवधियां [[सूजन]] उत्पन्न कर सकती है।
श्लेष्मक गुहाओं में स्थित तरल की कमी हो जाती है, जो आम तौर फ्रोजेन शोल्डर में प्रगंडिका (ऊपरी बांह की [[अस्थि|हड्डी]]) एवं स्कंधफलक में गर्तिका (स्कंधास्थि) के बीच के अंतराल को चिकना बनाकर कंधे के जोड़ की गति में मदद करता है। कैप्सूल और प्रगंडिका के गोलक के बीच यही प्रतिबंधित स्थान आसंजी सम्पुट-प्रदाह (कैप्सूलाइटिस) का एक कम जटिल, कष्टदायक, कठोर कंधे से अंतर बताता है। मधुमेह, [[पक्षाघात|दौरा पड़ने]], फेंफड़े के रोग, [[गठिया संधि शोथ|आमवाती गठिया (संधिशोथ)]] एवं [[हृदय रोग]] से पीड़ित व्यक्तियों या दुर्घटना के शिकार व्यक्तियों में फ्रोजेन शोल्डर होने का अधिक बड़ा जोखिम होता है। आसंजी सम्पुट-प्रदाह (कैप्सूलाइटिस) को कुछ उच्च रूप से [[रेट्रोवाइरस|सक्रिय रीट्रोवायरस को नष्ट करने या रोकने वाली]] चिकित्सा (एचएएआरटी) के कुछ प्रकारों के संभावित प्रतिकूल प्रभाव के रूप में सूचित किया गया है।
यह स्थिति 40 वर्ष से कम उम्र के लोगों में, कम से कम इसके बिना किसी कारण के उत्पन्न होने रूप में, शायद ही दिखाई देती है और यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक आम होती है (70% रोगी 40-60 आयु वर्ग की महिलाएं हैं). मधुमेह के रोगियों में फ्रोजेन शोल्डर को गैर-मधुमेह ग्रसित आबादी की तुलना में आम तौर पर अधिक कष्टप्रद अवस्था माना जाता है एवं स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने में लंबा समय लगता है।<ref name="titleQuestions and Answers about Shoulder Problems">{{cite web |url=http://www.niams.nih.gov/Health_Info/Shoulder_Problems/default.asp |title=Questions and Answers about Shoulder Problems |accessdate=2008-01-28 |format= |work= |archive-url=https://web.archive.org/web/20170728020555/https://www.niams.nih.gov/Health_Info/Shoulder_Problems/default.asp |archive-date=28 जुलाई 2017 |url-status=dead }}</ref>
ऐसे मामलों की सूचना स्तन या फेफड़ों की शल्य-चिकित्सा के बाद भी प्राप्त हुई है।
== रोकथाम ==
समस्या को रोकने के लिए, एक आम सलाह कंधे के [[संधि (शरीररचना)|जोड़]] को पूर्ण रूप से हिलाते-डुलाते रहना है, ताकि फ्रोजेन शोल्डर को रोका जा सके। अक्सर जब कंधा अकड़ने लगता है तो यह घायल हो सकता है। चूंकि दर्द गति को अवरुद्ध करता है, तो गति को अवरुद्ध करने वाले आसंजन का और अधिक विकास होगा, जब तक की जोड़ पूर्ण रूप से सभी दिशाओं (अभिवर्तन, अपावर्तन, आकुंजन, आवर्तन एवं फैलाव) में घूमना जारी नहीं रहता है। [[फिजियोथिरैपी|शारीरिक चिकित्सा]] निरंतर गति के द्वारा सहायता करती है।
'''लिंक शीर्षक'''मोटे अक्षरों में पाठ्य == लक्षण एवं निदान ==
फ्रोजेन शोल्डर का एक लक्षण यह है की इसमें जोड़ अत्यधिक कठोर एवं सख्त हो जाता है, इतना कि सामान्य सा हिलना-डुलना जैसे बांह उठाना भी लगभग असंभव हो जाता है। सबसे अधिक बाधित गति कंधे का बाहरी आवर्तन है।
लोग यह शिकायत करते हैं कि कठोरता और दर्द रात में अधिक बढ़ जाते हैं। फ्रोजेन शोल्डर के कारण होने वाला दर्द आम तौर मंद या पीड़ादायक होता है। यह हिलाने-डुलाने की कोशिश या सूजन होने से अधिक बढ़ सकता है। यदि एक शारीरिक जांच में कंधे की सीमित गति का पता चलता है तो एक शारीरिक चिकित्सक रोगी को फ्रोजेन शोल्डर होने का संदेह कर सकता है। फ्रोजेन शोल्डर का निदान किया जा सकता है, यदि सक्रिय गति की सीमा (मांशपेशियों के सक्रिय उपयोग से गति सीमा) पर रोक प्रायः एक ही या निष्क्रिय गति सीमा (एक व्यक्ति के द्वारा बांह एवं कंधे को हिलाने-डुलाने से प्राप्त गति की सीमा) पर रोक सामान होते हैं। एक संधिचित्र (ऑर्थ्रोग्राम) या एमआरआई (MRI) स्कैन निदान की पुष्टि कर सकता है, हालांकि व्यवहार में इसकी शायद ही जरुरत होती है।
एक फ्रोजेन शोल्डर के सामान्य कोर्स का वर्णन तीन चरणों में किया गया है:<ref name="titleYour Orthopaedic Connection: Frozen Shoulder">{{cite web |url=http://orthoinfo.aaos.org/topic.cfm?topic=A00071 |title=Your Orthopaedic Connection: Frozen Shoulder |accessdate=2008-01-28 |format= |work= |archive-url=https://web.archive.org/web/20171020011905/http://orthoinfo.aaos.org/topic.cfm?topic=a00071 |archive-date=20 अक्तूबर 2017 |url-status=dead }}</ref>
* प्रथम चरण: "अकड़ने वाला" या कष्टदायक चरण, जो छः सप्ताहों से नौ महीनों तक जारी रह सकता है एवं जिसमें रोगी में धीरे-धीरे दर्द का आरम्भ होता है। दर्द बदतर होने पर कंधे की गति समाप्त हो जाती है।
* द्वितीय चरण: "अकड़े हुए" या आसंजित चरण में दर्द में थोड़ा सुधार होता है, लेकिन कठोरता बनी रहती है। आम तौर पर यह चरण में चार से नौ महीने तक जारी रहता है।
* तृतीय चरण: "ढीला पड़ना" या स्वास्थ्य लाभ, जब कंधे की गति सामान्य होने लगती है। आमतौर पर यह 5-26 महीने तक जारी रहता है।
== प्रबंधन ==
इस विकार का प्रबंधन जोड़ की गति को बहाल करने और कंधे के दर्द को कम करने पर केंद्रित होता है। आमतौर पर, यह गैर-स्टेरॉयड युक्त प्रदाहरोधी औषधियों (NSAIDs) एवं ताप के व्यवहार के साथ शुरू होता है, जिसके बाद शरीर के अंगों को तानने वाले हल्का अभ्यास किये जाते हैं जिन्हें घर में एक शारीरिक चिकित्सक की सहायता से किया जा सकता है। कुछ मामलों में एक छोटे से बैटरी-चालित उपकरण के द्वारा त्वचा प्रवेशी विद्युतीय तंत्रिका उत्तेजना (टीईएनएस) का प्रयोग तंत्रिकाओं के आवेगों को अवरुद्ध कर दर्द को कम करने के लिए किया जा सकता है।
अगले चरण में अक्सर एक या स्टेरॉयड इंजेक्शनों जैसे कि मिथाइल प्रेडनिसोलोन की श्रेणी (छह तक) का प्रयोग करना शामिल होता है। इलाज कई महीनों के लिए जरूरी हो सकता है। आम तौर पर इंजेक्शन विकिरण-चिकित्सा संबंधी (रेडियोलॉजिकल) मार्गदर्शन में, प्रतिदीप्तिदर्शन, अल्ट्रासाउंड या परिकलित टॉमोग्राफी (सी टी) के साथ दिए जाते हैं। विकिरण-चिकित्सा संबंधी (रेडियोलॉजिकल) मार्गदर्शन का उपयोग किया जाता है, ताकि सुई को कंधे के जोड़ में सुरक्षित रूप से और सही ढंग से दिया जाए. इस स्थिति की विशेषता सूजन को कम करने के लिए जोड़ में कॉर्टिसोन (Cortisone) का इंजेक्शन दिया जाता है। अक्सर कैप्सूल के फटने वाले स्थान पर संकुचन के कारण दर्द एवं गति की कमी (जलीय फैलाव या संधिचित्रण) को दूर करने के लिए सामान्य लवणयुक्त घोल का इंजेक्शन देकर कंधे के कैप्सूल को भी फैलाया जा सकता है; 2008 में शोध ने जलीय फैलाव के लाभ के संबंध में प्रश्न किया है कि यह केवल कोर्टिसोन का इंजेक्शन देने की तुलना में कोई सांख्यिकीय लाभ नहीं प्रदान करता है।<ref>[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 ट्विटा ईके, तारिक आर., सेसेंग एस, जुएल एनजी, बौट्ज़-होल्टर ई. हाइड्रोडिलेटेशन, कोर्टिकोस्टेरौइडस और अद्हेसिव कैप्स्युलिटिस: एक अनियमित नियंत्रित परीक्षण.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110421083438/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 |date=21 अप्रैल 2011 }}[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 बीएमसी (BMC) मस्क्युलोस्केलेट डिसोर्ड. ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110421083438/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 |date=21 अप्रैल 2011 }}[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 19 अप्रैल 2008; 9:53.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110421083438/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/18423042 |date=21 अप्रैल 2011 }}</ref>
यदि ये उपाय विफल हुए तो चिकित्सक आसंजन को रोकने के लिए सामान्य संज्ञाहरण के तहत हस्त-कौशल द्वारा कंधे को ठीक करने की सलाह दे सकते हैं। अधिक लंबे समय से कायम एवं गंभीर स्थितियों में आसंजनों (कैप्सूल संबंधी स्राव) को काटने के लिये [[शल्यचिकित्सा|शल्य चिकित्सा]] की सलाह दी जा सकती है; आम तौर पर यह प्रक्रिया संधिचित्रण द्वारा की जाती है।<ref>[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 अद्हेसिव कैप्स्युलिटिस में आर्थ्रोस्कोपिक रिलीज़ के बाद मरीजों में कार्यात्मक परिणाम और सामान्य स्वास्थ्य स्थिति.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120111140908/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 |date=11 जनवरी 2012 }}[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 बौम्स एमएच, स्पान जी, नोज़ाकी एम, स्टेकेल एच, स्कलट्ज़ डब्ल्यू, कलिंगर एचएम. नोई सर्जन स्पोर्ट्स ट्रौमैटोल आर्थ्रोस्कोपिक. ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120111140908/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 |date=11 जनवरी 2012 }}[http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 मई 2007, 15(5):638-44.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120111140908/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17031613 |date=11 जनवरी 2012 }}</ref> कंधे के साथ अन्य समस्याओं में सुधार करने के लिये की गई शल्य-चिकित्सा जैसे कि जैसे, असंकूट टकराव या आवर्तनी पेशी कफ़ में फटन की भी जरूरत हो सकती है।
शारीरिक चिकित्सा में मालिश चिकित्सा और कभी-कभी कंधे को गर्म करने के बाद दैनिक रूप से कंधे को विस्तृत रूप से तानना शामिल हो सकता है।
वैकल्पिक चिकित्सा उपचार में शामिल होते हैं:
* दर्द प्रबंधन के लिए [[एक्यूपंक्चर]] और गति की बढ़ी हुई सीमा
* पोषण
* [[ऑस्टियोपैथी|अस्थिचिकित्सा]]
* काइरिप्रैक्टिक चिकित्सा पद्धति
* [[जलचिकित्सा|जलीय चिकित्सा]], जैसे कि जल में व्यायाम, खनिज जलीय स्नान-टब का व्यवहार
* [[होम्योपैथी]] जोड़ों से संबंधित अन्य शिकायतों के साथ फ्रोज़ेन शोल्डर का उपचार करने के लिये रसटॉक्स (Rhustox 30) नामक एक दवा का प्रयोग किया जाता है।
== इन्हें भी देखें ==
* कैल्सिफिक टेंडिनीटिस
== सन्दर्भ ==
{{reflist|2}}
यह लेख सार्वजनिक क्षेत्र दस्तावेज़ "फ्रोजेन शोल्डर" से लिया गया है, हड्डी रोग सर्जन के अमेरिकी अकादमी, यूआरएल (URL) http://orthoinfo.aaos.org/fact/thr_report.cfm?Thread_ID=162&topcategory=Shoulder {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190713170621/https://orthoinfo.aaos.org/fact/thr_report.cfm?Thread_ID=162&topcategory=Shoulder |date=13 जुलाई 2019 }}. से उपलब्ध.
==बाहरी कड़ियाँ==
* आर्थोपेडिक सर्जन के अमेरिकी अकादमी से [https://web.archive.org/web/20171020011905/http://orthoinfo.aaos.org/topic.cfm?topic=a00071 "फ्रोजेन शोल्डर"]
* घरेलू उपाय दूर कर देंगे कंधे का दर्द [https://web.archive.org/web/20190105202421/https://www.jointspainhealers.com/ye-4-gharelu-upchar-dur-kar-denge-kandhe-ka-dard/ ये 4 घरेलू उपाय दूर कर देंगे कंधे का दर्द]
* {{cite journal |author=Siegel LB, Cohen NJ, Gall EP |title=Adhesive capsulitis: a sticky issue |journal=Am Fam Physician |volume=59 |issue=7 |pages=1843–52 |year=1999 |month=April |pmid=10208704 |doi= |url=http://www.aafp.org/afp/990401ap/1843.html |access-date=15 जनवरी 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20101228055258/http://www.aafp.org/afp/990401ap/1843.html |archive-date=28 दिसंबर 2010 |url-status=live }}
* [http://www.melbourneradiology.com.au/index.php?option=com_content&view=article&id=100&Itemid=129.example.org सीटी (CT) निर्देशित कंधे हाइड्रोडिलेटेशन रेडियोलॉजी छवि अनुक्रम द्वारा प्रदर्शित]
{{Soft tissue disorders}}
{{DEFAULTSORT:Adhesive Capsulitis Of Shoulder}}
[[श्रेणी:फैसी शामिल रोग]]
[[श्रेणी:नरम ऊतक विकार]]
[[श्रेणी:ऑर्थोपेडिक सर्जरी]]
[[श्रेणी:कंधा]]
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Adarsh Rajput Ji
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wikitext
text/x-wiki
* [[आई-विद्यार्थी]]
* [[आइना-ए-अकबरी]]
* [[आइसोटोप]]
* [[आईज़ोल]]
* [[आईना-ए-अकबरी]]
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* [[आचारचन्द्रिका (श्रीनायाचार्य चूडामणि)]]
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* [[आचारचन्द्रोदय (महेश्वर)]]
* [[आचारचन्द्रोदय (सदाराम)]]
* [[आचारचिन्तामणि]]
* [[आचारतत्त्व]]
* [[आचारतिलक]]
* [[आचारतिलक (गंगाधर)]]
* [[आचारतिलक (द्रव्यशुद्धिदीपिका)]]
* [[आचारतंरगिणी]]
* [[आचारदर्पण]]
* [[आचारदर्पण (बोपदेव)]]
* [[आचारदर्पण (श्रीदत्त)]]
* [[आचारदर्शन]]
* [[आचारदीधिति]]
* [[आचारदीप]]
* [[आचारदीपक]]
* [[आचारदीपिका]]
* [[आचारदीपिका (अज्ञात)]]
* [[आचारदीपिका (आचारादर्श)]]
* [[आचारदीपिका (कमलाकर)]]
* [[आचारदीपिका (सारसमुच्चय)]]
* [[आचारदीपिका (हरिलाल)]]
* [[आचारदैतविवेक]]
* [[आचारनवनीत]]
* [[आचारनिर्णय]]
* [[आचारपद्धति (वासुदेवेंद्र)]]
* [[आचारपद्धति (विद्याकर)]]
* [[आचारपद्धति (श्रीधर सूरि)]]
* [[आचारपंचाशिका]]
* [[आचारप्रकाश]]
* [[आचारप्रकाशिका]]
* [[आचारप्रदीप]]
* [[आचारप्रदीप (कमलाकर)]]
* [[आचारप्रदीप (केशवभट्ट)]]
* [[आचारप्रदीप (नागदेव)]]
* [[आचारप्रदीप (भट्टोजि)]]
* [[आचारप्रशंसा]]
* [[आचारभूषण]]
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* [[आचार्यचूणामणि]]
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* [[आज्ञासंक्रान्ति]]
* [[आज्यकम्बल विधि]]
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* [[आदिधर्मसारसंग्रह]]
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* [[आदिलशाही वंश]]
* [[आदिवराह मन्दिर]] (मथुरा)
* [[आदिवराह मंदिर]] (मथुरा)
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* [[आनन्दसफल सप्तमी]]
* [[आनन्दसफलसप्तमी]]
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* [[आनंद भवन]]
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* [[आन्त्र]]
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* [[आपगा नदी]]
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* [[आपस्तम्बगृह्यप्रयोग]]
* [[आपस्तम्बगृह्यभाष्यार्थसंग्रह]]
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* [[आपस्तम्बगृह्यसूत्रकारिका]]
* [[आपस्तम्बगृह्यसूत्रकारिकावृत्ति]]
* [[आपस्तम्बगृह्यसूत्रदीपिका]]
* [[आपस्तम्बजातकर्म]]
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}}
'''मुत्तुवेल करुणानिधि''' ({{lang-ta| மு. கருணாநிதி}}) (3 जून 1924 - 7 अगस्त 2018)<ref name="Born03जून1924"/> [[भरत|भारतीय]] राजनेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री थे।<ref>{{cite web|url=https://newscentral24x7.com/uttar-pradesh-shelter-home-lists-fake-inmates-to-get-government-grant-officials/|title=The Death Of The Atheist, Anti-hindi, Anti Brahminism Karunanidhi Quite Literally Marks An End Of An Era|access-date=8 अगस्त 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180808202544/https://newscentral24x7.com/uttar-pradesh-shelter-home-lists-fake-inmates-to-get-government-grant-officials/|archive-date=8 अगस्त 2018|url-status=dead}}</ref> वे [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] राज्य के एक द्रविड़ राजनीतिक दल [[द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम]] (डी॰एम॰के॰)<ref>{{Cite web |url=http://www.dmk.in/ |title=डीएमके होमपेज-चेन्नई-तमिलनाडु-इंडिया 800x600 स्क्रीन रिसॉल्यूशन |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110721154756/http://www.dmk.in/ |archive-date=21 जुलाई 2011 |url-status=dead }}</ref> के प्रमुख थे। वे 1969<ref>{{cite web | url = http://www.dmk.in/bio/beng.htm | title = Biography in official party website | access-date = 15 मार्च 2011 | archive-url = https://web.archive.org/web/20131015225545/http://www.dmk.in/bio/beng.htm | archive-date = 15 अक्तूबर 2013 | url-status = dead }}</ref> में डी॰एम॰के॰ के संस्थापक [[अन्नादुरै|सी॰एन॰ अन्नादुरई]] की मौत के बाद से इसके नेता बने थे और पाँच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया।<ref>{{Cite web |url=http://sify.com/news/fullstory.php?id=14202776 |title="करुणानिधि विन्स फॉर रिकॉर्ड 11थ टाइम" - Sify.com |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090202191331/http://sify.com/news/fullstory.php?id=14202776 |archive-date=2 फ़रवरी 2009 |url-status=dead }}</ref> 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और [[पुदुचेरी]] में डी॰एम॰के॰ के नेतृत्व वाली डी॰पी॰ए॰ (यू॰पी॰ए॰ और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और [[लोकसभा]] की सभी 40 सीटों को जीत लिया। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने डी॰एम॰के॰ द्वारा जीती गयी सीटों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 18 कर दिया और तमिलनाडु और पुदुचेरी में यू॰पी॰ए॰ का नेतृत्व कर बहुत छोटे गठबंधन के बावजूद 28 सीटों पर विजय प्राप्त की। वे [[कॉलीवुड|तमिल सिनेमा]] जगत के एक नाटककार और पटकथा लेखक भी थे। उनके समर्थक उन्हें '''कलाईनार''' ({{lang-ta| கலைஞர்}}, "कला का विद्वान") कहकर बुलाते हैं।<ref>[http://economictimes.indiatimes.com/news/politics/nation/Kalaignar-survives-4-challenging-years/articleshow/5928644.cms कलाईनार सर्वाईव्स 4 चैलेंजिंग ईयर्स] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170702071215/http://economictimes.indiatimes.com/news/politics/nation/Kalaignar-survives-4-challenging-years/articleshow/5928644.cms |date=2 जुलाई 2017 }}, दी इकॉनोमिक टाइम्स, 14 मई 2010 एट</ref> करूणानिधि का निधन 7 अगस्त 2018 को कावेरी अस्पताल में हुआ।<ref>{{cite news |title=डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का निधन, शोक में डूबे प्रशंसक |url=https://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/bangalore/chennai/dmk-president-m-karunanidhi-dies-in-chennai-kauvery-hospital/articleshow/65309787.cms |accessdate=7 अगस्त 2018 |work=[[नवभारत टाइम्स]] |language=hi-IN |archive-url=https://web.archive.org/web/20180807220436/https://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/bangalore/chennai/dmk-president-m-karunanidhi-dies-in-chennai-kauvery-hospital/articleshow/65309787.cms |archive-date=7 अगस्त 2018 |url-status=live }}</ref>
== आरंभिक जीवन ==
एम॰ करुणानिधि का जन्म मुत्तुवेल और अंजुगम के यहाँ 3 जून 1924 को [[ब्रिटिश राज|ब्रिटिश भारत]]<ref>[नाई परिवार [http://www.indianexpress.com/news/karunanidhis-been-nice-but-his-village-not-blind-to-amma-option/2797/0 "करुणानिधि बीन नाइस, बट हिज़ विलेज नॉट ब्लाइंड टू अम्मा ऑप्शन".] ''दी इंडियन एक्सप्रेस'' .</ref> के नागपट्टिनम के तिरुक्कुभलइ में <ref>[http://www.outlookindia.com/article.aspx?218704 विथ देम / अगेंस्ट देम: दी डीएमके बिटर बैटल्स विथ दी स्टेट बीजेपी कंटीन्यू, सो हाउ लॉन्ग कैन दे हैंग ऑन एट दी सेंटर?] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110125221554/http://outlookindia.com/article.aspx?218704 |date=25 जनवरी 2011 }} अवेक्षण भारत</ref> के रूप में हुआ था।<ref name="Born03जून1924">[http://www.indianexpress.com/news/karunas-kutumbam/468573/0 "करुणानिधि कुटुम्बम".] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110128233840/http://www.indianexpress.com/news/karunas-kutumbam/468573/0 |date=28 जनवरी 2011 }} ''दी इंडियन एक्सप्रेस.''</ref> वे हिन्दू समुदाय से संबंध रखते हैं।<ref>{{Cite web |url=http://www.outlookindia.com/article.aspx?234692 |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110126204805/http://outlookindia.com/article.aspx?234692 |archive-date=26 जनवरी 2011 |url-status=live }}</ref>
== पटकथा-लेखन ==
करुणानिधि ने [[तमिल भाषा|तमिल]] फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के रूप में अपने करियर का शुभारम्भ किया। अपनी बुद्धि और भाषण कौशल के माध्यम से वे बहुत जल्द एक राजनेता बन गए। वे द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे और उसके समाजवादी और [[विवेकवाद|बुद्धिवादी]] आदर्शों को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक (सुधारवादी) कहानियाँ लिखने के लिए मशहूर थे। उन्होंने [[कॉलीवुड|तमिल सिनेमा]] जगत का इस्तेमाल करके ''पराशक्ति'' नामक फिल्म के माध्यम से अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया।<ref name="rethink">{{cite book
| last = Guneratne
| first = Anthony R.
| author2 = Wimal Dissanayake, Sumita S. Chakravarty
| title = Rethinking Third Cinema
| publisher = Routledge
| year = 2003
| pages = 216
| url = http://books.google.com/books?id=2IFR0oHGHKUC
| isbn = 0415213541
| access-date = 15 मार्च 2011
| archive-url = https://web.archive.org/web/20140103111250/http://books.google.com/books?id=2IFR0oHGHKUC
| archive-date = 3 जनवरी 2014
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}}</ref> ''पराशक्ति'' तमिल सिनेमा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई क्योंकि इसने द्रविड़ आंदोलन की विचारधाराओं का समर्थन किया और इसने तमिल फिल्म जगत के दो प्रमुख अभिनेताओं [[विल्लुपुरम चिन्नैया गणेशन|शिवाजी गणेशन]] और एस॰एस॰ राजेन्द्रन से दुनिया को परिचित करवाया।<ref name="Hardgrave">
{{cite journal
| last = Hardgrave, Jr
| first = Robert L
| title = Politics and the Film in Tamilnadu: The Stars and the DMK
| url = https://archive.org/details/sim_asian-survey_1973-03_13_3/page/288
| journal = Asian Survey
| volume = 13
| issue = 3
| pages = 288–305
| publisher = JSTOR
| month = मार्च | year = 1973
| accessdate = 2010-02-12}}
</ref> शुरू में इस फिल्म पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था लेकिन अन्त में इसे 1952 में रिलीज कर दिया गया।<ref name="Hardgrave"/> यह बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई लेकिन इसकी रिलीज विवादों से घिरी थी। रूढ़िवादी हिन्दूओं ने इस फिल्म का विरोध किया क्योंकि इसमें कुछ ऐसे तत्व शामिल थे जिसने ब्राह्मणवाद की आलोचना की थी।<ref>{{Cite news|url=http://www.hindu.com/2006/06/12/stories/2006061206151100.htm|title=Films and the politics of convenience|accessdate=2010-02-12|publisher=idlebrain.com|author=A. Srivathsan|location=Chennai, भारत|date=जून 12, 2006|archive-url=https://www.webcitation.org/6FYgbRwhT?url=http://www.hindu.com/2006/06/12/stories/2006061206151100.htm|archive-date=1 अप्रैल 2013|url-status=live}}</ref> इस तरह के सन्देशों वाली करूणानिधि की दो अन्य फ़िल्में ''पनाम'' और ''थंगारथनम'' थीं।<ref name="rethink"/> इन फिल्मों में विधवा पुनर्विवाह, अस्पृश्यता का उन्मूलन, आत्मसम्मान विवाह, ज़मींदारी का उन्मूलन और धार्मिक पाखंड का उन्मूलन जैसे विषय शामिल थे।<ref name="Hardgrave"/> जैसे-जैसे उनकी सुदृढ़ सामाजिक सन्देशों वाली फ़िल्में और नाटक लोकप्रिय होते गए, वैसे-वैसे उन्हें अत्यधिक सेंसशिप का सामना करना पड़ा; 1950 के दशक में उनके दो नाटकों को प्रतिबंधित कर दिया गया।<ref name="Hardgrave"/>
== राजनीति ==
=== राजनीति में प्रवेश ===
जस्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश किया और हिन्दी विरोधी आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने अपने इलाके के स्थानीय युवाओं के लिए एक संगठन की स्थापना की। उन्होंने इसके सदस्यों को मनावर नेसन नामक एक हस्तलिखित अखबार परिचालित किया। बाद में उन्होंने तमिलनाडु तमिल मनावर मन्द्रम नामक एक छात्र संगठन की स्थापना की जो द्रविड़ आन्दोलन का पहला छात्र विंग था। करूणानिधि ने अन्य सदस्यों के साथ छात्र समुदाय और खुद को भी सामाजिक कार्य में शामिल कर लिया। यहाँ उन्होंने इसके सदस्यों के लिए एक अखबार चालू किया जो [[द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम|डी॰एम॰के॰]] दल के आधिकारिक अखबार ''मुरासोली'' के रूप में सामने आया।
कल्लाकुडी में हिन्दी विरोधी विरोध प्रदर्शन में उनकी भागीदारी, तमिल राजनीति में अपनी जड़ मजबूत करने में करूणानिधि के लिए मददगार साबित होने वाला पहला प्रमुख कदम था। इस औद्योगिक नगर को उस समय [[उत्तर भारत]] के एक शक्तिशाली मुग़ल के नाम पर ''डालमियापुरम'' कहा जाता था। विरोध प्रदर्शन में करूणानिधि और उनके साथियों ने रेलवे स्टेशन से हिन्दी नाम को मिटा दिया और रेलगाड़ियों के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए पटरी पर लेट गए। इस विरोध प्रदर्शन में दो लोगों की मौत हो गई और करूणानिधि को गिरफ्तार कर लिया गया।<ref name="ramaswamy2210">{{cite book | first=Sumathy| last=Ramaswamy| authorlink=|author2= | origyear=| year=1997| title= Passions of the tongue: language devotion in Tamil India, 1891-1970 |edition= | publisher=University of California Press| location= | id= ISBN 0-520-20805-6 ISBN 978-0-520-20805-6| pages=226| url=http://www.escholarship.org/editions/view?docId=ft5199n9v7&chunk.id=s2.2.10&toc.depth=1&toc.id=s1.2.8&brand=ucpress}}</ref>
=== सत्ता प्राप्ति ===
करूणानिधि को तिरुचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई विधानसभा से 1957 में तमिलनाडु विधानसभा के लिए पहली बार चुना गया। वे 1961 में डी॰एम॰के॰ कोषाध्यक्ष बने और 1962 में राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने और 1967 में जब डी॰एम॰के॰ सत्ता में आई तब वे सार्वजनिक कार्य मंत्री बने। जब 1969 में अन्नादुरई की मौत हो गई तब करूणानिधि को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बना दिया गया। तमिलनाडु राजनीतिक क्षेत्र में अपने लंबे करियर के दौरान वे पार्टी और सरकार में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं।
मई 2006 के चुनाव में अपने गठबंधन द्वारा अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी [[जयललिता|जे॰ जयललिता]] के हारने के बाद उन्होंने 13 मई 2006 को [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला।<ref name="autogenerated1">{{Cite web |url=http://specials.rediff.com/election/2006/apr/25sld01.htm |title=rediff.com: asdadadaadav fsafsdfs fasfsf: The Sachin of TN politics |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110210162003/http://specials.rediff.com/election/2006/apr/25sld01.htm |archive-date=10 फ़रवरी 2011 |url-status=dead }}</ref> वे {{As of|2006|alt=currently}} तमिलनाडु राज्य की विधानसभा के सेन्ट्रल [[चेन्नई]] के चेपौक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। तमिलनाडु विधानसभा में उन्हें 11 बार और अब समाप्त हो चुके तमिलानडु विधान परिषद में एक बार निर्वाचित किया गया।<ref>[http://www.ndtv.com/template/template.asp?id=12428&template=tamilnadu&callid=1 NDTV.com: लेटेस्ट न्यूज़, ई-बुलेटिन, स्टॉक्स, बॉलीवुड, क्रिकेट, वीडियो, ब्लॉग, आरएसएस फ्रॉम इंडिया]</ref>
==== विधान सभा के सदस्य (विधायक) ====
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" style="margin:1em 1em 1em 0;background:#f9f9f9;border:1px #aaa solid;border-collapse:collapse;font-size:95%"
|- bgcolor="#CCCCCC" align="center"
! वर्ष
! निर्वाचित/पुनर्निर्वाचित
! स्थान
|-
| 1957
| निर्वाचित
| कुलितलाई
|-
| 1962
| निर्वाचित
| [[तंजावुर]]
|-
| 1967
| निर्वाचित
| सैदापेट
|-
| 1971
| पुनर्निर्वाचित
| सैदापेट
|-
| 1977
| निर्वाचित
| अन्ना नगर
|-
| 1980
| पुनर्निर्वाचित
| अन्ना नगर
|-
| 1989
| निर्वाचित
| हार्बर
|-
| 1991
| पुनर्निर्वाचित
| हार्बर
|-
| 1996
| निर्वाचित
| चेपॉक
|-
| 2001
| पुनर्निर्वाचित
| चेपॉक
|-
| 2006
| पुनर्निर्वाचित
| चेपॉक
|}
==== विधायिका में पद ====
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" style="margin:1em 1em 1em 0;background:#f9f9f9;border:1px #aaa solid;border-collapse:collapse;font-size:95%"
|- bgcolor="#CCCCCC" align="center"
! साल से
! वर्ष तक
! पद
|-
| 1962
| 1967
| विपक्ष के उप नेता
|-
| 1967
| 1969
| लोक निर्माण के कैबिनेट मंत्री
|-
| 1977
| 1980
| विपक्ष नेता
|-
| 1980
| 1983
| विपक्ष नेता
|-
| 1984
| बाद
| विधान परिषद के लिए निर्वाचित
|}
==== मुख्यमंत्री ====
{| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" style="margin:1em 1em 1em 0;background:#f9f9f9;border:1px #aaa solid;border-collapse:collapse;font-size:95%"
|- bgcolor="#CCCCCC" align="center"
! साल से
! वर्ष तक
! चुनाव
|-
| 1969
| 1971
| तमिलनाडु राज्य विधानसभा चुनाव, 1967
|-
| 1971
| 1976
| तमिलनाडु राज्य विधानसभा चुनाव, 1971
|-
| 1989
| 1991
| तमिलनाडु राज्य विधानसभा चुनाव, 1989
|-
| 1996
| 2001
| तमिलनाडु राज्य विधानसभा चुनाव, 1996
|-
| 2006
| 2011
| तमिलनाडु राज्य विधानसभा चुनाव, 2011
|}
== साहित्य ==
करुणानिधि [[तमिल साहित्य]] में अपने योगदान के लिए मशहूर हैं। उनके योगदान में कविताएं, चिट्ठियाँ, पटकथाएं, उपन्यास, जीवनी, ऐतिहासिक उपन्यास, मंच नाटक, संवाद, गाने इत्यादि शामिल हैं। उन्होंने [[तिरुक्कुरल]], थोल्काप्पिया पूंगा, पूम्बुकर के लिए ''कुरालोवियम'' के साथ-साथ कई कविताएं, निबंध और किताबें लिखी हैं।
साहित्य के अलावा करूणानिधि ने कला एवं स्थापत्य कला के माध्यम से [[तमिल भाषा]] में भी योगदान दिया है। कुरालोवियम की तरह, जिसमें कलाईनार ने [[तिरुक्कुरल]] के बारे में लिखा था, वल्लुवर कोट्टम के निर्माण के माध्यम से उन्होंने तिरुवल्लुवर, चेन्नई, तमिलनाडु में अपनी स्थापत्य उपस्थिति का परिचय दिया है। कन्याकुमारी में करूणानिधि ने तिरुवल्लुवर की एक 133 फुट ऊँची मूर्ति का निर्माण करवाया है जो उस विद्वान के प्रति उनकी भावनाओं का चित्रण करता है।
=== पुस्तकें ===
करुणानिधि द्वारा लिखित पुस्तकों में शामिल हैं: ''रोमपुरी पांडियन'', ''तेनपांडि सिंगम'', ''वेल्लीकिलमई'', ''नेंजुकू नीदि'', ''इनियावई इरुपद'', ''संग तमिल'', ''कुरालोवियम'', ''पोन्नर शंकर'', और ''तिरुक्कुरल उरई'' . उनकी गद्य और पद्य की पुस्तकों की संख्या 100 से भी अधिक है।
=== मंचकला ===
करुणानिधि के नाटकों में शामिल हैं: ''मनिमागुडम'', ''ओरे रदम'', ''पालानीअप्पन'', ''तुक्कु मेडइ'', ''कागिदप्पू'', ''नाने एरिवाली'', ''वेल्लिक्किलमई'', ''उद्यासूरियन'' और ''सिलप्पदिकारम'' .
=== पटकथायें ===
20 वर्ष की आयु में करुणानिधि ने ज्यूपिटर पिक्चर्स के लिए पटकथा लेखक के रूप में कार्य शुरु किया। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ''राजकुमारी'' से लोकप्रियता हासिल की। पटकथा लेखक के रूप में उनके हुनर में यहीं से निखार आना शुरु हुआ। उनके द्वारा लिखी गई 75 पटकथाओं में शामिल हैं: ''राजकुमारी'', ''अबिमन्यु'', ''मंदिरी कुमारी'', ''मरुद नाट्टू इलवरसी'', ''मनामगन'', ''[[देवकी]]'', ''पराशक्ति'', ''पनम'', ''तिरुम्बिपार'', ''नाम'', ''मनोहरा'', ''अम्मियापन'', ''मलाई कल्लन'', ''रंगून राधा'', ''राजा रानी'', ''पुदैयाल'', ''पुदुमइ पित्तन'', ''एल्लोरुम इन्नाट्टु मन्नर'', ''कुरावांजी'', ''ताइलापिल्लई'', ''कांची तलैवन'', ''पूम्बुहार'', ''पूमालई'', ''मनी मगुड्म'', ''मारक्क मुडियुमा?'', ''अवन पित्तना?'', ''पूक्कारी'', ''निदिक्कु दंडानई'', ''पालईवना रोजाक्कल'', ''पासा परावाईकल'', ''पाड़ाद थेनीक्कल'', ''नियाय तरासु'', ''पासाकिलिग्ल'', ''कन्नम्मा'', ''यूलियिन ओसई'', ''पेन सिन्गम'' और ''इलइज्ञइन'' .
=== संपादक और प्रकाशक ===
उन्होंने 10 अगस्त 1942 को [https://web.archive.org/web/20190526095758/http://www.murasoli.in/ ''मुरासोली'' ] का आरम्भ किया। अपने बचपन में वे ''मुरासोली'' नामक एक मासिक अखबार के संस्थापक सम्पादक और प्रकाशक थे जो बाद में एक साप्ताहिक और अब एक दैनिक अखबार बन गया है। उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा से संबंधित मुद्दों को जनता के सामने लाने के लिए एक पत्रकार और कार्टूनिस्ट के रूप में अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल किया। वह अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को नाम से संबोधित करके रोज चिट्ठी लिखते हैं; वह 50 वर्षोंं से ये चिट्ठियाँ लिखते आ रहे थे।
इसके अलावा उन्होंने ''कुडियारसु'' के सम्पादक के रूप में काम किया है और ''मुत्तारम'' पत्रिका को अपना काफी समय दिया है। वे स्टेट गवर्नमेंट्स न्यूज़ रील, अरासु स्टूडियो और तमिल एवं अंग्रेज़़ी में प्रकाशित होने वाली सरकारी पत्रिका ''तमिल अरासु'' के भी संस्थापक हैं।
=== विश्व तमिल सम्मेलन ===
उन्होंने 1970 में पेरिस में आयोजित तृतीय विश्व तमिल सम्मलेन के उद्घाटन दिवस पर और 1987 में कुआलालंपुर (मलेशिया) में आयोजित षष्ठ विश्व तमिल सम्मलेन के उद्घाटन दिवस पर भी विशेष भाषण दिया।
उन्होंने विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मलेन 2010 के लिए आधिकारिक विषय गीत "सेम्मोज्हियाना तमिज्ह मोज्हियाम" लिखा जिसे उनके अनुरोध पर [[अल्लाह रक्खा रहमान|ए॰आर॰ रहमान]] ने संगीतबद्ध किया।
== पुरस्कार और खिताब ==
* उन्होंने कभी-कभी प्यार से ''कलाईनार'' और ''मुथामिझ कविनार'' भी कहा जाता है।{{Citation needed|date=मई 2010}}
* [[अन्नामलाई विश्वविद्यालय|अन्नामलई विश्वविद्यालय]] ने 1971 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। {{Citation needed|date=मई 2010}}
* "थेनपंदी सिंगम" नामक किताब के लिए उन्हें तमिल विश्वविद्यालय, [[तंजावुर]] द्वारा "राजा राजन पुरस्कार" से सम्मानित किया गया। {{Citation needed|date=मई 2010}}
* 15 दिसम्बर 2006 को तमिलनाडु के राज्यपाल और मदुराई कामराज विश्वविद्यालय के चांसलर महामहिम थिरु सुरजीत सिंह बरनाला ने 40वें वार्षिक समारोह के अवसर पर मुख्यमंत्री को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित किया।<ref>{{Cite web |url=http://www.tn.gov.in/pressrelease/pr151206/pr151206d.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20061219203238/http://www.tn.gov.in/pressrelease/pr151206/pr151206d.htm |archive-date=19 दिसंबर 2006 |url-status=dead }}</ref>
* जून 2007 में<ref name="FriendYaaraanNewkerala">{{cite web |url= http://www.newkerala.com/news5.php?action=fullnews&id=35258 |title= TMMK to confer Karunanidhi with 'Friend of the Community' title |author= United News of India |work= newkerala.com |date= 3 जून 2007 |quote= [[चेन्नई]], जून 3: Tamil Nadu Chief Minister and DMK President M Karunanidhi, who turned 84 today, will be conferred with the 'Friend of the Muslim Community' title by the Tamil Nadu Muslim Makkal Katchi. |access-date= 15 मार्च 2011 |archive-url= https://web.archive.org/web/20070926232348/http://www.newkerala.com/news5.php?action=fullnews&id=35258 |archive-date= 26 सितंबर 2007 |url-status= live }}</ref><ref name="FriendYaaraanOneindia">{{cite web |url= http://news.oneindia.in/2007/06-1/03/tmmk-to-confer-karunanidhi-with-friend-of-the-community-title-1180859680.html |title= MK awarded 'Friend of the Community' title |author= United News of India |work= oneindia.in |date= 3 जून 2007 |quote= |access-date= 15 मार्च 2011 |archive-date= 9 मई 2008 |archive-url= https://web.archive.org/web/20080509190259/http://www.robotstxt.org/ |url-status= dead }}</ref><ref name="FriendYaaraanWebindia">{{cite web |url= http://news.webindia123.com/news/Articles/India/20070604/677337.html |title= Karunanidhi turns 84 |author= United News of India |work= news.webindia123.com |date= 4 जून 2007 |quote= The Tamil Nadu Muslim Makkal Katchi has decided to confer 'Yaaraan-E-Millath (meaning friend of the Muslim community) title on Mr Karunanidhi to mark the occasion. |access-date= 15 मार्च 2011 |archive-url= https://web.archive.org/web/20120517033748/http://news.webindia123.com/news/Articles/India/20070604/677337.html |archive-date= 17 मई 2012 |url-status= dead }}</ref> तमिलनाडु मुस्लिम मक्कल काची ने घोषणा की कि यह एम॰ करूणानिधि को 'मुस्लिम समुदाय के दोस्त' (यारां-ए-मिल्लाथ') प्रदान करेगा।
== विवाद ==
उन पर सरकारिया कमीशन द्वारा वीरानम परियोजना के लिए निविदाएं आवंटित करने में भष्टाचार का आरोप लगाया गया है।<ref>{{Cite web |url=http://www.hinduonnet.com/2001/06/10/stories/0410223a.htm |title=हिंदू: व्हाट दी सरकारिया कमिशन |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20101205052213/http://www.hinduonnet.com/2001/06/10/stories/0410223a.htm |archive-date=5 दिसंबर 2010 |url-status=dead }}</ref>
इन्दिरा गांधी ने संभावित अलगाव और भ्रष्टाचार के आरोप के आधार पर करूणानिधि सरकार को ख़ारिज कर दिया। <ref>[http://blogs.expressindia.com/showblogdetails.php?contentid=229744 राम सेतु एंड करुणानिधि]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
2001 में करुणानिधि, पूर्व मुख्य सचिव के॰ए॰ नाम्बिआर और अन्य कई लोगों के एक समूह को चेन्नई में फ्लाईओवर बनाने में भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।<ref>{{Cite web |url=http://www.hinduonnet.com/fline/fl1815/18150280.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110606103619/http://www.hinduonnet.com/fline/fl1815/18150280.htm |archive-date=6 जून 2011 |url-status=dead }}</ref>
उन्हें और उनकी पार्टी के सदस्यों पर आई॰पी॰सी॰ की धारा 120(b) (आपराधिक षड्यन्त्र), 167 (घायल करने के इरादे से सरकारी कर्मचारी द्वारा गलत दस्तावेज का निर्माण), 420 (धोखाधड़ी) और 409 (विश्वास का आपराधिक हनन) और भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा 13(1)(d) के साथ 13(2) के तहत कई आरोप लगाए गए लेकिन उनके और उनके बेटे एम॰के॰ स्टालिन के ख़िलाफ़ कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। <ref>{{Cite web |url=http://www.blonnet.com/businessline/2001/07/01/stories/14015501.htm |title=करुणानिधि हेल्ड इन प्री-डाउन स्वूप -- जेल्ड ऑन करेप्शन चार्जेज |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20060601062532/http://www.blonnet.com/businessline/2001/07/01/stories/14015501.htm |archive-date=1 जून 2006 |url-status=dead }}</ref>
=== राम सेतु से संबंधित टिप्पणियाँ ===
सेतुसमुद्रम विवाद के जवाब में करूणानिधि ने हिन्दू भगवान [[श्रीराम|राम]] के वजूद पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा:
{{quotation|Some say there was a person over 17 lakh years ago. His name was Rama. Do not touch the bridge (Ramar Sethu) constructed by him. Who is this Rama? From which engineering college did he graduate? Is there any proof for this?<ref>[http://www.newindpress.com/NewsItems.asp?ID=IET20070918000319&Title=Southern+News+-+Tamil+Nadu&rLink=0 Which engineering college did Rama study, asks Karuna] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20071109172331/http://www.newindpress.com/NewsItems.asp?ID=IET20070918000319&Title=Southern+News+-+Tamil+Nadu&rLink=0 |date=9 नवंबर 2007 }} New Ind Press - सितंबर 18, 2007</ref>}}
उनकी टिप्पणियों ने विवाद की इस आग में घी का काम किया। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने करूणानिधि पर धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया और कहा कि "हम करूणानिधि से यह जानना चाहते हैं कि क्या वे किसी अन्य धर्म के किसी धार्मिक प्रमुख के खिलाफ इस तरह का बयान करेंगे; जिसका जवाब 'नहीं' है।"<ref>[http://ia.rediff.com/news/2007/sep/17sethu2.htm करुणा अर्न्स बीजेपी वर्थ फॉर कमेंट्स ऑन लॉर्ड राम] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120314005214/http://ia.rediff.com/news/2007/sep/17sethu2.htm |date=14 मार्च 2012 }} रेडिफ - 17 सितंबर 2007</ref>
राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के प्रवक्ता डी॰पी॰ त्रिपाठी ने कहा, "राम के वजूद के सबूत पर सवाल खड़ा करने की क्या जरूरत है जब इतने सारे लोगों की उनमें पूरी आस्था है?"<ref name="pi">[http://www.dailypioneer.com/indexn12.asp?main_variable=front%5Fpage&file_name=story3%2Etxt&counter_img=3 डीएमके चीफ रबिशेस राम अगेन] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20181216032217/https://www.dailypioneer.com/indexn12.asp?main_variable=front%5Fpage&file_name=story3%2Etxt&counter_img=3 |date=16 दिसंबर 2018 }} दी पायोनियर - 20 सितम्बर 2007</ref>
इन बयानों के जवाब में करुणानिधि ने बेखटके कहा, "वैसे, [राम के वजूद के दावे को सही साबित करने के लिए] यहाँ न तो वाल्मीकि मौजूद हैं और न ही राम। यहाँ केवल एक ऐसा समूह है जो लोगों को बेवक़ूफ़ समझता है। वे गलत साबित होंगे।<ref name="pi"/>
कई दिनों बाद, उन्होंने टिप्पणी की:
{{quotation|I have not said anything more than Valmiki, who authored Ramayana. Valmiki had even stated that Rama was a drunkard. Have I said so?<ref>[http://www.andranews.net/India/2007/सितंबर/20-Valmiki-Rama-16388.asp As per Valmiki, Rama was a drunkard: Karunanidhi]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} AndhraNews.net</ref>}}
=== एल॰टी॰टी॰ई॰ के साथ संबंध ===
[[राजीव गांधी]] की हत्या की जाँच करने वाले जस्टिस जैन कमीशन की अंतरिम रिपोर्ट में करूणानिधि पर [[तमिल इलाम मुक्ति शेर|लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम]] (एलटीटीई) को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था।<ref>{{Cite web |url=http://www.india-today.com/itoday/17111997/cov.html |title=इंडिया टुडे Cover Story [Jain Commission Revelations: Damning the DMK] |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150924034354/http://www.india-today.com/itoday/17111997/cov.html |archive-date=24 सितंबर 2015 |url-status=dead }}</ref> अंतरिम रिपोर्ट ने सिफारिश की कि राजीव गांधी के हत्यारों को बढ़ावा देने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम॰ करूणानिधि और डी॰एम॰के॰ पार्टी जिम्मेदार माना जाए। अंतिम रिपोर्ट में ऐसा कोई आरोप शामिल नहीं था।<ref>{{cite news | url=http://www.hindu.com/2004/02/14/stories/2004021405140100.htm | location=Chennai, भारत | work=द हिन्दू | title=No adverse comments on DMK leaders in Jain report | date=फ़रवरी 14, 2004 | access-date=15 मार्च 2011 | archive-url=https://web.archive.org/web/20101229225814/http://www.hindu.com/2004/02/14/stories/2004021405140100.htm | archive-date=29 दिसंबर 2010 | url-status=live }}</ref>
अप्रैल 2009 में करूणानिधि ने एक विवादस्पद टिप्पणी की कि "प्रभाकरण मेरा अच्छा दोस्त है" और यह भी कहा कि "राजीव गांधी की हत्या के लिए भारत एल॰टी॰टी॰ई॰ को कभी माफ नहीं कर सकता"।<ref>{{Cite web |url=http://ibnlive.in.com/news/karunanidhi-flip-flops-says-cant-forgive-ltte/90663-37.html |title=करुणानिधि फ्लिप फ्लॉप, सेज़ कांट फोरगिव एलटीटीई |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20121016070022/http://ibnlive.in.com/news/karunanidhi-flip-flops-says-cant-forgive-ltte/90663-37.html |archive-date=16 अक्तूबर 2012 |url-status=live }}</ref>
=== कुलपक्षपात का आरोप ===
करूणानिधि के विरोधियों, उनकी पार्टी के कुछ सदस्यों और अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने करूणानिधि पर कुलपक्षपात को बढ़ावा देने और नेहरु-गांधी परिवार की तरह एक राजनीतिक वंश का आरम्भ करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। डी॰एम॰के॰ को छोड़ कर जाने वाले वाइको की आवाज़ सबसे बुलंद है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एम॰के॰ स्टालिन और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए एक खतरे के रूप में वाइको को दरकिनार कर दिया गया।
उनके भतीजा स्वर्गीय मुरासोली मारन एक केन्द्रीय मंत्री थे; हालाँकि इस बात पर ध्यान दिलाया गया है कि 1969 में करूणानिधि के मुख्यमंत्री बनने से काफी समय पहले से वे राजनीति में थे। उन्हें 1965 में हिन्दी विरोधी आंदोलन सहित कई अन्य मामलों में गिरफ्तार किया गया। उनसे 1967 में दक्षिण मद्रास का उपचुनाव लड़ने के लिए कहा गया और राजाजी, अन्नादुरई और मोहम्मद इस्माइल (कायद-ए-मिल्लाथ) ने नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर किए जिससे यह पता चलता है कि उनका राजनीतिक करियर पूरी तरह से करूणानिधि के साथ अपने रिश्ते की बुनियाद पर नहीं खड़ा था।<ref>{{Cite web |url=http://news.indiainfo.com/2003/11/23/23maran1.html |title=मारन - दी आईज एंड इयर्स ऑफ डीएमके इन डेल्ही |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110617023328/http://news.indiainfo.com/2003/11/23/23maran1.html |archive-date=17 जून 2011 |url-status=dead }}</ref>
कई राजनीतिक विरोधियों और डी॰एम॰के॰ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी में एम॰के॰ स्टालिन की उत्थान की आलोचना की है। लेकिन पार्टी के कुछ लोगों ने बताया है कि स्टालिन ने अपने दम पर उन्नति की है। उन्होंने 1975 के बाद से काफी मुश्किलों का सामना किया है जब उन्हें आतंरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट/एम॰आई॰एस॰ए॰) के तहत जेल भेज दिया गया और जेल में उन्हें आपातकाल के दौरान इतनी बुरी तरह से पीटा गया कि उन्हें बचाने की कोशिश में डी॰एम॰के॰ पार्टी के साथी कैदी की मौत हो गई।<ref>{{Cite web |url=http://www.india-today.com/itoday/19991101/stalin.html |title=पॉलिटिक्स: स्पेशल सीरीज; एम के स्टालिन |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150924034411/http://www.india-today.com/itoday/19991101/stalin.html |archive-date=24 सितंबर 2015 |url-status=dead }}</ref> 1989 और 1996 में स्टालिन को विधायक बनाया गया था जब उनके पिता करूणानिधि मुख्यमंत्री थे लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था। वे 1996 में चेन्नई के 44वें मेयर और इसके पहली बार प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित मेयर बने। विधायक के रूप में केवल अपने चौथे कार्यकाल में ही वे करूणानिधि के मंत्रिमंडल के एक मंत्री थे।
करूणानिधि पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा टेलीविजन नेटवर्क सन नेटवर्क चलाने वाले कलानिधि मारन (मुरासोली मारन के पुत्र) की मदद करने का आरोप लगाया गया है। फोर्ब्स के मुताबिक कलानिधि भारत के 2.9 बिलियन डॉलर की सम्पत्ति वाले 20 सबसे बड़े रईसों में से हैं।<ref>{{cite news | url=http://www.forbes.com/lists/2010/10/billionaires-2010_The-Worlds-Billionaires_CountryOfCitizen_11.html | work=Forbes | title=The World's Billionaires Page 11 of 41 | date=मार्च 10, 2010 | access-date=15 मार्च 2011 | archive-url=https://web.archive.org/web/20110221235357/http://www.forbes.com/lists/2010/10/billionaires-2010_The-Worlds-Billionaires_CountryOfCitizen_11.html | archive-date=21 फ़रवरी 2011 | url-status=live }}</ref> इसके अलावा टीकाकारों का कहना है कि उन्होंने अपनी योग्यता के आधार पर इस स्थिति को प्राप्त किया है और यहाँ तक कि करूणानिधि के बेटों ने भी उनकी तुलना में कुछ हासिल नहीं किया जो उनके बीच के टकराव का एक कारण रहा है। उनके चैनलों ने डी॰एम॰के॰ पार्टी के प्रवक्ता की तरह काम किया है (हाल के समय तक) और ए॰आई॰ए॰डी॰एम॰के॰ की जया टीवी के साथ संतुलन स्थापित करने में मदद की है।
दयानिधि मारन (मारन का एक अन्य बेटा) संचार एवं आई॰टी॰ विभाग, न कि प्रसारण मंत्रालय, के एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं जो टी॰वी॰ नेटवर्क के लिए जिम्मेदार है। दयानिधि मारन को केन्द्र के आई॰टी॰ एवं संचार विभाग से निकाल दिया गया (वे आई॰टी॰ एवं सचार विभाग के एक केन्द्रीय मंत्री थे) क्योंकि दिनाकरन (मारन भाइयों द्वारा संचालित अखबार) में प्रदर्शित एक सार्वजनिक मतदान के परिणाम के अनुसार दयानिधि मारन करूणानिधि के उत्तारधिकारी थे। इससे दिनाकरन कार्यालय की मदुराई शाखा में खूनी हिंसा (एम॰के॰ अज़गिरी द्वारा कार्यान्वित) भड़क उठी जिसकी वजह से तीन कर्मचारियों की मौत हो गई। इसे एक बार फिर करूणानिधि परिवार के वंश विवाद के एक परिणाम के रूप में देखा गया।
इस बात का ज़िक्र किया गया है कि करूणानिधि को अपने परिवार के भूले-भटके सदस्यों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में संकोच होता है हालाँकि गलत कार्य करने<ref>{{Cite web |url=http://www.tehelka.com/story_main18.asp?filename=Ne051306up_close.asp |title=तहलका - दी पीपुल्स पेपर |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://archive.today/20120911130612/http://www.tehelka.com/story_main18.asp?filename=Ne051306up_close.asp |archive-date=11 सितंबर 2012 |url-status=dead }}</ref> का दोषी पाए जाने पर उन्होंने अपने अन्य दो बेटों एम॰के॰ मुथु और एम॰के॰ अज़गिरी को निष्कासित कर दिया था और इसी तरह दयानिधि मारन को केन्द्रीय मंत्री पद से हटा दिया था (जिसके कारण का उल्लेख पिछले अनुच्छेद में किया गया है)।
बाद में उन पर दिनाकरन अखबार के कार्यालय पर एम॰के॰ अज़गिरी के समर्थकों द्वारा हमला किए जाने और तीन लोगों की मौत (जैसा कि ऊपर बताया गया है) होने के बाद एम॰के॰ अज़गिरी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया है। एम॰के॰ अज़गिरी पूर्व डी॰एम॰के॰ मंत्री किरुत्तिनन की हत्या के मामले के मुख्य अभियुक्त हैं।
करूणानिधि पर अज़गिरी को मदुराई में एक बेलगाम प्राधिकारी के रूप में कार्य करने की अनुमति प्रदान करने का भी आरोप है।<ref>{{cite news | url=http://www.hindu.com/thehindu/2003/08/19/stories/2003081902600400.htm | location=Chennai, भारत | work=द हिन्दू | title=Charge sheet filed against Azhagiri in Kiruttinan case | date=अगस्त 19, 2003 | access-date=15 मार्च 2011 | archive-url=https://web.archive.org/web/20121110042400/http://www.hindu.com/thehindu/2003/08/19/stories/2003081902600400.htm | archive-date=10 नवंबर 2012 | url-status=live }}</ref> दिनाकरन अखबार से संबंधित मामले को सी॰बी॰आई॰ को सौंप दिया गया। लेकिन जिला एवं सत्र अदालत ने उस मामले के सभी 17 मुलजिमों को बरी कर दिया। <ref>{{Cite web |url=http://www.hindu.com/2009/12/10/stories/2009121059620100.htm |title=दी हिंदू : ऑल एक्विटेड इन दिनाकरन केस |access-date=15 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100213171903/http://www.hindu.com/2009/12/10/stories/2009121059620100.htm |archive-date=13 फ़रवरी 2010 |url-status=live }}</ref> इस अपराध को अंजाम देने वालों की पहचान करने और उन्हें सजा दिलाने के लिए अब तक इस मामले को किसी उच्च अदालत में पेश नहीं किया गया है।
उनकी बेटी कानिमोझी को राज्य सभा पद के लिए मनोनीत किया गया है।
== व्यक्तिगत जीवन ==
वे पहले मांसाहारी थे लेकिन बाद में शाकाहारी हो गये थे।<ref>{{Cite web |url=http://www.chennaionline.com/colnews/newsitem.asp?NEWSID=%7B4EBFC7EE-7455-4DA3-8E4A-3599896D9098%7D&CATEGORYNAME=CHENNAI |title=संग्रहीत प्रति |access-date=16 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080506192204/http://www.chennaionline.com/colnews/newsitem.asp?NEWSID=%7B4EBFC7EE-7455-4DA3-8E4A-3599896D9098%7D&CATEGORYNAME=CHENNAI |archive-date=6 मई 2008 |url-status=dead }}</ref> उनका दावा था कि उनकी स्फूर्ति और सफलता का रहस्य उनके द्वारा दैनिक रूप से किया जाने वाला योगाभ्यास है।<ref>{{cite news | url=http://www.hindu.com/2005/10/01/stories/2005100107980100.htm | location=Chennai, भारत | work=द हिन्दू | title=Yoga keeps me going, says Karunanidhi | date=अक्टूबर 1, 2005 | access-date=15 मार्च 2011 | archive-url=https://web.archive.org/web/20121013032635/http://www.hindu.com/2005/10/01/stories/2005100107980100.htm | archive-date=13 अक्तूबर 2012 | url-status=live }}</ref> उन्होंने तीन बार शादी की; उनकी पत्नियाँ हैं पद्मावती, दयालु आम्माल और राजात्तीयम्माल।<ref>[http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1513322,prtpage-1.cms इन साउथ इंडिया, मोर दी मेरियर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090301094029/http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1513322,prtpage-1.cms |date=1 मार्च 2009 }} - [[द टाईम्स ऑफ़ इंडिया|दी टाइम्स ऑफ इंडिया]] 2 मई 2006</ref><ref>[http://www.rediff.com/news/1998/nov/02tn.htm राम, रावण बैटल अगेन इन टीएन] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111206040358/http://www.rediff.com/news/1998/nov/02tn.htm |date=6 दिसंबर 2011 }} - रेडिफ</ref><ref>{{cite news | url=http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1513322,prtpage-1.cms | work=The Times Of India | title=In South India, more the merrier | date=मई 2, 2006 | access-date=15 मार्च 2011 | archive-url=https://web.archive.org/web/20090301094029/http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1513322,prtpage-1.cms | archive-date=1 मार्च 2009 | url-status=live }}</ref>
उनके बेटे हैं एम॰के॰ मुत्तु, एम॰के॰ अलागिरी, एम॰के॰ स्टालिन और एम॰के॰ तामिलरसु। उनकी पुत्रियाँ हैं सेल्वी और कानिमोझी। कानिमोझी राज्यसभा की सांसद हैं। पद्मावती, जिनका देहावसान काफी जल्दी हो गया था, ने उनके सबसे बड़े पुत्र एम॰के॰ मुत्तु को जन्म दिया था। अज़गिरी, स्टालिन, सेल्वी और तामिलरासु दयालुअम्मल की संताने हैं, जबकि कनिमोझी उनकी तीसरी पत्नी राजात्तीयम्माल की पुत्री हैं।{{Citation needed|date= फ़रवरी 2010}}.. एक बुद्धिवादी होने के बावजूद बृहस्पति ग्रह शान्ति के लिए वे पीला वस्त्र पहनते थे।
== मंत्रिमंडल (कैबिनेट) ==
=== करुणानिधि का मंत्रिमंडल (13 मई 2006 - 16 मई 2011) ===
* एम. करुणानिधि: मुख्यमंत्री, लोक निर्माण विभाग, गृह, सामान्य प्रशासन, लोक सेवा, पुलिस, अल्पसंख्यक कल्याण, निषेध और राज्य आबकारी, तमिलनाडु सरकारी भाषायें, तमिल सांस्कृतिक के मंत्री.<ref name="councilofministers">{{cite web|title=Council of Ministers|publisher=Government of Tamil Nadu|url=http://www.tn.gov.in/tnassembly/ministers.htm|access-date=15 मार्च 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20061216005522/http://www.tn.gov.in/tnassembly/ministers.htm|archive-date=16 दिसंबर 2006|url-status=dead}}</ref>
* के. अन्बझगन: वित्त मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एर्कोट एन. वीरास्वामी: विद्युत मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एम. के. स्टालिन: उप मुख्यमंत्री, ग्रामीण विकास और स्थानीय प्रशासन मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* को। सी. मणि: सांख्यिकी और सहयोग मंत्री तथा एक पूर्व सैनिक<ref name="councilofministers"/>
* वीरापांडी एस. अरुमुगम: कृषि मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* दुराई मुरुगन: कानून मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* पोनमुडी: उच्च शिक्षा मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* के. एन. नेहरु: परिवहन मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एम.आर.के. पनीरसेल्वम: स्वास्थ्य मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* पोंगालुर एन. पालानीसामी: ग्रामीण उद्योग और पशुपालन मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* आई.पेरिआसामी: राजस्व और आवास मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एन. सुरेश राजन: पर्यटन और पंजीकरण मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* परिथि लाम्वाझुथी: सूचना मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* ई.वी. वेलू: खाद्य मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* सूबा थान्गावेलन: स्लम क्लीयरेंस और आवास मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* के.के.एस.एस.आर.रामचंद्रन: पिछड़े वर्गों के मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* टी.एम.एन्बरासन: श्रम मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* के.आर. पेरियाकरुप्पन: हिन्दू धर्म और धर्मार्थ दान मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* थंगम थेन्नारासु: स्कूल शिक्षा मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एस.एन.एम. उब्यादुल्लाह: वाणिज्यिक कर मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* टी.पी.एम. मोहिदीन खान: पर्यावरण मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* एन. सेल्वराज: वन मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* वेल्लाकोइल सेमिनाथन: राजमार्ग मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* पूनगोथई अलादी अरुणा: सूचना प्रौद्योगिकी संचार मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* गीता जीवन: सामाजिक कल्याण मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* तमिलारासी: आदि-द्रविडार कल्याण मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* के.पी.पी. सामी: मत्स्य पालन मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* यू.मथिवानन: डेयरी विकास मंत्री<ref name="councilofministers"/>
* के. रामचंद्रन: खादी मंत्री<ref name="councilofministers"/>
== इन्हें भी देखें ==
* [[राजनीतिक परिवारों की सूची]]
== सन्दर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
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{{Succession box| before = [[सी॰एन॰ अन्नादुरै]]| title = [[Chief Minister of Tamil Nadu]]<br />First Term (1969-1971)<br />Second Term (1971-1976)|years=1969-1976| after = [[मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन]] }}
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[[श्रेणी:1924 में जन्मे लोग]]
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/* साहब जी, मैं शशांक सैनी पहले मुंबई में 2024-25 फिर लखनऊ से जोमैटो का काम करता था साहब जी आर्थिक तंगी व बीमारी इलाज से हुए कर्ज के कारण काम छोड़ना पड़ गया मैं बहुत तनाव में हु मुझे सुसाइड के अलावा और कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है मैं अपने नरकीय जीवन से तंग आ गया हु। घर का इकलौता मैं ही कमाने वाला हु न खुद का घर है न कोई उचित कमाने का संसाधन मुंबई से तो काम करके पैसे भेजता था लेकिन पापा के बीमार हो जाने से घर की स्थिति और खराब हो गई उस कारण मुझे यहां वापस आना पड़...
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== साहब जी, मैं शशांक सैनी पहले मुंबई में 2024-25 फिर लखनऊ से जोमैटो का काम करता था साहब जी आर्थिक तंगी व बीमारी इलाज से हुए कर्ज के कारण काम छोड़ना पड़ गया मैं बहुत तनाव में हु मुझे सुसाइड के अलावा और कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है मैं अपने नरकीय जीवन से तंग आ गया हु। घर का इकलौता मैं ही कमाने वाला हु न खुद का घर है न कोई उचित कमाने का संसाधन मुंबई से तो काम करके पैसे भेजता था लेकिन पापा के बीमार हो जाने से घर की स्थिति और खराब हो गई उस कारण मुझे यहां वापस आना पड़ गया था अब मेरे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है नाते रिश्तेदारों का और बैंक लोन का कर्ज बहुत चढ़ गया है कर्जदार आए दिन अपना पैसा मांगते है घर चलाना मुश्किल हो गया है ऊपर से बच्चों की पढ़ाई लिखाई उनकी फीस कॉपी किताब मैं अकेले सब नहीं कर पा रहा हु मेरे पास खुद का रोजगार करने तक का पैसे नहीं है। साहब जी मैं अपना कर्जदारों का कर्ज उतारकर बच्चों का दाखिला कराकर उनको स्कूल भेजना चाहता हु और छोटा सा अपना खुद का व्यापार करना चाहता हु। मुझे नया जीवन देने की कृपा करिए हमारे परिवार को आपके सहानुभूति की जरूरत है। साहब जी मैडम जी मुझ गरीब पर 1 बार विचार विमर्श करने की कृपा करिए। ==
साहब जी,
मैं शशांक सैनी पहले मुंबई में 2024-25 फिर लखनऊ से जोमैटो का काम करता था साहब जी आर्थिक तंगी व बीमारी इलाज से हुए कर्ज के कारण काम छोड़ना पड़ गया मैं बहुत तनाव में हु मुझे सुसाइड के अलावा और कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है मैं अपने नरकीय जीवन से तंग आ गया हु। घर का इकलौता मैं ही कमाने वाला हु न खुद का घर है न कोई उचित कमाने का संसाधन मुंबई से तो काम करके पैसे भेजता था लेकिन पापा के बीमार हो जाने से घर की स्थिति और खराब हो गई उस कारण मुझे यहां वापस आना पड़ गया था अब मेरे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है नाते रिश्तेदारों का और बैंक लोन का कर्ज बहुत चढ़ गया है कर्जदार आए दिन अपना पैसा मांगते है घर चलाना मुश्किल हो गया है ऊपर से बच्चों की पढ़ाई लिखाई उनकी फीस कॉपी किताब मैं अकेले सब नहीं कर पा रहा हु मेरे पास खुद का रोजगार करने तक का पैसे नहीं है।
साहब जी मैं अपना कर्जदारों का कर्ज उतारकर बच्चों का दाखिला कराकर उनको स्कूल भेजना चाहता हु और छोटा सा अपना खुद का व्यापार करना चाहता हु।
मुझे नया जीवन देने की कृपा करिए हमारे परिवार को आपके सहानुभूति की जरूरत है।
साहब जी मैडम जी मुझ गरीब पर 1 बार विचार विमर्श करने की कृपा करिए। [[विशेष:योगदान/~2026-24930-47|~2026-24930-47]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-24930-47|वार्ता]]) 18:47, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
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[[File:Lachit Bust at NDA.jpg|thumb|right|300px|राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खड़कवासला में लाचित बरफुकन की प्रतिमा]]
'''लाचित बरफुकन''' [[असमिया भाषा|असमिया:]] লাচিত বৰফুকন / लाचित बरफुकन) [[आहोम साम्राज्य]] के एक सेनापति और [[बरफूकन]] थे, जो कि सन 1671 में हुई [[सराईघाट का युद्ध|सराईघाट की लड़ाई]] में अपनी नेतृत्व-क्षमता के लिए जाने जाते हैं, जिसमें [[असम]] पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए रामसिंह प्रथम के नेतृत्व वाली [[मुग़ल साम्राज्य|मुग़ल]] सेनाओं का प्रयास विफल कर दिया गया था। लगभग एक वर्ष बाद बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई।<ref>{{Cite web |url=http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20041025162428/http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |archive-date=25 अक्तूबर 2004 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.rediff.com/news/2003/jun/06inter.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20121023190622/http://www.rediff.com/news/2003/jun/06inter.htm |archive-date=23 अक्तूबर 2012 |url-status=live }}</ref>
== संक्षिप्त जीवन ==
[[चित्र:Lachit Barphukan's maidam.JPG|thumb|right|300px|हूलुंगपारा, जोरहाट में लाचित बरफुकन का स्मारक]] लाचित सेंग कालुक मो-साई (एक ताई-अहोम पुजारी) का चौथा पुत्र था।उनका जन्म सेंग-लॉन्ग मोंग, [[चराइडो]] में [[अहोम | ताई अहोम]] के परिवार में हुआ था।उनका धर्म फुरेलुंग अहोम था<ref>{{cite web |title=Vikaspedia |url=http://as.vikaspedia.in/education/9859b89ae9f0-9ac9c19f099e9cd99c9c0/9ae9ae9ae9ae |website=as.vikaspedia.in |publisher=India Development Gateway (InDG) |access-date=10 मार्च 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190304133922/http://as.vikaspedia.in/education/9859b89ae9f0-9ac9c19f099e9cd99c9c0/9ae9ae9ae9ae/ |archive-date=4 मार्च 2019 |url-status=live }}</ref>
लाचित बरफुकन ने मानविकी, शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक (''सोलधर बरुआ'') का पद, निज-सहायक के समतुल्य एक पद, सौंपा गया था जो कि किसी महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ या राजनेता के लिए पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता था। बोड़फुकन के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व वे अहोम राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक (''घोड़ बरुआ''), रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण सिमुलगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक (या ''दोलकक्षारिया बरुआ'') के पदों पर आसीन रहे.
राजा चक्रध्वज ने गुवाहाटी के शासक मुग़लों के विरुद्ध अभियान में सेना का नेतृत्व करने के लिए लाचित बोड़फुकन का चयन किया।<ref>4। 3। </ref> राजा ने उपहारस्वरूप लाचित को सोने की मूठ वाली एक तलवार (हेंगडांग) और विशिष्टता के प्रतीक पारंपरिक वस्त्र प्रदान किए. लाचित ने सेना एकत्रित की और 1667 की गर्मियों तक तैयारियां पूरी कर लीं गईं. लाचित ने मुग़लों के कब्ज़े से [[गुवाहाटी]] पुनः प्राप्त कर लिया और सराईघाट की लड़ाई में वे इसकी रक्षा करने में सफल रहे।
सराईघाट की विजय के लगभग एक वर्ष बाद प्राकृतिक कारणों से लाचित बरफुकन की मृत्यु हो गई। उनका मृत शरीर [[जोरहाट जिला|जोरहाट]] से 16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में विश्राम कर रहा है।
लाचित बोड़फुकन का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराना इतिवृत्त उनका वर्णन इस प्रकार करता है, "उनका मुख चौड़ा है और पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता है। कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता."
== सराईघाट की लड़ाई ==
{{मुख्य|सराईघाट की लड़ाई}}
[[File:Statue of Lachit Barphukan, at Lachit Ghat in Guwahati 11.jpg|left|thumb|गुवाहाटी में लाचित बोरफहुकोन की मूर्ति]]
लाचित और उनकी सेना द्वारा पराजित होने के बाद, मुगल सेना ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते [[ढाका]] से [[असम]] की ओर चलीं और [[गुवाहाटी]] की ओर बढ़ने लगीं. रामसिंह के नेतृत्व वाली मुग़ल सेना में 30,000 पैदल सैनिक, 15,000 तीरंदाज़, 18,000 तुर्की घुड़सवार, 5,000 बंदूकची और 1,000 से अधिक तोपों के अलावा नौकाओं का विशाल बेड़ा था।<ref>{{Cite web |url=http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20041025162428/http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |archive-date=25 अक्तूबर 2004 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.indianfolklore.org/journals/index.php/Ish/article/download/345/376 |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120425092941/http://www.indianfolklore.org/journals/index.php/Ish/article/download/345/376 |archive-date=25 अप्रैल 2012 |url-status=dead }}</ref>
लड़ाई के पहले चरण में [[मुग़ल साम्राज्य|मुग़ल]] सेनापति राम सिंह असमिया सेना के विरुद्ध कोई भी सफलता पाने में विफल रहा. रामसिंह के एक पत्र के साथ अहोम शिविर की ओर एक तीर छोड़ा गया, जिसमें लिखा था कि लाचित को एक लाख रूपये दिये गये थे और इसलिए उसे [[गुवाहाटी]] छोड़कर चला जाना चाहिए. यह पत्र अंततः अहोम राजा चक्रध्वज सिंह के पास पहुंचा। यद्यपि राजा को लाचित की निष्ठा और [[राष्ट्रभक्ति|देशभक्ति]] पर संदेह होने लगा था, लेकिन उनके [[प्रधानमन्त्री|प्रधानमंत्री]] अतन बुड़गोहेन ने राजा को समझाया कि यह लाचित के विरुद्ध एक चाल है।
सराईघाट की लड़ाई के अंतिम चरण में, जब [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] ने सराईघाट में नदी से आक्रमण किया, तो असमिया सैनिक लड़ने की इच्छा खोने लगे. कुछ सैनिक पीछे हट गए। यद्यपि लाचित गंभीर रूप से बीमार थे, फिर भी वे एक नाव में सवार हुए और सात नावों के साथ मुग़ल बेड़े की ओर बढे. उन्होंने सैनिकों से कहा, "यदि आप भागना चाहते हैं, तो भाग जाएं. महाराज ने मुझे एक कार्य सौंपा है और मैं इसे अच्छी तरह पूरा करूंगा. मुग़लों को मुझे बंदी बनाकर ले जाने दीजिए. आप महाराज को सूचित कीजिएगा कि उनके सेनाध्यक्ष ने उनके आदेश का पालन करते हुए अच्छी तरह युद्ध किया। उनके सैनिक लामबंद हो गए और ब्रह्मपुत्र नदी में एक भीषण युद्ध हुआ।
लाचित बोड़फुकन विजयी हुए. मुग़ल सेनाएं [[गुवाहाटी]] से पीछे हट गईं. [[मुग़ल साम्राज्य|मुग़ल]] सेनापति ने अहोम सैनिकों और अहोम सेनापति लाचित बोड़फुकन के हाथों अपनी पराजय स्वीकार करते हुए लिखा, "महाराज की जय हो! सलाहकारों की जय हो! सेनानायकों की जय हो!देश की जय हो! केवल एक ही व्यक्ति सभी शक्तियों का नेतृत्व करता है! यहां तक कि मैं राम सिंह, व्यक्तिगत रूप से युद्ध-स्थल पर उपस्थित होते हुए भी, कोई कमी या कोई अवसर नहीं ढूंढ सका! "
== लाचित दिवस ==
लाचित बोड़फुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय का स्मरण करने के लिए संपूर्ण [[असम]] राज्य में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को लाचित दिवस (साहित्य: लाचित दिवस) मनाया जाता है। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लाचित मैडल से सम्मानित किया जाता है, जिसका नाम लाचित बोड़फुकन के नाम पर रखा गया है।<ref>{{Cite web |url=http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20041025162428/http://www.hvk.org/articles/0801/92.html |archive-date=25 अक्तूबर 2004 |url-status=dead }}</ref>
== टिप्पणियां ==
{{Reflist}}
== सन्दर्भ ==
{{refbegin}}
* {{cite book
| last = Bhuyan
| first = S K
| title = Lachit Barphukan and His Times
| publisher = Lawyer's Book Stall
| year = 1947
| location = Guwahati
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* {{cite book
| last = Dowerah
| first = Swapon
| title = Lachit
| publisher = Macmillan India Ltd.
| year = 2000
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| isbn = }}
{{refend}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
*[https://www.panchjanya.com/Encyc/2019/11/25/-Shivaji-of-Northeast-India.html पूर्वोत्तर भारत के वीर योद्धा '''लचित बरफूकन'''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20191213152307/https://www.panchjanya.com/Encyc/2019/11/25/-Shivaji-of-Northeast-India.html |date=13 दिसंबर 2019 }}
*[https://www.bhartiyadharohar.com/lachit-barfukan/ लाचित बरफूकन की वीरता के कारण मुगल नहीं कर पाए थे पूर्वोत्तर भारत पर अधिकार]
* [https://web.archive.org/web/20041025162428/http://www.hvk.org/articles/0801/92.html लाचित बोड़फुकन के साहस और कौशल का अनुसरण करें]<span style="height:16px;padding-right:16px;width:16px" class="wrc11"></span> लेखक लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. सिन्हा
* [http://www.assam.org/mod.php?mod=userpage&menu=90409&page_id=178 लाचित बोड़फुकन] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20070310224244/http://www.assam.org/mod.php?mod=userpage&menu=90409&page_id=178 |date=10 मार्च 2007 }}<span style="height:16px;padding-right:16px;width:16px" class="wrc0"></span> लेखक: अजीत बरुआ
* [https://web.archive.org/web/20050317024828/http://news.indiainfo.com/2003/01/19/19togadia.html असम के समूह राष्ट्रवाद के पथ का अनुसरण करेंगे: डॉक्टर तोगड़िया]<span style="height:16px;padding-right:16px;width:16px" class="wrc0"></span> IndiaInfo - 19 जनवरी 2003
{{Persondata <!-- मेटाडाटा: [[विकिपीडिया:व्यक्तिगत आँकड़े]] देखें। -->
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}}
{{असम के प्रसिद्ध व्यक्ति}}
[[श्रेणी:1671 में होने वाली मौतें]]
[[श्रेणी:असम के लोग]]
[[श्रेणी:असम का इतिहास]]
[[श्रेणी:गूगल परियोजना]]
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हंसा मेहता
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Suyash.dwivedi
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चित्र लगाया/चित्रदीर्घा
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wikitext
text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=हंसा जीवराज मेहता|image=Hansa Jivraj Mehta.jpg|caption=|birth_name=|birth_date={{Birth date|1897|07|03|df=y}}|birth_place=|death_date={{Death date and age|1995|04|04|1897|07|03|df=y}}|death_place=|nationality=|other_names=|occupation=|known_for=|spouse=जीवराज नारायण मेहता}}<span data-segmentid="27" class="cx-segment">'''हंसा जीवराज मेहता''' ([[गुजराती भाषा|गुजराती]]<nowiki/>- હંસા જીવરાજ મહેતા, 3 जुलाई सन् 1897 - 4 अप्रैल 1995) <ref name="Gujarati Vishwakosh">{{Cite book|title=Gujarati Vishwakosh (Gujarati Encyclopedia)|last=Trivedi|first=Shraddha|publisher=[[Gujarati Vishwakosh|Gujarati Vishwakosh Trust]]|year=2002|volume=Vol. 15|location=Ahmedabad|page=540|oclc=248968453}}</ref> [[भारत]] की एक सुधारवादी, [[समाज कार्य|सामाजिक कार्यकर्ता]], [[शिक्षाशास्त्री|शिक्षाविद]], स्वतंत्रता सेनानी, [[नारीवाद]]ी और [[लेखक|लेखिका]] थीं। <ref name="c">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=TMFxy44dWBMC|title=Gandhi's Passion: The Life and Legacy of Mahatma Gandhi|last=Wolpert|first=Stanley|date=5 April 2001|publisher=Oxford University Press|isbn=9780199923922|page=149}}</ref><ref name="a">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=Kfs4Cns3nJIC|title=Women Role Models: Some Eminent Women of Contemporary India|last=Srivastava|first=Gouri|publisher=Concept Publishing Company|year=2006|isbn=9788180693366|pages=14–16}}</ref></span> उनके पिता मनुभाई मेहता [[वड़ोदरा|बड़ौदा]] और [[बीकानेर]] रियासतों के दीवान थे। पत्रकारिता और समाजशास्त्र में उच्च शिक्षा के लिए वे १९१९ ई॰ में इंग्लैंड चली गईं। १९४१ ई॰ से १९५८ ई॰ तक [[बड़ौदा विश्वविद्यालय]] की वाइस चांसलर के रूप में हंसा मेहता ने शिक्षा जगत में अपनी छाप छोड़ी।<ref>{{cite book|last=Jain|first=Devaki|title=Women, Development and the UN|url=https://archive.org/details/womendevelopment00jain|year=2005|publisher=Indiana University Press|location=Bloomington|page=[https://archive.org/details/womendevelopment00jain/page/n46 20]}}</ref>
१९५९ में उन्हें [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया गया था।<ref>{{cite web | url=http://www.indianautographs.com/productdetail-125454.html | title=Hansa Jivraj Mehta | publisher=Praful Thakkar's Thematic Gallery of Indian Autographs | accessdate=19 June 2016 | archive-url=https://web.archive.org/web/20160304041547/http://www.indianautographs.com/productdetail-125454.html | archive-date=4 मार्च 2016 | url-status=live }}</ref>
== प्रारंभिक जीवन ==
<span data-segmentid="30" class="cx-segment">हंसा मेहता का जन्म 3 जुलाई 1897 को [[बॉम्बे राज्य]]
(वर्तमान में [[गुजरात]]) के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था।</span> <span data-segmentid="31" class="cx-segment">वह [[ मनुभाई मेहता|मनुभाई मेहता]] की बेटी थी (जो तत्कालीन [[बड़ोदा राज्य|बड़ौदा राज्य]] के दीवान थे) और [[नंदशंकर मेहता]] की पोती, (जो [[गुजराती भाषा]] के पहले उपन्यास [[करण घेलो]] के लेखक थे)।<ref name="Gujarati Vishwakosh2">{{Cite book|title=Gujarati Vishwakosh (Gujarati Encyclopedia)|last=Trivedi|first=Shraddha|publisher=[[Gujarati Vishwakosh|Gujarati Vishwakosh Trust]]|year=2002|volume=Vol. 15|location=Ahmedabad|page=540|oclc=248968453}}</ref><ref name=":0">{{Cite news|url=https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|title=Hansa Jivraj Mehta: Freedom fighter, reformer; India has a lot to thank her for|date=2018-01-22|work=The Indian Express|access-date=2018-08-23|language=en-US|archive-url=https://web.archive.org/web/20190527201619/https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|archive-date=27 मई 2019|url-status=live}}</ref></span>
<span data-segmentid="36" class="cx-segment">उन्होंने 1918 में दर्शनशास्त्र में स्नातक किया, जिसके बाद</span> <span data-segmentid="37" class="cx-segment">उन्होंने [[इंग्लैण्ड|इंग्लैंड]] में [[पत्रकारिता]] और [[समाजशास्त्र]] का अध्ययन किया।</span> <span data-segmentid="38" class="cx-segment">1918 में</span> <span data-segmentid="37" class="cx-segment">वे</span> <span data-segmentid="38" class="cx-segment">[[सरोजिनी नायडू]] से और बाद में वह 1922 में [[महात्मा गांधी]] से मिलीं।<ref name=":02">{{Cite news|url=https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|title=Hansa Jivraj Mehta: Freedom fighter, reformer; India has a lot to thank her for|date=2018-01-22|work=The Indian Express|access-date=2018-08-23|language=en-US|archive-url=https://web.archive.org/web/20190527201619/https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|archive-date=27 मई 2019|url-status=live}}</ref><ref name=":1">{{Cite book|url=https://www.worldcat.org/oclc/70200087|title=વીસમી સદીનું ગુજરાતી નારીલેખન|last=|first=|publisher=[[Sahitya Akademi]]|others=|year=2005|isbn=8126020350|editor-last=Chaudhari|editor-first=Raghuveer|editor-link=Raghuveer Chaudhari|edition=1st|location=New Delhi|pages=350|language=gu|trans-title=20 Century Women's Writing's in Gujarati|chapter=લેખિકા-પરિચય|trans-chapter=Introduction of Women Writers|oclc=70200087|editor-last2=Dalal|editor-first2=Anila|editor-link2=Anila Dalal}}</ref></span> उनकी शादी प्रख्यात [[चिकित्सक]] और [[ सरकार का प्रशासक|प्रशासक]] [[जीवराज नारायण मेहता]] से हुई थी।
== जीवनी ==
=== <span data-segmentid="46" class="cx-segment">राजनीति, शिक्षा और सक्रियता</span> ===
<span data-segmentid="47" class="cx-segment">हंसा मेहता ने विदेशी कपड़े और शराब बेचने वाली दुकानों के बहिष्कार का आयोजन किया, और [[महात्मा गांधी]] की सलाह पर अन्य स्वतंत्रता आंदोलन गतिविधियों में भाग लिया।</span> <span data-segmentid="49" class="cx-segment">यहां तक कि उन्हें 1932 में अपने पति के साथ [[ब्रिटिश राज|अंग्रेजों]] ने गिरफ्तार कर जेल तक भेज दिया था।</span> <span data-segmentid="51" class="cx-segment">बाद में वह [[ बॉम्बे विधान परिषद|बॉम्बे विधान परिषद]] से प्रतिनिधि चुनी गईं। <ref name="c2">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=TMFxy44dWBMC|title=Gandhi's Passion: The Life and Legacy of Mahatma Gandhi|last=Wolpert|first=Stanley|date=5 April 2001|publisher=Oxford University Press|isbn=9780199923922|page=149}}</ref></span>
<span data-segmentid="53" class="cx-segment">स्वतंत्रता के बाद, वे उन 15 महिलाओं में शामिल थीं, जो [[भारत का संविधान|भारतीय संविधान का]] मसौदा तैयार करने वाली [[भारतीय संविधान सभा|घटक विधानसभा]] (Constituent Assembly) का हिस्सा थीं।<ref>{{Cite news|url=http://www.livemint.com/Leisure/dLi6ZIdW6CgswZCGdOA9VM/The-women-who-helped-draft-our-constitution.html|title=The women who helped draft our constitution|last=Ravichandran|first=Priyadarshini|date=13 March 2016|work=Mint|access-date=November 6, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20190705061438/https://www.livemint.com/Leisure/dLi6ZIdW6CgswZCGdOA9VM/The-women-who-helped-draft-our-constitution.html|archive-date=5 जुलाई 2019|url-status=live}}</ref> वे</span> <span data-segmentid="56" class="cx-segment">सलाहकार समिति और मौलिक अधिकारों पर उप समिति की सदस्य थीं। <ref>{{Cite web|url=http://cadindia.clpr.org.in/constituent_assembly_members/hansa_jivraj_mehta|title=CADIndia|website=cadindia.clpr.org.in|access-date=2018-01-16|archive-url=https://web.archive.org/web/20190331155544/http://cadindia.clpr.org.in/constituent_assembly_members/hansa_jivraj_mehta|archive-date=31 मार्च 2019|url-status=dead}}</ref></span> <span data-segmentid="57" class="cx-segment">उन्होंने भारत में महिलाओं के लिए समानता और न्याय की वकालत की। <ref>{{Cite web|url=http://cadindia.clpr.org.in/search|title=CADIndia|website=cadindia.clpr.org.in|access-date=2018-01-16|archive-url=https://web.archive.org/web/20190425030845/https://cadindia.clpr.org.in/search|archive-date=25 अप्रैल 2019|url-status=dead}}</ref><ref name=":03">{{Cite news|url=https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|title=Hansa Jivraj Mehta: Freedom fighter, reformer; India has a lot to thank her for|date=2018-01-22|work=The Indian Express|access-date=2018-08-23|language=en-US|archive-url=https://web.archive.org/web/20190527201619/https://indianexpress.com/article/gender/hansa-jivraj-mehta-freedom-fighter-reformer-india-has-a-lot-to-thank-her-for-5034322/|archive-date=27 मई 2019|url-status=live}}</ref></span>
<span data-segmentid="58" class="cx-segment">हंसा 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गईं और 1945-46 में [[ अखिल भारतीय महिला सम्मेलन|अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की]] अध्यक्ष बनीं।</span> <span data-segmentid="60" class="cx-segment">[[हैदराबाद]] में आयोजित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में, उन्होंने महिला अधिकारों का एक चार्टर प्रस्तावित किया।</span> वे <span data-segmentid="62" class="cx-segment">1945 से 1960 तक भारत में विभिन्न पदों पर रहीं, जिनमे से उल्लेखनीय पद हैं - [[श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी महिला विद्यापीठ|एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की]] कुलपति, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सदस्य, इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड ऑफ़ इंडिया की अध्यक्ष और [[महाराज सयाजीराव गायकवाड़ विश्वविद्यालय|महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ़ बड़ौदा की]] कुलपति।<ref name=":12">{{Cite book|url=https://www.worldcat.org/oclc/70200087|title=વીસમી સદીનું ગુજરાતી નારીલેખન|last=|first=|publisher=[[Sahitya Akademi]]|others=|year=2005|isbn=8126020350|editor-last=Chaudhari|editor-first=Raghuveer|editor-link=Raghuveer Chaudhari|edition=1st|location=New Delhi|pages=350|language=gu|trans-title=20 Century Women's Writing's in Gujarati|chapter=લેખિકા-પરિચય|trans-chapter=Introduction of Women Writers|oclc=70200087|editor-last2=Dalal|editor-first2=Anila|editor-link2=Anila Dalal}}</ref></span>
=== संयुक्त राष्ट्र में योगदान ===
<span data-segmentid="65" class="cx-segment">हंसा ने 1946 में महिलाओं की स्थिति पर एकल उप-समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया।</span> <span data-segmentid="66" class="cx-segment">1947-48 में [[संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद्|संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग]] में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में, उन्होंने " [[ सभी पुरुष समान हैं|सभी पुरुषों को समान बनाया गया है]]" या "all men are created equal" (जो कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमेरिका]] की तत्कालीन फ़र्स्ट लेडी [[एलिनोर रूज़वेल्ट]] का पसंदीदा वाक्यांश था) में "पुरुष" शब्द को बदलकर "मानव" शब्द उपयोग में लाने की क़वायद की, जिसके बाद यह "सभी मानवों को समान बनाया गया है" या ""all human beings are created equal" के रूप में पढ़ा जाने लगा। इससे वे ये साबित करना चाहती थीं कि अधिकार केवल पुरुषों के लिए नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी हैं, क्योंकि वे भी उतनी ही "मानव" हैं, जितने पुरुष। अंततः [[मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा]] की भाषा को बदलने में वे सफल रहीं<ref>{{Cite book|title=Women, Development and the UN|url=https://archive.org/details/womendevelopment00jain|last=Jain|first=Devaki|publisher=Indiana University Press|year=2005|location=Bloomington|page=[https://archive.org/details/womendevelopment00jain/page/n46 20]}}</ref> और इससे [[स्त्री पुरुष समानता|लैंगिक समानता]] की आवश्यकता पर प्रकाश पड़ा।<ref>http://www.un.int/india/india%20&%20un/humanrights.pdf {{Webarchive}}</ref></span> <span data-segmentid="72" class="cx-segment">हंसा बाद में 1950 में [[संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद्|संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग]] की उपाध्यक्ष बनीं। वे</span> <span data-segmentid="74" class="cx-segment">[[युनेस्को|यूनेस्को]] के कार्यकारी बोर्ड की सदस्य भी थीं।<ref name="a2">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=Kfs4Cns3nJIC|title=Women Role Models: Some Eminent Women of Contemporary India|last=Srivastava|first=Gouri|publisher=Concept Publishing Company|year=2006|isbn=9788180693366|pages=14–16}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=jL6fAAAAMAAJ|title=Contemporary art in Baroda|last=Dhanoa|first=Belinder|publisher=Tulika|year=1997|isbn=9788185229041|page=267}}</ref></span><ref>{{Cite web|url=https://www.un.org/en/events/humanrightsday/women-who-shaped-the-universal-declaration.shtml|title=Human Rights Day, 10 December|website=www.un.org|language=en|access-date=2019-08-16|archive-url=https://web.archive.org/web/20190425045333/https://www.un.org/en/events/humanrightsday/women-who-shaped-the-universal-declaration.shtml|archive-date=25 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref>
=== <span data-segmentid="76" class="cx-segment">साहित्य कैरियर</span> ===
<span data-segmentid="77" class="cx-segment">उन्होंने [[गुजराती भाषा|गुजराती]] में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं, जिनमें ''अरुणू अदभुत स्वप्न'' (1934), ''बबलाना पराक्रमो'' (1929), ''बलवर्तावली भाग'' 1-2 (1926, 1929) शामिल हैं।</span> <span data-segmentid="79" class="cx-segment">वह कुछ किताबें अनुवाद ''[[वाल्मीकि]] [[रामायण]]'': [[अरण्यकाण्ड]], [[बालकाण्ड]]<nowiki/>और [[सुन्दरकाण्ड]]। उन्होंने</span> <span data-segmentid="85" class="cx-segment">कई अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद</span> <span data-segmentid="79" class="cx-segment">भी</span> <span data-segmentid="85" class="cx-segment">किया, जिसमें ''[[गुलिवर्स ट्रेवल्स]]'' भी शामिल है।</span> <span data-segmentid="87" class="cx-segment">उन्होंने [[विलियम शेक्सपीयर|शेक्सपियर के]] कुछ नाटकों को भी रूपांतरित किया था।</span> <span data-segmentid="89" class="cx-segment">उनके निबंध एकत्र किए गए और ''केतलाक लेखो'' (1978) के रूप में प्रकाशित हुए। <ref name="c3">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=TMFxy44dWBMC|title=Gandhi's Passion: The Life and Legacy of Mahatma Gandhi|last=Wolpert|first=Stanley|date=5 April 2001|publisher=Oxford University Press|isbn=9780199923922|page=149}}</ref><ref name=":13">{{Cite book|url=https://www.worldcat.org/oclc/70200087|title=વીસમી સદીનું ગુજરાતી નારીલેખન|last=|first=|publisher=[[Sahitya Akademi]]|others=|year=2005|isbn=8126020350|editor-last=Chaudhari|editor-first=Raghuveer|editor-link=Raghuveer Chaudhari|edition=1st|location=New Delhi|pages=350|language=gu|trans-title=20 Century Women's Writing's in Gujarati|chapter=લેખિકા-પરિચય|trans-chapter=Introduction of Women Writers|oclc=70200087|editor-last2=Dalal|editor-first2=Anila|editor-link2=Anila Dalal}}</ref></span>
== पुरस्कार ==
<span data-segmentid="91" class="cx-segment">हंसा मेहता को 1959 में [[पद्म भूषण]] से [[पद्म भूषण|सम्मानित किया]] गया था।<ref>{{Cite web|url=http://www.indianautographs.com/productdetail-125454.html|title=Hansa Jivraj Mehta|publisher=Praful Thakkar's Thematic Gallery of Indian Autographs|access-date=19 June 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304041547/http://www.indianautographs.com/productdetail-125454.html|archive-date=4 मार्च 2016|url-status=live}}</ref></span>व राष्ट्रीय ध्वज को संविधान सभा में हंसा मेहता द्वारा ही प्रस्तुत किया गया।
== <span data-segmentid="93" class="cx-segment">यह भी देखें</span> ==
* [[गुजराती साहित्यकार|<span data-segmentid="94" class="cx-segment">गुजराती भाषा के लेखकों की सूची</span>]]
==सन्दर्भ==
{{Reflist}}
{{पद्म भूषण धारक 1954–1959}}
{{पद्म श्री पुरस्कार}}
[[श्रेणी:1897 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:१९९५ में निधन]]
[[श्रेणी:१९५९ पद्म भूषण]]
[[श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी]]
[[श्रेणी:गुजराती भाषा]]
[[श्रेणी:गुजराती लेखक]]
[[श्रेणी:भारतीय नारीवादी लेखिका]]
[[श्रेणी:भारतीय नारीवादी]]
[[श्रेणी:सामाजिक कार्य में पद्म भूषण प्राप्तकर्ता]]
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वार्ता:दक्षिण एशियाई भोजन में प्रयुक्त पादप
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Hi
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text/x-wiki
{{वार्ता शीर्षक}}hi
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[[विशेष:योगदान/~2026-24757-21|~2026-24757-21]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-24757-21|वार्ता]]) द्वारा अच्छी नीयत से किये गये बदलाव प्रत्यावर्तित किये गये
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{{वार्ता शीर्षक}}
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सहभागी लोकतंत्र
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ज्ञानेंद्र आर्य
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सहभागी लोकतंत्र जयप्रकाश नारायण और गांधी जी की चर्चा के बिना अधूरा है
6543591
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text/x-wiki
'''सहभागी लोकतंत्र''' (Participatory democracy) उस प्रक्रिया का नाम है जो किसी राजनैतिक प्रणाली के संचालन एवं निदेशन में लोगों की भरपूर सहभागिता पर जोर देती है। वैसे '[[लोकतंत्र]]' का आधार ही 'लोक' (लोग) हैं और सभी लोकतंत्र साझेदारी पर ही आधारित हैं किन्तु फिर भी 'सहभागी लोकतंत्र' सामान्य सहभागिता के बजाय कहीं अधिक सहभागिता की बात करती है।
लोकतंत्र यह दावा तो करता है कि वह 'लोक नियंत्रित तंत्र' है, किंतु व्यवहार में वह 'लोक नियुक्त तंत्र ' भर है। लोकतंत्र का व्यवहार लोक के प्रबंधक के बजाय लोक के अभिभावक का है। अभिभावक की प्रासंगिकता ही तब है, जब लोक को पागल, बीमार अथवा नाबालिग मान लिया जाय।
== बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=54061 सहभागी लोकतंत्र बन रहा है नया मंत्र] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20210413233440/https://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=54061 |date=13 अप्रैल 2021 }} (बिजनेस स्टैण्डर्ड)
*[https://web.archive.org/web/20140301124121/http://www.kaashindia.com/?p=439 संसदीय तानाशाही या सहभागी लोकतंत्र] (बजरंग मुनि)
*[https://web.archive.org/web/20150924105225/http://www.srijangatha.com/InDeno1_Apr2k9 लोकतंत्र का वर्तमान परिप्रेक्ष्य] (सृजनगाथा)
*[https://web.archive.org/web/20170302032849/http://mediaforrights.org/livelihood/hindi-articles/2040-%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-%E0%A5%A7 सत्ता में सहभागिता का भ्रम -१] (मिडिया फॉर राइट्स)
*[https://en-wikipedia-org.translate.goog/wiki/Jayaprakash_Narayan?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc जयप्रकाश नारायण]
[[श्रेणी:लोकतंत्र]]
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सुकेश साहनी
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text/x-wiki
{{Infobox writer
| name = सुकेश साहनी
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| website =www.laghukatha.com
}}
'''सुकेश साहनी''' (जन्म : 5 सितंबर 1956, [[लखनऊ]], उ.प्र.), हिंदी के लघुकथा [[लेखक]] हैं, जिनका लघुकथा की विकास यात्रा में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।<ref name=sahityakunj>{{cite web| last =| first =| authorlink =| title =सुकेश साहनी का परिचय| trans_title =| language =| url =http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SukeshSahni/SukeshSahni.htm| accessdate =13 मई 2014| archive-url =https://web.archive.org/web/20130704120450/http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SukeshSahni/SukeshSahni.htm| archive-date =4 जुलाई 2013| url-status =dead}}</ref> उनके तीन लघुकथा संग्रह 'डरे हुए लोग'<ref>{{cite book | url =| title =डरे हुए लोग|type=सजिल्द|trans_title=| page = 126| author =सुकेश साहनी| language= |translator = | editor = | publisher =अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-110030| year =1991/2010|ISBN=8174083871|ISBN=9788174083876}}</ref> 'ठंडी रज़ाई'<ref>{{cite book | url =| title =ठंडी रज़ाई |trans_title=| page = 112 | author =सुकेश साहनी| language= |translator = | editor = | publisher =अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-110030| year =1998|ASIN=B0000E73E1}}</ref>'साइबरमैन' और ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ प्रकाशित हैं। उनकी दोनों पुस्तकें क्रमश: 'डरे हुए लोग' का [[पंजाबी]], [[गुजराती]], [[मराठी]] व [[अंग्रेज़ी]] में तथा 'ठंडी रज़ाई' का [[अंग्रेज़ी]] व [[पंजाबी]] भाषा में अनुवाद हुआ है। इसके अतिरिक्त एक कहानी संग्रह 'मैग्मा और अन्य कहानियाँ' तथा बालकथा संग्रह 'अक्ल बड़ी या भैंस' प्रकाशित हुए हैं।'डरे हुए लोग' और 'ठंडी रजाई' का अनुवाद श्याम सुंदर अग्रवाल ने किया है। उनकी लघुकथा 'रास्तों से दोस्ती' अमनजोत सिंह सढौरा द्वारा पंजाबी में अनुवाद की गई। उनकी कुछ लघुकथाएँ [[जर्मन]] भाषा में भी अनूदित हुईं हैं। 'रोशनी' कहानी पर दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म का निर्माण किया है। उनकी एक और पुस्तक "लघु अपराध कथाएं "<ref>{{cite book | url =| title =लघु अपराध कथाएं|type=अजिल्द|trans_title=| page = 125| author =सुकेश साहनी| language= |translator = | editor = | publisher =पुस्तक महल| year =2001|ISBN=8122307027|ISBN=9788122307023}}</ref> प्रकाशित हुई हैं और उन्होने लघुकथाओं के दर्जन से अधिक संकलनों का संपादन भी किया है।'साहित्य आज तक 2018 में उन्होंने प्रतिभाग किया और अपनी चुनिंदा रचनाओं का पाठ किया। गद्य कोश में उनकी अनूदित और मौलिक रचनाएँ संकलित हैं।लघुकथा के क्षेत्र में उनका योगदान अति महत्त्वपूर्ण है और विधा के विकास में बहुत ही सहायक सिद्ध है।उन्हें 1994 में डॉ॰परमेश्वर गोयल लघुकथा सम्मान, 1996 में माता शरबती देवी पुरस्कार,1998 में डॉ॰ मुरली मनोहर हिन्दी साहित्यिक सम्मान तथा 2008 में माधवराव सप्रे सम्मान2008,वीरेन डंगवाल स्मृति साहित्य सम्मान 2018 तथा अन्य कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।<ref name=anubhuti>{{cite web | last =
| first =
| authorlink =
| title =
व्यक्तित्व: सुकेश साहनी | trans_title =
| language =
| url =
http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/s/sukesh_sahni.htm | accessdate =
13 मई 2014 | archive-url =
https://web.archive.org/web/20140704054704/http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/s/sukesh_sahni.htm | archive-date =
4 जुलाई 2014 | url-status =
live }}</ref>
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ==
*[https://web.archive.org/web/20140422013950/http://www.kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A5%80#.U3G1LoGSyFl कविता कोश में सुकेश साहनी]
*[https://web.archive.org/web/20140423134712/http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A5%80#.U3GuUYGSyFk गद्य कोश में सुकेश साहनी]
*[https://web.archive.org/web/20140514085249/http://www.hindisamay.com/writer/writer_details_n.aspx?id=439 हिन्दी समय में सुकेश साहनी का परिचय]
*[https://web.archive.org/web/20140514021922/http://kathaakaarssahni.blogspot.in/2007/07/blog-post_07.html सुकेश साहनी का लघुकथा संसार]कथाकार में।
[[श्रेणी:हिन्दी लेखक]]
[[श्रेणी:साहित्यकार]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:1956 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के लोग]]
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करिश्मा तन्ना
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wikitext
text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
| image = Karishma Tanna at an event in Pali Hill.jpg
| caption = करिश्मा तन्ना
| birth_date = {{birth date and age|df=yes|1983|12|21}}
| birth_place = [[मुम्बई|मुंबई]], [[महाराष्ट्र]], [[भारत]]
| occupation = [[अभिनेत्री]]
}}
'''करिश्मा तन्ना''' एक भारतीय अभिनेत्री हैं। इनका जन्म मुंबई में 21 दिसंबर 1983 में हुआ था। वर्तमान में [[बिग बॉस]] में प्रतिभागी थी। '''करिश्मा तन्ना''' शोबिज इंडस्ट्री में एक लोकप्रिय नाम है। उन्होंने अपना [[टेलीविजन]] डेब्यू [[क्यूंकी सास भी कभी बहू थी]] से किया और बाद में [[बाल वीर]], [[क़यामत की रात]], [[नागिन]] और [[बुलेट]] सहित कई शो में दिखाई दीं। करिश्मा ने [[झलक दिखला जा]] और [[खतरों के खिलाड़ी]] सहित कई रियलिटी शो में भी भाग लिया है। वह [[बिग बॉस]] के आठवें सीजन की विनर भी रह चुकी हैं। इसके बाद, '''करिश्मा तन्ना''' [[नेटफ्लिक्स]] सीरीज़ स्कूप में नज़र आएंगी, जो 2 जून को रिलीज़ होगी। यह शो एक क्राइम रिपोर्टर के जीवन पर आधारित है।<ref>{{Cite news |last=Farzeen |first=Sana |date=27 July 2020 |title=Khatron Ke Khiladi 10 winner Karishma Tanna: My only fear was not performing to the best of my ability |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/television/karishma-tanna-khatron-ke-khiladi-10-winner-rohit-shetty-6525387/ |access-date=7 August 2020 |work=The Indian Express |language=en}}</ref><ref>{{Cite news |last=गौड़ |first=प्रतिभा |date=4 August 2020 |title='खतरों के खिलाड़ी' की इस विनर ने तोड़ा एलोवेरा और लगीं चेहरे पर मलने...देखें Video |url=https://khabar.ndtv.com/news/television/karishma-tanna-applying-aloe-vera-gel-on-face-video-viral-on-internet-khatron-ke-khiladi-winner-2274084 |access-date=7 August 2020 |publisher=NDTV |language=hi |archive-date=6 अगस्त 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200806102914/https://khabar.ndtv.com/news/television/karishma-tanna-applying-aloe-vera-gel-on-face-video-viral-on-internet-khatron-ke-khiladi-winner-2274084 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite news |date=26 July 2020 |title=Khatron Ke Khiladi 10 winner is Karishma Tanna, Karan Patel declared runner-up |url=https://www.hindustantimes.com/tv/khatron-ke-khiladi-10-winner-is-karishma-tanna-karan-patel-declared-runner-up/story-j3wOwSeDpH978vCJ1aCn5O.html |access-date=7 August 2020 |work=Hindustan Times |language=en}}</ref>
== धारावाहिक ==
* 2023 में [[नेटफ्लिक्स]] की [[स्कूप]]
* 2014 में [[बिग बॉस]] में प्रतिभागी
* [[झलक दिखला जा]]
* वर्तमान [[क़यामत की रात]] मे गौरी के रूप में
* टेलीविजन डेब्यू [[क्यूंकी सास भी कभी बहू थी]]
* [[बाल वीर]]
* [[नागिन 3]]
* [[बुलेट]]
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
{{टिप्पणीसूची}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
{{Commons category|Karishma Tanna|करिश्मा तन्ना}}
* {{IMDb name|id=3169060}}
{{बिग बॉस 8}}
[[श्रेणी:बिग बॉस प्रतिभागी]]
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त्रिनिदाद अजायबघर
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox museum
| name = त्रिनिदाद अजायबघर
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| image = Teixeira - Convento de la Trinidad Calzada, Madrid 1656.png
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| established = {{Start date|1837|12|31|df=y}}
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}}
'''राष्ट्री चित्र और मूर्ती अजायबघर''' यां '''त्रिनिदाद अजायबघर''' [[माद्रीद]], [[स्पेन]] के कोंवेंतो दे ला त्रिनिदाद कालसाजा में स्थित एक अजायबघर था। इसकी स्थापना 1837 में हूई और 1872 में इसको खत्म कर दिया गया और इसकी कलाकृतियों को [[प्रादो अजायबघर]] में भेज दिया गया।
== गैलरी ==
<div align="center"><gallery perrow="6">
File:The Fountain of Life after van Eyck 2.jpg|''[[La Fuente de la Gracia]]'', de la escuela de [[Jan van Eyck]] ([[Monasterio de El Parral]], [[Segovia]]).
File:La Virgen con el Niño, por Petrus Christus.jpg|''La Virgen con el Niño'', [[Petrus Christus]], [[Monasterio de Nuestra Señora del Risco]], [[Amavida]], [[Provincia de Ávila|Ávila]].
File:La Virgen de los Reyes Católicos.jpg|''[[Maestro de la Virgen de los Reyes Católicos|La Virgen de los Reyes Católicos]]'', Maestro de la Virgen de los Reyes Católicos (anónimo [[hispano flamenco]]), [[Real Monasterio de Santo Tomás (Ávila)|Real Monasterio de Santo Tomás]] de [[Ávila]].
File:Tríptico (Antoniazzo Romano).jpg|''Tríptico: Busto de Cristo, San Juan Bautista y San Pedro. Cerrado: San Juan Evangelista y Santa Columba'' ([[Antoniazzo Romano]]).
File:Pedro Berruguete - Saint Dominic Presiding over an Auto-da-fe (1475).jpg|''[[Auto de Fe presidido por Santo Domingo de Guzmán]]'', tabla pintada por [[Pedro Berruguete]] para el Real Monasterio de Santo Tomás de Ávila y adquirida para el Museo en [[1867]].
File:Santa Ana, el Niño Jesús y la Virgen (Benson).jpg|''Santa Ana, el Niño Jesús y la Virgen'', c. 1528, de [[Ambrosius Benson]] ([[Convento de Santa Cruz la Real]], Segovia).
Maestro de la sisla-presentacion.jpg|''Presentación de Jesús en el Templo'', [[Maestro de la Sisla]], [[Monasterio de Santa María de Sisla]], [[Provincia de Toledo|Toledo]].
File:Anunciación (Correa de Vivar).jpg |''La Anunciación'', [[Juan Correa de Vivar]], Monasterio de San Jerónimo de [[Guisando]] ([[Provincia de Ávila|Ávila]]).
File:Pentecostés (El Greco, c. 1600) Prado.jpg|''[[Pentecostés (El Greco)|Pentecostés]]'', obra de [[El Greco]] procedente del [[retablo de doña María de Aragón]] ([[Madrid]]).
File:Still Life with Game Fowl,Vegetables and Fruits, Prado, Museum,Madrid,1602,HernaniCollection.jpg|''[[Bodegón de caza, hortalizas y frutas]]'', de [[Juan Sánchez Cotán]], que perteneció a la colección del [[Infante de España|infante]] don [[Sebastián Gabriel de Borbón y Braganza|Sebastián Gabriel]].
File:Maino-adoracion reyes.jpg|''Adoración de los Reyes Magos'', 1612 - 1614, de [[Juan Bautista Maíno|Maíno]], procedente del Retablo de las cuatro Pascuas de la iglesia de San Pedro Mártir de [[Toledo]].
File:Bodegón de frutas y hortalizas (Van der Hamen).jpg|''Bodegón de frutas y hortalizas'' ([[Juan van der Hamen]]).
File:Francisco de Zurbaran James of the Marches.JPG|''San Jacobo de la Marca'', de [[Francisco de Zurbarán]] (convento de San Diego de [[Alcalá de Henares]]).
File:La Virgen con el Niño (Cano).jpg|''La Virgen con el Niño (La Virgen del Lucero)'' ([[Alonso Cano]]).
File:El triunfo de San Agustín (Claudio Coello).jpg|''El triunfo de San Agustín'', una de las obras más destacadas de la producción de [[Claudio Coello]] (convento de San Juan de la Penitencia de Alcalá de Henares -antiguo colegio convento de [[Orden de San Agustín|Agustinos]] de [[Nicolás de Tolentino|San Nicolás de Tolentino]]-).
File:Pedro de Mena Magdalena penitente ni.JPG|''Magdalena penitente'', de [[Pedro de Mena]].
File:Autorretrato Goya 1815.jpg|''[[Autorretrato de Goya de 1815 (Museo del Prado)|Autorretrato]]'' de [[Francisco de Goya|Goya]] ([[1815]]), obra adquirida en [[1866]].
</gallery></div>
== पुस्तक सूची ==
*{{cite book
|last=Antigüedad del Castillo-Olivares
|first=María Dolores
|year=1998
|title=El museo de la Trinidad, germen del museo público en España
|revista=Espacio, tiempo y forma
|pages=367 - 396
|ubicación=[[Madrid]]
|editorial=[[Universidad Nacional de Educación a Distancia]]
|issn=1130-4715
|url=http://e-spacio.uned.es/fez/eserv.php?pid=bibliuned:ETFSerie7-AE83F381-AF5B-2168-3D76-3DC245F17B61&dsID=Documento.pdf
|serie=Serie VII, Historia del Arte
|volumen=11
}}
== बाहरी स्रोत ==
{{Commonscat|preposición=sobre el}}
* [https://web.archive.org/web/20141223080226/https://www.museodelprado.es/enciclopedia/enciclopedia-on-line/voz/colecciones-del-museo-de-la-trinidad/ Artículo sobre el Museo de la Trinidad en la Enciclopedia online del Museo del Prado.]
* [https://web.archive.org/web/20141223080206/https://www.museodelprado.es/exposiciones/info/en-el-museo/el-museo-de-la-trinidad-en-el-prado/ Recensión de la exposición realizada en 2004 sobre el Museo de la Trinidad en la web del Prado.]
* [https://web.archive.org/web/20141026224951/http://books.google.es/books?id=LUTnP6I5vmkC&hl=es ''Catálogo provisional, historial y razonado del Museo Nacional de Pinturas'', de Cruzada Villaamil, disponible en Google Libros.]
* [https://web.archive.org/web/20140725220249/http://www.guiarte.com/noticias/el-museo-de-la-trinidad.html Artículo sobre el Museo en guiarte.com.]
[[श्रेणी:स्पेन के संग्रहालय]]
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वार्ता:सैनी
1
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AGRIM SAINI11
921622
/* There are two groups of saini out of one # fake_saini in western Uttar Pradesh. */
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wikitext
text/x-wiki
== सफ़ाई की ==
ये लेख जो अंग्रेज़ी विकिपीडिया से अनुदित था, बहुत ही खराब हालत में था। अब मैंने इसको अंग्रेज़ी विकि के वर्तमान रूप के समक्ष कर दिया है। उल्लेखनीय है कि जाति के लेखों में प्रचार की बहुत संभावना रहती है।--<b>[[User:हिंदुस्थान वासी|<font color="sky blue">पीयूष</font>]]</b><sup>[[User talk:हिंदुस्थान वासी|<font color="kesari">वार्ता</font>]]</sup> 09:40, 8 जनवरी 2015 (UTC)
:। [[सदस्य:Kushwaha shailendra|Kushwaha shailendra]] ([[सदस्य वार्ता:Kushwaha shailendra|वार्ता]]) 09:00, 20 जुलाई 2020 (UTC)
==There are two types of saini groups of one is of #fake_saini in western Uttar Pradesh.==
1 - Gole this is fake saini
2 - Bhagirathi saini this group is real saini
the gole mali is also a good farmer They are using the "Saini" surname after "1885".
#Bhagirathi_Saini - They live in Saharanpur, Bijnor, Muzaffarnagar, Shamli, Meerut, Moradabad, Amroha, in western Uttar Pradesh. and are large landowners. Mali Rajput, gole mali and kushwaha, shakya also claim themselves to be suryavanshi saini but these are fake.They are using Saini surname after "1930".
A large population of Malio of Rajasthan extends to Mahendragarh, Rewari, Bhiwani, Hisar , panipat , rohtak in eastern Haryana bordering Rajasthan. The Indian census of 1961 also clearly states that Mali is a fake Saini.
== सही जानकारी यह है सैनी समाज की । जादौन बंजारो को बीच मे ना घुसाए ==
सही जानकारी यह है सैनी समाज की । जादौन बंजारो को बीच में न घुसाए [[सदस्य:Rudradaman09|Rudradaman09]] ([[सदस्य वार्ता:Rudradaman09|वार्ता]]) 08:24, 10 अप्रैल 2023 (UTC)
:उत्तरप्रदेश के सूर्यवंशी और पंजाब के चंद्रवंशी दोनों नकली सैनी है, यह दोनों नकली सैनी संगठन चलते हैं ।
:जो असली सैनी है वह कभी भी अपने आप को किसी अन्य जाति से नहीं जोड़ते , सैनी जात का अपना इतिहास है ।
:नकली सैनी :-
:1 . राजस्थान और महाराष्ट्र के शुद्र माली ।
:2 . राजस्थान के सैनिक क्षत्रीय माली ।
:3 . उत्तर प्रदेश के गोले और भागीरथी माली ।
:4 .उत्तर प्रदेश के मौर्य , कुशवाहा और शाक्य शुद्र समाज ।
:असली सैनी :- असली सैनी शूरसैनी है , शूरसैनी जाति का इतिहास सैनी जाति का प्राचीन इतिहास है ।
:Proof :- www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 12:37, 26 मई 2024 (UTC)
::हर जगह आपस में लड़कर आप समाज की छवि खराब कर रहे हो , कृपया प्रयास करें समाज में एकता बनी रहे ।
::नकली और असली का फैसला तो बाद में हो जाएगा पहले समाज में एकता तो बना लो । [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 12:45, 26 मई 2024 (UTC)
:::saini mali ek hi hai [[विशेष:योगदान/~2025-43575-9|~2025-43575-9]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-43575-9|talk]]) 11:16, 22 अगस्त 2025 (UTC)
::::Ha [[विशेष:योगदान/~2025-32454-39|~2025-32454-39]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-32454-39|talk]]) 07:42, 10 नवम्बर 2025 (UTC)
== असली सैनी और नकली सैनी कौन है ? ==
उत्तरप्रदेश के सूर्यवंशी और पंजाब के चंद्रवंशी दोनों नकली सैनी है, यह दोनों नकली सैनी संगठन चलते हैं ।
जो असली सैनी है वह कभी भी अपने आप को किसी अन्य जाति से नहीं जोड़ते , सैनी जात का अपना इतिहास है ।
A > नकली सैनी :-
1 . राजस्थान और महाराष्ट्र के शुद्र माली ।
2 . राजस्थान के " सैनिक क्षत्रीय माली " ।
3 . उत्तर प्रदेश के गोले और भागीरथी माली ।
4 .उत्तर प्रदेश के मौर्य , कुशवाहा और शाक्य शुद्र समाज ।
5 . सूर्यवंशी क्षत्रिय और चंद्रवंशी / यदुवंशी क्षत्रिय ।
B > असली सैनी :- असली सैनी " शूरसैनी " है , शूरसैनी जाति का इतिहास सैनी जाति का प्राचीन इतिहास है । असली सैनी जम्मू, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा और दिल्ली में पाए जाते हैं ।
सैनी नेता और सैनी संगठन अन्य जातियों को सैनी जाति से जोड़कर सैनी जाति की छवि खराब करने का कार्य कर रहे हैं।
वोट बैंक की राजनीति के लिए सैनी समाज की छवि खराब कर रहे हैं , यह बहुत गलत हो रहा है ।
Proof :- www.sainicaste.com
सैनी जाति की इस वेबसाइट पर सैनी जाती की सभी जानकारी है । जाकर देख लो !!
और
Proof :- www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:02, 26 मई 2024 (UTC)
== माली जाति और सैनी जाति में क्या अंतर है ? ==
[https://www.sainicaste.com]https://www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:21, 26 मई 2024 (UTC)
:सैनी और माली जाति हिंदू धर्म की दो अलग-अलग जातियां हैं , सैनी जाति हिंदू क्षत्रिय जाति है और शुद्र माली जाति फूल कृषि से जुड़ी हुई जाती है , सैनी और माली जाति में बहुत अंतर है :-
:सैनी जाति का संबंध प्राचीन शूरसैनी जाति से है , शूरसैनी एक क्षत्रिय जाति है और आपको बता दें कि इस जाति में कई राजा महाराजाओं ने जन्म लिया है ।
:वही माली जाति का संबंध शुद्र वर्ण से है , माली जाति के लोग प्राचीन काल में राजा के सेवक होते थे और माली जाति के लोग प्राचीन काल से ही फूल कृषि से जुड़े रहे हैं इन्हें " फूल माली " भी कहा जाता है ।
:सैनी जाति और माली जाति के गोत्र भी अलग-अलग होते हैं और इनमें शादी विवाह भी नहीं होता है ।
:उत्तर भारत के शूरसैनी ( सैनी ) असली सैनी होते हैं और यह लोग जम्मू , पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल और दिल्ली में पाए जाते हैं । असली सैनी अपने समाज की बेटी को नकली सैनियों में नहीं देते हैं ।
: उदाहरण के तौर पर नकली सैनी :- माली , भागीरथी माली , गोले माली, फूल माली , सैनिक क्षत्रीय माली , महाराष्ट्र के माली, उत्तर प्रदेश के माली , मौर्य माली , कुशवाहा माली , शाक्य माली आदि... सैनी जाति के लोग इन सभी माली उपजातियां को निचले स्तर की जातियां मानते हैं ।
:यह जानकारी मुझे सैनी जाति की एक वेबसाइट से मिली है इस वेबसाइट का नाम है Saini caste History ( www.sainicaste.com ). [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:24, 26 मई 2024 (UTC)
:प्राचीन [[मालवा]] प्रदेश के नागरिकों को ''माली'' कहने लगे, व [[सुरसेन]] प्रदेश के नागरिकों को ''सैनी''। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 14:28, 22 अगस्त 2025 (UTC)
== स्त्रोत ==
लेखक डी के सामंत ने अपनी पुस्तक <!--{{cite book|author=Kumar Suresh Singh|title=People of India: Rajasthan|url=https://books.google.com/books?id=vm_KCE4XXPMC&pg=PA467|accessdate=28 June 2013|date=1 January 1998|publisher=Popular Prakashan|isbn=978-81-7154-769-2|pages=845–850}}--> Rajasthan, Part 2, [https://books.google.co.in/books?id=vm_KCE4XXPMC&pg=PA845&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false पृष्ठ 845 से 850] पर विस्तार से [[सैनी]] जाति का वर्णन किया है। [[सदस्य:Riteze|Riteze]] ([[सदस्य वार्ता:Riteze|वार्ता]]) 01:57, 23 नवम्बर 2024 (UTC)
== सैनी चंद्रवंशीहै।। फुल माली समाज सैनी समाज का सर्वोत्तम स्थान वाला हिस्सा है जो राजस्थान का मूल निवासी है।। ये राजपूत से जुड़ा हुआ हैं परन्तु अपने आप को चंद्रवंशी मानते है।। क्योंकि राजस्थान का उतरी पूर्वी हिस्सा सुरसैनी प्रदेश का हिस्सा था।। ==
सुर [[विशेष:योगदान/~2025-38672-58|~2025-38672-58]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-38672-58|talk]]) 14:42, 5 दिसम्बर 2025 (UTC)
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2026-04-24T01:06:22Z
AGRIM SAINI11
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/* असली सैनी और नकली सैनी कौन है ? */
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wikitext
text/x-wiki
== सफ़ाई की ==
ये लेख जो अंग्रेज़ी विकिपीडिया से अनुदित था, बहुत ही खराब हालत में था। अब मैंने इसको अंग्रेज़ी विकि के वर्तमान रूप के समक्ष कर दिया है। उल्लेखनीय है कि जाति के लेखों में प्रचार की बहुत संभावना रहती है।--<b>[[User:हिंदुस्थान वासी|<font color="sky blue">पीयूष</font>]]</b><sup>[[User talk:हिंदुस्थान वासी|<font color="kesari">वार्ता</font>]]</sup> 09:40, 8 जनवरी 2015 (UTC)
:। [[सदस्य:Kushwaha shailendra|Kushwaha shailendra]] ([[सदस्य वार्ता:Kushwaha shailendra|वार्ता]]) 09:00, 20 जुलाई 2020 (UTC)
==There are two types of saini groups of one is of #fake_saini in western Uttar Pradesh.==
1 - Gole this is fake saini
2 - Bhagirathi saini this group is real saini
the gole mali is also a good farmer They are using the "Saini" surname after "1885".
#Bhagirathi_Saini - They live in Saharanpur, Bijnor, Muzaffarnagar, Shamli, Meerut, Moradabad, Amroha, in western Uttar Pradesh. and are large landowners. Mali Rajput, gole mali and kushwaha, shakya also claim themselves to be suryavanshi saini but these are fake.They are using Saini surname after "1930".
A large population of Malio of Rajasthan extends to Mahendragarh, Rewari, Bhiwani, Hisar , panipat , rohtak in eastern Haryana bordering Rajasthan. The Indian census of 1961 also clearly states that Mali is a fake Saini.
== सही जानकारी यह है सैनी समाज की । जादौन बंजारो को बीच मे ना घुसाए ==
सही जानकारी यह है सैनी समाज की । जादौन बंजारो को बीच में न घुसाए [[सदस्य:Rudradaman09|Rudradaman09]] ([[सदस्य वार्ता:Rudradaman09|वार्ता]]) 08:24, 10 अप्रैल 2023 (UTC)
:उत्तरप्रदेश के सूर्यवंशी और पंजाब के चंद्रवंशी दोनों नकली सैनी है, यह दोनों नकली सैनी संगठन चलते हैं ।
:जो असली सैनी है वह कभी भी अपने आप को किसी अन्य जाति से नहीं जोड़ते , सैनी जात का अपना इतिहास है ।
:नकली सैनी :-
:1 . राजस्थान और महाराष्ट्र के शुद्र माली ।
:2 . राजस्थान के सैनिक क्षत्रीय माली ।
:3 . उत्तर प्रदेश के गोले और भागीरथी माली ।
:4 .उत्तर प्रदेश के मौर्य , कुशवाहा और शाक्य शुद्र समाज ।
:असली सैनी :- असली सैनी शूरसैनी है , शूरसैनी जाति का इतिहास सैनी जाति का प्राचीन इतिहास है ।
:Proof :- www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 12:37, 26 मई 2024 (UTC)
::हर जगह आपस में लड़कर आप समाज की छवि खराब कर रहे हो , कृपया प्रयास करें समाज में एकता बनी रहे ।
::नकली और असली का फैसला तो बाद में हो जाएगा पहले समाज में एकता तो बना लो । [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 12:45, 26 मई 2024 (UTC)
:::saini mali ek hi hai [[विशेष:योगदान/~2025-43575-9|~2025-43575-9]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-43575-9|talk]]) 11:16, 22 अगस्त 2025 (UTC)
::::Ha [[विशेष:योगदान/~2025-32454-39|~2025-32454-39]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-32454-39|talk]]) 07:42, 10 नवम्बर 2025 (UTC)
== असली सैनी और नकली सैनी कौन है ? ==
उत्तरप्रदेश के सूर्यवंशी और पंजाब के चंद्रवंशी दोनों नकली सैनी है, यह दोनों नकली सैनी संगठन चलते हैं ।
जो असली सैनी है वह कभी भी अपने आप को किसी अन्य जाति से नहीं जोड़ते , सैनी जात का अपना इतिहास है ।
A > नकली सैनी :-
1 . राजस्थान और महाराष्ट्र के शुद्र माली ।
2 . राजस्थान के " सैनिक क्षत्रीय माली " ।
3 . उत्तर प्रदेश के गोले माली ।
4 .उत्तर प्रदेश के मौर्य , कुशवाहा और शाक्य समाज ।
5 . सूर्यवंशी क्षत्रिय और चंद्रवंशी / यदुवंशी क्षत्रिय ।
B > असली सैनी :- असली सैनी " शूरसैनी " है , शूरसैनी जाति का इतिहास सैनी जाति का प्राचीन इतिहास है । असली सैनी जम्मू, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा और दिल्ली में पाए जाते हैं ।
सैनी नेता और सैनी संगठन अन्य जातियों को सैनी जाति से जोड़कर सैनी जाति की छवि खराब करने का कार्य कर रहे हैं।
वोट बैंक की राजनीति के लिए सैनी समाज की छवि खराब कर रहे हैं , यह बहुत गलत हो रहा है ।
Proof :- www.sainicaste.com , Saharanpur - A Gazetteer
by Nevill, H. R.1909 pagenumber 104 see mali and saini community distinction
सैनी जाति की इस वेबसाइट पर सैनी जाती की सभी जानकारी है । जाकर देख लो !!
और
Proof :- www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:02, 26 मई 2024 (UTC)
== माली जाति और सैनी जाति में क्या अंतर है ? ==
[https://www.sainicaste.com]https://www.sainicaste.com [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:21, 26 मई 2024 (UTC)
:सैनी और माली जाति हिंदू धर्म की दो अलग-अलग जातियां हैं , सैनी जाति हिंदू क्षत्रिय जाति है और शुद्र माली जाति फूल कृषि से जुड़ी हुई जाती है , सैनी और माली जाति में बहुत अंतर है :-
:सैनी जाति का संबंध प्राचीन शूरसैनी जाति से है , शूरसैनी एक क्षत्रिय जाति है और आपको बता दें कि इस जाति में कई राजा महाराजाओं ने जन्म लिया है ।
:वही माली जाति का संबंध शुद्र वर्ण से है , माली जाति के लोग प्राचीन काल में राजा के सेवक होते थे और माली जाति के लोग प्राचीन काल से ही फूल कृषि से जुड़े रहे हैं इन्हें " फूल माली " भी कहा जाता है ।
:सैनी जाति और माली जाति के गोत्र भी अलग-अलग होते हैं और इनमें शादी विवाह भी नहीं होता है ।
:उत्तर भारत के शूरसैनी ( सैनी ) असली सैनी होते हैं और यह लोग जम्मू , पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल और दिल्ली में पाए जाते हैं । असली सैनी अपने समाज की बेटी को नकली सैनियों में नहीं देते हैं ।
: उदाहरण के तौर पर नकली सैनी :- माली , भागीरथी माली , गोले माली, फूल माली , सैनिक क्षत्रीय माली , महाराष्ट्र के माली, उत्तर प्रदेश के माली , मौर्य माली , कुशवाहा माली , शाक्य माली आदि... सैनी जाति के लोग इन सभी माली उपजातियां को निचले स्तर की जातियां मानते हैं ।
:यह जानकारी मुझे सैनी जाति की एक वेबसाइट से मिली है इस वेबसाइट का नाम है Saini caste History ( www.sainicaste.com ). [[सदस्य:Gaurav Satrawala|Gaurav Satrawala]] ([[सदस्य वार्ता:Gaurav Satrawala|वार्ता]]) 13:24, 26 मई 2024 (UTC)
:प्राचीन [[मालवा]] प्रदेश के नागरिकों को ''माली'' कहने लगे, व [[सुरसेन]] प्रदेश के नागरिकों को ''सैनी''। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 14:28, 22 अगस्त 2025 (UTC)
== स्त्रोत ==
लेखक डी के सामंत ने अपनी पुस्तक <!--{{cite book|author=Kumar Suresh Singh|title=People of India: Rajasthan|url=https://books.google.com/books?id=vm_KCE4XXPMC&pg=PA467|accessdate=28 June 2013|date=1 January 1998|publisher=Popular Prakashan|isbn=978-81-7154-769-2|pages=845–850}}--> Rajasthan, Part 2, [https://books.google.co.in/books?id=vm_KCE4XXPMC&pg=PA845&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false पृष्ठ 845 से 850] पर विस्तार से [[सैनी]] जाति का वर्णन किया है। [[सदस्य:Riteze|Riteze]] ([[सदस्य वार्ता:Riteze|वार्ता]]) 01:57, 23 नवम्बर 2024 (UTC)
== सैनी चंद्रवंशीहै।। फुल माली समाज सैनी समाज का सर्वोत्तम स्थान वाला हिस्सा है जो राजस्थान का मूल निवासी है।। ये राजपूत से जुड़ा हुआ हैं परन्तु अपने आप को चंद्रवंशी मानते है।। क्योंकि राजस्थान का उतरी पूर्वी हिस्सा सुरसैनी प्रदेश का हिस्सा था।। ==
सुर [[विशेष:योगदान/~2025-38672-58|~2025-38672-58]] ([[सदस्य वार्ता:~2025-38672-58|talk]]) 14:42, 5 दिसम्बर 2025 (UTC)
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नाहानी नदी
0
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6206795
2026-04-23T13:25:22Z
चाहर धर्मेंद्र
703114
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox river| river_name = दक्षिण नाहानी नदी
| image_name = Southnahannirivermap.jpg
| caption = नाहानी नदी का नक्शा
| origin = [[सेल्विन पर्वत]]<ref name="CRCA_NWT">{{cite book | editor = McCreadie, Mary | title = Canoeing Canada's Northwest Territories: A Paddler's Guide | year = 1995 | publisher = Canadian Recreational Canoeing Association | location = Hyde Park, Ontario, Canada | id = ISDN 1-895465-09-5 | chapter = South Nahanni River. | page = 150}}</ref>
| mouth = [[लिअर्ड नदी]]<ref name="CRCA_NWT" /><br /><small>{{Coord|61.05308|-123.32813}} दक्षिण नाहानी नदीमुख</small>
| basin_countries = [[कनाडा]] ([[नॉर्थवेस्ट टेरीटरीज़]], [[युकॉन प्रदेश]])
| length = 540 km (336 mi)<ref name="CHRS_NR">{{cite web | url = http://www.chrs.ca/Rivers/SouthNahanni/SouthNahanni-F_e.htm | title = South Nahanni River | accessdate = 2006-10-23 | publisher = Canadian Heritage River System | archive-url = https://web.archive.org/web/20061008042729/http://www.chrs.ca/Rivers/SouthNahanni/SouthNahanni-F_e.htm | archive-date = 8 अक्तूबर 2006 | url-status = dead }}</ref>
| elevation = 1600 m (5,250 ft)<ref name="CHRS_NR" />
| mouth_elevation = 350 m (1,148 ft)<ref name="CHRS_NR" />
| discharge = 404 m³/s (14,267 ft³/s)<ref name="INAC_Coppermine">{{cite web | url = http://nwt-tno.inac-ainc.gc.ca/pdf/wr/cop03_e.pdf | title = Coppermine River: Overview of the Hydrology and Water Quality | accessdate = 2006-10-23 | author = Coulombe-Pontbriand, Moïse | author2 = Robert Reid | author3 = Frances Jackson | date = December 1998 | format = PDF | publisher = Water Resources Division, Indian and Northern Affairs Canada | pages = 4 | archive-url = https://web.archive.org/web/20070926000809/http://nwt-tno.inac-ainc.gc.ca/pdf/wr/cop03_e.pdf | archive-date = 26 सितंबर 2007 | url-status = dead }}</ref>
| watershed = 31,100 km² (12,008 mi²)<ref name="INAC_Coppermine" />
}}
दक्षिण नाहानी नदी ({{lang-en|'''South Nahanni River'''}}) [[लिअर्ड नदी|लिआर्ड नदी]] की एक बड़ी सहायक नदी है जो कनाडा के [[येलोनाइफ़|येलोनाईफ]] से ५०० किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। यह [[नाहानी राष्ट्रीय उद्यान]] के मध्य से होकर गुजरती है। यह पश्चिम में [[मैकेन्ज़ी पर्वत]] और [[सेल्विन पर्वत]] से होकर बहती है और पूर्व में [[वर्जीनिया जलप्रपात]] की तरफ़ बधते हुए चौड़ी होती जाती है और अंतत: लिआर्ड नदी में मिल जाती है। नाहानी नदी का एक अनोखा भूगर्भीय इतिहास है। यह तब बनी थी जब यह क्षेत्र एक विस्तृत सपाट भूमि था।<!-- forming a winding course typical of flatland rivers.--> जैसे जैसे पर्वत ऊँचे उठे नदी ने अपनी विचित्र व [[विपथगामी प्रवाह]] को बनाए रखते हुए चट्टानों में चार गहरी घाटियाँ बना दीं।
[[डेन लोग]] और उनके पूर्वज नाहानी नदी के क्षेत्रों में हजारों सालों से रहते आए हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय लोग यहां सोने की खोज में आए। १९५० में आर एम पैटरसन के डैङरस रिवर के प्राकशन के बाद से इस नदी को प्रचार मिला और यह आधुनिक दुनिया में जानी जाने लगी । तभी से नाहानी कनाडा की प्रमुख जंगली नदियों में से जानी जाती है और हर वर्ष हज़ारों पर्यटकों और जोखिम भरे खेल खेलने वाले नौसिखियों व अनुभवियों दोनों के लिये ही महत्वपूर्ण पड़ाव है।
== प्रवाह==
[[Image:Nahanni - VirginiaFalls.jpg|thumb|250px|left|वर्जीनिया जलप्रपात]]
नहानी नदी [[मैकेन्ज़ी पर्वत|मैकेन्ज़ी के पहाड़]]ों पर माउंट क्रिस्टी के पश्चिमी ढ़लानों पर {{convert|1600|m|ft}} की ऊँचाई पर निकलती है। यह दक्षिण में [[यूकॉन|युकोन-]][[उत्तरपश्चिम प्रदेश]] की सीमा पर {{convert|10|km|mi|0}} की दूरी तय करती है, और फिर उत्तरपश्चिम प्रदेश में [[मूज़ तालाब]]ों के पास दक्षिण पूर्व की ओर मुड़ जाती है। यह सिल्विन पर्वतों में बहती है जहाँ इससे [[छोटी नाहानी नदी]] मिल जाती है।
बोलोना रिज़ के पूर्व में यह पश्चिम की तरफ मुड़ जाती है, और फिर दक्षिण-पूर्व की तरफ बढ़ जाती है। [[वैम्पायर चोटी]] के पूर्व में इसमें ब्रोकेन स्कल नदी का पानी मिलता है। [[नहानी राष्ट्रीय उद्यान]] में प्रवेश करने पर इसमें [[रैबिटकेटल नदी]] का पानी मिल जाता है। पूरे उद्यान में बहते हुए ये पूर्वी सीमा पर यह लिआर्ड के क्षेत्र और घुमावादार पर्वतों के बीच से गुजरती है। [[जैकफिश नदी]] का पानी लेने के बाद यह [[नाहानी बुट, उत्तरपश्चिम प्रदेश|नाहानी बुट]] में फोर्ट लिआर्ड के {{convert|90|km|mi}} उत्तर में {{convert|180|m|ft}} की ऊँचाई पर [[लिअर्ड नदी|लिआर्ड नदी]] में समा जाती है।
{{clear}}
== सहायक नदियाँ==
इसकी सहायक नदियाँ निम्नलिखित हैं।
{|class="wikitable"
!सहायक !!स्थान!!टिप्पणियाँ
|-
| [[मूज़ तालाब]] ||<small>{{Coord|62.91441|-129.67060}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
|[[छोटी नाहानी नदी]] ||<small>{{Coord|62.47736|-128.62759}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| बोलोग्ना क्रीक||<small>{{Coord|62.34588|-128.21657}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| द्वीपीय तालाब||<small>{{Coord|62.34055|-128.15620}}</small>|| बाँयी सहायक
|-
|[[ब्रोकेन स्कल नदी]] ||<small>{{Coord|62.26385|-127.64486}}</small>|| बाँयी सहायक
|-
| ब्रिन्टेल क्रीक||<small>{{Coord|62.05163|-127.35865}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| [[रैबिटकेटल नदी]]||<small>{{Coord|61.95242|-127.16125}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| हेल रोरिंग क्रीक||<small>{{Coord|61.87397|-126.62962}}</small>|| बाँयी सहायक
|-
| फ्लड क्रीक||<small>{{Coord|61.86318|-126.38923}}</small>|| बाँयी सहायक
|-
| मारेंगो क्रीक||<small>{{Coord|61.59243|-125.63626}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| [[सपाट नदी (उत्तरपश्चिम प्रदेश)|सपाट नदी]]||<small>{{Coord|61.53333|-125.34729}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| विंडी क्रीक||<small>{{Coord|61.24840|-123.99271}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| फिशट्रैप क्रीक||<small>{{Coord|61.23836|-123.69412}}</small>||पश्चिमी सहायक
|-
| [[जैकफिश नदी]]||<small>{{Coord|61.14784|-123.66486}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| ओवरफ्लो क्रीक||<small>{{Coord|61.14558|-123.65602}}</small>|| बाँयी सहायक
|-
| मैटसन क्रीक||<small>{{Coord|61.07633|-123.59025}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| बीवर वाटर क्रीक||<small>{{Coord|61.00658|-123.51062}}</small>|| दाहिनी सहायक
|-
| ब्लूफिश क्रीक||<small>{{Coord|61.03754|-123.43159}}</small>|| बाँयी सहायक
|}
==भूगोल और भूगर्भ==
क्षेत्र का इतिहास में एक उष्णकटिबंधीय समुद्र के नीचे 550 मिलियन साल पहले शुरू हुआ। यहाँ [[बलुआ पत्थर]] और [[चूना पत्थर]] समुद्र द्वारा लगाए गए शक्तिशाली दबाव से गठित की एक [[तलछटी]] परत बन गई। अंततः यह समुद्र सूख गया, और यहाँ पर एक विस्तृत मैदान बना जिस पर नाहानी नदी प्रवाहित हुई।
नाहानी [[पहाड़ी भाषाएँ|पहाड़ी]] नदियों के बीच में अद्वितीय है। यह नदी पर्वतों से बनने से पहले से मौजूद है इसलिये इसका बहाव भी पर्वतों के उठने के हिसाब से बदलता रहा है और मैदानी नदियों के जैसा है। पहाडों के उठने से नदी ने इनमें और आसपास गहरी घाटियाँ बना दी हैं।
[[Image:Nahanni River - The Gate.JPG|thumb|250px|right|द गेट, दूसरी घाटी।]]
<!--
The river runs through several distinct ranges of mountains, all part of the [[Mackenzie Mountains|Mackenzie Range]]. At its head waters, it runs through the much more rugged [[Selwyn Mountains]], formed from the colliding [[North American Plate|North American]] and [[Pacific Plate]]s roughly 200 million years ago. As the river travels east, it transitions into a gentler terrain of rolling sedimentary mountains formed around the same time by [[batholith]]s pushing the sedimentary layers upward, and forming large [[granite]] intusions. Finally, the,Nahanni River empties into the plains of the Liard River, unaffected by the powerful forces nearby.
During the [[Wisconsin glaciation|last glaciation]] two [[ice sheets]] advanced along the Nahanni. The [[Cordilleran Ice Sheet|Cordilleran]] advanced from the west, and the [[Laurentide]] from the east. The middle portions of the river managed to escape glaciation entirely, and so feature some of the oldest undisturbed landscape in Canada.
Although it escaped the powerful scouring effects of the glaciars, the middle section of the river was not entirely unaffected. The Laurentide Ice Sheet blocked off the mouth of the river, and so the river valley filled up, twice forming the large [[glacial lake]] [[Glacial Lake|Nahanni]], and once forming the smaller [[Glacial Lake Tetcella]]. This had a profound effect on the river's most famous feature, [[Virginia Falls, Northwest Territories|Virginia Falls]].
The current course of the Nahanni River around Virginia Falls was originally blocked by a spur of the nearby [[Sunblood Mountain]]. Sometime during the [[Illinoian Stage]] (352,000 to 132,000 years ago), a glacier severed the spur, and the river took its present course, cutting into the land and forming the Fourth Canyon. During the last glaciation, the valley was immersed by Glacial Lake Nahanni, and heavy silting from the glacial water filled in the course once again, shifting the falls to their present location.
Further downstream, the First, Second, and Third Canyons were also unaffected by the direct power of glaciation. The canyons of the Nahanni River are somewhat unique as a result. Usually when a river erodes the land, forming a [[valley]], the valley takes the form of a V shape. The effect of glaciers on these V-shaped valleys is unmistakable, leaving a steeper U-shaped valley. Because the Nahanni's course was already established before the mountains rose, it formed steep canyon wall that plummet hundreds of feet to the river's edge. Relatively untouched by glaciation, these canyons continue in their ancient state.
-->
== इतिहास==
जब यहां पहली बार यूरोपीय लोग आए तो उन्हें नदी तट पर डेन लोग रहते मिले। शुरुवाती 1823 में, हडसन बे कम्पनी के अलेक्ज़ेंडर मैक्लिऑड ने नदी के निचले क्षेत्र का अन्वेषण किया। <ref name="Karamanksi">{{cite book|first=थिओडोर|last=करामान्स्की|authorlink=थिओडोर जे. करामान्स्की|year=1983|title=Fur Trade and Exploration: Opening the Far Northwest |url=https://archive.org/details/furtradeexplorat0000kara|publisher=ओक्लाहामा विश्वविद्यालय प्रेस| isbn=0-8061-1833-4}}</ref> कम्पनी की इस क्षेत्र में रूचि तब समाप्त हो गयी जब उसे लगा कि नदी किनारे बहुत भारी संख्या में मूल निवासी नही रहते हैं, क्योंकि ये इतनी बड़ी जनसंख्या की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर सकती थी। साथ ही यहाँ से पश्चिम की तरफ जाने के लिये कोई बहुत अच्छा व छोटा रास्ता भी नहीं था।
<!--
With the Cassiar gold rush in the 1870s, prospectors came into the area for the first time. Famously, the MacLeod brothers were found dead along the Nahanni in 1906 after reportedly staking a rich claim along the Flat River.<ref name="Patterson">{{cite book|first=R.M.|last=Patterson|authorlink=R.M. Patterson|year=1953|title=Dangerous River: Adventure on the Nahanni |publisher=TouchWood Editions | isbn=1894898869}}</ref> Later two prospectors reached the South Nahanni from the Yukon by ascending the Ross River then crossing the divide to a source of the Nahanni and descended the river searching for the lost claim. One mysteriously died and was only found by his partner years later. During the following decades several more prospectors and trappers disappeared or were found dead along the Nahanni and its tributaries, starting rumors and giving the river a reputation of being extremely dangerous. This also gave rise to several of the names along the river including Deadman Valley and Headless Valley.<ref name="Patterson"/>
The arrival of float planes in the mid 20th century greatly increased access to the river, and allowed it to be visited without extended backcountry journeys. This, and the publishing of R.M. Patterson’s Dangerous River, made the South Nahanni an outdoor destination.
-->
1972 में उनके अंतिम अन्वेष्ण के दौरान प्रधानमंत्री [[पियर ट्रूडो]] यहाँ जीन पोइरेल के साथ इस क्षेत्र को और अच्छे से समझने आये। अपनी यात्रा पूरी होने के बाद उन्होंने नाहानी को कनाडा के लिये एक राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया।
1978 में यह उद्यान [[युनेस्को|यूनेस्को]] का [https://web.archive.org/web/20170701095105/http://whc.unesco.org/en/list/24 पहला विश्व विरासत उद्यान] बना।
== अर्थव्यवस्था==
दक्षिण नहानी नदी पर निम्नलिखित हवाईअड्डे हैं:
* [[वर्जीनिया फ़ाल्स वाटर एरोड्रम]],
* [[नहानी बुट वाटर एरोड्रम]] और
* [[नहानी बुट एरोड्रम]]।
==इन्हें भी देखें==
* [[कनाडा में नदियों की सूची]]
* [[अल्बर्ट फाइले]]
* [[लिअर्ड नदी]]
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
* The Dangerous River. Adventure on the Nahanni. आर.एम. पैटरसन के द्वारा लिखित। "
== और पढें ==
{{refbegin}}
* {{cite web| url = http://www.pc.gc.ca/pn-np/nt/nahanni/natcul/natcul1d_e.asp| title = Nahanni National Park Reserve of Canada: Hydrology| accessdate = 2006-10-23| date = 2003-12-11| publisher = [[पार्क्स कनाडा]]| archive-url = https://web.archive.org/web/20050216103456/http://www.pc.gc.ca/pn-np/nt/nahanni/natcul/natcul1d_e.asp| archive-date = 16 फ़रवरी 2005| url-status = live}}
* {{cite book | editor = मैक्क्रीडी, मैरी| title = Canoeing Canada's Northwest Territories: A Paddler's Guide | year = 1995 | publisher = Canadian Recreational Canoeing Association | location = Hyde Park, Ontario, Canada | id = ISDN 1-895465-09-5 | chapter = South Nahanni River.}}
* {{cite book | last = हार्टलिंग| first = आर. नील | title = Nahanni: River of Gold, River of Dreams | origyear = 1993 | year = 1998 | publisher = Canadian Recreational Canoeing Association | location = मेरिकविले, ओंटारियो, कनाडा| ISBN = 1-895465-06-0}}
{{refend}}
{{Commons category|South Nahanni River}}
{{Authority control}}
[[श्रेणी:कनाडा की नदियाँ]]
48qo803ziovt14ndb7txcsa5i7i9n4g
फेत्चबून प्रान्त
0
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2026-04-23T15:28:16Z
चाहर धर्मेंद्र
703114
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक प्रांत
|province_name = फेत्चबून<br /><small>เพชรบูรณ์</small><br /><small>Phetchabun</small>
|image = Buddhist monks in Phetchabun.jpg
|image_caption = फेत्चबून प्रान्त में बौद्ध भिक्षु
|image_size = 200px
|loc_map = Thailand Phetchabun locator map.svg
|capital = [[फेत्चबून]]
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|pop_year = २०१४
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|sub_province_title = अम्फोए (ज़िले)
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|languages= [[थाई भाषा|थाई]]
}}
'''फेत्चबून''' [[थाईलैण्ड]] का एक [[थाईलैण्ड के प्रान्त|प्रान्त]] है। यह [[मध्य थाईलैण्ड]] क्षेत्र में स्थित है।<ref>"[https://books.google.com/books?id=rtOB48gD5mgC Moon Living Abroad in Thailand]{{Dead link|date=अगस्त 2021 |bot=InternetArchiveBot }}," Suzanne Nam, Avalon Travel, 2010, ISBN 9781598806953</ref>
== नामोत्पत्ति ==
"फेत्च" [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के "वज्र" शब्द से आया है और इसका अर्थ "हीरा" होता है (जो इन्द्रदेव के वज्र पर "वज्रमणि" भी कहलाता है) और "बून" संस्कृत के "पूर्ण" शब्द से उत्पन्न हुआ है। इसलिये "फेत्चबून" का अर्थ थाई भाषा में "साक्षात हीरा" है।
== भूगोल ==
फेत्चबून प्रान्त थाईलैण्ड के [[उत्तरी थाईलैण्ड|उत्तरी]] और [[मध्य थाईलैण्ड|मध्य]] क्षेत्रों की सीमा पर है। यह [[पा सक नदी]] के ऊपजाऊ मैदान में विस्तृत है और इसके पूर्व व पश्चिम में [[फेत्चबून पहाड़ियाँ]] हैं। प्रान्त में कई [[प्राकृतिक उद्यान]], जलप्रपात और झीलें हैं।
== इन्हें भी देखें ==
* [[थाईलैण्ड के प्रान्त]]
* [[मध्य थाईलैण्ड]]
== सन्दर्भ ==
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{{थाईलैण्ड के प्रान्त}}
[[श्रेणी:फेत्चबून प्रान्त|*]]
[[श्रेणी:थाईलैण्ड के प्रान्त]]
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पुत्ताण्डु
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{{Infobox Holiday
|holiday_name = पुत्ताण्डु<br>तमिल नव वर्ष
|image = A colorful Puthandu welcome to Sinhala and Tamil New Year in Sri Lanka.jpg
|caption = पुत्ताण्डु के लिए तमिल नव वर्ष की सजावट
|observedby = तमिल लोग|[[भारत]], श्रीलंका, मॉरीशस, सिंगापुर में तमिल हिन्दू<ref name="Melton2011p633"/>
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|celebrations = दावत देना, उपहार भेजना, दूसरों के घरों और मंदिरों में जाना
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|relatedto = वैसाखी, विशु (केरल), थिङ्यान|म्यांमार का नव वर्ष, कम्बोडिया का नववर्ष, सोङ्क्रान (लाओ)|लाओ का नव वर्ष, विशु|मलयाली नववर्ष, पन संक्रान्ति|ओड़िया नव वर्ष, सिंहली नव वर्ष|श्री लंका का नव वर्ष, सोङ्करन (थाईलैण्ड)|थाई नव वर्ष
}}
'''पुत्ताण्डु''' (तमिल: புத்தாண்டு) [[तमिल]] कालगणना में वर्ष के प्रथम दिन का नाम है। इसे '''वरुटप्पिऱप्पु''' भी कहा जाता है, <ref name="Melton2011p633"/> यह तमिल मास चित्तिरै का प्रथम दिवस है। यह प्रतिवर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर के 14 अप्रैल या उसके आस-पास ही पड़ता है। <ref name="Melton2011p633"/> इस दिन को [[भारत]] के विभिन्न भागों में वर्ष के आरम्भिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसके नाम अलग अलग होते हैं। केरल में इस दिन को 'विशु' तथा मध्य भारत एवं उत्तर भारत में [[वैसाखी]] कहते है। <ref name="Melton2011p633"/>
इस दिन, तमिल लोग "पुट्टू वतुत्काका" कहकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं जो हिंदी के "नया वर्ष शुभ हो" के तुल्य है। <ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide|url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331125215/https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> इस दिन ज्यादातर लोग अपने परिवार के साथ समय बिताते हैं एवं लोग अपने घर-द्वार की साफ सफाई करते हैं। एक थाली भी सजाते हैं जिसमे [[फल]]ों, [[पुष्प|फूलों]] और अन्य शुभ वस्तुएं राखी जाती हैं।
पुत्ताण्डु तमिलनाडु और [[पुत्तुचेरी]] के बाहर रहने वाले तमिल हिंदुओं के द्वारा भी मनाया जाता है, जैसे श्रीलंका, [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], रीयूनियन, [[मॉरिशस|मॉरीशस]] और अन्य देशों में भी जहाँ तमिल लोग प्रवासी के तौर पर रहते हैं। <ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations|url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331123838/https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref>
इस दिन, तमिल लोग एक-दूसरे को "पुत्ताण्टु वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta| புத்தாண்டு வாழ்த்துகள்}}) या "इऩिय पुत्ताण्टु नल्वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta|இனிய புத்தாண்டு நல்வாழ்த்துகள்}}) कहकर अभिवादन करते हैं, जिसका अर्थ "नव वर्ष की शुभकामनाएं" के समान है।<ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide |url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220 |year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220}}</ref>
यह दिन पारिवारिक समय के रूप में मनाया जाता है। घरों में लोग घर की सफाई करते हैं, फलों, फूलों और शुभ वस्तुओं के साथ एक थाली तैयार करते हैं, परिवार के [[Puja (Hinduism)|पूजा]] वेदी को प्रज्वलित करते हैं और अपने स्थानीय मंदिरों में जाते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं और बच्चे बड़ों के पास जाकर उनका सम्मान करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, फिर परिवार एक साथ बैठकर शाकाहारी भोजन करता है।<ref>{{cite book|author=Samuel S. Dhoraisingam|title=Peranakan Indians of Singapore and Melaka |url=https://books.google.com/books?id=QHwcAgAAQBAJ |year=2006|publisher=Institute of Southeast Asian Studies|isbn=978-981-230-346-2|page=38}}</ref><math display="block"></math>
पुत्ताण्डु [[तमिल लोग]] द्वारा [[तमिलनाडु]] और [[पुदुचेरी]] में, तथा [[श्रीलंका]], [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], [[मॉरीशस]] और [[रियूनियन]] में मनाया जाता है। तमिल प्रवासी समुदाय<ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations |url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633}}</ref><ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ |year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref> इसे [[म्यांमार]], [[दक्षिण अफ्रीका]], [[यूनाइटेड किंगडम]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]], [[कनाडा]] और [[ऑस्ट्रेलिया]] जैसे देशों में भी मनाता है।
==उद्गभव और महत्व==
[[File:A food treats arrangement for Puthandu (Vaisakhi) Tamil New Year.jpg|thumb|left|पुत्ताण्डु के लिए पारंपरिक उत्सव व्यंजनों की सजावट।]]
तमिल नव वर्ष वसंत विषुव के बाद होता है एवं आम तौर पर ग्रेगोरी कैलेंडर के 14 अप्रैल को होता है। <ref name="Melton2011p633"/> यह दिन पारंपरिक तौर पर तमिल कैलेंडर के पहले दिन के तौर पर मनाया जाता है और तमिलनाडु और श्रीलंका दोनों जगहों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। इसी दिन [[असम]], पश्चिम बंगाल, केरल, [[मणिपुर]], त्रिपुरा, [[बिहार]], ओडिशा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, [[राजस्थान]] में कई हिंदुओं और साथ ही नेपाल में हिंदुओं द्वारा पारंपरिक नए साल के रूप में मनाया जाता है। बांग्लादेश। श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड के कई बौद्ध समुदाय एवं श्रीलंका का सिंहली समुदाय भी इस दिन को अपने नए साल के रूप में उसी दिन भी मनाता हैं,<ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20160520031624/https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|archive-date=20 मई 2016|url-status=live}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/Hindu New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref>
प्रारंभिक तमिल साहित्य में अप्रैल नववर्ष के कई संदर्भ मिलते हैं। नक्कीरर, [[संगम काल]] के लेखक और ''[[नेडुनलवाडई]]'' के रचयिता, ने लिखा कि सूर्य मेष/चित्रई से होकर राशि चक्र के 11 क्रमिक चिन्हों से गुजरता है।<ref>JV Chelliah: Pattupattu: Ten Tamil Idylls. Tamil Verses with English Translation. Thanjavur: Tamil University, 1985 – Lines 160 to 162 of the Neṭunalvāṭai</ref><ref>Kamil Zvelabil dates the Neṭunalvāṭai to between the 2nd and 4th century CE – Kamil Zvelebil: The Smile of Murugan on Tamil Literature of South India. E.J. Brill, Leiden, Netherlands, 1973 – page 41-42</ref> कूडलूर किऴार [[पुऱनानूरु]] में मेष राशि/चित्तिरै को वर्ष के प्रारंभ के रूप में संदर्भित करते हैं।<ref>Poem 229 of Puṟanāṉūṟu</ref><ref>Professor Vaiyapuri Pillai: 'History of Tamil Language and Literature' Chennai, 1956, pages 35, 151</ref><ref>George L. Hart and Hank Heifetz: The Four Hundred Songs of War and Wisdom: An Anthology of Poems from Classical Tamil: The Purananuru, Columbia University Press, New York, 1999 – Poem 229 in pages 142 to 143. – "At midnight crowded with darkness in the first quarter of the night when the constellation of Fire was linked with The Goat and from the moment the First Constellation arose...during the first half of the month of Pankuni, when the Constellation of the Far North was descending...". George Hart in turn dates the Purananuru to between the first and third centuries CE. See page xv – xvii</ref>टोल्काप्पियम तमिल की सबसे प्राचीन उपलब्ध व्याकरण है जो वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित करती है, जहाँ चित्तिरै इलवेनिल ऋतु या ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत को चिह्नित करता है।<ref>V. Murugan, G. John Samuel: Tolkāppiyam in English: Translation, with the Tamil text, Transliteration in the Roman Script, Introduction, Glossary, and Illustrations, Institute of Asian Studies, Madras, India, 2001</ref> सिलप्पदिकारम् में 12 राशियों (या राशि चिन्हों) का उल्लेख है, जो मेष/चित्तिरै से शुरू होती हैं।<ref>Canto 26 of Silappadikaaram. Canto 5 also describes the foremost festival in the Chola country – the Indra Vilha celebrated in Chitterai</ref>[[मणिमेकलाई]] आज जिस प्रकार हम जानते हैं, उस हिंदू सौर कैलेंडर का संकेत करती है। आदियार्कुनल्लार, एक प्रारंभिक मध्यकालीन टीकाकार या उरै-आसिरियार, तमिल कैलेंडर के बारह महीनों का उल्लेख करते हैं, विशेष रूप से चित्तिरै के संदर्भ में। बाद में पगन, बर्मा में 11वीं शताब्दी ईस्वी के अभिलेखीय संदर्भ और सुखोथाई, थाईलैंड में 14वीं शताब्दी ईस्वी के संदर्भ मिलते हैं, जो दक्षिण भारतीय, प्रायः वैष्णव, दरबारियों से संबंधित हैं, जिन्हें मध्य अप्रैल से प्रारंभ होने वाले पारंपरिक कैलेंडर को परिभाषित करने का कार्य सौंपा गया था।<ref>G.H. Luce, Old Burma – Early Pagan, Locust Valley, New York, Page 68, and A.B. Griswold, 'Towards a History of Sukhodaya Art, Bangkok 1967, pages 12–32</ref>
==समारोह==
तमिल लोग पुत्ताण्डु को पारंपरिक हिंदू नया साल के रूप में मनाते हैं, जिसे पुथुरूषम भी कहा जाता है,। यह तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना चित्राई का महीना है और पुत्ताण्डु आमतौर पर 14 अप्रैल को ही पड़ता है। दक्षिणी [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, त्योहार को चित्तारीय विशु कहा जाता है। घर के प्रवेश द्वार पर इस दिन सभी लोग बहुत ही आकर्षक [[रंगोली]] बनाकर नए वर्ष का स्वागत करते है। तमिल लोग पुत्ताण्डु, जिसे पुथुवरुषम भी कहा जाता है, को पारंपरिक "तमिल/नव वर्ष" के रूप में मनाते हैं, ऐसा पीटर रीव्स कहते हैं।<ref name=reevesp113/> यह चित्तिरै का महीना है, जो तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना है, और पुत्ताण्डु सामान्यतः 14 अप्रैल को पड़ता है।<ref name="Dalal2010p406">{{cite book|author=Roshen Dalal|title=Hinduism: An Alphabetical Guide|url=https://books.google.com/books?id=DH0vmD8ghdMC |year=2010|publisher=Penguin Books|isbn=978-0-14-341421-6|page=406}}</ref>दक्षिणी [[तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, इस त्योहार को चित्तिरै [[विषु]] कहा जाता है। पुत्ताण्डु की पूर्व संध्या पर, एक थाली में तीन फल (आम, केला और कटहल), पान के पत्ते और सुपारी, सोने/चांदी के आभूषण, सिक्के/पैसा, फूल और एक दर्पण सजाया जाता है।<ref name="Fieldhouse2017p548"/> यह केरल में विषु नव वर्ष त्योहार की औपचारिक थाली के समान है। तमिल परंपरा के अनुसार, यह उत्सव की थाली नव वर्ष के दिन जागने पर पहली दृष्टि के रूप में शुभ मानी जाती है।<ref name="Dalal2010p406"/>घर के प्रवेश द्वारों को रंगीन चावल के पाउडर से विस्तृत रूप से सजाया जाता है। इन डिज़ाइनों को [[कोलम]] कहा जाता है।<ref name=mercer22/>
=== मंदिरों में चित्तिरै तिरुविझा ===
मंदिरों के शहर [[मदुरै]] में, चित्तिरै तिरुविझा का उत्सव [[मीनाक्षी मंदिर]] में मनाया जाता है। एक विशाल प्रदर्शनी आयोजित की जाती है, जिसे चित्तिरै पोरुट्काच्ची कहा जाता है।<ref name="Dalal2010p406" />तमिल नववर्ष के दिन, [[रथ उत्सव]] का आयोजन तिरुविदैमरतूर में, जो [[कुंभकोणम]] के पास स्थित है, किया जाता है। [[तिरुचिरापल्ली]], [[कांचीपुरम]] और अन्य स्थानों पर भी उत्सव मनाए जाते हैं।<ref name="Dalal2010p406" />
=== कोंगु नाडु में चिथिरैकानी ===
''चिथिरैकानी'', जिसे ''विषुकानी'' के नाम से भी जाना जाता है, पुत्ताण्डु उत्सवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है [[कोंगु नाडु]] क्षेत्र में, जो [[केरल]] और [[तुलु नाडु]] में विषु उत्सवों के साथ समानताएँ साझा करते हैं।
[[File:Chithiraikani-kongunadu-newyear.png|thumb|एक कोंगु नाडु संस्कृति की चिथिरई कणी थाली जिसमें शुभ फलों, पान के पत्तों, चावल, सोने या चांदी के आभूषण, सिक्के, धन और फूलों की व्यवस्था होती है, जिसे दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जो समृद्धि का प्रतीक है।|210x210px]]
==विवाद==
जब २००८ में जब द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (द्रमुक) की तमिलनाडु में सरकार थी तब उन्होंने घोषित किया था कि तमिल नए साल को तमिल थाई महीने के पहले दिन ((14 जनवरी) [[पोंगल]] के फसल त्योहार के साथ मनाया जाएगा। 29 जनवरी 2008 को डीएमके विधानसभा सदस्यों और तमिलनाडु सरकार द्वारा तमिलनाडु नया साल (घोषणा बिल 2008) राज्य कानून के रूप में अधिनियमित किया गया था। <ref>{{cite web |url=http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |title=Bill on new Tamil New Year Day is passed unanimously |publisher=Tn.gov.in |accessdate=18 October 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20111028094334/http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |archive-date=28 अक्तूबर 2011 |url-status=live }}</ref> डीएमके की बहुमत वाली सरकार का यह कानून बाद में 23 अगस्त 2011 को एआईएडीएमके की बहुमत वाली सरकार ने तमिलनाडु विधानसभा में एक अलग कानून बनाकर रद्द कर दिया गया। हालाकि तमिलनाडु के कई लोगों ने DMK सरकार के कानून को नजरअंदाज कर दिया था जो त्योहार की तारीख को बदलने से सम्बंधित था, और अप्रैल के मध्य में ही अपने पारंपरिक पुत्ताण्डु नए साल के त्यौहार को मनाते रहे।
==संबंधित त्यौहार==
पुत्ताण्डु का त्यौहार अन्य जगहों पर मनाया जाता है लेकिन इनके नाम अलग है जो हैं:
#[[केरल]] में [[विषु|विशु]]
#[[आन्ध्र प्रदेश|आंध्र प्रदेश]] एवं तेलंगाना में उगाडी
#मध्य और [[उत्तर भारत|उत्तरी भारत]] में वैसाखी
#[[ओडिशा]] में [[विष्णु]] संक्रांति
#[[असम]] में रोंगली बीहु
== इन्हें भी देखें ==
*[[तमिल]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:त्योहार]]
[[श्रेणी:तमिल]]
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चितिरैकानी के विषय में जानकारी दी गई है।
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{{Infobox Holiday
|holiday_name = पुत्ताण्डु<br>तमिल नव वर्ष
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}}
'''पुत्ताण्डु''' (तमिल: புத்தாண்டு) [[तमिल]] कालगणना में वर्ष के प्रथम दिन का नाम है। इसे '''वरुटप्पिऱप्पु''' भी कहा जाता है, <ref name="Melton2011p633"/> यह तमिल मास चित्तिरै का प्रथम दिवस है। यह प्रतिवर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर के 14 अप्रैल या उसके आस-पास ही पड़ता है। <ref name="Melton2011p633"/> इस दिन को [[भारत]] के विभिन्न भागों में वर्ष के आरम्भिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसके नाम अलग अलग होते हैं। केरल में इस दिन को 'विशु' तथा मध्य भारत एवं उत्तर भारत में [[वैसाखी]] कहते है। <ref name="Melton2011p633"/>
इस दिन, तमिल लोग "पुट्टू वतुत्काका" कहकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं जो हिंदी के "नया वर्ष शुभ हो" के तुल्य है। <ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide|url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331125215/https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> इस दिन ज्यादातर लोग अपने परिवार के साथ समय बिताते हैं एवं लोग अपने घर-द्वार की साफ सफाई करते हैं। एक थाली भी सजाते हैं जिसमे [[फल]]ों, [[पुष्प|फूलों]] और अन्य शुभ वस्तुएं राखी जाती हैं।
पुत्ताण्डु तमिलनाडु और [[पुत्तुचेरी]] के बाहर रहने वाले तमिल हिंदुओं के द्वारा भी मनाया जाता है, जैसे श्रीलंका, [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], रीयूनियन, [[मॉरिशस|मॉरीशस]] और अन्य देशों में भी जहाँ तमिल लोग प्रवासी के तौर पर रहते हैं। <ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations|url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331123838/https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref>
इस दिन, तमिल लोग एक-दूसरे को "पुत्ताण्टु वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta| புத்தாண்டு வாழ்த்துகள்}}) या "इऩिय पुत्ताण्टु नल्वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta|இனிய புத்தாண்டு நல்வாழ்த்துகள்}}) कहकर अभिवादन करते हैं, जिसका अर्थ "नव वर्ष की शुभकामनाएं" के समान है।<ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide |url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220 |year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220}}</ref>
यह दिन पारिवारिक समय के रूप में मनाया जाता है। घरों में लोग घर की सफाई करते हैं, फलों, फूलों और शुभ वस्तुओं के साथ एक थाली तैयार करते हैं, परिवार के [[Puja (Hinduism)|पूजा]] वेदी को प्रज्वलित करते हैं और अपने स्थानीय मंदिरों में जाते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं और बच्चे बड़ों के पास जाकर उनका सम्मान करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, फिर परिवार एक साथ बैठकर शाकाहारी भोजन करता है।<ref>{{cite book|author=Samuel S. Dhoraisingam|title=Peranakan Indians of Singapore and Melaka |url=https://books.google.com/books?id=QHwcAgAAQBAJ |year=2006|publisher=Institute of Southeast Asian Studies|isbn=978-981-230-346-2|page=38}}</ref><math display="block"></math>
पुत्ताण्डु [[तमिल लोग]] द्वारा [[तमिलनाडु]] और [[पुदुचेरी]] में, तथा [[श्रीलंका]], [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], [[मॉरीशस]] और [[रियूनियन]] में मनाया जाता है। तमिल प्रवासी समुदाय<ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations |url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633}}</ref><ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ |year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref> इसे [[म्यांमार]], [[दक्षिण अफ्रीका]], [[यूनाइटेड किंगडम]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]], [[कनाडा]] और [[ऑस्ट्रेलिया]] जैसे देशों में भी मनाता है।
==उद्गभव और महत्व==
[[File:A food treats arrangement for Puthandu (Vaisakhi) Tamil New Year.jpg|thumb|left|पुत्ताण्डु के लिए पारंपरिक उत्सव व्यंजनों की सजावट।]]
तमिल नव वर्ष वसंत विषुव के बाद होता है एवं आम तौर पर ग्रेगोरी कैलेंडर के 14 अप्रैल को होता है। <ref name="Melton2011p633"/> यह दिन पारंपरिक तौर पर तमिल कैलेंडर के पहले दिन के तौर पर मनाया जाता है और तमिलनाडु और श्रीलंका दोनों जगहों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। इसी दिन [[असम]], पश्चिम बंगाल, केरल, [[मणिपुर]], त्रिपुरा, [[बिहार]], ओडिशा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, [[राजस्थान]] में कई हिंदुओं और साथ ही नेपाल में हिंदुओं द्वारा पारंपरिक नए साल के रूप में मनाया जाता है। बांग्लादेश। श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड के कई बौद्ध समुदाय एवं श्रीलंका का सिंहली समुदाय भी इस दिन को अपने नए साल के रूप में उसी दिन भी मनाता हैं,<ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20160520031624/https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|archive-date=20 मई 2016|url-status=live}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/Hindu New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref>
प्रारंभिक तमिल साहित्य में अप्रैल नववर्ष के कई संदर्भ मिलते हैं। नक्कीरर, [[संगम काल]] के लेखक और ''[[नेडुनलवाडई]]'' के रचयिता, ने लिखा कि सूर्य मेष/चित्रई से होकर राशि चक्र के 11 क्रमिक चिन्हों से गुजरता है।<ref>JV Chelliah: Pattupattu: Ten Tamil Idylls. Tamil Verses with English Translation. Thanjavur: Tamil University, 1985 – Lines 160 to 162 of the Neṭunalvāṭai</ref><ref>Kamil Zvelabil dates the Neṭunalvāṭai to between the 2nd and 4th century CE – Kamil Zvelebil: The Smile of Murugan on Tamil Literature of South India. E.J. Brill, Leiden, Netherlands, 1973 – page 41-42</ref> कूडलूर किऴार [[पुऱनानूरु]] में मेष राशि/चित्तिरै को वर्ष के प्रारंभ के रूप में संदर्भित करते हैं।<ref>Poem 229 of Puṟanāṉūṟu</ref><ref>Professor Vaiyapuri Pillai: 'History of Tamil Language and Literature' Chennai, 1956, pages 35, 151</ref><ref>George L. Hart and Hank Heifetz: The Four Hundred Songs of War and Wisdom: An Anthology of Poems from Classical Tamil: The Purananuru, Columbia University Press, New York, 1999 – Poem 229 in pages 142 to 143. – "At midnight crowded with darkness in the first quarter of the night when the constellation of Fire was linked with The Goat and from the moment the First Constellation arose...during the first half of the month of Pankuni, when the Constellation of the Far North was descending...". George Hart in turn dates the Purananuru to between the first and third centuries CE. See page xv – xvii</ref>टोल्काप्पियम तमिल की सबसे प्राचीन उपलब्ध व्याकरण है जो वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित करती है, जहाँ चित्तिरै इलवेनिल ऋतु या ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत को चिह्नित करता है।<ref>V. Murugan, G. John Samuel: Tolkāppiyam in English: Translation, with the Tamil text, Transliteration in the Roman Script, Introduction, Glossary, and Illustrations, Institute of Asian Studies, Madras, India, 2001</ref> सिलप्पदिकारम् में 12 राशियों (या राशि चिन्हों) का उल्लेख है, जो मेष/चित्तिरै से शुरू होती हैं।<ref>Canto 26 of Silappadikaaram. Canto 5 also describes the foremost festival in the Chola country – the Indra Vilha celebrated in Chitterai</ref>[[मणिमेकलाई]] आज जिस प्रकार हम जानते हैं, उस हिंदू सौर कैलेंडर का संकेत करती है। आदियार्कुनल्लार, एक प्रारंभिक मध्यकालीन टीकाकार या उरै-आसिरियार, तमिल कैलेंडर के बारह महीनों का उल्लेख करते हैं, विशेष रूप से चित्तिरै के संदर्भ में। बाद में पगन, बर्मा में 11वीं शताब्दी ईस्वी के अभिलेखीय संदर्भ और सुखोथाई, थाईलैंड में 14वीं शताब्दी ईस्वी के संदर्भ मिलते हैं, जो दक्षिण भारतीय, प्रायः वैष्णव, दरबारियों से संबंधित हैं, जिन्हें मध्य अप्रैल से प्रारंभ होने वाले पारंपरिक कैलेंडर को परिभाषित करने का कार्य सौंपा गया था।<ref>G.H. Luce, Old Burma – Early Pagan, Locust Valley, New York, Page 68, and A.B. Griswold, 'Towards a History of Sukhodaya Art, Bangkok 1967, pages 12–32</ref>
==समारोह==
तमिल लोग पुत्ताण्डु को पारंपरिक हिंदू नया साल के रूप में मनाते हैं, जिसे पुथुरूषम भी कहा जाता है,। यह तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना चित्राई का महीना है और पुत्ताण्डु आमतौर पर 14 अप्रैल को ही पड़ता है। दक्षिणी [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, त्योहार को चित्तारीय विशु कहा जाता है। घर के प्रवेश द्वार पर इस दिन सभी लोग बहुत ही आकर्षक [[रंगोली]] बनाकर नए वर्ष का स्वागत करते है। तमिल लोग पुत्ताण्डु, जिसे पुथुवरुषम भी कहा जाता है, को पारंपरिक "तमिल/नव वर्ष" के रूप में मनाते हैं, ऐसा पीटर रीव्स कहते हैं।<ref name=reevesp113/> यह चित्तिरै का महीना है, जो तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना है, और पुत्ताण्डु सामान्यतः 14 अप्रैल को पड़ता है।<ref name="Dalal2010p406">{{cite book|author=Roshen Dalal|title=Hinduism: An Alphabetical Guide|url=https://books.google.com/books?id=DH0vmD8ghdMC |year=2010|publisher=Penguin Books|isbn=978-0-14-341421-6|page=406}}</ref>दक्षिणी [[तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, इस त्योहार को चित्तिरै [[विषु]] कहा जाता है। पुत्ताण्डु की पूर्व संध्या पर, एक थाली में तीन फल (आम, केला और कटहल), पान के पत्ते और सुपारी, सोने/चांदी के आभूषण, सिक्के/पैसा, फूल और एक दर्पण सजाया जाता है।<ref name="Fieldhouse2017p548"/> यह केरल में विषु नव वर्ष त्योहार की औपचारिक थाली के समान है। तमिल परंपरा के अनुसार, यह उत्सव की थाली नव वर्ष के दिन जागने पर पहली दृष्टि के रूप में शुभ मानी जाती है।<ref name="Dalal2010p406"/>घर के प्रवेश द्वारों को रंगीन चावल के पाउडर से विस्तृत रूप से सजाया जाता है। इन डिज़ाइनों को [[कोलम]] कहा जाता है।<ref name=mercer22/>
=== मंदिरों में चित्तिरै तिरुविझा ===
मंदिरों के शहर [[मदुरै]] में, चित्तिरै तिरुविझा का उत्सव [[मीनाक्षी मंदिर]] में मनाया जाता है। एक विशाल प्रदर्शनी आयोजित की जाती है, जिसे चित्तिरै पोरुट्काच्ची कहा जाता है।<ref name="Dalal2010p406" />तमिल नववर्ष के दिन, [[रथ उत्सव]] का आयोजन तिरुविदैमरतूर में, जो [[कुंभकोणम]] के पास स्थित है, किया जाता है। [[तिरुचिरापल्ली]], [[कांचीपुरम]] और अन्य स्थानों पर भी उत्सव मनाए जाते हैं।<ref name="Dalal2010p406" />
=== कोंगु नाडु में चिथिरैकानी ===
''चिथिरैकानी'', जिसे ''विषुकानी'' के नाम से भी जाना जाता है, पुत्ताण्डु उत्सवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है [[कोंगु नाडु]] क्षेत्र में, जो [[केरल]] और [[तुलु नाडु]] में विषु उत्सवों के साथ समानताएँ साझा करते हैं।
[[File:Chithiraikani-kongunadu-newyear.png|thumb|एक कोंगु नाडु संस्कृति की चिथिरई कणी थाली जिसमें शुभ फलों, पान के पत्तों, चावल, सोने या चांदी के आभूषण, सिक्के, धन और फूलों की व्यवस्था होती है, जिसे दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जो समृद्धि का प्रतीक है।|210x210px]] यह ''चितिरैकानी'' प्रथा एक विशेष थाली की व्यवस्था करने से संबंधित है जिसमें शुभ वस्तुएँ रखी जाती हैं और जिसे एक दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है। [[कोंगु तमिल]] और [[मलयालम]] में "कानी" शब्द का अर्थ है "वह जो सबसे पहले देखा जाता है," और दोनों उत्सवों में शुभ वस्तुओं से सजी एक विशेष थाली को दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है। पारंपरिक मान्यता यह है कि नववर्ष के दिन सबसे पहले आनंददायक और शुभ वस्तुओं को देखने से समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होता है।
==विवाद==
जब २००८ में जब द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (द्रमुक) की तमिलनाडु में सरकार थी तब उन्होंने घोषित किया था कि तमिल नए साल को तमिल थाई महीने के पहले दिन ((14 जनवरी) [[पोंगल]] के फसल त्योहार के साथ मनाया जाएगा। 29 जनवरी 2008 को डीएमके विधानसभा सदस्यों और तमिलनाडु सरकार द्वारा तमिलनाडु नया साल (घोषणा बिल 2008) राज्य कानून के रूप में अधिनियमित किया गया था। <ref>{{cite web |url=http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |title=Bill on new Tamil New Year Day is passed unanimously |publisher=Tn.gov.in |accessdate=18 October 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20111028094334/http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |archive-date=28 अक्तूबर 2011 |url-status=live }}</ref> डीएमके की बहुमत वाली सरकार का यह कानून बाद में 23 अगस्त 2011 को एआईएडीएमके की बहुमत वाली सरकार ने तमिलनाडु विधानसभा में एक अलग कानून बनाकर रद्द कर दिया गया। हालाकि तमिलनाडु के कई लोगों ने DMK सरकार के कानून को नजरअंदाज कर दिया था जो त्योहार की तारीख को बदलने से सम्बंधित था, और अप्रैल के मध्य में ही अपने पारंपरिक पुत्ताण्डु नए साल के त्यौहार को मनाते रहे।
==संबंधित त्यौहार==
पुत्ताण्डु का त्यौहार अन्य जगहों पर मनाया जाता है लेकिन इनके नाम अलग है जो हैं:
#[[केरल]] में [[विषु|विशु]]
#[[आन्ध्र प्रदेश|आंध्र प्रदेश]] एवं तेलंगाना में उगाडी
#मध्य और [[उत्तर भारत|उत्तरी भारत]] में वैसाखी
#[[ओडिशा]] में [[विष्णु]] संक्रांति
#[[असम]] में रोंगली बीहु
== इन्हें भी देखें ==
*[[तमिल]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:त्योहार]]
[[श्रेणी:तमिल]]
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लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा
0
829695
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6160582
2026-04-24T08:47:10Z
~2026-25198-45
921657
जन्मतिथि को देवनागरी में परिवर्तित किया।
6543552
wikitext
text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
| name = लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा
| image = Laksminath Bezbaruah.jpg
| birth_date = १४ अक्टूबर १८६४
| birth_place = आहतगुडी, नगाँव, [[असम]], [[भारत]]
| death_date = २६ मार्च १९३८
| death_place = [[डिब्रूगढ़|डिब्रूगढ]], असम, भारत
| occupation = [[लेखक]], [[उपन्यासकार]], [[नाटककार]], [[कवि]], [[सम्पादन|सम्पादक]], [[व्यंगकार]]
| ethnicity = [[असमिया भाषा|असमिया]]
| spouse = प्रज्ञासुन्दरी देवी
}}
'''लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा''' ( १८६४-१९३८) आधुनिक [[असमिया साहित्य]] के पथ-प्रदर्शक कहे जाते हैं। कविता, नाटक, गल्प, उपन्यास, निबन्ध, रम्यरचना, समालोचना, प्रहसन, जीवनी, आत्मजीवनी, शिशुसाहित्य, इतिहास अध्ययन, सांवादिकता आदि दृष्टियों से बेजबरुवा का योगदान अमूल्य है।
असमिया साहित्य में उन्होंने कहानी तथा ललित निबंध के बीच के एक सहित्य रूप को अधिक प्रचलित किया। बेजबरुआ की हास्यरस की रचनाओं को काफी लोकप्रियता मिली। इसीलिए उसे "रसराज" की उपाधि दी गई।
==साहित्यिक जीवन==
बेजबरुवा का साहित्यिक जीवन [[कोलकाता]] में शिक्षा प्राप्ति के समय से ही आरम्भ हो गया था।
===आत्म-जीवनी तथा जीवk\===
* मोर जीवन सोँवरण (प्रथम खण्ड, १९४५)<ref name="Datta1987">{{cite book|author=Amaresh Datta|title=Encyclopaedia of Indian Literature: A-Devo|url=http://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&pg=PA273|accessdate=28 November 2012|year=1987|publisher=Sahitya Akademi|isbn=978-81-260-1803-1|pages=273–|archive-url=https://web.archive.org/web/20121114200113/http://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC|archive-date=14 नवंबर 2012|url-status=live}}</ref>
* मोर जीवन सोँवरण (द्बितीय खण्ड, १९६१)<ref name="Datta1987"/>
* डाङरीया दीननाथ बेजबरुवार संक्षिप्त जीवन चरित
* श्रीश्री शंकरदेव
* श्रीश्री शंकरदेव आरु श्रीश्री माधवदेव
===चिन्ताशील रचना===
* तत्त्बकथा
* श्रीकृष्णकथा
* भगवत् कथा
===उपन्यास===
* पदुमकुँवरी
===गल्प पुथि===
* सुरभि
* साधुकथार कुँकि
* जोनबिरि
* केहोँकलि
===साधुकथा एवं शिशु साहित्य===
* बुढ़ी आइर साधु
{{multicol}}
# मेकुरीर जीयेकर साधु
# बान्दर आरु शियाल
# औ-कुँवरी
# ढोँराकाउरी आरु टिपचीचराइ
# एजनी मालिनी आरु एजोपार फुल
# बुधियक शियाल
# बाघ आरु केँकोरा
# तेजीमला
# बुढ़ा-बुढ़ी आरु शियाल
# दीघल ठेङीया
{{col-break}}
# गंगाटोप
# नुमलीया पो
# सरबजान
# एटा शिङरा माछर कथा
# एटा बली मानुह
# चिलनी जीयेकर साधु
# तुला आरु तेजा
# कटा योवा नाक,खारणी दि ढाक
# तीखर आरु चुटिबाइ
# चम्पावती
{{col-break}}
# जरदगव रजार उपाख्यान
# पानेशै
# जोँवाइर साधु
# कुकुरीकणा
# भेकुलीर साधु
# तावैयेकर साधु
# लटकन
# लखिमी तिरोता
# दुइ बुधियक
# कांचनी
{{col-end}}
* ककादेउता आरु नातिलरा
* जुनुका
===बैषयिक गद्य===
* बाखर
* कामत कृतित्ब लभिबर संकेत
===नाटक===
'''धेमेलीया नाटक (प्रहसन)'''
* लितिकाइ
* नोमल
* पाचनि
* चिकरपति निकरपति
'''नाटर कुकि'''
* गदाधर रजा
* बारेमतरा
* ह-य-ब-र-ल
* हेमलेत
* मङला
'''बुरंजीमूलक नाटक'''
* चक्रध्बज सिंह
* जयमती कुँवरी
* बेलिमार
===रस रचना या हास्यरसात्मक रचना===
* कृपाबर बरुवार काकतर टोपोला
* कृपाबर बरुवार ओभतनि
* बरबरुवार बुलनि
* बरबरुवार भावर बुरबुरणि (प्रथम खण्ड)
* बरबरुवार भावर बुरबुरणि (द्बितीय खण्ड)
* बरबरुवार चिन्तार शिलगुटि
* बरबरुवार साहित्यिक रहस्य
* कृपाबर बरुवार सामरणि
===अनुवाद===
* भारतबर्षर बुरंजी
===अन्यान्य===
* असमीया भाषा आरु साहित्य
* पत्रलेखा
* काँहुदी आरु खारलि
* सम्पादकर च'रा
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:असमिया साहित्यकार]]
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6543567
6543552
2026-04-24T09:56:06Z
AMAN KUMAR
911487
/* आत्म-जीवनी तथा जीवk\ */ सुधार
6543567
wikitext
text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
| name = लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा
| image = Laksminath Bezbaruah.jpg
| birth_date = १४ अक्टूबर १८६४
| birth_place = आहतगुडी, नगाँव, [[असम]], [[भारत]]
| death_date = २६ मार्च १९३८
| death_place = [[डिब्रूगढ़|डिब्रूगढ]], असम, भारत
| occupation = [[लेखक]], [[उपन्यासकार]], [[नाटककार]], [[कवि]], [[सम्पादन|सम्पादक]], [[व्यंगकार]]
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| spouse = प्रज्ञासुन्दरी देवी
}}
'''लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा''' ( १८६४-१९३८) आधुनिक [[असमिया साहित्य]] के पथ-प्रदर्शक कहे जाते हैं। कविता, नाटक, गल्प, उपन्यास, निबन्ध, रम्यरचना, समालोचना, प्रहसन, जीवनी, आत्मजीवनी, शिशुसाहित्य, इतिहास अध्ययन, सांवादिकता आदि दृष्टियों से बेजबरुवा का योगदान अमूल्य है।
असमिया साहित्य में उन्होंने कहानी तथा ललित निबंध के बीच के एक सहित्य रूप को अधिक प्रचलित किया। बेजबरुआ की हास्यरस की रचनाओं को काफी लोकप्रियता मिली। इसीलिए उसे "रसराज" की उपाधि दी गई।
==साहित्यिक जीवन==
बेजबरुवा का साहित्यिक जीवन [[कोलकाता]] में शिक्षा प्राप्ति के समय से ही आरम्भ हो गया था।
===आत्म-जीवनी तथा जीवनी ===
* मोर जीवन सोँवरण (प्रथम खण्ड, १९४५)<ref name="Datta1987">{{cite book|author=Amaresh Datta|title=Encyclopaedia of Indian Literature: A-Devo|url=http://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&pg=PA273|accessdate=28 November 2012|year=1987|publisher=Sahitya Akademi|isbn=978-81-260-1803-1|pages=273–|archive-url=https://web.archive.org/web/20121114200113/http://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC|archive-date=14 नवंबर 2012|url-status=live}}</ref>
* मोर जीवन सोँवरण (द्बितीय खण्ड, १९६१)<ref name="Datta1987"/>
* डाङरीया दीननाथ बेजबरुवार संक्षिप्त जीवन चरित
* श्रीश्री शंकरदेव
* श्रीश्री शंकरदेव आरु श्रीश्री माधवदेव
===चिन्ताशील रचना===
* तत्त्बकथा
* श्रीकृष्णकथा
* भगवत् कथा
===उपन्यास===
* पदुमकुँवरी
===गल्प पुथि===
* सुरभि
* साधुकथार कुँकि
* जोनबिरि
* केहोँकलि
===साधुकथा एवं शिशु साहित्य===
* बुढ़ी आइर साधु
{{multicol}}
# मेकुरीर जीयेकर साधु
# बान्दर आरु शियाल
# औ-कुँवरी
# ढोँराकाउरी आरु टिपचीचराइ
# एजनी मालिनी आरु एजोपार फुल
# बुधियक शियाल
# बाघ आरु केँकोरा
# तेजीमला
# बुढ़ा-बुढ़ी आरु शियाल
# दीघल ठेङीया
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# गंगाटोप
# नुमलीया पो
# सरबजान
# एटा शिङरा माछर कथा
# एटा बली मानुह
# चिलनी जीयेकर साधु
# तुला आरु तेजा
# कटा योवा नाक,खारणी दि ढाक
# तीखर आरु चुटिबाइ
# चम्पावती
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# जरदगव रजार उपाख्यान
# पानेशै
# जोँवाइर साधु
# कुकुरीकणा
# भेकुलीर साधु
# तावैयेकर साधु
# लटकन
# लखिमी तिरोता
# दुइ बुधियक
# कांचनी
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* ककादेउता आरु नातिलरा
* जुनुका
===बैषयिक गद्य===
* बाखर
* कामत कृतित्ब लभिबर संकेत
===नाटक===
'''धेमेलीया नाटक (प्रहसन)'''
* लितिकाइ
* नोमल
* पाचनि
* चिकरपति निकरपति
'''नाटर कुकि'''
* गदाधर रजा
* बारेमतरा
* ह-य-ब-र-ल
* हेमलेत
* मङला
'''बुरंजीमूलक नाटक'''
* चक्रध्बज सिंह
* जयमती कुँवरी
* बेलिमार
===रस रचना या हास्यरसात्मक रचना===
* कृपाबर बरुवार काकतर टोपोला
* कृपाबर बरुवार ओभतनि
* बरबरुवार बुलनि
* बरबरुवार भावर बुरबुरणि (प्रथम खण्ड)
* बरबरुवार भावर बुरबुरणि (द्बितीय खण्ड)
* बरबरुवार चिन्तार शिलगुटि
* बरबरुवार साहित्यिक रहस्य
* कृपाबर बरुवार सामरणि
===अनुवाद===
* भारतबर्षर बुरंजी
===अन्यान्य===
* असमीया भाषा आरु साहित्य
* पत्रलेखा
* काँहुदी आरु खारलि
* सम्पादकर च'रा
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:असमिया साहित्यकार]]
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करणी सेना
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{{Infobox organization
| full_name = करणी सेना
| native_name = करणी सेना
| native_name_lang = hi
| logo = Flag_of_the_Maratha_Empire.svg
| logo_size = 60px
| logo_caption = [[केसरिया ध्वज]]
| image =
| abbreviation =
| nickname = करणी सेना
| named_after = [[करणी माता]]
| motto = जय भवानी<ref>{{cite web|url=http://thewirehindi.com/32242/film-padmaavat-released-protest-continue-by-karni-sena/|title=भारत में करणी सेना का बंद|website=द वायर|access-date=17 May 2021}}</ref>
| formation = {{start date and age|2006|09|23}}
| founder = लोकेंद्र सिंह कालवी
| founding_location = [[जयपुर]], [[राजस्थान]]
| type = [[गैर-लाभकारी संगठन|गैर-लाभकारी]]
| status = दान फाउंडेशन
| location_country = [[भारत]]
| location_country2 = [[नेपाल]]
| origins = [[झोटवाड़ा]], [[राजस्थान]]
| services = [[क्षत्रिय]] और उनकी संस्कृति का संरक्षण।
| membership = नि: शुल्क सदस्यता<ref>{{cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/topic/Shree-Rajput-Karni-Sena-members |title=Rajput Karni Sena Membership|website=[[टाइम्स ऑफ इंडिया]]}}</ref>
| language = [[हिंदी]],
| leader_name = {{bulleted list|[[सुखदेव सिंह गोगामेड़ी]]<ref>{{Cite news |date=2023-12-06 |title=Sukhdev Singh Gogamedi: Rashtriya Rajput Karni Sena chief shot dead in Jaipur |work=The Times of India |url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/rashtriya-rajput-karni-sena-national-president-sukhdev-singh-gogamedi-shot-dead-in-jaipur/articleshow/105753343.cms |access-date=2023-12-06 |issn=0971-8257}}</ref><ref>{{Cite web |title=राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की घर में घुसकर हत्या, सड़कों पर समर्थकों का हंगामा |url=https://ndtv.in/india/prominent-rajput-leader-and-karni-sena-chief-sukhdev-singh-gogamedi-shot-dead-in-jaipur-rajasthan-4635673 |access-date=2023-12-06 |website=NDTVIndia }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>|लोकेंद्र सिंह कालवी|डॉ राज शेखावत|विश्वबंधु सिंह राठौड़ }}
| remarks = स्व-संगठन और कानूनी
| formerly = करणी सेना
}}
'''करणी सेना''' सन् 2006 में स्थापित एक [[क्षत्रिय]] संगठन है।<ref>{{cite web|url=https://www.bbc.com/hindi/india-42803517|title=करणी सेना क्या है और कैसे काम करती है?|publisher=[[बीबीसी हिन्दी]]|author=नारायण बारेठ|date=२५ जनवरी २०१८}}</ref> यह संगठन मुख्य रूप से भारतीय राज्य [[राजस्थान]] में स्थित है।<ref>{{cite web|url=https://aajtak.intoday.in/lite/story/learn-about-karni-sena-history-how-famous-these-organizations-tedu-1-965455.html|title=जानें करणी सेना से जुड़ी हर बात, कैसे मशहूर हुआ ये संगठन|publisher=[[आज तक]]|date=१७ नवम्बर २०१७|access-date=10 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20181130164958/https://aajtak.intoday.in/lite/story/learn-about-karni-sena-history-how-famous-these-organizations-tedu-1-965455.html|archive-date=30 नवंबर 2018|url-status=live}}</ref> इसका नाम [[करणी माता]] के नाम पर पड़ा, जिन्हें उनके अनुयायियों द्वारा [[हिंगलाज माता|हिंगलाज]] का अवतार माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Shri Rajput Karni Sena |publisher=Shri Rajput Karni Sena |date=April 2015 |url=http://www.shrirajputkarnisena.com/ |accessdate=2015-04-15 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171121141734/http://www.shrirajputkarnisena.com/ |archive-date=21 नवंबर 2017 |url-status=dead }}</ref>
==पद्मावती==
{{मुख्य|पद्मावती (फ़िल्म)#फ़िल्म पर विवाद एवं विरोध-प्रदर्शन}}
समूह [[संजय लीला भंसाली]] द्वारा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म [[पद्मावत (फ़िल्म)|पद्मावती]] का विरोध कर रहे हैं क्योंकि इनके अनुसार फ़िल्म में इतिहास से छेड़छाड़ की गई है। समूह ने भंसाली और अभिनेत्री [[दीपिका पादुकोण]] के विरुद्ध हिंसक कृत्य करने की धमकी दी है।
इस फिल्म को मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात जैसे कई राज्यों में बैन कर दिया।<ref name="guardian">{{cite news|last=Safi|first=Michael|title=Indian film Padmavati sparks protests over 'Hindu-Muslim romance'|url=https://www.theguardian.com/world/2017/nov/16/indian-film-padmavati-sparks-protests-over-hindu-muslim-romance|work=[[द गार्डियन]]|date=16 November 2017|access-date=23 नवंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171116142642/https://www.theguardian.com/world/2017/nov/16/indian-film-padmavati-sparks-protests-over-hindu-muslim-romance|archive-date=16 नवंबर 2017|url-status=live}}</ref>
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:राजपूत]]
[[श्रेणी:हिन्दुत्व]]
{{आधार}}
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शिज़ूओका प्रांत
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2026-04-23T15:29:10Z
चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक जापान प्रान्त
| Name = शिज़ूओका प्रांत
| JapaneseName = 静岡県
| Rōmaji = Shizuoka-ken
| LocalName =
| LocalLanguage1 =
| LocalTranscription1 =
| Flag =Flag of Shizuoka Prefecture.svg
| Symbol = Emblem of Shizuoka Prefecture.svg
| Map = Map of Japan with highlight on 22 Shizuoka prefecture.svg
| coordinates = {{coord|34|55|N|138|19|E|display=inline,title}}
| ISOCode = जेपी-22
| Region = [[चूबू क्षेत्र|चूबू]] ([[तोकाई क्षेत्र|तोकाई]])
| Island = [[होन्शू]]
| Capital = [[शिज़ूओका]]
| Governor = हीता कवकात्सू
| TotalArea = 7779.63
| AreaRank = 13वाँ
| PCWater = 2.6
| PopDate = 1 जुलाई, 2010
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| PopRank = 10वाँ
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| Flower = [[अज़ेलिया]] (''रोडोडेंड्रन'')
| Tree = मीठा ओस्मन्थुस
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| Website = {{URL|www.pref.shizuoka.jp/a_foreign/english}} अंग्रेजी में
}}
शिज़ूओका प्रांत (静岡 県 शिज़ुका-केन) जापान का एक प्रान्त हैं, जो [[होन्शू|होन्शू द्वीप]] के चूबु क्षेत्र में स्थित हैं।<ref>Nussbaum, Louis-Frédéric. (2005). "Shizuoka-ken" in {{Google books|p2QnPijAEmEC|''Japan Encyclopedia'', p. 876|page=876}}; "Chūbu" in {{Google books|p2QnPijAEmEC|p. 126|page=126}}</ref> इसकी राजधानी [[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]] हैं, जबकि हमामात्सू आबादी के अनुसार सबसे बड़ा शहर हैं।<ref>Nussbaum, "Shizuoka" at {{Google books|p2QnPijAEmEC|p. 876|page=876}}.</ref>
==इतिहास==
शिज़ुओका प्रान्त का गठन पूर्व टोटोमी, सुरगा और इज़ू प्रांतों को मिला कर हुआ था।<ref>Nussbaum, "Provinces and prefectures" at {{Google books|p2QnPijAEmEC|p. 780|page=780}}.</ref>
यह क्षेत्र पहले [[तोकुगावा शोगुनराज]] का घर था। [[तोकुगावा इयासू]] इस क्षेत्र को तब तक अधिकार में रखे हुए थे, जब तक की वह कांतो क्षेत्र में होजो कबीले की भूमि पर कब्जा नहीं कर लिया और इसे [[टोयोटीमी हिडीयोशी]] कि देख-रेख में छोड़ दिया। [[शोगुन]] बनने के बाद, टोकागावा ने अपने परिवार के लिए जमीन वापस ले ली और वर्तमान शिज़ुओका शहर के आसपास के क्षेत्र को शोगुनेट के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण के तहत रखा। 1868 में शिज़ुओका हन के निर्माण के साथ, यह एक बार फिर से टोकुगावा परिवार का निवास स्थल बन गया।
==भूगोल==
शिज़ुओका प्रान्त, [[सुरुगा खाड़ी]] में [[प्रशान्त महासागर|प्रशांत महासागर]] के तट पर एक दीर्घीभूत क्षेत्र हैं। पश्चिम में, प्रांत [[जापान एल्प्स]] के अंदर तक फैला हुआ हैं। पूर्व में, यह [[फ़ूजीयामा|फ़ूजी पर्वत]] द्वारा उत्तर में घिरा हुआ एक संकरा वाला तट बन जाता है, जब तक कि यह [[इज़ू प्रायद्वीप]] के पास नहीं पहुँचता हैं, जोकि दक्षिण में प्रशांत तट में एक लोकप्रिय पर्यटन क्षेत्र हैं।
1 अप्रैल 2012 को, प्रान्त के कुल भूमि क्षेत्र का 11% [[प्राकृतिक उद्यान]] के रूप में नामित किया गया हैं, जिनमें फ़ुजी-हाकोन-इज़ू और मिनमी एल्प्स राष्ट्रीय उद्यान; टेनरी-ओकुमवा कसी-राष्ट्रीय उद्यान; और चार प्रांतीय प्राकृतिक पार्क सम्मलित हैं।<ref>{{cite web |url=http://www.env.go.jp/en/nature/nps/park/doc/files/np_6.pdf |title=General overview of area figures for Natural Parks by prefecture |publisher=[[Ministry of the Environment (Japan)|Ministry of the Environment]] |date=1 April 2012 |accessdate=10 August 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120421180819/http://www.env.go.jp/en/nature/nps/park/doc/files/np_6.pdf |archive-date=21 अप्रैल 2012 |url-status=live }}</ref>
[[शिज़ूओका]] (राजधानी), अतामी, फ़ुजी, फ़ुजीनोमिया, फुकुरोई, गोटेम्बा, और हमामात्सु (प्रांत अधिकतम जनसंख्या) आदि मिलाकर इस प्रांत में कुल तेईस शहर हैं।
===तोकाई भूकंप===
इतिहास के दौरान, तोकाई भूकंप नामक एक विनाशकारी भूकंप, हर 100 से 150 वर्षों में इस क्षेत्र में आता हैं। मंगलवार, 15 मार्च, 2011 को शिज़ुओका प्रांत पर 6.2 तीव्रता का भूकंप [[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]] के लगभग 42 किमी (26 मील) के क्षेत्र पर आया था।
==चित्र दीर्घा==
<gallery>
File:Map of Shizuoka Prefecture Ja.svg|thumb|शिज़ूओका प्रान्त का मानचित्र
File:Mt fuji with a duck.JPG|thumb|फ़ुजीनोमिया से फ़ूजी पर्वत का दृश्य
File:Nihondaira from shizuoka plain.JPG|thumb|[[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]]
File:Hamamatsu City - panoramio (1).jpg|thumb|हमामात्सू शहर
File:Numazu and Mount Fuji.jpg|thumb|नुमाज़ू और [[फ़ूजीयामा|फ़ूजी पर्वत]]
File:Fujinomiya 20120909.jpg|thumb|फ़ुजीनोमिया
File:熱海サンビーチ(熱海ムーンライトビーチ)海水浴場 - panoramio.jpg|thumb|अतामी
File:Fujisan-Shizuoka airport,Makinohara-city,Japan.jpg|thumb|शिज़ूओका हवाई अड्ड़ा
</gallery>
<gallery>
File:Fujinomiya Hongu Sengen Taisha Honden.jpg|[[Fujisan Hongū Sengen Taisha]]([[Fujinomiya, Shizuoka|Fujinomiya]])
File:181124 Shuzenji Onsen Izu Shizuoka pref Japan01s3.jpg|Shuzenji Onsen([[Izu, Shizuoka|Izu]])
File:Sunpu-castle tatsumi-yagura.JPG|सुनपू किला([[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]])
File:Hamamatsu.JPG|हमामात्सू किला([[हमामात्सू]])
File:Kakegawa castle.jpg|काकेगावा किला
File:静岡県立美術館-1.JPG|कला के शिजुओका प्रांतीय म्यूजियम
File:LakeSanaru2.JPG|सनारू झील([[हमामात्सू]])
File:BentenjimaKaihinkoenHamamatsu1.jpg|[[हमाना झील]]([[हमामात्सू]])
File:Beach in Atami City with sea bathers.jpg|अतामी बीच(अतामी)
File:Prunus lannesiana cv. Kawazu-zakura 05.jpg|कावाज़ू चेरी के पुष्प(कामो जिला)
File:Mt Fuji at Mihonomatsubara.jpg|मिहो नहीं मत्सुबारा([[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]])
File:富士サファリパーク ライオン2 Fuji-safari-park-Lion2.jpg|फ़ूजी सफारी पार्क(सुसोनो)
File:Hanahaku2014-4.JPG|हामानाको गार्डन पार्क([[हमामात्सू]])
File:Snowtown Yeti.JPG|स्नोटाउन यति और [[फ़ूजीयामा|फ़ूजी पर्वत]](सुसोनो)
File:Haiden of Kunozan Toshogu.jpg|कुनोजान तोशो-गु(([[शिज़ूओका|शिज़ूओका शहर]]))
File:Jogasaki Coast 20111016 b.jpg|जोगासाकी तट(ईटो)
</gallery>
==सन्दर्भ==
{{Reflist}}
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Commons category|Shizuoka prefecture}}
* [https://web.archive.org/web/20171117023413/http://www.pref.shizuoka.jp/a_foreign/english/ आधिकारिक शिज़ुओका प्रांत वेबसाइट]
* [https://web.archive.org/web/20171202173652/http://shizuoka-guide.com/english/index.html सरकारी शिज़ुओका गाइड]
[[श्रेणी:जापान के प्रांत]]
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नागभट्ट द्वितीय
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2026-04-23T21:37:07Z
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"Nagabhata_II.jpg" को हटाया। इसे कॉमन्स से [[commons:User:Yann|Yann]] ने हटा दिया है। कारण: Copyright violation, see [[:c:Commons:Licensing|]]
6543449
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox royalty
|title=परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर
|image=
|succession= चौथे गुर्जर राजवंश राजा
|<span class="searchmatch" style="font-weight: bold;">गुर्जर</span> <span class="searchmatch" style="font-weight: bold;">प्रतिहार</span><nowiki> राजवंश]] राजा</nowiki>
|reign=<span style="white-space:nowrap;">805</span> ई०<span>– </span><span style="white-space:nowrap;">833 ई०</span>
|predecessor =वत्सराज
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|father=वत्सराज
|mother=सुन्दरी-देवी
}}
{{गुर्जर-प्रतिहार राजवंश}}
'''नागभट्ट द्वितीय''' (805-833), अपने पिता [[वत्सराज]] से गद्दी प्राप्त करके चौथे राजा बने।<ref>{{Cite book|last=Panchānana Rāya|author=Panchānana Rāya|year=1939|title=A historical review of Hindu India: 300 B. C. to 1200 A. D.|url=https://books.google.com/books?id=kHEBAAAAMAAJ&q=Gurjar+parihar&dq=Gurjar+parihar&cd=1|page=125|publisher=I. M. H. Press|access-date=10 जनवरी 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20170507233826/https://books.google.com/books?id=kHEBAAAAMAAJ&q=Gurjar+parihar&dq=Gurjar+parihar&cd=1|archive-date=7 मई 2017|url-status=live}}</ref> उनकी माता का नाम सुन्दरीदेवी था। नागभट्ट द्वितीय को परमभट्टारक, महाराजाधिराज और कन्नौज विजय के बाद 'परमेश्वर' की उपाधि दी गई थी।{{Sfn|Rama Shankar Tripathi|1964|p=233}}
बडोदा ताम्रपत्र ( 811 ई.) के अनुसार[[चौहान वंश|शाकम्भरी के चाहमानों]] ने प्रतिहारों की आधीनता स्वीकार कर ली और उस समय के चाहमान प्रमुख गुवक ने अपनी बहन कलावती का विवाह नागभट्ट से करा दिया।<ref>वही० जिल्द २, पृ० १२१-१२६</ref>{{verify source}}
निस्संदेह नागभट्ट द्वितीय गुर्जर प्रतिहार वंश का एक शक्तिशाली शासक था। चन्द्रप्रभासुरि कृत प्रभावकचरित के अन्तर्गत बप्पभट्टिचरित में नागभट्ट के ग्वालियर के भव्य दरबार का वर्णन मिलता हैं।<ref>प्रभावकचरित के अन्तर्गत बप्पभट्टि प्रबंध पृ० १७७</ref>{{verify source}} उसके दरबार के नवरत्नों मे से एक जैन आचार्य [[बप्पभट्टिसुरि]] के कहने से नागभट्ट ने ग्वालियर में जैन प्रतिमाएं स्थापित करवायी थी। पं० [[गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा]]<ref>राजपुताने का इतिहास, पृ० १६१</ref>{{verify source}} के अनुसार जिस नाहड़राव प्रतिहार ने [[पुष्कर झील|पुष्कर सरोवर]] (अजमेर) का निर्माण कराया था, वो असल में नागभट्ट द्वितीय ही था।{{verify source}}
== राज ==
नागभट्ट द्वितीय का [[ग्वालियर प्रशस्ति]] में उसके सैनिक उपलब्धियों का उल्लेख है। उसने आंध्र, विदर्भ, कलिंग, मत्स्य, वत्स और तुर्क शासकों को हराया था। आगे उसने [[सेंधवा]] के शासक राणका प्रथम पर विजय प्राप्त कर पश्चिमी [[सौराष्ट्र]] (अब [[गुजरात]]) पर अपना अधिकार जमा लिया।<ref name="Sen1999">{{Cite book|last=Sailendra Nath Sen|author=Sailendra Nath Sen|date=1 January 1999|title=Ancient Indian History and Civilization|url=https://books.google.com/books?id=Wk4_ICH_g1EC&pg=PA343|pages=343|publisher=New Age International|isbn=978-81-224-1198-0|ISBN=978-81-224-1198-0|access-date=10 जनवरी 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20170307010812/https://books.google.com/books?id=Wk4_ICH_g1EC|archive-date=7 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> नागभट्ट ने चक्रायुध को भी पराजित कर कन्नौज पर कब्जा कर लिया।<ref name="Sen">Sen, S.N., 2013, A Textbook of Medieval Indian History, Delhi: Primus Books, {{ISBN|9789380607344}}</ref><sup>:20</sup> हलांकि उसे [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट]] [[गोविन्द तृतीय|सम्राट गोविंदा तृतीय]] (793-814) से हार का सामना करना पड़ा और और उसे मालवा और गुजरात खोना पड़ा। हालांकि, उसने राष्ट्रकूटों से पुनः [[मालवा]] जीतने मे सफल रहा, और [[कन्नौज]] पर अपना अधिकार जमा दिया। उसने गुर्जर -प्रतिहार साम्राज्य को [[सिन्धु-गंगा के मैदान|गंगा के मैदान]] में दूर तक शासन पहुँचा दिया। साथ ही उसने फिर पश्चिम में [[मुसलमान|मुसलमानों]] के हमलें को विफल कर दिया। [[कन्नौज]],गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का केंद्र बन गया था।{{Sfn|Rama Shankar Tripathi|1964|p=233}}
==इन्हें भी देखें==
* [[गोविन्द तृतीय]]
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:गुर्जर-प्रतिहार राजवंश]]
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वास्गमुवा राष्ट्रीय उद्यान
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
{{Infobox protected area
| name = वास्गमुवा राष्ट्रीय उद्यान
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'''वास्गमुवा राष्ट्रीय उद्यान''' [[श्रीलंका]] में मटाले और पोलोनारुवा जिलों में स्थित एक [[प्राकृतिक उद्यान]] है। वास्गमुवा संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जहां श्रीलंकाई हाथियों को बड़े झुंडों में देखा जा सकता है। यह उद्यान श्रीलंका में महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों में से एक है। वास्गमुवा का नाम "वालस गामुवा" शब्द के माध्यम से लिया गया है।<ref name="The Nation">{{cite news|url=http://www.nation.lk/2007/01/07/eyefea7.htm|title=Wasgamuwa Calling all nature lovers|last=Amaleeta|first=Nimashi|date=2007-01-07|work=The Nation|accessdate=2009-07-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20160303190158/http://www.nation.lk/2007/01/07/eyefea7.htm|archive-date=3 मार्च 2016|url-status=dead}}</ref> "वालसा" सिंहला में स्लोथ भालू है और "गामुवा" का मतलब है लकड़ी। उद्यान [[कोलंबो]] से 225 किमी दूर स्थित है।<ref name="Senarathna 2005">{{Si icon}} {{cite book|last=Senarathna|first=P.M.|title=Sri Lankawe Wananthara|publisher=Sarasavi Publishers|year=2005|edition=1st|chapter=Wasgamuwa|isbn=955-573-401-1}}</ref> 1984 में महावेली विकास परियोजना के दौरान विस्थापित जंगली जानवरों के लिए शरण बनाने के लिए घोषित किया गया था और परियोजना के तहत नामित चार राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है।<ref name="Senarathna 2004">{{Si icon}} {{cite book|last=Senarathna|first=P.M.|title=Sri Lankawe Jathika Vanodhyana|publisher=Sarasavi Publishers|year=2004|edition=2nd|pages=173–179|chapter=Wasgomuwa|isbn=955-573-346-5}}</ref> मूल रूप से इसे 1938 में एक प्रकृति आरक्षित के रूप में नामित किया गया था, और फिर 1970 के दशक के आरंभ में इस क्षेत्र को सख्त प्रकृति आरक्षित के रूप में पुनर्जीवित किया गया।<ref name="Nanayakkara et al.">{{cite web|url=http://www.protectedareas.net/documents/Community%20Wasgamuwa%20-%20Option%201.pdf|title=Development and Management of Eco Lodges by Adjoining Communities of Wasgamuwa Park – Pilot Project|author1=Nanayakkara, Eeasha|author2=Marasinghe, Ranjan|author3=Amerasinhe, Manjula|work=protectedareas.net|accessdate=2009-07-28|format=PDF|archive-url=https://web.archive.org/web/20160303191239/http://www.protectedareas.net/documents/Community%20Wasgamuwa%20-%20Option%201.pdf|archive-date=3 मार्च 2016|url-status=dead}}</ref>
==भौतिक विशेषताऐं==
राष्ट्रीय उद्यान का वार्षिक दैनिक तापमान 28 डिग्री सेल्सियस (82 डिग्री फारेनहाइट) है और वार्षिक वर्षा 1650-2100 मिलीमीटर के बीच है।<ref name="Senarathna 2004" />
उत्तर-पूर्वी मॉनसून के दौरान अक्टूबर से जनवरी तक वर्षा प्राप्त होती है।<ref name="Senarathna 2005" /> जुलाई-सितंबर शुष्क मौसम है। राष्ट्रीय उद्यान की सर्वोच्च ऊंचाई सुडु कंदा (सफेद पहाड़) है, जो 470 मीटर (1,540 फीट) ऊंचाई है। उद्यान की मिट्टी में [[स्फटिक]] और [[संगमरमर]] शामिल है।
==वनस्पति और जीव==
वास्गमुवा राष्ट्रीय उद्यान [[श्रीलंका]] में संरक्षित क्षेत्रों के बीच उच्चतम जैव विविधता प्रदर्शित करता है। उद्यान से 150 से अधिक पुष्प प्रजातियां दर्ज की गई हैं। लगभग 1,700 साल पुराने चिमनी के पेड़, "ओरु बेंडी सियांबलावा" उद्यान में है।<ref name="lanka.com">{{cite web|url=https://www.lanka.com/about/attractions/wasgamuwa-national-park/|title=No Ordinary Tree|work=exploresrilanka.com|accessdate=2009-07-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20180826121611/https://lanka.com/about/attractions/wasgamuwa-national-park/|archive-date=26 अगस्त 2018|url-status=dead}}</ref>
वास्गमुवा राष्ट्रीय उद्यान स्तनधारियों की 23 प्रजातियों का घर है। उद्यान में पाए गए दोनों बंदर, बैंगनी-चेहरे वाले लंगूर और टोक़ मैकक, श्रीलंका के लिए स्थानिक हैं। जबकि [[भैंस]] और श्रीलंकाई धुरी हिरण का निरीक्षण करना आम बात है। उद्यान से दर्ज पक्षी प्रजातियों की संख्या 143 है।<ref name="Senarathna 2004" /> इसमें 8 स्थानिक प्रजातियां शामिल हैं। श्रीलंका जंगलफॉल, पीले रंग के बार्बेट, काले सिर वाली आईबीस आदि पक्षियों ने भि यहाँ रहति हैं।<ref name="birdlife.org">{{cite web|url=http://www.birdlife.org/datazone/sites/index.html?action=SitHTMDetails.asp&sid=15297&m=0|title=Important Bird Area factsheet: Wasgomuwa, Sri Lanka|year=2009|work=birdlife.org|publisher=[[BirdLife International]]|accessdate=2009-07-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20090102203014/http://www.birdlife.org/datazone/sites/index.html?action=SitHTMDetails.asp&sid=15297&m=0|archive-date=2 जनवरी 2009|url-status=live}}</ref> उद्यान में 17 सरीसृप
प्रजातियां दर्ज की गई हैं। उन्में पांच प्रजातियां स्थानिक हैं। उद्यान की जल निकायों में जल मॉनीटर और मगर मगरमच्छ आम हैं। उद्यान के 50 तितलियों में से आठ प्रजातियां स्थानिक हैं।
==गैलरी==
<gallery>
File:Wasgamuwa Peacock.JPG|सुबह का सूरज का आनंद ले रहे एक मोर
File:WasgamuwaNationalPark-September2014 (2).JPG|वास्गमुवा में सफारी निशान
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== सन्दर्भ ==
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{{श्रीलंका के राष्ट्रीय उद्यान}}
[[श्रेणी:श्रीलंका का भूगोल]]
[[श्रेणी:श्रीलंका के राष्ट्रीय उद्यान]]
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सदस्य वार्ता:Parvat Singh Buddha
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Parvat Singh Buddha
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा"यह पृष्ठ प्रचार के उद्देश्य से नहीं बनाया गया है। पर्वत सिंह बुद्धा एक अनुभवी तकनीकी ऑपरेटर हैं और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी गहरी रुचि है। मैं इस लेख में और अधिक विश्वसनीय संदर्भ और स्रोत (जैसे समाचार लिंक या आधिकारिक रिकॉर्ड) जोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ ताकि इसकी सत्यता प्रमाणित हो सके। कृपया मुझे इसे सुधारने का थोड़ा समय दें।" ==
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[[File:Allah Jilai Bai 2003 stamp of India.jpg|thumb|Allah Jilai Bai on a 2003 stamp of India]]
'''अल्लाह जिलाई बाई (अंग्रेजी में: Allah Jilai Bai)''' लोकप्रिय राजस्थानी मांड गायिका थी. अल्लाई जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के जे . डी.मगरा नामक गाँव राजस्थान में हुआ था.यही पर वीरेंद्र भांभू का भी हुआ था जो वर्तमान समय में सूरतगढ़ में दिल्ली पुलिस की तैयारी में जुटा हुआ है । गंगासिंह के दरबार में इन्होंने गायिकी की. हुसैनबक्श लंगड़े ने इनकी गायिकी को निखारा. मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही इन्होंने राजगायिका की पदवी प्राप्त कर ली थी. यह मांड गायिकी के अलावा ठुमरी,ख्याल और दादरा की उम्दा कलाकार थी. केसरिया बालम, बाई सा रा बीरा, काली काली काजलिये री रेख, झालो दियो जाय इनके लोकप्रिय गीत हैं. इनकी मृत्यु के बाद सरकार द्वारा इन्हें राजस्थान रत्न सम्मान देने की घोषणा की.<ref>{{Cite web|url=http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|title=Allah Jilai Bai Biography In Hindi {{!}} अल्लाह जिलाई बाई का जीवन परिचय|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230234853/http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|archive-date=30 दिसंबर 2018|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> 1982 में इन््हें पद्म्मश्री पुुरस््कार से नवाजा गया।
== संदर्भ ==
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==बाहरी कड़ियाँ==
* [https://web.archive.org/web/20080502052510/http://www.realbikaner.com/personality/jilai.html Allah Jilai Bai on realbikaner.com]
* [https://web.archive.org/web/20090105174210/http://www.hamarabikaner.org/bikaneripop/allahjillaibai.html Padamshri Allah Jillai Bai]
* [http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ Listen Allah Jillai Bai's Folk Songs on FolkRajasthan.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111029065643/http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ |date=29 अक्तूबर 2011 }}
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[[File:Allah Jilai Bai 2003 stamp of India.jpg|thumb|Allah Jilai Bai on a 2003 stamp of India]]
'''अल्लाह जिलाई बाई (अंग्रेजी में: Allah Jilai Bai)''' लोकप्रिय राजस्थानी मांड गायिका थी. अल्लाई जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के धोंकलराम थी की खेड़ी (जे.डी.मगरा) नामक गाँव राजस्थान में हुआ था.यही पर वीरेंद्र भांभू का भी हुआ था जो वर्तमान समय में सूरतगढ़ में दिल्ली पुलिस की तैयारी में जुटा हुआ है । गंगासिंह के दरबार में इन्होंने गायिकी की. हुसैनबक्श लंगड़े ने इनकी गायिकी को निखारा. मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही इन्होंने राजगायिका की पदवी प्राप्त कर ली थी. यह मांड गायिकी के अलावा ठुमरी,ख्याल और दादरा की उम्दा कलाकार थी. केसरिया बालम, बाई सा रा बीरा, काली काली काजलिये री रेख, झालो दियो जाय इनके लोकप्रिय गीत हैं. इनकी मृत्यु के बाद सरकार द्वारा इन्हें राजस्थान रत्न सम्मान देने की घोषणा की.<ref>{{Cite web|url=http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|title=Allah Jilai Bai Biography In Hindi {{!}} अल्लाह जिलाई बाई का जीवन परिचय|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230234853/http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|archive-date=30 दिसंबर 2018|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> 1982 में इन््हें पद्म्मश्री पुुरस््कार से नवाजा गया।
== संदर्भ ==
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==बाहरी कड़ियाँ==
* [https://web.archive.org/web/20080502052510/http://www.realbikaner.com/personality/jilai.html Allah Jilai Bai on realbikaner.com]
* [https://web.archive.org/web/20090105174210/http://www.hamarabikaner.org/bikaneripop/allahjillaibai.html Padamshri Allah Jillai Bai]
* [http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ Listen Allah Jillai Bai's Folk Songs on FolkRajasthan.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111029065643/http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ |date=29 अक्तूबर 2011 }}
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[[File:Allah Jilai Bai 2003 stamp of India.jpg|thumb|Allah Jilai Bai on a 2003 stamp of India]]
'''अल्लाह जिलाई बाई (अंग्रेजी में: Allah Jilai Bai)''' लोकप्रिय राजस्थानी मांड गायिका थी. अल्लाई जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के धोंकलराम थी की खेड़ी (जे.डी.मगरा) नामक गाँव राजस्थान में हुआ था.यही पर वीरेंद्र भांभू का भी जन्म हुआ था जो वर्तमान समय में सूरतगढ़ में दिल्ली पुलिस की तैयारी में जुटा हुआ है । गंगासिंह के दरबार में इन्होंने गायिकी की. हुसैनबक्श लंगड़े ने इनकी गायिकी को निखारा. मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही इन्होंने राजगायिका की पदवी प्राप्त कर ली थी. यह मांड गायिकी के अलावा ठुमरी,ख्याल और दादरा की उम्दा कलाकार थी. केसरिया बालम, बाई सा रा बीरा, काली काली काजलिये री रेख, झालो दियो जाय इनके लोकप्रिय गीत हैं. इनकी मृत्यु के बाद सरकार द्वारा इन्हें राजस्थान रत्न सम्मान देने की घोषणा की.<ref>{{Cite web|url=http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|title=Allah Jilai Bai Biography In Hindi {{!}} अल्लाह जिलाई बाई का जीवन परिचय|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230234853/http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|archive-date=30 दिसंबर 2018|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> 1982 में इन््हें पद्म्मश्री पुुरस््कार से नवाजा गया।
== संदर्भ ==
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==बाहरी कड़ियाँ==
* [https://web.archive.org/web/20080502052510/http://www.realbikaner.com/personality/jilai.html Allah Jilai Bai on realbikaner.com]
* [https://web.archive.org/web/20090105174210/http://www.hamarabikaner.org/bikaneripop/allahjillaibai.html Padamshri Allah Jillai Bai]
* [http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ Listen Allah Jillai Bai's Folk Songs on FolkRajasthan.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111029065643/http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ |date=29 अक्तूबर 2011 }}
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[[File:Allah Jilai Bai 2003 stamp of India.jpg|thumb|Allah Jilai Bai on a 2003 stamp of India]]
'''अल्लाह जिलाई बाई (अंग्रेजी में: Allah Jilai Bai)''' लोकप्रिय राजस्थानी मांड गायिका थी. अल्लाई जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के धोंकलराम जी की खेड़ी (जे.डी.मगरा) नामक गाँव राजस्थान में हुआ था.इसी खेड़ी में वीरेंद्र भांभू का भी जन्म हुआ था जो वर्तमान समय में सूरतगढ़ में दिल्ली पुलिस की तैयारी में जुटा हुआ है । गंगासिंह के दरबार में इन्होंने गायिकी की. हुसैनबक्श लंगड़े ने इनकी गायिकी को निखारा. मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही इन्होंने राजगायिका की पदवी प्राप्त कर ली थी. यह मांड गायिकी के अलावा ठुमरी,ख्याल और दादरा की उम्दा कलाकार थी. केसरिया बालम, बाई सा रा बीरा, काली काली काजलिये री रेख, झालो दियो जाय इनके लोकप्रिय गीत हैं. इनकी मृत्यु के बाद सरकार द्वारा इन्हें राजस्थान रत्न सम्मान देने की घोषणा की.<ref>{{Cite web|url=http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|title=Allah Jilai Bai Biography In Hindi {{!}} अल्लाह जिलाई बाई का जीवन परिचय|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230234853/http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|archive-date=30 दिसंबर 2018|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> 1982 में इन््हें पद्म्मश्री पुुरस््कार से नवाजा गया।
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==बाहरी कड़ियाँ==
* [https://web.archive.org/web/20080502052510/http://www.realbikaner.com/personality/jilai.html Allah Jilai Bai on realbikaner.com]
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[[File:Allah Jilai Bai 2003 stamp of India.jpg|thumb|Allah Jilai Bai on a 2003 stamp of India]]
'''अल्लाह जिलाई बाई (अंग्रेजी में: Allah Jilai Bai)''' लोकप्रिय राजस्थानी मांड गायिका थी. अल्लाई जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के जे डी मगरा नामक गाँव राजस्थान में हुआ था. महाराजा गंगासिंह के दरबार में इन्होंने गायिकी की. हुसैनबक्श लंगड़े ने इनकी गायिकी को निखारा. मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही इन्होंने राजगायिका की पदवी प्राप्त कर ली थी. यह मांड गायिकी के अलावा ठुमरी,ख्याल और दादरा की उम्दा कलाकार थी. केसरिया बालम, बाई सा रा बीरा, काली काली काजलिये री रेख, झालो दियो जाय इनके लोकप्रिय गीत हैं. इनकी मृत्यु के बाद सरकार द्वारा इन्हें राजस्थान रत्न सम्मान देने की घोषणा की.<ref>{{Cite web|url=http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|title=Allah Jilai Bai Biography In Hindi {{!}} अल्लाह जिलाई बाई का जीवन परिचय|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230234853/http://hihindi.com/allah-jilai-bai-biography-in-hindi/|archive-date=30 दिसंबर 2018|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> 1982 में इन््हें पद्म्मश्री पुुरस््कार से नवाजा गया।
== संदर्भ ==
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==बाहरी कड़ियाँ==
* [https://web.archive.org/web/20080502052510/http://www.realbikaner.com/personality/jilai.html Allah Jilai Bai on realbikaner.com]
* [https://web.archive.org/web/20090105174210/http://www.hamarabikaner.org/bikaneripop/allahjillaibai.html Padamshri Allah Jillai Bai]
* [http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ Listen Allah Jillai Bai's Folk Songs on FolkRajasthan.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111029065643/http://folkrajasthan.com/allah-jilai-bai/ |date=29 अक्तूबर 2011 }}
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{{Infobox alternative intervention
| image = Cupping set, London, England Wellcome L0057395.jpg
| caption = Cupping and [[bloodletting]] set, from London, England, dating from 1860–1875
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[[File:Cupping set, London, England Wellcome L0057395.jpg|thumb|300px|right|]]
'''कप्पिंग थेरेपी''' वैकल्पिक चिकित्सा का एक रूप है जिसमें त्वचा पर एक स्थानीय सक्शन बनाया जाता है। क्यूपिंग दर्द मे बेहद लाभदायक है। इसका ठोस प्रमाण है कि इसके स्वास्थ्य लाभ हैं, और एपिडर्मल, परिसंचरण और तंत्रिका तंत्र के लिए लाभदायक हैं।
==प्रभावशीलता==
कप्पिंग को वैज्ञानिक साक्ष्य द्वारा समर्थन दिया नहीं जाता है, 2014 के हालिया साक्ष्यों की समीक्षा के साथ यह पता चलता है कि "अनुचित डिजाइन और खराब अनुसंधान गुणवत्ता के कारण, कपिंग थेरेपी के नैदानिक प्रमाण बहुत कम हैं।" <ref>{{cite journal|last1=Chen|first1=B|last2=Li|first2=MY|last3=Liu|first3=PD|last4=Guo|first4=Y|last5=Chen|first5=ZL|title=Alternative medicine: an update on cupping therapy.|journal=QJM : Monthly Journal of the Association of Physicians|date=July 2015|volume=108|issue=7|pages=523–5|pmid=25399022|doi=10.1093/qjmed/hcu227}}</ref> २०११ की एक समीक्षा में पाया गया कि "कपिंग की प्रभावशीलता वर्तमान में अधिकांश स्थितियों के लिए अच्छी तरह से प्रलेखित नहीं है", और यह कि दर्द के उपचार के लिए प्रभावकारिता दिखाने वाली व्यवस्थित समीक्षाएं "ज्यादातर खराब गुणवत्ता वाले प्राथमिक अध्ययनों पर आधारित थीं।" <ref>{{cite journal|last1=Lee|first1=MS|last2=Kim|first2=JI|last3=Ernst|first3=E|title=Is cupping an effective treatment? An overview of systematic reviews|journal=Journal of Acupuncture and Meridian Studies|date=March 2011|volume=4|issue=1|pages=1–4|pmid=21440874|doi=10.1016/s2005-2901(11)60001-0}}</ref> अमेरिकन कैंसर सोसाइटी ध्यान देती है कि "उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य दावों का समर्थन नहीं करते हैं कि क्यूपिंग के कोई स्वास्थ्य लाभ हैं" और यह भी कि उपचार में जलने का एक छोटा जोखिम है। <ref name="acs">{{cite book |publisher=[[American Cancer Society]] |title=American Cancer Society Complete Guide to Complementary and Alternative Cancer Therapies |url=https://archive.org/details/americancancerso0000unse |edition=2nd |year=2009 |isbn=9780944235713 |editor1= Russell J|editor2= Rovere A |pages=[https://archive.org/details/americancancerso0000unse/page/189 189]–191 |chapter=Cupping}}</ref>
==सुरक्षा==
क्यूपिंग आम तौर पर सुरक्षित है जब प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा उन लोगों पर लागू किया जाता है जो अन्यथा स्वस्थ हैं। <ref name=NIH2016>{{cite web|title=In the News: Cupping|url=https://nccih.nih.gov/news/cupping|website=NCCIH|accessdate=2016-08-15|date=2016-08-09|archive-url=https://web.archive.org/web/20180712121215/https://nccih.nih.gov/news/cupping|archive-date=12 जुलाई 2018|url-status=dead}}</ref> यह साइड इफेक्ट के कारण स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों के लिए अनुशंसित नहीं है। [५] ठेठ उपचार के लिए प्रतिस्थापन के रूप में क्यूपिंग की सिफारिश नहीं की जाती है। <ref name=NIH2016/> घिसने से चोट, जलन, दर्द और त्वचा का संक्रमण हो सकता है। <ref name=NIH2016/>
शोध बताते हैं कि कपिंग हानिकारक है, खासकर ऐसे लोगों में जो पतले या मोटे होते हैं: जैक रासो (1997) के अनुसार, कैपिलरी विस्तार में क्यूपिंग के परिणाम, ऊतकों में अत्यधिक तरल संचय और रक्त वाहिकाओं का टूटना। <ref>{{cite web|url=http://skepdic.com/cupping.html|title=cupping – The Skeptic's Dictionary – Skepdic.com|work=skepdic.com|access-date=24 जनवरी 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190205035959/http://www.skepdic.com/cupping.html|archive-date=5 फ़रवरी 2019|url-status=live}}</ref>
कप्पिंग चिकित्सा प्रतिकूल घटनाओं को स्थानीय और प्रणालीगत प्रतिकूल घटनाओं में विभाजित किया जा सकता है। स्थानीय प्रतिकूल घटना निशान गठन, जलता है, त्वचा संक्रमण, panniculitis, फोड़ा गठन, कप्पिंग साइट पर दर्द, और प्रणालीगत प्रतिकूल घटनाओं सहित थे: एनीमिया, चक्कर आना, vasovagal हमले, अनिद्रा, सिर दर्द, और मतली। <ref>{{Cite journal|last=Al-Bedah|first=Abdullah|last2=Shaban|first2=Tamer|last3=Suhaibani|first3=Amen|last4=Gazzaffi|first4=Ibrahim|last5=Khalil|first5=Mohammed|last6=Qureshi|first6=Naseem|date=2016-05-06|title=Safety of Cupping Therapy in Studies Conducted in Twenty One Century: A Review of Literature|url=http://sciencedomain.org/abstract/14487|journal=British Journal of Medicine and Medical Research|volume=15|issue=8|pages=1–12|doi=10.9734/bjmmr/2016/26285|access-date=24 जनवरी 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20180602073135/http://sciencedomain.org/abstract/14487|archive-date=2 जून 2018|url-status=dead}}</ref>
फायर कपिंग से कभी-कभी कपिंग साइट पर मामूली जलन हो सकती है और इससे अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है और चोट को ठीक करने के लिए स्किन ग्राफ्टिंग की भी आवश्यकता पड़ सकती है। <ref name="Gorski">{{cite web|last1=Gorski|first1=David|authorlink=David Gorski|title=What’s the harm? Cupping edition|url=http://scienceblogs.com/insolence/2016/07/01/whats-the-harm-cupping-edition/|website=Respectful Insolence|publisher=Science-Based Medicine|date=July 1, 2016|accessdate=8 August 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160809060845/http://scienceblogs.com/insolence/2016/07/01/whats-the-harm-cupping-edition/|archive-date=9 अगस्त 2016|url-status=live}}</ref> ज्वलनशील पदार्थों के उपयोग में लापरवाही बरतने के कारण अन्य जलन भी हो सकती है, जैसे फैल और अधिक आवेदन। <ref>{{cite journal|title=Burns Induced by Cupping Therapy in a Burn Center in Northeast China|journal=WOUNDS|date=July 2014|volume=26|issue=7|url=http://www.woundsresearch.com/article/burns-induced-cupping-therapy-burn-center-northeast-china|accessdate=2 December 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160306164139/http://www.woundsresearch.com/article/burns-induced-cupping-therapy-burn-center-northeast-china|archive-date=6 मार्च 2016|url-status=dead}}</ref><ref>{{cite news|title=Popular treatment known as cupping therapy leaves man with seven holes in his back|url=http://www.news.com.au/lifestyle/health/popular-treatment-known-as-cupping-therapy-leaves-man-with-seven-holes-in-his-back/news-story/33b979706858045dc7fcce1523772084|accessdate=2 December 2016|publisher=news.com.au|date=June 25, 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20161113084110/http://www.news.com.au/lifestyle/health/popular-treatment-known-as-cupping-therapy-leaves-man-with-seven-holes-in-his-back/news-story/33b979706858045dc7fcce1523772084|archive-date=13 नवंबर 2016|url-status=live}}</ref>
==आलोचना==
अपनी 2008 की पुस्तक ट्रिक या ट्रीटमेंट में, साइमन सिंह और एडज़र्ड अर्नस्ट लिखते हैं कि किसी भी चिकित्सीय स्थिति के लिए क्यूपिंग के किसी भी लाभकारी प्रभाव का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। <ref>{{cite book|last1= Singh|first1= Simon|authorlink1= Simon Singh|last2= Ernst|first2= Edzard|authorlink2= Edzard Ernst|title= Trick or Treatment|url= http://simonsingh.net/books/trick-or-treatment/|year= 2008|publisher= Transworld Publishers|isbn= 978-0-552-15762-9|page= 368|access-date= 24 जनवरी 2019|archive-url= https://web.archive.org/web/20190218020409/https://simonsingh.net/books/trick-or-treatment/|archive-date= 18 फ़रवरी 2019|url-status= live}}</ref> वैकल्पिक चिकित्सा जैसे कि हैरियट हॉल और मार्क क्रिस्लीप के आलोचकों ने " स्यूडोसाइन्स बकवास", "एक सेलिब्रिटी सनक", और " जिबरिश " के रूप में कैपिंग की विशेषता की है, और देखा कि कोई सबूत नहीं है कि क्यूपिंग किसी प्लेसबो से बेहतर काम करता है। <ref name="Crislip">{{cite web |url=https://www.sciencebasedmedicine.org/acupuncture-odds-and-ends/ |title=Acupuncture Odds and Ends |last1=Crislip |first1=Mark |authorlink=Mark Crislip |date=24 December 2014 |website=Science-Based Medicine |accessdate=8 August 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190531091113/https://sciencebasedmedicine.org/acupuncture-odds-and-ends/ |archive-date=31 मई 2019 |url-status=live }}</ref><ref name="Harriet">{{cite web|last1=Hall|first1=Harriet|authorlink=Harriet A. Hall|title=Therapy or Injury? Your Tax Dollars at Work.|url=https://www.sciencebasedmedicine.org/therapy-or-injury-your-tax-dollars-at-work/|publisher=Science-Based Medicine|accessdate=8 August 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160727063145/https://www.sciencebasedmedicine.org/therapy-or-injury-your-tax-dollars-at-work/|archive-date=27 जुलाई 2016|url-status=live}}</ref> फार्माकोलॉजिस्ट डेविड कोलक्वाउन लिखते हैं कि क्यूपिंग "हंसने योग्य ... और पूरी तरह से अंतर्निहित है।" <ref name="">{{cite web |url=https://www.independent.ie/sport/rio-2016-olympics/revealed-why-some-olympic-athletes-have-those-little-red-marks-on-them-34947356.html |title=Revealed - Why some Olympic athletes have those little red marks on them |date=8 August 2016 |author=Online Editors |website=Irish Independent |access-date=24 जनवरी 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190327090935/https://www.independent.ie/sport/rio-2016-olympics/revealed-why-some-olympic-athletes-have-those-little-red-marks-on-them-34947356.html |archive-date=27 मार्च 2019 |url-status=live }}</ref> सर्जन डेविड गोर्सी का अभ्यास करते हुए, "... यह बिना किसी लाभ के सभी जोखिम है। आधुनिक चिकित्सा में इसका कोई स्थान नहीं है, या कम से कम नहीं होना चाहिए।" <ref name="Gorski"/> २०१६ में, कम्बोडियन स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी कि उच्च रक्तचाप या दिल की समस्याओं वाले लोगों के लिए कपिंग एक स्वास्थ्य जोखिम और विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है। <ref>{{Cite news|url=https://apnews.com/4038fb0c8c9a47f1a930f4cdc3d90b37|title=Cupping and coining: I did it long before Phelps|work=AP News|access-date=2018-08-19|language=en-US|archive-url=https://web.archive.org/web/20180819114458/https://apnews.com/4038fb0c8c9a47f1a930f4cdc3d90b37|archive-date=19 अगस्त 2018|url-status=dead}}</ref>
==तरीके==
हालांकि चिकित्सकों, समाजों और संस्कृतियों के बीच विवरण भिन्न होते हैं, अभ्यास में एक आंशिक निर्वात बनाकर या लक्षित कप में हवा के ठंडा होने के बाद या एक यांत्रिक पंप के माध्यम से लक्षित क्षेत्र पर रखी टोपी में एक ऊतक खींचना होता है। <ref>{{cite web|title=What is cupping therapy|url=http://www.webmd.com/balance/guide/cupping-therapy|website=WebMD|accessdate=15 August 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160814231636/http://www.webmd.com/balance/guide/cupping-therapy|archive-date=14 अगस्त 2016|url-status=live}}</ref> कप आमतौर पर पाँच से पंद्रह मिनट के बीच कहीं पर छोड़ दिया जाता है।
घन चिकित्सा प्रकार वर्गीकरण के चार अलग-अलग तरीकों का उपयोग करके वर्गीकृत किया जा सकता है। श्रेणीकरण की पहली प्रणाली "तकनीकी प्रकार" से संबंधित है: सूखी, गीली, मालिश और फ्लैश कपिंग थेरेपी। दूसरा वर्गीकरण "सक्शन संबंधित प्रकारों की शक्ति" से संबंधित है: प्रकाश, मध्यम और मजबूत कपिंग थेरेपी। तीसरा वर्गीकरण "सक्शन संबंधित प्रकारों की विधि" से संबंधित है: आग, मैनुअल सक्शन और इलेक्ट्रिकल सक्शन कैपिंग थेरेपी। चौथा वर्गीकरण "कप के अंदर सामग्री" से संबंधित है: हर्बल उत्पाद, पानी, ओजोन, मोक्सा, सुई और चुंबकीय क्यूपिंग थेरेपी। <ref>{{Cite book|title=Cupping Therapy Encyclopedia|last=Shaban|first=Tamer|publisher=CreateSpace|year=2013|isbn=978-1494780517|pages=29}}</ref>
बाद में कपिंग की अन्य श्रेणियां विकसित की गईं। पाँचवाँ इलाका इलाज़ से संबंधित है: चेहरे, पेट, स्त्री, पुरुष और आर्थोपेडिक कपिंग थेरेपी। छठा "अन्य क्यूपिंग प्रकार" से संबंधित है जिसमें खेल और जलीय क्यूपिंग शामिल हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.researchgate.net/publication/306240082_Classification_of_Cupping_Therapy_A_Tool_for_Modernization_and_Standardization|title=Classification of Cupping Therapy: A Tool for Modernization and Standardization (PDF Download Available)|website=ResearchGate|language=en|access-date=2017-03-29|archive-url=https://web.archive.org/web/20190125021920/https://www.researchgate.net/publication/306240082_Classification_of_Cupping_Therapy_A_Tool_for_Modernization_and_Standardization|archive-date=25 जनवरी 2019|url-status=live}}</ref>
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|title=विभिन्न सामग्रियों के कप
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|कांच
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|पीतल
}}
===ड्राई कपिंग===
कपिंग प्रक्रिया में आमतौर पर त्वचा के बगल में कम हवा के दबाव का एक छोटा क्षेत्र बनाना शामिल है। हालांकि, उपयोग किए जाने वाले उपकरणों में किस्मों, कम दबाव बनाने के तरीके और उपचार के दौरान प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। <ref>Cui Jin and Zhang Guangqi, "A survey of thirty years’ clinical application of cupping", Journal of Traditional Chinese Medicine 1989; 9(3): 151–154</ref>
कप गेंद या घंटियों सहित विभिन्न आकृतियों के हो सकते हैं, और उद्घाटन के दौरान इसका आकार 1 से 3 इंच (25 से 76 मिमी) तक हो सकता है। प्लास्टिक और कांच आज के समय में उपयोग की जाने वाली सबसे आम सामग्री है, जो पहले के समय में उपयोग किए जाने वाले सींग, मिट्टी के बर्तन, कांस्य और बांस के कप की जगह लेती थी। कप को गर्म करके या उसके अंदर की हवा को खुली लौ या गर्म सुगंधित तेलों के साथ स्नान करके, फिर त्वचा के खिलाफ रखकर निम्न वायुदाब बनाया जा सकता है। जैसे-जैसे कप के अंदर की हवा ठंडी होती है, यह सिकुड़ती है और त्वचा को थोड़ा अंदर खींचती है। हाल ही में, कप के शीर्ष पर स्थित वाल्व के माध्यम से यांत्रिक सक्शन पंप अभिनय के साथ वैक्यूम बनाया जाता है। रबर के कप भी उपलब्ध हैं जो हवा को निचोड़ते हैं और असमान या बोनी सतहों के अनुकूल होते हैं।
व्यवहार में, कप आमतौर पर केवल नरम ऊतक पर उपयोग किए जाते हैं जो कप के किनारे के साथ एक अच्छी सील बना सकते हैं। वे एक बड़े क्षेत्र को कवर करने के लिए अकेले या कई के साथ उपयोग किया जा सकता है। वे अपने आप से इस्तेमाल किया जा सकता है या एक एक्यूपंक्चर सुई पर रखा जा सकता है। त्वचा को चिकनाई हो सकती है, जिससे कप धीरे-धीरे त्वचा के पार चला जाता है।
कपों को हटाने के बाद त्वचा के निशान सामान्य होते हैं, साधारण लाल छल्लों से अलग, जो जल्दी से गायब हो जाते हैं, उखड़ने से मलिनकिरण के लिए, खासकर अगर कप को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सक्शन करते समय खींचा जाता है, तो सूजन वाले फाइबर को तोड़ने के लिए। आमतौर पर उपचार बहुत दर्दनाक नहीं होते हैं।
===आग से कपिंग===
[[File:Fire Cupping.jpg|thumb|upright=1.3|आग कपिन्ह प्राप्त करने वाला व्यक्ति।]]
फायर क्यूपिंग में लगभग शुद्ध शराब में एक कपास की गेंद को भिगोना शामिल है। कपास संदंश की एक जोड़ी द्वारा जकड़ा हुआ है और मैच या लाइटर के माध्यम से जलाया जाता है, और, एक गति में, कप में रखा जाता है और जल्दी से हटा दिया जाता है, जबकि कप त्वचा पर रखा जाता है। आग कप के अंदर गरम करती है और हवा को ठंडा करके फिर से सिकुड़ कर चूषण की एक छोटी मात्रा बनाई जाती है। मसाज ऑयल को एक बेहतर सील बनाने के लिए लागू किया जा सकता है और साथ ही कप्स को "मूविंग क्यूपिंग" नामक एक अधिनियम में मांसपेशियों के समूहों (जैसे ट्रेपेज़ियस, इरेक्टर्स, लेटिसिमस डोर्सी, आदि) पर ग्लाइड करने की अनुमति दी जा सकती है। डार्क सर्कल दिखाई दे सकते हैं जहां कप को त्वचा के नीचे केशिकाओं के टूटने के कारण रखा गया था। आग से जलने के कारण जलने के दस्तावेज हैं। <ref>{{cite journal|last1=Iblher|first1=N.|last2=Stark|first2=B.|title=Cupping treatment and associated burn risk: a plastic surgeon's perspective|url=https://archive.org/details/sim_journal-of-burn-care-research_2007-04_28_2/page/355|journal=J Burn Care Res|volume=28|issue=2|pages=355–8|doi=10.1097/BCR.0B013E318031A267|pmid=17351459|year=2007}}</ref><ref>{{cite journal|last1=Sagi|first1=A.|last2=Ben-Meir|first2=P.|last3=Bibi|first3=C.|title=Burn hazard from cupping--an ancient universal medication still in practice|journal=Burns Incl Therm Inj|date=Aug 1988|volume=14|issue=4|pages=323–5|pmid=3224303|doi=10.1016/0305-4179(88)90075-7}}</ref>
===गीले कपिंग===
गीले कपिंग को हिजामा (अरबी : حجامة lit. "चूसने") या औषधीय रक्तस्राव के रूप में भी जाना जाता है, जहां एक छोटे से त्वचा के चीरा से स्थानीय सक्शन द्वारा रक्त खींचा जाता है। <ref>{{cite journal |last=Albinali |first=Hajar |date=June 2004 |title=Traditional Medicine Among Gulf Arabs Part II - Blood Letting |url=http://www.heartviews.org/text.asp?2004/5/2/74/64567 |journal=Heart Views |volume=5 |issue=2 |pages=74-85 |archive-url=https://web.archive.org/web/20070911211305/http://www.hmc.org.qa/heartviews/VOL5NO2/special_section.htm |archive-date=11 सितंबर 2007 |url-status=dead |access-date=29 सितंबर 2020 }}</ref> पहली रिपोर्ट में इस्लामिक हदीस के बारे में बताया गया है, जो इस्लामिक नबी मोहम्मद के कार्यों के लिए जिम्मेदार है। <ref name="RippinKnappert1986">{{cite book|last1=Rippin|first1=Andrew|last2=Knappert|first2=Jan|title=Textual Sources for the Study of Islam|url=https://books.google.com/books?id=m8xRAQAAIAAJ&pg=PA78|year=1986|publisher=Manchester University Press|isbn=978-0-7190-1884-8|page=78}}</ref><ref name=indeed/> मुहम्मद अल-बुखारी से हदीस, मुस्लिम इब्न अल-हज्जाज निशापुरी और अहमद इब्न हनबल मुहम्मद द्वारा इसकी सिफारिश और उपयोग का समर्थन करते हैं। <ref>{{Hadith-usc|usc=yes|abudawud|11|2097}}, {{Hadith-usc|abudawud|28|3848}}, {{Hadith-usc|usc=yes|muslim|26|5467}}, {{Hadith-usc|muslim|10|3830}}, {{Hadith-usc|bukhari|usc=yes|7|71|584}}, {{Hadith-usc|usc=no|bukhari|7|71|602}}</ref> परिणामस्वरूप, गीले कपिंग मुस्लिम दुनिया के कई हिस्सों में प्रचलित एक लोकप्रिय उपाय बन गया है। <ref>{{cite journal |last=El-Wakil |first=Ahmed |date=9 December 2011 |title=Observations of the popularity and religious significance of blood-cupping (''al-ḥijāma'') as an Islamic medicine |url=http://www.qscience.com/doi/abs/10.5339/cis.2011.2 |journal=Contemporary Islamic Studies |publisher=Hamad bin Khalifa University Press |volume=2 |doi=10.5339/cis.2011.2 |access-date=24 जनवरी 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200530205640/https://www.qscience.com/content/journals/10.5339/cis.2011.2 |archive-date=30 मई 2020 |url-status=dead }}</ref>
फिनलैंड में, कम से कम 15 वीं शताब्दी के बाद से गीली जुताई की जाती है, और यह पारंपरिक रूप से सौना में किया जाता है। कपिंग कप मवेशियों के सींग से बने होते थे, जिसमें एक वाल्व तंत्र के साथ हवा को चूसकर एक आंशिक वैक्यूम बनाया जाता था। <ref>{{cite journal |last=Kaups |first=Matti |year=1976 |title=A Finish Savusauna in Minnesota |url=http://collections.mnhs.org/MNHistoryMagazine/articles/45/v45i01p011-020.pdf |journal=Minnesota History |publisher=Minnesota Historical Society |issue=Spring |pages=11–20 |access-date=24 जनवरी 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160705072918/http://collections.mnhs.org/MNHistoryMagazine/articles/45/v45i01p011-020.pdf |archive-date=5 जुलाई 2016 |url-status=dead }}</ref> अभी भी फिनलैंड में आराम और / या स्वास्थ्य आहार के भाग के रूप में क्यूपिंग का अभ्यास किया जाता है। <ref>"...a cupping session — a recently revived, if archaic procedure, during which a therapist uses a cupping hatchet to make small cuts in your back and places glass cups fitted with bulb syringes over the cuts to draw out 'bad blood' and release 'feel-good' endorphins. Cupping is considered perfectly safe and aficionados say the procedure energizes them, but it’s definitely not for germophobes or the squeamish." : From [http://travelsquire.com/finlands-magnificent-obsession/ "Finland's magificent obsession"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20180919211525/http://travelsquire.com/finlands-magnificent-obsession/ |date=19 सितंबर 2018 }}, Travelsquire</ref>
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File:Hijama therapy1.jpg|गीला कपिंग प्राप्त करने वाला व्यक्ति
File:Drawn_blood.jpg|गीले कपिंग द्वारा खींचा हुआ रक्त
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===पारंपरिक चीनी दवा===
[[File:Fire cupping in Haikou - 02.JPG|thumb|चीन के हैनान में एक सड़क के किनारे व्यवसाय में आग लगाने वाली महिला।]]
पारंपरिक चीनी चिकित्सा (टीसीएम) के अनुसार, क्यूपिंग ठहराव (स्थिर रक्त और लसीका) को दूर करने के लिए किया जाता है, जिससे सामान्य सर्दी , निमोनिया और ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों का इलाज करने के लिए क्यूई प्रवाह में सुधार होता है, <ref name=china/>। क्यूपिंग का उपयोग पीठ, गर्दन, कंधे और अन्य मस्कुलोस्केलेटल स्थितियों पर भी किया जाता है। इसके अधिवक्ताओं का दावा है कि इसके अन्य आवेदन भी हैं। <ref name=china>State Administration of Traditional Chinese Medicine and Pharmacy, ''Advanced Textbook on Traditional Chinese Medicine and Pharmacology,'' Volume IV, 1997 New World Press, Beijing</ref>टीसीएम की सलाह नहीं दी जाती है, टीसीएम में, त्वचा पर अल्सर या गर्भवती महिलाओं के पेट या त्रिक क्षेत्रों में। <ref>Chinese Acupuncture and Moxibustion (Revised Edition), Xingnong, Foreign Languages Press, Beijing, China, 1987, p370.</ref>
==इतिहास==
[[File:F. Dekkers, Exercitationes practicae, Wellcome L0002320.jpg|thumb|left|1694 में प्रकाशित मेडिकल टेक्स्टबुक एक्सरसाइजेस प्रैक्टिसे का एक चित्रण, एक व्यक्ति को अपने नितंबों पर गुदगुदी दिखाते हुए दिखा।]]
3,000 से अधिक वर्षों के लिए, इस अभ्यास को आमतौर पर बिना किसी चिकित्सा पृष्ठभूमि के व्यक्तियों द्वारा अप्रकाशित किया जाता है। ईरानी पारंपरिक चिकित्सा में गीली-कप्पिंग प्रथाओं का उपयोग किया जाता है, इस विश्वास के साथ कि स्कार्फिकेशन के साथ कपिंग निशान ऊतक को समाप्त कर सकता है, और बिना स्कार्फ के कपिंग अंगों के माध्यम से शरीर को साफ करेगा। <ref>{{cite journal|author1= Nimrouzi M|author2= Mahbodi A|author3= Jaladat AM|author4= Sadeghfard A|author5= Zarshenas MM|title= ''Hijama'' in traditional Persian medicine: risks and benefits.|journal= J Evid Based Complementary Altern Med|year= 2014|volume= 19|issue= 2|pages= 128–36|pmid= 24647093|doi= 10.1177/2156587214524578|pmc=}}</ref> अभ्यास में गहन रुचि रखने वाले व्यक्ति आमतौर पर बहुत धार्मिक होते हैं और "शुद्धिकरण" चाहते हैं।
3000 ईसा पूर्व से प्रथा की तिथियों पर विश्वास करने का कारण है। द एबर्स पैपाइरस, लिखित सी। 1550 ईसा पूर्व और पश्चिमी दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा पाठ्यपुस्तकों में से एक, सहारन लोगों द्वारा नियोजित समान प्रथाओं का उल्लेख करते हुए, मिस्रियों को कपिंग के उपयोग का वर्णन करता है। प्राचीन ग्रीस में, हिप्पोक्रेट्स (सी। ४०० ईसा पूर्व) ने आंतरिक रोग और संरचनात्मक समस्याओं के लिए क्यूपिंग का उपयोग किया। मुहम्मद द्वारा विधि की अत्यधिक अनुशंसा की गई थी <ref name=indeed>{{cite book|author1=Qayyim Al-Jauziyah|editor1-last=Abdullah|editor1-first=Abdul Rahman (formerly Raymond J. Manderola)|title=Healing with the Medicine of the Prophet|url=https://archive.org/details/healingwithmedic0000qayy|date=2003|isbn=978-9960892917|quote=Indeed, the best of remedies you have is ''[[hijama]]'', and if there was something excellent to be used as a remedy then it is ''hijama''.}}</ref> और इसलिए मुस्लिम वैज्ञानिकों द्वारा अच्छी तरह से अभ्यास किया गया था, जिन्होंने विधि को और विस्तृत किया। लगातार, अपने कई रूपों में यह विधि पूरे एशियाई और यूरोपीय सभ्यताओं में दवा में फैल गई। चीन में, कपिंग का सबसे पहला उपयोग जो दर्ज किया गया है, वह प्रसिद्ध ताओवादी कीमियागर और हर्बलिस्ट, जीई हांग (281-341 ईस्वी) का है। <ref name=":0">{{Cite web|url=http://www.itmonline.org/arts/cupping.htm|title=Cupping|last=Dharmananda|first=Subhuti|date=|website=itmonline.org|publisher=Institute for Traditional Medicine|access-date=2016-08-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190109094417/http://www.itmonline.org/arts/cupping.htm|archive-date=9 जनवरी 2019|url-status=dead}}</ref> क्यूपिंग का उल्लेख स्वास्थ्य पर मैमूनिद की पुस्तक में भी किया गया था और पूर्वी यूरोपीय यहूदी <ref name=indeed/>समुदाय के भीतर इसका इस्तेमाल किया गया था। <ref>{{cite web|url=http://www.tabletmag.com/scroll/210759/everything-you-ever-wanted-to-know-about-cupping-and-some-stuff-you-probably-didnt|last=Ingall|first=Marjorie|title=Everything You Ever Wanted to Know About Cupping—and Some Stuff You Probably Didn’t|publisher=Tablet Magazine|date=2016-08-11|accessdate=2016-08-14|archive-url=https://web.archive.org/web/20190327102340/https://www.tabletmag.com/scroll/210759/everything-you-ever-wanted-to-know-about-cupping-and-some-stuff-you-probably-didnt|archive-date=27 मार्च 2019|url-status=live}}</ref>
==समाज और संस्कृति==
[[नेशनल फुटबॉल लीग]] के खिलाड़ी डेमैर्कस वेयर और ओलंपियन अलेक्जेंडर नाडडॉर , नताली कफलिन और माइकल फेल्प्स सहित अमेरिकी खेल हस्तियों द्वारा इसके इस्तेमाल के कारण क्यूपिंग को आधुनिक समय में प्रसिद्धी मिली है। <ref name="Chinese Cupping in Olympics">{{cite web |url=http://well.blogs.nytimes.com/2016/08/08/what-are-the-purple-dots-on-michael-phelps-cupping-has-an-olympic-moment/?_r=0 |title=What Are the Purple Dots on Michael Phelps? Cupping Has an Olympic Moment |date=August 8, 2016 |last1=Reynolds |first1=Gretchen |last2=Crouse |first2=Karen |website=Well |publisher=The New York Times |accessdate=8 August 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160808221332/http://well.blogs.nytimes.com/2016/08/08/what-are-the-purple-dots-on-michael-phelps-cupping-has-an-olympic-moment/?_r=0 |archive-date=8 अगस्त 2016 |url-status=live }}</ref> मेडिकल डॉक्टर ब्रैड मैकके ने लिखा है कि टीम यूएसए अपने प्रशंसकों के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है, जो "प्राचीन (लेकिन बेकार) पारंपरिक चिकित्सा" बताते हुए "अपने नेतृत्व का पालन करें" कर सकते हैं। <ref name="Kay">{{cite web|last1=McKay|first1=Brad|authorlink=Brad McKay (doctor)|title=Why Team USA's use of cupping therapy really sucks|url=http://www.news.com.au/lifestyle/health/why-team-usas-use-of-cupping-therapy-really-sucks/news-story/39e6da472eba56e564139cc17e38ee5b|publisher=News.com.au|date=August 9, 2016|accessdate=9 August 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160810162129/http://www.news.com.au/lifestyle/health/why-team-usas-use-of-cupping-therapy-really-sucks/news-story/39e6da472eba56e564139cc17e38ee5b|archive-date=10 अगस्त 2016|url-status=live}}</ref> स्टीवन नोवेल्ला ने कहा "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ओलंपिक सहित कुलीन एथलेटिक्स, [[छद्म विज्ञान]] के लिए इतना गर्म बिस्तर है।" <ref>{{cite web |url=https://sciencebasedmedicine.org/cupping-olympic-pseudoscience/ |title=Cupping – Olympic Pseudoscience |date=August 10, 2016 |last=Novella |first=Steven |website=Science Based Medicine |access-date=24 जनवरी 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190210030242/https://sciencebasedmedicine.org/cupping-olympic-pseudoscience/ |archive-date=10 फ़रवरी 2019 |url-status=dead }}</ref>
[[जॉर्ज ऑरवेल]] के निबंध " हाउ द पुअर डाई " में कैपिंग का वर्णन है, जहां वह एक पेरिस अस्पताल में इसका अभ्यास करने के लिए आश्चर्यचकित थे। <ref>{{cite web |url=https://sciencebasedmedicine.org/cupping-olympic-pseudoscience/ |title=Cupping – Olympic Pseudoscience |date=August 10, 2016 |last=Novella |first=Steven |website=Science Based Medicine |access-date=24 जनवरी 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190210030242/https://sciencebasedmedicine.org/cupping-olympic-pseudoscience/ |archive-date=10 फ़रवरी 2019 |url-status=dead }}</ref>
== इन्हें भी देखें ==
* [[गु शा]]
* [[कपिंग थेरेपी|हिजामा]]
* '''[https://mpnewshindi.com/What-is-cupping-therapy-How-is-it-beneficial कपिंग थेरेपी के फायदे]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}'''
==सन्दर्भ==
{{Reflist|30em}}
==बाहरी कड़ियाँ==
[[श्रेणी:एक्यूपंक्चर]]
[[श्रेणी:वैकल्पिक विषहरण]]
[[श्रेणी:इस्लामी चिकित्सा]]
[[श्रेणी:अप्रचलित चिकित्सा सिद्धांत]]
[[श्रेणी:पारंपरिक चीनी औषधि]]
[[श्रेणी:यूनानी चिकित्सा पद्धति]]
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श्रद्धा शर्मा
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{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
|name=श्रद्धा शर्मा
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|birth_date={{birth date and age|df=yes|1980|7|06}}<ref>{{Cite web |url=https://starsunfolded.com/shradha-sharma-yourstory/ |title=biography |access-date=28 मार्च 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190328103233/https://starsunfolded.com/shradha-sharma-yourstory/ |archive-date=28 मार्च 2019 |url-status=dead }}</ref>
|home_town=[[पटना]], [[बिहार]]
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|education=इतिहास में स्नातकोत्तर
|occupation={{flat list|* "योरस्टोरी" की संस्थापक और सी.ई.ओ.}}
}}
'''श्रद्धा शर्मा''', उद्यमियों के लिए एक मीडिया प्रौद्योगिकी मंच, योरस्टोरी (YourStory) की संस्थापक, सीईओ और मुख्य संपादक हैं। 2008 में योरस्टोरी शुरू करने से पहले, शर्मा ने [[सी एन बी सी – टी वी १८|सीएनबीसी – टीवी १८]] में सहायक उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत रही और ''[[द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया|टाइम्स ऑफ इंडिया]]'' में एक ब्रांड सलाहकार भी थीं।<ref name="Green">{{Cite news|url=http://www.thehindubusinessline.com/news/variety/listen-to-the-green-shoots/article4999986.ece|title=Listen to the green shoots|last=Sharma|first=Shradha|date=2013-08-08|work=The Hindu Business Line|access-date=2016-12-10}}</ref><ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.bloomberg.com/research/stocks/private/person.asp?personId=241937591&privcapId=241859424&previousCapId=241859424&previousTitle=YourStory%20Media%20Pvt.%20Ltd.|title=Shradha Sharma: Executive Profile & Biography - Bloomberg|website=www.bloomberg.com|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328104755/https://www.bloomberg.com/research/stocks/private/person.asp?personId=241937591&privcapId=241859424&previousCapId=241859424&previousTitle=YourStory%20Media%20Pvt.%20Ltd.|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://www.bloombergquint.com/business/2016/09/11/startup-street-india-to-get-a-desi-version-of-shark-tank|title=Startup Street: India To Get A Desi Version Of Shark Tank?|work=Bloomberg Quint|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328142122/https://www.bloombergquint.com/business/2016/09/11/startup-street-india-to-get-a-desi-version-of-shark-tank|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=dead}}</ref>
''लक्ष्मी के साथ चाय'' पर उन्हें "... भारत के डिजिटल स्पेस का सबसे बड़ी कहानीकार" की संज्ञा दी गई।<ref>{{Citation|last=Lakshmi Rebecca|title=10,000 Amazing Stories of Indian Entrepreneurs|date=2013-04-14|url=https://www.youtube.com/watch?v=e7nn2U0qrkU|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190305013310/https://www.youtube.com/watch?v=e7nn2U0qrkU|archive-date=5 मार्च 2019|url-status=live}}</ref> उन्हें टेकगिग की "भारत की 5 महिला भारतीय उद्यमी, जिनके बारे में आपको जानना चाहिए।" लेख में शामिल किया गया।<ref>{{Cite news|url=https://www.techgig.com/tech-news/editors-pick/5-Women-Entrepreneurs-in-India-that-you-should-know-about-42828|title=5 Women Entrepreneurs in India that you should know about!|last=www.Techgig.com|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20170113043119/https://www.techgig.com/tech-news/editors-pick/5-women-entrepreneurs-in-india-that-you-should-know-about-42828|archive-date=13 जनवरी 2017|url-status=dead}}</ref> ''[[द हिंदू]]'' ने अपने एक लेख में उनके बारे में "ग्लास सिलिंग" जैसी संज्ञा दी है।<ref name="Glass">{{Cite news|url=http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-metroplus/High-above-the-glass-ceiling/article16655977.ece|title=High above the glass ceiling|last=MELANGE|first=TEAM|work=The Hindu|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20161221095909/http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-metroplus/High-above-the-glass-ceiling/article16655977.ece|archive-date=21 दिसंबर 2016|url-status=live}}</ref> उनकी कंपनी को "स्टार्ट-अप और उद्यमियों से संबंधित कहानियों, समाचार, संसाधनों और अनुसंधान रिपोर्टों के लिए भारत का सबसे बड़ा और निश्चित मंच" बताया जाता है।<ref name="Femina">{{Cite news|url=http://www.femina.in/achievers/with-ratan-tatas-backing-shradha-sharma-is-making-yourstory-the-ultimate-startup-platform-6954.html|title=Meet Shradha Sharma of Yourstory.com|last=Reema Behl|date=8 June 2016|work=[[Femina (India)|Femina]]|access-date=5 March 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190305094251/http://www.femina.in/achievers/with-ratan-tatas-backing-shradha-sharma-is-making-yourstory-the-ultimate-startup-platform-6954.html|archive-date=5 मार्च 2019|url-status=dead}}</ref> योरस्टोरी 12 भाषाओं में उद्यमीशीलता की कहानी मुहैया कराती है।
योरस्टोरी को [[रतन नवल टाटा|रतन टाटा]], [[वाणी कोला]], कार्ति मदसामी और टी वी मोहनदास पाई से निवेश प्राप्त हुआ है।<ref>{{Cite news|url=http://www.business-standard.com/article/companies/ratan-tata-invests-in-yourstory-115081700158_1.html|title=Ratan Tata reads YourStory, and writes a cheque for it|last=Reporter|first=B. S.|date=2015-08-18|work=Business Standard India|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328145037/https://www.business-standard.com/article/companies/ratan-tata-invests-in-yourstory-115081700158_1.html|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://www.livemint.com/Companies/ITvYOkerWQ59Zzd9oHBWpO/The-40-who-matter-in-Indian-startup-ecosystem.html|title=The 40 who matter in the Indian start-up ecosystem|work=Live Mint|access-date=28 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328131026/https://www.livemint.com/Companies/ITvYOkerWQ59Zzd9oHBWpO/The-40-who-matter-in-Indian-startup-ecosystem.html|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://economictimes.indiatimes.com/news/company/corporate-trends/et-women-ahead-rising-stars-of-india-inc-beyond/articleshow/56608685.cms|title=Corporate India's fastest rising women leaders|work=Economic Times|access-date=28 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328121613/https://economictimes.indiatimes.com/news/company/corporate-trends/et-women-ahead-rising-stars-of-india-inc-beyond/articleshow/56608685.cms|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
शर्मा का जन्म [[बिहार]] के एक छोटे से शहर में हुआ था।<ref name="Glass"/> वे [[पटना]] में पली-बढ़ी।<ref name="Green"/> अपने स्कूल के दिनों में, वे अपनी कक्षा में अव्वल थीं और शिक्षा और वाद-विवाद में बहुत सक्रिय थीं।
शर्मा ने [[सेंट स्टीफ़न कॉलेज|सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली]] से इतिहास में स्नातक और मास्टर डिग्री और मैरीलैंड इंस्टीट्यूट कॉलेज ऑफ आर्ट से एमबीए हासिल की।<ref name=":0" />
== पुरस्कार और उपलब्धियां ==
शर्मा को समावेशी स्टार्टअप समुदाय के निर्माण में उनके प्रयासों के लिए नैस्कॉम इकोसिस्टम इवेंजलिस्ट पुरस्कार प्राप्त हुआ है, इसके अलावा उन्हें 2010 में स्टार्टअप्स के कवरेज के लिए विल्ग्रो जर्नलिस्ट ऑफ़ द इयर पुरस्कार दिया गया था। 2015 में उन्हें दुनिया भर में 500 लिंक्डइन इन्फ्लुएंसर के बीच सूचीबद्ध किया गया था, और उसी वर्ष उन्हें ऑनलाइन प्रभाव के लिए लोरियल पेरिस फेमिना पुरस्कार प्राप्त हुआ। 2016 में पैट मेमोरियल आउटस्टैंडिंग एलुमनीस पुरस्कार <ref>{{Cite news|url=http://indianexpress.com/article/cities/ahmedabad/start-ups-renege-on-offers-mica-chief/|title=Start-ups renege on offers: MICA chief Madhukar Kamath|date=2016-04-03|work=The Indian Express|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328142137/https://indianexpress.com/article/cities/ahmedabad/start-ups-renege-on-offers-mica-chief/|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref>
और 2016 में इंटरनेट श्रेणी के तहत [[लिंक्डइन]] में सबसे अधिक देखे जाने वाली सीईओ थीं<ref>{{Cite web|url=http://www.cxotoday.com/story/linkedin-announces-power-profiles-list-for-2016/|title=LinkedIn's Most Viewed CEOs In India - CXOtoday.com|website=www.cxotoday.com|access-date=2016-12-10|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328104101/http://www.cxotoday.com/story/linkedin-announces-power-profiles-list-for-2016/|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=dead}}</ref>
== <ref>{{Cite web|url=https://ndekho.com/shark-tank-india-season-2-judges-release-date/|title=Shark Tank India Season 2 - Judges, Release Date And New Sharks - News Dekho|date=2022-11-18|language=en-US|access-date=2022-11-20|archive-date=20 नवंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20221120200222/https://ndekho.com/shark-tank-india-season-2-judges-release-date/|url-status=dead}}</ref>सन्दर्भ ==
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:1980 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय पत्रकार]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला उद्यमी]]
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'''कॉटन विश्वविद्यालय''' ([[English]]: Cotton University, [[असमिया भाषा|असमिया]]: কটন বিশ্ববিদ্যালয়) गुवाहाटी, असम, भारत में स्थित एक सार्वजनिक राज्य विश्वविद्यालय है। यह कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी (CCSU) और कॉटन कॉलेज के विलय के लिए असम विधान सभा के कॉटन विश्वविद्यालय अधिनियम, 2017 के तहत स्थापित किया गया था।
कॉटन कॉलेज की स्थापना 1901 में सर हेनरी स्टैडमैन कॉटन ने की थी, जो तत्कालीन ब्रिटिश प्रांत असम के मुख्य आयुक्त थे। यह असम, और पूरे पूर्वोत्तर भारत में उच्च शिक्षा का सबसे पुराना संस्थान था। यह 1948 में गौहाटी विश्वविद्यालय का संघटक कॉलेज बन गया, और फिर 2011 में कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी CCSU असम सरकार के एक अधिनियम (अधिनियम XIX) द्वारा स्थापित किया गया था। कॉटन विश्वविद्यालय अधिनियम, 2017 को निष्पादित किया गया था कॉटन कॉलेज और कॉटन कॉलेज राज्य विश्वविद्यालय के बीच समस्याओं को हल करने के लिए।
[[श्रेणी:असम में विश्वविद्यालय और कॉलेज]]
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[[File:Cotton University formerly known as Cotton College in Guwahati 01.jpg|thumb|कॉटन विश्वविद्यालय]]
'''कॉटन विश्वविद्यालय''' ([[English]]: Cotton University, [[असमिया भाषा|असमिया]]: কটন বিশ্ববিদ্যালয়) गुवाहाटी, असम, भारत में स्थित एक सार्वजनिक राज्य विश्वविद्यालय है। यह कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी (CCSU) और कॉटन कॉलेज के विलय के लिए असम विधान सभा के कॉटन विश्वविद्यालय अधिनियम, 2017 के तहत स्थापित किया गया था।
कॉटन कॉलेज की स्थापना 1901 में सर हेनरी स्टैडमैन कॉटन ने की थी, जो तत्कालीन ब्रिटिश प्रांत असम के मुख्य आयुक्त थे। यह असम, और पूरे पूर्वोत्तर भारत में उच्च शिक्षा का सबसे पुराना संस्थान था। यह 1948 में गौहाटी विश्वविद्यालय का संघटक कॉलेज बन गया, और फिर 2011 में कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी CCSU असम सरकार के एक अधिनियम (अधिनियम XIX) द्वारा स्थापित किया गया था। कॉटन विश्वविद्यालय अधिनियम, 2017 को निष्पादित किया गया था कॉटन कॉलेज और कॉटन कॉलेज राज्य विश्वविद्यालय के बीच समस्याओं को हल करने के लिए।
[[श्रेणी:असम में विश्वविद्यालय और कॉलेज]]
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{{Infobox cricket team
| name = कराची किंग्स <br>{{Nastaliq|کراچی کنگز}}
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| nickname = ''दिलों के बादशाह'' (lit.Kings of Hearts) <br> ''दे धना धन''
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'''कराची किंग्ज़''' ({{langx|ur|{{unq|کراچی کنگز}}}}, {{langx|sd|ڪراچي ڪنگز}}, {{langx|en|Karachi Kings|italics=no}}) '''केके''' एक पाकिस्तानी पेशेवर फ्रेंचाइजी ट्वेंटी-20 क्रिकेट टीम है जो [[पाकिस्तान सुपर लीग]] में प्रतिस्पर्धा करती है। यह टीम पाकिस्तान के [[सिंध]] की प्रांतीय राजधानी [[कराची]] में स्थित है।<ref>{{cite news|url=http://www.emirates247.com/sports/local/pakistan-super-league-t20-in-uae-seeks-to-rival-india-s-ipl-2015-09-29-1.604988|title=Pakistan Super League T20 in UAE seeks to rival India's IPL|date=29 September 2015|accessdate=3 December 2015}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> [[पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड]] (पीसीबी) द्वारा [[पाकिस्तान सुपर लीग]] के गठन के परिणामस्वरूप 2015 में टीम का गठन किया गया था। टीम का होम ग्राउंड नेशनल स्टेडियम है टीम में वर्तमान में [[इमाद वसीम]] की कप्तानी है,<ref>{{cite news|title= Imad Wasim appointed as new captain of Karachi Kings|url= http://dunyanews.tv/en/Cricket/413341-Imad-Wasim-appointed-new-captain-of-Karachi-Kings/|accessdate= 21 February 2017|issue= Samaa TV|archive-url= https://web.archive.org/web/20171109215435/http://dunyanews.tv/en/Cricket/413341-Imad-Wasim-appointed-new-captain-of-Karachi-Kings|archive-date= 9 नवंबर 2017|url-status= dead}}</ref> और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर डीन जोन्स द्वारा कोच है।<ref>{{cite web|url=https://www.geo.tv/latest/256246-dean-jones-replaces-mickey-arthur-as|title=Karachi Kings appoint Dean Jones as head coach|accessdate=6 December 2019|work=Geo TV|archive-url=https://web.archive.org/web/20191206115654/https://www.geo.tv/latest/256246-dean-jones-replaces-mickey-arthur-as|archive-date=6 दिसंबर 2019|url-status=live}}</ref>
अप्रैल 2017 में, [[वसीम अकरम]] टीम के अध्यक्ष बने।<ref>{{Cite book|title=Wasim : the autobiography of Wasim Akram|url=https://archive.org/details/wasim0000wasi|author=Akram, Wasim|date=1998|publisher=Piatkus|isbn=074991808X|oclc=40498225}}</ref>
टीम के लिए प्रमुख रन स्कोरर [[बाबर आज़म]] हैं,<ref>{{cite web|title=Karachi Kings/Most runs|url=http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/batting/most_runs_career.html?id=205;team=5793;type=trophy|publisher=[[ESPNcricinfo]]|accessdate=21 March 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170322015908/http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/batting/most_runs_career.html?id=205;team=5793;type=trophy|archive-date=22 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> जबकि [[मोहम्मद आमिर|मोहम्मद आमिर]] विकेट लेने वाले हैं।<ref>{{cite web|title=Karachi Kings/Most wickets|url=http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?id=205;team=5793;type=trophy|publisher=[[ESPNcricinfo]]|accessdate=21 March 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170322021831/http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?id=205;team=5793;type=trophy|archive-date=22 मार्च 2017|url-status=live}}</ref>
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
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कृभको
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Mnjkhan
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[[विशेष:योगदान/~2026-24701-30|~2026-24701-30]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-24701-30|वार्ता]]) द्वारा अच्छी नीयत से किये गये बदलाव प्रत्यावर्तित किये गये
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{{ज्ञानसन्दूक कम्पनी
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'''कृषक भारती को-ऑपरेटिव लिमिटेड''' ('''कृभको'''), [[भारत]] की एक [[सहकार|सहकारी]] संस्था है जो [[उर्वरक]] (मुख्यतः [[यूरिया]]) बनाती हैं।
कृभको कि स्थापना 1980 में भारत सरकार द्वारा की गई।
[[श्रेणी:भारत की सहकारी संस्थाएँ]]
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ओवर-द-टॉप मीडिया सेवा
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text/x-wiki
'''ओवर-द-टॉप''' ( '''[[ओटीटी]]''' ) मीडिया सेवा एक [[मीडिया (संचार)|मीडिया]] सेवा है जो सीधे [[अंतरजाल|इंटरनेट]] के माध्यम से दर्शकों को प्रदान की जाती है। ओटीटी [[केबल टीवी|केबल]], प्रसारण और उपग्रह टेलीविजन प्लेटफॉर्म को बायपास करता है: ऐसी कंपनियों के प्रकार जो पारंपरिक रूप से ऐसी सामग्री के नियंत्रक या वितरक के रूप में काम करते हैं।<ref>{{Cite web|url=http://www.hollywoodreporter.com/live-feed/can-cbs-change-streaming-game-star-trek-discovery-1037576|title=Can CBS Change the Streaming Game With 'Star Trek: Discovery'?|last=Jarvey|first=Natalie|date=15 September 2017|publisher=The Holywood Reporter|archive-url=https://web.archive.org/web/20171028043908/http://www.hollywoodreporter.com/live-feed/can-cbs-change-streaming-game-star-trek-discovery-1037576|archive-date=2017-10-28|access-date=27 October 2017}}</ref> इसका उपयोग नो-कैरियर सेलफ़ोन का वर्णन करने के लिए भी किया गया है, जिसके लिए सभी संचारों को डेटा के रूप में चार्ज किया जाता है,<ref>{{Cite web|url=https://www.about360tech.com/2023/06/OTT-Kya-Hai-OTT-ka-full-form-kya-hai.html|title=क्यों लोगों में इनकी पसंद लगातार बढ़ रही है|last=yadav|first=Surendra|date=29 July 2023|website=https://www.about360tech.com/}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> एकाधिकार प्रतियोगिता से बचने के लिए, या फोन के लिए ऐप्स जो इस तरीके से डेटा संचारित करते हैं, जिसमें वे दोनों शामिल हैं जो अन्य कॉल विधियों को प्रतिस्थापित करते हैं<ref>{{Cite web|url=https://gigaom.com/2014/11/03/can-you-hear-me-now-verizon-att-to-make-voice-over-lte-interoperable-in-2015/|title=Can you hear me now? Verizon, AT&T to make voice-over-LTE interoperable in 2015|last=Fitchard|first=Kevin|date=3 November 2014|website=gigaom.com|access-date=18 फ़रवरी 2023|archive-date=11 नवंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201111203158/https://gigaom.com/2014/11/03/can-you-hear-me-now-verizon-att-to-make-voice-over-lte-interoperable-in-2015/|url-status=dead}}</ref><ref name="horoscope" /> और वे जो सॉफ्टवेयर को अपडेट करते हैं। <ref name="horoscope">{{Cite web|url=https://techcrunch.com/2013/03/25/startups-beating-carriers/|title=Why Startups Are Beating Carriers (Or The Curious Case Of The Premium SMS Horoscope Service & The Lack Of Customer Consent)|date=25 March 2013|website=TechCrunch}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://techcrunch.com/2014/02/26/close-look-at-blackphone/|title=A Closer Look At Blackphone, The Android Smartphone That Simplifies Privacy|date=February 26, 2014|website=TechCrunch}}</ref><ref name="auto">{{Cite web|url=https://www.forbes.com/sites/forbescommunicationscouncil/2021/02/08/what-is-ott-advertising-and-why-is-it-a-trend/|title=Council Post: What Is OTT Advertising, And Why Is It A Trend?|last=Tariq|first=Haseeb|website=Forbes}}</ref>
यह शब्द सब्सक्रिप्शन -आधारित वीडियो ऑन डिमांड (SVoD) सेवाओं का सबसे पर्यायवाची है, जो फिल्म और टेलीविजन सामग्री तक पहुंच प्रदान करता है (मौजूदा शो और फिल्मों सहित, जिनके लिए सामग्री स्वामी से अधिकार प्राप्त किए गए हैं, साथ ही मूल सामग्री विशेष रूप से सेवा)।<ref name="auto"/>
ओटीटी में "स्कीनी" टेलीविजन सेवाओं की एक लहर भी शामिल है जो एक पारंपरिक उपग्रह या केबल टीवी प्रदाता के समान रैखिक विशेषता चैनलों की लाइव स्ट्रीम तक पहुंच प्रदान करती है, लेकिन स्वामित्व वाले उपकरणों के साथ एक बंद, निजी नेटवर्क के बजाय सार्वजनिक [[अंतरजाल|इंटरनेट]] पर स्ट्रीम की जाती है। [[सेट-टॉप बॉक्स]] के रूप में।<ref>{{Cite web|url=https://pluto.tv/|title=Pluto TV - It's Free TV|website=Pluto TV|access-date=2022-10-03}}</ref>
ओवर-द-टॉप सेवाओं को आमतौर पर [[व्यक्तिगत संगणक|व्यक्तिगत कंप्यूटरों]] पर [[मोबाइल अनुप्रयोग|वेबसाइटों]] के साथ-साथ मोबाइल उपकरणों (जैसे [[स्मार्टफ़ोन|स्मार्टफोन]] और [[टैबलेट कम्प्यूटर|टैबलेट]] ), डिजिटल मीडिया प्लेयर ( वीडियो गेम कंसोल सहित), या एकीकृत स्मार्ट टीवी प्लेटफॉर्म वाले टीवी के माध्यम से एक्सेस किया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://pluto.tv/|title=Pluto TV - It's Free TV|website=Pluto TV|access-date=2022-10-03}}</ref>
== परिभाषाएं ==
2011 में, कनाडा के रेडियो-टेलीविजन और दूरसंचार आयोग (CRTC), कनाडा के दूरसंचार नियामक ने कहा कि यह "मानता है कि किसी सुविधा या नेटवर्क से स्वतंत्र प्रोग्रामिंग तक इंटरनेट पहुंच इसकी डिलीवरी के लिए समर्पित है (उदाहरण के लिए, केबल या उपग्रह) है जिसे 'ओवर-द-टॉप' सेवाओं की संज्ञा दी गई है, उसकी परिभाषित विशेषता"।<ref>{{Cite web|url=http://www.crtc.gc.ca/eng/publications/reports/rp1110.htm#ftn2|title=Results of the fact-finding exercise on the over-the-top programming services|last=(CRTC)|first=Government of Canada, Canadian Radio-television and Telecommunications Commission|date=3 October 2011|website=www.crtc.gc.ca|archive-url=https://web.archive.org/web/20170603162457/http://www.crtc.gc.ca/eng/publications/reports/rp1110.htm#ftn2#ftn2|archive-date=2017-06-03|access-date=30 May 2017}}</ref>
केबल और [[इंटरनेट प्रोटोकॉल टेलीविजन|आईपीटीवी]] द्वारा पेश किए गए वीडियो ऑन डिमांड वीडियो-डिलीवरी सिस्टम के विपरीत, जो कसकर प्रबंधित नेटवर्क हैं जहां चैनलों को तुरंत बदला जा सकता है, कुछ ओटीटी सेवाओं जैसे आईट्यून्स के लिए आवश्यक है कि वीडियो पहले डाउनलोड किया जाए और फिर चलाया जाए, <ref name="tnroVSE">{{Cite book|title=Introduction to Video Search Engines|last=Gibbon, David C., and Liu, Zhu|publisher=Federal Communications Commission (FCC)|year=2008|location=Washington, DC|page=251|bibcode=2008ivse.book.....G}}</ref> जबकि अन्य [[नेटफ्लिक्स]], [[हुलू|हुलु]], पीकॉक, डिज्नी+, एचबीओ मैक्स, डिस्कवरी+, पैरामाउंट+, और [[प्राइम वीडियो|अमेज़ॅन प्राइम वीडियो]] जैसे ओटीटी प्लेयर मूवी डाउनलोड की पेशकश करते हैं जो डाउनलोड पूरा होने ( [[स्ट्रीमिंग माध्यम|स्ट्रीमिंग]] ) से पहले खेलना शुरू कर देते हैं। <ref>{{Cite web|url=http://disruptionmatters.com/2008/10/13/will-internet-tv-kill-iptv/|title=Will Internet TV Kill IPTV?|last=Cansado|first=Jose Miguel|date=13 October 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20170606123042/http://disruptionmatters.com/2008/10/13/will-internet-tv-kill-iptv/|archive-date=2017-06-06|access-date=30 May 2017}}</ref>
यूनाइटेड स्टेट्स फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) OTT सेवाओं को दो समूहों में वर्गीकृत करता है: मल्टीचैनल वीडियो प्रोग्रामिंग डिस्ट्रीब्यूटर्स (MVPDs); और ऑनलाइन वीडियो वितरक (ओवीडी)। <ref name="FCC17th2016">{{Cite report|date=6 May 2016|title=Annual Assessment of the Status of Competition in the Market for the Delivery of Video Programming [Seventeenth Report; MB Docket No. 15-158; DA 16-510]|location=Washington, DC|url=https://apps.fcc.gov/edocs_public/attachmatch/DA-16-510A1_Rcd.pdf|access-date=26 December 2016|accessdate=2016-10-26}} {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161026075525/https://apps.fcc.gov/edocs_public/attachmatch/DA-16-510A1_Rcd.pdf |date=26 अक्तूबर 2016 }}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.broadcastingcable.com/news/washington/fcc-officially-launches-ovd-definition-nprm/136544|title=FCC Officially Launches OVD Definition NPRM|date=19 December 2014|website=Broadcasting & Cable|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20170819093215/http://www.broadcastingcable.com/news/washington/fcc-officially-launches-ovd-definition-nprm/136544|archive-date=2017-08-19|access-date=2018-03-22}}</ref>
[[हुलू]] और यूट्यूब टीवी जैसी विभिन्न सेवाएं शामिल हैं।
FCC ने एक OVD को इस प्रकार परिभाषित किया: <ref name="FCC17th2016"/>
=== टीवी में "ओवर द टॉप" का क्या मतलब होता है? ===
ओवर-द-टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवा (जिसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के रूप में भी जाना जाता है) इंटरनेट के माध्यम से दर्शकों को सीधे पेश की जाने वाली एक मीडिया सेवा है। ओटीटी केबल, प्रसारण और उपग्रह टेलीविजन प्लेटफार्मों को दरकिनार कर देता है - वह मीडिया जिसके माध्यम से कंपनियां पारंपरिक रूप से ऐसी सामग्री के नियंत्रक या वितरक के रूप में काम करती हैं।
== पृष्ठभूमि ==
[[प्रसारण]] में, ''ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सामग्री'' ऑडियो, वीडियो और अन्य मीडिया सामग्री है जो सामग्री के नियंत्रण या वितरण में मल्टी-सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ) की भागीदारी के बिना इंटरनेट पर वितरित की जाती है। इंटरनेट प्रदाता [[अंतरजाल नियमावली|इंटरनेट प्रोटोकॉल]] (आईपी) पैकेटों की सामग्री से अवगत हो सकता है, और अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए उनके पारगमन को अवरुद्ध या प्रतिबंधित करने में सक्षम हो सकता है (जब तक कि इंटरनेट प्रदाता एक अधिकार क्षेत्र के भीतर काम नहीं करता है जिसके लिए " [[नेट तटस्थता|शुद्ध तटस्थता]] " की आवश्यकता होती है), लेकिन है देखने की क्षमता, कॉपीराइट, और/या सामग्री के अन्य पुनर्वितरण के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। यह मॉडल [[अन्तर्जाल सेवा प्रदाता|इंटरनेट सेवा प्रदाता]] (आईएसपी) से वीडियो या ऑडियो सामग्री की खरीद या किराए पर लेने के विपरीत है, जैसे पे टेलीविजन, वीडियो ऑन डिमांड और इंटरनेट प्रोटोकॉल टेलीविजन (आईपीटीवी)। <ref>IPTV is the delivery of television content using signals based on the logical Internet protocol (IP), rather than through traditional terrestrial, satellite signal, and cable television formats.</ref> ओटीटी एक तीसरे पक्ष की सामग्री को संदर्भित करता है जो एक एंड-यूज़र को डिलीवर किया जाता है, जिसमें आईएसपी केवल आईपी पैकेटों को ट्रांसपोर्ट करता है। <ref>{{Cite web|url=http://bits.blogs.nytimes.com/2009/03/03/jeff-bewkes-goes-over-the-top/|title=Time Warner Goes Over the Top|last=Hansell|first=Saul|date=3 March 2009|website=The New York Times|archive-url=https://web.archive.org/web/20110710232313/http://bits.blogs.nytimes.com/2009/03/03/jeff-bewkes-goes-over-the-top/|archive-date=2011-07-10|access-date=21 March 2016}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.ecnmag.com/News/2009/11/Over-the-Top-Video-and-Content-Delivery-Networks-Will-Transform-Video-On-Demand-Provisioning/|title=Over-the-Top Video and Content Delivery Networks Will Transform Video-On-Demand Provisioning|date=19 November 2009|website=Electronic Component News|archive-url=https://web.archive.org/web/20120305082324/http://www.ecnmag.com/News/2009/11/Over-the-Top-Video-and-Content-Delivery-Networks-Will-Transform-Video-On-Demand-Provisioning/|archive-date=5 March 2012}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.businessinsider.com/what-will-it-take-to-make-over-the-top-video-successful-2010-12|title=Why 2011 Is Being Called The Year Of "The Cable Cut"|date=30 December 2010|website=Business Insider|archive-url=https://web.archive.org/web/20160403042433/http://www.businessinsider.com/what-will-it-take-to-make-over-the-top-video-successful-2010-12|archive-date=2016-04-03|access-date=21 March 2016}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.businessinsider.com/who-is-playing-the-ott-game-and-how-to-win-it-2010-12|title=Who Is Playing The OTT Game And How To Win It|date=30 December 2010|website=Business Insider|archive-url=https://web.archive.org/web/20160403052256/http://www.businessinsider.com/who-is-playing-the-ott-game-and-how-to-win-it-2010-12|archive-date=2016-04-03|access-date=21 March 2016}}</ref>
== सामग्री के प्रकार ==
{{Expandsect|a thorough, sourced description of the types of OTT content current transmitted|date=December 2016}}
'''ओटीटी टेलीविजन''', जिसे आमतौर पर [[इंटरनेट टीवी|ऑनलाइन टेलीविजन, इंटरनेट टेलीविजन या स्ट्रीमिंग टेलीविजन]] कहा जाता है, सबसे लोकप्रिय ओटीटी सामग्री बनी हुई है। स्थलीय प्रसारण या उपग्रह से टेलीविजन संकेत प्राप्त करने के विपरीत, यह संकेत इंटरनेट पर या सेल फोन नेटवर्क के माध्यम से प्राप्त होता है। वीडियो डिस्ट्रीब्यूटर एक ऐप, एक अलग ओटीटी डोंगल या फोन, पीसी या स्मार्ट टेलीविजन सेट से जुड़े बॉक्स के जरिए एक्सेस को नियंत्रित करता है। 2017 के मध्य तक, 58 प्रतिशत अमेरिकी परिवार किसी दिए गए महीने में एक का उपयोग करेंगे, और ओटीटी चैनलों से विज्ञापन राजस्व वेब ब्राउज़र प्लग-इन से अधिक हो जाएगा। <ref>Andrew Orlowski; [https://www.theregister.co.uk/2017/08/08/desktop_vs_ott_video/ Can the last person watching desktop video please turn out the light?] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170808154651/https://www.theregister.co.uk/2017/08/08/desktop_vs_ott_video/|date=2017-08-08}}, The Register, 8 Aug 2017 (retrieved 8 Aug 2017)</ref>
[[द वॉल्ट डिज़्नी कंपनी|डिज्नी के]] भारतीय वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म [[डिज़्नी+ हॉटस्टार|हॉटस्टार]] द्वारा एक साथ ओटीटी इवेंट देखने वाले उपयोगकर्ताओं का रिकॉर्ड 18.6 मिलियन पर सेट किया गया था।<ref>Manish Singh; [https://techcrunch.com/2019/05/12/hotstar-disneys-indian-streaming-service-sets-new-global-record-for-live-viewership/Hotstar, Disney’s Indian streaming service, sets new global record for live viewership] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20220705234030/https://techcrunch.com/2019/05/12/hotstar-disneys-indian-streaming-service-sets-new-global-record-for-live-viewership/ |date=5 जुलाई 2022 }}, Techcrunch, 12 May 2019 (retrieved 12 May 2019).</ref>
'''ओटीटी मैसेजिंग को''' मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटर द्वारा प्रदान की जाने वाली [[पाठ संदेश|टेक्स्ट मैसेजिंग]] सेवाओं के विकल्प के रूप में [[त्वरित संदेश प्रेषण (इंस्टेंट मेसेजिंग)|इंस्टेंट मैसेजिंग]] सेवाओं या तृतीय पक्षों द्वारा प्रदान की जाने वाली [[ऑनलाइन चैट]] के रूप में परिभाषित किया गया है।<ref>{{Cite web|url=http://www.businessinsider.com/chart-of-the-day-mobile-messaging-2013-5|title=Chart of the Day: Mobile Messaging|date=17 May 2013|website=Business Insider|archive-url=https://web.archive.org/web/20140222070154/http://www.businessinsider.com/chart-of-the-day-mobile-messaging-2013-5|archive-date=2014-02-22|access-date=10 February 2014}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://mobilemarketingmagazine.com/over-the-top-messaging-overtakes-sms|title=Over-The-Top Messaging Apps Overtake SMS Messaging|last=Maytom|first=Tim|date=4 August 2014|website=Mobile Marketing Magazine|archive-url=https://web.archive.org/web/20150907085209/http://mobilemarketingmagazine.com/over-the-top-messaging-overtakes-sms|archive-date=2015-09-07|access-date=28 August 2015}}</ref> एक उदाहरण [[फेसबुक]] के स्वामित्व वाला मोबाइल एप्लिकेशन [[वाट्सऐप|व्हाट्सएप]] है, जो इंटरनेट से जुड़े स्मार्टफोन पर टेक्स्ट मैसेजिंग को बदलने का काम करता है। <ref name="wsj20140220">{{Cite news|title=Facebook's $18 Billion Deal Sets High Bar|last=Albergotti|first=Reed|date=20 February 2014|work=[[The Wall Street Journal]]|last2=MacMillan|first2=Douglas|last3=Rusli|first3=Evelyn}}</ref> <ref name="Parmy Olsen">{{Cite web|url=http://fortune.com/2015/09/04/whatsapp-900-million-users/|title=WhatsApp hits 900 million users|last=Rao|first=Leena|date=4 September 2015|website=Fortune|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128054624/http://fortune.com/2015/09/04/whatsapp-900-million-users/|archive-date=2016-01-28|access-date=27 January 2016}}</ref> ओटीटी मैसेजिंग के अन्य प्रदाताओं में [[वाइबर]], वा चैट, आई मैसेज, [[स्काइप]], [[टेलीग्राम]] और अब निष्क्रिय [[गूगल अलो]] शामिल हैं।<ref>{{Cite web|url=http://www.tomsguide.com/us/pictures-story/654-best-messaging-apps.html|title=Apps Roundup: Best Messaging Apps|date=4 Oct 2016|website=Tom's Guide|archive-url=https://web.archive.org/web/20170214102110/http://www.tomsguide.com/us/pictures-story/654-best-messaging-apps.html|archive-date=2017-02-14|access-date=2017-02-14}}</ref>
'''ओटीटी वॉयस कॉलिंग''', जिसे आमतौर पर [[वॉइस ओवर इण्टरनेट प्रोटोकॉल|वीओआईपी]] कहा जाता है, क्षमताएं, उदाहरण के लिए, जैसा कि फेसटाइम, [[स्काइप]], [[वाइबर]], [[वाट्सऐप|व्हाट्सएप]], वीचैट और जूम द्वारा प्रदान की जाती हैं, मोबाइल फोन ऑपरेटरों द्वारा दी जाने वाली मौजूदा ऑपरेटर नियंत्रित सेवाओं को बदलने और कभी-कभी बढ़ाने के लिए खुले इंटरनेट संचार प्रोटोकॉल का उपयोग करती हैं।<ref name="Parmy Olsen"/>
== पहुंच के तरीके ==
उपभोक्ता इंटरनेट से जुड़े उपकरणों जैसे [[स्मार्टफ़ोन|फोन]] ( [[एंड्रॉइड (प्रचालन तंत्र)|एंड्रॉइड]] और [[आईओएस]] मोबाइल उपकरणों सहित), स्मार्ट टीवी (जैसे गूगल टीवी, रोकू टीवी और [[ऍलजी इलैक्ट्रॉनिक्स|एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स]] 'चैनल प्लस),<ref>{{Cite journal|last=Roettgers, Janko|date=8 January 2016|title=LG's New TVs Mix Streaming Channels from Buzzfeed, GQ & Vogue with Traditional Networks|url=https://variety.com/2016/digital/news/lgs-webos-internet-tv-channels-1201675137/|journal=Variety|archive-url=https://web.archive.org/web/20170203122444/http://variety.com/2016/digital/news/lgs-webos-internet-tv-channels-1201675137/|archive-date=2017-02-03|access-date=26 December 2016}}</ref> [[सेट-टॉप बॉक्स]] (जैसे) के माध्यम से ओटीटी सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। जैसे [[एप्पल टी॰वी॰]], एनवीडिया शील्ड, फायर टीवी, और रोकू ), गेमिंग कंसोल (जैसे [[प्लेस्टेशन ४]], डब्ल्यूआईआई यू, [[एक्सबॉक्स वन]], प्ले स्टेशन 5, और एक्सबॉक्स सीरीज़ एक्स / एस ), [[टैबलेट कम्प्यूटर|टैबलेट]] और डेस्कटॉप और लैपटॉप कंप्यूटर। 2019 तक, [[एंड्रॉइड (प्रचालन तंत्र)|एंड्रॉइड]] और [[आईओएस]] उपयोगकर्ता कुल ओटीटी सामग्री स्ट्रीमिंग दर्शकों का 45% से अधिक बनाते हैं, जबकि 39% उपयोगकर्ता ओटीटी सामग्री का उपयोग करने के लिए वेब का उपयोग करते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.uscreen.tv/blog/ott-content-trends/|title=OTT Content: What We Learned From 1.1 Million Subscribers|last=Johnson|first=James|date=2019-01-24|website=Uscreen|language=en-US|access-date=2019-11-01}}</ref>
2019 में, डिज्नी एंटरटेनमेंट के वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म हॉटस्टार द्वारा भारत में एक ओटीटी इवेंट देखने वाले एक साथ उपयोगकर्ताओं का रिकॉर्ड 18.6 मिलियन पर स्थापित किया गया था।<ref>{{Cite journal|last=Singh|first=Mahima|last2=Kumar|first2=Akshaya|date=2023-02-21|title=A Critical Political Economy Perspective on Indian Television: STAR, Hotstar, and Live Sports Streaming|url=https://doi.org/10.31269/triplec.v21i1.1395|journal=tripleC: Communication, Capitalism & Critique. Open Access Journal for a Global Sustainable Information Society|volume=21|issue=1|pages=18–32|doi=10.31269/triplec.v21i1.1395|issn=1726-670X}}</ref> 2023 में डिज्नी + हॉटस्टार पर आईसीसी क्रिकेट विश्व कप फाइनल के दौरान 59 मिलियन समवर्ती दर्शकों के साथ रिकॉर्ड फिर से टूट गया।<ref>{{Cite journal|date=2024-01-05|title=Medicines update: November 2023|url=https://doi.org/10.1002/vetr.3819|journal=Veterinary Record|volume=194|issue=1|pages=18–19|doi=10.1002/vetr.3819|issn=0042-4900}}</ref>
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:इंटरनेट टेलीवीजन]]
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अकील होसिन
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}}
'''अकील जेरोम होसिन''' (जन्म 25 अप्रैल 1993) एक ट्रिनिडाडियन क्रिकेटर है, जो [[वेस्टइंडीज]] के घरेलू क्रिकेट में [[त्रिनिदाद और टोबैगो]] के लिए खेले हैं, साथ ही कैरिबियन प्रीमियर लीग (सीपीएल) में ट्रिनबागो नाइट राइडर्स का प्रतिनिधित्व करते हैं।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी]]
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नाम सुधारा
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}}
'''अक़ील जेरोम हुसैन''' (जन्म: 25 अप्रैल 1993) एक ट्रिनिडाडियन क्रिकेटर है, जो [[वेस्टइंडीज]] के घरेलू क्रिकेट में [[त्रिनिदाद और टोबैगो]] के लिए खेले हैं, साथ ही कैरिबियन प्रीमियर लीग (सीपीएल) में ट्रिनबागो नाइट राइडर्स का प्रतिनिधित्व करते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://hindi.newsbytesapp.com/news/sports/ipl-2026-akeal-hosein-takes-4-wickets-against-mi-check-out-his-stats/story|title=IPL 2026: अकील हुसैन ने MI के खिलाफ लिए 4 विकेट, जानिए उनके आंकड़े|website=NewsBytes|language=hi|access-date=2026-04-24}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://hindi.cricketnmore.com/cricket-news/after-sanju-samson-century-akeal-hosein-shines-with-spin-as-csk-thrash-mi-by-103-runs-194143|title=IPL 2026: संजू सैमसन का शतक और अकील हुसैन की फिरकी का जादू, CSK ने MI को 103 रन से दी करारी शिकस्त|website=Cricketnmore|language=hi|access-date=2026-04-24}}</ref>
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी]]
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कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल
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text/x-wiki
'''कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल'''
'''KNMH''' [[प्रयागराज]] [[उत्तर प्रदेश]] भारत में स्थित है यह अस्पताल लाभ के लिए नहीं है।<ref>{{cite web |title=Kamala Nehru Memorial Hospital :: Home |url=http://www.knmhospital.org/Home.aspx |website=www.knmhospital.org |accessdate=8 फरवरी 2021 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
अस्पताल की शुरुआत 1931 में अपने पैतृक घर स्वराज भवन में श्रीमती [[कमला नेहरू]] द्वारा कि गई थी। इसकी स्थापना एक औषधालय के रूप में हुई थी। सन 1939 में गांधीजी ने कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल की आधारशिला रखी। KNMH देश का एकमात्र अस्पताल है जिसके लिए उन्होंने चंदा इकट्ठा किया था। [[महात्मा गांधी]] ने 28 फरवरी 1941 को स्वर्गीय श्रीमती कमला नेहरू की याद में इस अस्पताल का उद्घाटन किया था। उनकी मृत्यु 28 फरवरी 1936 में हुई थी।<ref>{{cite web |title=KNMH : The Legacy |url=http://www.knmhospital.org/legacy.aspx |website=www.knmhospital.org |accessdate=8 फरवरी 2021 |archive-date=23 दिसंबर 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20181223170308/http://www.knmhospital.org/legacy.aspx |url-status=dead }}</ref> 1994 से अस्पताल का ऑन्कोलॉजी विभाग एक क्षेत्रीय कैंसर केंद्र है जिसे भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है।
==इतिहास==
कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल ने अपनी जड़ों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पता लगाया, जब वर्ष 1931 में कमला नेहरू ने अपने पैतृक घर में स्वराज भवन में कुछ कमरे में बदलाव किया। इस मिनी अस्पताल में आंतरिक और बाहरी दोनों सुविधाएं हैं जो देशभक्त डॉक्टरों और अन्य पैरामेड स्टाफ द्वारा बनाई गई हैं। हालांकि स्वास्थ्य में विफलता लेकिन आत्माओं में अजेय श्रीमती कमला नेहरू ने इस संस्था को अपना समय, श्रम और सभी दया से ऊपर 1936 में अपनी असामयिक मृत्यु तक दिया। उनकी मृत्यु के बाद, महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं जैसे पं. [[मदन मोहन मालवीय]], पं. [[जवाहर लाल नेहरू]], डॉ. बी. सी. रॉय, [[उमा शंकर दीक्षित]] और अन्य ने यह देखने के लिए खुद को लिया कि जिस काम के लिए वह खुद को जिम्मेदार ठहराते थे, वह उनकी मृत्यु के बाद भी चल रहा था। KNMH को स्वर्गीय कमला नेहरू की याद में एक राष्ट्रीय श्रद्धांजलि के रूप में बनाया गया था, जो साथी मानवों के लिए निःस्वार्थ सेवा, त्याग और करुणा का जीवंत स्मारक थे। शुरुआत में यह केवल 40 बेड के प्रसूति और स्त्री रोग के साथ एक नवजात इकाई थी, जिसमें से 28 मुफ्त थे। अस्पताल के पहले चिकित्सा अधीक्षक डॉ. श्रीमती सत्यप्रिया मजूमदार थीं। आज इसकी बिस्तर क्षमता 350 है, जिसमें से 175 मुफ्त/अनुदानित हैं।
== KNMH में प्रयास ==
KNMH कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ साझेदारी कर रहा है ताकि स्थानीय आबादी की मदद की जा सके और उनके स्वास्थ्य के मानक को बढ़ाया जा सके। शहरी स्वास्थ्य पहल गेट्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित एक कार्यक्रम ने उत्तर प्रदेश में केएनएमएच को भागीदार के रूप में पहचान दी। समय-समय पर KNMH विभिन्न आउटरीच गतिविधियों को अंजाम देता है। Clean Green Environment की पहल के साथ, KNMH ने बिजली के उपयोग को कम करने और हरित [[पर्यावरण]] की दिशा में योगदान देने के उद्देश्य से परिसर के भीतर सोलर लाइटें लगाई हैं। KNMH के CEO प्रोफेसर डॉक्टर मधु चंद्र और कई अन्य प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा एक कागज सह-लेखक लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुए थे जो भारत में सस्ती और न्यायसंगत कैंसर की देखभाल करने की चुनौतियों पर चर्चा की गई थी।
=== KNMH ग्रामीण अस्पताल ===
कमला नेहरू मेमोरियल रूरल हॉस्पिटल KNMH सोसाइटी का एक बेस हॉस्पिटल है, जिसकी शुरुआत 1987 में तत्कालीन प्रधान मंत्री और KNMH ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री राजीव गांधी द्वारा ग्रामीण इलाहाबाद में यमुना नदी के पार, 100 से अधिक गाँवों में सेवा करने के लिए की गई थी।
=== कर्मचारी कल्याण ===
KNMH के पास इलाहाबाद के तेलियारगंज क्षेत्र में 66 फ्लैट हैं जो अस्पताल के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को आवास प्रदान करते हैं। ये फ्लैट अस्पताल प्रशासन ने इलाहाबाद विकास प्राधिकरण (ADA) से हासिल किए थे। अस्पताल के कर्मचारियों के बच्चों के लिए, KNMH प्रशासन योग्यता आधारित छात्रवृत्ति प्रदान करता है। अस्पताल के कर्मचारी भी KNMH पर मुफ्त/रियायती चिकित्सा देखभाल का लाभ उठाते हैं।
=== शैक्षणिक और प्रशिक्षण ===
KNMH विभिन्न चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए एक प्रशिक्षण मैदान है और 60 सीटों के सेवन के साथ नर्सिंग और मिडवाइफरी के लिए एक स्कूल चलाता है। नर्सिंग स्कूल में कुल छात्र संख्या का 92% से अधिक लड़कियों की भागीदारी है। KNMH औसतन हर साल रेडियोथेरेपी, प्रसूति और स्त्री रोग, नर्सिंग और मिडवाइफरी, OT और CT टेक्नोलॉजी और मेडिकल फिजिक्स के क्षेत्र में 130 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करता है।<ref>{{cite web |title=KNMH : Academic |url=http://www.knmhospital.org/Academic.aspx |website=www.knmhospital.org |accessdate=8 फरवरी 2021 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
=== प्रमाणन, भावना, और मान्यताएँ ===
RIMCH और RCC के रूप में पहचाने जाने के अलावा, KNMH के पास विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों से विभिन्न प्रमाणपत्र, नामावली और मान्यताएं हैं।<ref>{{cite web |title=KNMH : Empanelments |url=http://www.knmhospital.org/Empanelments.aspx |website=www.knmhospital.org |accessdate=8 फरवरी 2021 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:उत्तर प्रदेश]]
[[श्रेणी:अस्पताल]]
[[श्रेणी:प्रयागराज]]
[[श्रेणी:भारत के लोग]]
[[श्रेणी:इतिहास]]
[[श्रेणी:साहित्य]]
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कर्टनी स्टोडेन
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति
|name=Courtney Stodden|image=Courtney Stodden 2013.jpg
|caption=Stodden in 2013
|other_names=Ember<ref>{{Cite magazine |last=Garis, Mary Grace |date=May 8, 2018 |title=Off the Record, I Am so Ready for Courtney Stodden's Debut Album |url=https://www.intouchweekly.com/posts/courtney-stodden-ember-159626/ |magazine=[[In Touch Weekly]] |access-date=15 मई 2021 |archive-date=27 अप्रैल 2025 |archive-url=https://web.archive.org/web/20250427010024/https://www.intouchweekly.com/posts/courtney-stodden-ember-159626/ |url-status=dead }}</ref>
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}}
''' कर्टनी एलेक्सिस स्टोडेन ''' (जन्म 29 अगस्त, 1994) एक अमेरिकी मीडिया व्यक्तित्व, मॉडल, गायक और गीतकार हैं। अपने गृह राज्य वाशिंगटन में सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने और मूल संगीत जारी करने के बाद, 16 वर्षीय स्टोडेन ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया जब उन्होंने 2011 में 51 वर्षीय अभिनेता डग हचिसन से विवाह किया। स्टोडेन और उनकी शादी के आसपास के विवाद और मीडिया का ध्यान उन्हें रियलिटी टेलीविज़न शो कपल्स थेरेपी (2012) और सेलिब्रिटी बिग ब्रदर (2013) में दिखाई दिया, और बाद में वे रियलिटी एक्स-वाइव्स (2015) शो में दिखाई दिए। द मदर/डॉटर एक्सपेरिमेंट (2016), सेलेब्स गो डेटिंग (2017), और कोर्टनी (2020)।
== फिल्मोग्राफी ==
=== टेलीविजन ===
==== स्वयं के रूप में ====
{| class="wikitable sortable"
!साल
! शीर्षक
! class="unsortable" | टिप्पणियाँ
|-
| rowspan="3" | 2012
| ''युगल चिकित्सा''
| 12 एपिसोड
|-
| ''जीवन परिवर्तक''
| 1 एपिसोड
|-
| ''कोर्टनी स्टोडेन के साथ डोनी क्ले शो Show''
|
|-
| rowspan="2" | 2013
| ''तोश.0''
| एपिसोड: "डीजे दशमलव बिंदु"
|-
| ''सेलिब्रिटी बिग ब्रदर''
| 24 एपिसोड
|-
| 2013–2015
| ''बिग ब्रदर बिट ऑन साइड''
| 21 एपिसोड
|-
| rowspan="2" | 2014
| ''पॉप, फैशन और खेल''
| एपिसोड: "द ओशन्स आर डाइंग (हॉलीवुड में प्रीमियर अवेयरनेस इवेंट)"
|-
| ''हॉलीवुड हिलबिलीज''
| प्रकरण: "माइकल एक संगीत वीडियो बनाता है"
|-
| 2015
| ''वास्तविकता पूर्व पत्नियां''
|
|-
| rowspan="2" | २०१६
| ''माँ/बेटी प्रयोग: सेलिब्रिटी संस्करण''
|
|-
| ''मिलियन डॉलर मैचमेकर''
|
|-
| rowspan="3" | 2017
| ''सेलेब्स गो डेटिंग''
| सीरीज 3
|-
| ''डॉ. फिलो''
| 1 एपिसोड
|-
| ''बेवर्ली हिल्स का गाउन और आउट''
| 2 एपिसोड
|-
| 2019
| ''कर्टनी''
| 11 एपिसोड, रोक्को लियो गैग्लियोटी और कर्टनी स्टोडेन द्वारा विशेष रूप से निर्मित
|}
=== फ़िल्म ===
{| class="wikitable sortable"
!साल
! शीर्षक
! भूमिका
! class="unsortable" | टिप्पणियाँ
|-
| २०१६
| ''प्यार मे डूबा हुआ''
| श्रीमती। डैवेन्तपोर्ट
| फीचर फिल्म डेब्यू
|-
| 2019
| ''वेरोटिका''
| सुंदर गोरा
| "चेंज ऑफ़ फेस" सेगमेंट
|-
|}
=== संगीत वीडियो ===
* "कार कैंडी" (2010) <ref name="ABCNews">Marikar, Sheila (June 21, 2011). </ref>
* "डोंट पुट इट ऑन मी" (2010)
* "रियलिटी" (2012)
* "मिस्टलेटो बिकिनी" (2016) <ref name="cinemablend1">{{Cite web|url=http://www.cinemablend.com/celebrity/1603860/courtney-stodden-made-a-really-dirty-christmas-music-video-and-it-is-all-kinds-of-nsfw|title=Courtney Stodden Made A Really Dirty Christmas Music Video And It Is All Kinds Of NSFW|last=Rawden|first=Mack|date=December 23, 2016|publisher=Cinemablend.com|access-date=May 4, 2017|archive-date=26 दिसंबर 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20161226130913/http://www.cinemablend.com/celebrity/1603860/courtney-stodden-made-a-really-dirty-christmas-music-video-and-it-is-all-kinds-of-nsfw|url-status=dead}}</ref>
* "ग्लास ऑफ़ वाइन" (2017) ( ''हमें साप्ताहिक'' अनन्य)
* "आपके लिए" (2018) (एम्बर के रूप में श्रेय) <ref>{{Cite web|url=https://www.youtube.com/watch?v=Kvex0HQPIc4|title=Ember – For You [Official Music Video]|last=Stodden, Courtney|date=June 7, 2018|publisher=[[YouTube]]}}</ref>
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:1994 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:Articles with hCards]]
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कम्बोडियाई नरसंहार
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1333222
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2026-04-23T21:07:20Z
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{{Infobox civilian attack|title=कम्बोडियाई नरसंहार|partof=[[शीत युद्ध]]<br/>[[कंबोडिया]] में [[ख्मेर रूज]] का शासन|image=Skulls at Tuol Sleng.JPG|caption=तुओल स्लेंग नरसंहार इतिहासालय, नोम पैन्ह में कम्बोडियाई नरसंहार मे मारे गए पीड़ितों की खोपड़ियाँ|image_size=300px|motive=ख्मेर राष्ट्रवाद<br/>चरम राष्ट्रवाद<br/>कृषि समाजवाद<br/>राष्ट्रीय नास्तिकता<br/>बुद्धिजीवद्रोह<br/>नस्लभेद<br/>दक्षिणपंथ<br/>वर्ष शून्य|type=नरसंहार<br/>वर्गसंहार<br/>राजनैतिकसंहार<br/>जातीय संहार<br/>नयायेतर हत्या<br/>तड़पाना<br/>भुखमरी<br/>बेगार<br/>मानव परीक्षण<br/>अवगाह करना<br/>वामपंथी आतंक|location=लोकतांत्रिक कम्पुचिया|date=१७ अप्रैल १९७५ - ७ जनवरी १९७९ (३ वर्ष, ८ माह और २० दिन)|perps=[[ख्मेर रूज]]|fatalities=१५ से २० लाख|target=पूर्व कम्बोडियाई [[सैनिक]]<br/>[[राजनेता]]<br/>[[उद्योगपति]]<br/>[[पत्रकार]]<br/>[[विद्यार्थी]]<br/>[[चिकित्सक]]<br/>[[वकील]]<br/>[[बौद्ध]]<br/>[[ईसाई]]<br/>[[मुसलमान]]<br/>[[चाम लोग]]<br/>[[चीनी]]<br/>[[थाई]]<br/>वियतनामी}}
'''कम्बोडियाई नरसंहार''' (''{{Lang-km|របបប្រល័យពូជសាសន៍នៅកម្ពុជា}}'') कंबोडियाई लोगों पर हुआ उत्पीड़न और नरसंहार था। इसए [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी]] के महासचिव [[पोल पॉट]] के नेतृत्व में [[खमेर रूज|ख्मेर रूज]] द्वारा किया गया, जिन्होंने [[कम्बोडिया|कंबोडिया]] को पूरी तरह से आत्मनिर्भर कृषि समाजवादी समाज की ओर धकेला। इसके कारण १९७५ से १९७९ तक १५ से २० लाख लोगों की मृत्यु हुई, जो कंबोडिया की १९७५ की आबादी का लगभग एक चौथाई था (७८ लाख के आसपास)।<ref name="Heuveline, Patrick 2001">{{Cite book|title=Forced Migration and Mortality|url=https://archive.org/details/forcedmigrationm0000unse_t3v0|last=Heuveline|first=Patrick|publisher=[[National Academies Press]]|year=2001|isbn=978-0-309-07334-9|pages=[https://archive.org/details/forcedmigrationm0000unse_t3v0/page/102 102]–105|chapter=The Demographic Analysis of Mortality Crises: The Case of Cambodia, 1970–1979|quote=As best as can now be estimated, over two million Cambodians died during the 1970s because of the political events of the decade, the vast majority of them during the mere four years of the 'Khmer Rouge' regime. This number of deaths is even more staggering when related to the size of the Cambodian population, then less than eight million. ... Subsequent reevaluations of the demographic data situated the death toll for the [civil war] in the order of 300,000 or less.}}</ref><ref name="CAS">{{Cite journal|last=Kiernan|first=Ben|author-link=Ben Kiernan|year=2003|title=The Demography of Genocide in Southeast Asia: The Death Tolls in Cambodia, 1975–79, and East Timor, 1975–80|url=https://archive.org/details/sim_critical-asian-studies_2003-12_35_4/page/585|journal=Critical Asian Studies|volume=35|issue=4|pages=585–597|doi=10.1080/1467271032000147041|quote=We may safely conclude, from known pre- and post-genocide population figures and from professional demographic calculations, that the 1975–79 death toll was between 1.671 and 1.871 million people, 21 to 24 percent of Cambodia's 1975 population.|ref=none}}</ref><ref name="Locard"/>
पोल पॉट और ख्मेर रूज का लंबे समय से [[चीनी साम्यवादी दल|चीनी साम्यवादी पार्टी]] और उसके [[अध्यक्ष]] [[माओ से-तुंग]] ने समर्थन किया;{{Efn|See:<ref name=":0">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=mTlMDwAAQBAJ&q=Maha+lout+ploh&pg=PT77|title=Brother Number One: A Political Biography of Pol Pot|last=Chandler|first=David P.|year=2018|publisher=[[Routledge]]|isbn=978-0-429-98161-6}}</ref><ref name=":11">{{Cite web|last=Strangio|first=Sebastian|date=2012-05-16|title=China's Aid Emboldens Cambodia {{!}} YaleGlobal Online|url=https://yaleglobal.yale.edu/content/chinas-aid-emboldens-cambodia|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20201217133253/https://yaleglobal.yale.edu/content/chinas-aid-emboldens-cambodia|archive-date=2020-12-17|access-date=2019-11-26|website=Yale University}}</ref><ref name=":32">{{Cite web|url=https://www.wilsoncenter.org/publication/the-chinese-communist-partys-relationship-the-khmer-rouge-the-1970s-ideological-victory|title=The Chinese Communist Party's Relationship with the Khmer Rouge in the 1970s: An Ideological Victory and a Strategic Failure|date=2018-12-13|website=Wilson Center|access-date=2019-11-26}}</ref><ref name=":1">{{Cite journal|last=Hood|first=Steven J.|year=1990|title=Beijing's Cambodia Gamble and the Prospects for Peace in Indochina: The Khmer Rouge or Sihanouk?|url=https://archive.org/details/sim_asian-survey_1990-10_30_10/page/977|journal=Asian Survey|volume=30|issue=10|pages=977–991|doi=10.2307/2644784|issn=0004-4687|jstor=2644784}}</ref><ref name=":2">{{Cite web|url=https://www.rfa.org/english/news/special/chinacambodia/relation.html|title=China-Cambodia Relations|publisher=Radio Free Asia|access-date=2019-11-26}}</ref><ref name=":7">{{Cite web|url=https://sinosphere.blogs.nytimes.com/2015/03/30/cambodian-historians-call-for-china-to-confront-its-own-past/|title=China Is Urged to Confront Its Own History|last=Levin|first=Dan|date=2015-03-30|work=The New York Times|access-date=2019-11-26}}</ref>}} अनुमान लगाया गया है कि ख्मेर रूज को प्राप्त होने वाली विदेशी आर्थिक सहायता का कम से कम ९०% [[चीनी जनवादी गणराज्य|चीन]] से आती थी, और अकेले १९७५ में ब्याज मुक्त आर्थिक और सैन्य सहायता में कम से कम एक अरब [[अमेरिकी डॉलर]] [[चीनी जनवादी गणराज्य|चीन]] से आया था।<ref name=":12">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=Mq8sAcvg-AgC&q=ben+kiernan+pol+pot+regime+$1+billion+China+1975|title=The Pol Pot Regime: Race, Power, and Genocide in Cambodia Under the Khmer Rouge, 1975–79|last=Kiernan|first=Ben|date=2008|publisher=Yale University Press|isbn=978-0-300-14299-0}}</ref><ref name=":13">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=54iUDwAAQBAJ&q=By+mid-september+China+was+prepared+to+extend+to+Cambodia+a+total+of+US$1+billion&pg=PA84|title=ASEAN Resistance to Sovereignty Violation: Interests, Balancing and the Role of the Vanguard State|last=Laura|first=Southgate|publisher=Policy Press|year=2019|isbn=978-1-5292-0221-2}}</ref> अप्रैल १९७५ में सत्ता पर कब्जा करने के बाद ख्मेर रूज देश को एक कृषि [[समाजवादी]] [[गणराज्य]] में बदलना चाहता था, जो अति- [[माओवाद]] की नीतियों पर स्थापित और [[सांस्कृतिक क्रांति]] से प्रभावित था। पोल पॉट और अन्य ख्मेर रूज अधिकारियों ने जून १९७५ में [[बीजिंग]] में माओ के साथ मुलाकात की, अनुमोदन और सलाह प्राप्त की। इसके साथ उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने बाद में मदद पेशकश के लिए कंबोडिया का दौरा किया, जिसमें सीसीपी पोलितबुरो स्थायी समिति के सदस्य झांग चुंचाओ जैसे दिग्गज सदस्य शामिल थे। अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ख्मेर रूज ने शहरों को खाली कर दिया और कंबोडियाई लोगों को ग्रामीण इलाकों में श्रम शिविरों में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया, जहाँ सामूहिक निष्पादन, [[बेगार|जबरन श्रम]], शारीरिक शोषण, [[कुपोषण]] और बीमारी बड़े पैमाने पर थी।{{Sfn|Etcheson|2005|p=119}}{{Sfn|Heuveline|1998|pp=49–65}} १९७६ में ख्मेर रूज ने देश का नाम बदलकर ''लोकतांत्रिक कम्पूचिया'' रख दिया।
जब वियतनामी सेना [[कंबोडिया-वियतनाम युद्ध|ने १९७८ में आक्रमण किया]] और ख्मेर रूज शासन को गिरा दिया, तब नरसंहार समाप्त हो सका। जनवरी १९७९ तक ख्मेर रूज की नीतियों के कारण १५ से २० लाख लोग मारे गए थे, जिनमें २,००,०००-३,००,००० चीनी कंबोडियाई, ९०,००० [[मुसलमान]] और २०,००० वियतनामी कंबोडियन शामिल थे।<ref name=":8">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=27W92eiEuY4C&pg=PA69|title=Genocide Since 1945|last=Philip Spencer|year=2012|isbn=978-0-415-60634-9|page=69}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://history.people.com.cn/n/2014/0425/c372327-24944481.html|title=华侨忆红色高棉屠杀:有文化的华人必死|last=Zhang|first=Zhifeng|date=2014-04-25|website=[[People's Daily|Renmin Wang]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20201124074157/http://history.people.com.cn/n/2014/0425/c372327-24944481.html|archive-date=2020-11-24|access-date=2019-11-27}}</ref> २०,००० लोग सुरक्षा जेल-२१ से गुज़रे, जो ख्मेर रूज द्वारा संचालित १९६ जेलों में से एक था,<ref name="Locard"/><ref>{{Cite web|url=http://www.d.dccam.org/Projects/Maps/MappingKillingField.htm|title=Mapping the Killing Fields|website=Documentation Center of Cambodia|archive-url=https://web.archive.org/web/20160326190928/http://www.d.dccam.org/Projects/Maps/MappingKillingField.htm|archive-date=2016-03-26|access-date=2018-06-06|quote=Through interviews and physical exploration, DC-Cam identified 19,733 mass burial pits, 196 prisons that operated during the Democratic Kampuchea (DK) period, and 81 memorials constructed by survivors of the DK regime.}}</ref> और केवल सात वयस्क जीवित बच सके।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=Mq8sAcvg-AgC&q=464|title=The Pol Pot Regime: Race, Power, and Genocide in Cambodia Under the Khmer Rouge, 1975–79|last=Kiernan|first=Ben|publisher=[[Yale University Press]]|year=2014|isbn=978-0-300-14299-0|page=464|quote=Like all but seven of the twenty thousand Tuol Sleng prisoners, she was murdered anyway.|author-link=Ben Kiernan}}</ref> कैदियों को ''मृत्यु मैदानों'' में ले जाया जाता था, जहाँ उन्हें मार डाला गया (उन्हें अक्सर गैंती से मार जाता था ताकि गोलियाँ बचाई जा सकें)<ref>Landsiedel, Peter, [http://p-eworldtour.com/2017/03/27/the-killing-fields/ "The Killing Fields: Genocide in Cambodia"], ‘'P&E World Tour'’, 27 March 2017. Retrieved 17 March 2019</ref> और सामूहिक कब्रों में दफनाया जाता। बच्चों का [[अपहरण]] और उन्हें अनुशासित किया जाना साधारण बात थी, और बहुतों को अत्याचार करने के लिए राजी किया गया या मजबूर किया गया।<ref name=":10">{{Cite web|url=http://www.rfa.org/english/features/blogs/cambodiablog/blog6_cambodia_southerland-20060720.html|title=Cambodia Diary 6: Child Soldiers – Driven by Fear and Hate|last=Southerland|first=D|date=2006-07-20|access-date=2018-03-28|archive-date=20 मार्च 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180320105641/https://www.rfa.org/english/features/blogs/cambodiablog/blog6_cambodia_southerland-20060720.html|url-status=dead}}</ref> २००९ तक कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र ने २३,७४५ सामूहिक कब्रों का मानचित्रण किया है जिसमें लगभग १३ लाख संदिग्ध निष्पादन के शिकार हैं। माना जाता है कि प्रत्यक्ष निष्पादन में नरसंहार के मरने वालों की संख्या का ६०% तक का योगदान है,{{Sfn|Seybolt|Aronson|Fischoff|2013|p=238}} अन्य पीड़ितों के साथ भुखमरी, थकावट, या बीमारी के कारण मौत हो जाती है।
नरसंहार ने शरणार्थियों का दूसरा बहिर्वाह शुरू कर दिया, जिनमें से कई पड़ोसी [[थाईलैण्ड|थाईलैंड]] और कुछ हद तक [[वियतनाम|वियतनाम भाग गए]]।<ref>[http://www.unhcr.org/3ebf9bad0.html ''State of the World's Refugees, 2000''] United Nations High Commissioner for Refugees, p. 92. Retrieved 21 January 2019</ref> [[कंबोडिया-वियतनाम युद्ध|कंबोडिया पर वियतनामी आक्रमण]] ने जनवरी १९७९ में ख्मेर रूज को हराकर नरसंहार को समाप्त कर दिया।{{Sfn|Mayersan|2013|p=182}} २ जनवरी २००१ को कंबोडियाई सरकार ने ख्मेर रूज के नेतृत्व के सदस्यों पर मुकदमा चलाने के लिए ख्मेर रूज ट्रिब्यूनल की स्थापना की, जो कम्बोडियन नरसंहार के लिए जिम्मेदार था। मुकदमा १७ फरवरी २००९ को शुरू हुआ।{{Sfn|Mendes|2011|p=13}} ७ अगस्त २०१४ को नूओन चिया और खिउ सम्फन को नरसंहार के दौरान [[मानवता-विरोधी अपराध|मानव-विरोधी अपराधों]] के लिए दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा मिली। <ref>{{Cite web|url=https://www.eccc.gov.kh/en/articles/judgement-case-00201-be-pronounced-7-august-2014|title=Judgement in Case 002/01 to be pronounced on 7 August 2014 {{!}} Drupal|website=www.eccc.gov.kh|access-date=2019-11-29|archive-date=11 अप्रैल 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230411171002/https://www.eccc.gov.kh/en/articles/judgement-case-00201-be-pronounced-7-august-2014|url-status=dead}}</ref>
== ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ==
=== ख्मेर रूज का उदय ===
==== कम्बोडियाई गृहयुद्ध ====
१९६८ में [[खमेर रूज|ख्मेर रूज]] ने आधिकारिक तौर पर कंबोडिया में एक राष्ट्रव्यापी [[विद्रोह]] शुरू किया। भले ही [[उत्तरी वियतनाम]] की [[सरकार]] को ख्मेर रूज के फैसले के बारे में सूचित नहीं किया गया था, उसके बलों ने विद्रोह शुरू होने के बाद ख्मेर रूज को आश्रय और हथियार प्रदान किए। ख्मेर रूज के विद्रोह के उत्तर वियतनाम द्वारा समर्थन ने कंबोडियाई [[सेना]] के लिए इसके प्रभाव का मुकाबला करना असंभव बना दिया। अगले दो वर्षों तक विद्रोह बढ़ता गया क्योंकि [[नरोत्तम सीहनु]] ने इसे रोकने के लिए नहीं के बराबर काम किया। जैसे-जैसे विद्रोह की ताकत बढ़ती गई, पार्टी ने खुले तौर पर खुद को कम्पूचिया की कम्युनिस्ट पार्टी घोषित कर दिया।<ref name="Frey">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=m569AfPJkB4C&q=Cercle+Marxiste+Khmer+Students+Association&pg=PA267|title=Genocide and International Justice|last=Frey|first=Rebecca Joyce|publisher=Infobase Publishing|year=2009|isbn=978-0-8160-7310-8|pages=266–267}}</ref>
सीहनु को १९६० में राज्य के प्रमुख के रूप में हटा दिया गया। प्रधानमंत्री लोन नोल ने कम्बोडियाई राष्ट्रीय समिति की मदद से उन्हें उनके पद से हटाया, जिससे [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] का समर्थन करने वाले ख्मेर गणराज्य की स्थापना हुई। [[चीनी साम्यवादी दल|चीनी कम्युनिस्ट पार्टी]] (सीसीपी) की सलाह पर सीहनु, जो [[बीजिंग]] में निर्वासित थे, ने ख्मेर रूज के साथ गठबंधन किया, और ख्मेर रूज-प्रभुत्व वाली निर्वासित का नाममात्र प्रमुख बन गए। हालांकि लोन नोल की सेना की कमजोरी और वायु शक्ति के अलावा किसी भी रूप में नए संघर्ष के लिए अमेरिकी सैन्य बल को प्रतिबद्ध करने के लिए पूरी तरह से अवगत होने के बावजूद, निक्सन प्रशासन ने नए ख्मेर गणराज्य के लिए अपने समर्थन की घोषणा की। <ref>Shawcross, pp. 181–182, 194. See also Isaacs, Hardy, & Brown, p. 98.</ref>
२९ मार्च १९७० को [[उत्तरी वियतनाम]] ने कंबोडियाई सेना के खिलाफ एक आक्रमण जारी किया। [[सोवियत संघ]] के अभिलेखागार से जो दस्तावेज सामने आए थे, उनसे पता चला कि आक्रमण ख्मेर रूज के स्पष्ट अनुरोध पर शुरू किया गया था, जब नुओन ची के साथ बातचीत हुई थी।<ref name="Mosyakov">Mosyakov, Dmitry. "The Khmer Rouge and the Vietnamese Communists: A History of Their Relations as Told in the Soviet Archives". In Cook, Susan E., ed. (2004). "Genocide in Cambodia and Rwanda". ''Yale Genocide Studies Program Monograph Series''. '''1''': 54. "In April–May 1970, many North Vietnamese forces entered Cambodia in response to the call for help addressed to Vietnam not by Pol Pot, but by his deputy Nuon Chea. Nguyen Co Thach recalls: "Nuon Chea has asked for help and we have "liberated" five provinces of Cambodia in ten days."</ref> एक उत्तरी वियतनामी सेना ने जल्दी से पूर्वी कंबोडिया के बड़े हिस्से पर कब्जा पाकर [[नामपेन्ह|नोमपेन्ह]] के २४ किलोमीटर अंदर तक घुस गया, जिसके बाद उसे पीछे धकेल दिया गया। सीहनु को हटाने के तीन महीने बाद जून तक उन्होंने देश के पूरे पूर्वोत्तर तिहाई से सरकारी बलों को हटा दिया। उन ताकतों को हराने के बाद उत्तरी वियतनाम ने नए जीते क्षेत्रों को स्थानीय विद्रोहियों में बदल दिया। ख्मेर रूज ने देश के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में "मुक्त" क्षेत्रों की भी स्थापना की, जहाँ वे उत्तरी वियतनामी से स्वतंत्र रूप से संचालित होते थे।<ref>Sutsakhan, Lt. Gen. Sak, The Khmer Republic at War and the Final Collapse. Washington, D.C.: United States Army Center of Military History, 1987. p. 32.</ref>
सीहनु ने ख्मेर रूज के लिए मैदान में जाकर उनके समर्थन का प्रदर्शन करने के बाद उनकी सेना ६,००० से बढ़कर ५०,००० तक हो गई। ख्मेर रूज के नए रंगरूटों में से कई गैर-राजनीतिक किसान थे, जिन्होंने [[साम्यवाद|साम्यवाद के]] बजाय राजा के समर्थन में लड़ाई लड़ी, जिसकी उन्हें बहुत कम समझ थी।<ref>{{Cite web|url=http://www.atimes.com/atimes/Southeast_Asia/IC15Ae01.html|title=Dining with the Dear Leader|website=Asia Time|archive-url=https://web.archive.org/web/20070328161501/http://www.atimes.com/atimes/Southeast_Asia/IC15Ae01.html|archive-date=2007-03-28}}</ref>
१९७५ तक जब लोन नोल की सरकार के अमेरिकी समर्थन की समाप्ति के कारण गोला-बारूद से खत्म होने लगे, यह स्पष्ट था कि उनकी सरकार के गिरने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। १७ अप्रैल १९७५ को ख्मेर रूज ने नोमपेन्ह पर कब्जा कर लिया और [[गृहयुद्ध]] को समाप्त कर दिया। गृहयुद्ध से होने वाली मौतों के अनुमान अलग-अलग हैं। सीहनु ने ६ लाख गृहयुद्ध में हुई मौतों का आंकड़ा इस्तेमाल किया,<ref name="Sharp">{{Cite web|url=http://www.mekong.net/cambodia/deaths.htm|title=Counting Hell|last=Sharp|first=Bruce|website=Mekong.net|access-date=2019-08-17}}</ref> जबकि एलिजाबेथ बेकर ने दस लाख से अधिक गृहयुद्धों की मौत की सूचना दी, जिसमें सैन्य और नागरिक शामिल थे;<ref>{{Cite web|url=https://sites.tufts.edu/atrocityendings|title=Mass Atrocity Endings {{!}} Documenting declines in civilian fatalities|website=sites.tufts.edu|access-date=2018-02-06|archive-date=20 फ़रवरी 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230220200600/https://sites.tufts.edu/atrocityendings/|url-status=dead}}</ref> अन्य शोधकर्ता ऐसे उच्च अनुमानों की पुष्टि करने में असमर्थ थे।<ref name="Tufts.edu">{{Cite web|url=https://sites.tufts.edu/atrocityendings/2015/08/07/cambodia-u-s-bombing-civil-war-khmer-rouge/|title=Cambodia: U.S. bombing, civil war, & Khmer Rouge|date=2015-08-07|publisher=[[World Peace Foundation]]|access-date=2019-07-19|quote=On the higher end of estimates, journalist Elizabeth Becker writes that 'officially, more than half a million Cambodians died on the Lon Nol side of the war; another 600,000 were said to have died in the Khmer Rouge zones.' However, it is not clear how these numbers were calculated or whether they disaggregate civilian and soldier deaths. Others' attempts to verify the numbers suggest a lower number. Demographer Patrick Heuveline has produced evidence suggesting a range of 150,000 to 300,000 violent deaths from 1970 to 1975. In an article reviewing different sources about civilian deaths during the civil war, Bruce Sharp argues that the total number is likely to be around 250,000 violent deaths. ... Many attempts have been made to count or estimate the scale of deaths under the KR. While the KR officials claim that only around 20,000 civilians were killed, the true estimate likely falls somewhere between 1–3 million total deaths, with upper range estimates of those directly killed by the regime approaching 1 million. ... One of the more thorough demographic studies, conducted by Patrick Heuveline, also attempts to separate out violent civilian deaths from a general increase in mortality caused by famine, disease, working conditions, or other indirect causes. He does so by grouping deaths within different age and sex brackets and analyzing treatment of these age and sex groups by the Khmer Rouge and violent regimes in general. His conclusion is that an average of 2.52 million people (range of 1.17–3.42 million) died as a result of regime actions between 1970 and 1979, with an average estimate of 1.4 million (range of 1.09–2.16 million) directly violent deaths.|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714181839/https://sites.tufts.edu/atrocityendings/2015/08/07/cambodia-u-s-bombing-civil-war-khmer-rouge/|url-status=dead}}</ref> मारेक स्लिविंस्की ने नोट किया कि मृतकों के कई अनुमान सवालों के घेरे में हैं और प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं, यह सुझाव देते हुए कि सही संख्या २,४०,००० और ३,१०,००० के बीच है।<ref name="Sliwinski">{{Cite book|title=Le Génocide Khmer Rouge: Une Analyse Démographique|last=Sliwinski|first=Marek|publisher=[[L'Harmattan]]|year=1995|pages=42–43, 48|quote=Le bilan humain de cette périod de guerre civile est difficile à établir. Les chiffres avancés ne sont pas irréfutables, et ils peuvent bien avoir été lancés à des fins de propagande ou d'intoxication. Ils oscillent, pour le nombre des morts, entre 600 000 et 700 000, soit entre 7.7% et 9.6% de la population du pays selon les évaluations les plus extrêmes. La cause principale de ces pertes serait les bombardements massifs de l'aviation américaine dont le but principal était l'anéantissement des pistes Ho-Chi-Minh et la destruction d'un mythique Q.G. du Viêt-cong. A cet égard, il est intéressant de rappeler que la population de toutes les régions traversées par les pistes Ho-Chi-Minh, régions situées sur la rive gauche du Mékong, ne comptait au total qu'environ 1 165 000 personnes, et que les trois plus grandes provinces longeant la frontiére laotienne et vietnamienne, Stung Treng, Ratanakiri et Mondolkiri, étaient pratiquement inhabitées. L'impact des bombardments américains sur l'état de la population du Cambodge durant les années 1970–1975 ne paraît donc pas aussi évident que certain auteurs le supposent. Nos propres statistiques sur les causes précises des décés ne situent d'ailleurs les victimes des bombardments qu'à la troisiéme place, loin derriére les victimes des armes à feu portatives et des assassinats. ... Pour la période de guerre civile, l'augmentation totale de la mortalité est donc de 7.5% Si l'on considére que la mortalité naturelle frappe chaque anné quelque 132 000 personnes, on pourrait facilement en déduire que la surmortalité due à la guerre se chiffre par un nombre de décés ne dépassant pas 50 000 personnes durant la périod allant de mars 1970 à avril 1975. Toutefois, en tenant compte du fait que la guerre a eu une forte incidence tant sur la dimunution de la mortalité naturelle que sur l'agumentation de la mortalité infantile, on peut estimer la proportion annuelle des victimes elles-mêmes de cette guerre à 0,64% de la population du pays, soit, pour toutes ces années, 240 000 personnes environ.}}</ref> जूडिथ बैनिस्टर और ई. पेगे जॉनसन ने २,७५,००० युद्ध मृत्यु को "उच्चतम मृत्यु दर जिसे हम उचित ठहरा सकते हैं" के रूप में वर्णित किया।<ref name="Banister, Judith 1993">{{Cite book|url=https://archive.org/details/genocidedemocrac00kier/page/87|title=Genocide and Democracy in Cambodia: The Khmer Rouge, the United Nations and the International Community|last=Banister|first=Judith|last2=Johnson|first2=E. Paige|publisher=Yale University Southeast Asia Studies|year=1993|isbn=978-0-938692-49-2|page=[https://archive.org/details/genocidedemocrac00kier/page/87 87]|chapter=After the Nightmare: The Population of Cambodia|quote=An estimated 275,000 excess deaths. We have modeled the highest mortality that we can justify for the early 1970s.|chapter-url=https://archive.org/details/genocidedemocrac00kier}}</ref> पैट्रिक ह्यूवेलिन कहते हैं कि "जनसांख्यिकीय डेटा के बाद के पुनर्मूल्यांकन में [गृह युद्ध] के लिए मृत्यु टोल तीन लाख या उससे कम के क्रम में स्थित है"।<ref name="Heuveline, Patrick 2001"/>
==== संयुक्त राज्य अमेरिका बमबारी ====
१९७० से १९७३ तक ख्मेर रूज के खिलाफ संयुक्त राज्य अमेरिका के एक बड़े पैमाने पर बमबारी अभियान ने ग्रामीण कंबोडिया को तबाह कर दिया।<ref>William Shawcross, "1979 Sideshow: Kissinger, Nixon and the Destruction of Cambodia," (New York: Simon & Schuster, 1979)</ref><ref name="Cultural Survival Quarterly">Cultural Survival Quarterly Magazine, September 1990, [https://www.culturalsurvival.org/publications/cultural-survival-quarterly/roots-genocide-new-evidence-us-bombardment-cambodia "Roots of Genocide: New Evidence on the US Bombardment of Cambodia"]</ref> कंबोडिया का एक पूर्व अमेरिकी बमबारी अभियान वास्तव में १८ मार्च १९६९ को ऑपरेशन ब्रेकफास्ट के साथ शुरू हुआ था, लेकिन कंबोडिया में अमेरिकी बमबारी उससे कई साल पहले शुरू हुई थी।<ref name="Tufts.edu"/>
अमेरिकी बमबारी के कारण कंबोडियाई नागरिक और ख्मेर रूज की मौत की संख्या विवादित है और व्यापक कंबोडियाई गृहयुद्ध से अलग होना मुश्किल है।<ref name="Sliwinski"/> अनुमान ३०,००० से ५,००,००० तक है।<ref name="Valentino">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=LQfeXVU_EvgC&q=30%2C000-150%2C000|title=Final Solutions: Mass Killing and Genocide in the 20th Century|last=Valentino|first=Benjamin|publisher=[[Cornell University Press]]|year=2005|isbn=978-0-8014-7273-2|page=84}}</ref><ref>[https://books.google.com/books?id=NgokDwAAQBAJ&pg=PT97&dq=nixon,+cambodia,+killed,+civilians&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjXnbKPua7YAhUikeAKHW1VAd0Q6AEIJzAA#v=onepage&q=over%20500%2C000&f=false James A. Tyner, ''The Killing of Cambodia: Geography, Genocide and the Unmaking of Space''] (Routledge, 2017)</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.hawaii.edu/powerkills/SOD.CHAP4.HTM|title=Statistics of Cambodian Democide: Estimates, Calculations, And Sources|last=Rummel|first=Rudolph|authorlink=Rudolph Rummel|access-date=2018-02-06}}</ref><ref name="PBS Frontline">{{Cite web|url=http://www.pbs.org/frontlineworld/stories/cambodia/tl02.html|title=FRONTLINE/WORLD . Cambodia – Pol Pot's Shadow . Chronicle of Survival . 1969–1974: Caught in the crossfire|publisher=PBS|access-date=2017-12-29}}</ref> स्लिविंस्की का अनुमान है कि कुल गृहयुद्ध में होने वाली मौतों का लगभग १७% अमेरिकी बमबारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, यह देखते हुए कि यह मौत के प्रमुख कारणों से बहुत पीछे है, क्योंकि अमेरिकी बमबारी कम आबादी वाले सीमा क्षेत्रों में केंद्रित थी।<ref name="Sliwinski" /> बेन कीरनन ने ५०,००० से १५०,००० मौतों का श्रेय अमेरिकी बमबारी को दिया है।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/howpolpotcametop00kier_0|title=How Pol Pot Came to Power: Colonialism, Nationalism, and Communism in Cambodia, 1930–1975|last=Kiernan|first=Ben|publisher=[[Yale University Press]]|year=2004|isbn=978-0-300-10262-8|page=xxiii|author-link=Ben Kiernan|url-access=registration}}</ref>
इतिहासकारों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा कंबोडिया पर की गई भारी बमबारी और ख्मेर रूज के बढ़ते समर्थन और भर्ती एक रुचि का विषय रहा है। माइकल इग्नाटिएफ़, एडम जोन्स<ref>{{Cite book|url=https://www.mcvts.net/cms/lib07/NJ01911694/Centricity/Domain/155/Textbook.pdf|title=Genocide: A Comprehensive Introduction|last=Jones|first=Adam|publisher=Routledge|year=2006|pages=189–190|access-date=13 दिसंबर 2021|archive-date=5 अगस्त 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190805203324/https://www.mcvts.net/cms/lib07/NJ01911694/Centricity/Domain/155/Textbook.pdf|url-status=dead}}</ref> और ग्रेग ग्रैंडिन<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=QGGzBgAAQBAJ&q=%22grandin,%22+khmer+rouge|title=Kissinger's Shadow: The Long Reach of America's Most Controversial Statesman|last=Grandin|first=Greg|date=2015|publisher=Henry Holt and Company|isbn=978-1-62779-450-3|pages=179–180}}</ref> सहित कुछ विद्वानों ने १९६५ से १९७३ तक संयुक्त राज्य अमेरिका के हस्तक्षेप और बमबारी अभियान को महत्वपूर्ण कारकों के रूप में उद्धृत किया है जिनके कारण कंबोडियन किसानों के बीच ख्मेर रूज के लिए समर्थन बढ़ा।<ref>Kiernan, Ben (Winter 1989). "The American Bombardment of Kampuchea 1969–1973". ''Vietnam Generation''. '''1''' (1): 4–41.</ref> बेन कीएरनन के अनुसार, "ख्मेर रूज अमेरिका की आर्थिक सहायता और कंबोडिया की सैन्य अस्थिरता के बिना सत्ता हासिल नहीं कर सकता था। इसने बमबारी की तबाही और नागरिकों के नरसंहार को भर्ती प्रचार के रूप में और अपनी क्रूर, कट्टरपंथी नीतियों और उदारवादी साम्यवादियों और सीहनुवादियों के शुद्धिकरण के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया।"<ref>{{Cite book|title=The Pol Pot Regime: Race, Power, and Genocide in Cambodia under the Khmer Rouge, 1975–1979|last=Kiernan|first=Ben|publisher=[[Yale University Press]]|year=2008|isbn=978-0-300-14299-0|pages=16–19|author-link=Ben Kiernan}}</ref>
पोल पॉट के [[जीवनी]] लेखक डेविड पी. चांडलर ने लिखा है कि बमबारी से "अमेरिका को वह मिल गया जो वह चाहता था - इसने नोमपेन्ह के वामपंथी घेरे को तोड़ दिया", लेकिन ग्रामीण समाज के [[पतन]] को भी तेज कर दिया और [[सामाजिक]] [[ध्रुवीकरण]] में बढ़त हुई।<ref>[[David P. Chandler|Chandler, David]] (2000), ''Brother Number One: A Political Biography of Pol Pot'', Revised Edition, Chiang Mai, Thailand: Silkworm Books, pp. 96–98.</ref><ref>Chandler, David (2005). ''Cambodia 1884–1975'', in The Emergence of Modern Southeast Asia, edited by Norman Owen. University of Hawaii Press, p. 369.</ref> क्रेग एचेसन मानते हैं कि अमेरिकी हस्तक्षेप ने ख्मेर रूज के लिए भर्ती में बढ़ावा लाया, लेकिन विवाद है कि यह ख्मेर रूज की जीत का एक प्राथमिक कारण था।<ref>Etcheson, Craig, ''The Rise and Demise of Democratic Kampuchea'', Westview Press, 1984, p. 97.</ref> विलियम शॉक्रॉस के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका की बमबारी और जमीनी घुसपैठ ने कंबोडिया को उस अराजकता में डुबो दिया, जिससे बचने के लिए सीहनु ने वर्षों तक काम किया था।<ref>Shawcross, pp. 92–100, 106–112.</ref>
=== ख्मेर रूज के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन ===
==== चीन ====
===== माओ युग =====
[[चित्र:PolPot.jpg|अंगूठाकार|217x217पिक्सेल| १९७८ में [[पोल पॉट]]]]
१९५० के दशक के बाद से, [[पोल पॉट]] ने लगातार [[चीनी जनवादी गणराज्य]] का दौरा किया, जहाँ उन्होंने [[चीनी साम्यवादी दल]] के कर्मियों से राजनीतिक और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया - विशेष रूप से ''[[सर्वहारा की तानाशाही]]'' के सिद्धांत पर।<ref name=":9"/><ref name=":02">{{Cite web|url=http://www.yhcqw.com/13/2114.html|title=波尔布特:并不遥远的教训|last=Wang|first=Xiaolin|date=|website=[[Yanhuang Chunqiu]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20201124074333/http://www.yhcqw.com/13/2114.html|archive-date=2020-11-24|access-date=2019-11-23}}</ref> नवंबर १९६५ से फरवरी १९६६ तक चेन बोडा और झांग चुंचाओ जैसे उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने उन्हें [[चीन की साम्यवादी क्रांति]], [[वर्ग संघर्ष]], [[कम्युनिस्ट इंटरनेशनल]] आदि जैसे विषयों पर प्रशिक्षित किया।<ref name=":02" /> पोल पॉट ने [[डेंग शियाओ पिंग]] और पेंग जेन सहित अन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की।<ref name=":9" /> वे कांग शेंग के उस व्याख्यान से विशेष रूप से प्रभावित हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनीतिक शुद्धिकरण कैसे किया जाए। <ref name=":02" />
[[चित्र:Mao_Sihanouk.jpg|अंगूठाकार| [[माओ से-तुंग|माओ ज़ेडॉन्ग]], पेंग जेन, [[नरोत्तम सीहनु]] और [[लीउ शओची|लियू शाओकी]] (१९६५)।]]
१९७० में लोन नोल ने सीहनु को उखाड़ फेंका, और बाद वाला बीजिंग भाग गया, जहाँ पोल पॉट भी जा रहे थे। सीसीपी की सलाह पर ख्मेर रूज ने अपनी स्थिति बदल दी, और सीहनु का समर्थन करने के लिए, उसने कम्पूचिया के राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा की स्थापना की। अकेले १९७० में ही चीनियों ने कथित तौर पर संयुक्त मोर्चे को ४०० टन सैन्य सहायता दी।<ref name=":15">{{Cite journal|last=Song|first=Lianghe|last2=Wu|first2=Yijun|year=2013|title=中国对柬埔寨的援助:评价及建议|url=https://core.ac.uk/download/pdf/41448796.pdf|journal=Xiamen University Forum on International Development|language=zh|volume=|issue=6|pages=54–58|archive-url=https://web.archive.org/web/20190414161319/https://core.ac.uk/download/pdf/41448796.pdf|archive-date=2019-04-14}}</ref> अप्रैल १९७४ में सीहनु और ख्मेर रूज के नेता ईएंग सारी और खिउ सम्फन ने बीजिंग में माओ से मुलाकात की; माओ ने उन नीतियों का समर्थन किया जो ख्मेर रूज ने प्रस्तावित की थी, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि ख्मेर रूज गृहयुद्ध जीतने और एक नया कंबोडिया स्थापित करने के बाद सीहनु को हाशिए पर ले जाए।<ref name=":9"/><ref>{{Cite web|url=http://news.ifeng.com/history/special/khmerrouge/|title=人间正道:审判红色高棉|last=|first=|date=|website=[[Phoenix Television|Phoenix New Media]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20210103050441/http://news.ifeng.com/history/special/khmerrouge/|archive-date=2021-01-03|access-date=2019-11-28}}</ref>
जून १९७५ में पोल पॉट और अन्य ख्मेर रूज के अधिकारियों ने बीजिंग में [[माओ से-तुंग]] के साथ मुलाकात की, जहाँ माओ ने पोल पॉट को "सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के तहत निरंतर क्रांति के सिद्धांत" पर व्याख्यान दिया, जिसमें दो लेखों की सिफारिश की गई। जो याओ वेनयुआन द्वारा लिखे गए थे और ३० से अधिक पुस्तकें पोल पॉट भेज रहे थे, जिन्हें [[कार्ल मार्क्स]], [[फ्रेडरिक एंगेल्स]], [[व्लादिमीर लेनिन]] और [[जोसेफ़ स्टालिन|जोसेफ स्टालिन]] ने उपहार के रूप में लिखा था।<ref name=":9">{{Cite web|url=http://news.ifeng.com/history/2/shidian/200804/0410_2666_485387.shtml|title=西哈努克、波尔布特与中国|last=|first=|date=2008-04-10|website=[[Phoenix Television|Phoenix New Media]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20201030081609/http://news.ifeng.com/history/2/shidian/200804/0410_2666_485387.shtml|archive-date=2020-10-30|access-date=2019-11-26}}</ref><ref name=":02"/> इस मुलाकात के दौरान माओ ने पोल पॉट से कहा:<ref name=":42">{{Cite web|url=https://digitalarchive.wilsoncenter.org/document/111267.pdf?v=9ce155271bb6859cb1c694c29a8bba18|title=June 21, 1975. Conversation between Chinese leader Mao Zedong and Cambodian Leader Pol Pot|website=Wilson Center}}</ref><blockquote>हम आपसे सहमत हैं! आपका अधिकांश अनुभव हमसे बेहतर है। चीन आपकी आलोचना करने के काबिल नहीं है। अपने पचास वर्ष के राजनीतिक दौरे में दस गलतियाँ की - कुछ राष्ट्रीय, कुछ स्थानीय...इस कारण मैं मानता हूँ कि चीन के पास आपकी आलोचना करने की नहीं, बल्कि आपकी प्रशंसा करने की योग्यता है। आप मूल रूप से सही हैं...लोकतांत्रिक क्रांति से समाजवादी रास्ता अपनाने के रास्ते दो संभावनाएँ मौजूद हैं: पहला समाजवाद, दूसरा पूंजीवाद। अब हमारी स्थिति ऐसी है। आज से पचास साल या सौ साल बाद दोनों विचारों के बीच संघर्ष मौजूद रहेगा। आज से दस हजार साल बाद भी दोनों विचारों के बीच का संघर्ष बना रहेगा। जब साम्यवाद का एहसास होगा, तब भी दोनों विचारों के बीच संघर्ष रहेगा। नहीं तो आप मार्क्सवादी नहीं हैं।...जैसा लेनिन ने कहा था, हमारा राष्ट्र अब पूनिवादी राष्ट्र है जिसमें पूंजीपती नहीं हैं। यह राष्ट्र पूंजीवादी अधिकारों की रक्षा करता है, और आय समान नहीं है। समानता के नारे के तहत असमानता की व्यवस्था पेश की गई है। दो पंक्तियों के बीच संघर्ष होगा, उन्नत और पिछड़े के बीच संघर्ष, तब भी जब साम्यवाद का एहसास हो जाएगा। आज हम इसे पूरी तरह से समझा नहीं सकते हैं।</blockquote>पोल पॉट ने उत्तर दिया: "अध्यक्ष माओ द्वारा उठाए गई संघर्ष की पंक्तियाँ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा है। हम भविष्य में आपके शब्दों का पालन करेंगे। अपने बचपन के दिनों से मैं अध्यक्ष माओ के विभिन्न कार्यों के बारे में पढ़ता और सीखता था, विशेष रूप से ''लोगों के युद्ध'' पर लिखे है उनके सिद्धांत। आपके कार्यों ने हमारे पूरे दल को मार्गदर्शन दिया है।"<ref name=":9"/> वहीं दूसरी ओर अगस्त १९७५ में एक अन्य बैठक के दौरान चीनी प्रधान मंत्री [[झ़ोउ एनलाई|झोउ एनलाई]] ने चीन के अपने [[ग्रेट लीप फॉरवर्ड]] में गलतियों का हवाला देते हुए सीहनु के साथ-साथ ख्मेर रूज के नेताओं को खिउ सम्फान और आईंग सारी सहित साम्यवाद के प्रति कट्टरपंथी आंदोलन के खतरे की चेतावनी दी।<ref name=":14">{{Cite web|url=https://cross-currents.berkeley.edu/sites/default/files/e-journal/articles/jeldres_1.pdf|title=A Personal Reflection on Norodom Sihanouk and Zhou Enlai: An Extraordinary Friendship on the Fringes of the Cold War|website=UC Berkeley|archive-url=https://www.webcitation.org/6bvUPJGkx?url=https://cross-currents.berkeley.edu/sites/default/files/e-journal/articles/jeldres_1.pdf|archive-date=30 September 2015}}</ref><ref name=":17">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=ZPJIE9pX_joC&q=zhou+enlai+sihanouk+1975+august&pg=PA45|title=Kampuchea Between China and Vietnam|last=Chang|first=Pao-min|date=1985|publisher=NUS Press|isbn=978-9971-69-089-2}}</ref><ref name=":16">{{Cite journal|last=Ciorciari|first=John D.|date=2014-04-03|title=China and the Pol Pot regime|journal=Cold War History|volume=14|issue=2|pages=215–235|doi=10.1080/14682745.2013.808624|issn=1468-2745}}</ref> झोउ ने उनसे उन गलतियों को नहीं दोहराने का आग्रह किया जिन्होंने तबाही मचाई थी।<ref name=":14" /><ref name=":16" /> सीहनु ने बाद में याद किया कि खिउ सम्फन और आईंग थिरिथ ने केवल "एक अविश्वसनीय और बेहतर मुस्कान" के साथ जवाब दिया था।<ref name=":16" />
नरसंहार के दौरान चीन ख्मेर रूज का मुख्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षक था, जो "१५,००० से अधिक सैन्य सलाहकारों" और इसकी अधिकांश बाहरी सहायता की आपूर्ति करता था। {{Sfn|Kurlantzick|2008|p=[https://books.google.com/books?id=aWyP8-fXlsYC&q=193#v=snippet&q=193&f=false 193]}}{{Sfn|Kurlantzick|2008|p=[https://books.google.com/books?id=aWyP8-fXlsYC&pg=PA193 193]}} यह अनुमान लगाया गया है कि ख्मेर रूज को विदेशी सहायता का कम से कम ९०% चीन से आया था, केवल १९७५ में ब्याज मुक्त अर्थशास्त्र और सैन्य सहायता में [[अमेरिकी डॉलर|$]]<nowiki/>१ अरब को देखते हुए, "अब तक चीन द्वारा किसी एक देश को दी गई सबसे बड़ी सहायता" थी।<ref name=":12"/><ref name=":13"/> १९७६ में आंतरिक संकटों की एक श्रृंखला ने बीजिंग को ख्मेर रूज की नीतियों पर पर्याप्त प्रभाव डालने से रोक दिया।<ref name=":17"/>
===== संक्रमण अवधि =====
सितंबर १९७६ में माओ की मृत्यु के बाद चीन लगभग दो साल के संक्रमण से गुजरा, जिसके बाद डेंग शियाओपिंग दिसंबर १९७८ में उसके नए सर्वोपरि नेता बन गए। संक्रमण काल के दौरान पोल पॉट ने जुलाई १९७७ में चीन की आधिकारिक यात्रा की और उनका स्वागत अध्यक्ष हुआ गुओफेंग और अन्य उच्च सीसीपी अधिकारियों ने किया, ''[[पीपुल्स डेली]]'' ने उन्हें "कंबोडिया से कॉमरेड" (''柬埔寨战友'') कहा।<ref>{{Cite web|url=http://www.sohu.com/a/78426791_239503|title=老照片:七十年代波尔布特曾两度访华|last=Ruo|first=Gu|date=2016-05-30|website=[[Sohu]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20200604175935/https://www.sohu.com/a/78426791_239503|archive-date=2020-06-04|access-date=2019-11-24}}</ref> पॉट ने माओ के युग के उत्पाद, दझाई के कृषि उत्पादन मॉडल का भी दौरा किया। चीन के उप प्रधान मंत्री और दझाई के नेता चेन योंगगुई ने साम्यवाद के प्रति अपने आंदोलन की उपलब्धि की सराहना करते हुए दिसंबर १९७७ में कंबोडिया का दौरा किया। <ref>{{Cite web|url=http://www.yhcqw.com/36/1354.html|title='大寨工' 对全国农村的恶劣影响|last=Xiap|first=Han|date=|website=[[Yanhuang Chunqiu]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20201101134943/http://www.yhcqw.com/36/1354.html|archive-date=2020-11-01|access-date=2019-11-25}}</ref>
१९७८ में ख्मेर रूज नेता और लोकतांत्रिक कम्पूचिया के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री सोन सेन ने चीन का दौरा किया और सैन्य सहायता के लिए इसकी स्वीकृति प्राप्त की।<ref name=":132">{{Cite web|url=https://boxun.com/news/gb/z_special/2016/01/201601132346.shtml|title=红色高棉运动始末|last=Yu|first=Hongjun|date=2016-01-13|website=[[Boxun]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20180203060421/http://boxun.com/news/gb/z_special/2016/01/201601132346.shtml|archive-date=2018-02-03|access-date=2019-11-24}}</ref> उसी वर्ष वांग डोंगक्सिंग और देंग यिंगचाओ जैसे उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने समर्थन देने के लिए कंबोडिया का दौरा किया।<ref name=":132" /><ref>{{Cite web|url=http://news.sina.com.cn/c/2008-11-26/161216730325.shtml|title=1978年国家领导人主要出访 – 览表|last=|first=|date=2008-11-26|website=[[Sina Corp|Sina]]|language=zh|archive-url=https://web.archive.org/web/20201105023357/http://news.sina.com.cn/c/2008-11-26/161216730325.shtml|archive-date=2020-11-05|access-date=2019-11-24}}</ref>
===== देंग युग =====
देंग के चीन के सर्वोपरि नेता बनने के तुरंत बाद [[कंबोडिया-वियतनाम युद्ध|वियतनाम ने कंबोडिया पर आक्रमण]] करके जनवरी १९७९ में ख्मेर रूज को हराकर नरसंहार को समाप्त कर दिया,{{Sfn|Mayersan|2013|p=182}} जिसके तहत कम्पूचिया जनवादी गणराज्य की स्थापना हुई। [[दक्षिण पूर्व एशिया]] में [[सोवियत संघ]] और वियतनाम के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए चीन ने आधिकारिक तौर पर वियतनामी आक्रमण की निंदा की और ख्मेर रूज को अपना भौतिक समर्थन देना जारी रखा। १९७९ की शुरुआत में वियतनाम के आक्रमण के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने के लिए चीन ने [[चीन-वियतनाम युद्ध|वियतनाम पर आक्रमण कर दिया]]।<ref>{{Cite web|url=https://mothership.sg/2018/11/deng-xiaoping-singapore-china-george-yeo/|title=Deng Xiaoping visited S'pore in 1978. Here's the impact it left on Sino-S'pore relations 40 years on.|website=mothership.sg}}</ref>
देंग [[सिंगापुर]] के प्रधान मंत्री [[ली क्वान यू|ली कुआन यू]] द्वारा युद्ध के पैमाने और अवधि को सीमित करने के लिए बातचीत से आश्वस्त थे। एक महीने तक युद्ध चलने के बाद सिंगापुर ने कंबोडियाई मुद्दे पर वियतनाम और चीन के बीच मध्यस्थता रखने का प्रयास किया।<ref>{{Cite web|url=https://mothership.sg/2018/11/deng-xiaoping-singapore-china-george-yeo/|title=Deng Xiaoping visited S'pore in 1978. Here's the impact it left on Sino-S'pore relations 40 years on.|website=mothership.sg}}</ref>
==== अन्य समर्थन ====
१९७८ और १९७९ के वियतनामी आक्रमण पर चीनी और पश्चिम के विरोध के परिणामस्वरूप ख्मेर रूज ने १९८२ तक कंबोडिया की [[संयुक्त राष्ट्र]] की कुर्सी पर कब्जा करना जारी रखा, जिसके बाद सीट ख्मेर रूज-के गठबंधन ने ले लिया, जिसे ''कम्पूचियाई प्रजातन्त्र की गठबंधन सरकार'' के नाम से जाना जाता था।<ref name="Locard">{{Cite journal|last=Locard|first=Henri|date=March 2005|title=State Violence in Democratic Kampuchea (1975–1979) and Retribution (1979–2004)|journal=[[European Review of History]]|volume=12|issue=1|pages=121–143|doi=10.1080/13507480500047811|quote=Between 17 April 1975 and 7 January 1979 the death toll was about 25% of a population of some 7.8 million; 33.5% of men were massacred or died unnatural deaths as against 15.7% of the women, and 41.9% of the population of Phnom Penh. ... Since 1979, the so-called Pol Pot regime has been equated to Hitler and the Nazis. This is why the word 'genocide' (associated with Nazism) has been used for the first time in a distinctly Communist regime by the invading Vietnamese to distance themselves from a government they had overturned. This 'revisionism' was expressed in several ways. The Khmer Rouge were said to have killed 3.3 million, some 1.3 million more people than they had in fact killed. There was one abominable state prison, S–21, now the Tuol Sleng Genocide Museum. In fact, there were more than 150 on the same model, at least one per district. ... For the United States in particular, denouncing the crimes of the Khmer Rouge was not at the top of their agenda in the early 1980s. Instead, as in the case of Afghanistan, it was still at times vital to counter what was perceived as the expansionist policies of the Soviets. The USA prioritised its budding friendship with the Democratic Republic of China to counter the 'evil' influence of the USSR in Southeast Asia, acting through its client state, revolutionary Vietnam. All the ASEAN countries shared that vision. So it became vital, with the military and financial help of China, to revive and develop armed resistance to the Vietnamese troops, with the resurrected KR at its core. ... [France] was instrumental in forcing the Sihanoukists and the Republicans to form an obscene alliance with its former tormentors, the KR, under the name of the Coalition Government of Democratic Kampuchea (CGDK) in 1982. In so doing, the international community officially reintegrated some of the worst perpetrators of crimes against humanity into the world diplomatic sphere...}}</ref>{{Sfn|PoKempner|1995|p=[https://books.google.com/books?id=RSQ7VlnNw0AC&pg=PA106 106]}}{{Sfn|SarDesai|1998|p=[https://books.google.com/books?id=4nWqBAAAQBAJ&q=163#v=snippet&q=163&f=false 163]}} वियतनाम के विरोध से प्रेरित होकर चीन ने १९७९ से १९८६ तक अपनी ज़मीन पर ख्मेर रूज सैनिकों को प्रशिक्षित किया, "१९९० तक ख्मेर रूज सैनिकों के साथ सैन्य सलाहकार तैनात किए,"{{Sfn|PoKempner|1995|p=[https://books.google.com/books?id=RSQ7VlnNw0AC&pg=PA106 106]}} और " १९८० के दशक के दौरान सैन्य सहायता में कम से कम $१ अरब की आपूर्ति की।{{Sfn|Brinkley|2011|pp=[https://books.google.com/books?id=C3bsidxFIuEC&pg=PA64 64]–[https://books.google.com/books?id=C3bsidxFIuEC&pg=PA65 65]}}
१९९१ के पेरिस शांति समझौते के बाद [[थाईलैण्ड|थाईलैंड]] ने ख्मेर रूज को "व्यापार करने और अपनी गतिविधियों को बनाए रखने के लिए थाई सीमा के पार जाने की अनुमति दी... हालांकि अंतरराष्ट्रीय आलोचना, विशेष रूप से [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] और [[ऑस्ट्रेलिया]] से... के कारण इसे किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन को अस्वीकार करने का कारण बना दिया।"{{Sfn|PoKempner|1995|pp=[https://books.google.com/books?id=RSQ7VlnNw0AC&pg=PA107 107]–[https://books.google.com/books?id=RSQ7VlnNw0AC&pg=PA108 108]}} ऐसे भी आरोप हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ख्मेर रूज का समर्थन किया क्योंकि वह [[दक्षिण पूर्व एशिया]] में वियतनाम के प्रभाव को कमजोर करना चाहता था।<ref name="Locard"/>{{Sfn|Haas|1991|pp=17–18, 28–29}}{{Sfn|Thayer|1991|pp=180, 187–189}}{{Sfn|Brinkley|2011|pp=[https://books.google.com/books?id=C3bsidxFIuEC&pg=PA58 58], [https://books.google.com/books?id=C3bsidxFIuEC&pg=PA65 65]}} चीन, अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों के समर्थन के कारण, गँठबंधन ने १९९३ तक [[शीतयुद्ध|शीत युद्ध]] समाप्त होने के बाद भी कंबोडिया की संयुक्त राष्ट्र सीट पर कब्जा करके रखा।<ref name="Tufts.edu"/>
== विचारधारा ==
{{साम्यवाद साइडबार}}
[[विचारधारा]] ने [[नरसंहार]] में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पोल पॉट [[मार्क्सवाद-लेनिनवाद]] से प्रभावित थे और वे कंबोडिया को पूरी तरह से आत्मनिर्भर [[कृषि]] [[समाजवादी]] [[समाज]] में बदलना चाहते थे जो विदेशी प्रभावों से मुक्त हो। [[जोसेफ़ स्टालिन|स्टालिन]] के काम को उनके विचार पर "महत्वपूर्ण रचनात्मक प्रभाव" बुलाया गया है। माओ के काम भी प्रभावशाली थे, खासकर उनकी पुस्तक ''नए लोकतंत्र पर'' से। इतिहासकार डेविड चांडलर के अनुसार [[रूसो|झीन-झाक रूसो]] उनके पसंदीदा लेखकों में से थे। १९६० के दशक के बीच पोल पॉट ने कंबोडियाई स्थिति के अनुरूप मार्क्सवाद-लेनिनवाद के बारे में अपने विचारों में सुधार किया, जैसे कि कंबोडिया को शक्तिशाली [[ख्मेर साम्राज्य]] के कथित पौराणिक [[अतीत]] में वापस लाना, विदेशी [[सहायता]] और [[पश्चिमी संस्कृति]] जैसे भ्रष्ट प्रभावों को मिटाना, और कंबोडिया के [[कृषिक समाज|कृषि समाज]] को बहाल करना।<ref>{{Cite web|url=https://www.history.com/topics/cold-war/the-khmer-rouge|title=Khmer Rouge|website=History.com|access-date=8 October 2019}}</ref>
पोल पॉट का मानना था कि कंबोडिया के ग्रामीण उत्तर-पूर्व में उनके अनुभव से कंबोडिया को एक कृषि [[यूटोपिया]] में बदलने की जरूरत है - जहाँ उन्होंने ख्मेर रूज ने सत्ता हासिल करने के दौरान क्षेत्र की अलग-अलग जनजातियों की कृषि आत्मनिर्भरता के लिए एक आत्मीयता विकसित की।<ref>{{Cite web|url=https://www.history.com/topics/cold-war/the-khmer-rouge|title=Khmer Rouge|website=History.com|access-date=2019-10-08}}</ref> इन लक्ष्यों (छोटे, ग्रामीण समुदायों की टिप्पणियों पर गठित) को एक बड़े समाज में लागू करने के प्रयास आगामी नरसंहार के प्रमुख कारण थे।{{Sfn|Alvarez|2001|p=50}}{{Sfn|Alvarez|2007|p=16}} एक ख्मेर रूज नेता ने कहा कि हत्याएं "जनसंख्या की शुद्धि" के लिए की गई थी।{{Sfn|Hannum|1989|pp=88–89}} ख्मेर रूज ने वस्तुतः कंबोडिया की पूरी जनता को खुद को लामबंद टोलियों में विभाजित करने के लिए मजबूर कर दिया।<ref name="Hunt">{{Cite book|title=The World Transformed: 1945 to the Present|last=Hunt|first=Michael H.|publisher=Oxford University Press|year=2014|isbn=978-0-19-937102-0|location=New York|pages=377}}</ref> माइकल हंट ने लिखा है कि यह "बीसवीं सदी की क्रांतियों में बेजोड़ सामाजिक लामबंदी में एक प्रयोग था।"<ref name="Hunt" /> ख्मेर रूज ने आबादी को काबू में रखने के लिए [[बेगार]] शासन, भुखमरी, जबरन पुनर्वास, [[सामूहिक कृषि|भूमि एकत्रीकरण]] और राज्य [[आतंक]] का इस्तेमाल किया।<ref name="Hunt" /> ख्मेर रूज की आर्थिक योजना को उपयुक्त रूप से "महा लाउट प्लोह" नाम दिया गया था, जो चीन के [[ग्रेट लीप फॉरवर्ड]] का सीधा संकेत था, जिसके कारण महान चीनी अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई थी।<ref name=":6">{{Cite web|url=http://www.visiontimes.com/2018/01/28/how-red-china-supported-the-brutal-khmer-rouge.html|title=How Red China Supported the Brutal Khmer Rouge|date=2018-01-28|website=Vision Times|access-date=2019-11-26}}</ref><ref name=":5">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=xZSpDwAAQBAJ&q=Maha+lout+ploh&pg=PA334|title=A History of Cambodia|last=Chandler|first=David|publisher=Routledge|year=2018|isbn=978-0-429-96406-0}}</ref>
<ref>{{Cite web|url=https://www.worldfoodprize.org/en/about_the_foundation/ambassador_kenneth_m_quinn/|title=Ambassador Kenneth M. Quinn|publisher=The World Food Prize Foundation|access-date=13 दिसंबर 2021|archive-date=1 अप्रैल 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230401011429/https://www.worldfoodprize.org/en/about_the_foundation/ambassador_kenneth_m_quinn/|url-status=dead}}</ref> बारे में केनेथ एम० क्विन द्वारा लिखित एक डॉक्टरेट शोध प्रबंध में "कट्टरपंथी पोल पॉट शासन की उत्पत्ति" के बारे में लिखा था, जिसे "पोल पॉट और ख्मेर रूज की नरसंहारी नीतियों पर रिपोर्ट करने वाले पहले व्यक्ति" के रूप में स्वीकार किया जाता है।"<ref name=":19">{{Cite news|url=https://www.thegazette.com/subject/news/kenneth-quinn-reflects-on-world-food-prize-diplomacy-20190617|title=Kenneth Quinn: From Cambodia's 'killing fields' to Iowa's Field of Dreams|last=Boshart|first=Rod|date=17 June 2019|work=The Gazette|access-date=14 September 2020}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://www.jstor.org/stable/j.ctt1npbv9|title=The Pol Pot Regime… 1975–79: Race, Power, and Genocide in Cambodia under the Khmer Rouge|last=Kiernan|first=Ben|publisher=Yale University Press|year=2008|isbn=978-0-300-14299-0|location=New Haven, CT|pages=65–101|chapter=Cleansing the Countryside: Race, Power, and the Party, 1973–75|jstor=j.ctt1npbv9}}</ref> जब वे दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिकी विदेश विभाग के लिए एक विदेश सेवा अधिकारी के रूप में दाखिल थे, क्विन १९७३-१९७४ के बीच नौ महीने के लिए दक्षिण वियतनामी सीमा पर तैनात थे।<ref name=":22">{{Cite web|url=https://kh.usembassy.gov/wp-content/uploads/sites/80/2016/06/book_us_cambodia_relations.pdf|title=60h Anniversary of Diplomatic Relations between the United States and Cambodia|date=July 2016|website=U.S. Embassy in Cambodia|page=38|access-date=14 September 2020}}</ref> वहाँ रहते हुए क्विन ने "अनगिनत कंबोडियाई शरणार्थियों का साक्षात्कार लिया जो ख्मेर रूज के क्रूर चंगुल से बच गए थे।"<ref name=":22" /> संकलित [[साक्षात्कार|साक्षात्कारों]] और उनके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से देखे गए [[अत्याचार|अत्याचारों]] के आधार पर क्विन ने इसके बारे में एक ४०-पृष्ठ की रिपोर्ट लिखी, जिसे पूरे अमेरिकी सरकार के हर कर्मचारी को भेजा गया।<ref name=":19" /> [[रिपोर्ट]] में उन्होंने लिखा है कि ख्मेर रूज में "[[नाजी जर्मनी]] और [[सोवियत संघ]] के [[अधिनायकवाद]] से बहुत सामान्य था।"{{Sfn|Power|2002|p=96}} क्विन ने ख्मेर रूज के बारे में लिखा है कि "एक चीज़ है जो १९७० के दशक के दौरान कंबोडिया में फैले आतंक और हिंसा की व्याख्या के रूप में उभरता है, कि अलग-थलग पड़े बुद्धिजीवियों का एक छोटा समूह जो पूरी तरह से भ्रष्ट समाज की अपनी धारणा से क्रोधित है और कम से कम समय में एक शुद्ध [[समाजवादी]] [[व्यवस्था]] बनाने की [[माओवाद|माओवादी]] योजना से ओतप्रोत, अत्यंत युवा, गरीब और ईर्ष्यालु लड़ाकुओं की भर्ती की, उन्हें स्टालिनवादी आकाओं से सीखे गए कठोर और क्रूर तरीकों में निर्देश दिया, और उनका उपयोग भौतिक रूप से सांस्कृतिक आधार को नष्ट करने के लिए और सभ्यता के शुद्धिकरण, फाँसी और हिंसा के माध्यम से एक नया समाज लागू करने के लिए प्रयोग किया गया।"{{Sfn|Hinton|Lifton|2004|p=23}}
बेन किएरनन ने कंबोडियाई नरसंहार की तुलना [[आर्मीनियाई जनसंहार|अर्मेनियाई जनसंहार]] से की है जो [[पहला विश्व युद्ध|प्रथम विश्व युद्ध]] के दौरान [[उस्मानी साम्राज्य]] द्वारा किया गया था और [[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] के दौरान [[नाज़ी जर्मनी|नाजी जर्मनी]] द्वारा [[यहूदी नरसंहार]] किया गया था। भले ही प्रत्येक नरसंहार अद्वितीय था, उनमें कुछ सामान्य विशेषताएँ थी, और [[नस्लवाद]] तीनों शासनों की विचारधारा का एक प्रमुख हिस्सा था। तीनों शासनों ने धार्मिक [[अल्पसंख्यक|अल्पसंख्यकों]] पर निशाना साधा और उन्होंने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए बल का उपयोग करने की भी कोशिश की, जिसे वे अपना ऐतिहासिक हृदय क्षेत्र मानते थे (क्रमशः ख्मेर साम्राज्य, [[तुर्किस्तान|तुर्केस्तान]] और लेबेन्सराऊम), और तीनों शासनों ने "अपने जातीय किसानों को सच्चे 'राष्ट्रीय' वर्ग के रूप में आदर्श बनाया, वह जातीय मिट्टी जिससे नया राज्य विकसित हुआ।"{{Sfn|Kiernan|2003|p=29}}
== नरसंहार ==
=== वर्गसंहार ===
ख्मेर रूज शासन ने अक्सर उन लोगों को गिरफ्तार किया और मारा जिनके ऊपर पूर्व कंबोडियाई सरकार या विदेशी सरकारों के साथ संबंध था, साथ ही सभी पेशेवरों, बुद्धिजीवियों, [[भिक्खु|बौद्ध भिक्षुओं]] और जातीय अल्पसंख्यकों को भी मारा गया। यहाँ तक कि उन लोगों का भी संहार किया गया जिन्हें बौद्धिक गुणों के रूप में माना जाता था, जैसे कि जो लोग चश्मा पहनते या कई भाषाएं बोल सकते थे, क्योंकि शासन को डर था कि वे ख्मेर रूज के खिलाफ विद्रोह कर देंगे।<ref>{{Cite web|url=https://www.history.com/topics/cold-war/the-khmer-rouge|title=Khmer Rouge|date=2018-08-21|website=Hisory.com|access-date=2019-10-08}}</ref> इस कारण से पोल पॉट को विलियम ब्रैनिगिन जैसे पत्रकारों और इतिहासकारों द्वारा "एक नरसंहार तानाशाह" के रूप में वर्णित किया गया है।<ref>William Branigin, [https://web.archive.org/web/20130509211319/http://www.highbeam.com/doc/1P2-664002.html Architect of Genocide Was Unrepentant to the End] ''[[The Washington Post]]'', 17 April 1998</ref> अंग्रेज़ [[समाजशास्त्री]] मार्टिन शॉ ने कंबोडियाई नरसंहार को "[[शीतयुद्ध|शीत युद्ध]] के युग का सबसे शुद्ध नरसंहार" बताया। कंबोडियाई समाज को नस्लीय, सामाजिक और राजनीतिक आधार पर शुद्ध करने के प्रयास ने कंबोडिया के पिछले सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ व्यापारिक नेताओं, पत्रकारों, छात्रों, डॉक्टरों और वकीलों को भी मिटा दिया।{{Sfn|Alvarez|2001|p=12}}
जातीय वियतनामी, जातीय [[थाई लोग|थाई]], जातीय [[चीनी जनवादी गणराज्य|चीनी]], जातीय [[चाम लोग|चाम]], [[कंबोडिया में धर्म|कंबोडियाई ईसाई]] और अन्य अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया गया। ख्मेर रूज ने अल्पसंख्यक समूहों का जबरन स्थानांतरण कर दिया और उनकी भाषाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। डिक्री द्वारा ख्मेर रूज ने २० से अधिक अल्पसंख्यक समूहों के अस्तित्व पर प्रतिबंध लगा दिया जो कंबोडिया की १५% आबादी का गठन करते थे।<ref name="specter">{{Cite book|url=https://archive.org/details/specterofgenocid00robe|title=The Specter of Genocide: Mass Murder in Historical Perspective|last=Gellately|first=Robert|last2=Kiernan|first2=Ben|publisher=[[Cambridge University Press]]|year=2003|pages=[https://archive.org/details/specterofgenocid00robe/page/313 313]–314|url-access=registration}}</ref>
=== जातीय पीड़ित ===
[[चित्र:Photos_of_victims_in_Tuol_Sleng_prison_(2).JPG|अंगूठाकार| तुओल स्लेंग नरसंहार संग्रहालय के कमरों में ख्मेर रूज द्वारा अपने पीड़ितों के लिए ली गई हजारों तस्वीरें हैं।]]
जबकि कंबोडियाई सामान्य रूप से ख्मेर रूज शासन के शिकार थे, ख्मेर रूज द्वारा किए गए उत्पीड़न, यातना और हत्याओं को [[संयुक्त राष्ट्र]] ने नरसंहार का कार्य माना क्योंकि पोल पॉट और उनके शासन द्वारा जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से लक्षित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://news.un.org/en/story/2018/11/1025981|title=UN genocide adviser welcomes historic conviction of former Khmer Rouge leaders|date=2018-11-16|website=UN News|language=en|access-date=2021-01-22|archive-date=19 जुलाई 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240719092705/https://news.un.org/en/story/2018/11/1025981|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2018/11/15/world/asia/khmer-rouge-cambodia-genocide.html|title=Khmer Rouge's Slaughter in Cambodia Is Ruled a Genocide (Published 2018)|last=Beech|first=Hannah|date=2018-11-16|work=The New York Times|access-date=2021-01-22|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref>
ख्मेर रूज के हाथों उत्पीड़न और हत्याओं को नरसंहार माना जाना चाहिए या नहीं, इस पर विद्वानों और इतिहासकारों की अलग-अलग राय हैं, क्योंकि १९७९ में ख्मेर रूज शासन के पतन के ठीक बाद आई [[छात्रवृत्ति]] ने दावा किया था कि पीड़ितों को उन परिस्थितियों के कारण मारा जा सकता था। उदाहरण के लिए माइकल विकरी ने कहा कि हत्याएं "बड़े पैमाने पर एक प्रतिशोधी, अनुशासनहीन किसान सेना की सहज ज्यादतियों का परिणाम थीं।"<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/cambodia1975198200mich|title=Cambodia: 1975–1982|last=Vickery|first=Michael|publisher=South End Press|year=1984|location=Boston|url-access=registration}}</ref>
इस नजरिए का अलेक्जेंडर हिंटन ने समर्थन किया, जिन्होंने ख्मेर रूज के एक पूर्व काडर के बारे में बताया जिसने दावा किया कि हत्याएँ लोन नॉल सैनिकों के अन्याय का जवाब है। वे सैनिक पोल पॉट और ख्मेर रूज के आने से पहले पूर्व [[वियत मिन्ह]] एजेंटों को मारते थे।{{Sfn|Etcheson|2005|pp=45–47}} विकरी ने एक बार ग़लती से, तर्क दिया कि ख्मेर रूज शासन के दौरान चाम पीड़ितों की संख्या लगभग २०,०००<ref>{{Cite book|title=The Pol Pot Regime: Race, Power and Genocide in Cambodia under the Khmer Rouge, 1975–79|last=Kiernan|first=Ben|publisher=Yale University Press|year=2002|edition=Second|location=New Haven and London|pages=254–255}}</ref> थी जो पॉल पॉट और ख्मेर रूज के खिलाफ नरसंहार के अपराध से इनकार करेगा। ख्मेर रूज शासन द्वारा हत्याएं एक केंद्रीकृत और नौकरशाही प्रयास थीं, जैसा कि हाल ही में कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र (डीसी-कैम) द्वारा ख्मेर रूज आंतरिक सुरक्षा दस्तावेजों की खोज के माध्यम से प्रलेखित किया गया था, जिसने कंबोडिया में हत्याओं का निर्देश दिया था।{{Sfn|Etcheson|2005|pp=78–79}} हालांकि "सामूहिक हत्याओं में अनुशासनहीनता और सहजता" के उदाहरण भी थे।{{Sfn|Etcheson|2005|pp=84–85}} इसके शीर्ष पर, एचरसन ने यह भी बनाए रखा है कि राजनीतिक संबद्धता, जातीयता, धर्म और नागरिकता के आधार पर व्यवस्थित सामूहिक हत्याओं के परिणामस्वरूप कंबोडियाई आबादी का एक तिहाई नुकसान हुआ, ख्मेर रूज नरसंहार करने के लिए प्रभावी रूप से दोषी है .{{Sfn|Etcheson|2005|pp=10–11}}
डेविड चांडलर ने तर्क दिया है कि भले ही जातीय अल्पसंख्यक ख्मेर रूज शासन के शिकार हुए, उन्हें विशेष रूप से उनकी जातीय पृष्ठभूमि के कारण लक्षित नहीं किया गया था, बल्कि इसलिए कि वे ज्यादातर शासन के दुश्मन थे।<ref>(Kiernan, 2002:252; see also the footnote on Chandler’s ''The Tragedy of Cambodian History'', pp. 4, 263–265, 285)</ref> चांडलर ने हिटलर के साथ संभावित समानताएं खींचने से बचने के लिए "अंधराष्ट्रीयता" और "नरसंहार" शब्दों के इस्तेमाल को भी खारिज कर दिया। इससे पता चलता है कि चांडलर ख्मेर रूज शासन पर नरसंहार के अपराध का आरोप लगाने के तर्क में विश्वास नहीं करते हैं। माइकल विकरी चांडलर की बातों से सहमति रखते हैं, और ख्मेर रूज शासन के अत्याचारों को नरसंहार के रूप में स्वीकार करने से इनकार करते हैं; वियतनाम विरोधी और धर्म विरोधी नीतियों के कारण विकीरी ने ख्मेर रूज को एक "अंधराष्ट्रवादी" शासन माना।<ref>Kiernan, 2002:252; see Vickery’s ''Cambodia 1975–1982'', pp. 181–182, 255, 258, 264–265)</ref> स्टीफन हेडर यह भी मानते हैं कि ख्मेर रूज नरसंहार के दोषी नहीं थे, यह बताते हुए कि शासन के अत्याचार नस्ल से प्रेरित नहीं थे।<ref>Kiernan, 2002:252; see Heder’s ''From Pol Pot to Pen Sovan to the Villages'', p. 1</ref>
बेन कीरन ने तर्क दिया कि यह वास्तव में एक नरसंहार था और इन तीन विद्वानों से असहमति दिखाते हैं, जिसके लिए वे कंबोडिया में [[चाम लोग|चाम लोगों]] के इतिहास का उदाहरण देते हैं, जैसा कि एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने नुओन ची और खिउ सम्फन को ९२ और ८७ क्रमशः मामलों में दोषी पाया।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2018/11/15/world/asia/khmer-rouge-cambodia-genocide.html|title=Khmer Rouge's Slaughter in Cambodia Is Ruled a Genocide Photographs of victims of the Khmer Rouge at the Tuol Sleng Genocide Museum in Phnom Penh, Cambodia, on Thursday. Credit Adam Dean for The New York Times Image|last=Beech|first=Hannah|date=16 November 2018|work=The New York Times}}</ref>
==== वियतनामी ====
ख्मेर रूज ने शुरू में कंबोडिया से जातीय वियतनामी के निष्कासन का आदेश दिया था, लेकिन फिर बड़ी संख्या में वियतनामी [[नागरिक समाज|नागरिकों]] का बड़े पैमाने पर [[नरसंहार]] किया जिन्हें कंबोडिया से बाहर निकाला जा रहा था।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=AZeaAAAAQBAJ&pg=PA128|title=Revolution and Genocide in Ethiopia and Cambodia|last=Edward Kissi|date=2006|isbn=978-0-7391-6037-4|page=128}}</ref> [[शासन]] ने शेष २०,००० वियतनामियों को भागने से रोक दिया और इस समूह के अधिकांश को भी मार डाला।<ref name=":8"/> ख्मेर रूज ने नरसंहार के अपने लक्ष्यों का समर्थन करने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल किया। रेडियो नोम पेन्ह ने कंबोडियाई लोगों से ५ करोड़ वियतनामियों को खत्म करने का आह्वान किया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=ePjUrqrx8HkC&pg=PA176|title=British Foreign Policy since 1870|last=Will Podmore|date=2008|isbn=978-1-4628-3577-5|page=176}}</ref>
इसके अतिरिक्त ख्मेर रूज ने वियतनाम में कई सीमा पार छापे मारे जहाँ उन्होंने अनुमानित ३०,००० वियतनामी नागरिकों को मार डाला।<ref>{{Cite book|title=Death by Government|last=Rummel|first=R. J.|date=2011|isbn=978-1-4128-2129-2|page=[https://books.google.com/books?id=N1j1QdPMockC&pg=PA191&lpg=PA191 191]}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=27W92eiEuY4C&pg=PA69|title=Genocide Since 1945|last=Philip Spencer|year=2012|isbn=978-0-415-60634-9|page=71}}</ref> सबसे विशेष रूप से अप्रैल १९७८ में बा चाक नरसंहार के दौरान, ख्मेर रूज सेना ने सीमा पार की और गांव में प्रवेश किया, एक बार में ३,१५७ वियतनामी नागरिकों की हत्या कर दी। इसने वियतनामी सरकार से तत्काल प्रतिक्रिया को मजबूर कर दिया, जिससे कंबोडियन-वियतनामी युद्ध शुरू हो गया जिसमें ख्मेर रूज अंततः हार गया।{{Sfn|Brinkley|2011|p=[https://books.google.com/books?id=C3bsidxFIuEC&pg=PA56 56]}}{{Sfn|SarDesai|1998|pp=[https://books.google.com/books?id=4nWqBAAAQBAJ&q=161#v=snippet&q=161&f=false 161]–[https://books.google.com/books?id=4nWqBAAAQBAJ&q=163#v=snippet&q=163&f=false 163]}}
==== चीनी ====
ख्मेर रूज शासन के दौरान चीनी कंबोडियाई राज्य को "दक्षिणपूर्व एशिया में किसी भी जातीय चीनी समुदाय के लिए अब तक की सबसे बुरी आपदा" कहा जाता है।<ref name="specter"/> चीनी मूल के कंबोडियाई लोगों को ख्मेर रूज द्वारा नरसंहार का कारण बताया जाता था कि वे "कम्बोडियाई लोगों का शोषण करते थे"।<ref name="rpg" /> चीनी व्यापारियों और साहूकारों के रूप में पूंजीवाद से जुड़े हुए थे, जबकि ऐतिहासिक रूप से समूह ने अपने हल्के [[मानव त्वचा का रंग|त्वचा के रंग]] और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण नाराजगी को आकर्षित किया था।<ref>{{Cite book|title=Why Did They Kill? Cambodia in the Shadow of Genocide|last=Hinton, Alexander Laban|publisher=[[University of California Press]]|year=2005|page=54}}</ref> १९७८ में सैकड़ों चाम, चीनी और ख्मेर परिवारों को गोलबंद किया गया और कहा गया कि उन्हें फिर से बसाया जाना था, लेकिन वास्तव में उन्हें मार दिया गया था।<ref name="rpg">{{Cite book|title=The Pol Pot regime: Race, Power, and Genocide in Cambodia under the Khmer Rouge|last=Kiernan|first=Ben|publisher=[[Yale University Press]]|year=2008|page=431|author-link=Ben Kiernan}}</ref>
१९७५ में ख्मेर रूज शासन की शुरुआत में कंबोडिया में ४,२५,००० जातीय चीनी थे। १९७९ के अंत तक केवल २,००,००० लोग बचे हुए थे, और वे भी थाई शरणार्थी स्थलों या कंबोडिया में फसे हुए थे। १,७०,००० चीनी कंबोडिया से वियतनाम भाग गए जबकि अन्य को दूसरे देशों में भेज दिया गया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=7-ExBwAAQBAJ&pg=PA244|title=The Age of Asian Migration: Continuity, Diversity, and Susceptibility Volume 1|last=Chan|first=Yuk Wah|last2=Haines|first2=David|last3=Lee|first3=Jonathan|date=2014|publisher=Cambridge Scholars Publishing|isbn=978-1-4438-6569-2|page=244}}</ref> चीनी मुख्य रूप से शहरी थे, जिससे उन्हें ख्मेर रूज के क्रांतिकारी ग्रामीणवाद और शहर के निवासियों को खेतों में निकालने का खतरा था।<ref name="specter"/> [[पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना]] की सरकार ने कंबोडिया में जातीय चीनी की हत्याओं का विरोध नहीं किया क्योंकि वे शायद स्थिति से अनजान थे।<ref>{{Cite book|title=Remapping Asian American History|last=Chan|first=Sucheng|publisher=[[Rowman & Littlefield]]|year=2003|page=189}}</ref>
==== चाम मुसलमान ====
बेन किएरनन के अनुसार "सबसे भीषण विनाश अभियान कंबोडिया के मुस्लिम अल्पसंख्यक, [[चाम लोग|चाम लोगों]] के खिलाफ निर्देशित किया गया था।"{{Sfn|Kiernan|2003|p=30}} [[इस्लाम]] को एक "विदेशी" और "बाहरी" [[संस्कृति]] के रूप में देखा गया जो नई [[साम्यवादी]] [[प्रणाली]] में शामिल नहीं थी। शुरुआत में ख्मेर रूज का उद्देश्य [[जनसंख्या]] के फैलाव के माध्यम से चाम लोगों को जबरन आत्मसात करना था। पोल पॉट ने फिर चाम लोगों को डराने-धमकाने का प्रयास किया, जिसमें गांव के बुजुर्गों की हत्या भी शामिल थी, लेकिन उन्होंने आखिर में चाम लोगों की पूर्ण पैमाने पर सामूहिक हत्या का आदेश दिया। [[अमेरिकी]] [[प्रोफेसर]] सैमुअल टॉटेन और [[ऑस्ट्रेलिया|ऑस्ट्रेलियाई]] प्रोफेसर पॉल आर. बार्ट्रॉप का अनुमान है कि इन प्रयासों से चाम की आबादी पूरी तरह से समाप्त हो जाती यदि यह १९७९ में ख्मेर रूज को उखाड़ फेंकने के लिए नहीं होती।<ref name="Totten">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=rgGA91skoP4C&pg=PA64|title=Dictionary of Genocide: A–L|last=Totten|first=Samuel|last2=Bartrop|first2=Paul R.|date=2008|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-0-313-34642-2|page=64|author-link=Samuel Totten|author-link2=Paul R. Bartrop|access-date=15 April 2017}}</ref>
१९५० के दशक की शुरुआत में साम्यवाद में शामिल होने के माध्यम से चाम प्रमुखता से बढ़ने लगा जब एक चाम बुजुर्ग, सोस मान इंडोचाइना कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और पार्टी की ताकतों में एक प्रमुख बनने के लिए ऊँचे पद पर उठे। वे १९७० में पूर्वी क्षेत्र में घर लौट आए और कम्पूचिया की [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी]] में शामिल हो गए, और अपने बेटे माट ली के साथ पूर्वी क्षेत्र इस्लामिक आंदोलन की स्थापना की। साथ में वे चाम लोगों को क्रांति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी का मुखपत्र बन गए। १९७०-१९७५ के बीच कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के नेतृत्व द्वारा एसओएस मैन के इस्लामिक आंदोलन को भी सहन किया गया। चाम लोगों को धीरे-धीरे दक्षिण-पश्चिम में १९७२ की शुरुआत में अपने विश्वास और विशिष्ट प्रथाओं को त्यागने के लिए प्रोत्साहित किया गया।{{Sfn|Kiernan|2002|p=258}}
१९७२-१९७३ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी ने दस चाम [[गाँव|गांवों]] पर कब्जा कर लिया, जहाँ नए चाम [[राजनेता|नेताओं]] को स्थापित किया गया और ग्रामीणों को उनके गृहनगर से दूर खेतों में काम करने के लिए प्रेरित किया। किएरनन द्वारा [[साक्षात्कार]] में दिए गए एक गवाह ने दावा किया कि उस समय कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, और १९७४ में उन्हें अपने घरों में लौटने की अनुमति दे दी गई।{{Sfn|Kiernan|2002|p=259}} इसके अलावा चाम को "जमाकर्ता आधार वाले लोगों" के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिससे वे उत्पीड़न के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गए। इसके बावजूद कई क्षेत्रों में चाम स्थानीय लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रहते हैं, ख्मेर भाषा बोलते हैं, और यहाँ तक कि बहुसंख्यक ख्मेरों के साथ-साथ अल्पसंख्यक चीनी और वियतनामी के साथ अंतर्विवाह भी करते हैं।{{Sfn|Kiernan|2002|p=57}} १९७२ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के उदय के साथ कंबोडियाई लोगों की विविध जातीय और [[सामाजिक प्रथा|सांस्कृतिक प्रथाएँ]] बिगड़ने लगीं, जब चाम लोगों को उनके विश्वास और संस्कृति का अभ्यास करने से मना कर दिया गया: चाम महिलाओं को ख्मेरों की तरह अपने बाल छोटे रखना आवश्यक था; चाम पुरुषों को सारोंग पहनना [[निषेध]] था; किसानों को काले कपड़े पहनने के लिए कहा जाता था; अनिवार्य दैनिक प्रार्थना जैसी धार्मिक गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया गया।{{Sfn|Kiernan|2002|p=258}} विकरी ने ध्यान दिया कि कुछ इलाकों में युद्ध की शुरुआत से पहले ख्मेर द्वारा कंबोडियाई चाम के साथ भेदभाव किया गया था, कभी-कभी इसलिए क्योंकि चाम लोगों को काले जादू के चिकित्सकों के रूप में माना जाता था।{{Sfn|Kiernan|2002|p=256}}<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/cambodia197519820000vick|title=Cambodia: 1975–1982|last=Vickery|first=Michael|publisher=South End Press|year=1984|location=Boston|pages=[https://archive.org/details/cambodia197519820000vick/page/181 181]|url-access=registration}}</ref> अन्य इलाकों में ख्मेर भाषा बोलने वाले और ख्मेर वियतनामी और चीनी से शादी करने वाले मेजबान समुदायों के भीतर चाम लोगों को अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया गया था।
१९७२ और १९७४ के बीच इस तरह के प्रतिबंधों के प्रवर्तन को और बढ़ाया गया क्योंकि ख्मेर रूज ने चाम लोगों को अपनी [[अनूठा|अनूठी]] [[भाषा]], [[संस्कृति]], [[मजहब]] और स्वतंत्र सांप्रदायिक व्यवस्था के कारण अपने साम्यवादी एजेंडे के लिए खतरा पाया। इतना ही नहीं, चाम का नाम बदलकर "इस्लामिक ख्मेर" कर दिया गया ताकि उन्हें उनकी पैतृक विरासत और धरोहर को अलग किया जा सके और उन्हें बड़े ख्मेर-प्रभुत्व वाले लोकतांत्रिक कम्पूचिया में आत्मसात किया जा सके। ख्मेर रूज का मानना था कि चाम लोग [[घनिष्ठ]] समुदायों की स्थापना कर देंगे जहाँ हर किसी पर आसानी से नजर रखी जा सकती है, और यह साम्यवादी प्रयासों को खतरे में डाल देगा। इस कारण से शासन ने निर्णय लिया कि चाम लोगों को उनके इलाकों से निकालकर कंबोडिया के अलग-अलग जिलों में भेज दिया जाएगा जहाँ वे किसान के रूप में काम करेंगे, जिससे सीधे नई लोकतांत्रिक कम्पूचिया की अर्थव्यवस्था में योगदान मिलेगा। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था कि चाम फिर से अपना समुदाय बनाने के लिए एकत्र नहीं होंगे, जिससे केंद्रीय आर्थिक सहकारी समितियों की स्थापना की शासन की योजना कमजोर हो सकती थी। धीरे-धीरे इन प्रतिबंधों की अवहेलना करने वालों को शासन द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। इसलिए अक्तूबर १९७३ में लोकतांत्रिक कम्पूचिया के पूर्वी क्षेत्र में चाम मुसलमानों ने ढोल पीटकर कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी प्रतिबंधों के प्रति अपनी नाराजगी का प्रदर्शन किया - स्थानीय मस्जिदों में पारंपरिक रूप से दैनिक प्रार्थना के समय के बारे में स्थानीय लोगों को सूचित किया जाता था। सांप्रदायिक अवज्ञा के इस कृत्य ने कई चाम मुस्लिम नेताओं और धार्मिक शिक्षकों की व्यापक गिरफ्तारी को प्रेरित किया।<ref name=":18">{{Cite book|url=https://archive.org/details/specterofgenocid00robe|title=The specter of genocide : mass murder in historical perspective|last=Gellately|first=Robert|last2=Kiernan|first2=Ben|date=2003|publisher=New York : Cambridge University Press|others=Internet Archive|pages=[https://archive.org/details/specterofgenocid00robe/page/260 260]–261|url-access=registration}}</ref>
फरवरी १९७४ में क्षेत्र ३१, जो लोकतांत्रिक कम्पूचिया के पश्चिमी क्षेत्र में है, में रहने वाले चाम लोगों ने कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी नीति का विरोध किया, जिसके लिए [[मछुआरों]] को स्थानीय सहकारी के साथ अपनी दैनिक पकड़ दर्ज करने और कम कीमत पर सहकारी को बेचने की आवश्यकता थी। साथ ही स्थानीय लोगों से भी उन [[मछलियों]] को सहकारी समिति से ऊंचे दाम पर खरीदने को कहा गया। एक खाते के अनुसार इसने स्थानीय लोगों को अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिए सहकारी का सामना करने के लिए प्रेरित किया, जिसके चलते १०० से अधिक लोगों की गोली मारकर हत्या की गई और कई घायल भी हो गए। दिसंबर १९७४ तक पूर्वी क्षेत्र के क्षेत्र २१ में चाम द्वारा विद्रोह समुदाय के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के खिलाफ छिड़ गया था। शासन द्वारा विद्रोह को जबरदस्ती दबा दिया गया था, जिसमें हताहतों की संख्या का कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं था।<ref name=":18"/>
इन [[प्रतिबाधा|प्रतिबंधों]], [[प्रतिरोधकता|प्रतिरोधों]] और [[दबाव]] के जितने भी [[अभिलेख]] हैं, चाम समुदाय की ओर से भी अभिलेख हैं जो कहते हैं कि १९७० और १९७५ की शुरुआत के बीच उनके ऊपर शासन द्वारा कोई उत्पीड़न नहीं हुआ। जबकि उस अवधि के दौरान व्यापार और यात्रा जैसी कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध थे, उन्हें चल रहे गृहयुद्ध के उप-उत्पादों के रूप में समझा गया था। इसके अलावा कुछ चाम सैनिकों और कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के सदस्यों के रूप में भी [[क्रांति]] में शामिल हुए थे। कुछ स्थानीय समाचारों के अनुसार लोगों को ख्मेर रूज में तब से ही विश्वास था जब वे पहली बार ग्राम समुदायों में आकर स्थानीय लोगों को [[भोजन]] और [[प्रावधान|प्रावधानों]] के साथ [[सहायता]] करते थे, और स्थानीय संस्कृति या धर्म पर कोई प्रतिबंध नहीं था; भले ही प्रतिबंध लगाए गए हो, लेकिन परिणाम कठोर नहीं थे।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/specterofgenocid00robe|title=The specter of genocide : mass murder in historical perspective|last=Gellately|first=Robert|last2=Kiernan|first2=Ben|date=2003|publisher=New York : Cambridge University Press|others=Internet Archive|pages=[https://archive.org/details/specterofgenocid00robe/page/262 262]|url-access=registration}}</ref> कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी को क्रांति का नायक माना जाता था क्योंकि उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ किसानों और [[राष्ट्र]] के लिए [[संघर्ष]] किया था। चुकी चाम समुदायों को लोकतांत्रिक कम्पूचिया में पाया जाना था, इसलिए विभिन्न चाम समुदायों ने कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के १९७५ से पहले के प्रभावों को अलग-अलग तरीकों से अनुभव किया था; कुछ समुदायों ने दबाव और प्रतिबंधों को अनुभव किया जबकि कुछ ने नहीं किया। लेकिन जब पोल पॉट ने १९७५ के अंत तक [[सत्ता]] को समेकित किया था तब उत्पीड़न अधिक गंभीर हो गया और सभी चाम लोगों को अंधाधुंध रूप से प्रभावित किया। यह उन सरल कारकों में से एक हो सकता है जिसके कारण कंबोडियाई सरकार और ''कंबोडिया की अदालतों में असाधारण मंडल'' ने पोल पॉट के १९७५ में सत्ता में आने से पहले के ख्मेर रूजी अपराधों पर मुकदमा नहीं चलाया। जैसे १९७५ से पहले दबाव का अनुभव करने वालों की बातों को नरसंहार का हिस्सा नहीं माना जाता था क्योंकि यह जातीय या धार्मिक आधार पर नहीं किया जा रहा था।
१९७५ में ख्मेर गणराज्य बलों पर कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी की जीत पर ख्मेर रूज में शामिल दो चाम वंश के [[भाई]] सैनिकों के रूप में [[कम्पोंग चाम प्रान्त|काम्पोंग चाम प्रांत]] के भीतर क्षेत्र २१ में घर लौट आए, जहाँ सबसे बड़ा चाम मुसलमान समुदाय पाया जा सकता था। भाइयों ने फ़िर अपने [[पिता]] को उन कारनामों के बारे में बताया जो उन्होंने क्रांति के दौरान अनुभव किया जिसमें ख्मेरों को मारना और [[सूअर]] का [[मांस]] खाना शामिल था। उन्हें उम्मीद थी कि ये सब सुनकर उनके पिता को साम्यवादी लक्ष्य में शामिल होने के लिए तैयार हो जाएंगे। पिता, जो चुप थे, स्पष्ट रूप से अपने पुत्रों की कहानियों से चिंतित नहीं थे। इसके बजाय उन्होंने एक विदारक [[औज़ार|औज़ार]] से अपने बेटों को मार डाला, और अपने साथी ग्रामीणों से कहा कि उन्होंने दुश्मन को मार डाला है। जब गाँववालों ने कहा कि उन्होंने वास्तव में अपने ही [[बेटा|बेटों]] की हत्या की थी, तो उन्होंने अपने बेटों द्वारा सुनाई गई पहले की कहानियों का वर्णन किया कि ख्मेर रूज इस्लाम और चाम लोगों से नफरत करता है। इसके कारण सभी गाँववालों ने एक साथ निर्णय लिया कि सभी ख्मेर रूज [[सैनिकों]] को उसी रात मार दिया जाए। अगली सुबह दूसरे ख्मेर रूज सैनिक भारी हथियारों के साथ इस क्षेत्र में पहुँचे और गाँव को घेरकर सभी गाँववालों को मार डाला।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/specterofgenocid00robe|title=The specter of genocide : mass murder in historical perspective|last=Gellately|first=Robert|last2=Kiernan|first2=Ben|date=2003|publisher=New York : Cambridge University Press|others=Internet Archive|pages=[https://archive.org/details/specterofgenocid00robe/page/263 263]|url-access=registration}}</ref>
इसी तरह जून या जुलाई १९७५ में पूर्वी स्थान के क्षेत्र २१ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के अधिकारियों ने लोगों से [[कुरान]] की सभी प्रतियां जब्त करने की कोशिश की, साथ ही चाम महिलाओं को बाल छोटे करने का आदेश दिया। [[अधिकारी|अधिकारियों]] को स्थानीय चाम समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के साथ मुलाकात करनी पड़ी, जिन्हें शासन के सैनिकों द्वारा गोली मार दी गई। चाम लोगों ने तलवार और धारियों से कुछ सैनिकों को मार डाला, जिससे उनकी सैन्य सुदृढीकरण के साथ मुलाकात हुई, जिसने ग्रामीणों और उनकी संपत्तियों को नष्ट कर दिया।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/specterofgenocid00robe|title=The specter of genocide : mass murder in historical perspective|last=Gellately|first=Robert|last2=Kiernan|first2=Ben|date=2003|publisher=New York : Cambridge University Press|others=Internet Archive|pages=[https://archive.org/details/specterofgenocid00robe/page/263 263]–264|url-access=registration}}</ref> [[मलेशिया]] में चाम शरणार्थियों के एक अन्य समाचार में जून १९७५ में शासन द्वारा चाम [[मुसलमान]] [[समुदाय]] के भीतर तेरह प्रमुख व्यक्ति मारे गए। हत्याओं के पीछे का कारण माना जाता है कि उनमें से कुछ कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी की बैठक में भाग लेने के नाम पर प्रार्थना चलवा रहे थे, जबकि अन्य कथित तौर पर "विवाह समारोहों की अनुमति के लिए याचिका दायर कर रहे थे।"{{Sfn|Kiernan|2002|p=263}}
१९७६ के मध्य में [[विद्रोह]] के कारण हालात बद से बदतर होते गए। जातीय अल्पसंख्यक केवल ख्मेर राष्ट्रीयता और धर्म के प्रति वफादारी की प्रतिज्ञा करने के लिए बाध्य थे: ख्मेर के अलावा कोई अन्य पहचान नहीं थी। नतीजतन चाम [[भाषा]] का [[उच्चारण]] नहीं किया गया, और सांप्रदायिक भोजन अनिवार्य हो गया जहाँ हर कोई एक ही [[भोजन]] खाता था, जिसके कारण चाम मुसलमानों को सूअर पालने और अपने धार्मिक विश्वास के खिलाफ सूअर का [[मांस]] खाने के लिए मजबूर होना पड़ा।{{Sfn|Kiernan|2002|p=269}} स्थानीय लोगों द्वारा पेश किए गए इस तरह के विद्रोहों के [[कारण]] एक स्पष्टीकरण है कि कुछ चाम ख्मेर रूज में सैनिकों के रूप में शामिल थे, जो पोल पॉट के सत्ता में आने के बाद सत्ता की स्थिति का अनुमान लगा रहे थे। १९७५ में इन सैनिकों को ख्मेर रूज बल से बर्खास्त कर दिया गया, उनकी [[इस्लामी]] प्रथाओं से वंचित कर दिया गया और उनकी जातीय पहचान को लूट लिया गया।{{Sfn|Kiernan|2002|p=264}}
चाम लोगों की हत्याओं के दौरान [[प्रतिरूप]] सुसंगत थे: पहले मुफ्ती, इमाम और प्रभाव के अन्य विद्वान लोगों समेत चाम मुस्लिम नेताओं की हत्या के माध्यम से सांप्रदायिक ढांचे को खत्म किया गया। फ़िर चाम को ख्मेरों से अलग करने वाली प्रथाओं को प्रतिबंधित करके चाम की इस्लामी और जातीय पहचान को खत्म किया। इसके बाद अपने समुदायों से चाम का फैलाव या तो खेतों में जबरन मजदूरी करके या [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी]] के खिलाफ प्रतिरोध या विद्रोह का झूठा आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। ख्मेर रूज युग के दौरान [[बौद्ध धर्म]] और इस्लाम सहित सभी [[धर्म|धर्मों]] को सताया गया था। चाम के सूत्रों के अनुसार ख्मेर रूज युग के दौरान १३२ [[मस्जिदों]] को नष्ट कर दिया गया, कई अन्य मस्जिदों को तहस-नहस किया गया, और मुसलमानों के [[नमाज़]] पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मुसलमानों को सूअर का मांस खाने के लिए मजबूर किया गया और मना करने पर उनकी [[हत्या]] कर दी जाती थी। चाम गाँवों के सभी लोगों को मार डाला जाता था। चाम लोगों को अपनी भाषा बोलने की [[अनुमति]] नहीं थी। चाम बच्चों को उनके माता-पिता से दूर ले जाया गया और ख्मेर के रूप में पाला गया। १९७९ में ख्मेर रूज सरकार द्वारा दिए गए आदेशों में कहा गया है: "ख्मेर से संबंधित कम्पूचियाई मिट्टी पर चाम [[राष्ट्र]] अब मौजूद नहीं है। तदनुसार चाम राष्ट्रीयता, भाषा, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं को तुरंत समाप्त कर दिया जाना चाहिए। जो लोग इस आदेश का पालन करने में विफल रहते हैं, उन्हें [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी|अंगकार]] के विरोध के अपने कृत्यों के सभी परिणाम भुगतने होंगे।"<ref>{{Cite web|url=https://www.aljazeera.com/news/2015/11/question-genocide-cambodia-muslims-151110072431950.html|title=The question of genocide and Cambodia's Muslims|last=Le Coz|first=Clothilde|date=19 November 2015|publisher=Al Jazeera}}</ref>
ख्मेर रूज शासन के अंत के बाद सभी धर्मों को बहाल कर दिया गया। विकरी का मानना है कि १९८० के दशक के मध्य में कंबोडिया में लगभग १,८५,००० चाम रहते थे और मस्जिदों की संख्या लगभग उतनी ही थी जितनी १९७५ से पहले थी। १९८८ की शुरुआत में [[नोम पेन्ह]] क्षेत्र में ६ मस्जिद थे और प्रांतों में एक "अच्छी संख्या" थी, लेकिन मुसलमान गणमान्य व्यक्तियों की संख्या बहुत कम थी; [[कंबोडिया]] में पिछले ११३ सबसे प्रमुख चाम पादरियों में से केवल २० ख्मेर रूज काल से बचे थे।<ref>{{Cite web|url=https://time.com/time/magazine/article/0,9171,428133,00.html|title=Weakness in Numbers|last=Perrin|first=Andrew|date=16 November 2010|website=Time|archive-url=https://web.archive.org/web/20101129040814/https://time.com/time/magazine/article/0,9171,428133,00.html|archive-date=29 November 2010}}</ref>
=== धार्मिक समूह ===
पोल पॉट एक उत्साही [[मार्क्सवादी]] [[नास्तिक]] थे,<ref>[[Geoffrey Blainey]]; ''[[A Short History of Christianity]]''; Viking; 2011; p. 543</ref> इसलिए उनके नेतृत्व में ख्मेर रूज ने राज्य [[नास्तिकता]] की [[नीति]] लागू की। कैथरीन वेसिंगर के अनुसार "लोकतांत्रिक कम्पूचिया आधिकारिक तौर पर एक नास्तिक राज्य था, और ख्मेर रूज द्वारा धर्म का उत्पीड़न केवल [[अल्बानिया]] के साम्यवादी राज्यों और [[उत्तर कोरिया]] में धर्म के उत्पीड़न से गंभीरता से मेल खाता था। [[उत्तर कोरिया में धर्म की स्वतंत्रता]] देखें)।" <ref name="Wessinger2000">{{Cite book|title=Millennialism, Persecution, and Violence: Historical Cases|last=Wessinger|first=Catherine|publisher=[[Syracuse University Press]]|year=2000|isbn=978-0-8156-2809-5|page=282|language=en}}</ref> सभी धर्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और इस्लाम,<ref>{{Cite book|title=The Oxford Handbook of Global Religions|last=Juergensmeyer|first=Mark|publisher=Oxford University Press|page=495}}</ref> [[ईसाई धर्म]],<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/thirdindochinawa00west|title=The Third Indochina War: Conflict Between China, Vietnam and Cambodia, 1972–79|last=Quinn-Judge, Westad|first=Odd Arne, Sophie|publisher=Routledge|year=2006|isbn=9780415390583|page=[https://archive.org/details/thirdindochinawa00west/page/n197 189]|url-access=limited}}</ref> और बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर अत्याचार व्यापक थे। ऐसा अनुमान है कि ख्मेर रूज द्वारा ५०,०००[[भिक्खु|बौद्ध भिक्षुओं]] की हत्या कर दी गई थी।<ref name="NYTi">[https://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9E0CE5DE163CF931A35752C0A964958260 Philip Shenon, Phnom Penh Journal; Lord Buddha Returns, With Artists His Soldiers] ''[[The New York Times]]'' (2 January 1992)</ref><ref name="rummel">{{Cite book|title=Saving Lives, Enriching Life: Freedom as a Right And a Moral Good|last=Rummel|first=Rudolph J.|year=2001|chapter=Chapter 6: Freedom Virtually Ends Genocide and Mass Murder|chapter-url=http://www.hawaii.edu/powerkills/WF.CHAP6.HTM}}</ref>
=== आंतरिक शुद्धिकरण ===
पूर्वी सैन्य क्षेत्र में जिन इलाकों को वियतनामियों ने अशुद्ध कर दिया था, वहाँ पर १९७८ में पोल पॉट ने दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के सैनिकों को भेज दिया और "छिपे हुए गद्दारों" को खत्म करने का आदेश दिया। कम्पूचिया सरकार के हमले का सामना करने में असमर्थ थी, इसलिए फिम ने आत्महत्या कर ली और उनके डिप्टी हेंग समरीन वियतनाम चले गए। पूर्वी क्षेत्र में नरसंहारों की श्रृंखला पोल पॉट शासन के नरसंहार के दौरान हुए सभी नरसंहारों में सबसे अधिक थी।<ref name="Ben Kiernan 1987">{{Cite book|url=https://www.researchgate.net/publication/341272646|title=Cambodia : the Eastern Zone massacres : a report on social conditions and human rights violations in the Eastern Zone of democratic Kampuchea under the role of Pol Pot's (Khmer Rouge) Communist Party of Kampuchea|last=Kiernan|first=Ben|date=1987|publisher=Columbia University, Center for the Study of Human Rights|location=New York|page=Preface}}</ref> इसे "पार्टी, सेना और लोगों के बड़े पैमाने पर अंधाधुंध शुद्धिकरण" के रूप में वर्णित किया गया था।
== बच्चों का उपयोग ==
ख्मेर रूज ने नरसंहार और अत्याचार करने के लिए हजारों असुध बच्चों का इस्तेमाल किया, खासकर वो जो अभी अपनी शुरुआती किशोरावस्था में थे । निःसंकोच बच्चों को बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी आदेश का पालन करना सिखाया गया।<ref name=":10"/>
संगठन ने कम से कम १९९८ तक बड़े पैमाने पर बच्चों का उपयोग करना जारी रखा, अक्सर उन्हें जबरन भर्ती किया जाता था। इस अवधि के दौरान बच्चों को मुख्य रूप से अवैतनिक सहायक भूमिकाओं में तैनात किया गया था, जैसे [[गोला-बारूद]] वाहक या सैनिक के रूप में। कई बच्चे खाना ना मिलने के कारण ख्मेर रूज को छोड़कर भाग गए, और उनका मानना था कि सरकारी बलों में शामिल होने से उन्हें जीवित रहने में मदद मिलेगी, हालांकि स्थानीय [[कमांडर|कमांडरों]] अक्सर उन्हें वेतन देने से इनकार कर देते थे।<ref name=":4">{{Cite web|url=https://www.child-soldiers.org/Handlers/Download.ashx?IDMF=adc88bff-1916-4317-b184-d9079e7b0bb8|title=Global Report on Child Soldiers|last=Coalition to Stop the Use of Child Soldiers|year=2001|website=child-soldiers.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20190525205613/https://www.child-soldiers.org/Handlers/Download.ashx?IDMF=adc88bff-1916-4317-b184-d9079e7b0bb8|archive-date=2019-05-25|access-date=2018-05-16}}</ref>
== यातना और चिकित्सा प्रयोग ==
ख्मेर रूज शासन कैदियों पर दर्दनाक [[चिकित्सा]] प्रयोगों का अभ्यास करने के लिए भी जाना जाता है। लोगों को शासन का विरोध करने के [[संदेह]] में या अन्य [[क़ैदी|कैदियों]] द्वारा नाम देने के कारण कैद और प्रताड़ित किया जाता था। पूरे परिवार (महिलाओं और बच्चों सहित) को जेलों में बंद करके उन्हें प्रताड़ित किया जाता था क्योंकि ख्मेर रूज को [[डर]] था कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे, तो उनके इच्छित पीड़ितों के रिश्तेदार बदला लेने की [[कोशिश]] करेंगे। पोल पॉट ने कहा था, "यदि आप [[घास]] को मारना चाहते हैं, तो आपको [[जड़ों]] को भी मारना होगा"। अधिकांश कैदियों को यह भी नहीं पता था कि उन्हें क्यों कैद किया गया था और अगर जेलरों से पूछते, तो पहरेदार केवल यह कहकर जवाब देते कि [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी|अंगकार]] (कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी) कभी गलती नहीं करते हैं, तो उन्होंने कुछ अवैध किया ही होगा।<ref name="huyvannak2010_pp32-35">[[Cambodian genocide#huyvannak-2010|Huy Vannak (2010), pp. 32–35]]</ref>
एस-२१ के सूत्र और मुकदमे के दस्तावेजों दोनों में यातना के कई खाते हैं; जैसा कि उत्तरजीवी बौ मेंग ने अपनी पुस्तक (हुय वन्नक द्वारा लिखित) में बताया, यातनाएँ इतनी दर्दनाक और दुष्ट थीं कि कैदियों ने यहाँ तक कि [[चम्मच]] से भी [[आत्महत्या]] करने की कोशिश की, और उन्हें रोकने के लिए अक्सर उनकी उनके हाँथ उनकी पीठ के पीछे बंधे हुए रहते थे। जब यह माना जाता था कि वे कोई और उपयोगी [[जानकारी]] प्रदान नहीं कर सकते हैं, तो उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर मौत के खेत (जो सामूहिक कब्रें थीं) में भेज दिया जाता, जहाँ रात में कैदियों को [[कैंची]] या [[कील]] और [[हथौड़ा|हथौड़े]] जैसे [[धातु]] के [[उपकरण|औजारों]] से मार दिया जाता था (चुकी [[गोली|गोलियाँ]] बहुत महंगी थीं)। कई बार उनकी चीखें ना सुनाई दे इसलिए लाउडस्पीकरों पर लोकतांत्रिक कम्पूचिया का प्रचार संगीत बजाय जाता था और जनरेटर सेट से शोर की आवाज चलाई जाती थी।
[[चित्र:ChoeungEk-Darter-7.jpg|अंगूठाकार| एक चंकिरी का पेड़। तख्ते पर लिखा है "चंकिरी का पेड़ जिसपर जल्लाद बच्चों सर फोड़ते थे।"]]
एस-२१ के अंदर [[शिशुओं]] और बच्चों को एक विशेष उपचार दिया गया था; उन्हें उनकी माताओं और रिश्तेदारों से दूर ले जाया गया, और हत्या के मैदानों में भेज दिया जाता था, जहाँ उन्हें चंकिरी के पेड़ पर सर फोड़कर मार डाला जाता था। माना जाता है कि ऐसा एस-२१ जैसे अन्य कारागार भी थे जहाँ बच्चों को इस प्रकार मारा जाता था, जो पूरे लोकतांत्रिक कम्पूचिया में फैले हुए थे। एस-२१ में कुछ पश्चिमी लोग भी थे जिन्हें शासन ने पकड़ लिया था। उनमें से एक [[ब्रिटिश]] [[शिक्षक]] जॉन डावसन ड्यूहर्स्ट थे, जिन्हें ख्मेर रूज ने उस समय पकड़ लिया था जब वह एक यॉट पर थे। एस-२१ के एक पहरेदार चेम सोयू ने कहा कि एक पश्चिमी देश के नागरिक को जिंदा जला दिया गया था, लेकिन कांग केक इव ने इससे इनकार किया। उन्होंने कहा कि पोल पॉट ने उन्हें लाशों को जलाने के लिए कहा और कोई भी उनके आदेश का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करेगा।<ref>{{Cite web|url=https://www.theguardian.com/world/2009/aug/05/cambodia-war-crimes-trial|title=Westerner was burned alive, says Cambodia trial witness|last=Associated Press|date=5 August 2009|website=The Guardian|location=Phnom Penh}}</ref> यातनाएँ न केवल कैदियों को अपने अपराध कबूल करने के लिए मजबूर करने के लिए थीं, बल्कि पहरेदारों के [[मनोरंजन]] के लिए भी थीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया तो वे खुद कैदी बन जाएंगे।<ref>{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2009/03/01/world/asia/01iht-guard.1.20501994.html|title=For Khmer Rouge guard, it was kill or be killed|last=Mydans|first=Seth|date=1 March 2009|website=[[The New York Times]]}}</ref>
ख्मेर रूज के शासन के आने से पहले के सभी चिकित्सकों को या तो मार दिया गया था या ग्रामीण इलाकों में किसानों के रूप में काम करने के लिए भेजा गया था, और नोम पेन्ह में [[चिकित्सा]] संकाय के [[पुस्तकालय]] में [[आग]] लगा दी गई थी। उनके बदले शासन ने नए चिकित्सकों को नियुक्त किया जो बिना या बहुत कम प्रशिक्षण वाले [[किशोरावस्था|किशोर]] थे। उन्हें पश्चिमी चिकित्सा का कोई ज्ञान नहीं था (जिसे [[पूंजीवादी]] [[आविष्कार]] माना जाता था) और उन्हें अपने खुद के [[चिकित्सा]] प्रयोगों का अभ्यास करके कम्बोडियाई चिकित्सा में नई तकनीकों का आविष्कार करना था। उनके पास पश्चिमी दवाएँ नहीं थीं (क्योंकि ख्मेर रूज के अनुसार कंबोडिया को आत्मनिर्भर होना था) और सभी चिकित्सा बिना बेहोशी की दवाई के की जाती थी।<ref name="d.dccam.org">{{Cite web|url=http://www.d.dccam.org/Tribunal/Analysis/pdf/Prosecuting_Khmer_Rouge_Medical_Practices_as_Crimes_against_Humanity.pdf|title=Keeping Them Alive, One Gets Nothing; Killing Them, One Loses Nothing: Prosecuting Khmer Rouge Medical Practices as Crimes against Humanity|last=Vilim|first=Laura|year=2012|website=dccam.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20140407103200/http://www.d.dccam.org/Tribunal/Analysis/pdf/Prosecuting_Khmer_Rouge_Medical_Practices_as_Crimes_against_Humanity.pdf|archive-date=7 April 2014|access-date=29 September 2018}}</ref> एस-२१ के अंदर काम करने वाले एक [[चिकित्सक]] ने बताया कि एक १७ साल की लड़की का गला काट दिया गया और [[उदर]] में छेद करके उसे पीटा गया और रात भर पानी में रखा गया। इस प्रक्रिया को कई बार बिना एनेस्थेटिक्स के दोहराया गया।<ref>{{Cite web|url=http://www.cambodiatribunal.org/2016/06/16/propaganda-torture-and-french-colonial-heritage-looking-into-the-methods-of-the-khmer-rouge/|title=Propaganda, Torture and French Colonial Heritage: Looking into the Methods of the Khmer Rouge | Cambodia Tribunal Monitor}}</ref>
[[कम्पोंग चाम प्रान्त|काम्पोंग चाम प्रांत]] के एक अस्पताल में बाल चिकित्सकों ने एक जीवित गैर-[[सहमति]] वाले व्यक्ति की [[आंत|आंतों]] को काट दिया और [[उपचार]] प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए उनके अंत को एक दूसरे से जोड़ दिया। इस "ऑपरेशन" के कारण तीन दिनों के बाद [[रोगी]] की [[मृत्यु]] हो गई।<ref name="d.dccam.org"/> उसी अस्पताल में ख्मेर रूज द्वारा प्रशिक्षित अन्य "चिकित्सकों" ने सिर्फ दिल को धड़कते हुए देखने के लिए एक जीवित व्यक्ति की छाती खोल दी। ऑपरेशन के परिणामस्वरूप रोगी की तत्काल मृत्यु हो गई।<ref name="d.dccam.org" /> अन्य साक्ष्य और ख्मेर रूज नीति सुझाव देते हैं कि ये अलग-थलग मामले नहीं थे।<ref>{{Cite web|url=https://thediplomat.com/2012/08/chilling-evidence-in-khmer-rouge-trial/|title=Chilling Evidence in Khmer Rouge Trial}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.phnompenhpost.com/national/barbarous-kr-medical-experiments-uncovered|title=Barbarous KR medical experiments uncovered|date=2000-06-23}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cambodiadaily.com/news/tribunal-hears-secret-medical-experiments-118305/|title=Tribunal Hears of Secret Medical Experiments|date=2016-09-22|access-date=13 दिसंबर 2021|archive-date=17 फ़रवरी 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190217012141/https://www.cambodiadaily.com/news/tribunal-hears-secret-medical-experiments-118305/|url-status=dead}}</ref> उदाहरण के लिए उन्होंने एक जीवित व्यक्ति के शरीर में [[नारियल पानी]] इंजेक्ट करके प्रभावों का अध्ययन भी किया। नारियल के रस का इंजेक्शन अक्सर घातक होता है।<ref name="d.dccam.org" /><gallery>
चित्र:Genocide museum.jpg|तुओल स्लेंग नरसंहार संग्रहालय
चित्र:Genocide phnom.jpg|नरसंहार संग्रहालय से तस्वीर
चित्र:Museum phnom pen genoc.jpg|तुओल स्लेन्ग
चित्र:Museum fash gen.jpg|तुओल स्लेन्ग
चित्र:Koluchaya prov.jpg|नरसंहार संग्रहालय
चित्र:Kazarma museum.jpg|संग्रहालय के अंदर
</gallery>
== मृत संख्या ==
बेन किएरनन का अनुमान है कि ख्मेर रूज नीति के परिणामस्वरूप १६.७१ से १८.७१ [[लाख]] कंबोडियाई लोगों की मृत्यु हो गई, जो कंबोडिया की १९७५ की आबादी का २१% से २४% के बीच था।<ref name="CAS"/> [[फ्रांसीसी]] जनसांख्यिकीय मारेक स्लिविंस्की के एक अध्ययन ने ख्मेर रूज के तहत १९७५ की कंबोडियाई आबादी ७८ लाख में से २० लाख से कुछ कम अप्राकृतिक मौतों की गणना की; कंबोडियाई महिलाओं की १५.७% की तुलना में ख्मेर रूज के तहत ३३.५% कंबोडियाई पुरुषों की मृत्यु हुई।<ref name="Locard"/> २००१ के एक अकादमिक स्रोत के अनुसार, ख्मेर रूज के तहत अधिक मौतों का सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत अनुमान १५ लाख से २० लाख तक है, हालांकि आंकड़े १० लाख से कम और ३० लाख से अधिक के रूप में उद्धृत किए गए हैं; ख्मेर रूज की फांसी के कारण होने वाली मौतों का पारंपरिक रूप से स्वीकृत अनुमान ५ से १० लाख तक है, "इस अवधि के दौरान अतिरिक्त मृत्यु दर का एक तिहाई से आधा।"<ref name="Heuveline, Patrick 2001" /> हालांकि, २०१३ के एक अकादमिक स्रोत (२००९ से अनुसंधान का हवाला देते हुए) इंगित करता है कि निष्पादन में कुल का ६०% हिस्सा हो सकता है, जिसमें २३,७४५ सामूहिक कब्रें हैं जिनमें लगभग १३ लाख निष्पादन के संदिग्ध शिकार हैं।{{Sfn|Seybolt|Aronson|Fischoff|2013|p=238}} ख्मेर रूज के निष्पादन के पहले और अधिक व्यापक रूप से स्वीकृत अनुमानों की तुलना में काफी अधिक होने पर, कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र के क्रेग एचेसन ने दस लाख से अधिक निष्पादन के ऐसे अनुमानों का बचाव किया, जो "प्रशंसनीय, प्रकृति को देखते हुए" थे। सामूहिक कब्र और डीसी-कैम के तरीके, जो अधिक अनुमान के बजाय निकायों की कम गिनती का उत्पादन करने की अधिक संभावना रखते हैं।" <ref name="Tufts.edu"/> <ref name="Sharp"/> जनसांख्यिकीय पैट्रिक ह्यूवेलिन ने अनुमान लगाया कि ११.७ लाख से ३४.२ लाख के बीच कंबोडियाई लोगों की मृत्यु १९७० और १९७९ के बीच अप्राकृतिक मौतों के साथ हुई, जिनमें से डेढ़ से तीन लाख के बीच गृहयुद्ध के दौरान हुई मौतें थीं। ह्यूवेलिन का केंद्रीय अनुमान २५.२ लाख अतिरिक्त मौतें हैं, जिनमें से १४ लाख हिंसा का प्रत्यक्ष परिणाम थे।<ref name="Heuveline, Patrick 2001"/><ref name="Tufts.edu" /> कंबोडियाई लोगों के घर-घर के सर्वेक्षण पर आधारित होने के बावजूद, ख्मेर रूज के उत्तराधिकारी शासन, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कम्पूचिया (पीआरके) द्वारा घोषित ३३ लाख मौतों का अनुमान आम तौर पर एक अतिशयोक्ति माना जाता है; <ref name="Locard" /> अन्य कार्यप्रणाली त्रुटियों के बीच, पीआरके अधिकारियों ने उन पीड़ितों की अनुमानित संख्या को जोड़ा जो आंशिक रूप से खोदी गई सामूहिक कब्रों में कच्चे सर्वेक्षण के परिणामों में पाए गए थे, जिसका अर्थ है कि कुछ पीड़ितों की दोहरी गणना की गई होगी।<ref name="Tufts.edu" />
== लोकतांत्रिक कम्पूचिया के बाद ==
=== स्मरणोत्सव ===
हालांकि पुराने शासन के सरकारी अधिकारियों की फांसी नोम पेन्ह के गिरने के बाद हुई थी, २० मई १९७५ को कंबोडिया में उस तारीख के रूप में मनाया जाता है जब निजी नागरिकों के खिलाफ ख्मेर रूज अभियान शुरू हुआ था <ref name="nyt">''[[The New York Times]]''. ''[https://www.nytimes.com/1984/05/21/world/around-the-world-cambodian-day-of-hate-marks-pol-pot-s-victims.html Cambodian Day of Hate Marks Pol Pot's Victims]''</ref> और अब २० मई को प्रतिवर्ष "राष्ट्रीय स्मरण दिवस" ({{Lang-km|ទិវាជាតិនៃការចងចាំ|Tivea Cheate nei kar Changcham}}) मनाया जाता है जो एक राष्ट्रीय छुट्टी द्वारा चिह्नित है।<ref>{{Cite news|url=https://www.phnompenhpost.com/national/day-anger-becomes-kingdoms-latest-national-holiday|title='Day of Anger' becomes Kingdom's latest national holiday|date=20 February 2018|work=[[The Phnom Penh Post]]}}</ref>
=== युद्ध अपराध मुकदमे ===
[[चित्र:Main_building_of_Extraordinary_Chambers_in_the_Courts_of_Cambodia.jpg|अंगूठाकार|200x200पिक्सेल| कोर्ट रूम के साथ ट्रिब्यूनल का मुख्य भवन]]
१५ जुलाई १९७९ को ख्मेर रूज को उखाड़ फेंकने के बाद कंबोडिया की नई सरकार ने "हुक्मनामा कानून न० १" लागू किया जिसने नरसंहार के अपराध के लिए पोल पॉट और ईएंगसरी के मुकदमे की अनुमति दी। उन्हें एक अमेरिकी बचाव पक्ष के वकील, होप स्टीवंस,{{Sfn|Etcheson|2005|p=14}} दिए गए और उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया और उन्हें नरसंहार का दोषी ठहराया गया।{{Sfn|Donlon|2012|p=103}} जनवरी २००१ में कम्बोडियाई संसद भवन ने ख्मेर रूज शासन के अतिरिक्त सदस्यों पर मुकदमा चलाने के लिए एक न्यायाधिकरण बनाने के लिए कानून पारित किया।{{Sfn|Stanton|2013|p=411}}
[[संयुक्त राज्य अमेरिका]] ने १९८९ तक ख्मेर रूज अत्याचारों को नरसंहार के रूप में वर्णित करने से परहेज किया और १९९७ के अंत तक पोल पॉट के लिए मुकदमा चलाने और पकड़ने को मंजूरी देने से इनकार कर दिया, क्योंकि अमेरिका ने १९८० के दशक में [[दक्षिण पूर्व एशिया]] में वियतनामी और [[सोवियत]] प्रभाव को रोकने के लिए ख्मेर रूज का समर्थन किया था। अमेरिका को इस बात का भी डर था कि अभी के समय एक मुकदमा चलाने से वियतनाम युद्ध के दौरान कंबोडिया पर अमेरिकी बमबारी की वैधता की जांच कर सकता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/1998/04/17/world/death-of-pol-pot-the-diplomacy-pol-pot-s-end-won-t-stop-us-pursuit-of-his-circle.html|title=Death of Pol Pot: The Diplomacy; Pol Pot's End Won't Stop U.S. Pursuit of His Circle|last=Becker|first=Elizabeth|authorlink=Elizabeth Becker|date=1998-04-17|website=[[The New York Times]]|access-date=2020-09-02}}</ref>
१९९९ में निक डनलप और नेट थायर द्वारा कांग का साक्षात्कार लिया गया और टोल स्लेंग कारावास में किए गए अपराधों के लिए अपने अपराध को स्वीकार किया, जहाँ लगभग १७,००० राजनीतिक कैदियों को मार डाला गया था। उन्होंने अपने कार्यों के लिए दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे मुकदमे में खड़े होने और अपने पूर्व साथियों के खिलाफ [[सबूत]] देने को तैयार हैं। फरवरी और मार्च २००९ में अपने मुकदमे के दौरान कांग ने स्वीकार किया कि वह तुओल स्लेंग में किए गए अपराधों के लिए जिम्मेदार था। २६ जुलाई २०१० को, उन्हें [[मानवता-विरोधी अपराध|मानवता विरोधी अपराधों]] के आरोप में दोषी पाया गया और उन्हें ३५ साल जेल की सजा सुनाई गई।{{Sfn|Bartrop|2012|pp=166–167}} ३ फरवरी २०१२ को उनकी पिछली सजा को आजीवन कारावास से बदल दिया गया था।{{Sfn|ECCC-Kaing|2012}} कांग की सितंबर २०२० में [[फेफड़ा|फेफड़ों]] की [[बीमारी]] से मृत्यु हो गई।<ref>{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2020/09/01/world/asia/duch-kaing-guek-eav-dead.html|title=Duch, Prison Chief Who Slaughtered for the Khmer Rouge, Dies at 77|last=Mydans|first=Seth|date=2020-09-02|website=[[The New York Times]]|access-date=2020-09-02}}</ref>
नुओन चिया को १९ सितंबर २००७ को [[गिरफ्तार]] किया गया था।{{Sfn|Corfield|2011|p=855}} अपने २०१३ के मुकदमे के अंत में उन्होंने यह कहते हुए सभी आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने "ना तो लोगों के साथ दुर्व्यवहार या भोजन से वंचित करने के लिए और ना ही नरसंहार करने का आदेश नहीं दिया था"। उन्हें २०१४ में दोषी ठहराया गया था और [[आजीवन कारावास]] की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने अफसोस व्यक्त किया और अपने अपराधों के लिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा है, "मैं [[जनता]], पीड़ितों, [[परिवार|परिवारों]] और सभी कंबोडियाई लोगों से ईमानदारी के साथ माफी मांगना चाहता हूं।"{{Sfn|Nuon Chea|2013}}
एक भव्य नोम पेन्ह विला में स्थित होने के बाद, ईएंग सरी को १२ नवंबर २००७ को गिरफ्तार किया गया और उन्हे और उनकी पत्नी ईएंग ठिरिथ (जो शासन के लिए एक अनौपचारिक सलाहकार थीं) को मानवता विरोधी अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया।{{Sfn|MacKinnon|2007}} १७ नवंबर २०११ को चिकित्सा विशेषज्ञों के मूल्यांकन के बाद थिरिथ को मानसिक स्थिति के कारण मुकदमे के लिए अयोग्य पाया गया।{{Sfn|de los Reyes|Mattes|Lee|Van Tuyl|2012|p=1}} सरी की २०१३ में हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई, जब उनका परीक्षण चल रहा था।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2013/03/15/world/asia/ieng-sary-khmer-rouge-leader-tied-to-genocide-dies-at-87.html|title=Ieng Sary, Khmer Rouge Leader Tied to Genocide, Dies at 87|last=Mydans|first=Seth|date=2013-03-14|work=The New York Times|access-date=14 March 2013}}</ref>
एक अन्य वरिष्ठ ख्मेर रूज नेता खिउ सम्फन को १९ नवंबर २००७ को गिरफ्तार किया गया और उनपर मानवता विरोधी अपराधों का आरोप लगाया गया।{{Sfn|Munthit|2007}} उन्हें २०१४ में दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। २३ जून २०१७ को एक सुनवाई में सम्फन ने अपने निर्दोष पीड़ितों की याद में झुकने की इच्छा व्यक्त की, जबकि यह भी दावा किया कि उन्होंने उन लोगों के लिए संघर्ष किया जिन्होंने अपने आदर्श के लिए एक उज्जवल [[भविष्य]] के लिए संघर्ष किया।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2017/06/23/world/asia/cambodia-khmer-rouge-vietnam.html|title=Khmer Rouge Trial, Perhaps the Last, Nears End in Cambodia|last=Mydans|first=Seith|work=The New York Times|year=2017}}</ref>
=== नरसंहार की मनाही ===
१५ अप्रैल १९९८ को पोल पॉट ने अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले{{Sfn|Chan|2004|p=256}} नेट थायर को अपना साक्षात्कार दिया था। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा कि उनके पास एक स्पष्ट विवेक था और उन्होंने नरसंहार के लिए जिम्मेदार होने से इनकार किया। पोल पॉट ने जोर देकर कहा कि वे "लोगों को मारने के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष करने" के लिए आए थे। एलेक्स अल्वारेज़ के अनुसार पोल पॉट ने "खुद को एक गलत समझे गए और गलत तरीके से बदनाम किए गए व्यक्ति" के रूप में चित्रित किया।{{Sfn|Alvarez|2001|p=56}} २०१३ में कंबोडियाई प्रधान मंत्री [[हुन सेन]] ने सर्वसम्मति से कानून पारित किया जो ख्मेर रूज द्वारा किए गए कम्बोडियाई नरसंहार और अन्य युद्ध अपराधों से इनकार करने को अपराध मानता है; एक विधेयक जो [[यहूदी नरसंहार]] के समापन के बाद [[यूरोपीय]] देशों में पारित कानून के समान है।<ref>{{Cite web|url=https://www.npr.org/sections/thetwo-way/2013/06/07/189618585/cambodia-moves-to-outlaw-denial-of-khmer-rouge-atrocities|title=Cambodia Moves To Outlaw Denial of Khmer Rouge Atrocities|publisher=NPR|access-date=2019-10-08}}</ref>
कंबोडियाई राष्ट्रीय बचाव दल के उपाध्यक्ष केम सोखा की टिप्पणियों के बावजूद कानून पारित किया गया। सोखा ने कहा कि तुओल स्लेंग नरसंहार संग्रहालय में प्रदर्शन नकली थे और १९७९ में वियतनामी द्वारा आक्रमण के बाद नकली कलाकृतियों को बनाया गया था। सोखा की पार्टी ने दावा किया है कि उनकी टिप्पणियों को संदर्भ से अलग लिया गया। {{Sfn|Buncombe|2013}}
=== चीन से समर्थन की मनाही ===
१९८८ में कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन सेन, जो कभी ख्मेर रूज के सदस्य थे, ने चीन को कंबोडिया में "सारी फसात की जड़" के रूप में वर्णित किया। लेकिन जुलाई १९९७ में जब उन्होंने एक खूंखार [[तख्तापलट]] के साथ अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों को बाहर करके पश्चिम में आक्रोशित कर दिया तब चीन ने तुरंत यथास्थिति को मान्यता दी और सैन्य सहायता की पेशकश की। नए हित जल्द ही संरेखण में आ गए। फिर २००० में [[चीनी साम्यवादी पार्टी का महासचिव|सीसीपी महासचिव]] और [[जनवादी गणराज्य चीन के राष्ट्रपति|चीनी राष्ट्रपति]] जियांग जेमिन कंबोडिया में एक सरकारी यात्रा के लिए आए। यह १९६३ के बाद से पहली बार हो रहा था कि एक चीनी राष्ट्रपति कंबोडिया में आए हो।
दिसंबर २००० में जब जियांग कंबोडिया का दौरा कर रहे थे, चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि जब तक ख्मेर रूज ने कंबोडिया पर शासन किया तब तक [[बीजिंग]] ने कभी उनकी गलत नीतियों का समर्थन नहीं किया और माफी मांगने से इनकार कर दिया।<ref name=":3">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2000/11/07/world/china-says-it-won-t-apologize-for-supporting-the-khmer-rouge.html|title=China Says It Won't Apologize For Supporting the Khmer Rouge|last=Reuters|date=2000-11-07|work=The New York Times|access-date=2019-11-27|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref><ref name=":20">{{Cite news|url=http://news.bbc.co.uk/hi/chinese/news/newsid_1020000/10208121.stm|title=江泽民抵柬展开历史性访问|date=2000-11-13|access-date=2019-11-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20030218175921/http://news.bbc.co.uk/hi/chinese/news/newsid_1020000/10208121.stm|archive-date=2003-02-18|publisher=BBC}}</ref><ref name=":21">{{Cite news|url=http://news.bbc.co.uk/chinese/simp/hi/newsid_1020000/newsid_1022500/1022597.stm|title=中国疏远同红色高棉的关系|date=2000-11-14|access-date=2019-11-25|publisher=BBC}}</ref> चीन के विदेश मंत्रालय में एशियाई विभाग के तत्कालीन उपनिदेशक यांग यांयी (杨燕怡) ने दावा किया: "यह एक आंतरिक मामला है जिसे स्वयं कंबोडियाई द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए। [[चीनी जनवादी गणराज्य|चीन]] ने कभी किसी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया। उस निश्चित ऐतिहासिक अवधि के दौरान हमारी सहायता और समर्थन कंबोडिया की [[संप्रभुता]] और राष्ट्रीय [[स्वतंत्रता]] की रक्षा के [[प्रयास]] का समर्थन करना था। हम कभी दूसरे देशों की गलत नीतियों का समर्थन नहीं करते हैं।"<ref name=":3" />
यात्रा के दौरान जियांग ने नरोत्तम सीहनु और कंबोडिया के प्रधान मंत्री हुन सेन से मुलाकात की, कंबोडिया को $१.२ करोड़ की सहायता पेश करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। भले ही कंबोडियाई सरकार ने जियांग की यात्रा के दौरान ख्मेर रूज के मुद्दे का उल्लेख कभी नहीं किया, प्रदर्शनकारियों ने चीन से माफी और यहाँ तक कि बहाली की मांग की, और ऐसा अनुरोध अभी भी जारी है।<ref name=":3"/><ref>{{Cite web|url=http://www.genocidewatch.org/seekingjusticecambodia.html|title=Seeking Justice in Cambodia|last=Stanton|first=Gregory H.|website=genocidewatch.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20091026180136/http://www.genocidewatch.org/seekingjusticecambodia.html|archive-date=2009-10-26|access-date=2019-11-27}}</ref> २०१५ में कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र के कार्यकारी निदेशक यूक चांग ने बताया कि "चीनी सलाहकार सभी कारावास प्रहरियों और शीर्ष नेता के साथ मिले हुए थे। चीन ने इसके लिए कभी भी स्वीकार नहीं किया और माफी नहीं मांगी।" २००९ में ख्मेर रूज के कुछ पूर्व नेताओं के अदालती मुकदमों के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जियांग यू ने दावा किया: "लंबे समय से चीन के पिछले कंबोडियाई सरकारों के साथ सामान्य और मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं, जिसमें लोकतांत्रिक कम्पूचिया भी शामिल है। जैसा कि सभी जानते हैं, लोकतांत्रिक कम्पूचिया की सरकार के पास संयुक्त राष्ट्र में एक कानूनी सीट थी, और उसने ७० से अधिक देशों के साथ व्यापक विदेशी संबंध स्थापित किए थे।"<ref>{{Cite news|url=https://www.reuters.com/article/us-cambodia-rouge-china-sb-idUSTRE51G33W20090217|title=China defends its Khmer Rouge ties as trial opens|date=2009-02-17|work=Reuters|access-date=2019-11-27|language=en}}</ref>
=== बचाव दल की पहचान ===
''द रेस्क्यूअर्स'' प्रदर्शन, जो २०११ से २०१५ तक चला, ने उन व्यक्तियों की पहचान की जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। कम्बोडियाई बचावकर्ताओं को अन्य विश्व नरसंहारों से साहस के समान प्रोफाइल के साथ जोड़ा गया।<ref>{{Cite web|url=https://proof.org/the-rescuers|title=The Rescuers|website=proof.org}}</ref>
ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक सद्भाव समूह, करेज टू केयर द्वारा कंबोडियाई नरसंहार के बचावकर्ताओं को इसी प्रकार मान्यता दी गई, जिसने इस विषय पर एक शैक्षिक संसाधन प्रकाशित किया।<ref>{{Cite web|url=https://couragetocare.com.au/exhibition/wp-content/uploads/2019/08/Unknown-Heroes-of-Cambodia-2019.pdf|title=Unknown Heroes of Cambodia|last=Strozek, Karolina|last2=Seldowitz, Dovi|year=2019|website=Courage to Care NSW|access-date=13 दिसंबर 2021|archive-date=6 मार्च 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230306175227/https://couragetocare.com.au/exhibition/wp-content/uploads/2019/08/Unknown-Heroes-of-Cambodia-2019.pdf|url-status=dead}}</ref>
== साहित्य और मीडिया में ==
* फ़्रांसवा पोनशोद द्वारा लिखी गई फ्रांसीसी पुस्तक कांबोझ आने ज़ेरो (''Cambodge année zéro'' अर्थात "कंबोडिया वर्ष शून्य") १९७७ में जारी किया गया था और १९७८ में अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था।{{Sfn|Beachler|2011|p=45}} पोनचौड दुनिया के ध्यान में कंबोडियन नरसंहार लाने वाले पहले लेखकों में से एक थे।{{Sfn|Bartrop|2012|p=261}} पोनचौड ने कहा है कि नरसंहार "सबसे ऊपर था, कार्रवाई में अनुवाद एक आदमी की विशेष दृष्टि [ ''एसic'' ]: एक व्यक्ति जिसे एक भ्रष्ट शासन द्वारा खराब कर दिया गया है, उसे सुधार नहीं किया जा सकता है, उसे भाईचारे से शारीरिक रूप से समाप्त किया जाना चाहिए शुद्ध का।"{{Sfn|Tyner|2012|p=145}} ''मर्डर ऑफ ए जेंटल लैंड: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए कम्युनिस्ट जेनोसाइड इन कंबोडिया'' जॉन बैरोन और एंथोनी पॉल द्वारा १९७७ में प्रकाशित किया गया था।{{Sfn|Barron|1977}} पुस्तक शरणार्थियों के खातों पर आधारित है, और ''रीडर्स डाइजेस्ट'' में प्रकाशित एक संक्षिप्त संस्करण व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ था। पढ़ना।{{Sfn|Mayersan|2013|pp=183–184}}
* नरसंहार से बचे फिल्म निर्माता रिथी पान को "कई लोग कंबोडिया की सिनेमाई आवाज मानते हैं।" पान ने नरसंहार पर कई वृत्तचित्रों का निर्देशन किया है, जिसमें ''एस -२१: द ख्मेर रूज किलिंग मशीन शामिल है'', जिसे आलोचकों द्वारा "हमें यह देखने की अनुमति देने के लिए नोट किया गया है कि अतीत को वर्तमान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए स्मृति और समय कैसे गिर सकता है। इसलिए बुराई का सामान्य चेहरा प्रकट करो।"{{Sfn|Boyle|2009|p=95}}
* [[अकेडमी पुरस्कार|नरसंहार को १९८४ की अकादमी पुरस्कार]] विजेता फिल्म ''द किलिंग फील्ड्स'' <ref>{{Cite news|url=https://www.theguardian.com/film/2009/mar/11/the-killing-fields-reel-history|title=The Killing Fields: authentically good|date=12 March 2009|work=The Guardian|location=London}}</ref> और पेट्रीसिया मैककॉर्मिक के २०१२ के उपन्यास ''नेवर फॉल डाउन'' में चित्रित किया गया है।<ref name="Debra Lau Whelan">{{Cite web|url=http://www.slj.com/2012/10/awards/national-book-award-finalists-in-young-peoples-lit-unveiled/#_|title=SLJ Speaks to National Book Award Finalists|last=Debra Lau Whelan|date=10 October 2012|website=[[School Library Journal]]|access-date=15 November 2012}}</ref>
* नरसंहार का वर्णन लूंग उनग ने अपने संस्मरण ''फर्स्ट दे किल्ड माई फादर'' (२०००) में भी किया है।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/firsttheykilledm00loun_0|title=First they killed my father : a daughter of Cambodia remembers|last=Loung|first=Ung|date=2000|publisher=HarperCollinsPublishers|isbn=978-0-06-019332-4|edition=1st|location=New York|oclc=41482326|url-access=registration}}</ref><ref name="Debra Lau Whelan" /> [[एंजेलिना जोली|पुस्तक को एंजेलीना जोली]] द्वारा निर्देशित २०१७ की जीवनी फिल्म में रूपांतरित किया गया था। १९७५ में सेट, फिल्म में ५ वर्षीय अनग को दर्शाया गया है, जिसे एक बाल सैनिक के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि उसके भाई-बहनों को ख्मेर रूज शासन द्वारा श्रम शिविरों में भेजा जाता है। <ref name="Variety:Telluride Film Review: 'First They Killed My Father: A Daughter of Cambodia Remembers'">{{Cite web|url=https://variety.com/2017/film/reviews/first-they-killed-my-father-review-angelina-jolie-1202545717/|title=Telluride Film Review: 'First They Killed My Father: A Daughter of Cambodia Remembers'|last=Debruge|first=Peter|date=3 September 2017|website=Variety|access-date=20 September 2017}}</ref>
* फ़िल्म " ईयर ज़ीरो: द साइलेंट डेथ ऑफ़ कंबोडिया " १९७९ की एक ब्रिटिश टेलीविज़न डॉक्यूमेंट्री है जिसे ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जॉन पिल्गर द्वारा लिखित और प्रस्तुत किया गया है। <ref>Independent Movie Database (IMDB), [[imdbtitle:0275085|"Year Zero: The Silent Death of Cambodia (1979)"]]</ref> <ref>[http://johnpilger.com/videos/year-zero-the-silent-death-of-cambodia ''Year Zero: the Silent Death of Cambodia''], video of program on John Pilger's website.</ref> ३० अक्टूबर १९७९ को ब्रिटिश टेलीविजन पर पहला प्रसारण, फिल्म १९७० के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा कंबोडिया की व्यापक बमबारी [[वियतनाम युद्ध|को वियतनाम युद्ध के]] एक गुप्त अध्याय के रूप में याद करती है, बाद में क्रूरता और नरसंहार जो पोल पॉट और उसके ख्मेर रूज मिलिशिया ने लिया था। लोगों की गरीबी और पीड़ा, और पश्चिम द्वारा दी जाने वाली सीमित सहायता। ''कंबोडिया पर पिल्गर की पहली रिपोर्ट डेली मिरर के'' एक विशेष अंक में प्रकाशित हुई थी।<ref>[http://johnpilger.com/videos/year-zero-the-silent-death-of-cambodia ''Year Zero: the Silent Death of Cambodia''], video of programme on John Pilger's website.</ref><ref name="Pilger1986">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=dcL6w-VmjWwC&pg=PA417|title=Heroes|last=Pilger|first=John|publisher=Soluth End Press|year=2001|isbn=978-0-89608-666-1|location=London|page=417}} (Originally published by Jonathan Cape, London, 1986), p. 410</ref><ref name="Pilger2011">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=GOtwM8UdwgoC&pg=PA121|title=Tell Me No Lies: Investigative Journalism and its Triumphs|last=John Pilger|publisher=Random House|year=2011|isbn=978-1-4070-8570-8|page=121}}</ref>
== यह सभी देखें ==
* [[ग्रेट लीप फॉरवर्ड]]
* [[ख्मेर रूज]]
* [[कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी]]
* [[नरोत्तम सीहनु]]
* [[पोल पॉट]]
== संदर्भ ==
<references />
== अधिक जानकारी ==
* {{Cite book|title=The Politics of Lists: Bureaucracy and Genocide Under the Khmer Rouge|last=Tyner|first=James A.|date=2018|publisher=[[West Virginia University Press]]|isbn=978-1-946684-42-4|location=Morgantown|language=en}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Commons category-inline}}
{{Cambodia topics}}{{Genocide topics}}{{Authority control}}
[[श्रेणी:जातीय उत्पीड़न]]
[[श्रेणी:कंबोडिया का इतिहास]]
[[श्रेणी:प्रति-बुद्धिवाद]]
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कारी चान
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{{Infobox cricketer
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}}
'''कारी चान''' ({{zh|t=陳嘉瑩}}; जन्म 13 मार्च 1997) हांगकांग की एक क्रिकेटर और हांगकांग महिला राष्ट्रीय क्रिकेट टीम की कप्तान हैं।<ref>{{cite web|url=http://www.espncricinfo.com/ci/content/player/587502.html |title=Kary Chan |work=ESPN Cricinfo |access-date=21 October 2021}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.scmp.com/yp/discover/news/sports/article/3061489/hong-kong-national-womens-cricket-teams-kary-chan |title=Hong Kong national women's cricket team's Kary Chan on the importance of mutual support, and defeating self-doubt |work=South China Morning Post |access-date=21 October 2021}}</ref><ref>{{cite web |url=https://www.hkcricket.org/news/the-hong-kong-squad-announced-for-icc-womens-t20-cricket-world-cup-qualifiers-asia-region |title=The Hong Kong Squad announced for ICC Women's T20 Cricket World Cup Qualifiers – Asia Region |work=Hong Kong Cricket |access-date=21 October 2021 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
चैन ने 2019 थाईलैंड महिला टी20 स्मैश में इंडोनेशिया के खिलाफ हांगकांग के लिए 12 जनवरी 2019 को [[महिला ट्वेंटी 20 अंतर्राष्ट्रीय]] (मटी20आई) की शुरुआत की।<ref>{{cite web|url=https://www.espncricinfo.com/ci/engine/match/1171349.html |title=Group B, Bangkok, Jan 12 2019, Thailand Women's T20 Smash |work=ESPN Cricinfo |access-date=21 October 2021}}</ref> सितंबर 2019 में, चैन को 2019 महिला ट्वेंटी 20 पूर्वी एशिया कप के लिए हांगकांग टीम के कप्तान के रूप में नामित किया गया था।<ref>{{cite web |url=https://www.hkcricket.org/news/womens-east-asia-cup-2019?PageSpeed=noscript |title=Women's East Asia Cup 2019 squad announcement |work=Hong Kong Cricket |access-date=21 October 2021 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> हांगकांग के टूर्नामेंट के उद्घाटन मैच में, चीन के खिलाफ, चैन ने पांच विकेट लिए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हांगकांग की महिला टीम के लिए पहली हैट्रिक शामिल थी।<ref>{{cite web |url=https://www.womenscriczone.com/hat-trick-heroes-first-to-take-a-t20i-hat-trick-from-each-team |title=Hat-trick heroes: First to take a T20I hat-trick from each team |work=Women's CricZone |access-date=21 October 2021 |archive-date=1 नवंबर 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231101165620/https://www.womenscriczone.com/hat-trick-heroes-first-to-take-a-t20i-hat-trick-from-each-team |url-status=dead }}</ref><ref>{{cite web|url=https://emergingcricket.com/columns/super-over/super-over-6-great-womens-games-with-emerging-stars/6/ |title=Super Over: 6 great women's games with emerging stars |work=Emerging Cricket |access-date=21 October 2021}}</ref> वह चार मैचों में दस आउट होने के साथ, टूर्नामेंट में अग्रणी विकेट लेने वाली गेंदबाज के रूप में समाप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://stats.espncricinfo.com/ci/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?id=13239;type=tournament |title= Records: Women's Twenty20 East Asia Cup, 2019 / Most wickets |work=ESPN Cricinfo |access-date=21 October 2021}}</ref>
अक्टूबर 2020 में, चैन को 2021 हांगकांग महिला प्रीमियर लीग में बौहिनिया स्टार्स के कप्तान के रूप में नामित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://emergingcricket.com/news/hong-kong-womens-premier-league-squads-announced/ |title=Hong Kong Women's Premier League squads announced |work=Emerging Cricket |access-date=21 October 2021}}</ref><ref>{{cite web |url=https://womenscriczone.com/cricket-hong-kong-to-hold-three-match-womens-premier-league-t20 |title=Cricket Hong Kong to hold three-match Women's Premier League T20 |work=Women's CricZone |access-date=21 October 2021 |archive-date=18 मई 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210518110035/https://www.womenscriczone.com/cricket-hong-kong-to-hold-three-match-womens-premier-league-t20 |url-status=dead }}</ref> अक्टूबर 2021 में, चैन को संयुक्त अरब अमीरात में [[2021 आईसीसी महिला टी20 विश्व कप एशिया क्वालीफायर]] टूर्नामेंट के लिए हांगकांग की ओर से कप्तान के रूप में नामित किया गया था।<ref>{{cite web |url=https://www.womenscriczone.com/hong-kong-announce-14-member-squad-for-t20-world-cup-asia-qualifiers |title=Kary Chan to lead Hong Kong in T20 World Cup Asia Qualifiers |work=Women's CricZone |access-date=21 October 2021 |archive-date=19 जून 2024 |archive-url=https://web.archive.org/web/20240619161840/https://www.womenscriczone.com/hong-kong-announce-14-member-squad-for-t20-world-cup-asia-qualifiers |url-status=dead }}</ref>
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:1997 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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कर्नाटक हिजाब विवाद, २०२२
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text/x-wiki
'''कर्नाटक हिजाब विवाद, २०२२''' हाल के दिनों में भारत के [[कर्नाटक]] राज्य में उत्पन्न एक मामला है जो तब सामने आया जब एक कॉलेज में हिजाब पहनी छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। बाद में 5 फरवरी 2022 को [[कर्नाटक सरकार]] द्वारा कॉलेजों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया गया। [[कर्नाटक]] के कुछ कॉलेजों में हिजाब पहनने पर रोक लगाने के बाद [[कर्नाटक उच्च न्यायालय|कर्नाटक के उच्च न्यायालय]] में भी दो याचिकाएं दायर की गई हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.hindustantimes.com/india-news/hijab-row-maintain-peace-says-karnataka-high-court-as-tempers-flare-101644345793053.html|title=Hijab row: Maintain peace, says Karnataka high court as tempers flare|date=February 9, 2022|website=Hindustan Times}}</ref>
8 फरवरी 2022 को कर्नाटक में मुसलमान छात्त्राओं द्वारा हिजाब पहनने के विवाद तेज हो गया, जिसके बाद राज्य सरकार ने अगले तीन दिनों के लिए हाई स्कूल और कॉलेज बंद करने की घोषणा की।<ref>{{Cite web|url=https://indianexpress.com/article/cities/bangalore/karnataka-hijab-ban-row-protests-7763006/|title=Hijab protests spread, Karnataka govt shuts colleges, high schools for three days|date=February 9, 2022}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/karnataka-colleges-shut-for-3-days-as-hijab-row-turns-violent/articleshow/89439196.cms|title=Karnataka colleges shut for 3 days as hijab row turns violent | India News - Times of India|website=The Times of India}}</ref>
==परिप्रेक्ष्य==
दिसंबर 2021 के अंत और जनवरी 2022 की शुरुआत में राज्य के कई कॉलेजों में हिजाब को लेकर छात्राओं और प्रशासन के बीच विवाद बन चुकी थी, लेकिन फरवरी 2022 की शुरुआत में विवाद और तेज हो गए थे।<ref>{{Cite web|url=https://www.ndtv.com/india-news/hijab-row-live-protests-intensify-spread-to-other-states-karnataka-high-court-hearing-today-2757432|title=Hijab Row Live: Protests Intensify, Spread To Other States, Karnataka High Court Hearing Today|website=NDTV.com}}</ref>
==मामला न्यायालय में==
[[उडुपी]] के गवर्नमेंट पीयू कॉलेज फॉर विमेन की कई छात्राओं ने याचिका दायर कर कहा कि "हिजाब पहनना उनका संवैधानिक अधिकार है।"<ref>{{Cite web|url=https://www.india.com/karnataka/karnataka-high-court-hijab-ban-live-updates-cm-bommai-udupi-pu-college-karnataka-hijab-row-latest-updates-5228283/|title=Hijab Row Karnataka High Court To Hear Students|first=India com News|last=Desk|website=www.india.com}}</ref> १० फरवरी को उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि जब तक इस विषय में निर्णय नहीं आ जाता, तब तक छात्र-छात्राएँ किसी भी प्रकार का मजहबी परिधान धारण करके विद्यालय/महाविद्यालय न आयें। ११ फरवरी को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में त्वरित सुनवाई करने से मना कर दिया। <ref>[https://www.indiatv.in/india/national/hijab-controversy-supreme-court-refuses-to-hear-immediately-petition-given-against-order-of-karnataka-hc-2022-02-11-835330 सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई से किया इनकार, कर्नाटक HC के अंतरिम आदेश के खिलाफ दी गई थी याचिका]</ref>
==प्रतिक्रिया==
===व्यक्ति प्रतिक्रिया===
* [[आरिफ़ मोहम्मद ख़ान]] - [[केरल]] के राज्यपाल श्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने कहा कि पहले लड़कियों को जमीन में गाड़ दिया जाता था, अब उन्हें पर्दे में रखकर दबाया जाता है।<ref>[https://www.news18.com/news/india/girls-were-buried-under-earth-in-past-now-theyre-suppressed-with-veil-triple-talaq-on-hijab-row-kerala-guv-to-news-18-4759730.html 'Girls Were Buried Under Earth in Past, Now They're Suppressed with Veil': Kerala Guv on Hijab Row ]</ref>
* [[मलाला युसुफ़ज़ई|मलाला युसुफ़्ज़ाई]] – अपने ट्वीट पर मलाला ने कहा कि ''हिजाब पहनने वाली लड़कियों को स्कूल में प्रवेश करने से रोकना भयानक है। उन्होंने कहा कि कम या ज्यादा कपड़े पहनने के मामले में अभी भी महिलाओं के खिलाफ आपत्ति है और भारतीय नेताओं से मांग की कि [[मुसलमान|मुस्लिम]] महिलाओं को मुख्यधारा से अलग करने की प्रक्रिया को उनलोगों को रोकना चाहिए।''<ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/malala-yousafzai-karnataka-hijab-row-muslim-women-1910558-2022-02-09|title='Horrifying': Malala Yousafzai reacts to Karnataka hijab row|first1=India Today Web Desk New|last1=DelhiFebruary 9|first2=2022UPDATED|last2=February 9|first3=2022 01:59|last3=Ist|website=India Today}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://scroll.in/latest/1016942/karnataka-hijab-row-malala-yousafzai-urges-indian-leaders-to-stop-marginalisation-of-muslim-women|title=Karnataka hijab row: Malala Yousafzai urges Indian leaders to stop marginalisation of Muslim women|last=Staff|first=Scroll|website=Scroll.in|language=en-US|access-date=2022-02-09}}</ref>
* [[पॉल पोगबा|पॉल पोग्बा]] ने शेयर किए गए एक वीडियो में लिखा है, ‘''भारत में हिंदुत्व की भीड़ ने कॉलेज में मुस्लिम लड़की को हिजाब पहनने पर परेशान किया।'''<ref>{{Cite web|url=https://www.abplive.com/news/world/karnataka-hijab-row-controversy-manchester-united-footballer-paul-pogba-on-hindutva-hijab-controversy-2058949|title=अंतरराष्ट्रीय हुआ हिजाब विवाद! फ्रांसीसी फुटबॉलर ने शेयर किया कॉलेज में नारेबाजी वाला वीडियो|last=Live|first=A. B. P.|date=2022-02-11|website=www.abplive.com|language=hi|access-date=2022-02-11}}</ref>
* [[शाह महमूद कुरैशी]] - [[पाकिस्तान|पाकिस्तानी]] विदेश मंत्री ने कहा, "''मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा से वंचित करना मौलिक मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। किसी को भी इस मौलिक अधिकार से वंचित करना और उन्हें हिजाब पहनने के लिए आतंकित करना बिल्कुल दमनकारी है।''"<ref>{{Cite web|url=https://www.geo.tv/latest/398108-terrorising-women-for-wearing-hijab-absolutely-oppressive|title=Terrorising women for wearing hijab absolutely oppressive: Shah Mahmood Qureshi|website=www.geo.tv|language=en|access-date=2022-02-11}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.outlookindia.com/international/grave-violation-of-fundamental-human-rights-pak-foreign-minister-on-karnataka-hijab-row-news-121843|title=Grave Violation Of Fundamental Human Rights: Pak Foreign Minister On Karnataka Hijab Row|website=https://www.outlookindia.com/|language=en|access-date=2022-02-11}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.newsncr.com/national/karnataka-hijab-row-pakistan-enraged-by-controversy-over-hijab-summoned-indian-diplomat-said-incident-condemnable/|title=Karnataka Hijab Row: Pakistan enraged by controversy over hijab, summoned Indian diplomat, said- incident 'condemnable'|date=2022-02-10|website=News NCR|language=en-US|access-date=2022-02-11|archive-date=11 फ़रवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220211050735/https://www.newsncr.com/national/karnataka-hijab-row-pakistan-enraged-by-controversy-over-hijab-summoned-indian-diplomat-said-incident-condemnable/|url-status=dead}}</ref>
===दलीय प्रतिक्रिया===
* [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] - के 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' ने अपने बयान पर कहा कि ''हिंदू संस्कृति महिलाओं का सम्मान करना सिखाती है और जो लोग 'जय श्री राम' के नारा लगाकर लड़की को आतंकित करने की कोशिश किए हैं, वे गलत थे।''<ref>{{Cite web|url=https://www.deccanherald.com/state/top-karnataka-stories/asaduddin-owaisi-dials-mandya-girl-heckled-for-wearing-hijab-praises-her-fearlessness-1080011.html|title=Asaduddin Owaisi dials Mandya girl heckled for wearing hijab, praises…|date=2022-02-10|website=archive.vn|access-date=2022-02-11|archive-date=10 फ़रवरी 2022|archive-url=https://archive.today/20220210182301/https://www.deccanherald.com/state/top-karnataka-stories/asaduddin-owaisi-dials-mandya-girl-heckled-for-wearing-hijab-praises-her-fearlessness-1080011.html|url-status=bot: unknown}}</ref>
* [[विश्व हिंदू परिषद]] - नेता ने हिजाब विवाद को "''जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देने की साजिश" करार दिया और कहा कि मुस्लिम छात्र कॉलेज परिसरों में "हिजाब जिहाद" का प्रयास कर रहे थे''।<ref>https://www.siasat.com/hijab-issue-has-become-jihad-says-vishwa-hindu-parishad-leader-2272452/</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.theguardian.com/world/2022/feb/09/violent-clashes-over-hijab-ban-in-southern-india-force-schools-to-close|title=Violent clashes over hijab ban in southern India force schools to close|date=2022-02-09|website=the Guardian|language=en|access-date=2022-02-11}}</ref>
==इन्हें भी देखें==
*[[समान नागरिक संहिता]]
*[[पंथनिरपेक्षता]]
*[[छद्म धर्मनिरपेक्षता]]
*[[भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा]]
*[[कुरान की आलोचना]]
*[[फ्रांस द्वारा चेहरा ढकने पर प्रतिबन्ध]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://www.bbc.com/hindi/india-60343464 हिजाब पर दुनिया में कहां-कहां है विवाद और किन देशों में लगी है पाबंदी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:हिजाब]]
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वार्ता:सहकार भारती
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अनुनाद सिंह
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{{वार्ता पृष्ठ}}
== उल्लेखनीय है कि नहीं ==
यह एक अनुष्ठान है। देश के काफ़ी लोग तथा अन्य अनुष्ठान भी इससे जुड़े हुए हैं । अतः हम यह नहीं कह सकते हैं कि संस्था उल्लेखनीय नहीं है । हिन्दी विकिपीडिया में लेखों की काफ़ी कमी है । नए लेख, नए लेखक व संपादकों को उत्साह देना चाहिए । मेरे विचार में यह लेख रहने योग्य है । [[सदस्य:Subhrasingh|Subhrasingh]] ([[सदस्य वार्ता:Subhrasingh|वार्ता]]) 07:15, 29 अक्टूबर 2022 (UTC)
== इस संस्था की उल्लेखनीयता असंदिग्ध है ==
सहकार भारती कोई छोटी-मोटी संस्था नहीं है। यह भारत के ४०० जिलों में कार्य कर रही है। '''२० हजार''' से अधिक सहकारी संस्थाएँ इससे सम्बद्ध हैं।<ref>[https://www.indiancooperative.com/from-states/inamdars-centenary-sahakar-bharati-remembers-its-founder/ Sahakar Bharati remembers its founder]</ref>
अतः '''इसे न हटाएँ''' बल्कि इससे उल्लेखनीयता का टैग हटा दें।
==सन्दर्भ==
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काउंटर-स्ट्राइक: ग्लोबल ऑफेंसिव
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'''''काउंटर-स्ट्राइक: ग्लोबल ऑफेंसिव''''' ( '''''CS:GO''''' ) एक 2012 मल्टीप्लेयर टैक्टिकल [[प्रथम-व्यक्ति शूटर|फर्स्ट-पर्सन शूटर]] है जिसे वाल्व और हिडन पाथ एंटरटेनमेंट द्वारा विकसित किया गया है। यह [[काउंटर स्ट्राइक|काउंटर-स्ट्राइक]] श्रृंखला का चौथा गेम है। दो वर्षों से अधिक के लिए विकसित, ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव को अगस्त 2012 में [[माइक्रोसॉफ्ट विंडोज़|विंडोज]], मैकओएस, [[एक्सबॉक्स 360]] और [[प्लेस्टेशन ३|प्लेस्टेशन 3]] के लिए और 2014 में [[लिनक्स]] के लिए जारी किया गया था। वाल्व अभी भी नियमित रूप से खेल को अपडेट करता है, दोनों छोटे संतुलन पैच और बड़े सामग्री परिवर्धन के साथ।
खेल दो टीमों, आतंकवादियों और काउंटर-आतंकवादियों को अलग-अलग उद्देश्य-आधारित गेम मोड में एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करता है। सबसे आम गेम मोड में आतंकवादी बम लगाते हैं जबकि काउंटर-टेररिस्ट उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, या काउंटर-टेररिस्ट बंधकों को बचाने का प्रयास करते हैं जिन्हें आतंकवादियों ने पकड़ लिया है। नौ आधिकारिक गेम मोड हैं, जिनमें से सभी में उस मोड के लिए विशिष्ट विशेषताएं हैं। गेम में मैचमेकिंग सपोर्ट भी है जो खिलाड़ियों को कस्टम मैप्स और गेम मोड के साथ कम्युनिटी-होस्टेड सर्वर के अलावा समर्पित वाल्व सर्वर पर खेलने की अनुमति देता है। एक बैटल-रॉयल गेम-मोड, "डेंजर ज़ोन", दिसंबर 2018 में पेश किया गया था।
''ग्लोबल ऑफेंसिव'' को रिलीज पर आलोचकों से सकारात्मक समीक्षा मिली, जिन्होंने ''काउंटर-स्ट्राइक'' श्रृंखला के लिए इसके गेमप्ले और वफादारी के लिए खेल की प्रशंसा की, हालांकि कुछ शुरुआती विशेषताओं और कंसोल और पीसी संस्करणों के बीच अंतर के लिए इसकी आलोचना की गई थी। इसकी रिलीज के बाद से, यह प्रति माह अनुमानित 11 मिलियन खिलाड़ियों में शामिल हो गया है और वाल्व के स्टीम प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा खेले जाने वाले खेलों में से एक है। दिसंबर 2018 में, वाल्व ने कॉस्मेटिक वस्तुओं से राजस्व पर ध्यान केंद्रित करते हुए गेम को एक फ्री-टू-प्ले मॉडल में बदल दिया।
श्रृंखला में पिछले खेलों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी खेल के इतिहास को जारी रखते हुए, खेल में एक सक्रिय एस्पोर्ट्स दृश्य है। पेशेवर लीग और टूर्नामेंट में टीमें प्रतिस्पर्धा करती हैं, और ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव अब सबसे बड़े वैश्विक निर्यातों में से एक है। इसे द गेम अवार्ड्स 2017, द गेम अवार्ड्स 2019 और द गेम अवार्ड्स 2020 शो में "सर्वश्रेष्ठ ईस्पोर्ट्स गेम" से सम्मानित किया गया है।
== गेमप्ले ==
''वैश्विक आक्रामक'', ''काउंटर-स्ट्राइक'' श्रृंखला में पूर्व खेलों की तरह, एक उद्देश्य-आधारित, मल्टीप्लेयर [[प्रथम-व्यक्ति शूटर|प्रथम-व्यक्ति शूटर है]] । दो विरोधी टीमें, आतंकवादी और काउंटर-आतंकवादी, खेल मोड में बार-बार उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जैसे बम लगाने या डिफ्यूज करने और बंधकों को बचाने या पकड़ने के लिए एक स्थान हासिल करना। <ref name="Destructoid Review">{{Cite web|url=https://www.destructoid.com/review-counter-strike-global-offensive-233724.phtml|title=Review: Counter-Strike: Global Offensive|last=Pinsof|first=Allistair|date=August 24, 2012|website=[[Destructoid]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170101122023/https://www.destructoid.com/review-counter-strike-global-offensive-233724.phtml|archive-date=January 1, 2017|access-date=April 7, 2014}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.questia.com/newspaper/1P2-36564855/game-bytes-counter-strike-lackluster|title=GAME BYTES: 'Counter-Strike' Lackluster|last=Owen|first=Phil|date=August 31, 2012|website=[[The Tuscaloosa News]]|publisher=[[New Media Investment Group]]|via=|url-access=|archive-url=https://web.archive.org/web/20170816193400/https://www.questia.com/newspaper/1P2-36564855/game-bytes-counter-strike-lackluster|archive-date=August 16, 2017|access-date=}}</ref> प्रत्येक छोटे दौर के अंत में, खिलाड़ियों को व्यक्तिगत और टीम के प्रदर्शन के आधार पर इन-गेम मुद्रा के साथ पुरस्कृत किया जाता है ताकि बाद के राउंड में अन्य हथियारों या उपयोगिता पर खर्च किया जा सके। <ref name="DotEsportsEconomyGuide">{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/beginners-guide-csgo-economy-basics-edition-23593|title=CS:GO Economy Guide: How it Works, Bonuses, the Meta, and More|last=Heath|first=Jerome|last2=Villanueva|first2=Jamie|date=May 4, 2020|website=Dot Esports|access-date=March 8, 2021}}</ref> राउंड जीतना आम तौर पर हारने की तुलना में अधिक पैसा देता है, और दुश्मनों को मारने सहित मानचित्र-आधारित उद्देश्यों को पूरा करने से अतिरिक्त नकद बोनस मिलता है। <ref name="Destructoid Review" /> <ref name="navimoney">{{Cite web|url=http://read.navi-gaming.com/en/team_news/money_system_in_csgo_explained|title=Money system in CS:GO explained|publisher=[[Natus Vincere]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170102060245/http://read.navi-gaming.com/en/team_news/money_system_in_csgo_explained|archive-date=January 2, 2017|access-date=January 2, 2017}}</ref>
[[File:Counter-Strike_Global_Offensive_gameplay_screenshot.jpeg|बाएँ|अंगूठाकार| डस्ट II पर एक इन-प्रोग्रेस मैच, जिसमें खिलाड़ी [[एके47|AK-47 .]] का उपयोग कर रहा है]]
''ग्लोबल ऑफेंसिव'' में नौ आधिकारिक गेम मोड हैं: प्रतिस्पर्धी, आकस्मिक, डेथमैच, आर्म्स रेस, डिमोलिशन, विंगमैन, फ्लाइंग स्काउट्समैन, रीटेक और डेंजर ज़ोन। <ref name="ValveAboutCSGO">{{Cite web|url=https://blog.counter-strike.net/index.php/about/|title=Counter-Strike: Global Offensive|website=blog.counter-strike.net|access-date=March 7, 2021}}</ref> <ref name="weaponscourse">{{Cite magazine|accessdate=January 6, 2017}}</ref> <ref name="WingmanScoutsman">{{Cite news|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/operation-hydra-modes-maps-18685|title=Several maps and game modes permanently added to CS:GO as Operation Hydra ends|last=Villanueva|first=Jamie|date=November 15, 2017|work=Dot eSports|access-date=November 16, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20190216183147/https://dotesports.com/counter-strike/news/operation-hydra-modes-maps-18685|archive-date=February 16, 2019|publisher=[[The Daily Dot]]}}</ref> <ref name=":0">{{Cite web|url=http://www.counter-strike.net/brokenfang/|title=CS:GO - Operation Broken Fang|website=counter-strike.net|language=en|access-date=September 1, 2021}}</ref> प्रतिस्पर्धी मोड, प्राथमिक गेमप्ले अनुभव, <ref name="GameSpotReview">{{Cite web|url=https://www.gamespot.com/reviews/counter-strike-global-offensive-review/1900-6394451/|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|last=Neigher|first=Eric|date=August 31, 2012|website=[[GameSpot]]|publisher=[[CBS Interactive]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170409073748/https://www.gamespot.com/reviews/counter-strike-global-offensive-review/1900-6394451/|archive-date=April 9, 2017|access-date=April 9, 2017}}</ref> सर्वश्रेष्ठ -30 मैच में पांच खिलाड़ियों की दो टीमों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करता है। <ref name="competitivemode">{{Cite magazine|accessdate=January 6, 2017}}</ref> प्रतिस्पर्धी खेलते समय, खिलाड़ियों के पास ग्लिको रेटिंग सिस्टम के आधार पर एक कौशल रैंक होता है और उन्हें उसी रैंकिंग के आसपास के अन्य खिलाड़ियों के साथ जोड़ा जाता है। <ref name="Destructoid Review"/> कैजुअल और डेथमैच मोड प्रतिस्पर्धी मोड की तुलना में कम गंभीर हैं और अनुकूल आग दर्ज नहीं करते हैं। दोनों मुख्य रूप से एक अभ्यास उपकरण के रूप में उपयोग किए जाते हैं। <ref name="engadgetreview">{{Cite web|url=https://www.engadget.com/2012/08/28/counter-strike-global-offensive-review/|title=Counter-Strike Global Offensive review: Come at the king, you best not miss|last=de Matos|first=Xav|date=August 28, 2012|website=[[Engadget]]|publisher=[[AOL Inc]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622002528/https://www.engadget.com/2012/08/28/counter-strike-global-offensive-review/|archive-date=June 22, 2017|access-date=January 6, 2017}}</ref> <ref name="xhair">{{Cite magazine|accessdate=June 22, 2017}}</ref> शस्त्र दौड़ और विध्वंस, दोनों श्रृंखला में पिछले पुनरावृत्तियों के लिए मॉड पर आधारित, मोड के लिए आठ नए मानचित्रों के साथ जोड़े गए थे। <ref name="Destructoid Review" /> शस्त्र दौड़ श्रृंखला के अन्य खेलों में "गन गेम" मोड का ''वैश्विक आक्रामक'' संस्करण है। <ref name="Destructoid Review" /> डिमोलिशन एक और बम डिफ्यूज़ल गेम मोड है, जिसमें गन अपग्रेड केवल उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले राउंड में दुश्मन को मार दिया था। <ref name="Destructoid Review" /> विंगमैन एक टू-ऑन-टू बम डिफ्यूज़ल गेम मोड है जो सोलह राउंड में होता है। प्रतिस्पर्धी के समान, खिलाड़ियों को एक गतिशील कौशल रैंकिंग के आधार पर जोड़ा जाता है। <ref name="WingmanScoutsman" /> फ्लाइंग स्काउट्समैन मोड खिलाड़ियों को केवल एक एसएसजी 08 ("स्काउट" के रूप में जाना जाता है) और कम-गुरुत्वाकर्षण मानचित्र में एक चाकू से लैस करता है। <ref>{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/flying-scoutsman-14887|title=The Flying Scoutsman: How to play the CS:GO war game|last=Villanueva|first=Jamie|date=May 26, 2017|website=Dot Esports|access-date=March 8, 2021}}</ref> रीटेक एक गेम मोड है जहां तीन आतंकवादी पहले से लगाए गए सी4 को 4 काउंटर-टेररिस्टों के खिलाफ बचाव करेंगे। बम साइट को फिर से लेने (या बचाव) करने के लिए खिलाड़ी प्रत्येक दौर की शुरुआत में लोडआउट कार्ड चुनने में सक्षम होंगे। <ref name=":0" /> डेंजर ज़ोन एक बैटल-रॉयल मोड है जिसमें 18 खिलाड़ी अंतिम व्यक्ति या टीम के शेष रहने के प्रयास में हथियार, उपकरण और धन की खोज करते हैं। <ref>{{Cite magazine|accessdate=December 12, 2018}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.theverge.com/2018/12/6/18129666/counter-strike-go-danger-zone-battle-royale-mode-free-to-play-expansion|title=CS:GO Battle royale gamemode info|last=Liao|first=Shannon|date=December 6, 2018|website=The Verge}}</ref> वाल्व में एक ऑफ़लाइन अभ्यास मोड भी शामिल है जिसे नए खिलाड़ियों को बंदूकें और हथगोले का उपयोग करने का तरीका सीखने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसे वेपन्स कोर्स कहा जाता है। <ref>{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/learning-csgo-game-modes-11484|title=CSGO Game Modes –– Information|last=Redler|first=Jannes|date=December 21, 2015|website=DOT ESPORTS|access-date=12 अक्तूबर 2022|archive-date=16 जून 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210616072446/https://dotesports.com/counter-strike/news/learning-csgo-game-modes-11484|url-status=dead}}</ref> वेपन्स कोर्स के अलावा अन्य सभी गेम मोड को बॉट्स के साथ ऑनलाइन या ऑफलाइन खेला जा सकता है। <ref name="weaponscourse" />
खरीद योग्य हथियारों की पांच श्रेणियां हैं: राइफलें, सबमशीन बंदूकें, "भारी" हथियार (हल्की मशीनगन और शॉटगन), पिस्तौल और हथगोले। <ref>{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/csgo-weapons-guide-16911|title=A guide to CS:GO's weapons|last=Villanueva|first=Jamie|date=September 6, 2017|website=Dot eSports|publisher=[[The Daily Dot]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20180224052715/https://dotesports.com/counter-strike/news/csgo-weapons-guide-16911|archive-date=February 24, 2018|access-date=October 13, 2017}}</ref> ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' में प्रत्येक गन का एक अनूठा रीकॉइल पैटर्न होता है जिसे नियंत्रित किया जा सकता है, एक गेमप्ले फीचर जिसके साथ श्रृंखला लंबे समय से जुड़ी हुई है। <ref>{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/csgo-spray-pattern-guide-21133|title=CS:GO Spray Pattern and Recoil Compensation Guide For Every Weapon|last=Heath|first=Jerome|date=January 26, 2021|website=Dot Esports|access-date=March 7, 2021}}</ref> <ref name="VideoGamerReview">{{Cite web|url=https://www.videogamer.com/reviews/counter-strike-global-offensive-review|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|last=Gaston|first=Martin|date=August 23, 2017|website=VideoGamer.com|archive-url=https://web.archive.org/web/20170412065546/https://www.videogamer.com/reviews/counter-strike-global-offensive-review|archive-date=April 12, 2017|access-date=April 12, 2017}}</ref> ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' ने हथियार और उपकरण भी पेश किए जो पिछली किश्तों में नहीं देखे गए, जिनमें टैसर और एक आग लगाने वाला ग्रेनेड शामिल है।
इन-गेम मैचमेकिंग सभी ऑनलाइन गेम मोड के लिए समर्थित है और इसे स्टीम प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रबंधित किया जाता है। <ref>{{Cite web|url=http://www.gamespot.com/articles/counter-strike-global-offensive-firing-up-early-2012/1100-6328645/|title=Counter-Strike: Global Offensive firing up early 2012|last=Makuch|first=Eddie|website=[[GameSpot]]|publisher=CBS Interactive Inc.|archive-url=https://web.archive.org/web/20170106114424/http://www.gamespot.com/articles/counter-strike-global-offensive-firing-up-early-2012/1100-6328645/|archive-date=January 6, 2017|access-date=June 12, 2012}}</ref> धोखाधड़ी को रोकने के लिए गेम सर्वर वाल्व एंटी-चीट चलाते हैं। <ref>{{Cite magazine|accessdate=January 2, 2017}}</ref> धोखाधड़ी को रोकने के लिए ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव में मैचमेकिंग का एक रूप प्राइम मैचमेकिंग है जो उन मैचों को होस्ट करता है जिन्हें केवल "प्राइम" स्थिति वाले अन्य उपयोगकर्ताओं के साथ खेला जा सकता है। इस सुविधा के परिणामस्वरूप अधिक समान मिलान भी होते हैं क्योंकि इन मैचों में कम " [[स्वत: निशाना|smurfs]] " होते हैं। <ref name="pcgamerprime">{{Cite magazine|accessdate=January 1, 2017}}</ref> ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' का पीसी संस्करण निजी समर्पित सर्वरों का भी समर्थन करता है जिन्हें खिलाड़ी खेल में सामुदायिक सर्वर मेनू के माध्यम से कनेक्ट कर सकते हैं। इन सर्वरों को भारी रूप से संशोधित किया जा सकता है और बेस गेम मोड से काफी भिन्न हो सकते हैं। खेल के लिए कई समुदाय-निर्मित मोड हैं, जिनमें से एक लोकप्रिय "kz" है, एक ऐसा मॉड जो खिलाड़ियों को उन्नत स्ट्राफिंग और जंपिंग तकनीकों की आवश्यकता वाले बाधा कोर्स को पूरा करता है। <ref name="kz1">{{Cite magazine|accessdate=June 22, 2017}}</ref>
== विकास और रिलीज ==
{{external media|float=right|width=258px|video1=[https://www.youtube.com/watch?v=sdBjDSczgKY Counter-Strike: A Brief History], a YouTube video published by [[Valve Corporation|Valve]] on January 23, 2017}}
''काउंटर-स्ट्राइक: ग्लोबल ऑफेंसिव'', लोकप्रिय प्रथम-व्यक्ति शूटर ''काउंटर-स्ट्राइक: सोर्स'' की अगली कड़ी है, जिसे वाल्व द्वारा विकसित किया गया है। ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' ' विकास तब शुरू हुआ जब हिडन पाथ एंटरटेनमेंट ने ''काउंटर-स्ट्राइक: सोर्स'' ऑन वीडियो गेम कंसोल को पोर्ट करने का प्रयास किया। <ref name="Destructoid Review"/> <ref name="savedcsgo">{{Cite magazine|accessdate=January 11, 2017}}</ref> अपने विकास के दौरान, वाल्व ने बंदरगाह को एक पूर्ण गेम में बदलने और पूर्ववर्ती के गेमप्ले पर विस्तार करने का अवसर देखा। मार्च 2010 में ''वैश्विक आक्रामक'' विकास शुरू हुआ, और 12 अगस्त, 2011 को जनता के सामने प्रकट हुआ। <ref>{{Cite news|url=http://www.rockpapershotgun.com/2011/08/12/counter-strike-global-offensive/|title=Revealed: Counter-Strike: Global Offensive|last=Alec Meer|date=August 12, 2011|work=Rock Paper Shotgun|access-date=November 8, 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622003220/https://www.rockpapershotgun.com/2011/08/12/counter-strike-global-offensive/|archive-date=June 22, 2017}}</ref> बंद [[सॉफ्टवेयर रिलीज जीवन चक्र|बीटा]] 30 नवंबर, 2011 को शुरू हुआ, और शुरू में लगभग दस हजार लोगों तक ही सीमित था, जिन्हें ''वैश्विक आपत्तिजनक'' प्रदर्शन करने के उद्देश्य से एक कुंजी प्राप्त हुई थी। [[सेवार्थी-सेवक मॉडल|क्लाइंट और सर्वर]] स्थिरता के मुद्दों को संबोधित करने के बाद, बीटा को उत्तरोत्तर अधिक लोगों के लिए खोल दिया गया, <ref name="delayed" /> और E3 2012 में, वाल्व ने घोषणा की कि ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' 21 अगस्त, 2012 को जारी किया जाएगा, जिसमें ओपन बीटा लगभग एक महीने से शुरू होगा। इससे पहले। <ref name="delayed">{{Cite magazine|accessdate=June 22, 2017}}</ref> सार्वजनिक बीटा से पहले, वाल्व ने पेशेवर ''काउंटर-स्ट्राइक'' खिलाड़ियों को खेल का परीक्षण करने और प्रतिक्रिया देने के लिए आमंत्रित किया। <ref name="RPS GO Reveal">{{Cite news|url=http://www.rockpapershotgun.com/2011/08/15/counter-strike-go/|title=Counter-Strike: GO Explained Properly|last=Alec Meer|date=August 15, 2011|work=Rock Paper Shotgun|access-date=November 10, 2011}}</ref>
विंडोज़, ओएस एक्स, लिनक्स, एक्सबॉक्स 360 और प्लेस्टेशन 3 प्लेयर्स के बीच क्रॉस-प्लेटफ़ॉर्म मल्टीप्लेयर प्ले की योजना थी, लेकिन अंततः इसे छोड़ दिया गया ताकि पीसी और मैक संस्करणों को सक्रिय रूप से अपडेट किया जा सके। <ref>{{Cite web|url=https://www.engadget.com/2012/03/05/counter-strike-global-offensive-loses-cross-play/|title=Counter-Strike: Global Offensive loses cross-play|last=Hinkle|first=David|date=March 5, 2012|website=Joystiq|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622133515/https://www.engadget.com/2012/03/05/counter-strike-global-offensive-loses-cross-play/|archive-date=June 22, 2017|access-date=June 22, 2017}}</ref> 21 अगस्त 2012 को, खेल को सार्वजनिक रूप से लिनक्स को छोड़कर सभी प्लेटफार्मों पर जारी किया गया था, <ref name="CSGOrelease">{{Cite web|url=http://www.eurogamer.net/articles/2012-06-04-counter-strike-global-offensive-release-date-announced|title=Counter-Strike: Global Offensive release date announced|last=Wesley Yin-Poole|date=June 4, 2012|website=[[Eurogamer]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170413064515/http://www.eurogamer.net/articles/2012-06-04-counter-strike-global-offensive-release-date-announced|archive-date=April 13, 2017|access-date=August 21, 2012}}</ref> जो 23 सितंबर, 2014 तक जारी नहीं किया जाएगा। <ref>{{Cite web|url=http://news.softpedia.com/news/Counter-Strike-Global-Offensive-Officially-Lands-on-Linux-Skips-Beta-Stage-459590.shtml|title=Counter-Strike: Global Offensive Officially Lands on Linux, Skips Beta|last=Stahi|first=Silviu|date=September 23, 2014|website=[[Softpedia]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170413064120/http://news.softpedia.com/news/Counter-Strike-Global-Offensive-Officially-Lands-on-Linux-Skips-Beta-Stage-459590.shtml|archive-date=April 13, 2017|access-date=April 13, 2017}}</ref>
''ग्लोबल ऑफेंसिव'' की प्रारंभिक रिलीज के बाद से, वाल्व ने नए नक्शे और हथियार, गेम मोड और हथियार संतुलन परिवर्तन पेश करके गेम को अपडेट करना जारी रखा है। रिलीज के बाद के खेल के पहले प्रमुख परिवर्धन में से एक "आर्म्स डील" अपडेट था। 13 अगस्त, 2013 को जारी, इस अपडेट ने खेल में कॉस्मेटिक हथियार खत्म, या खाल को जोड़ा। ये आइटम लूट बॉक्स तंत्र द्वारा प्राप्य हैं; खिलाड़ियों को ऐसे मामले प्राप्त होंगे जिन्हें इन-गेम माइक्रोट्रांस के माध्यम से खरीदी गई आभासी कुंजियों का उपयोग करके अनलॉक किया जा सकता है। <ref name="polygon gambling overview">{{Cite web|url=http://www.polygon.com/2016/7/11/12129136/counter-strike-global-offensive-cs-go-skins-explainer|title=How do Counter-Strike: Global Offensive skins work?|last=Sarkar|first=Samit|date=July 11, 2016|website=[[Polygon (website)|Polygon]]|publisher=[[Vox Media]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622133640/https://www.polygon.com/2016/7/11/12129136/counter-strike-global-offensive-cs-go-skins-explainer|archive-date=June 22, 2017|access-date=July 11, 2016}}</ref> <ref name="savedcsgo"/> ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' में स्टीम वर्कशॉप का समर्थन है, जिससे उपयोगकर्ता उपयोगकर्ता द्वारा बनाई गई सामग्री, जैसे कि नक्शे, हथियार की खाल और कस्टम गेम-मोड अपलोड कर सकते हैं। कुछ लोकप्रिय उपयोगकर्ता-निर्मित खाल को खेल में जोड़ा जाता है और मामलों में उन्हें अनबॉक्सिंग से प्राप्त किया जा सकता है। <ref>{{Cite web|url=http://wwg.com/esports/2017/01/19/5-five-seven-skins-we-need-now/|title=5 Five-SeveN CSGO Skins We Need Now|last=Cropley|first=Steven|date=January 19, 2017|website=WWG|publisher=Comicbook.com|archive-url=https://web.archive.org/web/20170413065325/http://wwg.com/esports/2017/01/19/5-five-seven-skins-we-need-now/|archive-date=April 13, 2017}}</ref> खाल के रचनाकारों को भुगतान तब किया जाता है जब उनकी वस्तु को किसी मामले में जोड़ा जाता है। <ref>{{Cite news|url=https://www.rockpapershotgun.com/2015/01/30/steam-workshop-57-million-dollars/|title=Over $57 Million Paid Out To Steam Workshop Creators|last=O'Connor|first=Sarah|date=January 30, 2015|work=[[Rock, Paper, Shotgun]]|access-date=April 13, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170413070048/https://www.rockpapershotgun.com/2015/01/30/steam-workshop-57-million-dollars/|archive-date=April 13, 2017}}</ref> इन खालों ने ''वैश्विक आपत्तिजनक'' में एक आभासी अर्थव्यवस्था बनाने में मदद की, जिससे जुआ, सट्टेबाजी और व्यापारिक साइटों का निर्माण हुआ। <ref>{{Cite news|url=https://www.rockpapershotgun.com/2015/08/14/csgo-skin-economy-explained/|title=How Counter-Strike: Global Offensive's Economy Works|last=Richardson|first=Emily|date=August 14, 2015|work=[[Rock, Paper, Shotgun]]|access-date=September 30, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170930000705/https://www.rockpapershotgun.com/2015/08/14/csgo-skin-economy-explained/|archive-date=September 30, 2017}}</ref> खाल और संबद्ध आभासी अर्थव्यवस्था ने ''काउंटर-स्ट्राइक'' श्रृंखला के अन्य खेलों में ''ग्लोबल ऑफेंसिव के'' खिलाड़ी की गिनती शुरू की और यह खेल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण अपडेट में से एक है। <ref name="savedcsgo" /> <ref name="ESPN2017">{{Cite web|url=http://www.espn.com/espn/feature/story/_/id/18510975/how-counter-strike-turned-teenager-compulsive-gambler|title=Skin in the Game|last=Assael|first=Shaun|date=January 23, 2017|website=[[ESPN]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170122181421/http://www.espn.com/espn/feature/story/_/id/18510975/how-counter-strike-turned-teenager-compulsive-gambler|archive-date=January 22, 2017|access-date=January 23, 2017}}</ref>
"ऑपरेशन" नामक ईवेंट कभी-कभी आयोजित किए जाते हैं और "ऑपरेशन पास" के रूप में क्रय योग्य विस्तार पैक के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। ये पास ऑपरेशन उद्देश्यों तक पहुंच प्रदान करते हैं जो विभिन्न गेम मोड में फैले हुए हैं, जैसे कि आर्म्स रेस और डेथमैच, <ref name="op1" /> या ऑपरेशन-विशिष्ट गेम मोड में, पहली बार ऑपरेशन हाइड्रा में देखा गया, जिसे मई 2017 में जारी किया गया था। <ref name="hydra">{{Cite web|url=https://www.vg247.com/2017/05/24/counter-strike-go-operation-hydra/|title=Counter-Strike GO: Operation Hydra will change things up|last=O'Connor|first=James|date=May 24, 2017|website=[[VG247]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170524083500/https://www.vg247.com/2017/05/24/counter-strike-go-operation-hydra/|archive-date=May 24, 2017|access-date=May 24, 2017}}</ref> इन चुनौतियों को पूरा करने से खिलाड़ी को XP और ऑपरेशन "सिक्का" को अपग्रेड करने की क्षमता का पुरस्कार मिलता है। संचालन में मानचित्र समुदाय निर्मित होते हैं, जिसका अर्थ है कि कुछ राजस्व मानचित्र डिजाइनरों की ओर जाता है। <ref name="op1">{{Cite web|url=http://www.polygon.com/2014/7/2/5864207/counter-strike-global-offensive-cs-go-operation-breakout|title=Counter-Strike: Global Offensive gets missions and new rewards with Operation Breakout|last=Sarkar|first=Samit|date=July 2, 2014|website=[[Polygon (website)|Polygon]]|publisher=[[Vox Media]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20140706182928/http://www.polygon.com/2014/7/2/5864207/counter-strike-global-offensive-cs-go-operation-breakout|archive-date=July 6, 2014|access-date=April 15, 2017}}</ref> <ref>{{Cite magazine|accessdate=April 15, 2017}}</ref>
अक्टूबर 2014 में एक अपडेट में "म्यूजिक किट" जोड़ा गया, जो वाल्व द्वारा कमीशन किए गए [[ध्वनि-पट्टी|साउंडट्रैक]] कलाकारों के संगीत के साथ डिफ़ॉल्ट इन-गेम संगीत को बदल देता है। यदि संगीत किट वाला कोई खिलाड़ी राउंड का सबसे मूल्यवान खिलाड़ी बन जाता है, तो राउंड के अंत में उनका संगीत अन्य लोगों के लिए चलेगा। एक सुविधा है जो किट को उधार लेने की अनुमति देती है, और किट को स्टीम के सामुदायिक बाजार के माध्यम से बेचा और आदान-प्रदान किया जा सकता है। <ref>{{Cite web|url=http://games.softpedia.com/blog/New-CS-GO-Update-Adds-Music-Kits-with-Custom-Songs-to-the-Game-461784.shtml|title=New CS:GO Update Adds Music Kits with Custom Songs to the Game|last=Dobra|first=Andrei|date=October 11, 2014|website=[[Softpedia]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170415064032/http://games.softpedia.com/blog/New-CS-GO-Update-Adds-Music-Kits-with-Custom-Songs-to-the-Game-461784.shtml|archive-date=April 15, 2017|access-date=April 15, 2017}}</ref>
2016 में, खेल ने मूल ''काउंटर-स्ट्राइक'' मानचित्रों के दो रीमेक देखे, साथ ही साथ प्राइम मैचमेकिंग और अतिरिक्त वस्तुओं की शुरूआत की। ऑपरेशन वाइल्डफायर प्रमोशन के एक हिस्से के रूप में, न्यूक को फरवरी में फिर से बनाया गया और फिर से जारी किया गया, जिसमें प्राथमिक लक्ष्य नक्शे को संतुलित करना और इसे अधिक सौंदर्यपूर्ण रूप से मनभावन बनाना था। <ref>{{Cite web|url=https://www.polygon.com/2016/2/18/11048520/csgo-nuke-remake-operation-wildfire-valve|title=Counter-Strike: GO brings back Nuke as part of Operation Wildfire|date=February 18, 2016|website=[[Polygon (website)|Polygon]]}}</ref> अप्रैल में, प्राइम मैचमेकिंग को खेल में जोड़ा गया। इस मोड में भाग लेने के लिए, उपयोगकर्ता के पास अपने खाते से जुड़ा एक सत्यापित फ़ोन नंबर होना चाहिए। इसे वैध खिलाड़ियों को धोखेबाज़ों या उच्च-कुशल खिलाड़ियों के साथ वैकल्पिक, निचली रैंक वाले खातों पर खेलने से रोकने के प्रयास में पेश किया गया था, एक अभ्यास जिसे बोलचाल की भाषा में " [[स्वत: निशाना|स्मर्फिंग]] " के रूप में जाना जाता है। <ref name="pcgamerprime"/> इन्फर्नो, एक और मूल नक्शा, अक्टूबर में फिर से जारी किया गया था। वाल्व ने कहा कि रीमेक के पीछे उनके तीन कारण थे: "दृश्यता में सुधार करने के लिए, समूहों में घूमना आसान बनाने के लिए, और खिलाड़ी प्रतिक्रिया के साथ इसे ट्यून करने के लिए।" <ref>{{Cite news|url=https://www.rockpapershotgun.com/2016/10/14/counter-strike-global-offensive-inferno-comparison-screenshots/|title=Counter-Strike: Global Offensive's Inferno Revamped|date=October 14, 2016|work=Rock Paper Shotgun}}</ref> इसके अलावा अक्टूबर में, भित्तिचित्र नामक उपभोज्य वस्तुओं को खेल में जोड़ा गया। इन मदों ने स्प्रे नामक श्रृंखला के पिछले पुनरावृत्तियों में मौजूद एक विशेषता को बदल दिया। पहले, खिलाड़ी अपने स्प्रे को अनुकूलित कर सकते थे। भित्तिचित्र विचारों को स्टीम वर्कशॉप में उसी तरह अपलोड किया जा सकता है जैसे बंदूक की खाल और खिलाड़ी खेल में मौजूदा भित्तिचित्रों को खरीद और व्यापार कर सकते हैं। <ref name="graffiti">{{Cite web|url=https://www.polygon.com/2016/10/7/13203232/counter-strike-go-spray-graffiti-monetization-csgo-valve|title=Valve brings sprays back to Counter-Strike — and monetizes them|last=McWhertor|first=Michael|date=October 7, 2016|website=[[Polygon (website)|Polygon]]|publisher=[[Vox Media]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170917064115/https://www.polygon.com/2016/10/7/13203232/counter-strike-go-spray-graffiti-monetization-csgo-valve|archive-date=September 17, 2017|access-date=September 17, 2017}}</ref> एक महीने बाद, दस्ताने की खाल को जोड़ा गया। <ref name="glovesadded">{{Cite magazine|accessdate=January 6, 2017}}</ref>
सितंबर 2017 में, वाल्व कंपनी ने मुख्य भूमि चीन में ग्लोबल ऑफेंसिव को रिलीज़ करने के लिए प्रकाशक परफेक्ट वर्ल्ड के साथ काम किया। चीनी नागरिक, उनकी पहचान सत्यापित होने के साथ, गेम को मुफ्त में प्राप्त कर सकते हैं और तुरंत प्राइम मैचमेकिंग स्टेटस अर्जित कर सकते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-free-china-perfect-world-verify-id|title=CS:GO is free in China if you verify your identity|last=Scott-Jones|first=Richard|date=August 18, 2017|website=PCGamesN|archive-url=https://archive.today/20180201173325/https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-free-china-perfect-world-verify-id|archive-date=February 1, 2018|access-date=January 1, 2018}}</ref> गेम को Perfect World के लॉन्चर के माध्यम से खेला जाता है और इसमें खोपड़ी और अन्य प्रतीकों की सेंसरशिप सहित खेल में कई विशेष परिवर्तन शामिल हैं। <ref name="PerfectWorld2">{{Cite web|url=https://www.dexerto.com/news/china-prepares-csgo-launch-lighting-skyscrapers-marketing-counter-strike-perfect-world/35375|title=China Prepares for CS:GO Launch With Hardcore Marketing|last=Beard|first=Harrison|website=Dexerto|language=en-US|archive-url=https://archive.today/20180201173518/https://www.dexerto.com/news/china-prepares-csgo-launch-lighting-skyscrapers-marketing-counter-strike-perfect-world/35375|archive-date=February 1, 2018|access-date=January 1, 2018}}</ref> <ref name="PerfectWorld3">{{Cite web|url=https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-chinese-launch-buildings|title=Cities across China light up in honor of upcoming CS:GO launch|last=Bailey|first=Dustin|date=September 14, 2017|website=PCGamesN|archive-url=https://archive.today/20180201173858/https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-chinese-launch-buildings|archive-date=February 1, 2018|access-date=January 1, 2018}}</ref> कुछ नक्शों में सौंदर्य प्रसाधनों में कुछ अन्य परिवर्तन किए गए थे, उदाहरण के लिए, कैशे और ट्रेन पर हैमर और सिकल को हटा दिया गया था। <ref name="PerfectWorld4">{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/csgo-released-in-china-perfect-world-17402|title=CS:GO officially released in China through Perfect World|last=Villanueva|first=Jamie|date=September 15, 2017|website=Dot Esports|language=en-US|archive-url=https://archive.today/20180201172752/https://dotesports.com/counter-strike/news/csgo-released-in-china-perfect-world-17402|archive-date=February 1, 2018|access-date=January 1, 2018}}</ref> रिलीज़ की तैयारी में, चीन के कई शहरों ने इसकी आगामी रिलीज़ का जश्न मनाया और इसका जमकर प्रचार किया। <ref name="PerfectWorld2" /> <ref name="PerfectWorld3" /> इसके लॉन्च महीने के दौरान गेम खेलने वाले यूजर्स को फ्री प्रमोशनल कॉस्मेटिक्स मिले। <ref name="PerfectWorld4" /> <ref>{{Cite web|url=https://www.mcvuk.com/esportspro/counter-strike-launches-in-china-as-valve-partners-up-with-perfect-world-f2|title=Counter-Strike launches in China as Valve partners up with Perfect World, F2P for verified|last=Tucker|first=Jake|date=September 15, 2017|website=MCVUK|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20180201172309/https://www.mcvuk.com/esportspro/counter-strike-launches-in-china-as-valve-partners-up-with-perfect-world-f2|archive-date=February 1, 2018|access-date=January 1, 2018}}</ref> चीनी कानून के अनुपालन में, वाल्व को अपनी लूट बॉक्स जुआ बाधाओं का भी खुलासा करना था। <ref>{{Cite news|url=https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-case-odds|title=Here are CS:GO's loot box odds|last=Scott-Jones|first=Richard|date=September 11, 2017|work=PCGamesN|access-date=January 1, 2018|archive-url=https://archive.today/20180201171556/https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-case-odds|archive-date=February 1, 2018}}</ref>
नवंबर 2017 में, प्रतिस्पर्धी मंगनी के लिए एक अद्यतन की घोषणा की गई थी। "ट्रस्ट फैक्टर" कहा जाता है, इसका मतलब है कि एक खिलाड़ी के "ट्रस्ट फैक्टर" की गणना इन-गेम और स्टीम-वाइड दोनों क्रियाओं के माध्यम से की जाएगी। जब उपयोगकर्ता का "ट्रस्ट फैक्टर" विकसित होता है, तो ग्लोबल ऑफेंसिव पर प्लेटाइम, धोखाधड़ी के लिए उपयोगकर्ता द्वारा रिपोर्ट किए जाने का समय, अन्य स्टीम गेम पर खेलने का समय, और वाल्व द्वारा छिपे अन्य व्यवहार जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाता है। यह मैचमेकिंग में समुदाय को एक साथ वापस लाने के प्रयास में किया गया था, क्योंकि प्राइम मैचमेकिंग ने प्राइम और गैर-प्राइम खिलाड़ियों को एक-दूसरे से अलग कर दिया था। वाल्व उपयोगकर्ताओं को उनके "ट्रस्ट फैक्टर" को देखने या किसी के "ट्रस्ट" को तय करने वाले सभी कारकों को प्रकट नहीं करने देगा। <ref>{{Cite magazine|accessdate=February 1, 2018}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.ign.com/articles/2017/11/15/new-counter-strike-matchmaking-system-analyses-your-behavior-in-other-steam-games|title=New Counter-Strike Matchmaking System Analyses Your Behavior in Other Steam Games|last=Barnett|first=Brian|date=November 15, 2017|website=IGN|access-date=November 18, 2017}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.kotaku.co.uk/2017/11/15/counter-strike-global-offensive-now-uses-overall-steam-user-data-when-matchmaking|title=Counter-Strike: Global Offensive Now Uses All Steam User Data When Matchmaking|last=Dale|first=Laura|date=November 15, 2017|website=Kotaku UK|archive-url=https://archive.today/20180201200418/http://www.kotaku.co.uk/2017/11/15/counter-strike-global-offensive-now-uses-overall-steam-user-data-when-matchmaking|archive-date=February 1, 2018|access-date=November 18, 2017}}</ref> अगस्त 2018 में, गेम का एक ऑफ़लाइन संस्करण जारी किया गया था जो खिलाड़ियों को बॉट्स के साथ ऑफ़लाइन खेलने की अनुमति देता है। <ref>{{Cite news|url=https://thenextweb.com/gaming/2018/08/31/counter-strike-global-offensive-now-has-a-free-version-you-can-play-offline/|title=Counter-Strike: Global Offensive now has a free version you can play offline|last=Ghoshal|first=Abhimanyu|date=August 31, 2018|work=The Next Web|access-date=August 31, 2018|language=en-US}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://www.forbes.com/sites/mikestubbs/2018/08/30/valve-announces-limited-free-to-play-version-of-csgo/#6ee94ee54cc1|title=Valve Announces Limited Free To Play Version Of 'CS:GO'|last=Stubbs|first=Mike|work=Forbes|access-date=August 31, 2018|language=en}}</ref>
6 दिसंबर, 2018 को जारी एक अपडेट ने गेम को खेलने के लिए पूरी तरह से मुक्त कर दिया । जिन उपयोगकर्ताओं ने इस अपडेट से पहले गेम खरीदा था, वे स्वचालित रूप से "प्राइम" स्थिति में अपडेट हो गए थे और ऐसे मोड दिए गए थे जो कॉस्मेटिक आइटम छोड़ सकते हैं। इसके अलावा, नए संस्करण ने "डेंजर ज़ोन" नामक एक बैटल रॉयल मोड पेश किया। <ref>{{Cite web|url=https://www.gamesindustry.biz/articles/2018-12-06-counter-strike-global-offensive-goes-free-to-play|title=Counter-Strike: Global Offensive goes free-to-play|last=Valentine|first=Rebekah|date=December 6, 2018|website=[[GamesIndustry.biz]]|access-date=December 6, 2018}}</ref>
नवंबर 2019 में, ऑपरेशन बिखर वेब जारी किया गया था। यह पिछले ऑपरेशन के समान ही संचालित होता है और नए चरित्र मॉडल और एक युद्ध पास प्रणाली पेश करता है। <ref>{{Cite web|url=https://blog.counter-strike.net/index.php/2019/11/26297/|title=Operation Shattered Web|date=November 18, 2019|website=blog.counter-strike.net|access-date=November 18, 2019}}</ref>
अप्रैल 2020 में, ''काउंटर-स्ट्राइक: ग्लोबल ऑफेंसिव'' और ''टीम फोर्ट 2'' के 2018 संस्करणों का [[मूल कोड|सोर्स कोड]] इंटरनेट पर लीक हो गया था। इससे यह डर पैदा हुआ कि दुर्भावनापूर्ण उपयोगकर्ता संभावित रिमोट कोड निष्पादन सॉफ़्टवेयर विकसित करने और गेम सर्वर या खिलाड़ियों के अपने कंप्यूटर पर हमला करने के लिए कोड का लाभ उठाएंगे। कई चल रही प्रशंसक परियोजनाओं ने इस खबर के मद्देनजर अस्थायी रूप से विकास को रोक दिया जब तक कि रिसाव के प्रभाव की बेहतर पुष्टि नहीं की जा सकती। <ref>{{Cite web|url=https://www.pcgamesn.com/team-fortress-2/source-code-leak-csgo|title=Team Fortress 2 and CS:GO source code leak raises security fears|last=Bailey|first=Dustin|date=April 22, 2020|website=[[PCGamesN]]|access-date=April 22, 2020}}</ref> वाल्व ने कोड लीक की वैधता की पुष्टि की, लेकिन कहा कि उन्हें विश्वास नहीं है कि यह सर्वर और क्लाइंट को प्रभावित करता है जो किसी भी गेम के नवीनतम आधिकारिक बिल्ड चला रहे हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.usgamer.net/articles/team-fortress-2-counter-strike-global-offensive-code-leaks-source-valve-response|title=Mathew|last=Olsen|date=April 22, 2020|website=[[USGamer]]|access-date=April 22, 2020|archive-date=29 अप्रैल 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200429224507/https://www.usgamer.net/articles/team-fortress-2-counter-strike-global-offensive-code-leaks-source-valve-response|url-status=dead}}</ref>
दिसंबर 2020 में, ऑपरेशन ब्रोकन फैंग को सिनेमाई ट्रेलर के साथ रिलीज़ किया गया था, आधिकारिक लॉन्च ट्रेलर के बाद से आठ साल में पहला आधिकारिक ''काउंटर-स्ट्राइक: ग्लोबल ऑफेंसिव'' सिनेमैटिक ट्रेलर।
मई 2021 में, "CS:GO 360 Stats" नामक एक सदस्यता सेवा US$0.99 प्रति माह के लिए जारी की गई थी। इसमें आधिकारिक प्रतिस्पर्धी, प्रीमियर और विंगमैन गेम मोड से विस्तृत मैच आँकड़े और ऑपरेशन ब्रोकन फेंग में पेश की गई राउंड विन चांस रिपोर्ट तक पहुंच शामिल है। <ref>{{Cite web|url=https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-360-stats|title=CS:GO gets paid stat tracking|website=PCGamesN|language=en-GB|access-date=September 20, 2021}}</ref> अपडेट को खिलाड़ियों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली, जिसमें कई ने फ्री थर्ड-पार्टी वेबसाइटों की ओर इशारा किया जो समान आँकड़े प्रदान करती थीं। <ref>{{Cite web|url=https://gamerant.com/cs-go-fans-upset-paid-stat-tracking-system/|title=CS: GO Fans Aren't Happy About New Paid Stat Tracking System|date=May 5, 2021|website=Game Rant|language=en-US|access-date=September 20, 2021}}</ref>
सितंबर 2021 में, ऑपरेशन रिप्टाइड जारी किया गया था, जिसमें गेमप्ले और मैचमेकिंग परिवर्तन, नए नक्शे और नए कॉस्मेटिक आइटम शामिल थे। <ref>{{Cite web|url=https://counter-strike.net/operationriptide|title=CS:GO - Operation Riptide|publisher=Valve|access-date=October 12, 2021}}</ref>
जनवरी 2022 में, जाइरोस्कोपिक गेम कंट्रोलर्स के लिए फ्लिक स्टिक सपोर्ट को जोड़ने वाला एक अपडेट जारी किया गया था। फ़्लिक स्टिक एक नियंत्रण योजना है जो खिलाड़ी को सही एनालॉग स्टिक का उपयोग करके अपने दृश्य को "फ़्लिक" करने देती है, जबकि सभी ठीक लक्ष्य को जाइरो आंदोलनों को सौंपते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://dotesports.com/counter-strike/news/valve-adds-flickstick-to-csgo|title=Valve adds Flick Stick to CS:GO|date=January 18, 2022|website=dotesports.com|language=en-US|access-date=February 24, 2022}}</ref>
=== जुआ, तृतीय-पक्ष सट्टेबाजी और मनी लॉन्ड्रिंग ===
अगस्त 2013 में ''आर्म्स डील'' अपडेट की शुरुआत के बाद, खाल ने अपनी दुर्लभता और अन्य उच्च-मूल्य वाले कारकों के कारण एक आभासी अर्थव्यवस्था का गठन किया, जिसने उनकी वांछनीयता को प्रभावित किया। इसके कारण, स्टीमवर्क्स [[एपीआई]] द्वारा सक्षम कई स्किन ट्रेडिंग साइटों का निर्माण किया गया। इनमें से कुछ साइटों ने जुए की कार्यक्षमता की पेशकश करना शुरू कर दिया, जिससे उपयोगकर्ता खाल के साथ पेशेवर मैचों के परिणाम पर दांव लगा सकते हैं। जून और जुलाई 2016 में, इन जुआ साइटों और वाल्व के खिलाफ दो औपचारिक मुकदमे दायर किए गए थे, जिसमें कहा गया था कि ये कुछ स्ट्रीमर्स द्वारा कम उम्र के जुए और अघोषित प्रचार को प्रोत्साहित करते हैं। वाल्व ने बदले में इन साइटों को जुआ उद्देश्यों के लिए स्टीमवर्क्स का उपयोग करने से रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया, और इनमें से कई साइटों का संचालन बंद हो गया। <ref name="polygon gambling overview"/> जुलाई 2018 में, वाल्व ने बेल्जियम और नीदरलैंड में कंटेनरों के उद्घाटन को अक्षम कर दिया, क्योंकि उनके लूट के बक्से डच और बेल्जियम के जुआ कानूनों का उल्लंघन करते हुए दिखाई दिए। <ref>{{Cite web|url=https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-lootbox-netherlands|title=Valve disables CS:GO loot boxes in Belgium and the Netherlands|last=Jones|first=Ali|date=July 13, 2018|website=PCGamesN|archive-url=https://web.archive.org/web/20180907103437/https://www.pcgamesn.com/counter-strike-global-offensive/csgo-lootbox-netherlands|archive-date=September 7, 2018|access-date=September 19, 2018}}</ref>
2019 में, वाल्व ने ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' के लूट बॉक्स यांत्रिकी में बदलाव किया, क्योंकि इस अहसास के कारण कि लूट बॉक्स की चाबियों पर "लगभग सभी" व्यापार आपराधिक संगठनों द्वारा [[धन-शोधन (मनी लॉन्डरिंग)|मनी लॉन्ड्रिंग]] की एक विधि के रूप में किया गया था। वाल्व ने एक बयान जारी करते हुए कहा, "अतीत में, हमने देखा कि अधिकांश प्रमुख व्यापार वैध ग्राहकों के बीच थे। हालाँकि, दुनिया भर में धोखाधड़ी नेटवर्क हाल ही में अपने लाभ को समाप्त करने के लिए CS:GO कुंजियों का उपयोग करने के लिए स्थानांतरित हो गए हैं। इस बिंदु पर, लगभग सभी प्रमुख खरीद जो बाजार में कारोबार या बेची जाती हैं, उन्हें धोखाधड़ी-सोर्स माना जाता है। नतीजतन, हमने फैसला किया है कि नई खरीदी गई चाबियां व्यापार योग्य या विपणन योग्य नहीं होंगी।" <ref>{{Cite web|url=http://www.theguardian.com/games/2019/oct/30/counter-strike-trading-found-to-be-nearly-all-money-laundering|title=Counter-Strike trading found to be 'nearly all' money laundering|date=October 30, 2019|website=the Guardian|language=en|access-date=December 28, 2021}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/technology-50262447|title=Valve shuts down money laundering via CS:GO game|date=November 1, 2019|work=BBC News|access-date=December 28, 2021|language=en-GB}}</ref>
== पेशेवर प्रतियोगिता ==
{{Infobox sports league|title=''Counter-Strike: Global Offensive'' Major Championships|current_season=|current_season2=|last_season=PGL Major Antwerp 2022|upcoming_season=TBA|logo=|pixels=<!-- use a format of ##px, such as 120px -->|caption=|sport=[[Esports]]|founded=2013|teams=16 teams (2013–2017)<br />24 teams (2018–present)|venue=Various|continents=International|folded=|champion=[[FaZe Clan|FaZe]] (1 title)|most_champs=[[Astralis]] (4 titles)|tv=[[Twitch (service)|Twitch]], [[Steam.tv]], [[YouTube]], GOTV|sponsor=[[Valve Corporation|Valve]]|website=<!-- Please do not add each leagues website -->|footnotes=}}
[[चित्र:MLG_Columbus_-_Luminosity_vs_Navi.jpg|कड़ी=//upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/d/d9/MLG_Columbus_-_Luminosity_vs_Navi.jpg/220px-MLG_Columbus_-_Luminosity_vs_Navi.jpg|बाएँ|अंगूठाकार| MLG Columbus 2016 मेजर में ल्यूमिनोसिटी गेमिंग नेटस विंसियर के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करता है]]
''ग्लोबल'' ऑफेंसिव में दुनिया के सबसे लोकप्रिय एस्पोर्ट दृश्यों में से एक है। <ref>{{Cite web|url=https://www.dexerto.com/gaming/what-are-the-top-10-most-watched-esports-in-2018-181265/|title=What are the top 10 most watched esports in 2018?|last=Porter|first=Matt|date=October 5, 2018|website=Dexerto|language=en|access-date=March 5, 2021}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.vpesports.com/csgo/news/dota-2-and-csgo-top-esports-games-in-audience-engagement-on-twitch|title=Dota 2 and CS:GO top esports games in audience engagement on Twitch|last=Esanu|first=Andreea|website=VPEsports|language=en|access-date=March 5, 2021|archive-date=29 अप्रैल 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230429214658/https://www.vpesports.com/csgo/news/dota-2-and-csgo-top-esports-games-in-audience-engagement-on-twitch|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.sbnation.com/2020/3/20/21188298/esports-league-of-legends-lol-counter-strike-rocket-league-overwatch|title=A beginner's guide to following esports|last=McCauley|first=Kim|date=March 20, 2020|website=SBNation.com|language=en|access-date=March 5, 2021}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.theverge.com/2020/4/27/21238268/league-of-legends-csgo-esports-leagues-twitch-viewership|title=Pro gaming leagues are seeing a huge spike in viewership|last=Webster|first=Andrew|date=April 27, 2020|website=The Verge|language=en|access-date=March 5, 2021}}</ref> ''वैश्विक आक्रामक'' पेशेवर दृश्य में तीसरे पक्ष के संगठनों द्वारा आयोजित लीग और टूर्नामेंट शामिल हैं, और वाल्व-प्रायोजित टूर्नामेंट जिन्हें मेजर चैंपियनशिप के रूप में जाना जाता है। मेजर को ''काउंटर-स्ट्राइक'' सर्किट में सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट माना जाता है और उनके पास सबसे बड़े पुरस्कार पूल हैं; मूल रूप से US$250,000 की घोषणा की गई, एमएलजी कोलंबस 2016 के बाद से मेजर के लिए पुरस्कार पूल US$1,000,000 तक बढ़ गए हैं। <ref name="prizepool">{{Cite magazine|accessdate=May 9, 2017}}</ref> एस्ट्रालिस अब तक की सबसे सफल ''वैश्विक आक्रामक'' टीम है, जिसमें उस टीम के मुख्य सदस्यों ने एक साथ चार मेजर जीते हैं।
2014 में, ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव कम्युनिटी में "पहला बड़ा [[मैच फिक्सिंग]] स्कैंडल" <ref name="ibp1">{{Cite news|url=http://www.esportsinsider.com/2016/08/phil-kornyshev-forget-the-tv-show-this-is-the-real-skins-drama/|title=Phil Kornychev – Forget the TV show, this is the real Skins drama|last=Cooke|first=Sam|date=August 18, 2016|work=Esports Insider|access-date=August 22, 2017}}</ref> हुआ, जहां टीम iBuyPower जानबूझकर NetCodeGuides.com के खिलाफ मैच हार गई। घोटाले में शामिल सात पेशेवर खिलाड़ियों को वाल्व द्वारा सभी मेजर से स्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था, हालांकि कुछ अन्य आयोजकों ने अंततः खिलाड़ियों को अपने टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी थी। <ref>{{Cite web|url=https://www.hltv.org/news/14083/ex-ibp-banned-from-valve-majors|title=ex-iBP banned from Valve majors|website=HLTV.org|language=en|access-date=September 29, 2021}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://dotesports.com/counter-strike/dazed-azk-swag-csgo-team-16118|title=Swag, DaZeD, and azk to join forces following ESL unban|last=Villanueva|first=Jamie|date=July 24, 2017|work=Dot Esports|access-date=August 22, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170821211533/https://dotesports.com/counter-strike/dazed-azk-swag-csgo-team-16118|archive-date=August 21, 2017}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://dotesports.com/counter-strike/esl-rescinds-ban-on-exibp-players-16099|title=ESL drops bans on ex-iBP and Epsilon players|last=Wynne|first=Jared|date=July 2017|work=Dot Esports|access-date=August 22, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170822013818/https://dotesports.com/counter-strike/esl-rescinds-ban-on-exibp-players-16099|archive-date=August 22, 2017}}</ref>
2020 में, काउंटर-स्ट्राइक कोचिंग बग घोटाला सामने आया, जहां टीम के कोचों ने नक्शे के उन हिस्सों को देखने के लिए [[सॉफ्टवेयर बग|बग]] के वेरिएंट का इस्तेमाल किया, जिनकी आम तौर पर उनकी पहुंच नहीं होती थी और दुश्मन टीम के बारे में जानकारी इकट्ठा करते थे। 5 मई, 2022 तक, एस्पोर्ट्स इंटीग्रिटी कमीशन ने घोषणा की कि लगभग 100 कोचों को मंजूरी दी जाएगी क्योंकि वे अंतिम जांच के पूरा होने के करीब थे।
एस्पोर्ट्स संगठन Cloud9 और Dignitas, ने फरवरी 2020 में ''काउंटर-स्ट्राइक'' के लिए एक फ्रैंचाइज़ी-आधारित लीग, फ्लैशपॉइंट लॉन्च करने की योजना की घोषणा की, जो वर्तमान पदोन्नति / निर्वासन लीग की स्थिति पर चिंताओं का मुकाबला करता है। लीग को ओवरवॉच लीग के समान एकल संगठन के बजाय टीमों के स्वामित्व में होना था। <ref>{{Cite web|url=https://www.gamesindustry.biz/articles/2020-02-05-team-owned-cs-go-esport-league-launched|title=Major esport organisations launch new team-owned CS:GO league|last=Taylor|first=Haydn|date=February 6, 2020|website=[[GamesIndustry.biz]]|access-date=February 6, 2020}}</ref>
=== मीडिया कवरेज ===
जैसे-जैसे खेल और दृश्य की लोकप्रियता बढ़ती गई, डब्ल्यूएमई/आईएमजी और टर्नर ब्रॉडकास्टिंग सहित कंपनियों ने ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव प्रोफेशनल गेम्स का प्रसारण शुरू किया, जिसमें पहला एलीग्यू मेजर 2017 था, जिसे फॉक्स थिएटर में आयोजित किया गया था और यूएस केबल टेलीविजन नेटवर्क टीबीएस पर प्रसारित किया गया था। 2016. <ref>{{Cite web|url=https://variety.com/2015/tv/news/turner-wme-img-esports-league-tbs-1201600921/|title=Turner, WME/IMG Form E-Sports League, With TBS to Air Live Events|last=Spangler|first=Todd|date=September 23, 2015|website=[[वैराइटी (पत्रिका)|वैराइटी]]|publisher=[[Penske Media Corporation]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622133854/http://variety.com/2015/tv/news/turner-wme-img-esports-league-tbs-1201600921/|archive-date=June 22, 2017|access-date=November 13, 2015}}</ref> 22 अगस्त, 2018 को, टर्नर ने ''ELEAGUE के Esports 101: CSGO'' और ''ELEAGUE CS: GO Premier 2018 की'' टीबीएस नेटवर्क पर दीक्षा-श्रृंखला के साथ ''वैश्विक आक्रामक'' की अपनी आगे की प्रोग्रामिंग की घोषणा की। <ref>{{Cite web|url=https://fansided.com/2018/08/22/eleague-announces-csgo-premier-tv-plans-esports-101-special/|title=ELEAGUE announces CSGO Premier TV plans, Esports 101 special|last=Frederick|first=Brittany|date=August 22, 2018|website=Fansided|archive-url=https://web.archive.org/web/20180823120841/https://fansided.com/2018/08/22/eleague-announces-csgo-premier-tv-plans-esports-101-special/|archive-date=August 23, 2018|access-date=September 19, 2018}}</ref>
== स्वागत समारोह ==
{{Video game reviews|MC=PC: 83/100<ref name="Metacritic PC">{{cite web |url=https://www.metacritic.com/game/pc/counter-strike-global-offensive |title=Counter-Strike: Global Offensive for PC Reviews |website=[[Metacritic]] |access-date=August 25, 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170410071057/http://www.metacritic.com/game/pc/counter-strike-global-offensive |archive-date=April 10, 2017 |url-status=live}}</ref><br />PS3: 80/100<ref name="Metacritic PC PS3">{{cite web |url=https://www.metacritic.com/game/playstation-3/counter-strike-global-offensive |title=Counter-Strike: Global Offensive for PlayStation 3 Reviews |website=[[Metacritic]] |access-date=September 16, 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170410070747/http://www.metacritic.com/game/playstation-3/counter-strike-global-offensive |archive-date=April 10, 2017 |url-status=live}}</ref><br />X360: 79/100<ref name="MC-X360">{{cite web |url=https://www.metacritic.com/game/xbox-360/counter-strike-global-offensive |title=Counter-Strike: Global Offensive for Xbox 360 Reviews |website=[[Metacritic]] |access-date=September 16, 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170410070744/http://www.metacritic.com/game/xbox-360/counter-strike-global-offensive |archive-date=April 10, 2017 |url-status=live}}</ref>|Destruct=PC: 9.5/10<ref name="Destructoid Review"/>|EuroG=PC: 9/10<ref name="EuroG">{{cite web|url=http://www.eurogamer.net/articles/2012-08-17-counter-strike-global-offensive-review|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|website=[[Eurogamer]]|first=Tom|last=Bramwell|date=August 22, 2012|access-date=August 25, 2012}}</ref>|GSpot=PC/PS3/X360: 8.5/10<ref name="AllGSpot">{{cite web|url=http://www.gamespot.com/counter-strike-global-offensive/reviews/|title=Counter-Strike: Global Offensive reviews (MAC, PS3, X360, PC, LNX)|website=[[GameSpot]]|date=August 31, 2012|access-date=May 19, 2015}}</ref>|GSpy=PC: {{rating|4|5}}<ref name="GameSpy Review"/>|IGN=PC: 8/10<ref name="IGN">{{cite web|url=http://www.ign.com/articles/2012/08/28/counter-strike-global-offensive-review|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|website=IGN|publisher=Ziff Davis|first=Mitch|last=Dyer|date=August 27, 2012|access-date=August 28, 2012}}</ref>|PCGUS=PC: 84%<ref name="PCGamer Review"/>}}
काउंटर-स्ट्राइक: रिव्यू एग्रीगेटर मेटाक्रिटिक के अनुसार, ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' को आलोचकों से आम तौर पर सकारात्मक स्वागत मिला। खेल के जारी होने के बाद से, ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' स्टीम पर सबसे ज्यादा खेले जाने वाले और सबसे ज्यादा कमाई करने वाले खेलों में से एक बना हुआ है। <ref>{{Cite web|url=http://www.gamesindustry.biz/articles/2015-10-15-how-counter-strike-global-offensive-is-still-dominating-steam|title=How Counter-Strike: Global Offensive is still dominating Steam|last=Walker|first=Patrick|date=October 16, 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20170818001137/http://www.gamesindustry.biz/articles/2015-10-15-how-counter-strike-global-offensive-is-still-dominating-steam|archive-date=August 18, 2017|access-date=August 18, 2017}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.pcgamer.com/valve-explains-how-csgo-became-the-second-most-played-game-on-steam|title=Valve explains how CS:GO became the second most-played game on Steam|last=Lahti|first=Evan|date=March 25, 2014|website=[[PC Gamer]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170818001136/http://www.pcgamer.com/valve-explains-how-csgo-became-the-second-most-played-game-on-steam/|archive-date=August 18, 2017|access-date=August 18, 2017}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.ign.com/articles/steam-reveals-the-top-selling-and-most-played-games-of-2020|title=Steam Reveals the Top-Selling and Most-Played Games of 2020 - IGN|last=Bankhurst|first=Adam|date=December 27, 2020|website=IGN|language=en|access-date=March 5, 2021}}</ref> गेम ने द गेम अवार्ड्स 2015 में प्रशंसक की पसंद "ईस्पोर्ट्स गेम ऑफ द ईयर" पुरस्कार जीता। <ref name="TGA winners 2015">{{Cite web|url=https://www.polygon.com/2015/12/3/9846760/the-game-awards-2015-winners|title=Here are the winners of The Game Awards 2015|last=Sarkar|first=Samit|date=December 3, 2015|website=[[Polygon (website)|Polygon]]|publisher=[[Vox Media]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170622120457/https://www.polygon.com/2015/12/3/9846760/the-game-awards-2015-winners|archive-date=June 22, 2017|access-date=June 22, 2017}}</ref>
समीक्षकों ने पिछले गेम, ''काउंटर-स्ट्राइक: सोर्स'' के लिए ''ग्लोबल'' ऑफेंसिव ' वफादारी की प्रशंसा की, एलिस्टेयर पिन्सोफ़ ऑफ़ ''डिस्ट्रक्टॉइड'' ने गेम को बहुत अधिक रेटिंग दी और कहा कि ''ग्लोबल'' ऑफ़ेंसिव गेम का "पॉलिश और बेहतर दिखने वाला" संस्करण है। <ref name="Destructoid Review"/> ''गेमस्पॉट'' लेखक एरिक नेघेर ने अपनी समीक्षा में कहा कि यह गेम अपने पूर्ववर्तियों के लिए बहुत अधिक सामग्री जोड़कर सही रहता है, लेकिन छोटी मात्रा में बदलाव करता है और अपनी सर्वोत्तम सुविधाओं को बरकरार रखता है। <ref name="GameSpotReview"/> ''गेमटीएम'' के समीक्षकों ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि खेल "एक चमकदार अनुस्मारक के रूप में खड़ा है कि गुणवत्ता वाले गेम डिज़ाइन को दीर्घायु और विविधता में पुरस्कृत किया जाता है।" <ref name="GamesTMReview">{{Cite web|url=https://www.gamestm.co.uk/reviews/counter-strike-global-offensive-review/|title=Counter-Strike: Global Offensive review|website=[[GamesTM]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170101123011/https://www.gamestm.co.uk/reviews/counter-strike-global-offensive-review/|archive-date=January 1, 2017|access-date=January 1, 2017}}</ref> उन्होंने वाल्व को बधाई देना भी जारी रखा कि उन्होंने न केवल लोकप्रिय खेल को अपडेट किया था, बल्कि "अपने समकालीनों को पूरी तरह से पछाड़ दिया था।" <ref name="GamesTMReview" /> ''VideoGamer.com'' के मार्टिन गैस्टन ने लिखा है कि हालांकि वह वास्तव में खेल का आनंद लेने के लिए बहुत बूढ़ा था, उनका मानना था कि यह "अब तक के सबसे अच्छे खेलों में से एक की अच्छी किस्त" थी और कुछ लोग अनुभव करेंगे कि "क्या निश्चित होगा" उनके गेमिंग जीवन के क्षण।" <ref name="VideoGamerReview"/> ''Engadget'' के लिए Xav de Matos ने लिखा है कि कीमत के लिए, " ''वैश्विक आक्रामक'' उस विरासत का एक बड़ा विस्तार है।" <ref name="engadgetreview"/> ''आईजीएन'' के मिच डायर ने कहा कि " ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' निश्चित रूप से एक काउंटर-स्ट्राइक सीक्वल है - यह पुराने मुद्दों को संतुलित करने और लंबे समय के खिलाड़ियों को आश्चर्यचकित करने में मदद करने के लिए यहां और वहां मामूली बदलाव के साथ परिचित दिखता है और महसूस करता है।"
समीक्षकों द्वारा गेम के शुरुआती रिलीज में कुछ विशेषताओं की आलोचना की गई थी। ''GameSpy'' ' माइक शार्की को यह विश्वास नहीं था कि जोड़ी गई नई सामग्री अच्छी थी या उसमें बहुत कुछ था, और कहा कि एलो रेटिंग प्रणाली विभिन्न कौशल स्तरों के कई खिलाड़ियों के साथ अप्रभावी लग रही थी, सभी रिलीज के शुरुआती दिनों में एक साथ खेल रहे थे। <ref name="GameSpy Review">{{Cite web|url=http://pc.gamespy.com/pc/counter-strike-global-offensive/1225855p1.html|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|last=Sharkey|first=Mike|date=August 23, 2012|publisher=[[GameSpy]]|access-date=August 25, 2012}}</ref> ''पीसी गेमर'' के इवान लाहटी ने उल्लेख किया कि ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' में अधिकांश नए आधिकारिक नक्शे केवल आर्म्स रेस या डिमोलिशन गेम मोड के लिए थे, जबकि क्लासिक मैप्स को केवल मामूली विवरणों के लिए "स्मार्ट समायोजन" दिया गया था। पिंसोफ ने सोचा कि इसकी रिलीज की स्थिति में, यह खेल का अंतिम संस्करण नहीं होगा। <ref name="Destructoid Review"/> पॉल गुडमैन ने कहा कि श्रृंखला के लंबे समय के प्रशंसकों के लिए, ''ग्लोबल ऑफेंसिव'' खेल की उम्र दिखाना शुरू कर देगा, यह व्यक्त करते हुए कि वह "मदद नहीं कर सकता लेकिन महसूस करता है कि मैं वहां गया था और एक दर्जन बार पहले किया था।" <ref>{{Cite web|url=http://www.escapistmagazine.com/articles/view/video-games/editorials/reviews/9906-Counter-Strike-Global-Offensive-Review|title=Counter-Strike: Global Offensive Review|last=Goodman|first=Paul|date=September 8, 2012|website=[[The Escapist (magazine)|The Escapist]]|publisher=[[Defy Media]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170412071903/http://www.escapistmagazine.com/articles/view/video-games/editorials/reviews/9906-Counter-Strike-Global-Offensive-Review|archive-date=April 12, 2017|access-date=April 12, 2017}}</ref>
हालांकि समीक्षकों ने गेम के कंसोल संस्करण को पसंद किया, उनका मानना था कि पीसी और कंसोल संस्करणों के बीच स्पष्ट अंतर थे। Neigher का मानना था कि थंबस्टिक्स और शोल्डर बटन के साथ खेलने के कारण "आपको निश्चित रूप से अंतिम CS:GO अनुभव नहीं मिलेगा।" <ref name="GameSpotReview"/> Gamer.nl के लिए रॉन ''वोरस्टर्मन्स'' ने कहा कि पीसी संस्करण एक उच्च प्रतिस्पर्धी स्तर पर खेलने के लिए है, हालांकि उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धा के लिए पीसी की श्रेष्ठता के कारण कंसोल संस्करण कम नहीं हैं। <ref>{{Cite web|url=https://gamer.nl/artikelen/review/counter-strike-go-consoleversie-welkome-aanvulling/|title=Counter-Strike: GO (consoleversie) – Welkome aanvulling|last=Vorstermans|first=Ron|date=September 6, 2012|website=Gamer.nl|language=nl|archive-url=https://web.archive.org/web/20170409080014/https://gamer.nl/artikelen/review/counter-strike-go-consoleversie-welkome-aanvulling/|archive-date=April 9, 2017|access-date=April 9, 2017}}</ref> डायर ने लिखा है कि सिस्टम में कीबोर्ड और माउस को जोड़ने की क्षमता के कारण PlayStation 3 संस्करण Xbox संस्करण के लिए एक लाभ में था। उन्होंने यह कहना जारी रखा कि दोनों कंसोल पर यूजर-इंटरफ़ेस पीसी जितना ही अच्छा था। ''डिजिटल स्पाई'' के मार्क लैंगशॉ ने कहा कि हालांकि गेम में प्लेस्टेशन मूव के लिए समर्थन है, लेकिन इसका उपयोग केवल "पहले से ही माफ करने वाले गेम को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है।" <ref>{{Cite web|url=http://www.digitalspy.com/gaming/review/a402002/counter-strike-global-offensive-review-psn-striking-the-right-chord/|title=Counter-Strike Global Offensive review (PSN): Striking the right chord|last=Langshaw|first=Mark|date=August 27, 2012|website=[[Digital Spy]]|publisher=[[Hearst Communications]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20170409080140/http://www.digitalspy.com/gaming/review/a402002/counter-strike-global-offensive-review-psn-striking-the-right-chord/|archive-date=April 9, 2017|access-date=April 9, 2017}}</ref>
खेल को ''IGN'' ' 2017 के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों में "सर्वश्रेष्ठ स्पेक्टेटर गेम" के लिए नामांकित किया गया था, <ref>{{Cite web|url=http://www.ign.com/wikis/best-of-2017-awards/Best_Spectator_Game|title=Best of 2017 Awards: Best Spectator Game|date=December 20, 2017|website=IGN|publisher=Ziff Davis|access-date=February 16, 2018}}</ref> 2017, 2018, और 2019 में "ईस्पोर्ट्स गेम ऑफ द ईयर" के लिए गोल्डन जॉयस्टिक अवार्ड्स, <ref>{{Cite web|url=https://www.bestinslot.co/golden-joystick-awards-2017-nominees/|title=Golden Joystick Awards 2017 Nominees|last=Gaito|first=Eri|date=November 13, 2017|website=Best in Slot|archive-url=https://web.archive.org/web/20180110003232/https://www.bestinslot.co/golden-joystick-awards-2017-nominees/|archive-date=January 10, 2018|access-date=February 16, 2018}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://www.telegraph.co.uk/gaming/news/golden-joysticks-2018-nominees-announced-voting-open-now/|title=Golden Joysticks 2018 nominees announced, voting open now|last=Hoggins|first=Tom|date=September 24, 2018|work=[[डेली टेलीग्राफ]]|access-date=October 7, 2018|archive-url=https://ghostarchive.org/archive/20220111/https://www.telegraph.co.uk/gaming/news/golden-joysticks-2018-nominees-announced-voting-open-now/|archive-date=January 11, 2022}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.gamesradar.com/golden-joystick-awards-2018-winners/|title=Golden Joystick Awards 2018 winners: God of War wins big but Fortnite gets Victory Royale|last=Sheridan|first=Connor|date=November 16, 2018|website=[[GamesRadar+]]|access-date=November 18, 2018}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.pushsquare.com/news/2019/09/days_gone_rides_off_with_three_nominations_in_this_years_golden_joystick_awards|title=Days Gone Rides Off with Three Nominations in This Year's Golden Joystick Awards|last=Tailby|first=Stephen|date=September 20, 2019|website=Push Square|access-date=September 21, 2019}}</ref> द गेम अवार्ड्स 2017, द गेम अवार्ड्स 2019 और द गेम अवार्ड्स 2020 में "सर्वश्रेष्ठ ईस्पोर्ट्स गेम" के लिए, <ref>{{Cite web|url=https://www.gamespot.com/articles/the-game-awards-2017-winners-headlined-by-zelda-br/1100-6455467/|title=The Game Awards 2017 Winners Headlined By Zelda: Breath Of The Wild's Game Of The Year|last=Makuch|first=Eddie|date=December 8, 2017|website=GameSpot|access-date=February 17, 2018}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.gamespot.com/articles/the-game-awards-2019-nominees-full-list/1100-6471564/|title=The Game Awards 2019 Nominees Full List|last=Winslow|first=Jeremy|date=November 19, 2019|website=GameSpot|access-date=November 20, 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.forbes.com/sites/paultassi/2020/12/11/heres-the-game-awards-2020-winner-list-with-a-near-total-last-of-us-sweep/|title=Here's The Game Awards 2020 Winners List With A Near-Total 'Last Of Us' Sweep|last=Tassi|first=Paul|date=December 11, 2020|website=[[Forbes]]}}</ref> और 17वीं वार्षिक नेशनल एकेडमी ऑफ वीडियो में "गेम, ईस्पोर्ट्स" के लिए खेल व्यापार समीक्षक पुरस्कार। <ref>{{Cite web|url=https://navgtr.org/2018/03/13/horizon-wins-7-mario-goty/|title=Winner List for 2017: Mario, Horizon|date=March 13, 2018|website=National Academy of Video Game Trade Reviewers|access-date=November 20, 2019}}</ref> 2018 में, गेम को "फैन फेवरेट ईस्पोर्ट्स गेम" और "फैन फेवरेट ईस्पोर्ट्स लीग फॉर्मेट" के लिए गेमर्स च्वाइस अवार्ड्स में मेजर्स के साथ, <ref>{{Cite web|url=http://file770.com/2018-gamers-choice-awards-nominees/|title=2018 Gamers' Choice Awards Nominees|last=Glyer|first=Mike|date=November 19, 2018|website=File 770|access-date=January 15, 2019}}</ref> और ऑस्ट्रेलियन गेम्स अवार्ड्स में "ईस्पोर्ट्स टाइटल ऑफ द ईयर" के लिए नामांकित किया गया था। <ref>{{Cite web|url=https://www.australiangamesawards.com/news/|title=Your 2018 Winners|date=December 19, 2018|website=Australian Games Awards|access-date=January 15, 2019|archive-date=12 जनवरी 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190112043428/https://www.australiangamesawards.com/news/|url-status=dead}}</ref>{{Clear}}
== संदर्भ ==
[[श्रेणी:प्लेस्टेशन 3 गेम्स]]
[[श्रेणी:मैक ओएस एक्स गेम्स]]
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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असम पुलिस
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wikitext
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{{Infobox law enforcement agency|agencyname=असम पुलिस|nativename=|nativenamea=|nativenamer=|commonname=असम पुलिस|abbreviation=एपी|fictional=|patch=|patchcaption=|logo=|logocaption=|badge=|badgecaption=|flag=|flagcaption=|imagesize=|motto=|mottotranslated=জনহিতজনসেৱাৰ্থে JONOHITJON XEWARTHE ( Always at your service)|mission=|formedyear=1826|formedmonthday=|preceding1=|employees=61,310|budget={{INRConvert|5833|c}} <small>(2019-20 est.)</small> <ref>{{cite web |url=https://prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20%281%29.pdf |title=Assam Budget Analysis 2019-20 |date=2019 |website=prsindia.org |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=28 अगस्त 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190828041255/http://www.prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20(1).pdf |url-status=dead }}</ref>|country=भारत|countryabbr=IN|divtype=राज्य|divname=[[असम]]|subdivtype=|subdivname=|subdivdab=|map=|mapcaption=असम पुलिस क्षेत्राधिकार क्षेत्र|sizearea=78438 km2|sizepopulation=31,205,576|legaljuris=असम राज्य|police=yes|local=yes|overviewbody=[[असम सरकार]]|headquarters=पुलिस महानिदेशक कार्यालय, उलुबरी, [[गुवाहाटी]] - 781007|hqlocmap=|hqlocmapwidth=|hqlocmapheight=|hqlocmapborder=|hqlocleft=|hqloctop=|hqlocmappoptitle=|sworntype=|sworn=|unsworntype=|unsworn=|minister1name=[[हिमंत बिस्वा शर्मा|डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा]], [[असम के मुख्यमंत्री|मुख्यमंत्री]]|chief1name=भास्कर ज्योति महंत, [[भारतीय पुलिस सेवा|आईपीएस]]|chief1position=[[पुलिस महानिदेशक]]|parentagency=गृह विभाग, असम सरकार|child1agency=|unittype=|unitname=|officetype=कानून प्रवर्तन|officename=असम पुलिस का मुख्यालय|stationtype=|stations=|lockuptype=|lockups=|vehicle1type=|vehicles1=|boat1type=|boats1=|aircraft1type=|aircraft1=|animal1type=|animals1=|anniversary1=|award1=|website=https://police.assam.gov.in/|reference=}}
<hiero>
https://vajiramandravi.com/upsc-exam/upsc-post-list/
</hiero>'''असम पुलिस''' भारत में [[असम]] राज्य के लिए [[कानून प्रर्वतन संस्था|कानून प्रवर्तन एजेंसी]] है। [[यान्डाबू की संधि|यंदाबू की संधि के]] बाद कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजों द्वारा असम में एक नियमित पुलिस बल शुरू किया गया था। <ref name="assampolice">{{Cite web|url=http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|title=History of Assam Police|date=2017-07-06|website=Assam Police|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=27 जून 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190627040941/http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|url-status=dead}}</ref> यह गृह मामलों के विभाग, असम के तहत कार्य करता है। असम पुलिस का मुख्यालय राज्य की राजधानी [[गुवाहाटी]] के उलुबारी में स्थित है।
असम पुलिस गृह मंत्रालय, [[असम सरकार|असम सरकार के]] सीधे नियंत्रण में आती है। असम पुलिस का नेतृत्व एक [[पुलिस महानिदेशक|पुलिस]] महानिदेशक (DGP) करता है। असम पुलिस के वर्तमान डीजीपी भास्कर ज्योति महंत, आईपीएस हैं
* असम पुलिस बलों को पुलिस रेंज में संगठित किया जाता है, जिसका नेतृत्व एक महानिरीक्षक उप महानिरीक्षक करते हैं, जो कई पुलिस जिलों को नियंत्रित करता है।
* पुलिस जिला राज्य पुलिस गतिविधि का आधार है और प्रत्येक जिले का नेतृत्व एक अधीक्षक करता है। कई राज्यों में एक अधीक्षक को एक या एक से अधिक अतिरिक्त अधीक्षक या उप अधीक्षक द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। आम तौर पर, एक पुलिस जिला एक राज्य के राजस्व जिले के समान होता है।
* उपखंड पुलिस अधिकारी के एक उप अधीक्षक की कमान के तहत पुलिस जिले को पुलिस उप-विभाजनों में विभाजित किया गया है।
* पुलिस सब-डिवीजन एक या एक से अधिक पुलिस सर्किलों से बना होता है, और एक इंस्पेक्टर के अधीन होता है, जिसे अक्सर सर्कल इंस्पेक्टर कहा जाता है।
* पुलिस हलकों के अंतर्गत पुलिस स्टेशन होते हैं, जो आमतौर पर एक सब-इंस्पेक्टर के नियंत्रण में होते हैं।
असम राज्य पुलिस बल अपने स्वयं के रिज़र्व सशस्त्र पुलिस बल (विशेष सशस्त्र पुलिस और सशस्त्र पुलिस) का भी रखरखाव करता है जो आपात स्थिति और भीड़ नियंत्रण के मुद्दों के लिए जिम्मेदार है। वे आमतौर पर डीआईजी रैंक और उच्च स्तर के अधिकारियों के आदेश पर ही सक्रिय होते हैं। सशस्त्र कांस्टेबुलरी आमतौर पर आम जनता के संपर्क में नहीं आते हैं जब तक कि उन्हें वीआईपी ड्यूटी, आतंकवाद विरोधी अभियान, दंगा नियंत्रण या मेलों, त्योहारों, एथलेटिक घटनाओं, चुनावों और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं सौंपा जाता है। उन्हें छात्र या श्रमिक अशांति, संगठित अपराध, गार्ड पदों को बनाए रखने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लेने के लिए भी भेजा जा सकता है। असाइनमेंट के प्रकार के आधार पर, सशस्त्र पुलिस बल [[बैटन (कानून प्रवर्तन)|लाठियां]] या घातक हथियार ले जा सकता है।
असम पुलिस के पास एक कुलीन कमांडो समूह भी है जिसे "ब्लैक पैंथर्स" के रूप में जाना जाता है जो आतंकवाद विरोधी अभियानों और वीवीआईपी सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियारों और तकनीक से लैस है।
== शाखाओं ==
# जांच ब्यूरो (आर्थिक अपराध)
# विशेष शाखा
# अपराधशील खोज विभाग
# असम पुलिस सीमा संगठन
# असम पुलिस रेडियो संगठन
# असम नदी पुलिस संगठन
# फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय। असम
# असम ग्राम रक्षा संगठन।
# आग और आपातकालीन सेवाएं, असम / राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल असम
# असम पुलिस हाईवे पेट्रोल यूनिट, (पेश की जाने वाली) <ref>{{Cite web|url=http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|title=Business News Today: Read Latest Business news, India Business News Live, Share Market & Economy News|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=22 अप्रैल 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160422000157/http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|url-status=dead}}</ref>
असम पुलिस पिछले दो दशक के दौरान ताकत से ताकतवर हो गई है। 1980 में इसकी संख्या 40,290 थी और 20वीं शताब्दी के अंत में इसकी संख्या 60,721 थी। <ref>[https://web.archive.org/web/20010305214411/http://www.assampolice.com/orgstruc.htm Assam Police - History]</ref>
== बटालियन और आरक्षित बल ==
=== '''बटालियन''' ===
असम पुलिस बटालियन के जवान काउंटर इंसर्जेंसी, दंगा नियंत्रण सहित चौबीसों घंटे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रखवाली करने के अलावा, कानून और व्यवस्था बनाए रखने में जिला पुलिस की मदद करने के कठिन कार्य में लगे हुए हैं। वे अन्य स्थिर सुरक्षा कर्तव्यों में भी लगे हुए हैं।
* पहला एपीबीएन मुख्यालय [[शिवसागर]] में।
* दूसरा एपीबीएन मुख्यालय [[तिनसुकिया|माकुम तिनिसुकिया]] में है।
* तीसरा एपीबीएन मुख्यालय [[जोरहाट]] में है।
* चौथा APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* एनसी हिल्स में 5वां एपीबीएन मुख्यालय।
* छठा एपीबीएन मुख्यालय कछार में।
* 7वां APBN मुख्यालय [[कोकराझार]] में है।
* 8वां एपीबीएन मुख्यालय [[अभयापुरी|अभयपुरी]] में है।
* 9वां एपीबीएन मुख्यालय [[नगाँव|नगांव]] में है।
* 10वां APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* 11वां एपीबीएन का मुख्यालय [[गोलाघाट|डेरगांव]] में है।
* 12वां एपीबीएन का मुख्यालय [[जामुगुरिहाट|जमुगुरीहाट]] <ref>{{Cite web|url=https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|title=Assam Police Battalion (APB) | Assam Police | Government Of Assam, India|date=|publisher=Police.assam.gov.in|access-date=2022-08-11|archive-date=29 सितंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220929200044/https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|url-status=dead}}</ref> [[शोणितपुर जिला|सोनितपुर]] में है।
* 13वां एपीबीएन मुख्यालय [[उत्तरी लखीमपुर]] में है।
* 14वां एपीबीएन मुख्यालय [[नलबाड़ी]] में है
=== '''आईआरबीएन''' ===
सीपीएमएफ की स्थापना केवल राज्य की नियमित और बढ़ती मांग को पूरा कर सकती है। राज्य सरकारों की ताकत बढ़ाने का फैसला किया गया। इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की सहायता से असम में IR बटालियनों की स्थापना की गई। केंद्र सरकार हालांकि राज्य के बाहर तैनाती के लिए आवश्यक होने पर इन बटालियनों को बुलाने का पहला अधिकार सुरक्षित रखती है। बटालियन के कर्मी परिचालन के साथ-साथ कानून और व्यवस्था दोनों कर्तव्यों में लगे हुए हैं।
* 15वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[करीमगंज]] में है
* 16वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[मरिगाँव|मोरीगांव]] में है
* 19वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[डिब्रूगढ़]] में है
* 20वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय धुबरी में है
* 21वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय हैलाकांडी में है
* 22वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[धेमाजी]] में है
* 23वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय कार्बी आंगलोंग में है
* 24वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय बक्सा में है
=== '''टास्क फोर्स''' ===
सांप्रदायिक और सामूहिक हिंसा की घटनाओं से निपटने के लिए असम पुलिस टास्क फोर्स की एपीटीएफ बटालियन को विशेष शांति सेना के रूप में गठित किया गया था। इस बल के कर्मियों को संवेदनशील क्षेत्रों और अल्पसंख्यक इलाकों में तैनात किया गया था, ताकि सांप्रदायिक वैमनस्य के किसी भी संकेत का तुरंत मुकाबला किया जा सके और एक बड़ी सांप्रदायिक हिंसा को भड़कने से रोका जा सके। इस फोर्स ने इमरजेंसी टास्क फोर्स के तौर पर प्रभावी तरीके से काम किया है।
* पहला एपीटीएफ मुख्यालय [[गोवालपारा|गोलपाड़ा]] में है
* दूसरा APTF मुख्यालय नागांव में
* तीसरा एपीटीएफ का मुख्यालय [[दरंग जिला|डारंग]] में है
* चौथा एपीटीएफ का मुख्यालय बारपेटा में है
=== '''कमांडो बटालियन''' <ref>{{Cite web |url=https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |title=Assam Police Commando Battalion |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=5 जनवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230105191142/https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |url-status=dead }}</ref> ===
ब्लैक पैंथर्स:- ब्लैक पैंथर उग्रवाद विरोधी अभियानों से निपटने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित कमांडो बटालियन है। इस बटालियन का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
वीरांगना:- वीरांगना कठिन परिस्थितियों विशेषकर महिला सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए एक विशेष महिला कमांडो बटालियन है। इस बल का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
एसपीयू:- "स्पेशल प्रोटेक्शन यूनिट" असम पुलिस में एक आधुनिक और अद्वितीय कमांडो बल है। यह मूल रूप से शहरी पुलिसिंग या वीआईपी सुरक्षा मामलों से संबंधित मुद्दों से संबंधित है।
=== '''ओएनजीसी बटालियन''' ===
== पदक और पुरस्कार ==
असम पुलिस के अधिकारियों को उनकी उत्कृष्ट और मेधावी सेवा के लिए कई पुरस्कार और पदक मिले। 1986 से उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में असम पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।
वीरता के लिए 2011 के राष्ट्रपति पुलिस पदक के लिए प्राप्तकर्ताओं की सूची:
कांस्टेबल निर्मल चंद्र डेका। (मरणोपरांत)
गणतंत्र दिवस 2017 पर वीरता के लिए पुलिस पदक।
* प्रणब कुमार गोगोई सर्किल इंस्पेक्टर।
* उत्पल बोरा। सहायक निरीक्षक
* अनुराग अग्रवाल. सपा
* प्रकाश सोनोवाल। एसडीपीओ
* इमदाद अली. एसडीपीओ
* महानंदा गौरिया। सिपाही
* घनकांत मालाकार। सिपाही
* हेमकांता बोरो। सिपाही
* रत्नेश्वर कलिता। सिपाही
* बापन राय
== उपकरण और वाहन ==
असम पुलिस के लिए सभी उपकरण [[भारतीय आयुध निर्माणियाँ|भारतीय आयुध कारखानों]], रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्वदेशी रूप से निर्मित किए जाते हैं।
* [[ली-एन्फील्ड|ली-एनफील्ड]] .303 (चरणबद्ध रूप से बाहर)
* 1 ए एसएलआर राइफल
* 1बी1 [[इंसास राइफल|इंसास]] राइफल। (वर्तमान मानक अंक)
* [[स्टर्लिंग सबमशीन गन]] ।
* [[एकेएम]] (विशेष अभियान के लिए) भारतीय।
* [[एके47|एके -47]] बल्गेरियाई।
* [[हेकलर एंड कोच MP5]]
* [[ब्रेन लाइट मशीन गन]] ।
* [[पीके मशीन गन]] (सीमित मात्रा)।
* [[पिस्टल ऑटो 9mm 1A]] (अधिकारियों के लिए मानक सेवा हथियार)
* [[ग्लॉक 17]] (केवल विशेष सुरक्षा)
* रिवाल्वर। (अधिकारी का सेवा हथियार। चरणबद्ध किया जा रहा है)
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चित्र:Browning High-Power 9mm IMG 1526.jpg|Standard Officer's Service Gun
चित्र:Glock17.jpg|Glock 17 Standard Officer's Service Gun
चित्र:Hkmp5count-terr-wiki.jpg|
चित्र:Bren1.jpg|
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=== वाहनों ===
* [[टोयोटा इनोवा]]
* [[महिंद्रा स्कॉर्पियो]]
* [[टाटा सफारी]] (वीआईपी सुरक्षा और काफिले)
* एचएम एंबेसडर (चरणबद्ध रूप से बाहर किया जा रहा है)
=== '''सामान्य ड्यूटी उद्देश्य के लिए प्रयुक्त वाहन।''' ===
* [[महिंद्रा बोलेरो]]
* [[मारुति सुजुकी जिप्सी|मारुति जिप्सी]] ।
* [[टाटा सूमो]] ।
* [[टाटा 407]] ट्रक।
* सैनिकों के परिवहन के लिए बसें।
* बजाज पल्सर बाइक्स। (गश्त)
* [[रोयाल एनफील्ड|रॉयल एनफील्ड]]
* मारुति ओमनी। (केवल गुवाहाटी शहर के यातायात के लिए)
* महिंद्रा कमांडर जीप। (धीरे धीरे हटाया गया)
* टाटा स्पेसियो।
* [[महिंद्रा लीजेंड]]
* महिंद्रा आक्रमणकारी
* [[महिन्द्रा थार|महिंद्रा थार]]
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वज्र
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वरुण
* [[शेवरले टवेरा]] ट्रैफिक इंटरसेप्टर वाहन
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चित्र:MahindraScorpio Cropped.jpg|वृश्चिक
चित्र:2009 tata safari vx 4x4.JPG|सफारी
चित्र:Toyota Innova Crysta 2.4 Z front right.jpg|इनोवा
चित्र:Omni Lpg.jpg|इनोवा
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== विवादों ==
पुलिस की बर्बरता, हिरासत में मौत, मानवाधिकारों के उल्लंघन, फर्जी मुठभेड़, जबरन वसूली, आम जनता को परेशान करने के लिए फर्जी मामले भरना, असम पुलिस के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप और अदालती मामले दर्ज हैं। भ्रष्ट राजनेताओं के कारण पुलिस ने हमेशा ठीक से काम नहीं कर पाने की शिकायत की है। विभिन्न संगठनों और उनके खुले जबरन वसूली के बारे में जनता को पता है और पुलिस पर भी उन पर उचित हिस्सेदारी का आरोप लगाया गया है। वर्तमान में असम पुलिस की एक और मुख्य उपलब्धि यह है कि वे जनता के बजाय चोरों, अपहरणकर्ताओं और हत्यारों के दोस्त हैं और कहा जाता है कि उन अपराध के पैसे में पुलिस की बेहतर हिस्सेदारी है। संगठन का भ्रष्टाचार चरम पर है, लोग किसी अपराध के खिलाफ पुलिस के पास जाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें प्राथमिकी दर्ज करने या कार्यवाही करने के लिए पैसे देने की आवश्यकता होती है।
=== 2021 असम पुलिस फर्जी मुठभेड़ ===
मई 2021 से कई फर्जी पुलिस एनकाउंटर हुए। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-police-on-encounter-spree-nhrc-told/article35261868.ece|title=Assam police on 'encounter spree', NHRC told|date=2021-07-11|work=The Hindu|access-date=2021-12-13|others=Special Correspondent|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref> कथित फर्जी मुठभेड़ों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया गया है। <ref>{{Cite web|url=https://www.thequint.com/news/india/assam-police-encounter-spree-delhi-based-lawyer-approaches-nhrc-arif-jwadder|title='Assam Police on Encounter Spree': Delhi-Based Lawyer Approaches NHRC|last=Quint|first=The|date=2021-07-12|website=TheQuint|language=en|access-date=2021-12-13}}</ref> 21 दिसंबर को गौहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष [[Arif Jwadder|आरिफ जवादर]] द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें फर्जी मुठभेड़ हत्याओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। <ref>{{Cite web|url=https://scroll.in/latest/1013408/lawyer-moves-gauhati-high-court-seeking-independent-probe-into-deaths-in-assams-alleged-encounters|title=Lawyer moves Gauhati High Court seeking independent probe into deaths in Assam's alleged encounters|last=Scroll Staff|website=Scroll.in|language=en-US|access-date=2021-12-22}}</ref> अब तक 51 मौतें और 139 घायल हुए हैं। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/gauhati-high-court-asks-assam-govt-to-file-updated-probe-report-on-every-encounter-case/article65697806.ece|title=Gauhati High Court asks Assam to file updated probe report encounter cases since May 2021|last=Bureau|first=The Hindu|date=2022-07-29|work=The Hindu|access-date=2022-07-31|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref>
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:पुलिस]]
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6543579
6543571
2026-04-24T10:35:38Z
~2026-25125-92
921667
6543579
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox law enforcement agency|agencyname=असम पुलिस|nativename=|nativenamea=|nativenamer=|commonname=असम पुलिस|abbreviation=एपी|fictional=|patch=|patchcaption=|logo=|logocaption=|badge=|badgecaption=|flag=|flagcaption=|imagesize=|motto=|mottotranslated=জনহিতজনসেৱাৰ্থে JONOHITJON XEWARTHE ( Always at your service)|mission=|formedyear=1826|formedmonthday=|preceding1=|employees=61,310|budget={{INRConvert|5833|c}} <small>(2019-20 est.)</small> <ref>{{cite web |url=https://prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20%281%29.pdf |title=Assam Budget Analysis 2019-20 |date=2019 |website=prsindia.org |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=28 अगस्त 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190828041255/http://www.prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20(1).pdf |url-status=dead }}</ref>|country=भारत|countryabbr=IN|divtype=राज्य|divname=[[असम]]|subdivtype=|subdivname=|subdivdab=|map=|mapcaption=असम पुलिस क्षेत्राधिकार क्षेत्र|sizearea=78438 km2|sizepopulation=31,205,576|legaljuris=असम राज्य|police=yes|local=yes|overviewbody=[[असम सरकार]]|headquarters=पुलिस महानिदेशक कार्यालय, उलुबरी, [[गुवाहाटी]] - 781007|hqlocmap=|hqlocmapwidth=|hqlocmapheight=|hqlocmapborder=|hqlocleft=|hqloctop=|hqlocmappoptitle=|sworntype=|sworn=|unsworntype=|unsworn=|minister1name=[[हिमंत बिस्वा शर्मा|डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा]], [[असम के मुख्यमंत्री|मुख्यमंत्री]]|chief1name=भास्कर ज्योति महंत, [[भारतीय पुलिस सेवा|आईपीएस]]|chief1position=[[पुलिस महानिदेशक]]|parentagency=गृह विभाग, असम सरकार|child1agency=|unittype=|unitname=|officetype=कानून प्रवर्तन|officename=असम पुलिस का मुख्यालय|stationtype=|stations=|lockuptype=|lockups=|vehicle1type=|vehicles1=|boat1type=|boats1=|aircraft1type=|aircraft1=|animal1type=|animals1=|anniversary1=|award1=|website=https://police.assam.gov.in/|reference=}}
<hiero>
https://vajiramandravi.com/upsc-exam/upsc-post-list/
</hiero>'''असम पुलिस''' भारत में [[असम]] राज्य के लिए [[कानून प्रर्वतन संस्था|कानून प्रवर्तन एजेंसी]] है। [[यान्डाबू की संधि|यंदाबू की संधि के]] बाद कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजों द्वारा असम में एक नियमित पुलिस बल शुरू किया गया था। <ref name="assampolice">{{Cite web|url=http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|title=History of Assam Police|date=2017-07-06|website=Assam Police|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=27 जून 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190627040941/http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|url-status=dead}}</ref> यह गृह मामलों के विभाग, असम के तहत कार्य करता है। असम पुलिस का मुख्यालय राज्य की राजधानी [[गुवाहाटी]] के उलुबारी में स्थित है।
असम पुलिस गृह मंत्रालय, [[असम सरकार|असम सरकार के]] सीधे नियंत्रण में आती है। असम पुलिस का नेतृत्व एक [[पुलिस महानिदेशक|पुलिस]] महानिदेशक (DGP) करता है। असम पुलिस के वर्तमान डीजीपी भास्कर ज्योति महंत, आईपीएस हैं
* असम पुलिस बलों को पुलिस रेंज में संगठित किया जाता है, जिसका नेतृत्व एक महानिरीक्षक उप महानिरीक्षक करते हैं, जो कई पुलिस जिलों को नियंत्रित करता है।
* पुलिस जिला राज्य पुलिस गतिविधि का आधार है और प्रत्येक जिले का नेतृत्व एक अधीक्षक करता है। कई राज्यों में एक अधीक्षक को एक या एक से अधिक अतिरिक्त अधीक्षक या उप अधीक्षक द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। आम तौर पर, एक पुलिस जिला एक राज्य के राजस्व जिले के समान होता है।
* उपखंड पुलिस अधिकारी के एक उप अधीक्षक की कमान के तहत पुलिस जिले को पुलिस उप-विभाजनों में विभाजित किया गया है।
* पुलिस सब-डिवीजन एक या एक से अधिक पुलिस सर्किलों से बना होता है, और एक इंस्पेक्टर के अधीन होता है, जिसे अक्सर सर्कल इंस्पेक्टर कहा जाता है।
* पुलिस हलकों के अंतर्गत पुलिस स्टेशन होते हैं, जो आमतौर पर एक सब-इंस्पेक्टर के नियंत्रण में होते हैं।
असम राज्य पुलिस बल अपने स्वयं के रिज़र्व सशस्त्र पुलिस बल (विशेष सशस्त्र पुलिस और सशस्त्र पुलिस) का भी रखरखाव करता है जो आपात स्थिति और भीड़ नियंत्रण के मुद्दों के लिए जिम्मेदार है। वे आमतौर पर डीआईजी रैंक और उच्च स्तर के अधिकारियों के आदेश पर ही सक्रिय होते हैं। सशस्त्र कांस्टेबुलरी आमतौर पर आम जनता के संपर्क में नहीं आते हैं जब तक कि उन्हें वीआईपी ड्यूटी, आतंकवाद विरोधी अभियान, दंगा नियंत्रण या मेलों, त्योहारों, एथलेटिक घटनाओं, चुनावों और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं सौंपा जाता है। उन्हें छात्र या श्रमिक अशांति, संगठित अपराध, गार्ड पदों को बनाए रखने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लेने के लिए भी भेजा जा सकता है। असाइनमेंट के प्रकार के आधार पर, सशस्त्र पुलिस बल [[बैटन (कानून प्रवर्तन)|लाठियां]] या घातक हथियार ले जा सकता है।
असम पुलिस के पास एक कुलीन कमांडो समूह भी है जिसे "ब्लैक पैंथर्स" के रूप में जाना जाता है जो आतंकवाद विरोधी अभियानों और वीवीआईपी सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियारों और तकनीक से लैस है।
== [[@YouTubemah]] ==
# जांच ब्यूरो (आर्थिक अपराध)
# विशेष शाखा
# अपराधशील खोज विभाग
# असम पुलिस सीमा संगठन
# असम पुलिस रेडियो संगठन
# असम नदी पुलिस संगठन
# फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय। असम
# असम ग्राम रक्षा संगठन।
# आग और आपातकालीन सेवाएं, असम / राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल असम
# असम पुलिस हाईवे पेट्रोल यूनिट, (पेश की जाने वाली) <ref>{{Cite web|url=http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|title=Business News Today: Read Latest Business news, India Business News Live, Share Market & Economy News|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=22 अप्रैल 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160422000157/http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|url-status=dead}}</ref>
असम पुलिस पिछले दो दशक के दौरान ताकत से ताकतवर हो गई है। 1980 में इसकी संख्या 40,290 थी और 20वीं शताब्दी के अंत में इसकी संख्या 60,721 थी। <ref>[https://web.archive.org/web/20010305214411/http://www.assampolice.com/orgstruc.htm Assam Police - History]</ref>
== बटालियन और आरक्षित बल ==
=== '''बटालियन''' ===
असम पुलिस बटालियन के जवान काउंटर इंसर्जेंसी, दंगा नियंत्रण सहित चौबीसों घंटे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रखवाली करने के अलावा, कानून और व्यवस्था बनाए रखने में जिला पुलिस की मदद करने के कठिन कार्य में लगे हुए हैं। वे अन्य स्थिर सुरक्षा कर्तव्यों में भी लगे हुए हैं।
* पहला एपीबीएन मुख्यालय [[शिवसागर]] में।
* दूसरा एपीबीएन मुख्यालय [[तिनसुकिया|माकुम तिनिसुकिया]] में है।
* तीसरा एपीबीएन मुख्यालय [[जोरहाट]] में है।
* चौथा APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* एनसी हिल्स में 5वां एपीबीएन मुख्यालय।
* छठा एपीबीएन मुख्यालय कछार में।
* 7वां APBN मुख्यालय [[कोकराझार]] में है।
* 8वां एपीबीएन मुख्यालय [[अभयापुरी|अभयपुरी]] में है।
* 9वां एपीबीएन मुख्यालय [[नगाँव|नगांव]] में है।
* 10वां APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* 11वां एपीबीएन का मुख्यालय [[गोलाघाट|डेरगांव]] में है।
* 12वां एपीबीएन का मुख्यालय [[जामुगुरिहाट|जमुगुरीहाट]] <ref>{{Cite web|url=https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|title=Assam Police Battalion (APB) | Assam Police | Government Of Assam, India|date=|publisher=Police.assam.gov.in|access-date=2022-08-11|archive-date=29 सितंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220929200044/https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|url-status=dead}}</ref> [[शोणितपुर जिला|सोनितपुर]] में है।
* 13वां एपीबीएन मुख्यालय [[उत्तरी लखीमपुर]] में है।
* 14वां एपीबीएन मुख्यालय [[नलबाड़ी]] में है
=== '''आईआरबीएन''' ===
सीपीएमएफ की स्थापना केवल राज्य की नियमित और बढ़ती मांग को पूरा कर सकती है। राज्य सरकारों की ताकत बढ़ाने का फैसला किया गया। इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की सहायता से असम में IR बटालियनों की स्थापना की गई। केंद्र सरकार हालांकि राज्य के बाहर तैनाती के लिए आवश्यक होने पर इन बटालियनों को बुलाने का पहला अधिकार सुरक्षित रखती है। बटालियन के कर्मी परिचालन के साथ-साथ कानून और व्यवस्था दोनों कर्तव्यों में लगे हुए हैं।
* 15वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[करीमगंज]] में है
* 16वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[मरिगाँव|मोरीगांव]] में है
* 19वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[डिब्रूगढ़]] में है
* 20वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय धुबरी में है
* 21वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय हैलाकांडी में है
* 22वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[धेमाजी]] में है
* 23वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय कार्बी आंगलोंग में है
* 24वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय बक्सा में है
=== '''टास्क फोर्स''' ===
सांप्रदायिक और सामूहिक हिंसा की घटनाओं से निपटने के लिए असम पुलिस टास्क फोर्स की एपीटीएफ बटालियन को विशेष शांति सेना के रूप में गठित किया गया था। इस बल के कर्मियों को संवेदनशील क्षेत्रों और अल्पसंख्यक इलाकों में तैनात किया गया था, ताकि सांप्रदायिक वैमनस्य के किसी भी संकेत का तुरंत मुकाबला किया जा सके और एक बड़ी सांप्रदायिक हिंसा को भड़कने से रोका जा सके। इस फोर्स ने इमरजेंसी टास्क फोर्स के तौर पर प्रभावी तरीके से काम किया है।
* पहला एपीटीएफ मुख्यालय [[गोवालपारा|गोलपाड़ा]] में है
* दूसरा APTF मुख्यालय नागांव में
* तीसरा एपीटीएफ का मुख्यालय [[दरंग जिला|डारंग]] में है
* चौथा एपीटीएफ का मुख्यालय बारपेटा में है
=== '''कमांडो बटालियन''' <ref>{{Cite web |url=https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |title=Assam Police Commando Battalion |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=5 जनवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230105191142/https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |url-status=dead }}</ref> ===
ब्लैक पैंथर्स:- ब्लैक पैंथर उग्रवाद विरोधी अभियानों से निपटने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित कमांडो बटालियन है। इस बटालियन का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
वीरांगना:- वीरांगना कठिन परिस्थितियों विशेषकर महिला सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए एक विशेष महिला कमांडो बटालियन है। इस बल का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
एसपीयू:- "स्पेशल प्रोटेक्शन यूनिट" असम पुलिस में एक आधुनिक और अद्वितीय कमांडो बल है। यह मूल रूप से शहरी पुलिसिंग या वीआईपी सुरक्षा मामलों से संबंधित मुद्दों से संबंधित है।
=== '''ओएनजीसी बटालियन''' ===
== पदक और पुरस्कार ==
असम पुलिस के अधिकारियों को उनकी उत्कृष्ट और मेधावी सेवा के लिए कई पुरस्कार और पदक मिले। 1986 से उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में असम पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।
वीरता के लिए 2011 के राष्ट्रपति पुलिस पदक के लिए प्राप्तकर्ताओं की सूची:
कांस्टेबल निर्मल चंद्र डेका। (मरणोपरांत)
गणतंत्र दिवस 2017 पर वीरता के लिए पुलिस पदक।
* प्रणब कुमार गोगोई सर्किल इंस्पेक्टर।
* उत्पल बोरा। सहायक निरीक्षक
* अनुराग अग्रवाल. सपा
* प्रकाश सोनोवाल। एसडीपीओ
* इमदाद अली. एसडीपीओ
* महानंदा गौरिया। सिपाही
* घनकांत मालाकार। सिपाही
* हेमकांता बोरो। सिपाही
* रत्नेश्वर कलिता। सिपाही
* बापन राय
== उपकरण और वाहन ==
असम पुलिस के लिए सभी उपकरण [[भारतीय आयुध निर्माणियाँ|भारतीय आयुध कारखानों]], रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्वदेशी रूप से निर्मित किए जाते हैं।
* [[ली-एन्फील्ड|ली-एनफील्ड]] .303 (चरणबद्ध रूप से बाहर)
* 1 ए एसएलआर राइफल
* 1बी1 [[इंसास राइफल|इंसास]] राइफल। (वर्तमान मानक अंक)
* [[स्टर्लिंग सबमशीन गन]] ।
* [[एकेएम]] (विशेष अभियान के लिए) भारतीय।
* [[एके47|एके -47]] बल्गेरियाई।
* [[हेकलर एंड कोच MP5]]
* [[ब्रेन लाइट मशीन गन]] ।
* [[पीके मशीन गन]] (सीमित मात्रा)।
* [[पिस्टल ऑटो 9mm 1A]] (अधिकारियों के लिए मानक सेवा हथियार)
* [[ग्लॉक 17]] (केवल विशेष सुरक्षा)
* रिवाल्वर। (अधिकारी का सेवा हथियार। चरणबद्ध किया जा रहा है)
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चित्र:Browning High-Power 9mm IMG 1526.jpg|Standard Officer's Service Gun
चित्र:Glock17.jpg|Glock 17 Standard Officer's Service Gun
चित्र:Hkmp5count-terr-wiki.jpg|
चित्र:Bren1.jpg|
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=== वाहनों ===
* [[टोयोटा इनोवा]]
* [[महिंद्रा स्कॉर्पियो]]
* [[टाटा सफारी]] (वीआईपी सुरक्षा और काफिले)
* एचएम एंबेसडर (चरणबद्ध रूप से बाहर किया जा रहा है)
=== '''सामान्य ड्यूटी उद्देश्य के लिए प्रयुक्त वाहन।''' ===
* [[महिंद्रा बोलेरो]]
* [[मारुति सुजुकी जिप्सी|मारुति जिप्सी]] ।
* [[टाटा सूमो]] ।
* [[टाटा 407]] ट्रक।
* सैनिकों के परिवहन के लिए बसें।
* बजाज पल्सर बाइक्स। (गश्त)
* [[रोयाल एनफील्ड|रॉयल एनफील्ड]]
* मारुति ओमनी। (केवल गुवाहाटी शहर के यातायात के लिए)
* महिंद्रा कमांडर जीप। (धीरे धीरे हटाया गया)
* टाटा स्पेसियो।
* [[महिंद्रा लीजेंड]]
* महिंद्रा आक्रमणकारी
* [[महिन्द्रा थार|महिंद्रा थार]]
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वज्र
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वरुण
* [[शेवरले टवेरा]] ट्रैफिक इंटरसेप्टर वाहन
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चित्र:MahindraScorpio Cropped.jpg|वृश्चिक
चित्र:2009 tata safari vx 4x4.JPG|सफारी
चित्र:Toyota Innova Crysta 2.4 Z front right.jpg|इनोवा
चित्र:Omni Lpg.jpg|इनोवा
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== विवादों ==
पुलिस की बर्बरता, हिरासत में मौत, मानवाधिकारों के उल्लंघन, फर्जी मुठभेड़, जबरन वसूली, आम जनता को परेशान करने के लिए फर्जी मामले भरना, असम पुलिस के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप और अदालती मामले दर्ज हैं। भ्रष्ट राजनेताओं के कारण पुलिस ने हमेशा ठीक से काम नहीं कर पाने की शिकायत की है। विभिन्न संगठनों और उनके खुले जबरन वसूली के बारे में जनता को पता है और पुलिस पर भी उन पर उचित हिस्सेदारी का आरोप लगाया गया है। वर्तमान में असम पुलिस की एक और मुख्य उपलब्धि यह है कि वे जनता के बजाय चोरों, अपहरणकर्ताओं और हत्यारों के दोस्त हैं और कहा जाता है कि उन अपराध के पैसे में पुलिस की बेहतर हिस्सेदारी है। संगठन का भ्रष्टाचार चरम पर है, लोग किसी अपराध के खिलाफ पुलिस के पास जाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें प्राथमिकी दर्ज करने या कार्यवाही करने के लिए पैसे देने की आवश्यकता होती है।
=== 2021 असम पुलिस फर्जी मुठभेड़ ===
मई 2021 से कई फर्जी पुलिस एनकाउंटर हुए। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-police-on-encounter-spree-nhrc-told/article35261868.ece|title=Assam police on 'encounter spree', NHRC told|date=2021-07-11|work=The Hindu|access-date=2021-12-13|others=Special Correspondent|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref> कथित फर्जी मुठभेड़ों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया गया है। <ref>{{Cite web|url=https://www.thequint.com/news/india/assam-police-encounter-spree-delhi-based-lawyer-approaches-nhrc-arif-jwadder|title='Assam Police on Encounter Spree': Delhi-Based Lawyer Approaches NHRC|last=Quint|first=The|date=2021-07-12|website=TheQuint|language=en|access-date=2021-12-13}}</ref> 21 दिसंबर को गौहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष [[Arif Jwadder|आरिफ जवादर]] द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें फर्जी मुठभेड़ हत्याओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। <ref>{{Cite web|url=https://scroll.in/latest/1013408/lawyer-moves-gauhati-high-court-seeking-independent-probe-into-deaths-in-assams-alleged-encounters|title=Lawyer moves Gauhati High Court seeking independent probe into deaths in Assam's alleged encounters|last=Scroll Staff|website=Scroll.in|language=en-US|access-date=2021-12-22}}</ref> अब तक 51 मौतें और 139 घायल हुए हैं। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/gauhati-high-court-asks-assam-govt-to-file-updated-probe-report-on-every-encounter-case/article65697806.ece|title=Gauhati High Court asks Assam to file updated probe report encounter cases since May 2021|last=Bureau|first=The Hindu|date=2022-07-29|work=The Hindu|access-date=2022-07-31|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref>
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:पुलिस]]
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text/x-wiki
{{Infobox law enforcement agency|agencyname=असम पुलिस|nativename=|nativenamea=|nativenamer=|commonname=असम पुलिस|abbreviation=एपी|fictional=|patch=|patchcaption=|logo=|logocaption=|badge=|badgecaption=|flag=|flagcaption=|imagesize=|motto=|mottotranslated=জনহিতজনসেৱাৰ্থে JONOHITJON XEWARTHE ( Always at your service)|mission=|formedyear=1826|formedmonthday=|preceding1=|employees=61,310|budget={{INRConvert|5833|c}} <small>(2019-20 est.)</small> <ref>{{cite web |url=https://prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20%281%29.pdf |title=Assam Budget Analysis 2019-20 |date=2019 |website=prsindia.org |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=28 अगस्त 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190828041255/http://www.prsindia.org/sites/default/files/budget_files/State%20Budget%20Analysis%20-%20Assam%202019-20%20(1).pdf |url-status=dead }}</ref>|country=भारत|countryabbr=IN|divtype=राज्य|divname=[[असम]]|subdivtype=|subdivname=|subdivdab=|map=|mapcaption=असम पुलिस क्षेत्राधिकार क्षेत्र|sizearea=78438 km2|sizepopulation=31,205,576|legaljuris=असम राज्य|police=yes|local=yes|overviewbody=[[असम सरकार]]|headquarters=पुलिस महानिदेशक कार्यालय, उलुबरी, [[गुवाहाटी]] - 781007|hqlocmap=|hqlocmapwidth=|hqlocmapheight=|hqlocmapborder=|hqlocleft=|hqloctop=|hqlocmappoptitle=|sworntype=|sworn=|unsworntype=|unsworn=|minister1name=[[हिमंत बिस्वा शर्मा|डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा]], [[असम के मुख्यमंत्री|मुख्यमंत्री]]|chief1name=भास्कर ज्योति महंत, [[भारतीय पुलिस सेवा|आईपीएस]]|chief1position=[[पुलिस महानिदेशक]]|parentagency=गृह विभाग, असम सरकार|child1agency=|unittype=|unitname=|officetype=कानून प्रवर्तन|officename=असम पुलिस का मुख्यालय|stationtype=|stations=|lockuptype=|lockups=|vehicle1type=|vehicles1=|boat1type=|boats1=|aircraft1type=|aircraft1=|animal1type=|animals1=|anniversary1=|award1=|website=https://police.assam.gov.in/|reference=}}'''असम पुलिस''' भारत में [[असम]] राज्य के लिए [[कानून प्रर्वतन संस्था|कानून प्रवर्तन एजेंसी]] है। [[यान्डाबू की संधि|यंदाबू की संधि के]] बाद कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजों द्वारा असम में एक नियमित पुलिस बल शुरू किया गया था। <ref name="assampolice">{{Cite web|url=http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|title=History of Assam Police|date=2017-07-06|website=Assam Police|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=27 जून 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190627040941/http://assampolice.gov.in/history-of-Assam-Police.php|url-status=dead}}</ref> यह गृह मामलों के विभाग, असम के तहत कार्य करता है। असम पुलिस का मुख्यालय राज्य की राजधानी [[गुवाहाटी]] के उलुबारी में स्थित है।
असम पुलिस गृह मंत्रालय, [[असम सरकार|असम सरकार के]] सीधे नियंत्रण में आती है। असम पुलिस का नेतृत्व एक [[पुलिस महानिदेशक|पुलिस]] महानिदेशक (DGP) करता है। असम पुलिस के वर्तमान डीजीपी भास्कर ज्योति महंत, आईपीएस हैं
* असम पुलिस बलों को पुलिस रेंज में संगठित किया जाता है, जिसका नेतृत्व एक महानिरीक्षक उप महानिरीक्षक करते हैं, जो कई पुलिस जिलों को नियंत्रित करता है।
* पुलिस जिला राज्य पुलिस गतिविधि का आधार है और प्रत्येक जिले का नेतृत्व एक अधीक्षक करता है। कई राज्यों में एक अधीक्षक को एक या एक से अधिक अतिरिक्त अधीक्षक या उप अधीक्षक द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। आम तौर पर, एक पुलिस जिला एक राज्य के राजस्व जिले के समान होता है।
* उपखंड पुलिस अधिकारी के एक उप अधीक्षक की कमान के तहत पुलिस जिले को पुलिस उप-विभाजनों में विभाजित किया गया है।
* पुलिस सब-डिवीजन एक या एक से अधिक पुलिस सर्किलों से बना होता है, और एक इंस्पेक्टर के अधीन होता है, जिसे अक्सर सर्कल इंस्पेक्टर कहा जाता है।
* पुलिस हलकों के अंतर्गत पुलिस स्टेशन होते हैं, जो आमतौर पर एक सब-इंस्पेक्टर के नियंत्रण में होते हैं।
असम राज्य पुलिस बल अपने स्वयं के रिज़र्व सशस्त्र पुलिस बल (विशेष सशस्त्र पुलिस और सशस्त्र पुलिस) का भी रखरखाव करता है जो आपात स्थिति और भीड़ नियंत्रण के मुद्दों के लिए जिम्मेदार है। वे आमतौर पर डीआईजी रैंक और उच्च स्तर के अधिकारियों के आदेश पर ही सक्रिय होते हैं। सशस्त्र कांस्टेबुलरी आमतौर पर आम जनता के संपर्क में नहीं आते हैं जब तक कि उन्हें वीआईपी ड्यूटी, आतंकवाद विरोधी अभियान, दंगा नियंत्रण या मेलों, त्योहारों, एथलेटिक घटनाओं, चुनावों और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं सौंपा जाता है। उन्हें छात्र या श्रमिक अशांति, संगठित अपराध, गार्ड पदों को बनाए रखने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लेने के लिए भी भेजा जा सकता है। असाइनमेंट के प्रकार के आधार पर, सशस्त्र पुलिस बल [[बैटन (कानून प्रवर्तन)|लाठियां]] या घातक हथियार ले जा सकता है।
असम पुलिस के पास एक कुलीन कमांडो समूह भी है जिसे "ब्लैक पैंथर्स" के रूप में जाना जाता है जो आतंकवाद विरोधी अभियानों और वीवीआईपी सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियारों और तकनीक से लैस है।
== शाखाओं ==
# जांच ब्यूरो (आर्थिक अपराध)
# विशेष शाखा
# अपराधशील खोज विभाग
# असम पुलिस सीमा संगठन
# असम पुलिस रेडियो संगठन
# असम नदी पुलिस संगठन
# फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय। असम
# असम ग्राम रक्षा संगठन।
# आग और आपातकालीन सेवाएं, असम / राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल असम
# असम पुलिस हाईवे पेट्रोल यूनिट, (पेश की जाने वाली) <ref>{{Cite web|url=http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|title=Business News Today: Read Latest Business news, India Business News Live, Share Market & Economy News|access-date=5 जनवरी 2023|archive-date=22 अप्रैल 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160422000157/http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-07-10/news/51300906_1_assam-police-cases-verification|url-status=dead}}</ref>
असम पुलिस पिछले दो दशक के दौरान ताकत से ताकतवर हो गई है। 1980 में इसकी संख्या 40,290 थी और 20वीं शताब्दी के अंत में इसकी संख्या 60,721 थी। <ref>[https://web.archive.org/web/20010305214411/http://www.assampolice.com/orgstruc.htm Assam Police - History]</ref>
== बटालियन और आरक्षित बल ==
=== '''बटालियन''' ===
असम पुलिस बटालियन के जवान काउंटर इंसर्जेंसी, दंगा नियंत्रण सहित चौबीसों घंटे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रखवाली करने के अलावा, कानून और व्यवस्था बनाए रखने में जिला पुलिस की मदद करने के कठिन कार्य में लगे हुए हैं। वे अन्य स्थिर सुरक्षा कर्तव्यों में भी लगे हुए हैं।
* पहला एपीबीएन मुख्यालय [[शिवसागर]] में।
* दूसरा एपीबीएन मुख्यालय [[तिनसुकिया|माकुम तिनिसुकिया]] में है।
* तीसरा एपीबीएन मुख्यालय [[जोरहाट]] में है।
* चौथा APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* एनसी हिल्स में 5वां एपीबीएन मुख्यालय।
* छठा एपीबीएन मुख्यालय कछार में।
* 7वां APBN मुख्यालय [[कोकराझार]] में है।
* 8वां एपीबीएन मुख्यालय [[अभयापुरी|अभयपुरी]] में है।
* 9वां एपीबीएन मुख्यालय [[नगाँव|नगांव]] में है।
* 10वां APBN मुख्यालय [[गुवाहाटी]] में है।
* 11वां एपीबीएन का मुख्यालय [[गोलाघाट|डेरगांव]] में है।
* 12वां एपीबीएन का मुख्यालय [[जामुगुरिहाट|जमुगुरीहाट]] <ref>{{Cite web|url=https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|title=Assam Police Battalion (APB) | Assam Police | Government Of Assam, India|date=|publisher=Police.assam.gov.in|access-date=2022-08-11|archive-date=29 सितंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220929200044/https://police.assam.gov.in/portlet-sub-innerpage/assam-police-battalion-apb|url-status=dead}}</ref> [[शोणितपुर जिला|सोनितपुर]] में है।
* 13वां एपीबीएन मुख्यालय [[उत्तरी लखीमपुर]] में है।
* 14वां एपीबीएन मुख्यालय [[नलबाड़ी]] में है
=== '''आईआरबीएन''' ===
सीपीएमएफ की स्थापना केवल राज्य की नियमित और बढ़ती मांग को पूरा कर सकती है। राज्य सरकारों की ताकत बढ़ाने का फैसला किया गया। इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की सहायता से असम में IR बटालियनों की स्थापना की गई। केंद्र सरकार हालांकि राज्य के बाहर तैनाती के लिए आवश्यक होने पर इन बटालियनों को बुलाने का पहला अधिकार सुरक्षित रखती है। बटालियन के कर्मी परिचालन के साथ-साथ कानून और व्यवस्था दोनों कर्तव्यों में लगे हुए हैं।
* 15वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[करीमगंज]] में है
* 16वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[मरिगाँव|मोरीगांव]] में है
* 19वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[डिब्रूगढ़]] में है
* 20वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय धुबरी में है
* 21वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय हैलाकांडी में है
* 22वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय [[धेमाजी]] में है
* 23वां एपी आईआरबीएन का मुख्यालय कार्बी आंगलोंग में है
* 24वें एपी आईआरबीएन का मुख्यालय बक्सा में है
=== '''टास्क फोर्स''' ===
सांप्रदायिक और सामूहिक हिंसा की घटनाओं से निपटने के लिए असम पुलिस टास्क फोर्स की एपीटीएफ बटालियन को विशेष शांति सेना के रूप में गठित किया गया था। इस बल के कर्मियों को संवेदनशील क्षेत्रों और अल्पसंख्यक इलाकों में तैनात किया गया था, ताकि सांप्रदायिक वैमनस्य के किसी भी संकेत का तुरंत मुकाबला किया जा सके और एक बड़ी सांप्रदायिक हिंसा को भड़कने से रोका जा सके। इस फोर्स ने इमरजेंसी टास्क फोर्स के तौर पर प्रभावी तरीके से काम किया है।
* पहला एपीटीएफ मुख्यालय [[गोवालपारा|गोलपाड़ा]] में है
* दूसरा APTF मुख्यालय नागांव में
* तीसरा एपीटीएफ का मुख्यालय [[दरंग जिला|डारंग]] में है
* चौथा एपीटीएफ का मुख्यालय बारपेटा में है
=== '''कमांडो बटालियन''' <ref>{{Cite web |url=https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |title=Assam Police Commando Battalion |access-date=5 जनवरी 2023 |archive-date=5 जनवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230105191142/https://www.kcgmckarnal.org/assam-police-commando-battalion-recruitment/ |url-status=dead }}</ref> ===
ब्लैक पैंथर्स:- ब्लैक पैंथर उग्रवाद विरोधी अभियानों से निपटने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित कमांडो बटालियन है। इस बटालियन का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
वीरांगना:- वीरांगना कठिन परिस्थितियों विशेषकर महिला सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए एक विशेष महिला कमांडो बटालियन है। इस बल का मुख्यालय उत्तरी गुवाहाटी के मांडकाटा में है।
एसपीयू:- "स्पेशल प्रोटेक्शन यूनिट" असम पुलिस में एक आधुनिक और अद्वितीय कमांडो बल है। यह मूल रूप से शहरी पुलिसिंग या वीआईपी सुरक्षा मामलों से संबंधित मुद्दों से संबंधित है।
=== '''ओएनजीसी बटालियन''' ===
== पदक और पुरस्कार ==
असम पुलिस के अधिकारियों को उनकी उत्कृष्ट और मेधावी सेवा के लिए कई पुरस्कार और पदक मिले। 1986 से उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में असम पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।
वीरता के लिए 2011 के राष्ट्रपति पुलिस पदक के लिए प्राप्तकर्ताओं की सूची:
कांस्टेबल निर्मल चंद्र डेका। (मरणोपरांत)
गणतंत्र दिवस 2017 पर वीरता के लिए पुलिस पदक।
* प्रणब कुमार गोगोई सर्किल इंस्पेक्टर।
* उत्पल बोरा। सहायक निरीक्षक
* अनुराग अग्रवाल. सपा
* प्रकाश सोनोवाल। एसडीपीओ
* इमदाद अली. एसडीपीओ
* महानंदा गौरिया। सिपाही
* घनकांत मालाकार। सिपाही
* हेमकांता बोरो। सिपाही
* रत्नेश्वर कलिता। सिपाही
* बापन राय
== उपकरण और वाहन ==
असम पुलिस के लिए सभी उपकरण [[भारतीय आयुध निर्माणियाँ|भारतीय आयुध कारखानों]], रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्वदेशी रूप से निर्मित किए जाते हैं।
* [[ली-एन्फील्ड|ली-एनफील्ड]] .303 (चरणबद्ध रूप से बाहर)
* 1 ए एसएलआर राइफल
* 1बी1 [[इंसास राइफल|इंसास]] राइफल। (वर्तमान मानक अंक)
* [[स्टर्लिंग सबमशीन गन]] ।
* [[एकेएम]] (विशेष अभियान के लिए) भारतीय।
* [[एके47|एके -47]] बल्गेरियाई।
* [[हेकलर एंड कोच MP5]]
* [[ब्रेन लाइट मशीन गन]] ।
* [[पीके मशीन गन]] (सीमित मात्रा)।
* [[पिस्टल ऑटो 9mm 1A]] (अधिकारियों के लिए मानक सेवा हथियार)
* [[ग्लॉक 17]] (केवल विशेष सुरक्षा)
* रिवाल्वर। (अधिकारी का सेवा हथियार। चरणबद्ध किया जा रहा है)
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चित्र:Browning High-Power 9mm IMG 1526.jpg|Standard Officer's Service Gun
चित्र:Glock17.jpg|Glock 17 Standard Officer's Service Gun
चित्र:Hkmp5count-terr-wiki.jpg|
चित्र:Bren1.jpg|
</gallery>
=== वाहनों ===
* [[टोयोटा इनोवा]]
* [[महिंद्रा स्कॉर्पियो]]
* [[टाटा सफारी]] (वीआईपी सुरक्षा और काफिले)
* एचएम एंबेसडर (चरणबद्ध रूप से बाहर किया जा रहा है)
=== '''सामान्य ड्यूटी उद्देश्य के लिए प्रयुक्त वाहन।''' ===
* [[महिंद्रा बोलेरो]]
* [[मारुति सुजुकी जिप्सी|मारुति जिप्सी]] ।
* [[टाटा सूमो]] ।
* [[टाटा 407]] ट्रक।
* सैनिकों के परिवहन के लिए बसें।
* बजाज पल्सर बाइक्स। (गश्त)
* [[रोयाल एनफील्ड|रॉयल एनफील्ड]]
* मारुति ओमनी। (केवल गुवाहाटी शहर के यातायात के लिए)
* महिंद्रा कमांडर जीप। (धीरे धीरे हटाया गया)
* टाटा स्पेसियो।
* [[महिंद्रा लीजेंड]]
* महिंद्रा आक्रमणकारी
* [[महिन्द्रा थार|महिंद्रा थार]]
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वज्र
* दंगा नियंत्रण के लिए [[वीआरडीई]] द्वारा वरुण
* [[शेवरले टवेरा]] ट्रैफिक इंटरसेप्टर वाहन
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चित्र:MahindraScorpio Cropped.jpg|वृश्चिक
चित्र:2009 tata safari vx 4x4.JPG|सफारी
चित्र:Toyota Innova Crysta 2.4 Z front right.jpg|इनोवा
चित्र:Omni Lpg.jpg|इनोवा
</gallery>
== विवादों ==
पुलिस की बर्बरता, हिरासत में मौत, मानवाधिकारों के उल्लंघन, फर्जी मुठभेड़, जबरन वसूली, आम जनता को परेशान करने के लिए फर्जी मामले भरना, असम पुलिस के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप और अदालती मामले दर्ज हैं। भ्रष्ट राजनेताओं के कारण पुलिस ने हमेशा ठीक से काम नहीं कर पाने की शिकायत की है। विभिन्न संगठनों और उनके खुले जबरन वसूली के बारे में जनता को पता है और पुलिस पर भी उन पर उचित हिस्सेदारी का आरोप लगाया गया है। वर्तमान में असम पुलिस की एक और मुख्य उपलब्धि यह है कि वे जनता के बजाय चोरों, अपहरणकर्ताओं और हत्यारों के दोस्त हैं और कहा जाता है कि उन अपराध के पैसे में पुलिस की बेहतर हिस्सेदारी है। संगठन का भ्रष्टाचार चरम पर है, लोग किसी अपराध के खिलाफ पुलिस के पास जाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें प्राथमिकी दर्ज करने या कार्यवाही करने के लिए पैसे देने की आवश्यकता होती है।
=== 2021 असम पुलिस फर्जी मुठभेड़ ===
मई 2021 से कई फर्जी पुलिस एनकाउंटर हुए। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-police-on-encounter-spree-nhrc-told/article35261868.ece|title=Assam police on 'encounter spree', NHRC told|date=2021-07-11|work=The Hindu|access-date=2021-12-13|others=Special Correspondent|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref> कथित फर्जी मुठभेड़ों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया गया है। <ref>{{Cite web|url=https://www.thequint.com/news/india/assam-police-encounter-spree-delhi-based-lawyer-approaches-nhrc-arif-jwadder|title='Assam Police on Encounter Spree': Delhi-Based Lawyer Approaches NHRC|last=Quint|first=The|date=2021-07-12|website=TheQuint|language=en|access-date=2021-12-13}}</ref> 21 दिसंबर को गौहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष [[Arif Jwadder|आरिफ जवादर]] द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें फर्जी मुठभेड़ हत्याओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। <ref>{{Cite web|url=https://scroll.in/latest/1013408/lawyer-moves-gauhati-high-court-seeking-independent-probe-into-deaths-in-assams-alleged-encounters|title=Lawyer moves Gauhati High Court seeking independent probe into deaths in Assam's alleged encounters|last=Scroll Staff|website=Scroll.in|language=en-US|access-date=2021-12-22}}</ref> अब तक 51 मौतें और 139 घायल हुए हैं। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/national/other-states/gauhati-high-court-asks-assam-govt-to-file-updated-probe-report-on-every-encounter-case/article65697806.ece|title=Gauhati High Court asks Assam to file updated probe report encounter cases since May 2021|last=Bureau|first=The Hindu|date=2022-07-29|work=The Hindu|access-date=2022-07-31|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref>
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:पुलिस]]
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बन्नेरघट्टा जैव उद्यान
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चाहर धर्मेंद्र
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox zoo
|zoo_name = बन्नेरघट्टा जैव उद्यान<br><small>Bannerghatta Biological Park</small><br><small>ಬನ್ನೇರುಘಟ್ಟ ಜೈವಿಕ ಉದ್ಯಾನವನ</small>
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|annual_visitors = 16,16,130 <small>(वित्त वर्ष 2019/20)</small><ref name = "WRS Yearbook 2018/2019">{{cite web |title = Visitor Numbers 2019/2020 |url = https://bannerghattabiologicalpark.org/information.html |website = Bannerghatta Biological Park |access-date = 7 मार्च 2023 |archive-date = 20 अगस्त 2022 |archive-url = https://web.archive.org/web/20220820071224/https://bannerghattabiologicalpark.org/information.html |url-status = dead }}</ref>
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}}
'''बन्नेरघट्टा जैव उद्यान''' (Bannerghatta Biological Park) [[भारत]] के [[कर्नाटक]] राज्य में [[बंगलोर]] के समीप स्थित एक [[प्राकृतिक उद्यान]]और चिड़ियाघर है। यह पहले [[बन्नेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग हुआ करता था, और 2002 में इस जैव उद्यान को 731.88 [[हेक्टर (क्षेत्रफल)|हेक्टर]] क्षेत्रफल पृथक कर बनाया गया। यहाँ अब एक चिड़ियाघर, सफारी उद्यान, तितली उद्यान और संकट, चोट या अन्य व्यथा से प्रभावित प्राणियों के लिए आश्रय-केन्द्र है। यहाँ पर्यटकों के लिए [[पिकनिक]] मनाने के स्थान भी है।<ref>[http://www.karnataka.com/bangalore/bannerghatta-national-park/ "Bannerghatta National Park"] Karnataka.com Accessed 23 May 2014.</ref><ref>[http://bannerghattabiologicalpark.org "Bannerghatta Biological Park"] Park website Accessed 23 May 2014.</ref>
== चित्रदीर्घा ==
<gallery class="center" mode="nolines" caption="बन्नेरघट्टा जैव उद्यान" widths="200" heights="150">
File:Lions 02.JPG|बन्नेरघट्टा जैव उद्यान में बाघ और सिंह
File:The Bannerghatta White Tiger.jpg|बन्नेरघट्टा जैव उद्यान में श्वेत बाघ
File:Bannerghetta Tiger.jpg|बन्नेरघट्टा में बाघ
File:Bannerghata zoo.jpg|बन्नेरघट्टा में श्वेत बाघ
File:White tiger bangalore.jpg|बन्नेरघट्टा में श्वेत बाघ
File:Bengal Tiger in Bangalore.jpg|बन्नेरघट्टा में बंगाल बाघ
File:Elephant Bannerghatta.jpg|बन्नेरघट्टा में हाथी
File:Crocodile Bannerghatta.jpg|घड़ियाल
File:Indian Crocodile in the Lake of Bannerghatta National Park.jpg|बन्नेरघट्टा में भारतीय मगरमच्छ
File:VB 017 Butterfly Park Bangalore.jpg|बन्नेरघट्टा में तितली क्षेत्र
File:Pelican Bannerghatta.jpg|बन्नेरघट्टा में पक्षी
File:Butterlfy Park.jpg|तितली क्षेत्र का प्रवेश
File:BannerghattaBlackSpider.jpg|बन्नेरघट्टा में एक दुर्लभ मकड़ी
File:Bannerghata National Park Tiger Safari.JPG|टाइगर सफारी
File:Bannerghata National Park Safari Entry.JPG|सफारी प्रवेश
File:Tiger - Bannerghatta National Park.jpg|बाघ
File:Hippopotamus at Bannerghatta Park, Bangalore.JPG|बन्नेरघट्टा में दरियाई घोड़ा
File:Saffari at Bannerghatta National Park Bangalore 8418.JPG|सफारी
File:Snap from Bannerghatta National Park Bangalore 8550.JPG|बन्नेरघट्टा उद्यान
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== इन्हें भी देखें ==
* [[बंगलोर]]
* [[बन्नेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:भारत में चिड़ियाघर]]
[[श्रेणी:बंगलौर]]
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चाहर धर्मेंद्र
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{{Infobox zoo
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'''बन्नेरघट्टा जैव उद्यान''' (Bannerghatta Biological Park) [[भारत]] के [[कर्नाटक]] राज्य में [[बंगलोर]] के समीप स्थित एक [[प्राकृतिक उद्यान]] और [[चिड़ियाघर]] है। यह पहले [[बन्नेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग हुआ करता था, और 2002 में इस जैव उद्यान को 731.88 [[हेक्टर (क्षेत्रफल)|हेक्टर]] क्षेत्रफल पृथक कर बनाया गया। यहाँ अब एक चिड़ियाघर, सफारी उद्यान, तितली उद्यान और संकट, चोट या अन्य व्यथा से प्रभावित प्राणियों के लिए आश्रय-केन्द्र है। यहाँ पर्यटकों के लिए [[पिकनिक]] मनाने के स्थान भी है।<ref>[http://www.karnataka.com/bangalore/bannerghatta-national-park/ "Bannerghatta National Park"] Karnataka.com Accessed 23 May 2014.</ref><ref>[http://bannerghattabiologicalpark.org "Bannerghatta Biological Park"] Park website Accessed 23 May 2014.</ref>
== चित्रदीर्घा ==
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File:Lions 02.JPG|बन्नेरघट्टा जैव उद्यान में बाघ और सिंह
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File:Pelican Bannerghatta.jpg|बन्नेरघट्टा में पक्षी
File:Butterlfy Park.jpg|तितली क्षेत्र का प्रवेश
File:BannerghattaBlackSpider.jpg|बन्नेरघट्टा में एक दुर्लभ मकड़ी
File:Bannerghata National Park Tiger Safari.JPG|टाइगर सफारी
File:Bannerghata National Park Safari Entry.JPG|सफारी प्रवेश
File:Tiger - Bannerghatta National Park.jpg|बाघ
File:Hippopotamus at Bannerghatta Park, Bangalore.JPG|बन्नेरघट्टा में दरियाई घोड़ा
File:Saffari at Bannerghatta National Park Bangalore 8418.JPG|सफारी
File:Snap from Bannerghatta National Park Bangalore 8550.JPG|बन्नेरघट्टा उद्यान
</gallery>
== इन्हें भी देखें ==
* [[बंगलोर]]
* [[बन्नेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:भारत में चिड़ियाघर]]
[[श्रेणी:बंगलौर]]
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लिम्बू लिपि
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text/x-wiki
[[चित्र:Limbu Alphabet Chart (ᤕᤠᤰᤌᤢᤱ ᤐᤠᤴ).png|दाएँ|अंगूठाकार|275x275पिक्सेल|लिम्बू लिपि ('''ᤕᤰᤌᤢᤱ ᤐᤠᤴ)''']]
लिम्बू लिपि एक भाषा लिपि है जो [[नेपाल]] के [[लिम्बुवान]] में पायी जाती है। यह लिपि नेपाली भाषा के लिए विकसित की गई थी और आधिकारिक रूप से २०२० में नेपाल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त की गई थी। इस लिपि का नाम इसलिए है क्योंकि यह लिपि लिम्बू वृक्ष के विशाल फलों की तरह दिखती है।
लिम्बू लिपि में अक्षर स्वर और व्यंजन के रूप में होते हैं और यह लिपि दो भागों में विभाजित होती है। इस लिपि में १४१ वर्ण होते हैं जिन्हें स्वर और व्यंजन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इस लिपि का उपयोग नेपाली भाषा में लेखन के लिए किया जाता है। इसके अलावा, यह लिपि भूतानी, तिब्बती और भारतीय गोरखा समुदायों में भी उपयोग की जाती है।
पहला भाग वर्णमाला को दर्शाता है जो स्वर और व्यंजन के अक्षरों का समूह होता है। दूसरा भाग संख्याओं के लिए होता है और यह संख्याओं को अक्षरों में लिखने का तरीका बताता है।
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text/x-wiki
'''कल्ट''' उन [[सामाजिक समूह|सामाजिक समूहों]] को कहा जाता है जो अपने असाधारण [[धर्म|धार्मिक]], [[आध्यात्मिकता|आध्यात्मिक]] या [[दार्शनिक]] विश्वास<ref>{{Cite Merriam-Webster|cult}}</ref> या समान हित और उद्देश्य के लिए जाने जाते हैं। इस शब्द को इस रूप में कहना विवादित है, क्योंकि इसका अर्थ लोकप्रिय संस्कृति और शिक्षा दोनों के लिए किया जा सकता है, और विद्वानों के बीच कई क्षेत्रों के विषय में एक सतत स्रोत भी रहा है।<ref name="ZablockiRobbins">{{Cite book|title=Misunderstanding Cults: Searching for Objectivity in a Controversial Field|title-link=Misunderstanding Cults (book)|last=Zablocki|first=Benjamin David|last2=Robbins|first2=Thomas|publisher=University of Toronto Press|year=2001|isbn=0-8020-8188-6|page=473|author-link=Benjamin Zablocki|author-link2=Thomas Robbins (sociologist)}}</ref>{{Rp|348–56}} "कल्ट" शब्द को आमतौर पर अपमानजनक माना जाता है।
''कल्ट'' शब्द का एक पुराना अर्थ उन धार्मिक परंपराओं पर स्थित है जो अपनी संस्कृति, किसी विशेष व्यक्ति या ईश्वर, और जगह से जुड़ी हैं।<ref>{{OED|cult}} - "2.a. A particular form or system of religious worship or veneration, esp. as expressed in ceremony or ritual directed towards a specified figure or object."</ref> उदाहरण के लिए कैथोलिक संत के संदर्भ में कल शब्द या प्राचीन रोम के शाही पंत के संदर्भ में कल शब्द का प्रयोग किया जाता है।
जहाँ एक तरफ यह शब्द अभी भी अपने शाब्दिक और मूल अर्थ में प्रयोग किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर १९वीं शताब्दी में ''अत्यधिक भक्ति'' का एक व्युत्पन्न अर्थ उत्पन्न हुआ।<ref group="lower-roman">Compare the ''[[ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी|Oxford English Dictionary]]'' note for usage in 1875: "cult:…b. A relatively small group of people having (esp. religious) beliefs or practices regarded by others as strange or sinister, or as exercising excessive control over members.… 1875 ''Brit. Mail 30'' Jan. 13/1 Buffaloism is, it would seem, a cult, a creed, a secret community, the members of which are bound together by strange and weird vows, and listen in hidden conclave to mysterious lore."
{{OED|cult}}</ref> फिर १९३० के दशक की शुरुआत में कल्ट [[धार्मिक अध्ययन|धार्मिक व्यवहार के अध्ययन]] के संदर्भ में [[समाजशास्त्र|समाजशास्त्रीय अध्ययन]] का एक उद्देश्य बन गया।<ref>[[Erwin Fahlbusch|Fahlbusch, Erwin]], and [[Geoffrey W. Bromiley|Geoffrey William Bromiley]]. [https://books.google.com/books?id=C5V7oyy69zgC&pg=PA897 ''The Encyclopedia of Christianity'' 4]. p. 897. Retrieved 21 March 2013.</ref> १९४० के दशक से ईसाई विरोधी कल्ट आंदोलन ने कुछ लघुपंथों और नए धार्मिक आंदोलनों का विरोध किया है, उन्हें उनके अपरंपरागत विश्वासों के कारण ''कल्ट'' कहा है। १९७० के दशक के बाद से धर्मनिरपेक्ष विरोधी कल्ट आंदोलन ने कुछ समूहों का विरोध किया है और हिंसा के कृत्यों की प्रतिक्रिया के रूप में उन कल्टों पर अक्सर [[विचार-नियंत्रण|विचारनियंत्रण]] का अभ्यास करने का आरोप लगाया है। विद्वानों और संचार ने कल्ट-विरोधी आंदोलनों के कुछ दावों और कार्यों पर विवाद किया है, जिससे सार्वजनिक विवाद और बढ़ गया है।
धार्मिक आंदोलनों के समाजशास्त्रीय वर्गीकरण एक कल्ट की पहचान सामाजिक रूप से विचलित या उपन्यास मान्यताओं और प्रथाओं के साथ एक सामाजिक समूह के रूप में कर सकते हैं<ref>{{Harvnb|Stark|Bainbridge|1996|p=124}}</ref> हालांकि यह अक्सर अस्पष्ट होता है।<ref>[[OED]], citing ''[[American Journal of Sociology]]'' 85 (1980). p. 1377: "Cults…like other deviant social movements, tend to recruit people with a grievance, people who suffer from a some variety of deprivation."</ref><ref name=":0">Shaw, Chuck. 2005. "[http://shawcss.tripod.com/REL101/society/sects.htm Sects and Cults]." [[Greenville Technical College]]. Retrieved 21 March 2013.</ref><ref>Olson, Paul J. 2006. "The Public Perception of 'Cults' and 'New Religious Movements'." Journal for the Scientific Study of Religion 45 (1): 97–106</ref> अन्य शोधकर्ता लघुपंथों की एक कम संगठित तस्वीर पेश करके कहते हैं कि वे नए विश्वासों और प्रथाओं के आसपास अनायास उत्पन्न होते हैं।<ref>{{Harvnb|Stark|Bainbridge|1987}}</ref> ''कल्ट'' के रूप में वर्णित किए गए समूहों का आकार स्थानीय समूहों से कुछ अनुयायियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लाखों अनुयायियों के साथ होता है।
== परिभाषा ==
अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया में ''कल्ट'' शब्द का अक्सर [[ह्रासकारी|अपमानजनक]] अर्थ होता है।<ref>[[cf.]] Brink, T. L. 2008. "[https://resources.saylor.org/wwwresources/archived/site/wp-content/uploads/2011/01/TLBrink_PSYCH13.pdf Unit 13: Social Psychology]." Pp. 293–320 in ''Psychology: A Student Friendly Approach''. p. 320: "Cult is a somewhat derogatory term for a [[new religious movement]], especially one with unusual theological doctrine or one that is abusive of its membership."</ref> इस अर्थ में इसे एक [[व्यक्तिपरकता|व्यक्तिपरक]] शब्द माना गया है जिसका उपयोग अलग-अलग सिद्धांतों या प्रथाओं वाले समूहों के खिलाफ एक [[व्यक्ति-केन्द्रित कुतर्क|व्यक्ति-केंद्रित कुतर्क]] के रूप में किया जाता है।<ref name=":0"/><ref>Bromley, David Melton, and J. Gordon. 2002. ''Cults, Religion, and Violence''. West Nyack, NY: [[Cambridge University Press]].</ref> जैसे [[धार्मिक अध्ययन|धर्म विद्वान]] मेगन गुडविन ने कल्ट ''शब्द को'' परिभाषित किया है, जब इसे आम आदमी द्वारा प्रयोग किया जाता है, जैसा कि अक्सर "वह [[धर्म (पंथ)|धर्म]] जो मुझे पसंद नहीं है" के लिए आशुलिपि है।<ref>Ingram, Wayne, host. "[https://religion.ua.edu/wp-content/uploads/2017/08/Ep_-2-Turkey-Ritual.pdf Turkey Ritual]" (transcript). Ep. 2 in ''Study Religion'' (podcast). Birmingham: Dept. of Religious Studies, [[University of Alabama]].</ref>
१९७० के दशक में [[धर्मनिरपेक्षता|धर्मनिरपेक्ष]] विरोधी कल्ट आंदोलनों के उदय के साथ विद्वानों (आम जनता के अलावा) ने ''कल्ट'' शब्द के उपयोग को छोड़ना शुरू कर दिया। ''द ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ रिलिजियस मूवमेंट्स'' (अंग्रेज़ी: ''The Oxford Handbook of Religious Movements'', अर्थात धार्मिक आंदोलनों के ऊपर ऑक्सफोर्ड की पुस्तिका) के अनुसार, "दशक के अंत तक, 'नए धर्म' शब्द वस्तुतः 'कल्ट' शब्द को उन सभी बचे हुए समूहों का वर्णन करने के लिए बदल देगा जो गिरजाघर या लघुपंथ के लेबल के तहत आसानी से फिट नहीं होते थे।"<ref name="Lewis, 2004">{{Harvnb|Lewis|2004}}</ref>
[[समाजशास्त्र|समाजशास्त्री]] एमी रायन (२०००) ने उन समूहों को अलग करने की आवश्यकता के लिए तर्क दिया है जो अधिक सौम्य समूहों से खतरनाक हो सकते हैं।<ref>Ryan, Amy. 2000. ''[https://web.archive.org/web/20051118223258/http://rand.pratt.edu/~giannini/newreligions.html New Religions and the Anti-Cult Movement: Online Resource Guide in Social Sciences].'' Archived from the [http://rand.pratt.edu/~giannini/newreligions.html#Definitions original] on 18 November 2005.</ref> रायन कल्ट विरोधियों द्वारा प्रस्तावित परिभाषाओं के बीच तीव्र अंतर को विख्यात करतीं हैं जो नकारात्मक विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और जो समाजशास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनका लक्ष्य मूल्य-मुक्त परिभाषाएँ बनाना है। स्वयं आंदोलनों की धर्म की अलग-अलग परिभाषाएँ भी हो सकती हैं।<ref>[[Bryan R. Wilson|Wilson, Bryan]]. 2001. "[https://www.scribd.com/document/115621228/Why-the-Bruderhof-is-not-a-cult-by-Bryan-Wilson Why the Bruderhof is not a cult]." Retrieved 12 July 2017. p. 2. – via Scribd:
Wilson makes the same point, saying that the [[Bruderhof Communities|Bruderhof]] is not a cult, pointing out that the public imagination is captured by five events that have occurred in religious groups: [[Jonestown]], the [[Branch Davidians]], [[Order of the Solar Temple|Solar Temple]], [[Aum Shinrikyo]], and [[Heaven's Gate (religious group)|Heaven's Gate]].</ref> जॉर्ज क्राइसाइड्स भी बहस में आम जमीन की अनुमति देने के लिए बेहतर परिभाषाएँ विकसित करने की आवश्यकता का हवाला देते हैं। कसिनो (१९९९) इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के लिए महत्वपूर्ण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। धर्म की परिभाषा को सीमित करने से धर्म की स्वतंत्रता में बाधा आ सकती है, जबकि बहुत व्यापक परिभाषा कुछ खतरनाक या अपमानजनक समूहों को "सभी अवांछित कानूनी दायित्वों से बचने के लिए एक असीम बहाना" दे सकती है।<ref name="Casino-DefiningReligion">Casino. Bruce J. 15 March 1999. "[https://web.archive.org/web/20051110101400/http://www.religiousfreedom.com/articles/casino.htm Defining Religion in American Law]" (lecture). ''Conference On The Controversy Concerning Sects In French-Speaking Europe''. Sponsored by [[CESNUR]] and CLIMS. Archived from the [http://www.religiousfreedom.com/articles/casino.htm original] on 10 November 2005.</ref>
== नवधार्मिक आंदोलन ==
[[चित्र:Church-sect_continuum.svg|दाएँ|अंगूठाकार|400x400पिक्सेल| हावर्ड पी. बेकर की गिरजाघर-लघुपंथ वर्गीकरण, अर्न्स्ट ट्रॉल्त्श के मूल सिद्धांत पर आधारित है और कल्ट, लघुपंथों और नए धार्मिक आंदोलनों की आधुनिक अवधारणाओं के लिए आधार प्रदान करती है]]
एक नवधार्मिक आंदोलन एक धार्मिक समुदाय या आधुनिक उत्पत्ति का आध्यात्मिक समूह है (१८०० के दशक के मध्य से) जिसका समाज की प्रमुख धार्मिक संस्कृति के भीतर एक परिधीय स्थान है। नवधार्मिक आंदोलन मूल रूप से या व्यापक धर्म के हिस्से में उपन्यास हो सकते हैं, इस मामले में वे पहले से मौजूद लघुपंथों से अलग हैं।<ref name="Clarke, Peter B 2006">Clarke, Peter B. 2006. ''New Religions in Global Perspective: A Study of Religious Change in the Modern World''. New York: Routledge.</ref> १९९९ में एलीन बार्कर ने अनुमान लगाया कि नवधार्मिक आंदोलन, जिनमें से कुछ को लेकिन सभी को कल्ट के रूप में लेबल नहीं किया गया है, दुनिया भर में हजारों की संख्या में हैं जिनमें से अधिकांश [[एशिया]] या [[अफ़्रीका|अफ्रीका]] में उत्पन्न हुए हैं; और उनमें से अधिकांश के पास केवल कुछ ही सदस्य हैं, कुछ के पास हजारों हैं और बहुत कम के पास एक लाख से अधिक हैं। २००७ में [[धार्मिक अध्ययन|धार्मिक विद्वान]] एलिय्याह सीगलर ने टिप्पणी की कि हालांकि कोई भी नवधार्मिक आंदोलन किसी भी देश में प्रमुख विश्वास नहीं बन पाया था, कई अवधारणाएं जिन्हें उन्होंने पहली बार पेश किया था (अक्सर "[[न्यू एज]]" विचारों के रूप में संदर्भित) दुनिया भर में मुख्यधारा की संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं।<ref name="siegler2007">[[एलियाह सीगलर|Siegler, Elijah]]. 2007. ''New Religious Movements''. [[शागिर्द कक्ष|Prentice Hall]]. {{ISBN|0131834789}}.</ref>{{Rp|51}}
== विद्वतापूर्ण अध्ययन ==
[[चित्र:Max_Weber_1894.jpg|अंगूठाकार|267x267पिक्सेल| लघुपंथों का अध्ययन करने वाले पहले विद्वानों में से एक, [[मैक्स वेबर]] (१८६४-१९२०)।]]
समाजशास्त्री [[मैक्स वेबर]] (१८६४-१९२०) ने पाया कि करिश्माई नेतृत्व पर आधारित कल्ट अक्सर [[करिश्मावादी नेतृत्व|करिश्मा के नियमितीकरण]] का पालन करते हैं। <ref>[[Max Weber|Weber, Max]]. [1922] 1947. "The Nature of Charismatic Authority and its Routinization." Ch. 4§10 in ''Theory of Social and Economic Organization,'' translated by A. R. Anderson and [[Talcott Parsons|T. Parsons]]. [http://www.textlog.de/7415.html Available in its original German].</ref> समाजशास्त्रीय वर्गीकरण के रूप में कल्ट की अवधारणा, हालांकि १९३२ में अमेरिकी समाजशास्त्री हावर्ड पॉल बेकर द्वारा जर्मन धर्मशास्त्री अर्नस्ट ट्रॉएल्त्श की ''गिरजाघर-लघुपंथ वर्गीकरण'' के विस्तार के रूप में पेश की गई थी। ट्रॉएल्त्श का उद्देश्य तीन मुख्य प्रकार के धार्मिक व्यवहारों के बीच अंतर करना था: गिरजाघरिक, [[साम्प्रदायिकता|सांप्रदायिक]] और [[रहस्यवाद|रहस्यमायिक]]।
बेकर ने ट्रॉल्त्श की पहली दो श्रेणियों को और विभाजित किया: ''गिरजाघर को'' ''[[कलीसिया]]'' और ''डेनोमीनेशन'' में विभाजित किया गया; और ''लघुपंथ को'' ''लघुपंथ'' और ''कल्ट'' में।<ref name="SwatosEncy">{{Cite book|title=Encyclopedia of Religion and Society|url=https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3|last=Swatos|first=William H. Jr.|publisher=AltaMira|year=1998|isbn=978-0761989561|editor-last=William H. Swatos Jr.|location=Walnut Creek, CA|pages=[https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3/page/90 90]–93|chapter=Church-Sect Theory}}</ref> ट्रॉल्त्श के "रहस्यमय धर्म" की तरह बेकर का कल्ट छोटे धार्मिक समूहों को संदर्भित करता है जो संगठन में कमी रखते हैं और व्यक्तिगत विश्वासों की निजी प्रकृति पर जोर देते हैं।<ref name="CampbellEncy">{{Cite book|title=Encyclopedia of Religion and Society|url=https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3|last=Campbell|first=Colin|publisher=AltaMira|year=1998|isbn=978-0761989561|editor-last=William H. Swatos Jr.|location=Walnut Creek, CA|pages=[https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3/page/122 122]–123|chapter=Cult}}</ref> बाद में इस तरह की विशेषताओं पर निर्मित समाजशास्त्रीय सूत्रीकरण, विचलित धार्मिक समूहों के रूप में कल्टों पर अतिरिक्त जोर देते हुए, "प्रमुख धार्मिक संस्कृति के बाहर से अपनी प्रेरणा प्राप्त करते हैं।" यह अक्सर समूह और इसके आसपास की अधिक मुख्यधारा की संस्कृति के बीच उच्च स्तर के तनाव का कारण माना जाता है, जो धार्मिक लघुपंथों के साथ साझा की जाने वाली विशेषता है।<ref>{{Harvnb|Stark|Bainbridge|1987}}</ref> इस समाजशास्त्रीय शब्दावली के अनुसार ''लघुपंथ'' धार्मिक विद्वता के उत्पाद हैं और इसलिए पारंपरिक मान्यताओं और प्रथाओं के साथ एक निरंतरता बनाए रखते हैं, जबकि कल्ट नए विश्वासों और प्रथाओं के आसपास सहज रूप से उत्पन्न होते हैं।<ref>{{Harvnb|Stark|Bainbridge|1987}}</ref>
१९६० के दशक की शुरुआत में समाजशास्त्री जॉन लोफलैंड, दक्षिण कोरियाई [[धर्मप्रचारक|मिशनरी]] युंग ऊन किम और [[कैलिफ़ोर्निया]] में कुछ पहले अमेरिकी [[एकीकरण चर्च|एकीकरण गिरजाघर]] के सदस्यों के साथ रहते हुए अपने विश्वासों को बढ़ावा देने और नए सदस्यों को जीतने की कोशिश में उनकी गतिविधियों का अध्ययन किया।<ref>[http://www.uc-history.us/GalenHistory/Forward.htm The Early Unification Church History] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20120222192756/http://www.uc-history.us/GalenHistory/Forward.htm|date=22 February 2012}}, Galen Pumphrey</ref> लोफलैंड ने विख्यात किया कि उनके अधिकांश प्रयास अप्रभावी थे और इसमें शामिल होने वाले अधिकांश लोगों ने अन्य सदस्यों के साथ व्यक्तिगत संबंधों, अक्सर पारिवारिक संबंधों के कारण ऐसा किया। लोफलैंड ने १९६४ में "द वर्ल्ड सेवर्स: ए फील्ड स्टडी ऑफ कल्ट प्रोसेसेज" नामक डॉक्टरेट थीसिस के रूप में अपने निष्कर्षों को प्रकाशित किया और १९६६ में प्रेंटिस-हॉल द्वारा पुस्तक के रूप में ''कयामत कल्ट: ए स्टडी ऑफ कन्वर्जन, प्रॉसेलिटाइजेशन एंड मेंटेनेंस ऑफ फेथ'' (अंग्रेज़ी: ''Doomsday Cult: A Study of Conversion, Proselytization and Maintenance of Faith'', अर्थात कयामत कल्ट: धर्मपरिवर्तन और मान्यता को कायम रखने पर अध्ययन) के रूप में प्रकाशित किया। इसे धार्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से उद्धृत अध्ययनों में से एक माना जाता है।
समाजशास्त्री रॉय वालिस (१९४५-१९९०) ने तर्क दिया कि एक कल्ट "[[ज्ञानमीमांसा|ज्ञानमीमांसात्मक]] [[व्यक्तिवाद]]" की विशेषता है, जिसका अर्थ है कि "कल्ट के पास व्यक्तिगत सदस्य से परे अंतिम अधिकार का कोई स्पष्ट ठिकाना नहीं है।" वालिस के अनुसार कल्टों को आम तौर पर "सदस्यों और गैर-सदस्यों के बीच स्पष्ट अंतर" के बिना "सदस्यों पर कुछ मांगें" बनाते हुए, "व्यक्तियों की समस्याओं के प्रति उन्मुख, शिथिल संरचित, सहिष्णु [और] गैर-अनन्य" , "सदस्यता का तेजी से कारोबार" होना और अस्पष्ट सीमाओं और अस्थिर विश्वास प्रणालियों के साथ क्षणिक सामूहिक होने के नाते वर्णित किया जाता है। वालिस का दावा है कि कल्ट "सांस्कृतिक परिवेश" से निकलते हैं।
जॉन गॉर्डन मेल्टन ने कहा कि १९७० में "कोई व्यक्ति अपने हाथों से नए धर्मों पर सक्रिय शोधकर्ताओं की संख्या की गणना कर सकता है।" हालांकि जेम्स आर लुईस लिखते हैं कि अध्ययन के इस क्षेत्र में ''उल्कापिंड वृद्धि'' को १९७० के दशक की शुरुआत के कल्ट विवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। १९६० के दशक के अंत और १९७० के दशक की शुरुआत में ''गैर-पारंपरिक धार्मिकता की लहर'' के कारण शिक्षाविदों ने नए धार्मिक आंदोलनों को पिछले धार्मिक नवाचारों से अलग घटना के रूप में माना।<ref name="Lewis, 2004">{{Harvnb|Lewis|2004}}</ref>
१९७८ में ब्रूस कैंपबेल ने कहा कि कल्ट व्यक्ति में एक दिव्य तत्व में विश्वासों से जुड़े हैं; यह या तो ''[[आत्मा]]'' है, ''स्वयं'' है, या ''सच्चा आत्म'' है। कल्ट स्वाभाविक रूप से अल्पकालिक और शिथिल रूप से संगठित हैं। हाल के कई कार्यों में एक प्रमुख विषय है जो कल्ट और [[रहस्यवाद]] के बीच के संबंध को दर्शाता है। कैंपबेल कल्टों को व्यक्ति में एक दैवीय तत्व में विश्वास के आधार पर गैर-पारंपरिक धार्मिक समूहों के रूप में वर्णित करते हुए इस तरह के दो प्रमुख प्रकारों को ध्यान में लाते हैं, '''रहस्यमय''' और '''वाद्य''', जो कल्टों को या तो मनोगत या [[तत्त्वमीमांसा|आध्यात्मिक]] सभा में विभाजित करते हैं। एक तीसरा प्रकार भी है, '''सेवा-उन्मुख''', जिसपर कैंपबेल कहते हैं, "धार्मिक संगठन के विकास में विकसित होने वाले स्थिर रूपों के संस्थापक या संस्थापकों के धार्मिक अनुभव की सामग्री के लिए एक महत्वपूर्ण संबंध होगा।"<ref name="Bruce Campbell 1978">Campbell, Bruce. 1978. "A Typology of Cults." ''Sociology Analysis''. Santa Barbara.</ref>
डिक एंथोनी, एक [[न्यायालयिक मनोविज्ञान|फोरेंसिक मनोवैज्ञानिक]], जो रूपांतरण के [[विचार-नियंत्रण|विचारनियंत्रण]] सिद्धांत की आलोचना के लिए जाने जाते हैं,<ref name="Oldenburg">Oldenburg, Don. [2003] 2003. "[https://web.archive.org/web/20110501144721/http://www.crimlaw.org/defbrief269.html Stressed to Kill: The Defense of Brainwashing; Sniper Suspect's Claim Triggers More Debate]." ''Defence Brief'' 269. Toronto: Steven Skurka & Associates. Archived from the [http://www.crimlaw.org/defbrief269.html original] on 1 May 2011.</ref><ref>{{Harvnb|Dawson|1998}}</ref> ने कुछ तथाकथित कल्टों का बचाव किया है, और १९८८ में तर्क दिया कि ऐसे आंदोलनों में शामिल होना अक्सर हानिकारक के बजाय फायदेमंद हो सकता है, कहते हुए कि "यहाँ नए धर्मों के मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों पर मुख्यधारा की पत्रिकाओं में प्रकाशित एक बड़ा [[वैज्ञानिक साहित्य|शोध साहित्य]] है। अधिकांश भाग के लिए प्रभाव किसी भी तरह से सकारात्मक प्रतीत होता है जो औसत दर्जे का है।"<ref name="Sipchen">[[Bob Sipchen|Sipchen, Bob]]. 17 November 1988. "[https://articles.latimes.com/1988-11-17/news/vw-257_1_cult-battle/3 Ten Years After Jonestown, the Battle Intensifies Over the Influence of 'Alternative' Religions]." ''[[लॉस एंजिल्स टाइम्स]].''</ref>
१९९६ की अपनी पुस्तक ''थ्योरी ऑफ रिलिजन'' में अमेरिकी समाजशास्त्री रोडनी स्टार्क और विलियम सिम्स बैनब्रिज ने प्रस्ताव दिया कि लघुपंथों के गठन को तर्कसंगत विकल्प सिद्धांत के माध्यम से समझाया जा सकता है।<ref name="stark1996">{{Harvnb|Stark|Bainbridge|1996}}</ref> ''धर्म के भविष्य'' में वे टिप्पणी करते हैं कि "शुरुआत में सभी धर्म अस्पष्ट, छोटे, पथभ्रष्ट कल्ट आंदोलन हैं।" [[न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय|एनवाईयू]] में मनश्चिकित्सा के प्रोफेसर मार्क गैलेन्टर के अनुसार, लोगों के कल्ट में शामिल होने के विशिष्ट कारणों में समुदाय की खोज और आध्यात्मिक खोज शामिल है। स्टार्क और बैनब्रिज ने उस प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए जिसके द्वारा व्यक्ति नए धार्मिक समूहों में शामिल होते हैं, यहाँ तक कि ''[[धर्मांतरण|रूपांतरण]]'' की अवधारणा की उपयोगिता पर सवाल उठाया है, यह सुझाव देते हुए कि ''संबद्धता'' एक अधिक उपयोगी अवधारणा है।<ref>Bader, Chris, and A. Demaris. 1996. "A test of the Stark-Bainbridge theory of affiliation with religious cults and sects''."'' ''[[Journal for the Scientific Study of Religion]]'' 35:285–303.</ref>
== उपश्रेणियाँ ==
=== विनाशकारी लघुपंथ ===
[[चित्र:Rev._Jim_Jones,_1977_(cropped)2.jpg|दाएँ|अंगूठाकार| पीपल्स टेम्पल के नेता जिम जोन्स]]
''विनाशकारी कल्ट'' आमतौर पर उन समूहों को संदर्भित करता है जिनके सदस्यों ने जानबूझकर कार्रवाई के माध्यम से अपने समूह या अन्य लोगों के अन्य सदस्यों को शारीरिक रूप से घायल या मार डाला है। धार्मिक सहिष्णुता पर ओंटारियो कंसल्टेंट्स विशेष रूप से धार्मिक समूहों के लिए शब्द के उपयोग को सीमित करते हैं जो "उनकी सदस्यता या आम जनता के बीच जीवन की हानि का कारण बनते हैं या उत्तरदायी हैं।"<ref>{{Cite web|url=http://www.religioustolerance.org/destruct.htm|title=Doomsday, destructive religious cults|last=Robinson|first=B.A.|date=<!-- last updated -->25 July 2007|website=[[Ontario Consultants on Religious Tolerance]]|access-date=18 November 2007}}</ref> कल्ट-विरोधी समूह अंतर्राष्ट्रीय कल्ट ज्ञान संगठन के कार्यकारी निदेशक मनोवैज्ञानिक माइकल लैंगोन, एक विनाशकारी कल्ट को "एक अत्यधिक हेरफेर करने वाला समूह जो शोषण करता है और कभी-कभी शारीरिक और/या मनोवैज्ञानिक रूप से सदस्यों और भर्ती को नुकसान पहुंचाता है" के रूप में परिभाषित करता है।<ref>{{Cite book|title=Differential Diagnosis & Treatment in Social Work|url=https://archive.org/details/differentialdiag0004unse_l2g6|last=Turner|first=Francis J.|last2=Arnold Shanon Bloch, Ron Shor|date=1 September 1995|publisher=Free Press|isbn=0028740076|edition=4th|page=[https://archive.org/details/differentialdiag0004unse_l2g6/page/1146 1146]|chapter=105: From Consultation to Therapy in Group Work With Parents of Cultists}}</ref>
जॉन गॉर्डन क्लार्क ने तर्क दिया कि शासन की [[सर्वसत्तावाद|अधिनायकवादी]] व्यवस्था और [[मुद्रा (विनिमय माध्यम)|पैसा]] बनाने पर जोर एक विनाशकारी कल्ट की विशेषताएं हैं।<ref>{{Cite journal|last=Clark, M.D.|first=John Gordon|author-link=John Gordon Clark|date=4 November 1977|title=The Effects of Religious Cults on the Health and Welfare of Their Converts|url=http://www.csj.org/infoserv_articles/press_jones_congress.htm|journal=[[Congressional Record]]|publisher=[[United States Congress]]|volume=123|issue=181|pages=Extensions of Remarks 37401–03|archive-url=https://web.archive.org/web/20051216095942/http://www.csj.org/infoserv_articles/press_jones_congress.htm|archive-date=16 December 2005|access-date=18 November 2007}}</ref> ''कल्ट्स एंड द फैमिली'' में लेखक शापिरो का हवाला देते हैं, जो ''विनाशकारी कल्ट को'' एक [[मनोविकृति]] [[संलक्षण]] के रूप में परिभाषित करता है, जिसके विशिष्ट गुणों में शामिल हैं: "व्यवहार और व्यक्तित्व परिवर्तन, व्यक्तिगत पहचान की हानि, विद्वतापूर्ण गतिविधियों की समाप्ति, परिवार से अलगाव, समाज में उदासीनता और धार्मिक नेताओं द्वारा स्पष्ट मानसिक नियंत्रण और दासता।"<ref>{{Cite book|title=Cults and the Family|last=Kaslow|first=Florence Whiteman|last2=Marvin B. Sussman|publisher=Haworth Press|year=1982|isbn=0917724550|page=34}}</ref>
रटगर्स विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर बेंजामिन ज़ब्लॉकी की राय में ''विनाशकारी कल्ट'' सदस्यों के लिए अपमानजनक बनने के उच्च जोखिम में हैं, यह बताते हुए कि ऐसा [[करिश्मावादी नेतृत्व|करिश्माई नेताओं]] के सदस्यों के प्रशंसा के कारण होता है, जो नेताओं को सत्ता से भ्रष्ट होने में योगदान देता है। बैरेट के अनुसार, विनाशकारी लघुपंथों के खिलाफ लगाया जाने वाला सबसे आम आरोप यौन शोषण है। क्रानेंबोर्ग के अनुसार, कुछ समूह जोखिम भरे होते हैं जब वे अपने सदस्यों को नियमित चिकित्सा देखभाल का उपयोग न करने की सलाह देते हैं। इससे शारीरिक और मानसिक नुकसान हो सकता है।<ref>{{Cite web|url=http://www.reveal.org/library/psych/The%20Impact%20of%20Cults%20on%20Health.pdf|title=The impacts of cults on health}}</ref>
''मिसअंडरस्टैंडिंग कल्ट्स: सर्चिंग फॉर ऑब्जेक्टिविटी इन अ कॉन्ट्रोवर्शियल फील्ड'' (अंग्रेज़ी: ''Misunderstanding Cults: Searching for Objectivity in a Controversial Field'', अर्थात कल्टों की गलतफहमी:एक विवादित श्रेणी में निष्पक्षतवाद ढूँढना) नामक पुस्तक में ब्रुडरहोफ समुदायों के बारे में लिखते हुए जूलियस एच. रुबिन ने कहा कि अमेरिकी धार्मिक नवाचार ने लघुपंथों की एक अंतहीन विविधता का निर्माण किया। इन "नए धार्मिक आंदोलनों... ने नए धर्मांतरित लोगों को इकट्ठा किया और व्यापक समाज के लिए चुनौतियाँ जारी कीं। अक्सर नहीं, सार्वजनिक विवाद, विवादित आख्यान और मुकदमेबाजी का परिणाम।"<ref name="ZablockiRobbins"/> अपने काम ''कल्ट्स इन कॉन्टेक्स्ट'' में लेखक लोर्ने एल. डावसन लिखते हैं कि हालांकि [[एकीकरण चर्च|एकीकरण गिरजाघर]] को "हिंसक या अस्थिर नहीं दिखाया गया है," इसे "विरोधी धर्मयोद्धाओं" द्वारा एक विनाशकारी कल्ट के रूप में वर्णित किया गया है। <ref>{{Harvnb|Dawson|1998}}</ref> २००२ में जर्मन सरकार को संघीय संवैधानिक न्यायालय द्वारा अन्य बातों के अलावा, बिना किसी तथ्यात्मक आधार के "विनाशकारी कल्ट" के रूप में संदर्भित करके [[ओशो|ओशो आंदोलन]] को [[मानहानि|बदनाम करने]] के लिए आयोजित किया गया था।<ref>Seiwert, Hubert. 2003. "[https://archive.today/2012.07.08-164142/http://findarticles.com/p/articles/mi_m0SOR/is_3_64/ai_109568884/pg_4 Freedom and Control in the Unified Germany: Governmental Approaches to Alternative Religions Since 1989]." ''[[Sociology of Religion (journal)|Sociology of Religion]]'' 64(3):367–375, p. 370.</ref>
कुछ शोधकर्ताओं ने ''विनाशकारी कल्ट'' शब्द के उपयोग की आलोचना करते हुए लिखा है कि इसका उपयोग उन समूहों का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो आवश्यक रूप से स्वयं या दूसरों के लिए प्रकृति में हानिकारक नहीं हैं। अपनी पुस्तक ''अंडरस्टैंडिंग न्यू रिलिजियस मूवमेंट्स'' में जॉन ए सलीबा लिखते हैं कि यह शब्द अतिसामान्य है। सलीबा पीपल्स टेम्पल को "एक विनाशकारी कल्ट के प्रतिमान" के रूप में देखता है, जहां इस शब्द का उपयोग करने वालों का अर्थ है कि अन्य समूह भी सामूहिक आत्महत्या करेंगे।<ref name="saliba">{{Cite book|title=Understanding New Religious Movements|last=Saliba|first=John A.|last2=[[J. Gordon Melton]], foreword|publisher=Rowman Altamira|year=2003|isbn=0759103569|page=144}}</ref>
=== कयामत कल्ट ===
''कयामत कल्ट'' एक अभिव्यक्ति है जिसका उपयोग उन समूहों का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो सर्वनाशवाद और सहस्राब्दीवाद में विश्वास करते हैं, और इसका उपयोग उन दोनों समूहों को संदर्भित करने के लिए भी किया जा सकता है जो [[आपदा|आपदा की]] भविष्यवाणी करते हैं, और ऐसे समूह जो इसे लाने का प्रयास करते हैं।<ref name="jenkins">{{Cite book|title=Mystics and Messiahs: Cults and New Religions in American History|url=https://archive.org/details/mysticsmessiahsc0000jenk|last=Jenkins|first=Phillip|publisher=[[Oxford University Press]], US|year=2000|isbn=0195145968|pages=[https://archive.org/details/mysticsmessiahsc0000jenk/page/216 216], 222}}</ref> १९५० के दशक में अमेरिकी [[समाज मनोविज्ञान|सामाजिक मनोवैज्ञानिक]] लियोन फेस्टिंगर और उनके सहयोगियों ने कई महीनों तक एक छोटे से यूएफओ धर्म के सदस्यों का अवलोकन किया, जिन्हें साधक कहा जाता है, और उनके करिश्माई नेता की असफल भविष्यवाणी से पहले और बाद में उनकी बातचीत को रिकॉर्ड किया।<ref name="stangor">{{Cite book|title=Social Groups in Action and Interaction|last=Stangor|first=Charles|publisher=Psychology Press|year=2004|isbn=184169407X|pages=42–43: "When Prophecy Fails"}}</ref><ref>{{Cite book|title=Sociology: Exploring the Architecture of Everyday Life|last=Newman|first=Dr. David M.|publisher=Pine Forge Press|year=2006|isbn=1412928141|page=86}}</ref><ref name="petty">{{Cite book|title=Attitudes and Persuasion: Classic and Contemporary Approaches|url=https://archive.org/details/attitudespersuas0000pett|last=Petty|first=Richard E.|last2=John T. Cacioppo|publisher=Westview Press|year=1996|isbn=081333005X|page=139: "Effect of Disconfirming an Important Belief"}}</ref> उनका काम बाद ''में व्हेन प्रोफेसी फेल्स: ए सोशल एंड साइकोलॉजिकल स्टडी ऑफ ए मॉडर्न ग्रुप दैट प्रेडिक्टेड द डिस्ट्रक्शन ऑफ द वर्ल्ड'' (अंग्रेज़ी: ''When Prophecy Fails: A Social and Psychological Study of a Modern Group that Predicted the Destruction of the World'', अर्थात जब भविश्वानी विफल हो जाए: एक आधुनिक संगठन का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिसने दुनिया के नाश की भविष्यवाणी की थी) में प्रकाशित हुआ।<ref name="festinger">{{Cite book|url=http://www.whenprophecyfails.org/|title=When Prophecy Fails: A Social and Psychological Study of a Modern Group that Predicted the Destruction of the World|last=Festinger|first=Leon|last2=Riecken|first2=Henry W.|last3=Schachter|first3=Stanley|publisher=University of Minnesota Press|year=1956|isbn=1591477271|author-link=Leon Festinger|author-link2=Henry Riecken|author-link3=Stanley Schachter|archive-url=https://web.archive.org/web/20030203224945/http://www.whenprophecyfails.org/|archive-date=2003-02-03}}</ref> १९८० के दशक के उत्तरार्ध में कयामत का दिन समाचार रिपोर्टों का एक प्रमुख विषय था, कुछ पत्रकारों और टिप्पणीकारों ने उन्हें समाज के लिए एक गंभीर खतरा माना।<ref>[[Philip Jenkins|Jenkins, Philip]]. 2000. ''Mystics and Messiahs: Cults and New Religions in American History.'' Oxford University Press. pp. 215–216.</ref> फेस्टिंगर, रीकेन और स्कैचर द्वारा १९९७ के एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि मुख्यधारा के आंदोलनों में अर्थ खोजने में बार-बार विफल होने के बाद लोग एक कयामतकारी विश्वदृष्टि की ओर मुड़ गए।<ref name="pargament">{{Cite book|title=The Psychology of Religion and Coping: Theory, Research, Practice|url=https://archive.org/details/psychologyofreli0000parg|last=Pargament|first=Kenneth I.|publisher=Guilford Press|year=1997|isbn=1572306645|pages=150–153, 340, section: "Compelling Coping in a Doomsday Cult"|author-link=Kenneth Pargament}}</ref> लोग वैश्विक घटनाओं में अर्थ खोजने का भी प्रयास करते हैं जैसे कि सहस्राब्दी की बारी जब कई लोगों ने भविष्यवाणी की कि यह एक युग के अंत और इस प्रकार दुनिया के अंत को चिह्नित करता है। एक प्राचीन माया कैलेंडर वर्ष २०१२ में समाप्त हो गया और कई प्रत्याशित विनाशकारी आपदाएँ पृथ्वी को हिला देंगी।<ref>[[Matthew Restall|Restall, Matthew]], and Amara Solari. 2011. ''2012 and the End of the World: the Western Roots of the Maya Apocalypse''. [[Rowman & Littlefield]].</ref>
=== राजनीतिक कल्ट ===
[[चित्र:EAP_demonstrerar_mot_EU_-_2008-05-01_-_1.jpg|अंगूठाकार| लिस्बन की संधि का विरोध करते हुए [[स्टॉकहोम]] में लारूश आंदोलन के सदस्य]]
एक राजनीतिक कल्ट एक कल्ट है जो [[राजनीति|राजनीतिक कार्रवाई]] और [[विचारधारा]] में प्राथमिक रुचि रखता है।<ref name=":3">Tourish, Dennis, and [[Tim Wohlforth]]. 2000. ''[[On the Edge: Political Cults Right and Left]]''. Armonk, NY: [[M. E. Sharpe]].</ref><ref>[[Janja Lalich|Lalich, Janja]]. 2003. "'[https://web.archive.org/web/20131029210722/http://www.icsahome.com/infoserv_bookreviews/bkrev_onedgeandtabernaclehate.htm On the Edge' and 'Tabernacle of Hate']" (review). ''[[Cultic Studies Review]]'' 2(2). Archived from the [http://www.icsahome.com/infoserv_bookreviews/bkrev_onedgeandtabernaclehate.htm original] on 29 October 2013. Retrieved 6 June 2020.</ref> समूह जिन्हें कुछ लोगों ने राजनीतिक कल्ट के रूप में वर्णित किया है, ज्यादातर दूर-वामपंथी या दूर-दराज़ एजेंडे की वकालत करते हैं, पत्रकारों और विद्वानों का कुछ ध्यान आकर्षित किया है। अपनी २००० की पुस्तक ''ऑन द एज: पॉलिटिकल कल्ट्स राइट एंड लेफ्ट'' में डेनिस टूरिश और टिम वोहलफोर्थ ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ग्रेट ब्रिटेन में एक दर्जन संगठनों के बारे में चर्चा की, जिन्हें वे लघुपंथ के रूप में वर्णित करते हैं।<ref name=":3" /><ref>Tourish, Dennis. 1998. "[https://www.academia.edu/24768857/Ideological_Intransigence_Democratic_Centralism_and_Cultism_A_Case_Study Ideological Intransigence, Democratic Centralism and Cultism: A Case Study from the Political Left]." ''[[Cultic Studies Journal]]'' 15:33–67.</ref> एक अलग लेख में टूरिश कहते हैं कि उनके उपयोग में:
{{Quote|कल्ट शब्द गाली नहीं है, जैसा ये पेपर समझाने की कोशिश कर रहा है। वो केवल कुछ आशुलिपि वाली अभिव्यक्तियाँ हैं जिसे अलग-अलग प्रकार के निष्क्रिय संगठनों में देखा गया है।}}
१९९० में लुसी पैट्रिक ने टिप्पणी की:<ref>Patrick, Lucy. 1990. ''[[Library Journal]]'' 115(21):144. Mag.Coll.: 58A2543.</ref>
{{Quote|भले ही हम एक लोकतंत्र में जीते हैं, कल्ट व्यवहार हमारे नेताओं पर सवाल उठाने की अनिच्छा, हमारी बाहरी लोगों को नीचा दिखाने और झगड़ा न मोलने से अपनी स्थापना करता है। हम कल्ट व्यवहार के ऊपर यह पहचानकर विजय पा सकते हैं कि हमारे पास निर्भरता की ज़रूरत है तो प्रौढ़ लोगों के लिए अनुचित है, जिसे हम सत्तावदी-विरोधी शिक्षा का बढ़ावा करके, और निजी स्वायत्तता और विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान से हासिल कर सकते हैं।}}
ईरान में "[[रुहोल्ला खोमैनी|खुमैनी]] का कल्ट" एक "धर्मनिरपेक्ष धर्म" के रूप में विकसित हुआ। ईरानी लेखक अमीर ताहेरी के अनुसार, खुमैनी को इमाम कहा जाता है, जो "ट्वेल्वर शियावाद को तेरह के कल्ट में बदल देता है।" खुमैनी की छवि विशाल चट्टानों और पहाड़ी ढलानों में उकेरी गई है, प्रार्थना उनके नाम के साथ शुरू और समाप्त होती है, और उनके फतवे उनकी मृत्यु के बाद भी मान्य रहते हैं (कुछ ऐसा जो शिया सिद्धांतों के खिलाफ जाता है)। ईरान में हिज़्बुल्लाह के युद्ध नारों के रूप में "गॉड, कुरान, खुमैनी" या "गॉड इज वन, खुमैनी इज द लीडर" जैसे नारे भी इस्तेमाल किए जाते हैं।<ref>{{Cite book|title=The Persian Night: Iran under the Khomeinist Revolution|url=https://archive.org/details/persiannightiran0000tahe|last=Amir Taheri|publisher=Encounter Books|year=2009|isbn=978-1594032400|pages=[https://archive.org/details/persiannightiran0000tahe/page/83 83]}}</ref> भले ही खुमैनी की तस्वीरें अभी भी कई सरकारी कार्यालयों में टंगी हैं, ऐसा कहा जाता है कि १९९० के दशक के अंत तक "खुमैनी का कल्ट फीका पड़ गया था"।<ref>{{Cite book|title=Persian Mirrors: The Elusive Face of Iran|url=https://archive.org/details/persianmirrorsel0000elai|last=Elaine Sciolino|publisher=Simon & Schuster|year=2005|isbn=978-0743284790|pages=[https://archive.org/details/persianmirrorsel0000elai/page/65 65]}}</ref>
==== आयन रैंड संस्थान ====
[[आयन रैंड]] के अनुयायियों को उनके जीवनकाल के दौरान अर्थशास्त्री मरे रोथबार्ड द्वारा और बाद में माइकल शेरमर द्वारा एक कल्ट के रूप में चित्रित किया गया है।<ref name="rothbard">[[Murray Rothbard|Rothbard, Murray]]. 1972. "[https://www.lewrockwell.com/1970/01/murray-n-rothbard/understanding-ayn-randianism/ The Sociology of the Ayn Rand Cult]." Retrieved 6 June 2020. Revised editions: ''[[Liberty (1987)|Liberty]]'' magazine (1987), and [[Center for Libertarian Studies]] (1990).</ref><ref>[[Michael Shermer|Shermer, Michael]]. 1993. "The Unlikeliest Cult in History." ''[[Skeptic (U.S. magazine)|Skeptic]]'' 2(2):74–81.</ref> रैंड के आसपास के मुख्य समूह को "सामूहिक" कहा जाता था, जो अब समाप्त हो गए हैं; मुख्य समूह जो आज रैंड के विचारों का प्रसार कर रहा है, वह आयन रैंड इंस्टीट्यूट है। जहाँ सामूहिक ने एक [[व्यक्तिवाद|व्यक्तिवादी दर्शन]] की वकालत की, वहीं रोथबार्ड ने दावा किया कि यह [[लेनिनवाद|लेनिनवादी]] संगठन के रूप में आयोजित किया गया था।<ref name="rothbard" />
==== लारूश आंदोलन ====
लारूश आंदोलन एक राजनीतिक और सांस्कृतिक संजाल है जो देर से लिंदन लारूश और उनके विचारों को बढ़ावा देता है। इसमें दुनिया भर के कई संगठन और कंपनियाँ शामिल हैं, जो अभियान चलाती हैं, जानकारी इकट्ठा करती हैं और किताबें और पत्रिकाएं प्रकाशित करती हैं। ''[[दि न्यू यॉर्क टाइम्स]]'' द्वारा इसे ''कल्ट जैसा'' कहा गया है।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2019/02/13/obituaries/lyndon-larouche-dead.html|title=Lyndon LaRouche, Cult Figure Who Ran for President 8 Times, Dies at 96|last=Severo|first=Richard|date=2019-02-13|work=The New York Times|access-date=2021-07-07|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref>
आंदोलन १९६० के दशक की कट्टरपंथी वामपंथी छात्र राजनीति के भीतर उत्पन्न हुआ। १९७० और १९८० के दशक में सैकड़ों उम्मीदवार संयुक्त राज्य अमेरिका में राज्य [[डेमोक्रैटिक पार्टी (संयुक्त राज्य)|डेमोक्रेटिक]] प्राइमरी में 'लारूश प्लेटफॉर्म' पर दौड़े, जबकि लिंडन लारूश ने राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए बार-बार प्रचार किया। हालाँकि लारूश आंदोलन को अक्सर दूर-दराज़ माना जाता है।<ref name="King132-133">King 1989, pp. 132–133.</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/1986/04/04/us/larouche-savors-fame-that-may-ruin-him.html|title=LaRouche savors fame that may ruin him|last=Toner|first=Robin|date=April 4, 1986|work=The New York Times|page=A1}}</ref><ref name="Bennett1988">{{Cite book|title=The party of fear: from nativist movements to the New Right in American history|last=Bennett|first=David Harry|publisher=UNC Press Books|year=1988|isbn=978-0807817728|page=362}}</ref><ref name="King1984">{{Cite news|title=The LaRouche Connection|last=King|first=Dennis|date=19 November 1984|work=[[The New Republic]]|last2=Radosh|first2=Ronald}}</ref> १९७० और १९८० के दशक में अपने चरम के दौरान, लारूश आंदोलन ने एक निजी खुफिया एजेंसी और विदेशी सरकारों के साथ संपर्क विकसित किया।<ref>{{Cite web|url=https://www.washingtonpost.com/wp-srv/national/longterm/cult/larouche/larou1.htm|title=Some Officials Find Intelligence Network 'Useful'|last=Mintz|first=John|date=1985|website=www.washingtonpost.com|access-date=2021-07-07}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.motherjones.com/politics/2018/12/lyndon-larouche-roger-stone-russia-robert-mueller/|title=Here's an insane story about Roger Stone, Lyndon LaRouche, Vladimir Putin, and the Queen of England|last=Jindia|first=Shilpa|website=Mother Jones|language=en-US|access-date=2021-07-07}}</ref><ref name="King1984" />
==== न्यू एक्रोपोलिस ====
पूर्व [[थियोसोफी|थियोसोफिस्ट]]<ref name="ts">{{Cite web|url=http://www.kelebekler.com/cesnur/txt/theosophy.htm|title=The Theosophical Society's Position on New Acropolis|date=2004-06-09|publisher=International Secretary Office The Theosophical Society Adyar|via=Centre for the Study of New Religions|archive-url=https://web.archive.org/web/20200205002148/http://www.kelebekler.com/cesnur/txt/theosophy.htm|archive-date=2020-02-05|access-date=2020-05-25}}</ref> जॉर्ज एंजेल लिवरागा द्वारा १९५७ में स्थापित एक अर्जेंटीना गूढ़ समूह, न्यू एक्रोपोलिस कल्चरल एसोसिएशन को विद्वानों द्वारा एक अति-रूढ़िवादी, नव-फासीवादी और [[श्वेत प्रभुत्व|श्वेत वर्चस्ववादी]] [[अर्धसैनिक बल|अर्धसैनिक समूह]] के रूप में वर्णित किया गया है।<ref name="país">{{Cite news|url=https://elpais.com/diario/1997/02/14/madrid/855923054_850215.html|title=Un profesor de instituto enseña teorías racistas a menores|last=Martínez|first=Jan|access-date=29 January 2019|agency=El País}}</ref><ref name="theos 2">{{Cite web|url=http://theos-talk.com/archives/199802/tt00311.html|title=Letter to the Vice-Chairman of the European Council from Theosophical Society Secretary General|last=Palmeri|first=Juan Carlos|date=1998-02-22|via=Theos Talk|access-date=2020-05-25|archive-date=11 मार्च 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230311083151/http://theos-talk.com/archives/199802/tt00311.html|url-status=dead}}</ref><ref name="goodrick-clarke2003">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=xaiaM77s6N4C&pg=PA86|title=Black Sun: Aryan Cults, Esoteric Nazism, and the Politics of Identity|last=Goodrick-Clarke|first=Nicholas|publisher=New York University Press|year=2003|isbn=978-0814731550|page=86|quote=A recent example of the neo-fascist potential in Theosophy is provided by Nouvelle Acropole movement of Jorge Angel Livraga (b. 1930), the charismatic Argentinian Theosophist who by the 1980s had built up an argent youth following in more than thirty countries. The structure, organization and symbolism of the Nouvelle Acropole is clearly indebted to fascist models.|author-link=Nicholas Goodrick-Clarke}}</ref> समूह स्वयं इस तरह के विवरण से इनकार करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.acropolis.org/en/frequently-asked-questions|title=New Acropolis – Frequently Asked Questions|website=www.acropolis.org|access-date=2019-01-29}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.acropolis.org/en/assembly-resolutions|title=New Acropolis – Assembly Resolutions|website=www.acropolis.org|access-date=2019-01-29}}</ref>
==== एकीकरण गिरजाघर ====
उत्तर कोरिया में जन्मे सुन म्युंग मून द्वारा स्थापित [[एकीकरण चर्च|एकीकरण गिरजाघर]] (जिसे एकीकरण आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है) एक मजबूत साम्यवादी विरोधी स्थिति रखता है।<ref name="moon-peace">{{Cite book|title=As a Peace-Loving Global Citizen|last=Moon|first=Sun Myung|publisher=Gimm-Young Publishers|year=2009|isbn=978-0716602996}}</ref><ref>[http://www.tparents.org/Moon-Books/sm-gww/GWW-07.htm The Way of Restoration], (April, 1972)</ref> १९४० के दशक में [[जापानी साम्राज्य]] के खिलाफ कोरियाई स्वतंत्रता आंदोलन में मून ने कोरिया की साम्यवादी पार्टी के सदस्यों के साथ सहयोग किया। हालाँकि [[कोरियाई युद्ध]] (१९५०-१९५३) के बाद वह एक मुखर साम्यवादी विरोधी बन गए।<ref name="moon-peace" /> चंद्रमा ने लोकतंत्र और साम्यवाद के बीच [[शीतयुद्ध|शीत युद्ध को]] [[ईश्वर]] और [[शैतान]] के बीच अंतिम संघर्ष के रूप में देखा, जिसमें विभाजित कोरिया इसकी प्राथमिक सीमा रेखा के रूप में था। इसकी स्थापना के तुरंत बाद एकीकरण आंदोलन ने साम्यवादी विरोधी संगठनों का समर्थन करना शुरू कर दिया, जिसमें १९६६ में [[ताइपे|ताइपेई]], [[चीनी गणराज्य|चीन गणराज्य]] (ताइवान), [[च्यांग काई शेक|चियाँग काई-शेक]], और [[एकीकरण चर्च|कोरियाई संस्कृति और स्वतंत्रता]] द्वारा स्थापित वर्ल्ड लीग फॉर फ्रीडम एंड डेमोक्रेसी शामिल है। [[एकीकरण चर्च|यह संस्थान]] एक अंतरराष्ट्रीय [[लोक राजनय|सार्वजनिक कूटनीति]] संगठन है जिसने रेडियो फ्री एशिया को भी प्रायोजित किया।<ref name="Korean denies influence peddling">{{Cite news|url=https://news.google.com/newspapers?nid=2457&dat=19761102&id=y6kzAAAAIBAJ&pg=3422,903462|title=Korean denies influence peddling|work=Bangor Daily News|access-date=21 March 2012}}</ref>
१९७४ में एकीकरण गिरजाघर ने [[रिपब्लिकन पार्टी|रिपब्लिकन]] [[संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति|राष्ट्रपति]] [[रिचर्ड मिल्हौस निक्सन|रिचर्ड निक्सन]] का समर्थन किया और वाटरगेट कांड के बाद उनके पक्ष में रैली की, निक्सन ने इसके लिए व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद दिया। १९७५ में मून ने सियोल में येउइदो द्वीप पर संभावित उत्तर कोरियाई सैन्य आक्रमण के खिलाफ एक सरकारी प्रायोजित रैली में लगभग १० लाख दर्शकों के सामने बात की।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=8t-9yx3oG4kC&q=yoido+rally|title=Richard Quebedeaux, Lifestyle : Conversations with Members of Unification Church|last=Quebedeaux|first=Richard|year=1982|isbn=978-0932894182|access-date=9 October 2012}}</ref> एकीकरण आंदोलन की मुख्यधारा के संचार और इसके साम्यवादी विरोधी सक्रियता के लिए वैकल्पिक प्रेस दोनों द्वारा आलोचना की गई थी, जिसके बारे में कई लोगों ने कहा कि यह [[तृतीय विश्व युद्ध|तृतीय विश्वयुद्ध]] और एक परमाणु होलोकॉस्ट का कारण बन सकता है।<ref name="Give and Forget">Thomas Ward, 2006, [http://www.tparents.org/Library/Unification/Publications/SMM-Communism-060300/giveforget.html#chap2a Give and Forget]</ref><ref name="The Resurrection of Reverend Moon">{{Cite web|url=http://www.mediachannel.org/originals/moontranscript2.shtml|title=The Resurrection of Reverend Moon|date=21 January 1992|website=Frontline|publisher=PBS|archive-url=https://web.archive.org/web/20110107084418/http://www.mediachannel.org/originals/moontranscript2.shtml|archive-date=7 January 2011}}</ref><ref name="Sun Myung Moon Changes Robes">[https://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9E0CEEDB1F3FF932A15752C0A964958260 Sun Myung Moon Changes Robes], ''[[The New York Times]]'', 21 January 1992</ref>
१९७७ में [[अमेरिकी हाउस ऑफ रेप्रेसेंटेटिव|अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स]] की अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर समिति की अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की उपसमिति ने पाया कि दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसी, दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय खुफिया सेवा ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ राजनीतिक प्रभाव हासिल करने के लिए आंदोलन का इस्तेमाल किया था और कुछ सदस्य कांग्रेस के कार्यालयों में स्वयंसेवकों के रूप में काम किया था। साथ में उन्होंने कोरियाई सांस्कृतिक स्वतंत्रता फाउंडेशन की स्थापना की, जो एक गैर-लाभकारी संगठन है जिसने [[दक्षिण कोरिया|कोरिया गणराज्य]] के लिए एक [[लोक राजनय|सार्वजनिक कूटनीति]] अभियान के रूप में कार्य किया। <ref name="books.google.com">[https://books.google.com/books?id=AabywLOknbsC&pg=PA59&q=fraser%20kcia Spiritual warfare: the politics of the Christian right], [[Sara Diamond (sociologist)|Sara Diamond]], 1989, [[Pluto Press]], Page 58</ref> समिति ने निक्सन के समर्थन में एकीकरण गिरजाघर के अभियान पर संभावित केसीआईए प्रभाव की भी जांच की।<ref>[https://news.google.com/newspapers?id=f7ITAAAAIBAJ&sjid=KeADAAAAIBAJ&pg=6935,979096 Ex-aide of Moon Faces Citation for Contempt], [[एसोसिएटेड प्रेस]], ''[[Eugene Register-Guard]]'', August 5, 1977</ref>
१९८० में सदस्यों ने [[न्यूयॉर्क नगर|न्यूयॉर्क शहर]] में स्थित एक [[साम्यवाद-रोध|साम्यवादी विरोधी]] शैक्षिक संगठन [[एकीकरण चर्च|कौसा इंटरनेशनल की]] स्थापना की।<ref name="ReferenceE">"Moon's 'Cause' Takes Aim At Communism in Americas." ''[[The Washington Post]]''. August 28, 1983</ref> १९८० के दशक में यह २१ देशों में सक्रिय था। संयुक्त राज्य अमेरिका में इसने [[शुभसंदेशीयवाद|इंजीलवादी]] और कट्टरपंथी ईसाई नेताओं<ref name="christianitytoday37">[http://www.christianitytoday.com/ct/2001/augustweb-only/8-6-37.0.html Sun Myung Moon's Followers Recruit Christians to Assist in Battle Against Communism] ''[[Christianity Today]]'', June 15, 1985</ref> के साथ-साथ [[अमेरिकी सीनेट|सीनेट]] के कर्मचारियों, हिस्पैनिक अमेरिकियों और रूढ़िवादी कार्यकर्ताओं के लिए सेमिनार और सम्मेलनों के लिए शैक्षिक सम्मेलनों को प्रायोजित किया। <ref name="washingtonpost.com">[https://www.washingtonpost.com/wp-srv/national/longterm/cult/unification/image.htm Church Spends Millions On Its Image], ''[[The Washington Post]]'', 1984-09-17. "Another church political arm, Causa International, which preaches a philosophy it calls "God-ism," has been spending millions of dollars on expense-paid seminars and conferences for Senate staffers, Hispanic Americans and conservative activists. It also has contributed $500,000 to finance an anticommunist lobbying campaign headed by John T. (Terry) Dolan, chairman of the National Conservative Political Action Committee (NCPAC)."</ref> १९८६ में कौसा इंटरनेशनल ने [[निकारागुआ]] के मिस्किटो भारतीयों और निकारागुआन सरकार के हाथों उनके उत्पीड़न के बारे में डॉक्यूमेंट्री फिल्म ''निकारागुआ वास अवर होम को'' प्रायोजित किया। इसे यूएसए-यूडब्ल्यूसी के सदस्य ली शापिरो द्वारा फिल्माया और निर्मित किया गया था, जिनकी बाद में [[अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत युद्ध|सोवियत-अफगान युद्ध]] के दौरान सोवियत-विरोधी ताकतों के साथ फिल्मांकन करते समय मृत्यु हो गई थी।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/1986/07/29/movies/on-13-sandinistas-vs-miskitos.html|title=On 13, Sandinistas Vs. Miskitos|last=Corry|first=John|date=29 July 1986|work=The New York Times|access-date=19 January 2019}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.envio.org.ni/articulo/3245|title=Revista Envío – How to Read the Reagan Administration: The Miskito Case|website=www.envio.org.ni|access-date=19 January 2019|archive-date=7 अक्तूबर 2006|archive-url=https://web.archive.org/web/20061007070045/http://www.envio.org.ni/articulo/3245|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://fair.org/|title=FAIR|access-date=19 January 2019}}</ref><ref>[https://select.nytimes.com/gst/abstract.html?res=F40717F738590C7B8EDDA90994DF484D81 2 Americans Reported Killed In an Ambush in Afghanistan] ''[[The New York Times]]'', 1987-10-28</ref>
१९८३ में कुछ अमेरिकी सदस्य कोरियाई एयरलाइंस की उड़ान ००७ को मार गिराए जाने को लेकर [[सोवियत संघ]] के खिलाफ एक सार्वजनिक विरोध में शामिल हुए।<ref>[http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=/c/a/2008/08/29/PK2812ETF2.DTL] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111112022354/http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=%2Fc%2Fa%2F2008%2F08%2F29%2FPK2812ETF2.DTL |date=12 नवंबर 2011 }} ''[[San Francisco Chronicle]]'', September 3, 1983 "For a second day, the Soviet Consulate in Pacific Heights was the scene of emotional protests against the shooting down of a Korean Air Lines jumbo jet. About 300 people held demonstration yesterday morning. Among them were members of the Unification Church, or "Moonies," whose founder is the Rev. Sun Myung Moon, the controversial South Korean who has melded a fierce anti-communism into his ideology. Eldridge Cleaver, the onetime black radical who recently has had ties with the Moonies, spoke at the rally. Many pickets carried signs accusing the Soviet Union of murdering the 269 passengers and crew aboard the airliner. In another development, San Francisco attorney Melvin Belli filed a $109 billion lawsuit against the Soviet Union on behalf of the 269 victims."</ref> १९८४ में एचएसए-यूडब्ल्यूसी ने [[वॉशिंगटन, डी॰ सी॰|वॉशिंगटन डीसी]] [[विचारक समूह|थिंक टैंक]] वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर वैल्यूज़ इन पब्लिक पॉलिसी की स्थापना की, जो [[स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय|स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी]], [[शिकागो विश्वविद्यालय]] और अन्य संस्थानों में रूढ़िवादी-उन्मुख अनुसंधान और सेमिनारों को रेखांकित करता है।<ref name="Church Spends Millions On Its Image">[https://www.washingtonpost.com/wp-srv/national/longterm/cult/unification/image.htm Church Spends Millions On Its Image], ''[[The Washington Post]]'', 1984-09-17.</ref> उसी वर्ष सदस्य डेन फेफरमैन ने [[वर्जीनिया]] में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन की स्थापना की, जो कि सरकारी एजेंसियों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरे के रूप में विरोध करने में सक्रिय है।<ref name="Ribadeneira-ire">{{Cite news|title=Ire at school Star of David ruling unites ACLU, Pat Robertson|last=Ribadeneira|first=Diego|date=August 21, 1999|work=[[The Boston Globe]]|publisher=[[The New York Times Company]]|page=B2}}</ref> अगस्त १९८५ में मून द्वारा स्थापित एक संगठन, [[एकीकरण चर्च|प्रोफेसर्स वर्ल्ड पीस एकेडमी]] ने "साम्यवादी साम्राज्य के पतन के बाद दुनिया में स्थिति" विषय पर बहस करने के लिए [[जिनेवा]] में एक सम्मेलन प्रायोजित किया।<ref name="goliath.ecnext.com">[http://goliath.ecnext.com/coms2/gi_0199-14440148/Projections-about-a-post-Soviet.html Projections about a post-Soviet world-twenty-five years later.] // Goliath Business News</ref>
अप्रैल १९९० में मून ने [[सोवियत संघ]] का दौरा किया और राष्ट्रपति [[मिखाइल गोर्बाचेव]] से मुलाकात की। मून ने सोवियत संघ में चल रहे राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के लिए समर्थन व्यक्त किया। इसी समय पूर्व साम्यवादी राष्ट्रों में आंदोलन का विस्तार हो रहा था।<ref name="query.nytimes.com">[https://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9C0CE5D61F39F937A25752C1A966958260&sec=&spon= EVOLUTION IN EUROPE; New Flock for Moon Church: The Changing Soviet Student] from ''[[The New York Times]]''</ref> १९९४ में ''[[दि न्यू यॉर्क टाइम्स]]'' ने आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव को मान्यता देते हुए कहा कि यह "एक ईश्वरीय शक्ति केंद्र है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में रूढ़िवादी कारणों में विदेशी भाग्य डाल रहा है।"<ref>{{Cite news|url=https://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9E0CEEDB1F3FF932A15752C0A964958260&sec=&spon=|title=Review/Television; Sun Myung Moon Changes Robes|last=Goodman|first=Walter|date=January 21, 1992|work=New York Times}}</ref> १९९८ में मिस्र के अखबार ''अल-अहराम'' ने चंद्रमा के ''चरम दक्षिणपंथी झुकाव'' की आलोचना की और रूढ़िवादी इजरायल के प्रधान मंत्री [[बेंजामिन नेतन्याहू]] के साथ एक व्यक्तिगत संबंध का सुझाव दिया।<ref>[http://weekly.ahram.org.eg/1998/403/op1.htm The same old game] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090215193404/http://weekly.ahram.org.eg/1998/403/op1.htm|date=2009-02-15}}, ''[[अल-अहरम|Al-Ahram]]'', November 12–18, 1998, "The Washington Times is a mouthpiece for the ultra conservative Republican right, unquestioning supporters of Israel's [[लिकुड|Likud]] government. The newspaper is owned by Sun Myung Moon, originally a native of North Korea and head of the Unification Church, whose ultra-right leanings make him a ready ally for Netanyahu. Whether or not Netanyahu is personally acquainted with Moon is unclear, though there is no doubt that he has established close friendships with several staff members on The Washington Times, whose editorial policy is rabidly anti-Arab, anti-Muslim and pro-Israel."</ref>
[[जॉर्ज वॉकर बुश]] की अध्यक्षता के दौरान, एक एकीकरण आंदोलन के सदस्य और ''द वाशिंगटन टाइम्स'' के तत्कालीन अध्यक्ष डोंग मून जू ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सुधारने के प्रयास में उत्तर कोरिया के लिए अनौपचारिक राजनयिक मिशन चलाए।<ref name="beast2712">[http://www.thedailybeast.com/articles/2012/02/07/the-bush-administration-s-secret-link-to-north-korea.html The Bush Administration's Secret Link to North Korea], Aram Roston, ''[[The Daily Beast]]'', February 7, 2012</ref> जू का जन्म उत्तर कोरिया में हुआ था और वह संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक हैं।<ref name="yonhap122611">[http://english.yonhapnews.co.kr/northkorea/2011/12/26/79/0401000000AEN20111226008351315F.HTML Unification Church president on condolence visit to N. Korea], ''[[Yonhap News]]'', December 26, 2011</ref>
द एकीकरण गिरजाघर ''द वाशिंगटन टाइम्स'', ''इनसाइट ऑन द न्यूज'',<ref>[https://www.cjr.org/politics/insightmag_a_mustread.php Insightmag, a Mustread] ''Columbia Journalism Review'' 2007-01-27</ref> [[युनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल|यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल]]<ref name="in sorrow">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/1989/12/24/books/upi-look-back-in-sorrow.html|title=U.P.I.: Look Back in Sorrow (book review of ''Down to the Wire: UPI's Fight for Survival'' By Gregory Gordon and Ronald E. Cohen)|last=Atwater, James D.|date=December 24, 1989|work=The New York Times|access-date=March 15, 2011}}</ref><ref name="old dog">{{Cite news|url=https://www.forbes.com/forbes/1998/0601/6111047a.html|title=Old dog, new tricks?|last=Spiegel, Peter|date=June 1, 1998|work=Forbes|access-date=March 15, 2011}}</ref> और न्यूज वर्ल्ड कम्युनिकेशंस संजाल सहित कई समाचार आउटलेट का भी मालिक है।<ref name="Washington Post-ghosts">{{Cite news|url=https://www.washingtonpost.com/ac2/wp-dyn?pagename=article&contentId=A60061-2002May22|title=Moon Speech Raises Old Ghosts as the Times Turns 20|last=Ahrens|first=Frank|date=May 23, 2002|work=[[The Washington Post]]|access-date=2009-08-16}}</ref><ref name="wrmea.com">[http://www.wrmea.com/backissues/1297/9712060.html As U.S. Media Ownership Shrinks, Who Covers Islam?], ''[[Washington Report on Middle East Affairs]]'', December 1997</ref> ''वाशिंगटन टाइम्स के'' राय संपादक चार्ल्स हर्ट वाशिंगटन [[वॉशिंगटन, डी॰ सी॰|, डीसी]] में [[डॉनल्ड ट्रम्प|डोनाल्ड ट्रम्प]] के शुरुआती समर्थकों में से एक थे<ref>{{Cite news|url=https://www.politico.com/magazine/story/2016/07/the-trump-show-214075|title=The Trump Dynasty Takes Over the GOP|last=Lowry|first=Rich|date=July 20, 2016|work=[[Politico Magazine]]|access-date=May 3, 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20161027122711/https://www.politico.com/magazine/story/2016/07/the-trump-show-214075|archive-date=October 27, 2016|author-link=Rich Lowry}}</ref> २०१८ में उन्होंने रोनाल्ड रीगन, [[मार्टिन लूथर किंग|मार्टिन लूथर किंग जूनियर]], [[मारग्रेट थैचर|मार्गरेट थैचर]] और पोप जॉन पॉल द्वितीय के साथ ट्रम्प को "महान चैंपियन" के रूप में शामिल किया। स्वतंत्रता के।" <ref>{{Cite book|title=The Corrosion of Conservatism: Why I Left the Right|url=https://archive.org/details/corrosionofconse0000boot|last=Boot|first=Max|publisher=Liveright Publishing|year=2018|isbn=978-1631495670|page=[https://archive.org/details/corrosionofconse0000boot/page/124 124]|chapter=The Cost of Capitulation|lccn=2018036979|author-link=Max Boot}}</ref> २०१६ में ''वाशिंगटन टाइम्स ने'' संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया, लेकिन २०२० में फिर से चुनाव के लिए ट्रम्प का समर्थन किया<ref>''Washington Times'', 10/26/2020, [https://www.washingtontimes.com/news/2020/oct/26/editorial-donald-trump-for-reelection Donald Trump for Reelection] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20201027152248/https://www.washingtontimes.com/news/2020/oct/26/editorial-donald-trump-for-reelection/|date=October 27, 2020}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.reuters.com/article/us-usa-election-church-idUSKBN27E2U2|title=In Pennsylvania woods, church in 'spiritual battle' to re-elect Trump|last=Campbell|first=Joe|date=29 October 2020|work=Reuters|access-date=19 December 2020|last2=Fogarty|first2=Kevin}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.mcall.com/opinion/readers-react/mc-omalley-sanctuary-church-ar15-20180609-story.html|title=Story about Moon church 'alarming'|date=10 June 2018|access-date=19 December 2020|agency=Morning Call}}</ref>
==== कार्यकर्ता क्रांतिकारी पार्टी ====
ब्रिटेन में वर्कर्स रिवोल्यूशनरी पार्टी (अंग्रेज़ी: ''Workers Revolution Party'', अर्थात मजदूर क्रांतिकारी दल), एक ट्रोट्स्कीवादी समूह जिसका नेतृत्व गेरी हीली ने किया था और अभिनेत्री वैनेसा रेडग्रेव द्वारा दृढ़ता से समर्थित था, को अन्य लोगों द्वारा वर्णित किया गया है, जो ट्रोट्स्कीस्ट आंदोलन में शामिल रहे हैं, एक कल्ट या एक समूह जिसने १९७० और १९८० के दशक के दौरान कल्ट जैसी विशेषताओं को प्रदर्शित किया। वोहल्फोर्थ और टूरिश द्वारा भी इसका वर्णन किया गया है,<ref>Wohlforth, Tim, and Dennis Tourish. 2000. "Gerry Healy: Guru to a Star." pp. 156–172 in ''[[On the Edge: Political Cults Right and Left]]''. Armonk, NY: [[M. E. Sharpe]].</ref> जिनके लिए वर्कर्स रिवोल्यूशनरी पार्टी के एक पूर्व सदस्य बॉब पिट ने स्वीकार किया कि इसका "कल्ट जैसा चरित्र" था, हालांकि यह तर्क देते हुए कि यह सुदूर वामपंथी होने के बजाय विशिष्ट है। फीचर ने वास्तव में WRP को असामान्य बना दिया और "इसके कारण इसे क्रांतिकारी वामपंथी के भीतर एक अछूत के रूप में माना जाने लगा।"
==== अन्य समूह ====
मैक्सिकन दूर-दराज़ समूह एल युंके जैसे संगठन, जिसने स्पेनिश दूर-दराज़ पार्टी वोक्स को प्रायोजित किया,<ref>{{Cite web|url=https://www.eldiario.es/sociedad/conexiones-vox-grupos-ultracatolicos_1_1799146.html|title=Las conexiones de Vox con HazteOir, los 'kikos' y una docena de obispos españoles|last=Bastante|first=Jesús|date=7 December 2018|website=elDiario.es}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.elconfidencial.com/espana/2014-05-30/una-jueza-destapa-los-vinculos-entre-la-secta-secreta-el-yunque-y-los-ultras-de-hazte-oir_138569/|title=Una jueza destapa los vínculos entre la secta secreta El Yunque y 'ultras' de Hazte Oír|last=Lobo|first=José Luis|date=30 May 2014|website=elconfidencial.com}}</ref> [[क्यू एनॉन]] [[षड्यन्त्र का सिद्धान्त|षड्यंत्र सिद्धांत]],<ref name="atlrel">{{Cite web|url=https://www.theatlantic.com/newsletters/archive/2020/05/qanon-q-pro-trump-conspiracy/611722/|title=The Atlantic Daily: QAnon Is a New American Religion|last=Nyce|first=Caroline Mimbs|date=May 14, 2020|website=[[The Atlantic]]|language=en-US|access-date=May 18, 2020}}</ref><ref name="church">{{Cite web|url=http://theconversation.com/the-church-of-qanon-will-conspiracy-theories-form-the-basis-of-a-new-religious-movement-137859|title=The Church of QAnon: Will conspiracy theories form the basis of a new religious movement?|last=Argentino|first=Marc-André|date=May 18, 2020|website=The Conversation|language=en|access-date=May 18, 2020}}</ref> और लैटिन अमेरिका में बढ़ते नव-पेंटेकोस्टल राजनीतिक प्रभाव,<ref>{{Cite journal|last=del Campo|first=María Esther|last2=Resina|first2=Jorge|date=2020|title=¿De movimientos religiosos a organizaciones políticas? La relevancia política del evangelismo en América Latina|journal=Fundación Carolina}}</ref> कल्ट के रूप में चित्रित किया जा सकता है।
गीनो पेरेन्टे का नेशनल लेबर फेडरेशन (अंग्रेज़ी: ''National Labor Federation'', अर्थात राष्ट्रीय मजदूरी संघ)<ref>Solomon, Alisa. 26 November 1996. "Commie Fiends of Brooklyn." ''[[The Village Voice]]''.</ref> और मार्लीन डिक्सन की अब-मृत डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी राजनीतिक समूहों के उदाहरण हैं जिन्हें "कल्ट" के रूप में वर्णित किया गया है। डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी का एक महत्वपूर्ण इतिहास समाजशास्त्री और डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी के पूर्व सदस्य जंजा लालीच द्वारा ''बाउंडेड चॉइस'' में दिया गया है। फ़्रांस में लुत्त उवरीएर (फ्रांसीसी: ''Lutte Ouvrière'', अर्थात श्रमिकों का संघर्ष), सार्वजनिक रूप से आरलेत लागिलार के नेतृत्व में लेकिन १९९० के दशक में रॉबर्ट बार्सिया द्वारा निर्देशित किए जाने का पता चला, अक्सर एक कल्ट के रूप में आलोचना की गई है, उदाहरण के लिए डैनियल कोह्न-बेंडिट और उनके बड़े भाई गेब्रियल कोह्न-बेंडिट, साथ ही साथ लूमानीते (फ्रांसीसी: ''L'Humanité'', अर्थात इंसानियत) और लिबेराशॉन (फ्रांसीसी: ''Libération'', अर्थात आज़ादी) द्वारा आलोचित किया गया है।<ref>{{Cite news|url=http://www.humanite.presse.fr/journal/2002-04-11/2002-04-11-32049|title=Arlette Laguiller n'aime pas le débat|date=11 April 2002|work=[[L'Humanité]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20050629070722/http://www.humanite.presse.fr/journal/2002-04-11/2002-04-11-32049|archive-date=29 June 2005|language=fr}}</ref>
अपनी पुस्तक ''लेस सेक्ट्स पॉलिटिक्स: १९६५-१९९५'' (''राजनीतिक लघुपंथ: १९६५-१९९५'') में फ्रांसीसी लेखक सिरिल ले तललेक कुछ धार्मिक समूहों पर विचार करते हैं जो उस समय राजनीति में शामिल थे। उन्होंने क्लूनी के सांस्कृतिक कार्यालय, न्यू एक्रोपोलिस, द डिवाइन लाइट मिशन, ट्रेडिशन फैमिली प्रॉपर्टी, लोंगो माई, सुपरमेन क्लब और औद्योगिक कला प्रोत्साहन संगठन को शामिल किया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=-l1QQOEQKXUC&q=%22les+sectes+politiques%22|title=Les sectes politiques: 1965–1995|last=Cyril Le Tallec|year=2006|isbn=978-2296003477|language=fr|access-date=28 August 2009}}</ref>
ग्रॉपर आंदोलन के कई पूर्व नेता{{Snd}}एक पूर्ण-सही गुट जो [[श्वेत प्रभुत्व|श्वेत वर्चस्व]], ईसाई राष्ट्रवाद और इंसेल विचारधारा को प्रभावित करता है{{Snd}}ने निक फुएंटेस पर एक कल्ट की तरह इसका नेतृत्व करने का आरोप लगाया है, उसे गाली देने वाला और अपने अनुयायियों से पूर्ण वफादारी की मांग करने वाला बताया।<ref>Hayden, M. E. (2022, June 2). Pro-trump white nationalist group facing key desertions. Southern Poverty Law Center. Retrieved August 21, 2022, from https://www.splcenter.org/hatewatch/2022/06/02/pro-trump-white-nationalist-group-facing-key-desertions</ref><ref>'Groyper Army' fractures amid public feud between Patrick Casey and Nick Fuentes. Angry White Men. (2021, March 4). Retrieved August 21, 2022, from https://angrywhitemen.org/2021/02/15/groyper-army-fractures-amid-public-feud-between-patrick-casey-and-nick-fuentes/</ref><ref>Owen, T. (2022, June 7). They Love Jesus, Bon Iver, and Incels. Inside America's New Ultranationalist Youth Movement. VICE. Retrieved August 21, 2022, from https://www.vice.com/en/article/epzgb4/groyper-young-christian-nationalists-movement</ref> फ्यूएंट्स ने "कल्ट जैसी ... मानसिकता" होने की प्रशंसा की और अपने स्वयं के आंदोलन को एक कल्ट के रूप में वर्णित करते हुए "विडंबनापूर्ण" स्वीकार किया।<ref>Gais, H. (2021, March 11). Far-right extremists gather in Florida for CPAC spinoff alongside sitting congressman. Southern Poverty Law Center. Retrieved August 21, 2022, from https://www.splcenter.org/hatewatch/2021/03/11/far-right-extremists-gather-florida-cpac-spinoff-alongside-sitting-congressman</ref>
=== बहुविवाह कल्ट ===
कल्ट जो [[बहुविवाह]] सिखाते हैं और अभ्यास करते हैं, दो से अधिक लोगों के बीच विवाह, बहुधा बहुविवाह, एक व्यक्ति की कई पत्नियाँ होती हैं, लंबे समय से विख्यात किए गए हैं, हालांकि वे अल्पसंख्यक हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि उत्तरी अमेरिका में बहुविवाह कल्ट के लगभग ५०,००० सदस्य हैं।<ref>Bridgstock, Robert. 2014. ''The Youngest Bishop in England: Beneath the Surface of Mormonism''. [[See Sharp Press]]. p. 102.</ref> अक्सर बहुविवाहवादी कल्टों को कानूनी अधिकारियों और मुख्यधारा के समाज दोनों द्वारा नकारात्मक रूप से देखा जाता है, और इस दृष्टिकोण में कभी-कभी संबंधित मुख्यधारा लघुपंथों की नकारात्मक धारणाएं शामिल होती हैं, क्योंकि उनके संभावित [[घरेलू हिंसा]] और बाल शोषण के कथित लिंक होते हैं।<ref>Cusack, C. 2015. ''Laws Relating to Sex, Pregnancy, and Infancy: Issues in Criminal Justice''. [[Springer books|Springer]].</ref>
१८३० के दशक से यीशु के गिरजाघर के लैटर-डे सेंट्स के सदस्य बहुविवाह या बहुविवाह का अभ्यास करते थे। १८९० में यीशु के गिरजाघर के लैटर-डे सेंट्स के अध्यक्ष, विल्फोर्ड वुड्रूफ़ ने एक सार्वजनिक घोषणापत्र जारी किया, जिसमें घोषणा की गई कि यीशु के गिरजाघर के लैटर-डे सेंट्स ने नए बहुवचन विवाह करना बंद कर दिया है। एंटी-मॉर्मन भावना कम हो गई, जैसा कि यूटा के लिए राज्य का विरोध था। १९०४ में द स्मूट हियरिंग, जिसने दस्तावेज किया कि एलडीएस गिरजाघर के सदस्य अभी भी बहुविवाह का अभ्यास कर रहे थे, ने गिरजाघर को दूसरा घोषणापत्र जारी करने के लिए प्रेरित किया, फिर से दावा किया कि इसने नए बहुवचन विवाह करना बंद कर दिया है। १९१० तक, एलडीएस गिरजाघर ने उन लोगों को बहिष्कृत कर दिया, जिन्होंने नए बहुवचन विवाह किए या किए। १८९० के मेनिफेस्टो के प्रवर्तन ने बहुवचन विवाह की प्रथा को जारी रखने के लिए एलडीएस गिरजाघर छोड़ने के लिए विभिन्न स्प्लिन्टर समूहों का कारण बना।<ref>[http://attorneygeneral.utah.gov/polygamy/The_Primer.pdf "The Primer"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20050111224555/http://attorneygeneral.utah.gov/polygamy/The_Primer.pdf|date=11 January 2005}} – Helping Victims of Domestic Violence and Child Abuse in Polygamous Communities. A joint report from the offices of the Attorneys General of Arizona and Utah. (2006)</ref> ऐसे समूहों को मॉर्मन कट्टरपंथी के रूप में जाना जाता है। उदाहरण के लिए लैटर-डे सेंट्स के जीसस क्राइस्ट के फंडामेंटलिस्ट गिरजाघर को अक्सर बहुविवाहवादी कल्ट के रूप में वर्णित किया जाता है।<ref>Alex Hannaford, [https://www.theguardian.com/world/2018/oct/13/woman-escaped-cult-hq-flds-refuge "The woman who escaped a polygamous cult – and turned its HQ into a refuge"], ''[[The Guardian]]'', 13 October 2018.</ref>
=== जातिवादी कल्ट ===
{{मुख्य|आतंकवाद}}
[[चित्र:Ku_Klux_Klan_members_and_a_burning_cross,_Denver,_Colorado,_1921.jpg|अंगूठाकार| १९१५ में [[कु क्लुल्स क्लान|कू क्लक्स क्लान]] के सदस्यों द्वारा क्रॉस बर्निंग]]
समाजशास्त्री और इतिहासकार ऑरलैंडो पैटरसन ने [[कु क्लुल्स क्लान|कू क्लक्स क्लान]], जो [[अमेरिकी गृहयुद्ध|गृह युद्ध]] के बाद अमेरिकी दक्षिण में उभरा, का एक विधर्मी ईसाई कल्ट के रूप में वर्णन किया है और उन्होंने [[अफ़्रीकी अमेरिकी|अफ्रीकी अमेरिकियों]] और अन्य लोगों के उत्पीड़न को [[मानव बलि|मानव बलिदान]] के रूप में भी वर्णित किया है।<ref>[[Orlando Patterson|Patterson, Orlando]]. 1998. ''Rituals of Blood: Consequences of Slavery in Two American Centuries.'' New York: [[Basic Civitas Books]].</ref> उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में गुप्त [[आर्य वंश|आर्य]] कल्टों के अस्तित्व ने फोल्किश आंदोलन और [[नाज़ीवाद|नाजीवाद]] के उदय को दृढ़ता से प्रभावित किया।<ref>[[Nicholas Goodrick-Clarke|Goodrick-Clarke, Nicholas]]. 1993. ''[[The Occult Roots of Nazism]]''. New York: [[New York University Press|NYU Press]].</ref> संयुक्त राज्य अमेरिका में आधुनिक समय के श्वेत शक्ति वाले स्किनहेड समूह उन्हीं भर्ती तकनीकों का उपयोग करते हैं, जिन्हें विनाशकारी लघुपंथों के रूप में जाना जाता है।<ref>Perry, Barbara. 2012. ''Hate and Bias Crime: A Reader''. [[Routledge]]. pp. 330–331.</ref>
विबर्ट एल व्हाइट, जूनियर, इस्लाम के राष्ट्र के एक पूर्व सदस्य और इसके एक पूर्व प्रमुख सलाहकार ने संगठन को एक कल्ट के रूप में चित्रित किया, इसके नेता लुई फर्रखान पर अन्य संगठनात्मक नेताओं के साथ, [[अश्वेत राष्ट्रवाद|काले राष्ट्रवाद]] और धार्मिक हठधर्मिता का उपयोग करने का आरोप लगाया। व्यक्तिगत और राजनीतिक लाभ के लिए काले लोगों का शोषण करना।<ref>White, V. L. (n.d.). Inside the nation of Islam : A historical and personal testimony by a Black Muslim. University of Missouri-St. Louis Libraries. Retrieved August 21, 2022, from http://link.umsl.edu/portal/Inside-the-Nation-of-Islam--a-historical-and/_dVsNFm_eaM/{{Dead link|date=मार्च 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> इस्लाम का राष्ट्र काले वर्चस्व का उपदेश देता है, कि इसके संस्थापक वालेस फर्ड मुहम्मद एक मसीहा थे और उनके उत्तराधिकारी एलिय्याह मुहम्मद एक दिव्य संदेशवाहक थे, और यह कि गोरे लोग शैतानों की एक जाति थे जिन्हें सर्वनाश से उखाड़ फेंका गया था।<ref>{{Cite web|url=https://www.britannica.com/topic/Nation-of-Islam|title=Nation of Islam | History, Founder, Beliefs, & Facts | Britannica}}</ref><ref>Southern Poverty Law Center. (2022). Nation of Islam. Southern Poverty Law Center. Retrieved August 21, 2022, from https://www.splcenter.org/fighting-hate/extremist-files/group/nation-islam</ref>
=== आतंकवादी लघुपंथ ===
''जिहाद एंड सेक्रेड वेंजेंस: साइकोलॉजिकल अंडरकरेंट्स ऑफ हिस्ट्री नामक'' पुस्तक में [[मनोविकारविज्ञानी|मनोचिकित्सक]] पीटर ए. ओल्सन ने [[ओसामा बिन लादेन]] की तुलना जिम जोन्स, डेविड कोरेश, शोको असहारा, मार्शल एप्पलव्हाइट, ल्यूक जौरेट और जोसेफ डी मेम्ब्रो सहित कुछ कल्ट नेताओं से की है, और वह यह भी कहते हैं कि इनमें से प्रत्येक व्यक्ति मादक व्यक्तित्व विकार वाले लोगों के लिए नौ मानदंडों में से कम से कम आठ फिट बैठता है।<ref name="piven">{{Cite book|title=Jihad and Sacred Vengeance: Psychological Undercurrents of History|last=Piven|first=Jerry S.|publisher=iUniverse|year=2002|isbn=0595251048|pages=104–114}}</ref> पुस्तक ''सीकिंग द कम्पैशनेट लाइफ: द मोरल क्राइसिस फॉर साइकोथेरेपी एंड सोसाइटी में'' लेखक गोल्डबर्ग और क्रेस्पो भी ओसामा बिन लादेन को "विनाशकारी कल्ट नेता" के रूप में संदर्भित करते हैं।<ref>{{Cite book|title=Seeking the Compassionate Life: The Moral Crisis for Psychotherapy and Society|url=https://archive.org/details/seekingcompassio0000gold|last=Goldberg|first=Carl|last2=Crespo|first2=Virginia|publisher=Praeger/Greenwood|year=2004|isbn=0275981967|page=[https://archive.org/details/seekingcompassio0000gold/page/161 161]}}</ref>
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संगठन की २००२ की बैठक में कल्ट-विरोधी स्टीवन हसन ने कहा कि [[अल-क़ायदा]] एक विनाशकारी कल्ट की विशेषताओं को पूरा करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा:<ref name="dittmann">{{Cite news|url=http://www.apa.org/monitor/nov02/cults.html|title=Cults of hatred: Panelists at a convention session on hatred asked APA to form a task force to investigate mind control among destructive cults.|last=Dittmann|first=Melissa|date=10 November 2002|work=Monitor on Psychology|access-date=18 November 2007|publisher=[[American Psychological Association]]|issue=10|volume=33|page=30}}</ref>
{{Quote|हमें विनाशक विचारनियंत्रित कल्टों के बारे में जो पता है उसका प्रयोग करना चाहिए, और ये आतंकवाद से लड़ाई में एक प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें उस मनोविज्ञान को समझना होगा जिसके कारण लोग इन संगठनों में शामिल होते हैं ताकि हम इस प्रक्रिया को कम कर सकें। हमें पूर्व कल्ट सदस्यों से मिलकर उनमें से कुछ की मदद का आतंकवाद पर युद्ध पर इस्तेमाल कर सकते हैं।}}
''द टाइम्स'' में प्रकाशित अल-कायदा पर एक लेख में पत्रकार मैरी एन सीघर्ट ने लिखा है कि अल-कायदा एक "क्लासिक कल्ट" जैसा दिखता है:<ref>{{Cite news|title=The cult figure we could do without|last=Sieghart|first=Mary Ann|date=26 October 2001|work=[[The Times]]|author-link=Mary Ann Sieghart}}</ref>
{{Quote|अल-कायदा कल्ट के सभी औपचारिक व्याख्याओं पर सटीक बैठती है। वह अपने सदस्यों विचारों को नियंत्रित करते हैं, एक बंद, [[सर्वसत्तावाद|सर्वसत्तावादी]] समाज बनाते हैं; उसका एक स्वयं-निर्मित मसीहा है; और वे मानते हैं कि अंत मार्ग को न्यायोचित ठहराता है।}}
अल-क़ायदा के समान [[आईएसआईएस|इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड द लेवेंट]] एक और भी अधिक चरमपंथी और शुद्धतावादी विचारधारा का पालन करता है, जिसमें लक्ष्य [[शरीयत]] द्वारा शासित एक [[सम्प्रभु राज्य|राज्य]] बनाना है, जैसा कि इसके धार्मिक नेतृत्व द्वारा व्याख्या की गई है, जो तब [[विचार-नियंत्रण|ब्रेनवॉश]] और आदेश देता है। उनके सक्षम पुरुष विषय [[आत्मघाती हमला|आत्मघाती मिशन]] पर जाने के लिए कार बम जैसे उपकरणों के साथ, अपने दुश्मनों के खिलाफ, जिसमें जानबूझकर चुने गए नागरिक लक्ष्य शामिल हैं, जैसे कि गिरजाघर और [[शिया इस्लाम|शिया]] [[मस्जिद]], अन्य। विषय इसे एक वैध कार्रवाई के रूप में देखते हैं; एक [[दायित्व]], यहाँ तक कि। इस राजनीतिक-सैन्य प्रयास का अंतिम लक्ष्य अंततः [[यौम अल-क़ियामा|उनकी इस्लामी मान्यताओं के अनुसार दुनिया के अंत]] में प्रवेश करना है और सर्वनाश की अंतिम लड़ाई के अपने संस्करण में भाग लेने का मौका है, जिसमें उनके सभी दुश्मन (यानी कोई भी जो उनके पक्ष में नहीं है) का सत्यानाश कर दिया जाएगा।<ref>Barron, Maye. 2017. ''18JTR'' 8(1).</ref> इस तरह के प्रयास अंततः २०१७ में विफल रहे,<ref>{{Cite web|url=https://www.theguardian.com/world/2017/oct/21/isis-caliphate-islamic-state-raqqa-iraq-islamist|title=Rise and fall of Isis: its dream of a caliphate is over, so what now?|last=Burke|first=Jason|date=21 October 2017|website=The Guardian|archive-url=https://web.archive.org/web/20171021230705/https://www.theguardian.com/world/2017/oct/21/isis-caliphate-islamic-state-raqqa-iraq-islamist|archive-date=21 October 2017|access-date=22 July 2021}}</ref> हालांकि कट्टर बचे लोग उग्रवाद आतंकवाद (यानी इराकी विद्रोह, २०१७-वर्तमान) में बड़े पैमाने पर लौट आए हैं।
१९८० और १९९० के दशक में [[पेरू]] में सक्रिय [[शाइनिंग पाथ]] [[गुरिल्ला युद्ध|गुरिल्ला]] आंदोलन को विभिन्न प्रकार से एक "कल्ट"<ref>Stern, Steven J., ed. 1998. ''Shining and Other Paths: War and Society in Peru, 1980–1995''. Durham, NC: [[Duke University Press]].</ref> और एक गहन "व्यक्तित्व का कल्ट" के रूप में वर्णित किया गया है।<ref>Palmer, David Scott. 1994. ''Shining Path of Peru'' (2nd ed.). New York: [[St. Martin's Press]].</ref> [[लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम|तमिल टाइगर्स को]] फ्रांसीसी पत्रिका लेक्सप्रेस (फ्रांसीसी: ''L'Express'') द्वारा भी इस तरह वर्णित किया गया है।
== कल्ट विरोधी आंदोलन ==
=== ईसाई प्रतिवाद आंदोलन ===
१९४० के दशक में गैर-ईसाई धर्मों के लिए कुछ स्थापित ईसाई लघुपंथों द्वारा लंबे समय से विरोध और कथित रूप से [[अपधर्म|विधर्मी]] या नकली ईसाई लघुपंथों ने संयुक्त राज्य अमेरिका में एक अधिक संगठित ईसाई विरोधी आंदोलन में क्रिस्टलीकृत किया। आंदोलन से संबंधित लोगों के लिए ईसाई होने का दावा करने वाले सभी धार्मिक समूहों, लेकिन ईसाई रूढ़िवाद के बाहर समझा जाता है, को कल्ट माना जाता था।<ref>{{Harvnb|Cowan|2003}}</ref> ईसाई कल्ट नए धार्मिक आंदोलन हैं जिनकी ईसाई पृष्ठभूमि है लेकिन अन्य ईसाई गिरजाघरों के सदस्यों द्वारा उन्हें धर्मशास्त्रीय रूप से विचलित माना जाता है।<ref>[[J. Gordon Melton]], ''Encyclopedic Handbook of Cults in America'' (New York/London: Garland, 1986; revised edition, Garland, 1992). p. 5</ref> अपनी प्रभावशाली पुस्तक ''द किंगडम ऑफ द कल्ट्स'' (१९६५) में ईसाई विद्वान वाल्टर राल्स्टन मार्टिन ने ईसाई लघुपंथों को उन समूहों के रूप में परिभाषित किया है, जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत व्याख्या का पालन करते हैं, न कि निकीन ईसाई धर्म द्वारा स्वीकार की गई [[बाइबिल]] की समझ के बजाय, गिरजाघर के उदाहरण प्रदान करते हैं। अंतिम-दिनों के संतों के यीशु मसीह, [[क्रिश्चियन साइंस|ईसाई विज्ञान]], [[यहोवा के साक्षी]] और एकीकरण गिरजाघर ।
ईसाई विरोधी आंदोलन का दावा है कि ईसाई लघुपंथ जिनके विश्वास आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से बाइबिल के अनुसार नहीं हैं, वे गलत हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि एक धार्मिक लघुपंथ को एक कल्ट माना जा सकता है यदि इसकी मान्यताओं में मुक्ति, [[त्रित्व|तृत्व]], एक व्यक्ति के रूप में स्वयं यीशु, यीशु की सेवकाई, यीशु के चमत्कार जैसे किसी भी आवश्यक ईसाई शिक्षाओं के रूप में जो कुछ भी देखते हैं, उसका खंडन शामिल है। [[यीशु]], सूली पर चढ़ाया जाना, मसीह का पुनरुत्थान, दूसरा आगमन और मेघारोहण ।<ref>[[Walter Ralston Martin|Martin, Walter Ralston]]. 1978. ''The Rise of the Cults'' (revised ed.). Santa Ana: Vision House. pp. 11–12.</ref><ref>[[Richard Abanes|Abanes, Richard]]. 1997. ''Defending the Faith: A Beginner's Guide to Cults and New Religions''. Grand Rapids: [[Baker Book House]]. p. 33.</ref><ref>House, H. Wayne, and Gordon Carle. 2003. ''Doctrine Twisting: How Core Biblical Truths are Distorted''. Downers Grove, IL: [[InterVarsity Press]].</ref>
प्रतिकल्टी साहित्य आमतौर पर सैद्धांतिक या धार्मिक चिंताओं और एक [[धर्मप्रचारक|मिशनरी]] या [[आपत्तिखण्डन|क्षमाप्रार्थी]] उद्देश्य को व्यक्त करता है।<ref>Trompf, Garry W. 1987. "Missiology, Methodology and the Study of New Religious Movements." ''Religious Traditions'' 10:95–106.</ref> यह गैर-मौलिक ईसाई लघुपंथों की मान्यताओं के खिलाफ बाइबिल की शिक्षाओं पर जोर देकर खंडन प्रस्तुत करता है। ईसाई विरोधी कल्ट कार्यकर्ता लेखक भी कल्ट के अनुयायियों के लिए ईसाइयों को [[इंजीलवाद|प्रचार करने]] की आवश्यकता पर जोर देते हैं।<ref>[[Ronald Enroth|Enroth, Ronald]], ed. 1990. ''Evangelising the Cults''. Milton Keynes, UK: [[Word Books]].</ref><ref>[[Norman Geisler|Geisler, Norman L.]], and Ron Rhodes. 1997. ''When Cultists Ask: A Popular Handbook on Cultic Misinterpretations''. Grand Rapids: [[Baker Book House]].</ref>{{Rp|479–493}}
=== धर्मनिरपेक्ष विरोधी कल्ट आंदोलन ===
[[चित्र:Anti-Aum_Shinrikyo_protest.JPG|अंगूठाकार| २००९ में जापान में ओम् शिनरिक्यो विरोधी विरोध]]
१९७० के दशक की शुरुआत में कल्ट माने जाने वाले समूहों के लिए एक धर्मनिरपेक्ष विरोध आंदोलन ने आकार ले लिया था। धर्मनिरपेक्ष कल्ट-विरोधी आंदोलन का गठन करने वाले संगठन अक्सर "कल्ट" के [[धर्मांतरण|रिश्तेदारों]] की ओर से काम करते थे, जो यह नहीं मानते थे कि उनके प्रियजन अपनी [[मुक्त कर्म|मर्जी]] से अपने जीवन को इतनी तेजी से बदल सकते हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाले कुछ मनोवैज्ञानिकों और [[समाजशास्त्र|समाजशास्त्रियों]] ने सुझाव दिया कि कल्ट के सदस्यों की वफादारी बनाए रखने के लिए [[विचार-नियंत्रण|विचारनियंत्रण]] तकनीकों का इस्तेमाल किया गया था।<ref name="refRichardsonIntrovigne">{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref> यह विश्वास कि कल्टों ने अपने सदस्यों का ब्रेनवॉश किया, कल्ट आलोचकों के बीच एक एकीकृत विषय बन गया और कल्ट विरोधी आंदोलन तकनीकों के अधिक चरम कोनों में कभी-कभी कल्ट सदस्यों के ''अकार्यक्रम'' का अभ्यास किया गया।<ref name="ShupeEncy">{{Cite book|title=Encyclopedia of Religion and Society|url=https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3|last=Shupe|first=Anson|publisher=AltaMira|year=1998|isbn=978-0761989561|editor-last=William H. Swatos Jr.|location=Walnut Creek, CA|page=[https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3/page/27 27]|chapter=Anti-Cult Movement}}</ref>
कल्ट-विरोधी आंदोलन से संबंधित धर्मनिरपेक्ष कल्ट विरोधी आमतौर पर एक कल्ट को एक ऐसे समूह के रूप में परिभाषित करते हैं जो अपने सदस्यों का हेरफेर, शोषण और नियंत्रण करता है। कहा जाता है कि कल्ट व्यवहार में विशिष्ट कारकों में सदस्यों, सांप्रदायिक और समग्र संगठन, आक्रामक धर्मांतरण, मतारोपण के व्यवस्थित कार्यक्रम, और [[मध्यम वर्ग|मध्यवर्गीय]] समुदायों में स्थिरता पर चालाकी और सत्तावादी [[विचार-नियंत्रण|दिमाग नियंत्रण]] शामिल है।<ref>"[C]ertain manipulative and authoritarian groups which allegedly employ mind control and pose a threat to mental health are universally labeled cults. These groups are usually 1) authoritarian in their leadership; 2) communal and totalistic in their organization; 3) aggressive in their proselytizing; 4) systematic in their programs of indoctrination; 5) relatively new and unfamiliar in the United States; 6) middle class in their clientele" (Robbins and Anthony (1982:283), as qtd. in Richardson 1993:351).</ref><ref name="BromleyEncy">{{Cite book|title=Encyclopedia of Religion and Society|url=https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3|last=Bromley|first=David G.|publisher=AltaMira|year=1998|isbn=978-0761989561|editor-last=William H. Swatos Jr.|location=Walnut Creek, CA|pages=[https://archive.org/details/encyclopediaofre0000unse_j2f3/page/61 61]–62|chapter=Brainwashing}}</ref><ref>[[Eileen Barker|Barker, Eileen]]. 1989. ''New Religious Movements: A Practical Introduction''. London: [[Her Majesty's Stationery Office]].</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.csj.org/infoserv_cult101/checklis.htm|title=Characteristics Associated with Cultic Groups – Revised|last=Janja|first=Lalich|last2=Langone|first2=Michael|website=International_Cultic_Studies_Association|publisher=International Cultic Studies Association|archive-url=https://web.archive.org/web/20070430071731/http://www.csj.org/infoserv_cult101/checklis.htm|archive-date=30 April 2007|access-date=23 May 2014}}</ref> [[संचार माध्यम]] में और औसत नागरिकों के बीच "कल्ट" ने एक तेजी से नकारात्मक अर्थ प्राप्त किया, [[अपहरण]], विचारनियंत्रण, मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार, यौन शोषण और अन्य [[अपराध|आपराधिक गतिविधियों]] और सामूहिक आत्महत्या जैसी चीजों से जुड़ा हुआ। जबकि इन नकारात्मक गुणों में से अधिकांश में आमतौर पर नए धार्मिक समूहों के एक बहुत छोटे अल्पसंख्यक की गतिविधियों में वास्तविक प्रलेखित मिसालें होती हैं, जन संस्कृति अक्सर उन्हें सांस्कृतिक रूप से विचलन के रूप में देखे जाने वाले किसी भी धार्मिक समूह तक फैलाती है, हालांकि यह शांतिपूर्ण या कानून का पालन करने वाला हो सकता है।
जबकि कुछ मनोवैज्ञानिक इन सिद्धांतों के प्रति ग्रहणशील थे, समाजशास्त्री नवधार्मिक आंदोलन में रूपांतरण की व्याख्या करने की उनकी क्षमता के बारे में सबसे अधिक संदेहवादी थे।<ref name="BarkerAReview">{{Cite journal|last=Barker, Eileen|year=1986|title=Religious Movements: Cult and Anti-Cult Since Jonestown|url=https://archive.org/details/sim_annual-review-of-sociology_1986_12/page/329|journal=Annual Review of Sociology|volume=12|pages=329–346|doi=10.1146/annurev.so.12.080186.001553}}</ref> १९८० के दशक के उत्तरार्ध में मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों ने विचारनियंत्रण और माइंड कंट्रोल जैसे सिद्धांतों को छोड़ना शुरू कर दिया। जबकि विद्वानों का मानना है कि विभिन्न कम नाटकीय जबरदस्ती मनोवैज्ञानिक तंत्र समूह के सदस्यों को प्रभावित कर सकते हैं, वे मुख्य रूप से एक तर्कसंगत पसंद के कार्य के रूप में नए धार्मिक आंदोलनों में रूपांतरण को देखते हैं।<ref name="Ayella">{{Cite journal|last=Ayella, Marybeth|year=1990|title=They Must Be Crazy: Some of the Difficulties in Researching 'Cults'|journal=American Behavioral Scientist|volume=33|issue=5|pages=562–577|doi=10.1177/0002764290033005005}}</ref><ref>[[Cult#Cowan2003|Cowan]], 2003 ix</ref>
=== कल्ट विरोधी आंदोलनों की प्रतिक्रियाएँ ===
१९७० के दशक की कल्ट बहस के बाद से "कल्ट" और "कल्ट नेता" शब्दों के तेजी से [[ह्रासकारी|निंदनीय]] उपयोग के कारण, कुछ शिक्षाविदों, समूहों के अलावा जिन्हें कल्ट कहा जाता है, का तर्क है कि इन शब्दों से बचा जाना चाहिए।<ref>[[Pnina Werbner|Werbner. Pnina]]. 2003. ''Pilgrims of Love: The Anthropology of a Global Sufi Cult''. Bloomington: Indiana University Press. p. xvi: "...the excessive use of "cult" is also potentially misleading. With its pejorative connotations"</ref>{{Rp|348–356}}कैथरीन वेसिंगर (लोयोला यूनिवर्सिटी न्यू ऑरलियन्स) ने कहा है कि "कल्ट" शब्द महिलाओं और समलैंगिकों के लिए नस्लीय गालियाँ या अपमानजनक शब्दों के रूप में उतना ही [[पूर्वाग्रह]] और विरोध का प्रतिनिधित्व करता है।<ref name="Wessinger" /> उसने तर्क दिया है कि लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे इस शब्द द्वारा व्यक्त की गई [[भेदभाव|कट्टरता]] से अवगत हों, जिस तरह से यह समूह के सदस्यों और उनके बच्चों को अमानवीय बनाता है, उस पर ध्यान आकर्षित करता है।<ref name="Wessinger">{{Cite book|title=How the Millennium Comes Violently|last=Wessinger|first=Catherine Lowman|publisher=Seven Bridges Press|year=2000|isbn=1889119245|location=New York/London|page=4|author-link=Catherine Wessinger}}</ref> वह कहती है कि एक समूह को अमानवीय के रूप में लेबल करना, इसके खिलाफ हिंसा का औचित्य बन जाता है।<ref name="Wessinger" /> वह यह भी कहती हैं कि एक समूह को "कल्ट" का लेबल देना लोगों को सुरक्षित महसूस कराता है, क्योंकि "धर्म से जुड़ी हिंसा को पारंपरिक धर्मों से अलग कर दिया जाता है, दूसरों पर पेश किया जाता है, और केवल अपभ्रंश समूहों को शामिल करने की कल्पना की जाती है।"<ref name="Wessinger" /> उनके अनुसार, यह इस बात पर ध्यान देने में विफल है कि मुख्यधारा के धर्मों के विश्वासियों द्वारा बाल शोषण, यौन शोषण, वित्तीय जबरन वसूली और युद्ध भी किए गए हैं, लेकिन अपमानजनक "कल्ट" स्टीरियोटाइप इस असहज तथ्य का सामना करने से बचना आसान बनाता है।<ref name="Wessinger" />
== सरकार की नीतियाँ और कार्य ==
सरकारी दस्तावेजों में धार्मिक आंदोलनों के लिए लेबल "कल्ट" या "लघुपंथ" का उपयोग अंग्रेजी में "कल्ट" शब्द के लोकप्रिय और नकारात्मक उपयोग और कई यूरोपीय भाषाओं में "लघुपंथ" के रूप में अनुवादित शब्दों के कार्यात्मक रूप से समान उपयोग को दर्शाता है।<ref name="Richardson01">{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref> "कल्ट" शब्द के इस नकारात्मक राजनीतिक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण [[समाजशास्त्रियों की सूची|समाजशास्त्रियों]] का तर्क है कि यह समूह के सदस्यों की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।<ref name="Davis1996">Davis, Dena S. 1996. "Joining a Cult: Religious Choice or Psychological Aberration." ''Journal of Law and Health''.</ref> १९९० के दशक में प्रति-कल्ट आंदोलन और कर्मकांडों के दुरुपयोग के चरम पर कुछ सरकारों ने लघुपंथों की सूची प्रकाशित की।<ref group="lower-roman">Or "sects" in German-speaking countries, the German term ''sekten'' having assumed the same derogatory meaning as English "cult".</ref> जबकि ये दस्तावेज़ समान शब्दावली का उपयोग करते हैं, उनमें आवश्यक रूप से समान समूह शामिल नहीं हैं और न ही इन समूहों का मूल्यांकन सहमत मानदंडों के आधार पर किया गया है।<ref name="Richardson01" /> अन्य सरकारें और विश्व निकाय भी नए धार्मिक आंदोलनों पर रिपोर्ट करते हैं लेकिन समूहों का वर्णन करने के लिए इन शर्तों का उपयोग नहीं करते हैं।<ref name="Richardson01" /> २००० के दशक के बाद से कुछ सरकारों ने धार्मिक आंदोलनों के ऐसे वर्गीकरणों से खुद को फिर से दूर कर लिया है। जबकि नए धार्मिक समूहों की आधिकारिक प्रतिक्रिया दुनिया भर में मिश्रित रही है, कुछ सरकारें इन समूहों के आलोचकों के साथ "वैध" धर्म और "खतरनाक", [[लोकनीति|सार्वजनिक नीति]] में "अवांछित" कल्टों के बीच अंतर करने की हद तक गठबंधन करती हैं।<ref name="refRichardsonIntrovigne">{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref><ref name="Edelman">{{Cite journal|last=Edelman|first=Bryan|last2=Richardson|first2=James T.|year=2003|title=Falun Gong and the Law: Development of Legal Social Control in China|journal=Nova Religio|volume=6|issue=2|pages=312–331|doi=10.1525/nr.2003.6.2.312}}</ref>
=== चीन ===
[[चित्र:Destruction_d'ouvrages_du_Falun_Gong_lors_de_la_répression_de_1999_en_Chine.jpg|दाएँ|अंगूठाकार| चीनी सरकार द्वारा [[फालुन गोंग]] पुस्तकों को प्रतीकात्मक रूप से नष्ट किया जा रहा है]]
सदियों से चीन में सरकारों ने कुछ धर्मों को ''शिएजियाओ'' ([[चीनी भाषा|चीनी]]: ''邪教'', अर्थात [[काफ़ि़र|काफिर]]) के रूप में वर्गीकृत किया है, जिसे कभी-कभी "दुष्ट कल्ट" या "विधर्मी शिक्षाओं" के रूप में अनुवादित किया जाता है।<ref name="Pennyreligion">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=P6Z6fQ7Fg3QC|title=The Religion of Falun Gong|last=Penny|first=Benjamin|date=2012|publisher=University of Chicago Press|isbn=978-0226655017|language=en}}</ref> [[चीन का इतिहास|शाही चीन]] में ''शिएजियाओ'' के रूप में एक धर्म के वर्गीकरण का मतलब यह नहीं था कि धर्म की शिक्षाओं को झूठा या अप्रमाणिक माना जाता था, बल्कि यह लेबल उन धार्मिक समूहों पर लागू किया गया था जो राज्य द्वारा अधिकृत नहीं थे, या इसे धार्मिक समूहों पर लागू किया गया था। ऐसा माना जाता है कि समूह राज्य की वैधता को चुनौती देते हैं।<ref name="Pennyreligion" /> [[चीन का इतिहास|आधुनिक चीन]] में ''शिएजियाओ'' शब्द का उपयोग उन शिक्षाओं को निरूपित करने के लिए किया जाता है जिन्हें सरकार अस्वीकार करती है, और इन समूहों को अधिकारियों द्वारा दमन और दंड का सामना करना पड़ता है। चीन में चौदह अलग-अलग समूहों को सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा ''शिएजियाओ'' के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।<ref>Center for Religious Freedom. February 2002. "[https://web.archive.org/web/20120402165033/http://www.hudson.org/files/publications/Analysis_of_China_Docs_1_to_7.pdf Report Analyzing Seven Secret Chinese Government Documents]." Washington: [[Freedom House]].</ref> इसके अतिरिक्त, १९९९ में चीनी साम्यवादी पार्टी के अधिकारियों ने [[फालुन गोंग]] आध्यात्मिक अभ्यास को एक विधर्मी शिक्षा के रूप में निंदा की, और उन्होंने इसे खत्म करने के लिए एक अभियान चलाया। हालांकि इस तरह के दावे केवल पार्टी के प्रस्तावों में मौजूद हैं, और चीनी कानून प्रणालियों द्वारा इसे वैध नहीं किया गया है। इसने वास्तव में इस तरह की निंदा को भ्रमित कर दिया और साम्यवादी पार्टी के गुप्त पुलिसकर्मियों द्वारा गुप्त रूप से किए गए गैरकानूनी कार्यों के रूप में। [[एमनेस्टी इण्टरनेशनल|एमनेस्टी इंटरनेशनल]] के अनुसार, फालुन गोंग के उत्पीड़न में एक बहुआयामी प्रचार अभियान,<ref name="CRS2006">{{Cite web|url=https://fpc.state.gov/documents/organization/67820.pdf|title=CRS Report for Congress: China and Falun Gong|last=Lum|first=Thomas|date=25 May 2006|publisher=[[Congressional Research Service]]}}</ref> लागू वैचारिक रूपांतरण और पुन: शिक्षा का एक कार्यक्रम, साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के अतिरिक्त कानूनी जबरदस्ती के उपाय शामिल हैं, जैसे मनमानी गिरफ्तारी, [[बेगार]], और शारीरिक यातना, कभी-कभी मृत्यु के परिणामस्वरूप।<ref name="Amnesty1">{{Cite web|url=http://web.amnesty.org/library/Index/engASA170112000|title=China: The crackdown on Falun Gong and other so-called "heretical organizations"|date=23 March 2000|publisher=Amnesty International|archive-url=https://web.archive.org/web/20030711022606/http://web.amnesty.org/library/Index/engASA170112000|archive-date=11 July 2003|access-date=17 March 2010}}</ref>
=== रूस ===
२००८ में रूसी आंतरिक मंत्रालय ने "चरमपंथी समूहों" की एक सूची तैयार की। सूची के शीर्ष पर "पारंपरिक इस्लाम" के बाहर इस्लामी समूह थे, जिनकी निगरानी रूसी सरकार द्वारा की जाती है। अगला सूचीबद्ध " बुतपरस्त कल्ट " थे।<ref>[[Andrei Soldatov|Soldatov, Andreĭ]], and I. Borogan. 2010. ''The new nobility : the restoration of Russia's security state and the enduring legacy of the KGB''. New York: [[PublicAffairs]]. pp. 65–66.</ref> २००९ में रूसी न्याय मंत्रालय ने एक परिषद बनाई जिसे उसने "राज्य धार्मिक अध्ययन विशेषज्ञ विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों की परिषद" नाम दिया। नई परिषद ने ८० बड़े लघुपंथों को सूचीबद्ध किया जो इसे रूसी समाज के लिए संभावित रूप से खतरनाक मानते थे, और यह भी उल्लेख किया कि हजारों छोटे थे। जिन बड़े लघुपंथों को सूचीबद्ध किया गया था उनमें शामिल हैं: गिरजाघर ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर-डे सेंट्स, [[यहोवा के साक्षी]], और अन्य लघुपंथ जिन्हें " नव-पेंटेकोस्टल " के रूप में संदर्भित किया गया था।<ref>Marshall, Paul. 2013. ''Persecuted: The Global Assault on Christians''. [[Thomas Nelson Inc]].</ref>
=== संयुक्त राज्य अमेरिका ===
१९७० के दशक में " [[विचार-नियंत्रण|विचारनियंत्रण थ्योरी]] " की वैज्ञानिक स्थिति अमेरिकी अदालती मामलों में एक केंद्रीय विषय बन गई थी, जहां इस सिद्धांत का इस्तेमाल कल्ट के सदस्यों के जबरदस्त अकार्यक्रमित के उपयोग को सही ठहराने के लिए किया गया था।<ref name="Lewis, 2004">{{Harvnb|Lewis|2004}}</ref><ref name="Davis1996">Davis, Dena S. 1996. "Joining a Cult: Religious Choice or Psychological Aberration." ''Journal of Law and Health''.</ref> इस बीच इन सिद्धांतों के आलोचक [[समाजशास्त्रियों की सूची|समाजशास्त्रियों]] ने अदालत में नए धार्मिक आंदोलनों की वैधता का बचाव करने में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिवक्ताओं की सहायता की।<ref name="refRichardsonIntrovigne">{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref><ref name="Edelman"/> संयुक्त राज्य अमेरिका में कल्टों की धार्मिक गतिविधियों को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के पहले संशोधन के तहत संरक्षित किया गया है, जो [[राज्य धर्म|धर्म की सरकारी स्थापना]] पर रोक लगाता है और धर्म की स्वतंत्रता, [[अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता|भाषण की स्वतंत्रता]], [[प्रेस की स्वतंत्रता]] और विधानसभा की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। हालांकि धार्मिक समूहों या कल्टों के किसी भी सदस्य को [[सरकारी वकील|आपराधिक मुकदमे]] से कोई विशेष छूट नहीं दी जाती है।<ref name="Ogloff92">
{{Cite journal|last=Ogloff|first=J. R.|last2=Pfeifer, J. E.|year=1992|title=Cults and the law: A discussion of the legality of alleged cult activities.|journal=Behavioral Sciences & the Law|volume=10|issue=1|pages=117–140|doi=10.1002/bsl.2370100111}}</ref> १९९० में ''यूनाइटेड स्टेट्स'' बनाम कोर्ट केस । ''फिशमैन'' (१९९०) ने मार्गरेट सिंगर और रिचर्ड ओफ्शे जैसे विशेषज्ञ गवाहों द्वारा विचारनियंत्रण सिद्धांतों के उपयोग को समाप्त कर दिया।<ref name=":4">''[https://law.justia.com/cases/federal/district-courts/FSupp/743/713/2593631/ United States v. Fishman]'', 743 [[Federal Supplement|F. Supp]]. 713 ([[United States District Court for the Northern District of California|N.D. Cal.]] 1990).</ref> मामले के फैसले में अदालत ने फ्राइ मानक का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि विशेषज्ञ गवाहों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वैज्ञानिक सिद्धांत को आम तौर पर उनके संबंधित क्षेत्रों में स्वीकार किया जाना चाहिए। अदालत ने एपीए टास्क फ़ोर्स द्वारा प्रकाशित सहायक दस्तावेज़ों का उपयोग करते हुए [[विचार-नियंत्रण|विचारनियंत्रण]] को विशेषज्ञ गवाहियों में अस्वीकार्य माना, जो अनुनय और नियंत्रण के भ्रामक और अप्रत्यक्ष तरीकों पर प्रकाशित किए गए थे, पिछले अदालती मामलों के साहित्य जिनमें विचारनियंत्रण सिद्धांतों का इस्तेमाल किया गया था, और विशेषज्ञ गवाहियाँ जो वितरित की गई थीं डिक एंथोनी जैसे विद्वानों द्वारा।<ref name=":4" /><ref>{{Cite journal|last=Introvigne|first=Massimo|year=2014|title=Advocacy, brainwashing theories, and new religious movements|journal=Religion|volume=44|issue=2|pages=303–319|doi=10.1080/0048721X.2014.888021}}</ref>
=== पश्चिमी यूरोप ===
फ़्रांस और बेल्जियम की सरकारों ने नीतिगत दृष्टिकोण अपनाए हैं जो "विचारनियंत्रण" सिद्धांतों को अनालोचनात्मक रूप से स्वीकार करते हैं, जबकि अन्य यूरोपीय देशों की सरकारें, जैसे कि स्वीडन और इटली, ब्रेनवॉश करने के संबंध में सतर्क हैं और परिणामस्वरूप, उन्होंने अधिक तटस्थता से प्रतिक्रिया दी है नए धर्मों के संबंध में।<ref>{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref> विद्वानों ने सुझाव दिया है कि बड़े पैमाने पर हत्या/आत्महत्याओं के बाद जो आक्रोश सौर मंदिर<ref name="refRichardsonIntrovigne">{{Harvnb|Richardson|Introvigne|2001}}</ref><ref name="Robbins2002">{{Cite journal|last=Robbins, Thomas|year=2002|title=Combating 'Cults' and 'Brainwashing' in the United States and Europe: A Comment on Richardson and Introvigne's Report|journal=Journal for the Scientific Study of Religion|volume=40|issue=2|pages=169–176|doi=10.1111/0021-8294.00047}}</ref> द्वारा जारी था, उसने यूरोपीय विरोधी कल्ट के साथ-साथ अधिक अव्यक्त [[अज्ञातव्यक्तिभीति|ज़ेनोफोबिक]] और अमेरिकी-विरोधी दृष्टिकोणों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है जो व्यापक हैं महाद्वीप।<ref name="Beckford1998">{{Cite journal|last=Beckford, James A.|year=1998|title='Cult' Controversies in Three European Countries|journal=Journal of Oriental Studies|volume=8|pages=174–184}}</ref> १९८० के दशक में फ्रांसीसी सरकार के पादरी और अधिकारियों ने चिंता व्यक्त की कि [[कैथोलिक गिरजाघर|रोमन कैथोलिक गिरजाघर]] के भीतर कुछ आदेश और अन्य समूह कल्ट विरोधी कानूनों से प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे, जिन पर तब विचार किया जा रहा था।<ref>{{Cite book|title=Regulating religion: case studies from around the globe|last=Richardson|first=James T.|publisher=Kluwer Acad. / Plenum Publ.|year=2004|isbn=0306478862|location=New York|author-link=James T. Richardson}}</ref>
== संदर्भ ==
=== व्याख्यात्मक विख्यात ===
<references group="lower-roman" responsive="1"></references>
=== उद्धरण ===
<references group="" responsive="1"></references>
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* [[Eileen Barker|Barker, E.]] (1989) ''New Religious Movements: A Practical Introduction'', London, HMSO
* Bromley, David et al.: ''Cults, Religion, and Violence'', 2002, {{ISBN|0521668980}}
* Enroth, Ronald. (1992) ''[[Churches that Abuse]]'', Zondervan, {{ISBN|0310532906}} [http://www.apologeticsindex.org/716-churches-that-abuse-online-book Full text online]
* Esquerre, Arnaud: ''La manipulation mentale. Sociologie des sectes en France'', Fayard, Paris, 2009.
* House, Wayne: ''Charts of Cults, Sects, and Religious Movements'', 2000, {{ISBN|0310385512}}
* Kramer, Joel and Alstad, Diane: ''The Guru Papers: Masks of Authoritarian Power'', 1993.
* Lalich, Janja: ''Bounded Choice: True Believers and Charismatic Cults'', 2004, {{ISBN|0520240189}}
* Landau Tobias, Madeleine et al. : ''Captive Hearts, Captive Minds'', 1994, {{ISBN|0897931440}}
* [[James R. Lewis (scholar)|Lewis, James R.]] ''Odd Gods: New Religions and the Cult Controversy'', [[Prometheus Books]], 2001
* Martin, Walter et al.: ''[[The Kingdom of the Cults]]'', 2003, {{ISBN|0764228218}}
* [[J. Gordon Melton|Melton, Gordon]]: ''Encyclopedic Handbook of Cults in America'', 1992 {{ISBN|0815311400}}
* Oakes, Len: ''Prophetic Charisma: The Psychology of Revolutionary Religious Personalities'', 1997, {{ISBN|0815603983}}
* [[Margaret Singer|Singer, Margaret Thaler]]: ''Cults in Our Midst: The Continuing Fight Against Their Hidden Menace'', 1992, {{ISBN|0787967416}}
* Tourish, Dennis: '''On the Edge: Political Cults Right and Left'', 2000, {{ISBN|0765606399}}
* Zablocki, Benjamin et al.: ''Misunderstanding Cults: Searching for Objectivity in a Controversial Field'', 2001, {{ISBN|0802081886}}
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=== सामान्य और उद्धृत स्रोत ===
* {{Cite book|title=Bearing False Witness? An Introduction to the Christian Countercult|url=https://archive.org/details/bearingfalsewitn0000cowa|last=Cowan|first=Douglas E.|publisher=[[Praeger Paperback|Praeger]]|year=2003|isbn=978-0275974596|location=Westport, CT|author-link=Douglas E. Cowan}}
* {{Cite book|title=Cults in Context: Readings in the Study of New Religious Movements|last=Dawson|first=Lorne L.|publisher=[[Transaction Publishers]]|year=1998|isbn=0765804786|author-link=Lorne L. Dawson}}
* {{Cite book|title=The Oxford Handbook of New Religious Movements|url=https://archive.org/details/oxfordhandbookof0000unse_m1q8|last=Lewis|first=James R.|publisher=[[Oxford University Press]]|year=2004|isbn=0195149866|location=US|author-link=James R. Lewis (scholar)}}
* {{Cite journal|last=Richardson|first=James T.|author-link=James T. Richardson|year=1993|title=Definitions of Cult: From Sociological-Technical to Popular-Negative.|url=https://archive.org/details/sim_review-of-religious-research_1993-06_34_4/page/348|journal=[[Review of Religious Research]]|volume=34|pages=348–356|doi=10.2307/3511972|jstor=3511972}}
* {{Cite journal|last=Richardson|first=James T.|last2=Introvigne|first2=Massimo|author-link2=Massimo Introvigne|year=2001|title='Brainwashing' Theories in European Parliamentary and Administrative Reports on 'Cults' and 'Sects'.|url=https://archive.org/details/sim_journal-for-the-scientific-study-of-religion_2001-06_40_2/page/143|journal=[[Journal for the Scientific Study of Religion]]|volume=40|pages=143–168|doi=10.1111/0021-8294.00046}}
* {{Cite book|title=The Future of Religion: Secularization, Revival and Cult Formation|last=Stark|first=Rodney|last2=Bainbridge|first2=William Sims|publisher=University of California Press|year=1987|isbn=978-0520057319|location=Berkeley|author-link=Rodney Stark|author-link2=William Sims Bainbridge}}
* {{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=xi9j4vCOtPQC|title=A Theory of Religion|last=Stark|first=Rodney|last2=Bainbridge|first2=William Sims|publisher=[[Peter Lang Publishing]]|year=1996|isbn=0813523303|author-mask=1|author-mask2=1|author-link=Rodney Stark|author-link2=William Sims Bainbridge}}
== अग्रिम पठन ==
=== पुस्तकें ===
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* [[Eileen Barker|Barker, E.]] (1989) ''New Religious Movements: A Practical Introduction'', London, HMSO
* Bromley, David et al.: ''Cults, Religion, and Violence'', 2002, {{ISBN|0521668980}}
* Enroth, Ronald. (1992) ''[[Churches that Abuse]]'', Zondervan, {{ISBN|0310532906}} [http://www.apologeticsindex.org/716-churches-that-abuse-online-book Full text online]
* Esquerre, Arnaud: ''La manipulation mentale. Sociologie des sectes en France'', Fayard, Paris, 2009.
* House, Wayne: ''Charts of Cults, Sects, and Religious Movements'', 2000, {{ISBN|0310385512}}
* Kramer, Joel and Alstad, Diane: ''The Guru Papers: Masks of Authoritarian Power'', 1993.
* Lalich, Janja: ''Bounded Choice: True Believers and Charismatic Cults'', 2004, {{ISBN|0520240189}}
* Landau Tobias, Madeleine et al. : ''Captive Hearts, Captive Minds'', 1994, {{ISBN|0897931440}}
* [[James R. Lewis (scholar)|Lewis, James R.]] ''Odd Gods: New Religions and the Cult Controversy'', [[Prometheus Books]], 2001
* Martin, Walter et al.: ''[[The Kingdom of the Cults]]'', 2003, {{ISBN|0764228218}}
* [[J. Gordon Melton|Melton, Gordon]]: ''Encyclopedic Handbook of Cults in America'', 1992 {{ISBN|0815311400}}
* Oakes, Len: ''Prophetic Charisma: The Psychology of Revolutionary Religious Personalities'', 1997, {{ISBN|0815603983}}
* [[Margaret Singer|Singer, Margaret Thaler]]: ''Cults in Our Midst: The Continuing Fight Against Their Hidden Menace'', 1992, {{ISBN|0787967416}}
* Tourish, Dennis: '''On the Edge: Political Cults Right and Left'', 2000, {{ISBN|0765606399}}
* Zablocki, Benjamin et al.: ''Misunderstanding Cults: Searching for Objectivity in a Controversial Field'', 2001, {{ISBN|0802081886}}
{{refend}}
=== सामग्री ===
{{refbegin}}
* Aronoff, Jodi; Lynn, Steven Jay; Malinosky, Peter. ''Are cultic environments psychologically harmful?'', ''Clinical Psychology Review'', 2000, Vol. 20 No. 1 pp. 91–111
* Langone, Michael: Cults: [https://web.archive.org/web/20040514055256/http://www.csj.org/infoserv_articles/langone_michael_cultsqa.htm Questions and Answers]
* [[Robert Jay Lifton|Lifton, Robert Jay]]: [https://web.archive.org/web/20040624204743/http://csj.org/infoserv_articles/lifton_robert.htm "Cult Formation"], ''The Harvard Mental Health Letter'', February 1991
* Robbins, T. and D. Anthony, 1982. "Deprogramming, brainwashing and the medicalization of deviant religious groups" ''Social Problems'' '''29''' pp. 283–297.
* Rosedale, Herbert et al.: [https://web.archive.org/web/20040514072433/http://www.csj.org/infoserv_articles/langone_michael_term_cult.htm "On Using the Term 'Cult{{'"}}]
* Van Hoey, Sara: [https://web.archive.org/web/20041216002202/http://www.csj.org/infoserv_articles/van_hoey_sara_cults_in_court.htm "Cults in Court"]. ''The Los Angeles Lawyer'', February 1991
* [[Philip Zimbardo|Zimbardo, Philip]]: [https://web.archive.org/web/20041118073343/http://www.csj.org/infoserv_articles/zimbardo_philip_messeges.htm "What messages are behind today's cults?"], ''American Psychological Association Monitor'', May 1997
{{refend}}
== बाहरी संबंध ==
* {{Wiktionary inline}}
* {{Wikiquote-inline|Cult}}
{{New Religious Movements}}{{Opposition_to_NRMs}}
[[श्रेणी:ह्रासकारी]]
[[श्रेणी:चीनी भाषा पाठ वाले लेख]]
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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कलियाबोर कॉलेज
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{{Infobox university
| name = '''कलियाबोर कॉलेज'''
| native_name = ''Kaliabor College''
| image_name = The logo of kaliabor college. jpg.jpg|thumb|कलियाबोर कालेज का प्रतीक चिह्न
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| caption = '''कलियाबोर कालेज का प्रतीक चिह्न'''
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| motto = ''knowledge with values''
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| president = बीरेन चंद्र फुकन
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| principal = डॉ उत्तम कुमार बरुवा
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}}
'''कलियाबोर कॉलेज''' ''([[अंग्रेजी]]:Kaliabor College) ([[असमिया]]:কলিয়াবৰ মহাবিদ্যালয়)'' [[असम]] के [[नगाँव]] जिले में स्थित एक प्रसिद्ध [[सह-शिक्षा]] [[महाविद्यालय]] है।<ref>{{cite web|url=https://www.targetadmission.com/colleges/5051-kaliabor-college-nagaon|title=Kaliabor College, Nagaon - Courses, Fees, Placement, Review, Admission, Result 2023|publisher=Target Admission|accessdate=2023-05-25}}{{Dead link|date=नवंबर 2024 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> 1969 में स्थापित, इस कॉलेज का [[गुवाहाटी विश्वविद्यालय]] से संबद्ध है और [[राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद]] (NAAC) द्वारा A ग्रेड की मान्यता प्राप्त है। यह व्यावसायिक और दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों के साथ-साथ विभिन्न विषयों में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की एक श्रृंखला प्रदान करता है। कॉलेज अपनी अकादमिक उत्कृष्टता, अत्याधुनिक सुविधाओं और समर्पित संकाय के लिए जाना जाता है।<ref name="official">{{cite web|url=http://www.kaliaborcollege.org/|title=Official Website of Kaliabor College|publisher=Kaliabor College|accessdate=2023-05-25|archive-date=13 अक्तूबर 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20231013214727/http://www.kaliaborcollege.org/|url-status=dead}}</ref>
== इतिहास और अवलोकन ==
कलियाबोर कॉलेज की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी और तब से यह [[नगाँव]] जिले में एक प्रमुख शैक्षणिक संस्थान बन गया है। कॉलेज को राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (NAAC) द्वारा A ग्रेड की मान्यता प्राप्त है। इसका [[गौहाटी विश्वविद्यालय]] से संबद्ध है और [[विज्ञान]], [[कला]], [[वाणिज्य]] के साथ-साथ [[व्यावसायिक पाठ्यक्रम]], [[व्यवसाय प्रशासन]] और [[कंप्यूटर अनुप्रयोग]] में डिग्री पाठ्यक्रम प्रदान करता है। कॉलेज वरिष्ठ [[उच्चतर माध्यमिक शिक्षा]] भी प्रदान करता है।<ref>{{cite web|url=https://collegedunia.com/college/2294-kaliabor-college-nagaon/admission|title=Kaliabor College Admission|publisher=CollegeDunia|accessdate=2023-05-25}}</ref>
कलियाबोर कॉलेज का परिसर 15 एकड़ में फैला है और अपने छात्रों को एक [[छात्रावास]], [[पुस्तकालय]], [[कैंटीन]], [[खेल परिसर]], और बहुत कुछ सहित विभिन्न सुविधाएं प्रदान करता है। कॉलेज का उद्देश्य अपने छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समग्र विकास के अवसर प्रदान करना है।
== पाठ्यक्रम और विशेषज्ञता ==
कलियाबोर कॉलेज अल्पकालिक और दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों के साथ-साथ स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की एक विविध श्रेणी प्रदान करता है।<ref>{{cite web|url=https://collegedunia.com/college/2294-kaliabor-college-nagaon|title=Kaliabor College - Courses, Fees, Admission, Ranking, Review, Placements, and More|publisher=CollegeDunia|accessdate=2023-05-25}}</ref> कॉलेज द्वारा प्रदान किए जाने वाले पाठ्यक्रमों में शामिल हैं:
* [[अंग्रेजी]], [[असमिया]], [[राजनीति विज्ञान]] और अन्य में [[कला स्नातक]] (बीए)।
* [[भौतिकी]], [[जूलॉजी]], [[बायोटेक्नोलॉजी]], और बहुत कुछ में [[बैचलर ऑफ साइंस]] (बीएससी)।
* [[बैचलर ऑफ कॉमर्स]] (बी.कॉम) [[अकाउंटेंसी]], [[मैनेजमेंट स्टडीज]], और बहुत कुछ।
* [[कंप्यूटर एप्लीकेशन]] में [[बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन]] (बीसीए)।
* [[बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन]] में [[बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन]] (बीबीए)।
* [[शिक्षा]] में [[मास्टर ऑफ आर्ट्स]] (एम.ए.)
* [[लेखा]] और [[वित्त]], [[मानव संसाधन]] और [[विपणन]] में [[मास्टर ऑफ कॉमर्स]] (एम.कॉम)।
* [[लघु चाय बागान प्रबंधन]], [[आतिथ्य और पर्यटन]], और अन्य में [[व्यावसायिक अध्ययन स्नातक]] (बी.वोक)।
प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिए योग्यता मानदंड भिन्न हो सकते हैं, और चयन प्रक्रिया पिछली योग्यता परीक्षा में योग्यता पर आधारित है। स्नातक पाठ्यक्रमों की अवधि तीन वर्ष है, जबकि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की अवधि दो वर्ष है।
== शिक्षाविद ==
कलियाबोर कॉलेज [[विज्ञान]], [[कला]], [[वाणिज्य]] और व्यावसायिक धाराओं में कई तरह के पाठ्यक्रम प्रदान करता है। स्नातक पाठ्यक्रमों में बीए, बीएससी, बीकॉम, बी वोक, बीबीए और बीसीए शामिल हैं, जबकि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में एमए और एमकॉम शामिल हैं। प्रवेश के लिए चयन पिछली योग्यता परीक्षा की योग्यता के आधार पर होता है। चयनित उम्मीदवारों के लिए भौतिक परामर्श सत्र के साथ कॉलेज एक ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया का पालन करता है।<ref>{{cite web|url=https://www.indiastudychannel.com/colleges/54765-kaliabor-college-koliabor|title=Kaliabor College, Koliabor - Admissions, Contact, Website, Facilities 2023-2024|publisher=IndiaStudyChannel|accessdate=2023-05-25}}</ref>
== सुविधाएं ==
कलियाबोर कॉलेज अपने छात्रों के समग्र विकास का समर्थन करने के लिए उत्कृष्ट सुविधाएं प्रदान करता है।<ref>{{cite web|url=https://www.careers360.com/colleges/kaliabor-college-nagaon|title=Kaliabor College, Nagaon - Courses, Fees, Reviews, Admissions, 2023-2024|publisher=Careers360|accessdate=2023-05-25}}</ref> परिसर 15 एकड़ में फैला है और इसमें सुविधाएं शामिल हैं जैसे:
* [[छात्रावास]]: कॉलेज आरामदायक आवास के साथ लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग छात्रावास प्रदान करता है।
* [[पुस्तकालय]]: कॉलेज के पुस्तकालय में पुस्तकों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का विशाल संग्रह है। यह बुक बैंक सुविधाएं और मुफ्त इंटरनेट सेवाएं भी प्रदान करता है।
* [[कंप्यूटर सेल]]: छात्रों की तकनीकी जरूरतों को पूरा करने के लिए कॉलेज में एक सुसज्जित कंप्यूटर सेल है।
* [[कैंटीन]]: कैंटीन छात्रों के लिए विभिन्न प्रकार के किफायती और स्वच्छ भोजन विकल्प प्रदान करती है।
* [[सांस्कृतिक संग्रहालय]]: कॉलेज में एक सांस्कृतिक संग्रहालय है जो छात्रों के ज्ञान और इतिहास और संस्कृति की समझ को बढ़ाने के लिए कलाकृतियों को प्रदर्शित करता है।
* [[व्यायामशाला]]: छात्रों को शारीरिक फिटनेस गतिविधियों में संलग्न करने के लिए परिसर में एक अच्छी तरह से सुसज्जित व्यायामशाला उपलब्ध है।
* [[प्रयोगशाला]]एँ: कॉलेज में वैज्ञानिक प्रयोगों और अनुसंधान के लिए कई प्रयोगशालाएँ हैं। इसमें एक समर्पित भाषा प्रयोगशाला भी है।
* [[सभागार]]: कार्यशालाओं, संगोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन के लिए परिसर में एक वातानुकूलित सभागार मौजूद है।
== प्लेसमेंट ==
कलियाबोर कॉलेज में एक समर्पित प्लेसमेंट सेल है जो छात्रों को नौकरी के अवसर तलाशने में सहायता करता है। प्लेसमेंट सेल आवेदन पत्र भरने, साक्षात्कार की तैयारी करने और संभावित नियोक्ताओं के साथ छात्रों को जोड़ने पर मार्गदर्शन प्रदान करता है। कॉलेज विभिन्न उद्योगों में प्लेसमेंट के अवसरों के बारे में छात्रों की समझ बढ़ाने के लिए सेमिनार भी आयोजित करता है।<ref>{{cite web|url=https://www.shiksha.com/college/kaliabor-college-nagaon-72573|title=Kaliabor College, Nagaon - Courses, Fees, Reviews, Admissions 2023-2024|publisher=Shiksha|accessdate=2023-05-25|archive-date=25 मार्च 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230325111604/https://www.shiksha.com/college/kaliabor-college-nagaon-72573|url-status=dead}}</ref>
== प्रवेश प्रक्रिया ==
कलियाबोर कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन आयोजित की जाती है। योग्य उम्मीदवारों का चयन पिछली योग्यता परीक्षा में उनकी योग्यता के आधार पर किया जाता है। कॉलेज सरकारी नियमों के अनुसार आरक्षण नियमों का पालन करता है। इच्छुक आवेदक कलियाबोर कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट पर पंजीकरण करके और आवश्यक विवरण के साथ आवेदन पत्र भरकर और आवश्यक दस्तावेजों को संलग्न करके आवेदन कर सकते हैं। आवेदन शुल्क के रूप में 200 रुपये का भुगतान करना होगा। शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को काउंसलिंग के लिए बुलाया जाएगा, जहां उन्हें संबंधित दस्तावेजों के साथ कॉलेज जाना होगा।<ref>{{cite web|url=https://www.getmyuni.com/college/kaliabor-college-nagaon|title=Kaliabor College, Nagaon - Courses, Fees, Reviews, Admission, Placements 2023|publisher=Getmyuni|accessdate=2023-05-25}}</ref>
== छात्रवृत्ति ==
कलियाबोर कॉलेज योग्य छात्रों को [[छात्रवृत्ति]], [[पुरस्कार]] और [[सम्मान]] प्रदान करता है।<ref>{{cite web|url=https://www.collegebatch.com/college/kaliabor-college-nagaon|title=Kaliabor College, Nagaon - Courses, Fees, Review, Admission, Result, Contact Details 2023-2024|publisher=CollegeBatch|accessdate=2023-05-25}}{{Dead link|date=जून 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> कॉलेज द्वारा प्रदान की जाने वाली कुछ स्कॉलरशिप में शामिल हैं:
* नि: शुल्क छात्रवृति पुरस्कार: परीक्षा में कुल 60% अंक प्राप्त करने वाले प्रत्येक स्ट्रीम के टॉपर्स को पुरस्कृत किया जाता है।
* नकद पुरस्कार: शीर्ष दस छात्रों को INR 5000 का नकद पुरस्कार दिया जाता है।
*वित्तीय सहायता: आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
* योग्यता छात्रवृत्ति: योग्यता और वित्तीय स्थिति के आधार पर पांच छात्रों को INR 5000 की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।
* स्वर्गीय खगेश्वर हजारिका स्मृति छात्रवृत्ति: यह छात्रवृत्ति योग्यता और वित्तीय स्थिति के आधार पर प्रदान की जाती है।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://www.kaliaborcollege.org/
कलियाबोर कालेज का जालस्थल] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20231013214727/http://www.kaliaborcollege.org/ |date=13 अक्तूबर 2023 }}
[[श्रेणी:नगाँव]]
[[श्रेणी:असम में विश्वविद्यालय और कॉलेज]]
[[श्रेणी:कॉलेज]]
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किरण अब्बावरम
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text/x-wiki
{{Infobox person
| name = किरण अब्बावरम
| image = Kiran Abbavaram.png
| image_caption = 2022 में अब्बावरम
| birth_date = {{Birth date and age|1992|7|15|df=yes}}
| birth_place = [[रायचोटी]], [[आंध्र प्रदेश]], [[भारत]]
| occupation = {{Hlist|फ़िल्म अभिनेता|पटकथा लेखक}}
| years_active = 2019–वर्तमान
| education = [[बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी|बी. टेक]]
}}
किरण अब्बावरम (जन्म 15 जुलाई 1992) एक भारतीय अभिनेता हैं जो [[तेलुगू भाषा|तेलुगु]] फिल्मों में काम करते हैं। उन्होंने 2019 में एक प्रेम कहानी राजा वारु रानी गारू के साथ अपनी शुरुआत की, और फिल्म एसआर कल्याणमंडपम (2021) में लिखा और अभिनय किया।
== प्रारंभिक जीवन ==
किरण अब्बावरम का जन्म 15 जुलाई 1992 <ref>{{Cite web|url=https://english.sakshi.com/news/tollywood/kiran-abbavarams-sammatame-first-look-out-139019|title=Kiran Abbavaram’s Sammatame First Look Out|date=15 July 2021|website=[[साक्षी (मीडिया समूह)|साक्षी पोस्ट]]|access-date=10 जून 2023|archive-date=4 अक्तूबर 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20231004091848/https://english.sakshi.com/news/tollywood/kiran-abbavarams-sammatame-first-look-out-139019|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.newindianexpress.com/entertainment/telugu/2022/jun/22/if-we-do-more-work-it-provides-employment-to-many-people-sammathame-starkiran-abbavaram-2468195.html|title=If we do more work, it provides employment to many people: 'Sammathame' star Kiran Abbavaram|date=22 June 2022|website=[[द न्यू इंडियन एक्सप्रेस]]|quote=The 29-year-old actor}}</ref> को [[रायचोटी, कडपा|रायचोटी]], [[आन्ध्र प्रदेश|आंध्र प्रदेश]] में हुआ था। <ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/belief-passion-ideology-and-hard-work-is-all-you-need-kiran-abbavaram/articleshow/77014462.cms|title=Belief, passion, ideology and hard work is all you need: Kiran Abbavaram|date=17 July 2020|website=The Times of India}}</ref> वह बीटेक स्नातक हैं और [[चेन्नई]] और [[बंगलौर|बैंगलोर]] में ढाई साल तक नेटवर्क सलाहकार के रूप में काम किया। उन्होंने काम करते हुए लघु फिल्में करना शुरू कर दिया और बाद में फिल्मों में पूर्णकालिक करियर बनाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। उनकी एक लघु फिल्म, श्रीकरम को 2021 में इसी नाम से एक फीचर फिल्म में रीमेक किया गया था। <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/entertainment/movies/kiran-abbavaram-makes-a-debut-in-a-feature-film/article28835606.ece|title=Kiran Abbavaram's short cut to fame|last=Chowdhary|first=Y. Sunita|date=6 August 2019|work=The Hindu|access-date=21 August 2021|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref>
== करियर ==
किरण अब्बावरम ने राजा वारु रानी गारू (2019) के साथ अपनी शुरुआत की। द हिंदू की संगीता देवी ने अपनी समीक्षा में कहा, "अब्बावरम दिखाता है कि वह अब केवल यूट्यूब या एक लघु फिल्म सनसनी नहीं हैं - उनके पास अच्छी कहानियों और फिल्मों का हिस्सा बनने का लुक और वादा है। उन्हें अपनी दूसरी फिल्म एसआर कल्याणमंडपम के साथ अधिक पहचान और प्रशंसा मिली, जिसे उन्होंने लिखा भी था। <ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/sr-kalyana-mandapam-leaked-online-kiran-abbavaram-requests-movie-buffs-to-not-encourage-piracy/articleshow/85127322.cms|title=SR Kalyana Mandapam leaked online: Kiran Abbavaram requests movie buffs do not encourage piracy – Times of India|website=The Times of India}}</ref> फिल्म को समीक्षकों से सकारात्मक समीक्षा मिली और यह बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। <ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/sr-kalyanamandapam-twitter-review-heres-how-netizens-are-praising-kiran-abbavaram-and-sai-kumars-performance-in-the-film/articleshow/85092715.cms|title='SR Kalyanamandapam' Twitter review: Here's how netizens are praising Kiran Abbavaram and Sai Kumar's performance in the film – Times of India|website=The Times of India}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://english.sakshi.com/news/tollywood/sr-kalyanamandapam-gets-official-ott-release-date-141158|title=SR Kalyanamandapam Gets Official OTT Release Date|date=17 August 2021|website=Sakshi Post|access-date=10 जून 2023|archive-date=6 फ़रवरी 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230206090737/https://english.sakshi.com/news/tollywood/sr-kalyanamandapam-gets-official-ott-release-date-141158|url-status=dead}}</ref>
2022 में, अब्बावरम की दो रिलीज़ हुईं- ''सेबस्टियन पीसी 524'' और ''सम्माथम'' । <ref name="auto">{{Cite web|url=https://telanganatoday.com/kiran-abbavarams-look-from-sebastian-p-c-524-garners-huge-response|title=Kiran Abbavaram's look from 'Sebastian P.C. 524' garners huge response|date=15 July 2021|website=Telangana Today}}</ref> <ref name="sm">{{Cite web|url=https://telanganatoday.com/poster-of-kiran-abbavarams-next-film-sammathame-out|title=Poster of Kiran Abbavaram's next film, 'Sammathame', out|date=16 July 2021|website=Telangana Today}}</ref> ''[[द न्यू इंडियन एक्सप्रेस]]'' के मुरली कृष्णा सीएच ने ''सेबस्टियन को'' आधा-अधूरा नाटक कहा, लेकिन अब्बावरम का प्रदर्शन इसकी सबसे बड़ी ताकत थी। <ref>{{Cite web|url=https://www.newindianexpress.com/entertainment/review/2022/mar/05/a-half-hearted-crime-drama-2426461|title=A half-hearted crime drama|website=[[द न्यू इंडियन एक्सप्रेस]]|access-date=5 March 2022}}{{Dead link|date=जून 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
== फिल्मोग्राफी ==
{| class="wikitable"
|+
!वर्ष
! पतली परत
! भूमिका
! टिप्पणियाँ
! संदर्भ।
|-
| 2019
| ''राजा वरु रानी गारू''
| राजा
| नामांकित- सर्वश्रेष्ठ पुरुष पदार्पण के लिए SIIMA अवार्ड - तेलुगु
|
|-
| 2021
| ''एसआर कल्याणमंडपम''
| कल्याण
| लेखक भी
| <ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/entertainment/reviews/sr-kalyana-mandapam-review-this-kiran-abbavaram-film-is-an-ordeal/article35763171.ece|title='SR Kalyanamandapam' movie review: It's an ordeal|last=Dundoo|first=Sangeetha Devi|date=6 August 2021|work=The Hindu|via=www.thehindu.com}}</ref>
|-
| rowspan="3" | 2022
| ''सेबस्टियन पीसी 524''
| सेबस्टियन "सेबा"
|
| <ref>{{Cite web|url=https://www.cinejosh.com/news/3/93435/2023-is-a-golden-year-for-kiran-abbavaram.html|title=2023 is a golden year for Kiran Abbavaram.|last=P|first=Ram|date=2022-11-24|website=cinejosh.com|language=english|access-date=2023-05-07}}</ref>
|-
| ''सम्मथामे''
| कृष्णा
|
|
|-
| ''नेनु मीकु बागा कवलसिनवादिनी''
| विवेक/पवन
| लेखक भी
| <ref>{{Cite web|url=https://telugu.asianetnews.com/entertainment/kiran-abbavaram-upcoming-film-title-poster-released--r7r0rr|title=Kiran Abbavaram Upcoming film : క్రేజీ ప్రాజెక్ట్ తో కిరణ్ అబ్బవరం.. ఫస్ట్ లుక్ పోస్టర్ రిలీజ్..|date=23 February 2022|website=asianet news Telugu}}</ref>
|-
| rowspan="3" | 2023
| ''विनरो भाग्यमु विष्णु कथा''
| विष्णु
|
| <ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/photos-kiran-abbavaras-vinaro-bhagyamu-vishnu-katha-launched-with-formal-pooja/articleshow/88771377.cms|title=PHOTOS: Kiran Abbavara's 'Vinaro Bhagyamu Vishnu Katha' launched with formal pooja|date=2022-01-08|website=The Times of India|access-date=}}</ref>
|-
| मीटर
| अर्जुन कल्याण
|
| <ref>{{Cite web|url=http://idlebrain.com/news/today/meter-firstlook.html|title=Kiran A's Meter FL|date=2022-07-15|website=idlebrain.com|access-date=}}</ref>
|-
|नियम रंजन
| मनो रंजन
| फिल्माने
| <ref>{{Cite web|url=https://telugu.samayam.com/telugu-movies/cinema-news/actor-kiran-abbavaram-new-movie-rules-ranjan-film-launched-with-pooja-ceremony-today-in-hyderabad/articleshow/91840629.cms|title=Kiran Abbavaram 'రూల్స్ రంజన్' షూటింగ్ షురూ.. క్లాప్ కొట్టిన డైరెక్టర్ క్రిష్|website=Samayam Telugu}}</ref>
|-
|2025
| दिलरुबा
|सिद्धार्थ रेड्डी
|
| <ref>https://yajivker.in/dilruba-box-office-collection/{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
|}
== लघु फिल्म ==
{| class="wikitable"
|+
!वर्ष
! पतली परत
! भूमिका
! उपलब्धता
! टिप्पणियाँ
! संदर्भ।
|-
| rowspan="2" | 2015
| गाचीबोवली
| अनिर्वेश
| rowspan="3" | यूट्यूब
|
|
|-
| मल्ली मोडालैन्दी अला
| प्रख्यात
| rowspan="2" | लेखक और निर्देशक भी
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| rowspan="3" | 2016
| वानर संयम
| हर्ष
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| श्रीकारम
| कार्तिक
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| श्रीकरम नाम से एक फीचर फिल्म बनाई गई।
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| ऊ मनसा रा इला
| श्रीनु
| rowspan="7" | यूट्यूब
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| rowspan="3" | 2017
| 1991
| राजू
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| अर्जुन फाल्गुन
| अर्जुन
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| अंधारू अंधगथेले
| किरण
| समथमे के समान निर्देशक
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| rowspan="3" | 2019
| अस्वीकृति का डर
| वह स्वयं
| rowspan="3" | राजा वरू रानी गारू फिल्म के प्रमोशन में
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| स्कूल में लड़के
| राजा
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| स्कूल में लड़कियां
| राजा
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|}
== संदर्भ ==
{{Reflist|2}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{इंस्टाग्राम|kiran_abbavaram}}
* {{IMDb name|10954569}}
* {{ट्विटर|Kiran_Abbavaram}}
[[श्रेणी:1992 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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कल्याण सिंह सोलंकी
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{{stub|इस लेख में कृपया संदर्भ जोड़ने में मदद करें}}
{{infobox officeholder
|office= पूर्व सांसद - [[आंवला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र| आंवला]], [[उत्तर प्रदेश]]
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'''कल्याण सिंह सोलंकी''' (जन्म: जुलाई 1944), एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं, इन्होंने 8वीं लोकसभा में [[उत्तर प्रदेश]] के [[आंवला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|आंवला]] लोकसभा का [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] के प्रत्याशी के रूप में प्रतिनिधित्व किया था। <ref>[https://www.datais.info/loksabha/members/Solanki+%2C+Shri+Kalyan+Singh/1ddcc8859976c607315e2c391c93a6b2/ Loksabha members : Solanki , Shri Kalyan Singh - Data is Info]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref>
इन्होंने 1984 के भारतीय आम चुनाव में [[जनता पार्टी]] के प्रत्याशी [[जयपाल सिंह कश्यप]] को हराकर जीत हासिल की। लोकसभा में सांसद होने से पूर्व इन्होंने 1965-1971 तक [[फरीदपुर]] से [[ब्लॉक प्रमुख]] के रूप में कार्य किया था।
==इन्हें भी देखें==
* [[आंवला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र]]
* [[भारतीय आम चुनाव]]
==सन्दर्भ==
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सदस्य:Adarsh Rajput Ji/प्रयोगपृष्ठ
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== Adarsh Rajput ==
'''Adarsh Rajput''' एक भारतीय संगीत कलाकार (Artist) और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं, जो हिंदी और भावनात्मक (romantic/sad) गीतों के लिए जाने जाते हैं। उनका गीत ''Tujh Sang Preet Lagai Sajna'' डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया।
== करियर ==
Adarsh Rajput ने स्वतंत्र कलाकार के रूप में अपना संगीत करियर शुरू किया। उन्होंने अपना पहला प्रमुख गीत ''Tujh Sang Preet Lagai Sajna'' रिलीज किया, जिसे YouTube और अन्य म्यूजिक प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित किया गया। उनके गीतों में भावनात्मक और लो-फाई शैली का प्रभाव देखा जाता है।
== डिस्कोग्राफी ==
=== सिंगल ===
* ''Tujh Sang Preet Lagai Sajna''
== शैली ==
Adarsh Rajput मुख्य रूप से हिंदी रोमांटिक, सैड और लो-फाई शैली के गीतों पर काम करते हैं।
== बाहरी लिंक ==
* YouTube चैनल (http://www.youtube.com/@adarsh_rajput_8400)
* Spotify कलाकार प्रोफ़ाइल (https://open.spotify.com/artist/79TkAuQO8c7ShGKEdqIJ0r?si=75R_oS6ISseK76JK5aH8iQ)
== संदर्भ ==
(यहाँ विश्वसनीय स्रोत जोड़े जाने आवश्यक हैं जैसे म्यूजिक प्लेटफॉर्म लिंक, न्यूज़ वेबसाइट आदि)
[[आदर्श राजपूत]] उर्फ शेखर का जन्म सौरंगपुर गांव, (जनपद हरदोई) (उत्तरप्रदेश) में [[27 सितंबर, 2006]] को हुआ थाप। इनके पिता का नाम [[अरविंद राजपूत]] एवं माता का नाम [[उमा देवी]] है। इनके पिता एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक थे। वे एक नेक और ईमानदार स्वभाव के हैं। बाद में इन्होंने स्कूल का माहौल अच्छा नहीं देखा तो स्कूल छोड़ दिया। इनकी माता भी स्वामित्व, नेक एक ग्रहणी हैं। आदर्श राजपूत बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के हैं। इन्हें स्कूल में कई बार सम्मानित किया गया। हाईस्कूल की परीक्षा में ये प्रथम श्रेणी में पास हुए। हाईस्कूल में इन्होंने 84.67% अंक प्राप्त किए। इंटरमीडिएट में ये स्कूल में पढ़ाई न होने से 74.33% ही अंक प्राप्त कर पाए। <ref>{{Cite web|url=https://m.instagram.com/adarsh_rajput_8400/|title=Instagram|last=Rajput|first=Adarsh|date=17/08/2025}}</ref>
==सन्दर्भ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय अभिनेता]]
[[श्रेणी:तेलुगू अभिनेता]]
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किरण सी पटेल
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{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=किरण सी पटेल|image=Kiran Patel And Pallavi Patel.jpg|caption=यूरो पीसीआर 2019 में किरण पटेल और उनकी पत्नी पल्लवी पटेल|birth_place=[[जाम्बिया]]|birth_date={{birth year and age|1949}}|citizenship=अमेरिकन|other_names=डॉक्टर के.|occupation=हृदय रोग विशेषज्ञ, व्यवसायी|spouse=पल्लवी पटेल|children=3}}'''किरण सी. पटेल''' (जन्म 1949) एक [[ज़ाम्बिया|जाम्बियन]] [[भारतीय-अमेरिकी|भारतीय अमेरिकी]] परोपकारी, उद्यमी, [[होटल प्रबंधक|होटल व्यवसायी]] और [[हृदयशास्त्र|हृदय रोग विशेषज्ञ]] हैं। <ref name="auto">{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2020/01/06/dr-kiran-patel-adds-to-hospitality-portfolio-with.html|title=Dr. Kiran Patel adds to hospitality portfolio with 650-acre resort on Florida's east coast|last=Choudhary|first=Arjun|date=6 Jan 2020|website=|via=bbc.com|archive-url=|archive-date=|access-date=}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
पटेल का जन्म 1949 में [[ज़ाम्बिया|जाम्बिया]] में एक [[हिन्दू|हिंदू]] [[गुजराती लोग|गुजराती]] [[भारतीय परिवार]] में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा जाम्बिया में ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के तहत प्राप्त की और [[कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय]] और [[लंदन विश्वविद्यालय]] से डिप्लोमा हासिल किया। पटेल ने भारत में [[गुजरात विश्वविद्यालय]] <ref name="auto2">{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2020/01/06/dr-kiran-patel-adds-to-hospitality-portfolio-with.html|title=Dr. Kiran Patel adds to hospitality portfolio with 650-acre resort on Florida's east coast|last=Choudhary|first=Arjun|date=6 Jan 2020|website=|via=bbc.com|archive-url=|archive-date=|access-date=}}</ref> में मेडिकल स्कूल में भाग लिया और अफ्रीका में अपनी इंटर्नशिप पूरी की। 1976 में वह संयुक्त राज्य अमेरिका चले गये। पटेल ने 1980 में न्यू जर्सी में आंतरिक चिकित्सा में रेजीडेंसी की, और 1982 में न्यूयॉर्क के [[कोलंबिया विश्वविद्यालय]] से संबद्ध कार्डियोलॉजी कार्यक्रम में फेलोशिप पूरी की।
== चिकित्सा बीमा कंपनी ==
1992 में, पटेल ने ''वेल केयर एचएमओ, इंक''. (''वेल केयर'') को लगभग 5 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। उन्होंने एक दशक बाद 2002 में कंपनी को 200 मिलियन डॉलर में बेच दिया। <ref name="medical">{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2017/10/25/why-kiran-patel-is-selling-his-health-insurance.html|title=Why Kiran Patel is selling his health insurance companies to Anthem|website=www.bizjournals.com|access-date=16 April 2020}}</ref>
2007 में उन्होंने ''फ्रीडम हेल्थ'' और ''ऑप्टिमम हेल्थकेयर इंक'' को खरीद लिया।
2017 में, उन्होंने अपनी दूसरी बीमा कंपनी - ''अमेरिकाज फर्स्ट चॉइस'' (''फ्रीडम हेल्थ'' और ''ऑप्टिमम हेल्थकेयर'' सहित) को अज्ञात राशि में ''एंथम इंक'' को बेच दिया। <ref name="medical2">{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2017/10/25/why-kiran-patel-is-selling-his-health-insurance.html|title=Why Kiran Patel is selling his health insurance companies to Anthem|website=www.bizjournals.com|access-date=16 April 2020}}</ref>
== पुरस्कार ==
2019 में, पटेल को भारत सरकार द्वारा [[प्रवासी भारतीय सम्मान]] दिया गया। <ref>{{Cite web|url=https://mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/30941/list+of+pravasi+bharatiya+samman+awardees+pbsa+for+the+year+2019|title=List of Pravasi Bharatiya Samman Awardees (PBSA) for the year 2019|date=23 January 2019|access-date=26 September 2019}}</ref> जनवरी 2019 में, क्लियरवाटर सिटी काउंसिल ने नोवा साउथईस्टर्न यूनिवर्सिटी के टाम्पा बे रीजनल कैंपस में पटेल के योगदान को मान्यता देते हुए दमिश्क रोड का नाम बदलकर डॉ. किरण सी. पटेल बुलेवार्ड रखने का प्रस्ताव जारी किया। <ref>{{Cite web|url=https://nsunews.nova.edu/road-in-clearwater-to-be-renamed-in-honor-of-dr-kiran-c-patel/|title=Road in Clearwater to be Renamed in Honor of Dr. Kiran C. Patel {{!}} NSU Newsroom|website=nsunews.nova.edu|access-date=19 December 2019}}</ref>
== दान ==
पटेल ने दान के माध्यम से कई समूहों का समर्थन किया है:
# पटेल फाउंडेशन ने नोवा साउथईस्टर्न यूनिवर्सिटी के ऑस्टियोपैथिक और [[ऍलोपैथी|एलोपैथिक मेडिसिन]] कॉलेजों को 225 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई। <ref>{{Cite web|url=https://theunn.com/2018/10/drs-kiran-pallavi-patel-among-top-nris-donors-giving-1-2-billion-to-u-s-higher-education-institutions/|title=Drs. Kiran & Pallavi Patel among top NRIs donors giving $1.2 billion to U.S. higher education institutions|date=3 October 2018|website=The Universal News Network|archive-url=https://web.archive.org/web/20181006102002/http://theunn.com:80/2018/10/drs-kiran-pallavi-patel-among-top-nris-donors-giving-1-2-billion-to-u-s-higher-education-institutions/|archive-date=2018-10-06|access-date=17 August 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://philanthropynewsdigest.org/news/patel-foundation-commits-200-million-to-nova-southeastern-university|title=Patel Foundation Commits $200 Million to Nova Southeastern University|last=Candid|website=Philanthropy News Digest (PND)|access-date=17 August 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://philanthropynewsdigest.org/news/nova-southeastern-receives-25-million-for-allopathic-medicine|title=Nova Southeastern Receives $25 Million for Allopathic Medicine|last=Candid|website=Philanthropy News Digest (PND)|access-date=17 August 2019}}</ref>
# पटेल सेंटर फॉर ग्लोबल सॉल्यूशंस और कॉलेज ऑफ ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी के लिए साउथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय को 30.5 मिलियन डॉलर। <ref name="floridatrend.com">{{Cite web|url=https://www.floridatrend.com/article/23664/floridian-of-the-year-kiran-patel-first-i-give-to-charity|title=Floridian of the Year: Kiran Patel: 'First, I give to charity'|website=Florida Trend|access-date=17 August 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://wusfnews.wusf.usf.edu/post/12-million-gift-creates-usf-college-global-sustainability|title=$12 Million Gift Creates USF College of Global Sustainability|last=Schreiner|first=Mark|date=2 October 2012|website=wusfnews.wusf.usf.edu|access-date=17 August 2019}}</ref>
# हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी के लिए दो घर बनाने के लिए $171,500 . <ref>{{Cite web|url=https://www.habitathillsborough.org/patel-family-foundation-presents-171500-check-build-2-habitat-homes/|title=Patel Family Foundation presents $171,500 check to build 2 Habitat homes|last=Macar|first=Robin|date=27 February 2018|website=Habitat for Humanity of Hillsborough County, FL|access-date=17 August 2019|archive-date=2 जून 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210602213437/https://www.habitathillsborough.org/patel-family-foundation-presents-171500-check-build-2-habitat-homes/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://theunn.com/2018/03/dr-kiran-patel-donates-171500-in-dedicating-home-to-single-mother-in-florida/|title=Dr. Kiran Patel donates $171,500 in dedicating home to single mother in Florida|date=20 March 2018|website=The Universal News Network|archive-url=https://web.archive.org/web/20190817125335/https://theunn.com/2018/03/dr-kiran-patel-donates-171500-in-dedicating-home-to-single-mother-in-florida/|archive-date=17 August 2019|access-date=17 August 2019}}</ref>
# पटेल ने 7.5 डॉलर देने का वादा किया 2017-2018 से फ्लोरिडा अस्पताल कैरोलवुड को मिलियन का दान। <ref>{{Cite web|url=https://tampabay.com/news/health/Florida-Hospital-Carrollwood-spending-17-5-million-to-expand-emergency-department-_167448064/|title=Florida Hospital Carrollwood spending $17.5 million to expand emergency department|website=Tampa Bay Times|access-date=19 December 2019}}</ref>
== संस्थान ==
* किरण सी. पटेल कॉलेज ऑफ ऑस्टियोपैथिक मेडिसिन (डीओ) <ref>{{Cite web|url=https://tampabay.com/news/education/2019/09/23/in-clearwater-a-state-of-the-art-medical-school-now-overlooks-tampa-bay/|title=In Clearwater, a state-of-the-art medical school now overlooks Tampa Bay|website=Tampa Bay Times|access-date=19 December 2019}}</ref>
* किरण सी. पटेल कॉलेज ऑफ एलोपैथिक मेडिसिन (एमडी)
* डॉ. किरण और पल्लवी पटेल एलाइड हेल्थ बिल्डिंग
* डॉ. किरण सी. पटेल सेंटर फॉर ग्लोबल सॉल्यूशंस
* किरण सी. पटेल हाई स्कूल <ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2019/08/06/kiran-c-patel-high-school-opens-in-temple-terrace.html|title=Kiran C. Patel High School opens in Temple Terrace|date=n.d.|website=The Business Journals|archive-url=|archive-date=|access-date=19 December 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://tampabay.com/news/education/2019/10/31/hillsboroughs-charter-school-enrollment-tops-28000-with-more-campuses-on-the-way/|title=Hillsborough's charter school enrollment tops 28,000, with more campuses on the way|website=Tampa Bay Times|access-date=19 December 2019}}</ref>
* किरण सी. पटेल अनुसंधान संस्थान <ref>{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/world-us-canada-41587429|title=Why is this Indian giving $200m to Florida?|date=2017-10-12|work=BBC News|access-date=2021-03-03|language=en-GB}}</ref>
* पटेल कंज़र्वेटरी - स्ट्राज़ सेंटर फ़ॉर द परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स
* डॉ. किरण सी पटेल सतत विकास केंद्र, आईआईटी गांधीनगर, गुजरात <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/small-biz/startups/newsbuzz/centre-for-work-on-local-and-global-solutions-launched-by-iit/articleshow/67773708.cms|title=Centre for work on local and global solutions launched by IIT|last=Verma|first=Prachi|date=31 January 2019|work=The Economic Times|access-date=19 December 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2019/02/11/kiran-patel-launches-sustainability-center-in.html|title=Kiran Patel launches sustainability center in India|website=www.bizjournals.com|access-date=2021-03-03}}</ref>
== व्यक्तिगत जीवन ==
पटेल का विवाह बाल रोग विशेषज्ञ पल्लवी पटेल से हुआ है। <ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/tampabay/news/2020/08/09/kiran-patel-carrollwood-estate-under-construction.html|title='If you've seen it, I don't want it': Dr. Kiran Patel's palatial Carrollwood compound, with eye-catching designs at every turn, inches toward completion|website=www.bizjournals.com|access-date=2020-09-04}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.tampabay.com/news/health/2020/08/27/10-loans-one-address-tampa-philanthropists-hotels-got-millions-in-federal-aid/|title=10 loans, one address: Tampa philanthropist's hotels got millions in federal aid|website=Tampa Bay Times|language=en|access-date=2020-09-04}}</ref> उनकी दो बेटियाँ और एक बेटा, शिलेन पटेल हैं जिनके साथ उन्होंने संयुक्त रूप से इंग्लिश फुटबॉल (सॉकर) क्लब [[वेस्त ब्रोम्विछ अल्बिओन् एफ.सी.|वेस्ट ब्रोमविच एल्बियन]] खरीदा है। शिलेन अब क्लब के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। <ref name="floridatrend.com2">{{Cite web|url=https://www.floridatrend.com/article/23664/floridian-of-the-year-kiran-patel-first-i-give-to-charity|title=Floridian of the Year: Kiran Patel: 'First, I give to charity'|website=Florida Trend|access-date=17 August 2019}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.bbc.com/sport/football/68357597.amp|title=West Bromwich Albion - Shilen Patel completes takeover of Championship club|date=28 February 2024|website=BBC Sport|language=en|access-date=2024-02-29}}</ref>
पटेल को 2002 में [[विटिलिगो|विटिलिगो रोग]] हो गया। वह इस बिमारी के लिए उपचार नहीं करवा रहे हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.floridatrend.com/print/article/23664|title=Kiran Patel: 'First, I give to charity' {{!}} Floridian of the Year Feature {{!}} Feature - Florida Trend|website=www.floridatrend.com|access-date=2022-12-13|archive-date=13 दिसंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20221213020154/https://www.floridatrend.com/print/article/23664|url-status=dead}}</ref>
== संदर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:1949 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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कानुम पोंगल
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text/x-wiki
'''कानुम पोंगल''' (तमिल: காணும் பொங்கல்) चार दिवसीय [[पोंगल]] त्योहार का चौथा और अंतिम दिन है।<ref>{{Cite web|url=https://tamil.news18.com/news/tamil-nadu/kannum-pongal-celebrations-vjr-244047.html|title=தமிழகம் முழுவதும் களைக்கட்டும் காணும் பொங்கல் கொண்டாட்டம்..!|date=2021-01-16|website=न्यूज़18 तमिल|access-date=2020-01-17|archive-date=16 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200216113903/https://tamil.news18.com/news/tamil-nadu/kannum-pongal-celebrations-vjr-244047.html|url-status=dead}}</ref> ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह 17 जनवरी को मनाया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.astroved.com/astropedia/en/festivals/kaanum-pongal|title=Kaanum Pongal 2020 ,Kaanum Pongal 2020 Date ,Karinaal or Thiruvalluvar Day 2020 Date|website=एस्ट्रोवेद|access-date=2020-01-17}}</ref> यद्यपि इस त्यौहार का नाम विशिष्ट रूप से तमिलनाडु से लिया गया है, लेकिन इसे अन्य दक्षिणी [[भारत]]<nowiki/>ीय राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश और [[कर्नाटक]] में भी मनाया जाता है, क्योंकि यह त्यौहार दक्षिण भारत में काफी लोकप्रिय है। कानुम पोंगल के दिन को अक्सर महान ऐतिहासिक तमिल लेखक, कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर की याद में तिरुवल्लुवर दिवस के रूप में स्वीकार किया जाता है, जो विश्व प्रसिद्ध थिरुकुरल लिखने के लिए जाने जाते थे।<ref>{{Cite web|url=http://www.pongalfestival.org/thiruvalluvar-day-kaanum-pongal.html|title=Thiruvalluvar Day - Kanum Pongal, Fourth Day of Pongal|website=पोंगल फेस्टिवल|access-date=2020-01-17}}</ref> इस दिन को लोकप्रिय रूप से दर्शनीय स्थलों की यात्रा के दिन के साथ-साथ धन्यवाद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। लोगों का मानना है कि काणुम पोंगल विवाह के प्रस्ताव तय करने और नए बंधन और रिश्तों की शुरुआत करने के लिए एक शुभ दिन है।
== नामकरण और उत्सव ==
काणुम शब्द का अर्थ है 'देखना और देखना'। काणुम पोंगल विश्राम और आनंद का दिन है क्योंकि इसका अर्थ है कि लोग अपना समय पारिवारिक यात्राओं, पिकनिक, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर जाकर बिताते हैं।<ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/cities/chennai/police-makes-arrangements-for-kaanum-pongal-in-chennai/article30574444.ece|title=10,000 police personnel to be on bandobust duty in Chennai for Kaanum Pongal|date=2020-01-16|work=द हिन्दू|access-date=2020-01-17|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref> आंध्र प्रदेश राज्य में, इस त्यौहार को मुक्कनुमा के रूप में चिह्नित और मनाया जाता है और आंध्र में मवेशियों की पूजा करके शुभ त्यौहार मनाया जाता है। तमिलनाडु राज्य में, कानुम पोंगल के दिन को वर्जिन पोंगल या कन्नी पोंगल भी कहा जाता है, कन्नी शब्द का अर्थ कुंवारी/युवती/अविवाहित लड़की है।
==सन्दर्भ==
[[श्रेणी:भारत में त्यौहार]]
[[श्रेणी:हिन्दू पर्व]]
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कार काछे कोइ मनेर कथा
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'''''कार काछे कोइ मनेर कथा''''' (কার কাছে কই মনের কথা; हिन्दी अनुवाद: किसको बताऊँ मन की बात?; लघुरूप: केकेकेएमके) [[बंगाली भाषा]] का भारतीय रोमांटिक नाटक धारावाहिक है जो भारतीय बंगाली मनोरंजन चैनल [[ज़ी बांग्ला]] पर प्रसारित किया जाता है।<ref>{{Cite web |date=2023-06-13 |title=মনের কথা বোঝে না বর, শাশুড়ি খুঁত খুঁজতে ব্যস্ত, মানালির সহচরী হয়ে উঠবে পড়শিরা |url=https://bangla.hindustantimes.com/entertainment/manalis-comeback-mega-kar-kache-koi-moner-kothas-promo-out-now-watch-31686619915314.html |access-date=2023-06-26 |website=हिन्दुस्तान टाइम्स बांग्ला |language=bn |archive-date=26 जून 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230626073220/https://bangla.hindustantimes.com/entertainment/manalis-comeback-mega-kar-kache-koi-moner-kothas-promo-out-now-watch-31686619915314.html |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web |title=New Bengali Serial: বিয়ের পর কাকে বলবেন 'মনের কথা', মানালির পড়শীরাই হয়ে উঠবেন তাঁর সই |url=https://bangla.aajtak.in/cinema-and-tv-serial-news/story/kar-kache-koi-moner-kotha-promo-out-manali-dey-basabdutta-comeback-in-this-serial-television-bengali-serial-related-news-banglay-sum-578525-2023-06-13 |access-date=2023-06-26 |website=आजतक बांग्ला |language=bn}}</ref> ये धारावाहिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ज़ी5 पर भी उपलब्ध है। इसका प्रसारण 3 जुलाई 2023 को आरम्भ हुआ।<ref>{{Cite web |title=স্বামী নয়, মনের কথা বোঝে পড়শিরাই! প্রকাশ্যে মানালির নতুন ধারাবাহিকের প্রোমো |url=https://eisamay.com/entertainment/tv-news/bengali-actress-manali-dey-returns-with-new-serial-kar-kache-koi-moner-kotha-promo-out/articleshow/100956029.cms |access-date=2023-06-26 |website=ई समय |language=bn}}</ref> इस शृंखला का निर्माण आर्का गांगुली ने ऑर्गेनिक स्टूडियो के बैनर तले किया है। इसमें मनाली डे, द्रोण मुखर्जी, बसबदत्ता चटर्जी, श्रीजानी मित्रा, स्नेहा चटर्जी और श्रीतमा भट्टाचार्जी मुख्य अभिनय किया है।<ref>{{Cite news |date=2023-06-13 |title=Manali Manisha Dey, Basabdatta Chatterjee starrer 'Kar Kache Koi Moner Kotha' to bring back nostalgia of 'Para culture' |work=द टाइम्स ऑफ़ इंडिया |url=https://timesofindia.indiatimes.com/tv/news/bengali/manali-manisha-dey-basabdatta-chatterjee-starrer-kar-kache-koi-moner-kotha-to-bring-back-nostalgia-of-para-culture/articleshow/100957037.cms |access-date=2023-06-26 |issn=0971-8257}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/tv/news/bengali/kar-kachhe-koi-moner-kotha-to-launch-next-month/articleshow/101153632.cms|title='Kar Kachhe Koi Moner Kotha' to launch next month|website=द टाइम्स ऑफ़ इंडिया}}</ref> [<ref>{{cite web|url=https://www.indiantvinfo.com/kar-kachhe-koi-moner-katha-serial-zee-bangla/|title=Kar Kachhe Koi Moner Katha Serial Zee Bangla Starring Manali Manisha Dey, Basabdatta Chatterjee in Lead|website= इंडियन टीवी न्यूज़ }}</ref><ref>{{cite web|url=https://eisamay.com/entertainment/tv-news/bengali-actress-manali-dey-starrer-kar-kache-koi-moner-kotha-bts-of-promo-shoot-and-know-the-telecast-date/articleshow/101298850.cms|title=Kar Kache Koi Moner Kotha Telecast Time : খুনসুটিতে ভরপুর প্রোমো শ্যুটের BTS, কবে শুরু মানালির নতুন ধারাবাহিক?|website=ई समय}}</ref>
==कथानक==
शिमुल एक आधुनिक और खुले विचारों वाली लड़की है। उसे डांस करना बहुत पसंद है। लेकिन उसके भाई उसे बोझ समझते हैं। इसलिए शतद्रु से प्यार करने के बावजूद वह पराग से शादी कर लेती है। लेकिन वह पराग के साथ खुशहाल जीवन जीने के इरादे से आगे बढ़ जाती है। लेकिन पराग एक रूढ़िवादी परिवार से ताल्लुक रखता है जिसमें उसकी माँ मधुबाला, भाई पलाश और मानसिक रूप से विक्षिप्त बहन पुतुल शामिल हैं। ससुराल वालों में शिमुल की कोई परवाह नहीं करता। पराग, पलाश और मधुबाला उसे तरह-तरह से प्रताड़ित और अपमानित करते हैं। लेकिन शिमुल के साथ रहने वाली कुछ लड़कियाँ (सुचरिता, बिपाशा और शीर्षा) उसके लिए सहानुभूति रखती हैं और हर बार उसकी रक्षा करती हैं। उनकी दोस्ती शुरू होती है।
==कलाकार==
===मुख्य===
* मनाली डे – शिमुल बनर्जी (उर्फ मित्रा): शिप्रा की बेटी; सुमित और श्रीजीत की बहन; शतद्रु का पूर्व प्रेमी; पराग की पत्नी; सुचरिता, बिपाशा और शीर्षा की दोस्त; प्रियंका की प्रतिद्वंद्वी; प्रतीक्षा और पलाश के दुश्मन
* द्रोण मुखर्जी – पराग बनर्जी: मधुबाला के बड़े बेटे; पुतुल और पलाश के भाई; टुटुल के चचेरे भाई; शिमुल के पति; प्रियंका के पूर्व मंगेतर
* बसबदत्ता चटर्जी – सुचरिता बसु: इंद्रदीप की विधवा; ट्विंकल की मां; शिमुल की पड़ोसी और दोस्त; स्वस्तिका की प्रतिद्वंद्वी
* स्नेहा चटर्जी – बिपाशा मित्रा: चंदन की पहली पत्नी; शिमुल की पड़ोसी और दोस्त; मधुरिमा की प्रतिद्वंद्वी
* श्रीजानी मित्रा – शीर्षा चौधरी: विश्वदीप की पत्नी; शिमुल की पड़ोसी और दोस्त
* श्रीतामा भट्टाचार्जी – पुतुल चटर्जी (उर्फ बनर्जी): एक मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़की; मधुबाला की बेटी; पराग और पलाश की बड़ी बहन; टुटुल की सबसे बड़ी चचेरी बहन; तीर्थ की छात्रा और प्रेमिका जो पत्नी बन गई; मधुबाला बनर्जी के रूप में रंजा की प्रतिद्वंद्वी
* रीता दत्ता चक्रवर्ती – मधुलता बनर्जी: पुतुल, पराग और पलाश की मां; शिमुल, प्रतीक्षा और तीर्थ की सास
==सन्दर्भ==
{{Reflist|30em}}
[[श्रेणी:बांग्ला फ़िल्म]]
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भारत में कानून प्रवर्तन
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[[File:The President, Shri Ram Nath Kovind with the Probationers of 70 RR (2017 Batch) of the Indian Police Service from Sardar Vallabhbhai Patel National Police Academy, at Rashtrapati Bhavan, in New Delhi on October 12, 2018 (1).JPG|alt=Khaki-clad officers supervise a peaceful demonstration|thumb|[[भारत]] के पूर्व राष्ट्रपति [[राम नाथ कोविंद]], 2018 में [[नई दिल्ली]] स्थित [[राष्ट्रपति भवन]] में [[भारतीय पुलिस सेवा]] के अधिकारियों के साथ।]]
[[File:Women personnel of India's Border Security Force.jpg|thumb|[[भारत-पाकिस्तान सीमा]] पर महिला सुरक्षाकर्मी।]]<hiero>
https://vajiramandravi.com/upsc-exam/upsc-post-list/
</hiero>'''भारत में कानून प्रवर्तन''' [[न्याय]] और [[व्यवस्था]] बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक इकाई है। [[भारतीय कानून]] का पालन सुनिश्चित करने के लिए कई एजेंसियों कार्यरत हैं। कई संघीय देशों के विपरीत, [[भारत का संविधान]] कानून और व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी [[भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश|राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों]] को सौंपता है।<ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/delhi/chidambaram-was-unsure-of-nia-s-constitutionality/story-cFZmQydPPbWZuqZ7TlupiJ.html|title=Chidambaram was unsure of NIA's constitutionality|date=19 मार्च 2011|website=हिंदुस्तान टाइम्स|language=en|trans-title=चिदंबरम एनआईए की संवैधानिकता को लेकर अनिश्चित थे|access-date=12 नवम्बर 2024}}</ref>
संघीय स्तर पर, [[भारत]] के कुछ [[अर्धसैनिक बल]] [[गृह मंत्रालय]] के अधीन आते हैं और राज्यों को सहायता प्रदान करते हैं। बड़े शहरों के पास अपने स्वयं के [[पुलिस]] बल होते हैं जो संबंधित राज्य पुलिस के अधीन होते हैं (सिवाय [[कोलकाता]] पुलिस के, जो स्वायत्त है और राज्य के गृह सचिव को रिपोर्ट करती है)। राज्य पुलिस बलों और संघीय एजेंसियों में सभी वरिष्ठ अधिकारी [[भारतीय पुलिस सेवा|भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस)]] के सदस्य होते हैं। भारत में आतंकवादी हमलों से निपटने के लिए संघीय और राज्य स्तर पर कुछ विशेष सामरिक बल हैं, जैसे मुंबई पुलिस क्विक रिस्पांस टीम, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड, एंटी-टेररिज्म स्क्वाड, दिल्ली पुलिस एसडब्ल्यूएटी आदि।
==केंद्रीय एजेंसियां==
[[File:The Union Home Minister, Shri Rajnath Singh presenting the medals and awards to CISF personnel, during the 49th Raising Day Parade of the Central Industrial Security Force (CISF), in Ghaziabad on March 10, 2018.jpg|alt=Two officers standing behind a machine gun|thumb|केंद्रीय गृह मंत्री [[राजनाथ सिंह]] ने सीआईएसएफ कर्मियों और कैडेटों को पदक और पुरस्कार प्रदान किए।]]
केंद्रीय एजेंसियां [[भारत सरकार|केंद्र सरकार]] द्वारा नियंत्रित होती हैं। अधिकांश संघीय कानून-प्रवर्तन एजेंसियां [[गृह मंत्रालय, भारत सरकार|गृह मंत्रालय]] के अंतर्गत आती हैं। प्रत्येक एजेंसी का प्रमुख एक आईपीएस अधिकारी होता है। संविधान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सौंपता है, और लगभग सभी सामान्य पुलिसिंग कार्य—जिसमें अपराधियों को पकड़ना भी शामिल है—राज्य-स्तरीय पुलिस बलों द्वारा किया जाता है। संविधान केंद्र सरकार को पुलिस संचालन और संगठन में भाग लेने की अनुमति भी देता है, जिससे भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) का निर्माण किया जा सके।
[[File:National Police Museum New Delhi India.jpg|alt=Museum exhibit, with uniformed mannequins|thumb|upright=1.2|नई दिल्ली में [[राष्ट्रीय पुलिस स्मारक]] और [[संग्रहालय]] में [[रेलवे सुरक्षा बल]], रैपिड एक्शन फोर्स, [[राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड]] और [[खुफिया ब्यूरो (भारत)|खुफिया ब्यूरो]] की प्रदर्शनी।]]
केंद्रीय पुलिस बल किसी राज्य के पुलिस बल की सहायता कर सकते हैं यदि राज्य सरकार इसकी मांग करती है। 1975-77 के आपातकाल के दौरान, संविधान में 1 फरवरी 1976 को एक संशोधन किया गया था जिससे केंद्र सरकार को राज्य की अनुमति के बिना अपने सशस्त्र पुलिस बलों को तैनात करने की अनुमति मिल गई थी। यह संशोधन लोकप्रिय नहीं था, और केंद्रीय पुलिस बलों का उपयोग विवादास्पद साबित हुआ। [[आपातकाल (भारत)|आपातकाल]] हटने के बाद, दिसंबर 1978 में संविधान में फिर से संशोधन किया गया और स्थिति को पूर्ववत कर दिया गया।
===गृह मंत्रालय===
कानून प्रवर्तन से संबंधित मुख्य राष्ट्रीय मंत्रालय गृह मंत्रालय (एमएचए) है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा संचालित और प्रशासित विभिन्न सरकारी कार्यों और एजेंसियों की देखरेख करता है। यह मंत्रालय सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने, लोक सेवा कर्मचारियों और प्रशासन का प्रबंधन, आंतरिक सीमाओं का निर्धारण, और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन जैसे मामलों से संबंधित है।
भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) पर नियंत्रण के साथ-साथ, गृह मंत्रालय कई पुलिस और सुरक्षा से संबंधित एजेंसियों और संगठनों का प्रबंधन करता है। केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन होती है। गृह मंत्री इस मंत्रालय के लिए कैबिनेट मंत्री होते हैं, जबकि गृह सचिव, जो एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी होते हैं, मंत्रालय के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं।
===केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल===
{{Main|केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल}}
====सीमा सुरक्षा बल====
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) शांति काल में भारत की भूमि सीमाओं की निगरानी और सीमा-पार अपराधों की रोकथाम के लिए जिम्मेदार है। यह गृह मंत्रालय के अधीन एक केंद्रीय पुलिस बल है, जिसके कर्तव्यों में महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा, चुनाव पर्यवेक्षण, महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा और नक्सल-विरोधी अभियानों का संचालन शामिल है।
[[1965 के भारत-पाक युद्ध]] ने मौजूदा सीमा प्रबंधन प्रणाली की अपर्याप्तता को उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप [[पाकिस्तान]] के साथ भारत की सीमा की सुरक्षा के लिए बीएसएफ का गठन एक एकीकृत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के रूप में किया गया। बीएसएफ की पुलिसिंग क्षमता का उपयोग 1971 के [[भारत-पाक युद्ध]] में [[पाकिस्तान सशस्त्र बल|पाकिस्तानी सशस्त्र बलों]] के खिलाफ उन क्षेत्रों में किया गया, जहाँ खतरा कम था। युद्ध के समय या केंद्रीय सरकार के आदेश पर, बीएसएफ का कमांड भारतीय सेना के अधीन होता है; बीएसएफ सैनिकों ने 1971 के लोंगेवाला युद्ध में इस क्षमता में भाग लिया। 1971 के युद्ध (जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ) के बाद, [[बांग्लादेश]] के साथ सीमा की निगरानी का कार्य बीएसएफ को सौंपा गया।
मूल रूप से भारत की बाहरी सीमाओं की सुरक्षा के लिए गठित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को अब आतंकवाद और विद्रोह विरोधी अभियानों का कार्य भी सौंपा गया है। जब 1989 में जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद भड़क उठा और राज्य पुलिस तथा कम तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को बढ़ती हिंसा से निपटने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता पड़ी, तो केंद्र सरकार ने कश्मीरी उग्रवादियों से लड़ने के लिए बीएसएफ को [[जम्मू]] और [[कश्मीर]] में तैनात किया।
बीएसएफ [[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] में अपने अकादमी में एक टियर-स्मोक यूनिट संचालित करता है, जो दंगों की रोकथाम के लिए सभी राज्य पुलिस बलों को आंसू गैस और धुएं के गोले उपलब्ध कराता है। यह डॉग स्क्वॉड संचालित करता है और राष्ट्रीय डॉग ट्रेनिंग और अनुसंधान केंद्र भी चलाता है। बीएसएफ, जो भारतीय पुलिस बलों में से एक है जिसके पास अपने स्वयं के वायु और जल विंग हैं, राज्य पुलिस को हेलीकॉप्टर, कुत्तों और अन्य सहायक सेवाएँ प्रदान करता है।
====केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल====
[[केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल]] (सीआईएसएफ) का मुख्य कार्य औद्योगिक सुरक्षा प्रदान करना है।<ref>{{cite news |title=Role of CISF in the internal security of the country |url=https://morungexpress.com/role-cisf-internal-security-country |access-date=29 March 2021 |work=MorungExpress}}</ref> यह पूरे देश में केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करता है, समुद्री बंदरगाहों और हवाई अड्डों की सुरक्षा करता है, और कुछ गैर-सरकारी संगठनों को भी सुरक्षा प्रदान करता है। सीआईएसएफ [[परमाणु ऊर्जा संयंत्र|परमाणु ऊर्जा संयंत्रों]], अंतरिक्ष प्रतिष्ठानों, टकसालों, तेल क्षेत्र और रिफाइनरियों, भारी इंजीनियरिंग और इस्पात संयंत्रों, बांधों, उर्वरक इकाइयों, जलविद्युत और ताप विद्युत स्टेशनों और अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों को आंशिक या पूर्ण रूप से सुरक्षा प्रदान करता है।<ref>{{cite web |title=Section 10 in the Central Industrial Security Force Act, 1968 |url=https://indiankanoon.org/doc/573891/ |publisher=Indian Kanoon |access-date=29 March 2021}}</ref>
====केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल====
[[केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल]] (सीआरपीएफ) का मुख्य उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की कानून और व्यवस्था बनाए रखने और उग्रवाद को नियंत्रित करने में सहायता करना है। इसे कई क्षेत्रों में आतंकवाद विरोधी इकाई के रूप में तैनात किया जाता है और यह संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों के हिस्से के रूप में विदेशों में भी कार्य करता है।<ref>{{cite news |title=CRPF contingent evacuated as situation worsens in Libya: Sushma Swaraj |url=https://www.indiatoday.in/india/story/sushma-swaraj-says-india-evacuates-peacekeeping-crpf-contingent-as-situation-worsen-in-libya-1496101-2019-04-07 |access-date=29 March 2021 |work=India Today |date=7 April 2019 |language=en}}</ref>
====भारत-तिब्बत सीमा पुलिस====
90,000 सदस्यों वाली इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) 2,115 किलोमीटर (1,314 मील) लंबे [[भारत तिब्बत सीमा पुलिस|भारत-तिब्बत सीमा]] और इसके आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। आईटीबीपी के कर्मियों को कानून और व्यवस्था बनाए रखने, [[सैन्य रणनीति]], जंगल युद्ध, उग्रवाद विरोधी और आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया है। उन्हें [[अफगानिस्तान]] में स्थित भारतीय राजनयिक मिशनों में भी तैनात किया गया था।<ref>{{cite news |title=India sending 35 ITBP commandos to guard Afghanistan missions |url=https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/india-sending-35-itbp-commandos-to-guard-afghanistan-missions/articleshow/49557609.cms?from=mdr |access-date=29 March 2021 |work=The Economic Times |agency=PTI |date=27 October 2015}}</ref>
====राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड====
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) एक कमांडो इकाई है, जिसे मूल रूप से आतंकवाद विरोधी और बंधक मुक्ति मिशनों के लिए 1986 में स्थापित किया गया था। इसे इसके काले रंग के यूनिफॉर्म के कारण "ब्लैक कैट्स" के नाम से जाना जाता है। भारत में अधिकांश सैन्य और उच्च सुरक्षा इकाइयों की तरह, एनएसजी मीडिया से बचता है और भारतीय जनता को इसके कार्यक्षमता और संचालन विवरणों के बारे में बहुत कम जानकारी होती है।
एनएसजी अपने मुख्य सदस्य भारतीय सेना से प्राप्त करता है, जबकि शेष स्टाफ अन्य केंद्रीय पुलिस इकाइयों से लिया जाता है। एक एनएसजी टीम और एक परिवहन विमान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तैनात रहता है, जो 30 मिनट के भीतर तैनाती के लिए तैयार रहता है।
====सशस्त्र सीमा बल====
सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी), जिसकी स्थापना 1963 में हुई थी, भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमाओं पर तैनात है। एसएसबी के पास 82,000 से अधिक कर्मी हैं, जिन्हें कानून और व्यवस्था बनाए रखने, सैन्य रणनीतियों, जंगल युद्ध, विरोधी उग्रवाद और आंतरिक सुरक्षा में प्रशिक्षित किया जाता है। इसके कर्मियों को खुफिया ब्यूरो (आईबी), अनुसंधान और विश्लेषण विंग (रिऔरएडब्लू), विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी), और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में भी तैनात किया जाता है। अधिकारी सहायक कमांडेंट के रूप में शुरुआत करते हैं (जो राज्य पुलिस में उपनिरीक्षक के समकक्ष होता है), और सेवानिवृत्त होने पर उन्हें निरीक्षक जनरल (आईजी) के पद पर पदोन्नत किया जाता है।
===विशेष सुरक्षा समूह===
विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) केंद्रीय सरकार की एक्जीक्यूटिव सुरक्षा एजेंसी है, जो भारत के प्रधानमंत्री और उनके तत्काल परिवार की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। इस बल की स्थापना 1985 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की गई थी। यह बल वर्तमान प्रधानमंत्री और उनके परिवार को पूरे भारत में 24 घंटे, हर दिन सुरक्षा प्रदान करता है। एसपीजी का उद्देश्य प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें किसी भी संभावित खतरे से बचाना है, और यह विशेष रूप से उच्चतम स्तर की सुरक्षा और कड़ी निगरानी प्रदान करता है।
===केंद्रीय जांच और खुफिया संस्थाएं===
====केंद्रीय जांच ब्यूरो====
[[केंद्रीय जांच ब्यूरो]] (सीबीआई) भारत की प्रमुख जांच एजेंसी है, जो विभिन्न प्रकार के अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के लिए जिम्मेदार है। इसे अक्सर दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के तहत स्थापित माना जाता है, लेकिन इसे केंद्रीय सरकार द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से बनाया गया था। इसकी संविधानिकता को [[गुवाहाटी उच्च न्यायालय]] में ''नरेंद्र कुमार बनाम भारत संघ'' मामले में चुनौती दी गई थी, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि सभी पुलिसिंग क्षेत्रों का अधिकार राज्य सरकारों को है, जबकि सीबीआई एक केंद्रीय-सरकारी एजेंसी है। अदालत ने यह निर्णय लिया कि कानून की कमी के बावजूद, सीबीआई केंद्रीय सरकार की राष्ट्रीय पुलिसिंग के लिए अधिकृत एजेंसी है। इसके निर्णय को [[सर्वोच्च न्यायालय]] ने भी सही ठहराया और सीबीआई के राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए इसे वैध माना।
यह एजेंसी भारत सरकार के [[कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय]] के तहत आती है, जिसका नेतृत्व आम तौर पर प्रधानमंत्री करते हैं, जो [[कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्री]] होते हैं। भारत का इंटरपोल यूनिट, सीबीआई अपने कर्मचारियों को देशभर से भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों से भर्ती करती है। सीबीआई उच्च-रैंकिंग सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं से जुड़े अपराधों में विशेष रूप से माहिर है, और मीडिया और जनता के दबाव के कारण इसे अन्य आपराधिक मामलों को भी संभालने का अवसर मिला है (जो आम तौर पर स्थानीय पुलिस की जांच में अक्षमता के कारण होता है)।
====आयकर विभाग====
{{Main|आयकर जांच महानिदेशालय|केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का जांच प्रभाग|मुख्य आयकर आयुक्त, केन्द्रीय}}
[[File:ALH Dhruv, Indian Air Force.jpg|alt=Indian Navy helicopter, seen from below|thumb|आयकर जांच महानिदेशालय को हेलीकॉप्टर भारतीय वायु सेना द्वारा आपूर्ति किये जाते हैं।]]
[[आयकर विभाग]] (आईटीडी) भारत की प्रमुख वित्तीय एजेंसी है, जो वित्तीय और राजस्व संबंधी मामलों के लिए जिम्मेदार है। यह विभाग वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन आता है, जिसका नेतृत्व एक मंत्री करते हैं जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) भी राजस्व विभाग का हिस्सा है। सीबीडीटी प्रत्यक्ष करों की नीतियों और योजनाओं के लिए इनपुट प्रदान करता है और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानूनों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। यह बोर्ड केंद्रीय राजस्व अधिनियम, 1963 के अनुसार कार्य करता है। बोर्ड के सदस्य अपने पद के अनुसार करों के लगान और संग्रहण, कर चोरी और राजस्व खुफिया जैसे मामलों को देखना है। यह भारत का आधिकारिक [[वित्तीय कार्रवाई कार्यदल]] (एफएटीएफ) यूनिट है। आयकर विभाग का स्टाफ [[भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस)]] के अधिकारियों से लिया जाता है और यह आर्थिक अपराधों और कर चोरी की जांच के लिए जिम्मेदार है। कुछ विशेष एजेंट और एजेंट हथियार रखने का अधिकार भी रखते हैं।<ref name="express">{{cite news |title=Tax evasion cases: I-T 'special agents' to carry arms |url=http://archive.indianexpress.com/news/tax-evasion-cases-it-special-agents-to-carry-arms/843036/ |access-date=27 July 2019 |work=[[The Indian Express]] |date=7 September 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160314100752/http://archive.indianexpress.com/news/tax-evasion-cases-it-special-agents-to-carry-arms/843036/ |archive-date=14 March 2016 |url-status=live }}</ref>
क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन निदेशालय (डीसीआई) का नेतृत्व इंटेलिजेंस (इनकम टैक्स) के महानिदेशक करते हैं, जो सीमा पार काले धन के मामलों से निपटने के लिए स्थापित किया गया था। डीसीआई "ऐसे व्यक्तियों और लेनदेन की गुप्त जांच करता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली और प्रत्यक्ष कर कानूनों के तहत दंडनीय आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।"<ref name="express" />
आईटीडी के इंटेलिजेंस निदेशालय के आयुक्त, जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और लखनऊ में नियुक्त, डीसीआई के लिए आपराधिक जांच भी करेंगे। आईटीडी की इंटेलिजेंस शाखा सेंट्रल इंफॉर्मेशन ब्रांच (सीआईबी) की निगरानी करती है, जो करदाताओं के वित्तीय लेनदेन का एक डेटाबेस रखता है।
====राजस्व खुफिया निदेशालय====
[[राजस्व खुफिया निदेशालय]] (डीआरआई) एक खुफिया आधारित संगठन है जो भारत में तस्करी विरोधी प्रयासों के समन्वय के लिए जिम्मेदार है। इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा और [[केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड]] के ग्रुप बी से लिए जाते हैं।
====केंद्रीय आर्थिक आसूचना ब्यूरो====
[[केंद्रीय आर्थिक आसूचना ब्यूरो]] (सीईआईबी) एक खुफिया एजेंसी है जो आर्थिक अपराधों और आर्थिक युद्ध से संबंधित सूचनाओं के संग्रहण और आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए जिम्मेदार है।
====वस्तु एवं सेवाकर खुफिया महानिदेशालय====
वस्तु एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीआई), जिसे पहले केंद्रीय उत्पाद शुल्क खुफिया महानिदेशालय (डीजीसीईआई) कहा जाता था, एक खुफिया-आधारित संगठन है जो केंद्रीय उत्पाद शुल्क और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित कर चोरी के मामलों के लिए जिम्मेदार है। इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के ग्रुप बी से लिए जाते हैं।
====राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी====
[[राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी]] (एनआईए), जो कि आतंकवाद से मुकाबला करने वाली केंद्रीय एजेंसी है, राज्यों की अनुमति के बिना अंतर्राज्यीय आतंक से संबंधित अपराधों का निपटारा कर सकती है। राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी विधेयक 2008, जिसने इस एजेंसी की स्थापना की, 16 दिसंबर 2008 को गृह मंत्री द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया था।<ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/Finally-govt-clears-central-terror-agency-tougher-laws/articleshow/3842368.cms|title=Finally, govt clears central terror agency, tougher laws|website=The Times of India|date=16 December 2008 |access-date=26 July 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190814034303/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Finally-govt-clears-central-terror-agency-tougher-laws/articleshow/3842368.cms|archive-date=14 August 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/mumbaiterrorstrike/Story.aspx?ID=NEWEN20080076587&type=News|title=Cabinet clears bill to set up federal probe agency|access-date=25 May 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20130508110740/http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/mumbaiterrorstrike/Story.aspx?ID=NEWEN20080076587&type=News|archive-date=8 May 2013|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/Govt-tables-bill-to-set-up-National-Investigation-Agency/articleshow/3846827.cms|title=Govt tables bill to set up National Investigation Agency|website=The Times of India|date=16 December 2008 |access-date=26 July 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190811193724/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Govt-tables-bill-to-set-up-National-Investigation-Agency/articleshow/3846827.cms|archive-date=11 August 2019|url-status=live}}</ref> एनआईए को [[2008 के मुंबई हमले]] के बाद एक केंद्रीय आतंकवाद-रोधी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। यह मादक पदार्थों की तस्करी और मुद्रा की नकलीकरण जैसी समस्याओं से भी निपटती है, और इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से आते हैं।
====नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो====
[[नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो]] (एनसीबी) पूरे भारत में मादक पदार्थ विरोधी अभियान के लिए जिम्मेदार है। इसका उद्देश्य अवैध मादक पदार्थों के प्रसार को रोकना और ड्रग्स की खेती पर नियंत्रण रखना है। इस ब्यूरो में अधिकारी भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से नियुक्त किए जाते हैं।
====पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो====
[[पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो]] (बीपीआरडी) की स्थापना 28 अगस्त 1970 को पुलिस बलों को आधुनिक बनाने के लिए की गई थी। यह पुलिस से संबंधित मुद्दों पर शोध करता है, जिसमें केंद्रीय और राज्य स्तर पर प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी का परिचय शामिल है।
====राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो====
1979 में, [[राष्ट्रीय पुलिस आयोग]] ने एक ऐसी एजेंसी बनाने की सिफारिश की थी जो आपराधिक रिकॉर्ड और एक साझा डेटाबेस का रखरखाव कर सके जिसे संघीय और राज्य स्तरों पर साझा किया जा सके। [[राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो]] (एनसीआरबी) की स्थापना, पुलिस कंप्यूटरों के समन्वय निदेशालय, केंद्रीय फिंगरप्रिंट ब्यूरो, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के समन्वय प्रभाग के डेटा सेक्शन, और पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के सांख्यिकीय सेक्शन को मिलाकर की गई थी।
===केंद्रीय फोरेंसिक संस्थान===
====केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला====
[[केन्द्रीय फॉरेन्सिक विज्ञान प्रयोगशाला]] (सीएफएसएल), जो गृह मंत्रालय का एक प्रभाग है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एकमात्र डीएनए संग्रहालय है। सात केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ हैं: [[हैदराबाद]], [[कोलकाता]], [[भोपाल]], [[चंडीगढ़]], [[पुणे]], [[गुवाहाटी]] और [[नई दिल्ली]] में। सीएफएसएल हैदराबाद रासायनिक विज्ञान में उत्कृष्टता केंद्र है, सीएफएसएल कोलकाता जैविक विज्ञान में और सीएफएसएल चंडीगढ़ भौतिक विज्ञान में। इन प्रयोगशालाओं का प्राथमिक नियंत्रण मंत्रालय के फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय (डीएफएस) के अधीन है; नई दिल्ली की प्रयोगशाला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अधीन है और उसके लिए मामलों की जांच करती है।
====राष्ट्रीय अपराधविज्ञान और फोरेंसिक विज्ञान संस्थान====
राष्ट्रीय अपराधविज्ञान और फोरेंसिक विज्ञान संस्थान (एनआईसीएफएस) की स्थापना 4 जनवरी 1972 को [[विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (भारत)|विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)]] द्वारा नियुक्त एक समिति की सिफारिश पर की गई थी। सितंबर 1979 में, यह संस्थान गृह मंत्रालय का एक विभाग बन गया, जिसमें एक पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त किया गया। इसका नेतृत्व वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों द्वारा किया जाता है। संस्थान साइबर अपराध जांच में प्रशिक्षण प्रदान करता है और अपराधविज्ञान और फोरेंसिक (जिसमें साइबर फोरेंसिक शामिल है) के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान करता है। इसे [[विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (भारत)|विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग]] द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी संगठन के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
==राज्य पुलिस==
{{main|भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस बल}}
[[File:City of Taj Police Car.jpg|alt=A smiling constable|thumb|आगरा पुलिस गश्ती गाड़ी]]
राज्य पुलिस बल [[राज्य सरकार]] के अधीन संगठित होते हैं, और प्रत्येक राज्य और [[केंद्र शासित प्रदेश]] का अपना पुलिस बल होता है। पुलिस मामलों के लिए सर्वोच्च प्राधिकरण राज्य के गृह विभाग के पास होता है, जिसका नेतृत्व एक अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव, जिन्हें गृह सचिव भी कहा जाता है, द्वारा किया जाता है और जो सामान्यतः एक आईएएस अधिकारी होते हैं। राज्य पुलिस बल का नेतृत्व [[पुलिस महानिदेशक|पुलिस महानिदेशक (डीजीपी)]] करते हैं, जो सामान्यतः भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी होते हैं।
[[File:Nizamabad Police Vehicle.jpg|thumb|निजामाबाद सिटी पुलिस की गश्ती कार, ([[टोयोटा इनोवा]])]]
1861 का पुलिस अधिनियम भारत में पुलिस बलों के संगठन और कार्यप्रणाली के लिए आधारभूत ढांचा प्रदान करता है। भले ही विभिन्न राज्य पुलिस बलों में उपकरण और संसाधनों में भिन्नता हो सकती है, उनकी संगठनात्मक संरचना और संचालन पैटर्न सामान्यतः समान होते हैं।
डीजीपी के नीचे, पुलिस बल को पुलिस जोन, रेंज, जिलों, उपखंडों और पुलिस थानों में विभाजित किया जाता है। पुलिस जोन का नेतृत्व इंस्पेक्टर जनरल (आईजीपी) करते हैं, जबकि पुलिस रेंज का नेतृत्व डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) करते हैं। जिला पुलिस मुख्यालय का नेतृत्व पुलिस अधीक्षक (एसपी) करते हैं और वे अधीनस्थ इकाइयों की देखरेख करते हैं। कानून और व्यवस्था शाखा के अलावा, प्रत्येक राज्य पुलिस में विशेष शाखाएँ होती हैं जैसे कि आपराधिक जांच विभाग, खुफिया शाखा, पुलिस प्रशिक्षण शाखा और [[राज्य सशस्त्र पुलिस बल]], जिनका नेतृत्व वरिष्ठ अधिकारी करते हैं।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस को गृह मंत्रालय द्वारा तैयार दिशा-निर्देशों के तहत स्वयंसेवी [[भारतीय गृह रक्षक]] इकाइयों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।
अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, पुलिस बलों को सिविल (निर्जीव) पुलिस और सशस्त्र पुलिस टुकड़ियों में विभाजित किया गया है। सिविल पुलिस पुलिस स्टेशनों में तैनात होती है, जांच करती है, नियमित शिकायतों का उत्तर देती है, यातायात कर्तव्यों का निर्वहन करती है, और सड़कों पर गश्त करती है। वे सामान्यतः लाठी (बाँस की छड़ी, लोहे से वजनी या टिप की हुई) रखते हैं।
[[File:Karnataka Police Tata Vehicle.JPG|alt=Two motorcycle police officers in front of a police car|thumb|कर्नाटक राज्य पुलिस का सशस्त्र एसडब्ल्यूएटी वाहन]]
सशस्त्र पुलिस को दो समूहों में विभाजित किया गया है: जिला सशस्त्र पुलिस/जिला सशस्त्र रिज़र्व (डीएआर) और राज्य सशस्त्र पुलिस बल या प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी बल। जिला सशस्त्र पुलिस एक सेना पैदल सेना बटालियन की तरह संगठित होती है। इन्हें पुलिस स्टेशनों में तैनात किया जाता है और ये सुरक्षा एवं एस्कॉर्ट की जिम्मेदारी निभाते हैं। जिला सशस्त्र रिज़र्व पुलिस (डीएआर) संबंधित जिला पुलिस इकाइयों के तहत कार्य करती है। जिन राज्यों में सशस्त्र बल होते हैं, वे उन्हें आपातकालीन रिज़र्व स्ट्राइक बल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इन इकाइयों को राज्य नियंत्रण के तहत एक मोबाइल सशस्त्र बल के रूप में या, जिला सशस्त्र पुलिस के मामले में (जो उतनी सुसज्जित नहीं होती), जिला पुलिस अधीक्षकों द्वारा निर्देशित बल के रूप में संगठित किया जाता है और आमतौर पर दंगों को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी या राज्य सशस्त्र पुलिस एक सशस्त्र रिज़र्व है, जिसे कुछ राज्यों में महत्वपूर्ण स्थानों पर बनाए रखा जाता है और इसे डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल और उच्च स्तर के अधिकारियों के आदेश पर सक्रिय किया जाता है। सशस्त्र आरक्षी आम तौर पर जनता के संपर्क में नहीं आते जब तक कि वे वीआईपी ड्यूटी या मेलों, त्यौहारों, खेल आयोजनों, चुनावों, और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात न हों। इन्हें छात्रों या श्रमिकों के विरोध, संगठित अपराध, और सामुदायिक दंगों को नियंत्रित करने, महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियों की रखवाली करने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लेने के लिए भेजा जा सकता है। असाइनमेंट के आधार पर, प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी केवल लाठी लेकर तैनात हो सकते हैं।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पुलिस की कमांड चेन का पालन करते हैं और नामित नागरिक अधिकारियों के सामान्य दिशा-निर्देशों के तहत कार्य करते हैं। नगर पुलिस बल में कमांड की चेन राज्य गृह सचिव तक चलती है, न कि जिला पुलिस अधीक्षक या जिला अधिकारियों तक।
भर्ती होने वाले कर्मियों को लगभग [[भारतीय रुपया|₹]]30,000 प्रति माह का वेतन मिलता है। पदोन्नति के अवसर सीमित होते हैं क्योंकि उच्च ग्रेड में प्रवेश का प्रणालीकृत तरीका है। महाराष्ट्र राज्य पुलिस पर 2016 के एक लेख में बताया गया है कि सुधार की आवश्यकता क्यों है।<ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/news/Fixing-Mumbai-Free-the-police/article14494203.ece|title=Fixing Mumbai: Free the police|first=Vappala|last=Balachandran|newspaper=The Hindu|date=17 July 2016}}</ref>
1980 के दशक के अंत से भारतीय पुलिस के उच्च पदों पर महिलाओं का प्रवेश बढ़ा है, मुख्य रूप से भारतीय पुलिस सेवा प्रणाली के माध्यम से। महिला अधिकारियों को पहली बार 1972 में उपयोग किया गया था, और कई महिलाएं राज्य पुलिस संगठनों में प्रमुख पदों पर हैं। हालांकि, उनकी कुल संख्या कम है। नई दिल्ली में "एंटी-ईव टीज़िंग स्क्वाड" के रूप में वर्दीधारी और अंडरकवर महिला पुलिस अधिकारियों को महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ तैनात किया गया है। तमिलनाडु में महिलाओं के खिलाफ [[यौन उत्पीड़न]] से निपटने के लिए कई महिला-केवल पुलिस स्टेशन स्थापित किए गए हैं।
===वर्दी===
{{See also|भारत में पुलिस पद और प्रतीक चिन्ह}}
[[File:Ranks of Police National Police Museum New Delhi India.jpg|thumb|alt=Mannequins in khaki uniforms|[[राष्ट्रीय पुलिस स्मारक]] एवं संग्रहालय, नई दिल्ली में भारतीय पुलिस रैंक और वर्दी की प्रदर्शनी]]
राज्य और स्थानीय पुलिस की वर्दी ग्रेड, क्षेत्र, और कर्तव्य के प्रकार के अनुसार भिन्न होती है। राज्य पुलिस की मुख्य सेवा वर्दी खाकी रंग की होती है। कुछ शहरों, जैसे कोलकाता में, सफेद वर्दी होती है। रैंक और राज्य के आधार पर हेडगियर में भी अंतर होता है; अधिकारी आमतौर पर एक पीक कैप पहनते हैं, और सिपाही बेरेट या साइडकैप पहनते हैं।<ref>{{Cite web |url=http://persmin.gov.in/Archive/Acts_Rules_Archive/AISRules_Archive/IPSRules/IPS(Uniform)Rules(Revised).htm#_ftnref21 |title=1The Indian Police Service (Uniform) Rules, 1954 |access-date=31 August 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140208194152/http://persmin.gov.in/Archive/Acts_Rules_Archive/AISRules_Archive/IPSRules/IPS(Uniform)Rules(Revised).htm#_ftnref21 |archive-date=8 February 2014 |url-status=dead }}</ref> अपराध शाखा, विशेष शाखा जैसे विभागों की वर्दी नहीं होती; व्यवसायिक परिधान (शर्ट, टाई, ब्लेज़र, आदि) के साथ एक बैज पहना जाता है। विशेष सेवा सशस्त्र पुलिस की वर्दी उनके कार्य के अनुसार सामरिक होती है, और यातायात पुलिस आमतौर पर सफेद वर्दी पहनती है।
===संगठन===
[[File:Delhi Police Headquarters.jpg|thumb|दिल्ली पुलिस मुख्यालय]]
राज्य पुलिस का नेतृत्व एक आईपीएस अधिकारी करते हैं, जिनका पद पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) होता है। डीजीपी की सहायता दो (या अधिक) अतिरिक्त पुलिस महानिदेशकों (एडीजी) द्वारा की जाती है। डीजीपी स्तर के अन्य अधिकारी स्वायत्त निकायों का नेतृत्व करते हैं जो डीजीपी के अधीन नहीं होते, जैसे पुलिस भर्ती बोर्ड, अग्निशमन सेवा, पुलिस प्रशिक्षण, सतर्कता, भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो, कारागार विभाग, पुलिस आवास सोसायटी, पुलिस कल्याण ब्यूरो आदि। राज्य बलों को जोनों में संगठित किया गया है, जिनमें दो (या अधिक) रेंज होते हैं। महत्वपूर्ण जोनों का नेतृत्व एक अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) करते हैं, जबकि अन्य जोनों का नेतृत्व एक पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) करते हैं। प्रत्येक रेंज में कई जिले होते हैं। महत्वपूर्ण रेंज का नेतृत्व एक आईजी करते हैं, जबकि अन्य रेंज का नेतृत्व एक डीआईजी करते हैं।
महत्वपूर्ण जिलों का नेतृत्व एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) करते हैं, जबकि अन्य जिलों का नेतृत्व एक पुलिस अधीक्षक (एसपी) करते हैं। यदि एक एसएसपी जिले का नेतृत्व कर रहे हैं, तो उनकी सहायता दो (या अधिक) एसपी करते हैं। यदि जिले का नेतृत्व एक एसपी कर रहे हैं, तो उनकी सामान्यतः सहायता एक या दो अतिरिक्त एसपी द्वारा की जाती है। प्रत्येक जिला उप-विभागों या सर्किलों में बंटा होता है, जिसका नेतृत्व एक पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) करता है। प्रत्येक उप-विभाग में कई पुलिस थाने होते हैं, जिनका नेतृत्व एक पुलिस निरीक्षक द्वारा किया जाता है, और जिनकी सहायता उप-निरीक्षकों (एसआई) और सहायक उप-निरीक्षकों (एएसआई) द्वारा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, एक पुलिस उप-निरीक्षक एक पुलिस स्टेशन का प्रभारी होता है, जबकि पुलिस सर्कल निरीक्षक पुलिस स्टेशनों के कार्यों की निगरानी करते हैं। उप-निरीक्षक (और इससे उच्च अधिकारी) अदालत में आरोप-पत्र दाखिल कर सकते हैं।
[[File:Police Constable.JPG|thumb|[[मुंबई]] में पुलिस कांस्टेबल]]
जिलों के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। [[जिला मजिस्ट्रेट]] (डीएम), जो एक आईएएस अधिकारी होते हैं, इन शक्तियों का प्रयोग करते हैं, जिनमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की [[धारा 144]] लागू करना और शस्त्र लाइसेंस जारी करना शामिल है।
जिला पुलिस बल के अलावा, राज्य पुलिस के तहत अन्य विभाग भी हो सकते हैं, जैसे कि [[अपराध जांच विभाग (भारत)|अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी)]], आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), टेलीकॉम, वीआईपी सुरक्षा, ट्रैफिक पुलिस, सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी), भ्रष्टाचार विरोधी संगठन, राज्य सशस्त्र पुलिस बल, आतंकवाद विरोधी दस्ता (एटीएस), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एससीआरबी), फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), राज्य विशेष शाखा, तटीय सुरक्षा पुलिस आदि।<ref>{{cite web |title=Organisational Setup of Uttar Pradesh Police |url=https://uppolice.gov.in/pages/en/topmenu/about-us/en-organisational-setup-of-uttar-pradesh-police |publisher=[[Uttar Pradesh Police]] |access-date=15 May 2021}}</ref>
====भारत सरकार रेलवे पुलिस====
भारत सरकार रेलवे पुलिस (जीआरपी) एक सुरक्षा पुलिस बल है जो भारतीय रेलवे के रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। इसके कर्तव्य उनके क्षेत्राधिकार में आने वाले इलाकों में जिला पुलिस के समान हैं, लेकिन केवल रेलवे संपत्ति पर लागू होते हैं। जहां रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अधीन आता है, वहीं जीआरपी संबंधित राज्य पुलिस या केंद्र शासित प्रदेश पुलिस के अधीन आती है।<ref>{{cite news |agency=Press Trust of India |title=MoS Railways dubs Railway Protection Force as 'toothless', demands more power for it |url=https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/railways/mos-railways-dubs-railway-protection-force-as-toothless-demands-more-power-for-it/articleshow/67560323.cms |access-date=12 June 2019 |website=economictimes.indiatimes.com}}</ref><ref>{{cite news |author=[[Bibek Debroy]] |title=Lesser-known facts about GRP and RPF |url=https://www.business-standard.com/article/opinion/lesser-known-facts-about-grp-and-rpf-117061501484_1.html |access-date=16 May 2021 |agency=[[Business Standard]]}}</ref>
===पुलिस कमिश्नरी===
{{see also|पुलिस आयुक्त (भारत)}}
कुछ प्रमुख महानगरों में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू है (जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर आदि), जिसके प्रमुख पुलिस कमिश्नर होते हैं। इस प्रणाली की मांग बढ़ रही है क्योंकि यह पुलिस को स्वतंत्र रूप से कार्य करने और किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने की छूट देती है। वर्तमान में भारत के 68 बड़े शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में यह प्रणाली लागू है।
औपनिवेशिक काल में भी कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास जैसे प्रेसिडेंसी नगरों में कमिश्नरी प्रणाली थी।
पुलिस कमिश्नर (सीपी) के अधीन ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर (ज्वाइंट सीपी), पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) और सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) होते हैं। पुलिस कमिश्नर और उनके डिप्टी कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में सीआरपीसी की धारा 144 लागू करने और शस्त्र लाइसेंस जारी करने का अधिकार रखते हैं।
पुलिस कमिश्नरी राज्य पुलिस के अधीन होती है, लेकिन कोलकाता पुलिस स्वतंत्र रूप से पश्चिम बंगाल सरकार के गृह विभाग को रिपोर्ट करती है।
===यातायात पुलिस===
[[File:India - Kolkata traffic cop - 3661.jpg|alt=Two mounted-police officers|thumb|कोलकाता में यातायात पुलिस गाड़ियों को निर्देश देती हुई।|180x180px]]
राज्य पुलिस के अंतर्गत छोटे शहरों में हाईवे पुलिस और ट्रैफिक पुलिस आती है; शहरों में ट्रैफिक पुलिस मेट्रोपॉलिटन और राज्य पुलिस के अधीन होती है।
ट्रैफिक पुलिस यातायात को सुचारू रूप से बनाए रखने और अपराधियों को रोकने का कार्य करती है।
हाईवे पुलिस राजमार्गों की सुरक्षा और तेज गति से चलने वाले वाहनों को पकड़ने का कार्य करती है। दुर्घटनाओं, पंजीकरण और वाहन संबंधी डेटा की जांच ट्रैफिक पुलिस द्वारा की जाती है।
===राज्य सशस्त्र पुलिस बल===
राज्य सशस्त्र पुलिस बल विशेष रूप से हिंसात्मक या गंभीर स्थितियों में, जैसे डाकुओं और नक्सलियों का मुकाबला करने में राज्य को पुलिसिंग प्रदान करते हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तरह, इन्हें अनौपचारिक रूप से अर्धसैनिक बल के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक राज्य पुलिस बल एक सशस्त्र बल बनाए रखता है, जैसे कि प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) और विशेष सशस्त्र पुलिस, जो आपातकालीन स्थिति और भीड़ नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन्हें आमतौर पर एक उप महानिरीक्षक या उच्च-स्तरीय अधिकारियों के आदेश पर सक्रिय किया जाता है। नीचे राज्य सशस्त्र पुलिस बलों की सूची दी गई है।
{{static row numbers}}{{Table alignment}}
{|class="wikitable sortable static-row-numbers static-row-header-text hover-highlight" "style="font-size: 100%"
|+राज्य सशस्त्र पुलिस बलों की सूची
!राज्य का नाम
!राज्य सशस्त्र पुलिस बल
|-
|[[आंध्र प्रदेश]]
|[[आंध्र प्रदेश पुलिस|आंध्र प्रदेश राज्य विशेष और आरक्षित पुलिस बल]]
|-
|[[अरुणाचल प्रदेश]]
|[[अरुणाचल प्रदेश पुलिस|अरुणाचल प्रदेश सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[असम]]
|[[असम पुलिस|असम पुलिस बटालियन]]
|-
|[[बिहार]]
|[[राज्य सशस्त्र पुलिस बल|बिहार सैन्य पुलिस]]
|-
|[[गोवा]]
|भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[गुजरात]]
|[[गुजरात पुलिस|गुजरात राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
|-
|[[हरियाणा]]
|[[हरियाणा पुलिस|हरियाणा सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[हिमाचल प्रदेश]]
|भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[झारखंड]]
|[[झारखंड पुलिस|झारखंड सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[कर्नाटक]]
|[[कर्नाटक पुलिस|कर्नाटक राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
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|[[केरल]]
|[[केरल पुलिस|केरल सशस्त्र पुलिस]], मालाबार विशेष पुलिस, [[राज्य सशस्त्र पुलिस बल|विशेष सशस्त्र पुलिस]]
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|[[मध्य प्रदेश]]
|[[मध्य प्रदेश पुलिस|मध्य प्रदेश विशेष सशस्त्र पुलिस बल (एसएएफ)]]
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|[[महाराष्ट्र]]
|[[महाराष्ट्र पुलिस|महाराष्ट्र राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
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|[[मणिपुर]]
|[[मणिपुर पुलिस|मणिपुर राइफल्स]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[मेघालय]]
|[[मेघालय पुलिस|मेघालय सशस्त्र पुलिस बटालियन]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[मिजोरम]]
|[[मिजोरम पुलिस]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[नागालैंड]]
|[[नागालैंड पुलिस|नागालैंड सशस्त्र पुलिस]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[ओडिशा]]
|[[ओडिशा पुलिस|ओडिशा विशेष सशस्त्र पुलिस]]
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|[[पंजाब]]
|[[पंजाब पुलिस (भारत)|पंजाब सशस्त्र पुलिस]]
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|[[राजस्थान]]
|[[राजस्थान पुलिस|राजस्थान सशस्त्र कांस्टेबुलरी]]
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|[[सिक्किम]]
|[[सिक्किम पुलिस|सिक्किम सशस्त्र पुलिस]]
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|[[तमिलनाडु]]
|[[तमिलनाडु पुलिस|तमिलनाडु विशेष पुलिस]]
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|[[तेलंगाना]]
|[[तेलंगाना पुलिस|तेलंगाना राज्य विशेष पुलिस]]
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|[[त्रिपुरा]]
|त्रिपुरा स्टेट राइफल्स और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[उत्तर प्रदेश]]
|उत्तर प्रदेश प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी
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|[[उत्तराखंड]]
|[[उत्तराखंड पुलिस|उत्तराखंड प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी]]
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|[[पश्चिम बंगाल]]
|[[पश्चिम बंगाल पुलिस|पश्चिम बंगाल सशस्त्र पुलिस बल]], पूर्वी सीमांत राइफल्स और [[कोलकाता पुलिस|कोलकाता सशस्त्र पुलिस]]
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==इन्हें भी देखें==
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Sheriff#India भारत के शेरिफ]
* [[भारतीय सशस्त्र बल]]
* [[भारत की न्यायपालिका]]
* [[भारतीय दंड संहिता]]
* [[भारत सरकार]]
* [[भारत मे द्रव्यमान निगरानी]]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Indian_intelligence_agencies भारतीय खुफिया एजेंसियों की सूची]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/National_Counter_Terrorism_Centre राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Police_Complaints_Authority_(India) पुलिस शिकायत प्राधिकरण (भारत)]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Police_Foundation_and_Institute भारतीय पुलिस फाउंडेशन और संस्थान]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_cases_of_police_brutality_in_India भारत में पुलिस बर्बरता के मामलों की सूची]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Crime_and_Criminal_Tracking_Network_and_Systems अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_and_dependencies_by_number_of_police_officers पुलिस अधिकारियों की संख्या के आधार पर देशों और आश्रितों की सूची]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची|2}}
==बाहरी कड़ियाँ==
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{{भारत में कानून प्रवर्तन}}
{{Asia topic|कानून प्रवर्तन}}
{{Asia topic|बड़े पैमाने पर निगरानी}}
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[[श्रेणी:भारत में विधि-प्रवर्तन]]
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AMAN KUMAR
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[[विशेष:योगदान/खास विशेष|खास विशेष]] ([[सदस्य वार्ता:खास विशेष|वार्ता]]) के अवतरण 6302718 पर पुनर्स्थापित : प्रचार हटाया
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[[File:The President, Shri Ram Nath Kovind with the Probationers of 70 RR (2017 Batch) of the Indian Police Service from Sardar Vallabhbhai Patel National Police Academy, at Rashtrapati Bhavan, in New Delhi on October 12, 2018 (1).JPG|alt=Khaki-clad officers supervise a peaceful demonstration|thumb|[[भारत]] के पूर्व राष्ट्रपति [[राम नाथ कोविंद]], 2018 में [[नई दिल्ली]] स्थित [[राष्ट्रपति भवन]] में [[भारतीय पुलिस सेवा]] के अधिकारियों के साथ।]]
[[File:Women personnel of India's Border Security Force.jpg|thumb|[[भारत-पाकिस्तान सीमा]] पर महिला सुरक्षाकर्मी।]]
'''भारत में कानून प्रवर्तन''' [[न्याय]] और [[व्यवस्था]] बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक इकाई है। [[भारतीय कानून]] का पालन सुनिश्चित करने के लिए कई एजेंसियों कार्यरत हैं। कई संघीय देशों के विपरीत, [[भारत का संविधान]] कानून और व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी [[भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश|राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों]] को सौंपता है।<ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/delhi/chidambaram-was-unsure-of-nia-s-constitutionality/story-cFZmQydPPbWZuqZ7TlupiJ.html|title=Chidambaram was unsure of NIA's constitutionality|date=19 मार्च 2011|website=हिंदुस्तान टाइम्स|language=en|trans-title=चिदंबरम एनआईए की संवैधानिकता को लेकर अनिश्चित थे|access-date=12 नवम्बर 2024}}</ref>
संघीय स्तर पर, [[भारत]] के कुछ [[अर्धसैनिक बल]] [[गृह मंत्रालय]] के अधीन आते हैं और राज्यों को सहायता प्रदान करते हैं। बड़े शहरों के पास अपने स्वयं के [[पुलिस]] बल होते हैं जो संबंधित राज्य पुलिस के अधीन होते हैं (सिवाय [[कोलकाता]] पुलिस के, जो स्वायत्त है और राज्य के गृह सचिव को रिपोर्ट करती है)। राज्य पुलिस बलों और संघीय एजेंसियों में सभी वरिष्ठ अधिकारी [[भारतीय पुलिस सेवा|भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस)]] के सदस्य होते हैं। भारत में आतंकवादी हमलों से निपटने के लिए संघीय और राज्य स्तर पर कुछ विशेष सामरिक बल हैं, जैसे मुंबई पुलिस क्विक रिस्पांस टीम, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड, एंटी-टेररिज्म स्क्वाड, दिल्ली पुलिस एसडब्ल्यूएटी आदि।
==केंद्रीय एजेंसियां==
[[File:The Union Home Minister, Shri Rajnath Singh presenting the medals and awards to CISF personnel, during the 49th Raising Day Parade of the Central Industrial Security Force (CISF), in Ghaziabad on March 10, 2018.jpg|alt=Two officers standing behind a machine gun|thumb|केंद्रीय गृह मंत्री [[राजनाथ सिंह]] ने सीआईएसएफ कर्मियों और कैडेटों को पदक और पुरस्कार प्रदान किए।]]
केंद्रीय एजेंसियां [[भारत सरकार|केंद्र सरकार]] द्वारा नियंत्रित होती हैं। अधिकांश संघीय कानून-प्रवर्तन एजेंसियां [[गृह मंत्रालय, भारत सरकार|गृह मंत्रालय]] के अंतर्गत आती हैं। प्रत्येक एजेंसी का प्रमुख एक आईपीएस अधिकारी होता है। संविधान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सौंपता है, और लगभग सभी सामान्य पुलिसिंग कार्य—जिसमें अपराधियों को पकड़ना भी शामिल है—राज्य-स्तरीय पुलिस बलों द्वारा किया जाता है। संविधान केंद्र सरकार को पुलिस संचालन और संगठन में भाग लेने की अनुमति भी देता है, जिससे भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) का निर्माण किया जा सके।
[[File:National Police Museum New Delhi India.jpg|alt=Museum exhibit, with uniformed mannequins|thumb|upright=1.2|नई दिल्ली में [[राष्ट्रीय पुलिस स्मारक]] और [[संग्रहालय]] में [[रेलवे सुरक्षा बल]], रैपिड एक्शन फोर्स, [[राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड]] और [[खुफिया ब्यूरो (भारत)|खुफिया ब्यूरो]] की प्रदर्शनी।]]
केंद्रीय पुलिस बल किसी राज्य के पुलिस बल की सहायता कर सकते हैं यदि राज्य सरकार इसकी मांग करती है। 1975-77 के आपातकाल के दौरान, संविधान में 1 फरवरी 1976 को एक संशोधन किया गया था जिससे केंद्र सरकार को राज्य की अनुमति के बिना अपने सशस्त्र पुलिस बलों को तैनात करने की अनुमति मिल गई थी। यह संशोधन लोकप्रिय नहीं था, और केंद्रीय पुलिस बलों का उपयोग विवादास्पद साबित हुआ। [[आपातकाल (भारत)|आपातकाल]] हटने के बाद, दिसंबर 1978 में संविधान में फिर से संशोधन किया गया और स्थिति को पूर्ववत कर दिया गया।
===गृह मंत्रालय===
कानून प्रवर्तन से संबंधित मुख्य राष्ट्रीय मंत्रालय गृह मंत्रालय (एमएचए) है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा संचालित और प्रशासित विभिन्न सरकारी कार्यों और एजेंसियों की देखरेख करता है। यह मंत्रालय सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने, लोक सेवा कर्मचारियों और प्रशासन का प्रबंधन, आंतरिक सीमाओं का निर्धारण, और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन जैसे मामलों से संबंधित है।
भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) पर नियंत्रण के साथ-साथ, गृह मंत्रालय कई पुलिस और सुरक्षा से संबंधित एजेंसियों और संगठनों का प्रबंधन करता है। केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन होती है। गृह मंत्री इस मंत्रालय के लिए कैबिनेट मंत्री होते हैं, जबकि गृह सचिव, जो एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी होते हैं, मंत्रालय के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं।
===केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल===
{{Main|केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल}}
====सीमा सुरक्षा बल====
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) शांति काल में भारत की भूमि सीमाओं की निगरानी और सीमा-पार अपराधों की रोकथाम के लिए जिम्मेदार है। यह गृह मंत्रालय के अधीन एक केंद्रीय पुलिस बल है, जिसके कर्तव्यों में महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा, चुनाव पर्यवेक्षण, महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा और नक्सल-विरोधी अभियानों का संचालन शामिल है।
[[1965 के भारत-पाक युद्ध]] ने मौजूदा सीमा प्रबंधन प्रणाली की अपर्याप्तता को उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप [[पाकिस्तान]] के साथ भारत की सीमा की सुरक्षा के लिए बीएसएफ का गठन एक एकीकृत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के रूप में किया गया। बीएसएफ की पुलिसिंग क्षमता का उपयोग 1971 के [[भारत-पाक युद्ध]] में [[पाकिस्तान सशस्त्र बल|पाकिस्तानी सशस्त्र बलों]] के खिलाफ उन क्षेत्रों में किया गया, जहाँ खतरा कम था। युद्ध के समय या केंद्रीय सरकार के आदेश पर, बीएसएफ का कमांड भारतीय सेना के अधीन होता है; बीएसएफ सैनिकों ने 1971 के लोंगेवाला युद्ध में इस क्षमता में भाग लिया। 1971 के युद्ध (जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ) के बाद, [[बांग्लादेश]] के साथ सीमा की निगरानी का कार्य बीएसएफ को सौंपा गया।
मूल रूप से भारत की बाहरी सीमाओं की सुरक्षा के लिए गठित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को अब आतंकवाद और विद्रोह विरोधी अभियानों का कार्य भी सौंपा गया है। जब 1989 में जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद भड़क उठा और राज्य पुलिस तथा कम तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को बढ़ती हिंसा से निपटने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता पड़ी, तो केंद्र सरकार ने कश्मीरी उग्रवादियों से लड़ने के लिए बीएसएफ को [[जम्मू]] और [[कश्मीर]] में तैनात किया।
बीएसएफ [[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] में अपने अकादमी में एक टियर-स्मोक यूनिट संचालित करता है, जो दंगों की रोकथाम के लिए सभी राज्य पुलिस बलों को आंसू गैस और धुएं के गोले उपलब्ध कराता है। यह डॉग स्क्वॉड संचालित करता है और राष्ट्रीय डॉग ट्रेनिंग और अनुसंधान केंद्र भी चलाता है। बीएसएफ, जो भारतीय पुलिस बलों में से एक है जिसके पास अपने स्वयं के वायु और जल विंग हैं, राज्य पुलिस को हेलीकॉप्टर, कुत्तों और अन्य सहायक सेवाएँ प्रदान करता है।
====केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल====
[[केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल]] (सीआईएसएफ) का मुख्य कार्य औद्योगिक सुरक्षा प्रदान करना है।<ref>{{cite news |title=Role of CISF in the internal security of the country |url=https://morungexpress.com/role-cisf-internal-security-country |access-date=29 March 2021 |work=MorungExpress}}</ref> यह पूरे देश में केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करता है, समुद्री बंदरगाहों और हवाई अड्डों की सुरक्षा करता है, और कुछ गैर-सरकारी संगठनों को भी सुरक्षा प्रदान करता है। सीआईएसएफ [[परमाणु ऊर्जा संयंत्र|परमाणु ऊर्जा संयंत्रों]], अंतरिक्ष प्रतिष्ठानों, टकसालों, तेल क्षेत्र और रिफाइनरियों, भारी इंजीनियरिंग और इस्पात संयंत्रों, बांधों, उर्वरक इकाइयों, जलविद्युत और ताप विद्युत स्टेशनों और अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों को आंशिक या पूर्ण रूप से सुरक्षा प्रदान करता है।<ref>{{cite web |title=Section 10 in the Central Industrial Security Force Act, 1968 |url=https://indiankanoon.org/doc/573891/ |publisher=Indian Kanoon |access-date=29 March 2021}}</ref>
====केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल====
[[केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल]] (सीआरपीएफ) का मुख्य उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की कानून और व्यवस्था बनाए रखने और उग्रवाद को नियंत्रित करने में सहायता करना है। इसे कई क्षेत्रों में आतंकवाद विरोधी इकाई के रूप में तैनात किया जाता है और यह संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों के हिस्से के रूप में विदेशों में भी कार्य करता है।<ref>{{cite news |title=CRPF contingent evacuated as situation worsens in Libya: Sushma Swaraj |url=https://www.indiatoday.in/india/story/sushma-swaraj-says-india-evacuates-peacekeeping-crpf-contingent-as-situation-worsen-in-libya-1496101-2019-04-07 |access-date=29 March 2021 |work=India Today |date=7 April 2019 |language=en}}</ref>
====भारत-तिब्बत सीमा पुलिस====
90,000 सदस्यों वाली इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) 2,115 किलोमीटर (1,314 मील) लंबे [[भारत तिब्बत सीमा पुलिस|भारत-तिब्बत सीमा]] और इसके आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। आईटीबीपी के कर्मियों को कानून और व्यवस्था बनाए रखने, [[सैन्य रणनीति]], जंगल युद्ध, उग्रवाद विरोधी और आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया है। उन्हें [[अफगानिस्तान]] में स्थित भारतीय राजनयिक मिशनों में भी तैनात किया गया था।<ref>{{cite news |title=India sending 35 ITBP commandos to guard Afghanistan missions |url=https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/india-sending-35-itbp-commandos-to-guard-afghanistan-missions/articleshow/49557609.cms?from=mdr |access-date=29 March 2021 |work=The Economic Times |agency=PTI |date=27 October 2015}}</ref>
====राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड====
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) एक कमांडो इकाई है, जिसे मूल रूप से आतंकवाद विरोधी और बंधक मुक्ति मिशनों के लिए 1986 में स्थापित किया गया था। इसे इसके काले रंग के यूनिफॉर्म के कारण "ब्लैक कैट्स" के नाम से जाना जाता है। भारत में अधिकांश सैन्य और उच्च सुरक्षा इकाइयों की तरह, एनएसजी मीडिया से बचता है और भारतीय जनता को इसके कार्यक्षमता और संचालन विवरणों के बारे में बहुत कम जानकारी होती है।
एनएसजी अपने मुख्य सदस्य भारतीय सेना से प्राप्त करता है, जबकि शेष स्टाफ अन्य केंद्रीय पुलिस इकाइयों से लिया जाता है। एक एनएसजी टीम और एक परिवहन विमान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तैनात रहता है, जो 30 मिनट के भीतर तैनाती के लिए तैयार रहता है।
====सशस्त्र सीमा बल====
सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी), जिसकी स्थापना 1963 में हुई थी, भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमाओं पर तैनात है। एसएसबी के पास 82,000 से अधिक कर्मी हैं, जिन्हें कानून और व्यवस्था बनाए रखने, सैन्य रणनीतियों, जंगल युद्ध, विरोधी उग्रवाद और आंतरिक सुरक्षा में प्रशिक्षित किया जाता है। इसके कर्मियों को खुफिया ब्यूरो (आईबी), अनुसंधान और विश्लेषण विंग (रिऔरएडब्लू), विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी), और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में भी तैनात किया जाता है। अधिकारी सहायक कमांडेंट के रूप में शुरुआत करते हैं (जो राज्य पुलिस में उपनिरीक्षक के समकक्ष होता है), और सेवानिवृत्त होने पर उन्हें निरीक्षक जनरल (आईजी) के पद पर पदोन्नत किया जाता है।
===विशेष सुरक्षा समूह===
विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) केंद्रीय सरकार की एक्जीक्यूटिव सुरक्षा एजेंसी है, जो भारत के प्रधानमंत्री और उनके तत्काल परिवार की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। इस बल की स्थापना 1985 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की गई थी। यह बल वर्तमान प्रधानमंत्री और उनके परिवार को पूरे भारत में 24 घंटे, हर दिन सुरक्षा प्रदान करता है। एसपीजी का उद्देश्य प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें किसी भी संभावित खतरे से बचाना है, और यह विशेष रूप से उच्चतम स्तर की सुरक्षा और कड़ी निगरानी प्रदान करता है।
===केंद्रीय जांच और खुफिया संस्थाएं===
====केंद्रीय जांच ब्यूरो====
[[केंद्रीय जांच ब्यूरो]] (सीबीआई) भारत की प्रमुख जांच एजेंसी है, जो विभिन्न प्रकार के अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के लिए जिम्मेदार है। इसे अक्सर दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के तहत स्थापित माना जाता है, लेकिन इसे केंद्रीय सरकार द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से बनाया गया था। इसकी संविधानिकता को [[गुवाहाटी उच्च न्यायालय]] में ''नरेंद्र कुमार बनाम भारत संघ'' मामले में चुनौती दी गई थी, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि सभी पुलिसिंग क्षेत्रों का अधिकार राज्य सरकारों को है, जबकि सीबीआई एक केंद्रीय-सरकारी एजेंसी है। अदालत ने यह निर्णय लिया कि कानून की कमी के बावजूद, सीबीआई केंद्रीय सरकार की राष्ट्रीय पुलिसिंग के लिए अधिकृत एजेंसी है। इसके निर्णय को [[सर्वोच्च न्यायालय]] ने भी सही ठहराया और सीबीआई के राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए इसे वैध माना।
यह एजेंसी भारत सरकार के [[कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय]] के तहत आती है, जिसका नेतृत्व आम तौर पर प्रधानमंत्री करते हैं, जो [[कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्री]] होते हैं। भारत का इंटरपोल यूनिट, सीबीआई अपने कर्मचारियों को देशभर से भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों से भर्ती करती है। सीबीआई उच्च-रैंकिंग सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं से जुड़े अपराधों में विशेष रूप से माहिर है, और मीडिया और जनता के दबाव के कारण इसे अन्य आपराधिक मामलों को भी संभालने का अवसर मिला है (जो आम तौर पर स्थानीय पुलिस की जांच में अक्षमता के कारण होता है)।
====आयकर विभाग====
{{Main|आयकर जांच महानिदेशालय|केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का जांच प्रभाग|मुख्य आयकर आयुक्त, केन्द्रीय}}
[[File:ALH Dhruv, Indian Air Force.jpg|alt=Indian Navy helicopter, seen from below|thumb|आयकर जांच महानिदेशालय को हेलीकॉप्टर भारतीय वायु सेना द्वारा आपूर्ति किये जाते हैं।]]
[[आयकर विभाग]] (आईटीडी) भारत की प्रमुख वित्तीय एजेंसी है, जो वित्तीय और राजस्व संबंधी मामलों के लिए जिम्मेदार है। यह विभाग वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन आता है, जिसका नेतृत्व एक मंत्री करते हैं जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) भी राजस्व विभाग का हिस्सा है। सीबीडीटी प्रत्यक्ष करों की नीतियों और योजनाओं के लिए इनपुट प्रदान करता है और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानूनों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। यह बोर्ड केंद्रीय राजस्व अधिनियम, 1963 के अनुसार कार्य करता है। बोर्ड के सदस्य अपने पद के अनुसार करों के लगान और संग्रहण, कर चोरी और राजस्व खुफिया जैसे मामलों को देखना है। यह भारत का आधिकारिक [[वित्तीय कार्रवाई कार्यदल]] (एफएटीएफ) यूनिट है। आयकर विभाग का स्टाफ [[भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस)]] के अधिकारियों से लिया जाता है और यह आर्थिक अपराधों और कर चोरी की जांच के लिए जिम्मेदार है। कुछ विशेष एजेंट और एजेंट हथियार रखने का अधिकार भी रखते हैं।<ref name="express">{{cite news |title=Tax evasion cases: I-T 'special agents' to carry arms |url=http://archive.indianexpress.com/news/tax-evasion-cases-it-special-agents-to-carry-arms/843036/ |access-date=27 July 2019 |work=[[The Indian Express]] |date=7 September 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160314100752/http://archive.indianexpress.com/news/tax-evasion-cases-it-special-agents-to-carry-arms/843036/ |archive-date=14 March 2016 |url-status=live }}</ref>
क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन निदेशालय (डीसीआई) का नेतृत्व इंटेलिजेंस (इनकम टैक्स) के महानिदेशक करते हैं, जो सीमा पार काले धन के मामलों से निपटने के लिए स्थापित किया गया था। डीसीआई "ऐसे व्यक्तियों और लेनदेन की गुप्त जांच करता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली और प्रत्यक्ष कर कानूनों के तहत दंडनीय आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।"<ref name="express" />
आईटीडी के इंटेलिजेंस निदेशालय के आयुक्त, जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और लखनऊ में नियुक्त, डीसीआई के लिए आपराधिक जांच भी करेंगे। आईटीडी की इंटेलिजेंस शाखा सेंट्रल इंफॉर्मेशन ब्रांच (सीआईबी) की निगरानी करती है, जो करदाताओं के वित्तीय लेनदेन का एक डेटाबेस रखता है।
====राजस्व खुफिया निदेशालय====
[[राजस्व खुफिया निदेशालय]] (डीआरआई) एक खुफिया आधारित संगठन है जो भारत में तस्करी विरोधी प्रयासों के समन्वय के लिए जिम्मेदार है। इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा और [[केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड]] के ग्रुप बी से लिए जाते हैं।
====केंद्रीय आर्थिक आसूचना ब्यूरो====
[[केंद्रीय आर्थिक आसूचना ब्यूरो]] (सीईआईबी) एक खुफिया एजेंसी है जो आर्थिक अपराधों और आर्थिक युद्ध से संबंधित सूचनाओं के संग्रहण और आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए जिम्मेदार है।
====वस्तु एवं सेवाकर खुफिया महानिदेशालय====
वस्तु एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीआई), जिसे पहले केंद्रीय उत्पाद शुल्क खुफिया महानिदेशालय (डीजीसीईआई) कहा जाता था, एक खुफिया-आधारित संगठन है जो केंद्रीय उत्पाद शुल्क और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित कर चोरी के मामलों के लिए जिम्मेदार है। इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के ग्रुप बी से लिए जाते हैं।
====राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी====
[[राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी]] (एनआईए), जो कि आतंकवाद से मुकाबला करने वाली केंद्रीय एजेंसी है, राज्यों की अनुमति के बिना अंतर्राज्यीय आतंक से संबंधित अपराधों का निपटारा कर सकती है। राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी विधेयक 2008, जिसने इस एजेंसी की स्थापना की, 16 दिसंबर 2008 को गृह मंत्री द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया था।<ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/Finally-govt-clears-central-terror-agency-tougher-laws/articleshow/3842368.cms|title=Finally, govt clears central terror agency, tougher laws|website=The Times of India|date=16 December 2008 |access-date=26 July 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190814034303/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Finally-govt-clears-central-terror-agency-tougher-laws/articleshow/3842368.cms|archive-date=14 August 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/mumbaiterrorstrike/Story.aspx?ID=NEWEN20080076587&type=News|title=Cabinet clears bill to set up federal probe agency|access-date=25 May 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20130508110740/http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/mumbaiterrorstrike/Story.aspx?ID=NEWEN20080076587&type=News|archive-date=8 May 2013|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/Govt-tables-bill-to-set-up-National-Investigation-Agency/articleshow/3846827.cms|title=Govt tables bill to set up National Investigation Agency|website=The Times of India|date=16 December 2008 |access-date=26 July 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190811193724/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Govt-tables-bill-to-set-up-National-Investigation-Agency/articleshow/3846827.cms|archive-date=11 August 2019|url-status=live}}</ref> एनआईए को [[2008 के मुंबई हमले]] के बाद एक केंद्रीय आतंकवाद-रोधी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। यह मादक पदार्थों की तस्करी और मुद्रा की नकलीकरण जैसी समस्याओं से भी निपटती है, और इसके अधिकारी भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से आते हैं।
====नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो====
[[नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो]] (एनसीबी) पूरे भारत में मादक पदार्थ विरोधी अभियान के लिए जिम्मेदार है। इसका उद्देश्य अवैध मादक पदार्थों के प्रसार को रोकना और ड्रग्स की खेती पर नियंत्रण रखना है। इस ब्यूरो में अधिकारी भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से नियुक्त किए जाते हैं।
====पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो====
[[पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो]] (बीपीआरडी) की स्थापना 28 अगस्त 1970 को पुलिस बलों को आधुनिक बनाने के लिए की गई थी। यह पुलिस से संबंधित मुद्दों पर शोध करता है, जिसमें केंद्रीय और राज्य स्तर पर प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी का परिचय शामिल है।
====राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो====
1979 में, [[राष्ट्रीय पुलिस आयोग]] ने एक ऐसी एजेंसी बनाने की सिफारिश की थी जो आपराधिक रिकॉर्ड और एक साझा डेटाबेस का रखरखाव कर सके जिसे संघीय और राज्य स्तरों पर साझा किया जा सके। [[राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो]] (एनसीआरबी) की स्थापना, पुलिस कंप्यूटरों के समन्वय निदेशालय, केंद्रीय फिंगरप्रिंट ब्यूरो, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के समन्वय प्रभाग के डेटा सेक्शन, और पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के सांख्यिकीय सेक्शन को मिलाकर की गई थी।
===केंद्रीय फोरेंसिक संस्थान===
====केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला====
[[केन्द्रीय फॉरेन्सिक विज्ञान प्रयोगशाला]] (सीएफएसएल), जो गृह मंत्रालय का एक प्रभाग है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एकमात्र डीएनए संग्रहालय है। सात केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ हैं: [[हैदराबाद]], [[कोलकाता]], [[भोपाल]], [[चंडीगढ़]], [[पुणे]], [[गुवाहाटी]] और [[नई दिल्ली]] में। सीएफएसएल हैदराबाद रासायनिक विज्ञान में उत्कृष्टता केंद्र है, सीएफएसएल कोलकाता जैविक विज्ञान में और सीएफएसएल चंडीगढ़ भौतिक विज्ञान में। इन प्रयोगशालाओं का प्राथमिक नियंत्रण मंत्रालय के फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय (डीएफएस) के अधीन है; नई दिल्ली की प्रयोगशाला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अधीन है और उसके लिए मामलों की जांच करती है।
====राष्ट्रीय अपराधविज्ञान और फोरेंसिक विज्ञान संस्थान====
राष्ट्रीय अपराधविज्ञान और फोरेंसिक विज्ञान संस्थान (एनआईसीएफएस) की स्थापना 4 जनवरी 1972 को [[विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (भारत)|विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)]] द्वारा नियुक्त एक समिति की सिफारिश पर की गई थी। सितंबर 1979 में, यह संस्थान गृह मंत्रालय का एक विभाग बन गया, जिसमें एक पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त किया गया। इसका नेतृत्व वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों द्वारा किया जाता है। संस्थान साइबर अपराध जांच में प्रशिक्षण प्रदान करता है और अपराधविज्ञान और फोरेंसिक (जिसमें साइबर फोरेंसिक शामिल है) के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान करता है। इसे [[विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (भारत)|विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग]] द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी संगठन के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
==राज्य पुलिस==
{{main|भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस बल}}
[[File:City of Taj Police Car.jpg|alt=A smiling constable|thumb|आगरा पुलिस गश्ती गाड़ी]]
राज्य पुलिस बल [[राज्य सरकार]] के अधीन संगठित होते हैं, और प्रत्येक राज्य और [[केंद्र शासित प्रदेश]] का अपना पुलिस बल होता है। पुलिस मामलों के लिए सर्वोच्च प्राधिकरण राज्य के गृह विभाग के पास होता है, जिसका नेतृत्व एक अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव, जिन्हें गृह सचिव भी कहा जाता है, द्वारा किया जाता है और जो सामान्यतः एक आईएएस अधिकारी होते हैं। राज्य पुलिस बल का नेतृत्व [[पुलिस महानिदेशक|पुलिस महानिदेशक (डीजीपी)]] करते हैं, जो सामान्यतः भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी होते हैं।
[[File:Nizamabad Police Vehicle.jpg|thumb|निजामाबाद सिटी पुलिस की गश्ती कार, ([[टोयोटा इनोवा]])]]
1861 का पुलिस अधिनियम भारत में पुलिस बलों के संगठन और कार्यप्रणाली के लिए आधारभूत ढांचा प्रदान करता है। भले ही विभिन्न राज्य पुलिस बलों में उपकरण और संसाधनों में भिन्नता हो सकती है, उनकी संगठनात्मक संरचना और संचालन पैटर्न सामान्यतः समान होते हैं।
डीजीपी के नीचे, पुलिस बल को पुलिस जोन, रेंज, जिलों, उपखंडों और पुलिस थानों में विभाजित किया जाता है। पुलिस जोन का नेतृत्व इंस्पेक्टर जनरल (आईजीपी) करते हैं, जबकि पुलिस रेंज का नेतृत्व डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) करते हैं। जिला पुलिस मुख्यालय का नेतृत्व पुलिस अधीक्षक (एसपी) करते हैं और वे अधीनस्थ इकाइयों की देखरेख करते हैं। कानून और व्यवस्था शाखा के अलावा, प्रत्येक राज्य पुलिस में विशेष शाखाएँ होती हैं जैसे कि आपराधिक जांच विभाग, खुफिया शाखा, पुलिस प्रशिक्षण शाखा और [[राज्य सशस्त्र पुलिस बल]], जिनका नेतृत्व वरिष्ठ अधिकारी करते हैं।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस को गृह मंत्रालय द्वारा तैयार दिशा-निर्देशों के तहत स्वयंसेवी [[भारतीय गृह रक्षक]] इकाइयों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।
अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, पुलिस बलों को सिविल (निर्जीव) पुलिस और सशस्त्र पुलिस टुकड़ियों में विभाजित किया गया है। सिविल पुलिस पुलिस स्टेशनों में तैनात होती है, जांच करती है, नियमित शिकायतों का उत्तर देती है, यातायात कर्तव्यों का निर्वहन करती है, और सड़कों पर गश्त करती है। वे सामान्यतः लाठी (बाँस की छड़ी, लोहे से वजनी या टिप की हुई) रखते हैं।
[[File:Karnataka Police Tata Vehicle.JPG|alt=Two motorcycle police officers in front of a police car|thumb|कर्नाटक राज्य पुलिस का सशस्त्र एसडब्ल्यूएटी वाहन]]
सशस्त्र पुलिस को दो समूहों में विभाजित किया गया है: जिला सशस्त्र पुलिस/जिला सशस्त्र रिज़र्व (डीएआर) और राज्य सशस्त्र पुलिस बल या प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी बल। जिला सशस्त्र पुलिस एक सेना पैदल सेना बटालियन की तरह संगठित होती है। इन्हें पुलिस स्टेशनों में तैनात किया जाता है और ये सुरक्षा एवं एस्कॉर्ट की जिम्मेदारी निभाते हैं। जिला सशस्त्र रिज़र्व पुलिस (डीएआर) संबंधित जिला पुलिस इकाइयों के तहत कार्य करती है। जिन राज्यों में सशस्त्र बल होते हैं, वे उन्हें आपातकालीन रिज़र्व स्ट्राइक बल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इन इकाइयों को राज्य नियंत्रण के तहत एक मोबाइल सशस्त्र बल के रूप में या, जिला सशस्त्र पुलिस के मामले में (जो उतनी सुसज्जित नहीं होती), जिला पुलिस अधीक्षकों द्वारा निर्देशित बल के रूप में संगठित किया जाता है और आमतौर पर दंगों को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी या राज्य सशस्त्र पुलिस एक सशस्त्र रिज़र्व है, जिसे कुछ राज्यों में महत्वपूर्ण स्थानों पर बनाए रखा जाता है और इसे डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल और उच्च स्तर के अधिकारियों के आदेश पर सक्रिय किया जाता है। सशस्त्र आरक्षी आम तौर पर जनता के संपर्क में नहीं आते जब तक कि वे वीआईपी ड्यूटी या मेलों, त्यौहारों, खेल आयोजनों, चुनावों, और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात न हों। इन्हें छात्रों या श्रमिकों के विरोध, संगठित अपराध, और सामुदायिक दंगों को नियंत्रित करने, महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियों की रखवाली करने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लेने के लिए भेजा जा सकता है। असाइनमेंट के आधार पर, प्रांतीय सशस्त्र आरक्षी केवल लाठी लेकर तैनात हो सकते हैं।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पुलिस की कमांड चेन का पालन करते हैं और नामित नागरिक अधिकारियों के सामान्य दिशा-निर्देशों के तहत कार्य करते हैं। नगर पुलिस बल में कमांड की चेन राज्य गृह सचिव तक चलती है, न कि जिला पुलिस अधीक्षक या जिला अधिकारियों तक।
भर्ती होने वाले कर्मियों को लगभग [[भारतीय रुपया|₹]]30,000 प्रति माह का वेतन मिलता है। पदोन्नति के अवसर सीमित होते हैं क्योंकि उच्च ग्रेड में प्रवेश का प्रणालीकृत तरीका है। महाराष्ट्र राज्य पुलिस पर 2016 के एक लेख में बताया गया है कि सुधार की आवश्यकता क्यों है।<ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/news/Fixing-Mumbai-Free-the-police/article14494203.ece|title=Fixing Mumbai: Free the police|first=Vappala|last=Balachandran|newspaper=The Hindu|date=17 July 2016}}</ref>
1980 के दशक के अंत से भारतीय पुलिस के उच्च पदों पर महिलाओं का प्रवेश बढ़ा है, मुख्य रूप से भारतीय पुलिस सेवा प्रणाली के माध्यम से। महिला अधिकारियों को पहली बार 1972 में उपयोग किया गया था, और कई महिलाएं राज्य पुलिस संगठनों में प्रमुख पदों पर हैं। हालांकि, उनकी कुल संख्या कम है। नई दिल्ली में "एंटी-ईव टीज़िंग स्क्वाड" के रूप में वर्दीधारी और अंडरकवर महिला पुलिस अधिकारियों को महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ तैनात किया गया है। तमिलनाडु में महिलाओं के खिलाफ [[यौन उत्पीड़न]] से निपटने के लिए कई महिला-केवल पुलिस स्टेशन स्थापित किए गए हैं।
===वर्दी===
{{See also|भारत में पुलिस पद और प्रतीक चिन्ह}}
[[File:Ranks of Police National Police Museum New Delhi India.jpg|thumb|alt=Mannequins in khaki uniforms|[[राष्ट्रीय पुलिस स्मारक]] एवं संग्रहालय, नई दिल्ली में भारतीय पुलिस रैंक और वर्दी की प्रदर्शनी]]
राज्य और स्थानीय पुलिस की वर्दी ग्रेड, क्षेत्र, और कर्तव्य के प्रकार के अनुसार भिन्न होती है। राज्य पुलिस की मुख्य सेवा वर्दी खाकी रंग की होती है। कुछ शहरों, जैसे कोलकाता में, सफेद वर्दी होती है। रैंक और राज्य के आधार पर हेडगियर में भी अंतर होता है; अधिकारी आमतौर पर एक पीक कैप पहनते हैं, और सिपाही बेरेट या साइडकैप पहनते हैं।<ref>{{Cite web |url=http://persmin.gov.in/Archive/Acts_Rules_Archive/AISRules_Archive/IPSRules/IPS(Uniform)Rules(Revised).htm#_ftnref21 |title=1The Indian Police Service (Uniform) Rules, 1954 |access-date=31 August 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140208194152/http://persmin.gov.in/Archive/Acts_Rules_Archive/AISRules_Archive/IPSRules/IPS(Uniform)Rules(Revised).htm#_ftnref21 |archive-date=8 February 2014 |url-status=dead }}</ref> अपराध शाखा, विशेष शाखा जैसे विभागों की वर्दी नहीं होती; व्यवसायिक परिधान (शर्ट, टाई, ब्लेज़र, आदि) के साथ एक बैज पहना जाता है। विशेष सेवा सशस्त्र पुलिस की वर्दी उनके कार्य के अनुसार सामरिक होती है, और यातायात पुलिस आमतौर पर सफेद वर्दी पहनती है।
===संगठन===
[[File:Delhi Police Headquarters.jpg|thumb|दिल्ली पुलिस मुख्यालय]]
राज्य पुलिस का नेतृत्व एक आईपीएस अधिकारी करते हैं, जिनका पद पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) होता है। डीजीपी की सहायता दो (या अधिक) अतिरिक्त पुलिस महानिदेशकों (एडीजी) द्वारा की जाती है। डीजीपी स्तर के अन्य अधिकारी स्वायत्त निकायों का नेतृत्व करते हैं जो डीजीपी के अधीन नहीं होते, जैसे पुलिस भर्ती बोर्ड, अग्निशमन सेवा, पुलिस प्रशिक्षण, सतर्कता, भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो, कारागार विभाग, पुलिस आवास सोसायटी, पुलिस कल्याण ब्यूरो आदि। राज्य बलों को जोनों में संगठित किया गया है, जिनमें दो (या अधिक) रेंज होते हैं। महत्वपूर्ण जोनों का नेतृत्व एक अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) करते हैं, जबकि अन्य जोनों का नेतृत्व एक पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) करते हैं। प्रत्येक रेंज में कई जिले होते हैं। महत्वपूर्ण रेंज का नेतृत्व एक आईजी करते हैं, जबकि अन्य रेंज का नेतृत्व एक डीआईजी करते हैं।
महत्वपूर्ण जिलों का नेतृत्व एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) करते हैं, जबकि अन्य जिलों का नेतृत्व एक पुलिस अधीक्षक (एसपी) करते हैं। यदि एक एसएसपी जिले का नेतृत्व कर रहे हैं, तो उनकी सहायता दो (या अधिक) एसपी करते हैं। यदि जिले का नेतृत्व एक एसपी कर रहे हैं, तो उनकी सामान्यतः सहायता एक या दो अतिरिक्त एसपी द्वारा की जाती है। प्रत्येक जिला उप-विभागों या सर्किलों में बंटा होता है, जिसका नेतृत्व एक पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) करता है। प्रत्येक उप-विभाग में कई पुलिस थाने होते हैं, जिनका नेतृत्व एक पुलिस निरीक्षक द्वारा किया जाता है, और जिनकी सहायता उप-निरीक्षकों (एसआई) और सहायक उप-निरीक्षकों (एएसआई) द्वारा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, एक पुलिस उप-निरीक्षक एक पुलिस स्टेशन का प्रभारी होता है, जबकि पुलिस सर्कल निरीक्षक पुलिस स्टेशनों के कार्यों की निगरानी करते हैं। उप-निरीक्षक (और इससे उच्च अधिकारी) अदालत में आरोप-पत्र दाखिल कर सकते हैं।
[[File:Police Constable.JPG|thumb|[[मुंबई]] में पुलिस कांस्टेबल]]
जिलों के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। [[जिला मजिस्ट्रेट]] (डीएम), जो एक आईएएस अधिकारी होते हैं, इन शक्तियों का प्रयोग करते हैं, जिनमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की [[धारा 144]] लागू करना और शस्त्र लाइसेंस जारी करना शामिल है।
जिला पुलिस बल के अलावा, राज्य पुलिस के तहत अन्य विभाग भी हो सकते हैं, जैसे कि [[अपराध जांच विभाग (भारत)|अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी)]], आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), टेलीकॉम, वीआईपी सुरक्षा, ट्रैफिक पुलिस, सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी), भ्रष्टाचार विरोधी संगठन, राज्य सशस्त्र पुलिस बल, आतंकवाद विरोधी दस्ता (एटीएस), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एससीआरबी), फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), राज्य विशेष शाखा, तटीय सुरक्षा पुलिस आदि।<ref>{{cite web |title=Organisational Setup of Uttar Pradesh Police |url=https://uppolice.gov.in/pages/en/topmenu/about-us/en-organisational-setup-of-uttar-pradesh-police |publisher=[[Uttar Pradesh Police]] |access-date=15 May 2021}}</ref>
====भारत सरकार रेलवे पुलिस====
भारत सरकार रेलवे पुलिस (जीआरपी) एक सुरक्षा पुलिस बल है जो भारतीय रेलवे के रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। इसके कर्तव्य उनके क्षेत्राधिकार में आने वाले इलाकों में जिला पुलिस के समान हैं, लेकिन केवल रेलवे संपत्ति पर लागू होते हैं। जहां रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अधीन आता है, वहीं जीआरपी संबंधित राज्य पुलिस या केंद्र शासित प्रदेश पुलिस के अधीन आती है।<ref>{{cite news |agency=Press Trust of India |title=MoS Railways dubs Railway Protection Force as 'toothless', demands more power for it |url=https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/railways/mos-railways-dubs-railway-protection-force-as-toothless-demands-more-power-for-it/articleshow/67560323.cms |access-date=12 June 2019 |website=economictimes.indiatimes.com}}</ref><ref>{{cite news |author=[[Bibek Debroy]] |title=Lesser-known facts about GRP and RPF |url=https://www.business-standard.com/article/opinion/lesser-known-facts-about-grp-and-rpf-117061501484_1.html |access-date=16 May 2021 |agency=[[Business Standard]]}}</ref>
===पुलिस कमिश्नरी===
{{see also|पुलिस आयुक्त (भारत)}}
कुछ प्रमुख महानगरों में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू है (जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर आदि), जिसके प्रमुख पुलिस कमिश्नर होते हैं। इस प्रणाली की मांग बढ़ रही है क्योंकि यह पुलिस को स्वतंत्र रूप से कार्य करने और किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने की छूट देती है। वर्तमान में भारत के 68 बड़े शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में यह प्रणाली लागू है।
औपनिवेशिक काल में भी कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास जैसे प्रेसिडेंसी नगरों में कमिश्नरी प्रणाली थी।
पुलिस कमिश्नर (सीपी) के अधीन ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर (ज्वाइंट सीपी), पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) और सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) होते हैं। पुलिस कमिश्नर और उनके डिप्टी कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में सीआरपीसी की धारा 144 लागू करने और शस्त्र लाइसेंस जारी करने का अधिकार रखते हैं।
पुलिस कमिश्नरी राज्य पुलिस के अधीन होती है, लेकिन कोलकाता पुलिस स्वतंत्र रूप से पश्चिम बंगाल सरकार के गृह विभाग को रिपोर्ट करती है।
===यातायात पुलिस===
[[File:India - Kolkata traffic cop - 3661.jpg|alt=Two mounted-police officers|thumb|कोलकाता में यातायात पुलिस गाड़ियों को निर्देश देती हुई।|180x180px]]
राज्य पुलिस के अंतर्गत छोटे शहरों में हाईवे पुलिस और ट्रैफिक पुलिस आती है; शहरों में ट्रैफिक पुलिस मेट्रोपॉलिटन और राज्य पुलिस के अधीन होती है।
ट्रैफिक पुलिस यातायात को सुचारू रूप से बनाए रखने और अपराधियों को रोकने का कार्य करती है।
हाईवे पुलिस राजमार्गों की सुरक्षा और तेज गति से चलने वाले वाहनों को पकड़ने का कार्य करती है। दुर्घटनाओं, पंजीकरण और वाहन संबंधी डेटा की जांच ट्रैफिक पुलिस द्वारा की जाती है।
===राज्य सशस्त्र पुलिस बल===
राज्य सशस्त्र पुलिस बल विशेष रूप से हिंसात्मक या गंभीर स्थितियों में, जैसे डाकुओं और नक्सलियों का मुकाबला करने में राज्य को पुलिसिंग प्रदान करते हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तरह, इन्हें अनौपचारिक रूप से अर्धसैनिक बल के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक राज्य पुलिस बल एक सशस्त्र बल बनाए रखता है, जैसे कि प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) और विशेष सशस्त्र पुलिस, जो आपातकालीन स्थिति और भीड़ नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन्हें आमतौर पर एक उप महानिरीक्षक या उच्च-स्तरीय अधिकारियों के आदेश पर सक्रिय किया जाता है। नीचे राज्य सशस्त्र पुलिस बलों की सूची दी गई है।
{{static row numbers}}{{Table alignment}}
{|class="wikitable sortable static-row-numbers static-row-header-text hover-highlight" "style="font-size: 100%"
|+राज्य सशस्त्र पुलिस बलों की सूची
!राज्य का नाम
!राज्य सशस्त्र पुलिस बल
|-
|[[आंध्र प्रदेश]]
|[[आंध्र प्रदेश पुलिस|आंध्र प्रदेश राज्य विशेष और आरक्षित पुलिस बल]]
|-
|[[अरुणाचल प्रदेश]]
|[[अरुणाचल प्रदेश पुलिस|अरुणाचल प्रदेश सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[असम]]
|[[असम पुलिस|असम पुलिस बटालियन]]
|-
|[[बिहार]]
|[[राज्य सशस्त्र पुलिस बल|बिहार सैन्य पुलिस]]
|-
|[[गोवा]]
|भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[गुजरात]]
|[[गुजरात पुलिस|गुजरात राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
|-
|[[हरियाणा]]
|[[हरियाणा पुलिस|हरियाणा सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[हिमाचल प्रदेश]]
|भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[झारखंड]]
|[[झारखंड पुलिस|झारखंड सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[कर्नाटक]]
|[[कर्नाटक पुलिस|कर्नाटक राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
|-
|[[केरल]]
|[[केरल पुलिस|केरल सशस्त्र पुलिस]], मालाबार विशेष पुलिस, [[राज्य सशस्त्र पुलिस बल|विशेष सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[मध्य प्रदेश]]
|[[मध्य प्रदेश पुलिस|मध्य प्रदेश विशेष सशस्त्र पुलिस बल (एसएएफ)]]
|-
|[[महाराष्ट्र]]
|[[महाराष्ट्र पुलिस|महाराष्ट्र राज्य रिजर्व पुलिस बल]]
|-
|[[मणिपुर]]
|[[मणिपुर पुलिस|मणिपुर राइफल्स]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[मेघालय]]
|[[मेघालय पुलिस|मेघालय सशस्त्र पुलिस बटालियन]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[मिजोरम]]
|[[मिजोरम पुलिस]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[नागालैंड]]
|[[नागालैंड पुलिस|नागालैंड सशस्त्र पुलिस]] और भारतीय रिजर्व बटालियन
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|[[ओडिशा]]
|[[ओडिशा पुलिस|ओडिशा विशेष सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[पंजाब]]
|[[पंजाब पुलिस (भारत)|पंजाब सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[राजस्थान]]
|[[राजस्थान पुलिस|राजस्थान सशस्त्र कांस्टेबुलरी]]
|-
|[[सिक्किम]]
|[[सिक्किम पुलिस|सिक्किम सशस्त्र पुलिस]]
|-
|[[तमिलनाडु]]
|[[तमिलनाडु पुलिस|तमिलनाडु विशेष पुलिस]]
|-
|[[तेलंगाना]]
|[[तेलंगाना पुलिस|तेलंगाना राज्य विशेष पुलिस]]
|-
|[[त्रिपुरा]]
|त्रिपुरा स्टेट राइफल्स और भारतीय रिजर्व बटालियन
|-
|[[उत्तर प्रदेश]]
|उत्तर प्रदेश प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी
|-
|[[उत्तराखंड]]
|[[उत्तराखंड पुलिस|उत्तराखंड प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी]]
|-
|[[पश्चिम बंगाल]]
|[[पश्चिम बंगाल पुलिस|पश्चिम बंगाल सशस्त्र पुलिस बल]], पूर्वी सीमांत राइफल्स और [[कोलकाता पुलिस|कोलकाता सशस्त्र पुलिस]]
|}
==इन्हें भी देखें==
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Sheriff#India भारत के शेरिफ]
* [[भारतीय सशस्त्र बल]]
* [[भारत की न्यायपालिका]]
* [[भारतीय दंड संहिता]]
* [[भारत सरकार]]
* [[भारत मे द्रव्यमान निगरानी]]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Indian_intelligence_agencies भारतीय खुफिया एजेंसियों की सूची]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/National_Counter_Terrorism_Centre राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Police_Complaints_Authority_(India) पुलिस शिकायत प्राधिकरण (भारत)]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Police_Foundation_and_Institute भारतीय पुलिस फाउंडेशन और संस्थान]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_cases_of_police_brutality_in_India भारत में पुलिस बर्बरता के मामलों की सूची]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Crime_and_Criminal_Tracking_Network_and_Systems अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_and_dependencies_by_number_of_police_officers पुलिस अधिकारियों की संख्या के आधार पर देशों और आश्रितों की सूची]
==सन्दर्भ==
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==बाहरी कड़ियाँ==
* {{Commons category-inline|भारत में कानून प्रवर्तन}}
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[[श्रेणी:भारत में विधि-प्रवर्तन]]
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'''मॉरीशस''' के संविधान में किसी एक आधिकारिक भाषा का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं मिलता, जो इसे भाषाई दृष्टि से विशिष्ट बनाता है। संविधान के अनुच्छेद 49 में यह प्रावधान अवश्य किया गया है कि राष्ट्रीय सभा की कार्यवाही की आधिकारिक भाषा [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] होगी, किंतु किसी भी सदस्य को अध्यक्ष को [[फ़्रान्सीसी भाषा|फ्रेंच]] में संबोधित करने की अनुमति है। इससे यह संकेत मिलता है कि अंग्रेजी और फ्रेंच का औपचारिक उपयोग मुख्यतः संसद की कार्यप्रणाली तक सीमित है, न कि पूरे राष्ट्र की भाषाई पहचान तक।
वास्तविक जीवन में, मॉरीशस की भाषाई स्थिति कहीं अधिक जीवंत और बहुरंगी है। यहाँ की [[सम्पर्क भाषा|आम जनभाषा]] मॉरीशस क्रियोल है, जो दैनिक संवाद और सामाजिक जीवन का आधार बनती है। इसके साथ ही फ्रेंच भाषा व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है, तथा समाचार माध्यमों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। दूसरी ओर, अंग्रेजी प्रशासन, शासन और शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभाती है।
[[File:Mauritius 24.08.2009 08-03-28.jpg|thumb|right|मॉरीशस में साइनबोर्ड पर फ्रेंच और अंग्रेजी दोनों भाषाएँ आम हैं।]]
मॉरीशस के सार्वजनिक विद्यालयों में अंग्रेजी शिक्षा का प्रमुख माध्यम है, जबकि फ्रेंच भी व्यापक रूप से शिक्षण में प्रयुक्त होती है और जनसंचार माध्यमों की मुख्य भाषा के रूप में स्थापित है।<ref>{{cite web | url=http://www.brandeis.edu/coexistence/linked%20documents/Nigel%20-%20Mauritius%20FINAL.pdf | title=Coexistence International at Brandeis University | access-date=2010-07-04 }}</ref> अंतर्राष्ट्रीय फ़्रैंकोफ़ोनी संगठन के अनुसार, वर्ष 2005 में लगभग 72.7% मॉरीशसवासी फ्रेंच भाषी थे,<ref name="2007_report">{{in lang|fr}} [https://www.amazon.fr/dp/2098821778 ''La Francophonie dans le monde 2006–2007''] published by the ऑर्गेनाइज़ेशन इंटरनेशनेल डे ला फ़्रैंकोफ़ोनी. [http://www.nathan.fr Nathan] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20180114144601/http://www.nathan.fr/ |date=2018-01-14 }}, [[पेरिस]], 2007.</ref> जो इस भाषा की गहरी सामाजिक उपस्थिति को दर्शाता है। मॉरीशस उन विशिष्ट देशों में शामिल है जहाँ फ्रेंच और अंग्रेजी दोनों का समान रूप से प्रयोग होता है; इस श्रेणी में [[कनाडा]], [[कैमरुन]], [[डोमिनिका]], [[रुआण्डा]], [[सेशेल्स]] और [[वानूआतू]] जैसे राष्ट्र भी सम्मिलित हैं। इसी द्विभाषिक स्वरूप के कारण [[मॉरिशस]] [[राष्ट्रकुल|राष्ट्रमंडल]] तथा ला फ़्रैंकोफ़ोनी—दोनों का सदस्य है।
भाषाई विविधता यहाँ के सामाजिक जीवन का स्वाभाविक अंग है। अंग्रेजी और फ्रेंच के अतिरिक्त, मॉरीशस में [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[तमिल भाषा|तमिल]], [[तेलुगु भाषा|तेलुगु]], [[हिन्दी]]-[[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[अरबी भाषा|अरबी]] और [[चीनी भाषा]] भी विभिन्न समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। इसके अतिरिक्त, मॉरीशस सांकेतिक भाषा वहाँ के बधिर समुदाय के लिए संप्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम है।
[[File:Interdit de stationner - devant la Marmite Mauricienne (Flic-en-Flac).jpg|thumb|अंग्रेजी और चीनी भाषा में नो-पार्किंग ट्रैफिक कोन, फ्लिक-एन-फ्लैक]]
इस बहुभाषिक परिवेश का परिणाम यह है कि अधिकांश मॉरीशसवासी कम-से-कम दो भाषाओं में दक्ष होते हैं, जबकि अनेक लोग तीन या चार भाषाओं का भी सहज प्रयोग करते हैं। यह बहुभाषिकता न केवल संवाद का साधन है, बल्कि मॉरीशस की सांस्कृतिक बहुलता और सह-अस्तित्व की जीवंत अभिव्यक्ति भी है।
== सन्दर्भ ==
[[श्रेणी:मॉरीशस की भाषाएँ]]
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ओरोमो भाषा
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{{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=मार्च 2025}}
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| imagecaption = शीक बकरी सफालू लिपि में "अफ़ान ओरोमू" का आविष्कार [[बकरी सपालो]] द्वारा किया गया था।<ref>https://www.unicode.org/L2/L2024/24109-sheek-bakrii-saphaloo.pdf {{Bare URL PDF|date=August 2024}}</ref>
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| [[लैटिन लिपि|लैटिन]] (क्यूबी, ओरोमो वर्णमाला)
| क़ुबी शेक बकरी सफ़ालू
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| mapcaption = पूर्वी अफ्रीका के वे क्षेत्र जहाँ ओरोमो बोली जाती है
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}}
'''ओरोमो'''<ref>{{Cite web|url=https://www.dictionary.com/browse/Oromo|title=Dictionary.com {{!}} Meanings & Definitions of English Words|website=Dictionary.com|language=en|access-date=2025-01-26}}</ref> ऐतिहासिक रूप से '''गैला''' भी कहा जाता है, एक अफ्रोएशियाटिक भाषा है जो कुशिटिक शाखा से संबंधित है।<ref>{{Cite web|url=https://www.ethnologue.com/language/gaz/|title=Oromo, West Central {{!}} Ethnologue Free|website=Ethnologue (Free All)|language=en|access-date=2025-01-26}}</ref> यह इथियोपियाई राज्य ओरोमिया और उत्तरी केन्या का मूल निवासी है और मुख्य रूप से ओरोमो लोगों और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के पड़ोसी जातीय समूहों द्वारा बोली जाती है। इसका उपयोग विशेष रूप से ओरोमिया क्षेत्र और उत्तरपूर्वी केन्या में एक सामान्य भाषा के रूप में किया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.mustgo.com/worldlanguages/oromo/|title=Oromo Language - Dialects & Structure - MustGo|website=MustGo.com|language=en-US|access-date=2025-01-26}}</ref>
41.7 मिलियन से अधिक बोलने वालों के साथ,<ref>{{Cite web|url=https://www.ethnologue.com/language/gaz/|title=Oromo, West Central {{!}} Ethnologue Free|website=Ethnologue (Free All)|language=en|access-date=2025-01-26}}</ref> जो कुल आबादी का 33.8% है,<ref>{{Citation|title=Ethiopia|date=2025-01-21|url=https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/ethiopia/|work=The World Factbook|publisher=Central Intelligence Agency|language=en|access-date=2025-01-26|archive-date=21 अप्रैल 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210421154941/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/ethiopia/|url-status=dead}}</ref> ओरोमो बोलने वालों की कुल संख्या (अम्हारिक् के बाद दूसरी भाषा बोलने वालों सहित) के मामले में इथियोपिया में दूसरी सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है। ओरोमो के रूप उत्तरी और पूर्वी केन्या के कुछ हिस्सों में अतिरिक्त आधे मिलियन लोगों द्वारा बोली जाती हैं। दक्षिण अफ्रीका, लीबिया, मिस्र और सूडान जैसे अन्य अफ्रीकी देशों में भी प्रवासियों की संख्या कम है। ओरोमो भाषा सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली कुशिटिक भाषा है और सबसे बड़ी मातृभाषा आबादी वाली अफ्रीका की पांच भाषाओं में से एक है।
ओरोमो भाषा इथियोपिया की आधिकारिक कामकाजी भाषाओं में से एक है<ref>{{Cite web|url=https://www.africanews.com/2020/03/04/one-to-five-ethiopia-gets-four-new-federal-working-languages/|title=One to five: Ethiopia gets four new federal working languages {{!}} Africanews|date=2020-12-15|website=web.archive.org|access-date=2025-01-26|archive-date=15 दिसंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201215231030/https://www.africanews.com/2020/03/04/one-to-five-ethiopia-gets-four-new-federal-working-languages/|url-status=bot: unknown}}</ref> और ओरोमिया, हरारी और डायर डावा क्षेत्रीय राज्यों सहित इथियोपियाई संघीय प्रणाली के कई राज्यों की कामकाजी भाषा भी है। ओरोमिया, हरारी, डायर डावा, बेनीशंगुल-गुमुज़ और अदीस अबाबा में कई अलग-अलग प्रकार की प्राथमिक शिक्षा हैं। इसका उपयोग टिग्रीन्या के साथ-साथ संघीय वेबसाइटों के लिए एक इंटरनेट भाषा के रूप में किया जाता है। हेली सेलासी के शासन के तहत, ओरोमो को शिक्षा, बातचीत और प्रशासनिक मामलों से प्रतिबंधित कर दिया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://nalrc.indiana.edu/doc/brochures/oromo.pdf|title=https://nalrc.indiana.edu/doc/brochures/oromo.pdf {{!}} Ghostarchive|website=ghostarchive.org|access-date=2025-01-26|archive-date=9 अक्तूबर 2022|archive-url=https://ghostarchive.org/archive/20221009221012/https://nalrc.indiana.edu/doc/brochures/oromo.pdf|url-status=dead}}</ref>
== संदर्भ ==
[[श्रेणी:पूर्वी कुशिटिक भाषाएँ]]
[[श्रेणी:इथियोपिया की भाषाएँ]]
[[श्रेणी:केन्या की भाषाएँ]]
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मिस यूनीवर्स 2011
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{{Infobox beauty pageant
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| caption = [[लेइला लोपेस]]
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}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==इन्हें भी देखें==
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
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[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==इन्हें भी देखें==
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
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शीर्षक और उपशीर्षक बनाकर जानकारी जोड़ा
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| broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}}
| entrants = 89
| placements = 16
| withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}}
| returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}}
| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
===स्थान और तिथि==
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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2026-04-24T03:32:45Z
खास विशेष
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उपशीर्षक बनाकर जानकारी डाली
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
| presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}}
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| entrants = 89
| placements = 16
| withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}}
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| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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खास विशेष
810972
/* प्रतिभागियों का चयन */ उपशीर्षक बनाकर अतिरिक्त जानकारी जोड़ी
6543490
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
| presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}}
| entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}}
| broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}}
| entrants = 89
| placements = 16
| withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}}
| returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}}
| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं। जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
| presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}}
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| entrants = 89
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| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं। जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
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| date = 12 सितंबर 2011
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| entrants = 89
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| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref>
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं। जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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wikitext
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{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
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| date = 12 सितंबर 2011
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| presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}}
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| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
[[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]]
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref>
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं। जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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6543495
6543493
2026-04-24T03:42:00Z
खास विशेष
810972
/* प्रतिस्थापन */ संदर्भ जोड़ा
6543495
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
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}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
[[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]]
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref>
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref>
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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खास विशेष
810972
/* प्रतिस्थापन */ संदर्भ जोड़ा
6543496
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
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}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
[[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]]
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref>
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref>
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref>
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref>
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
srvfltoaxewpv815z84vw5ds74hgnfe
6543497
6543496
2026-04-24T03:43:16Z
खास विशेष
810972
/* प्रतिस्थापन */ संदर्भ जोड़ा
6543497
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox beauty pageant
| photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg
| caption = [[लेइला लोपेस]]
| winner = [[लेइला लोपेस]]
|represented=अंगोला
| congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]]
| best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]]
| photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]]
| date = 12 सितंबर 2011
| venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]]
| presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}}
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| before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]]
| next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]]
}}
'''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref>
इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref>
इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref>
इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया।
इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref>
==पृष्ठभूमि==
[[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]]
===स्थान और तिथि===
16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी।
यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई।
जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया।
यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref>
===प्रतिभागियों का चयन===
७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया।
इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया।
====प्रतिस्थापन====
एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref>
मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref>
माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref>
इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref>
====वापसी और निकासी====
2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई।
पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था।
नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।
सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।
ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट]
{{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}}
[[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]]
[[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]]
[[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]]
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करीम अली शाह
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'''पीर सैयद करीम अली शाह''' (22 दिसंबर, 1879-02 जुलाई, 1932) एक [[Hindustani Muslims|हिंदुस्तानी]] ट्वेल्वर शी 'आह, सूफी विद्वान, सार्वजनिक वक्ता और [[पंजाब (भारत)|पंजाब]] [[ब्रिटिश राज|ब्रिटिश]] [[भारत]] (वर्तमान भारत) के कवि थे।<ref>{{Cite web|url=https://nishantverma.in/sufism-and-mysticism-in-india-freedom-struggle-spiritual-forces-for-nationalism/|title=Sufism and Mysticism in India Freedom Struggle: Spiritual Forces for Nationalism - Nishant Verma|date=2025-04-10|language=en-US|access-date=2025-05-01}}</ref>
== काम करता है। ==
* ''हकुमत-का-निजाम''
* ''न्याय विज्ञान''
* ''इस्लाम धर्म''
* मुल्फुज़ात-ए-करीम-अली-शाह (करीम अली शाह की बातें)
* ''अल-ताशिया-वाल्टसोव''
* ''शांति बनाएँ''
== मृत्यु और विरासत ==
शाह की मृत्यु या तो 1929 या 1932 में [[अमृतसर]], [[पंजाब (भारत)|पंजाब]] में हुई, जो उस समय भी [[ब्रिटिश भारत के प्रेसिडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]] का हिस्सा था। उनका मंदिर [[भारत]] के [[अमृतसर]] में स्थित है।<ref>{{Cite journal|last=Snehi|first=Yogesh|date=2020-01-01|title=Sufi inheritance of Amritsar|url=https://www.academia.edu/59337942/Sufi_inheritance_of_Amritsar|journal=Nishaan Nagara}}</ref> 1947 में उनकी मृत्यु के लगभग 18 या 15 साल बाद, [[ब्रिटिश राज]] भंग हो गया।<ref>{{Cite web|url=https://indoislamic.org/sufis-played-a-key-role-in-fighting-the-british-rule-in-india/|title=Sufis played a key role in fighting the British rule in India -|date=2023-12-17|language=en-US|access-date=2025-05-20|archive-date=22 मई 2025|archive-url=https://web.archive.org/web/20250522220007/https://indoislamic.org/sufis-played-a-key-role-in-fighting-the-british-rule-in-india/|url-status=dead}}</ref>
== संदर्भ ==
<references />
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ओकाड़ा
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}}
'''ओकाड़ा''' ({{Langx|ur|{{unq|اوکاڑہ}}}}, {{Langx|en|Okara|italic=no}}) [[पाकिस्तान]] के [[पंजाब (पाकिस्तान)|पंजाब]] प्रांत के [[ओकाड़ा ज़िला|ओकाड़ा ज़िले]] की राजधानी है।<ref name="NRB">{{Cite web|url=http://www.nrb.gov.pk/lg_election/union.asp?district=24&dn=Okara|title=Tehsils & Unions in the District of Okara|date=27 November 2011|website=Government of Pakistan website|archive-url=https://web.archive.org/web/20120209043337/http://www.nrb.gov.pk/lg_election/union.asp?district=24&dn=Okara|archive-date=9 February 2012|access-date=11 April 2021}}</ref> शहर का नाम ''ओकान'' से लिया गया है, जो एक प्रकार के पेड़ है। प्राचीन काल में बड़ी संख्या में ओकान के पेड़ थे, जिस कारण शहर का नाम ओकाड़ा रखा गया था। यह जनसंख्या के अनुसार पाकिस्तान का 23वाँ सबसे बड़ा शहर है।<ref name="Population city">{{Cite web|url=https://www.tageo.com/index-e-pk-cities-PK.htm|title=Pakistan City & Town Population List|website=Tageo.com website|access-date=11 April 2021}}</ref> ओकाड़ा [[लाहौर]] और [[फ़ैसलाबाद]] के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और [[रावी नदी]] को दरकिनार करते हुए 100 km दूर है। इसे अपनी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और कपास मिलों के लिए जाना जाता है। ओकाड़ा का निकटतम प्रमुख शहर [[साहिवाल|साहीवाल]] है। [[क़सूर]] भी शहर के पूर्व में स्थित है। देश के सैन्य डेरी खेत, जो अपने पनीर के लिए जाने जाते हैं, ओकाड़ा में स्थित हैं। यह खेत 1947 में [[पाकिस्तान]] के [[भारत का विभाजन|निर्माण]] से पहले स्थापित किए गए थे।
== जलवायु ==
जून और सितंबर के बीच गर्मियों के मानसून के मौसम को छोड़कर, ओकाड़ा की जलवायु प्रायः गर्म और शुष्क होती है। सबसे ठंडे मास दिसंबर से फ़रवरी तक होते हैं, जब तापमान मध्यम वर्षा के साथ {{Convert|3|C}} तक गिर सकता है। सबसे गर्म मास मई से जुलाई तक होते हैं, जब तापमान {{Convert|45|C}} तक पहुंच सकता है। शहर में वार्षिक मध्यम वर्षा लगभग 615 mm है।
== दर्शनीय स्थल ==
* [[मीर चाकर खाँ|मीर चाकर रिन्द]]
* [[हुजरा शाह मुक़ीम|हुजरा शाह मुक़ीम]]
* [[सतलुज नदी]]
== जनसांख्यिकी ==
=== जनसंख्या ===
{{ऐतिहासिक जनसंख्याएं|9=1981|10=127455|11=1998|12=201815|13=2017|14=357935|15=2023|16=533693|align=center|footnote=Sources:<ref>{{cite web |title=Population by administrative units 1951-1998 |url=https://repository.lahoreschool.edu.pk/xmlui/bitstream/handle/123456789/13673/Administrative%20Units.pdf?isAllowed=y&sequence=1 |publisher=[[Pakistan Bureau of Statistics]] |access-date=23 जून 2025 |archive-date=23 जुलाई 2025 |archive-url=https://web.archive.org/web/20250723012012/https://repository.lahoreschool.edu.pk/xmlui/bitstream/handle/123456789/13673/Administrative%20Units.pdf?sequence=1&isAllowed=y |url-status=dead }}</ref>}}
=== भाषाएँ ===
ओकाड़ा में [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] सबसे लोकप्रिय बोली जाने वाली भाषा है, लगभग 95% जनसंख्या इसे अपनी पहली भाषा के रूप में पहचानती है। इस शहर की मुख्य पंजाबी बोलियाँ माझी और झंगवी हैं।
=== पार्क ===
सफ़दर शहीद पार्क और जिन्नाह पार्क ओकाड़ा के दो मुख्य पार्क हैं। गुलशन-ए-फ़ातिमा पार्क, महबूब आलम पार्क, लालाज़ार कॉलोनी पार्क आदि कुछ अन्य पार्क हैं।<ref>{{Cite web|url=https://pakgeography.com/okara-district/|title=Okara City and District: History, Facts, and Overview|website=Pak Geography|language=en-US|access-date=2025-06-07}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://urbanunit.gov.pk/Download/publications/Files/8/2021/PCIIP%20Cities%20Profile-Okara.pdf|title=Okara profile - Urbanunit.gov,pk}}</ref>
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:वेबग्रंथागार साँचा वेबैक कड़ियाँ]]
[[श्रेणी:विकिडेटा पर उपलब्ध निर्देशांक]]
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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सदस्य वार्ता:New Life Faith Outreach Ministries of India
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Rahul Tandi Evagalist
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New Life Faith Outreach Ministries of India (NLFOM)
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{{NLFOM|realName=|name=New Life Faith Outreach Ministries of India}}
-- [[Odisha| Kalahandi]] ([[ Founded/Established| Founded/Established]]) 18 January 2007 President Rev. Pastor Ruben Tandi & Hulda Tandi son of @RT knownperson Rahul Tandi Indian Executive Director, Social Worker, Internet platform, Evagalist, Mission Presence Personality known as well as CEO of New Life Faith Outreach Ministries of India (NLFOM)
* Village - Naktikani [[:en:Golamunda]] [[:en:Kalahandi district]] (odisha) date of birth (born June 22 2003) Rahul Tandi in [[:en:Kalahandi district]]
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कपोल समुदाय
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{{एकाकी}}{{Infobox ethnic group
| native_name = कपोल समाज / कापोले
| image = <!-- Add image here -->
| image_caption = कपोल समुदाय के सदस्य
| population = अनुमानतः 1,00,000
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| name = कपोल समुदाय
| region = सौराष्ट्र (गुजरात), भारत
| related_ethnicities = बनिया, वणिक
| notable_people = रूपजी धनजी, सर मंगलदास नाथुभाई, वरजीवंदास माधवदास, करसनदास मुलजी
}}
'''कपोल समुदाय''' (जिसे '''कपोल समाज''' और '''कापोले''' के नाम से भी जाना जाता है) भारत के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र (काठियावाड़) प्रायद्वीप से जुड़ा हुआ एक वैश्य/बनिया उपसमूह है।<ref name=":0">{{Cite web|url=https://kapolutkarsh.org/aboutus.aspx|title=Shree Vileparle Kapol Utkarsh Mandal|website=kapolutkarsh.org|access-date=2025-09-11|archive-date=13 जून 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240613070452/https://kapolutkarsh.org/aboutus.aspx|url-status=dead}}</ref>
बनिया या वनिया शब्द संस्कृत शब्द ''वणिक'' से लिया गया है, जिसका अर्थ "व्यापारी" होता है। ऐतिहासिक रूप से, यह समुदाय व्यापार, बैंकिंग और साहूकारी से जुड़ा रहा है। आधुनिक समय में, इस समुदाय के सदस्यों ने विभिन्न उद्यमों और परोपकारी कार्यों में खुद को स्थापित किया है। अनुमान है कि दुनिया भर में लगभग 1,00,000 कपोल व्यक्ति हैं। उत्तरी अमेरिका में इनकी एक बड़ी आबादी (लगभग 10,000 व्यक्ति) है, जहाँ इसके सदस्य विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं।<ref name=":1">{{Cite web|url=https://globalkapolvikas.com/|title=globalkapolvikas.com – Kapol community is vibrant, energetic & successful community|language=en-US|access-date=2025-09-11}}</ref>
== उत्पत्ति और प्रारंभिक वितरण ==
संस्कृत शब्द कपोला का अर्थ "गाल" होता है, और यह शास्त्रीय साहित्य में पाया जाता है। सामुदायिक साहित्य में एक किंवदंती भी प्रचलित है कि यह नाम उन भक्तों को मिला जो अपने माथे पर केसर/चंदन का लेप लगाते थे। यह किंवदंती विद्वानों की व्युत्पत्ति के बजाय सामुदायिक इतिहास में अधिक पाई जाती है। <ref name=":0" />
आधुनिक युग से पहले, कपोल समुदाय की बस्तियां दक्षिण-पूर्वी सौराष्ट्र के राजुला, सिहोर, महुवा, लाठी, जाफराबाद, सावरकुंडला और अमरेली जैसे क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं, जो एक बड़े वणिक/वनिया व्यापारी समूह का हिस्सा थे।<ref>{{Cite web|url=https://kapoleshreyasmandal.com/history/|title=History – Kapole Shreyas Mandal|language=en-GB|access-date=2025-09-11}}</ref>
== बॉम्बे (मुंबई) में प्रवास और संस्थागत जीवन ==
17वीं से 19वीं सदी के अंत तक कपोल व्यापारिक परिवारों ने मुंबई का रुख किया, और उनके वंशजों ने माधवबाग मंदिर, छात्रावासों, सेनेटोरियमों और धर्मार्थ ट्रस्टों की स्थापना की, जो आज भी कपोल समुदाय के लिए महत्वपूर्ण संस्थान हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.kapolsanatorium.com/about|title=Kapol {{!}} About|website=www.kapolsanatorium.com|access-date=2025-09-11}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.madhavbagtemple.org/about-us/|title=About Us|language=en-US|access-date=2025-09-11}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.squareyards.com/mumbai-residential-property/kopol-niwas/66448/project|title=Kopol Niwas Matunga, Mumbai {{!}} Price List, Floor Plan, Reveiws & RERA Details|last=SquareYards.com|website=SquareYards|access-date=2025-09-11}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.kapolcollege.in/|title=Kapol Vidyanidhi College|website=www.kapolcollege.in|access-date=2025-09-11}}</ref>
== धर्म और सामाजिक जीवन ==
कपोल मुख्य रूप से वैष्णव हैं; कई परिवार पुष्टिमार्ग (वल्लभाचार्य की कृष्ण भक्ति) का पालन करते हैं, जिसकी गुजराती व्यापारी जातियों में गहरी जड़ें हैं। सामाजिक जीवन में पारिवारिक एकता और अहिंसा पर जोर दिया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.indianetzone.com/bania_community_vaishya_caste|title=Bania Community|website=www.indianetzone.com|access-date=2025-09-11}}</ref>
== बैंकिंग, परोपकार और सहकारी उद्यम ==
कापोल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की स्थापना 1939 में राजरत्न खुशालदास कुरजी पारेख द्वारा "आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की सेवा" करने के उद्देश्य से की गई थी। बैंक को 1998 में अनुसूचित बैंक का दर्जा मिला।
मुंबई में कपोल परोपकार में सर हरकिसनदास (हुरकिसनदास) नरोत्तमदास अस्पताल (1925) की स्थापना भी शामिल है, जिसे डॉ. गोरधनदास भगवानदास नरोत्तमदास द्वारा स्थापित किया गया था, जो आज सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल के नाम से जाना जाता है।<ref name=":1" />
== उल्लेखनीय कपोल व्यक्ति ==
''(यह सूची सामुदायिक इतिहास, जीवनी और मीडिया प्रोफाइल से सत्यापित आंकड़ों के आधार पर बनाई गई है, जिसमें सुधार, व्यवसाय, राजनीति और परोपकार के क्षेत्र में योगदान पर जोर दिया गया है।)''
* [[रूपजी धनजी]] (17वीं सदी के अंत): अग्रणी व्यापारी, जिन्होंने 1692 में मुंबई में प्रवास किया।
* [[:en:Mangaldas_Nathubhoy|सर मंगलदास नाथुभाई]] (1832-1890): शुरुआती बॉम्बे के उद्योगपति, परोपकारी और सुधारक। उन्हें 1875 में नाइट की उपाधि मिली। <ref>{{Cite web|url=https://vmkb.in/|title=Sheth Varjivandas Madhavdas Kapol Boarding School|website=vmkb.in|access-date=2025-09-11}}</ref>
* वरजीवंदास माधवदास (1817–1896): बॉम्बे के व्यापारी-परोपकारी। उन्होंने माधवबाग मंदिर और VMKB बोर्डिंग स्कूल जैसी प्रमुख संस्थाओं की स्थापना की।
* [[करसनदास मूलजी|करसनदास मुलजी]] (1832-1871): पत्रकार और समाज सुधारक। उन्होंने 1855 में सत्यप्रकाश नामक गुजराती अखबार की स्थापना की। 1862 के महाराज मानहानि मामले में महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने के लिए वे केंद्रीय व्यक्ति थे। उनकी जीवनी का शीर्षक उत्तम कपोल करसनदास मुलजी चरित्र था।
* [[डॉ. गोरधनदास भगवानदास नरोत्तमदास]] (1887-1975): चिकित्सक-परोपकारी; उन्होंने सर हरकिसनदास नरोत्तमदास अस्पताल (1925) की स्थापना की।
* [[जीवराज नारायण मेहता|डॉ. जीवराज नारायण मेहता]] (1887-1978): चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और गुजरात के पहले मुख्यमंत्री (1960-63)। उनकी चिकित्सा शिक्षा सेठ वीएम कपोल बोर्डिंग ट्रस्ट द्वारा प्रायोजित थी।
* राजरत्न खुशालदास कुरजी पारेख (मृ. 1970 के दशक): शिक्षाविद् और कपोल को-ऑपरेटिव बैंक (1939) के संस्थापक।
* [[दिलीप संघवी|दिलीप सांघवी]] (ज. 1955): सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज के संस्थापक। उनका जन्म एक कपोल वैष्णव परिवार में हुआ था।
* [[हितेन भुता]] (ज. 1971): उद्यमी, सीजीएस समूह के सीईओ और ग्लोबल कपोल विकास के परियोजना निदेशक ; उन्हें Kapol Business Council द्वारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।<ref>{{Cite web|url=https://www.freepressjournal.in/spirituality/hiten-bhuta-bridging-ancient-wisdom-modern-science-for-todays-world|title=Hiten Bhuta: Bridging Ancient Wisdom & Modern Science for Today's World|website=Free Press Journal|language=en|access-date=2025-09-11}}</ref>
* शरद पारेख: नीलकमल के सह-संस्थापक। उनके भाई वामनराय पारेख भी कापोल धर्मार्थ फाउंडेशन के अध्यक्ष थे।
* [[पी. के. लहरी]]: एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा ([[भारतीय प्रशासनिक सेवा|IAS]]) अधिकारी, जिन्होंने गुजरात सरकार के मुख्य सचिव के रूप में कार्य किया।
* [[आशा पारेख]]: एक प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री, निर्देशक और निर्माता, जिन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। उनके पिता एक गुजराती हिंदू थे।
* हिमेश रेशमिया: एक जाने-माने भारतीय संगीत निर्देशक, गायक और अभिनेता। उनके पिता, विपिन रेशमिया, भी एक गुजराती संगीतकार थे।
== मीडिया और प्रकाशन ==
कपोल मित्र: यह एक सामुदायिक पत्रिका है जिसकी सोशल मीडिया पर सक्रिय उपस्थिति है कपोल सहकारी बैंक
== बैंक ==
[[:en:Kapol_Co-operative_Bank|कपोल सहकारी बैंक]] - 1939 में स्थापित, यह बैंक मुख्य रूप से कपोल समुदाय को सेवा प्रदान करता था तथा महाराष्ट्र और गुजरात में शाखाएं संचालित करता था।
== इन्हें भी देखें ==
* [[बनियारा-मिलिक गाँव, सनहौला (भागलपुर)|बनिया (जाति)]]; [[गुजराती लोग]]; [[पुष्टिमार्ग]]; मुंबई के व्यापारी समुदाय
* [[:en:Kapol_Co-operative_Bank|कपोल सहकारी बैंक]]
== संदर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:गुजराती लोग]]
[[श्रेणी:गुजरात के लोग]]
[[श्रेणी:हिंदू समुदाय]]
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काओमोजी
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{{एकाकी}}
[[चित्र:It's_all_about_the_smilies_(3578588882).jpg|अंगूठाकार|जापानी [[एनटीटी डोकोमो|एनटीटी दोकोमो]] मोबाइल फ़ोन पर काओमोजी]]
[[चित्र:Kaomoji!_(2334722446).jpg|अंगूठाकार|जापान में एक काओमोजी चित्रकला]]
'''काओमोजी''' जापानी [[भाव-चिह्न]] (इमोटिकॉन) होते हैं, जो पाठ्य अक्षरों के संयोजन द्वारा चेहरे की भाव-भंगिमा और भावनाओं को दर्शाते हैं। इनका प्रादुर्भाव [[जापान]] में १९८० के दशक (संवत् २०३७–२०४४) में हुआ, जहाँ डिजिटल संवाद में मनोदशा और स्वर को व्यक्त करने का एक विशिष्ट माध्यम प्रस्तुत किया गया। प्रचलित उदाहरण:
* (<sup>ω</sup>) — प्रसन्नता या उत्साह व्यक्त करता है
* ( ͡o╭╮ ͡o) — उदासी या निराशा दर्शाता है
काओमोजी का विकास स्वतंत्र रूप से उसी समय हुआ जब [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] में पार्श्व [[भाव-चिह्न]] (जैसे स्माइलीज़) का प्रयोग आरम्भ हुआ:
* :-) या :) — प्रसन्नता
* :-( या :( — अप्रसन्नता
पाश्चात्य भाव-चिह्नों के विपरीत, जिन्हें पार्श्व रूप में देखा जाता है, काओमोजी सीधे खड़े रूप में पढ़े जाते हैं और इनमें अधिक विविध वर्णों का प्रयोग होता है। इन्हें आधुनिक [[इमोजी]] का पूर्ववर्ती माना जाता है, जिनका उद्गम भी जापान में ही हुआ।
== इतिहास ==
जापान के उपयोगकर्ताओं ने एक ऐसी शैली को लोकप्रिय बनाया जिसे सिर को झुकाए बिना समझा जा सकता था।{{sfn|Seargeant|2019|p=47}}{{sfn|Veszelszki|2017|pp=133–134}} यह शैली १९८० के दशक (संवत् २०३७–२०४४) में जापान की प्रारम्भिक ऑनलाइन सेवा ASCII NET पर विकसित हुई।<ref name="aist2">{{cite web|url=http://staff.aist.go.jp/k.harigaya/doc/kao_his.html|title=The History of Smiley Marks|website=Staff.aist.go.jp|archive-url=https://web.archive.org/web/20121203061906/http://staff.aist.go.jp/k.harigaya/doc/kao_his.html|archive-date=December 3, 2012|access-date=March 14, 2013|url-status=dead}}</ref><ref name="whatjapanthinks20072">{{cite web|url=http://whatjapanthinks.com/2007/09/19/turns-25-but-how-old-are-japanese-emoticons/|title=The History of Smiley Marks (English)|last1=Yasumoto-Nicolson|first1=Ken|date=September 19, 2007|website=Whatjapanthinks.com|access-date=August 10, 2017|archive-date=1 मई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210501111054/https://whatjapanthinks.com/2007/09/19/turns-25-but-how-old-are-japanese-emoticons/|url-status=dead}}</ref> इनमें ASCII वर्णों के अतिरिक्त [[जापानी लेखन पद्धति]] का भी समावेश होता है। पाश्चात्य शैली के भाव-चिह्नों की तुलना में, काओमोजी में मुख की अपेक्षा नेत्रों पर अधिक बल दिया जाता है।{{Sfn|Veszelszki|2017|pp=133–134}}<ref name="Karpinska">{{Cite book|url=https://www.taylorfrancis.com/chapters/edit/10.4324/9780429491757-4/emoticons-marzena-karpinska-paula-kurzawska-katarzyna-rozanska|title=Emoticons, Kaomoji, and Emoji|last=Karpinska|first=Marzena|last2=Kurzawska|first2=Paula|last3=Rozanska|first3=Katarzyna|date=2019|publisher=Routledge|isbn=978-0-429-49175-7|editor-last=Giannoulis|editor-first=Elena|location=New York|chapter=Emoticons: Digital Lingua Franca or a Culture-Specific Product Leading to Misunderstandings?|doi=10.4324/9780429491757-4|editor-last2=Wilde|editor-first2=Lukas R.A.}}</ref>
वकाबायाशी यासुशी को मूल काओमोजी (<sup>_</sup>) के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है, जो सन् १९८६ ई॰ (संवत् २०४३) में प्रकट हुआ। इसी समय के आसपास Byte Information Exchange (BIX) पर भी समान भाव-चिह्नों का प्रयोग देखा गया। जहाँ पाश्चात्य भाव-चिह्न मुख्यतः अमेरिकी कम्प्यूटर वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग किए गए, वहीं काओमोजी का प्रयोग प्रायः किशोर बालिकाओं और जापानी चित्रकथा ([[मांगा]]) के प्रशंसकों द्वारा किया गया। भाषाविज्ञानी इलारिया मोस्कीनी के अनुसार, इसका एक कारण काओमोजी की "कावाई" (नन्हीं-मुन्नी, प्यारी) सौंदर्य शैली भी है।{{r|Karpinska}}<ref>{{cite web|url=http://catb.org/jargon/oldversions/jarg261.txt|title=Jargon file, version 2.6.1, February 12, 1991|access-date=March 14, 2013}}</ref> ये भाव-चिह्न प्रायः (''_'') जैसे स्वरूप में पाए जाते हैं, जहाँ तारचिह्न नेत्रों को, मध्यवर्ती अक्षर (अक्सर अंडरस्कोर) मुख को, और कोष्ठक चेहरे की रूपरेखा को दर्शाते हैं।
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:जापानी भाषा पाठ वाले लेख]]
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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कामज़
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text/x-wiki
{{स्रोत कम|date=August 2017}}{{Infobox Albanian settlement|name=कामज़|type=m|flag=|emblem=Stema e Bashkisë Kamëz.svg|image_skyline=<!-- images and maps -----------> {{multiple image
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| image1 = Kamëz, Albania 01 - Town Center.jpg
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}}|image_caption=|map=|county=Tirana|parts=|settled=|incorporated=|dissolved=|party=[[अल्बानिया समाजवादी पार्टी|PS]]|mayor=रक़ीब सुली|council chairman=|administrator=|coordinates={{coord|41|23|N|19|46|E|type:adm1st_region:AL_dim:100000|display=inline}}|elevation=|area munic=37.20|area rank=|population as of=2023<ref name="2023pop">{{cite web|title=Census of Population and Housing|url=https://www.instat.gov.al/en/themes/censuses/census-of-population-and-housing/|publisher=Institute of Statistics Albania|access-date=21 अक्तूबर 2025|archive-date=30 अप्रैल 2025|archive-url=https://web.archive.org/web/20250430151629/https://www.instat.gov.al/en/themes/censuses/census-of-population-and-housing/|url-status=dead}}</ref>|area_unit=24.07|population munic=96137|population unit=61739|population rank=|demonym=|postal code=1030|area code=(0)47|website={{URL|https://kamza.gov.al/}}|native_name=Kamëz}}'''कामज़''' ({{Langx|sq|Kamëz|italic=no}}) [[अल्बानिया]] के [[तिराना प्रांत]] में स्थित एक नगर है।<ref>{{Cite web|url=http://www.citypopulation.de/Albania.html|title=Albania: Prefectures, Municipalities, Municipal Units, Cities and Agglomerations - Population Statistics in Maps and Charts|website=Citypopulation.de|access-date=28 August 2017}}</ref> इसका गठन 2015 के स्थानीय सरकार सुधार में पूर्व नगरपालिकाओं कामज़ और [[पास्कुचान]]<nowiki/> के विलय से किया गया था, जो प्रशासनिक इकाइयाँ बन गईं।<ref name="law115">{{Cite web|url=https://www.vendime.al/wp-content/uploads/2015/08/137-2014.pdf|title=Law nr. 115/2014|pages=6375|language=sq|access-date=25 February 2022}}</ref> 2023 की जनगणना के अनुसार नगरपालिका की जनसंख्या 96,137 है, जबकि इकाई की जनसंख्या 61,739 है, जो 37.20 km² के कुल क्षेत्र में फैली हुई है।
{{ऐतिहासिक जनसंख्याएं|1989|8589|2001|44443|2011|66841|2023|61739|align=right}}
कामज़ 2019 [[यूरोपीय हरित राजधानी पुरस्कार]] के लिए आवेदकों में से एक थे, जिसे [[ओस्लो]] ने जीता था।<ref>{{Cite web|url=http://ec.europa.eu/environment/europeangreencapital/news/20161116.html|title=European Green Capital|website=Ec.europa.eu|access-date=28 August 2017}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.greencapital2019.com/about-us|title=Oslo European Green Capital 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20211215000337/https://www.greencapital2019.com/about-us|archive-date=2021-12-15|access-date=2022-03-14}}</ref>
== इतिहास ==
[[चित्र:Tirana_Expansion.png|बाएँ|अंगूठाकार|200x200पिक्सेल|[[तिराना]] और कामज़]]
कामज़ एक प्राचीन इलीरियाई गाँव के स्थल पर स्थित है। यहाँ संभवतः [[जस्टिनियन प्रथम]] या [[बेलिसैरियस]] आए थे। 1990 दशक से पहले, कामज़ की जनसंख्या कम थी और यह एक कृषि आधारित क्षेत्र था। 1990 दशक के जनसंख्या आंदोलनों हेतु देश भर से लोग यहाँ आकर बसने लगे कामज़ की गलियों का नाम प्रसिद्ध व्यक्तियों, राजधानियों एवं संगठनों पर रखे गए हैं, जैसे [[डॉनल्ड ट्रम्प]] गली।
== खेलकूद ==
मुख्य [[फुटबॉल|फ़ुटबॉल]] टीम, [[KS कामज़ा]], [[फ़ुशा स्पोर्टिव कामज़]] में अल्बेनियाई द्वितीय श्रेणी में खेलती है। यह [[तिराना कृषि विश्वविद्यालय]] का स्थल है। बास्केटबॉल टीम [[BC कामज़ा बास्केट]] 6 बार के राष्ट्रीय चैंपियन हैं और [[साला स्पोर्टिव बाथोर]] में अपने घरेलू खेल खेलते हैं।
== जुड़वें शहर ==
* {{Flagicon|ITA}} [[कास्तेनासो]], इटली<ref>{{Cite web|url=https://www.comune.castenaso.bo.it/it-it/vivere-il-comune/rubriche/gemellaggi-2215-1-0ff2437ef93c823f78d47da5b388d5de|title=Gemellaggi - Città di Castenaso|website=www.comune.castenaso.bo.it|access-date=2021-09-02}}</ref>
* {{Flagicon|TUR}} [[कमालपाशा]], तुर्की<ref>{{Cite web|url=http://www.kamza.gov.al/previewdoc.php?file_id=333|title=Archived copy|archive-url=https://web.archive.org/web/20130922041205/http://www.kamza.gov.al/previewdoc.php?file_id=333|archive-date=2013-09-22|access-date=2012-06-01}}</ref>
* {{Flagicon|ITA}} [[माचेराता]], इटली<ref>{{Cite web|url=http://www.kamza.gov.al/previewdoc.php?file_id=332|title=Archived copy|archive-url=https://web.archive.org/web/20130921214737/http://www.kamza.gov.al/previewdoc.php?file_id=332|archive-date=2013-09-21|access-date=2012-06-01}}</ref>
* {{Flagicon|USA}} [[योंकर्स]], अमेरिका<ref>{{Cite web|url=http://ina-online.net/diaspora/10759.html|title=ILIRIA NEWS AGENCY - Kamza binjakëzim me Yonkers|date=30 October 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111030124058/http://ina-online.net/diaspora/10759.html|archive-date=30 October 2011|access-date=28 August 2017}}</ref>
=== सहयोग और मित्रता ===
कामज़ का सहयोग इस शहर के साथ भी है:
* {{Flagicon|GER}} [[येना]], जर्मनी <ref>{{Cite web|url=https://international.jena.de/de/kamza-albanien|title=Kamza, Albanien {{!}} Jena International|website=international.jena.de|language=de|access-date=2021-09-13}}</ref>
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
[[श्रेणी:अल्बानिया के शहर]]
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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कफ्तान
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text/x-wiki
'''कफ्तान''' ( / ˈ k æ f t æ n / ; अरबी : قفطان , qafṭān ; फ़ारसी : خفتان , khaftān ; तुर्की : kaftan ) एक प्रकार का चोगा या अंगरखा है। [[पश्चिम एशिया]] में बना, इसे विश्व भर की कई संस्कृतियों में हजारों वर्षों से पहना जाता रहा है। [[रूसी भाषा]] में, कफ्तान का तात्पर्य पुरुषों के लंबे सूट से है जिसकी आस्तीनें तंग होती हैं।
[[File:Kurd Man.png|thumb|कफ्तान पहने एक कुर्द व्यक्ति। मैक्स कार्ल टिल्के द्वारा बनाया गया चित्र, जो ओरिएंटल कॉस्ट्यूम्स: देयर डिज़ाइन्स एंड कलर्स (१९२२) में प्रकाशित हुआ था , जॉर्जियन नेशनल म्यूज़ियम , तिबलीसी ।]]
यह ऊन , रेशम या कपास से बना हो सकता है और इसे कमरबंद के साथ पहना जा सकता है । ओटोमन साम्राज्य के समय में लोकप्रिय , विस्तृत और जटिल रूप से डिज़ाइन किए गए वस्त्र टोपकापी महल में राजदूतों और अन्य महत्त्वपूर्ण मेहमानों को उपहार स्वरूप दिए जाते थे ।
कफ्तान के विभिन्न रूप एशिया भर की संस्कृतियों में विरासत में मिले और रूस , मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के लोगों द्वारा पहने जाते थे ।
कफ्तान की शैलियाँ, उपयोग और नाम संस्कृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। कफ्तान को अक्सर कोट या ऊपरी वस्त्र के रूप में पहना जाता है, जिसमें आमतौर पर लंबी आस्तीन होती हैं और यह टखनों तक पहुँचता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में, इसे हल्के, ढीले-ढाले वस्त्र के रूप में पहना जाता है। कुछ संस्कृतियों में, कफ्तान राजशाही का प्रतीक रहा है।
==इतिहास==
कफ्तान की उत्पत्ति अनिश्चित है, लेकिन माना जाता है कि यह सबसे पहले प्राचीन [[मेसोपोटामिया]] में दिखाई दिया था । इसे एक लंबे वस्त्र के रूप में वर्णित किया गया है जो कभी-कभी पिंडली तक या घुटने के ठीक नीचे तक होता है, और सामने से खुला होता है तथा आस्तीन कलाई पर थोड़ी कटी होती हैं या यहाँ तक कि बांहों के मध्य तक भी होती हैं।
"कफ्तान" शब्द पुराने [[तुर्की]] शब्द "ḳaftān" से लिया गया है जिसका अर्थ है "चोगा"। यह शब्द पुराने तुर्की शब्द "kap-ton" से लिया गया हो सकता है जिसका अर्थ है "थैला वस्त्र"। "Doerfer, Türk. und Mong. Elementen im Neupersisch p. 3:185 ff." का तर्क है कि यह शब्द तुर्की से फारसी और अरबी में लिया गया शब्द है।
कफ्तान सबसे पुरानी तुर्की पोशाक प्रतीत होती है; इस पोशाक का इतिहास [[हूण]] और गोक्तर्क काल तक मिलता है ।<ref name="b694">{{cite web | title=etimesut | url=https://www.etimesut.org/_files/ugd/c50047_c42232e5714a4c3abe52fdd06fc6182f.pdf?index=true | access-date=20 December 2025 | archive-date=1 अप्रैल 2023 | archive-url=https://web.archive.org/web/20230401203220/https://www.etimesut.org/_files/ugd/c50047_c42232e5714a4c3abe52fdd06fc6182f.pdf?index=true | url-status=dead }}</ref> कफ्तान मध्य एशिया के तुर्क राज्यों, भारत के तुर्क साम्राज्य, सेल्जुक तुर्कों और [[ओटोमन साम्राज्य]] में पहना जाने वाला पसंदीदा परिधान था । यह सेल्जुक काल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था और इस वस्त्र के सबसे पुराने ज्ञात उदाहरण हूण कब्रों में पाए गए हैं।<ref name="y232">{{cite book | title=Türk dünyası kültür atlası: Osmanlı dönemi. 3. 2 | publisher=Türk Kültürüne Hizmet Vakfı, Turkish Cultural Service Foundation | date=1998 | isbn=978-975-7522-11-9 | url=https://books.google.com/books?id=BXU_AQAAIAAJ | language=tr | access-date=20 December 2025 | page=}}</ref> गोक्तर्क काल की पोशाक में कमर पर बेल्ट से बंधे लंबे कफ्तान होते थे, इन कफ्तानों को गोक्तर्क मूर्तियों में देखा जा सकता है।
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
[[श्रेणी:तुर्की की संस्कृति]]
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कल्कि सुब्रमणियम
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text/x-wiki
{{Infobox person
| honorific_prefix =
| name = कल्कि सुब्रमणियम
| honorific_suffix =
| image = Kalki_Subramaniam.jpg
| caption = 2013 में कल्कि
| birth_place = पोल्लाची, [[तमिलनाडु]], [[भारत]]
| nationality = भारतीय
| occupation = सामाजिक कार्यकर्ता, अभिनेत्री, कलाकार और लेखिका
| years_active = 2005–वर्तमान
}}
'''कल्कि सुब्रमणियम''' ([[अंग्रेज़ी]]: Kalki Subramaniam) एक भारतीय ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, अभिनेत्री, लेखिका, प्रेरक वक्ता और उद्यमी हैं। वह [[तमिलनाडु]] की निवासी हैं। वह '''सहोदरी फ़ाउंडेशन''' की संस्थापक हैं, जो भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की दृश्यता और सशक्तीकरण के क्षेत्र में अग्रणी संगठनों में से एक है। वह भारत सरकार की '''नेशनल काउंसिल फ़ॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स''' की दक्षिण क्षेत्र की प्रतिनिधि एवं सदस्य भी रही हैं।
== प्रारम्भिक जीवन ==
कल्कि सुब्रमणियम का जन्म [[तमिलनाडु]] के पोल्लाची नामक एक छोटे शहर में हुआ।<ref>{{Cite web |last=Kalki |title=My Story |url=http://ai.eecs.umich.edu/people/conway/TSsuccesses/Kalki/Kalki.html |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20231120021008/https://ai.eecs.umich.edu/people/conway/TSsuccesses/Kalki/Kalki.html |archive-date=20 November 2023 |website=ai.eecs.umich.edu}}</ref> एक कामकाजी परिवार में जन्मी कल्कि एक मेधावी छात्रा थीं। उन्होंने दो स्नातकोत्तर डिग्रियाँ प्राप्त कीं—पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर।
अपने स्नातकोत्तर अध्ययन के दौरान उन्होंने ट्रांसजेंडर महिलाओं के लिए तमिल भाषा में प्रकाशित मासिक पत्रिका '''सहोदरी''' की शुरुआत की (सहोदरी का अर्थ “बहन” होता है)। यह भारत की ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए प्रकाशित पहली तमिल पत्रिका थी।<ref>{{Cite web |title=Profile |url=http://www.kalkisubramaniam.com/about.aspx |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20180421232656/http://www.kalkisubramaniam.com/about.aspx |archive-date=21 April 2018 |website=Kalki Subramaniam}}</ref>
कल्कि कई वर्षों तक ऑरोविल में भी रहीं।
== सामाजिक कार्य ==
2005 से कल्कि भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। वह तकनीक, कला, सिनेमा और साहित्य को ट्रांसजेंडर सशक्तीकरण के माध्यम के रूप में उपयोग करने वाले अपने अभिनव सामाजिक कार्य के लिए जानी जाती हैं। वह [[भारत का सर्वोच्च न्यायालय]] द्वारा ट्रांसजेंडर पहचान को कानूनी मान्यता देने वाले ऐतिहासिक निर्णय के पीछे सक्रिय भूमिका निभाने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थीं।<ref>{{Cite web |last=Anil |first=Chintha Mary |date=2016-06-11 |title=Cutting the phallus and destroying binaries: Transgender activist Kalki's battle through art |url=https://www.thenewsminute.com/article/cutting-phallus-and-destroying-binaries-transgender-activist-kalkis-battle-through-art-44694 |website=The News Minute |language=en |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20230329220812/https://www.thenewsminute.com/article/cutting-phallus-and-destroying-binaries-transgender-activist-kalkis-battle-through-art-44694 |archive-date=29 March 2023 }}</ref>
2009 में, एक लोकप्रिय वैवाहिक वेबसाइट द्वारा एक ट्रांसजेंडर महिला का विवाह विज्ञापन अस्वीकार किए जाने के बाद, कल्कि ने भारत की पहली ट्रांसजेंडर विवाह वेबसाइट की शुरुआत की।<ref>{{Cite web |last=Mahadevan |first=Meenakshi |date=September 3, 2009 |title=India's first transsexual matrimony site launched |url=https://www.news18.com/videos/india/transexuals-website-323933.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20190412092825/https://www.news18.com/videos/india/transexuals-website-323933.html |archive-date=12 April 2019 |website=News18}}</ref>
उन्होंने एलजीबीटीक्यू अधिकारों पर 12 से अधिक वृत्तचित्र बनाए हैं और कई अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्रों में अभिनय भी किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.thehindu.com/features/magazine/breaking-free/article6941000.ece|title=Breaking Free |newspaper=The Hindu|date=28 February 2015|last1=Parthasarathy|first1=Sindhuja }}</ref>
2010 में उन्होंने वंचित ट्रांसजेंडर महिलाओं को नागरिक पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया और उन्हें अपनी कहानियाँ बताने के लिए लघु वृत्तचित्र बनाने के लिए प्रेरित किया।<ref>{{cite news|url=https://www.reuters.com/article/india-transgender-journalists-kalki/indias-transgender-journalists-give-voice-to-community-idUSKBN1420ER|title=India's transgender journalists give voice to community |first1=Mrinalika |last1=Roy |newspaper=Reuters|date=13 December 2016 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220609025757/https://www.reuters.com/article/india-transgender-journalists-kalki/indias-transgender-journalists-give-voice-to-community-idUSKBN1420ER |archive-date=9 June 2022 }}</ref>
2019 के अक्टूबर में उन्होंने तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर में पहला LGBTQIA प्राइड मार्च आयोजित किया।
== उद्यमिता ==
2008 में कल्कि ने '''सहोदरी फ़ाउंडेशन''' की स्थापना की, जो भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए कार्य करने वाला एक संगठन है।<ref>{{cite web|url=https://sahodari.org/about/|title=About Sahodari Foundation - Sahodari.org|access-date=6 फ़रवरी 2026|archive-date=22 अक्तूबर 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20091022090211/http://sahodari.org/about_sahodari.html|url-status=dead}}</ref>
2017 में उन्होंने '''थूरिकाई''' नामक एक कला परियोजना शुरू की, जिसके माध्यम से 200 से अधिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अभिव्यक्तिपूर्ण कला का प्रशिक्षण देकर उनकी आजीविका के अवसर बढ़ाए।<ref>{{Cite news|url=https://transhearts.org/about|title=About Transhearts - Transhearts.org}}</ref>
== फ़िल्मी करियर ==
2011 में कल्कि ने [[तमिल भाषा]] की फ़िल्म '''नार्थागी''' में मुख्य भूमिका निभाई, जो ट्रांसजेंडर जीवन पर आधारित थी।
2018 में फ़िल्म '''सरकार''' के गीत “ओरु भाइरल पुरात्सी” में उन्होंने विशेष उपस्थिति दी।
वह भारत की पहली ट्रांसजेंडर महिला हैं जिन्होंने किसी फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई।<ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/bhopal-gets-drenched-in-rainbow-colours/articleshow/58746571.cms}}</ref>
2019 में उन्होंने समानांतर हिंदी फ़िल्म '''Kalashnikov – The Lone Wolf''' में मुख्य भूमिका निभाई।<ref>{{Cite news|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/tamil/movies/news/kalki-subramaniams-maiden-film-wins-award-in-new-delhi/articleshow/69162355.cms}}</ref>
== प्रकाशन ==
2015 में उनका तमिल कविता संग्रह '''कुरी अरुथेयन्''' प्रकाशित हुआ।
2021 में उनकी अंग्रेज़ी पुस्तक '''उइ आर नोट द्य आदार्स''' प्रकाशित हुई, जिसे हार्वर्ड कैनेडी स्कूल के पुस्तकालय में शामिल किया गया।
2024 में उनका तमिल काव्य-संग्रह '''ओरु थिरुनंगईयिन डायरी कुरिप्पु''' प्रकाशित हुआ।
== पुरस्कार और सम्मान ==
* 2010 – IVLP के अंतर्गत अमेरिका सरकार की आधिकारिक अतिथि
* 2014 – फेसबुक द्वारा विश्व की 12 प्रेरणादायक महिलाओं में चयन
* 2016 – NDTV Woman of Worth Award के लिए नामांकन
* 2019 – TransAmsterdam द्वारा “International Ambassador for Life”
== संदर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता]]
[[श्रेणी:भारतीय अभिनेत्री]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता]]
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कियोवा भाषा
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{| class="infobox vevent infobox-has-images-with-white-backgrounds"
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| colspan="2" class="infobox-subheader" style="font-size:110%; color: black; background-color: #c0dde6;" |<span title="Kiowa-language text">''Ǥáuiđòᵰgyà''</span> ~ <span title="Kiowa-language text">''[Gáui[dòñ:gyà''</span>
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| class="infobox-data" style="line-height:1.3em;" |२० (२००७)<ref name="unesco"><cite class="citation web cs1"><span class="cx-segment" data-segmentid="655">[http://www.unesco.org/culture/languages-atlas/en/atlasmap/language-id-873.html "UNESCO Atlas of the World's Languages in danger"]. </span><span class="cx-segment" data-segmentid="656">''www.unesco.org''<span class="reference-accessdate">. </span></span><span class="cx-segment" data-segmentid="657"><span class="reference-accessdate">Retrieved <span class="nowrap">2018-05-24</span></span>.</span></cite></ref>
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* '''कियोवा'''
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| colspan="2" class="infobox-full-data" style="line-height:1.3em;" |[[File:Kiowa_lang.png|फ़्रेमहीन]]<div style="text-align:left;">दक्षिणी मैदानों में प्रवास के बाद कियोवा भाषा का वितरण</div>
|-
| colspan="2" class="infobox-full-data" style="line-height:1.3em;" |[[File:Lang_Status_40-SE.svg|फ़्रेमहीन]]<div style="text-align:left;"><div class="center">कियोवा को [[UNESCO|यूनेस्को]] एटलस ऑफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेज इन डेंजर द्वारा गंभीर रूप से लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत किया गया है।</div></div>
|-
| colspan="2" class="infobox-below noprint selfref" style="background-color:#E7E7FF;color:inherit;padding:0.3em 0.5em;text-align:left;line-height:1.3;" |'''इस लेख में [[International Phonetic Alphabet|आई. पी. ए.]] ध्वन्यात्मक प्रतीक हैं।''' उचित प्रतिपादन समर्थन के बिना, आप [[Unicode|यूनिकोड]] वर्णों के बजाय [[Specials (Unicode block)#Replacement character|प्रश्न चिह्न, बक्से या अन्य प्रतीक]] देख सकते हैं। आईपीए प्रतीकों पर परिचयात्मक मार्गदर्शिका के लिए, हेल्पः आईपीए देखें।
|}
'''किओवा''' (अंग्रेज़ी/ˈkaɪ. oʊ. wə/{{Respell|KY|oh|wə}}) भाषा में ही [gàui [dón:gyà], 'किओवा' की भाषा 'कीओवा लोगों द्वारा बोली जाने वाली एक तानोअन भाषा है, जो मुख्य रूप से कैडो, '''कियोवा''' और कोमांचे काउंटी, [[ओक्लाहोमा]] में बोली जाती है। कियोवा आदिवासी केंद्र कार्नेगी में स्थित है। अधिकांश उत्तरी अमेरिकी स्वदेशी भाषाओं की तरह, कियोवा एक [[लुप्तप्राय भाषा]] है क्योंकि उसे सिर्फ २० लोग बोलते हैं।
== लिपि ==
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== भाषा पुनरोद्धार ==
टुलसा यूनिवर्सिटी, नॉर्मन में ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी और चिकाशा में ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड आर्ट्स, किओवा भाषा की क्लास देते हैं।
२०१० के दशक से, किओवा ट्राइब ने नॉर्मन, ओक्लाहोमा में एक नॉन-प्रॉफिट नेटिव अमेरिकन आर्ट सेंटर, जैकबसन हाउस में हर हफ़्ते भाषा की क्लास शुरू कीं। डेन पूलॉ और कैरल विलियम्स ने पार्कर मैकेंज़ी के तरीके का इस्तेमाल करके भाषा सिखाई।<ref>{{Cite web|url=http://www.kiowatribe.org/archives/1047|title=Kiowa Language Class {{!}} KIOWA TRIBE|website=www.kiowatribe.org|language=en-US|access-date=2026-02-22|archive-date=14 नवंबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111114232146/http://www.kiowatribe.org/archives/1047|url-status=dead}}</ref>
२०२२ में, टुलसा पब्लिक स्कूल ने जिले में किओवा भाषा और संस्कृति सिखाने के लिए ओक्लाहोमा की किओवा जनजाति के साथ एक एग्रीमेंट साइन किया।<ref>{{Cite web|url=https://tulsaworld.com/news/local/education/article_3513f3e0-0f7b-11ed-a2df-c301b7cee9e9.html|title=Tulsa school approves tribe's offering of Kiowa classes|last=World|first=Lenzy Krehbiel-Burton Tulsa|date=2022-08-02|website=Tulsa World|language=en|access-date=2026-02-22}}</ref> २०२६ तक, किओवा जनजाति के पास एक किओवा भाषा डिपार्टमेंट है।<ref>{{Cite web|url=https://www.kiowatribe.org/department/kiowa-language-department|title=Kiowa Language Department {{!}} Kiowa Tribe|website=www.kiowatribe.org|access-date=2026-02-22}}</ref>
== सन्दर्भ ==
[[श्रेणी:संयुक्त राज्य अमेरिका की भाषाएँ]]
[[श्रेणी:तानोआन भाषाएँ]]
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ओज़बेक खान मस्जिद
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text/x-wiki
{{Infobox religious building|building_name=ओज़बेक खान मस्जिद|religious_affiliation=[[सुन्नी इस्लाम]]|image=Stary Krym Meczet Chana Uzbeka.jpg|caption=|location=[[स्तार्यी क्रीम]]|geo={{Coord|45|01|45|N|35|05|19|E|display=inline,title|type:landmark_region:UA}}|cercle=|sector=|municipality=|district=|territory=[[क्रीमिया गणराज्य (रूस)|क्रीमिया गणराज्य]] ''([[वास्तव में]])''<br>
[[क्रीमिया का स्वायत्त गणराज्य]] ''([[विधि अनुसार]])''|prefecture=|state=|province=|region=|functional_status=सक्रिय|leadership=|website=|architect=|architecture_type=मस्जिद|architecture_style=|year_completed=1314|construction_cost=|facade_direction=|capacity=|length=|width=|width_nave=|height_max=|dome_quantity=|dome_height_outer=|dome_height_inner=|dome_dia_outer=|dome_dia_inner=|minaret_quantity=1|minaret_height=|spire_quantity=|spire_height=|materials=|module={{Infobox historic site |embed = yes |designation1 = UKRAINE NATIONAL |designation1_offname = {{Lang|uk|Мечеть і медресе}} (''मस्जिद और मदरसा'') |designation1_type = वास्तुकला |designation1_number = 010068}}|specifications=yes}}
'''ओज़बेक खान मस्जिद''' ({{langx|crh|Özbek Han Camisi}}; {{langx|tr|Özbek Han Camii}}) क्रीमिया के स्तार्यी क्रीम में स्थित एक [[मस्जिद]] है। ओज़बेक खान मस्जिद क्रीमिया की सबसे पुरानी मस्जिद है, जिसका निर्माण 1314 में ओज़बेक खान के शासनकाल के दौरान किया गया था।<ref name="Crimea">{{cite web|url=http://www.iccrimea.org/monuments/monuments.html|title=Crimean Tatar Architecture|publisher=International Committee for Crimea|access-date=2011-02-20|archive-date=6 जनवरी 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170106033834/http://www.iccrimea.org/monuments/monuments.html|url-status=dead}}</ref>
== इतिहास ==
14वीं शताब्दी तक स्तार्यी क्रीम को सोल्खात के नाम से जाना जाता था, जो गोल्डन होर्ड के शासन के दौरान एक समृद्ध शहर था। शुरुआती क्रीमियाई खानों की राजधानी सोल्खात में थी, जिसे 16वीं शताब्दी के पहले भाग में बाखचीसराय में स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद सोल्खात ने एक सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में अपना महत्व धीरे-धीरे खो दिया।
ओज़बेक खान मस्जिद का निर्माण 1314 में हुआ था और मस्जिद की दक्षिणी दीवार से सटा हुआ [[मदरसा]], 1332 में किलबुरुन बे की बेटी इंची खातून द्वारा बनवाया गया था। आज मदरसे के केवल अवशेष ही बचे हैं।
मस्जिद का फर्श योजना वर्गाकार है, जो सेलजुक काल के दौरान [[अनातोलिया]] में पाई जाने वाली वास्तुकला की विशेषताओं के समान है। मस्जिद की एक अनूठी विशेषता इसका भव्य प्रवेश द्वार है जिसमें नक्काशीदार लकड़ी का दरवाजा लगा है।
आज, स्तार्यी क्रीम में एक छोटी लेकिन समर्पित क्रीमियाई तातार आबादी है, और ओज़बेक खान मस्जिद एक बार फिर से इबादतगाह के रूप में कार्य कर रही है।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
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वाइल्ड ब्लड (वीडियो गेम)
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आयुष दास
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इमेज और कैप्शन डाले गए।
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text/x-wiki
{{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=मार्च 2026}}
{{एक स्रोत|date=मार्च 2026}}
{{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम
| title = वाइल्ड ब्लड
| developer = [[Gameloft]]
| publisher = Gameloft
| designer = स्टैनिस्लास देववरिन<!-- creative director --><br />मेई डोंग शेंग<!-- creative director -->
| engine = [[Unreal Engine 3]]<ref>{{cite web |url=http://www.phonesreview.co.uk/2012/08/23/wild-blood-game-for-ios-and-android-video-released/ |title=Wild Blood game for iOS and Android video released - PhonesReviews UK- Mobiles, Apps, Networks, Software, Tablet etc |website=Phonesreview.co.uk |date=2012-08-23 |access-date=2016-05-12 |archive-date=2018-06-18 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180618052903/http://www.phonesreview.co.uk/2012/08/23/wild-blood-game-for-ios-and-android-video-released/ |url-status=live }}</ref>
| released = 6 सितंबर 2012
| genre = [[हैक एंड स्लैश]]
| modes = [[एकल-खिलाड़ी]], [[मल्टीप्लेयर]]
| platforms = [[Android (operating system)|एंड्रॉइड]], [[आईओएस]]
| artist = ग्वेनेल हेलिउ<!-- art director --><br />आर्थर ह्यूगोट<!-- art director redsteam -->
| producer = जोनाथन स्टॉक<!-- executive producer --><br />जीन-क्लाउड लेबेले<!-- executive producer -->
| image = वाइल्ड ब्लड.webp
| caption = गेम का आइकॉन
}}वाइल्ड ब्लड एक एक्शन गेम है जिसे Gameloft द्वारा [[आईओएस]] ([[आईफ़ोन|आईफोन]] और [[आईपैड]]) और एंड्रॉइड के लिए 2012 में विकसित और प्रकाशित किया गया था।
== गेमप्ले ==
वाइल्ड ब्लड एक हैक एंड स्लैश गेम है जिसमें प्रमुख हथियार तलवार, कुल्हाड़ी और धनुष होते हैं, जिनमें से हर एक में विभिन्न कॉम्बो चालें होती हैं, साथ ही बुनियादी तौर पर तीन तत्त्वों (आग, बर्फ़ और बिजली) के साथ जादू के हमले होते हैं। प्लेयर को एक स्तर से दूसरे तक जाने के लिए एक निश्चित तादाद के दुश्मनों को मारना पड़ता है। प्लेयर फ़व्वारों पर अपनी प्रगति को बचा सकते हैं, जहाँ वे नए हथियार और कवच भी क्रय कर सकते हैं। इस गेम में कैप्चर द फ्लैग और टीम डेथमैच मोड के साथ चार-पर-चार ऑनलाइन मल्टीप्लेयर भी हैं।
== प्लॉट ==
वाइल्ड ब्लड आर्थरियन किंवदंतियों से मुतासिर है। गेम में, प्लेयर ईर्ष्यालु और पागल [[राजा आर्थर]] के विरुद्ध अपनी लड़ाई लड़ने के लिए सर लैंसलॉट को नियंत्रित करता है। राजा आर्थर, जिसने रानी गिनीवर के साथ लैंसलॉट के ताल्लुक़ से नाराज़ होकर अपनी दुष्ट जादूगरनी बहन मोर्गाना को अपनी बादशाही ताक़त सौंप देता है ताकि वह लैंसलॉट और उसके बेगम को तकलीफ़ में देख सके। लेकिन काली चुड़ैल ने बदले में नरक का दरवाज़ा खोला, हैवानी जानवरों की फ़ौज को उसके सेवकों के रूप में काम करने के लिए मुक्त किया, और गिनीवर को भी पकड़ कर उसे एवलॉन के जादुई टापू पर एक टावर में बंधक बना लिया। अपने प्यार को बचाने के लिए, लैंसलॉट को राजा और फिर मोर्गाना जो ड्रैगन में बदलने में सक्षम है, उसे हराने के लिए नरक स्पॉन भीड़ का सामना करना होगा। इसके लिए वह गवैन और मर्लिन जैसे सहयोगियों की मदद लेगा, जिनमें से मर्लिन को पहले स्वयंग आज़ाद करना ज़रूरी है।
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क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह
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text/x-wiki
{{Infobox writer
| name = क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह
| native_name = قيس بن الملوح
| image = Qays ibn Al-Mulawwah by Khalil Gibran.png
| caption = खलील जिब्रान द्वारा क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह का एक रेखाचित्र
| birth_date = लगभग 645 ईसवी
| birth_place = नज्द, अरबी प्रायद्वीप (उमय्यद खिलाफत)
| death_date = लगभग 688 ईसवी
| death_place = नज्द, अरबी प्रायद्वीप
| occupation = [[कवि]]
| language = [[अरबी भाषा|शास्त्रीय अरबी]]
| nationality = अरब
| genre = ग़ज़ल, उज़्री (ʿUdhri) प्रेम कविता
| notableworks = मजनून लैला की कविताएँ (दीवान-ए-मजनून)
| movement = उज़्री (ʿUdhri) काव्य परंपरा
| wikidata = Q14354376
}}
'''क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह''' (अरबी: قيس بن الملوح; जन्म लगभग 645 ईसवी – निधन 688 ईसवी), जिन्हें [[इतिहास]] और साहित्य में उनके लोकप्रिय उपनाम '''मजनून लैला''' (مجنون ليلى, अर्थात "लैला का पागल") से जाना जाता है, उमय्यद खिलाफत के युग के एक प्रमुख शास्त्रीय अरबी कवि थे। वे बानू आमिर (Banu 'Amir) कबीले से संबंधित एक बद्दू (खानाबदोश) कवि थे। शास्त्रीय अरबी साहित्य और मध्य पूर्वी इतिहास में उन्हें उनकी चचेरी बहन [[लैला अल-आमिरिया]] (Layla al-Aamiriya) के साथ उनके अप्राप्य और दुखद प्रेम प्रसंग के लिए मुख्य रूप से पहचाना जाता है। उनकी यह कथा [[अरबी संस्कृति]] से निकलकर बाद में [[मध्य पूर्व|मध्य पूर्वी]], [[तुर्की]] और [[दक्षिण एशिया|दक्षिण एशियाई]] साहित्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाओं में से एक बन गई।<ref>{{Cite book|url=https://www.cambridge.org/core/books/arabic-poetics/069E5876505AED64A8B3FD53A4A5EB4A|title=Arabic Poetics: Aesthetic Experience in Classical Arabic Literature|last=Harb|first=Lara|date=2020|publisher=Cambridge University Press|isbn=978-1-108-49021-4|series=Cambridge Studies in Islamic Civilization|location=Cambridge}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और सामाजिक परिवेश ==
क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह का जन्म [[सातवीं शताब्दी]] में [[अरबी प्रायद्वीप]] के नज्द क्षेत्र में हुआ था। ऐतिहासिक कथाओं और साहित्यिक स्रोतों के अनुसार, क़ैस और लैला एक ही कबीले के थे और बचपन के साथी थे। बेदुइन (बद्दू) परंपराओं के अनुसार, वे दोनों अपने कबीले के मवेशियों को एक साथ चराते हुए बड़े हुए थे। इसी दौरान क़ैस का लैला के प्रति आकर्षण बढ़ा। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, क़ैस ने लैला की सुंदरता और अपने भावनात्मक जुड़ाव का वर्णन करते हुए कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं, जो धीरे-धीरे उनके कबीले में प्रसिद्ध होने लगीं।<ref>{{Cite web|url=https://arablit.org/2014/11/04/chronicles-of-majnun-layla-selected-poems/|title=‘Chronicles of Majnun Layla & Selected Poems’: A Different Kind of Crazy|date=2014-11-04|website=ARABLIT & ARABLIT QUARTERLY|language=en-US|access-date=2026-03-13}}</ref>
उस समय के तत्कालीन अरब समाज में, विवाह से पूर्व किसी महिला के लिए खुलेआम प्रेम कविताएँ लिखना या उसके नाम की सार्वजनिक घोषणा करना सामाजिक रूप से अत्यंत अनुचित माना जाता था। जब क़ैस ने लैला के पिता के समक्ष विवाह का औपचारिक प्रस्ताव रखा, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया। लैला के परिवार का तर्क था कि क़ैस की कविताओं ने पहले ही समाज में विवाद उत्पन्न कर दिया है, और ऐसे व्यक्ति से विवाह करना परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के विरुद्ध होगा। इसके परिणामस्वरूप, लैला का विवाह 'वर्द' (Ward) नामक एक अन्य संपन्न व्यक्ति से कर दिया गया।<ref>{{Cite web|url=https://www.orient-institut.org/publications/bts-beiruter-texte-und-studien/details/love-madness-and-poetry-an-interpretation-of-the-ma-nun-legend.html|title=Love, Madness, and Poetry: An Interpretation of the Maǧnūn Legend|website=www.orient-institut.org|language=en-US|access-date=2026-03-13}}</ref>
== अलगाव, निर्वासन और उज़्री काव्य परंपरा ==
लैला के विवाह की खबर का क़ैस के [[मानसिक स्वास्थ्य]] पर गंभीर प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपना सामान्य जीवन, [[जनजाति|कबीले]] के लोग और अपना घर छोड़ दिया और [[मरुस्थल|रेगिस्तान]] की ओर प्रस्थान किया। उनके इस विक्षिप्त व्यवहार, सामाजिक अलगाव और दिन-रात जंगलों में भटकने के कारण ही स्थानीय लोगों ने उन्हें '''मजनून''' (जिसका अरबी अर्थ 'पागल' या 'जिन्न द्वारा ग्रसित' होता है) कहना शुरू कर दिया।<ref>{{Cite book|url=https://press.uchicago.edu/ucp/books/book/chicago/Z/bo3634564.html|title=The Zephyrs of Najd: The Poetics of Nostalgia in The Classical Arabic Nasib|last=Stetkevych|first=Jaroslav|publisher=University of Chicago Press|location=Chicago, IL|language=en}}</ref>
साहित्यिक आख्यानों के अनुसार, मजनून ने अपना शेष जीवन नज्द के बंजर रेगिस्तान में भटकते हुए व्यतीत किया। वे अक्सर रेत पर लकड़ी के टुकड़े से लैला के लिए कविताएँ लिखते थे। उनकी कविताओं में अलगाव की पीड़ा, अप्राप्य प्रेम का दुख और आसपास के प्राकृतिक परिवेश का विस्तृत वर्णन मिलता है। उनकी ये रचनाएँ अरबी साहित्य की 'उज़्री' (ʿUdhri) काव्य परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती हैं। उज़्री कविता की विशेषता यह है कि यह बिना किसी शारीरिक या सांसारिक संबंध के, एक अत्यंत पवित्र, वैराग्यपूर्ण और दुखद प्रेम पर केंद्रित होती है, जिसमें प्रेमी अक्सर अपने प्रेम की प्राप्ति न होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है।<ref>{{cite book |title=Al-A’māl al-Shiʿriyyah [Poetic Works] |volume=2 |location=Beirut |publisher=Al-Muʾassasa al-ʿArabiyya lil-Dirāsāt wa-l-Nashr |year=2000 |pages=181–254}}</ref>
== साहित्यिक विरासत और सूफी प्रतीकवाद ==
क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह की कहानी केवल एक क्षेत्रीय अरबी लोककथा तक सीमित नहीं रही, बल्कि समय के साथ इसने एक दार्शनिक, [[अध्यात्मवाद|आध्यात्मिक]] और [[प्रतीकात्मक]] रूप ग्रहण कर लिया। इस्लामी रहस्यवाद (सूफीवाद) के उदय के साथ, मजनून का लैला के प्रति सांसारिक प्रेम, आत्मा की ईश्वर (परमात्मा) के प्रति असीम लालसा का एक रूपक (Allegory) बन गया। सूफी विचारकों ने मजनून के विक्षिप्तपन को सांसारिक मोहमाया से मुक्ति और ईश्वरीय प्रेम में पूर्ण समर्पण (फ़ना) के रूप में व्याख्यायित किया।<ref>{{cite journal |last=Watson |first=Alasdair |title=From Qays to Majnun: the evolution of a legend fromʿUdhri roots to Sufi allegory |journal=University of Oxford |page=2 |access-date=2026-03-13 |url=https://www.slv.vic.gov.au/sites/default/files/La-Trobe-Journal-91-Alasdair-Watson.pdf}}</ref>
इस [[ऐतिहासिक स्रोत|ऐतिहासिक कथा]] को 12वीं शताब्दी में फारसी के महान कवि निज़ामी गंजवी ने अपने महाकाव्य 'लैला-मजनून' का मुख्य विषय बनाया। निज़ामी की रचना के बाद यह कहानी तुर्की, फारसी और दक्षिण एशियाई साहित्य में व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गई। प्रारंभिक आधुनिक [[भारतीय उपमहाद्वीप]] में भी लैला और मजनून की कथा का व्यापक प्रभाव पड़ा, जहाँ इसे क्षेत्रीय भाषाओं में कई बार रूपांतरित किया गया और यह यहाँ के [[लोक साहित्य]] का अभिन्न अंग बन गई।<ref>{{cite journal |last=Hasson |first=Michal |date=31 August 2018 |title=Crazy in Love: The Story of Laila and Majnun in Early Modern South Asia |journal=Harvard University, Graduate School of Arts & Sciences |page=32 |access-date=2026-03-13 |url=https://dash.harvard.edu/server/api/core/bitstreams/a9b27ae0-5d0a-422e-aafe-08b5100288c3/content |archive-date=6 मार्च 2026 |archive-url=https://web.archive.org/web/20260306173334/https://dash.harvard.edu/server/api/core/bitstreams/a9b27ae0-5d0a-422e-aafe-08b5100288c3/content |url-status=bot: unknown }}</ref>
== आधुनिक संस्कृति और कला में प्रभाव ==
क़ैस की कविता और उनके जीवन की कथा का आधुनिक साहित्य, कला और [[फ़िल्म|सिनेमा]] पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। समकालीन लेखकों और कवियों ने उनकी शास्त्रीय कविताओं का नए दृष्टिकोण से मूल्यांकन किया है। बहरीन के प्रसिद्ध कवि कसीम हद्दाद ने अपनी पुस्तक 'क्रॉनिकल्स ऑफ मजनून लैला एंड सिलेक्टेड पोयम्स' में उनकी कविताओं का आधुनिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भ में विश्लेषण किया है।<ref>{{Cite book|url=https://openlibrary.org/books/OL34028710M/Chronicles_of_Majnun_Layla_and_Selected_Poems|title=Chronicles of Majnun Layla and Selected Poems|last=Haddad|first=Qasim|last2=Ghazoul|first2=Ferial Jabouri|last3=Verlenden|first3=John|date=2014|publisher=Syracuse University Press|isbn=978-0-8156-5288-5}}</ref>
विश्व स्तर पर इस कहानी का कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उदाहरण के लिए, 1981 में जापानी विद्वान एमिको ओकाडा द्वारा इसका जापानी भाषा में अनुवाद किया गया, जिसने पूर्वी एशिया में इस कथा को परिचित कराया।<ref>{{cite book |title=Laila and Majnun: An Arab Love Story |language=ja |translator=Emiko Okada |publisher=Heibonsha Toyo Bunko |year=1981 |access-date=2026-03-13|url=https://www.heibonsha.co.jp/book/b164515.html|archive-url=https://web.archive.org/web/20250417035217/https://www.heibonsha.co.jp/book/b164515.html|archive-date=2025-04-17}}</ref> इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्वी सिनेमा और दृश्य-श्रव्य माध्यमों में भी इस कहानी को कई बार फिल्माया गया है। 1960 में 'कैस वा लैला' (Qaiss wa Laila) नामक एक लोकप्रिय अरबी फिल्म का निर्माण किया गया।<ref>{{Citation|last=Din|first=Ahmed Dia El|title=Qaiss wa Laila|date=1960-01-18|url=https://www.imdb.com/hi/title/tt0359531/?reasonForLanguagePrompt=browser_header_mismatch|others=Magda, Shukri Sarhan, Mohamed Sobeih|publisher=Aflam Magda|access-date=2026-03-13}}</ref> 2008 में 'मजनून लैला' (مجنون ليلى) नामक एक ऐतिहासिक टेलीविजन धारावाहिक प्रसारित किया गया, जिसने आधुनिक दर्शकों के समक्ष इस कवि की जीवनी को एक नए रूप में प्रस्तुत किया।<ref>{{cite web |title=طاقم العمل: مسلسل - مجنون ليلى - 2008 |url=https://elcinema.com/work/1011442/cast |access-date=2026-03-13}}</ref>
== इन्हें भी देखें ==
* [[लैला अल-आमिरिया]]
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
[[श्रेणी:अरब कवि]]
[[श्रेणी:उमय्यद खलीफ़ाओं के काल के लोग]]
[[श्रेणी:सातवीं शताब्दी के अरब लोग]]
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=== मार्च 2026 ===
# [[:चिरंजीवी सरजा]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 20:50, 18 मार्च 2026 (UTC)
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=== अप्रैल 2026 ===
# [[:द्वितीयक रंग]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 17:09, 2 अप्रैल 2026 (UTC)
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# [[:द्वितीयक रंग]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 17:09, 2 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:सदस्य:Harendra jakhar nagour]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 17:23, 2 अप्रैल 2026 (UTC)
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6543603
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2026-04-24T11:55:47Z
AMAN KUMAR
911487
शीह नामांकन का लॉग बनाया जा रहा of [[:के राघवन रेड्डी]].
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wikitext
text/x-wiki
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=== अप्रैल 2026 ===
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# [[:सदस्य:Harendra jakhar nagour]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 17:23, 2 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:सहायता:Protection]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 17:30, 2 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:कंपनी हवलदार मेजर]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 22:57, 5 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:विक्रम सिंह मीना]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 01:25, 7 अप्रैल 2026 (UTC)
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# [[:सदस्य वार्ता:Govind Bhana Artist]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 14:38, 12 अप्रैल 2026 (UTC)
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# [[:पूर्ति आर्या]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 03:47, 13 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:साँचा:Article wizard/button wizard/sandbox]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 20:33, 13 अप्रैल 2026 (UTC)
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# [[:सदस्य वार्ता:Nawada District President of Youth Congress is Mohammad Irshad Ansari]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 04:14, 15 अप्रैल 2026 (UTC)
# [[:ऑस्ट्रेलिया के लिए CDR]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 08:44, 15 अप्रैल 2026 (UTC)
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कासिमिया मदरसा
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{{Infobox school|name=कासिमिया मदरसा|native_name={{langx|tr|Kasımiye Medresesi}}|image=Mardin P1050254 20080426114925.JPG|alt=|caption=|motto=|motto_translation=|location=[[मार्डिन]]|country=[[तुर्की]]|coordinates={{coord|37|18|29|N|40|43|12|E|type:edu_region:TR|display=inline,title}}|other_name=|former_name=|type=[[मदरसा]]|religious_affiliation=[[इस्लाम]]|established=|founder=|closed=|school_board=|district=|authority=|oversight=|principal=|head=|staff=|faculty=|grades=|gender=|age_range=|enrollment=|language=|campus_size=|campus_type=|colors=|accreditation=|publication=|newspaper=|yearbook=|affiliation=|website=|footnotes=}}'''कासिमिया मदरसा''' ({{langx|tr|Kasımiye Medresesi}}) या '''कासिम पाशा मदरसा''' तुर्की के मार्डिन में स्थित एक पूर्व [[मदरसा]] है।
== भूगोल ==
मदरसा पुराने मार्डिन के शहर केंद्र के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।<ref>{{Cite web|url=http://www.e-sehir.com/turkiye-haritasi/mardin-il-haritasi.html#.U5G2Ys-KDGI|title=City map|archive-url=https://web.archive.org/web/20190531081751/http://www.e-sehir.com/turkiye-haritasi/Mardin-il-haritasi.html#.U5G2Ys-KDGI|archive-date=2019-05-31|access-date=2014-06-06|url-status=dead}}</ref> कासिमिया की ऊंचाई लगभग 975 मीटर है।
== इतिहास ==
मदरसे का निर्माण एक अनातोलियाई बेयलिक के शासक, अर्तुक़िद राजवंश के सुल्तान अल-ज़ाहिर मजद अल-दीन ईसा इब्न दाऊद (या ईसा बे) द्वारा शुरू किया गया था। हालाँकि, 1407 में इमारत पूरी तरह से बनने से पहले ही कराकोयूनलू के खिलाफ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई थी।<ref>{{Cite book|title=Eastern Turkey: an architectural and archaeological survey|last=Sinclair|first=Thomas Alan|publisher=The Pindar Press|year=1989|isbn=0907132340|volume=III|pages=205–206}}</ref> शहर पर अक कोयुनलू तुर्कमेनों के कब्जे के बाद निर्माण कार्य फिर से शुरू हुआ। अक कोयुनलू सुल्तान मुइज़-अल-दीन के बेटे कासिम को 1445 में मदरसे को पूरा करने का श्रेय दिया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://archnet.org/sites/2065|title=Kasim Pasa Medresesi|website=Archnet|access-date=2020-11-01|archive-date=7 नवंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201107225023/https://archnet.org/sites/2065|url-status=dead}}</ref>
1924 में, धार्मिक जीवन पर सामान्य प्रहार और समाज को [[धर्मनिरपेक्षता|धर्मनिरपेक्ष]] बनाने के प्रयास के तहत तुर्की के सभी मदरसे बंद कर दिए गए थे।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=qfcyEAAAQBAJ&dq=turkey+1924+madrasas&pg=PT133|title=The Routledge Handbook on Contemporary Turkey|last=Jongerden|first=Joost|publisher=Routledge|year=2021|isbn=978-0-429-55906-8|language=en}}</ref>
== इमारत ==
मुख्य इमारत आयताकार है। अलंकृत पोर्टल के माध्यम से प्रवेश दक्षिण से होता है। प्रांगण में एक जलकुंड है। पानी का स्रोत दीवार में बना एक कीप है जो जन्म का प्रतिनिधित्व करता है। जलकुंड का पानी एक संकरी झिरी के माध्यम से निकलता है जो मृत्यु और सिरात (इस्लामी मान्यता में नर्क के ऊपर एक संकरा पुल जो स्वर्ग की ओर जाता है) का प्रतिनिधित्व करता है। कक्षाएं जलकुंड के चारों ओर बनी हैं। कक्षाओं के दरवाजों को जानबूझकर नीचा रखा गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि छात्र प्रवेश करते समय अपने शिक्षकों के सामने सम्मानपूर्वक झुकें।
== हाथी घड़ी ==
[[इवान]] के उत्तर में 12वीं शताब्दी के मुस्लिम इंजीनियर इस्माइल अल-जज़ारी द्वारा डिजाइन की गई एक हाथी घड़ी की प्रतिकृति रखी गई है।<ref>{{Cite web|url=http://haberler.mardinimiz.com/haber_detay.asp?haberID=1889|title=Mardin news by Dr. Salim Aydüz|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304034722/http://haberler.mardinimiz.com/haber_detay.asp?haberID=1889|archive-date=2016-03-04|access-date=2014-06-06|url-status=dead}}</ref>
== संदर्भ ==
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ओताजॉनबॉय मदरसा
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text/x-wiki
{{Infobox building|name=ओताजॉनबॉय मदरसा|native_name=|image=|coordinates={{coord|41.37671|60.35986|format=dms|type:landmark_region:UZ|display=inline,title}}|architectural_style=मध्य एशियाई वास्तुकला|address=23, पहलवन महमूद स्ट्रीट, [[इचान कला]], [[खीवा]], [[खोरज़्म क्षेत्र]], उज्बेकिस्तान|years_built=1884|renovation_date=1970–1980|owner=राज्य संपत्ति|material=पकी हुई ईंटें|floor_count=2|floor_area=19.9x17.25 मीटर}}'''ओताजॉनबॉय मदरसा''' (या ओताजॉन बॉय मदरसा) उज्बेकिस्तान गणराज्य के खोरज़्म क्षेत्र के [[खीवा]] शहर में स्थित एक वास्तुशिल्प स्मारक है। इस मदरसे का निर्माण 1884 में खीवा के एक धनी व्यक्ति ओताजॉनबॉय के धन से किया गया था। आज यह मदरसा पहलवन महमूद स्ट्रीट के "इचान कला" पड़ोस में स्थित है।
उज्बेकिस्तान के मंत्रिपरिषद के 4 अक्टूबर, 2019 के निर्णय द्वारा, ओताजॉनबॉय मदरसे को भौतिक सांस्कृतिक विरासत की अचल संपत्ति वस्तुओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल किया गया और इसे राज्य संरक्षण प्राप्त हुआ।<ref>{{Cite web|url=https://nrm.uz/contentf?doc=348334_tarihiy_badiiy_eki_o%E2%80%98zga_madaniy_qimmatliligi_tufayli_garov_va_ipoteka_qo%E2%80%98llanilishi_mumkin_bo%E2%80%98lmagan_obektlar_ro%E2%80%98yhati_(o%E2%80%98zr_vm_05_12_2014_y_335-son_qaroriga_ilova)|title=The list of objects that cannot be pledged and mortgaged...|website=nrm.uz|access-date=2023-10-26}}</ref> वर्तमान में, इचान कला राज्य संग्रहालय-आरक्षित क्षेत्र परिचालन प्रबंधन के अधिकार के आधार पर राज्य की संपत्ति है।<ref>{{Cite web|url=https://lex.uz/ru/docs/-4543266?ONDATE2=17.06.2021&action=compare|title=LAW ON THE APPROVAL OF THE NATIONAL LIST OF REAL ESTATE OBJECTS OF TANGIBLE CULTURAL HERITAGE|access-date=2023-10-11}}</ref>
== इतिहास ==
1842 में, खीवा खानते के शासक अल्लाकुली खान ने खीवा के एक हिस्से को एक विशेष दीवार से घेरने का आदेश दिया और शहर के इस हिस्से को इचान कला कहा गया। 19 के दशक में खीवा में कई मदरसों और मस्जिदों का निर्माण हुआ। ओताजॉनबॉय मदरसा खीवा में माज़ोरी शरीफ़ मदरसे के बगल में बनाया गया था। यह 1884 में खीवा के जमींदार ओताजॉनबॉय की पहल और धन से बनाया गया था। यह मदरसा पहलवन महमूद परिसर की अंतिम इमारतों में से एक है। ऊपर से देखने पर, इसका आकार एक विषम आयत जैसा दिखता है, जो अपनी दक्षिणी दीवार पर बाहरी प्रवेश द्वार के संबंध में पूर्व से पश्चिम की ओर तिरछा फैला हुआ है।
ओताजॉनबॉय मदरसा और माज़ोरी शरीफ़ मदरसे के बीच एक आंतरिक गलियारा है। एक-दूसरे के करीब होने के कारण ये दोनों मदरसे एक ही परिसर के रूप में दिखाई देते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.sayyoh.com/diqqatga-sazovor-joylar/xiva-otajonboy-madrasasi/|title=Khiva — Otajonboy madrasah|access-date=2023-10-24|archive-date=29 फ़रवरी 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240229135016/https://www.sayyoh.com/diqqatga-sazovor-joylar/xiva-otajonboy-madrasasi/|url-status=dead}}</ref>
मदरसे का 1970-1980 में नवीनीकरण किया गया था। आज इसमें लकड़ी पर नक्काशी की एक कार्यशाला संचालित हो रही है।<ref>[[OʻzME]]. 1st Volume. Tashkent, 2000</ref>
== वास्तुकला ==
मदरसे का निर्माण एक जटिल लेआउट (19.9x17.25 मीटर) में किया गया था, जिसका अग्रभाग दक्षिण की ओर है। इसके दो किनारों (wings) को गुलदस्ते जैसे पैटर्न से सजाया गया है। प्रवेश द्वार के माध्यम से मियोंसराय में प्रवेश होता है। एक छोटा प्रांगण (5.65x11.0 मीटर) कोठरियों (cells) से घिरा हुआ है।
दक्षिणी दीवार और [[मिहराब]] पर [[मुकर्नास]] बनाए गए हैं। कोठरियाँ थोड़े गुंबददार आकार की हैं। प्रवेश कक्ष एक गुंबद से ढका हुआ है जो प्रांगण की ओर ले जाता है। चूंकि मदरसे में कोई विशेष अध्ययन कक्ष नहीं था, इसलिए इसका कार्य संभवतः दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित केवल एक बड़े कमरे द्वारा पूरा किया जाता था।<ref>{{Cite web|url=https://www.khivamuseum.uz/uz/otajonboy-madrasasi|title=Otajonboy madrasah|access-date=2023-10-24}}</ref>
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
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कलामंडलम हैदराली
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{{Infobox musical artist
| background = solo_singer
| name = कलामंडलम हैदराली <br> കലാമണ്ഡലം ഹൈദരാലി
| image = Kalamandalam_Hyderali.jpg
| caption = कलामंडलम हैदराली
| birth_name = हैदराली
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| genre = [[कथकली]]
| occupation = गायक
}}
'''कलामंडलम हैदराली''' (5 सितंबर 1946 – 5 जनवरी 2006) अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ [[कथकली]] गायकों में से एक थे। वे दक्षिण [[भारत]] के [[केरल]] की चार शताब्दी पुरानी शास्त्रीय नृत्य-नाटिका में अपनी पहचान बनाने वाले पहले गैर-[[हिंदू]] कलाकार थे।<ref>{{cite web|url=http://www.hindu.com/mag/2006/01/22/stories/2006012200320500.htm|title=Transcending barriers – K. K. GOPALAKRISHNAN|date=2006-01-22|access-date=23 मार्च 2026|archive-date=27 नवंबर 2007|archive-url=https://web.archive.org/web/20071127130015/http://www.hindu.com/mag/2006/01/22/stories/2006012200320500.htm|url-status=dead}}</ref>
== जीवन ==
हैदराली [[त्रिशूर]] जिले के वदक्कांचेरी स्थित ओट्टुपारा के निवासी थे। उनके पिता, मोइदुट्टी, मापिला पाट्टु के प्रतिपादक थे। कला जगत ने पहली बार नन्हे हैदराली की प्रतिभा को तब पहचाना जब उन्होंने एक स्थानीय स्तर की प्रतियोगिता में मलयालम फिल्म गीत "कल्ले कनिविले" गाकर जीत हासिल की। 11 साल की उम्र में हैदराली [[केरल कलामंडलम]] में शामिल हुए। एक गरीब परिवार से होने के कारण उनके माता-पिता को प्रवेश शुल्क देने में कठिनाई हुई थी - जैसा कि हैदराली ने बाद में अपनी आत्मकथा में याद किया, "एक हिंदू और एक ईसाई" ने उन्हें इस प्रमुख प्रदर्शन कला संस्थान में प्रवेश दिलाने में मदद की थी।
== शिक्षा ==
कलामंडलम में उन्होंने कलामंडलम नीलकंदन नंबिसन, शिवरामन नायर और कलामंडलम गंगाधरन जैसे गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया। संस्थान में उनके समकालीनों में मदंबी सुब्रमण्यन नंबूदिरि, कलामंडलम शंकरन एमब्रान्थिरी और कलामंडलम तिरुर नंबिसन शामिल थे। अपना पाठ्यक्रम पूरा करने के कुछ समय बाद, कला संरक्षक एम. के. के. नायर ने उन्हें कोच्चि के पास अंबलमेडु में फैक्ट कथकली स्कूल में नौकरी की पेशकश की।
हैदराली ने कलामंडलम शंकरन एमब्रान्थिरी और वेनमणि हरिदास के साथ मिलकर कथकली संगीत के सौंदर्य को फिर से ढालने और इसे अधिक लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हैदराली की आवाज हल्की, लचीली और मधुर थी जो कथकली मंच पर कोमल और मेलोड्रामैटिक दृश्यों के लिए बहुत उपयुक्त थी। उनके भावनात्मक गायन की कलामंडलम गोपी जैसे उस्तादों ने भी प्रशंसा की। हैदराली उन अग्रदूतों में से थे जिन्होंने कथकली संगीत को दृश्य प्रदर्शन के बिना स्वतंत्र कार्यक्रमों के रूप में प्रस्तुत किया। उनका यह नवाचार आज भी प्रचलित है।
== धार्मिक बाधाएं ==
सौम्य और मृदुभाषी स्वभाव के हैदराली वास्तविक जीवन में भगवान कृष्ण को देखने की इच्छा रखते थे, लेकिन उन्हें धार्मिक आधार पर कभी-कभी व्यावसायिक अपमान का सामना करना पड़ता था, क्योंकि केरल के मंदिरों में (जहाँ कथकली शो का एक बड़ा हिस्सा आयोजित होता है) गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। कथकली प्रेमी याद करते हैं कि कैसे [[हरिपाद]] के पास एक प्राचीन मंदिर के प्रबंधकों ने परिसर की दीवार का एक हिस्सा ढहा दिया और वहां मंच का विस्तार किया ताकि हैदराली परिसर के अंदर प्रदर्शन करने वाले कथकली कलाकारों के लिए बाहर बैठकर गा सकें। 2019 में किरण जी. नाथ द्वारा उनके जीवन पर मलयालम भाषा में एक फीचर फिल्म कलामंडलम हैदराली (फिल्म) भी बनाई गई थी।
== बाद का जीवन ==
1990 के दशक तक हैदराली ने कथकली की प्रेमपूर्ण, नाटकीय और शास्त्रीय कहानियों को संभालने में अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। लेकिन, जब उनका करियर चरम पर था, तभी 5 जनवरी 2006 को अपने गृह नगर के पास मुल्लुरकरा में एक कार दुर्घटना में उनका निधन हो गया। हैदराली का संगीत, जिसका आधार हिंदुस्तानी शास्त्रीय या गजल जैसी शैली के करीब था, कथकली संगीतकारों की अगली पीढ़ियों में जीवित है। उनमें से प्रमुख पाथियूर शंकरनकुट्टी हैं, जिन्हें हैदराली ने उनके शुरुआती दिनों में तैयार किया था।
== मृत्यु ==
हैदराली की मृत्यु 5 जनवरी 2006 को त्रिशूर जिले के मुल्लुरकरा के पास एक कार दुर्घटना में हुई थी।<ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/features/metroplus/accident-of-worth/article5871429.ece|title=Accident of worth|date=4 April 2014|newspaper=The Hindu}}</ref>
== संदर्भ ==
{{Reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{YouTube|gZzl3L947-0|हैदराली का संगीत}}
* [http://varnachitram.com/2006/01/12/rip-kalamandalam-hyderali/ हैदराली के बारे में लेख]
{{authority control}}
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ओसामा इदरीस नदवी
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{{Infobox person
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| name = ओसामा इदरीस नदवी
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| birth_place = फुलात, [[मुजफ्फरनगर जिला]], उत्तर प्रदेश
| alma_mater = {{Bulleted list|[[दारुल उलूम नदवतुल उलमा]]|[[अल महदुल आली अल इस्लामी, हैदराबाद]]|[[ग्लोकल यूनिवर्सिटी]]}}
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| awards = निशान-ए-इतराफ़ (2023)
}}
'''ओसामा इदरीस नदवी''' (जन्म 1 जनवरी 1994), जिन्हें '''मुफ्ती ओसामा नदवी''' के नाम से भी लिखा जाता है, एक इस्लामी विद्वान, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं। उन्हें मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक मुद्दों को सुलझाने में उनके असाधारण प्रयासों के लिए पहचाना जाता है।
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
ओसामा इदरीस नदवी का जन्म 1 जनवरी 1994 को मुजफ्फरनगर जिले के फुलात में हुआ था। उनकी रस्म-ए-बिस्मिल्लाह (कुरान पढ़ने की शुरुआत) 1996 में [[कलीम सिद्दीकी]] द्वारा कराई गई थी। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा जामिया इमाम शाह वलीउल्लाह, फुलात से पूरी की और 2012 में [[दारुल उलूम नदवतुल उलमा]], लखनऊ से आलिम के रूप में स्नातक किया। इसके बाद, उन्होंने [[अल महदुल आली अल इस्लामी, हैदराबाद]] में इस्लामी न्यायशास्त्र (तखस्सुस फिल फिकह वल इफ़्ता) में विशेषज्ञता हासिल की और ''साइबर जराइम और इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र'' (साइबर अपराध और इस्लामी परिप्रेक्ष्य) शीर्षक से एक शोध शोध प्रबंध लिखा।<ref name=":1">{{Cite web |last=Qasmi |first=Ghafran Sajid |date=9 December 2024 |title=एडवोकेट मुफ्ती ओसामा इदरीस नदवी: एक संक्षिप्त जीवनी रेखाचित्र |url=https://www.baseeratonline.com/archives/219334 |access-date=10 December 2024 |website=Baseerat Online |language=Urdu}}</ref>
इसके बाद, [[खालिद सैफुल्लाह रहमानी]] की सलाह पर, उन्होंने सहारनपुर की [[ग्लोकल यूनिवर्सिटी]] से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।<ref name=":1"/>
== करियर ==
नदवी ने समुदाय की सेवा के माध्यम के रूप में कानून के पेशे को चुना। उन्होंने कैदियों की जमानत और रिहाई सुनिश्चित करने, जनता को कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करने और जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सलाह देने पर व्यापक रूप से काम किया है।<ref>{{Cite web |date=31 May 2023 |title=एडवोकेट ओसामा नदवी ने लखनऊ जेल में दो साल के बाद मोहम्मद अज़ीम की रिहाई सुनिश्चित की |url=https://www.baseeratonline.com/archives/199777 |access-date=10 December 2024 |website=Baseerat Online |language=Urdu}}</ref><ref name=":1"/><ref>{{Cite web |last= |date=29 July 2022 |title=दाईयें: इस्लाम हजरत मौलाना कलीम सिद्दीक़ी साहब ने जेल में रहते हुए भी एक ऐसे अहम काम को अंजाम दिया है कैसा है उनका ये बड़ा काम? जानिए |url=https://www.mediadetection.com/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%8ईये-%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A8/ |access-date=10 December 2024 |website=Media Detection |language=hi}}</ref> वह [[कलीम सिद्दीकी]] के कानूनी सलाहकार के रूप में भी सेवा देते हैं।<ref>{{Cite web |last=Rashid |first=Omar |date=12 September 2024 |title=यूपी धर्मांतरण कानून के तहत पहली बड़ी दोषसिद्धि में, प्रमुख इस्लामी विद्वान और 11 अन्य को आजीवन कारावास की सजा |url=https://m.thewire.in/article/law/in-first-major-conviction-under-up-conversion-law-prominent-islamic-scholar-and-11-others-sentenced-to-life |access-date=10 December 2024 |website=[[The Wire (India)|The Wire]]|language=en}}</ref>
नदवी ने [[पश्चिमी उत्तर प्रदेश]] में [[ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन]] (AIMIM) के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने तीन बार मुजफ्फरनगर जिला अध्यक्ष, [[सहारनपुर मंडल]] के पूर्व अध्यक्ष और पश्चिमी यूपी के पूर्व प्रांतीय उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में कार्य किया है।<ref>{{Cite web |date=18 September 2019 |title=AIMIM ने मुफ्ती ओसामा इदरीस नदवी को कमिश्नरी अध्यक्ष नियुक्त किया |url=https://urdu.millattimes.com/archives/45065 |access-date=10 December 2024 |website=Millat Times |language=ur}}</ref><ref name=":1"/><ref>{{Cite web |date=11 January 2021 |title=मण्डल अध्यक्ष मुफ़्ती ओसामा नदवी ने जनपद सहारनपुर का दौरा किया |url=https://watansamachar.com/Mandal-President-Mufti-Osama-Nadvi-visited-district-Saharanpur |access-date=10 December 2024 |website=Watan Samāchār |language=hi |archive-date=11 जनवरी 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210111140348/https://watansamachar.com/Mandal-President-Mufti-Osama-Nadvi-visited-district-Saharanpur |url-status=dead }}</ref>
== पुरस्कार और सम्मान ==
उनके योगदानों की मान्यता में, नदवी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिसमें दिसंबर 2023 में [[ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड]] द्वारा दिया गया ''निशान-ए-इतराफ़'' शामिल है।<ref>{{Cite web |date=20 December 2023 |title=एडवोकेट मौलाना ओसामा इदरीस नदवी को निशान-ए-इतराफ़ पुरस्कार से सम्मानित किया गया |url=https://www.baseeratonline.com/archives/208618 |access-date=10 December 2024 |website=Baseerat Online |language=ur}}</ref><ref name=":1"/>
उन्होंने लेख भी प्रकाशित किए हैं और सेमिनारों में शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं।
== विचार ==
मार्च 2025 में, नदवी ने एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच के दौरान [[रमजान]] के महीने में उपवास (रोज़ा) नहीं रखने के लिए भारतीय क्रिकेटर [[मोहम्मद शमी]] की सार्वजनिक आलोचना पर टिप्पणी की। कुरान के प्रावधानों का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि शमी एक लंबी यात्रा पर थे और धर्म के अनुसार उन्हें उपवास से छूट प्राप्त थी। नदवी ने तर्क दिया कि सार्वजनिक निंदा अनुचित थी।<ref>{{cite web |date=7 March 2025 |title=मोहम्मद शमी के रोज़ा न रखने पर बवाल, आलोचना करने वाले जान लें क्या कहता है इस्लाम और कुरान |url=https://www.tv9hindi.com/india/mohammed-shami-indian-cricketer-roza-row-islam-point-of-view-explained-3159417.html |access-date=10 August 2025 |website=[[TV9 Bharatvarsh|TV9 Hindi]] |language=hi}}</ref>
जुलाई 2025 में, नदवी ने यमन में मौत की सजा पाने वाली भारतीय नर्स निमिषा प्रिया के मामले के दौरान इस्लामी कानून में [[किसास]] (प्रतिशोधात्मक न्याय) के प्रयोग पर टिप्पणी की। उन्होंने समझाया कि किसास के तहत पीड़ित के परिवार के पास माफी या दीयत (खून का पैसा) का विकल्प होता है।<ref>{{cite web |date=17 July 2025 |title=निमिषा प्रिया को शरिया क़ानून में 'क़िसास' के तहत सज़ा-ए-मौत देने की मांग, जानिए क्या है ये नियम? |url=https://www.bbc.com/hindi/articles/c62dxm78j6mo |access-date=18 July 2025 |website=[[BBC Hindi]] |language=hi}}</ref>
== संदर्भ ==
{{reflist}}
{{DEFAULTSORT:Nadwi, Osama Idrīs}}
[[Category:1994 में जन्मे लोग]]
[[Category:जीवित लोग]]
[[Category:मुजफ्फरनगर जिले के लोग]]
[[Category:दारुल उलूम नदवतुल उलमा के पूर्व छात्र]]
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मैनहंट 2
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आयुष दास
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जानकारी में तबदीली की गई।
6543526
wikitext
text/x-wiki
{{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=मार्च 2026}}
{{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम
| title = मैनहंट 2
| developer = [[रॉकस्टार लंदन]]{{efn|Originally in development at [[Rockstar Vienna]]. Additional development by [[Rockstar Toronto]] and [[Rockstar North]]. Ported to PlayStation Portable by [[Rockstar Leeds]], and to Wii and Microsoft Windows by Rockstar Toronto.}}
| publisher = [[रॉकस्टार गेम्स]]
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| released = '''PS2''', '''PSP''', '''वी'''{{Video game release|NA|29 अक्टूबर 2007|EU|31 अक्टूबर 2008}}'''माइक्रोसॉफ्ट विंडोज'''{{Video game release|NA|6 नवंबर 2009}}
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| caption = विडिओ गेम का आधिकारिक पोस्टर
}}'''''''[[मैनहंट (वीडियो गेम)|मैनहंट]]'' 2''''' [[रॉकस्टार गेम्स]] द्वारा बनाई 2007 का एक स्टेल्थ गेम है। इसे रॉकस्टार लंदन द्वारा [[माइक्रोसॉफ्ट विंडोज़|माइक्रोसॉफ्ट विंडोज]] और [[प्लेस्टेशन २|प्लेस्टेशन 2]] के लिए, रॉकस्टार लीड्स द्वारा प्लेस्टेशन पोर्टेबल के लिए और रॉकस्टार टोरंटो द्वारा [[वी]] के लिए विकसित किया गया था। यह 2003 की मैनहंट की अगली कड़ी है और इसे उत्तरी अमेरिका में 29 अक्टूबर 2007 को और PAL क्षेत्रों में 31 अक्टूबर 2008 से जारी किया गया था।<ref name="uk">{{Cite web|url=http://www.ign.com/articles/2008/10/03/manhunt-2-dated-in-uk|title=Manhunt 2 Dated in UK|last=Matt Wales|date=3 October 2008|website=IGN|archive-url=https://web.archive.org/web/20201021025003/https://www.ign.com/articles/2008/10/03/manhunt-2-dated-in-uk|archive-date=21 October 2020|access-date=3 October 2008}}</ref> गेम में भूलने की बीमारी से पीड़ित एक दिमाग़ी मरीज़ डैनियल लैम्ब और एक [[मनोविकृति|समाजोपैथिक]] क़ातिल लियो कैस्पर का अनुसरण किया गया है, जो डैनियल को उसकी सफ़र में हिदायत देता है।
मूल रूप से जुलाई 2007 में उत्तरी अमेरिकी और यूरोपीय रिलीज़ के लिए निर्धारित किया गया था, गेम को रॉकस्टार की [[नियंत्रक कंपनी|मूल कंपनी]] टेक-टू इंटरएक्टिव द्वारा निलंबित कर दिया गया था जब इसे कुछ मुल्कों में वर्गीकरण से इनकार कर दिया गया और संयुक्त राज्य अमेरिका में सिर्फ़ बालिग़ों के लिए उपयुक्त (AO) रेटिंग दी गई थी।<ref>{{Cite web|url=http://www.gamespot.com/articles/manhunt-2-pc-gets-ao-rating/1100-6216220/|title=Manhunt 2 PC gets AO rating|last=Brendan Sinclair|date=21 June 2007|website=[[GameSpot]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20140304125247/http://www.gamespot.com/articles/manhunt-2-pc-gets-ao-rating/1100-6216220/|archive-date=4 March 2014|access-date=2 September 2010}}</ref> चूंकि [[निनटेंडो|निन्टेंडो]], [[माइक्रोसॉफ़्ट|माइक्रोसॉफ्ट]] और सोनी कंप्यूटर एंटरटेनमेंट अपने कंसोल पर A.O. टाइटल के लिए रिलीज़ के लाइसेन्स हासिल करने की इजाज़त नहीं देते हैं, इसलिए इसने अमेरिका में भी उनके ग्राहक आधार को गंभीर रूप से सीमित कर दिया होगा।<ref>{{Cite web|url=http://www.gamespot.com/articles/sony-nintendo-forbid-ao-rated-manhunt-2/1100-6172830/|title=Sony, Nintendo forbid AO-rated Manhunt 2|last=Brendan Sinclair|date=20 June 2007|website=[[GameSpot]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20140321043246/http://www.gamespot.com/articles/sony-nintendo-forbid-ao-rated-manhunt-2/1100-6172830/|archive-date=21 March 2014|access-date=29 November 2012}}</ref> इन रेटिंग मसलों के जवाब में, रॉकस्टार ने गेम को सेंसर किया, गेम के मंज़र-ए-क़त्ल के दौरान स्क्रीन को धुंधला कर दिया और स्कोरिंग सिस्टम को हटा दिया, जिस में प्लेयर को विशेष रूप से क्रूर क़तलों के लिए पुरस्कृत किया जाता था। इस संपादित वर्ज़न को ESRB के ज़रिये अमेरिका में M का दर्जा देकर इसे जारी किया गया था।<ref name="MTV">{{Cite web|url=http://www.mtv.com/news/1572934/manhunt-2-developer-finally-talks-about-game-ratings-controversy-much-as-it-pains-him/|title=''Manhunt 2'' Developer Finally Talks About Game, Ratings Controversy – Much As It Pains Him|last=Stephen Tolito|date=29 October 2007|publisher=MTV|archive-url=https://web.archive.org/web/20140723120539/http://www.mtv.com/news/1572934/manhunt-2-developer-finally-talks-about-game-ratings-controversy-much-as-it-pains-him/|archive-date=23 July 2014|access-date=29 November 2012}}</ref> हालांकि, कुछ दूसरे मुल्कों में बोर्डों ने अभी भी संपादित वर्ज़न को नकार दिया, जैसे कि ब्रिटेन में BBFC और आयरलैंड में IFCO ने रॉकस्टार की अपील के बाद, अंततः गेम को क्रमशः 18 प्रमाण पत्र और PEGI 18 रेटिंग के साथ क़ुबूल किया गया था।<ref name="VAC">{{Cite web|url=http://www.bbfc.co.uk/education/case-studies/manhunt-2|title=Manhunt 2|publisher=[[British Board of Film Classification|BBFC]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20130221003029/http://www.bbfc.co.uk/case-studies/manhunt-2|archive-date=21 February 2013|access-date=27 November 2012}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.ifco.ie/ifco/ifcoweb.nsf/web/news?opendocument&news=yes&type=graphic|title=Manhunt 2 Video Game Prohibited|publisher=Irish Film Classification Office|archive-url=https://web.archive.org/web/20071120192726/http://www.ifco.ie/ifco/ifcoweb.nsf/web/news?opendocument&news=yes&type=graphic|archive-date=2007-11-20}}</ref> फिर भी, जर्मनी और मलेशिया जैसे कुछ मुल्कों में, ''मैनहंट 2'' पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई थी ।<ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.siliconrepublic.com/play/top-10-banned-video-games|title=Top 10 banned video games|date=November 21, 2010|website=[[Silicon Republic]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20190816075117/https://www.siliconrepublic.com/play/top-10-banned-video-games|archive-date=16 August 2019|access-date=December 1, 2019}}</ref><ref name=":1">{{Cite web|url=http://www.malaysianbar.org.my/legal/general_news/fomca_regulate_video_games.html|title=Fomca: Regulate video games|date=2011-10-13|publisher=Malaysian Bar|archive-url=https://web.archive.org/web/20110610205540/http://www.malaysianbar.org.my/legal/general_news/fomca_regulate_video_games.html|archive-date=10 June 2011|access-date=2011-10-26}}</ref>
''मैनहंट 2'' को आलोचकों से मिश्रित समीक्षा मिलीः बेहतर गेमप्ले, गेम इंजन, कथानक मोड़, गहरी कहानी और अत्यधिक हिंसा के इस्तेमाल के लिए दाद दी गई, लेकिन इसकी आवाज़ अभिनय और पुराने ग्राफिक्स ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं हासिल कीं। इस शीर्षक ने अपनी रिलीज़ से पहले और बाद में विवाद खड़ा कर दिया, ब्रिटिश संसद के सदस्य कीथ वाज, अमेरिकी विडिओ गेम विरोधी कार्यकर्ता जैक थॉम्पसन और विभिन्न [[अमेरिकी सीनेट|अमेरिकी सीनेटर]] का नज़र खींचा। इसे PS2 के लिए गेमस्पाई के 2007 गेम ऑफ़ द ईयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था।
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{{Short description|यूक्रेनी पाक कला लेखक}}
{{Infobox person
| name = ओल्हा फ्रेंको
| image = Ольга Франко (Білевич).jpg
| birth_date = 24 जुलाई 1896
| birth_place = [[व्यरीव]], यूक्रेन
| death_date = 27 मार्च 1987
| death_place = [[ल्वीव]], यूक्रेन
| alma_mater = उच्च कृषि विद्यालय, वियना
| occupation = लेखक
| spouse = [[पेट्रो फ्रेंको]]
}}
'''ओल्हा फेडोरिवना फ्रेंको''' (जन्म नाम बिलेविच) (24 जुलाई 1896 - 27 मार्च 1987) एक [[युक्रेन|यूक्रेनी]] [[लेखक|लेखिका]] और पाकपुस्तकों की रचनाकार थीं।<ref name=":0">{{Cite news|url=https://www.radiosvoboda.org/a/24554248.html|title=Галицька кухня багата таємницями|last=Терещук|first=Галина|date=2012-04-20|work=Радіо Свобода|access-date=2026-04-01|language=uk}}</ref>
==प्रारंभिक जीवन और शिक्षा==
फ्रेंको का जन्म 24 जुलाई 1896 को हुआ था। उन्होंने वियना के कृषि उच्च विद्यालय में दो वर्ष तक पाक कला का अध्ययन किया।<ref name=":0" />
==लेखन==
फ्रेंको ने 'प्रैक्टिकल किचन' (практична кухня) नामक पुस्तक लिखी, जो 1929 में कोलोमिया पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।<ref>{{Cite web|url=https://subscription.ukrweekly.com/ukrainian-british-chef-and-author-offers-a-fresh-look-at-ukrainian-cuisine/|title=Ukrainian British chef and author offers a fresh look at Ukrainian cuisine – The Ukrainian Weekly|date=2018-09-07|language=en-US|access-date=2026-04-01}}</ref><ref name=":1">{{Cite web|url=https://ukrainiannationalmuseum.org/ukrainian-gastronomic-identity-tastes-we-almost-lost/|title=Ukrainian Gastronomic Identity: Tastes We Almost Lost - Ukrainian National Museum of Chicago|last=owdsupport|date=2020-03-04|language=en|access-date=2026-04-01}}</ref> यह पुस्तक गैलिसिया के व्यंजनों पर केंद्रित थी, हालांकि इसमें अन्य क्षेत्रों के लगभग 20% यूक्रेनी व्यंजन भी शामिल थे।<ref name=":2">{{Cite web|url=https://www.lvivpost.net/city/na-106-vulytsyah-shevchenkivskogo-rajonu-vidremontuyut-dorogy-do-kintsya-roku/|title=На 106 вулицях Шевченківського району відремонтують дороги до кінця року|last=Любаров|first=Марк|date=2026-03-31|website=Львівська Пошта|language=uk|access-date=2026-04-01}}</ref> इसे यूक्रेनी व्यंजनों पर लिखी गई पहली रेसिपी पुस्तकों में से एक माना जाता है। पुस्तक को 1991 में 'प्रैक्टिकल कुज़ीन' शीर्षक से पुनः प्रकाशित किया गया और 2019 में मारियाना दुशार की प्रस्तावना के साथ फिर से प्रकाशित किया गया। इसमें स्थानीय सामग्रियों से बने पारंपरिक [[पकवान|व्यंजनों]] पर केंद्रित रेसिपी शामिल थीं।<ref>{{Cite web|url=https://cityofliterature.lviv.ua/en/chomu-varto-shodyty-na-vechirku-introverta-umistiliteratury/|title=Чому варто сходити на вечірку інтроверта #умістілітератури. – CITY OF LITERATURE|website=cityofliterature.lviv.ua|language=en-US|access-date=2026-04-01|archive-date=4 मार्च 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220304223930/https://cityofliterature.lviv.ua/en/chomu-varto-shodyty-na-vechirku-introverta-umistiliteratury/|url-status=dead}}</ref>
इसमें 1937 में, फ्रेंको ने अपनी दूसरी पुस्तक 'नेशनल कुज़ीन' प्रकाशित की, जो खाना पकाने के पोषण संबंधी पहलुओं पर केंद्रित थी।
==समर्थन==
अपनी [[पुस्तक]] में, फ्रेंको ने गृहिणियों को स्थानीय अधिकारियों से खाद्य गुणवत्ता निरीक्षण की मांग करने के लिए प्रोत्साहित किया।<ref name=":0" />
==परिवार==
फ्रेंको प्रसिद्ध बिलेविच परिवार से थीं। <ref name=":0" />अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद, उन्होंने पेट्रो फ्रेंको से विवाह किया और यूक्रेनी कार्यकर्ता और कवि इवान फ्रेंको की बहू बन गईं।
ओल्हा फ्रेंको को अक्सर उनकी सास के साथ भ्रमित किया जाता है, क्योंकि दोनों का नाम बिल्कुल एक जैसा है। भ्रम से बचने के लिए अनौपचारिक रूप से उन्हें "जूनियर" और "सीनियर" कहा जाता था।<ref name=":0" /><ref name=":1" />
==मृत्यु==
1987 में, फ्रेंको का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। हालांकि उनके पति की 1941 में [[हत्या]] कर दी गई थी, लेकिन उन्हें कभी भी उनके भाग्य के बारे में पता नहीं चला।<ref name=":2" />
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
{{authority control}}
[[श्रेणी:1987 में हुई मौतें]]
[[श्रेणी:1896 में जन्मे बच्चे]]
[[श्रेणी:20वीं सदी के यूक्रेनी लेखक]]
[[श्रेणी:यूक्रेनी खाद्य लेखक]]
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{{Short description|यूक्रेनी विज्ञान कथा लेखक (1926–2003)}}
{{Infobox person
| name = ओलेस बर्डनिक
| image = Олесь Бердник - Всесоюзная конференция Клубов любителей фантастики, Киев, 1988.jpg
| birth_date = 27 नवंबर 1926
| birth_place = वावीलोव, यूक्रेन
| death_date = {{death date and age|2003|3|18|1926|11|27|df=y}}
| death_place = कीव, यूक्रेन
| known_for = विज्ञान कथा, असहमति
| notable_works =
}}
'''ओलेक्सांद्र''' (ओलेस) पावलोविच बर्दनिक ([[यूक्रेनी भाषा एवं साहित्य|यूक्रेनी]]: Олександр (Олесь) Павлович Бердник; जन्म 27 नवंबर, 1926, आधिकारिक रूप से 25 दिसंबर, 1927 - मृत्यु 18 मार्च, 2003)<ref>{{Cite web|url=http://data.bibliotheken.nl/doc/thes/p097752150|title=Berdnyk, Olesʹ (1927-2003) — LodView, giving data a new shape|website=data.bibliotheken.nl|access-date=2026-04-02|archive-date=6 मई 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230506104054/http://data.bibliotheken.nl/doc/thes/p097752150|url-status=dead}}</ref> एक [[युक्रेन|यूक्रेनी]] [[विज्ञान कथा साहित्य|विज्ञान कथा]] [[लेखक]]<ref>{{Cite web|url=http://tsdavo.gov.ua/4/webpages/62964651.html|title=Центральний державний архів вищих органів влади та управління України - Олександр (Олесь) Павлович Бердник - український письменник-фантаст, філософ, громадський діяч|website=tsdavo.gov.ua|access-date=2026-04-02}}</ref>, भविष्यवादी और वैश्विकतावादी, [[दर्शनशास्त्र|दार्शनिक]] और [[धर्ममीमांसा|धर्मशास्त्री]], सार्वजनिक व्यक्तित्व, [[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] के दौरान [[लाल सेना]] के [[सेना|सैनिक]] और सोवियत शिविरों में राजनीतिक [[क़ैदी|कैदी]] थे।<ref>{{Citation|last=Білодід|first=В. Д.|title=Бердник Олесь (Олександр) Павлович|date=2003-12-12|url=https://esu.com.ua/article-39187|work=Енциклопедія Сучасної України|volume=2|publisher=Інститут енциклопедичних досліджень НАН України|language=uk|isbn=978-966-02-2074-4|access-date=2026-04-02}}</ref> उन्होंने 20 से अधिक [[उपन्यास]] और लघु कथाएँ लिखीं, जिनका [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]], [[जर्मन भाषा|जर्मन]], [[फ़्रान्सीसी भाषा|फ्रेंच]], [[रूसी भाषा|रूसी]] और [[हंगेरियाई भाषा|हंगेरियन]] सहित कई भाषाओं में [[अनुवाद]] किया गया है। उन्हें यूक्रेनी विज्ञान कथा के सबसे प्रभावशाली क्लासिक लेखक के रूप में वर्णित किया गया है।<ref>{{Cite journal|last=Hajder|first=Tatiana|date=2019|title=Myth and Philosophy in the Slavic Science Fiction Novel|url=https://www.ceeol.com/search/article-detail?id=870485|journal=LOGOS - A Journal of Religion, Philosophy, Comparative Cultural Studies and Art|language=English|issue=101|pages=85–93|issn=0868-7692}}</ref><ref>{{Cite journal|last=Roberts|first=Brittany|date=2014|editor-last=Smyrniw|editor-first=Walter|title=Elusive Information about a Largely Untranslated SF Tradition|url=https://www.jstor.org/stable/10.5621/sciefictstud.41.3.0674|journal=Science Fiction Studies|volume=41|issue=3|pages=674–676|doi=10.5621/sciefictstud.41.3.0674|issn=0091-7729}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://muse.jhu.edu/verify?url=/article/816665&r=945270|title=Project MUSE -- Verification required!|website=muse.jhu.edu|access-date=2026-04-02}}</ref>
वे यूक्रेनी हेलसिंकी समूह के संस्थापक सदस्य और यूक्रेनी मानवतावादी संघ "यूक्रेनी आध्यात्मिक गणराज्य" के नेता थे।
==यह भी देखें==
*[[यूक्रेनी हेलसिंकी समूह]]
*[[सोवियत असंतुष्ट]]
*[[स्लाविक मूल धर्म संगठनों की सूची]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
{{Authority control}}
[[श्रेणी:ग्रेनाइट पर क्रांति के लोग]]
[[श्रेणी:यूक्रेनी विज्ञान कथा लेखक]]
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नूखल्क भाषा
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text/x-wiki
{{Infobox language|name=नूखल्क|nativename={{lang|blc|ItNuxalkmc}}<ref name="ignace" />|states={{CAN}}|region=बेला कूला, [[ब्रिटिश कोलंबिया]]|ethnicity=१,६६० [[नूखल्क लोग|नूखल्क]] (२०१४)<ref name=e18/>|speakers=१७|date=२०१४|ref=१७ (२०१४) <ref name="e18" />|familycolor=salishan|fam1=[[सलीशन भाषाएँ|सलीशन]]|iso3=blc|glotto=bell1243|glottorefname=Bella Coola|notice=|altname=|map=|mapcaption=|script=[[रोमन लिपि|लातिन]]|conservation_status=CR}}
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'''नूखल्क''' जिसे '''बेला कूला''' के नाम से भी जाना जाता है, एक सलीशन भाषा है जो नुक्सालक लोगों द्वारा बोली जाती है। आज, यह कनाडा के शहर बेला कूला, [[ब्रिटिश कोलम्बिया|ब्रिटिश कोलंबिया]] के आसपास के क्षेत्र में एक लुप्तप्राय भाषा है।<ref>{{Cite news|url=https://www.yorktonthisweek.com/news/conklin-linguist-one-of-the-last-fluent-speakers-of-endangered-nuxalk-language-1.24279713|title=Conklin linguist one of the last fluent speakers of endangered Nuxalk language|last=Williscraft|first=Sarah|date=February 13, 2021|work=Yorkton This Week|archive-url=https://web.archive.org/web/20210213163450/https://www.yorktonthisweek.com/news/conklin-linguist-one-of-the-last-fluent-speakers-of-endangered-nuxalk-language-1.24279713|archive-date=2021-02-13}} </ref><ref>{{Cite news|url=https://www.canadiangeographic.ca/article/resurgence-nuxalk|title=The resurgence of the Nuxalk|last=Noisecat|first=Julian Brave|date=November–December 2018|work=Canadian Geographic|archive-url=https://web.archive.org/web/20220518031827/https://canadiangeographic.ca/articles/the-resurgence-of-the-nuxalk/|archive-date=2022-05-18|page=19}}</ref> जबकि भाषा को अभी भी कभी-कभी भाषाविदों द्वारा ''बेला कूला'' कहा जाता है, मूल नाम नूखल्क को कुछ लोगों द्वारा पसंद किया जाता है, विशेष रूप से नूखल्क राष्ट्र की सरकार द्वारा।<ref name="ignace">{{Cite book|title=Secwépemc people, land, and laws = Yerí7 re Stsq̓ey̓s-kucw|last=Ignace|first=Marianne|last2=Ignace|first2=Ronald Eric|publisher=McGill-Queen's Press – MQUP|year=2017|isbn=978-0-7735-5203-6|location=Montreal|oclc=989789796}}</ref>
== नाम ==
भाषा के लिए "नूखल्क" नाम देशी ''नूखल्क'' (''nuxalk'') से आता है जो बेला कूला घाटी का जिक्र करता है।<ref>{{Cite book|url=http://www.hiddenhistory.com/page3/swsts/canada.HTM#Bellacoola|title=The Indian Tribes of North America|last=Swanton|first=John R.|year=1953|series=Bureau of American Ethnology|volume=Bulletin 145}}</ref> "बेला कूला" हेलत्सुक बलख्वुला (''bḷ́xʷlá'') का एक प्रतिपादन है, जिसका अर्थ है "अजनबी"।{{Sfn|Nater|1984|p=xvii}}
== लिपि ==
{| class="wikitable sortable"
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!व्यावहारिक
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== सन्दर्भ ==
[[श्रेणी:अभिश्लेषणी भाषाएँ]]
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सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून (वीडियो गेम)
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आयुष दास
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तस्वीर और उसकी छोटी सी जानकारी शामिल की गई।
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम
| title = सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून
| developer = [[Raven Software]]<br/>[[Loki Entertainment|Loki Software]]<small> (लिनक्स)</small><br />[[Runecraft (company)|Runecraft]] <small>(DC)</small><br />[[Majesco#1998–2016|Pipe-Dream Interactive]] <small>(PS2)</small>
| publisher = [[Activision]] <small>(विंडोज़)</small><br/>Loki Software<small> (लिनक्स)</small><br />[[Crave Entertainment]] <small>(DC)</small><br />[[Majesco|Majesco Entertainment]] <small>(PS2)</small>
| designer = जिम ह्यूजेस
| series = सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून
| engine = [[Quake II engine|''Quake II'' इंजन]]
| platforms = [[विंडोज़]], [[लिनक्स]], [[Dreamcast]], [[प्लेस्टेशन 2]]
| released = '''विंडोज़'''{{vgrelease|NA|मार्च 28, 2000<ref>{{cite web | url=https://www.gamespot.com/articles/soldier-of-fortune-in-stores/1100-2541989/ | title=Soldier of Fortune In Stores | author=Ajami, Amer | date=March 29, 2000 | website=[[GameSpot]] | publisher=[[Fandom (website)|Fandom]] | archive-url=https://web.archive.org/web/20000605215145/http://headline.gamespot.com/news/00_03/29_pc_sofstore/index.html | archive-date=June 5, 2000 | url-status=live | access-date=January 22, 2024}}</ref><ref>{{cite web | url=https://www.shacknews.com/article/5541/sof-on-shelves | title=SoF On Shelves | author=Gibson, Steve | date=March 28, 2000 | website=[[Shacknews]] | publisher=Gamerhub | archive-url=https://web.archive.org/web/20240109011736/https://www.shacknews.com/article/5541/sof-on-shelves | archive-date=January 9, 2024 | url-status=live | access-date=January 22, 2024}}</ref>|EU|अप्रैल 1, 2000<ref>{{cite web | url=https://www.eurogamer.net/article-26778 | title=UK Release Date list updated | author=Bye, John "Gestalt" | date=April 1, 2000 | website=[[Eurogamer]] | publisher=[[Gamer Network]] | archive-url=https://web.archive.org/web/20210922180942/https://www.eurogamer.net/articles/article_26778 | archive-date=September 22, 2021 | url-status=live | access-date=October 21, 2023}}</ref>}}'''लिनक्स'''<br />जुलाई 14, 2000<ref>{{cite web | url=http://www.cdmag.com/articles/028/171/linux_sof.html | title=Linux Soldier of Fortune Released | author=Fudge, James | date=July 14, 2000 | website=[[Computer Games Magazine|Computer Games Strategy Plus]] | publisher=Strategy Plus, Inc. | archive-url=https://web.archive.org/web/20030821064417/http://www.cdmag.com/articles/028/171/linux_sof.html | archive-date=August 21, 2003 | url-status=dead | access-date=June 21, 2021}}</ref><br />'''Dreamcast'''{{vgrelease|NA|जुलाई 26, 2001<ref>{{cite web | url=http://www.cravegames.com/pressreleases/20010726_01.htm | title=Crave's First Person Frag Fest Delights | date=July 26, 2001 | website=[[Crave Entertainment]] | archive-url=https://web.archive.org/web/20011207061822/http://www.cravegames.com/pressreleases/20010726_01.htm | archive-date=December 7, 2001 | url-status=dead | access-date=May 30, 2021}}</ref>|EU|2001}}'''प्लेस्टेशन 2'''{{vgrelease|NA|नवंबर 13, 2001|EU|जुलाई 5, 2002}}
| genre = [[प्रथम-व्यक्ति शूटर]]
| modes = [[Single-player video game|एकल-खिलाड़ी]], [[Multiplayer video game|मल्टीप्लेयर]]
| image = सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून ps2.jpg
| caption = विडिओ गेम का PAL कवर
}}सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून एक [[प्रथम-व्यक्ति शूटर]] [[वीडियो खेल|वीडियो गेम]] है जिसे Raven Software के ज़रिये तैयार किया गया है और 2000 में विंडोज़ के लिए Activision के ज़रिये जारी किया गया है। बाद में इसे [[प्लेस्टेशन २|प्लेस्टेशन 2]] (सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून: गोल्ड इडिशन के तौर पर) के साथ-साथ Dreamcast के लिए जारी किया गया, जबकि Loki Software ने भी [[लिनक्स]] के लिए एक पोर्ट बनाया। इसे अपने दो उत्तराधिकारियों के साथ 2 अक्टूबर, 2018 को GOG.com पर डिजिटल वर्ज़न फिर से जारी किया गया था।<ref name="gog.com">{{Cite web|url=https://www.gog.com/game/soldier_of_fortune_platinum_edition|title=Soldier of Fortune: Platinum Edition|website=[[GOG.com]]|publisher=[[CD Projekt]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20231014215132/https://www.gog.com/game/soldier_of_fortune_platinum_edition|archive-date=October 14, 2023|access-date=October 22, 2023}}</ref> [[एक्सबॉक्स (कंसोल)|एक्सबॉक्स]] के लिए एक वर्ज़न का इरादा था लेकिन इसे कभी जारी नहीं किया गया।<ref>{{Cite journal|last=Schilling|first=Melissa|date=2001-01-01|title=Microsoft's Xbox|url=https://www.academia.edu/17729684/Microsofts_Xbox|journal=Boston University Teaching Case}}</ref> प्लेयर एक अमरीकी भाड़े के फ़ौजी की भूमिका निभाता है क्योंकि उसे एक दहशत गर्द [[परमाणु बम|परमाणु हथियार]] की साज़िश को रोकने की उम्मीद में दुनिया भर में घूमना पड़ता है।
यह गेम, जिसे Quake II इंजन के साथ बनाया गया था, हिंसा के यथार्थवादी चित्रण के लिए उल्लेखनीय है, जैसे इंसानी जिस्मों का विखंडन जिसे GHOUL इंजन के तहत मुमकिन बनाया गया है। यह गेम का शैलीगत आकर्षण था और इसने काफ़ी विवाद पैदा किया, विशेष रूप से कनाडा और जर्मनी में, जहां इसे एक प्रतिबंधित-रेटेड फिल्म के तौर पर वर्गीकृत किया गया था और क्रमशः युवाओं के लिए हानिकारक मीडिया के लिए संघीय एजेंसी में सूचीबद्ध किया गया था। टेक्नॉलजी दुश्मनों के जिस्म पर 26 अलग-अलग ज़ोन बनाती है, जिससे अलग-अलग प्रतिकीरिये नज़र आती है इस पर निर्भर करते हुए कि किस हिस्से को निशाना बनाया गया है।
गेम शुरू में अच्छे से बिका और आलोचनात्मक स्वागत सकारात्मक था। इसके दो सीक्वल जारी किए गएः सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून II: डबल हेलिक्स (2002) और सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यूनः पेबैक (2007)। सोल्जर ऑफ़ फॉर्च्यून ऑनलाइन, एक बड़े पैमाने पर मल्टीप्लेयर ऑनलाइन प्रथम-व्यक्ति शूटर, 2010 में कोरिया में जारी हुआ था, लेकिन इसके जारी होने के बाद सर्वर कप फ़ौरन बंद कर दिए गए थे।
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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भारत में डिजिटल मीडिया
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text/x-wiki
'''भारत में डिजिटल मीडिया''' से तात्पर्य उन मीडिया माध्यमों से है जो [[इंटरनेट]], [[मोबाइल]] उपकरणों और अन्य डिजिटल तकनीकों के माध्यम से [[सूचना]], [[समाचार]], [[मनोरंजन]] और संचार का प्रसार करते हैं। इसमें वेबसाइट, [[सोशल मीडिया]] प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन समाचार पोर्टल, वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाएँ और मोबाइल अनुप्रयोग शामिल हैं।
भारत में डिजिटल मीडिया ने पिछले एक दशक में तीव्र विकास किया है और यह पारंपरिक मीडिया, जैसे [[प्रिंट]] और [[टेलीविजन]], के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। [[इंटरनेट]] उपयोगकर्ताओं की बढ़ती संख्या, स्मार्टफ़ोन की उपलब्धता और सस्ते डेटा सेवाओं ने इसके विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
== इतिहास ==
भारत में डिजिटल मीडिया की शुरुआत 1990 के दशक में इंटरनेट सेवाओं के आगमन के साथ हुई। 2000 के बाद वेबसाइटों और ऑनलाइन समाचार पोर्टलों की संख्या में वृद्धि हुई। 2010 के बाद स्मार्टफोन और सस्ते डेटा प्लान (विशेषकर 4G सेवाओं के आगमन) ने डिजिटल मीडिया के उपयोग को तेजी से बढ़ाया।
== विकास और विस्तार ==
भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से एक है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच बढ़ने और डिजिटल इंडिया अभियान के कारण डिजिटल मीडिया का विस्तार हुआ है।
डिजिटल मीडिया के प्रमुख रूपों में शामिल हैं:
* ऑनलाइन समाचार पोर्टल
* सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
* ब्लॉग और वेबसाइट
* वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाएं
* पॉडकास्ट
== प्रभाव ==
डिजिटल मीडिया ने सूचना के प्रसार को तेज और सुलभ बना दिया है। इसके माध्यम से नागरिक पत्रकारिता को बढ़ावा मिला है और लोगों को अपनी बात रखने का मंच मिला है। साथ ही, फेक न्यूज और गलत सूचना जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं।
== सरकार की पहल ==
भारत सरकार ने डिजिटल मीडिया को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं, जैसे:
* डिजिटल इंडिया अभियान
* भारतनेट परियोजना
* सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
== चुनौतियां ==
* फेक न्यूज और गलत जानकारी
* डेटा गोपनीयता और सुरक्षा
* डिजिटल विभाजन (ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर)
== संदर्भ ==
<references>
<ref>{{cite web |title=India’s Digital Media Landscape |url=https://www.ibef.org/industry/media-entertainment-india.aspx |publisher=India Brand Equity Foundation}}</ref>
<ref>{{cite web |title=Digital India Programme |url=https://www.digitalindia.gov.in/ |publisher=Government of India}}</ref>
<ref>{{cite web |title=Internet users in India |url=https://www.statista.com/topics/2157/internet-usage-in-india/ |publisher=Statista}}</ref>
<ref>{{cite web |title=Growth of Digital Media in India |url=https://www.livemint.com/industry/media/digital-media-growth-india |publisher=LiveMint}}</ref>
</references>
== बाहरी कड़ियाँ ==
* https://www.digitalindia.gov.in/
[[श्रेणी:भारत में मीडिया]]
[[श्रेणी:डिजिटल मीडिया]]
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द ट्रेंडिंग पीपल
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Reference द डेक्कन टाइम्स
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wikitext
text/x-wiki
{{Short description|भारतीय डिजिटल समाचार मंच}}
{{Infobox website
| name = द ट्रेंडिंग पीपल
| type = डिजिटल मीडिया मंच
| language = हिन्दी, अंग्रेज़ी
| founded = 2021
| headquarters = [[नई दिल्ली]], भारत
}}
'''द ट्रेंडिंग पीपल''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: ''The Trending People'') एक भारतीय डिजिटल मीडिया मंच है, जिसका उल्लेख समाचार स्रोतों में डिजिटल प्रकाशन मंच के रूप में किया गया है।<ref name="ips">{{cite web |url=https://ipsnews.net/business/2026/03/16/independent-digital-platforms-expand-space-for-grassroots-storytelling-in-india/ |title=Independent digital platforms expand space for grassroots storytelling in India |website=IPS News |access-date=2026-04-12}}</ref><ref name="hans">{{cite web |url=https://www.thehansindia.com/life-style/the-trending-people-a-growing-force-in-indias-digital-news-media-931154 |title=The Trending People: A Growing Force in India's Digital News Media |website=The Hans India |access-date=2026-04-12}}</ref>
== परिचय ==
यह मंच डिजिटल पत्रकारिता से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है, जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक तथा समसामयिक विषय शामिल होते हैं। स्रोतों में इसे स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो जमीनी स्तर की कहानियों और सामाजिक मुद्दों को प्रकाशित करता है।<ref name="ips" /><ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.thedeccantimes.in/2025/03/thetrendingpeoplecom-new-age-digital.html|title=The Trending People: A New-Age Digital Media Platform, Journalism|last=|first=|website=द डेक्कन टाइम्स|language=en|access-date=2026-04-23}}</ref>
== इतिहास ==
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, इस मंच की स्थापना 2021 में हुई। प्रारंभिक चरण में इसने समसामयिक घटनाओं और [[सामाजिक|सामाजिक विषयों]] से संबंधित सामग्री प्रकाशित की।<ref name="hans" /> अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भारत में उभरते स्वतंत्र [[डिजिटल मीडिया]] मंचों के संदर्भ में इसका उल्लेख किया गया है।<ref name="ips" />
== मीडिया में उल्लेख ==
समाचार स्रोतों में इस मंच का उल्लेख भारत में उभरते [[डिजिटल मीडिया]] प्लेटफॉर्म के संदर्भ में किया गया है।<ref name="pk">{{cite web
|url=https://m.haryana.punjabkesari.in/gurgaon/news/thetrendingpeople-a-digital-platform-voice-of-society-2053753
|title=The Trending People: A digital platform voice of society
|website=Punjab Kesari
|access-date=2026-04-12}}</ref><ref name="jagran">{{cite web
|url=https://web.archive.org/web/20260317055630/https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/69b7d9af1e5ec/article-48262
|title=The Trending People पर रिपोर्ट
|website=दैनिक जागरण
|access-date=2026-04-12}}</ref> प्लेटफ़ॉर्म को विभिन्न डिजिटल मीडिया स्रोतों में कवर किया गया है।<ref name=":0" />
== सामग्री ==
मंच पर [[राजनीति]], समाज, [[संस्कृति]] और अन्य सार्वजनिक महत्व के विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते हैं। इसमें विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित सामग्री शामिल होती है।<ref name="jagran" />
== यह भी देखें ==
* [[डिजिटल पत्रकारिता]]
* भारत में मीडिया
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.thetrendingpeople.com/}}
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'''द ट्रेंडिंग पीपल''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: ''The Trending People'') एक भारतीय डिजिटल मीडिया मंच है, जिसका उल्लेख समाचार स्रोतों में डिजिटल प्रकाशन मंच के रूप में किया गया है।<ref name="ips">{{cite web |url=https://ipsnews.net/business/2026/03/16/independent-digital-platforms-expand-space-for-grassroots-storytelling-in-india/ |title=Independent digital platforms expand space for grassroots storytelling in India |website=IPS News |access-date=2026-04-12}}</ref><ref name="hans">{{cite web |url=https://www.thehansindia.com/life-style/the-trending-people-a-growing-force-in-indias-digital-news-media-931154 |title=The Trending People: A Growing Force in India's Digital News Media |website=The Hans India |access-date=2026-04-12}}</ref>
== परिचय ==
यह मंच डिजिटल पत्रकारिता से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है, जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक तथा समसामयिक विषय शामिल होते हैं। स्रोतों में इसे स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो जमीनी स्तर की कहानियों और सामाजिक मुद्दों को प्रकाशित करता है।<ref name="ips" /><ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.thedeccantimes.in/2025/03/thetrendingpeoplecom-new-age-digital.html|title=The Trending People: A New-Age Digital Media Platform, Journalism|last=|first=|website=द डेक्कन टाइम्स|language=en|access-date=2026-04-23}}</ref>
== इतिहास ==
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, इस मंच की स्थापना 2021 में हुई। प्रारंभिक चरण में इसने समसामयिक घटनाओं और [[सामाजिक|सामाजिक विषयों]] से संबंधित सामग्री प्रकाशित की।<ref name="hans" /> अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भारत में उभरते स्वतंत्र [[डिजिटल मीडिया]] मंचों के संदर्भ में इसका उल्लेख किया गया है।<ref name="ips" />
== मीडिया में उल्लेख ==
समाचार स्रोतों में इस मंच का उल्लेख भारत में उभरते [[डिजिटल मीडिया]] प्लेटफॉर्म के संदर्भ में किया गया है।<ref name="pk">{{cite web
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== सामग्री ==
मंच पर [[राजनीति]], समाज, [[संस्कृति]] और अन्य सार्वजनिक महत्व के विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते हैं। इसमें विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित सामग्री शामिल होती है।<ref name="jagran" />
== यह भी देखें ==
* [[डिजिटल पत्रकारिता]]
* भारत में मीडिया
== सन्दर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.thetrendingpeople.com/}}
[[श्रेणी:वेबसाइटें]]
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AMAN KUMAR
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'''द ट्रेंडिंग पीपल''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: ''The Trending People'') एक भारतीय डिजिटल मीडिया मंच है, जिसका उल्लेख समाचार स्रोतों में डिजिटल प्रकाशन मंच के रूप में किया गया है।<ref name="ips">{{cite web |url=https://ipsnews.net/business/2026/03/16/independent-digital-platforms-expand-space-for-grassroots-storytelling-in-india/ |title=Independent digital platforms expand space for grassroots storytelling in India |website=IPS News |access-date=2026-04-12}}</ref><ref name="hans">{{cite web |url=https://www.thehansindia.com/life-style/the-trending-people-a-growing-force-in-indias-digital-news-media-931154 |title=The Trending People: A Growing Force in India's Digital News Media |website=The Hans India |access-date=2026-04-12}}</ref>
== परिचय ==
यह मंच डिजिटल पत्रकारिता से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है, जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक तथा समसामयिक विषय शामिल होते हैं। स्रोतों में इसे स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो जमीनी स्तर की कहानियों और सामाजिक मुद्दों को प्रकाशित करता है।<ref name="ips" /><ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.thedeccantimes.in/2025/03/thetrendingpeoplecom-new-age-digital.html|title=The Trending People: A New-Age Digital Media Platform, Journalism|last=|first=|website=द डेक्कन टाइम्स|language=en|access-date=2026-04-23}}</ref>
== इतिहास ==
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, इस मंच की स्थापना 2021 में हुई। प्रारंभिक चरण में इसने समसामयिक घटनाओं और [[सामाजिक|सामाजिक विषयों]] से संबंधित सामग्री प्रकाशित की।<ref name="hans" /> अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भारत में उभरते स्वतंत्र [[डिजिटल मीडिया]] मंचों के संदर्भ में इसका उल्लेख किया गया है।<ref name="ips" />
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== सामग्री ==
मंच पर [[राजनीति]], समाज, [[संस्कृति]] और अन्य सार्वजनिक महत्व के विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते हैं। इसमें विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित सामग्री शामिल होती है।<ref name="jagran" />
== यह भी देखें ==
* [[डिजिटल पत्रकारिता]]
* भारत में मीडिया
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.thetrendingpeople.com/}}
[[श्रेणी:वेबसाइटें]]
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[[श्रेणी:2021 में स्थापित संगठन]]
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'''द ट्रेंडिंग पीपल''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''The Trending People'') एक भारतीय [[डिजिटल समाचार पत्र|डिजिटल समाचार]] एवं [[मीडिया (संचार)|मीडिया मंच]] है, जिसकी स्थापना 2021 में हुई। यह मंच [[हिन्दी]] एवं अंग्रेज़ी भाषा में [[समाचार]] और समसामयिक विषयों से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है।<ref name="ips">{{cite web
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== इतिहास ==
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, मंच की स्थापना 2021 में हुई। यह मंच समाचार, सामाजिक विषयों और समसामयिक मुद्दों से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है।<ref name="hans" />
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== यह भी देखें ==
* [[डिजिटल पत्रकारिता]]
* [[भारत में मीडिया]]
== सन्दर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.thetrendingpeople.com/}}
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"यह भी देखें" अनुभाग में संबंधित मीडिया और पत्रकारिता लेख जोड़े
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'''द ट्रेंडिंग पीपल''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''The Trending People'') एक भारतीय [[डिजिटल समाचार पत्र|डिजिटल समाचार]] एवं [[मीडिया (संचार)|मीडिया मंच]] है, जिसकी स्थापना 2021 में हुई। यह मंच [[हिन्दी]] एवं अंग्रेज़ी भाषा में [[समाचार]] और समसामयिक विषयों से संबंधित सामग्री प्रकाशित करता है।<ref name="ips">{{cite web
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== मीडिया में उल्लेख ==
कुछ समाचार स्रोतों में इस मंच का उल्लेख भारत में उभरते डिजिटल मीडिया मंचों के संदर्भ में किया गया है।<ref name="ips" /><ref>{{cite web
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== यह भी देखें ==
* [[हिन्दुस्तान टाइम्स]]
* [[डिजिटल पत्रकारिता]]
* [[इंटर प्रेस सर्विस]]
* [[डिजिटल मीडिया]]
== सन्दर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.thetrendingpeople.com/}}
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नमस्कार दोस्तो!
मेरी रूचि भारत का इतिहास, विश्व इतिहास, भूगोल, भारतीय मीडिया, वर्तमान मुद्दों से संबन्धित पृष्ठों अपने मध्य प्रदेश के पृष्टों को ज्यादा से ज्यादा ज्ञानमय बनाने में है।
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* [[भारत के राजवंशों और सम्राटों की सूची]] का विस्तार और सुधार।
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प्रशांत कुमार सैनी (राजनीतिज्ञ)
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{{हहेच लेख| कारण=लेख मूल शोध पर आधारित प्रतीत होता है तथा पर्याप्त विश्वसनीय स्रोतों द्वारा समर्थित नहीं है।| चर्चा_पृष्ठ= विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/प्रशांत कुमार सैनी (राजनीतिज्ञ)}}{{Infobox officeholder
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'''प्रशांत कुमार सैनी''' (अंग्रेज़ी: ''Prashant Kumar Saini''), जिन्हें '''प्रशांत सैनी''' के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो [[जयपुर]], [[राजस्थान]] से संबंधित हैं।<ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी का बड़ा ऐलान: आगामी चुनावों में सभी सीटों पर उतारेगी उम्मीदवार|url=https://bhaskardigital.com/viraj-jan-partys-big-announcement-will/|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref><ref>{{Cite web|title=Prashant Saini: Candidate Profile|url=https://m.economictimes.com/prashant-saini/amp_candidates/candidateid-11302.cms|website=The Economic Times|access-date=2026-02-02}}</ref> वह राजनीतिक संगठन '''विराज जन पार्टी''' के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।<ref name="dj1">{{Cite web |date=9 December 2025 |title=Viraj Jan Party all set to enter the political arena in 2028: Prashant Kumar Saini |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/viraj-jan-party-all-set-to-enter-the-political-arena/article-9889 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी 2028 में चुनावी मैदान में उतरेगी: प्रशांत कुमार सैनी|url=https://www.dainikjagranmpcg.com/election/prashant-kumar-saini-will-contest-elections-in-viraj-jan-party/article-39570|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=hi}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
सैनी ने [[राजस्थान विश्वविद्यालय]] से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है और इसके साथ ही उन्होंने एमबीए भी किया है।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=A massive rally and Membership campaign by Viraj Jan Party |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/-a-massive-rally-and-membership-campaign-by-viraj-jan/article-10900 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=Candidate Affidavit Information|url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302|website=Myneta|access-date=2026-02-02}}</ref>
== राजनीतिक करियर ==
प्रशांत कुमार सैनी ने 2019 का भारतीय आम चुनाव में जयपुर लोकसभा सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।<ref>{{Cite web |title=Loksabha 2019 Candidate Details |url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302 |access-date=4 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली|url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-party-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02}}</ref>
वह '''विराज जन पार्टी''' के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कार्यरत हैं और भविष्य में चुनावी विस्तार की योजना बना रहे हैं।<ref name="dj1" />
== अन्य कार्य ==
राजनीति में आने से पहले, सैनी एक बैंक कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। बाद में वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए, विशेष रूप से पशु कल्याण से जुड़े कार्यों में, जो विराट सेना से संबंधित संगठनों के माध्यम से किए गए।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली |url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-partys-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी की रैली और मेंबरशिप अभियान|url=https://bhaskardigital.com/a-big-rally-and-membership-campaign-of-viraj/|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref>
== संदर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.myneta.info/}}
[[Category:जीवित लोग]]
[[Category:भारतीय राजनीतिज्ञ]]
[[Category:जयपुर के लोग]]
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'''प्रशांत कुमार सैनी''' (अंग्रेज़ी: ''Prashant Kumar Saini''), जिन्हें '''प्रशांत सैनी''' के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो [[जयपुर]], [[राजस्थान]] से संबंधित हैं।<ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी का बड़ा ऐलान: आगामी चुनावों में सभी सीटों पर उतारेगी उम्मीदवार|url=https://bhaskardigital.com/viraj-jan-partys-big-announcement-will/|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref><ref>{{Cite web|title=Prashant Saini: Candidate Profile|url=https://m.economictimes.com/prashant-saini/amp_candidates/candidateid-11302.cms|website=The Economic Times|access-date=2026-02-02}}</ref> वह राजनीतिक संगठन '''विराज जन पार्टी''' के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।<ref name="dj1">{{Cite web |date=9 December 2025 |title=Viraj Jan Party all set to enter the political arena in 2028: Prashant Kumar Saini |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/viraj-jan-party-all-set-to-enter-the-political-arena/article-9889 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी 2028 में चुनावी मैदान में उतरेगी: प्रशांत कुमार सैनी|url=https://www.dainikjagranmpcg.com/election/prashant-kumar-saini-will-contest-elections-in-viraj-jan-party/article-39570|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=hi}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
सैनी ने [[राजस्थान विश्वविद्यालय]] से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है और इसके साथ ही उन्होंने एमबीए भी किया है।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=A massive rally and Membership campaign by Viraj Jan Party |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/-a-massive-rally-and-membership-campaign-by-viraj-jan/article-10900 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=Candidate Affidavit Information|url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302|website=Myneta|access-date=2026-02-02}}</ref>
== राजनीतिक करियर ==
प्रशांत कुमार सैनी ने 2019 का भारतीय आम चुनाव में जयपुर लोकसभा सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।<ref>{{Cite web |title=Loksabha 2019 Candidate Details |url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302 |access-date=4 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली|url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-party-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02}}</ref>
वह '''विराज जन पार्टी''' के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कार्यरत हैं और भविष्य में चुनावी विस्तार की योजना बना रहे हैं।<ref name="dj1" />
== अन्य कार्य ==
राजनीति में आने से पहले, सैनी एक बैंक कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। बाद में वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए, विशेष रूप से पशु कल्याण से जुड़े कार्यों में, जो विराट सेना से संबंधित संगठनों के माध्यम से किए गए।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली |url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-partys-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी की रैली और मेंबरशिप अभियान|url=https://bhaskardigital.com/a-big-rally-and-membership-campaign-of-viraj/|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref>
== संदर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.myneta.info/}}
[[Category:जीवित लोग]]
[[Category:भारतीय राजनीतिज्ञ]]
[[Category:जयपुर के लोग]]
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{{विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/प्रशांत कुमार सैनी (राजनीतिज्ञ)}}
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| name = प्रशांत कुमार सैनी
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'''प्रशांत कुमार सैनी''' (अंग्रेज़ी: ''Prashant Kumar Saini''), जिन्हें '''प्रशांत सैनी''' के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो [[जयपुर]], [[राजस्थान]] से संबंधित हैं।<ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी का बड़ा ऐलान: आगामी चुनावों में सभी सीटों पर उतारेगी उम्मीदवार|url=https://bhaskardigital.com/viraj-jan-partys-big-announcement-will/|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref><ref>{{Cite web|title=Prashant Saini: Candidate Profile|url=https://m.economictimes.com/prashant-saini/amp_candidates/candidateid-11302.cms|website=The Economic Times|access-date=2026-02-02}}</ref> वह राजनीतिक संगठन '''विराज जन पार्टी''' के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।<ref name="dj1">{{Cite web |date=9 December 2025 |title=Viraj Jan Party all set to enter the political arena in 2028: Prashant Kumar Saini |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/viraj-jan-party-all-set-to-enter-the-political-arena/article-9889 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी 2028 में चुनावी मैदान में उतरेगी: प्रशांत कुमार सैनी|url=https://www.dainikjagranmpcg.com/election/prashant-kumar-saini-will-contest-elections-in-viraj-jan-party/article-39570|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=hi}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
सैनी ने [[राजस्थान विश्वविद्यालय]] से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है और इसके साथ ही उन्होंने एमबीए भी किया है।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=A massive rally and Membership campaign by Viraj Jan Party |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/-a-massive-rally-and-membership-campaign-by-viraj-jan/article-10900 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=Candidate Affidavit Information|url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302|website=Myneta|access-date=2026-02-02}}</ref>
== राजनीतिक करियर ==
प्रशांत कुमार सैनी ने 2019 का भारतीय आम चुनाव में जयपुर लोकसभा सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।<ref>{{Cite web |title=Loksabha 2019 Candidate Details |url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302 |access-date=4 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली|url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-party-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02}}</ref>
वह '''विराज जन पार्टी''' के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कार्यरत हैं और भविष्य में चुनावी विस्तार की योजना बना रहे हैं।<ref name="dj1" />
== अन्य कार्य ==
राजनीति में आने से पहले, सैनी एक बैंक कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। बाद में वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए, विशेष रूप से पशु कल्याण से जुड़े कार्यों में, जो विराट सेना से संबंधित संगठनों के माध्यम से किए गए।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली |url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-partys-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी की रैली और मेंबरशिप अभियान|url=https://bhaskardigital.com/a-big-rally-and-membership-campaign-of-viraj/|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref>
== संदर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.myneta.info/}}
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'''प्रशांत कुमार सैनी''' (अंग्रेज़ी: ''Prashant Kumar Saini''), जिन्हें '''प्रशांत सैनी''' के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो [[जयपुर]], [[राजस्थान]] से संबंधित हैं।<ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी का बड़ा ऐलान: आगामी चुनावों में सभी सीटों पर उतारेगी उम्मीदवार|url=https://bhaskardigital.com/viraj-jan-partys-big-announcement-will/|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref><ref>{{Cite web|title=Prashant Saini: Candidate Profile|url=https://m.economictimes.com/prashant-saini/amp_candidates/candidateid-11302.cms|website=The Economic Times|access-date=2026-02-02}}</ref> वह राजनीतिक संगठन '''विराज जन पार्टी''' के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।<ref name="dj1">{{Cite web |date=9 December 2025 |title=Viraj Jan Party all set to enter the political arena in 2028: Prashant Kumar Saini |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/viraj-jan-party-all-set-to-enter-the-political-arena/article-9889 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी 2028 में चुनावी मैदान में उतरेगी: प्रशांत कुमार सैनी|url=https://www.dainikjagranmpcg.com/election/prashant-kumar-saini-will-contest-elections-in-viraj-jan-party/article-39570|date=2025-12-09|access-date=2026-02-02|language=hi}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
सैनी ने [[राजस्थान विश्वविद्यालय]] से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है और इसके साथ ही उन्होंने एमबीए भी किया है।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=A massive rally and Membership campaign by Viraj Jan Party |url=https://english.dainikjagranmpcg.com/politics/-a-massive-rally-and-membership-campaign-by-viraj-jan/article-10900 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=Candidate Affidavit Information|url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302|website=Myneta|access-date=2026-02-02}}</ref>
== राजनीतिक करियर ==
प्रशांत कुमार सैनी ने 2019 का भारतीय आम चुनाव में जयपुर लोकसभा सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।<ref>{{Cite web |title=Loksabha 2019 Candidate Details |url=https://www.myneta.info/LokSabha2019/candidate.php?candidate_id=11302 |access-date=4 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली|url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-party-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02}}</ref>
वह '''विराज जन पार्टी''' के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कार्यरत हैं और भविष्य में चुनावी विस्तार की योजना बना रहे हैं।<ref name="dj1" />
== अन्य कार्य ==
राजनीति में आने से पहले, सैनी एक बैंक कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। बाद में वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए, विशेष रूप से पशु कल्याण से जुड़े कार्यों में, जो विराट सेना से संबंधित संगठनों के माध्यम से किए गए।<ref>{{Cite web |date=23 December 2025 |title=जयपुर में विराज जन पार्टी की विशाल रैली |url=https://www.punjabkesari.in/national/news/viraj-jan-partys-massive-rally-in-jaipur-public-support-growing-rapidly-2265351 |access-date=5 January 2026}}</ref><ref>{{Cite web|title=विराज जन पार्टी की रैली और मेंबरशिप अभियान|url=https://bhaskardigital.com/a-big-rally-and-membership-campaign-of-viraj/|date=2025-12-23|access-date=2026-02-02|language=en}}</ref>
== संदर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{Official website|https://www.myneta.info/}}
[[Category:जीवित लोग]]
[[Category:भारतीय राजनीतिज्ञ]]
[[Category:जयपुर के लोग]]
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विकिपीडिया वार्ता:विकि लव्ज़ रमजान 2026
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J ansari
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/* स्थानीय पुरस्कारों के संबंध में */ उत्तर
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== स्थानीय पुरस्कारों के संबंध में ==
@[[सदस्य:J ansari|J ansari]] महोदय, मेरा एक छोटा सा प्रश्न है। क्या 'विकि लव्ज़ रमजान 2026' प्रतियोगिता में वैश्विक स्तर के पुरस्कारों के अलावा, हिन्दी विकिपीडिया के योगदानकर्ताओं के लिए कोई स्थानीय पुरस्कार भी रखे गए हैं? कृपया जानकारी दें। धन्यवाद! --[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:31, 19 अप्रैल 2026 (UTC)
:@[[सदस्य:J ansari|J ansari]] महोदय, इसका उत्तर दें [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:34, 19 अप्रैल 2026 (UTC)
::विकी लव्स रमजान प्रतियोगिता में कोई स्थानीय पुरस्कार प्रदान नहीं किया जा रहा है। केवल विश्व स्तर पर प्रदान कर रहे हैं। लेकीन अगली इस प्रतियोगिता में इस विषय को मुख्य रूप से रखा जायेगा। देरी से जबाब के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। धन्यवाद -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 16:49, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
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'''YourStory''' (योरस्टोरी) एक भारतीय डिजिटल मीडिया मंच है, जिसकी स्थापना 2008 में [[पत्रकार]] [[श्रद्धा शर्मा]] द्वारा की गई थी। यह मंच मुख्यतः [[उद्यमिता]], स्टार्टअप और व्यवसाय से संबंधित [[समाचार]] एवं [[फीचर]] सामग्री प्रकाशित करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.thehindubusinessline.com/news/variety/listen-to-the-green-shoots/article23028675.ece|title=Listen to the green shoots|date=2013-08-08|website=द हिंदू बिजनेस लाइन|language=en|access-date=2026-04-22}}</ref><ref name=":0">{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/news/company/corporate-trends/et-women-ahead-rising-stars-of-india-inc-beyond/articleshow/56608685.cms?from=mdr|title=ET Women Ahead: Corporate India's fastest rising women leaders|date=2017-01-23|work=The Economic Times|access-date=2026-04-22|issn=0013-0389}}</ref>
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YourStory की शुरुआत एक [[ब्लॉग]] के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य भारत में उद्यमियों और स्टार्टअप से जुड़ी कहानियों को प्रकाशित करना था। समय के साथ यह एक डिजिटल मीडिया मंच के रूप में विकसित हुआ, जो स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र से संबंधित सामग्री प्रस्तुत करता है।<ref name="forbes">{{Cite news |title=How Shradha Sharma built YourStory |url=https://www.forbesindia.com/article/startups/how-shradha-sharma-built-yourstory/52625/1 |work=Forbes India}}</ref>
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== सन्दर्भ ==
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[[Category:2008 में स्थापित कंपनियाँ]]
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शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व7|शीह व7]])
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<big>'''परिचय-पर्वत सिंह (जन्म 17 दिसंबर 1983) एक भारतीय डिजिटल कंटेंट क्रिएटर, एक विकीपीडियन लेखक और औद्योगिक विशेषज्ञ हैं। वे मुख्य रूप से सोशल मीडिया ब्रांडिंग और रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में अपने कार्यों के लिए जाने जाते हैं।'''</big>
=== <big>'''प्रारंभिक जीवन और शिक्षा'''</big> ===
<big>'''पर्वत सिंह का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के ग्राम पंचायत भैंगना में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुई, जिसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके पास कला और शिक्षा के क्षेत्र में स्नातकोत्तर (M.A., M.Ed.) की उपाधियाँ हैं।'''</big>
=== <big>'''करियर और रचनात्मक कार्य'''</big> ===
<big>'''सिंह डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और "Mr. Parvat Singh" के नाम से एक लोकप्रिय फेसबुक पेज का संचालन करते हैं। वे आधुनिक तकनीक जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके संगीत और वीडियो निर्माण में रुचि रखते हैं। इसके अतिरिक्त, वे अपनी जीवन गाथाओं को रचनात्मक लेखन के माध्यम से लिपिबद्ध करने के लिए भी जाने जाते हैं।'''</big>
<big>'''व्यावसायिक रूप से, वे औद्योगिक विनिर्माण क्षेत्र (Footwear Industry) से जुड़े रहे हैं और तकनीकी मशीनरी के संचालन में विशेषज्ञता रखते हैं।'''</big>
=== <big>'''व्यक्तिगत जीवन'''</big> ===
<big>'''पर्वत सिंह ग्वालियर, मध्य प्रदेश के निवासी हैं। उनका विवाह निर्मला सिंह से हुआ है और उनके दो बच्चे (एक पुत्र और एक पुत्री) हैं। उन्हें लग्जरी घड़ियों के संग्रह और ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण का विशेष शौक है।'''</big>
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Draft:श्रव्य-दृश्य अनुवाद
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चाहर धर्मेंद्र
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शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व2|शीह व2]])
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श्रव्य-दृश्य अनुवाद (Audiovisual Translation)
== परिचय ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद अनुवाद का एक आधुनिक और विकासशील क्षेत्र है। जिसमें ध्वनि और दृश्य दोनों माध्यमों के साथ प्रस्तुत सामग्री का एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण किया जाता है। इसमें केवल शब्दों रूपांतरण मात्र नहीं होता बल्कि समान भाव, ध्वनि और सांस्कृतिक संदर्भों का भी ध्यान रखा जाता है।
आजकल 21 की सदी के दौर में जब डिजिटल युग का जमाना है देश विदेश की फिल्में, वेबसीरीज़, वीडियो आसानी से उपलब्ध है तब श्रव्य-दृश्य अनुवाद का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
यवेस गैम्बियर के अनुसार, "वैश्वीकरण की दुनिया में श्रव्य-दृश्य अनुवाद संचार का एक प्रमुख माध्यम बन गया है।"<ref>{{Cite journal|last=Gambier|first=Yves|date=2009|title=Challenges in research on audiovisual translation|journal=University of Turku|pages=1}}</ref>
== इतिहास और विकास ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का इतिहास सिनेमा के प्रारंभ से जुड़ा हुआ है। जब मूक फिल्में बनाई जाती थी तब उनमें संवाद को दिखाने के लिए लिखित कार्ड (intertitles) का प्रयोग किया जाता था।
बाद में जब ध्वनि तकनीक विकसित हुई तब फिल्मों में संवाद सुनाई देने लगे। इसके बाद डबिंग (Dubbing) और उपशीर्षक (subtitles) जैसे तरीकों का विकास हुआ।
वर्तमान समय में अमेजन प्राइम, नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म्स के कारण श्रव्य दृश्य अनुवाद चर्चा का विषय बन रहा है। और इस उद्योग में हजारों की संख्या में अनुवादक काम कर रहे हैं।
== श्रव्य-दृश्य अनुवाद के प्रकार ==
•उपशीर्षक (subtitles)
उपशीर्षक में फिल्म या वीडियो में दृश्य के नीचे संवादों को लिखित रूप में दर्शाया जाता है, जबकि मूल आवाज बनी रहती है।
यह सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला तरीका है क्योंकि इसमें लागत कम होती है और दर्शक मूल आवाज भी सुन सकते हैं। इसमें अनुवादक को यह ध्यान रखना पड़ता है कि टेक्स्ट छोटा, स्पष्ट और जल्दी पढ़ने लायक हो।
हेनरी गोटलीब के अनुसार "सिनेमा के शुरुआती दौर में यह एक 'आवश्यक बुराई' माना जाता था लेकिन आज यह अनुवाद अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।"<ref>{{Cite journal|last=Gottlieb|first=Henrik|date=1992|title=Subtitling: A New University Discipline|journal=Center for Translation Studies, University of Copenhagen|pages=1}}</ref>
•डबिंग (Dubbing)
डबिंग में मूल भाषा की आवाज को हटाकर लक्ष्य भाषा की नई आवाज को जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से थोड़ी जटिल है क्योंकि इसमें आवाज को पात्रों के होठों की गति (lip-sync) से मिलाना पड़ता है। इसका प्रयोग ज्यादातर फिल्म उद्योग में अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचने हेतु किया जाता है।
•वॉइस ओवर (voice-over)
इसमें मूल आवाज को पूरी तरह से हटाया नहीं जाता जबकि थोड़ा धीमा कर दिया जाता है जबकि उसके ऊपर अनुवादित आवाज सुनाई देती है। यह तकनीकी समाचार, इंटरव्यू आदि में प्रयुक्त होती है।
•क्लोज्ड कैप्शनिंग (closed-captioning)
यह तकनीक विशेष रूप से उन लोगों के लिए बनाई गई है जिन्हें सुनने में कठिनाई होती है। इसमें सिर्फ संवाद ही नहीं बल्कि ध्वनि प्रभाव (संगीत, शोर आदि) भी लिखकर दिए जाते हैं।
== उपयोग और महत्व ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का प्रयोग कई क्षेत्रों में होता है।यथा:- फिल्में और टेलीविजन,ओटीटी प्लेटफॉर्म्स,ऑनलाइन शिक्षा,वीडियोगेम आदि।
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का महत्व कई क्षेत्रों में है। इसके माध्यम से वैश्विक संचार में सहायता प्राप्त हुई है। अब किसी भी देश का निवासी अन्य देश की फिल्में, वेबसीरीज़ आदि देखकर उस देश की संस्कृति का परिचायक बन सकता है।
इसके अलावा इसके द्वारा पहले के जमाने में उसी भाषा में फिल्में वेबसीरीज़ बनने के कारण सीमित दर्शक ही उसे समझ पाते थे। अब आधुनिक ज़माने में मनोरंजन सर्वसुलभ हो गया है श्रव्य-दृश्य अनुवाद के माध्यम से लोग किसी भी भाषा की सामग्री का अपनी भाषा में समझ लुत्फ उठा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से लोग नई भाषा सीख सकते हैं। नई भाषा के नए नए शब्द और उसका सही उच्चारण भी इसके माध्यम से पता चल जाता है। इस प्रकार यह शिक्षा के क्षेत्र में भी अत्यंत लाभकारी है।
== चुनौतियां ==
डियाज़ सिंटास बताते हैं "दृश्य और श्रव्य चैनलों के माध्यम से विभिन्न संकेतों (चित्र, ध्वनि, पाठ) का एक साथ होना अनुवादक के कार्य को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बनाता है।"<ref>{{Cite book|title=Handbook of Translation Studies|last=Diaz Cintas|first=Jorge|publisher=John Benjamins|year=2010|pages=344-349}}</ref>
श्रव्य-दृश्य अनुवाद की इस पूरी प्रक्रिया में अनुवादक को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसमें सीमित समय सीमा में सीमित शब्द चयन के कारण कुछ शब्दों को छोड़ देना, सांस्कृतिक भिन्नताओं का सही अनुवाद न कर पाना, lip-sync का मिलान सही से न हो पाना व अन्य तकनीकी सीमाएं निहित है।
== निष्कर्ष ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद वह माध्यम है जो अलग-अलग भाषाओं के लोगों को एक ही सामग्री से जोड़ता है और वैश्विक स्तर पर समझ बढ़ाता है। यह भाषा, दृश्य और ध्वनि के समन्वय के माध्यम से संचार को सरल बनाता है। इसकी चुनौतियों के बावजूद, यह आधुनिक डिजिटल युग की एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
== संदर्भ ==
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श्रव्य-दृश्य अनुवाद (Audiovisual Translation)
== परिचय ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद अनुवाद का एक आधुनिक और विकासशील क्षेत्र है। जिसमें ध्वनि और दृश्य दोनों माध्यमों के साथ प्रस्तुत सामग्री का एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण किया जाता है। इसमें केवल शब्दों रूपांतरण मात्र नहीं होता बल्कि समान भाव, ध्वनि और सांस्कृतिक संदर्भों का भी ध्यान रखा जाता है।
आजकल 21 की सदी के दौर में जब डिजिटल युग का जमाना है देश विदेश की फिल्में, वेबसीरीज़, वीडियो आसानी से उपलब्ध है तब श्रव्य-दृश्य अनुवाद का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
यवेस गैम्बियर के अनुसार, "वैश्वीकरण की दुनिया में श्रव्य-दृश्य अनुवाद संचार का एक प्रमुख माध्यम बन गया है।"<ref>{{Cite journal|last=Gambier|first=Yves|date=2009|title=Challenges in research on audiovisual translation|journal=University of Turku|pages=1}}</ref>
== इतिहास और विकास ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का इतिहास सिनेमा के प्रारंभ से जुड़ा हुआ है। जब मूक फिल्में बनाई जाती थी तब उनमें संवाद को दिखाने के लिए लिखित कार्ड (intertitles) का प्रयोग किया जाता था।
बाद में जब ध्वनि तकनीक विकसित हुई तब फिल्मों में संवाद सुनाई देने लगे। इसके बाद डबिंग (Dubbing) और उपशीर्षक (subtitles) जैसे तरीकों का विकास हुआ।
वर्तमान समय में अमेजन प्राइम, नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म्स के कारण श्रव्य दृश्य अनुवाद चर्चा का विषय बन रहा है। और इस उद्योग में हजारों की संख्या में अनुवादक काम कर रहे हैं।
== श्रव्य-दृश्य अनुवाद के प्रकार ==
•उपशीर्षक (subtitles)
उपशीर्षक में फिल्म या वीडियो में दृश्य के नीचे संवादों को लिखित रूप में दर्शाया जाता है, जबकि मूल आवाज बनी रहती है।
यह सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला तरीका है क्योंकि इसमें लागत कम होती है और दर्शक मूल आवाज भी सुन सकते हैं। इसमें अनुवादक को यह ध्यान रखना पड़ता है कि टेक्स्ट छोटा, स्पष्ट और जल्दी पढ़ने लायक हो।
हेनरी गोटलीब के अनुसार "सिनेमा के शुरुआती दौर में यह एक 'आवश्यक बुराई' माना जाता था लेकिन आज यह अनुवाद अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।"<ref>{{Cite journal|last=Gottlieb|first=Henrik|date=1992|title=Subtitling: A New University Discipline|journal=Center for Translation Studies, University of Copenhagen|pages=1}}</ref>
•डबिंग (Dubbing)
डबिंग में मूल भाषा की आवाज को हटाकर लक्ष्य भाषा की नई आवाज को जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से थोड़ी जटिल है क्योंकि इसमें आवाज को पात्रों के होठों की गति (lip-sync) से मिलाना पड़ता है। इसका प्रयोग ज्यादातर फिल्म उद्योग में अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचने हेतु किया जाता है।
•वॉइस ओवर (voice-over)
इसमें मूल आवाज को पूरी तरह से हटाया नहीं जाता जबकि थोड़ा धीमा कर दिया जाता है जबकि उसके ऊपर अनुवादित आवाज सुनाई देती है। यह तकनीकी समाचार, इंटरव्यू आदि में प्रयुक्त होती है।
•क्लोज्ड कैप्शनिंग (closed-captioning)
यह तकनीक विशेष रूप से उन लोगों के लिए बनाई गई है जिन्हें सुनने में कठिनाई होती है। इसमें सिर्फ संवाद ही नहीं बल्कि ध्वनि प्रभाव (संगीत, शोर आदि) भी लिखकर दिए जाते हैं।
== उपयोग और महत्व ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का प्रयोग कई क्षेत्रों में होता है।यथा:- फिल्में और टेलीविजन,ओटीटी प्लेटफॉर्म्स,ऑनलाइन शिक्षा,वीडियोगेम आदि।
श्रव्य-दृश्य अनुवाद का महत्व कई क्षेत्रों में है। इसके माध्यम से वैश्विक संचार में सहायता प्राप्त हुई है। अब किसी भी देश का निवासी अन्य देश की फिल्में, वेबसीरीज़ आदि देखकर उस देश की संस्कृति का परिचायक बन सकता है।
इसके अलावा इसके द्वारा पहले के जमाने में उसी भाषा में फिल्में वेबसीरीज़ बनने के कारण सीमित दर्शक ही उसे समझ पाते थे। अब आधुनिक ज़माने में मनोरंजन सर्वसुलभ हो गया है श्रव्य-दृश्य अनुवाद के माध्यम से लोग किसी भी भाषा की सामग्री का अपनी भाषा में समझ लुत्फ उठा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से लोग नई भाषा सीख सकते हैं। नई भाषा के नए नए शब्द और उसका सही उच्चारण भी इसके माध्यम से पता चल जाता है। इस प्रकार यह शिक्षा के क्षेत्र में भी अत्यंत लाभकारी है।
== चुनौतियां ==
डियाज़ सिंटास बताते हैं "दृश्य और श्रव्य चैनलों के माध्यम से विभिन्न संकेतों (चित्र, ध्वनि, पाठ) का एक साथ होना अनुवादक के कार्य को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बनाता है।"<ref>{{Cite book|title=Handbook of Translation Studies|last=Diaz Cintas|first=Jorge|publisher=John Benjamins|year=2010|pages=344-349}}</ref>
श्रव्य-दृश्य अनुवाद की इस पूरी प्रक्रिया में अनुवादक को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसमें सीमित समय सीमा में सीमित शब्द चयन के कारण कुछ शब्दों को छोड़ देना, सांस्कृतिक भिन्नताओं का सही अनुवाद न कर पाना, lip-sync का मिलान सही से न हो पाना व अन्य तकनीकी सीमाएं निहित है।
== निष्कर्ष ==
श्रव्य-दृश्य अनुवाद वह माध्यम है जो अलग-अलग भाषाओं के लोगों को एक ही सामग्री से जोड़ता है और वैश्विक स्तर पर समझ बढ़ाता है। यह भाषा, दृश्य और ध्वनि के समन्वय के माध्यम से संचार को सरल बनाता है। इसकी चुनौतियों के बावजूद, यह आधुनिक डिजिटल युग की एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
== संदर्भ ==
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व्याचेस्लाव चोर्नोविल
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चाहर धर्मेंद्र
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'''व्याचेस्लाव मक्सिमोविच चोर्नोविल''' ({{lang-uk|В'ячеслав Максимович Чорновіл}}; 24 दिसंबर 1937 – 25 मार्च 1999) एक प्रमुख यूक्रेनी सोवियत असंतुष्ट, स्वतंत्रता सेनानी और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे। वे यूक्रेन के राजनीतिक और सामाजिक पुनर्जागरण के अग्रदूतों में गिने जाते हैं। वर्ष 1989 से लेकर अपने निधन तक वे यूक्रेन का जन आन्दोलन के नेता रहे, जिसने देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की चेतना को सशक्त स्वर प्रदान किया।
मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता ने उन्हें सोवियत शासन के विरोध का प्रमुख चेहरा बना दिया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें कठोर दमन का सामना करना पड़ा और उन्होंने अपने जीवन के लगभग पंद्रह वर्ष कारावास और निर्वासन में व्यतीत किए।
वर्ष 1990 से 1999 तक यूक्रेन के जन प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने वाले चोर्नोविल, यूक्रेन में सार्वजनिक पद धारण करने वाले पहले और सबसे प्रमुख कम्युनिस्ट-विरोधी नेताओं में से एक थे। उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति पद के लिए दो बार चुनाव लड़ा। वर्ष 1991 में अपने पहले प्रयास में वे [[लियोनिद क्रावचुक]] से हार गए थे, जबकि 1999 के चुनाव अभियान के दौरान एक कार दुर्घटना में विवादित परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।
चोर्नोविल का जन्म तत्कालीन [[सोवियत संघ]] के अधीन मध्य यूक्रेन के येर्की गाँव में हुआ था। विश्वविद्यालय के दिनों से ही कोम्सोमोल के सदस्य रहे चोर्नोविल, प्रति-सांस्कृतिक सिक्सटियर्स आंदोलन से जुड़ गए थे। साम्यवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण अंततः उन्हें कोम्सोमोल से निष्कासित कर दिया गया। 1965-1966 के सोवियत दमन के दौरान गिरफ्तार किए गए बुद्धिजीवियों के प्रति हुए दुर्व्यवहार की जांच करने वाले उनके ''समिज्दात'' कार्यों ने उन्हें पश्चिमी देशों में भारी प्रशंसा दिलाई, लेकिन इसी के परिणामस्वरूप उन्हें याकूतिया में तीन साल के कारावास की सजा भी सुनाई गई। रिहाई के बाद, वे पुनः ''समिज्दात'' कार्यों में सक्रिय हो गए और उन्होंने ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' का प्रकाशन शुरू किया, जिसे आधुनिक यूक्रेनी स्वतंत्र प्रेस का अग्रदूत माना जाता है।
वर्ष 1972 में, बुद्धिजीवियों के दमन के एक अन्य चक्र में चोर्नोविल को फिर से बंदी बना लिया गया, और उन्हें 1985 तक यूक्रेन लौटने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने अपना यह अधिकांश समय कारावास में ही व्यतीत किया। जेल में रहने के दौरान, उनके साथी असंतुष्ट मिखाइल खेइफेट्स ने यूक्रेनी राजनीतिक कैदियों का नेतृत्व करने के कारण चोर्नोविल को "ज़ेकों (कैदियों) का जनरल" कहकर पुकारा था, और [[एमनेस्टी इंटरनेशनल]] ने भी उन्हें 'अंतरात्मा का बंदी' घोषित किया था।
उनकी रिहाई तब संभव हो सकी जब सोवियत सरकार ने ''पेरेस्त्रोइका'' नीति के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी। चोर्नोविल ने यूक्रेन में कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ राजनीतिक विपक्ष तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप यूक्रेन का जन आन्दोलन पार्टी की स्थापना हुई और एक ऐसी लोकप्रिय क्रांति का जन्म हुआ जिसने साम्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंका। इस क्रांति के बीच, चोर्नोविल ने यूक्रेन की संसद के सदस्य के रूप में पदभार ग्रहण किया। वे 1991 यूक्रेनी राष्ट्रपति चुनाव में दो मुख्य उम्मीदवारों में से एक थे, यद्यपि वे पूर्व कम्युनिस्ट नेता [[लियोनिद क्रावचुक]] से पराजित हो गए थे। चोर्नोविल ने [[यूरोपीय संघ]] में यूक्रेन की सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया और यूक्रेनी कुलीन वर्गों के बढ़ते प्रभुत्व का कड़ा विरोध किया।
अपने जीवनकाल में चोर्नोविल एक अत्यंत विवादास्पद व्यक्ति माने जाते थे, और उनके जीवन के अंतिम महीनों में 'रूख' पार्टी के भीतर भारी गुटबाजी हावी रही। 1999 यूक्रेनी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, जहाँ वे तत्कालीन राष्ट्रपति [[लियोनिद कुचमा]] के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे। उनकी मृत्यु ने कई षड्यंत्र के सिद्धांतों को जन्म दिया और वर्षों तक इसकी जांच और मुकदमे चलते रहे, जिन्होंने न तो [[हत्या]] की संभावना की पूरी तरह पुष्टि की और न ही इसे सिरे से खारिज किया। वे वर्तमान यूक्रेन में एक बेहद लोकप्रिय ऐतिहासिक व्यक्ति हैं; उन्हें दो बार यूक्रेन के शीर्ष दस सबसे लोकप्रिय व्यक्तियों की सूची में स्थान दिया गया है और उन्हें देश के लोकतंत्र, मानवाधिकार सक्रियता तथा यूरोप-समर्थक विचारधारा का प्रतीक माना जाता है।
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
[[File:71-212-0076 SAM 9126 Vilkhovets.jpg|alt=पेड़ों से घिरे एक सफेद और हरे रंग के घर की तस्वीर|thumb|left|[[विल्खोवेट्स, चर्कासी ओब्लास्ट|विल्खोवेट्स]] में चोर्नोविल के बचपन का घर]]
व्याचेस्लाव मक्सिमोविच चोर्नोविल का जन्म 24 दिसंबर 1937 को तत्कालीन यूक्रेनी सोवियत समाजवादी गणराज्य के येर्की गाँव में शिक्षकों के एक परिवार में हुआ था।{{sfn|LIGA.net 2009}} उनके पिता, मक्सिम इओसिपोविच चोर्नोविल, कोसैक कुलीन वर्ग के वंशज थे, जबकि उनकी माता कुलीन तेरेशचेंको परिवार से संबंध रखती थीं।{{sfn|Kherson Oblast Universal Library 2024}} 'ग्रेट पर्ज' के दौरान जन्मे और पले-बढ़े व्याचेस्लाव के बचपन पर सोवियत दमन की गहरी छाप थी; उनके चाचा, पेत्रो इओसिपोविच को मृत्युदंड दे दिया गया था, जबकि उनके पिता यूक्रेन में कानून की नजरों से छिपकर एक भगोड़े का जीवन जी रहे थे।{{sfn|Kherson Oblast Universal Library 2024}} [[द्वितीय विश्व युद्ध]] और यूक्रेन पर जर्मन कब्जे के दौरान चोर्नोविल का परिवार हुसाकोव गाँव में रहा, जहाँ व्याचेस्लाव ने अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने बाद में अपनी आत्मकथा में यह दावा किया कि सोवियत संघ द्वारा हुसाकोव पर दोबारा कब्ज़ा किए जाने के बाद, उनके परिवार को गाँव से निकाल दिया गया था। इसके बाद वे विल्खोवेट्स में रहने लगे और वहीं से व्याचेस्लाव ने 1955 में स्वर्ण पदक के साथ अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की।{{sfn|Chornovil, autobiography}} उनके अशांत बचपन को देखते हुए, चोर्नोविल के माता-पिता ने उन्हें यूक्रेनी राष्ट्रवाद के बारे में बताने से परहेज किया। इसके बजाय उनका पालन-पोषण कम्युनिस्ट विचारधारा की शिक्षाओं के साथ किया गया{{sfn|Derevinskyi 2017a|p=1}} और उन्हें लोगों के बीच मित्रता तथा सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयवाद जैसे आदर्श सिखाए गए।{{sfn|Matiash|2017|p=6}}
उसी वर्ष चोर्नोविल ने कीव के तरास शेवचेंको विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहाँ वे पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वे सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) की युवा शाखा, कोम्सोमोल में भी शामिल हो गए। कीव की रूसी-भाषी आबादी द्वारा यूक्रेनी भाषा बोलने वालों के प्रति दिखाई जाने वाली नकारात्मक प्रतिक्रिया ने उन्हें भीतर से असंतुष्ट कर दिया और एक यूक्रेनी के रूप में उनकी चेतना को जागृत किया।{{sfn|Ivanova|2024}} उस समय के अन्य युवा सोवियत कार्यकर्ताओं की भाँति, चोर्नोविल भी 1956 में सी॰पी॰एस॰यू॰ की 20वीं कांग्रेस से अत्यधिक प्रभावित हुए थे, जिसमें [[निकिता ख्रुश्चेव]] ने [[जोसेफ स्टालिन]] के शासन की कड़ी निंदा करते हुए भाषण दिया था।{{sfn|Kulchytskyi|2019|p=50}}
1957 में उनके गैर-अनुरूपतावादी विचारों ने उन्हें संकाय के समाचार पत्र के साथ विवाद में ला खड़ा किया, जिसने "अमानक सोच" रखने के लिए उनकी निंदा की।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} नतीजतन, उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी और [[डोनबास]] शहर ज़दानोव में एक ब्लास्ट फर्नेस के निर्माण कार्य में लगा दिया गया।{{sfn|Chornovil, autobiography}} वहाँ उन्होंने ''कीव कोम्सोमोलेट्स'' समाचार पत्र के लिए एक भ्रमणशील संपादक के रूप में भी काम किया। एक वर्ष पश्चात, वे अपनी पढ़ाई पर लौट आए और 1960 में सम्मान के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} उनका डिप्लोमा शोध प्रबंध 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत के प्रमुख यूक्रेनी लेखक और स्वतंत्रता कार्यकर्ता बोरिस ह्रीन्चेंको के कार्यों पर आधारित था।{{sfn|LB.ua 2015}} उसी वर्ष, उन्होंने अपनी पहली पत्नी, इरीना ब्रुनेवेट्स से विवाह कर लिया। 1962 में उनके तलाक से पूर्व, उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम एंड्री था।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}}
== पत्रकारिता और पार्टी का करियर ==
स्नातक होने के बाद, जुलाई 1960 में चोर्नोविल ल्वीव टेलीविज़न (वर्तमान - सुस्पिल्ने ल्वीव) में एक संपादक बन गए । उन्होंने चैनल के युवा कार्यक्रमों के लिए पटकथाएँ लिखीं।{{sfn|Ostrovskyi 2018a|p=106}} इस अवधि में, चोर्नोविल ने साहित्यिक आलोचना पर भी काम किया, जिसमें मुख्य रूप से ह्रीन्चेंको, तरास शेवचेंको और वलोडिमिर सामिलेंको की कृतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया था।{{sfn|Shvydkyi|2013}} इनमें से कुछ रचनाएँ टीवी पर भी प्रसारित हुईं; उदाहरण के लिए, 1962 में उन्होंने मिखाइलो स्टेल्माख, वासिल चुमाक और 'यंग म्यूज' समूह पर विशेष फीचर प्रसारित किए।{{sfn|Seko|2020|p=135}} संभवतः इसी दौरान उनकी मुलाकात ज़ेनोविय क्रासिव्स्की से हुई, जो ल्वीव विश्वविद्यालय में टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे। चोर्नोविल की ही तरह, क्रासिव्स्की भी बाद में असंतुष्ट आंदोलन के एक बड़े नेता बने।{{sfn|Ostrovskyi 2018a|p=106}}
[[File:Київська ГЕС.jpg|alt=एक बड़े जलविद्युत ऊर्जा संयंत्र की हवाई तस्वीर|thumb|कीव हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट, जहाँ चोर्नोविल ने 1963 से 1964 तक कोम्सोमोल सचिव के रूप में काम किया]]
मई 1963 में चोर्नोविल ने ल्वीव टेलीविज़न की अपनी नौकरी छोड़ दी और कीव लौट आए, ताकि वे अपना 'कैंडिडेट ऑफ साइंसेज' का शोध प्रबंध पूरा कर सकें।{{sfn|Derevinskyi 2017a|pp=1–2}} वहां, उन्होंने पास के विशहोरोद में कीव हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट के निर्माण के लिए कोम्सोमोल सचिव के रूप में कार्य किया।{{sfn|Shvydkyi|2013}} उन्होंने कीव स्थित समाचार पत्रों ''यंग गार्ड'' और ''सेकंड रीडिंग'' के लिए एक संपादक के रूप में भी एक साथ काम किया,{{sfn|Chornovil, autobiography}} और वे 'आर्टिस्टिक यूथ्स क्लब' का हिस्सा बन गए, जो प्रति-सांस्कृतिक सिक्सटियर्स आंदोलन से जुड़े बुद्धिजीवियों का एक अनौपचारिक समूह था।{{sfn|Ostrovskyi 2018a|p=107}} जून 1963 में, चोर्नोविल ने अपनी दूसरी पत्नी, ओलेना एंटोनिव से विवाह किया, और 1964 में उनके दूसरे बेटे, तरास का जन्म हुआ।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} चोर्नोविल ने 1964 में कीव शैक्षणिक संस्थान में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। हालाँकि, उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें 'डॉक्टर ऑफ साइंसेज' की डिग्री हासिल करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया।{{sfn|Shvydkyi|2013}}
9 मार्च 1964 को, सोवियत संघ ने यूक्रेन के राष्ट्रीय कवि तरास शेवचेंको की 150वीं वर्षगांठ मनाई। शेवचेंको पर सी॰पी॰एस॰यू॰ का आधिकारिक रुख, विशेष रूप से 'शेवचेंको दिवस' के दौरान, दास-प्रथा विरोधी गतिविधियों में कवि की भूमिका और ज़ारिस्ट निरंकुशता के प्रति उनके कड़े प्रतिरोध पर ज़ोर देता था। कीव हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट के श्रमिकों को संबोधित करते हुए अपने भाषण में, चोर्नोविल ने निर्धारित कम्युनिस्ट व्याख्याओं से हटकर शेवचेंको को एक विशिष्ट रूप से यूक्रेनी नायक के रूप में प्रस्तुत किया। चोर्नोविल ने श्रोताओं से कवि के मुख्य कार्यों के संग्रह, ''कोबज़ार'' को "अपनी अपमानित और तिरस्कृत मातृभूमि के लिए कांपते हुए प्रेम" की अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्यायित करने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शेवचेंको के कार्यों से यह सिद्ध होता है कि "मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीड़न पर, मानवीय गरिमा और अविच्छेद्य मानवाधिकारों की अवमानना पर, स्वतंत्र व मानवीय विचारों के दमन पर, और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के उत्पीड़न पर टिकी हर व्यवस्था, चाहे वह किसी भी नए आवरण में क्यों न छिप जाए [...] मानव स्वभाव के घोर विरुद्ध है, और इसे नष्ट किया जाना चाहिए।"{{sfn|Seko|2020|pp=123–125}} इतिहासकार यारोस्लाव सेको इस भाषण को सिक्सटियर्स आंदोलन के एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में देखते हैं, यद्यपि उनका यह भी मानना है कि उस समय ''इंटरनेशनलिज्म और रसिफिकेशन?'' के लेखक इवान डज़िउबा, और साथी असंतुष्ट येवहेन स्वेर्स्टिउक का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक था।{{sfn|Seko|2020|pp=128–129}}
8 अगस्त 1965 को, शेषोरी गाँव में शेवचेंको के एक स्मारक के उद्घाटन के अवसर पर, चोर्नोविल ने घोर कम्युनिस्ट-विरोधी स्वर के साथ एक प्रखर भाषण दिया। परिणामस्वरूप, उन्हें उनकी कोम्सोमोल की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। अपनी बर्खास्तगी के बाद, चोर्नोविल ने अपनी बेगुनाही साबित करने के एक असफल प्रयास में कोम्सोमोल के नेतृत्व को कई पत्र भी लिखे।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}}
== असंतुष्ट और मानवाधिकार कार्यकर्ता ==
=== 1965–1966 का दमन और उसके परिणाम ===
वर्ष 1965 में सिक्सटियर बुद्धिजीवियों की सामूहिक गिरफ्तारियों का एक नया सिलसिला शुरू हुआ क्योंकि अपेक्षाकृत उदार माने जाने वाले निकिता ख्रुश्चेव को हटाकर लियोनिद ब्रेझनेव को नियुक्त कर दिया गया था। इन गिरफ्तारियों के विरोध में, चोर्नोविल, डज़िउबा और छात्र वासिल स्टस ने कीव सिनेमा के भीतर एक बड़ा प्रदर्शन किया, जिसने सर्गेई पारजानोव की फिल्म 'शैडोज़ ऑफ़ फॉरगॉटन एंसेस्टर्स' के 4 सितंबर के प्रीमियर को बाधित कर दिया। चोर्नोविल ने जोर से चिल्लाकर कहा: "जो भी इस अत्याचार के विरुद्ध है, वह अपने स्थान पर खड़ा हो जाए!"
चोर्नोविल और डज़िउबा के इस घटना के संस्मरण काफी भिन्न रहे हैं। डज़िउबा ने बाद में यह दावा किया कि उन्हें याद नहीं कि चोर्नोविल वहाँ उपस्थित थे या उन्हें उस घटना की पूर्व जानकारी थी। दूसरी ओर, चोर्नोविल ने कहा कि वे और डज़िउबा स्वतंत्र रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि दमन के खिलाफ एक सार्वजनिक विरोध नितांत आवश्यक था, और जब डज़िउबा का भाषण दर्शकों के शोर में दब गया, तो चोर्नोविल ने वह वाक्य चिल्लाकर विरोध को जारी रखा। सेको डज़िउबा के अधिक सतर्क और सूचनात्मक भाषण की तुलना चोर्नोविल के अधिक उग्र और टकराव वाले दृष्टिकोण से करते हैं।{{sfn|Seko|2014|pp=128–130}}
उसी वर्ष 30 सितंबर को, चोर्नोविल के ल्वीव स्थित फ्लैट की सोवियत सुरक्षा एजेंसी, के॰जी॰बी॰ द्वारा तलाशी ली गई। वहाँ से साहित्य के 190 अंश जब्त किए गए, जिनमें 'गैलिसियन-वोलहिनियन क्रॉनिकल', 'बुक्स ऑफ द जेनेसिस ऑफ द यूक्रेनी पीपल', पांटेलीमोन कुलिश, वलोडिमिर एंटोनोविच, वलोडिमिर हनतियुक, दिमित्रो डोरोशेंको, इवान कृपियाकेविच और वलोडिमिर विन्नीचेंको के मोनोग्राफ व लेख, साथ ही पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल, प्रथम विश्व युद्ध और यूक्रेनी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ी पुस्तकें शामिल थीं। के॰जी॰बी॰ द्वारा उनके फ्लैट पर 3 अगस्त 1967 और 12 जनवरी 1972 को की गई दो अन्य छापेमारी में भी साहित्य की जब्ती हुई, हालांकि ये दोनों सितंबर 1965 की छापेमारी की तुलना में आकार में बहुत छोटी थीं।{{sfn|Ostrovskyi 2018b|p=119}}
उसी वर्ष कुछ समय पश्चात, दमन जारी रहने के कारण, चोर्नोविल को सिक्सटियर्स मिखाइलो ओसादची, बोहदान होरिन और मिखाइलो होरिन, तथा मायरोस्लावा ज़वारीचेवस्का के मुकदमों में साक्ष्य देने के लिए बुलाया गया। चोर्नोविल ने स्पष्ट रूप से गवाही देने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 'सेकंड रीडिंग' में उनके संपादक पद से हटा दिया गया। उन्होंने ''समिज्दात'' की ओर रुख किया और मई 1966 में अपनी रचना 'कोर्ट ऑफ लॉ ऑर ए रिटर्न ऑफ द टेरर?' प्रकाशित की, जिसने सिक्सटियर्स को दी गई सजा की वैधता और संवैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए।{{sfn|Derevinskyi|2007|p=38}} 8 जुलाई को यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ की आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 179 के तहत मुकदमों में गवाही देने से इनकार करने का उन पर आरोप लगाया गया, और वेतन में 20% की कटौती के साथ उन्हें तीन महीने के कठोर श्रम की सजा सुनाई गई। इस अवधि में, उन्होंने कार्पेथियन पर्वत में यूक्रेन की विज्ञान अकादमी के अभियानों में एक तकनीशियन के रूप में, 'कीवकनीहतोर्ह' के लिए एक विज्ञापनदाता के रूप में, और प्रकृति संरक्षण के लिए ल्वीव क्षेत्रीय केंद्र में एक शिक्षक के रूप में विभिन्न कार्य किए।{{sfn|Shvydkyi|2013}}
1967 में चोर्नोविल ने ''समिज्दात'' की अपनी दूसरी महत्वपूर्ण कृति प्रकाशित की। 'वूम फ्रॉम विट: पोर्ट्रेट्स ऑफ ट्वेंटी "क्रिमिनल्स"' के नाम से विख्यात इस कृति में 1965–1966 के दमन के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों की जानकारी और उनकी गिरफ्तारी के दौरान सोवियत अधिकारियों द्वारा किए गए घोर कानून उल्लंघनों का पूरा विवरण शामिल था। चोर्नोविल ने इस कृति की प्रतियां यूक्रेन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति, यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ के के॰जी॰बी॰, यूक्रेन के राइटर्स यूनियन और यूक्रेन के कलाकारों के संघ को भी भेजीं। 21 अक्टूबर 1967 को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा समर्थित 'रेडियो लिबर्टी' के एक प्रसारण के दौरान इसे पढ़ा गया, और वर्ष के अंत तक इसे व्यावसायिक रूप से मुद्रित भी कर दिया गया था।{{sfn|Shvydkyi|2013}} चोर्नोविल का यह ''समिज्दात'' 1969 में पश्चिमी देशों में 'द चोर्नोविल पेपर्स' शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ, जिसने ऐसे समय में इस दमन की ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया जब वैश्विक जनचेतना मुख्य रूप से सिन्याव्स्की-डैनियल परीक्षण पर केंद्रित थी।{{sfn|Bociurkiw|1970|p=343}} चोर्नोविल के इस साहसिक कार्य ने उन्हें उस समय यूक्रेनी कार्यकर्ताओं के बीच अग्रणी हस्तियों में से एक के रूप में स्थापित कर दिया।{{sfn|Matiash|2017|p=11}} ''वूम फ्रॉम विट'' के अतिरिक्त, चोर्नोविल ने गिरफ्तारियों के दौरान जांचकर्ताओं द्वारा किए गए कानूनी उल्लंघनों के संबंध में यूक्रेनी के॰जी॰बी॰ के प्रमुख और यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ के अभियोजक जनरल को औपचारिक शिकायतें भी लिखीं।
5 मई 1967 को, उन्हें ल्वीव ओब्लास्ट के उप अभियोजक जनरल ई॰ स्तारिकोव के कार्यालय में तलब किया गया, जिन्होंने उन्हें यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ की आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 187-1 के अस्तित्व से अवगत कराया। यह कानून, जो सोवियत व्यवस्था या सरकार की निंदा करने पर पूरी तरह रोक लगाता था, अस्तित्व में तो था लेकिन आधिकारिक पुस्तकों में दर्ज नहीं था। इसलिए केवल उस बैठक के दौरान ही चोर्नोविल को आधिकारिक तौर पर यह ज्ञात हो सका कि उन्होंने शायद कुछ अवैध कार्य किया था। उस समय तक, के॰जी॰बी॰ की नजरों में उनकी छवि एक उपद्रवी की बन चुकी थी।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}}
=== याकूतिया में निर्वासन ===
[[File:Якутия.png|alt=याकूत स्वायत्त सोवियत समाजवादी गणराज्य का एक स्थलाकृतिक मानचित्र|thumb|अगस्त 1967 की अपनी गिरफ्तारी के बाद चोर्नोविल को याकूत ए॰एस॰एस॰आर॰ भेज दिया गया था]]
''वूम फ्रॉम विट'' के प्रकाशन के प्रत्युत्तर में अगस्त 1967 में चोर्नोविल को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर अनुच्छेद 187-1 के तहत आरोप तय किए गए।{{sfn|Melnykova-Kurhanova|2019|p=79}} उनके फ्लैट की एक और तलाशी ली गई जिसके परिणामस्वरूप ''वूम फ्रॉम विट'' की एक प्रति के साथ-साथ वैलेन्टिन मोरोज़ की ''समिज्दात'' पुस्तिका ''रिपोर्ट फ्रॉम द बेरिया रिज़र्व'' भी जब्त कर ली गई, जो उनके खिलाफ मानहानि के आरोपों का मुख्य आधार बनी। चोर्नोविल ने पूछताछ के दौरान मौखिक के बजाय अपनी लिखित गवाही देने का विकल्प चुना, क्योंकि उस समय मौखिक पूछताछ के दौरान तर्कों को विकृत और हेरफेर किए जाने का भारी जोखिम था। चोर्नोविल ने अपनी बेगुनाही, साथ ही दमन के दौरान गिरफ्तार किए गए अन्य सभी लोगों की बेगुनाही का पुरजोर तर्क देते हुए लिखा:{{sfn|Istorychna Pravda 2017}}
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया, और उनकी शिकायतों पर सोवियत अधिकारियों की ओर से किसी भी कार्रवाई की कमी ने, सोवियत प्रणाली में उनके विश्वास को काफी हद तक समाप्त कर दिया था। हालाँकि, उन्होंने इस बात पर जोर देना जारी रखा कि सोवियत सरकार के प्रति उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं थी, बल्कि उन्होंने यह आरोप लगाया कि उन्हें कुछ ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा निशाना बनाया जा रहा था जो अवैध रूप से उन्हें देश की वास्तविक स्थिति के बारे में उच्च पदस्थ अधिकारियों को सूचित करने से रोकना चाहते थे।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} इन तर्कों के बावजूद 13 नवंबर 1967 को चोर्नोविल को दोषी ठहराया गया और उन्हें तीन साल के कारावास की सजा सुनाई गई।{{sfn|Melnykova-Kurhanova|2019|p=79}} इस अवधि के दौरान, उन्हें याकूत स्वायत्त सोवियत समाजवादी गणराज्य के चप्पनदा गाँव में रखा गया था।{{sfn|Matiash|2017|p=29}}
[[File:Атена Пашко на Донбасі1.jpg|alt=कैप्शन देखें|thumb|[[एटेना पाश्को]], चोर्नोविल की तीसरी और अंतिम पत्नी]]
1969 में, चोर्नोविल ने साथी कार्यकर्ता एटेना पाश्को से विवाह किया, जिनसे वे एक अन्य असंतुष्ट इवान स्वितलीचनी के घर पर पहली बार मिले थे। उन दोनों ने याकूतिया के निउर्बा शहर में औपचारिक रूप से विवाह संपन्न किया।{{sfn|Matiash|2017|p=29}}
=== गिरफ्तारियों के बीच का जीवन (1969–1972) ===
1969 में एक [[आम माफी]] के तहत चोर्नोविल को जेल से रिहा कर दिया गया था। रिहाई के बाद उन्हें एक स्थिर नौकरी खोजने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ा; उन्होंने ज़कारपट्टिया ओब्लास्ट में एक मौसम केंद्र पर, ओडेसा ओब्लास्ट के एक पुरातात्विक अभियान के दौरान एक उत्खननकर्ता के रूप में, और स्क्निलिव रेलवे स्टेशन पर एक सामान्य कर्मचारी के रूप में विभिन्न कार्य किए।{{sfn|Matiash|2017|p=13}} सितंबर 1969 में, वे वैलेन्टिन मोरोज़ से भी मिले, जो एक अन्य प्रमुख असंतुष्ट थे जिन्हें 1965-1966 के दमन के दौरान कैद किया गया था। उन दोनों ने जल्दी ही गहरी मित्रता कर ली और वे अक्सर एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहते थे, क्योंकि वे दोनों असंतुष्ट आंदोलन को मजबूत करने और सरकारी दुर्व्यवहारों का अधिक दृढ़ता से सामना करने का प्रयास कर रहे थे। इस समयावधि के दौरान, चोर्नोविल ने, स्वितलीचनी और स्वेर्स्टिउक के साथ मिलकर, मोरोज़ को घोर गरीबी में जाने से रोकने के लिए एक दान अभियान का भी सफल नेतृत्व किया। इस अभियान ने 3,500 सोवियत रूबल एकत्र किए।{{sfn|Paska|2018|p=135}} उन्होंने अन्य पूर्व-कैद असंतुष्टों, जैसे कि शिवतोस्लाव कारावन्स्की और नीना स्ट्रोकाटा के लिए भी ऐसे ही दान अभियान आयोजित किए थे।{{sfn|Fedunyshyn|2018|p=199}}
जनवरी 1970 में चोर्नोविल ने ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' के नाम से एक नया ''समिज्दात'' अखबार शुरू किया। इस अखबार में अन्य ''समिज्दात'' प्रकाशनों के साथ-साथ उस महत्वपूर्ण जानकारी को भी शामिल किया गया जिसे वे महान रूसी अंधराष्ट्रवाद और यूक्रेन-विरोधी भावना मानते थे। इसमें सोवियत सरकार और पुलिस द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के दुरुपयोग का विस्तृत विवरण दिया गया था, जिसे चोर्नोविल सोवियत संघ के संविधान के सर्वथा विपरीत मानते थे, और इसमें यूक्रेन में असंतुष्ट आंदोलन से संबंधित अन्य जानकारी भी मौजूद थी।{{sfn|Shanovska|2019|pp=144–145}} चोर्नोविल ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' के मुख्य संपादक थे, और इसके तीन संस्थापकों व संपादकों में से एक थे। ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' ने एक बड़े पेशेवर कर्मचारियों के दल को बनाए रखा था, जिसके संवाददाता पूरे यूक्रेन में मौजूद थे,{{sfn|Dubyk|Zaitsev|2019}} और जीवनी लेखक वी॰ आई॰ मत्याश द्वारा इस अखबार को यूक्रेन में स्वतंत्र प्रेस के अग्रदूत के रूप में वर्णित किया गया है।{{sfn|Matiash|2017|p=8}}
गिरफ्तारी के डर से, जुलाई 1971 में चोर्नोविल ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति को एक विस्तृत पत्र लिखा, इस आशा के साथ कि यदि वे फिर से कैद हो गए तो अंतर्राष्ट्रीय निकाय इसे प्रकाशित करेगा। इस पत्र में, उन्होंने सोवियत अधिकारियों द्वारा किए गए कानून के उल्लंघनों के ठोस उदाहरणों को रेखांकित किया, और यह तर्क दिया कि सोवियत राजनीतिक कैदियों के पास अपना बचाव करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था और वे निरंतर निगरानी, ब्लैकमेल और धमकियों के क्रूर अभियान के अधीन थे। उन्होंने जांचकर्ताओं के साथ सहयोग करने की किसी भी संभावना को यह लिखते हुए सिरे से खारिज कर दिया: "मैं उपर्युक्त सिद्धांतों के आगे झुकने के बजाय सलाखों के पीछे मरना अधिक पसंद करूँगा।"{{sfn|Fedunyshyn|2018|p=200}}
इस समय, चोर्नोविल ने मायखाइलो द्रागोमानोव की मान्यताओं के आधार पर उदार लोकतंत्र में भी अपना विश्वास अपनाया। अक्टूबर 1971 में मोरोज़ को लिखे एक पत्र में, चोर्नोविल ने टिप्पणी की कि अराजकतावादी क्रांतिकारियों पियरे-जोसेफ प्राउधोन और मिखाइल बाकुनिन के अपने अध्ययन में, उन्होंने द्रागोमानोव की नीतियों के लिए बिना शर्त समर्थन को तो अस्वीकार कर दिया था, लेकिन उनका यह मानना था कि स्वशासन पर इस शुरुआती बुद्धिजीवी के विचार पूर्णतः समर्थन करने योग्य थे। इसी दृष्टिकोण ने बाद में संघवाद के लिए उनके मजबूत समर्थन को आकार दिया।{{sfn|Seko|2021|pp=95–96}} इस दौरान, चोर्नोविल ने स्वयं को एक समाजवादी के रूप में वर्णित करना जारी रखा, और एक बिना तिथि वाले पत्र में उन्होंने लिखा कि उन्होंने "हमेशा समाजवाद के मूल सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन किया है और ऐसा करना जारी रखा है", जबकि राजनीतिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों के लिए उन्होंने सोवियत सरकार की घोर आलोचना की।{{sfn|Bellezza|2019|p=119}}
कार्यकर्ता नीना स्ट्रोकाटा की गिरफ्तारी के पश्चात 21 दिसंबर 1971 को चोर्नोविल ने 'नीना स्ट्रोकाटा की रक्षा के लिए नागरिक समिति' की स्थापना की। इस समिति ने मानवाधिकार संगठनों के गठन के प्रति उनके दृष्टिकोण में एक बड़े बदलाव को चिह्नित किया; वे इससे पहले याचिका अभियानों के पक्ष में उन्हें अस्वीकार कर चुके थे, क्योंकि वे सोवियत संघ के भीतर यूक्रेन की स्थिति की कठोर परिस्थितियों के कारण एक संगठन के गठन को लगभग असंभव मानते थे। हालाँकि, उनके इस पुराने दृष्टिकोण की असंतुष्टों और यूक्रेनी जनता द्वारा बढ़ती आलोचना हुई थी, जो इन याचिका अभियानों को बहुत धीमा और महत्वपूर्ण परिणाम नहीं देने वाला मानते थे। इस नई समिति की जड़ें एंजेला डेविस की कानूनी रक्षा के लिए स्थापित सार्वजनिक समितियों में निहित थीं, जो एक अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थीं, जिनका मामला सोवियत संघ में इसलिए लोकप्रिय था क्योंकि वे एक कम्युनिस्ट थीं। चोर्नोविल का मानना था कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति को मामले की जानकारी देकर स्ट्रोकाटा को मुक्त किया जा सकता है, और इसके अतिरिक्त उन्होंने दज़िउबा, स्ट्रोकाटा के करीबी दोस्त लियोनिद तिमचुक, मॉस्को स्थित कार्यकर्ताओं प्योत्र याकिर और ल्यूडमिला अलेक्सेयेवा, और लेखक इवान फ्रांको की पोती ज़िनोविया फ्रांको के प्रत्यक्ष समर्थन का भी अनुरोध किया।{{sfn|Derevinskyi|2015|pp=21–22}}
दज़िउबा और फ्रांको सहित कई अन्य असंतुष्टों ने इस समिति में भाग लेने से इनकार कर दिया। इन इन्कारों ने चोर्नोविल को काफी प्रभावित किया, विशेष रूप से फ्रांको के इनकार ने, जिनके पारिवारिक संबंधों के बारे में उनका यह मानना था कि वे समिति को सोवियत सरकार के हमलों से सुरक्षित रखने में मदद कर सकते थे।{{sfn|Derevinskyi|2015|pp=21–22}} तिमचुक अंततः इसमें शामिल हो गए, और वासिल स्टस भी आ जुड़े। इस समूह ने अपने बचाव के तर्क सोवियत संविधान, [[मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा]] और नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय नियम पर आधारित किए। समिति के प्रकाशनों में, सोवियत कार्यकर्ताओं के इतिहास में पहली बार, इसके सदस्यों के पते स्पष्ट रूप से शामिल थे, जहाँ स्ट्रोकाटा की ओर से सामग्री प्रस्तुत की जानी थी। यह यूक्रेन के इतिहास में पहला मानवाधिकार संगठन था, लेकिन अगले ही वर्ष इसके सदस्य को छोड़कर सभी के गिरफ्तार होने के बाद इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया जाएगा।{{sfn|Zaitsev|2006}}
=== रूस में जीवन (1972–1985) ===
==== ''यूक्रेनी हेराल्ड'' परीक्षण ====
[[File:1 Bandery Street, Lviv (01).jpg|alt=दो कोबलस्टोन सड़कों के चौराहे पर एक इमारत|thumb|left|द [[लॉकी स्ट्रीट पर जेल]], जहाँ 1972 की गिरफ्तारी के बाद चोर्नोविल को पूर्व-परीक्षण निरोध में रखा गया था]]
यूक्रेनी बुद्धिजीवियों पर एक और अत्यंत व्यापक दमन जनवरी 1972 में शुरू हुआ, जो बेल्जियम-यूक्रेनी यारोस्लाव दोबोश की गिरफ्तारी से भड़क गया था। दोबोश यूक्रेनी राष्ट्रवादियों का संगठन के एक सक्रिय सदस्य थे, जिन्हें सोवियत संघ से ''समिज्दात'' की तस्करी करने का गुप्त काम सौंपा गया था। चोर्नोविल को ओलेना एंटोनिव के ल्वीव फ्लैट में एक उत्सव के ठीक बाद 12 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन पर यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ की आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 62 (सोवियत विरोधी आंदोलन) और 187-1 (सोवियत संघ के खिलाफ निंदा) के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे।{{sfn|Tereshchuk|2022}} यह समारोह सोवियत सांस्कृतिक और धार्मिक नीति के मुखर विरोध के रूप में आयोजित किया गया था, और इसके अतिरिक्त इसने ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' और राजनीतिक कैदियों तथा उनके बेसहारा परिवारों के लिए धन उगाहने के एक प्रयास के रूप में भी काम किया था। इसने 250 रूबल जुटाए थे, जिनका उपयोग दमन के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों की आर्थिक सहायता के लिए किया गया। चोर्नोविल को इरीना कालियनेट्स, इवान गेल, स्टेफानिया शबतुरा, मिखाइलो ओसादची और यारोस्लाव दशकेविच के साथ ल्वीव के के॰जी॰बी॰ पूर्व-परीक्षण निरोध केंद्र में कैद किया गया था।{{sfn|Hrytsiv|2017}}
चोर्नोविल का यह परीक्षण बंद दरवाजों के पीछे संपन्न हुआ था।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} अभियोजकों ने तर्क दिया कि चोर्नोविल ही ''द यूक्रेनी हेराल्ड'' की सामग्री के लिए पूरी तरह जिम्मेदार थे, जिस आरोप से उन्होंने स्पष्ट इनकार किया।{{sfn|Seko|2020|p=134}} जांच के दौरान, अन्य असंतुष्ट कार्यकर्ताओं ने समाचार पत्र में चोर्नोविल की भूमिका के सबूत देने से भी इनकार कर दिया; अंततः सरकार ने अपने तर्कों के लिए ज़िनोविया फ्रांको जैसे अन्य व्यक्तियों के अनुमानों पर भरोसा किया।{{sfn|Derevinskyi 2017b}} चोर्नोविल ने भी साथी असंतुष्टों के खिलाफ किसी भी प्रकार के सबूत देने या जांचकर्ताओं के साथ सहयोग करने से साफ इनकार कर दिया। पूछताछ के दौरान, उन्होंने अपना यह दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि यह परीक्षण पूरी तरह अवैध था और अन्य असंतुष्टों से असंबंधित था{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} और उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी अपने निपटान में उपलब्ध सभी साधनों का उपयोग करते हुए, उनके खिलाफ "एक नरसंहार" की तैयारी कर रहे थे।{{sfn|Seko|2020|p=134}} इस परीक्षण के दौरान उनसे सौ से भी अधिक बार कड़ी पूछताछ की गई।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} अभियोजकों ने ब्लैकमेल का भी सहारा लिया, उनके रिश्तेदारों को गिरफ्तारी और शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी दी, लेकिन इस प्रयास का उल्टा ही असर हुआ और चोर्नोविल ने पूछताछ में सहयोग करने से पूरी तरह इनकार कर दिया।{{sfn|Bazhan|2018|p=35}}
चोर्नोविल द्वारा लेखन और वर्तनी के कई अलग-अलग परस्पर विरोधी रूपों के उपयोग ने उनके बचाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया, और उन्होंने यह तर्क देने के लिए इसका इस्तेमाल किया कि उन्हें पाठ के उचित भाषाई विश्लेषण के बिना ही दोषी ठहराया गया था।{{sfn|Seko|2020|p=134}} चोर्नोविल के इन तर्कों के बावजूद, के॰जी॰बी॰ ने ऐसे सबूतों को उजागर किया जो चोर्नोविल को समाचार पत्र शुरू करने और जांच को विफल करने के स्पष्ट उद्देश्य से इसकी तस्करी का समन्वय करने में पूरी तरह फंसाते थे; लेकिन वे निर्णायक रूप से यह साबित करने में विफल रहे कि चोर्नोविल ही इसके मुख्य संपादक थे। चोर्नोविल के सेल में गुप्त रूप से सुनने वाले उपकरण लगाए गए थे, इसलिए सुरक्षा सेवा को यह भी पता चल गया कि यदि उन्हें यूक्रेन के बाहर निर्वासन में भेजा जाता है तो उनका इरादा भूख हड़ताल की घोषणा करने का था, और वे सोवियत संघ छोड़कर यूगोस्लाविया जाने की अनुमति चाहते थे।{{sfn|Bazhan|2018|p=35}}
चोर्नोविल के परीक्षण के समापन पर दी गई सजा काफी विवादित रही है; [[एमनेस्टी इंटरनेशनल]] ने 1977 में कहा था कि उन्हें सात साल के कारावास और पांच साल के निर्वासन की कड़ी सजा सुनाई गई थी;{{sfn|Amnesty International 1977}} मार्च 1973 में ''द न्यूयॉर्क टाइम्स'' ने दावा किया कि उन्हें दोनों के बीच अंतर किए बिना सीधे बारह साल के कारावास और निर्वासन के अधीन किया गया था;{{sfn|The New York Times 1973}} 2015 में एनसाइक्लोपीडिया ऑफ यूक्रेन ने दावा किया कि उन्हें छह साल के कारावास और तीन साल के आंतरिक निर्वासन की अवधि मिली थी,{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} जिसे इतिहासकार बोहदान पास्का{{sfn|Paska|2018|p=141}} और ओलेह बाज़ान ने भी समान रूप से स्वीकार किया। बाज़ान के अनुसार, चोर्नोविल को 8 अप्रैल 1973 को ल्वीव ओब्लास्ट कोर्ट द्वारा सजा सुनाई गई थी,{{sfn|Bazhan|2018|p=35}} यद्यपि चोर्नोविल ने 1974 में याद किया था कि उन्हें 12 अप्रैल को सजा सुनाई गई थी।{{sfn|Chornovil|1976|p=58}} चोर्नोविल ने अपने मामले के संबंध में उच्च न्यायालयों में तीन अपीलें दायर कीं; पहली दो को खारिज कर दिया गया, जबकि तीसरी को आंशिक रूप से औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया - हालांकि चोर्नोविल की अंतिम सजा में कोई बदलाव नहीं किया गया।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}}
==== मोर्दोविया में कारावास (1972-1978) ====
अपनी दोषसिद्धि के बाद, चोर्नोविल को मोर्दोवियन स्वायत्त सोवियत समाजवादी गणराज्य में एक सुधारात्मक श्रम कॉलोनी में भेज दिया गया। 1973 से 1978 तक उन्हें विभिन्न रूप से दो कठोर शिविरों में कैद रखा गया था; ZhKh-385/17-अ और ZhKh-385/3।{{sfn|Shvydkyi|2013}} अपने अमानवीय कारावास के बावजूद, चोर्नोविल ने सक्रिय रूप से कैदियों के विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करना जारी रखा, जिसके कारण लेखक और असंतुष्ट मिखाइल खेइफेट्स द्वारा उन्हें "ज़ेकों (कैदियों) के जनरल" का उपनाम दिया गया। उन्हें अन्य कैदियों से पूरी तरह अलग कर दिया गया और उन नियमों का पालन करने से इनकार करने के बाद उन्हें कड़ी निगरानी में रखा गया जिनका सभी कैदियों को पालन करना अनिवार्य था।{{sfn|Kheifets|2018}} बी॰ एज़र्निकोव और एल॰ कामिंस्की, दो रिफ्यूसेनिक जिन्हें चोर्नोविल के समान ही शिविर में कैद किया गया था, ने भी उन्हें "सभी राजनीतिक कैदियों के बीच महान अधिकार" रखने वाले एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में वर्णित किया, और 1975 में सोवियत संघ छोड़ने के बाद वैश्विक समाज से उनकी रिहाई का आग्रह करते हुए एक खुला पत्र भी लिखा।{{sfn|Fedunyshyn|2021|pp=119–120}}
उनके कारावास के दौरान चोर्नोविल की गतिविधियों ने अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना जारी रखा। उन्हें मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा 'अंतरात्मा का बंदी' के रूप में मान्यता दी गई थी,{{sfn|Amnesty International 1977}} और 1975 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरे वाले लेखकों को मान्यता देने वाले निकोलस टोमालिन पत्रकारिता पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।{{sfn|Chornovil|1976|p=57}} इसी समय के आसपास, चोर्नोविल ने अपने लेखन को जेल से बाहर तस्करी करना भी शुरू कर दिया था, और सोवियत मानवाधिकारों के हनन को प्रदर्शित करने के साधन के रूप में इस अवसर का भरपूर उपयोग किया।{{sfn|Fedunyshyn|2021|p=120}} उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड को एक पत्र लिखकर सोवियत संघ में मानवाधिकारों की दिशा में बढ़े हुए ध्यान के साथ 'डिटेंटे' की नीति का मिलान करने का आग्रह किया, यह आरोप लगाते हुए कि सोवियत अधिकारियों ने असंतुष्ट आवाजों को बेरहमी से दबाने के साधन के रूप में इसका इस्तेमाल किया था।{{sfn|Chornovil|1975}} उन्होंने आगे उनसे जैक्सन-वैनिक संशोधन का पूर्ण समर्थन करने का आग्रह किया, जिसने देश से प्रवासन की स्वतंत्रता की अनुमति देने के प्रयास में सोवियत संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था।{{sfn|Fedunyshyn|2018|pp=201–202}} बोरिस पेंसन के साथ मिलकर, उन्होंने ''समिज्दात'' पुस्तिका "डेली लाइफ इन द मोर्दोवियन कैंप्स" लिखी, जिसे यरूशलेम ले जाया गया और रूसी में प्रकाशित किया गया, इससे पहले कि अगले वर्ष म्यूनिख स्थित ''सुचास्निस्ट'' पत्रिका में इसका यूक्रेनी में अनुवाद किया गया।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}}
हेलसिंकी समझौते 30 जुलाई और 1 अगस्त 1975 के बीच हस्ताक्षरित किए गए थे। हस्ताक्षरकर्ता देशों में संपूर्ण यूरोप, सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा शामिल थे।{{sfn|Commission on Security and Cooperation in Europe 2019}} सोवियत संघ में, इस हेलसिंकी समझौते को असंतुष्टों के लिए एक नई शुरुआत के रूप में देखा गया, जिन्होंने पाया कि उनके पास अब सोवियत मानवाधिकारों के हनन को उजागर करने का एक साधन था।{{sfn|Marynovych|2021|p=86}} कीव में एक असंतुष्ट माइकोला रुडेंको ने उस उद्देश्य के लिए 9 नवंबर 1975 को यूक्रेनी हेलसिंकी समूह (UHG) के गठन की ऐतिहासिक घोषणा की।{{sfn|Marynovych|2021|p=90}} चोर्नोविल समूह की स्थापना के समय जेल में थे और 1979 तक वे इसमें शामिल नहीं हुए थे।{{sfn|Marynovych|2021|p=102}}
मोरोज़ और अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ, चोर्नोविल की प्रतिरोध गतिविधियाँ UHG की स्थापना के बाद भी निर्बाध जारी रहीं। दोनों ने 12 जनवरी 1977 की भूख हड़ताल में भाग लिया, जिसमें उन्होंने अपने गैर-अनुरूपतावादी दृष्टिकोणों के आधार पर उत्पीड़न को पूरी तरह समाप्त करने का आह्वान किया। हालाँकि, इस समय, यूक्रेनी राजनीतिक कैदियों के बीच एक बड़ा विभाजन बन रहा था कि क्या सोवियत जेल प्रणाली का सक्रिय रूप से विरोध करना बेहतर था या वे जो आत्म-संरक्षण का पक्ष लेते थे। के॰जी॰बी॰ के प्रभाव से, दोनों गुट खुलकर आपस में भिड़ने लगे। मोरोज़ और शुमुक से अलग एक शिविर में कैद चोर्नोविल ने इस संघर्ष में पक्ष लेने से साफ इनकार कर दिया और एक मध्यस्थ के रूप में कार्य किया। 1977 की शुरुआत में, एक अस्पताल में शुमुक के साथ बैठक के दौरान, चोर्नोविल ने पूर्व पर मोरोज़ के साथ अपने संघर्ष को कृत्रिम रूप से तेज करने का आरोप लगाया, और कनाडाई परिवार के सदस्यों को शुमुक के पत्रों की तुलना सीधे पुलिस शिकायतों के समकक्ष की। जेल से रिहाई के बाद, चोर्नोविल ने शुमुक और मोरोज़ दोनों पर उनके अहंकारी रवैये के परिणामस्वरूप इस विवाद के लिए समान रूप से जिम्मेदार होने का आरोप लगाया।{{sfn|Paska|2018|pp=141–142}}
==== याकूतिया वापसी (1978-1980) ====
चोर्नोविल को जेल से रिहा कर दिया गया और 1978 की शुरुआत में उन्हें फिर से चप्पनदा भेज दिया गया। वहाँ, उन्होंने सोवियत संघ के भीतर राजनीतिक कैदियों की स्थिति और मानवाधिकारों के बारे में अपना लेखन जारी रखा।{{sfn|Zakharov|2005}} वे मोरोज़ और शुमुक के बीच चल रहे संघर्ष में भी शामिल होते रहे; मोरोज़ की पत्नी रायसा को लिखे एक पत्र में, उन्होंने शुमुक के सार्वजनिक "बहिष्कार" का आह्वान किया, जबकि यह तर्क दिया कि मोरोज़ अब अनम्य हो रहे थे। मोरोज़ के नौ साल के लंबे कारावास ने उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित किया था; चोर्नोविल ने उन्हें आत्म-प्रशंसक और संकीर्ण बताया। अपने निर्वासन के दौरान, मोरोज़ के साथ चोर्नोविल की मित्रता भी समाप्त हो गई क्योंकि पूर्व ने शुमुक के साथ संघर्ष के कारण बाद वाले से खुद को दूर करने की कड़ी मांग की थी।{{sfn|Paska|2018|p=142}}
अपने निर्वासन के दौरान, चोर्नोविल ने सोवियत अधिकारियों को पत्र भेजना जारी रखा। सोवियत संघ के अभियोजक जनरल को लिखे 10 अप्रैल 1978 के एक पत्र में, उन्होंने इस तथ्य की घोर आलोचना की कि सोवियत संविधान द्वारा सैद्धांतिक रूप से दिए गए व्यापक अधिकार वास्तविकता में पूरी तरह अनुपस्थित थे, यह पूछते हुए कि "सोवियत कानून क्यों मौजूद हैं?"।{{sfn|Fedunyshyn|2018|p=202}} उन्होंने "ओनली वन ईयर" नामक एक ''समिज्दात'' पैम्फलेट भी लिखा,{{sfn|Matiash|2017|p=13}} और उन्हें उस वर्ष पीईएन इंटरनेशनल में भर्ती कराया गया।{{sfn|Zakharov|2005}} उस समय, वे निउर्बा में एक खेत में एक मजदूर के रूप में काम कर रहे थे,{{sfn|Matiash|2017|p=13}} जहाँ उन्हें अक्टूबर 1979 में भेजा गया था। पहले की तरह, चोर्नोविल के ''समिज्दात'' कार्यों में से अधिकांश ने मानवाधिकारों के हनन और अंतरात्मा के बंदियों द्वारा सामना की जाने वाली स्थितियों को चित्रित करने का महत्वपूर्ण काम किया।{{sfn|Ostrovskyi 2018a|pp=110–111}}
चोर्नोविल 22 मई 1979 को अपने निर्वासन से यूक्रेनी हेलसिंकी समूह (UHG) में शामिल हुए।{{sfn|Marynovych|2021|p=102}} नवंबर 1979 से मार्च 1980 तक उन्हें के॰जी॰बी॰ द्वारा निरंतर निगरानी में रखा गया था, जिसने यह दर्ज किया कि उन्होंने असंतुष्टों मिखाइलो होरिन, ओक्साना मेश्को और इवान सोकुलस्की के साथ संपर्क स्थापित किया था। उन्होंने कई अन्य व्यक्तियों से भी संपर्क किया जो यूक्रेन के ओब्लास्ट में UHG के अध्याय स्थापित करना चाहते थे। चोर्नोविल के अज्ञात, मेश्को, जो उस समय UHG के नेता थे, वे भी भारी के॰जी॰बी॰ निगरानी में आ गए थे, और उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को रोकने के लिए व्यक्तियों को प्रवेश देना बंद कर दिया था। एक प्रमुख UHG सदस्य ज़ेनोविय क्रासिव्स्की ने कैद और निर्वासित असंतुष्टों से मिलने के लिए पेट्रो रोज़ुमनी को भेजा। उनमें चोर्नोविल भी थे, जिन्हें UHG के प्रमुख के रूप में मेश्को को बदलने के लिए विशेष रूप से कहा गया था।{{sfn|Ostrovskyi 2018a|pp=110–111}}
==== बलात्कार के प्रयास के लिए गलत सजा (1980-1985) ====
चोर्नोविल को 8,{{sfn|Kryzhanovska|2022}} 9,{{sfn|A Chronicle of Current Events 1983}} या 15{{sfn|Shvydkyi|2013}} अप्रैल 1980 को बलात्कार के प्रयास के घिनौने आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया था। यूक्रेनी इतिहासलेखन में इन आरोपों को अक्सर मनगढ़ंत के रूप में वर्णित किया जाता है,{{sfn|Shvydkyi|2013}}{{sfn|Kryzhanovska|2022}}{{sfn|Matiash|2017|p=14}} और इसी तरह अमेरिकी पत्रिका ''[[टाइम (पत्रिका)|टाइम]]'' द्वारा भी इसे संदर्भित किया गया था।{{sfn|Blake|1980}} मायकोला होरबल, यारोस्लाव लेसियव और योसिफ़ ज़िसेल्स सहित कई अन्य प्रमुख असंतुष्टों को उस समय इसी तरह के फर्जी आरोप मिले थे। UHG के सदस्य मायरोस्लाव मैरिनोविच ने एक के॰जी॰बी॰ अधिकारी के हवाले से कहा कि "हम विशेष रूप से राजनीतिक आरोपों पर व्यक्तियों को गिरफ्तार करके अब कोई नया शहीद नहीं बनाएंगे।"{{sfn|Marynovych|2021|p=115}} चोर्नोविल की गिरफ्तारी, साथ ही यूक्रेन और पूरे सोवियत संघ के कई अन्य असंतुष्टों की गिरफ्तारी, मैड्रिड में यूरोप में सुरक्षा और सहयोग पर सम्मेलन की एक बैठक के ठीक बीच हुई, और ''टाइम'' ने कहा कि कुछ पर्यवेक्षकों का यह मानना था कि हेलसिंकी समझौते के प्रति सोवियत नाराजगी प्रदर्शित करने के लिए ही ये गिरफ्तारियां की गई थीं।{{sfn|Blake|1980}}
अपनी गिरफ्तारी के बाद, चोर्नोविल ने भूख हड़ताल की घोषणा कर दी,{{sfn|A Chronicle of Current Events 1983}} और अपनी तथा दूसरों की गिरफ्तारी को लेनिनवादी आदर्शों के घोर विपरीत और 1980 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की अगुवाई में असंतोष को दबाने के प्रयास के रूप में चित्रित किया।{{sfn|Chornovil|2007|p=673}} उन्हें याकूतिया के तबागा में एक जेल शिविर में ले जाया गया, जहाँ उन्हें उल्टी और मल से सने एक अत्यंत गंदे सेल में रखा गया था। एक समय पर, उन्हें एक "मनोरंजन कक्ष" में स्थानांतरित कर दिया गया था, जहाँ उनकी पानी तक कोई पहुँच नहीं थी। अपनी भूख हड़ताल के परिणामस्वरूप शक्ति की भारी कमी के कारण, चोर्नोविल जेल के शौचालय तक पहुँचने के लिए चारों हाथों-पैरों के बल रेंगते थे, जो उनके सेल से एक मंजिल नीचे और जेल के यार्ड के पार स्थित था। कई बार, वे थकावट से बेहोश हो गए, और पहरेदारों द्वारा उन पर पानी डालकर जगाए गए। चोर्नोविल को अपना यह विरोध तब रोकना पड़ा जब डॉक्टरों ने कड़ी चेतावनी दी कि यदि उन्होंने भोजन से इनकार करना जारी रखा तो शिविर में एक महामारी के दौरान अनुबंधित पेचिश के लिए उनका इलाज नहीं किया जाएगा। इस हड़ताल के लिए, चोर्नोविल को 5 से 21 नवंबर 1980 तक एकांतवास में रखा गया था।{{sfn|A Chronicle of Current Events 1983}} उन्हें मिर्नी शहर में एक बंद अदालत द्वारा दोषी पाया गया और पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई।{{sfn|Shvydkyi|2013}}
चोर्नोविल ने जेल में लिखना जारी रखा, जिसमें सी॰पी॰एस॰यू॰ की 26वीं कांग्रेस को लिखा गया फरवरी 1981 का एक खुला पत्र शामिल है, जिसमें उन्होंने महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और के॰जी॰बी॰ अध्यक्ष यूरी एंड्रोपोव पर UHG के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन करने का सीधा आरोप लगाया था। उन्होंने अपनी पत्नी को भी लिखा, और कांग्रेस के प्रति असंतुष्टों की प्रतिक्रियाओं में "कोई भी समझौता नहीं" करने का आग्रह किया। उन्होंने 9 अप्रैल 1981 को एक और पत्र लिखा, इस बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति, एमनेस्टी इंटरनेशनल, कमिटी फॉर द फ्री वर्ल्ड और हेलसिंकी कमिटी फॉर ह्यूमन राइट्स को, सोवियत संघ के प्रति अपनी कूटनीतिक नीतियों को तैयार करने में UHG के सोवियत उत्पीड़न की दिशा में अधिक ध्यान बढ़ाने का आग्रह किया।{{sfn|Fedunyshyn|2018|pp=202–203}} 1983 में चोर्नोविल को रिहा कर दिया गया, लेकिन उन्हें यूक्रेन लौटने से सख्त रोक दिया गया। वे पोक्रोव्स्क शहर में ही रहे,{{sfn|Shvydkyi|2013}} एक फायर स्टोकर के रूप में काम करते हुए।{{sfn|Matiash|2017|p=14}} अंततः 15 अप्रैल 1985 को{{sfn|Shvydkyi|2013}} नए महासचिव मिखाइल गोर्बाचेव ने चोर्नोविल को ''पेरेस्त्रोइका'' के हिस्से के रूप में यूक्रेन लौटने की अनुमति प्रदान की।{{sfn|Ivanova|2024}}{{sfn|Kulchytskyi|2019|p=50}} चोर्नोविल ने सोवियत सरकार द्वारा कुल 15 साल कैद में बिताए थे।{{sfn|Ivanova|2024}}
=== यूक्रेन वापसी ===
जब तक चोर्नोविल यूक्रेन लौटे, तब तक देश नाटकीय रूप से बदल चुका था। यूक्रेन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम सचिव पेट्रो शेलेस्ट, जो एक उदारवादी नेता थे, को हटा दिया गया और उनकी जगह कट्टरपंथी वलोडिमिर शेर्बित्स्की को नियुक्त किया गया, जो ब्रेझनेव के निप्रॉपेट्रोस माफिया के एक सदस्य थे। शेर्बित्स्की ने रूसीकरण नीतियों और यूक्रेनी संस्कृति पर नकेल कसने को नाटकीय रूप से बढ़ा दिया था। आंशिक रूप से शेर्बित्स्की की नीतियों के परिणामस्वरूप, 1982 में ब्रेझनेव की मृत्यु के समय तक, जोसेफ स्टालिन के शासन के दौरान ब्रेझनेव के नेतृत्व में यूक्रेनी में बहुत कम किताबें प्रकाशित हुई थीं।{{sfn|Kuzio|2010}} यूक्रेनी संस्कृति में इस भारी गिरावट के साथ-साथ 1986 की [[चेर्नोबिल दुर्घटना]] के प्रति सरकार की धीमी प्रतिक्रिया ने जनमत को बुरी तरह खराब कर दिया और चोर्नोविल को कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए प्रेरित किया।{{sfn|Poberezhets|2013|p=115}}
गोर्बाचेव के सुधारों के बावजूद, सोवियत सरकार ने चोर्नोविल और अन्य असंतुष्टों के खिलाफ हस्तक्षेप करना जारी रखा था। 1987 में राज्य ने चोर्नोविल के खिलाफ एक मानहानि अभियान शुरू किया, जिसका आंशिक कारण शेर्बित्स्की के रूसीकरण के प्रयासों पर आंतरिक असंतोष था{{sfn|Bilyk|2019|pp=14–15}} और आंशिक रूप से मॉस्को का भारी दबाव था।{{sfn|Danylenko|2019|pp=27-28}} ''द यूक्रेनी हेराल्ड'', जिसे अगस्त 1987 में फिर से लॉन्च किया गया था और जिसमें प्रमुख विपक्षी-दिमाग वाले बुद्धिजीवियों के निबंध प्रकाशित किए गए थे,{{sfn|Kipiani|2002}} ने "विदेशी विध्वंसक सुरक्षा एजेंसियों" द्वारा समर्थित होने के राज्य-समर्थित आरोपों को बहुत आकर्षित किया।{{sfn|Kipiani|2011}} उसी समय के आसपास, चोर्नोविल ने ''द यूक्रेनी वीकली'' को एक विस्तृत साक्षात्कार दिया, जिसमें उन्होंने धर्म और यूक्रेनी संस्कृति के प्रति असंतुष्ट आंदोलन के दृष्टिकोण को स्वतंत्र रूप से स्पष्ट किया। सरकार ने चोर्नोविल और असंतुष्ट आंदोलन की छवि को धूमिल करने के प्रयास में टेलीविजन पर बातचीत के कुछ क्लिप प्रसारित किए, लेकिन इस प्रयास का उल्टा ही असर हुआ। मार्था कोलोमियट्स, वे पत्रकार जिन्होंने चोर्नोविल से बात की थी, को बाद में एक "अमेरिकी सबोटूर" के रूप में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन तब तक यह साक्षात्कार पहले ही व्यापक रूप से प्रचारित और साझा किया जा चुका था।{{sfn|Bila|2020}} दिसंबर में, शेर्बित्स्की के कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें विपक्ष की, विशेष रूप से चोर्नोविल की के॰जी॰बी॰ निगरानी बढ़ाने का वादा किया गया था, जिसने प्रिंट और प्रसारण मीडिया दोनों से हमलों की एक नई लहर देखी।{{sfn|Danylenko|2019|pp=27-28}} ल्वीव स्थित ''फ्री यूक्रेन'' समाचार पत्र में प्रकाशित एक राय-संपादकीय में, चोर्नोविल ने इन उपायों की कड़ी आलोचना की और कहा कि उनके और मिखाइलो होरिन के साथ किया गया व्यवहार 15 साल पहले अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन के व्यवहार के बिल्कुल बराबर था।{{sfn|Chornovil|2011|pp=81–82}}
मानवाधिकार गतिविधियाँ उनकी रिहाई के बाद चोर्नोविल के अथक प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण फोकस बनी रहीं। चोर्नोविल और होरिन वासिल बारलादियानु, गेल, ज़ोरियन पोपादियुक, और स्टीफन खमारा के साथ आपराधिक संहिता से सोवियत विरोधी आंदोलन को पूरी तरह हटाने और सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई और पुनर्वास की वकालत करने में शामिल हुए।{{sfn|Kharkiv Human Rights Protection Group 2006}} 24 फरवरी 1987 को, उन्होंने मॉस्को के के॰जी॰बी॰ मुख्यालय, लुब्यंका भवन की यात्रा की, जहाँ उन्होंने इन मांगों को मजबूती से दोहराया और जब्त की गई संपत्ति को वापस करने का आग्रह किया। लुब्यंका में रहते हुए, उन्होंने घोषणा की कि, रूस के ईसाईकरण (1988) की 1000वीं वर्षगांठ के आधिकारिक समारोहों के जवाब में, असंतुष्ट आंदोलन 1946 के ल्वीव धर्मसभा के फैसले को उलटने के लिए एक अभियान शुरू करेगा जिसने यूक्रेनी ग्रीक कैथोलिक चर्च का रूसी रूढ़िवादी चर्च में विलय कर दिया था।{{sfn|Danylenko|2019|p=26}} हालाँकि, सरकार ने उनकी सभा की स्वतंत्रता में भारी हस्तक्षेप किया - उदाहरण के लिए, चोर्नोविल को ल्वीव में एक "निवारक" साक्षात्कार के लिए बुलाकर सोवियत संघ के भीतर गैर-रूसी देशों के अधिकारों पर एक नियोजित दिसंबर 1987 के संगोष्ठी में भाग लेने से रोक दिया गया था, जहाँ उन्हें "असामाजिक" गतिविधियों में शामिल होने के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी गई थी।{{sfn|Danylenko|2019|pp=26-27}}
11 मार्च 1988 को, चोर्नोविल ने औपचारिक रूप से होरिन और क्रासिव्स्की द्वारा सह-हस्ताक्षरित एक पत्र में यूक्रेनी हेलसिंकी समूह (UHG) को फिर से स्थापित किया, हालांकि समूह ने पिछले वर्ष की गर्मियों में ही अपनी गतिविधि फिर से शुरू कर दी थी और चोर्नोविल का ''हेराल्ड'' इसका प्रेस अंग था।{{sfn|Zakharov|2005}} इस समय तक, लायंस सोसाइटी, ''स्पाद्शच्यना'', और यूक्रेनी कल्टूरोलॉजिकल क्लब जैसे कई स्वतंत्र संगठन अस्तित्व में थे। असंतुष्ट आंदोलन की खंडित प्रकृति ने चोर्नोविल को अप्रैल 1988 में एक ही संरचना में संगठनों को एक साथ लाना शुरू करने के लिए प्रेरित किया।{{sfn|Krupnyk|2019|p=45}}
[[File:Гельсінська спілка-1.jpg|alt=सूट में ग्यारह पुरुषों की एक तस्वीर|thumb|1989 में यूक्रेनी हेलसिंकी संघ की डोनेट्स्क शाखा के सदस्यों के साथ चोर्नोविल]]
चोर्नोविल ने 7 जून 1988 को यूक्रेनी हेलसिंकी संघ (UHS) की स्थापना की। यह सोवियत यूक्रेन में पहली स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी थी।{{sfn|Krupnyk|2019|pp=45-46}} चोर्नोविल ने पार्टी के मंच के सह-लेखक बने और उसे प्रस्तुत किया,{{sfn|Kobuta|2020|pp=36–37}} जिसने सोवियत राज्यों के परिसंघीय ढांचे के भीतर यूक्रेनी स्वतंत्रता का आह्वान किया। घोषणापत्र में यह तर्क दिया गया कि यूक्रेनी स्वतंत्रता से यूक्रेनियन और गैर-यूक्रेनियन दोनों को समान रूप से लाभ होगा, लेकिन परिसंघ के बारे में बिंदु जोड़ा ताकि UHS को अलगाववादी के रूप में प्रतिबंधित होने से रोका जा सके।{{sfn|Krupnyk|2019|p=46}}
इस समय अवधि के दौरान चोर्नोविल की गतिविधियाँ केवल यूक्रेन तक ही सीमित नहीं थीं; उन्होंने अन्य असंतुष्टों के साथ भी व्यापक संपर्क बनाए रखा, विशेष रूप से बाल्टिक राज्यों, आर्मेनिया और जॉर्जिया के असंतुष्टों के साथ। यूक्रेनी के॰जी॰बी॰ के 8 सितंबर 1988 के एक आंतरिक नोटिस ने गुर्गों को सूचित किया कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक कैदियों के संरक्षण के लिए समिति नामक एक संगठन मौजूद है। इस समिति की स्थापना चोर्नोविल और अर्मेनियाई असंतुष्ट पिरुयर हेयरिकयान द्वारा जनवरी 1988 में की गई थी, और यह सोवियत विरोधी आंदोलन कानून को निरस्त करने, जेल शिविरों और मनोरोग अस्पतालों को बंद करने के प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल थी, और यूक्रेन और सोवियत संघ के भीतर अन्य देशों के राष्ट्रवादी आंदोलनों के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध थी।{{sfn|Krupnyk|2019|pp=46-47}} 24-25 सितंबर को, चोर्नोविल ने रीगा में असंतुष्ट समूहों के एक सम्मेलन में UHS का प्रतिनिधित्व किया। चोर्नोविल ने सम्मेलन का समापन बयान लिखा, जिसमें सभी "राष्ट्रीय लोकतांत्रिक आंदोलनों" से एक संयुक्त मोर्चा बनाने और बैनर के तहत विरोध करने का पुरजोर आग्रह किया गया।{{sfn|Krupnyk|2019|p=47}}
==== क्रांति ====
[[File:В.М.Чорновіл на шахті ім. Поченкова. 2.JPG|alt=चोर्नोविल अपने आसपास हड़ताली श्रमिकों से बात कर रहे हैं|thumb|1990 के दशक में माकिव्का खदान की बैठक में हड़ताली श्रमिकों के साथ चोर्नोविल]]
पूरे 1988 और 1989 में मध्य और पूर्वी यूरोप में चल रही 1989 की क्रांतियों ने चोर्नोविल को बहुत दिलचस्पी दी, विशेष रूप से अहिंसा के पालन में। उनकी सफलता ने चोर्नोविल को कम्युनिस्ट-विरोधी के पक्ष में मार्क्सवाद-लेनिनवाद के लिए अपने सार्वजनिक समर्थन को त्यागने के लिए प्रेरित किया, जिसका उन्होंने 1960 के दशक के मध्य से निजी तौर पर समर्थन किया था, लेकिन एक उदारवादी के रूप में प्रकट होने के प्रयास में इसे सार्वजनिक रूप से बताने से परहेज किया था।{{sfn|Seko|2019|p=124}} अन्य यूक्रेनी बुद्धिजीवियों ने भी कम्युनिस्ट-विरोधी समर्थन करना शुरू कर दिया, और राइटर्स यूनियन ऑफ यूक्रेन ने 1988 के अंत में एक लोकप्रिय मोर्चा विकसित करना शुरू किया, इसे स्थानीय सरकार में अधिक सक्रिय होने और आर्थिक चिंताओं में अधिक रुचि लेने के लिए जनता को प्रोत्साहित करने के रूप में न्यायोचित ठहराया।{{sfn|Adamovych|2020|p=8}} चोर्नोविल ने सोवियत संघ में एक मानवाधिकार आंदोलन, मेमोरियल, को यूक्रेन में फैलाने का भी समर्थन किया, और मार्च 1989 में इसकी स्थापना पर समूह के यूक्रेनी अध्याय के प्रेसिडियम को एक सकारात्मक पत्र लिखा।{{sfn|Chornovil|2009|pp=476–477}}
18 जुलाई 1989 को, पूरे संघ में खनन हड़तालों की लहर पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र के माकिव्का शहर में कोयला खनिकों तक पहुँच गई।{{sfn|Lykhobova|Kuzina|2009|pp=155–156}}{{sfn|Safire|1989}} कर्मचारियों ने पहले बेहतर काम करने की स्थिति, बेहतर मजदूरी और बढ़ी हुई सामाजिक सुरक्षा की मांग की। हालाँकि, शुरुआत से ही, कई डोनबास खनिकों ने स्व-शासन के संभावित मार्ग के रूप में सहानुभूति के साथ यूक्रेनी स्वतंत्रता आंदोलन को भी देखा था।{{sfn|Walkowitz|1991}} चोर्नोविल ने अपने शुरुआती दिनों से ही हड़तालों का समर्थन किया, एक बयान जारी करते हुए कहा, अन्य बातों के अलावा, कि हड़ताल ने "पार्टी और लोगों की एकता के बारे में पार्टी की लफ्फाजी का पर्दा फाड़ दिया", जिसका कम्युनिस्टों ने दावा किया कि वहां विभिन्न "चरमपंथियों" द्वारा हमला किया जा रहा था।{{sfn|Radio Liberty 2014}} दूसरी ओर, शेर्बित्स्की खुश नहीं थे और सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया में हड़तालियों को बदनाम करके और हड़ताल समितियों के लिए संचार काट कर उन पर कड़ी नकेल कसी।{{sfn|Walkowitz|1991}} इसने खनिकों को कट्टरपंथी बना दिया, जिन्होंने जल्द ही शेर्बित्स्की के इस्तीफे का आह्वान करना शुरू कर दिया।{{sfn|Radio Liberty 2021}}
मार्च 1990 के लिए निर्धारित सर्वोच्च सोवियत के चुनाव करीब आने के साथ, चोर्नोविल ने अभियान मोड में स्विच किया। उनके घोषणापत्र ने "राज्य का दर्जा, लोकतंत्र और स्वशासन" और गैर-जातीय यूक्रेनियनों के साथ सहयोग का आह्वान किया। चोर्नोविल के कार्यक्रम की आधारशिला बारह "भूमि" पर आधारित एक संघीय यूक्रेन का उनका विचार था, जिसे मोटे तौर पर यूक्रेनी जनवादी गणराज्य के गवर्नरेट और डोनबास के लिए एक अलग भूमि द्वारा परिभाषित किया गया था। क्रीमिया को एक स्वतंत्र राज्य या यूक्रेन के स्वायत्त गणराज्य के रूप में मौजूद होना था। विधायिका को एक द्विसदनीय केंद्रीय राडा के रूप में फिर से स्थापित किया जाना था, निचले सदन को आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा चुना जाना था और ऊपरी सदन को भूमि से चुना जाना था।{{sfn|Chornovil|2009|pp=580–583}} चोर्नोविल का मानना था कि संघवाद यूक्रेन और उसके क्षेत्रों को सोवियत संघ से स्वतंत्र अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राजनीति विकसित करने की अनुमति देगा और सोवियत शैली की नौकरशाही की स्थापना को रोकेगा।{{sfn|Derevinskyi|2023|pp=54–55}} चोर्नोविल इस समय UHS के भीतर स्वतंत्रता-समर्थक पदों को अपनाने पर जोर देने वाले प्राथमिक व्यक्तियों में से एक थे, यह प्रस्ताव करते हुए कि पार्टी के कार्यक्रम में स्वतंत्रता का प्रश्न प्रस्तावित किया जाए।{{sfn|Derevinskyi|2023|p=335}}
[[File:1съезд.jpg|alt=एक सम्मेलन में एकत्रित कई व्यक्ति, उनमें से कुछ यूक्रेनी झंडे लहरा रहे हैं|thumb|left|यूक्रेन के जन आन्दोलन की पहली कांग्रेस सितंबर 1989 में हुई थी]]
8 सितंबर 1989 को, यूक्रेन का जन आन्दोलन (रूख) की स्थापना यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ की राज्य भाषा के रूप में यूक्रेनी की स्थापना, एक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पुनरुद्धार, और यूक्रेनी स्वशासन के साथ-साथ यूक्रेन के भीतर अल्पसंख्यकों के लिए भाषाई अधिकारों को मजबूत करने की वकालत करने वाले एक कार्यक्रम के साथ की गई थी। ये पद राइटर्स यूनियन के लोगों पर आधारित थे, जिन्होंने उस वर्ष फरवरी में उन्हें अपनाया था।{{sfn|Adamovych|2020|pp=8–9}} पूरी तरह से "पेरेस्त्रोइका के लिए यूक्रेन का जन आन्दोलन" के रूप में नामित, इसके पहले नेता कवि इवान ड्रेच थे। इसके बावजूद, हालाँकि, चोर्नोविल पार्टी के वास्तविक नेता थे और इतिहासकार रोमन ह्रीत्स्किंव के अनुसार, इसकी स्थापना का आयोजन भी उन्हीं ने किया था।{{sfn|Popovych|2023}} चोर्नोविल ने कट्टरपंथी और स्वतंत्रता के उदारवादी समर्थकों को फिर से जोड़ते हुए, 'रूख' को यूक्रेनी राष्ट्रवादियों के जन आंदोलन में बदलने की मांग की।{{sfn|Derevinskyi|2023|p=10}}
संयोग से, खनिकों की हड़ताल{{sfn|Radio Liberty 2021}} और गोर्बाचेव के दबाव के संयोजन के कारण शेर्बित्स्की को उसी महीने इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था।{{sfn|Senkus|2007}}
चोर्नोविल ने 1919 के एकीकरण अधिनियम की वर्षगांठ मनाते हुए, 22 जनवरी 1990 को ल्वीव से कीव तक एक मानव शृंखला आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।{{sfn|Adamovych|2018|p=3}} लगभग तीस लाख लोगों ने शृंखला में भाग लिया जो उस समय तक 'रूख' द्वारा किया गया सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था।{{sfn|Poberezhets|2011|p=288}} चोर्नोविल ने एकीकरण अधिनियम की वर्षगांठ को अवकाश के रूप में मान्यता देने की वकालत की।{{sfn|Adamovych|2018|p=3}}
== चोर्नोविल सत्ता में ==
{{Multiple image
| header = चोर्नोविल के आधिकारिक चित्र, [[यूक्रेन की संसद|संसद]]
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| caption1 = पहली (1990–1994)
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सोवियत यूक्रेन के इतिहास में पहला बहुदलीय मतदान, सर्वोच्च सोवियत चुनाव, 4 मार्च 1990 को आयोजित किया गया था। यह उच्च मतदान द्वारा चिह्नित किया गया था, जिसमें 85% पंजीकृत मतदाताओं ने भाग लिया था। अधिकांश यूक्रेन में, परिणाम कम्युनिस्टों के लिए फायदेमंद था, 90% पहले चुने गए प्रतिनिधि फिर से चुने गए और 450 प्रतिनिधियों में से 373 कम्युनिस्ट पार्टी के थे। हालाँकि, सभी तीन गैलिशियन ओब्लास्ट में, डेमोक्रेटिक ब्लॉक, एक 'रूख' नेतृत्व वाले गठबंधन{{sfn|Kozhanov|2020|p=44}} ने अधिकांश सीटें जीतीं। सुप्रीम सोवियत के उपाध्यक्ष के रूप में चुने गए इवान प्लियुश्च ने 2010 में लिखा था कि कम्युनिस्ट बहुमत संसदीय स्तर पर समान प्रभाव को कमान करने में असमर्थ था जैसा कि डेमोक्रेटिक ब्लॉक था।{{sfn|Kulchytskyi|2019|pp=51–52}} चोर्नोविल को ल्वीव शहर के शेवचेंकिव्स्की जिले से डेमोक्रेटिक ब्लॉक के उप-प्रतिनिधि के रूप में पूर्ण बहुमत से चुना गया, जिन्होंने सात अन्य उम्मीदवारों के खिलाफ 68.60% वोट जीते।{{sfn|1st Verkhovna Rada}} सुप्रीम सोवियत के भीतर, चोर्नोविल डेमोक्रेटिक ब्लॉक के कट्टरपंथी विंग के नेताओं में से थे।{{sfn|Fedunyshyn|2019|p=137}}
चोर्नोविल को अप्रैल 1990 में ल्वीव ओब्लास्ट परिषद का अध्यक्ष भी चुना गया, जिससे वे ल्वीव ओब्लास्ट के पहले गैर-कम्युनिस्ट प्रमुख बन गए।{{sfn|Fedunyshyn|2019|p=137}} उन्होंने जल्दी ही एक असंतुष्ट के रूप में जीवन से राजनीति में खुद को अनुकूलित कर लिया, दाईं ओर मुड़ते हुए और स्पष्ट रूप से कम्युनिस्ट-विरोधी क्रांति का समर्थन करने वाले पहले यूक्रेनी राजनेताओं में से एक बन गए।{{sfn|Seko|2018|p=174}} आर्थिक क्षेत्र में, उन्होंने आवास बाजार और प्रकाश उद्योग का निजीकरण किया, और सामूहिक खेतों को समाप्त करके और किसानों को भूमि पुनर्वितरित करके भूमि सुधार शुरू किए।{{sfn|Fedunyshyn|2019|p=137}} सामाजिक रूप से, उन्होंने यूक्रेन के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनरुद्धार का सक्रिय समर्थन किया; उनकी सरकार द्वारा सोवियत के बजाय यूक्रेनी प्रतीकों का उपयोग किया गया, यूक्रेनी विद्रोही सेना के सैनिकों को दिग्गजों के रूप में मान्यता दी गई, धर्मसभा ल्वीव द्वारा लगाए गए यूक्रेनी ग्रीक कैथोलिक चर्च पर प्रतिबंध निरस्त कर दिया गया और धार्मिक छुट्टियों को सार्वजनिक छुट्टियों के रूप में मान्यता दी गई।{{sfn|Adamovych|2018|p=3}} व्लादिमीर लेनिन की मूर्तियों को पहली बार चोर्नोविल की सरकार के तहत ध्वस्त किया गया था,{{sfn|Kobuta|2020|pp=37–38}} 1 जुलाई 1990 को चेर्वोनोग्राद में मूर्ति को गिरा दिया गया था। इसने 1990 और 1991 के दौरान गैलिसिया में लेनिन स्मारकों को गिराने की लहर शुरू कर दी।{{sfn|Gazeta.ua 2018}}
चोर्नोविल की नीतियां सीधे तौर पर यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ और सोवियत संघ के उस समय के कानूनों के विपरीत थीं, और यूक्रेनी और संघ-व्यापी सरकार-समर्थक मीडिया में उनकी सरकार की आलोचना की गई थी। इसके बावजूद, अन्य गैलिशियन ओब्लास्ट, जो 'रूख' के नियंत्रण में आ गए थे, ने जल्द ही सुधारों को आगे बढ़ाने में चोर्नोविल के उदाहरण का पालन किया।{{sfn|Kobuta|2020|pp=38–39}} इतिहासकार स्टीफन कोबुटा ने तर्क दिया है कि गैलिसिया द्वारा सोवियत कानूनों की अस्वीकृति चोर्नोविल के संघीय विश्वासों की अभिव्यक्ति थी।{{sfn|Kobuta|2020|p=39}} अपने लोकतांत्रिक लाभ को बनाए रखने और सोवियत राज्य संस्थानों का मुकाबला करने के लिए, गैलिशियन राष्ट्रीय डेमोक्रेट्स ने फरवरी 1991 में चोर्नोविल को इसके प्रमुख के रूप में नियुक्त करके गैलिशियन असेंबली का गठन किया।{{sfn|Muravskyi|2019|pp=139-140}}{{sfn|Semkiv|2014}}{{sfn|Adamovych|2018|p=3}}
सुप्रीम सोवियत के एक उप-प्रतिनिधि के रूप में, चोर्नोविल ने सोवियत संघ के भीतर यूक्रेन की संप्रभुता को स्वतंत्रता के अंतिम उद्देश्य के साथ-साथ भूमि सुधार, पर्यावरण संरक्षण, अल्पसंख्यक और धार्मिक अधिकारों, संघवाद और सरकार की एकमात्र भाषा के रूप में यूक्रेनी को स्थापित करने के लिए खुद को समर्पित किया।{{sfn|Kobuta|2020|p=37}} उन्हें सुप्रीम सोवियत के अध्यक्ष के लिए डेमोक्रेटिक ब्लॉक के उम्मीदवार के रूप में नामित किया गया था, हालांकि उन्होंने नामांकन को अस्वीकार कर दिया और गठबंधन के नेता, इहोर युखनोवस्की का समर्थन किया। अंततः, दोनों में से कोई भी नहीं चुना गया, क्योंकि कम्युनिस्टों ने व्लादिमीर इवाश्को के लिए मतदान किया।{{sfn|Kulchytskyi|2019|p=52}} मतदान के दौरान, चोर्नोविल ने खुले तौर पर सोवियत संघ से यूक्रेन की स्वतंत्रता का आह्वान किया, यह तर्क देते हुए कि उस समय यूक्रेन का सामना कर रहे "आर्थिक, पर्यावरणीय और आध्यात्मिक तबाही" को समाप्त करने का यह एकमात्र संभव तरीका था।{{sfn|Kobuta|2020|pp=37–38}}
चोर्नोविल ने संघवाद की वकालत करना जारी रखा, मई 1990 के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि "कीवन केंद्रवाद" डोनबास में रूसी राष्ट्रवाद और ज़कारपट्टिया ओब्लास्ट में रुसिन पहचान के उद्भव को जन्म देगा।{{sfn|Riabinin|2021|p=90}} उसी महीने, जैसे ही ग्रामीण ग्रीक कैथोलिक और रूढ़िवादी ईसाइयों के बीच संघर्ष छिड़ गया, ल्वीव ओब्लास्ट की सरकार ने यह निर्धारित करने के लिए गांवों में जनमत संग्रह कराने का प्रयोग किया कि किस संप्रदाय को चर्चों का नियंत्रण दिया जाएगा। चोर्नोविल द्वारा लिखे गए इस प्रस्ताव के अनुसार, बहुसंख्यक संप्रदाय अल्पसंख्यक की आस्था से संबंधित एक चर्च के निर्माण की जिम्मेदारी वहन करेगा। इस प्रणाली ने क्षेत्र में एक धार्मिक संघर्ष को उभरने से सफलतापूर्वक रोका।{{sfn|Yurash|2021|pp=134–135}}
12 जून 1990 को, रूस ने सोवियत संघ के भीतर राज्य संप्रभुता की घोषणा की। इसने डेमोक्रेटिक ब्लॉक द्वारा यूक्रेन की राज्य संप्रभुता की घोषणा पर मतदान पर जोर देने के प्रयासों को बढ़ावा दिया, जिसे कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों ने अवरुद्ध कर दिया था। घोषणा पर 5 जुलाई की बहस के दौरान, चोर्नोविल और साथी गठबंधन सदस्य मायखाइलो बतिह ने कम्युनिस्टों पर पार्टी द्वारा मतदान करने का तरीका बताने का आरोप लगाया। चोर्नोविल ने बाद में खुलासा किया कि कई प्रतिनिधियों को एक स्वतंत्र सेना या कानूनी प्रणाली की स्थापना जैसे उपायों को खत्म करने के लिए संप्रभुता पर मसौदा कानून में संशोधन करने के निर्देश मिले थे। इस खुलासे से कार्यवाहक सर्वोच्च सोवियत अध्यक्ष इवान प्लियुश्च ने एक जांच शुरू की, जो यह पता चलने के बाद तेज हो गई कि कई प्रतिनिधियों ने निर्देशों को शब्दशः उद्धृत किया था।{{sfn|Kulchytskyi|2019|pp=57–59}}
चोर्नोविल और एक अज्ञात कम्युनिस्ट उप-प्रतिनिधि ने तब घोषणा पर मतदान शुरू करने का प्रयास किया। प्लियुश्च ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि सोवियत संघ के पीपुल्स डिपुटीज के सदस्य अभी तक वापस नहीं आए थे और इसलिए कोरम असंभव था। जवाब में, चोर्नोविल ने सोवियत पीपुल्स डिपुटीज की तत्काल वापसी की मांग करने के लिए कदम उठाया, जिसे तब संप्रभुता-समर्थक कम्युनिस्टों द्वारा समर्थन दिया गया और बड़े अंतर से पारित किया गया। चार दिन बाद, प्रतिनिधि वापस आ गए और राज्य संप्रभुता की घोषणा पर बहस फिर से शुरू हो गई। घोषणा-विरोधी समूह का नेतृत्व स्टैनिस्लाव हुरेंको और लियोनिद क्रावचुक ने किया, जिन्होंने दावा किया कि संप्रभुता का मामला कीव के बजाय मॉस्को में हल किया जाएगा।{{sfn|Kulchytskyi|2019|pp=59–61}}
[[File:Підняття українського прапора над Києвом, подія.JPG|alt=कार्यालय भवनों के सामने मुख्य रूप से यूक्रेनी झंडों के साथ प्रदर्शन कर रहे कई लोग|thumb|left|300px|मध्य कीव में यूक्रेन की संप्रभुता की घोषणा के समर्थन में प्रदर्शन, जुलाई 1990]]
इवाश्को ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के उप महासचिव बनने के लिए 11 जुलाई को अपने यूक्रेनी सरकारी पदों से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया। यह कदम यूक्रेनी जनता के लिए एक सदमे के रूप में आया, क्योंकि सी॰पी॰एस॰यू॰ को ढहने के रूप में माना जाता था, और पार्टी की सेवा के लिए यूक्रेनी पदों से इवाश्को के इस्तीफे ने यूक्रेनी आबादी के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन किया। इवाश्को के इस्तीफे के बाद, कम्युनिस्ट हतोत्साहित रह गए, जिससे चोर्नोविल को कार्यालय के माध्यम से घोषणा को आगे बढ़ाने की अनुमति मिली। यह अंततः 16 जुलाई 1990 को पारित किया गया था, जो सोवियत सरकार के कानूनों पर यूक्रेनी कानूनों को प्राथमिकता देता था।{{sfn|Kulchytskyi|2019|pp=61–63}} यह चोर्नोविल के लिए एक बड़ी जीत थी, जिन्होंने जुलाई 1989 से राज्य संप्रभुता की घोषणा की निजी तौर पर मांग की थी।{{sfn|Kobuta|2020|p=37}}
1990 के शेष भाग में यूक्रेनी जनभावना सरकार के खिलाफ मुड़ना जारी रही। छात्रों के विरोध की एक शृंखला, जिसे क्रांति पर ग्रेनाइट के रूप में जाना जाता है, अक्टूबर में शुरू हुई जब छात्रों के समूहों ने दावा किया कि सरकार ने डेमोक्रेटिक ब्लॉक को बहुमत हासिल करने से रोकने के लिए परिणामों में हेरफेर किया था। छात्रों ने कीव में अक्टूबर क्रांति स्क्वायर पर भूख हड़ताल शुरू कर दी, और बाद में कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों द्वारा उनका मज़ाक उड़ाया गया। इस असंवेदनशील रवैये ने लगभग सभी नरमपंथियों और राष्ट्रीय कम्युनिस्टों को लेखक ओल्स होन्चर के नेतृत्व का पालन करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। इन व्यक्तियों ने राष्ट्रीय-डेमोक्रेट्स की ओर दलबदल कर लिया, जिससे शेष कम्युनिस्टों को और कमजोर कर दिया।{{sfn|Pipash|2021|p=82}}
जनवरी की घटनाओं, जिसमें सोवियत सरकार ने लिथुआनिया को स्वतंत्र होने से रोकने के प्रयास में 16 जनवरी 1991 को सेना तैनात की, ने चोर्नोविल को अस्थायी रूप से सोवियत सेना से अलग यूक्रेनी सेना की स्थापना की दिशा में अपनी नीतियों को फिर से उन्मुख करने के लिए प्रेरित किया। इसे प्राप्त करने के लिए, उन्होंने इहोर डेरकाच, मायकोला पोरोव्स्की, विटाली लाज़ोर्किन और विलेन मार्टिरोसियन के साथ मिलकर 'रूख' के सैन्य कॉलेजियम की सह-स्थापना की, जिसे यूक्रेन के सशस्त्र बलों का निर्माण करने और सोवियत सरकार की कार्रवाई में यूक्रेनी सैनिकों के उपयोग को रोकने का काम सौंपा गया था।{{sfn|Lazorkin|2020|p=74}} चोर्नोविल ने 16 फरवरी 1991 को गैलिशियन असेंबली की दूसरी बैठक में गैलिशियन ओब्लास्ट के एकीकरण की वकालत करना जारी रखा, विशेष रूप से शिक्षा और अंतर-ओब्लास्ट व्यापार तक पहुंच का विस्तार करने में।{{sfn|Adamovych|2018|p=4}} चोर्नोविल ने मार्च 1991 के यूक्रेनी स्वतंत्रता जनमत संग्रह का भी निरीक्षण किया, जिसमें गैलिशियन ओब्लास्ट की अधिकांश आबादी ने सोवियत संघ से अलग होने के लिए मतदान किया।{{sfn|Fedyk|2019|p=137}}
=== स्वतंत्रता की घोषणा और राष्ट्रपति चुनाव ===
[[File:Chornovil5.JPG|alt=चोर्नोविल और एक अन्य व्यक्ति यूक्रेनी पारंपरिक कपड़े पहने कई महिलाओं के सामने और कई यूक्रेनी झंडों के नीचे खड़े हैं|thumb|1990 में क्रिवी रिह में चोर्नोविल]]
सुप्रीम सोवियत ने 5 जुलाई 1991 को एक कानून पारित किया जिसमें राष्ट्रपति का कार्यालय स्थापित किया गया, जिसके धारक को चुनाव द्वारा निर्धारित किया जाएगा।{{sfn|Law on Ukrainian SSR presidential elections 1991}}
सोवियत संघ के गोर्बाचेव के नेतृत्व का विरोध करने वाले कट्टरपंथियों ने 19 अगस्त 1991 को तख्तापलट शुरू किया। तख्तापलट के समय, चोर्नोविल एक व्यापार यात्रा पर ज़ापोरिज़्ज़िया शहर में थे। यह जानकर कि पुट्स हुआ था, वे तुरंत कीव लौट आए और यूक्रेनी एस॰एस॰आर॰ की सर्वोच्च सोवियत के आपातकालीन सत्र का आह्वान करना शुरू कर दिया; उन्होंने ल्वीव ओब्लास्ट में कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया। सुप्रीम सोवियत में, डेमोक्रेटिक ब्लॉक के प्रतिनिधियों ने यूक्रेनी स्वतंत्रता की वकालत करना शुरू कर दिया, यह तर्क देते हुए कि यूक्रेन यूरोप का हिस्सा था न कि सोवियत संघ का।{{sfn|Bohatchuk|2020|p=225}} तख्तापलट की विफलता के बाद, सुप्रीम सोवियत ने 24 अगस्त 1991 को यूक्रेन की स्वतंत्रता की घोषणा को अपनाया।{{sfn|Adamovych|2018|p=4}}
राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभियान आधिकारिक तौर पर 1 सितंबर 1991 को शुरू हुआ।{{sfn|Zolotariova 2021a}} राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक शिविर में तीन प्रमुख उम्मीदवार थे, जबकि क्रावचुक राज्य के प्रमुख के रूप में एक अच्छी तरह से स्थापित व्यक्ति थे।{{sfn|Potichnyj|1991|p=135}} दौड़ जल्द ही चोर्नोविल बनाम क्रावचुक के साथ एक प्रभावी दो-व्यक्ति अभियान में संकुचित हो गई, क्योंकि वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए आवश्यक संगठन के साथ एकमात्र उम्मीदवार थे। डेमोक्रेटिक ब्लॉक के युखनोव्स्की के नेतृत्व के बावजूद, वे बौद्धिक शहरी केंद्रों और पश्चिमी यूक्रेन के बाहर अलोकप्रिय थे, जबकि लुक्यानेंको, एक पसंदीदा स्वतंत्रता-समर्थक व्यक्ति होने के बावजूद, एक संगठित अभियान का अभाव था और यूक्रेन के अधिकांश हिस्सों में अज्ञात थे।{{sfn|Potichnyj|1991|pp=137–138}}
चोर्नोविल ने यूक्रेनी स्वतंत्रता का संदेश फैलाने के लिए पूरे यूक्रेन की यात्रा की, जिसमें क्रीमिया जैसे कट्टर रूसी-समर्थक क्षेत्र भी शामिल थे। दोनों भाषाओं में बोलकर रूसोफोन और यूक्रेनी-भाषा के दर्शकों दोनों से अपील करते हुए, चोर्नोविल ने एक ऐसे कार्यक्रम के लिए तर्क दिया जिसमें वे एक नियोजित अर्थव्यवस्था से मुक्त-बाजार पूंजीवाद में एक वर्ष के भीतर कई आदेशों और पश्चिमी निवेशकों का ध्यान आकर्षित करके संक्रमण करेंगे,{{sfn|Dahlburg|1991}} साथ ही यूरोपीय आर्थिक समुदाय और एक काल्पनिक अखिल-यूरोपीय सामूहिक सुरक्षा संगठन में सदस्यता लेंगे।{{sfn|Derevinskyi|2016|p=34}} चोर्नोविल ने क्रावचुक को "एक धूर्त राजनीतिज्ञ" के रूप में निंदा की जो "[यूक्रेन] को वापस [सोवियत संघ] में लाने की कोशिश कर रहा था," यह चेतावनी देते हुए कि वे रूस के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को फिर से स्थापित करेंगे।{{sfn|Dahlburg|1991}}
[[File:1991 Ukrainian presidential election.svg|alt=1991 के यूक्रेनी राष्ट्रपति चुनाव के परिणामों का एक रंगीन मानचित्र|thumb|[[1991 यूक्रेनी राष्ट्रपति चुनाव]] के परिणाम।
चोर्नोविल द्वारा जीते गए ओब्लास्ट नीले रंग में दिखाए गए हैं।]]
चोर्नोविल शुरू में अपने विश्वासों के खिलाफ दशकों के सोवियत प्रचार के कारण अलोकप्रिय थे, जिसे क्रावचुक ने पहले निर्देशित किया था।{{sfn|Dahlburg|1991}} नेशनल-डेमोक्रेट्स द्वारा एकल उम्मीदवार को नामित करने में असमर्थता ने भी इस विश्वास में योगदान दिया कि असंतुष्ट जनचेतना में शासन करने के लिए अयोग्य थे।{{sfn|Kulchynskyi|2023}} इसके बावजूद, चोर्नोविल के अभियान ने जनमत सर्वेक्षण में गैलिसिया के बाहर की खाई को धीरे-धीरे बंद करना शुरू कर दिया; नवंबर 1991 के एक पोल ने ओडेसा में क्रावचुक के 28% की तुलना में चोर्नोविल को 22% वोट के साथ दिखाया, जिसमें अनिर्णीत मतदाताओं की संख्या एक चौथाई से बढ़कर स्थानीय मतदाताओं की एक तिहाई हो गई।{{sfn|Dahlburg|1991}} उत्तर पश्चिमी यूक्रेन ने अक्टूबर से एक महत्वपूर्ण युद्ध के मैदान के रूप में काम किया, क्योंकि सर्वेक्षणों ने शुरू में एक व्यावहारिक टाई का पूर्वानुमान लगाया था और बाद में चोर्नोविल को थोड़ी बढ़त दी थी।{{sfn|Potichnyj|1991|p=136}}
यूक्रेनियनों ने राष्ट्रपति चुनाव और यूक्रेन की स्वतंत्रता की पुष्टि करने वाले जनमत संग्रह दोनों में 1 दिसंबर 1991 को मतदान किया। 84.18% आबादी ने जनमत संग्रह में भाग लिया, जिसमें 90.32% ने पक्ष में मतदान किया।{{sfn|Potichnyj|1991|p=129}} क्रावचुक ने चुनाव के 61.59% के साथ राष्ट्रपति चुनाव जीता। चोर्नोविल 23.27% वोट के साथ दूर दूसरे स्थान पर रहे, एक रनऑफ से बचते हुए। उत्तर पश्चिमी ओब्लास्ट में चोर्नोविल की जीत की पूर्व भविष्यवाणियों के विपरीत, उन्होंने अंततः केवल गैलिसिया में जीत हासिल की, हालांकि उन्होंने चेर्निवत्सी, चर्कासी, कीव, रिव्ने, वोलिन और ज़कारपट्टिया ओब्लास्ट के साथ-साथ कीव शहर में अच्छा प्रदर्शन किया। चोर्नोविल ने चुनाव के दिन हार स्वीकार कर ली, कहा "चुनाव पूर्व अभियान ने मुझे पूरे यूक्रेन की यात्रा करने, लोगों से मिलने और पूर्व का राजनीतिकरण करने का अवसर दिया।"{{sfn|Potichnyj|1991|pp=134–135}} उन्होंने बाद में कहा कि 1991 में हुए संक्षिप्त अभियान के बजाय अभियान के एक और छह महीने ने जीत की अनुमति दी होती।{{sfn|Urban|1992|p=40}}
=== स्वतंत्र यूक्रेन ===
==== पार्टी शासन ====
राष्ट्रपति चुनाव के बाद, समूह के भविष्य को लेकर 'रूख' के भीतर दरारें आ गईं। ड्रेच और मिखाइलो होरिन के नेतृत्व में एक गुट ने संगठन को भंग करने और क्रावचुक के राष्ट्र निर्माण के प्रयासों का समर्थन करने की मांग की, जबकि चोर्नोविल और उनके समर्थकों ने चोर्नोविल की भविष्य की राष्ट्रपति महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए संगठन को एक पार्टी में सुधारने की मांग की।{{sfn|Potichnyj|1991|pp=138}} कई सदस्यों ने 'रूख' के चोर्नोविल के समर्थन को मात्र एक सिफारिश मानते हुए युखनोवस्की या लुक्यानेंको के पीछे अपना समर्थन दिया, जिससे अंतर्दलीय तनाव और बढ़ गया।{{sfn|Malynovskyi|2019|p=72}}
28 फरवरी 1992 को 'रूख' की तीसरी कांग्रेस में, संगठन में विभाजन को संक्षेप में टाल दिया गया था। दोनों गुटों के बीच एक समझौते के रूप में ड्रेच, होरिन और चोर्नोविल को 'रूख' के सह-अध्यक्षों के रूप में चुना गया था।{{sfn|Kulchytskyi|2020}} बहरहाल, यूक्रेनी रिपब्लिकन पार्टी और यूक्रेन की डेमोक्रेटिक पार्टी, जो 'रूख' से बनी थीं, ने क्रावचुक के साथ सहयोग करने का फैसला किया।{{sfn|Haran|Sydorchuk|2010}} अंततः दिसंबर 1992 में चौथी कांग्रेस में चोर्नोविल के गुट की जीत हुई क्योंकि 'रूख' को उनके नेतृत्व में एक केंद्र-दक्षिणपंथी राजनीतिक दल के रूप में पुनर्गठित किया गया था।{{sfn|Kulchytskyi|2020}}
==== क्रीमियन मुद्दा ====
[[File:Black Sea with the Crimea highlighted.svg|alt=काला सागर का एक मानचित्र, जिसमें क्रीमिया को हाइलाइट किया गया है|thumb|left|काला सागर के भीतर क्रीमिया का स्थान]]
सोवियत संघ के टूटने के कुछ ही समय बाद, क्रीमिया की जातीय-रूसी आबादी ने यूक्रेन से अलग होने और रूस के साथ एकीकरण करने की मांग की। 5 मई 1992 को, क्रीमिया ने एकतरफा रूप से यूक्रेन से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जिससे तनाव फैल गया। यूक्रेन के झंडे को रूस के झंडे से बदल दिया गया, और स्वदेशी क्रीमियन तातार आबादी के खिलाफ दमन की लहर शुरू हो गई।{{sfn|Derevinskyi|2018|p=50}} चोर्नोविल, जिन्होंने अपने कारावास के बाद से क्रीमियन तातारों में रुचि बनाए रखी थी,{{sfn|Finnin|2022|pp=147–148}} ने यूक्रेन की संसद से क्रीमिया की स्वतंत्रता की घोषणा को रद्द करने और उसकी संसद के लिए नए चुनावों की मांग करने का आह्वान किया। कई वर्षों तक चले इस संकट के दौरान, वे इस मुद्दे पर आक्रामक राजनेताओं में से थे।{{sfn|Derevinskyi|2018|p=50}}
1993 तक, रूस क्रीमिया संकट में कूद पड़ा। रूस की सर्वोच्च सोवियत के उपाध्यक्ष वैलेंटाइन अगाफोनोव ने जनमत संग्रह द्वारा क्रीमिया की स्वतंत्रता की पुष्टि होने पर उसे मान्यता देने का संकल्प लिया। जून में, सेवस्तोपोल शहर ने भी रूसी संघ में शामिल होने के लिए आवेदन किया। अग्रणी रूसी-समर्थक कार्यकर्ता यूरी मेशकोव ने सोवियत काला सागर बेड़े से बनी एक सेना की व्यवस्था की और समर्थकों के साथ पुलिस और मीडिया भवनों पर नियंत्रण कर लिया।{{sfn|Derevinskyi|2018|p=51}} एक समय पर, यूक्रेनी सरकार ने आर्थिक दबावों को कम करने के लिए सोवियत संघ से विरासत में मिले परमाणु शस्त्रागार को बेचने पर विचार किया,{{sfn|Schmemann|1992|p=10}} लेकिन अलगाव के खतरे और मॉस्को के व्यवहार ने यूक्रेनी आबादी को इस लेनदेन का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। चोर्नोविल उन राजनेताओं में से थे जिन्होंने एक स्वतंत्र परमाणु शस्त्रागार, या वैकल्पिक रूप से नाटो की सदस्यता का समर्थन किया, जिसे उन्होंने रूसी विस्तारवाद के लिए एकमात्र संभावित निवारक के रूप में देखा था यदि यूक्रेन को परमाणु हथियार छोड़ने की आवश्यकता हो।{{sfn|Blank|1994|pp=10, 15}} उन्होंने स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल में यूक्रेन की भागीदारी का विरोध किया, हालांकि 1997 की रूसी-यूक्रेनी मैत्री संधि के अनुसमर्थन का समर्थन किया।{{sfn|Derevinskyi|2013|pp=358-359,493}}
चोर्नोविल ने जोर देकर कहा कि तत्काल अवधि में क्रीमिया को लेकर युद्ध नहीं होगा; उनका मानना था कि आधे साल से एक साल के भीतर, क्रीमियाई अलगाववाद लोकप्रियता खो देगा और रूसी कार्य क्रीमियाई अलगाववादियों के वित्तपोषण और यूक्रेन के खिलाफ एक सूचना युद्ध अभियान तक सीमित रहेंगे। ये दोनों भविष्यवाणियाँ अंततः सटीक साबित होंगी। हालाँकि, उनका यह भी मानना था कि अलगाववाद का खतरा अभी भी वास्तविक था। उनका मानना था कि इसका मुकाबला केवल एक ऐसी रणनीति से किया जा सकता है जो यूक्रेन के रूसीकृत क्षेत्रों को एकल अखिल-यूक्रेनी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण की ओर धकेले - जिस पर कार्रवाई नहीं की गई थी। चोर्नोविल ने क्रीमियन स्वायत्तता का विरोध किया जैसा कि यह मौजूद था, जिसे वे कृत्रिम मानते थे क्योंकि यह हाल ही में प्रत्यावर्तित क्रीमियन तातार आबादी पर आधारित नहीं था बल्कि रूसियों पर आधारित था जो बड़े पैमाने पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहुंचे थे; उन्होंने यह भी सोचा कि प्रायद्वीप की विशेष स्थिति ने केवल संघर्ष को रोक दिया है।{{sfn|Derevinskyi|2018|p=51}}
==== अर्थव्यवस्था पर विचार ====
स्वतंत्रता के पहले वर्षों में तेजी से बिगड़ती अर्थव्यवस्था को ठीक करना एक अत्यंत गंभीर मुद्दा था। समस्या पूर्व सोवियत संघ के भीतर बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के अनुकूल होने में सरकार की विफलता और आयात के प्रभुत्व वाली यूक्रेन की अर्थव्यवस्था से उपजी थी। हाइपरइन्फ्लेशन शुरू हो गया और उत्पादकता गिर गई। इन राजनीतिक और आर्थिक संकटों ने कई प्रतिनिधियों के बीच यह आशंका पैदा कर दी कि यूक्रेन जल्द ही अपनी स्वतंत्रता खो देगा;{{sfn|Schmemann|1992|p=10}} इसके विपरीत, चोर्नोविल का मानना था कि यूक्रेन की संप्रभुता सुनिश्चित करने से राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों में सुधार होगा। उन्होंने क्रावचुक का विरोध करना जारी रखा, जिनके साथ वे तीखी प्रतिद्वंद्विता बनाए रखते थे।{{sfn|Schmemann|1992|p=19}}
स्वतंत्र व्यापार संघों ने क्रावचुक की सरकार द्वारा श्रमिकों के लाभ और मुआवजे की गारंटी देने से इनकार करने से क्षुब्ध होकर 2 सितंबर 1992 को व्यापक हड़तालें शुरू कीं। 1989-1991 की हड़तालों की तरह हड़ताल करने वाले बड़े पैमाने पर कोयला खनिक थे, लेकिन पिछली हड़तालों के विपरीत वे व्यापक समर्थन हासिल करने में विफल रहे, इस तथ्य को लाफयेत्ते कॉलेज के प्रोफेसर स्टीफन क्रॉले इस कारण बताते हैं कि इसे स्थानीय, डोनबास-आधारित हड़ताल समितियों के बजाय राष्ट्रव्यापी संघ द्वारा बुलाया गया था। फरवरी 1993 में कोयला खनिकों के साथ कीव के सार्वजनिक परिवहन कर्मचारी भी शामिल हो गए, एक ऐसा उपाय जिसने हड़ताल को जनता के बीच गहराई से अलोकप्रिय बना दिया। पिछली हड़तालों के विपरीत, 'रूख' ने हड़तालियों की निंदा की और सरकार से "हड़ताल के असली आयोजकों को दंडित करने" का आह्वान किया। चोर्नोविल ने विशेष रूप से स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक गतिविधि, विशेष रूप से हड़तालों को कम करने का तर्क दिया।{{sfn|Crowley|1995|pp=54–55}}
==== 1994 के चुनाव ====
क्रावचुक की सरकार ने खनिकों के गुस्से को रोकने के लिए 17 जून 1993 को सुप्रीम राडा को भंग कर दिया और संसदीय और राष्ट्रपति चुनावों को जल्दी बुलाया।{{sfn|Zolotariova 2021b}}{{sfn|Stoliarova|Chernova|2021}} चोर्नोविल ने शुरू में संसदीय चुनाव में कीव सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें लगा कि यह उन्हें एक राष्ट्रीय व्यक्ति के रूप में स्थापित करेगा और उन्हें अपनी वैचारिक दृष्टि को फैलाने के लिए पूरे यूक्रेन का दौरा करने का अवसर देगा। उनके करीबी सहयोगी और दोस्त मिखाइलो बॉयच्यशिन को 'रूख' द्वारा ल्वीव के शेवचेंकिव्स्की जिले के लिए उम्मीदवार के रूप में नामित किया गया था। उस समय बॉयच्यशिन 'रूख' के सचिवालय के अध्यक्ष थे, और अधिक आर्थिक रूप से केंद्रित नीति के लिए पार्टी के मुख्य पैरोकारों में से एक थे।{{sfn|Olenin|2021}}
14 या 15 जनवरी 1994 को बॉयच्यशिन कीव में 'रूख' के चुनाव प्रचार मुख्यालय से निकले। बाद में उसी शाम, सशस्त्र व्यक्तियों द्वारा उनका अपहरण कर लिया गया{{sfn|Zdorovylo|2025}} या दो हथियारबंद व्यक्ति अभियान मुख्यालय भवन में दाखिल हुए और बॉयच्यशिन के ठिकाने के बारे में जानना चाहा।{{sfn|Olenin|2021}} वे तब से नहीं देखे गए हैं, और माना जाता है कि उनकी मृत्यु हो चुकी है। बॉयच्यशिन का जबरन गायब होना यूक्रेन में एक महत्वपूर्ण क्षण था, पत्रकार एंड्री ओलेनिन के अनुसार यह राजनीति से प्रेरित गायब होने और हत्याओं की शृंखला में पहला था। बॉयच्यशिन के गायब होने के बाद, 'रूख' सामाजिक नीति और मानवाधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने के पक्ष में एक आर्थिक कार्यक्रम को काफी हद तक छोड़ देगा।{{sfn|Olenin|2021}} बॉयच्यशिन के अपहरण के समय, चोर्नोविल दक्षिणी मायकोलाइव ओब्लास्ट में प्रचार कर रहे थे, और बॉयच्यशिन के "गायब" होने से कुछ समय पहले दोनों ने फोन पर बात की थी। बॉयच्यशिन के गायब होने का चोर्नोविल पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। उन्होंने बाद में कीव में एक सीट के बजाय 357वें चुनावी जिले में चुनाव लड़ने का विकल्प चुना, और वे 14 विरोधियों के खिलाफ 62.5% वोट के साथ सफलतापूर्वक चुने गए{{sfn|2nd Verkhovna Rada}}।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}}
संसदीय चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति चुनाव में क्रावचुक की संभावनाओं के लिए खराब संकेत दिया: 75% आबादी ने मतदान किया, जो कम मतदान और उदासीनता की उम्मीदों से कहीं अधिक था। पूर्वी यूक्रेन, जिसने नव-पुनर्स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ यूक्रेन के उम्मीदवारों को चुना, और मध्य और पश्चिमी यूक्रेन के बीच एक विभाजन विकसित हुआ, जहाँ 'रूख' ने विशेष रूप से अच्छा प्रदर्शन किया। चुनाव के बाद ''द न्यूयॉर्क टाइम्स'' ने कहा कि पूर्व प्रधान मंत्री लियोनिद कुचमा और इवान प्लियुश्च के साथ-साथ चोर्नोविल को क्रावचुक का एक अपेक्षित प्रतियोगी माना जाता था, जिन्होंने क्रावचुक के संभावित विरोधियों के रूप में स्थापित होने के बाद महत्वपूर्ण अंतर से जीत हासिल की थी। चुनाव के बाद, क्रावचुक ने 25 मार्च 1994 के संबोधन में तर्क दिया कि जून 1994 के लिए निर्धारित राष्ट्रपति चुनाव को रद्द करने की आवश्यकता होगी और आर्थिक सुधारों और संगठित अपराध से लड़ने के लिए आपातकालीन शक्तियां प्रदान करने के लिए सुप्रीम राडा में याचिका दायर की।{{sfn|Erlanger|1994}}
120 प्रतिनिधियों, जो बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक विपक्ष से संबंधित थे, ने क्रावचुक को चुनावों को रद्द करने और अधिक शक्तियां प्राप्त करने के उनके प्रयासों में अपना समर्थन दिया। 'रूख' ने इस औचित्य के तहत चुनावों को स्थगित करने के क्रावचुक के आह्वान का अनिच्छा से समर्थन किया कि चुनाव कानूनों में सुधार के बिना ऐसा नहीं करने से राजनीतिक संकट पैदा होगा, हालांकि चोर्नोविल ने उनकी शक्तियों के विस्तार का समर्थन करने से इनकार कर दिया और तर्क दिया कि वे इसका इस्तेमाल पूर्व कम्युनिस्ट अधिकारियों को सशक्त बनाने और रूस को परमाणु हथियार और काला सागर बेड़े दोनों सौंपने के लिए सहमत होने के लिए करेंगे। चोर्नोविल ने तर्क दिया कि राष्ट्रपति शक्तियों का विस्तार करने से "कुलीनतंत्र की एक मूक तानाशाही" का उदय होगा। अंततः, कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं हुआ क्योंकि चुनाव के बाद कम्युनिस्टों ने सर्वोच्च राडा के नेतृत्व पर नियंत्रण कर लिया और चुनाव स्थगित करने या रद्द करने के किसी भी प्रयास को अवरुद्ध कर दिया।{{sfn|Kuzio|1996|pp=120–121}}
संसदीय चुनाव में अपनी चुनावी सफलता के बावजूद, चोर्नोविल ने 1994 के राष्ट्रपति चुनाव में नहीं लड़ने का फैसला किया और इसके बजाय अर्थशास्त्री वलोडिमिर लानोवी का समर्थन किया,{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} जिन्हें आर्थिक संकट को समाप्त करने के लिए सुधारों का प्रस्ताव देने के बाद क्रावचुक द्वारा सरकार से हटा दिया गया था।{{sfn|Erlanger|1994}} पत्रकार और 'रूख' के सहयोगी तारास ज़दोरोविलो ने दावा किया है कि यह संभव है कि यह निर्णय उनके जीवन और 'रूख' के भविष्य के डर से लिया गया हो; ज़दोरोविलो के अनुसार, चोर्नोविल ने जेल में अपने समय के संपर्कों का उपयोग यूक्रेनी माफिया के प्रमुख हस्तियों से गुप्त रूप से मिलने के लिए किया, जिन्होंने जिम्मेदारी से इनकार किया और दावा किया कि सरकार ने बॉयच्यशिन के अपहरण का आदेश दिया था।{{sfn|Zdorovylo|2025}} इस आरोप को 2013 में 'रूख' के प्रेस सचिव दिमित्रो पोनोमारचुक ने दोहराया था।{{sfn|Olenin|2021}} ज़दोरोविलो का यह भी कहना है कि क्रावचुक की सरकार ने चुनाव के दौरान 'रूख' के वित्त में राजनीति से प्रेरित जांच शुरू की और चोर्नोविल और पार्टी के उच्च-रैंकिंग सदस्य ओलेक्ज़ेंडर लवरिनोविच दोनों को एक सुरक्षा एस्कॉर्ट के तहत रखा, जिसने उनकी बातचीत की निगरानी की।{{sfn|Zdorovylo|2025}}
==== दूसरा संसदीय कार्यकाल ====
[[File:Zernovol 2.jpg|alt=चोर्नोविल और पाश्को अन्य व्यक्तियों के बीच खड़े हैं|thumb|300px|अक्टूबर 1995 में कीव हाउस ऑफ़ सिनेमा की यात्रा के दौरान चोर्नोविल और उनकी पत्नी एटेना पाश्को]]
लियोनिद कुचमा ने चुनाव में क्रावचुक को हराया, और यूक्रेन के दूसरे राष्ट्रपति बने। स्वतंत्र मीडिया पर कुचमा की बाद की कार्रवाई ने चोर्नोविल को उनकी सरकार के प्रमुख आलोचकों में से एक बना दिया।{{sfn|Marusenko|1999}} यद्यपि कुचमा की जीत के परिणामस्वरूप सत्ता एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित हो गई, लेकिन राजनीतिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया; देश पूर्व-कम्युनिस्ट ''नोमेनक्लातुरा'' द्वारा नियंत्रित रहा, जिसे चोर्नोविल 1996 में "सत्ता की पार्टी" के रूप में संदर्भित करेंगे, और उनसे जुड़े औद्योगिक कुलीन वर्गों का एक उभरता हुआ वर्ग। चोर्नोविल कुलीन वर्गों के आलोचक थे, सैनिकों, डॉक्टरों और शिक्षकों को वेतन का भुगतान न करने, संस्कृति और विज्ञान के लिए कम धन और टेलीविज़न प्रोग्रामिंग की खराब गुणवत्ता के लिए उन्हें दोषी ठहराते थे। उन्होंने कुलीन वर्गों पर "गैर-यूक्रेनी यूक्रेन" के भीतर एक निर्दलीय प्रणाली बनाने का प्रयास करने का आरोप लगाया, जिसमें सत्ता इसके बजाय एक महानगरीय वित्तीय अभिजात वर्ग में निहित होगी।{{sfn|Derevinskyi|2021|pp=20–21}}
स्वतंत्र यूक्रेन के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने और उसका अनुसमर्थन करने की प्रक्रिया 1995 में शुरू हुई। चोर्नोविल, यूक्रेन के अधिकांश अन्य दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी राजनेताओं की तरह, खुद को कुचमा के साथ गठबंधन में पाया क्योंकि संसदीय वामपंथियों ने भूमि की बिक्री और खरीद को रोकने और सोवियत युग के स्थानीय सरकारी निकायों के संरक्षण के लिए संवैधानिक लेखों पर जोर दिया। चोर्नोविल ने 25 मार्च 1995 को संकेत दिया कि उन्होंने कुचमा के प्रस्तावित संविधान का समर्थन किया है, हालांकि पत्रकार यूरी लुकानाव का कहना है कि उन्होंने व्यक्त किया कि इसके अंगीकरण पर 'रूख' को "ग्यारह गंभीर आपत्तियां" थीं।{{sfn|Lukanov|2023}}
कुचमा के प्रस्तावित संविधान को ओलेक्ज़ेंडर मोरोज़ द्वारा एक अत्यधिक-केंद्रीकृत राज्य बनाने के रूप में वर्णित किया गया था जिसमें कार्यपालिका के लिए मजबूत शक्तियां थीं और एक स्वतंत्र न्यायपालिका का अभाव था। उन्होंने सबसे पहले कुचमा के संविधान को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मार्च में "ऐसा अलोकतांत्रिक संविधान यूरोप में कहीं नहीं है"। हालाँकि, उस वर्ष जून में, मोरोज़ ने "संवैधानिक आयोग" के हिस्से के रूप में कुचमा और 38 अन्य व्यक्तियों के साथ दूसरा संवैधानिक मसौदा तैयार किया। इस मसौदे को बदले में दाएं और मध्य द्वारा उसी कारण से खारिज कर दिया गया था जिस कारण मोरोज़ ने पहले मसौदे को खारिज कर दिया था। 24 नवंबर को, चोर्नोविल ने ''चास-टाइम'' समाचार पत्र में लिखा कि मसौदा "संसदीय विरोधी" था और मसौदा तैयार करने वालों पर सुप्रीम राडा को बाधित करने का प्रयास करने का आरोप लगाया।{{sfn|Lukanov|2023}} अंततः 28 जून 1996 को एक संविधान अपनाया गया, हालांकि निजी संपत्ति के अधिकार, एक एकात्मक राज्य के रूप में यूक्रेन की पुष्टि और आत्मनिर्णय के लिए यूक्रेनी लोगों के अधिकार जैसे 'रूख' द्वारा समर्थित कई प्रावधानों को नहीं अपनाया गया।{{sfn|Lukanov|2023}}
संविधान के अलावा, चोर्नोविल ने 1994 में वासिल सिमोनेनको इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू किया। उसी वर्ष उन्हें यूरोप की परिषद की संसदीय सभा में पहले यूक्रेनी प्रतिनिधियों में से एक के रूप में भी नियुक्त किया गया था,{{sfn|Fedunyshyn|2019|p=138}} और यूक्रेनी रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ प्रथम चेचन युद्ध के दौरान चेचन नागरिकों को 50 टन मानवीय सहायता के दान का आयोजन किया।{{sfn|Pustovhar|2024}} समाचार पत्र ''गाज़ेटा.यूए'' ने 2017 में लिखा था कि पैट्रिआर्क वलोडिमिर के अंतिम संस्कार के दौरान चोर्नोविल यूक्रेनी रूढ़िवादी चर्च - कीव पैट्रिआर्कट के समर्थकों में से थे, जिनके साथ उन्हें कैद किया गया था, क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें सेंट सोफिया कैथेड्रल में दफनाने का प्रयास किया था,{{sfn|Gazeta.ua 2017}} हालांकि यूक्रेनी राष्ट्रीय स्मृति संस्थान इंगित करता है कि इसके बजाय उन्होंने दफन जारी रखने की मांग की थी।{{sfn|Ukrainian Institute of National Memory}} चोर्नोविल ने अपने राष्ट्रपति पद के शुरुआती वर्षों में कई मौकों पर कुचमा की सरकारी पदों पर राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक नेताओं की नियुक्ति के लिए प्रशंसा की।{{sfn|Bondarenko|2002}} चोर्नोविल ने 14 से 16 सितंबर 1994 तक ओडेसा का भी दौरा किया, जहाँ उन्होंने 'रूख' की राजनीति और ऐतिहासिक भूमिका पर ओडेसा नेशनल पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी में एक सम्मेलन की मेजबानी की। ओडेसा पॉलिटेक्निक में चोर्नोविल के भाषण ने लोकतांत्रिक मानदंडों को मजबूत करने और आर्थिक सुधारों के माध्यम से एक मध्यम वर्ग के निर्माण की वकालत की। उसी समय, उन्होंने उभरते हुए कुलीनतंत्र की अपनी आलोचना जारी रखी।{{sfn|Honcharuk|2018|p=45}}
1997 में, चोर्नोविल ने मोरोज़ के साथ अपने विवाद को बढ़ा दिया, उनके भाषणों को "आदिम लोकलुभावनवाद" के रूप में निंदा की और यूक्रेन में राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने के लिए उन्हें दोषी ठहराया।{{sfn|Suspilne 1997}} चोर्नोविल ने अन्य मध्य और पूर्वी यूरोपीय राज्यों के साथ यूक्रेनी एकीकरण की वकालत भी तेजी से की, बेलारूसी असंतुष्ट ज़ियानोन पज़नियाक के साथ एक "बाल्टिक-ब्लैक सी यूनियन", या मिज़्मोरिया की स्थापना का आह्वान किया। उन्होंने अतिरिक्त रूप से काला सागर के विसैन्यीकरण और नाटो में यूक्रेनी सदस्यता की वकालत की। अमेरिकी विदेश मंत्री मेडेलीन अलब्राइट, पूर्व ब्रिटिश प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचर और चेक राष्ट्रपति वाक्लाव हावेल जैसे पश्चिमी सहयोगियों ने कई मौकों पर चोर्नोविल से मुलाकात की, और पश्चिमी नेताओं द्वारा यूक्रेन के बड़े पैमाने पर पूर्व कम्युनिस्ट नेतृत्व की तुलना में उन्हें तेजी से अधिक भरोसेमंद वार्ताकार के रूप में माना जाने लगा।{{sfn|Bila|2021}} चोर्नोविल एक समर्पित अटलांटिसवादी थे, और उन्होंने यूक्रेन के नाटो और [[यूरोपीय संघ]] दोनों का सदस्य बनने की वकालत की। उन्होंने यूक्रेन को यूरोपीय एकीकरण के लिए अभिन्न माना।{{sfn|Derevinskyi|p=118}}
मुट्ठी भर अन्य राजनेताओं के साथ, चोर्नोविल ने 1997 में चेचन गणराज्य इचकेरिया के राष्ट्रपति के रूप में असलान मस्खादोव के उद्घाटन में भाग लिया।{{sfn|Ukraina Moloda 2011}} 'रूख' ने उसी वर्ष अक्टूबर में औपचारिक रूप से कुचमा के शासन के विरोध में खुद को घोषित किया।{{sfn|Gawdiak|2003|p=7}}
==== 1998 के चुनाव ====
[[File:Вибори до ВР України 1998.svg|alt=1998 के यूक्रेनी संसदीय चुनाव के परिणामों का एक रंगीन मानचित्र|thumb|left|1998 के यूक्रेनी संसदीय चुनाव के परिणामों का मानचित्र; 'रूख' ने पश्चिमी यूक्रेन में वोट पर हावी रहा]]
चोर्नोविल ने फिर से 1998 के संसदीय चुनाव में 'रूख' का नेतृत्व किया, इस बार पार्टी के आनुपातिक प्रतिनिधित्व सूची में पहले उम्मीदवार के रूप में चल रहे थे।{{sfn|3rd Verkhovna Rada}} चुनाव के दौरान, 'रूख' ने संघवाद पर अपना रुख बदल दिया, चोर्नोविल ने तर्क दिया कि यूक्रेन को एक संघीय गणराज्य बनने के लिए आह्वान "कबीले संघवाद" थे।{{sfn|Semkiv|2014}} चोर्नोविल के साथ वलोडिमिर चेर्नियाक, विदेश मंत्री हेनादिय उदोवेंको, ड्रेच और पर्यावरण मंत्री यूरी कोस्टेंको प्रमुख पार्टी-सूची के उम्मीदवारों के रूप में, क्रीमियन तातार कार्यकर्ता मुस्तफा दज़ेमिलेव के साथ शामिल हुए। 'रूख' ने चुनाव लड़ने के लिए किसी अन्य दल के साथ गठबंधन नहीं किया, हालांकि इसके उम्मीदवारों में गैर-सरकारी संगठनों जैसे 'प्रोस्विता' और 'यूक्रेनी महिला संघ' के सदस्य शामिल थे। पार्टी ने आम तौर पर वामपंथ के खिलाफ प्रचार किया।{{sfn|Gawdiak|2003|p=7}} चोर्नोविल ने वामपंथी और दक्षिणपंथी 'कांग्रेस ऑफ यूक्रेनी नेशनलिस्ट्स' के खिलाफ गठबंधन बनाने के लिए सभी राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक दलों का आह्वान किया, साथ ही कुचमा-समर्थक पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और 'सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ यूक्रेन (यूनाइटेड)' के साथ एक महागठबंधन का भी तर्क दिया।{{sfn|Ukraina Moloda 2011}} किसी भी दल ने चोर्नोविल के गठबंधन के अनुरोधों पर सहमति नहीं जताई।{{sfn|Smiian|2017}}
यद्यपि वे सुप्रीम राडा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थे, परिणाम 'रूख' के लिए सकारात्मक था, जिसने 1994 की तुलना में अपनी सीटें दोगुनी कर दीं।{{sfn|Bilyk|2019|p=39}} सामान्य रूप से दक्षिणपंथियों के लिए, हालांकि, चुनाव निराशाजनक था, क्योंकि केवल 'रूख' ने पार्टी-सूची प्रतिनिधित्व के लिए 4% की सीमा पार की और सामान्य रूप से दक्षिणपंथियों ने 20-25% सीटों के अपने पारंपरिक परिणाम से कम प्रदर्शन किया।{{sfn|Birch|Wilson|1999|p=280}} 'रूख' ने चुनाव के बाद अवैध के रूप में चुनाव परिणामों को चुनौती देने के अपने इरादे की घोषणा की। यूक्रेन की कम्युनिस्ट पार्टी फिर से सुप्रीम राडा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई, जिसमें वामपंथी दलों ने बहुमत बनाया। हालांकि उन्होंने नोट किया कि परिणाम दक्षिणपंथियों के लिए पिछले चुनाव जितने खराब नहीं थे,{{sfn|Gawdiak|2003|p=5}} चोर्नोविल अभियान से थक गए थे और लगातार थके हुए होने की सार्वजनिक छवि प्राप्त की।{{sfn|Smiian|2017}} उस समय, वे 'चास-टाइम' और राजनीति के बीच प्रतिबद्धताओं को संतुलित करने के कारण प्रतिदिन पाँच घंटे से अधिक नहीं सो रहे थे। ल्वीव ओब्लास्ट में, उनके पारंपरिक समर्थन आधार और पूरे यूक्रेन में हुए निजीकरण के खिलाफ एक होल्डआउट में, 'रूख' की सरकार को एग्रेरियन पार्टी द्वारा बदल दिया गया था, जिसके तहत किकबैक, मनी लॉन्ड्रिंग और व्यापारिक विवादों के परिणामस्वरूप हिंसा से जुड़े राजनीतिक घोटाले आम हो गए।{{sfn|Kushnir|2011}}
==== नौवीं कांग्रेस, 1999 राष्ट्रपति चुनाव, 'रूख' में विभाजन ====
12 से 13 दिसंबर 1998 तक आयोजित 'रूख' की नौवीं कांग्रेस में, चोर्नोविल ने 1999 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति की घोषणा की। "फॉरवर्ड्स, टू द ईस्ट" नामक, इसमें पूर्वी और दक्षिणी यूक्रेन की आबादी पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया गया था, जबकि यूक्रेनी के साथ सह-आधिकारिक भाषा के रूप में रूसी की स्थापना के लिए अपना विरोध बनाए रखा।{{sfn|Adamovych|2018|p=24}}
उसी कांग्रेस में, चोर्नोविल ने 1999 के चुनाव में दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के अपने इरादे की घोषणा की। चोर्नोविल और हेनादिय उदोवेंको राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित होने वाले 'रूख' के दो प्राथमिक उम्मीदवार थे; अंतिम निर्णय बाद की तारीख में लिया जाना था।{{sfn|Hai-Nyzhnyk|2012}} केंद्र-दक्षिणपंथी रिफॉर्म्स एंड ऑर्डर पार्टी के नेता विक्टर पिन्ज़ेनिक के अनुसार, उन्होंने और चोर्नोविल ने यूक्रेन के नेशनल बैंक के गवर्नर विक्टर युशचेंको को 1999 में राष्ट्रपति पद के लिए दौड़ने के लिए मनाने का भी प्रयास किया।{{sfn|Espreso TV 2018}}
इस समय तक, 'रूख' के उन सदस्यों के बीच विभाजन तेजी से स्पष्ट हो रहा था जो चोर्नोविल को एक पुरानी शख्सियत मानते थे और वे जो उनका समर्थन करते थे। पार्टी के भीतर चोर्नोविल के विरोधियों ने उन्हें अति-सत्तावादी, पार्टी नियमों का अनादर करने वाला{{sfn|Woronowycz 1999a|p=1}} और कुचमा के बहुत करीब माना;{{sfn|Ovsiienko|2022|p=146}} चोर्नोविल के समर्थकों ने भी उनके विरोधियों को कुचमा के बहुत करीब माना{{sfn|Ovsiienko|2022|p=146}} और पैसे वाले हितों द्वारा समर्थित माना।{{sfn|Woronowycz 1999a|p=3}} यूक्रेनी इतिहासकार पावलो हाई-न्यज़्न्यक ने कहा है कि चोर्नोविल ने जनवरी 1999 में राष्ट्रपति पद के नामांकन से अपना नाम वापस ले लिया{{sfn|Hai-Nyzhnyk|2012}} और जेम्सटाउन फाउंडेशन के अनुसार उन्होंने उदोवेंको का समर्थन किया,{{sfn|Jamestown Foundation 1999}} हालांकि चोर्नोविल के बेटे तारास ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि वे अपनी मृत्यु तक राष्ट्रपति पद के लिए प्रचार कर रहे थे।{{sfn|Khalupa|2004}}
यह विभाजन फरवरी 1999 में अपने चरम पर पहुंच गया। यूरी कोस्टेंको ने 'रूख' के एक दल का नेतृत्व करते हुए 17{{sfn|Woronowycz 1999a|p=1}} या 19 फरवरी{{sfn|Koshiw|1999}} की संसदीय बैठक में चोर्नोविल को नेता के पद से हटाने की घोषणा की, और 27 फरवरी को अपने समर्थकों की बैठक में खुद को पार्टी का नेता घोषित किया।{{sfn|Woronowycz 1999a|p=1}} चोर्नोविल ने 22 फरवरी के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाब दिया जहाँ उन्होंने उनकी तुलना स्टेट कमेटी ऑन द स्टेट ऑफ़ इमरजेंसी से की, जिसने 1991 के सोवियत तख्तापलट का नेतृत्व किया था और उन पर यूक्रेनी सरकार से प्रति माह $40,000 लेने, 'रूख' कार्यालय से 4,000 रिव्निया लेने और 'रूख' पीपुल्स डिप्टी ओलेह इश्चेंको से दस लाख डॉलर की रिश्वत लेने का आरोप लगाया। ''कीव पोस्ट'' के उप संपादक जारोस्लाव कोशिव ने 25 फरवरी के एक राय लेख में लिखा था कि कोस्टेंको के दलबदल के बाद केवल 17 प्रतिनिधि ही चोर्नोविल के प्रति वफादार रहे।{{sfn|Koshiw|1999}}
'रूख' से जुड़े कई समाचार पत्र इस झगड़े से विभाजित हो गए; 11 ने चोर्नोविल का समर्थन किया, जबकि पाँच ने कोस्टेंको का समर्थन किया। ''दज़ेरकालो त्ज़न्ह्या'' ने एक स्वतंत्र रुख अपनाया, लेकिन आम तौर पर कुचमा और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार येवहेन मार्चुक के साथ विभाजन के लिए चोर्नोविल को दोषी ठहराया।{{sfn|Ovsiienko|2022|p=145}} चोर्नोविल और उनके अनुयायी विभाजन के बाद कोस्टेंको के गुट के प्रति तिरस्कारपूर्ण थे; लेस् तनयुक ने कहा कि "ये वे लोग हैं जो अभी अपने मर्सिडीज पाने और अपने डाचा बनाने के लिए अधिक चिंतित हैं", जबकि चोर्नोविल ने कोस्टेंको के अधिग्रहण के प्रयास को "पार्टी का निजीकरण" बताया और कुचमा और सरकार को विभाजन को व्यवस्थित करने के लिए दोषी ठहराया।{{sfn|Woronowycz 1999a|p=3}}
चोर्नोविल की मौत से जुड़ी 2012 की अदालती कार्यवाही में, उदोवेंको ने गवाही दी कि फरवरी 1999 में रूसी संघीय सुरक्षा सेवा (FSB) द्वारा नियोजित एक यूक्रेनी नागरिक व्याचेस्लाव बाबेन्को ने उनसे संपर्क किया था। उदोवेंको के अनुसार, बाबेन्को ने उन्हें चेतावनी दी थी कि रूसी खुफिया एजेंसियों को शामिल करते हुए चोर्नोविल के जीवन पर एक प्रयास होगा। चोर्नोविल ने बाबेन्को की चेतावनी को डराने-धमकाने का प्रयास बताकर खारिज कर दिया। चोर्नोविल की मौत की जांच करने का काम सौंपे गए आंतरिक मामलों के मंत्रालय के एक कर्मचारी मायकोला स्टेपनेन्को ने बाबेन्को को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उल्लेख किया जिसे चोर्नोविल की दैनिक दिनचर्या और यात्रा योजनाओं का पर्याप्त ज्ञान था।{{sfn|Ukrainska Pravda 2012}}
चोर्नोविल ने 24 फरवरी को 'रूख' के संसदीय गुट का नाम बदलकर "पीपुल्स मूवमेंट ऑफ यूक्रेन - 1" कर दिया। 28 फरवरी को, कोस्टेंको के समर्थकों ने 'रूख' की दसवीं कांग्रेस के रूप में संदर्भित किया, जिसके दौरान उन्होंने घोषणा की कि चोर्नोविल को आधिकारिक तौर पर नेता के पद से हटा दिया गया है और पार्टी के विरोध की अवधि को "समान भागीदारी" में से एक द्वारा बदल दिया जाएगा। चोर्नोविल के अनुयायियों की एक कांग्रेस, जिसे चोर्नोविल द्वारा नौवीं कांग्रेस के "दूसरे चरण" के रूप में संदर्भित किया गया था, 7 मार्च को आयोजित की गई थी और इसमें 'रूख' विधानसभा के 520 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, जो पार्टी के क़ानून के तहत दो-तिहाई आवश्यकता से अधिक था।{{sfn|Ovsiienko|2022|pp=147–148}}
== मृत्यु और अंतिम संस्कार ==
24 मार्च 1999 को, चोर्नोविल किरोवोह्राद शहर में एक अभियान कार्यक्रम में थे, या तो अपने लिए या उदोवेंको के लिए।{{sfn|Woronowycz 1999b|p=1}} किरोवोह्राद में रहते हुए, उन्होंने एक साक्षात्कार दिया जहाँ उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि यूक्रेन के वित्तीय और संगठित अपराध कुलों ने इसे नष्ट करने और वित्तीय पूंजी के और संचय को सुरक्षित करने के प्रयास में 'रूख' को लक्षित किया था। उन्होंने आगे दावा किया कि कुचमा केवल अपने विरोधियों की हत्या करके या उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ करके ही जीत सकते हैं। उनके आखिरी फोन कॉल का विवरण विवादित है; उनकी बहन वेलेंटीना ने कहा है कि उन्होंने उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और 'रूख' के विभाजन को "हमारे पीछे" बताया,{{sfn|Fedunyshyn|2019|pp=138–139}} जबकि कोस्टेंको ने आरोप लगाया कि उन्होंने संकेत दिया कि उन्होंने अपना मन बदल लिया है और राष्ट्रपति पद के लिए उदोवेंको के बजाय उनका समर्थन करना चाहते हैं।{{sfn|Perevozna|2007}}
25 मार्च 1999 की मध्यरात्रि से ठीक पहले,{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} चोर्नोविल किरोवोह्राद से कीव लौट रहे थे, उनके साथ सहयोगी येवहेन पावलोव और 'रूख' के प्रेस सचिव दिमित्रो पोनोमारचुक थे। बोरिस्पिल से पांच किलोमीटर दूर, 140 किमी/घंटा की गति से यात्रा करते हुए,{{sfn|Yasynskyi|2021}} चोर्नोविल की टोयोटा कोरोला अनाज ले जाने वाली एक कामाज़ लॉरी से टकरा गई, जो राजमार्ग पर एक मोड़ पर रुक रही थी। चोर्नोविल और पावलोव दोनों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पोनोमारचुक को गंभीर चोटों के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था।{{sfn|Karatnycky|2024|p=45}}
[[File:Будинок учителя, Київ.jpg|alt=कांच की छत वाली एक ईंट की इमारत|thumb|कीव सिटी टीचर्स हाउस, जो कभी सेंट्रल राडा की सीट थी, जहाँ चोर्नोविल का अंतिम संस्कार हुआ था]]
चोर्नोविल का अंतिम संस्कार 29 मार्च को कीव के सिटी टीचर्स हाउस में आयोजित किया गया था,{{sfn|Woronowycz 1999b|p=1}} जिसमें एक जुलूस बैकोव कब्रिस्तान में उनके दफनाने से पहले सेंट वलोडिमिर के कैथेड्रल की यात्रा कर रहा था।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}}{{sfn|Woronowycz 1999b|p=4}} ''[[द गार्जियन]]'' ने बताया कि "दसियों हज़ार यूक्रेनियन" मौजूद थे;{{sfn|Marusenko|1999}} मिलिशिया ने 10,000 के आंकड़े का दावा किया; जबकि ''द यूक्रेनी वीकली'' ने लिखा कि लगभग 50,000 लोग "उस अंतिम संस्कार में शामिल हुए जिसे कई लोग इस शहर [कीव] में अब तक का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार मानते हैं"। उन्हें राज्य सम्मान गार्ड के साथ-साथ एक सैन्य ऑर्केस्ट्रा भी दिया गया था। यूक्रेन के अधिकांश राजनीतिक अभिजात वर्ग अंतिम संस्कार में मौजूद थे, जिनमें क्रावचुक, कुचमा, प्रधान मंत्री वालेरी पुस्टोवोइटेंको, और सुप्रीम राडा के अध्यक्ष ओलेक्ज़ेंडर टकाचेंको, साथ ही कई पूर्व असंतुष्ट और कम्युनिस्ट पार्टी और प्रोग्रेसिव सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ यूक्रेन के उल्लेखनीय अपवादों के साथ लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेता शामिल थे।{{sfn|Woronowycz 1999b|p=1, 4}}
=== षड्यंत्र के सिद्धांत और जांच ===
चोर्नोविल की मृत्यु में यूक्रेनी सरकार की भागीदारी का संदेह लगभग तुरंत उभर आया,{{sfn|archives.gov.ua}} जो चोर्नोविल की विवादास्पद प्रकृति और आगामी राष्ट्रपति चुनाव से भड़क गया था। आंतरिक मामलों के मंत्री यूरी क्रावचेंको ने चोर्नोविल की मृत्यु की शाम को एक टेलीविज़न भाषण में कहा कि चोर्नोविल की मृत्यु की जांच में हत्या पर विचार नहीं किया जाएगा। उनके दफन से पहले, टैन्युक और क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी के डिप्टी विटाली ज़ुरावस्की दोनों ने आरोप लगाया कि चोर्नोविल की हत्या कर दी गई थी, जबकि पत्रकार सेरही नाबोका ने उल्लेख किया कि उनकी मृत्यु की परिस्थितियाँ सोवियत नेताओं के राजनीतिक विरोधियों की अन्य संदिग्ध मौतों के समान थीं।{{sfn|Woronowycz 1999c|p=5}} लॉरी चालक पर शुरू में लापरवाही का आरोप लगाया गया था,{{sfn|Karatnycky|2024|p=45}} लेकिन एक महीने के भीतर उसे आम माफी दे दी गई,{{sfn|archives.gov.ua}} और लॉरी के एक यात्री की अस्पष्ट परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।{{sfn|Istorychna Pravda 2017}} करतनीकी, कुचमा के 1999 के अभियान के एक अनाम सदस्य का हवाला देते हुए, नोट करते हैं कि कुचमा के अन्य गैर-कम्युनिस्ट प्रतिद्वंद्वी उनके खिलाफ गठबंधन बनाने में विफल रहे, जिसके कारण अंततः उनकी जीत हुई;{{sfn|Karatnycky|2024|pp=46–47}} यूक्रेनी राजनीतिक वैज्ञानिक तारास कुज़ियो ने इसी तरह चोर्नोविल की मृत्यु के बाद कुचमा और येवहेन मार्चुक को राष्ट्रपति पद के लिए एकमात्र गंभीर गैर-वामपंथी दावेदारों के रूप में वर्णित किया।{{sfn|Kuzio|2007|p=34}}
चोर्नोविल की मृत्यु की जांच करने का पहला प्रयास अप्रैल 1999 में एक सुप्रीम राडा आयोग के साथ शुरू हुआ।{{sfn|BBC News 1999}} 2004-2005 की ऑरेंज क्रांति के बाद, कुचमा के उत्तराधिकारी विक्टर युशचेंको ने घोषणा की कि 23 अगस्त 2006 को चोर्नोविल की एक प्रतिमा के उद्घाटन समारोह में चोर्नोविल की मौत की परिस्थितियों की जांच फिर से शुरू की जाएगी।{{sfn|BBC News Ukrainian 2006}} 6 सितंबर 2006 को, आंतरिक मामलों के मंत्री यूरी लुट्सेंको ने घोषणा की कि चोर्नोविल की हत्या कर दी गई थी और इसे साबित करने वाले सबूत अभियोजक जनरल को सौंप दिए गए थे।{{sfn|Radio Ukraine 2006}} अभियोजक जनरल ऑलेक्ज़ेंडर मेदवेदको ने मामले के बारे में लुट्सेंको के बयानों को "हल्के ढंग से, अव्यवसायिक" बताकर आलोचना की, और आरोप लगाया कि जानकारी एक ऐसे व्यक्ति से आई है जिसे धोखाधड़ी के लिए दोषी ठहराया गया है और जिसके लिए इंटरपोल नोटिस जारी किया गया था।{{sfn|Yakhno|2006}} तब से, चोर्नोविल की मृत्यु की जांच को बार-बार बंद किया गया है और बिना यह निष्कर्ष निकाले फिर से खोला गया है कि चोर्नोविल एक हत्या की साजिश के शिकार थे या एक साधारण कार दुर्घटना के। बोरिस्पिल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने घोषणा की कि जनवरी 2014 में कोई हत्या की साजिश मौजूद नहीं थी और मामला बंद कर दिया, लेकिन मार्च 2015 तक यह फिर से अभियोजक जनरल के कार्यालय द्वारा जांच का विषय था।{{sfn|Harasymiw|Koshelivets|Senkus|2015}} 2019 तक, मामला जांच के अधीन रहा।{{sfn|Bellezza|2019|p=104}}
== विरासत ==
[[File:Vyacheslav Chornovil money.jpg|alt=चोर्नोविल के चेहरे को दर्शाने वाला एक सिक्का|thumb|चोर्नोविल को दर्शाने वाला 2-रिव्निया का स्मारक सिक्का]]
[[File:Stamp 2008 Chornovil.jpg|alt=एक स्टैम्प पर चोर्नोविल का एक पेंसिल चित्र|thumb|चोर्नोविल के सम्मान में यूक्रेनी टिकट, 2008]]
अपने जीवनकाल में, चोर्नोविल एक अत्यंत विवादास्पद व्यक्ति रहे। 1991 के चुनाव में उनके विरोधियों में से एक, वलोडिमिर ह्रीनीव ने 1992 में कहा था कि मतदाताओं को चोर्नोविल के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के अविश्वास और यह विश्वास कि वे यहूदी-विरोधी और रूसी-विरोधी थे, के कारण क्रावचुक का समर्थन करने के लिए लुभाया गया था; चोर्नोविल ने इन दावों को खारिज कर दिया, दावा किया कि "रोजमर्रा की जिंदगी में कोई यहूदी-विरोध नहीं है" और यह देखते हुए कि ल्वीव की अधिकांश जातीय-रूसी आबादी ने यूक्रेनी स्वतंत्रता का समर्थन किया था।{{sfn|Clarity|1992}} UHS के सह-नेता के रूप में, चोर्नोविल और पार्टी के अन्य नेताओं के अधिक कट्टरपंथी कम्युनिस्ट-विरोधी दृष्टिकोण ने सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी की मारियाना कोलिनचॉक के अनुसार, पार्टी में अतिवाद का लेबल ला दिया।{{sfn|Kolinchak|2007|p=5}} दाईं ओर, अधिक कट्टरपंथी राष्ट्रवादियों, जैसे कि ज़ेनोविय क्रासिव्स्की ने, राजनीतिक आदर्श के रूप में स्वतंत्रता को तुरंत अपनाने के बजाय, 1980 के दशक के अंत में सोवियत राजनीतिक संरचनाओं के भीतर काम करने के लिए चोर्नोविल और लुक्यानेंको की आलोचना की।{{sfn|Kuzio|1997|p=223}} 'रूख' के भीतर, एक सत्तावादी नेता के रूप में चोर्नोविल की धारणाओं के कारण दो विभाजन (1993 और 1999 में) हुए।{{sfn|Parfionov|1999|p=77}}
''द गार्जियन'' के एक पत्रकार पीटर मारुसेंको ने चोर्नोविल के अंतिम संस्कार की रिपोर्टिंग करते समय तर्क दिया कि यूक्रेनी इतिहास में उनके योगदान को कई यूक्रेनियन द्वारा उनकी मृत्यु के बाद तक मान्यता नहीं दी गई थी।{{sfn|Marusenko|1999}} 2017 की अपनी पुस्तक ''द नियर एब्रॉड'' में, प्रोफेसर ज़बिग्न्यू वोज्नोव्स्की ने चोर्नोविल को 20वीं सदी के शुरुआती और मध्य के राष्ट्रवादी नेता स्टीफन बांदेरा के विपरीत "यूक्रेन की अधिक समावेशी दृष्टि, स्पष्ट रूप से यूरोपीय समर्थक और कानून के शासन और संसदीय लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता से एकजुट" के रूप में वर्णित किया, और कहा कि 2013-2014 के यूरोमैडन विरोध प्रदर्शनों के दौरान चोर्नोविल का एक बड़ा पोस्टर मौजूद था।{{sfn|Wojnowski|2017|pp=207–208}} वोज्नोव्स्की ने चोर्नोविल की "सुधारवादी देशभक्ति" की विचारधारा को परिभाषित किया है, जो यूक्रेन को सुधारों का पालन करने और मध्य यूरोप के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने की वकालत करता है, जो कि यूरोमैडन और ऑरेंज क्रांति के बाद यूक्रेनी समाज में फैल गया।{{sfn|Wojnowski|2017|p=212}}
अधिक आलोचनात्मक रूप से, दार्शनिक और लेखक पेट्रो क्रालियुक द्वारा 2017 के 'रेडियो लिबर्टी' लेख में चोर्नोविल पर "रोमांटिसिज्म" के बदले राजनीतिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करने और राजनीति के प्रति एक भोला रवैया रखने का आरोप लगाया गया है। विशेष रूप से, क्रालियुक 1991 के चुनाव में हार के बाद क्रावचुक के साथ काम करने से इनकार करने और संघवाद में चोर्नोविल के विश्वास को रचनात्मक नहीं मानते हैं।{{sfn|Kraliuk|2017}}
एक यूक्रेनी राज्य को फिर से स्थापित करने में उनके महत्व की मान्यता में, चोर्नोविल को 2000 में मरणोपरांत यूक्रेन के हीरो की उपाधि से सम्मानित किया गया था।{{sfn|Ukrainian Institute of National Memory 2017}} उन्हें 1996 में उनकी खोजी पत्रकारिता, विशेष रूप से उनके ''समिज्दात'' के लिए शेवचेंको राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था,{{sfn|Hrytsenko}} और 1997 में ऑर्डर ऑफ प्रिंस यारोस्लाव द वाइज से सम्मानित किया गया था।{{sfn|Kherson Oblast Universal Library 2024}} उन्हें दो बार सर्वकालिक दस सबसे लोकप्रिय यूक्रेनियनों में स्थान दिया गया है। 2008 के ''वेलीकी उक्रेन्त्सी'' पोल में, उन्हें यूक्रेन के सातवें सबसे लोकप्रिय व्यक्ति के रूप में स्थान दिया गया था, जिसमें 2.63% सर्वेक्षण वाले व्यक्तियों ने उन्हें सर्वकालिक महान यूक्रेनी के रूप में नामित किया था।{{sfn|Inter 2008}} 2022 के "पीपुल्स टॉप" पोल में, वे नौवें सबसे लोकप्रिय यूक्रेनी थे, जिसमें पिछले मतदान से संकेत मिलता था कि उनका समर्थन 2012 में 3.5% से बढ़कर 2022 में 8.7% हो गया था।{{sfn|People's Top 2022}}
2003 में, यूक्रेन के नेशनल बैंक ने चोर्नोविल को समर्पित 2 रिव्निया के नाममात्र के साथ एक स्मारक सिक्का जारी किया।{{sfn|National Bank of Ukraine}} 2009 में, चोर्नोविल को समर्पित एक यूक्रेनी स्टैम्प जारी किया गया था।{{sfn|Ukrinform 2008}}
== नोट्स ==
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== सन्दर्भ ==
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=== पुस्तकें ===
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* {{Cite book |last=Adamovych |first=Serhii |title=Чорноволівські читання: Матеріали VI Всеукраїнської наукової конференції |date=14 March 2020 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=8–12 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 6th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Ставлення Народного Руху України до національних меншин напередодні здобуття державної незалежності |trans-chapter=Attitude of the People's Movement of Ukraine towards national minorities on the eve of the attainment of state independence|url=https://www.academia.edu/127917089/%D0%A7%D0%BE%D1%80%D0%BD%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D0%BB%D1%96%D0%B2%D1%81%D1%8C%D0%BA%D1%96_%D1%87%D0%B8%D1%82%D0%B0%D0%BD%D0%BD%D1%8F_v%D0%B0%D1%82%D0%B5%D1%80%D1%96%D0%B0%D0%BB%D0%B8_VI_%D0%92%D1%81%D0%B5%D1%83%D0%BA%D1%80%D0%B0%D1%97%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%BE%D1%97_%D0%BD%D0%B0%D1%83%D0%BA%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D1%97_%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D1%84%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%BD%D1%86%D1%96%D1%97_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_14_%D0%B1%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B7%D0%BD%D1%8F_2020_%D1%83%D0%BF%D0%BE%D1%80%D1%8F%D0%B4_%D0%92_%D0%A4_%D0%94%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B2%D1%96%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%B8%D0%B9_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_%D0%91%D0%B5%D1%81%D0%BA%D0%B8%D0%B4%D0%B8_2020_150_%D1%81}}
* {{Cite book |last=Bazhan |first=Oleh |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=31–36 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Вячеслав Чорновіл як об'єкт секретної справи КДБ «Блок» |trans-chapter=Viacheslav Chornovil as an object of the KGB's secret 'Bloc' case|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Bilyk |first=Yaroslav |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=14–18 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Мовна політика в діяльності лідерів НРУ |trans-chapter=Language politics in the activities of the leaders of the NRU}}
* {{Cite book |last=Chornovil |first=Viacheslav |title=Вячеслав Чорновіл. Твори в десяти томах. Том 5. публіцистика, документи, матеріали «Справи No.196» (1970–1984) |publisher=Smoloskyp |year=2007 |isbn=978-966-7332-87-7 |editor-last=Chornovil |editor-first=Valentyna |location=Kyiv |page=911 |language=uk |trans-title=Viacheslav Chornovil: Works in Ten Books. Book 5: Publications, Documents, and Materials of "Case No. 196" (1970–1984)}}
* {{Cite book |last=Chornovil |first=Viacheslav |title=Вячеслав Чорновіл. Твори в десяти томах. Том 6. Документи та матеріали (листопад 1985 – квітень 1990) |publisher=Smoloskyp |year=2009 |isbn=978-966-2164-07-7 |editor-last=Chornovil |editor-first=Valentyna |location=Kyiv |pages=1051 |language=uk |trans-title=Viacheslav Chornovil: Works in Ten Books. Book 6: Documents and Materials (November 1985–April 1990)}}
* {{Cite book |last=Chornovil |first=Viacheslav |title=Шлях до незалежності: суспільні настрої в Україні кін. 80-х рр. ХХ ст. Документи і матеріали. До 20-ї річниці незалежності України |publisher=[[Institute of History of Ukraine]] |year=2011 |isbn=978-966-02-5425-1 |editor-last=Smoliy |editor-first=Valeriy |editor-link=Valeriy Smoliy |location=Kyiv |pages=81–83 |language=uk |trans-title=Path to Independence: Public attitudes in late 1980s Ukraine: Documents and Materials: to the 20th anniversary of Ukrainian independence |chapter=Лист-відповідь В. Чорновола «Ось же вона, охоронна журналістика!» Любомирі Петрівні та Миколі Яковичу (авторам статті «Під маскою борців за гласність» / Вільна Україна, 20.12.1987 р.) |trans-chapter=V. Chornovil's letter response "Here it is, secure journalism!" to Lyubomira Petrivna and Mykola Yakovych (authors of the article "Under the Mask of Fighters for Glasnost" / Free Ukraine, 20.12.1987)}}
* {{Cite book |last=Danylenko |first=Viktor |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=25–30 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Політичний нагляд за діяльністю В. Чорновола в роки «перебудови» (друга половина 1980-х рр.) |trans-chapter=Political supervision of V. Chornovil's activities in the Perestroika years (second half of the 1980s)}}
* {{Cite book |last=Derevinskyi |first=Vasyl |url=https://irbis-nbuv.gov.ua/ulib/item/ukr0000015008 |title=В'ячеслав Чорновіл |publisher=Family Leisure Club |year=2017 |location=Kharkiv |pages=383 |language=uk |trans-title=Viacheslav Chornovil |ref={{sfnRef|Derevinskyi 2017a}}}}
* {{Cite book |last=Derevinskyi |first=Vasyl |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=47–55 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Вячеслав Чорновіл та кримське питання |trans-chapter=Viacheslav Chornovil and the Crimean question|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Derevinskyi |first=Vasyl |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=17–23 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Вячеслав Чорновіл: П'ятиріччя незалежності та неукраїнська Україна |trans-chapter=Viacheslav Chornovil: Five Years of Independence and a Non-Ukrainian Ukraine}}
* {{Cite book |last=Fedunyshyn |first=Liubomyra |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=197–203 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Правозахисна діяльність В. Чорновола у 1960–1970-х рр. |trans-chapter=Human rights activities of V. Chornovil in the 1960s and 1970s|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Fedunyshyn |first=Liubomyra |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=137–142 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Вячеслав Чорновіл і Народний Рух України |trans-chapter=Viacheslav Chornovil and the People's Movement of Ukraine}}
* {{Cite book |last=Fedunyshyn |first=Liubomyra |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=117–121 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Емоційно-психологічний світ Вячеслава Чорновола |trans-chapter=Viacheslav Chornovil's emotional and psychological world}}
* {{Cite book |last=Fedyk |first=Lidiia |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=132–136 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Особливості «вирішення національного питання» в УРСР крізь призму поглядів В. Чорновола |trans-chapter=Idiosyncracies of the "solution to the national question" in the Ukrainian SSR through the prism of V. Chornovil's views}}
* {{Cite book |last=Finnin |first=Rory |title=Blood of Others: Stalin's Crimean atrocity and the poetics of solidarity |publisher=[[University of Toronto Press]] |year=2022 |isbn=978-1-4875-3700-5 |location=Toronto |pages=334 |jstor=10.3138/j.ctv2p7j53j |lccn=2024391355}}
* {{Cite book |last=Hai-Nyzhnyk |first=Pavlo |author-link=Pavlo Hai-Nyzhnyk |title=Українська багатопартійність: політичні партії, виборчі блоки, лідери (кінець 1980-х – початок 2012 рр.). Енциклопедичний довідник |publisher=I. F. Kuras Institute of Political and Ethnonational Studies, National Academy of Sciences of Ukraine |year=2012 |location=Kyiv |pages=274–280 |language=uk |trans-title=Ukrainian Multi-Partisanship: Political Parties, Electoral Blocs, Leaders (Late 1980s–Early 2012): an Encyclopedic Overview |chapter=Народний Рух України |trans-chapter=People's Movement of Ukraine |chapter-url=https://hai-nyzhnyk.in.ua/doc/2012doc..n2.php}}
* {{Cite book |last=Honcharuk |first=Hryhorii |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=45–46 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Вячеслав Чорновіл в Одесі |trans-chapter=Viacheslav Chornovil in Odesa|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Karatnycky |first=Adrian |title=Battleground Ukraine: From Independence to the War with Russia |publisher=[[Yale University Press]] |year=2024 |isbn=978-0-300-26946-8 |location=New Haven and London |pages=346 |lccn=2023949848}}
* {{Cite book |last=Wojnowski |first=Zbigniew |title=The Near Abroad: Socialist Eastern Europe and Soviet Patriotism in Ukraine, 1956–1985 |publisher=[[University of Toronto Press]] |year=2017 |isbn=9781442631069 |location=Toronto, Buffalo, London |pages=317 |doi=10.3138/9781442631069}}
* {{Cite book |last=Kobuta |first=Stepan |title=Чорноволівські читання: Матеріали VI Всеукраїнської наукової конференції |date=14 March 2020 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=36–40 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 6th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Майбутній державно-політичний устрій та система владних відносин в Україні у бачення В.Чорновола у 1988–1991 роках |trans-chapter=The future state-political organisation and system of governing relations in Ukraine in the vision of V. Chornovil, 1988–1991|url=https://www.academia.edu/127917089/%D0%A7%D0%BE%D1%80%D0%BD%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D0%BB%D1%96%D0%B2%D1%81%D1%8C%D0%BA%D1%96_%D1%87%D0%B8%D1%82%D0%B0%D0%BD%D0%BD%D1%8F_v%D0%B0%D1%82%D0%B5%D1%80%D1%96%D0%B0%D0%BB%D0%B8_VI_%D0%92%D1%81%D0%B5%D1%83%D0%BA%D1%80%D0%B0%D1%97%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%BE%D1%97_%D0%BD%D0%B0%D1%83%D0%BA%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D1%97_%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D1%84%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%BD%D1%86%D1%96%D1%97_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_14_%D0%B1%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B7%D0%BD%D1%8F_2020_%D1%83%D0%BF%D0%BE%D1%80%D1%8F%D0%B4_%D0%92_%D0%A4_%D0%94%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B2%D1%96%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%B8%D0%B9_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_%D0%91%D0%B5%D1%81%D0%BA%D0%B8%D0%B4%D0%B8_2020_150_%D1%81}}
* {{Cite book |last=Kozhanov |first=Andrii |title=Чорноволівські читання: Матеріали VI Всеукраїнської наукової конференції |date=14 March 2020 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=41–45 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 6th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Нонконформізм і протестні настрої на Одещині (1960–1980 рр.) |trans-chapter=Non-conformism and protest moods in Odeshchyna (1960–1980)|url=https://www.academia.edu/127917089/%D0%A7%D0%BE%D1%80%D0%BD%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D0%BB%D1%96%D0%B2%D1%81%D1%8C%D0%BA%D1%96_%D1%87%D0%B8%D1%82%D0%B0%D0%BD%D0%BD%D1%8F_v%D0%B0%D1%82%D0%B5%D1%80%D1%96%D0%B0%D0%BB%D0%B8_VI_%D0%92%D1%81%D0%B5%D1%83%D0%BA%D1%80%D0%B0%D1%97%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%BE%D1%97_%D0%BD%D0%B0%D1%83%D0%BA%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D1%97_%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D1%84%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%BD%D1%86%D1%96%D1%97_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_14_%D0%B1%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B7%D0%BD%D1%8F_2020_%D1%83%D0%BF%D0%BE%D1%80%D1%8F%D0%B4_%D0%92_%D0%A4_%D0%94%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B2%D1%96%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%B8%D0%B9_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_%D0%91%D0%B5%D1%81%D0%BA%D0%B8%D0%B4%D0%B8_2020_150_%D1%81}}
* {{Cite book |last1=Kozhanov |first1=Andrii |last2=Shypotilova |first2=Olena |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=32–35 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Неформальна преса як форма діяльності українських націонал-демократичних сил на завершальному етапі «перебудови» |trans-chapter=Informal press as a form of activity of Ukrainian National-Democratic forces at the final stage of perestroika}}
* {{Cite book |last=Krupnyk |first=Liuba |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=43–49 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Роль Вячеслава Чорновола в ході Української національго-демократичної революції кінця 1980-х – 1991 років |trans-chapter=Viacheslav Chornovil's role during the Ukrainian National-Democratic revolution of the late 1980s–1991}}
* {{Cite book |last=Kulchytskyi |first=Stanislav |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=50–63 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Діяльність Вячеслава Чорновола під час суверенізації радянської України (1990) |trans-chapter=Viacheslav Chornovil's activities during the sovereigntisation of Soviet Ukraine (1990)}}
* {{Cite book |last=Lazorkin |first=Vitalii |author-link=Vitalii Lazorkin |title=Чорноволівські читання: Матеріали VI Всеукраїнської наукової конференції |date=14 March 2020 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=63–76 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 6th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Вячеслав Чорновіл. Деякі сторінки з історії творення збройних сил України |trans-chapter=Viacheslav Chornovil: Some pages on the history of the Armed Forces of Ukraine's establishment|url=https://www.academia.edu/127917089/%D0%A7%D0%BE%D1%80%D0%BD%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D0%BB%D1%96%D0%B2%D1%81%D1%8C%D0%BA%D1%96_%D1%87%D0%B8%D1%82%D0%B0%D0%BD%D0%BD%D1%8F_v%D0%B0%D1%82%D0%B5%D1%80%D1%96%D0%B0%D0%BB%D0%B8_VI_%D0%92%D1%81%D0%B5%D1%83%D0%BA%D1%80%D0%B0%D1%97%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%BE%D1%97_%D0%BD%D0%B0%D1%83%D0%BA%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D1%97_%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D1%84%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%BD%D1%86%D1%96%D1%97_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_14_%D0%B1%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B7%D0%BD%D1%8F_2020_%D1%83%D0%BF%D0%BE%D1%80%D1%8F%D0%B4_%D0%92_%D0%A4_%D0%94%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B2%D1%96%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%B8%D0%B9_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_%D0%91%D0%B5%D1%81%D0%BA%D0%B8%D0%B4%D0%B8_2020_150_%D1%81}}
* {{Cite book |last=Malynovskyi |first=Valentyn |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=71–77 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Вплив ІІІ Всеукраїнських Зборів НРУ на подальший розвиток організації |trans-chapter=Influence of the Third All-Ukrainian Assembly of the NRU on further development of the organisation}}
* {{Cite book |last=Marples |first=David R. |url=https://link.springer.com/book/10.1007/978-1-349-10880-0 |title=Ukraine under Perestroika: Ecology, Economics and the Workers' Revolt |publisher=University of Alberta Press |year=1991 |isbn=9780888642295 |pages=243 |author-link=David R. Marples |doi=10.1007/978-1-349-10880-0 }}
* {{Cite book |last=Marynovych |first=Myroslav |author-link=Myroslav Marynovych |id={{Project MUSE|84843|type=book}} |title=The Universe behind Barbed Wire: Memoirs of a Ukrainian Soviet Dissident |publisher=University of Rochester Press |year=2021 |isbn=978-1-78744-832-2 |editor-last=Younger |editor-first=Katherine |location=Rochester |pages=453 |translator-last=Hayuk |translator-first=Zoya }}
* {{Cite book |last=Matiash |first=V. I. |title="Я вірую в свій народ!": До 80-річчя від дня народження В.М. Чорновола |publisher=Oles Honchar Poltava Regional Children's Library |year=2017 |location=Poltava |pages=41 |language=uk |trans-title="I Believe in my People!": to the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil}}
* {{Cite book |last=Melnykova-Kurhanova |first=Olena |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=78–83 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Правозахисна публіцистика та діяльність Вячеслава Чорновола |trans-chapter=The human rights writing and activity of Vyacheslav Chornovil}}
* {{Cite book |last=Ostrovskyi |first=Valerii |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=105–117 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Вячеслав Чорновіл і Зіновій Красівський: переплетіння доль і звершень |trans-chapter=Viacheslav Chornovil and Zinovii Krasivskyi: intertwined fates and achievements |ref={{sfnRef|Ostrovskyi 2018a}}|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Ostrovskyi |first=Valerii |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=118–127 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Трактування історії України в епістолярній спадщині Вячеслава Чорновола |trans-chapter=Interpretations of the history of Ukraine in the epistolary heritage of Vyacheslav Chornovil |ref={{sfnRef|Ostrovskyi 2018b}}|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Parfionov |first=Aleksandr |url=https://books.google.com/books?id=810jAQAAIAAJ |title=Between Russia and the West: Foreign and Security Policy of Independent Ukraine |publisher=[[Peter Lang (publisher)|Peter Lang]] |year=1999 |isbn=9780820446295 |editor-last=Spillman |editor-first=Kurt R. |series=Studies in Contemporary History and Security Policy |volume=2 |pages=75–94 |chapter=Foreign and Security Policy Views of Relevant Ukrainian Political Forces |issn=1422-8327 |editor-last2=Wenger |editor-first2=Andreas |editor-last3=Müller |editor-first3=Derek}}
* {{Cite book |last=Paska |first=Bohdan |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=132–144 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Взаємини Вячеслава Чорноволо та Валентина Мороза: від співпраці до конфронтації |trans-chapter=Relations between Vyacheslav Chornovil and Valentin Moroz: from cooperation to confrontation|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Pipash |first=Volodymyr |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=79–140 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Націонал-комунізм та національно орієнтовані комуністи в Україні (60-ті – 80-ті рр. ХХ ст.) |trans-chapter=National communism and the national orientation of communists in Ukraine (1960s–1980s)}}
* {{Cite book |last=Riabinin |first=Yevhen |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=89–92 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Ідеї В.Чорновола стосовно державно-територіального устрою України |trans-chapter=V. Chornovil's ideas regarding the state and territorial structure of Ukraine}}
* {{Cite book |last=Seko |first=Yaroslav |title=Другі Чорновілські читання. Матеріали наукової конференції, присвяченої 75-й річниці з дня народження В'ячеслава Чорновола |year=2014 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Ternopil |pages=127–137 |language=uk |trans-title=Second Chornovil Readings: Materials of the Scientific Conference celebrating the 75th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=В'ячеслав Чорновіл: на роздоріжжі шістдесятницта |trans-chapter=Viacheslav Chornovil: at the crossroads of the sixties}}
* {{Cite book |last=Seko |first=Yaroslav |title=Чорновілські читання. Візія майбутнього України: Матеріали III і IV наукових конференцій, присвячених 80-й річниці з дня народження Вячеслава Чорновола |publisher=Beskydy |year=2018 |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv, Ternopil |pages=174–184 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: a Vision of Ukraine's Future: materials of the third and fourth scientific conferences celebrating the 80th birth anniversary of Viacheslav Chornovil |chapter=Вячеслав Чорновіл і криза дисидентства у період перебудови|trans-chapter=Viacheslav Chornovil and the crisis of dissent in the perestroika period|url=https://shron2.chtyvo.org.ua/Zbirnyk_statei/Chornovolivski_chytannia_Viziia_maibutnoho_Ukrainy_Materialy_III_i_IV_naukovykh_konferentsii_prysvia.pdf}}
* {{Cite book |last=Seko |first=Yaroslav |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=124–131 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Концепція антикомунісичної революції Вячеслава Чорновола |trans-chapter=The Conception of Viacheslav Chornovil's Anticommunist Revolution}}
* {{Cite book |last=Seko |first=Yaroslav |title=Чорноволівські читання: Матеріали VI Всеукраїнської наукової конференції |date=14 March 2020 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=123–136 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 6th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Шевченкіана Вячеслава Чорновола |trans-chapter=The Shevchenkiana of Viacheslav Chornovil|url=https://www.academia.edu/127917089/%D0%A7%D0%BE%D1%80%D0%BD%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D0%BB%D1%96%D0%B2%D1%81%D1%8C%D0%BA%D1%96_%D1%87%D0%B8%D1%82%D0%B0%D0%BD%D0%BD%D1%8F_v%D0%B0%D1%82%D0%B5%D1%80%D1%96%D0%B0%D0%BB%D0%B8_VI_%D0%92%D1%81%D0%B5%D1%83%D0%BA%D1%80%D0%B0%D1%97%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%BE%D1%97_%D0%BD%D0%B0%D1%83%D0%BA%D0%BE%D0%B2%D0%BE%D1%97_%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D1%84%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%BD%D1%86%D1%96%D1%97_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_14_%D0%B1%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B7%D0%BD%D1%8F_2020_%D1%83%D0%BF%D0%BE%D1%80%D1%8F%D0%B4_%D0%92_%D0%A4_%D0%94%D0%B5%D1%80%D0%B5%D0%B2%D1%96%D0%BD%D1%81%D1%8C%D0%BA%D0%B8%D0%B9_%D0%9A%D0%B8%D1%97%D0%B2_%D0%91%D0%B5%D1%81%D0%BA%D0%B8%D0%B4%D0%B8_2020_150_%D1%81}}
* {{Cite book |last=Seko |first=Yaroslav |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=93–103 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Драгоманівський контекст ідеї федералізму Вячеслава Чорновола |trans-chapter=The Drahomanov context of Viacheslav Chornovil's ideas of federalism}}
* {{Cite book |last=Shanovska |first=Olena |title=Чорноволівські читання: Матеріали V Всеукраїнської наукової конференції |date=15 March 2019 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=143–146 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 5th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Еволюція світоглядних позицій В. Чорновола: від комуністичної прихильності до категоричного неприйняття радянської ідеології |trans-chapter=Evolution of the position of V. Chornovil's worldview: from communist participation to categorical rejection of Soviet ideology}}
* {{Cite book |last=Yurash |first=Andrii |title=Чорноволівські читання: Матеріали VII Всеукраїнської наукової конференції |date=27 March 2021 |publisher=Beskydy |editor-last=Derevinskyi |editor-first=Vasyl |location=Kyiv |pages=134–140 |language=uk |trans-title=Chornovil Readings: materials of the 7th all-Ukrainian scientific conference |chapter=Релігійні та етнонаціональні політики в сучасній Україні: плюралізм чи хаос? |trans-chapter=Religious and ethno-national politics in modern Ukraine: pluralism or chaos?}}
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=== जर्नल लेख ===
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* {{Cite journal|last=Adamovych|first=Serhii|date=2018|title=Vyacheslav Chornovil – intelektual, polityk, tvorets novitnoyi Ukrayinskoyi derzhavnosti|trans-title=Viacheslav Chornovil: an intellectual, a politician and the creator of modern Ukrainian statehood|url=http://lib.pnu.edu.ua:8080/handle/123456789/4255|journal=Beskedy|language=uk|pages=5|isbn=978-966-457-176-7|via=Precarpathian National University Repository|archive-date=15 March 2022|access-date=3 February 2025|archive-url=https://web.archive.org/web/20220315130315/http://lib.pnu.edu.ua:8080/handle/123456789/4255|url-status=live}}
* {{Cite journal|last=Bellezza|first=Simone A.|date=Winter 2019|title=The "Transnationalization" of Ukrainian Dissent: New York City Ukrainian Students and the Defense of Human Rights, 1968–80|url=https://muse.jhu.edu/pub/28/article/717541/pdf|journal=[[Kritika: Explorations in Russian and Eurasian History]]|volume=20|issue=1|pages=99–120|doi=10.1353/kri.2019.0005|via=Project MUSE|url-access=subscription}}
* {{Cite journal|last1=Birch|first1=Sarah|author-link1=Sarah Birch|last2=Wilson|first2=Andrew|author-link2=Andrew Wilson (historian)|date=1999|title=The Ukrainian parliamentary elections of 1998|url=https://www.academia.edu/8365169|journal=Electoral Studies|volume=18|issue=2|pages=276–282|doi=10.1016/S0261-3794(98)00050-X|via=Academia.edu}}
* {{Cite book|last=Blank|first=Stephen J.|date=1 July 1994|title=Proliferation and Nonproliferation in Ukraine: Implications for European and U.S. Security|chapter=Implications for European and U.S. Security|journal=[[Strategic Studies Institute]]|publisher=[[United States Army War College]]|pages=36|jstor=resrep11595}}
* {{Cite journal|last=Bociurkiw|first=Bohdan R.|author-link=Bohdan Bociurkiw|date=June 1970|title=The Chornovil Papers. by Vyacheslav Chornovil and Frederick C. Barghoorn: Dear Comrade: Pavel Litvinov and the Voices of Soviet Citizens in Dissent|journal=[[Slavic Review]]|volume=29|issue=2|pages=343–344|doi=10.2307/2493419|jstor=2493419}}
* {{Cite journal|last=Bohatchuk|first=S. S.|date=April 2020|title=V. Chornovil. "Velykyy lider velykoyi natsiyi"|trans-title=V. Chornovil: "The great leader of a great nation"|journal=Scientific Journal Virtus|language=uk|volume=43|pages=223–226}}
* {{Cite journal|last=Chornovil|first=Viacheslav|date=March 1976|title=My trial|journal=[[Index on Censorship]]|volume=5|issue=1|pages=57–69|doi=10.1080/03064227608532501}}
* {{Cite journal|last=Crowley|first=Stephen|date=March 1995|title=Between Class and Nation: Worker Politics in the New Ukraine|journal=Communist and Post-Communist Studies|publisher=[[University of California Press]]|volume=28|issue=1|pages=43–69|doi=10.1016/0967-067x(95)00005-f|jstor=45301918}}
* {{Cite journal|last=Derevinskyi|first=Vasyl|date=2007|title=Pratsi V. Chornovola - "Pravosuddya chy retsydyvy teroru?" ta "Lykho z rozumu" yak dzherelo do vyvchennya radyanskykh represiy 1965-1966 rr.|trans-title=Viacheslav Chornovil's works "Court of Law or a Return of the Terror?" and "Woe from Wit" as a source of study of the 1965–1966 Soviet repressions|url=https://ekmair.ukma.edu.ua/handle/123456789/14339|journal=Magisterium|language=uk|publisher=[[National University of Kyiv-Mohyla Academy]]|volume=28|pages=37–42}}
* {{Cite web|last=Derevinskyi|first=Vasyl|date=2013|title=Hromadsko-politychna ta derzhavotvorcha diyalnist Vyacheslava Chornovola|trans-title=Public, political and state-building activities of Vyacheslav Chornovil|language=Ukrainian|publisher=PhD diss., [[Kyiv National University of Construction and Architecture]]|url=https://enpuir.udu.edu.ua/entities/publication/6fa4d828-9786-41f8-b196-3e4e3a5389db}}
* {{Cite journal|last=Derevinskyi|first=Vasyl|date=2015|title=Ukrainian Human Rights Organization (1971–1972)|url=https://oaji.net/articles/2015/739-1426694509.pdf|journal=European Journal of Social and Human Sciences|volume=5|issue=1|pages=19–23|issn=1339-6773|eissn=1339-875X}}
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* {{Cite journal|last=Derevinskyi|first=Vasyl|date=2023|title=Vyacheslav Chornovil i pytannya suverenitetu: vid ideyi do deklaratsiyi pro derzhavnyy suverenitet Ukrayiny|trans-title=Viacheslav Chornovil and the issue of sovereignty: from the idea to the declaration of state sovereignty of Ukraine|url=https://www.academia.edu/108849595|journal=History Pages|language=uk|issue=56|pages=328–340|doi=10.20535/2307-5244.56.2023.288789|doi-access=free}}
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* {{Cite journal|last=Kuzio|first=Taras|date=June 1996|author-link=Taras Kuzio|title=Kravchuk to Kuchma: The Ukrainian presidential elections of 1994|journal=The Journal of Communist Studies and Transition Politics|volume=12|issue=2|pages=117–144|doi=10.1080/13523279608415306|doi-access=free}}
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* {{Cite journal|last1=Lykhobova|first1=Zoia|last2=Kuzina|first2=Kseniia|date=April 2009|title=Lypnevi strayky 1989 roku v shakhtarskykh mistakh Donbasu|trans-title=The July strikes of 1989 in the mining cities of the Donbas|url=http://dspace.nbuv.gov.ua/handle/123456789/85577|journal=Ukraine in the 20th Century: Culture, Ideology, Politics|language=uk|volume=15|issue=1|pages=155–170|via=Scientific Electronic Library of Periodical Publications of the National Academy of Sciences of Ukraine|archive-date=30 August 2024|access-date=30 August 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240830052846/http://dspace.nbuv.gov.ua/handle/123456789/85577|url-status=dead}}
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* {{Cite journal|last=Poberezhets|first=Anna|date=2013|title=Uchast V. Chornovola ta Narodnoho Rukhu Ukrayiny v derzhavotvorchykh protsesakh 90-kh rr. XX st.|trans-title=Participation of V. Chornovil and the People's Movement of Ukraine in state-building processes in the 1990s|url=http://dspace.tnpu.edu.ua/handle/123456789/3975|journal=Scientific Notes of Ternopil Volodymyr Hnatiuk National Pedagogical University: History Series|language=uk|volume=1|issue=1|pages=114–118}}
* {{Cite journal|last=Potichnyj|first=Peter J.|author-link=Peter Potichnyj|date=June 1991|title=The Referendum and Presidential Elections in Ukraine|journal=[[Canadian Slavonic Papers]]|publisher=[[Taylor & Francis]]|volume=33|issue=2|pages=123–138|doi=10.1080/00085006.1991.11091956|jstor=40869291}}
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=== समाचार लेख और अन्य संसाधन ===
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* {{cite web|title=Chornovil, Viacheslav Maksymovych|url=http://w1.c1.rada.gov.ua/pls/radan_gs09/d_ank_arh?kod=35102|website=Verkhovna Rada|access-date=22 December 2014|language=uk|archive-date=21 August 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20130821122337/http://w1.c1.rada.gov.ua/pls/radan_gs09/d_ank_arh?kod=35102|url-status=live|ref={{sfnRef|2nd Verkhovna Rada}}}}
* {{cite web|title=People's Deputy of Ukraine of the III convocation|url=http://w1.c1.rada.gov.ua/pls/radan_gs09/d_ank_arh?kod=52703|website=Verkhovna Rada|access-date=22 December 2014|language=uk|archive-date=4 March 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304070740/http://w1.c1.rada.gov.ua/pls/radan_gs09/d_ank_arh?kod=52703|url-status=live|ref={{sfnRef|3rd Verkhovna Rada}}}}
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* {{Cite news|date=9 April 1999|title=Ukraine probes politician's death|url=https://news.bbc.co.uk/2/hi/europe/315859.stm|access-date=27 April 2025|work=[[BBC News]]|ref={{sfnRef|BBC News 1999}}}}
* {{Cite news|date=23 August 2006|title=Yushchenko vidkryv pamyatnyk Chornovolu i vidnovyv slidstvo|trans-title=Yushchenko opens monument to Chornovil and resumes investigation|url=https://www.bbc.com/ukrainian/domestic/story/2006/08/060823_chornovil_flag_oh|access-date=27 April 2025|work=[[BBC News Ukrainian]]|language=uk|ref={{sfnref|BBC News Ukrainian 2006}}}}
* {{Cite news|last=Bila|first=Andriana|date=24 December 2020|title=Dokumentalne kinodoslidzhennya. Chy mozhna mizh Chornovolom i Ukrayinoyu postavyty znak dorivnyuye?|trans-title=Documentary film study: Can one place an equal sign between Chornovil and Ukraine?|url=https://www.radiosvoboda.org/a/chornovil-dokumentalny-film/31015837.html|access-date=10 July 2024|work=Radio Free Europe/Radio Liberty|language=uk|archive-date=11 July 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240711023221/https://www.radiosvoboda.org/a/chornovil-dokumentalny-film/31015837.html|url-status=live}}
* {{Cite news|last=Bila|first=Andriana|date=22 August 2021|title=30 rokiv Nezalezhnosti Ukrayiny: vid vidnovlennya derzhavnosti do vtilennya idey Chornovola|trans-title=30 years of Ukraine's Independence: from the restoration of statehood to the implementation of Chornovil's ideas|url=https://www.radiosvoboda.org/a/vyacheslav-chornovil-film/31420418.html|access-date=23 April 2025|work=Radio Free Europe/Radio Liberty|language=uk}}
* {{Cite magazine |last=Blake |first=Patricia |date=1 December 1980 |title=SOVIET UNION: Killing the Spirit of Helsinki |url=https://time.com/archive/6858428/soviet-union-killing-the-spirit-of-helsinki/ |access-date=2 June 2024 |magazine=[[Time (magazine)|Time]] |archive-date=2 June 2024 |archive-url=https://web.archive.org/web/20240602092401/https://time.com/archive/6858428/soviet-union-killing-the-spirit-of-helsinki/ |url-status=live}}
* {{Cite news|last=Bondarenko|first=Kost|date=14 October 2002|title=Desyatylittya pid znakom Kuchmy|trans-title=A decade under Kuchma|url=https://www.pravda.com.ua/news/2002/10/14/2991073/|access-date=23 April 2025|work=Ukrainska Pravda|language=uk}}
* {{Cite news|last=Chornovil|first=Viacheslav|date=8 November 1975|title=V. Chornovil's letter to President Ford|url=https://www.ukrweekly.com/archive/1975/The_Ukrainian_Weekly_1975-43.pdf|access-date=2 June 2024|work=[[The Ukrainian Weekly]]|pages=2|archive-date=14 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240514061259/https://www.ukrweekly.com/archive/1975/The_Ukrainian_Weekly_1975-43.pdf|url-status=live}}
* {{Cite web|last=Chornovil|first=Viacheslav|title=Vyacheslav Chornovil: Avtobiohrafiya|url=https://rukhpress.com.ua/002005/index.phtml|archive-url=https://web.archive.org/web/20120102123224/http://rukhpress.com.ua/002005/print.phtml|url-status=live|archive-date=2 January 2012|access-date=14 May 2024|website=Rukh Press|language=uk|ref={{sfnRef|Chornovil, autobiography}}}}
* {{Cite book|url=https://chronicle-of-current-events.com/wp-content/uploads/2013/10/no-63-july-1983.pdf|title=A Chronicle of Current Events: No. 63|publisher=Amnesty International Publications|year=1983|isbn=0-86210-059-3|location=London|pages=163–164|ref={{sfnRef|A Chronicle of Current Events 1983}}}}
* {{Cite news|last=Clarity|first=James F.|date=12 February 1992|title=Free Ukraine's Nationalism: Will Pride Become Prejudice?|url=https://www.nytimes.com/1992/02/12/world/free-ukraine-s-nationalism-will-pride-become-prejudice.html|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20180116033206/https://www.nytimes.com/1992/02/12/world/free-ukraine-s-nationalism-will-pride-become-prejudice.html|archive-date=16 January 2018|access-date=3 November 2025|work=The New York Times}}
* {{Cite web|date=June 2019|title=The Helsinki Process: An Overview|url=https://www.csce.gov/sites/helsinkicommission.house.gov/files/The%20Helsinki%20Process%20Four%20Decade%20Overview.pdf|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20210815155808/https://www.csce.gov/sites/helsinkicommission.house.gov/files/The%20Helsinki%20Process%20Four%20Decade%20Overview.pdf|archive-date=15 August 2021|access-date=2 June 2024|website=[[Commission on Security and Cooperation in Europe]]|ref={{sfnRef|Commission on Security and Cooperation in Europe 2019}}}}
* {{Cite news|last=Dahlburg|first=John-Thor|date=21 November 1991|title=After Life as Dissident, Running for President of Ukraine Is Easy|url=https://www.latimes.com/archives/la-xpm-1991-11-21-mn-397-story.html|access-date=10 February 2025|work=[[The Los Angeles Times]]|archive-date=14 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240514061259/https://www.latimes.com/archives/la-xpm-1991-11-21-mn-397-story.html|url-status=live}}
* {{Cite news|last=Derevinskyi|first=Vasyl|date=5 March 2017|title=Kryminalna sprava "Ukrayinskoho visnyka"|trans-title=The criminal case of The Ukrainian Herald|url=https://tyzhden.ua/kryminalna-sprava-ukrainskoho-visnyka/|access-date=20 May 2024|work=[[The Ukrainian Week]]|language=uk|archive-date=26 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240526210852/https://tyzhden.ua/kryminalna-sprava-ukrainskoho-visnyka/|url-status=live|ref={{sfnRef|Derevinskyi 2017b}}}}
* {{Cite web|last1=Dubyk|first1=M. H.|last2=Zaitsev|first2=Yurii|date=2019|title=UKRAYiNSKYY VISNYK|trans-title=The Ukrainian Herald|url=http://resource.history.org.ua/cgi-bin/eiu/history.exe?Z21ID=&I21DBN=EIU&P21DBN=EIU&S21STN=1&S21REF=10&S21FMT=eiu_all&C21COM=S&S21CNR=20&S21P01=0&S21P02=0&S21P03=TRN=&S21COLORTERMS=0&S21STR=Ukrainskyj_visnyk_1970_z|access-date=17 May 2024|website=Encyclopedia of History of Ukraine|language=uk|archive-date=18 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240518020252/http://resource.history.org.ua/cgi-bin/eiu/history.exe?Z21ID=&I21DBN=EIU&P21DBN=EIU&S21STN=1&S21REF=10&S21FMT=eiu_all&C21COM=S&S21CNR=20&S21P01=0&S21P02=0&S21P03=TRN=&S21COLORTERMS=0&S21STR=Ukrainskyj_visnyk_1970_z|url-status=live}}
* {{Cite news|last=Erlanger|first=Steven|author-link=Steven Erlanger|date=29 March 1994|title=Economic Protest Seen in Ukrainian Election|url=https://www.nytimes.com/1994/03/29/world/economic-protest-seen-in-ukrainian-election.html|url-access=registration|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20240710123220/https://www.nytimes.com/1994/03/29/world/economic-protest-seen-in-ukrainian-election.html|archive-date=10 July 2024|access-date=27 February 2025|work=The New York Times}}
* {{Cite news|date=31 March 2018|title=Chornovil prosyv Yushchenka pity v prezydenty shche v 1999 rotsi, - Pynzenyk|trans-title="Chornovil asked Yushchenko to run for president in 1999" - Pynzenyk|url=https://espreso.tv/news/2018/03/31/chornovil_prosyv_yuschenka_pity_v_prezydenty_sche_1999_roku_pynzenyk|access-date=23 April 2025|work=[[Espreso TV]]|language=uk|ref={{sfnRef|Espreso TV 2018}}}}
* {{Cite news|date=24 December 2017|title=Lyudy zakhyshchaly Vyacheslava Chornovola vid militsiyi pislya mitynhiv|trans-title=People defended Viacheslav Chornovil from police after rallies|url=https://gazeta.ua/articles/history/_lyudi-zahischali-vyacheslava-cornovola-vid-miliciyi-pislya-mitingiv/811237|access-date=23 April 2025|work=Gazeta.ua|language=uk|ref={{sfnRef|Gazeta.ua 2017}}}}
* {{Cite news|date=8 December 2018|title=Pershyy Lenin vpav 1990 roku: yak skydaly idola komunizmu|trans-title=The first Lenin fell in 1990: how communism's idol was toppled|url=https://gazeta.ua/articles/politics/_pershij-lenin-vpav-1990-roku-yak-skidali-idola-komunizmu/873618|access-date=4 February 2025|work=[[Gazeta.ua]]|language=uk|archive-date=15 April 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210415161321/https://gazeta.ua/articles/politics/_pershij-lenin-vpav-1990-roku-yak-skidali-idola-komunizmu/873618|url-status=live|ref={{sfnRef|Gazeta.ua 2018}}}}
* {{Cite web|last1=Haran|first1=Oleksii|last2=Sydorchuk|first2=Oleksii|date=2010|title=Narodnyy rukh Ukrayiny|trans-title=People's Movement of Ukraine|url=http://resource.history.org.ua/cgi-bin/eiu/history.exe?Z21ID=&I21DBN=DOP&P21DBN=EIU&S21STN=1&S21REF=10&S21FMT=eiu_all&C21COM=S&S21CNR=20&S21P01=0&S21P02=0&S21P03=TRN=&S21COLORTERMS=0&S21STR=Narodnyj_rukh|access-date=16 February 2025|website=[[Encyclopedia of History of Ukraine]]|publisher=Institute of History of Ukraine|publication-place=Kyiv|archive-date=14 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240514061321/http://resource.history.org.ua/cgi-bin/eiu/history.exe?Z21ID=&I21DBN=DOP&P21DBN=EIU&S21STN=1&S21REF=10&S21FMT=eiu_all&C21COM=S&S21CNR=20&S21P01=0&S21P02=0&S21P03=TRN=&S21COLORTERMS=0&S21STR=Narodnyj_rukh|url-status=live}}
* {{Cite web|last1=Harasymiw|first1=Bohdan|last2=Koshelivets|first2=Ivan|last3=Senkus|first3=Roman|date=2015|title=Chornovil, Viacheslav|url=https://www.encyclopediaofukraine.com/display.asp?linkpath=pages%5CC%5CH%5CChornovilViacheslav.htm|access-date=14 May 2024|website=[[Encyclopedia of Ukraine]]|archive-date=10 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240510112338/https://www.encyclopediaofukraine.com/display.asp?linkpath=pages%5CC%5CH%5CChornovilViacheslav.htm|url-status=live}}
* {{Cite web|last=Hrytsenko|first=Yu. A.|title=Do 85-richchya vid dnya narodzhennya V. M. Chornovola (1937–1999), ukrayinskoho politychnoho ta derzhavnoho diyacha, zhurnalista, publitsysta, literaturnoho krytyka|trans-title=To the 85th birthday of V. M. Chornovil (1937–1999), Ukrainian political and state figure, journalist, publicist and literary critic|url=https://nlu.org.ua/vustavki.php?id=1167|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20231028000120/https://nlu.org.ua/vustavki.php?id=1167|archive-date=28 October 2023|access-date=6 June 2025|website=[[Yaroslav Mudryi National Library of Ukraine]]|language=uk}}
* {{Cite news|last=Hrytsiv|first=Mariia|date=12 January 2017|title=Areshtovana kolyada, abo Pohrom 12 sichnya 1972-ho|trans-title=The Arrested Koliada, or the 12 January 1972 pogrom|url=https://www.istpravda.com.ua/articles/2011/01/12/13866/|access-date=19 May 2024|work=Istorychna Pravda|language=uk|archive-date=15 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240515085629/https://www.istpravda.com.ua/articles/2011/01/12/13866/|url-status=live}}
* {{Cite news|date=19 May 2008|title=Yaroslav the Wise - the Greatest Ukrainian of all times|url=https://inter.ua/en/news/yaroslav-the-wise-the-greatest-ukrainian-of-all-times|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20250509171933/https://inter.ua/en/news/yaroslav-the-wise-the-greatest-ukrainian-of-all-times|archive-date=9 May 2025|access-date=23 April 2025|work=[[Inter (TV channel)|Inter]]|ref={{sfnRef|Inter 2008}}}}
* {{Cite news|date=24 August 2017|title=Vyacheslav Chornovil. Neuhomonnыy u borotbi za Ukrayinu|trans-title=Viacheslav Chornovil: Restless in the fight for Ukraine|url=https://www.istpravda.com.ua/articles/2017/08/24/150177/|access-date=17 May 2024|work=[[Ukrainska Pravda|Istorychna Pravda]]|language=uk|ref={{sfnRef|Istorychna Pravda 2017}}|archive-date=18 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240518020252/https://www.istpravda.com.ua/articles/2017/08/24/150177/|url-status=live}}
* {{Cite news|last=Ivanova|first=Kateryna|date=25 March 2024|title=25 rokiv z dnya zahybeli Vyacheslava Chornovola. Shlyakh polityka ta obstavyny zahybeli|trans-title=25 years since the day of Viacheslav Chornovil's death: the politician's path and circumstances of his death|url=https://glavcom.ua/country/society/25-rokiv-z-dnja-zahibeli-vjacheslava-chornovola-shljakh-politika-ta-obstavini-zahibeli-992626.html|access-date=14 May 2024|work=Glavcom|language=uk|archive-date=14 May 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240514072928/https://glavcom.ua/country/society/25-rokiv-z-dnja-zahibeli-vjacheslava-chornovola-shljakh-politika-ta-obstavini-zahibeli-992626.html|url-status=live}}
* {{Cite web|date=17 September 1999|title=Udovenko and Kostenko: Rukh contenders|url=https://jamestown.org/program/udovenko-and-kostenko-rukh-contenders/|access-date=23 April 2025|website=[[Jamestown Foundation]]|ref={{sfnRef|Jamestown Foundation 1999}}}}
* {{Cite news|last=Khalupa|first=Iryna|date=24 March 2004|title=Vyacheslav Chornovil yak symvol politychnoho lidera: do pyatoyi richnytsi zahybeli|trans-title=Viacheslav Chornovil as the symbol of a political leader: the fifth anniversary of his death|url=https://www.radiosvoboda.org/a/914027.html|access-date=23 April 2025|work=Radio Free Europe/Radio Liberty|language=uk}}
* {{Cite web|date=3 November 2006|title=Ukrayinska initsiatyvna hrupa za zvilnennya vyazniv sumlinnya|trans-title=Ukrainian Initiative Group for Liberation of Prisoners of Conscience|url=https://museum.khpg.org/1162536782|access-date=10 July 2024|website=Kharkiv Human Rights Protection Group|language=uk|ref={{sfnRef|Kharkiv Human Rights Protection Group 2006}}}}
* {{Cite news |last=Kheifets |first=Mikhail |date=9 December 2018 |title=Vyacheslav Chornovil – zekivskyy heneral. Frahment knyhy "Ukrayinski syluety" |trans-title=Viacheslav Chornovil – General of the Zeks: Fragments from the book 'Ukrainian Silhouettes' |url=https://www.istpravda.com.ua/articles/2018/12/9/153389/ |access-date=2 June 2024 |work=Istorychna Pravda |language=uk |archive-date=2 June 2024 |archive-url=https://web.archive.org/web/20240602050942/https://www.istpravda.com.ua/articles/201
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विनोद वर्मा (आभूषण वर्ल्ड)
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[[चित्र:News report about Vinod Verma, Founder of Aabhushan World, meeting with SP Buxar regarding security (April 2026) and his social work.jpg|thumb|right|विनोद वर्मा, बक्सर के पुलिस अधीक्षक (SP) के साथ सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा करते हुए (२०२६)।]]
'''विनोद वर्मा''' (जन्म: बक्सर, बिहार) एक भारतीय उद्यमी, संपादक और समाजसेवी हैं। वे प्रसिद्ध रत्न एवं आभूषण पत्रिका '''[[आभूषण वर्ल्ड]]''' (Aabhushan World) के संस्थापक और मुख्य संपादक हैं। इसके अतिरिक्त वे '''[[AIMA मीडिया]]''' से जुड़कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। उन्हें मुख्य रूप से रत्न एवं आभूषण उद्योग में सुधार और उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के लिए पहचाना जाता है।
परिचय
विनोद वर्मा भारत के एक उद्यमी, संपादक और मीडिया पेशेवर हैं। वे रत्न एवं आभूषण क्षेत्र से संबंधित प्रकाशन एवं डिजिटल मंच आभूषण वर्ल्ड (Aabhushan World) के संस्थापक एवं प्रधान संपादक के रूप में जाने जाते हैं। उनका कार्य आभूषण उद्योग से जुड़ी जानकारी, आयोजनों और पहल को प्रकाशित करने पर केंद्रित है। [संदर्भ]
प्रारंभिक जीवन
विनोद वर्मा का संबंध बिहार के बक्सर जिले से है। उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र की शुरुआत स्थानीय स्तर से की और बाद में मीडिया एवं आभूषण उद्योग से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। [संदर्भ]
करियर
विनोद वर्मा ने वर्ष 2017 के आसपास आभूषण वर्ल्ड मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना की, जिसका उद्देश्य रत्न एवं आभूषण उद्योग से संबंधित समाचार, विश्लेषण और गतिविधियों को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करना है। [संदर्भ]
यह मंच प्रिंट एवं डिजिटल दोनों माध्यमों में कार्य करता है और विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय आभूषण आयोजनों की कवरेज करता रहा है। [संदर्भ]
उपलब्धियाँ एवं सम्मान
वर्ष 2025 में विनोद वर्मा को मुंबई में आयोजित IIJS प्रीमियर के दौरान मीडिया फेलिसिटेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस उपलब्धि का उल्लेख Dainik Bhaskar सहित अन्य समाचार माध्यमों में प्रकाशित हुआ।
[संदर्भ] <ref>Dainik Bhaskar, "आईआईजेएस प्रीमियर 2025 में मिला मीडिया फेलिसिटेशन पुरस्कार", 18 अगस्त 2025</ref>
अंतरराष्ट्रीय सहभागिता
विनोद वर्मा ने थाईलैंड स्थित Gem and Jewelry Institute of Thailand तथा Department of International Trade Promotion से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर आभूषण उद्योग में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए हैं। [संदर्भ]
सामाजिक पहल
विनोद वर्मा विभिन्न सामाजिक एवं जन-जागरूकता गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। उन्होंने स्थानीय स्तर पर सामूहिक कार्यक्रमों और जनहित पहलों में भागीदारी की है। [संदर्भ]
== सामाजिक और सुरक्षा पहल ==
* **केदारनाथ आपदा (२०१३):** २०१३ में आई भीषण [[केदारनाथ]] आपदा के समय उन्होंने बक्सर के रामेश्वर नाथ मंदिर में सामूहिक प्रार्थना सभाओं और राहत कार्यों का सफल नेतृत्व किया था, ताकि मंदिर में जल्द से जल्द नियमित पूजा शुरू हो सके। इस कार्य को दैनिक जागरण और प्रभात खबर जैसे प्रमुख समाचार पत्रों ने प्रमुखता से कवर किया था।
* **स्वर्णकार सुरक्षा:** अप्रैल २०२६ में उन्होंने बक्सर के पुलिस अधीक्षक (SP) के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की और स्वर्णकारों की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और पुलिस गश्त बढ़ाने जैसे ठोस कदम उठाए।
== सन्दर्भ ==
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<references>
* "केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना को प्रार्थना", दैनिक जागरण, बक्सर संस्करण (२०१३)।
* "उत्तराखंड त्रासदी हेतु शांति सभा", प्रभात खबर (२०१३)।
* AIMA मीडिया आधिकारिक रिपोर्ट, अप्रैल २०२६।
</references>
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:बक्सर के लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय उद्यमी]]
[[श्रेणी:बिहार के समाजसेवी]]
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AMAN KUMAR
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'''विनोद वर्मा''' (जन्म: बक्सर, बिहार) एक भारतीय उद्यमी, संपादक और समाजसेवी हैं। वे प्रसिद्ध रत्न एवं आभूषण पत्रिका '''[[आभूषण वर्ल्ड]]''' (Aabhushan World) के संस्थापक और मुख्य संपादक हैं। इसके अतिरिक्त वे '''[[AIMA मीडिया]]''' से जुड़कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। उन्हें मुख्य रूप से रत्न एवं आभूषण उद्योग में सुधार और उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के लिए पहचाना जाता है।
परिचय
विनोद वर्मा भारत के एक उद्यमी, संपादक और मीडिया पेशेवर हैं। वे रत्न एवं आभूषण क्षेत्र से संबंधित प्रकाशन एवं डिजिटल मंच आभूषण वर्ल्ड (Aabhushan World) के संस्थापक एवं प्रधान संपादक के रूप में जाने जाते हैं। उनका कार्य आभूषण उद्योग से जुड़ी जानकारी, आयोजनों और पहल को प्रकाशित करने पर केंद्रित है। [संदर्भ]
प्रारंभिक जीवन
विनोद वर्मा का संबंध बिहार के बक्सर जिले से है। उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र की शुरुआत स्थानीय स्तर से की और बाद में मीडिया एवं आभूषण उद्योग से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। [संदर्भ]
करियर
विनोद वर्मा ने वर्ष 2017 के आसपास आभूषण वर्ल्ड मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना की, जिसका उद्देश्य रत्न एवं आभूषण उद्योग से संबंधित समाचार, विश्लेषण और गतिविधियों को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करना है। [संदर्भ]
यह मंच प्रिंट एवं डिजिटल दोनों माध्यमों में कार्य करता है और विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय आभूषण आयोजनों की कवरेज करता रहा है। [संदर्भ]
उपलब्धियाँ एवं सम्मान
वर्ष 2025 में विनोद वर्मा को मुंबई में आयोजित IIJS प्रीमियर के दौरान मीडिया फेलिसिटेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस उपलब्धि का उल्लेख Dainik Bhaskar सहित अन्य समाचार माध्यमों में प्रकाशित हुआ।
[संदर्भ] <ref>Dainik Bhaskar, "आईआईजेएस प्रीमियर 2025 में मिला मीडिया फेलिसिटेशन पुरस्कार", 18 अगस्त 2025</ref>
अंतरराष्ट्रीय सहभागिता
विनोद वर्मा ने थाईलैंड स्थित Gem and Jewelry Institute of Thailand तथा Department of International Trade Promotion से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर आभूषण उद्योग में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए हैं। [संदर्भ]
सामाजिक पहल
विनोद वर्मा विभिन्न सामाजिक एवं जन-जागरूकता गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। उन्होंने स्थानीय स्तर पर सामूहिक कार्यक्रमों और जनहित पहलों में भागीदारी की है। [संदर्भ]
== सामाजिक और सुरक्षा पहल ==
* **केदारनाथ आपदा (२०१३):** २०१३ में आई भीषण [[केदारनाथ]] आपदा के समय उन्होंने बक्सर के रामेश्वर नाथ मंदिर में सामूहिक प्रार्थना सभाओं और राहत कार्यों का सफल नेतृत्व किया था, ताकि मंदिर में जल्द से जल्द नियमित पूजा शुरू हो सके। इस कार्य को दैनिक जागरण और प्रभात खबर जैसे प्रमुख समाचार पत्रों ने प्रमुखता से कवर किया था।
* **स्वर्णकार सुरक्षा:** अप्रैल २०२६ में उन्होंने बक्सर के पुलिस अधीक्षक (SP) के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की और स्वर्णकारों की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और पुलिस गश्त बढ़ाने जैसे ठोस कदम उठाए।
== सन्दर्भ ==
{{reflist}}
<references>
* "केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना को प्रार्थना", दैनिक जागरण, बक्सर संस्करण (२०१३)।
* "उत्तराखंड त्रासदी हेतु शांति सभा", प्रभात खबर (२०१३)।
* AIMA मीडिया आधिकारिक रिपोर्ट, अप्रैल २०२६।
</references>
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:बक्सर के लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय उद्यमी]]
[[श्रेणी:बिहार के समाजसेवी]]
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पार्क्स कनाडा
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चाहर धर्मेंद्र
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कनाडा सरकार की संस्था
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}}
'''पार्क्स कनाडा''' ([[फ़्रान्सीसी भाषा|फ़्रांसीसी]]: Parcs Canada) कनाडा सरकार की वह प्रमुख संस्था है, जो देश की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा प्रबंधन के लिए उत्तरदायी है। इसके अधीन 37 राष्ट्रीय उद्यान, 11 राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य,<ref>{{Cite web |last=पार्क्स कनाडा एजेंसी |first=कनाडा सरकार|date=2025-12-10 |title=National parks - Parks Canada - National parks |url=https://parks.canada.ca/pn-np |access-date=2026-02-17 |website=parks.canada.ca}}</ref> 5 राष्ट्रीय समुद्री संरक्षण क्षेत्र,<ref>{{Cite web |last=पार्क्स कनाडा एजेंसी |first=कनाडा सरकार |date=2025-09-03 |title=National marine conservation areas - Parks Canada - Parks Canada |url=https://parks.canada.ca/amnc-nmca |access-date=2026-02-17 |website=parks.canada.ca}}</ref> 171 राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल,<ref>{{Cite web |last=पार्क्स कनाडा एजेंसी |first=कनाडा सरकार|date=2025-09-19 |title=National historic sites - Parks Canada - National historic sites |url=https://parks.canada.ca/lhn-nhs |access-date=2026-02-17 |website=parks.canada.ca}}</ref> एक राष्ट्रीय शहरी उद्यान—रूज राष्ट्रीय शहरी उद्यान—और एक राष्ट्रीय स्थलचिह्न—पिंगो—का संचालन और संरक्षण किया जाता है।
इस संस्था का मूल दायित्व केवल इन स्थलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कनाडा की [[प्रकृति|प्राकृतिक]] और [[सांस्कृतिक विरासत]] के राष्ट्रीय महत्व के उदाहरणों को इस प्रकार संरक्षित और प्रस्तुत किया जाए कि उनकी पारिस्थितिक और ऐतिहासिक अखंडता अक्षुण्ण बनी रहे। साथ ही, पार्क्स कनाडा का उद्देश्य जनसामान्य में इन धरोहरों के प्रति समझ, सराहना और आनंद की भावना को विकसित करना भी है, ताकि वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियाँ भी इन अमूल्य संसाधनों से लाभान्वित हो सकें।<ref>{{Cite web |last=पार्क्स कनाडा एजेंसी |first=कनाडा सरकार|date= जनवरी 4, 2018|title=The Parks Canada Mandate and Charter|url=https://www.pc.gc.ca/en/agence-agency/mandat-mandate|access-date= जनवरी 10, 2019|website=www.pc.gc.ca}}</ref>
इस प्रकार, यह संस्था संरक्षण और जनभागीदारी के बीच संतुलन स्थापित करते हुए एक ऐसे मॉडल का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ प्रकृति और इतिहास दोनों को समान रूप से महत्व दिया जाता है और उन्हें दीर्घकालिक दृष्टि से सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है।
== सन्दर्भ ==
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बोगद खान पर्वत
0
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6543378
2026-04-23T14:04:33Z
चाहर धर्मेंद्र
703114
मंगोलिया में पहाड़
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text/x-wiki
{{Infobox mountain
| name = बोग्द खान पर्वत
| photo = Bogd Khan Uul Mount view from Ulan Bator, Mongolia.JPG
| photo_caption = बोगद खान का उत्तरी भाग, [[उलान बतोर]] से देखा गया
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[[File:Bogd Khan Uul 2001.jpg|thumb|right|upright=1.5|एक उपग्रह चित्र, जिसमें केंद्र में बोगद खान पर्वत, उत्तर-पश्चिम कोने में [[उलान बतोर|उलानबातर]], शहर और पर्वत के बीच बहती [[तूल नदी|तुउल नदी]] , पर्वत के दक्षिण में [[ज़ूनमोद|ज़ूनमोद शहर]], पर्वत के पूर्व में [[नालाइख|नालाइख शहर]] और पर्वत के पश्चिम में बुयांत-उखा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दिखाई दे रहा है।]]
[[File:Bogd Khan Mountain.jpg|thumb|मंजुश्री मठ के पास की पहाड़ियाँ]]
'''बोगद खान पर्वत''' ([[मंगोल भाषा|मंगोलियाई]]: Богд хан-уул, अर्थ: ‘पवित्र खान पर्वत’) [[मंगोलिया]] का एक प्रमुख और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण [[पर्वत]] है। यह लगभग 2,261 मीटर (7,418 फीट) की ऊँचाई तक उठता हुआ देश की राजधानी [[उलान बतोर]] के दक्षिण में स्थित है और अपने भौगोलिक प्रभुत्व के कारण नगर के प्राकृतिक परिदृश्य का एक विशिष्ट अंग बनता है।<ref>[https://whc.unesco.org/en/tentativelists/936/ Mongolia Sacred Mountains: Bogd Khan, Burkhan Khaldun, Otgon Tenger – UNESCO World Heritage Centre]</ref>
यह पर्वत बोगद खान उउल जैवमंडल अभ्यारण्य के अंतर्गत संरक्षित है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता, वन्य जीवन और पारिस्थितिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र का संरक्षण केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मंगोलियाई परंपराओं और आस्था से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
==आधुनिक मान्यता==
बोगद खान पर्वत को मंगोलिया के अन्य पवित्र पर्वतों—[[बुरख़ान ख़लदुन]] और ओटगोंटेंगर—के साथ 6 अगस्त 1996 को सांस्कृतिक श्रेणी में [[यूनेस्को]] की [[विश्व धरोहर]] अस्थायी सूची में सम्मिलित किया गया था।<ref>{{Cite web |title=Sacred Mountains of Mongolia |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/6068/|journal=[[यूनेस्को]] |date=23 नवंबर 2015 }}</ref>
विश्व धरोहर स्थलों की संकल्पना उन स्थानों को मान्यता देने के लिए विकसित की गई है, जो अपनी असाधारण सार्वभौमिक महत्ता के कारण संपूर्ण मानवता के लिए मूल्यवान माने जाते हैं। ऐसे स्थल प्राकृतिक, सांस्कृतिक अथवा दोनों प्रकार के महत्व को अभिव्यक्त करते हैं और उनका संरक्षण वैश्विक स्तर पर आवश्यक समझा जाता है, ताकि उनकी विशिष्टता और विरासत भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुँच सके।
== सन्दर्भ ==
[[श्रेणी:मंगोलिया के पर्वत]]
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सोलो मियो
0
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लेख अनूदित किया
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text/x-wiki
{{Infobox film
| name = सोलो मियो
| image =
| caption = प्रचार पोस्टर
| director = चक किनाने<br>डैन किनाने
| writer = चक किनाने<br>डैन किनाने<br>केविन जेम्स
| producer = मार्क फसानो<br>जेफरी ग्रीनस्टीन
| starring = {{Plainlist|
* केविन जेम्स
* निकोल ग्रिमाउडो
* [[एलीसन हनिंगन]]
* जोनाथन रूमी
* जूली सेर्डा
* जूली ऐन एमरी
* आंद्रेया बोचेली
* किम कोट्स
}}
| cinematography = जेरेड फदेल
| editing = पीट किनाने
| music = जॉय न्गियाव
| studio = {{Plainlist|
* ए हायर स्टैण्डर्ड
* किनाने ब्रदर्स
* निकेल सिटी पिक्चर्स
}}
| distributor = एंजेल स्टूडियोज
| released = {{Film date|2026|1|20|कोकोनट ग्रोव सिनेपोलिस<ref>{{Cite web |date=जनवरी 20, 2026 |title=''Kevin James premieres new romantic comedy in Coconut Grov'' [PG] |url=https://www.local10.com/news/local/2026/01/20/kevin-james-premieres-new-romantic-comedy-in-coconut-grove/ |access-date=जनवरी 22, 2026 |website=लोकल 10 न्यूज़}}</ref>|2026|2|6|संयुक्त राज्य अमेरिका}}
| runtime = 96 मिनट<ref>{{Cite web |date=दिसम्बर 14, 2025 |title=''Solo Mio'' [PG] |url=https://www.classification.gov.au/titles/solo-mio |access-date=December 16, 2025 |website=ऑस्ट्रेलियन क्लाशिफिकेशन बोर्ड}}</ref>
| country = संयुक्त राज्य अमेरिका
| language = अंग्रेज़ी
| budget = $40 लाख<ref name="Yahoo">{{Cite web|url=https://www.yahoo.com/entertainment/movies/articles/kevin-james-months-long-fake-215202678.html|title=Kevin James' months-long fake teacher persona sets stage for 'Solo Mio' opening weekend success|last=बकाल |first=मैक्स|work=याहू एंटरटैनमेंट |date=फ़रवरी 12, 2026|accessdate=फ़रवरी 12, 2026}}</ref>
| gross = $2.62 करोड़<ref name="BOM">{{Cite web |title=Solo Mio |url=https://www.boxofficemojo.com/release/rl2967437313/?ref_=bo_we_table_5 |access-date=अप्रैल 10, 2026 |website=[[बॉक्स ऑफ़िस मोजो]]}}</ref><ref name="NUM">{{Cite web |title=Solo Mio - Box Office and Financial Information |url=https://www.the-numbers.com/movie/Solo-Mio-(2026)#tab=summary |access-date=अप्रैल 10, 2026 |website=द नम्बर्स}}</ref>
}}'''''सोलो मियो''''' (अनुवाद: केवल मैं) सन् 2026 में प्रमोचित अमेरिकी [[प्रेमकहानी फ़िल्म|प्रेमकहानी]] हास्य फ़िल्म है जिसका निर्देशेन चक किनाने और डैन किनाने ने किया। इसका कथानक पैट्रिक किनाने, जॉन किनाने और केविन जेम्स ने लिखा। इस फ़िल्म में जेम्स के साथ-साथ [[एलीसन हनिंगन]], किम कोट्स, निकोल ग्रिमाउडो और जोनाथन रूमी ने मुख्य अभिनय किया है।
फ़िल्म को 6 फ़रवरी 2026 को एंजेल स्टूडियो ने प्रमोचित किया।
== कथानक ==
मैट [[इटली]] में विवाह करने वाला था लेकिन उसी समय उसे उसकी [[वाग्दान|मंगेतर]] हैदर का पत्र मिलता है कि वो अभी विवाह के लिए तैयार नहीं है। मैट इससे बहुत परेशान होता है क्योंकि विवाह के लिए सभी तैयारियाँ हो चुकी थी। वो पहले हैदर को इधर उधर खोजता है लेकिन असफल रहने के बाद वो पहले से निर्धारित सभी गतिविधियों में अकेले ही शामिल होने का निर्णय लेता है। इस दौरान उसे दो विवाहित युगलों से सांत्वना मिलती है। वो लोग उसे बताते हैं कि उनके अपने रिश्ते भी एकदम अच्छे नहीं हैं।
एक स्थानीय कैफे में भोजन करते समय मैट की मुलाकात जिया से होती है। जिया उस कैफ़े की आकर्षक मालकिन है और वो मैट को नगर में घुमाने का प्रस्ताव रखती है। दोनों के बीच जल्द ही एक जुड़ाव हो जाता है हालांकि मैट स्वयं के इटली आने का कारण उसे नहीं बताता है। जैसे जैसे दोनों का रिश्ता आगे बढ़ता है, जिया उसे अंगूरों के खेत में लेकर जाती है। यहाँ मैट को समझ में आता है कि जिया का सम्बंध मशहूर इतालवी गायक [[एंड्रिया बोसेली]] से है। बोसेली ने मैट के पसंदीदा कलाकार [[एड शियरन]] के साथ काम किया था।
एक दिन जैसे ही जिया मैट को चुमने की कोशिश करती है, मैट अपना राज खोल देता है। वो उसे बताता है कि उसका विवाह हैदर के साथ कुछ दिन पहले होने वाला था। वो उसे वो पत्र भी दिखाता है जो मैट ने उसके लिए छोड़ा था। ये सब सुनकर जिया दुखी एवं हैरान होकर वहाँ से चली जाती है। निरास मैट इटली छोड़नी की तैयारी करने लगता है और इसी बीच उसे अपने होटेल के प्रतीक्षागृह में हैदर को देखता है। हैदर उसे छोड़कर जाने के लिए माफ़ी मांगती है और बताती है कि विवाह से पहले उसकी मुलाक़ात जिया से हुई थी। उन दोनों ने हैदर की नाखुशी के बारे में बात की थी और जिया (उस समय तक मैट से नहीं मिली थी) ने ही हैदर को मैट के लिए वो पत्र लिखने में मदद की थी।
अपने जीवन में आगे बढ़ने का इरादा रखकर मैट अपनी सगाई की अंगूठी बेच देता है। अंगूठी बेचने से प्राप्त धन से वो एक मोटरसायकिल क्रय कर लेता है और जिया के कैफ़े में वापस लौट आता है। जिया को यह बताने के बाद वो समझ गया कि जिया ने हैदर को पत्र लिखने में सहायता क्यों की थी। वो जिया को अपने साथ एड शियरन के संगीत समारोह में चलने का न्यौता देता है जिसे जिया खुशी-खुशी स्वीकार कर लेती है।
फ़िल्म के अंत में (श्रेय के दौरान) दिखाये गये दृश्यों में कुछ समय बीत जाने के बाद मैट और जिया इटली में विवाह करते हुये दिखाई देते हैं। इस विवाह में वो दोनों विवाहित युगल भी शामिल होते हैं जिन्होंने मैट की सहायता की थी। विवाह की रस्म के दौरान उन दोनों युगलों के पास भी अपने जीवन की कुछ नई उपलब्धियों का जश्न मनाने का मौका होता है।
== कलाकार ==
* केविन जेम्स – मैट टेलर
* [[एलीसन हनिंगन]] – मेघन
* निकोल ग्रिमाउडो – जिया
* किम कोट्स – जूलियन
* जोनाथन रूमी – नील
* जूली सेर्डा – डोना
* जूली एन एमरी – हैदर
* कैटेरिना सिल्वा – क्लाउडिया
* एलेसेंड्रो कार्बोनेरा – मार्सेलो
इतालवी टेनर (तत्त्व) [[एंड्रिया बोसेली]] इसमें अपने ही एक काल्पनिक रूप में अभिनय करते हैं। [[एड शियरन]] इस फ़िल्म में स्वयं के रूप में अभिनय करते हैं।
== निर्माण ==
मई 2024 में यह घोषणा की गयी कि जेम्स फ़िल्म में काम करेंगे।<ref name="kay">{{cite web|url=https://www.screendaily.com/news/kevin-james-to-star-in-rom-com-solo-mio-a-higher-standard-launching-cannes-sales-exclusive/5193049.article|title=Kevin James to star in rom-com 'Solo Mio'; A Higher Standard launching Cannes sales (exclusive)|last=के|first=जेरेमी|date=मई 6, 2024|website=स्क्रीन डैली|accessdate=मई 31, 2025}}</ref> अक्टूबर 2024 में यह घोषणा हुई कि फ़िल्मांकन का काम [[रोम]] में चल रहा है।<ref>{{cite web|url=https://deadline.com/2024/10/alyson-hannigan-kevin-james-solo-mio-1236116464/|title=Alyson Hannigan, Nicole Grimaudo, Kim Coates & More Board Kevin James Rom-Com 'Solo Mio'|last=डीयलेसेंद्रो|first=एंथनी|date=अक्टूबर 15, 2024|website=डेडलाइन हॉलीवुड|accessdate=मई 31, 2025}}</ref> जून 2025 में यह घोषणा हुई कि जॉय न्गियाव फ़िल्म संगीतकार के रूप में सेवायें देंगी।<ref>{{cite web|url=https://filmmusicreporter.com/2025/06/30/joy-ngiaw-to-score-charles-daniel-kinnanes-solo-mio/|title=Joy Ngiaw to Score Charles & Daniel Kinnane's 'Solo Mio'|website=फ़िल्म म्यूज़िक रिपोर्टर|access-date=2025-06-30}}</ref>
=== विपणन ===
15 अक्टूबर 2025 को [[टिकटॉक]] और [[इंस्टाग्राम]] जैसे सोशल मीडिया खातों पर "दिस इज मैट टेलर" (@thisismatttaylor; अनुवाद: ये मैट टेलर है) टैग के साथ वीडियो सामग्री अपलोड की जाने लगी। इससे ज्ञात हुआ कि जेम्स फ़िल्म में अपने अभिनय का चित्रण कर रहे हैं। इनमें टेलर की कला कक्षा, उनके विद्यार्थी और अन्य वस्तुओं की झलक दिखाई मिलती थी। आखिरकार यह सिलसिला टेलर के विवाह प्रस्ताव और विवाह वाले वीडियो तक पहुँचा। इस तरह लगभग प्रतिदिन नये वीडियो डाले गये।<ref>https://www.instagram.com/thisismatttaylor/</ref><ref>https://www.tiktok.com/@thisismatttaylor?lang=en</ref>
ये सोशल मीडिया खाते जब सामने आये थे तब कई ऑनलाइन उपयोगकर्ताओं को फ़िल्म के निर्माण के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इस कारण ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि क्या केविन जेम्स किसी फ़िल्म का प्रचार कर रहे हैं या फिर सचमुच कोई कला शिक्षक हैं जिनका चेहरा उनसे मिलता-जुलता है।<ref>{{cite web|url=https://www.usatoday.com/story/entertainment/celebrities/2025/11/17/matt-taylor-tiktok-kevin-james/87324884007/|title=Who is Matt Taylor? TikTok personality sparks speculation about Kevin James alter ego|last=सेगारा|first=एडवर्ड|date=17 नवम्बर 2025|website=यूएसए टुडे|access-date=2026-02-04}}</ref> बहरहाल ये खाते दोनों सोशल मीडिया मंचों पर बहुत सफ़ल रहे; फ़रवरी 2026 तक इंस्टाग्राम पर इसके अनुसरणकर्ताओं की संख्या 507,000 तक पहुँच गयी जबकि इसी समय टिकटॉक पर यह संख्या 856,800 तक पहुँची।
8 फ़रवरी को फुटबॉल प्रतियोगिता सुपर बाउल 60 में दर्शकों के मध्य जेम्स, मैट टेलर के रूप में दिखाई दिये। उन्हें यहाँ देखा जाना सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।<ref>{{Cite web|url=https://www.filmogaz.com/143350|title=Matt Taylor and Kevin James spark Super Bowl buzz with “heartbroken” in-stadium stunt|last=FilmoGaz|date=2026-02-10|website=FilmoGaz|language=en|access-date=2026-02-10}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://tribune.com.pk/story/2591749/kevin-james-sparks-super-bowl-buzz-with-viral-heartbreak-stunt-during-bad-bunny-halftime-show|title=Kevin James sparks Super Bowl buzz with viral heartbreak stunt during Bad Bunny halftime show|last=|first=|date=2026-02-10|website=द एक्सप्रेस ट्रिब्यून|language=en|access-date=2026-02-10}}</ref>
== संगीत ==
''सोलो मियो'' का संगीत जॉय न्गियाव ने दिया जिसमें 15 गाने शामिल हैं।<ref>{{Cite web|url=https://moviemusicuk.us/2026/03/02/solo-mio-joy-ngiaw/|title=SOLO MIO – Joy Ngiaw|date=2026-03-02|website=MOVIE MUSIC UK|language=en|access-date=2026-04-11}}</ref>
== प्रमोचन ==
''सोलो मियो'' को सबसे पहले 20 जनवरी 2026 को कोकोनट ग्रोव सिनेपोलिस में दिखाया गया।<ref>{{Cite web|url=https://www.local10.com//news/local/2026/01/20/kevin-james-premieres-new-romantic-comedy-in-coconut-grove/|title=Kevin James premieres new romantic comedy in Coconut Grove|last=Carter|first=Jason|last2=Reporter|first2=Entertainment|date=2026-01-21|website=wplg|language=en|access-date=2026-01-22}}</ref> संयुक्त राज्य अमेरिका में फ़िल्म को 6 फरवरी 2026 को प्रमोचित किया गया।<ref name="goldsmith">{{cite web|url=https://deadline.com/2025/05/angel-studios-solo-mio-kevin-james-alyson-hannigan-jonanthan-roumie-1236413209/|title=Angel Studios Sets Release For 'Solo Mio' With Kevin James, Alyson Hannigan, Jonathan Roumie|last=गोल्डस्मिथ|first=जिल|date=मई 29, 2025|website=डेडलाइन हॉलीवुड|accessdate=मई 31, 2025}}</ref>
== स्वीकृति ==
रिव्यू एग्रीगेटर वेबसाइट [[रॉटेन टमेटोज़|रॉटन टोमाटोज़]] पर, 54 समालोचकों की 83% समीक्षाएँ सकारात्मक हैं। वेबसाइट की आम सहमति के अनुसार "दिल टूटने से उबरने के लिए केविन जेम्स की मिलनसार स्टार पावर और रोम के खूबसूरत दृश्यों का लाभ उठाते हुए, सोलो मियो एक सुखद अनुभव है।"<ref>{{Cite web|url=https://www.rottentomatoes.com/m/solo_mio|title=Solo Mio {{!}} Rotten Tomatoes|website=www.rottentomatoes.com|language=en|access-date=2026-04-23}}</ref> भारित औसत का उपयोग करने वाली वेबसाइट [[मेटाक्रिटिक]] पर आठ समालोचकों के आधार पर फिल्म को 100 में से 48 का स्कोर मिला।<ref>{{Cite web|url=https://www.metacritic.com/movie/solo-mio/|title=Solo Mio Reviews - Metacritic|website=www.metacritic.com|language=en|access-date=2026-04-23}}</ref> सिनेमास्कोर द्वारा मतदान किए गए दर्शकों ने फिल्म को ए+ से एफ पैमाने पर "ए-" का औसत ग्रेड दिया।<ref>{{Cite web|url=https://www.cinemascore.com/|title=Home|website=सिनेमास्कोर|language=en-US|access-date=फ़रवरी 6, 2026}}</ref>
== सन्दर्भ ==
{{Reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* {{IMDb title|32306991}}
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प्राकृतिक उद्यान
0
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चाहर धर्मेंद्र
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कुछ देशों में संरक्षित क्षेत्र का प्रकार
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wikitext
text/x-wiki
[[File:Hutovo Blato sunset.jpg|thumb|400px|[[बॉस्निया और हर्ज़ेगोविना]] में स्थित हुटोवो ब्लाटो संरक्षित दलदली भूमि और पक्षी अभयारण्य है।]]
'''प्राकृतिक उद्यान''', ऐसे [[संरक्षित क्षेत्र]] होते हैं जिन्हें दीर्घकालिक भूमि नियोजन, सतत [[प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन|संसाधन प्रबंधन]] तथा [[कृषि]] और अचल संपत्ति विकास पर नियंत्रित प्रतिबंधों के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है। इन उद्यानों का मूल उद्देश्य मूल्यवान प्राकृतिक [[भूदृश्य|भूदृश्यों]] को उनकी वर्तमान [[पारिस्थितिकी]] अवस्था में संरक्षित बनाए रखना होता है, ताकि उनकी जैव विविधता, प्राकृतिक संतुलन और सौंदर्य अक्षुण्ण रह सके।<ref>{{cite book |editor1-last=संतराम |editor2-last=वात्स्य |title=Svāmī Rāmatīrtha
|url=https://www.google.co.th/books/edition/Sv%C4%81m%C4%AB_R%C4%81mat%C4%ABrtha/nrkgAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8&dq=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8&printsec=frontcover|date= 1973 |publisher=सन्मार्ग प्रकाशन}}</ref> साथ ही, इन्हें इस प्रकार विकसित किया जाता है कि वे [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] को प्रोत्साहित करें और लोगों को प्रकृति के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील बनाएं।
अधिकांश देशों में प्राकृतिक उद्यानों को विधिक संरक्षण प्राप्त होता है, जो उनके राष्ट्रीय [[संरक्षण नियम|संरक्षण कानूनों]] का अभिन्न हिस्सा होता है। यह कानूनी ढाँचा सुनिश्चित करता है कि इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियाँ नियंत्रित रहें और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग संतुलित एवं सतत रूप से किया जाए, जिससे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियाँ भी इन अमूल्य प्राकृतिक धरोहरों का लाभ उठा सकें।
==इन्हें भी देखें==
* [[चिड़ियाघर]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
==बाहरी कड़ियाँ==
{{Wiktionary|Nature park}}
{{commons category|Nature parks}}
* [http://www.Naturparke.de जर्मन प्रकृति पार्क संघ का होम पेज]
* [http://www.Naturparke.at ऑस्ट्रियाई प्रकृति पार्क संघ का होम पेज]
* [http://www.paerke.ch स्विस पार्क नेटवर्क का होम पेज]
* [http://www.provinz.bz.it/natur/2803/index_d.asp दक्षिण टायरॉल प्रकृति पार्कों का होमपेज]
* [https://web.archive.org/web/20070612050803/http://www.europarc-deutschland.de/pages/index.htm यूरोपार्क जर्मनी]
d2se8gg1mfl6xwbdjo1ujyx94xrppp8
नीड फ़ॉर स्पीड: अंडरग्राउंड राइवल्स
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2026-04-23T15:29:26Z
आयुष दास
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"[[:en:Special:Redirect/revision/1328731385|Need for Speed: Underground Rivals]]" पृष्ठ का अनुवाद करके निर्मित किया गया
6543398
wikitext
text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम
| title = नीड फ़ॉर स्पीड: अंडरग्राउंड राइवल्स
| developer = Team Fusion
| publisher = [[Electronic Arts]]
| released = {{vgrelease|JP|फरवरी 24, 2005|NA|मार्च 14, 2005|EU|सितंबर 1, 2005}}
| genre = [[Racing video games|रेसिंग]]
| series = ''[[नीड फ़ॉर स्पीड]]''
| designer = डेविड सेमोर
}}नीड फ़ॉर स्पीड: अंडरग्राउंड राइवल्स 2005 का एक रेसिंग वीडियो गेम है जिसे Team Fusion के ज़रिये तैयार किया गया है और PlayStation Portable के लिए Electronic Arts के ज़रिये जारी किया गया है। यह PlayStation Portable के लिए जारी किया गया पहला नीड फ़ॉर स्पीड टाइटल है। यह अंडरग्राउंड टाइटल का एक PSP स्पिन-ऑफ़ है और एक बहुत ही मिलता जुलता गेमप्ले शैली का पेरवी करता है।
== गेमप्ले ==
रेस ईवेंट सिर्फ़ रात में होती हैं और प्लेयर खुलकर घूम नहीं सकते हैं। अधिक प्रदर्शन और दृश्य अपग्रेड को अनलॉक करने के लिए ट्यूनिंग गेम का एक बुनियादी पहलू है, प्लेयर को 'अपग्रेड अंक' जमा करना होता हैं।
प्लेयर अंडरग्राउंड (करियर) और क्विक रेस दोनों मोड में खेल सकते हैं। अन्डरग्राउंड मोड चार कठिनाई स्तरों पर उपलब्ध है। आंकड़े माई अंडरग्राउंड में ड्राइवर स्टेटस स्क्रीन पर देखे जा सकते हैं।
=== गेम मोड ===
* '''सर्किट रेस:''' इस मोड को चार वर्गों में विभाजित किया गया हैः मास्टर, नौसिखिया, प्रो और कार विशिष्टता। पहले तीन सिर्फ़ ताक़त की पाबंदी के साथ रेस ईवेंट हैं, जबकि कार स्पेक सिर्फ़ आवश्यक कारों को विशिष्ट ईवेंट में शामिल होने की इजाज़त देता है।
* '''ड्रैग रेस:''' एक लंबी, सीधी रेस में, प्लेयर अपनी कार को टॉप स्पीड तक ले जाते हैं। इस मोड को सिर्फ़ मैनुअल ट्रांसमिशन के साथ खेला जा सकता है।
* '''ड्रिफ्ट अटैकः''' प्लेयर को ज़मीन पर रखे गए विभिन्न मार्करों के तहत ड्रिफ्ट करना होता है। विजेता वह होता है जो सबसे ज़्यादा ड्रिफ्ट अंक जमा करता है।
* '''लैप नॉकआउट रेस:''' कोई भी प्लेयर जो अंतिम स्थान पर लैप पूरा करता है, उसे बाहर कर दिया जाता है। यह तब तक जारी रहता है जब तक कि सिर्फ़ एक प्लेयर नहीं रह जाता।
* '''नाइट्रस रन:''' रेस जीतने के लिए, प्लेयर को एक चौकी (जिसे "गेट" कहा जाता है) से दूसरे तक जाना पड़ता है। एक गेट से गुज़रने से वक़्त और नाइट्रस जुड़ जाता है।
* '''स्ट्रीट क्रॉस:''' रेसर्स एक तंग आंतरिक परिपथ पर गाड़ी चलाएंगे जिसमें बुनियादी तौर पर 90° और 180° मोड़ होते हैं। स्ट्रीट क्रॉस बहुत हद तक स्ट्रीट एक्स पर बुनियाद है।
* '''रैली रिले:''' प्लेयर एक परिपथ के चारों ओर दो चक्कर मुकम्मल करते हैं। पहला लैप पूरा करने के बाद, प्लेयर को वाहन बदलना होगा।
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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आयुष दास
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प्लेटफॉर्म का नाम जोड़ा गया।
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text/x-wiki
{{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम
| title = नीड फ़ॉर स्पीड: अंडरग्राउंड राइवल्स
| developer = Team Fusion
| publisher = [[Electronic Arts]]
| released = {{vgrelease|JP|फरवरी 24, 2005|NA|मार्च 14, 2005|EU|सितंबर 1, 2005}}
| genre = [[Racing video games|रेसिंग]]
| series = ''[[नीड फ़ॉर स्पीड]]''
| designer = डेविड सेमोर
| platforms = PlayStation Portable
}}नीड फ़ॉर स्पीड: अंडरग्राउंड राइवल्स 2005 का एक रेसिंग वीडियो गेम है जिसे Team Fusion के ज़रिये तैयार किया गया है और PlayStation Portable के लिए Electronic Arts के ज़रिये जारी किया गया है। यह PlayStation Portable के लिए जारी किया गया पहला नीड फ़ॉर स्पीड टाइटल है। यह अंडरग्राउंड टाइटल का एक PSP स्पिन-ऑफ़ है और एक बहुत ही मिलता जुलता गेमप्ले शैली का पेरवी करता है।
== गेमप्ले ==
रेस ईवेंट सिर्फ़ रात में होती हैं और प्लेयर खुलकर घूम नहीं सकते हैं। अधिक प्रदर्शन और दृश्य अपग्रेड को अनलॉक करने के लिए ट्यूनिंग गेम का एक बुनियादी पहलू है, प्लेयर को 'अपग्रेड अंक' जमा करना होता हैं।
प्लेयर अंडरग्राउंड (करियर) और क्विक रेस दोनों मोड में खेल सकते हैं। अन्डरग्राउंड मोड चार कठिनाई स्तरों पर उपलब्ध है। आंकड़े माई अंडरग्राउंड में ड्राइवर स्टेटस स्क्रीन पर देखे जा सकते हैं।
=== गेम मोड ===
* '''सर्किट रेस:''' इस मोड को चार वर्गों में विभाजित किया गया हैः मास्टर, नौसिखिया, प्रो और कार विशिष्टता। पहले तीन सिर्फ़ ताक़त की पाबंदी के साथ रेस ईवेंट हैं, जबकि कार स्पेक सिर्फ़ आवश्यक कारों को विशिष्ट ईवेंट में शामिल होने की इजाज़त देता है।
* '''ड्रैग रेस:''' एक लंबी, सीधी रेस में, प्लेयर अपनी कार को टॉप स्पीड तक ले जाते हैं। इस मोड को सिर्फ़ मैनुअल ट्रांसमिशन के साथ खेला जा सकता है।
* '''ड्रिफ्ट अटैकः''' प्लेयर को ज़मीन पर रखे गए विभिन्न मार्करों के तहत ड्रिफ्ट करना होता है। विजेता वह होता है जो सबसे ज़्यादा ड्रिफ्ट अंक जमा करता है।
* '''लैप नॉकआउट रेस:''' कोई भी प्लेयर जो अंतिम स्थान पर लैप पूरा करता है, उसे बाहर कर दिया जाता है। यह तब तक जारी रहता है जब तक कि सिर्फ़ एक प्लेयर नहीं रह जाता।
* '''नाइट्रस रन:''' रेस जीतने के लिए, प्लेयर को एक चौकी (जिसे "गेट" कहा जाता है) से दूसरे तक जाना पड़ता है। एक गेट से गुज़रने से वक़्त और नाइट्रस जुड़ जाता है।
* '''स्ट्रीट क्रॉस:''' रेसर्स एक तंग आंतरिक परिपथ पर गाड़ी चलाएंगे जिसमें बुनियादी तौर पर 90° और 180° मोड़ होते हैं। स्ट्रीट क्रॉस बहुत हद तक स्ट्रीट एक्स पर बुनियाद है।
* '''रैली रिले:''' प्लेयर एक परिपथ के चारों ओर दो चक्कर मुकम्मल करते हैं। पहला लैप पूरा करने के बाद, प्लेयर को वाहन बदलना होगा।
[[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]]
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सदस्य वार्ता:JAGDISH17
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चाहर धर्मेंद्र
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सूचना: [[:Draft:श्रव्य-दृश्य अनुवाद]] को शीघ्र हटाने का नामांकन
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इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है।
यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें।
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JAGDISH17
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/* Draft:श्रव्य-दृश्य अनुवाद पृष्ठ को शीघ्र हटाने का नामांकन */ उत्तर
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इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है।
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:मैंने आपको Gmail किया है यहां भी आपसे निवेदन कर देता हु
:भाई मै खुद राजस्थान से हु वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी में मास्टर्स कर रहा हु हमें यह शोध पत्र लिखने का विषय दिया गया है। अगर आपको इसमें कोई सुधार करना या हटवाना है तो कृपया कुछ दिनों का इंतजार करे वैसे भी यह ड्राफ्ट है मुख्य पेज नहीं आपसे विनती है मेरे यह टास्क मई माह की सेमेस्टर परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण है अगर आप सुधार करना चाहे तो यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात होगी लेकिन आप इन्हें एकदम से हटाने का अनुरोध न करे हमने शोध कार्य कर इस पेज को बनाया है पूरी मेहनत से । आशा है आप ऐसा नहीं करेंगे जब तक मेरी परीक्षाएं खत्म नहीं हो जाती है उसके बाद हम इस विषय पर अच्छे से बात करके अच्छा योगदान देंगे इस विषय पर विकिपीडिया को [[सदस्य:JAGDISH17|JAGDISH17]] ([[सदस्य वार्ता:JAGDISH17|वार्ता]]) 18:55, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
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आयुष दास
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{{उचित उपयोग औचित्य
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== सारांश ==
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वार्ता:विनोद वर्मा (आभूषण वर्ल्ड)
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/* शीघ्र हटाने पर चर्चा */ नया अनुभाग
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
इस पृष्ठ को साफ़ प्रचार होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[विशेष:योगदान/~2026-24918-27|~2026-24918-27]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-24918-27|वार्ता]]) 16:16, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
यह लेख तटस्थता के अनुरूप संशोधित किया जा रहा है।
प्रचारात्मक भाषा को हटाया जा रहा है और सामग्री को विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर सुधारा जा रहा है।
लेख में केवल सत्यापित और प्रकाशित जानकारी ही रखी जाएगी।
यदि आवश्यक हो तो अतिरिक्त स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोत भी जोड़े जाएंगे।
अतः कृपया सुधार के लिए कुछ समय प्रदान किया जाए।
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text/x-wiki
विनोद वर्मा बिहार के बक्सर जिले से जुड़े एक भारतीय उद्यमी हैं। वे आभूषण वर्ल्ड नामक एक प्रकाशन एवं डिजिटल मंच से संबंधित हैं, जो आभूषण उद्योग से जुड़ी सामग्री प्रकाशित करता है।
परिचय
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, विनोद वर्मा का कार्य आभूषण क्षेत्र से संबंधित मीडिया गतिविधियों तक सीमित है। वे प्रिंट और डिजिटल माध्यमों के माध्यम से उद्योग से जुड़ी जानकारी प्रस्तुत करने से जुड़े रहे हैं।
करियर
विनोद वर्मा ने वर्ष 2017 के आसपास आभूषण वर्ल्ड की शुरुआत की। यह मंच आभूषण उद्योग से संबंधित समाचार और अन्य सामग्री प्रकाशित करता है।
सार्वजनिक स्रोतों में उनके कार्य के बारे में विस्तृत स्वतंत्र जानकारी सीमित है।
मान्यता
समाचार स्रोतों में उल्लेख है कि आभूषण वर्ल्ड को वर्ष 2025 में एक उद्योग आयोजन के दौरान मीडिया फेलिसिटेशन से संबंधित सम्मान प्राप्त हुआ।
संदर्भ
HTML
<ref>{{cite news
|title=आईआईजेएस प्रीमियर 2025 में मिला मीडिया फेलिसिटेशन पुरस्कार
|url=https://www.bhaskar.com/..... (FULL LINK)
|publisher=Dainik Bhaskar
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सदस्य वार्ता:Ранко Николић
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2026-04-23T16:55:39Z
J ansari
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J ansari ने पृष्ठ [[सदस्य वार्ता:Ранко Николић]] को [[सदस्य वार्ता:Ран-кан]] पर स्थानांतरित किया: "[[Special:CentralAuth/Ранко Николић|Ранко Николић]]" का नाम "[[Special:CentralAuth/Ран-кан|Ран-кан]]" करते समय पृष्ठ स्वतः स्थानांतरित हुआ
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text/x-wiki
#पुनर्प्रेषित [[सदस्य वार्ता:Ран-кан]]
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त्रिनणापोप थोंगचाय
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Mtmew
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नया पृष्ठ: {{Infobox person | name = त्रिनणापोप थोंगचाय | native_name = ตฤณณภพ ทองฉาย | native_name_lang = th | image = Trinnaphop.jpg | caption = 2025 में त्रिनणापोप थोंगचाय | birth_name = थनादच श्रीरत्चाहार | birth_date = {{Birth date and age|2006|4|21|df=y}} | birth_place...
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{{Infobox person
| name = त्रिनणापोप थोंगचाय
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| alma_mater = मीन चुआन विश्वविद्यालय, ताइवान
| years_active = 2018–वर्तमान
}}
'''त्रिनणापोप थोंगचाय''' ({{भाषा-थाई|ตฤณณภพ ทองฉาย}}; जन्म 21 अप्रैल 2006), जिन्हें उनके उपनाम '''आफोंग''' के नाम से भी जाना जाता है, एक थाई अभिनेता और गायक हैं।<ref name="tpop">{{Cite web|url=https://tpop.fandom.com/th/wiki/%E0%B8%AD%E0%B8%B2%E0%B8%9F%E0%B8%87|title=Afong Profile - T-pop Wiki|access-date=24 April 2026|language=th}}</ref> वह चैनल 3 के लोकप्रिय नाटकों जैसे 'लव डेस्टिनी' (2018) और '[[Krong Kam]]' (2019) में अपनी भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। <ref name="tmdb">{{Cite web|url=https://www.themoviedb.org/person/6105683|title=Trinnaphop Thongchay Acting Credits|website=TMDB|access-date=24 April 2026}}</ref>
वह वर्तमान में ताइवान में रह रहे हैं और '''मीन चुआन विश्वविद्यालय''' (MCU) में कम्युनिकेशन आर्ट्स की पढ़ाई कर रहे हैं। <ref name="mcu">{{Cite web|url=https://www.mcu.edu.tw|title=Ming Chuan University - International Students|access-date=24 April 2026}}</ref> अपनी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के कारण, वह थाई और मंदारिन चीनी भाषा में पारंगत हैं।
==करियर==
त्रिनणापोप ने अपने करियर की शुरुआत एक मॉडल और अभिनेता के रूप में की थी। एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में, उन्हें मार्च 2025 में प्रतिष्ठित '''द गिटार मग अवार्ड्स''' में "न्यू फेस ऑफ द ईयर" के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। <ref name="guitarmag">{{Cite web|url=https://www.theguitarmag.com|title=The Guitar Mag Awards 2025 Winners|access-date=24 April 2026}}</ref> उनकी डिस्कोग्राफी में 'DAYDREAM STATION' (2024) और 'Midnight Walk' (2025) जैसे एल्बम शामिल हैं। <ref name="spotify">{{Cite web|url=https://open.spotify.com|title=Thongchay on Spotify|access-date=24 April 2026}}</ref>
==फ़िल्मोग्राफ़ी==
===टेलीविज़न===
* 2018: लव डेस्टिनी (Bupphesanniwat)
* 2019: [[Krong Kam]] (सिंघ के रूप में)
* 2025: चाओ खुन फी कप ई-नांग खाम दुआंग
==संदर्भ==
{{Reflist}}
==बाहरी कड़ियाँ==
* {{imdb name|6105683|त्रिनणापोप थोंगचाय}}
* {{Instagram|trinaphop}}
[[श्रेणी:2006 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:थाई अभिनेता]]
[[श्रेणी:थाई गायक]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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Mtmew
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text/x-wiki
{{Infobox person
| name = त्रिनणापोप थोंगचाय
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| caption = 2025 में त्रिनणापोप थोंगचाय
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'''त्रिनणापोप थोंगचाय''' ({{भाषा-थाई|ตฤณณภพ ทองฉาย}}; जन्म 21 अप्रैल 2006), जिन्हें उनके उपनाम '''आफोंग''' के नाम से भी जाना जाता है, एक थाई अभिनेता और गायक हैं।<ref name="tpop">{{Cite web|url=https://tpop.fandom.com/th/wiki/%E0%B8%AD%E0%B8%B2%E0%B8%9F%E0%B8%87|title=Afong Profile - T-pop Wiki|access-date=24 April 2026|language=th}}</ref> वह चैनल 3 के लोकप्रिय नाटकों जैसे 'लव डेस्टिनी' (2018) और '[[Krong Kam]]' (2019) में अपनी भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। <ref name="tmdb">{{Cite web|url=https://www.themoviedb.org/person/6105683|title=Trinnaphop Thongchay Acting Credits|website=TMDB|access-date=24 April 2026}}</ref>
वह वर्तमान में ताइवान में रह रहे हैं और '''मीन चुआन विश्वविद्यालय''' (MCU) में कम्युनिकेशन आर्ट्स की पढ़ाई कर रहे हैं। <ref name="mcu">{{Cite web|url=https://www.mcu.edu.tw|title=Ming Chuan University - International Students|access-date=24 April 2026}}</ref> अपनी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के कारण, वह थाई और मंदारिन चीनी भाषा में पारंगत हैं।
==करियर==
त्रिनणापोप ने अपने करियर की शुरुआत एक मॉडल और अभिनेता के रूप में की थी। एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में, उन्हें मार्च 2025 में प्रतिष्ठित '''द गिटार मग अवार्ड्स''' में "न्यू फेस ऑफ द ईयर" के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। <ref name="guitarmag">{{Cite web|url=https://www.theguitarmag.com|title=The Guitar Mag Awards 2025 Winners|access-date=24 April 2026}}</ref> उनकी डिस्कोग्राफी में 'DAYDREAM STATION' (2024) और 'Midnight Walk' (2025) जैसे एल्बम शामिल हैं। <ref name="spotify">{{Cite web|url=https://open.spotify.com|title=Thongchay on Spotify|access-date=24 April 2026}}</ref>
==फ़िल्मोग्राफ़ी==
===टेलीविज़न===
* 2018: लव डेस्टिनी (Bupphesanniwat)
* 2019: [[Krong Kam]] (सिंघ के रूप में)
* 2025: चाओ खुन फी कप ई-नांग खाम दुआंग
==संदर्भ==
{{Reflist}}
==बाहरी कड़ियाँ==
* {{imdb name|6105683|त्रिनणापोप थोंगचाय}}
* {{Instagram|trinaphop}}
[[श्रेणी:2006 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:थाई अभिनेता]]
[[श्रेणी:थाई गायक]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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[[WP:HC|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:थाई गायक]] हटाई; [[श्रेणी:थाईलैंड गायक]] जोड़ी
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text/x-wiki
{{Infobox person
| name = त्रिनणापोप थोंगचाय
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}}
'''त्रिनणापोप थोंगचाय''' ({{भाषा-थाई|ตฤณณภพ ทองฉาย}}; जन्म 21 अप्रैल 2006), जिन्हें उनके उपनाम '''आफोंग''' के नाम से भी जाना जाता है, एक थाई अभिनेता और गायक हैं।<ref name="tpop">{{Cite web|url=https://tpop.fandom.com/th/wiki/%E0%B8%AD%E0%B8%B2%E0%B8%9F%E0%B8%87|title=Afong Profile - T-pop Wiki|access-date=24 April 2026|language=th}}</ref> वह चैनल 3 के लोकप्रिय नाटकों जैसे 'लव डेस्टिनी' (2018) और '[[Krong Kam]]' (2019) में अपनी भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। <ref name="tmdb">{{Cite web|url=https://www.themoviedb.org/person/6105683|title=Trinnaphop Thongchay Acting Credits|website=TMDB|access-date=24 April 2026}}</ref>
वह वर्तमान में ताइवान में रह रहे हैं और '''मीन चुआन विश्वविद्यालय''' (MCU) में कम्युनिकेशन आर्ट्स की पढ़ाई कर रहे हैं। <ref name="mcu">{{Cite web|url=https://www.mcu.edu.tw|title=Ming Chuan University - International Students|access-date=24 April 2026}}</ref> अपनी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के कारण, वह थाई और मंदारिन चीनी भाषा में पारंगत हैं।
==करियर==
त्रिनणापोप ने अपने करियर की शुरुआत एक मॉडल और अभिनेता के रूप में की थी। एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में, उन्हें मार्च 2025 में प्रतिष्ठित '''द गिटार मग अवार्ड्स''' में "न्यू फेस ऑफ द ईयर" के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। <ref name="guitarmag">{{Cite web|url=https://www.theguitarmag.com|title=The Guitar Mag Awards 2025 Winners|access-date=24 April 2026}}</ref> उनकी डिस्कोग्राफी में 'DAYDREAM STATION' (2024) और 'Midnight Walk' (2025) जैसे एल्बम शामिल हैं। <ref name="spotify">{{Cite web|url=https://open.spotify.com|title=Thongchay on Spotify|access-date=24 April 2026}}</ref>
==फ़िल्मोग्राफ़ी==
===टेलीविज़न===
* 2018: लव डेस्टिनी (Bupphesanniwat)
* 2019: [[Krong Kam]] (सिंघ के रूप में)
* 2025: चाओ खुन फी कप ई-नांग खाम दुआंग
==संदर्भ==
{{Reflist}}
==बाहरी कड़ियाँ==
* {{imdb name|6105683|त्रिनणापोप थोंगचाय}}
* {{Instagram|trinaphop}}
[[श्रेणी:2006 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:थाई अभिनेता]]
[[श्रेणी:थाईलैंड गायक]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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प्रवेशद्वार:न्यूरोविज्ञान
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नया पृष्ठ: विज्ञान की वह शाखा है जिसमें मानव मस्तिष्क में पाए जाने वाले न्यूरो का अध्ययन किया जाता है न्यूरो विज्ञान कहलाता है
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विज्ञान की वह शाखा है जिसमें मानव मस्तिष्क में पाए जाने वाले न्यूरो का अध्ययन किया जाता है न्यूरो विज्ञान कहलाता है
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विज्ञान की वह शाखा है जिसमें मानव मस्तिष्क में पाए जाने वाले न्यूरो का अध्ययन किया जाता है न्यूरो विज्ञान कहलाता है
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खार्किव यूक्रेनी नाटक थिएटर
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खारकीव यूक्रेनी ड्रामा थिएटर, जिसे तारास शेवचेंको खारकीव अकादमिक यूक्रेनी ड्रामा थिएटर के नाम से भी जाना जाता है ({{langx|uk|Харківський академічний український драматичний театр імені Тараса Шевченка|Kharkivskyi akademichnyi ukrainskyi dramatychnyi teatr imeni Tarasa Shevchenka}}) एक राष्ट्रीय थिएटर है जिसकी स्थापना 1935 में दबे हुए बेरेज़िल थिएटर के अवशेषों से हुई थी, जिसे लेस कुरबास ने 1922 में स्थापित किया था। खार्किव यूक्रेनी ड्रामा थिएटर में दो चरण हैंः मुख्य मंच (900 सीटें) और छोटा मंच "बेरेज़िल" (115 सीटें) ।<ref>{{Cite web|url=http://www.theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|title=Харківський Державний Академічний Драматичний Театр ім. Т.Г.Шевченка|website=www.theatre-shevchenko.com.ua|archive-url=https://web.archive.org/web/20210515091343/https://theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|archive-date=2021-05-15|access-date=2017-01-12}}</ref>
थिएटर के प्रदर्शनों की सूची का गठन [[कॉन्स्तेंतिन स्तैनिस्लावस्की|कॉन्स्टेंटिन स्टैनिस्लावस्की]] के स्कूल में प्रशिक्षित निर्देशकों द्वारा किया गया था, और 1990 के दशक से [[अनातोली वासिलिव]] द्वारा प्रशिक्षित निर्देशकों ने किया था। इन वर्षों में थिएटर के कलाकारों की टुकड़ी में कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल थे जैसे वादिम मेलर (मंच डिजाइनर) लियोनिद बायकोव (अभिनेता), फिल्म के स्टार ''इवान द टेरिबल'' (अभिनेता) एंड्री ज़ोल्डक (थिएटर निर्देशक) आंद्रेज स्ज़्ज़िटको (थिएटर निर्देशक)<ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|title="Antigone in New York" in Ivan Franko National Theatre, Kiev|work=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-url=https://web.archive.org/web/20190504102143/http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|archive-date=2019-05-04}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|title=Andrzej Szczytko|work=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304235907/http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|archive-date=2016-03-04}}</ref>
2002 से 2005 तक, एंड्री ज़ोल्डक थिएटर के कलात्मक निर्देशक थे, जहाँ उन्होंने पाँच नाटक प्रस्तुत किए, जिन्हें यूक्रेन के अलावा जर्मनी, फ्रांस, फ़िनलैंड, नीदरलैंड, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, रोमानिया और रूस जैसे कई यूरोपीय देशों के प्रसिद्ध उत्सवों में भी मंचित किया गया। 2005 में, जब खारकीव के अधिकारियों ने उनके “रोमियो और जूलियट. ए फ़्रैगमेंट” के मंचन पर प्रतिबंध लगा दिया, तो झोलदाक को थिएटर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।<ref>{{Cite web|url=http://svobodazholdaktheatre.com/en/director|title=DIRECTOR / Svoboda Zholdak Theatre|website=svobodazholdaktheatre.com|access-date=2017-01-12}}</ref>
2004 में, थिएटर के कलाकारों की टुकड़ी को आईटीआई-[[यूनेस्को]] के आलोचकों द्वारा यूरोप में सर्वश्रेष्ठ कलाकारों की टुकड़ियों में से एक के रूप में नामित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://www.e-teatr.pl/pl/artykuly/234226.html|title=Charków. Prapremiera "Kartoteki" Różewicza|website=www.e-teatr.pl|access-date=2019-10-15}}</ref>
== यह भी देखें ==
* येफ्रोसिनिया ज़ार्निट्स्का
== संदर्भ ==
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खारकीव यूक्रेनी ड्रामा थिएटर, जिसे तारास शेवचेंको खारकीव अकादमिक यूक्रेनी ड्रामा थिएटर के नाम से भी जाना जाता है ({{langx|uk|Харківський академічний український драматичний театр імені Тараса Шевченка|Kharkivskyi akademichnyi ukrainskyi dramatychnyi teatr imeni Tarasa Shevchenka}}) एक राष्ट्रीय थिएटर है जिसकी स्थापना 1935 में दबे हुए बेरेज़िल थिएटर के अवशेषों से हुई थी, जिसे लेस कुरबास ने 1922 में स्थापित किया था। खार्किव यूक्रेनी ड्रामा थिएटर में दो चरण हैंः मुख्य मंच (900 सीटें) और छोटा मंच "बेरेज़िल" (115 सीटें) ।<ref>{{Cite web|url=http://www.theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|title=Харківський Державний Академічний Драматичний Театр ім. Т.Г.Шевченка|website=www.theatre-shevchenko.com.ua|archive-url=https://web.archive.org/web/20210515091343/https://theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|archive-date=2021-05-15|access-date=2017-01-12}}</ref>
थिएटर के प्रदर्शनों की सूची का गठन [[कॉन्स्तेंतिन स्तैनिस्लावस्की|कॉन्स्टेंटिन स्टैनिस्लावस्की]] के स्कूल में प्रशिक्षित निर्देशकों द्वारा किया गया था, और 1990 के दशक से [[अनातोली वासिलिव]] द्वारा प्रशिक्षित निर्देशकों ने किया था। इन वर्षों में थिएटर के कलाकारों की टुकड़ी में कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल थे जैसे वादिम मेलर (मंच डिजाइनर) लियोनिद बायकोव (अभिनेता), फिल्म के स्टार ''इवान द टेरिबल'' (अभिनेता) एंड्री ज़ोल्डक (थिएटर निर्देशक) आंद्रेज स्ज़्ज़िटको (थिएटर निर्देशक)<ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|title="Antigone in New York" in Ivan Franko National Theatre, Kiev|work=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-url=https://web.archive.org/web/20190504102143/http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|archive-date=2019-05-04}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|title=Andrzej Szczytko|work=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304235907/http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|archive-date=2016-03-04}}</ref>
2002 से 2005 तक, एंड्री ज़ोल्डक थिएटर के कलात्मक निर्देशक थे, जहाँ उन्होंने पाँच नाटक प्रस्तुत किए, जिन्हें यूक्रेन के अलावा जर्मनी, फ्रांस, फ़िनलैंड, नीदरलैंड, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, रोमानिया और रूस जैसे कई यूरोपीय देशों के प्रसिद्ध उत्सवों में भी मंचित किया गया। 2005 में, जब खारकीव के अधिकारियों ने उनके “रोमियो और जूलियट. ए फ़्रैगमेंट” के मंचन पर प्रतिबंध लगा दिया, तो झोलदाक को थिएटर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।<ref>{{Cite web|url=http://svobodazholdaktheatre.com/en/director|title=DIRECTOR / Svoboda Zholdak Theatre|website=svobodazholdaktheatre.com|access-date=2017-01-12}}</ref>
2004 में, थिएटर के कलाकारों की टुकड़ी को आईटीआई-[[यूनेस्को]] के आलोचकों द्वारा यूरोप में सर्वश्रेष्ठ कलाकारों की टुकड़ियों में से एक के रूप में नामित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://www.e-teatr.pl/pl/artykuly/234226.html|title=Charków. Prapremiera "Kartoteki" Różewicza|website=www.e-teatr.pl|access-date=2019-10-15}}</ref>
== यह भी देखें ==
* येफ्रोसिनिया ज़ार्निट्स्का
== संदर्भ ==
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}}
'''खार्किव यूक्रेनी नाटक रंगमंच''' खारकीव का '''तारास शेवचेंको अकादमिक यूक्रेनी नाट्य रंगमंच''' यूक्रेन की सांस्कृतिक चेतना का एक सजीव प्रतीक है, जिसकी स्थापना 1935 में उस ऐतिहासिक बेरेज़िल रंगमंच की विरासत पर हुई, जिसे महान रंगनिर्देशक लेस कुरबास ने 1922 में स्थापित किया था।<ref name=":0">{{Cite web|url=http://www.encyclopediaofukraine.com/display.asp?linkpath=pages%5CK%5CH%5CKharkivUkrainianDramaTheater.htm|title=Kharkiv Ukrainian Drama Theater|website=www.encyclopediaofukraine.com|access-date=2017-01-12}}</ref> यह संस्थान केवल एक रंगमंच नहीं, बल्कि सृजनात्मक संघर्ष, कलात्मक नवोन्मेष और राष्ट्रीय आत्मा की अभिव्यक्ति का केंद्र रहा है। खारकीव नगर में स्थित इस रंगमंच के दो प्रमुख मंच हैं—एक भव्य मुख्य मंच, जिसमें लगभग 900 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है, और दूसरा अंतरंग ‘बेरेज़िल’ मंच, जिसकी क्षमता 115 दर्शकों तक सीमित है,<ref>{{Cite web|url=http://www.theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|title=Харківський Державний Академічний Драматичний Театр ім. Т.Г.Шевченка|website=www.theatre-shevchenko.com.ua|access-date=2017-01-12|archive-date=2021-05-15|archive-url=https://web.archive.org/web/20210515091343/https://theatre-shevchenko.com.ua/about/shema.php|url-status=dead}}</ref> परंतु जिसकी कलात्मक ऊष्मा अत्यंत व्यापक है।
इस रंगमंच की प्रस्तुति-परंपरा पर महान रंगचिंतक [[कॉन्स्तेंतिन स्तैनिस्लावस्की]] की अभिनय-पद्धति की गहरी छाप रही है, जिसने इसकी नाट्य अभिव्यक्तियों को यथार्थवाद और संवेदनात्मक गहराई प्रदान की। 1990 के दशक के बाद, अनातोली वासिलिव की प्रशिक्षण-परंपरा से जुड़े निर्देशकों ने इसमें नवीन दृष्टि और प्रयोगशीलता का समावेश किया, जिससे इसकी कलात्मक दिशा और भी समृद्ध हुई। वर्षों के दौरान इस रंगमंच ने अनेक प्रतिभाशाली कलाकारों को अपने साथ जोड़ा, जिनमें मंच-सज्जा के क्षेत्र में विख्यात वादिम मेलर, प्रभावशाली अभिनेता लियोनिद बायकोव, तथा समकालीन रंगनिर्देशक आंद्रेई ज़ोल्डक और आंद्रेज स्ज़्ज़िटको जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref name=":0" /><ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|title="Antigone in New York" in Ivan Franko National Theatre, Kiev|newspaper=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-date=2019-05-04|archive-url=https://web.archive.org/web/20190504102143/http://eepap.culture.pl/event/antigone-new-york-ivan-franko-national-theatre-kiev|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|title=Andrzej Szczytko|newspaper=eepap.culture.pl|access-date=2017-01-12|archive-date=2016-03-04|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304235907/http://eepap.culture.pl/person/andrzej-szczytko|url-status=dead}}</ref>
2002 से 2005 के बीच आंद्रेई ज़ोल्डक ने इस रंगमंच के कलात्मक निर्देशक के रूप में कार्य करते हुए इसकी सृजनात्मक दिशा को एक नई ऊँचाई प्रदान की। उनके नेतृत्व में प्रस्तुत किए गए पाँच नाट्य-प्रयोग केवल देश तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जर्मनी, फ्रांस, फ़िनलैंड, नीदरलैंड, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, रोमानिया और रूस जैसे अनेक यूरोपीय देशों के प्रतिष्ठित रंगोत्सवों में भी मंचित हुए, जहाँ उन्हें व्यापक सराहना प्राप्त हुई। उनके कार्यों में प्रयोगशीलता, साहस और भावनात्मक तीव्रता का अद्भुत संगम दिखाई देता है, जिसने रंगमंच की परंपरागत सीमाओं को चुनौती दी।
किन्तु 2005 में परिस्थितियाँ अचानक बदल गईं, जब खारकीव के स्थानीय अधिकारियों ने उनके चर्चित प्रस्तुति “[[रोमियो और जूलियट]]: एक खंड” के मंचन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस निर्णय ने न केवल कलात्मक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया, बल्कि आंद्रेई ज़ोल्डक को इस रंगमंच से अलग होने के लिए विवश भी कर दिया।<ref>{{Cite web|url=http://svobodazholdaktheatre.com/en/director|title=DIRECTOR / Svoboda Zholdak Theatre|website=svobodazholdaktheatre.com|access-date=2017-01-12}}</ref> यह घटना उस समय की सांस्कृतिक और प्रशासनिक टकरावों का एक मार्मिक उदाहरण बन गई।
इसके बावजूद, इस रंगमंच की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रही। 2004 में इसकी कलाकार-टुकड़ी को आईटीआई-[[यूनेस्को]] के समीक्षकों द्वारा यूरोप की सर्वश्रेष्ठ नाट्य-टुकड़ियों में सम्मिलित किया गया, जो इसकी कलात्मक उत्कृष्टता और समर्पण का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है।<ref>{{Cite web|url=http://www.e-teatr.pl/pl/artykuly/234226.html|title=Charków. Prapremiera "Kartoteki" Różewicza|website=www.e-teatr.pl|access-date=2019-10-15}}</ref>
रूस-यूक्रेन युद्ध के उथल-पुथल भरे समय में इस रंगमंच को भी अपनी सामान्य गतिविधियों को स्थगित कर भूमिगत होना पड़ा।<ref>{{Cite web |last=कैरी |first=एंड्रयू |last2=तारासोवा-मार्किना |first2=डारिया |date=2024-05-19 |title=Life goes on in Kharkiv as Russian advance menaces city |url=https://www.cnn.com/2024/05/19/europe/life-goes-on-in-kharkiv-cmd-intl/index.html |access-date=2024-05-19 |website=सीएनएन |language=en}}</ref><ref>{{Cite web |title=Театр ім. Т.Г. Шевченка |url=https://www.theatre-shevchenko.com.ua/events/padati.-litati-art-area-dk-31-05-2024-18-00 |access-date=2024-05-19 |website=www.theatre-shevchenko.com.ua}}</ref>
== संदर्भ ==
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
इस पृष्ठ को परीक्षण पृष्ठ होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:JAGDISH17|JAGDISH17]] ([[सदस्य वार्ता:JAGDISH17|वार्ता]]) 18:58, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
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सदस्य वार्ता:Deepak kumar Buddhist
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नया पृष्ठ: प्रारंभिक नाम और पहचान Gautama Buddha का मूल नाम सिद्धार्थ गौतम था। “सिद्धार्थ” का अर्थ है “जिसका उद्देश्य सिद्ध हो गया हो” और “गौतम” उनका गोत्र था। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्हें “बुद्ध”...
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प्रारंभिक नाम और पहचान
Gautama Buddha का मूल नाम सिद्धार्थ गौतम था। “सिद्धार्थ” का अर्थ है “जिसका उद्देश्य सिद्ध हो गया हो” और “गौतम” उनका गोत्र था। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्हें “बुद्ध” कहा गया, जिसका अर्थ है “जागृत” या “प्रबुद्ध व्यक्ति”।
जन्म और परिवार
बुद्ध का जन्म शाक्य गणराज्य में हुआ, जो उस समय एक छोटा राज्य था। उनकी माता महामाया का निधन उनके जन्म के कुछ दिनों बाद ही हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया।
शिक्षा और व्यक्तित्व
राजकुमार होने के कारण उन्हें युद्धकला, राजनीति, और शास्त्रों की शिक्षा दी गई। लेकिन उनका झुकाव हमेशा आध्यात्मिकता और चिंतन की ओर रहा। वे अक्सर जीवन के गहरे प्रश्नों पर विचार करते थे, जैसे—दुख का कारण क्या है और इसका अंत कैसे हो सकता है।
वैराग्य की ओर झुकाव
चार दृश्यों को देखने के बाद सिद्धार्थ के मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने समझ लिया कि भौतिक सुख स्थायी नहीं हैं। इस विचार ने उन्हें सांसारिक जीवन छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
साधना और तपस्या
सिद्धार्थ ने कई गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास किया और कठोर तपस्या भी की। उन्होंने कई वर्षों तक अत्यंत कठिन जीवन जिया, लेकिन अंततः उन्होंने यह महसूस किया कि अत्यधिक तपस्या भी समाधान नहीं है। इसके बाद उन्होंने संतुलित जीवन (मध्यम मार्ग) को अपनाया।
बोधगया और ज्ञान
ज्ञान की प्राप्ति Bodh Gaya में हुई। यह स्थान आज बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहां उन्होंने जीवन के मूल सत्य को समझा और दुखों से मुक्ति का मार्ग खोजा।
बौद्ध धर्म का प्रसार
ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपने उपदेशों का प्रचार शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले अपना उपदेश Sarnath में दिया। उनके उपदेश सरल भाषा में होते थे, जिससे आम लोग भी उन्हें आसानी से समझ सकते थे।
उनके प्रमुख शिष्य थे:
आनंद
महाकश्यप
सारिपुत्र
मौद्गल्यायन
संघ की स्थापना
बुद्ध ने भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए एक संगठन बनाया, जिसे “संघ” कहा जाता है। यह बौद्ध धर्म के तीन रत्नों में से एक है:
बुद्ध
धर्म
संघ
प्रमुख सिद्धांतों का विस्तार
अनित्य (Impermanence)
सब कुछ बदलता रहता है, कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है।
अनात्म (No-self)
कोई स्थायी आत्मा या “मैं” नहीं है, यह केवल एक धारणा है।
प्रतीत्यसमुत्पाद (Dependent Origination)
सभी घटनाएं कारण और परिणाम के आधार पर उत्पन्न होती हैं।
बौद्ध ग्रंथ
बुद्ध के उपदेशों को बाद में उनके शिष्यों ने संकलित किया। प्रमुख ग्रंथ हैं:
त्रिपिटक (विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक)
महापरिनिर्वाण
बुद्ध ने अपना अंतिम समय Kushinagar में बिताया। यहीं उन्होंने 80 वर्ष की आयु में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव
बुद्ध के विचारों ने कई देशों को प्रभावित किया, जैसे:
भारत
श्रीलंका
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उनकी शिक्षाओं ने समाज में समानता, अहिंसा और करुणा को बढ़ावा दिया।
आधुनिक समय में महत्व
आज भी बुद्ध की शिक्षाएं मानसिक शांति, तनाव प्रबंधन और नैतिक जीवन के लिए प्रासंगिक हैं। उनके विचार आधुनिक मनोविज्ञान और ध्यान पद्धतियों में भी उपयोग किए जाते हैं।[[विशेष:योगदान/~2026-25044-03|~2026-25044-03]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-25044-03|वार्ता]]) 19:26, 23 अप्रैल 2026 (UTC)
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AMAN KUMAR
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सदस्य वार्ता:Mtmew
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अनु तोमर
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2026-04-24T00:40:16Z
Advocate vinit tyagi
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अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज अनु तोमर की जीवनी और खेल उपलब्धियों की जानकारी जोड़ी गई।
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{{Infobox sportsperson
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}}
'''अनु तोमर''' (Anu Tomar; जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] सिंह तोमर की वंशज हैं।<ref>https://www.amarujala.com/news-archives/india-news-archives/anu-tomar-will-demand-rifle-from-pm-modi-hindi-news-rk</ref>
== खेल करियर ==
अनु तोमर ने 2000 के दशक के मध्य में निशानेबाजी शुरू की। उन्होंने 2007 में भारतीय सेना (Army) की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी पहचान बनाई।<ref>https://www.telegraphindia.com/north-east/army-shoots-to-top-spot/cid/620023</ref> वह वर्ष 2012 के नेशनल शूटिंग स्क्वाड के चयन ट्रायल्स में भी शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल रही हैं।<ref>https://www.scribd.com/doc/84811928/Score</ref>
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कुल 7 पदक जीते हैं। उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में 30 से अधिक पदक और 3 नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं।<ref>https://www.jagran.com/uttar-pradesh/bagpat-international-shooter-anu-tomar-honored-the-medal-winners-21928892.html</ref>
=== अंतरराष्ट्रीय पदक तालिका ===
{| class="wikitable" style="text-align:center;"
|-
! वर्ष !! प्रतियोगिता !! स्पर्धा !! पदक
|-
| 2007 || एशियन शूटिंग चैंपियनशिप (कुवैत) || 10m एयर राइफल (टीम) || {{Silver2}} रजत
|-
| 2013 || दक्षिण एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप || राइफल स्पर्धा || {{Gold1}} स्वर्ण
|-
| 2015 || अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण प्रतियोगिता || बिग बोर/राइफल || {{Gold1}} स्वर्ण
|}
== बाहरी कड़ियां ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter अनु तोमर का आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत के लोग]]
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2026-04-24T01:24:08Z
Advocate vinit tyagi
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'''अनु तोमर''' (Anu Tomar; जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] सिंह तोमर की वंशज हैं।<ref>https://www.amarujala.com/news-archives/india-news-archives/anu-tomar-will-demand-rifle-from-pm-modi-hindi-news-rk</ref>
== खेल करियर ==
अनु तोमर ने 2000 के दशक के मध्य में निशानेबाजी शुरू की। उन्होंने 2007 में भारतीय सेना (Army) की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी पहचान बनाई।<ref>https://www.telegraphindia.com/north-east/army-shoots-to-top-spot/cid/620023</ref> वह वर्ष 2012 के नेशनल शूटिंग स्क्वाड के चयन ट्रायल्स में भी शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल रही हैं।<ref>https://www.scribd.com/doc/84811928/Score</ref>
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कुल 7 पदक जीते हैं। उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में 30 से अधिक पदक और 3 नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं।<ref>https://www.jagran.com/uttar-pradesh/bagpat-international-shooter-anu-tomar-honored-the-medal-winners-21928892.html</ref>
=== अंतरराष्ट्रीय पदक तालिका ===
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| 2007 || एशियन शूटिंग चैंपियनशिप (कुवैत) || 10m एयर राइफल (टीम) || {{Silver2}} रजत
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== बाहरी कड़ियां ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter अनु तोमर का आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
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Anu tomar shooting pic.jpg | अभ्यास के दौरान अनु तोमर
Anu tomar medal pic.jpg | अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक के साथ
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2026-04-24T03:29:10Z
Advocate vinit tyagi
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"ISSF प्रोफाइल, द टेलीग्राफ और अमर उजाला के आधिकारिक संदर्भ जोड़े गए और अंतरराष्ट्रीय पदकों की जानकारी अपडेट की गई।"
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'''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह [[उत्तर प्रदेश]] के [[बागपत ज़िला|बागपत]] जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=शूटर अनु तोमर ने बागपत का नाम रोशन किया |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=Amar Ujala |access-date=2024-04-24}}</ref> उनके परिवार का इतिहास और उपलब्धियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में भी चर्चित रही हैं।
== करियर ==
अनु तोमर ने 2007 और 2015 के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
2007 में, उन्होंने कुवैत में आयोजित '''11वीं एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 10 मीटर एयर राइफल महिला (जूनियर) टीम स्पर्धा में '''रजत पदक''' जीता।<ref>{{Cite web |title=Athlete profile: Anu TOMAR |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org |access-date=2024-04-24}}</ref><ref>{{Cite news |title=Shooting: Asian Championships results |url=https://www.telegraphindia.com/sports/shooting-asian-championships-results/cid/685954 |work=The Telegraph |date=2007-12-10 |access-date=2024-04-24}}</ref>
2009 में, उन्होंने हंगरी ओपन एयर वेपन शूटिंग चैंपियनशिप और म्यूनिख, जर्मनी में एयर गन शूटिंग प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
2012 में, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के चयन ट्रायल्स में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।<ref>{{Cite web |title=NRAI Selection Trials Score 2012 |url=https://www.scribd.com/document/81423451/NRAI-Selection-Trials-Score |website=Scribd |access-date=2024-04-24}}</ref>
2013 में, उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित '''दूसरी दक्षिण एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 50 मीटर राइफल प्रोन महिला (जूनियर) टीम श्रेणी में '''स्वर्ण पदक''' जीता।<ref>{{Cite news |title=निशानेबाजी में अनु को स्वर्ण |url=https://www.jagran.com/uttar-pradesh/baghpat-10714902.html |work=Dainik Jagran |access-date=2024-04-24}}</ref>
2014 में, उन्होंने भूटान के थिम्पु में आयोजित '''पहली भारत-भूटान बिग बोर निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में स्वर्ण पदक हासिल किए।
उन्होंने 2015 में केरल में आयोजित '''35वें राष्ट्रीय खेलों''' में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए 50 मीटर राइफल प्रोन महिला टीम स्पर्धा में '''स्वर्ण पदक''' जीता।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
[[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
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Advocate vinit tyagi
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"AfC टैग हटाया गया और आधिकारिक सूत्रों (ISSF, द टेलीग्राफ) के साथ करियर की जानकारी अपडेट की गई।"
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'''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह [[उत्तर प्रदेश]] के [[बागपत ज़िला|बागपत]] जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=शूटर अनु तोमर ने बागपत का नाम रोशन किया |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=Amar Ujala |access-date=2024-04-24}}</ref> उनके परिवार का इतिहास और उपलब्धियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में भी चर्चित रही हैं।
== करियर ==
अनु तोमर ने 2007 और 2015 के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
2007 में, उन्होंने कुवैत में आयोजित '''11वीं एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 10 मीटर एयर राइफल महिला (जूनियर) टीम स्पर्धा में '''रजत पदक''' जीता।<ref>{{Cite web |title=Athlete profile: Anu TOMAR |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org |access-date=2024-04-24}}</ref><ref>{{Cite news |title=Shooting: Asian Championships results |url=https://www.telegraphindia.com/sports/shooting-asian-championships-results/cid/685954 |work=The Telegraph |date=2007-12-10 |access-date=2024-04-24}}</ref>
2009 में, उन्होंने हंगरी ओपन एयर वेपन शूटिंग चैंपियनशिप और म्यूनिख, जर्मनी में एयर गन शूटिंग प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
2012 में, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के चयन ट्रायल्स में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।<ref>{{Cite web |title=NRAI Selection Trials Score 2012 |url=https://www.scribd.com/document/81423451/NRAI-Selection-Trials-Score |website=Scribd |access-date=2024-04-24}}</ref>
2013 में, उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित '''दूसरी दक्षिण एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 50 मीटर राइफल प्रोन महिला (जूनियर) टीम श्रेणी में '''स्वर्ण पदक''' जीता।<ref>{{Cite news |title=निशानेबाजी में अनु को स्वर्ण |url=https://www.jagran.com/uttar-pradesh/baghpat-10714902.html |work=Dainik Jagran |access-date=2024-04-24}}</ref>
2014 में, उन्होंने भूटान के थिम्पु में आयोजित '''पहली भारत-भूटान बिग बोर निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में स्वर्ण पदक हासिल किए।
उन्होंने 2015 में केरल में आयोजित '''35वें राष्ट्रीय खेलों''' में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए 50 मीटर राइफल प्रोन महिला टीम स्पर्धा में '''स्वर्ण पदक''' जीता।
== संदर्भ ==
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== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
[[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
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AMAN KUMAR
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'''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह [[उत्तर प्रदेश]] के [[बागपत ज़िला|बागपत]] जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=शूटर अनु तोमर ने बागपत का नाम रोशन किया |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=Amar Ujala |access-date=2024-04-24}}</ref>
== करियर ==
अनु तोमर ने 2007 और 2015 के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
2007 में, उन्होंने कुवैत में आयोजित '''11वीं एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 10 मीटर एयर राइफल महिला (जूनियर) टीम स्पर्धा में '''रजत पदक''' जीता।<ref>{{Cite web |title=Athlete profile: Anu TOMAR |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org |access-date=2024-04-24}}</ref><ref>{{Cite news |title=Shooting: Asian Championships results |url=https://www.telegraphindia.com/sports/shooting-asian-championships-results/cid/685954 |work=The Telegraph |date=2007-12-10 |access-date=2024-04-24}}</ref>
2009 में, उन्होंने हंगरी ओपन एयर वेपन शूटिंग चैंपियनशिप और म्यूनिख, जर्मनी में एयर गन शूटिंग प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
2012 में, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के चयन ट्रायल्स में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।<ref>{{Cite web |title=NRAI Selection Trials Score 2012 |url=https://www.scribd.com/document/81423451/NRAI-Selection-Trials-Score |website=Scribd |access-date=2024-04-24}}</ref>
2013 में, उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित '''दूसरी दक्षिण एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 50 मीटर राइफल प्रोन महिला (जूनियर) टीम श्रेणी में '''स्वर्ण पदक''' जीता।<ref>{{Cite news |title=निशानेबाजी में अनु को स्वर्ण |url=https://www.jagran.com/uttar-pradesh/baghpat-10714902.html |work=Dainik Jagran |access-date=2024-04-24}}</ref>
2014 में, उन्होंने भूटान के थिम्पु में आयोजित '''पहली भारत-भूटान बिग बोर निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में स्वर्ण पदक हासिल किए।
उन्होंने 2015 में केरल में आयोजित '''35वें राष्ट्रीय खेलों''' में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए 50 मीटर राइफल प्रोन महिला टीम स्पर्धा में '''स्वर्ण पदक''' जीता।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
[[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
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2026-04-24T04:48:59Z
Advocate vinit tyagi
921618
"लेख को पूरी तरह हिंदी में अपडेट किया गया, पदक की तिथियां सही की गईं और विश्वसनीय समाचार स्रोतों (ISSF, द टेलीग्राफ) को जोड़ा गया।"
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'''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह [[उत्तर प्रदेश]] के [[बागपत ज़िला|बागपत]] जिले की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=शूटर अनु तोमर ने बागपत का नाम रोशन किया |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=Amar Ujala |access-date=2024-04-24}}</ref>
== करियर ==
अनु तोमर ने 2007 और 2015 के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
2007 में, उन्होंने कुवैत में आयोजित '''11वीं एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 10 मीटर एयर राइफल महिला (जूनियर) टीम स्पर्धा में '''रजत पदक''' जीता।<ref>{{Cite web |title=Athlete profile: Anu TOMAR |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org |access-date=2024-04-24}}</ref><ref>{{Cite news |title=Shooting: Asian Championships results |url=https://www.telegraphindia.com/sports/shooting-asian-championships-results/cid/685954 |work=The Telegraph |date=2007-12-10 |access-date=2024-04-24}}</ref>
2014 में, उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित '''दक्षिण एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप''' में 50 मीटर राइफल प्रोन महिला (जूनियर) टीम श्रेणी में '''स्वर्ण पदक''' जीता।<ref>{{Cite news |title=निशानेबाजी में अनु को स्वर्ण |url=https://www.jagran.com/uttar-pradesh/baghpat-10714902.html |work=Dainik Jagran |access-date=2024-04-24}}</ref>
उन्होंने 2015 में केरल में आयोजित '''35वें राष्ट्रीय खेलों''' में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए 50 मीटर राइफल प्रोन महिला टीम स्पर्धा में '''स्वर्ण पदक''' जीता।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
[[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
<gallery>
Anu tomar shooting pic.jpg | अभ्यास के दौरान अनु तोमर
Anu tomar medal pic.jpg | अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक के साथ
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"करियर विवरण और पदकों की सटीक जानकारी जोड़ी गई (2007 एशियाई पदक, भूटान और पोलैंड पदक)। साथ ही ISSF, The Telegraph और NRAI चयन ट्रायल के विश्वसनीय संदर्भ (links) अपडेट किए गए।"
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text/x-wiki
{{Infobox sportsperson
| नाम = अनु तोमर
| चित्र = Anu tomar medal pic.jpg
| कैप्शन = अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज अनु तोमर
| जन्म_तिथि = {{birth date and age|1989|11|6}}
| जन्म_स्थान = [[बागपत ज़िला|बागपत]], [[उत्तर प्रदेश]], भारत
| देश = [[भारत]]
| खेल = [[निशानेबाजी]]
| इवेंट = 50m राइफल 3 पोजीशन, 50m राइफल प्रोन, 10m एयर राइफल
| पदक_तालिका =
{{MedalSport | महिला [[निशानेबाजी]]}}
{{MedalCountry | {{IND}}}}
{{MedalCompetition | [[एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप]]}}
{{MedalGold | 2007 कुवैत | 50m राइफल प्रोन टीम (जूनियर)}}
{{MedalSilver | 2007 कुवैत | 50m राइफल 3 पोजीशन टीम (जूनियर)}}
{{MedalCompetition | भारत-भूटान निशानेबाजी चैंपियनशिप}}
{{MedalGold | 2014 थिम्पू | 50m राइफल प्रोन (व्यक्तिगत)}}
{{MedalGold | 2014 थिम्पू | टीम स्पर्धा}}
{{MedalCompetition | दक्षिण एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप}}
{{MedalGold | 2014 नई दिल्ली | 50m राइफल प्रोन टीम}}
{{MedalCompetition | [[भारत के राष्ट्रीय खेल]]}}
{{MedalGold | 2015 केरल | 50m राइफल प्रोन टीम}}
}}
'''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं। वह [[उत्तर प्रदेश]] के [[बागपत ज़िला|बागपत]] की रहने वाली हैं और 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=शूटर अनु तोमर ने बागपत का नाम रोशन किया |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=Amar Ujala |access-date=2024-04-24}}</ref>
== करियर और उपलब्धियां ==
अनु तोमर ने 2007 से 2015 के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते हैं:
* '''एशियाई चैंपियनशिप (2007):''' कुवैत में आयोजित 11वीं एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप में इन्होंने भारतीय टीम के सदस्य के रूप में 50 मीटर राइफल प्रोन टीम में '''स्वर्ण पदक''' और 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन टीम में '''रजत पदक''' जीता।<ref>{{Cite news |title=Army shooters dominate |url=https://www.telegraphindia.com/sports/army-shooters-dominate/cid/692019 |work=The Telegraph |date=2007-12-14}}</ref> इनके करियर का आधिकारिक विवरण अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ (ISSF) की वेबसाइट पर भी दर्ज है।<ref>{{Cite web |title=Athlete profile: Anu TOMAR |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org}}</ref>
* '''विश्व रेलवे खेल (2010):''' पोलैंड में आयोजित USIC विश्व रेलवे खेलों में भारतीय रेलवे का प्रतिनिधित्व करते हुए 1 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीता।
* '''भारत-भूटान चैंपियनशिप (2014):''' थिम्पू, भूटान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में इन्होंने 2 स्वर्ण और 2 कांस्य पदक हासिल किए।<ref>दैनिक जागरण, "निशानेबाजी में अनु को स्वर्ण", 2014</ref>
* '''राष्ट्रीय रिकॉर्ड:''' इन्होंने 2008-09 के घरेलू सत्र के दौरान निशानेबाजी में नया राष्ट्रीय कीर्तिमान (National Record) स्थापित किया था।
* '''NRAI चयन प्रक्रिया:''' नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के चयन ट्रायल्स में इनका स्कोर निरंतर शीर्ष स्तर पर रहा है।<ref>{{Cite web |title=NRAI Selection Trials Score |url=https://www.scribd.com/document/96752047/6th-Selection-Trial-Score-Shotgun-May-2012 |website=Scribd}}</ref>
* '''राष्ट्रीय खेल (2015):''' केरल में आयोजित 35वें राष्ट्रीय खेलों में उत्तर प्रदेश के लिए स्वर्ण पदक जीता।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://www.instagram.com/anutomarshooter आधिकारिक इंस्टाग्राम प्रोफाइल]
[[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]]
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]]
[[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]]
== चित्र दीर्घा ==
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Anu tomar shooting pic.jpg | अभ्यास के दौरान अनु तोमर
Anu tomar medal pic.jpg | अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक के साथ
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Anu tomar
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[[अनु तोमर]] को अनुप्रेषित
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#REDIRECT [[अनु तोमर]]
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AMAN KUMAR
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[[वि:शीह|शीघ्र हटाने का अनुरोध]] कारण "शीर्षक अन्य भाषा में है"
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AMAN KUMAR
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मैने कुछ उदाहरण देखें जैसे विराट कोहली इसके आधार पर नामांकन वापस लिया
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#REDIRECT [[अनु तोमर]]
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AMAN KUMAR
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सूचना: [[:Anu tomar]] को शीघ्र हटाने का नामांकन
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== [[:Anu tomar|Anu tomar]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन ==
[[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]]
नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:Anu tomar|Anu tomar]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।
शीर्षक अन्य भाषा में है
यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> यदि यह पृष्ठ हटा दिया गया है, तो आप [[वि:चौपाल|चौपाल]] पर इस पृष्ठ को अपने सदस्य उप-पृष्ठ में डलवाने, अथवा इसकी सामग्री ई-मेल द्वारा प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकते हैं। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 03:46, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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:"नमस्ते। यह लेख एक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी (Anu Tomar) के बारे में है। 'Anu tomar' शीर्षक को हटाना उचित नहीं है क्योंकि यह एक आवश्यक 'Redirect' है ताकि अंग्रेजी में खोजने वाले पाठक भी हिंदी लेख तक पहुँच सकें। विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं। मैंने मुख्य लेख 'अनु तोमर' में सभी विश्वसनीय स्रोत (ISSF, The Telegraph) जोड़ दिए हैं जो खिलाड़ी की महत्ता (Notability) को सिद्ध करते हैं। देश का मान बढ़ाने वालों के नाम को लेकर भी अगर शिकायतें होंगी तो ये एक अत्यंत चिंताजनक स्थिति है। आपको समझना चाहिए कि किस तरह अनु जी ने विश्वस्तर पर देश का नाम रोशन किया है। कृपया इस नामांकन को वापस लें और लेख को सुरक्षित रखें।" [[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 05:21, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
इस पृष्ठ को शीघ्र नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... ("नमस्ते। यह लेख एक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी (Anu Tomar) के बारे में है। 'Anu tomar' शीर्षक को हटाना उचित नहीं है क्योंकि यह एक आवश्यक 'Redirect' है ताकि अंग्रेजी में खोजने वाले पाठक भी हिंदी लेख तक पहुँच सकें। विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं। मैंने मुख्य लेख 'अनु तोमर' में सभी विश्वसनीय स्रोत (ISSF, The Telegraph) जोड़ दिए हैं जो खिलाड़ी की महत्ता (Notability) को सिद्ध करते हैं। कृपया इस नामांकन को वापस लें और लेख को सुरक्षित रखें।") --[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 05:09, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
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:@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आपने लिखा है, कि "विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं।" तो इसके आप उदाहरण दें| हिंदी विकिपीडिया के लिए [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:38, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आप चिंता न करें कोई भी प्रबंधक इसे समीक्षा के बाद ही रखेगा या हटाएगा [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
इस पृष्ठ को शीघ्र नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... ("नमस्ते। यह लेख एक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी (Anu Tomar) के बारे में है। 'Anu tomar' शीर्षक को हटाना उचित नहीं है क्योंकि यह एक आवश्यक 'Redirect' है ताकि अंग्रेजी में खोजने वाले पाठक भी हिंदी लेख तक पहुँच सकें। विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं। मैंने मुख्य लेख 'अनु तोमर' में सभी विश्वसनीय स्रोत (ISSF, The Telegraph) जोड़ दिए हैं जो खिलाड़ी की महत्ता (Notability) को सिद्ध करते हैं। कृपया इस नामांकन को वापस लें और लेख को सुरक्षित रखें।") --[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 05:09, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
:@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आपने लिखा है, कि "विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं।" तो इसके आप उदाहरण दें| हिंदी विकिपीडिया के लिए [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:38, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आप चिंता न करें कोई भी प्रबंधक इसे समीक्षा के बाद ही रखेगा या हटाएगा [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::श्रीमान नाम किस भाषा में लिखा है,उससे ज्यादा जरूरी है कि नाम असल है, नाम के बारे में जो लिखा है वो सत्य है, और जिस नाम के लिए लिखा गया है, उस नाम ने देश का मान सामान विश्व स्तर पर बढ़ाया है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल में नाम कमाया है,खेल भावना को बढ़ाया है, हमें खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाना चाहिए, जिन्हें देश को पहचान दिलाई उनके सम्मान में कुछ तो कारण चाहिए। तो जो मुझसे हो सका मैने कर दिया। [[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 06:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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== शीघ्र हटाने पर चर्चा ==
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:@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आपने लिखा है, कि "विकिपीडिया पर अन्य खिलाड़ियों के नाम भी इसी तरह रीडायरेक्ट के रूप में मौजूद हैं।" तो इसके आप उदाहरण दें| हिंदी विकिपीडिया के लिए [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:38, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::@[[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] महोदय, आप चिंता न करें कोई भी प्रबंधक इसे समीक्षा के बाद ही रखेगा या हटाएगा [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::श्रीमान नाम किस भाषा में लिखा है,उससे ज्यादा जरूरी है कि नाम असल है, नाम के बारे में जो लिखा है वो सत्य है, और जिस नाम के लिए लिखा गया है, उस नाम ने देश का मान सामान विश्व स्तर पर बढ़ाया है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल में नाम कमाया है,खेल भावना को बढ़ाया है, हमें खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाना चाहिए, जिन्हें देश को पहचान दिलाई उनके सम्मान में कुछ तो कारण चाहिए। तो जो मुझसे हो सका मैने कर दिया। [[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 06:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
::श्रीमान रीडियरेक्ट का लाभ देना ही नहीं चाहिए अगर ये गलत है तो। रीडियरेक्ट की सुविधा कुछ सोच समझ कर ही दी गई होगी, अगर ये सुविधा गलत है तो बंद कर देनी चाहिए. [[सदस्य:Advocate vinit tyagi|Advocate vinit tyagi]] ([[सदस्य वार्ता:Advocate vinit tyagi|वार्ता]]) 06:47, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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भाषाएँ
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[[श्रेणी:देशानुसार भाषाएँ]]
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चेतावनी: {{हहेच}} साँचे हटाना [[:प्रशांत कुमार सैनी (राजनीतिज्ञ)]] पर.
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== अप्रैल 2026 ==
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आयुष दास
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सदस्य वार्ता:Mushraf57
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~2026-24854-58
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/* 🎯 1JJ Game Complete Guide – Login, Download, Features & Earning Tips (2026) */ नया अनुभाग
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== 🎯 1JJ Game Complete Guide – Login, Download, Features & Earning Tips (2026) ==
'''[https://1jjgame.pk/ 1JJ Game]''' ek popular online gaming platform where users different casino-style aur skill-based games khel sakte hain. Yeh platform especially Asia, including Pakistan mein kaafi trending hai.
Is guide mein hum 1JJ Game ke:
* Features
* Login process
* Download method
* Earning tips
* FAQs
sab kuch detail mein explain karenge.
----
== 🔥 What is 1JJ Game? ==
1JJ Game ek online gaming app hai jahan aap:
* Teen Patti
* Slots
* Aviator
* Fishing games
* Lottery games
khel sakte ho aur real rewards earn kar sakte ho.
👉 Yeh platform simple interface aur fast withdrawal system ki wajah se popular hai.
----
== 📲 How to Download 1JJ Game ==
1JJ Game Play Store par usually available nahi hota, is liye APK download karna padta hai.
=== Steps: ===
# Official website visit karo
# “Download APK” button par click karo
# File install karo (Unknown Sources enable karo)
# App open karke register karo
⚠️ Tip: Sirf trusted source se hi download karo
----
== 🔐 [https://1jjgame.pk/ 1JJGame] Login Process ==
Login karna bohot easy hai:
# App open karo
# Mobile number ya username enter karo
# Password likho
# “Login” button par click karo
👉 Agar account nahi hai:
* “Register” par click karo
* New account bana lo
----
== 💰 How to Earn Money on 1JJ Game ==
1JJ Game par earning ke multiple tareeqay hain:
=== 1. 🎴 Playing Games ===
* Teen Patti
* Slots
* Aviator
👉 Skill aur strategy use karo
----
=== 2. 🎁 Bonus & Rewards ===
* Welcome bonus
* Daily login bonus
* Referral rewards
----
=== 3. 👥 Referral System ===
Apne doston ko invite karo aur commission earn karo
----
== ⚡ Key Features of 1JJ Game ==
* ✔ Fast withdrawals
* ✔ Multiple games in one app
* ✔ User-friendly interface
* ✔ Daily bonuses
* ✔ Mobile-friendly platform
----
== ⚠️ Is 1JJ Game Legal in Pakistan? ==
Pakistan mein online gaming ka legal status clear nahi hai.
👉 Is liye:
* Apni risk par khelo
* Sirf entertainment ke liye use karo
----
== 🚀 Tips to Win More in 1JJ Game ==
* Small bets se start karo
* Ek hi game par focus karo
* Loss recover karne ke liye jaldi decision na lo
* Bonus ka smart use karo
----
== ❓ FAQs About 1JJ Game ==
=== 1. How do I deposit in [https://1jjgame.pk/ 1JJ] Game? ===
Aap JazzCash, EasyPaisa ya crypto ke through deposit kar sakte ho (platform ke options check karo).
----
=== 2. How fast are withdrawals? ===
Zyada cases mein withdrawals 5–30 minutes mein complete ho jati hain.
----
=== 3. Is 1JJ Game safe? ===
Agar official version use karo to relatively safe hai, lekin hamesha caution rakho.
----
=== 4. Can I play on mobile? ===
Haan, 1JJ Game mobile-friendly app hai.
----
== 🏁 Final Words ==
1JJ Game ek trending online gaming platform hai jahan users entertainment ke sath earning bhi kar sakte hain. Lekin smart play aur risk management bohot zaroori hai. [[विशेष:योगदान/~2026-24854-58|~2026-24854-58]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-24854-58|वार्ता]]) 07:49, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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2026-04-24T08:22:10Z
AMAN KUMAR
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Spam
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text/x-wiki
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मेन रिज, टोबेगो
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2026-04-24T08:25:20Z
चाहर धर्मेंद्र
703114
टोबैगो द्वीप पर स्थित मुख्य पर्वतीय श्रृंखला
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'''मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र''' त्रिनिदाद और टोबैगो के टोबैगो द्वीप की प्रमुख पर्वतीय श्रृंखला है, जो लगभग 29 किलोमीटर (18 मील) लंबाई में विस्तृत पहाड़ियों का एक सुदीर्घ विस्तार प्रस्तुत करती है। यह श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में कैरेबियन सागर और दक्षिणी टोबैगो भ्रंश तंत्र के मध्य फैली हुई है, तथा इसकी अधिकतम ऊँचाई लगभग 572 मीटर (1,877 फीट) तक पहुँचती है। द्वीप की भौगोलिक संरचना में इसका स्थान केंद्रीय और अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
इसी क्षेत्र में स्थित मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र, जिसकी स्थापना 1776 में विधिक रूप से की गई थी, विश्व के सबसे प्राचीन संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों में गिना जाता है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पक्षी-अवलोकन तथा पर्यावरणीय पर्यटन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है।
मेन रिज केवल एक भौगोलिक संरचना भर नहीं, बल्कि जीव-जगत के लिए एक सुरक्षित आश्रयस्थल भी है। यहाँ की सघन वनस्पति और विविध पारिस्थितिक तंत्र अनेक स्थानीय पौधों और जीव-जंतुओं को संरक्षण प्रदान करते हैं, जिनमें कई प्रजातियाँ ऐसी हैं जो केवल टोबैगो तक ही सीमित हैं। इस प्रकार, मेन रिज प्राकृतिक संतुलन, जैविक विविधता और संरक्षण की दीर्घकालिक परंपरा का एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरता है।
==इतिहास==
पेरिस की संधि के साथ 1763 में टोबैगो के इतिहास ने एक निर्णायक मोड़ लिया, जब उसका तटस्थ क्षेत्र का दर्जा समाप्त कर उसे ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में स्थापित कर दिया गया।<ref name = "Niddrie">{{Cite journal|last=निड्री|first=डी.एल.|date=1966|title=Eighteenth-Century Settlement in the British Caribbean|journal=ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं के संस्थान के लेनदेन|issue=40|pages=67–80|doi=10.2307/621569|issn=0020-2754|jstor=621569}}</ref> इससे पहले ऐक्स-ला-चैपल की संधि के अंतर्गत 1748 में इस द्वीप को तटस्थ घोषित कर उसकी शेष स्वदेशी आबादी के संरक्षण में छोड़ दिया गया था। किंतु ब्रिटिश सत्ता की पुनर्स्थापना ने यहाँ की परिस्थितियों को तीव्रता से परिवर्तित कर दिया और द्वीप शीघ्र ही बागान-आधारित अर्थव्यवस्था के ढाँचे में ढलने लगा।<ref name="Boomert" />
व्यापार बोर्ड के निर्देशन में टोबैगो का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया, जिसके बाद भूमि को 100 से 500 एकड़ (लगभग 40 से 202 हेक्टेयर) के खंडों में विभाजित कर बागान स्वामियों को सौंप दिया गया।<ref name="Boomert">{{Cite book|title=The indigenous peoples of Trinidad and Tobago : from the first settlers until today|last=बूमर्ट|first=एरी|date=2016-01-15|isbn=9789088903540|location= लीडेन |oclc=944910446}}</ref> इस तीव्र औपनिवेशिक विस्तार और कृषि विकास के बीच एक महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि मेन रिज के ऊपरी भाग को “वर्षा से संरक्षण हेतु वन” के रूप में सुरक्षित रखा जाए। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र न तो साफ किया गया और न ही खेती के लिए उपयोग में लाया गया,<ref name="Niddrie" /> जिससे इसकी प्राकृतिक संपदा और जैविक विविधता अक्षुण्ण बनी रही।
सोम जेनिन्स के दूरदर्शी प्रयासों ने टोबैगो में वनों के संरक्षण की उस ऐतिहासिक पहल को जन्म दिया, जिसका उद्देश्य वर्षा को बनाए रखना और भूमि की उर्वरता की रक्षा करना था। जेनिन्स स्टीफन हेल्स के पादप शरीर-क्रिया-विज्ञान और वाष्पोत्सर्जन संबंधी अध्ययनों से गहराई से प्रभावित थे और उन्होंने यह समझ लिया था कि वर्षा के संतुलन में वनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।<ref>{{Cite book|title=Green imperialism : colonial expansion, tropical island Edens, and the origins of environmentalism, 1600–1860|last=ग्रोव|first=रिचर्ड एच.|publisher=कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस|year=1995|isbn=978-0521565134|location=कैम्ब्रिज|oclc=28548987}}</ref> इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने ब्रिटिश संसद को इस विचार के महत्व से अवगत कराने के लिए निरंतर प्रयास किए। उन्हें यह लक्ष्य प्राप्त करने में ग्यारह वर्षों का समय लगा, परंतु उनकी दृढ़ता अंततः सफल सिद्ध हुई।
13 अप्रैल 1776 को संसद ने एक अध्यादेश पारित कर इस अभ्यारण्य की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की, जिसका उद्देश्य था—“बार-बार वर्षा को आकर्षित करना, जिस पर इन जलवायु क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता पूर्णतः निर्भर करती है।”<ref name="UNESCO">{{Cite web|url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/|title=Tobago Main Ridge Forest Reserve|website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en|access-date=2019-03-08}}</ref> इस निर्णय के परिणामस्वरूप एक ऐसे संरक्षित क्षेत्र का निर्माण हुआ, जो न केवल विश्व के सबसे प्राचीन अभ्यारण्यों में से एक माना जाता है,<ref name="UNESCO" /><ref name="GEF" /> बल्कि संरक्षण-चेतना की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में भी इसकी गणना होती है। इसे आधुनिक पर्यावरणीय विचारधारा की दिशा में उठाए गए प्रारंभिक और महत्वपूर्ण कदमों में से एक भी माना गया है।<ref name="UNESCO" />
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[[File:Tobago WI Charlotteville.JPG|right|thumb|मेन रिज की पहाड़ियां टोबैगो के उत्तरी तट पर समुद्र से मिलती हैं।]]
== सन्दर्भ ==
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चाहर धर्मेंद्र
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'''मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र''' त्रिनिदाद और टोबैगो के टोबैगो द्वीप की प्रमुख पर्वतीय श्रृंखला है, जो लगभग 29 किलोमीटर (18 मील) लंबाई में विस्तृत पहाड़ियों का एक सुदीर्घ विस्तार प्रस्तुत करती है। यह श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में कैरेबियन सागर और दक्षिणी टोबैगो भ्रंश तंत्र के मध्य फैली हुई है, तथा इसकी अधिकतम ऊँचाई लगभग 572 मीटर (1,877 फीट) तक पहुँचती है। द्वीप की भौगोलिक संरचना में इसका स्थान केंद्रीय और अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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==इतिहास==
पेरिस की संधि के साथ 1763 में टोबैगो के इतिहास ने एक निर्णायक मोड़ लिया, जब उसका तटस्थ क्षेत्र का दर्जा समाप्त कर उसे ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में स्थापित कर दिया गया।<ref name = "Niddrie">{{Cite journal|last=निड्री|first=डी.एल.|date=1966|title=Eighteenth-Century Settlement in the British Caribbean|journal=ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं के संस्थान के लेनदेन|issue=40|pages=67–80|doi=10.2307/621569|issn=0020-2754|jstor=621569}}</ref> इससे पहले ऐक्स-ला-चैपल की संधि के अंतर्गत 1748 में इस द्वीप को तटस्थ घोषित कर उसकी शेष स्वदेशी आबादी के संरक्षण में छोड़ दिया गया था। किंतु ब्रिटिश सत्ता की पुनर्स्थापना ने यहाँ की परिस्थितियों को तीव्रता से परिवर्तित कर दिया और द्वीप शीघ्र ही बागान-आधारित अर्थव्यवस्था के ढाँचे में ढलने लगा।<ref name="Boomert" />
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सोम जेनिन्स के दूरदर्शी प्रयासों ने टोबैगो में वनों के संरक्षण की उस ऐतिहासिक पहल को जन्म दिया, जिसका उद्देश्य वर्षा को बनाए रखना और भूमि की उर्वरता की रक्षा करना था। जेनिन्स स्टीफन हेल्स के पादप शरीर-क्रिया-विज्ञान और वाष्पोत्सर्जन संबंधी अध्ययनों से गहराई से प्रभावित थे और उन्होंने यह समझ लिया था कि वर्षा के संतुलन में वनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।<ref>{{Cite book|title=Green imperialism : colonial expansion, tropical island Edens, and the origins of environmentalism, 1600–1860|last=ग्रोव|first=रिचर्ड एच.|publisher=कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस|year=1995|isbn=978-0521565134|location=कैम्ब्रिज|oclc=28548987}}</ref> इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने ब्रिटिश संसद को इस विचार के महत्व से अवगत कराने के लिए निरंतर प्रयास किए। उन्हें यह लक्ष्य प्राप्त करने में ग्यारह वर्षों का समय लगा, परंतु उनकी दृढ़ता अंततः सफल सिद्ध हुई।
13 अप्रैल 1776 को संसद ने एक अध्यादेश पारित कर इस अभ्यारण्य की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की, जिसका उद्देश्य था—“बार-बार वर्षा को आकर्षित करना, जिस पर इन जलवायु क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता पूर्णतः निर्भर करती है।”<ref name="UNESCO">{{Cite web|url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/|title=Tobago Main Ridge Forest Reserve|website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en|access-date=2019-03-08}}</ref> इस निर्णय के परिणामस्वरूप एक ऐसे संरक्षित क्षेत्र का निर्माण हुआ, जो न केवल विश्व के सबसे प्राचीन अभ्यारण्यों में से एक माना जाता है,<ref name="UNESCO" /><ref name="GEF" /> बल्कि संरक्षण-चेतना की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में भी इसकी गणना होती है। इसे आधुनिक पर्यावरणीय विचारधारा की दिशा में उठाए गए प्रारंभिक और महत्वपूर्ण कदमों में से एक भी माना गया है।<ref name="UNESCO" />
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[[File:Tobago WI Charlotteville.JPG|right|thumb|मेन रिज की पहाड़ियां टोबैगो के उत्तरी तट पर समुद्र से मिलती हैं।]]
== सन्दर्भ ==
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सदस्य:Babulbaishya
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CptViraj
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text/x-wiki
#पुनर्प्रेषित [[सदस्य:BabulB]]
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सदस्य वार्ता:Babulbaishya
3
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CptViraj
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#पुनर्प्रेषित [[सदस्य वार्ता:BabulB]]
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सदस्य:Maris Dreshmanis
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Maris Dreshmanis
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{{#babel:lv|ru-4}}
== Maris Dreshmanis ==
Open data researcher. Contributor to [[d:Wikidata:WikiProject Occupations|WikiProject Occupations]] on Wikidata.
* '''[[d:User:Maris Dreshmanis|Wikidata contributions]]''' — 37,000+ edits
* '''GSCO''' — Global Standard Classification of Occupations (140 national registries, 245,000+ entries)
* '''[[d:Wikidata:WikiProject Occupations|WikiProject Occupations]]''' — coordinating occupation label enrichment in 21 languages
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द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँन
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Klf2026
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wikitext
text/x-wiki
== सन्दर्भ ==
<references responsive="1"></references>
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://mumbaiqueerfest.com/short-films-packages/ इंडियन मसाला मिक्स – 2], मुंबई क्वीर फेस्ट
* [https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf व्यूइंग रूम फ़िल्म बाज़ार], पृष्ठ सं. 232 (PDF)
* [https://saffm.centrekabir.com/video/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ], SAFF मॉन्ट्रियल
* [https://www.csaff.org/filmguide?cnSelected=8bf60431-d0b2-4a87-a473-f4a1666d80b7 सेंट्रल स्टेट्स फ़िल्म फेस्टिवल] (सितंबर 2025)
* [https://aifilmfest.in/catalogue-11th-aiff/.pdf AIFF 2026 कैटलॉग], पृष्ठ सं. 122 (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/wp-content/uploads/2025/07/OnePager_Queer_2025.pdf 22वाँ इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट 2025] (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ ड्रामा, क्वीर, लघु फ़िल्में], इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट
* [https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf रील डिज़ायर्स चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल 2025] (PDF)
* [https://kiff.in/archive/2025/official-selection/short-documentary-panorama/2278 कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025]
* [https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America- तस्वीर प्रीमियर पर पेलीप्लैट कवरेज]
{{Reflist}}
'''''द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ''''' २०२४ की भारतीय [[मराठी सिनेमा|मराठी]] [[लघु फ़िल्म]] है, जिसे संतोष राम ने लिखा, निर्मित और निर्देशित किया है।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}</ref> यह फ़िल्म [[महाराष्ट्र]] के एक रूढ़िवादी ग्रामीण गाँव में अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के दो युवकों के बीच समलैंगिक संबंध को दर्शाती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}</ref> फ़िल्म का विश्व प्रीमियर अक्टूबर में [[सिएटल]] में १९ वें [[तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल]] में हुआ<ref name="peliplat">{{cite web|url=https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America-|title=Yuvraj and Shahjahan: A Story of Courage and Love Premieres at 19th Tasveer Festival 2024 in America|website=Peliplat|access-date=21 अप्रैल 2026}}</ref> और तब से यह अनेक अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है,<ref name="filmbazaar">{{cite web|url=https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf|title=Viewing Room Film Bazaar|page=232|format=PDF|access-date=21 अप्रैल 2026}}</ref> जिनमें क्वीर विषयों पर केंद्रित आयोजन भी शामिल हैं।<ref name="chennai">{{cite web|url=https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf|title=Reel Desires Chennai International Queer Film Festival 2025|format=PDF|access-date=21 अप्रैल 2026}}</ref><ref name="stuttgart">{{cite web|url=https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/|title=Drama, Queer, Short Films – The Story of Yuvraj and Shahajahan|website=Indisches Filmfestival Stuttgart|access-date=21 अप्रैल 2026}}</ref>
== कथानक ==
युवराज, एक युवा गाँव का लड़का, शाहजहाँ की ओर आकर्षित होता है, जो एक चूड़ी बेचने वाला है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> दोनों पुरुष एक एकांत स्थान पर मिलते हैं और अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं। दोनों एक ऐसे रूढ़िवादी समाज में दोहरा जीवन जीते हैं जो समलैंगिकता के प्रति शत्रुतापूर्ण है।<ref name="Programme Booklet">{{cite web|url=https://indisches-filmfestival.de/en/programme-booklet/|title=The Story of Yuvraj and Shahajahan – Page No. 54|date=2025|website=indisches-filmfestival.de|access-date=21 अप्रैल 2026}}</ref> फ़िल्म का अंत आशा की एक किरण के साथ होता है, जहाँ दोनों पात्र दोबारा मिलने की उम्मीद लेकर विदा होते हैं।<ref name="medium-review" />
== कलाकार ==
* राहुल बिरादर — युवराज की भूमिका में
* विनय भगत — शाहजहाँ की भूमिका में
* अंजलि जाधव — पत्नी की भूमिका में
* राजकुमार मुंडे — पाटिल की भूमिका में
* विवेक होलसांब्रे — पिता की भूमिका में
* शेषेराव पवाड़े — गुरु की भूमिका में
*
== निर्माण ==
फ़िल्म को प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए महाराष्ट्र के एक ग्रामीण गाँव में प्राकृतिक स्थानों पर फिल्माया गया था।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}</ref> संतोष राम ने गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम किया, जिसने एक हिंदू और एक मुस्लिम पात्र के बीच केंद्रीय समलैंगिक संबंध के यथार्थवादी चित्रण में योगदान दिया।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref>
== पुरस्कार एवं नामांकन ==
फ़िल्म को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं :
{| class="wikitable sortable"
!वर्ष
!पुरस्कार
!महोत्सव
!परिणाम
|-
|2025
|महोत्सव के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक
|15वाँ पुणे शॉर्ट फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|-
|2025
|सम्माननीय उल्लेख
|कारवाँ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार
|14वाँ अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सव सूरत|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फ़िल्म
|थिलश्री अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2026
|विशेष उल्लेख पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ LGBTQ भारतीय गे फ़िल्म)
|कलर्स ऑफ लव – क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|}
*
== समीक्षा ==
आलोचकों ने फ़िल्म को «शांत रूप से शक्तिशाली» और «ग्रामीण क्वीर प्रेम का कोमल चित्रण» बताया है, जो रूढ़िवादी ग्रामीण भारत में समलैंगिक संबंधों पर एक दुर्लभ दृष्टि प्रस्तुत करती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> स्थानीय मराठी मीडिया ने अमेरिका में तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल में इसके चयन को प्रमुखता से उठाया।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/ "डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत"]. ''Deshonnati'' (मराठी भाषा में). 19 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Deshonnati&rft.atitle=%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B3%E0%A5%80%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%9F+%E0%A4%9D%E0%A4%B3%E0%A4%95%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-19&rft_id=https%3A%2F%2Fdeshonnati.com%2Fa-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened%2F&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref>
{{Reflist}}
*
[[श्रेणी:मराठी फ़िल्में]]
[[श्रेणी:सीएस1 मराठी-भाषा स्रोत (mr)]]
[[श्रेणी:2024 की फ़िल्में]]
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2026-04-24T09:29:11Z
Klf2026
921031
संशोधित मसौदा
6543558
wikitext
text/x-wiki
{{Infobox film
| name = द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँन
| image =
| caption =
| director = संतोष राम
| writer = संतोष राम
| producer = संतोष राम
| starring = राहुल बिरादर<br>विनय भगत<br>लक्ष्मी बालाजी बिरादर<br>लक्ष्मण बिरादर
| cinematography = अर्जुन बालकृष्णन
| editing = योगेश भगवत
| music = सुधांशु अंधोरीकर
| studio = विवेक चित्रा प्रोडक्शन
| distributor = विवेक चित्रा प्रोडक्शन
| released = {{Film date|2024}}
| runtime = 25 मिनट
| country = भारत
| language = मराठी
}}'''''द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ''''' २०२४ की भारतीय [[मराठी सिनेमा|मराठी]] [[लघु फ़िल्म]] है, जिसे संतोष राम ने लिखा, निर्मित और निर्देशित किया है। यह फ़िल्म [[महाराष्ट्र]] के एक रूढ़िवादी ग्रामीण गाँव में अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के दो युवकों के बीच समलैंगिक संबंध को दर्शाती है। फ़िल्म का विश्व प्रीमियर अक्टूबर में [[सिएटल]] में १९ वें [[तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल]] में हुआ और तब से यह अनेक अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है, जिनमें क्वीर विषयों पर केंद्रित आयोजन भी शामिल हैं।
== कथानक ==
युवराज, एक युवा गाँव का लड़का, शाहजहाँ की ओर आकर्षित होता है, जो एक चूड़ी बेचने वाला है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> दोनों पुरुष एक एकांत स्थान पर मिलते हैं और अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं। दोनों एक ऐसे रूढ़िवादी समाज में दोहरा जीवन जीते हैं जो समलैंगिकता के प्रति शत्रुतापूर्ण है। फ़िल्म का अंत आशा की एक किरण के साथ होता है, जहाँ दोनों पात्र दोबारा मिलने की उम्मीद लेकर विदा होते हैं।<ref name="medium-review" />
== कलाकार ==
* राहुल बिरादर — युवराज की भूमिका में
* विनय भगत — शाहजहाँ की भूमिका में
* अंजलि जाधव — पत्नी की भूमिका में
* राजकुमार मुंडे — पाटिल की भूमिका में
* विवेक होलसांब्रे — पिता की भूमिका में
* शेषेराव पवाड़े — गुरु की भूमिका में
== निर्माण ==
फ़िल्म को प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए महाराष्ट्र के एक ग्रामीण गाँव में प्राकृतिक स्थानों पर फिल्माया गया था।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref> संतोष राम ने गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम किया, जिसने एक हिंदू और एक मुस्लिम पात्र के बीच केंद्रीय समलैंगिक संबंध के यथार्थवादी चित्रण में योगदान दिया।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref>
== पुरस्कार एवं नामांकन ==
फ़िल्म को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं :
{| class="wikitable sortable"
!वर्ष
!पुरस्कार
!महोत्सव
!परिणाम
|-
|2025
|महोत्सव के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक
|15वाँ पुणे शॉर्ट फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|-
|2025
|सम्माननीय उल्लेख
|कारवाँ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार
|14वाँ अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सव सूरत|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फ़िल्म
|थिलश्री अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2026
|विशेष उल्लेख पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ LGBTQ भारतीय गे फ़िल्म)
|कलर्स ऑफ लव – क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|}
== समीक्षा ==
आलोचकों ने फ़िल्म को «शांत रूप से शक्तिशाली» और «ग्रामीण क्वीर प्रेम का कोमल चित्रण» बताया है, जो रूढ़िवादी ग्रामीण भारत में समलैंगिक संबंधों पर एक दुर्लभ दृष्टि प्रस्तुत करती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> स्थानीय मराठी मीडिया ने अमेरिका में तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल में इसके चयन को प्रमुखता से उठाया।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/ "डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत"]. ''Deshonnati'' (मराठी भाषा में). 19 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Deshonnati&rft.atitle=%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B3%E0%A5%80%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%9F+%E0%A4%9D%E0%A4%B3%E0%A4%95%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-19&rft_id=https%3A%2F%2Fdeshonnati.com%2Fa-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened%2F&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref>
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://mumbaiqueerfest.com/short-films-packages/ इंडियन मसाला मिक्स – 2], मुंबई क्वीर फेस्ट
* [https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf व्यूइंग रूम फ़िल्म बाज़ार], पृष्ठ सं. 232 (PDF)
* [https://saffm.centrekabir.com/video/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ], SAFF मॉन्ट्रियल
* [https://www.csaff.org/filmguide?cnSelected=8bf60431-d0b2-4a87-a473-f4a1666d80b7 सेंट्रल स्टेट्स फ़िल्म फेस्टिवल] (सितंबर 2025)
* [https://aifilmfest.in/catalogue-11th-aiff/.pdf AIFF 2026 कैटलॉग], पृष्ठ सं. 122 (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/wp-content/uploads/2025/07/OnePager_Queer_2025.pdf 22वाँ इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट 2025] (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ ड्रामा, क्वीर, लघु फ़िल्में], इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट
* [https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf रील डिज़ायर्स चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल 2025] (PDF)
* [https://kiff.in/archive/2025/official-selection/short-documentary-panorama/2278 कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025]
* [https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America- तस्वीर प्रीमियर पर पेलीप्लैट कवरेज]
== सन्दर्भ ==
<references responsive="1"></references>
*
[[श्रेणी:मराठी फ़िल्में]]
[[श्रेणी:सीएस1 मराठी-भाषा स्रोत (mr)]]
[[श्रेणी:2024 की फ़िल्में]]
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox film
| name = द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँन
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| director = संतोष राम
| writer = संतोष राम
| producer = संतोष राम
| starring = राहुल बिरादर<br>विनय भगत<br>लक्ष्मी बालाजी बिरादर<br>लक्ष्मण बिरादर
| cinematography = अर्जुन बालकृष्णन
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| distributor = विवेक चित्रा प्रोडक्शन
| released = {{Film date|2024}}
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| language = मराठी
}}'''''द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ''''' २०२४ की भारतीय [[मराठी सिनेमा|मराठी]] [[लघु फ़िल्म]] है, जिसे संतोष राम ने लिखा, निर्मित और निर्देशित किया है। यह फ़िल्म [[महाराष्ट्र]] के एक रूढ़िवादी ग्रामीण गाँव में अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के दो युवकों के बीच समलैंगिक संबंध को दर्शाती है। फ़िल्म का विश्व प्रीमियर अक्टूबर में [[सिएटल]] में १९ वें [[तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल]] में हुआ और तब से यह अनेक अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है, जिनमें क्वीर विषयों पर केंद्रित आयोजन भी शामिल हैं।
== कथानक ==
युवराज, एक युवा गाँव का लड़का, शाहजहाँ की ओर आकर्षित होता है, जो एक चूड़ी बेचने वाला है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}</ref> दोनों पुरुष एक एकांत स्थान पर मिलते हैं और अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं। दोनों एक ऐसे रूढ़िवादी समाज में दोहरा जीवन जीते हैं जो समलैंगिकता के प्रति शत्रुतापूर्ण है। फ़िल्म का अंत आशा की एक किरण के साथ होता है, जहाँ दोनों पात्र दोबारा मिलने की उम्मीद लेकर विदा होते हैं।<ref name="medium-review" />
== कलाकार ==
* राहुल बिरादर — युवराज की भूमिका में
* विनय भगत — शाहजहाँ की भूमिका में
* अंजलि जाधव — पत्नी की भूमिका में
* राजकुमार मुंडे — पाटिल की भूमिका में
* विवेक होलसांब्रे — पिता की भूमिका में
* शेषेराव पवाड़े — गुरु की भूमिका में
== निर्माण ==
फ़िल्म को प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए महाराष्ट्र के एक ग्रामीण गाँव में प्राकृतिक स्थानों पर फिल्माया गया था।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref> संतोष राम ने गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम किया, जिसने एक हिंदू और एक मुस्लिम पात्र के बीच केंद्रीय समलैंगिक संबंध के यथार्थवादी चित्रण में योगदान दिया।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref>
== पुरस्कार एवं नामांकन ==
फ़िल्म को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं :
{| class="wikitable sortable"
!वर्ष
!पुरस्कार
!महोत्सव
!परिणाम
|-
|2025
|महोत्सव के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक
|15वाँ पुणे शॉर्ट फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|-
|2025
|सम्माननीय उल्लेख
|कारवाँ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार
|14वाँ अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सव सूरत|| {{won}}
|-
|2025
|सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फ़िल्म
|थिलश्री अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}}
|-
|2026
|विशेष उल्लेख पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ LGBTQ भारतीय गे फ़िल्म)
|कलर्स ऑफ लव – क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}}
|}
== समीक्षा ==
आलोचकों ने फ़िल्म को «शांत रूप से शक्तिशाली» और «ग्रामीण क्वीर प्रेम का कोमल चित्रण» बताया है, जो रूढ़िवादी ग्रामीण भारत में समलैंगिक संबंधों पर एक दुर्लभ दृष्टि प्रस्तुत करती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> स्थानीय मराठी मीडिया ने अमेरिका में तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल में इसके चयन को प्रमुखता से उठाया।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span>
[[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}
</ref>
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://mumbaiqueerfest.com/short-films-packages/ इंडियन मसाला मिक्स – 2], मुंबई क्वीर फेस्ट
* [https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf व्यूइंग रूम फ़िल्म बाज़ार], पृष्ठ सं. 232 (PDF)
* [https://saffm.centrekabir.com/video/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ], SAFF मॉन्ट्रियल
* [https://www.csaff.org/filmguide?cnSelected=8bf60431-d0b2-4a87-a473-f4a1666d80b7 सेंट्रल स्टेट्स फ़िल्म फेस्टिवल] (सितंबर 2025)
* [https://aifilmfest.in/catalogue-11th-aiff/.pdf AIFF 2026 कैटलॉग], पृष्ठ सं. 122 (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/wp-content/uploads/2025/07/OnePager_Queer_2025.pdf 22वाँ इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट 2025] (PDF)
* [https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ ड्रामा, क्वीर, लघु फ़िल्में], इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट
* [https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf रील डिज़ायर्स चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल 2025] (PDF)
* [https://kiff.in/archive/2025/official-selection/short-documentary-panorama/2278 कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025]
* [https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America- तस्वीर प्रीमियर पर पेलीप्लैट कवरेज]
== सन्दर्भ ==
<references responsive="1"></references>
*
[[श्रेणी:मराठी फ़िल्में]]
[[श्रेणी:सीएस1 मराठी-भाषा स्रोत (mr)]]
[[श्रेणी:2024 की फ़िल्में]]
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सुम्बावा भाषा
0
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text/x-wiki
<templatestyles src="Module:Infobox/styles.css"></templatestyles>'''सुम्बावा''' ({{Lang|smw|Basa Samawa}}, [[लोन्तारा लिपि|सतेरा जोनतल लिपि]]: ᨅᨔ ᨔᨆᨓ, {{Langx|id|Bahasa Sumbawa}}) यह [[इंडोनेशिया]] के [[सुम्बावा|सुम्बावा द्वीप]] के पश्चिमी हिस्से की एक मलाय-पॉलीनेशियन भाषा है, जिसे यह बीमा बोलने वालों के साथ साझा करती है। यह पड़ोसी [[लोम्बोक]] और [[बाली]] की भाषाओं से निकटता से संबंधित है। सुम्बावा लोग अपनी भाषा को अपनी ही एक मूल लिपि में लिखते हैं, जिसे उनके गृहक्षेत्र में आमतौर पर '[[लोन्तारा लिपि|सतेरा जोंतल]]' के नाम से जाना जाता है; इसके साथ ही वे लैटिन लिपि का भी उपयोग करते हैं।<ref>{{Cite web|url=http://lingdy.aacore.jp/doc/endangered-scripts-issea/asako_shiohara_paper.pdf|title=The ''Satera Jontal'' Script in the Sumbawa District in Eastern Indonesia|last=Shiohara|first=Asako|via=Linguistic Dynamics Science Project|archive-url=https://web.archive.org/web/20161224181401/http://lingdy.aacore.jp/doc/endangered-scripts-issea/asako_shiohara_paper.pdf|archive-date=2016-12-24|access-date=2015-05-05}}</ref>
== सम्बन्ध ==
=== बाली भाषा से सम्बन्ध ===
{| class="wikitable" border="1"
!अंग्रेज़ी
![[बाली भाषा]]
!सुम्बावा भाषा
|-
|राजा का शीर्षक
|{{Lang|ban|ᬤᬾᬯᬅᬕᬸᬂ}} (देवा अगुङ्ग)
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|-
|कब
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|{{Lang|smw|ᨄᨗᨉᨊ}} (पिदन)
|-
|}
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:इण्डोनेशिया की भाषाएँ]]
[[श्रेणी:ऑस्ट्रोनेशियाई भाषाएँ]]
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== सम्बन्ध ==
=== बाली भाषा से सम्बन्ध ===
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!अंग्रेज़ी
![[बाली भाषा]]
!सुम्बावा भाषा
|-
|राजा का शीर्षक
|{{Lang|ban|ᬤᬾᬯᬅᬕᬸᬂ}} (देवा अगुङ्ग)
|{{Lang|smw|ᨉᨙᨓᨆᨔᨆᨓ}} (देवा मस्मावा)
|-
|कब
|{{Lang|ban|ᬧᬶᬤᬦ᭄}} (पिदन)
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|}
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:इण्डोनेशिया की भाषाएँ]]
[[श्रेणी:ऑस्ट्रोनीशियाई भाषाएँ]]
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|[[रोमन लिपि|लैटिन]]
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== सम्बन्ध ==
=== बाली भाषा से सम्बन्ध ===
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!अंग्रेज़ी
![[बाली भाषा]]
!सुम्बावा भाषा
|-
|राजा का शीर्षक
|{{Lang|ban|ᬤᬾᬯᬅᬕᬸᬂ}} (देवा अगुङ्ग)
|{{Lang|smw|ᨉᨙᨓᨆᨔᨆᨓ}} (देवा मस्मावा)
|-
|कब
|{{Lang|ban|ᬧᬶᬤᬦ᭄}} (पिदन)
|{{Lang|smw|ᨄᨗᨉᨊ}} (पिदन)
|-
|}
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:इण्डोनेशिया की भाषाएँ]]
[[श्रेणी:ऑस्ट्रोनीशियाई भाषाएँ]]
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आकाश गुप्ता
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2026-04-24T09:50:51Z
AMAN KUMAR
911487
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wikitext
text/x-wiki
{{Infobox YouTube personality
| name = आकाश गुप्ता
| image = Aakash Gupta at the premiere of Follow Kar Lo Yaar (cropped).jpg
| caption = 2025 में गुप्ता
| birth_name =
| native_name =
| native_name_lang =
| education = [[वाणिज्य स्नातक]]
| alma_mater = [[दिल्ली विश्वविद्यालय]]
| birth_date = {{Birth date and age|1993|01|5|df=yes}}
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| youtube_display_name = आकाश गुप्ता
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}}
'''आकाश गुप्ता''' एक भारतीय हास्य कलाकार, अभिनेता, यूट्यूबर और रंगमंच कलाकार हैं।<ref>{{Cite web |title=Comicstaan Season 2 winners: Akash Gupta, Samay Raina win the Amazon original show, awarded prize money of Rs 10 lakh |url=https://www.indiatoday.in/television/web-series/story/comicstaan-season-2-winners-akash-gupta-samay-raina-win-the-amazon-original-show-awarded-prize-money-of-rs-10-lakh-1581506-2019-08-16 |access-date=2022-04-23 |website=India Today |language=en}}</ref><ref>{{Cite web |date=2019-08-17 |title=Comicstaan season 2: Akash Gupta, Samay Raina crowned as winners of Amazon Prime Video India comedy show |url=https://www.firstpost.com/entertainment/comicstaan-season-2-akash-gupta-samay-raina-crowned-as-winners-of-amazon-prime-video-india-comedy-show-7177151.html |access-date=2022-04-23 |website=Firstpost |language=en}}</ref> वे [[समय रैना]] के साथ स्टैंड-अप कॉमेडी प्रतियोगिता टेलीविज़न शृंखला 'कॉमिकस्तान' के दूसरे सीज़न के सह-विजेता रहे हैं।<ref>{{Cite web |last=Shukla |first=Ira |date=2021-02-26 |title=You Don't Have To Visit Sarojini Nagar, Just Listen To Aakash Gupta's Standup About The Market |url=https://www.scoopwhoop.com/travel/aakash-gupta-standup-act-delhi-sarojini-nagar/ |access-date=2022-04-23 |website=www.scoopwhoop.com |language=English}}</ref><ref>{{Cite web |date=2019-10-06 |title=Uncensored With Aakash Gupta: The Winner of Comicstaan Season Two |url=https://dubeat.com/2019/10/uncensored-with-aakash-gupta-the-winner-of-comicstaan-season-two/ |access-date=2022-04-23 |website=DU Beat |language=en-US}}</ref> वे प्रदर्शन कला और स्केच कॉमेडी में प्रशिक्षित हैं।<ref>{{Cite web |date=2019-08-16 |title=Aakash Gupta and Samay Raina win Comicstaan 2 |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comicstaan-2-winners-aakash-gupta-and-samay-raina-5909204/ |access-date=2022-04-23 |website=The Indian Express |language=en}}</ref>
== प्रारंभिक जीवन ==
[[दिल्ली]] में जन्मे और पले-बढ़े आकाश गुप्ता ने अपनी स्कूली शिक्षा सुमेरमल जैन पब्लिक स्कूल से पूरी की। उन्होंने [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] से वाणिज्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कॉलेज के दिनों में ही उनका परिचय रंगमंच से हुआ, जहाँ वे एक शानदार कलाकार के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपने कॉलेज और 'मूड इंडिगो' ([[भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुम्बई|आई॰आई॰टी॰ बॉम्बे]], [[भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली|आई॰आई॰टी॰ दिल्ली]]) जैसे अन्य विभिन्न कॉलेज उत्सवों में कई नुक्कड़ और मंचीय नाटकों में अभिनय किया। अपने अंतिम वर्ष में, गुप्ता शहीद भगत सिंह कॉलेज की थिएटर सोसाइटी 'नटुवे' के अध्यक्ष थे। स्नातक होने के पश्चात्, उन्होंने एक वर्ष तक के॰पी॰एम॰जी॰ के साथ ऑडिट एसोसिएट के रूप में कार्य किया, और साथ ही सप्ताहांतों पर दिल्ली में विभिन्न समूहों के साथ रंगमंच के नाटकों में भी भाग लेते रहे।
== प्रारंभिक करियर ==
बाद में, गुप्ता ने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया ताकि वे रंगमंच के विभिन्न रूपों को सीखने पर ध्यान केंद्रित कर सकें, और साथ ही कॉमेडी व इम्प्रोव में अपना कार्य भी जारी रखा। 2014 में, उन्होंने रेडियो मंत्रा में इंटर्नशिप की। गुप्ता ने भारतीय और जर्मन अभिनय शिक्षकों से 'रेड नोज़ क्लाउनिंग' और 'कोमेडिया डेल'आर्टे' में पेशेवर प्रशिक्षण प्राप्त करके अभिनय के क्षेत्र में स्वयं को और अधिक निखारा।
के॰पी॰एम॰जी॰ छोड़ने के पश्चात्, उनका रुझान इम्प्रोव कॉमेडी की ओर हुआ और 2014 में उन्होंने दिल्ली के अनुभवी इम्प्रोव ट्रेनर वरुण आनंद के मार्गदर्शन में 'क्यूलेस इम्प्रोव' नामक एक कॉमेडी समूह ज्वाइन किया। गुप्ता ने इम्प्रोवाइज़्ड कॉमेडी सीखना जारी रखा और इस समूह के साथ दो वर्षों तक कई शो किए। 2014 में, दिल्ली के अक्षरा थियेटर में एक ओपन माइक में प्रदर्शन करने के बाद, उन्होंने स्टैंड-अप कॉमेडी में अपना करियर बनाना आरंभ किया।
2015 के आसपास, उन्होंने अनुभवी हास्य कलाकार नितिन गुप्ता के कॉमेडी नेटवर्क 'द ह्यूमर बीइंग्स' के कॉमेडी स्केच के लिए एक अभिनेता और सह-लेखक के रूप में कार्य करना शुरू किया।
तीन वर्षों तक स्टैंड-अप करने के पश्चात्, आकाश ने अंततः 2017 में यूट्यूब पर अपना पहला स्टैंड-अप वीडियो जारी किया। यह वीडियो मुंबई के 'द हैबिटेट' (पूर्व नाम- ट्यूनिंग फ़ोर्क) में रिकॉर्ड किया गया था।
== स्टैंड-अप कॉमेडी ==
विभिन्न इम्प्रोव शो में प्रदर्शन करने के पश्चात् गुप्ता ने स्टैंड-अप कॉमेडी में अपना करियर आगे बढ़ाया। उनके पहले दो स्टैंड-अप वीडियो— 'ट्रेन जर्नीज़ एंड हनीमून ट्रिप्स' और 'रिलेशनशिप्स, क्लबिंग एंड कॉकटेल्स'— की सफलता के बाद उनका राष्ट्रीय हास्य दौरा उनके एकल शो 'भाई खुश रहा कर' के साथ आरंभ हुआ।
2018 में जारी उनका 'दिल्ली मेट्रो' वीडियो दुनिया भर में वायरल हो गया और यह उनके चैनल पर अब तक का सबसे अधिक देखा जाने वाला वीडियो है। जब आकाश ने [[अमेज़न प्राइम वीडियो]] पर प्रसारित होने वाले 'कॉमिकस्तान 2' के लिए ऑडिशन दिया, तो वे जल्द ही दर्शकों के बीच एक लोकप्रिय प्रतियोगी बन गए। उन्हें अधिकांश एपिसोड्स में लगातार उच्चतम अंक प्राप्त हुए। उनकी अनूठी स्केच कॉमेडी शैली ने उन्हें शो के ग्रैंड फ़िनाले तक पहुँचाया और अंततः वे [[समय रैना]] के साथ सीज़न 2 के सह-विजेता बने। कॉमिकस्तान से मिली इस नई प्रसिद्धि के बाद, आकाश ने पूरे भारत में कई शो करने शुरू किए और उनके शो ऑडिटोरियम व कॉलेजों में खचाखच भरे रहने लगे।
== यूट्यूब ==
आकाश ने 'डॉग्स' नामक एक नया स्टैंड-अप वीडियो जारी किया और उसके बाद 'सरोजिनी नगर' जारी किया, जो यूट्यूब पर फिर से ट्रेंड करने लगा। 'सरोजिनी नगर' यूट्यूब पर पहले स्थान पर ट्रेंड करने वाले पहले भारतीय स्टैंड-अप वीडियो में से एक था। आकाश के अधिकांश विदेशी प्रशंसकों ने भी उन्हें यूट्यूब के माध्यम से ही पहचाना। इससे उन्हें यूट्यूब पर एक मिलियन सब्सक्राइबर्स का आंकड़ा पार करने में मदद मिली। उन्हें 11 सितंबर 2018 को यूट्यूब सिल्वर प्ले बटन और 22 जुलाई 2020 को यूट्यूब गोल्ड प्ले बटन प्राप्त हुआ। 2022 में, उन्होंने 'पान' नामक एक स्टैंड-अप वीडियो जारी किया, जो रिलीज़ होने के 12 घंटे से भी कम समय में यूट्यूब पर दूसरे स्थान पर ट्रेंड करने लगा।
== ओटीटी कार्य ==
गुप्ता [[अमेज़न प्राइम वीडियो]] पर 'एल॰ओ॰एल॰: हंसे तो फंसे' नामक एक कॉमेडी रियलिटी शो का हिस्सा थे,<ref>{{Cite web |title=Watch LOL - Hasse toh Phasse -Season 1 {{!}} Prime Video |url=https://www.amazon.com/LOL-Hasse-toh-Phasse-Season/dp/B092KPPLJF |access-date=2022-04-23 |website=www.amazon.com}}</ref><ref>{{Cite news |last=Philip |first=Susan Joe |date=2021-04-29 |title=Actors Arshad Warsi and Boman Irani on their upcoming comedy series 'LOL: Hasse Toh Phasse' |language=en-IN |work=The Hindu |url=https://www.thehindu.com/entertainment/movies/actors-arshad-warsi-and-boman-irani-on-their-upcoming-comedy-series-lol-hasse-toh-phasse/article34441046.ece |access-date=2022-04-23 |issn=0971-751X}}</ref> जिसमें उनके साथ [[सुनील ग्रोवर]], [[गौरव गेरा]], कुशा कपिला, [[मल्लिका दुआ]], सायरस ब्रोचा आदि भी शामिल थे। 2021 में, वे नेटफ्लिक्स की 'कॉमेडी प्रीमियम लीग' के पहले सीज़न में नज़र आए, जहाँ उन्होंने डिबेट्स और रोस्ट किए। गुप्ता ने केनी सेबेस्टियन, कनीज़ सुरका और प्रशस्ति सिंह के साथ मिलकर एक टीम बनाई, जिसका नाम उन्होंने 'द घरेलू गिलहरीज़' रखा था। बाद में मई 2021 में, उन्होंने नए लॉन्च किए गए ए॰वी॰ओ॰डी॰ प्लेटफ़ॉर्म अमेज़न मिनी टीवी के लिए स्केच लिखे, निर्देशित किए और उनमें अभिनय किया। 2022 में, गुप्ता ने वेब सीरीज़ 'कपल गोल्स एस॰ 3' में मुख्य भूमिका निभाई, जिसका प्रीमियर अमेज़न मिनी टीवी पर हुआ था।
== व्यक्तिगत जीवन ==
आकाश सोशल मीडिया पर अपने व्यक्तिगत जीवन को निजी रखना पसंद करते हैं। उन्होंने अक्टूबर 2021 में विवाह किया।<ref>{{Cite web |date=2021-10-22 |title=All The Deets From Comedian Aakash Gupta's Wedding In New Delhi |url=https://shaadiwish.com/blog/2021/10/22/comedian-aakash-guptas-wedding/ |access-date=2022-04-23 |website=ShaadiWish |language=en-US}}</ref> इस विवाह समारोह में कई प्रसिद्ध हास्य कलाकार और सामग्री निर्माता शामिल हुए थे। स्टैंड-अप कॉमेडियन गौरव कपूर ने इस विवाह के बारे में एक व्लॉग भी बनाया था, जिसे काफी देखा गया।
== फ़िल्मोग्राफी ==
{| class="wikitable"
!वर्ष
!शीर्षक
!टिप्पणियाँ
!सन्दर्भ
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|2015
|''सेंसरशिप - एपिसोड 1 - गैंग्स ऑफ़ गालीपुर''
|द ह्यूमर बीइंग्स
|<ref>{{Citation |title=Censorship - Ep. 1 {{!}} Gangs of Gaalipur |url=https://www.youtube.com/watch?v=WZbRJ024rOg |access-date=2024-01-09 |language=en}}</ref>
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|2015
|''सेंसरशिप - एपिसोड 2 - जिस्म रीलोडेड''
|द ह्यूमर बीइंग्स
|<ref>{{Citation |title=Censorship - Ep-2 - 'Jism Reloaded' |url=https://www.youtube.com/watch?v=pYXbFBGXlJ8 |access-date=2024-01-09 |language=en}}</ref>
|-
|2016
|''एक था रेस्टोरेंट''
|द ह्यूमर बीइंग्स
|<ref>{{Citation |title=THB: Ek Tha Restaurant |url=https://www.youtube.com/watch?v=z6gU3MK99XY |access-date=2024-01-09 |language=en}}</ref>
|-
|2016
|''टाइम्स ऑफ़ इनटोलरेंस''
|द ह्यूमर बीइंग्स
|<ref>{{Citation |title=Times of Intolerance - Ep-1 : Award Wapsi |url=https://www.youtube.com/watch?v=KwPNwBzM7xM |access-date=2024-01-09 |language=en}}</ref>
|-
|2019
|''[[कॉमिकस्तान|कॉमिकस्तान 2]]''
|सह-विजेता
|<ref>{{Cite news |title=Comicstaan 2 winner Aakash Gupta: The biggest challenge was to not disappoint myself |work=Indian Express |editor-last=Tripathi |editor-first=Anuj |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comictsaan-2-winner-aakash-gupta-5917927/ |access-date=22 October 2022}}</ref>
|-
|2021
|''[[कॉमेडी प्रीमियम लीग]]''<ref>{{Cite web |date=2021-08-21 |title=Comedy Premium League review: The closest India will get to a Saturday Night Live |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comedy-premium-league-review-the-closest-india-will-get-to-a-saturday-night-live-7463321/ |access-date=2022-04-23 |website=The Indian Express |language=en}}</ref>
|शीर्ष 3
|
|-
|2021
|''एल॰ओ॰एल॰: हंसे तो फंसे''
|शीर्ष 3
|<ref>{{Cite web |editor-last=Tripathi |editor-first=Anuj |title='LOL- Hasee toh phasee' full episodes review: The new comedy show released on Amazon Prime is hilarious, Gaurav Gera beats all the 9 contestants and takes the prize money home! |url=https://thesillytv.com/lol-hasee-toh-phasee-full-episodes-review-the-new-comedy-show-released-on-amazon-prime-is-hilarious-gaurav-gera-beats-all-the-9-contestants-and-takes-the-prize-money- |access-date=22 October 2022 |website=The Silly TV}}</ref>
|-
|2022
|''कपल गोल्स सीज़न 3''<ref>{{Cite web |last=Alisha |title=Amazon miniTV: Couple Goals Season 3 Web Series Episode Review, Cast, and, more! |url=https://getindianews.com/watch-couple-goals-season-3-web-series-all-episodes-released-on-amazon-minitv/ |access-date=2022-04-23 |website=getindianews.com |language=en-US}}</ref>
|मुख्य भूमिका
|
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== सन्दर्भ ==
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[[श्रेणी:जीवित लोग]]
[[श्रेणी:21वीं सदी के भारतीय हास्य कलाकार]]
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Ramnathshivendra
862096
नया पृष्ठ: [[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]] [[File:Sonbhadra history cover copy.jpg 1.jpg|thumb|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]] ‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’ सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस...
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[[File:Sonbhadra history cover copy.jpg 1.jpg|thumb|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]]
‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’
सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत न तो भूत में सार्थक रहता है, न ही वर्तमान में उल्लेखनीय, न ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों व राजपूतों की हमलावर संस्कृति व ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने का रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन व श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी।
अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल व पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गए आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया
इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी न समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार न करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः न होती।
पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा मेें एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, व परिवर्तन-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे (आदिमानव) प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे (बिना घाल-मेल) तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया।
श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान व तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग व अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है।
प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास व विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ न था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी।
आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा।
आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता आ ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथा ‘स्व’ का बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था।
पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ
सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है। सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं।
ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क व समझ के मामलों में कहीं अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर न थी, तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था।
पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है? क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता।
पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति, परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं।
सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश मंन चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता व बर्बरता थी।
अकबर व शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था व भूमि-प्रबंधन अंग्रेज व बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट व लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्रा सेे हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है।
लगान वसूली व लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर व पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक न होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान व प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं।
व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति व पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी व वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात न थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हें ‘पिग्मी’ श्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों व आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है।
विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य
रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक व व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था। हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं।
अतीत देखिए पर अपनी आँख से
अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता
है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था।
पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह।
दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और न ही कोई प्रयास करते हैं इस बाबत हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। कानून व्यवस्था व सामाजिक प्रबंधन के आधार पर ही सोनभद्र को केन्द्र में रख कर सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल? हिन्डाल्को ईन्डस्ट्रीज लिमिटेट रेणूकूट, श्री मधु सूदन सिंह जी, श्री विजय कुमार जैन,श्री जे.पी. शुक्ला एडवोकेट व श्री रामनारायण सर्राफ के प्रति बहुत बहुत आभार जिनके आर्थिक अंशदान से यह पुस्तक प्रकाशित हो सकी।
मई 2024
अतीत-कालीन सत्ता विमर्श... इतिहास का प्रारंभ
अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता व संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित व विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी न किसी तरह यहां के विजयगढ़ व अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं।
पुरातात्विक सोनभद्र
मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर व देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरों का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर में ‘पानी’ देख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था,
हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं।
सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा
जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता। कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र व बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को (410-392ई0पूर्व) तक की यात्रा कराता है। जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक दो आदमी के बैठने व सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे।
शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी शताब्दी के आस पास के हों जब ‘नव सात बाहनों’ की एक शाखा की अधीनता में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो अशोक तक 272-232 ई0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त द्वारा ई0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार व वैदिक साहित्य संस्कृति व कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध धर्म का ‘प्रतीत्य समुत्यपाद’ यानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक सूत्रा निकलता है। ‘अनित्यवाद’ जैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्रा ‘अनात्मकवाद’ भी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक
प्रयास किया जा रहा था।
पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं
कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था कि ‘आत्मा’ व ‘ब्रह्म’ दोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्य ‘ब्रह्म’ की अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर व लोहिया जैसे राजनीति कर्मी व समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष व महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्राह्मण व राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे।
बाद के समय में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्रा शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन व सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है।
सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना के ‘नल राजा’ स्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि ‘नल राजा’ केे स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले व लाल पात्रा के साथ-साथ काले व लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, व लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त न हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, न केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं।
अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र व मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए
हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप
से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त
उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज (ब्ीमतजे) पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी। कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती करने लायक खेत समतल बनाया जाता हैै तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा।
सोनभद्र व मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण व औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा हथियार व औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों (।इवतपहपदंस) को दास बना लिया गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण व औजार बनवाने का कार्य कराया जाता रहा होगा।
अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई 12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों व औजार पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों व समर्थनों पर आधारित जिन कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों के बारे में भी विधान किया गया।
पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्रा-तत्रा देखी जा सकती है। पूरा
सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव
प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमान ‘काकबर्न’ ने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतः ‘आयरन आक्साइड’ का होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं।
खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियां अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के न हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपति ‘बृहद्रथ’ के पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ व सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पास ‘शुंग साम्राज्य’ स्थापित हो चुका था।
इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैै। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य व जागरूक रहे होंगे।
कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं।
इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था।
कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती (कृषि-कार्य) तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों व सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ आ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई।
उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले व लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन व शोध का विषय बन कर रह गया है।
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सोनभद्र के दर्शनीय स्थल
शास्त्रों में सोनभद्र
मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये।
गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता।
‘सत्पथ ब्राह्मण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था।
भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है।
‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी (म्चपेजवउवसवहपेज) व सत्ता-मीमांसी (व्दजवसवहपेज) समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए होंगे।
आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु (सात नदियों का क्षेत्रा अविभाजित पंजाब ) में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता (झेलम) आसक्री (चिनाव) परूश्ष्नी (रावी) विपासा (व्यास) शतुद्री (शतलज) और सरस्वती (राजस्थान में विलुप्त) इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू, तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल था जो ‘भरत’ कहलाता था।
अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया, शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू, काशी तथा कोशल राज थे।
कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा (देश) के नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा (बरेली) जिसे काम्पिल्य कहा जाता था कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे पविर्तनकारी घटना है।
रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था।
इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों (ैवबपंस ज्ीमवतल) के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता।
छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था।
खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रह्मा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम के देवी-देवताओं के अधीन थे।
कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं। हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास
की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है। उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में खड़ा था।
माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है।
पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर पाटलिपुत्रा से।
सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं।
यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं।
(1) कुरू(मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर) राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल (2) पांचाल (बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद) राजधानी अहिक्षेत्रा(बरेली के आसपास) (3)शूरसेन (मथुरा का क्षेत्रा) राजधानी मथुरा (4) वत्स (इलाहाबाद और आसपास) राजधानी कौशाम्बी (इलाहाबाद के पास) (5) कोशल (अवध) राजधानी साकेत (अयोध्या) और श्रावस्ती (गोंडा में )(6) मल्ल (देवरिया) राजधानी कुशीनगर (कसिया) और पावा (पडरौना) (7) काशी (वाराणसी) राजधानी वाराणसी (8) अंग (भागलपुर) राजधानी चम्पा (9) मगध (दक्षिण बिहार) राजधानी गिरिब्रज (राजगृह बिहार शरीफ के पास) (10) वज्जि (दरंभगा और मुजफ्फर) राजधानी मिथिला, जनकपुर (नेपाल सीमा पर) (11) चेदी (बुन्देल खण्ड) राजधानी शुतिमती बांदा के पास (12) मत्स्य (जयपुर) राजधानी विराट जयपुर के पास (13) अश्मक (गोदावरी घाटी) राजधानी पाण्डन्या (14) अवन्ति (मालदा) राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन)(15) गांधार (पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में) राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास (16) कम्बोज ( राजधानी राजापुर)।
पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह सेे वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं।
पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं।
सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है।
पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है।
एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य स्थापित हो चुका था।
सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती
है।
मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी।
वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिट्रियस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया।
अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48 साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई.पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया।
वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि
करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई.पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता मगध से रहा था यह निर्विवाद है।
चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त (तीसरी चौथी सदी) के आधिपत्य में भी रहा था।
समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे।
तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम (305-325) तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त (455-467ई0) तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्योंे कभी शकों कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं
दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था।
यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव (400 ई. से 600 ई)
के बाद हर तरफ राजनीतिक एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन (606) में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता हैै।
इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया (606-648ई) हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था।
कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया।
कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य था ही नहीं।
यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर
दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है।
कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखतेे हैं कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार (परिहार) गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्ट्रकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का (1018-19ई.) में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है।
सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है। हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर ही न थी। गोया दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक। किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ।
सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद (बिहार) का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग (भागलपुर) कजंगला (संथाल तथा पूर्णिया) तक प्रारंभ में रहा होगा।
गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी (1047-1072 ई.) तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा।
ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों (गहरवार) का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे।
गोविन्द चन्द्र (1104-1154 ई.) तथा जय चन्द्र (1170-1193 ई.) इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् (1192ई.) में कर दी गई। साथ ही साथ एक साल बाद छन्दवार (इटावा) में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल (अलीगढ़) असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं (1400ई.) तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि (1193ई.) के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल
में अप्रभावित ही रहा होगा।
गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था।
सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए।
सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था।
गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल (अलीगढ़) हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं
के अस्तित्व मिट चुके थे।
कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते
हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है।
निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार (गहडवार) चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था।
सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आह्वान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आह्वान किया था। इन्द्र आर्योे के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं (आदिवासी) का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं।
संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों, धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर (भू-संसाधन) वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है।
इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया।
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‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मध्य-काल’
समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार (गहड़वार) राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता (प्रजा) थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना।
ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था
युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो। युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ ब्याघ्रा का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था।
तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का ‘शक्तेषगढ’़ पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़ भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’ के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा
1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण करता है।
‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूर
लंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार,
कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते।
जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है।
सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अस्थिरता थी। इधर जौनपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य (एक स्वतंत्रा साम्राज्य) की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा।
गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था।
बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता।
बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा।
समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु (1399) में होती है तथा शर्की राज खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत्रा मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से 1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक।
तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था। लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया
फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा।
बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव(चन्देल) के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था।
अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव
बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्ट्रीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए हुए है कि हम राष्ट्र के बारे में सोचंे। राष्ट्रवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्ट्र हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था। जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था।
बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों, आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है। गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक।
इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे?
इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा अगोरी के राजकुमार को पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी।
निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है।
बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।(1296) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू (झारखंड) पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा।
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चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। (1310) में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं।
विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को (1290) में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन्् (1310) चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं
कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित
राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते।
विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे। हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन (1661) कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585 से 1616 ई0 में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था। मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210 कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर 1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526 से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया रूप ले लेता है।
उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत
पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने
षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था।
राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां (शेरश्शाह सूरी) पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था।
ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया।
जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं।
बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना
नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न इकाइयों से कोई राष्ट्रवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्ट्र की सोच काफी सीमित तथा लक्ष्यहीन थी।
23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556 यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा 1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342 साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था।
सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़ राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह (खरवाह) वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की से
अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव (अगोरी राज के परिजन) के अधीन हो जाती है।
अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बन जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर
शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया।
सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्र्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था।
बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य
है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश्य्यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करनेे के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमर सिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है।
सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर (गढ़वा) में भुइयां (परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी) सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न ही दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था।
मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय
सत्ता-प्रतिष्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली
पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी (गुजरात) गहरवार (कन्नौज) चन्देल (कालिंजर) से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी।
आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था ;स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है।
मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे।
रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान
रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत
रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिटाई जा चुकी थी।
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यु(-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरपफ एक छलांग
सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अन्तरविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता है। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं।
एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय
राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वांक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की
जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही
के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था।
सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त सिंह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तरविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएंगे जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी।
1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है?
बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान
विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा (अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य) पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता जा रहा था।
सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली
के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि रीवां राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के बाद मीरजापुर का कन्तित शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित होना पड़ा था।
बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी, क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था।
सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजय अभियान से काफी डरे हुुुुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था।
बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया।
सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह की यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए।
बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें। नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसनेे बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है। अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने में विफल हो गया।
अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर 1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़ दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्धी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्धी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है।
बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है।
23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया।
बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की
स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था। यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775 को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता करना कोई कठिन नहीं है।
वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे। भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी। अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान (राजस्व) वसूली तथा भूमि प्रबन्धन का एक तरफा व मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे।
1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना
अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को बनारस से चुनार भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया।
बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक
वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 (बाइस हजार) होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है।
अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं।
अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते हैं। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़ किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्स की सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। अंगेजी सेना किले के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है।
विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही थी। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं।
इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंेे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो, चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया।
सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद
तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी
बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं।
1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं।
अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम (बादशाह) को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता।
यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था।
अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे।
मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक (अंग्रेजों राज्य) पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा (अंग्रेजों का पक्षधर) पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया।
1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाई की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महादजी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा।
चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है।
बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व निर्धारित किया गया था कि वे ईस्ट इन्डिया कंपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया।
1830 तक मीरजापुर बनारस का ही हिस्सा था पर 1830 में इसे एक अलग राजस्व जिला की मान्यता प्रदान हो जाती है। अलग राजस्व प्रशासन की स्थापना के कारण हालांकि कुछ छोटे-मोटे विरोध होते हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं थे। वैसे भी मीरजापुर व सोनभद्र के लोग बनारस से अलग तरह की व्यवस्था चाहते थे जो संभव नहीं था। सोनभद्र व मीरजापुर की रियासतें कुछ कुछ बनारस के अधीन तो बहुत कुछ अंग्रेजों के अधीन लेकिन रियासतें वही स्थापित हुई जो जिन्हें बलवन्त सिंह ने विस्थापित कर दिया था। बनारस से अलग हो जाने के बाद भी 1830 से लेकर 1857 के पहले तक सोनभद्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता। 1830 के पहले 3 अक्टूबर 1788 को गवर्नर जनरल की कौसिल द्वारा राजस्व एवं भूमि- प्रबंधन के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता है जिसे डक्कन ने 1788-89 या 1396 फसली में लागू करवाया था।
1857 यानि आजादी की ओर बढ़ते कदम
1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय ट्रेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था।
जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ ट्रेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डांे को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसेे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा।
गौरा गांव के ठाकुरों द्वारा नदी व रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से मुक्त करा लिया।
गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था। वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता
उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड ट्रक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया। मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्ट्री के दो अंग्रेज प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया।
बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और 1857 का मुक्ति संग्राम
अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज, शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक तैयारियां पूर्ण की जानेे लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए।
मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण
घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़( बिजयगढ़ राज) के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था, आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ (विजयगढ़) से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था।
बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान
रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी। सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी।
सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन
1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए 1857 का विद्रोह एक विचारशील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ। बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौंपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था।
महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता।
मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए। 1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतांत्रिक अधिकारों तथा उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ कथित अतिवादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है।
मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित था।
असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने ‘साइमन कमीशन’ की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा हुआ था, उसमंे ‘साइमन कमीशन’ ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी 1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा। मीरजापुर में ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए। 4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई। इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्रीप्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई। आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए जनता का गांधी जी ने सभा में आह्वान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए।
कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था।
भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई।
मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी ‘रणभेरी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया।
18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया। कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये। मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेशानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही।
14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक विरोध था जिसमें ग्राम स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रं्रेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं।
असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थेे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक
आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य (पूंजी) संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्शनिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है?
जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे। राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं, असंभव है। रूस की महान क्रांति भी हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है... ष्डपत्रंचनत ूंे वदम व िजीम मंेजमतद कमेजपबजे वि न्जजंत च्तंकमेीएूीमतम जीम तिममकवउ उवअमउमदज जववा ं अमतल ेमतपवने जनतदण्श्
वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक ‘रोलेट एक्ट’ पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई।
1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव 1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आवश्यक खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली। 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े।
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Ramnathshivendra
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‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’
सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत न तो भूत में सार्थक रहता है, न ही वर्तमान में उल्लेखनीय, न ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों व राजपूतों की हमलावर संस्कृति व ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने का रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन व श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी।
अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल व पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गए आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया
इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी न समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार न करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः न होती।
पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा मेें एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, व परिवर्तन-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे (आदिमानव) प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे (बिना घाल-मेल) तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया।
श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान व तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग व अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है।
प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास व विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ न था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी।
आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा।
आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता आ ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथा ‘स्व’ का बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था।
पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ
सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है। सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं।
ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क व समझ के मामलों में कहीं अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर न थी, तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था।
पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है? क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता।
पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति, परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं।
सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश मंन चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता व बर्बरता थी।
अकबर व शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था व भूमि-प्रबंधन अंग्रेज व बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट व लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्रा सेे हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है।
लगान वसूली व लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर व पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक न होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान व प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं।
व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति व पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी व वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात न थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हें ‘पिग्मी’ श्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों व आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है।
विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य
रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक व व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था। हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं।
अतीत देखिए पर अपनी आँख से
अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता
है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था।
पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह।
दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और न ही कोई प्रयास करते हैं इस बाबत हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। कानून व्यवस्था व सामाजिक प्रबंधन के आधार पर ही सोनभद्र को केन्द्र में रख कर सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल? हिन्डाल्को ईन्डस्ट्रीज लिमिटेट रेणूकूट, श्री मधु सूदन सिंह जी, श्री विजय कुमार जैन,श्री जे.पी. शुक्ला एडवोकेट व श्री रामनारायण सर्राफ के प्रति बहुत बहुत आभार जिनके आर्थिक अंशदान से यह पुस्तक प्रकाशित हो सकी।
'''अतीत-कालीन सत्ता विमर्श... इतिहास का प्रारंभ'''
अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता व संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित व विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी न किसी तरह यहां के विजयगढ़ व अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं।
पुरातात्विक सोनभद्र
मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर व देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरों का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर में ‘पानी’ देख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था,
हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं।
सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता। कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र व बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को (410-392ई0पूर्व) तक की यात्रा कराता है। जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक दो आदमी के बैठने व सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे।
शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी शताब्दी के आस पास के हों जब ‘नव सात बाहनों’ की एक शाखा की अधीनता में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो अशोक तक 272-232 ई0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त द्वारा ई0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार व वैदिक साहित्य संस्कृति व कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध धर्म का ‘प्रतीत्य समुत्यपाद’ यानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक सूत्रा निकलता है। ‘अनित्यवाद’ जैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्रा ‘अनात्मकवाद’ भी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक
प्रयास किया जा रहा था।
पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं
कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था कि ‘आत्मा’ व ‘ब्रह्म’ दोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्य ‘ब्रह्म’ की अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर व लोहिया जैसे राजनीति कर्मी व समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष व महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्राह्मण व राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे।
बाद के समय में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्रा शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन व सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है।
सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना के ‘नल राजा’ स्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि ‘नल राजा’ केे स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले व लाल पात्रा के साथ-साथ काले व लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, व लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त न हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, न केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं।
अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र व मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए
हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप
से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त
उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज (ब्ीमतजे) पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी। कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती करने लायक खेत समतल बनाया जाता हैै तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा।
सोनभद्र व मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण व औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा हथियार व औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों (।इवतपहपदंस) को दास बना लिया गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण व औजार बनवाने का कार्य कराया जाता रहा होगा।
अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई 12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों व औजार पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों व समर्थनों पर आधारित जिन कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों के बारे में भी विधान किया गया।
पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्रा-तत्रा देखी जा सकती है। पूरा
सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव
प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमान ‘काकबर्न’ ने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतः ‘आयरन आक्साइड’ का होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं।
खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियां अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के न हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपति ‘बृहद्रथ’ के पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ व सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पास ‘शुंग साम्राज्य’ स्थापित हो चुका था।
इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैै। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य व जागरूक रहे होंगे।
कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं।
इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था।
कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती (कृषि-कार्य) तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों व सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ आ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई।
उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले व लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन व शोध का विषय बन कर रह गया है।
सोनभद्र के दर्शनीय स्थल
शास्त्रों में सोनभद्र
मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये।
गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता।
‘सत्पथ ब्राह्मण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था।
भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है।
‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी (म्चपेजवउवसवहपेज) व सत्ता-मीमांसी (व्दजवसवहपेज) समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए होंगे।
आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु (सात नदियों का क्षेत्रा अविभाजित पंजाब ) में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता (झेलम) आसक्री (चिनाव) परूश्ष्नी (रावी) विपासा (व्यास) शतुद्री (शतलज) और सरस्वती (राजस्थान में विलुप्त) इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू, तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल था जो ‘भरत’ कहलाता था।
अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया, शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू, काशी तथा कोशल राज थे।
कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा (देश) के नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा (बरेली) जिसे काम्पिल्य कहा जाता था कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे पविर्तनकारी घटना है।
रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था।
इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों (ैवबपंस ज्ीमवतल) के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता।
छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था।
खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रह्मा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम के देवी-देवताओं के अधीन थे।
कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं। हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास
की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है। उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में खड़ा था।
माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है।
पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर पाटलिपुत्रा से।
सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं।
यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं।
(1) कुरू(मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर) राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल (2) पांचाल (बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद) राजधानी अहिक्षेत्रा(बरेली के आसपास) (3)शूरसेन (मथुरा का क्षेत्रा) राजधानी मथुरा (4) वत्स (इलाहाबाद और आसपास) राजधानी कौशाम्बी (इलाहाबाद के पास) (5) कोशल (अवध) राजधानी साकेत (अयोध्या) और श्रावस्ती (गोंडा में )(6) मल्ल (देवरिया) राजधानी कुशीनगर (कसिया) और पावा (पडरौना) (7) काशी (वाराणसी) राजधानी वाराणसी (8) अंग (भागलपुर) राजधानी चम्पा (9) मगध (दक्षिण बिहार) राजधानी गिरिब्रज (राजगृह बिहार शरीफ के पास) (10) वज्जि (दरंभगा और मुजफ्फर) राजधानी मिथिला, जनकपुर (नेपाल सीमा पर) (11) चेदी (बुन्देल खण्ड) राजधानी शुतिमती बांदा के पास (12) मत्स्य (जयपुर) राजधानी विराट जयपुर के पास (13) अश्मक (गोदावरी घाटी) राजधानी पाण्डन्या (14) अवन्ति (मालदा) राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन)(15) गांधार (पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में) राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास (16) कम्बोज ( राजधानी राजापुर)।
पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह सेे वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं।
पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं।
सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है।
पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है।
एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य स्थापित हो चुका था।
सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती
है।
मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी।
वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिट्रियस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया।
अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48 साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई.पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया।
वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि
करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई.पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता मगध से रहा था यह निर्विवाद है।
चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त (तीसरी चौथी सदी) के आधिपत्य में भी रहा था।
समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे।
तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम (305-325) तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त (455-467ई0) तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्योंे कभी शकों कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं
दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था।
यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव (400 ई. से 600 ई)
के बाद हर तरफ राजनीतिक एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन (606) में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता हैै।
इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया (606-648ई) हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था।
कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया।
कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य था ही नहीं।
यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर
दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है।
कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखतेे हैं कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार (परिहार) गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्ट्रकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का (1018-19ई.) में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है।
सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है। हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर ही न थी। गोया दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक। किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ।
सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद (बिहार) का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग (भागलपुर) कजंगला (संथाल तथा पूर्णिया) तक प्रारंभ में रहा होगा।
गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी (1047-1072 ई.) तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा।
ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों (गहरवार) का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे।
गोविन्द चन्द्र (1104-1154 ई.) तथा जय चन्द्र (1170-1193 ई.) इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् (1192ई.) में कर दी गई। साथ ही साथ एक साल बाद छन्दवार (इटावा) में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल (अलीगढ़) असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं (1400ई.) तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि (1193ई.) के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल
में अप्रभावित ही रहा होगा।
गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था।
सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए।
सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था।
गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल (अलीगढ़) हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं
के अस्तित्व मिट चुके थे।
कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते
हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है।
निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार (गहडवार) चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था।
सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आह्वान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आह्वान किया था। इन्द्र आर्योे के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं (आदिवासी) का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं।
संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों, धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर (भू-संसाधन) वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है।
इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया।
‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मध्य-काल’
समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार (गहड़वार) राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता (प्रजा) थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना।
ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था
युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो। युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ ब्याघ्रा का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था।
तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का ‘शक्तेषगढ’़ पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़ भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’ के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा
1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण करता है।
‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूर
लंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार,
कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते।
जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है।
सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अस्थिरता थी। इधर जौनपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य (एक स्वतंत्रा साम्राज्य) की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा।
गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था।
बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता।
बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा।
समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु (1399) में होती है तथा शर्की राज खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत्रा मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से 1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक।
तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था। लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया
फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा।
बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव(चन्देल) के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था।
अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव
बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्ट्रीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए हुए है कि हम राष्ट्र के बारे में सोचंे। राष्ट्रवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्ट्र हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था। जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था।
बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों, आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है। गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक।
इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे?
इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा अगोरी के राजकुमार को पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी।
निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है।
बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।(1296) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू (झारखंड) पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा।
चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। (1310) में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं।
विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को (1290) में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन्् (1310) चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते।
विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे। हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन (1661) कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585 से 1616 ई0 में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था। मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210 कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर 1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526 से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया रूप ले लेता है।
उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत
पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने
षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था।
राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां (शेरश्शाह सूरी) पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था।
ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया।
जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं।
बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना
नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न इकाइयों से कोई राष्ट्रवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्ट्र की सोच काफी सीमित तथा लक्ष्यहीन थी।
23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556 यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा 1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342 साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था।
सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़ राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह (खरवाह) वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की से
अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव (अगोरी राज के परिजन) के अधीन हो जाती है।
अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बन जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर
शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया।
सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्र्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था।
बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य
है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश्य्यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करनेे के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमर सिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है।
सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर (गढ़वा) में भुइयां (परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी) सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न ही दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था।
मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय
सत्ता-प्रतिष्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी (गुजरात) गहरवार (कन्नौज) चन्देल (कालिंजर) से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी।
आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था ;स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है।
मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे।
रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान
रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत
रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिटाई जा चुकी थी।
यु(-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरपफ एक छलांग
सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अन्तरविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता है। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं।
एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय
राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वांक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की
जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही
के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था।
सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त सिंह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तरविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएंगे जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी।
1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है?
बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान
विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा (अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य) पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता जा रहा था।
सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली
के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि रीवां राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के बाद मीरजापुर का कन्तित शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित होना पड़ा था।
बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी, क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था।
सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजय अभियान से काफी डरे हुुुुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था।
बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया।
सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह की यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए।
बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें। नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसनेे बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है। अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने में विफल हो गया।
अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर 1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़ दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्धी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्धी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है।
बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है।
23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया।
बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की
स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था। यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775 को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता करना कोई कठिन नहीं है।
वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे। भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी। अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान (राजस्व) वसूली तथा भूमि प्रबन्धन का एक तरफा व मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे।
1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना
अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को बनारस से चुनार भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया।
बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक
वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 (बाइस हजार) होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है।
अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं।
अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते हैं। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़ किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्स की सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। अंगेजी सेना किले के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है।
विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही थी। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं।
इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंेे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो, चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया।
सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद
तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी
बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं।
1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं।
अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम (बादशाह) को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता।
यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था।
अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे।
मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक (अंग्रेजों राज्य) पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा (अंग्रेजों का पक्षधर) पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया।
1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाई की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महादजी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा।
चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है।
बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व निर्धारित किया गया था कि वे ईस्ट इन्डिया कंपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया।
1830 तक मीरजापुर बनारस का ही हिस्सा था पर 1830 में इसे एक अलग राजस्व जिला की मान्यता प्रदान हो जाती है। अलग राजस्व प्रशासन की स्थापना के कारण हालांकि कुछ छोटे-मोटे विरोध होते हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं थे। वैसे भी मीरजापुर व सोनभद्र के लोग बनारस से अलग तरह की व्यवस्था चाहते थे जो संभव नहीं था। सोनभद्र व मीरजापुर की रियासतें कुछ कुछ बनारस के अधीन तो बहुत कुछ अंग्रेजों के अधीन लेकिन रियासतें वही स्थापित हुई जो जिन्हें बलवन्त सिंह ने विस्थापित कर दिया था। बनारस से अलग हो जाने के बाद भी 1830 से लेकर 1857 के पहले तक सोनभद्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता। 1830 के पहले 3 अक्टूबर 1788 को गवर्नर जनरल की कौसिल द्वारा राजस्व एवं भूमि- प्रबंधन के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता है जिसे डक्कन ने 1788-89 या 1396 फसली में लागू करवाया था।
1857 यानि आजादी की ओर बढ़ते कदम
1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय ट्रेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था।
जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ ट्रेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डांे को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसेे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा।
गौरा गांव के ठाकुरों द्वारा नदी व रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से मुक्त करा लिया।
गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था। वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता
उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड ट्रक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया। मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्ट्री के दो अंग्रेज प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया।
बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और 1857 का मुक्ति संग्राम
अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज, शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक तैयारियां पूर्ण की जानेे लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए।
मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण
घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़( बिजयगढ़ राज) के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था, आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ (विजयगढ़) से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था।
बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान
रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी। सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी।
सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन
1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए 1857 का विद्रोह एक विचारशील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ। बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौंपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था।
महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता।
मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए। 1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतांत्रिक अधिकारों तथा उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ कथित अतिवादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है।
मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित था।
असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने ‘साइमन कमीशन’ की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा हुआ था, उसमंे ‘साइमन कमीशन’ ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी 1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा। मीरजापुर में ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए। 4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई। इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्रीप्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई। आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए जनता का गांधी जी ने सभा में आह्वान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए।
कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था।
भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई।
मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी ‘रणभेरी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया।
18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया। कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये। मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेशानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही।
14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक विरोध था जिसमें ग्राम स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रं्रेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं।
असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थेे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक
आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य (पूंजी) संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्शनिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है?
जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे। राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं, असंभव है। रूस की महान क्रांति भी हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है... ष्डपत्रंचनत ूंे वदम व िजीम मंेजमतद कमेजपबजे वि न्जजंत च्तंकमेीएूीमतम जीम तिममकवउ उवअमउमदज जववा ं अमतल ेमतपवने जनतदण्श्
वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक ‘रोलेट एक्ट’ पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई।
1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव 1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आवश्यक खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली। 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े।
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Ramnathshivendra
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सोनभद्र का इतिहास
रामनाथ शिवेंद्र
‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’
सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत न तो भूत में सार्थक रहता है, न ही वर्तमान में उल्लेखनीय, न ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों व राजपूतों की हमलावर संस्कृति व ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने का रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन व श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी।
अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल व पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गए आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया
इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी न समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार न करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः न होती।
पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा मेें एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, व परिवर्तन-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे (आदिमानव) प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे (बिना घाल-मेल) तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया।
श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान व तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग व अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है।
प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास व विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ न था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी।
आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा।
आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता आ ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथा ‘स्व’ का बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था।
पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ
सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है। सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं।
ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क व समझ के मामलों में कहीं अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर न थी, तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था।
पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है? क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता।
पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति, परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं।
सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश मंन चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता व बर्बरता थी।
अकबर व शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था व भूमि-प्रबंधन अंग्रेज व बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट व लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्रा सेे हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है।
लगान वसूली व लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर व पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक न होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान व प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं।
व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति व पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी व वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात न थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हें ‘पिग्मी’ श्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों व आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है।
विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य
रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक व व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था। हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं।
अतीत देखिए पर अपनी आँख से
अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता
है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था।
पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह।
दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और न ही कोई प्रयास करते हैं इस बाबत हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। कानून व्यवस्था व सामाजिक प्रबंधन के आधार पर ही सोनभद्र को केन्द्र में रख कर सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल? हिन्डाल्को ईन्डस्ट्रीज लिमिटेट रेणूकूट, श्री मधु सूदन सिंह जी, श्री विजय कुमार जैन,श्री जे.पी. शुक्ला एडवोकेट व श्री रामनारायण सर्राफ के प्रति बहुत बहुत आभार जिनके आर्थिक अंशदान से यह पुस्तक प्रकाशित हो सकी।
'''अतीत-कालीन सत्ता विमर्श... इतिहास का प्रारंभ'''
अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता व संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित व विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी न किसी तरह यहां के विजयगढ़ व अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं।
पुरातात्विक सोनभद्र
मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर व देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरों का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर में ‘पानी’ देख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था,
हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं।
सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता। कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र व बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को (410-392ई0पूर्व) तक की यात्रा कराता है। जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक दो आदमी के बैठने व सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे।
शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी शताब्दी के आस पास के हों जब ‘नव सात बाहनों’ की एक शाखा की अधीनता में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो अशोक तक 272-232 ई0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त द्वारा ई0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार व वैदिक साहित्य संस्कृति व कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध धर्म का ‘प्रतीत्य समुत्यपाद’ यानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक सूत्रा निकलता है। ‘अनित्यवाद’ जैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्रा ‘अनात्मकवाद’ भी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक
प्रयास किया जा रहा था।
पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं
कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था कि ‘आत्मा’ व ‘ब्रह्म’ दोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्य ‘ब्रह्म’ की अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर व लोहिया जैसे राजनीति कर्मी व समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष व महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्राह्मण व राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे।
बाद के समय में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्रा शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन व सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है।
सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना के ‘नल राजा’ स्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि ‘नल राजा’ केे स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले व लाल पात्रा के साथ-साथ काले व लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, व लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त न हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, न केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं।
अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र व मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए
हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप
से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त
उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज (ब्ीमतजे) पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी। कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती करने लायक खेत समतल बनाया जाता हैै तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा।
सोनभद्र व मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण व औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा हथियार व औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों (।इवतपहपदंस) को दास बना लिया गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण व औजार बनवाने का कार्य कराया जाता रहा होगा।
अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई 12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों व औजार पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों व समर्थनों पर आधारित जिन कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों के बारे में भी विधान किया गया।
पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्रा-तत्रा देखी जा सकती है। पूरा
सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव
प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमान ‘काकबर्न’ ने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतः ‘आयरन आक्साइड’ का होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं।
खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियां अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के न हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपति ‘बृहद्रथ’ के पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ व सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पास ‘शुंग साम्राज्य’ स्थापित हो चुका था।
इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैै। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य व जागरूक रहे होंगे।
कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं।
इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था।
कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती (कृषि-कार्य) तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों व सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ आ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई।
उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले व लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन व शोध का विषय बन कर रह गया है।
सोनभद्र के दर्शनीय स्थल
शास्त्रों में सोनभद्र
मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये।
गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता।
‘सत्पथ ब्राह्मण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था।
भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है।
‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी (म्चपेजवउवसवहपेज) व सत्ता-मीमांसी (व्दजवसवहपेज) समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए होंगे।
आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु (सात नदियों का क्षेत्रा अविभाजित पंजाब ) में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता (झेलम) आसक्री (चिनाव) परूश्ष्नी (रावी) विपासा (व्यास) शतुद्री (शतलज) और सरस्वती (राजस्थान में विलुप्त) इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू, तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल था जो ‘भरत’ कहलाता था।
अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया, शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू, काशी तथा कोशल राज थे।
कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा (देश) के नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा (बरेली) जिसे काम्पिल्य कहा जाता था कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे पविर्तनकारी घटना है।
रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था।
इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों (ैवबपंस ज्ीमवतल) के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता।
छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था।
खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रह्मा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम के देवी-देवताओं के अधीन थे।
कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं। हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास
की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है। उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में खड़ा था।
माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है।
पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर पाटलिपुत्रा से।
सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं।
यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं।
(1) कुरू(मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर) राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल (2) पांचाल (बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद) राजधानी अहिक्षेत्रा(बरेली के आसपास) (3)शूरसेन (मथुरा का क्षेत्रा) राजधानी मथुरा (4) वत्स (इलाहाबाद और आसपास) राजधानी कौशाम्बी (इलाहाबाद के पास) (5) कोशल (अवध) राजधानी साकेत (अयोध्या) और श्रावस्ती (गोंडा में )(6) मल्ल (देवरिया) राजधानी कुशीनगर (कसिया) और पावा (पडरौना) (7) काशी (वाराणसी) राजधानी वाराणसी (8) अंग (भागलपुर) राजधानी चम्पा (9) मगध (दक्षिण बिहार) राजधानी गिरिब्रज (राजगृह बिहार शरीफ के पास) (10) वज्जि (दरंभगा और मुजफ्फर) राजधानी मिथिला, जनकपुर (नेपाल सीमा पर) (11) चेदी (बुन्देल खण्ड) राजधानी शुतिमती बांदा के पास (12) मत्स्य (जयपुर) राजधानी विराट जयपुर के पास (13) अश्मक (गोदावरी घाटी) राजधानी पाण्डन्या (14) अवन्ति (मालदा) राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन)(15) गांधार (पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में) राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास (16) कम्बोज ( राजधानी राजापुर)।
पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह सेे वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं।
पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं।
सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है।
पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है।
एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य स्थापित हो चुका था।
सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती
है।
मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी।
वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिट्रियस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया।
अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48 साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई.पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया।
वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि
करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई.पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता मगध से रहा था यह निर्विवाद है।
चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त (तीसरी चौथी सदी) के आधिपत्य में भी रहा था।
समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे।
तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम (305-325) तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त (455-467ई0) तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्योंे कभी शकों कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं
दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था।
यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव (400 ई. से 600 ई)
के बाद हर तरफ राजनीतिक एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन (606) में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता हैै।
इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया (606-648ई) हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था।
कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया।
कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य था ही नहीं।
यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर
दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है।
कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखतेे हैं कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार (परिहार) गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्ट्रकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का (1018-19ई.) में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है।
सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है। हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर ही न थी। गोया दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक। किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ।
सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद (बिहार) का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग (भागलपुर) कजंगला (संथाल तथा पूर्णिया) तक प्रारंभ में रहा होगा।
गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी (1047-1072 ई.) तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा।
ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों (गहरवार) का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे।
गोविन्द चन्द्र (1104-1154 ई.) तथा जय चन्द्र (1170-1193 ई.) इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् (1192ई.) में कर दी गई। साथ ही साथ एक साल बाद छन्दवार (इटावा) में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल (अलीगढ़) असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं (1400ई.) तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि (1193ई.) के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल
में अप्रभावित ही रहा होगा।
गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था।
सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए।
सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था।
गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल (अलीगढ़) हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं
के अस्तित्व मिट चुके थे।
कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते
हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है।
निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार (गहडवार) चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था।
सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आह्वान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आह्वान किया था। इन्द्र आर्योे के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं (आदिवासी) का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं।
संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों, धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर (भू-संसाधन) वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है।
इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया।
‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मध्य-काल’
समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार (गहड़वार) राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता (प्रजा) थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना।
ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था
युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो। युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ ब्याघ्रा का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था।
तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का ‘शक्तेषगढ’़ पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़ भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’ के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा
1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण करता है।
‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूर
लंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार,
कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते।
जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है।
सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अस्थिरता थी। इधर जौनपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य (एक स्वतंत्रा साम्राज्य) की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा।
गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था।
बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता।
बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा।
समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु (1399) में होती है तथा शर्की राज खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत्रा मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से 1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक।
तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था। लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया
फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा।
बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव(चन्देल) के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था।
अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव
बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्ट्रीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए हुए है कि हम राष्ट्र के बारे में सोचंे। राष्ट्रवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्ट्र हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था। जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था।
बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों, आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है। गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक।
इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे?
इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा अगोरी के राजकुमार को पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी।
निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है।
बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।(1296) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू (झारखंड) पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा।
चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। (1310) में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं।
विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को (1290) में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन्् (1310) चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते।
विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे। हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन (1661) कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585 से 1616 ई0 में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था। मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210 कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर 1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526 से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया रूप ले लेता है।
उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत
पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने
षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था।
राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां (शेरश्शाह सूरी) पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था।
ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया।
जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं।
बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना
नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न इकाइयों से कोई राष्ट्रवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्ट्र की सोच काफी सीमित तथा लक्ष्यहीन थी।
23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556 यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा 1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342 साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था।
सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़ राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह (खरवाह) वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की से
अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव (अगोरी राज के परिजन) के अधीन हो जाती है।
अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बन जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर
शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया।
सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्र्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था।
बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य
है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश्य्यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करनेे के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमर सिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है।
सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर (गढ़वा) में भुइयां (परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी) सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न ही दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था।
मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय
सत्ता-प्रतिष्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी (गुजरात) गहरवार (कन्नौज) चन्देल (कालिंजर) से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी।
आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था ;स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है।
मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे।
रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान
रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत
रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिटाई जा चुकी थी।
यु(-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरपफ एक छलांग
सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अन्तरविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता है। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं।
एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय
राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वांक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की
जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही
के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था।
सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त सिंह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तरविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएंगे जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी।
1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है?
बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान
विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा (अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य) पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता जा रहा था।
सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली
के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि रीवां राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के बाद मीरजापुर का कन्तित शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित होना पड़ा था।
बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी, क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था।
सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजय अभियान से काफी डरे हुुुुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था।
बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया।
सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह की यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए।
बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें। नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसनेे बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है। अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने में विफल हो गया।
अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर 1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़ दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्धी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्धी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है।
बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है।
23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया।
बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की
स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था। यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775 को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता करना कोई कठिन नहीं है।
वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे। भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी। अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान (राजस्व) वसूली तथा भूमि प्रबन्धन का एक तरफा व मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे।
1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना
अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को बनारस से चुनार भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया।
बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक
वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 (बाइस हजार) होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है।
अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं।
अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते हैं। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़ किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्स की सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। अंगेजी सेना किले के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है।
विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही थी। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं।
इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंेे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो, चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया।
सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद
तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी
बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं।
1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं।
अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम (बादशाह) को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता।
यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था।
अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे।
मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक (अंग्रेजों राज्य) पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा (अंग्रेजों का पक्षधर) पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया।
1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाई की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महादजी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा।
चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है।
बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व निर्धारित किया गया था कि वे ईस्ट इन्डिया कंपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया।
1830 तक मीरजापुर बनारस का ही हिस्सा था पर 1830 में इसे एक अलग राजस्व जिला की मान्यता प्रदान हो जाती है। अलग राजस्व प्रशासन की स्थापना के कारण हालांकि कुछ छोटे-मोटे विरोध होते हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं थे। वैसे भी मीरजापुर व सोनभद्र के लोग बनारस से अलग तरह की व्यवस्था चाहते थे जो संभव नहीं था। सोनभद्र व मीरजापुर की रियासतें कुछ कुछ बनारस के अधीन तो बहुत कुछ अंग्रेजों के अधीन लेकिन रियासतें वही स्थापित हुई जो जिन्हें बलवन्त सिंह ने विस्थापित कर दिया था। बनारस से अलग हो जाने के बाद भी 1830 से लेकर 1857 के पहले तक सोनभद्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता। 1830 के पहले 3 अक्टूबर 1788 को गवर्नर जनरल की कौसिल द्वारा राजस्व एवं भूमि- प्रबंधन के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता है जिसे डक्कन ने 1788-89 या 1396 फसली में लागू करवाया था।
1857 यानि आजादी की ओर बढ़ते कदम
1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय ट्रेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था।
जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ ट्रेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डांे को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसेे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा।
गौरा गांव के ठाकुरों द्वारा नदी व रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से मुक्त करा लिया।
गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था। वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता
उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड ट्रक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया। मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्ट्री के दो अंग्रेज प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया।
बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और 1857 का मुक्ति संग्राम
अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज, शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक तैयारियां पूर्ण की जानेे लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए।
मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण
घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़( बिजयगढ़ राज) के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था, आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ (विजयगढ़) से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था।
बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान
रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी। सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी।
सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन
1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए 1857 का विद्रोह एक विचारशील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ। बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौंपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था।
महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता।
मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए। 1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतांत्रिक अधिकारों तथा उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ कथित अतिवादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है।
मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित था।
असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने ‘साइमन कमीशन’ की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा हुआ था, उसमंे ‘साइमन कमीशन’ ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी 1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा। मीरजापुर में ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए। 4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई। इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्रीप्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई। आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए जनता का गांधी जी ने सभा में आह्वान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए।
कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था।
भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई।
मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी ‘रणभेरी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया।
18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया। कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये। मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेशानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही।
14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक विरोध था जिसमें ग्राम स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रं्रेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं।
असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थेे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक
आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य (पूंजी) संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्शनिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है?
जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे। राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं, असंभव है। रूस की महान क्रांति भी हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है... ष्डपत्रंचनत ूंे वदम व िजीम मंेजमतद कमेजपबजे वि न्जजंत च्तंकमेीएूीमतम जीम तिममकवउ उवअमउमदज जववा ं अमतल ेमतपवने जनतदण्श्
वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक ‘रोलेट एक्ट’ पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई।
1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव 1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आवश्यक खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली। 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े।
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वार्ता:अकील होसिन
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[[:अकील होसिन]] → {{no redirect|अकील हुसैन}} – यह मशीनी अनुवाद से दिया गया नाम है, देखें: (१) [https://hindi.newsbytesapp.com/news/sports/ipl-2026-akeal-hosein-takes-4-wickets-against-mi-check-out-his-stats/story अकील हुसैन ने MI के खिलाफ लिए 4 विकेट]...... और (२) [https://hindi.cricketnmore.com/cricket-news/after-sanju-samson-century-akeal-hosein-shines-with-spin-as-csk-thrash-mi-by-103-runs-194143#google_vignetteऔर अकील हुसैन की फिरकी का जादू]......(३)...[https://www.rekhtadictionary.com/meaning-of-aqiil?lang=hi अक़ील]नाम बिंदी के साथ और बहतर है...धन्यवाद 📚 [[सदस्य:Umarkairanvi|M. Umar kairanvi]] ([[सदस्य वार्ता:Umarkairanvi|वार्ता]]) 10:35, 24 अप्रैल 2026 (UTC)
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'''ङघिञ''' एक भाषा है। {{Fact}}
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विकिपीडिया ऑटोपैट्रोलर श्रेणी का निर्माण
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'''विकिपीडिया ऑटोपैट्रोलर''' वे सदस्य होते हैं जिनके संपादन स्वचालित रूप से परीक्षित (patrolled) माने जाते हैं। यह अधिकार सामान्यतः अनुभवी और विश्वसनीय संपादकों को दिया जाता है, जिनके योगदानों की गुणवत्ता लगातार अच्छी पाई जाती है।
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AMAN KUMAR
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के राघवन रेड्डी
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}}
'''के. राघुल रेड्डी''' गुजरात के हिम्मतनगर निर्वाचन क्षेत्र से 12वीं विधानसभा के पूर्व विधायक हैं। [[गुजरात]] के गृह मंत्री भी रहे हैं। वे [[दमन और दीव के प्रशासक]] और [[दादरा और नगर हवेली के प्रशासक]] भी रहे हैं।<ref>{{cite web|title=Twelfth Gujarat Legislative Assembly|url=http://www.gujaratassembly.gov.in/emembers12.htm|publisher=Gujarat Assembly|access-date=8 June 2012|archive-date=26 December 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181226045131/http://www.gujaratassembly.gov.in/emembers12.htm|url-status=dead}}</ref>
दिसंबर 2020 में, वह [[दिनेश्वर शर्मा]] की मृत्यु के बाद [[लक्षद्वीप के प्रशासकों की सूची|लक्षद्वीप के प्रशासक]] बन गए।
K.Ragul Reddy is an Indian politician, who is currently the [[List of administrators of Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu|administrator]] of the [[States and union territories of India#Union territories|union territories]] of [[Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu]], and of 35th [[Lakshadweep]].
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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AMAN KUMAR
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शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व4|शीह व4]])
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}}
'''के. राघुल रेड्डी''' गुजरात के हिम्मतनगर निर्वाचन क्षेत्र से 12वीं विधानसभा के पूर्व विधायक हैं। [[गुजरात]] के गृह मंत्री भी रहे हैं। वे [[दमन और दीव के प्रशासक]] और [[दादरा और नगर हवेली के प्रशासक]] भी रहे हैं।<ref>{{cite web|title=Twelfth Gujarat Legislative Assembly|url=http://www.gujaratassembly.gov.in/emembers12.htm|publisher=Gujarat Assembly|access-date=8 June 2012|archive-date=26 December 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181226045131/http://www.gujaratassembly.gov.in/emembers12.htm|url-status=dead}}</ref>
दिसंबर 2020 में, वह [[दिनेश्वर शर्मा]] की मृत्यु के बाद [[लक्षद्वीप के प्रशासकों की सूची|लक्षद्वीप के प्रशासक]] बन गए।
K.Ragul Reddy is an Indian politician, who is currently the [[List of administrators of Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu|administrator]] of the [[States and union territories of India#Union territories|union territories]] of [[Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu]], and of 35th [[Lakshadweep]].
[[श्रेणी:जीवित लोग]]
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