विकिपीडिया hiwiki https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.46.0-wmf.24 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिपीडिया विकिपीडिया वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता प्रवेशद्वार प्रवेशद्वार वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विकिपीडिया:चौपाल 4 1001 6543679 6542992 2026-04-24T17:40:24Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति संपादनोत्सव में भाग लें */ 6543679 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <!-- इस लाइन को न हटायें। नए अनुभाग पृष्ठ पर सबसे नीचे बनायें। --> == Anthony Albanese के सही उच्चारण के संबंध में == विकिपीडिया के अंग्रेज़ी संस्कारण पर Albanese का उच्चारण "/ˌælbəˈniːzi/ ऐल-ब्अ-नी-ज़ी अथवा /ˈælbəniːz/ ऐल-ब्अ-नीज़" दिया गया है, अतः हिन्दी संस्करण पर भी उनका सही नाम का उच्चारण शामिल करें। स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Anthony_Albanese == Derbyshire के सही उच्चारण के संबंध में == Derbyshire का सही उच्चारण "डर्बीशायर" न होकर "ˈdɑː(ɹ).bɪ.ʃə(ɹ) {ड्आ (र्).बि.श्अ(र्)} = "डार्बिशर" प्रतीत हो रहा है। स्रोत: https://en.wiktionary.org/wiki/Derbyshire == Satyajit Rāy के सही वर्तनी == Satyajit Rāy को सत्यजित राय लिखा जाए। एक जगह पर "सत्यजीत" लिखा गया था, उसे "सत्यजित" लिखा जाए। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 13:59, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) :यह कहाँ लिखा है? कृपया लिंक भेज दें ताकि एडमिन आपका मामला देख सकें। [[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 19:31, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) ::[[सत्यजित राय|https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF]] ::वाक्य प्रयोग: सत्यजीत राय (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 02:53, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::yes [[विशेष:योगदान/&#126;2025-39710-56|&#126;2025-39710-56]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2025-39710-56|talk]]) 07:26, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) ::::तो तनिक इसे ठीक करें। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 07:36, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::::कर दिया। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 15 दिसम्बर 2025 (UTC) == लिंक जोडें == मैने इस पृष्ठ https://simple.wikipedia.org/wiki/Minority_appeasement_in_India को हिन्दी में अनुवाद किया है और हिंदी वाला पृष्ठ [[भारत में अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण]] पर पढा जा सकता है, अब कोई उन दोनों को लिंक कीजिए [[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 16:38, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) :मैने उसे स्वयं जोड दिया है -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 20:41, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) == विकिपीडिया का 25वें जन्मदिन समारोह, 15 जनवरी  == [[File:WP25 Anthem video - alternate cut.webm|300px|right|thumbtime=67]] नमस्ते विकिपीडिया के [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:Wikipedia%2025%20Virtual%20Celebration 25वें जन्मदिन समारोह] में आपको आमंत्रित करना चाहता हूँ, जो [https://zonestamp.toolforge.org/1768492800 15 जनवरी को 16:00 UTC] पर हो रहा है। यह एक घंटे भर का वर्चुअल इवेंट होगा जिसमें ट्रिविया, पुरस्कार, संगीत प्रदर्शन, नाटक रीडिंग, संपादकों पर स्पॉटलाइट और विशेष अतिथि शामिल होंगे। इसे Eventyay और विकिपीडिया के यूट्यूब चैनल पर स्ट्रीम किया जाएगा। तारीख सेव करने और अपडेट पाने के लिए इवेंट के लिए रजिस्टर करें, और अगर आपके कोई सवाल हों तो मुझसे पूछें! –[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 10:20, 12 दिसम्बर 2025 (UTC) == तुरन्त हस्तक्षेप अनुरोध == प्रिय साथी विकीमीडियन्स, मैं आप सभी से अत्यंत आग्रह और गंभीरता के साथ तत्काल सहायता की अपील कर रहा हूँ, ताकि विकीमीडिया ब्लॉग टीम द्वारा की गई एक लंबे समय से चली आ रही अन्यायपूर्ण स्थिति को सुधारा जा सके। 2014 से 2020 के बीच, विकीमीडिया के कुछ स्टाफ सदस्यों के प्रतिकूल और हतोत्साहित करने वाले रवैये के बावजूद, मैंने भारत ( [https://diff.wikimedia.org/2017/04/12/ashish-bhatnagar/ आशीष भटनागर जी] का ब्लॉग इंटरव्यू, [https://diff.wikimedia.org/2015/03/03/hindi-wiki-sammelan/ प्रथम हिन्दी विकि सम्मेलन की रिपोर्ट], आदि), म्यांमार, कोरिया, तुर्की, चेक गणराज्य आदि देशों की विकीमीडिया समुदायों और विकीमीडियन्स का परिचयात्मक दस्तावेज़ीकरण (प्रोफाइलिंग) करने का कार्य किया। मैंने स्वयं गहन शोध किया, प्रमुख और सक्रिय योगदानकर्ताओं की पहचान की, प्रश्नावलियाँ तैयार कीं, विस्तृत प्रोफाइल/साक्षात्कार लिखे और कुल मिलाकर 35 ब्लॉग पोस्ट तैयार कर प्रकाशित करवाईं। दुर्भाग्यवश, विकीमीडिया ब्लॉग टीम के कम से कम दो सदस्य जबरन और अनुचित रूप से लगभग 10 ब्लॉग पोस्टों की लेखकता (Authorship) अपने नाम से दर्शा रहे हैं, जबकि उन लेखों का संपूर्ण शोध, लेखन और सामग्री मेरी ओर से की गई थी। मैं आप सभी से विनम्र लेकिन सशक्त अनुरोध करता हूँ कि इस स्पष्ट अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएँ और यहाँ [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Wikimedia_Blog#Credits मेरी अपील] के नीचे अपने विचार/टिप्पणियाँ दर्ज करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके और वास्तविक लेखक को उसका उचित श्रेय मिल सके। आपका समर्थन न केवल मेरे लिए, बल्कि विकीमीडिया आंदोलन में पारदर्शिता, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। आप सभी का अग्रिम धन्यवाद। [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 07:27, 27 दिसम्बर 2025 (UTC) :बिना विश्वसनीय  स्रोत के, किसी भी विकिपीडिया पेज पर कोई वाक्य नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए कृपया मुझे बताएं कि आप किन पृष्ठों की बात कर रहे हैं?[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 08:03, 13 जनवरी 2026 (UTC) ::बांग्ला जी, आपका और हिन्दी विकिपीडिया समुदाय का धन्यवाद। वैसे कुछ अन्य विकिपीडिया के सज्जन पुरुषों के हस्तक्षेप के कारण [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Diff_(blog)#Blogpost_Credits समस्या सुलझ चुकी है] । [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 21:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Istanbul का सही उच्चारण == "इस्तांबुल" लिखने से यह होगा कि इसका उच्चारण "इस्ताम्बुल" हो जाएगा, क्योंकि त के बाद में "ब" है, जिसके बाद "म" है (प, फ, ब, भ, म)। इसलिए "इस्तान्बुल" ही सही है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 16:10, 28 दिसम्बर 2025 (UTC)Dimple323 :@[[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] लेख के वार्ता पृष्ठ पर चर्चा करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 07:51, 7 जनवरी 2026 (UTC) == ड्राफ्ट की समीक्षा और स्थानांतरण का अनुरोध == नमस्ते, कृपया ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra की समीक्षा करें और यदि उपयुक्त हो तो इसे मुख्य नामस्थान में स्थानांतरित करें। ड्राफ्ट का लिंक: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra धन्यवाद। [[सदस्य:Supraconciencia|Supraconciencia]] ([[सदस्य वार्ता:Supraconciencia|वार्ता]]) 22:03, 8 जनवरी 2026 (UTC) == अनुरोध == मैं आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि आप इस चर्चा में अपनी टिप्पणियाँ जोड़ें: <nowiki>https://hi.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया</nowiki>: पृष्ठ_हटाने_हेतु_चर्चा/लेख/ भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण# भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण ।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 03:58, 11 जनवरी 2026 (UTC) == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप कार्यक्रम सूचना == सभी विकि साथियों को नववर्ष 2026 के लिए शुभकामनाएं। हम यूजर ग्रूप के जनवरी 2026 तक के कार्यों से संबंधित कुछ नए अपडेट साझा करना चाहते हैं: :अक्तूबर तथा नवंबर 2025 में आयोजित संपादनोत्सव के परिणाम घोषित हो चुके हैं: # [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025]] - 2 अक्तूबर 2025 से 18 अक्तूबर 2025 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- 1 नवंबर, 2025 से 14 नवंबर, 2025 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। :जनवरी में नई दिल्ली में दो ऑफ लाइन बैठक/कार्यशाला का आयोजन हो रहा है: # [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका|विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका]] - 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित सांस्थानिक प्रशिक्षण और भागिदारी कार्यशाला। # [[w:hi:विकिपीडिया:प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026|प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026]] - 16 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रबंधक बैठक। : वर्ष 2026 के फरवरी तथा मार्च में दो गुणवत्ता बढ़ाने वाले संपादनोत्सव करने की योजना है: # [[w:hi:विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026|विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026]] – फरवरी 2026 में हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- मार्च में हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।:इन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए तथा इससे संबंधित कोई सुझाव देने के लिए सदस्यों का स्वागत है। : 15 जनवरी को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने को इच्छुक दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिपीडियनों का स्वागत हैं। आप आयोजन पृष्ठ पर अपना पंजीयन कराकर इस कार्यशाला में शामिल हो सकते हैं। :सादर- संपर्क सूत्र -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 18:49, 13 जनवरी 2026 (UTC) ==सहायता== मैं जब भी किसी लेख में संपादित करती करती हूँ तो स्रोत संपादित की जगह संपादित करें आता है जिस कारण मैं ठीक से आडिट नहीं कर पाती हूँ कृपया मेरी इस समस्या में सहायता करें। [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:14, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी, आपको समस्या क्या आ रही है? वहाँ स्रोत सम्पादन और यथादृश्य समादिका (visual editor) के मध्य बदला जा सकता है। यदि आप स्रोत सम्पादन का उपयोग करना चाहें तो उचित बदलाव कर सकते हैं। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 06:19, 15 जनवरी 2026 (UTC) ::{{ping|संजीव कुमार}} लेकिन कहाँ और कैसे बदला जाएगा [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:21, 15 जनवरी 2026 (UTC) :::{{ping|संजीव कुमार}} जी कृपया मार्गदर्शन करें। 14:23, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी वहाँ पर दाहिने ओर ऊपर एक पेन जैसा दिखने वाला बटन होता है जिसे क्लिक करके आप 'यथादृश्य' और 'स्रोत संपादक' में अदल बदल कर सकते हैं। आप कंप्यूटर पे हो तो। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) :::::@[[सदस्य:SM7|SM7]] जी हो गया, धन्यवाद [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 07:44, 17 जनवरी 2026 (UTC) == मसौदे की समीक्षा का अनुरोध == नमस्ते, मैंने हाल ही में एक जीवित व्यक्ति की जीवनी का मसौदा तैयार किया है, जो स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है। मुख्य नामस्थान में स्थानांतरण का अनुरोध पहले ही किया जा चुका है। मसौदा यहाँ उपलब्ध है: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra यदि कोई अनुभवी संपादक इसकी समीक्षा कर सके, तो आभारी रहूँगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 10:03, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::नमस्ते, :: जानकारी देने के लिए धन्यवाद। मेरा उद्देश्य किसी भी प्रकार का प्रचार करना नहीं था। मैं आपके निर्णय का सम्मान करता हूँ और आगे से हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार ही योगदान करूँगा। :: धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 17:53, 16 जनवरी 2026 (UTC) == नये लेख [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] की समीक्षा हेतु अनुरोध == नमस्ते संपादकों, मैंने सम्राट कुमार गुप्ता के बारे में एक लेख (Draft) तैयार किया है जिसमें 3 दशकों के पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के विश्वसनीय संदर्भ दिए गए हैं। कृपया इसकी समीक्षा करें और इसे मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित करने में सहायता करें। लिंक: [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] -- धन्यवाद [[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Supriya|वार्ता]]) 07:43, 16 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:46, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Thank You for Last Year – Join Wiki Loves Ramadan 2026 == Dear Wikimedia communities, We hope you are doing well, and we wish you a happy New Year. ''Last year, we captured light. This year, we’ll capture legacy.'' In 2025, communities around the world shared the glow of Ramadan nights and the warmth of collective iftars. In 2026, ''Wiki Loves Ramadan'' is expanding, bringing more stories, more cultures, and deeper global connections across Wikimedia projects. We invite you to explore the ''Wiki Loves Ramadan 2026'' [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026|Meta page]] to learn how you can participate and [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026/Participating communities|sign up]] your community. 📷 ''Photo campaign on '' [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan 2026|Wikimedia Commons]] If you have questions about the project, please refer to the FAQs: * [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan/FAQ/|Meta-Wiki]] * [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan/FAQ|Wikimedia Commons]] ''Early registration for updates is now open via the '''[[m:Special:RegisterForEvent/2710|Event page]]''''' ''Stay connected and receive updates:'' * [https://t.me/WikiLovesRamadan Telegram channel] * [https://lists.wikimedia.org/postorius/lists/wikilovesramadan.lists.wikimedia.org/ Mailing list] We look forward to collaborating with you and your community. '''The Wiki Loves Ramadan 2026 Organizing Team''' 19:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29879549 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्वागत सन्देश में चित्र == पूर्व चर्चा: [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख 63#स्वागत सन्देश में चित्र]] [[साँचा:सहायता|स्वागत संदेश]] में अंकित किया गया चित्र मशीन द्वारा निर्मित किया गया है। मशीन द्वारा बनाई गई सामग्री इस ज्ञानकोष में मान्य नहीं है। इसलिए अनुरोध है कि जिस सदस्य ने यह चित्र स्थापित किया है, वही इसे हटा भी दे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 09:32, 18 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी, यह चित्र आपको कैसा लगता है? मुझे तो यह पुराने चित्र जैसा ही लग रहा है। इसलिए यदि आप दोनों को यह ठीक लगे, तो हम इसे उपयोग में ले सकते हैं। :[[चित्र:Annapoorni (10641191125).jpg|120px|thumb|right|स्वागत!]] – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:13, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) {{-}} :: [[चित्र:Tableau_noir_dans_le_désert_du_Thar_(Rajasthan).jpg|240px|thumb|center|हिन्दी विकिपीडिया में आपका हार्दिक स्वागत है। इस ज्ञानकोश के विकास और विस्तार में आपके सहयोग की हमें प्रतीक्षा है।]] <center>--[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 18:03, 8 फ़रवरी 2026 (UTC)</center> :::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, ये आपको कैसे लग रहा है कि एआई से जनित चित्र ज्ञानकोशीय नहीं हो सकता? आजकल एआई से ज्ञानकोशीय एनिमेशन बनाये जाते हैं। यह तो बनाने वाले पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त चित्र ज्ञानकोशीय होने के लिए नहीं बल्कि स्वागत के रूप में जोड़ा गया है। :::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] जी, मुझे आपके सुझाव से कोई समस्या नहीं है और आप चाहें तो इसे जोड़ सकते हैं। हालांकि पिछली बार @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी का सुझाव था कि चित्र को हटा दिया जाये, अतः मुझे उनका सुझाव भी उचित ही लगा। लेकिन मैंने परम्परा के तौर पर नया चित्र जोड़ा था क्योंकि स्वागत सन्देश में बहुत बदलावों की आवश्यकता है। :::@[[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] जी, आपका सुझाव भी उचित है लेकिन इससे बेहतर चित्र हम कंप्यूटर पर निर्मित कर सकते हैं जो इससे बेहतर होंगे। इसके लिए चर्चा करना बेहतर होगा। स्वागत सन्देश बड़ा रखने के स्थान पर एक छोटी कड़ी दे सकते हैं जिसपर सभी सन्देशों को सूचीबद्ध किया जा सके। इससे उन सदस्यों को भी सुविधा रहेगी जो हिन्दी नहीं जानते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:34, 9 फ़रवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]]@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]]@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] @[[सदस्य:Hindustanilanguage|Hindustanilanguage]] मेरा अब भी सुझाव है कि चित्र हटा दिया जाय। हालाँकि, अभी जो आपत्ति दर्ज़ की गई है, उसपे इतना ही कहूँगा कि यह चित्र 'ज्ञानकोश' का हिस्सा नहीं है। स्वागत संदेश में इस तरह के चित्र पर आपत्ति उचित नहीं प्रतीत हो रही। ::::संजीव जी जैसा कह रहे, पूरे स्वागत संदेश को पुनर्विचार एवं नये सिरे से बनाने की ज़रूरत है - लंबा काम है - मुझे कोई गुरेज़ नहीं इसमें भागीदारी करने में। ::::पर यह चित्र हटाने वाली बात चर्चा के योग्य भी नहीं। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 10:49, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, एक महिला को हर किसी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े किया जाना महिलाओं के आत्मसम्मान के लिहाज से कहीं न कहीं गरिमापूर्ण प्रतीत नही हो रहा है। इसलिए भी इस चित्र को हटा देना या किसी उपयुक्त चित्र से बदल देना चाहिए। बहुत से ज्ञानकोषों में बिस्किट का प्रयोग किया जाता है क्योंकि संपादन के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, जो बिस्किट से मिलती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 08:23, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी के विचारों से सहमत होते हुए कि स्वागत संदेश को नए सिरे से बनाने की आवश्यकता है, और @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी की आपत्तियों (एआई और गरिमा) को ध्यान में रखते हुए, मेरा सुझाव है कि हम विवादित चित्र के स्थान पर प्राकृतिक फूलों के चित्र का उपयोग किया जाएं। फूल स्वागत का एक गरिमापूर्ण, मानवीय और तटस्थ प्रतीक हैं। ::::::मैंने विकिमीडिया कॉमन्स से कुछ प्राकृतिक और सुंदर चित्रों का चयन किया है। कृपया नीचे दी गई गैलरी में देखकर बताएँ कि इनमें से कौन सा चित्र नए स्वागत संदेश के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा? ::::::File:Lotus 2013 sai.jpg|कमल '''यह चित्र मैने @[[सदस्य:SM7|SM7]] के सदस्य पृष्ठ पर देखा''' ::::::File:Red rose at Square of the Cathedral of Christ the Saviour.jpg|लाल गुलाब ::::::File:Combretum indicum(Rangoon creeper).jpg|मधुमालती (रंगून क्रीपर) '''यह मैने ही अपलोड किया''' ::::::File:(MHNT) Jasminum polyanthum – flowers and buds.jpg|चमेली ::::::File:Marigold 14.jpg|गेंदा ::::::File:Flower bouquet in Tarnowskie Góry, Silesian Voivodeship, Poland, December 2023.jpg|पुष्प गुच्छ ::::::File:Rose and carnation flower bouquet 01.jpg|गुलाब और कार्नेशन ::::::आप सभी वरिष्ठ साथियों की राय का स्वागत है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 14:09, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] जी, फूल लगवाने का कोई विशेष औचित्य? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:38, 9 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, महोदय :::::::: फूल लगवाने का मुख्य औचित्य केवल एक तटस्थ, विवाद-रहित और मानवीय स्वागत-प्रतीक प्रस्तुत करना है। ::::::::महोदय, भारत में फूलों से स्वागत करना सबसे आत्मीय और सहज माना जाता है। ::::::::प्राकृतिक फूल होने के कारण यह AI और गरिमा से जुड़े उन सभी विवादों से पूरी तरह मुक्त है, जो वर्तमान चित्र को लेकर उठे हैं। ::::::::मेरा उद्देश्य सिर्फ एक सकारात्मक चित्र लगाना है। यदि समुदाय को फूल के स्थान पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी का 'बिस्किट' वाला सुझाव या विकिपीडिया का लोगो अधिक उपयुक्त लगता है, तो मेरी उसमें भी पूर्ण सहमति है। प्रमुख उद्देश्य स्वागत संदेश को बेहतर बनाना है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 16:47, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::::भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। फूलों से स्वागत देवताओं का किया जाता है और आजकल लोगों ने चाटुकारिता के लिए इसे मनुष्यों पर लागू करना आरम्भ कर दिया है। चित्रों में प्राकृतिक फूल कैसे हो सकते हैं? वर्तमान चित्र को लेकर मैंने कोई विवाद नहीं देखा, बल्कि चित्र को हटाकर संबंधित सन्देश को पुनः लिखने पर यह चर्चा है। वर्तमान चित्र में क्या नकारात्मक दिखाई दे रहा है? क्या वो भारतीय संस्कृति से संबंधित नहीं है? (हालांकि ऐसा आवश्यक नहीं है)। अभी चर्चा इसपर चाहिए कि चित्र की आवश्यकता ही क्या है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:43, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी,महोदय ::::::::::मेरा उद्देश्य केवल उठे हुए विवाद के बीच एक विकल्प देना था। लेकिन मैं आपसे और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि असली मुद्दा यह है कि स्वागत सन्देश में किसी भी चित्र की आवश्यकता है ही नहीं। पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] महोदय ने बिस्किट के चित्र का उदाहरण दिया था, जिसके लिए मैं पुष्पों का विकल्प दिया था| ::::::::::मेरी ओर से चित्र वाले विषय पर चर्चा यहीं समाप्त है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:59, 12 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::सभी सदस्यो से विनम्र निवेदन है, की कृपया इस [[:File:AI Chatgpt generated Woman in Welcome pose.png|चित्र]] देखने का कष्ट करे, इसको स्वागत सन्देश में लगने के लिए उपयुक्त हो सकता है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:06, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::::@[[सदस्य:Cptabhiimanyuseven|Cptabhiimanyuseven]] जी, चित्र को हटाने पर चर्चा चल रही है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:35, 14 मार्च 2026 (UTC). :::::::::::::::{{Ping|संजीव कुमार}} जी, नमस्ते! चित्र को उपयोग में लिया जा चुका है,पहले चित्र उपयोग में न होने के कारण हटाने हेतु चर्चा के लिए नामांकित किया गया है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:50, 14 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::{{ping|संजीव कुमार}}, आपकी बात सही है कि भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। परंतु, क्योंकि आप और यहां के अधिकतर प्रबंधक पुरुष हैं, और स्वागत करते हुए व्यक्ति का ही चित्र लगाना है तो उचित होगा कि किसी पुरुष का हाथ जोड़कर स्वागत करता हुआ चित्र लगाया जाए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:28, 20 मार्च 2026 (UTC) :{{od}} वर्तमान चर्चा के आधार पर चित्र हटा दिया गया है। भविष्य में चर्चा करके एक उपयुक्त चित्र जोड़ा जा सकता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:51, 18 मार्च 2026 (UTC) == Feminism and Folklore 2026 starts soon == <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;"> [[File:Feminism and Folklore 2026 logo.svg|centre|550px|frameless]] ::<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> ;Invitation to Organize Feminism and Folklore 2026 Dear Wiki Community, We are pleased to invite Wikimedia communities, affiliates, and independent contributors to organize the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026]]''' writing competition on your local Wikipedia. The international campaign will run from '''1 February to 31 March 2026''' and aims to improve coverage of feminism, women’s histories, gender-related topics, and folk culture across Wikipedia projects. ;About the Campaign '''Feminism and Folklore''' is a global writing initiative that complements the '''[[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2026|Wiki Loves Folklore]]''' photography competition. While Wiki Loves Folklore focuses on visual documentation, this writing campaign addresses the '''gender gap on Wikipedia''' by improving encyclopedic content related to folk culture and marginalized voices. ;What Can Participants Write About? Communities can contribute by creating, expanding, or translating articles related to: * Folk festivals, rituals, and celebrations * Folk dances, music, and traditional performances * Women and queer figures in folklore * Women in mythology and oral traditions * Women warriors, witches, and witch-hunting narratives * Fairy tales, folk stories, and legends * Folk games, sports, and cultural practices Participants may work from curated article lists or generate new article suggestions using campaign tools. ;How to Sign Up as an Organizer Organizers are requested to complete the following steps to register their community: # Create a local project page on your wiki [[:m:Feminism and Folklore/Sample|(see sample)]] # Set up the campaign using the '''CampWiz''' tool # Prepare a local article list and clearly mention: #* Campaign timeline #* Local and international prizes # Request a site notice from local administrators [[:mr:Template:SN-FNF|(see sample)]] # Add your local project page and CampWiz link to the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta project page]]''' ;Campaign Tools The Wiki Loves Folklore Tech Team has introduced tools to support organizers and participants: * '''Article List Generator by Topic''' – Helps identify articles available on English Wikipedia but missing in your local language Wikipedia. The tool allows customized filters and provides downloadable article lists in CSV and wikitable formats. * '''CampWiz''' – Enables communities to manage writing campaigns effectively, including jury-based evaluation. This will be the third year CampWiz is officially used for Feminism and Folklore. Both tools are now available for use in the campaign. '''[https://tools.wikilovesfolklore.org/ Click here to access the tools]''' ;Learn More & Get Support For detailed information about rules, timelines, and prizes, please visit the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 project page]]'''. If you have any questions or need assistance, feel free to reach out via: * '''[[:m:Talk:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta talk page]]''' * Email us using details on the contact page. ;Join Us We look forward to your collaboration and coordination in making Feminism and Folklore 2026 a meaningful and impactful campaign for closing gender gaps and enriching folk culture content on Wikipedia. Thank you and best wishes, '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 International Team]]''' ---- ''Stay connected:'' [[File:B&W Facebook icon.png|link=https://www.facebook.com/feminismandfolklore/|30x30px]]&nbsp; [[File:B&W Twitter icon.png|link=https://twitter.com/wikifolklore|30x30px]] </div></div> == Invitation to Host Wiki Loves Folklore 2026 in Your Country == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> [[File:Wiki Loves Folklore Logo.svg|right|150px|frameless]] Hello everyone, We are delighted to invite Wikimedia affiliates, user groups, and community organizations worldwide to participate in '''Wiki Loves Folklore 2026''', an international initiative dedicated to documenting and celebrating folk culture across the globe. ;About Wiki Loves Folklore '''Wiki Loves Folklore''' is an annual international photography competition hosted on Wikimedia Commons. The campaign runs from '''1 February to 31 March 2026''' and encourages photographers, cultural enthusiasts, and community members to contribute photographs that highlight: * Folk traditions and rituals * Cultural festivals and celebrations * Traditional attire and crafts * Performing arts, music, and dance * Everyday practices rooted in folk heritage Through this campaign, we aim to preserve and promote diverse folk cultures and make them freely accessible to the world. [[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026|Project page on Wikimedia Commons]] ; Host a Local Edition As we celebrate the '''eight edition''' of Wiki Loves Folklore, we warmly invite communities to organize a local edition in their country or region. Hosting a local campaign is a great opportunity to: * Increase visibility of your region’s folk culture * Engage new contributors in your community * Enrich Wikimedia Commons with high-quality cultural content '''[[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026/Organize|Sign up to organize]]:''' If your team prefers to organize the competition in ''either February or March only'', please feel free to let us know. If you are unable to organize, we encourage you to share this opportunity with other interested groups or organizations in your region. ;Get in Touch If you have any questions, need support, or would like to explore collaboration opportunities, please feel free to contact us via: * The project Talk pages * Email: '''support@wikilovesfolklore.org''' We are also happy to connect via an online meeting if your team would like to discuss planning or coordination in more detail. Warm regards, '''The Wiki Loves Folklore International Team''' </div> [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 13:21, 18 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikipedia&oldid=29228188 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Tiven2240@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा == <section begin="announcement-content" /> मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा की अवधि शुरू हो चुकी है। आप 9 फरवरी 2026 तक बदलावों के सुझाव दे सकते हैं। यह वार्षिक समीक्षा के कई चरणों का पहला चरण है। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Annual review/2026|मेटा के UCoC पृष्ठ पर अधिक जानकारी पाएँ और जुड़ने के लिए वार्तालाप खोजें]]। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee|सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति]] (U4C) एक वैश्विक समिति है जो UCoC का साम्यिक और सुसंगत कार्यान्वयन करने को समर्पित है। यह वार्षिक समीक्षा U4C द्वारा योजित और लागू की गई है। अधिक जानकारी तथा U4C की ज़िम्मेदारियों के लिए [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee/Charter|आप U4C चार्टर की जाँच कर सकते हैं]]। कृपया जहाँ भी उचित हो, अपने समुदाय के दूसरे सदस्यों के साथ यह जानकारी साझा करें। -- U4C के साथ समन्वय में, [[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|वार्ता]])<section end="announcement-content" /> 21:01, 19 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=29905753 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकि सम्मेलन 2026 समुदाय सहभागिता सर्वे == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप इस वर्ष जुलाई में हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इससे संबंधित हिंदी विकिपीडियनों की रुचि तथा महत्वपूर्ण विषयों को समझने के लिए एक सर्वेक्षण किया जा रहा है। [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeWaqfyOlr9hS7Ef5eXg_Y4mPK8gj1cnzaIBAbQXbjM6KH4aw/viewform हिंदी विकि सम्मेलन 2026] भरकर हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने में सहयोगी बनें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 09:07, 31 जनवरी 2026 (UTC) [[सदस्य:Vishal K Pandey|Vishal K Pandey]] ([[सदस्य वार्ता:Vishal K Pandey|वार्ता]]) 18:11, 26 जनवरी 2026 (UTC) ==गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड== विकिडेटा में गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का लोगो Guinness World Records logo.svg नाम से उपलब्ध है। इसका हिन्दी में उपयोग करना संभव बनाएं। अधिकार संपन्न लोग ऐसा कर सकते हैं। '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:28, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:00, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::समस्या सुलझाने के लिए आपका धन्यवाद - '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) LimcaBookofRecords.jpg इस फाइल के बारे में भी विचार करें। धन्यवाद '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:35, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:02, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::आपको धन्यवाद- '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) == शीर्षक परिवर्तन के लिए अनुरोध == Namaste, I would like the article title '''[[डी एन ए की नकल]]''' to be changed to '''डीएनए प्रतिकृति''', as this form is more accurate and is the one used in most scientific literature. Sorry for writing in English and if this is not the right place to make the request. I have been on a long break from Wikipedia and have forgotten the proper procedure for requesting a title change.<b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 15:32, 3 फ़रवरी 2026 (UTC) :नमस्ते, मैं चाहता हूँ कि लेख का शीर्षक [[डी एन ए की नकल]] बदलकर 'डीएनए प्रतिकृति' कर दिया जाए, क्योंकि यह रूप ज़्यादा सही है और ज़्यादातर वैज्ञानिक किताबों में इसी का इस्तेमाल होता है।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 18:54, 5 फ़रवरी 2026 (UTC) == ''कंप्यूटिंग'' या ''अभिकलन'' == हिन्दी में कंप्यूटिंग को [[अभिकलन]] भी कहा जाता है। परंतु इसके बाद भी कुछ पृष्ठ के नाम [[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] या [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] है। प्रोग्रामिंग को [[क्रमानुदेशन]] कहा जाता है परंतु आधे से ज्यादा निबंध के शीर्षक में [[प्रोग्रामिंग भाषा]] लिखा गया है। हमें निबंध के शीर्षक एक समान रखने चाहिए। जैसे सारे निबंध के शीर्षक में प्रोगामिंग के जगह क्रमानुदेशन लिखा रहेगा। अन्य नाम हम निबंध के मुख्य भाग में लिख सकते है या redirect कर सकते है। जैसे- '''क्रमानुदेशन भाषा''', जिसे '''प्रोग्रामिंग भाषा''' भी कहते है..... [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 11:16, 7 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, नमस्ते! आप एक समाधान प्रस्तावित करें - उसपे चर्चा करके यह कार्य किया जा सकता है। आपका और सभी का स्वागत है इस एकरूपता लाने के प्रयास के लिए। सादर! --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:03, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) ::[[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] का नाम बदलकर [[मोबाइल अभिकलन]] कर देना चाहिए। [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] का [[क्लाउड अभिकलन]] तथा [[प्रोग्रामिंग भाषा]] का नाम [[क्रमानुदेशन भाषा]] कर देना चाहिए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:40, 8 मार्च 2026 (UTC) == हिन्दी विकिपीडिया से गायब हो चुके पुराने संपादक == तकरीबन 8 साल बाद मैं विगत कुछ दिनों से विकिपीडिया पर सक्रिय हूं। इस बीच देख रहा हूं कि यहां से वो तमाम लोग गायब हो चुके हैं जो एक समय में लगातार सक्रिय रहते थे। नए लेखों की गुणवत्ता स्तरीय थी। लेकिन इधर हिन्दी विकिपीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो या तो आत्मप्रचार है या फिर नौसिखियों द्वारा लगातार किया जा रहा प्रयोग। आज मैंने लगभग 25 लोगों को अपनी ओर से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की जो एक जमाने में प्रबंधक रह चुके हैं और जिन्होंने विकिपीडिया पर काफी योगदान दिया है। लेकिन सबने यही कहा कि वो अब सक्रिय नहीं हैं। यह हिन्दी विकिपीडिया के लिए ठीक नहीं है। यद्यपि कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में विकिपीडिया और खासतौर पर अंग्रेजी से इतर भाषाओं में इस ज्ञानकोश की अब पहले जैसी आवश्यकता रह नहीं गई है। क्योंकि अब अंग्रेजी की सामग्री एक क्लिक पर किसी भी दूसरी भाषा में उपलब्ध है। फिर भी हिन्दी में लिखे गए मूल लेखों का महत्व तो हमेशा बना रहेगा। इसलिए विकिपीडिया संपादक समुदाय को एक बार फिर अपना तुच्छ अहंकार छोड़कर दूर जा चुके लोगों को दोबारा सक्रिय करना चाहिए। --'''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 13:54, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:कलमकार|कलमकार]] सर ! आठ साल (हुये तो नहीं!) बाद आप का स्वागत - हमारी ओर से। :कुछ उधार का अर्ज़ कर रहा (बुरा मत मानियेगा) :''"ऐसा नहीं कि उन से ''(मतलब विकि से)'' मोहब्बत नहीं रही :''जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही'' :'' :''सर में वो इंतिज़ार का सौदा नहीं रहा'' :''दिल पर वो धड़कनों की हुकूमत नहीं रही''"'' :यह हमारी स्थिति है। :और जो चले गए उनकी स्थिति यह है कि :''चेहरे को झुर्रियों ने भयानक बना दिया'' :''आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही'' --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:00, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :कलमकार जी, ज्ञानकोष में सक्रियता के प्रति आपकी चिंता वाजिब है। मैंने यहां पर देखा है कि बहुत से सदस्यों द्वारा महनत से बनाए गए पृष्ठ कोई न कोई पैमाना बताकर शीघ्र हटाने के लिए नामांकित कर दिए जाते हैं, फिर कोई अन्य सदस्य उन्हें हटा भी देता है। शायद इससे हताश होकर बहुत से संपादक ज्ञानकोष को छोड़कर चले गए। बहुत से संपादकों के तो सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए हैं। सम्पादकों की सक्रियता में कमी की एक वजह यह भी हो सकती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:21, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, क्या आप कुछ ऐसे सदस्य पृष्ठों के उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें हटाया गया था, और कुछ ऐसे पृष्ठ भी जिन्हें किसी गलत मानदंड के तहत शीघ्र हटाने के लिए नामांकित किया गया और बाद में हटा दिया गया? यदि आपकी चिंता जायज़ होगी, तो अवश्य ही कोई समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:54, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) :::DreamRimmer जी, हाल ही के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, जहां प्रतीत होता है कि संपादकों द्वारा शिद्दत से बनाए गए कुछ पृष्ठों को हटा दिया गया: :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#why are you remove this article "सुमरत सिंह"]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#कृपया गोप्रेक्षेश्वर लेख की पुनः समीक्षा करें और कॉपीराइट उल्लंघन का टैग हटाने की कृपा करें]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#सहायता नोट]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#डॉ. विनोद कुमार पृष्ठ: शीघ्र हटाने नामांकन पर प्रतिक्रिया]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#अभिनव अरोड़ा के पृष्ठ हटाने के विषय में]] :::हटाए गए पृष्ठों की सामग्री देखे बगैर मापदंड की सटीकता पर टिप्पणी करना संभव नही है परंतु बहुत से ऐसे पृष्ठ भी हटाए गए हैं, जहां संपादक लेख में संशोधन करने के लिए तैयार थे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 07:56, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपको प्रचार सामग्री चाहिए या केवल विवाद खड़ा करना उद्देश्य रहा है? यदि आपको प्रचार सामग्री चाहिए तो बताइयेगा, ईमेल से भेज देता हूँ। बैठकर देखते और समझते रहियेगा। अन्यथा आपने मेरा वार्ता पृष्ठ यहाँ क्यों जोड़ा है पता नहीं। मैंने सभी सन्देशों का उत्तर भी दे रखा है। वर्तमान में भी [[विकिपीडिया:शीह|शीघ्र हटाने]] के लिए बहुत लेख नामांकित हैं। कृपया उनकी भी समीक्षा कर लेते समय रहते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:40, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने ऊपर जिन चर्चाओं का उल्लेख किया है, उनसे संबंधित लेख मुझे किसी भी प्रकार से गलत मानदंड के अंतर्गत हटाए गए नहीं लगते। उन विषयों की उल्लेखनीयता और उपलब्ध सामग्री के आधार पर संजीव जी द्वारा लिया गया निर्णय बिल्कुल उचित था, और ऐसी स्थिति में मेरा निर्णय भी यही होता। आपने यह भी कहा कि ऐसे पृष्ठ हटाए गए जहाँ संपादक लेख में सुधार करने के लिए तैयार थे, परंतु सभी जानते हैं कि कोई अनुल्लेखनीय लेख केवल बार-बार संपादन या सुधार करने से उल्लेखनीय नहीं बन जाता। किसी विषय की उल्लेखनीयता तभी स्थापित होती है जब उसे विश्वसनीय स्रोतों में पर्याप्त स्थान मिले, और इसमें स्वाभाविक रूप से समय लगता है। शीघ्र हटाने की नीति इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है; यदि किसी लेख पर सही मानदंड के अनुसार टैग लगाया गया है, तो प्रबंधक उसे किसी भी समय हटा सकता है। यदि लेखक कोई टिप्पणी जोड़ता है, तो भी प्रबंधक उस टिप्पणी से संतुष्ट न होने पर लेख को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं होता। आपने यह भी कहा था कि सदस्यों के सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए, लेकिन इसके समर्थन में आपने कोई लिंक प्रस्तुत नहीं किया। मेरा मानना है कि किसी भी सदस्य के कार्य पर प्रश्न तभी उठाया जाना चाहिए जब पर्याप्त प्रमाण हों; अन्यथा यह बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आक्षेप और निराधार आरोप की श्रेणी में आता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:20, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, जो आपकी नज़र में प्रचार हो, वह संभवतः दूसरों के लिए जानकारी हो सकती है। :::::DreamRimmer जी, ऐसे भी बहुत से पृष्ठ देखें हैं, जहां अनेक विश्वसनीय स्रोत दिए गए थे, उन्हें भी अनुल्लेखनिय बता कर हटाया गया। उदाहरण के लिए: :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#सुमन कुमार घई]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/अप्रैल 2022#रचित यादव]]। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:41, 20 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, समस्या यह ही है कि आप इसे मेरे या आपके नज़र से देख रहे हो। एकबार नज़र हटाकर देखियेगा। "सुमन कुमार घई" नामक लेख पर 15 वर्षों से बिना स्रोत की कुछ सामग्री लिखी थी और बाद में [[विशेष:योगदान/सुमन कुमार घई|इसी नाम के सदस्य]] ने सामग्री हटाकर साहित्य कुंज की कड़ी जोड़ दी। इसी तरह अन्य लेखों को भी या तो सम्बंधित व्यक्ति ने स्वयं (आपके अनुसार उनकी नज़रों में वो स्वयं बहुत उल्लेखनीय व्यक्ति हैं) ने बनाया या अपने किसी रिश्तेदार से बनवाया। यदि आप बिना किसी स्रोत के स्वयं को उल्लेखनीय मानने लग जाओ तो क्या वो उल्लेखनीय हो जायेगा? एकबार इंटरनेट पर उपरोक्त व्यक्तियों के बारे में खोजकर देखें कि इनकी उल्लेखनीयता क्या है? उनके प्रसिद्धि के क्षेत्र में उन्हें कौनसे पुरस्कार मिले हैं? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:26, 25 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य: संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, उल्लेखनीयता का मापदंड इसलिए बनाया गया था, कि यदि एक ही विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक दावेदार आ जाते हैं, तो इस नाम से उस विषय या व्यक्ति का लेख बनेगा जो अधिक उल्लेखनीय होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि विकिपीडिया के संदर्भ में एक phrase कई बार सामने आता है, जिसमें लिखा होता है, "sum of all knowledge""। कहने का तात्पर्य यह है कि उल्लेखनीयता के नाम पर तब तक कोई पृष्ठ नही हटाना चाहिए, जब तक उस विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक असंबंधित संभावनाएं न हों। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 'रमेश सिंह' के नाम से उद्धरण सहित लेख बना रहा है तो वह लेख रहने देना चाहिए, जब तक कि कोई उससे भी अधिक उल्लेखनीय 'रमेश सिंह' नाम के व्यक्ति पर उद्धरण सहित लेख बनाने का दावेदार नहीं आ जाता। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, बहुत अच्छा अर्थ निकाला है आपने। साथ में अपने तर्क के पक्ष में कोई स्रोत भी दे दीजियेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:39, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, [[:en:Wikipedia:Notability]] की भूमिका में लिखा है - ''Information on Wikipedia must be'' '''verifiable'''''... Wikipedia's'' '''concept of notability applies this basic standard''' ''to avoid indiscriminate inclusion of topics... Determining notability does not necessarily depend on things such as fame, importance, or popularity''. -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:53, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने इसके नीचे वाला भाग क्यों नहीं पढ़ा? यद्यपि वो उस विषय की स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं जो नीचे बताए गए दिशानिर्देशों को पूरा करता हो। इसके बाद विस्तार से बहुत कुछ लिखा हुआ है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:04, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::उसके नीचे भी पढ़ा है, वहां लिखा है कि यदि कोई सामग्री एक नया लेख बनाने के लिए उल्लेखनीय नहीं है, तो उस सामग्री को किसी अन्य संबंधित पृष्ठ में विलय कर देना चाहिए। यह सही भी है यदि वह सामग्री स्रोत/संदर्भ युक्त है तो। ऐसा भी देखा गया है कि राष्ट्रपति इत्यादि से अनेक उल्लेखनीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति पर बना लेख उल्लेखनीयता के नाम पर हटा दिया गया परन्तु उसमें दर्ज संदर्भित सामग्री कहीं और संजोई नहीं गई, न ही लेखक को उसे दर्ज करने के लिए किसी अन्य पृष्ठ की ओर निर्देशित किया गया। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:16, 31 मार्च 2026 (UTC) {{od|10}}@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से व्यक्ति उल्लेखनीय कैसे हो गया? विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में [[दीक्षान्त समारोह]] के समय डिग्री वितरण राष्ट्रपति या राज्यपाल के हाथों से करवाया जाता है। आपके अनुसार वो सभी लोग उल्लेखनीय हो गये? सम्बंधित लोगों के नामों की सूची सम्बंधित संस्थान के आधिकारिक जालस्थल पर मिल जायेगा जिसे आप विश्वसनीय स्रोत कह सकते हो। राष्ट्रपति के हाथों से मिला पुरस्कार इतना उल्लेखनीय होना चाहिए जो सम्बंधित व्यक्ति को किसी विशिष्ट कार्य के लिए मिला हो और उस कार्य के कारण व्यक्ति उल्लेखनीय हुआ हो, तो उसे उल्लेखनीय माना जाता है, न कि केवल राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार प्राप्त करने से। ऐसे समारोह राष्ट्रपति भवन में हमेशा होते हैं और उनके समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छपते हैं।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:08, 1 अप्रैल 2026 (UTC) : उदाहरण के लिए, क्या इस ([[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]) पृष्ठ को हटाते समय, इसमें उपलब्ध संदर्भित जानकारी किसी अन्य पृष्ठ पर स्थानांतरित की गई? -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 01:49, 3 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा == नमस्ते, मैं हिंदी विकिपीडिया पर लॉग-इन हूँ। मेरा खाता पुराना है और मैंने कई संपादन भी किए हैं, फिर भी मुझे किसी भी लेख में “स्थानांतरण (Move)” का विकल्प दिखाई नहीं दे रहा। मैंने डेस्कटॉप मोड और अलग ब्राउज़र से भी कोशिश की है। कृपया बताएं कि यह समस्या क्यों आ रही है और इसका समाधान क्या है। धन्यवाद। {{unsigned|ROLEXMEENA}} : अंग्रेजी ज्ञानकोष की तरह यहां भी 'Move' (पृष्ठ स्थानांतरण) का विकल्प होना चाहिए, ताकि संपादक अपने सदस्य स्थान में पृष्ठ बनाकर उसे मुख्य नाम स्थान में स्वयं स्थापित कर सकें। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:27, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) =="अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026" में भाग लें == हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप द्वारा [[अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर विकिपीडिया एवं विकिस्रोत पर संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। # [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—15 फ़रवरी 2026 से 21 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव। # [[s:विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—21 फ़रवरी 2026 से 28 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन गुणवत्ता संवर्द्धन प्रतियोगिता। :इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 04:34, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) == प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन == मैंने [[विकिपीडिया:प्रबन्धन अधिकार हेतु निवेदन#DreamRimmer|यहाँ]] प्रबंधक व अन्तरफलक प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन किया है। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 17:11, 15 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधन अधिकार मिलने पर बहुत बधाई। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:33, 8 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक कैसे बदले == महोदय मुझे बताए कि शीर्षक बीजाणुउद्भिद को कैसे बदलकर बीजाणुद्भिद करे हृदय से धन्यवाद [[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] ([[सदस्य वार्ता:VIKRAM PRATAP7|वार्ता]]) 04:39, 18 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधकों को [[#हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा|कहा था]] कि 'पेज मूव' का ऑप्शन सभी के लिए चालू कर दिया जाए, परंतु अभी तक नहीं किया गया है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:31, 8 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, यह अधिकार प्रबन्धकों के पास नहीं है। बाकी आप तर्क एवं स्रोत के साथ लिखेंगे तो स्थानान्तरण कर दिया जाता है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:42, 18 मार्च 2026 (UTC) :::परंतु यह विकल्प अंग्रेजी ज्ञानकोष पर कैसे उपलब्ध हुआ!? [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:45, 20 मार्च 2026 (UTC) == Reference Previews – experiment == Hi, I’m Johannes from [[m:WMDE Technical Wishes|WMDE Technical Wishes]]. Sorry for writing in English, please support us by providing a translation! Our team is currently working on [[:m:WMDE Technical Wishes/References|improvements to references]], e.g. [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|Sub-referencing]]. In 2021 we developed [[:m:WMDE Technical Wishes/ReferencePreviews|Reference Previews]] in order to provide a MediaWiki feature to preview references when hovering over the footnote marker. Over the course of our current work we’ve noticed that using Reference Previews doesn’t seem to be intuitive for some readers and we would like to improve this. <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Problem === <div class="mw-collapsible-content"> In our usability tests, we repeatedly notice desktop readers – unaware of Reference Previews or how to use the feature – clicking on footnotes instead of hovering over them. Many are confused when they end up in the reference list and don’t know how to jump back to the text passage they were previously reading. Many readers seem unaware that both the ↑ arrow in the reference list and the <sup>a b</sup> (for re-used references) can be used to jump back. This makes jumping to the reference list rather unpleasant, especially in long articles. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Assumption === <div class="mw-collapsible-content"> We assume that most readers do not want to jump to the reference list, but rather want to click on the footnote to open Reference Previews, which provide them with the reference information for the text passage they have just read. At the same time, we believe that some readers – e.g. those who want to delve deeper into a topic rather than just quickly researching a piece of information – are still interested in conveniently accessing the reference list. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Idea === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to try adjustments to Reference Previews in order to best meet the needs of different readers. Specifically, we want to prevent readers from accidentally ending up in the individual reference list; jumping there should be a conscious decision. When clicking on a footnote marker, we want to display Reference Previews instead of jumping to the reference list. The pop-up remains permanently visible until clicking on the "x" or anywhere outside the preview to close it. In addition Reference Previews will provide a link to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – current version.png|Reference Previews – current version File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed version when '''clicking on a footnote marker''' </gallery> When hovering over a footnote marker without clicking on it, we want to display a simplified version of Reference Previews – without the settings icon and the resulting empty space. When moving the mouse pointer over the pop-up, a note will appear indicating that you can click for further options. This will open the persistent version of Reference Previews with a link to allow users to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – hover-state.png|Proposed version when '''hovering over the footnote marker''' File:Reference Previews mock-up – hover-state and options.png|Proposed version when '''hovering over the Reference Preview''' File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed (persistent) version when '''clicking on the hover preview''' </gallery> By improving the usability of Reference Previews, we also hope to mitigate the issue that reference lists with a large number of (reused) references (or [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|sub-references]]) can be confusing for some readers. In addition, the proposed version when hovering over a footnote marker is more compact than the current version. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Experiment === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to test the proposed changes in an [[:en:A/B testing|A/B test]] on several wikis. We want to measure how many readers click on a footnote marker and then proceed to jump to the reference list using the proposed version of Reference Previews compared to readers who receive the current version of Reference Previews. In addition, we will measure how many readers in both groups access the reference list via the table of contents. This will give us data-based insights into how many clicks on the footnote unintentionally open the reference list and how many readers only want to use Reference Previews. We would like to run our experiment on the following Wikipedia language versions: de, pl, fr, sv, fa, hu, hi, my, tl, lv, fy, hr. 10% of readers will see our modified version of Reference Previews in order to obtain sufficient data. The experiment is expected to run for 1-2 weeks at the end of March. We'll restore the current version of Reference Previews for all readers until we have evaluated the experiment, discussed the results with the community, and decided on further steps. </div> </div> We look forward to your feedback [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/Reference Previews|on our talk page]] – or just reply to this post! Once the experiment is ready to go, we will also provide a link that you can use to test the changes yourself. --[[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 12:22, 20 फ़रवरी 2026 (UTC) :As indicated on our project page [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=WMDE_Technical_Wishes/References/Reference_Previews&diff=prev&oldid=30215686], we will only test the proposed change when ''clicking'' on a footnote. Reference Previews will remain ''unchanged when hovering'' over a footnote marker. Reasons for this were concerns that the proposed transition from hover to persistent preview could be disruptive or at least feel unusual when interacting with reference content in the hover preview (e.g. when clicking on links). [[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 13:30, 9 मार्च 2026 (UTC) ==विकि लव्ज़ रमजान 2026== <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;> [[File:Wiki Loves Ramadan Logo Black hi.svg|Left|200px|frameless]] प्रिय विकी समुदाय, आपको [[विकिपीडिया:विकि लव्ज़ रमजान 2026|विकी लव्ज रमज़ान 2026]] में भाग लेने के लिए विनम्रतापूर्वक आमंत्रित किया जाता है, जो कि विभिन्न क्षेत्रों से इस्लामी इतिहास और इस्लामी सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने के लिए विकिपीडिया, विकिवॉयज पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय लेख लेखन प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता 20 फरवरी से 20 अप्रैल 2025 तक आयोजित की जायेगी अभी भाग लें और पुरस्कार के विजेता बने है। धन्यवाद '''[[:m:Wiki Loves Ramadan 2026|विकी लव्स रमज़ान 2026 इंटरनेशनल टीम]]''' -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 15:51, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) </div> == इस हफ्ते पेस्ट जाँच आ रही है == नमस्ते। [[mw:Special:MyLanguage/Help:Edit check#Paste_check|पेस्ट जाँच]] एक प्रकार की [[mw:Special:MyLanguage/Edit check|सम्पादन जाँच]] सुविधा है जो तब दिखाई देगी जब यथादृश्य सम्पादिका का प्रयोग कर रहा कोई नवागंतुक किसी लेख में लंबा पाठ पेस्ट करे, अगर प्रणाली द्वारा यह निर्धारित किया जाए कि वह सामग्री सम्पादक ने संभवतः स्वयं नहीं लिखी है। इस सुविधा का यहाँ पर पिछले वर्ष परीक्षण किया गया था, और शोध के [[mw:Edit check/Paste Check#A/B_Experiment|परिणाम]] सकारात्मक थे: इस जाँच का सामना करने वाले सम्पादकों के द्वारा किए गए सम्पादनों में से पूर्ववत किए गए सम्पादनों की संख्या में नियंत्रण समूह की तुलना में 18% घटाव आया। डिफ़ॉल्ट से पेस्ट जाँच उन सम्पादकों को दिखाई जाएगी जिन्होंने लोकल रूप से 100 या उससे कम सम्पादन किए हुए हों। यह [[{{#special:EditChecks}}]] के माध्यम से प्रबंधकों द्वारा बदला जा सकता है। जब इस आवश्यकता को पूरा करने वाला कोई सम्पादक कहीं और से कम-से-कम 50 कैरेक्टर्स लंबा पाठ पेस्ट करता है, पेस्ट जाँच उससे पूछेगी कि सामग्री उसने स्वयं लिखी है या फिर नहीं। [[mw:Special:MyLanguage/Edit check/Tags|सम्पादनों को टैग किया जाएगा]] ताकि अनुभवी सदस्य उन सम्पादनों का पता लगा पाएँ जहाँ पर पेस्ट जाँच दिखाई गई थी। अंतिम सम्पादन में कोई भी पेस्ट किया हुआ पाठ न होने के बावजूद भी टैग दृश्य होगा। यह सुविधा इस हफ्ते के अंत तक ग्लोबल स्तर पर जारी की जाएगी। इसे परखने में सहायता करने के लिए आप सबका धन्यवाद। [[सदस्य:Quiddity (WMF)|Quiddity (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:Quiddity (WMF)|वार्ता]]) 00:02, 3 मार्च 2026 (UTC) == अली ख़ामेनेई == <nowiki>[[अली ख़ामेनेई]]</nowiki> को हिंदी में <nowiki>[[अली ख़मीने]]</nowiki> लिखा जाना चाहिए, कृपया इसे बदलिए। -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 13:28, 3 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, यह चर्चा [[वार्ता:अली ख़ामेनेई]] पृष्ठ पर होनी चाहिए। यदि आपको लगता है कि वर्तमान नाम सही नहीं है, तो आप [[साँचा:नाम बदले]] का प्रयोग करते हुए पृष्ठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकते हैं। मेरी व्यक्तिगत राय में वर्तमान नाम सही है, क्योंकि [https://www.bbc.com/hindi/articles/c747xp3pke8o BBC], [https://www.aajtak.in/trending/photo/iran-supreme-leader-ali-khamenei-death-reaction-celebration-mourning-tstf-2484137-2026-03-02 Aaj Tak], [https://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/bahraich-shia-community-ali-khamenei-death-mourning-ban-juloos-local18-10235065.html News18] और [https://ndtv.in/world-news/iran-us-tensions-live-updates-trump-ayotallah-khamenei-sanctions-military-buildup-explosions-nuclear-tensions-us-israel-iran-tension-live-11148367 NDTV] सहित कई मीडिया संस्थान भी “ख़ामेनेई” ही लिखते हैं और हिंदी उच्चारण के अनुसार भी यही नाम उचित प्रतीत होता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 13:49, 3 मार्च 2026 (UTC) ::: @[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, फ़ारसी में नाम علی خامنه‌ای लिखा जाता है। इसी आधार पर देवनागरी में इसका निकटतम लिप्यंतरण अली ख़ामेनेई होगा। ::: यहाँ خ ध्वनि के लिए “ख़” का प्रयोग किया जाता है और अंतिम –ई ध्वनि को दर्शाने के लिए “ई” आता है। इसलिए अली ख़ामेनेई फ़ारसी उच्चारण के सबसे क़रीब माना जा सकता है। --[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 01:29, 9 मार्च 2026 (UTC) == Lua त्रुटि == जी, जब भी में [[मॉड्यूल:Designation/list]] नामक पृष्ठ को बनाने का प्रयास करता हूँ, मुझे यह संदेश मिलता है: Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'. मैं अंग्रेज़ी विकिपीडिया के स्रोत कोड का प्रयोग करता हूँ, फिर भी यह संदेश आता है। क्या इसका कोई उपाय है? [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 10:14, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:16, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद ^^ [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 15:45, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] मैंने स्वतः परीक्षित अधिकार के लिए निवेदन भेजा है। यदि आप चाहते हैं तो कृपया अपना मत दें। फिर से धन्यवाद! :3 [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 16:26, 18 मार्च 2026 (UTC) :::समय-समय पर मेरा ध्यान आपके संपादनों पर जाता रहता है। हालाँकि मैंने आपके बनाए लेखों को ठीक से नहीं देखा है, लेकिन नामांकन में दिए गए लेखों में से [[रोलिन' (एयर रेड व्हीकल)]] देखा तो वह मुझे लगभग पूरा मशीनी अनुवाद लगा। इसी तरह दूसरे उदाहरण, जैसे [[तलत जाफ़री]] आदि, भी मुझे मशीनी अनुवाद जैसे लगे। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं इस विषय में आपकी कोई विशेष मदद कर पाऊँगा। बाकी अन्य सदस्य भी आपके नामांकन को देखकर अपने सुझाव दे सकते हैं। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:52, 20 मार्च 2026 (UTC) == सदस्य पृष्ठ हटाने हेतु अनुरोध == नमस्ते प्रशासक महोदय, मैं 'Gahininath gutte' इस खाते का स्वामी हूँ। मैं अपना 'सदस्य वार्ता' पृष्ठ (User Talk Page) हटाना चाहता हूँ क्योंकि यह गूगल सर्च में मेरी निजी जानकारी दिखा रहा है। मैंने लॉगिन किया है, लेकिन सुरक्षा फ़िल्टर के कारण मैं स्वयं <nowiki>{{db-u1}}</nowiki> टैग नहीं लगा पा रहा हूँ। कृपया मेरी सहायता करें और इस पृष्ठ को हटा दें। धन्यवाद। [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 12:40, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{Ping|Gahininath gutte}} नमस्ते! हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार तभी हटाए जाते है, ज़ब उसपे अत्यधिक बर्बरता या निजी जानकारी और गाली गालोच हुआ हो, आमतौर पर सदस्य वार्ता नही हटाए जाते है,अगर आप सदस्य पृष्ठ की बात कर रहे है, तो आप 10 सकारात्मक संपादन करने के उपरांत सदस्य पृष्ठ को हटवाने ले लिए अनुरोध कर सकते है,या हटाने हेतु संबंधित साँचा लगा सकते है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 12:52, 12 मार्च 2026 (UTC) ::<blockquote>महोदय, जवाब के लिए धन्यवाद। मैं समझता हूँ कि वार्ता पृष्ठ हटाना नियमों के विरुद्ध है। लेकिन यह पृष्ठ गूगल सर्च में मेरा नाम और निजी संदर्भ दिखा रहा है, जिससे मुझे प्राइवेसी की समस्या हो रही है। अगर आप इसे हटा नहीं सकते, तो कृपया इस पृष्ठ पर '''<nowiki>__NOINDEX__</nowiki>''' टैग लगा दें ताकि यह गूगल सर्च इंजन में दिखाई न दे। साथ ही, कृपया इस पृष्ठ की पुरानी सामग्री (History) को भी छुपा दें। आपकी बहुत कृपा होगी।"</blockquote> ::[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:03, 12 मार्च 2026 (UTC) ::"नमस्ते, मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद। मैं विकिपीडिया पर अब सक्रिय नहीं रहना चाहता और अपनी निजता (Privacy) की सुरक्षा के लिए 'Right to Vanish' के तहत इस पृष्ठ को स्थायी रूप से (Permanently) हटाने का अनुरोध करता हूँ। इसमें मेरा वास्तविक नाम शामिल है जो गूगल सर्च में दिखाई दे रहा है और यह मेरी निजता का उल्लंघन है। मैं चाहता हूँ कि मेरे खाते से जुड़ी यह पहचान पूरी तरह से मिटा दी जाए। कृपया मेरी सहायता करें।" [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:06, 12 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] जी, मैंने आपके वार्ता पृष्ठ का एक अवतरण हटा दिया है, जिसमें आपकी व्यक्तिगत जानकारी थी। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:56, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::अभि भी मेरा नाम गुगल सर्च मैं दिख रहा है मुझे Wikipedia पर रहना ही नहीं कृपया यहा पर मेरा जो अकाउंट है उसे हटा दे पुरी तरह सें... ::::धन्यवाद...! [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 15:14, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::इसके लिए आप [[विशेष:GlobalVanishRequest]] पर उपलब्ध फ़ॉर्म भर सकते हैं। कृपया अनुरोध करने से पहले फ़ॉर्म पर दिए गए निर्देशों को अवश्य पढ़ लें। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:19, 18 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == [[:en:Embarrasingly parallel]] का शीर्षक अनुवाद में क्या होना चाहिए- * [[एम्बैरसिंगली पैरेलल]] या * [[अति-समानांतरीय]] [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:13, 15 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, सम्भवतः आपके पास टाइपो हुआ है और आप [[:en:Embarrassingly_parallel|Embarrassingly parallel]] की बात कर रहे हो। parallel के लिए हिन्दी में समानांतर शब्द काम में लेते हैं और शब्दकोश नामक वेबसाइट पर इसका अनुवाद अव्यवस्थित समानांतर लिखा है। लेकिन मुझे तार्किक तौर पर कोई तुल्य शब्द याद नहीं आ रहा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:50, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, शब्दकोश नामक वेबसाइट पर एंबैरिसिंगली (Embarrassingly) का अनुवाद "शर्मनाक रूप से" लिखा है, लेकिन हम इसे कंप्यूटर विज्ञान या कोडिंग के संदर्भ में लिख रहे हैं तो क्या "सहज समानांतर" लिख सकते है? इसका मतलब यह है कि समानांतर करने में कोई विशेष दिमाग या मेहनत नहीं लगती। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 17:36, 19 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] जी, इस स्थिति में अंग्रेज़ी वाले का ही देवनागरी में उच्चारण लिख दीजिएगा। लेख की शुरूआत में शब्दशः अनुवाद लिख सकते हैं और भविष्य में विश्वसनीय स्रोत मिलने पर उचित स्थानान्तरण कर दिया जायेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:29, 25 मार्च 2026 (UTC) == Request for Comment: VisualEditor automatic reference names == <div lang="en" dir="ltr"> Hi, I’m Johannes from [[:m:Wikimedia Deutschland|Wikimedia Deutschland]]’s [[:m:WMDE Technical Wishes|Technical Wishes team]]. Apologies for writing in English. {{Int:Please-translate}}! We are considering to work on [[:m:Community Wishlist/W17|Community Wishlist/W17: Improve VE references' automatic names and reuse]]. This has been a long-term issue for wikitext editors (see e.g. [[:en:WP:VisualEditor/Named references]]) which has been among the top-voted wishes in several [[:m:Community Wishlist Survey|Community Wishlist Surveys]], e.g. [[:m:Community Wishlist Survey 2017/Editing/VisualEditor: Allow editing of auto-generated references before adding them|2017]], [[:m:Community Wishlist Survey 2019/Citations/VisualEditor: Allow references to be named|2019]], [[:m:Community Wishlist Survey 2022/Editing/VisualEditor should use human-like names for references|2022]] or [[:m:Community Wishlist Survey 2023/Editing/VisualEditor should use proper names for references|2023]]. We would like your input on the [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Proposed solutions|solutions]] proposed on our project page: '''[[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names]]'''. We are considering several options, which can be combined if desired by the community. * Changing the default pattern for automatically generated reference names (currently <code>":n"</code>, e.g. <code>":0"</code>, <code>":1"</code>...) to use the [[:mw:Help:Reference Previews#Exposed reference types|reference type]] instead (e.g. <code>"book_reference-1"</code>). * Providing a simple mechanism for communities to configure a different default name. * Generating automatic reference names based on the [[:en:domain name|domain name]] (if it’s a web citation). * Generating automatic reference names based on template parameters (e.g. "title" or "last"+"first") – defined by the community. === Feedback === [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names|Visit our project page]] to read about our proposal in detail and share your thoughts [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Request for comment|on metawiki]]. '''Please note''': We will only implement a solution if there’s clear consensus among the global community. Our intention is not to build the perfect solution, but to find a simple and lean one that alleviates the pain caused by auto generated names. We are aware that some experienced VisualEditor users might prefer an option to manually change reference names in VisualEditor, but such a UX intervention is difficult to achieve across reference types and thus out of scope for our team, we can only improve the auto-naming mechanism. We are happy about suggestions for improving certain details of the proposed solutions. Any other feedback and alternative proposals are also welcome – even though it’s out of scope for us, it might still be relevant for future work on this topic. Please support us interpreting consensus by clearly indicating your opinion (e.g. by using support/neutral/oppose templates). We are aware of [[:en:WP:NOTVOTE]], but given that we are facilitating this discussion with users from different wikis, potentially commenting in their native language, clearly indicating your position helps us avoid misunderstandings. Thank you for participating!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[User:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[User talk:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]])</bdi> 11:15, 19 मार्च 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johannes_Richter_(WMDE)/MassMessageRecipients&oldid=30281362 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johannes Richter (WMDE)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मार्च गतिविधि अपडेट == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ: * 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है। * गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया। * फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ। * आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में सामुदायिक बैठक निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं। : हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC) == अंगिका और मैथिली विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" मे भाग ले == नमस्ते , विकिपीडियन ‎[https://anp.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_आरू_लोकगाथा_अंगिका_२०२६ अंगिका] और [https://mai.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_एवं_लोककथा_२०२६ मैथिली] विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" प्रतियोगिता चल रही है, और इनाम जीते। ‎तिथि: 23 मार्च - 31 मार्च 2026 (8 दिन शेष) [[सदस्य:Surajkumar9931|Surajkumar9931]] ([[सदस्य वार्ता:Surajkumar9931|वार्ता]]) 05:33, 23 मार्च 2026 (UTC) == Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki == [Please help translate this message] Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[foundation:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contact_Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[metawiki:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[metawiki:Talk:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|talk page]]. –– [[सदस्य:STei (WMF)|STei (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:STei (WMF)|वार्ता]]) 13:21, 25 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == मैं [[:en:Perpetual calendar]] को अनुवाद कर रहा हूं। इसका शीर्षक क्या मुझे [[परपेचुअल पंचांग]] रखना चाहिए ? इसका तत्सम क्या हो सकता है क्योंकि मुझे इसका कही हिन्दी में प्रयोग नही मिला। [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:40, 25 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, आप की जानकारी के लिए कुछ सन्दर्भ [https://uptoword.com/en/perpetual-calendar-meaning-in-hindi?utm_source=chatgpt.com] [https://fj.voguetimebalfie.com/info/are-perpetual-calendar-watches-accurate-100990981.html] [https://www.google.co.th/books/edition/N%C4%ABh%C4%81rik%C4%81/t6hHAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&printsec=frontcover] [https://www.google.co.th/books/edition/Bhajpa_Ka_Abhyuday_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A4%BE_%E0%A4%95/Cet5EAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&pg=RA1-PA1970&printsec=frontcover] दिए गए है, इन के हिसाब से सतत पंचांग या स्थायी पंचांग लिखा जा सकता है। बाकि जैसी सभी की राय हो। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 08:32, 28 मार्च 2026 (UTC) == विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ हेतु स्कॉलरशिप आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं == नमस्ते, विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ के लिए स्कॉलरशिप हेतु आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं । यह कॉन्फ्रेंस ४ से ६ सितंबर २०२६ तक कोच्चि, भारत में होगी । विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत), दक्षिण एशिया के साथ और भी विकिमीडियन्स, सामुदायिक आयोजकों और योगदानकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह जुड़ने, सीखने, अनुभव बाँटने करने और निःशुल्क ज्ञान के आंदोलन को सशक्त करने हेतु मिलजुलकर करने का एक स्थान है । 🙂 अगर आप विकिमीडिया परियोजनाओं में सक्रिय योगदानकर्ता हैं अथवा सामुदायिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं, तो आपको स्कॉलरशिप के लिए आवेदन हेतु प्रोत्साहित किया जाता है । [[diffblog:2026/03/19/namukku-othukoodam-scholarships-now-open-for-wikiconference-india-2026/|विस्तृत घोषणा]] यहाँ है । आवेदन की अंतिम तिथि: १५ अप्रैल २०२६ रात ११:५९ बजे IST आवेदन की लिंक: [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdA3rR9xX_k31dzJrjM5MTDNYNUIRcAB45S4TflsYCbGJNrzg/viewform आवेदन की लिंक] अधिक जानकारी: [[metawiki:WikiConference_India_2026/Scholarship|मेटा पेज लिंक]] कृपया इस घोषणा को अपने समुदाय में अन्य सदस्यों के साथ भी बाँटें । धन्यवाद ! विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ की आयोजन टीम -[[User:Gnoeee|<span style="color:#990000">❙❚❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span><span style="color:#000"> जिनोय </span><span style="color:#006699">❚❙❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span>]] [[User talk:Gnoeee|✉]] 21:00, 28 मार्च 2026 (UTC) == Join the sixth Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia! == <div lang="en" dir="ltr"> [[File:Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia 2026.png|right|250px|thumb|link=https://meta.wikimedia.org/wiki/Ukraine%27s_Cultural_Diplomacy_Month_2026|Join our campaign!]] {{int:please-translate}} Dear Wikipedians! [[:m:Special:MyLanguage/Wikimedia Ukraine|Wikimedia Ukraine]], in cooperation with the [[:en:Ministry of Foreign Affairs of Ukraine|MFA of Ukraine]] and [[:en:Ukrainian Institute|Ukrainian Institute]], has launched the sixth edition of writing challenge "'''[[:m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Ukraine's Cultural Diplomacy Month]]'''", which lasts from '''1st April''' until '''30th April 2026'''. The initiative aims to promote knowledge about Ukrainian culture abroad by creating and improving Wikipedia articles in multiple languages. This year marks the sixth edition of the campaign, which will focus on contemporary culture, making today’s artistic voices and practices more visible to international audiences. 🧩'''How to participate?''' Choose an article from the suggested list → Write an article in your language, or improve an existing one according to the rules → Add your contribution to the contest page and calculate your points → Win prizes and receive a certificate of participation → Become a promoter of truthful knowledge about Ukraine. 🧩'''[[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Check our main page for more information]]'''. '''If you are interested in coordinating long-term community engagement for the campaign and becoming a local ambassador, we would love to hear from you! Please let us know your interest.''' If not, then we encourage you to translate the [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|landing page of the contest]] and [https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MessageGroupStats?group=Centralnotice-tgroup-UCDM2026banner&messages=&language=en&x=D banner] into your own language. Also, we set up a [[:m:CentralNotice/Request/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|banner]] to notify users of the possibility to participate in this challenge! [[:m:User:OlesiaLukaniuk (WMUA)|OlesiaLukaniuk (WMUA)]] ([[:m:User talk:OlesiaLukaniuk (WMUA)|talk]]) 04:35, 1 April 2026 (UTC) </div> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:OlesiaLukaniuk_(WMUA)/list_of_wikis&oldid=28552112 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:OlesiaLukaniuk (WMUA)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Action Required: Update templates/modules for electoral maps (Migrating from P1846 to P14226) == Hello everyone, This is a notice regarding an ongoing data migration on Wikidata that may affect your election-related templates and Lua modules (such as <code>Module:Itemgroup/list</code>). '''The Change:'''<br /> Currently, many templates pull electoral maps from Wikidata using the property [[:d:Property:P1846|P1846]], combined with the qualifier [[:d:Property:P180|P180]]: [[:d:Q19571328|Q19571328]]. We are migrating this data (across roughly 4,000 items) to a newly created, dedicated property: '''[[:d:Property:P14226|P14226]]'''. '''What You Need To Do:'''<br /> To ensure your templates and infoboxes do not break or lose their maps, please update your local code to fetch data from [[:d:Property:P14226|P14226]] instead of the old [[:d:Property:P1846|P1846]] + [[:d:Property:P180|P180]] structure. A [[m:Wikidata/Property Migration: P1846 to P14226/List|list of pages]] was generated using Wikimedia Global Search. '''Deadline:'''<br /> We are temporarily retaining the old data on [[:d:Property:P1846|P1846]] to allow for a smooth transition. However, to complete the data cleanup on Wikidata, the old [[:d:Property:P1846|P1846]] statements will be removed after '''May 1, 2026'''. Please update your modules and templates before this date to prevent any disruption to your wiki's election articles. Let us know if you have any questions or need assistance with the query logic. Thank you for your help! [[User:ZI Jony|ZI Jony]] using [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 17:12, 3 अप्रैल 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29941252 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Wikimedia Foundation की वार्षिक योजना की चर्चाओं में शामिल होने का आमंत्रण == नमस्ते, मैं आप सभी को '''साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल''' के अप्रैल एडिशन में इनवाइट करना चाहता हूँ, जो विकिमीडिया फाउंडेशन की लीडरशिप के साथ उनके [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan/2026-2027 एनुअल प्लान (2026-2027)] पर चर्चा करेगा। फ़ाउंडेशन की [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan वार्षिक योजना] एक उच्च-स्तरीय रोडमैप है, जिसमें यह बताया गया है कि संगठन आने वाले वर्ष में क्या हासिल करना चाहता है। इसमें न केवल फाउंडेशन के लक्ष्य, प्रगति और योजना शामिल है, बल्कि वैश्विक रुझानों का सारांश भी शामिल है जो हमारे मूवमेंट के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगला '[https://meta.wikimedia.org/wiki/South%20Asia%20Open%20Community%20Call साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल]' नीचे दी गई तारीखों/समय पर आयोजित कि जाएगी। कृपया इसे अपने कैलेंडर में नोट कर लें और [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 यहाँ साइन अप करें।] Platform: Google Meet Date: 17th April, 2026 Time: 1930-2045 IST (1400-1515 UTC) [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 Registration Link] '''नोट:''' सिर्फ़ रजिस्टर्ड लोगों को ही जॉइनिंग लिंक मिलेगा। कॉल पर आपसे मिलने का इंतज़ार रहेगा, --[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 12:49, 6 अप्रैल 2026 (UTC) == पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) अधिकार और नए सुरक्षा स्तर पर पुनर्विचार हेतु प्रस्ताव == सभी सदस्य महोदय, मैं समुदाय का ध्यान पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) से जुड़ी [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख_48#केवल_स्वतः_परीक्षित_सदस्यों_द्वारा_स्थानांतरण|2017 की एक पुरानी चर्चा (पुरालेख 48)]] और नीति की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उस समय अनुचित स्थानांतरणों को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया था कि केवल 'स्वतः परीक्षित' (Autopatrolled), रोलबैकर या प्रबंधक स्तर के सदस्य ही पृष्ठों का स्थानांतरण कर सकेंगे। उस समय की चर्चा में और फैब्रिकेटर (Phabricator) पर एक अन्य विकल्प (विकल्प 2) का भी सुझाव दिया गया था, जिसका उल्लेख आदरणीय @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी ने किया था: '''"एक नया सुरक्षा स्तर बना कर बर्बरता के शिकार पन्नों को इस स्तर पर सुरक्षित करने का।"''' मेरा प्रस्ताव है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हमें अब इस विकल्प (नया स्थानांतरण सुरक्षा स्तर) को लागू करना चाहिए। मेरी रूपरेखा कुछ इस प्रकार है: # '''सुरक्षित पृष्ठ:''' जिन पृष्ठों को अर्ध-सुरक्षा (Semi-protection) या पूर्ण सुरक्षा (Full protection) प्राप्त है या जो बर्बरता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, उन्हें स्थानांतरित करने का अधिकार केवल 'स्वतः परीक्षित', रोलबैकर, पुनरीक्षक, प्रशासक या प्रबंधक स्तर के सदस्यों तक ही सीमित रहे। # '''सामान्य पृष्ठ:''' जो पृष्ठ पूरी तरह से असुरक्षित और सामान्य हैं, उनका स्थानांतरण (नाम परिवर्तन) करने का अधिकार 'स्वतः स्थापित' (Autoconfirmed) सदस्यों को वापस दे दिया जाए (जैसा कि अंग्रेजी व अन्य विकिपीडिया परियोजनाओं पर होता है)। '''इस बदलाव की आवश्यकता क्यों है (ठोस आँकड़े)?''' सक्रिय अधिकार-प्राप्त सदस्यों की भारी कमी के कारण, छोटे-छोटे और स्पष्ट स्थानांतरण कार्यों (जैसे वर्तनी सुधार) के लिए भी सक्रिय 'स्वतः स्थापित' सदस्यों को <code><nowiki>{{नाम बदलें}}</nowiki></code> का अनुरोध करना पड़ता है। इससे काम की गति धीमी होती है और प्रबंधकों पर भी अनावश्यक अनुरोधों का बोझ पड़ता है। हाल ही में मैंने Quarry टूल के माध्यम से हिंदी विकिपीडिया के डेटाबेस का विश्लेषण किया (क्वेरी लिंक: [https://quarry.wmcloud.org/query/104224 Quarry Query: 104224])। इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में दर्जनों ऐसे अधिकार-प्राप्त सदस्य हैं, जिन्होंने पिछले कई महीनों या वर्षों से हिंदी विकिपीडिया पर एक भी संपादन नहीं किया है। आप नीचे दी गई तालिका का विस्तार करके स्वयं देख सकते हैं: {| class="wikitable mw-collapsible mw-collapsed" style="text-align:center; width:80%;" |+ अधिकार प्राप्त सदस्यों के अंतिम संपादन की सूची ! अधिकार (Group) !! सदस्य का नाम !! आखिरी संपादन (दिनांक) |- | autopatrolled || Naziah rizvi || 20-10-2016 |- | autopatrolled || Somesh Tripathi || 05-10-2017 |- | autopatrolled || Jeeteshvaishya || 22-10-2017 |- | autopatrolled || रोहित रावत || 02-09-2018 |- | autopatrolled || Salma Mahmoud || 23-10-2018 |- | rollbacker || FR30799386 || 02-10-2019 |- | autopatrolled || SGill (WMF) || 03-03-2020 |- | autopatrolled || RacIndian || 21-08-2020 |- | autopatrolled || Jaswant Singh4 || 25-09-2020 |- | autopatrolled || Teacher1943 || 28-08-2021 |- | autopatrolled || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | rollbacker || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | autopatrolled || Mala chaubey || 29-12-2021 |- | autopatrolled || Navodian || 20-01-2022 |- | autopatrolled || AbhiSuryawanshi || 08-06-2022 |- | autopatrolled || Innocentbunny || 21-09-2022 |- | autopatrolled || Biplab Anand || 22-10-2022 |- | autopatrolled || सुनील मलेठिया || 08-01-2023 |- | autopatrolled || Sushilmishra || 20-04-2023 |- | autopatrolled || Gaurav561 || 01-05-2023 |- | autopatrolled || Ahmed Nisar || 02-07-2023 |- | autopatrolled || JamesJohn82 || 20-08-2023 |- | autopatrolled || जैन || 02-11-2023 |- | autopatrolled || Samee || 13-01-2024 |- | autopatrolled || Dinesh smita || 15-04-2024 |- | autopatrolled || सीमा1 || 15-04-2024 |- | rollbacker || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | rollbacker || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | autopatrolled || Anamdas || 07-11-2024 |- | autopatrolled || चक्रपाणी || 02-12-2024 |- | autopatrolled || Charan Gill || 14-12-2024 |- | autopatrolled || Satdeep Gill || 10-02-2025 |- | autopatrolled || MKar || 23-03-2025 |- | autopatrolled || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || स || 20-05-2025 |- | autopatrolled || स || 20-05-2025 |- | rollbacker || Stang || 26-05-2025 |- | autopatrolled || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || PQR01 || 12-06-2025 |- | autopatrolled || WhisperToMe || 26-06-2025 |- | autopatrolled || Hunnjazal || 03-07-2025 |- | autopatrolled || MGA73 || 13-07-2025 |- | autopatrolled || Jayprakash12345 || 19-07-2025 |- | rollbacker || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Raju Babu || 03-08-2025 |- | autopatrolled || Trikutdas || 06-10-2025 |- | autopatrolled || Surenders25 || 29-10-2025 |- | rollbacker || राजकुमार || 01-11-2025 |- | rollbacker || Nadzik || 22-11-2025 |- | autopatrolled || Srajaltiwari || 15-12-2025 |- | autopatrolled || Buddhdeo Vibhakar || 22-12-2025 |- | autopatrolled || आशीष भटनागर || 23-12-2025 |- | autopatrolled || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | rollbacker || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | autopatrolled || कलमकार || 12-02-2026 |- | autopatrolled || शीतल सिन्हा || 21-02-2026 |- | rollbacker || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || नीलम || 09-03-2026 |- | autopatrolled || Dr.jagdish || 10-03-2026 |- | rollbacker || Chronos.Zx || 12-03-2026 |- | rollbacker || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Utcursch || 17-03-2026 |- | rollbacker || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || Mahensingha || 27-03-2026 |- | autopatrolled || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || Saroj || 31-03-2026 |- | autopatrolled || Ziv || 01-04-2026 |- | rollbacker || TypeInfo || 02-04-2026 |- | sysop || संजीव कुमार || 07-04-2026 |- | autopatrolled || Dharmadhyaksha || 07-04-2026 |- | autopatrolled || CommonsDelinker || 08-04-2026 |- | sysop || SM7 || 08-04-2026 |- | sysop || अजीत कुमार तिवारी || 09-04-2026 |- | sysop || अनिरुद्ध कुमार || 09-04-2026 |- | autopatrolled || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | rollbacker || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | sysop || DreamRimmer || 09-04-2026 |- | autopatrolled || अनुनाद सिंह || 09-04-2026 |- | sysop || Sanjeev bot || 10-04-2026 |} यदि हम यह नई तकनीकी व्यवस्था लागू करते हैं, तो सक्रिय सदस्यों को काम करने में सहूलियत मिलेगी, विकिपीडिया का विकास तेज़ी से होगा, और प्रबंधकों का कीमती समय बचेगा। कृपया इस प्रस्ताव पर अपने बहुमूल्य विचार साझा करें ताकि हम इस सुधार को प्रबंधकों के माध्यम से लागू करवा सकें। धन्यवाद। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 09:22, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] जी, मुझे आपका उद्देश्य समझ में नहीं आया। जो आवेदन अधूरे हैं उनमें से अधिकतर अधूरे होने का कारण प्रबन्धकों की सक्रियता नहीं बल्कि उचित स्रोत का न होना है। आप चाहते हो कि स्रोतों के अभाव में आवेदन करने वाले सदस्य मनमर्जी से स्थानान्तरण करते रहें? आपने जो उपरोक्त सूची दी है, क्या उनमें कोई सदस्य अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है? यदि हाँ तो सूचित करें। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:48, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] महोदय, ::'''1. मनमर्जी से स्थानांतरण:''' मेरा उद्देश्य इसे बढ़ावा देना बिल्कुल नहीं है। जैसा कि इस विषय पर पहले भी बताया गया था, यह प्रस्ताव केवल स्पष्ट वर्तनी और मात्रा की गलतियों को तुरंत सुधारने के लिए है। यदि कोई 'स्वतः स्थापित' सदस्य अनुचित स्थानांतरण करता है, तो उसे आसानी से पूर्ववत किया जा सकता है। साथ ही, संवेदनशील या विवादित पृष्ठों को नए 'स्थानांतरण सुरक्षा स्तर' से सुरक्षित रखा जा सकता है। या एक विकल्प यह भी है कि किसी भी सुरक्षित पृष्ठ पर स्थानांतरण करने के लिए नामांकन की आवश्यकता है| ::'''2. सूची का उद्देश्य:''' मेरा उद्देश्य किसी पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाना नहीं था। यह सूची केवल यह दर्शाने के लिए थी कि अधिकार-प्राप्त सक्रिय सदस्यों की संख्या वर्तमान में बहुत कम है। इस कारण, नाम सुधारने जैसे छोटे-छोटे कार्यों का पूरा बोझ आप जैसे चंद सक्रिय प्रबंधकों पर ही पड़ता है। ::मेरा यह प्रस्ताव केवल प्रबंधकों का कीमती समय बचाने और सुधारात्मक कार्यों को गति देने का एक तकनीकी सुझाव मात्र है। समुदाय का जो भी निर्णय होगा, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 16:27, 20 अप्रैल 2026 (UTC) :::प्रबन्धकों के समय का निर्धारण आप कैसे कर सकते हैं? किसी प्रबन्धक ने आपको कहा है क्या कि हमारा समय पृष्ठ स्थानान्तरण में जा रहा है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:36, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी नहीं महोदय [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 23:57, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ==आप सभी से विनम्र निवेदन है कि== मेरे [[विकिपीडिया:स्वतः_परीक्षित_अधिकार_हेतु_निवेदन#चाहर_धर्मेंद्र|इस]] निवेदन के संबंध में आपके विचार मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृपया अपना बहुमूल्य समय निकालकर इस पर अपना मत अवश्य साझा करें। आपके सुझाव और प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।<span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 11:34, 10 अप्रैल 2026 (UTC) == अनुरोध == नमस्कार! मैं आपसे [[मॉड्यूल:Lang/data]] पर एक संपादन करने का अनुरोध करता हूँ। ["hbo"] = "Biblical Hebrew" ===> ["hbo"] = "बाइबिली इब्रानी" [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 19:28, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 08:56, 17 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद! [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 09:51, 17 अप्रैल 2026 (UTC) == रोलबैक अधिकार के नामांकन पर आपके विचार/मत हेतु == <div style="background-color: #FFF9E6; padding: 15px; border: 1px solid #DAA520; border-radius: 8px; margin-top: 10px;"> नमस्ते, आशा है आप सकुशल होंगे। मैं पिछले कुछ समय से हिंदी विकिपीडिया पर सक्रिय रूप से गश्त कर रहा हूँ और हाल के बदलावों में स्पष्ट बर्बरता को हटाने का प्रयास कर रहा हूँ। अपने इस कार्य को और अधिक सुचारू बनाने के लिए, मैंने स्वयं को '''रोलबैक अधिकार''' के लिए नामांकित किया है। चूँकि आप हिंदी विकिपीडिया के एक अनुभवी सदस्य हैं, इसलिए मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि कृपया मेरे हालिया योगदानों की समीक्षा करें और अपना बहुमूल्य मत या सुझाव प्रदान करें। आपका समर्थन और मार्गदर्शन मेरे लिए अत्यंत उत्साहजनक होगा। '''नामांकन यहाँ देखें:''' [[विकिपीडिया:रोलबैकर्स अधिकार हेतु निवेदन#AMAN KUMAR|मेरे नामांकन पर अपना मत दें]] सहयोग के लिए अग्रिम धन्यवाद! सादर,<br> [[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 11:44, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> ==अंतिम कुछ दिन: विकि सम्मेलन भारत 2026 छात्रवृत्ति आवेदन== प्रिय विकिमीडिया समुदाय सदस्य, हमें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि '''[[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026|विकि सम्मेलन भारत 2026]]''' के लिए छात्रवृत्ति आवेदन वर्तमान में खुले हैं, और अंतिम तिथि अब बहुत निकट है। विकि सम्मेलन भारत 2026 इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन का चौथा संस्करण है, जो भारत और दक्षिण एशिया में इंडिक भाषाओं के विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स तथा मुक्त ज्ञान आंदोलन से जुड़े विकिमीडियनों और हितधारकों को एक साथ लाता है। यह सम्मेलन 4–6 सितंबर 2026 को कोच्चि, केरल में आयोजित किया जाएगा। * आप अधिक जानकारी और [[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026/Scholarship|आवेदन फॉर्म Meta-Wiki पर उपलब्ध]] छात्रवृत्ति पृष्ठ पर प्राप्त कर सकते हैं। * छात्रवृत्ति की अंतिम तिथि: 15 अप्रैल 2026, रात 11:59 बजे (IST) अब जबकि केवल कुछ ही दिन शेष हैं, हम आपको आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं यदि आपने अभी तक आवेदन नहीं किया है। साथ ही, कृपया इस अवसर को अपने समुदाय में साझा करें और अन्य लोगों को भी आवेदन करने के लिए प्रेरित करें। अधिक जानकारी और नियमित अपडेट के लिए, कृपया सम्मेलन के Meta पृष्ठ पर जाएँ। सादर, <br> विकि सम्मेलन भारत 2026 आयोजन टीम की ओर से <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 23:38, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> == फॉण्ट == हिन्दी विकिपीडिया पर पिछले कुछ दिनों से लैटिन लिपि के लिए जो फॉण्ट है, वे [[:hak:Hakkapedia|Hakkapedia]] एवं [[:nan:Pang-chān:Holopedia|Holopedia]] के फॉण्ट की तरह दिख रहा है। क्या default फॉण्ट को बदल दिया गया है? [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) {{Font color|grey|११:२५, १२ अप्रैल २०२६ (IST)}} == Lua त्रुटि == मॉड्यूल:Designation/lookup को बनाने में मुझे "Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'." त्रुटि मिलती है। कृपया उस पृष्ठ का निर्माण करें। कोड अंग्रेज़ी विकिपीडिया से लिया गया है (Module:Designation/lookup) [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 08:04, 18 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:24, 19 अप्रैल 2026 (UTC) == "यहया" नामक दो लेख? == दोनों [[याह्या (पैग़म्बर)|John the Baptist]] और [[यहया (इस्लाम)|Yahya]] के लेखों के नाम "यहया" क्यों है? केवल इस्लाम में उस व्यक्ति का नाम '''यहया''' होता है। ईसाई धर्म में उनहें '''यूहन्ना बपतिस्मा दाता''' के नाम से जाना जाता है। कृपया इस समस्या पर गौर करें। [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 11:24, 20 अप्रैल 2026 (UTC) == Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications == The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]]. Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects. '''The hackathon is intended for:''' * Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc. * Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc. * Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces. Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach. To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses. '''Apply here:''' * Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form] '''More information:''' We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page. * Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]] If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at contact@indicmediawikidev.org. Best Regards, On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group == सत्य == सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित, तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है। इसके साथ व्यक्ति की मानसिकता का जुड़ाव  है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आंकाक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण ‘अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन’ सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। झूठ बोलना तथा किसी सद् वस्तु के स्वरूप, स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना - ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य है। [[विशेष:योगदान/&#126;2026-24320-85|&#126;2026-24320-85]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-24320-85|वार्ता]]) 08:51, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == साँचा:स्टेटस भाषा == मैं <span style="font-family:'Kalimati', 'Arial', serif;"> [[साँचा:स्टेटस भाषा]] </span> का निर्माण करके वाला हूँ, जो [[बाली विकिपीडिया]] के [[:ban:Mal:Status basa|ᬫᬮ᭄:ᬲ᭄ᬢᬢᬸᬲ᭄ᬩᬲ]] की तरह होगा। इसे [[साँचा:Infobox language|ज्ञानदूसक भाषा]] पर लागु करने के बाद, हमें भाषा का यूनेस्को वर्गीकरण करना बहुत सरल हो जाएगा एवं वे interface भी अच्छा लगेगा। [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) 10:42, 21 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:ङघिञ|ङघिञ]] जी नमस्ते। साँचा का वार्ता पृष्ठ देख लें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 06:06, 22 अप्रैल 2026 (UTC) == यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति संपादनोत्सव में भाग लें == नमस्ते, 'यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति माह 2026' की गतिविधियों को समर्थन देने के लिए 22 अप्रैल 2026 को पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 1 बजे तक नई दिल्ली (भारत) स्थित युक्रेन दूतावास में एक विशेष संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं के विकिपीडिया प्रोजेक्ट्स पर यूक्रेन की संस्कृति से संबंधित जानकारी को समृद्ध करना और उसमें सुधार करना है। इस कार्यक्रम में आप ऑनलाइन जूम मीटिंग के माध्यम से शामिल हो सकते हैं। * समय: बुधवार, 22 अप्रैल 2026 | सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक (IST) * ज़ूम मीटिंग लिंक: [https://zoom.us/j/98031157656?pwd=BUHOGF5D4Qg8YnqQrEdFx3TyXrvKDO.1 ऑनलाइन जुड़ें] * मीटिंग आईडी: 980 3115 7656 * पासकोड: 716372 * आयोजन का मेटा पृष्ठ: [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|w.wiki/LyML]] इस आयोजन का हिस्सा बनें और भारतीय भाषाओं में मुक्त ज्ञान के प्रसार में अपना योगदान दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 22:59, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == आगामी कार्यक्रम == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची: # जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून) # जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई) # अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त) -संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:40, 24 अप्रैल 2026 (UTC) dezorfais8stigqvz4bogz7xg60g818 6543680 6543679 2026-04-24T17:41:25Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* आगामी कार्यक्रम */ 6543680 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <!-- इस लाइन को न हटायें। नए अनुभाग पृष्ठ पर सबसे नीचे बनायें। --> == Anthony Albanese के सही उच्चारण के संबंध में == विकिपीडिया के अंग्रेज़ी संस्कारण पर Albanese का उच्चारण "/ˌælbəˈniːzi/ ऐल-ब्अ-नी-ज़ी अथवा /ˈælbəniːz/ ऐल-ब्अ-नीज़" दिया गया है, अतः हिन्दी संस्करण पर भी उनका सही नाम का उच्चारण शामिल करें। स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Anthony_Albanese == Derbyshire के सही उच्चारण के संबंध में == Derbyshire का सही उच्चारण "डर्बीशायर" न होकर "ˈdɑː(ɹ).bɪ.ʃə(ɹ) {ड्आ (र्).बि.श्अ(र्)} = "डार्बिशर" प्रतीत हो रहा है। स्रोत: https://en.wiktionary.org/wiki/Derbyshire == Satyajit Rāy के सही वर्तनी == Satyajit Rāy को सत्यजित राय लिखा जाए। एक जगह पर "सत्यजीत" लिखा गया था, उसे "सत्यजित" लिखा जाए। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 13:59, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) :यह कहाँ लिखा है? कृपया लिंक भेज दें ताकि एडमिन आपका मामला देख सकें। [[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 19:31, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) ::[[सत्यजित राय|https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF]] ::वाक्य प्रयोग: सत्यजीत राय (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 02:53, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::yes [[विशेष:योगदान/&#126;2025-39710-56|&#126;2025-39710-56]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2025-39710-56|talk]]) 07:26, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) ::::तो तनिक इसे ठीक करें। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 07:36, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::::कर दिया। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 15 दिसम्बर 2025 (UTC) == लिंक जोडें == मैने इस पृष्ठ https://simple.wikipedia.org/wiki/Minority_appeasement_in_India को हिन्दी में अनुवाद किया है और हिंदी वाला पृष्ठ [[भारत में अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण]] पर पढा जा सकता है, अब कोई उन दोनों को लिंक कीजिए [[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 16:38, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) :मैने उसे स्वयं जोड दिया है -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 20:41, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) == विकिपीडिया का 25वें जन्मदिन समारोह, 15 जनवरी  == [[File:WP25 Anthem video - alternate cut.webm|300px|right|thumbtime=67]] नमस्ते विकिपीडिया के [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:Wikipedia%2025%20Virtual%20Celebration 25वें जन्मदिन समारोह] में आपको आमंत्रित करना चाहता हूँ, जो [https://zonestamp.toolforge.org/1768492800 15 जनवरी को 16:00 UTC] पर हो रहा है। यह एक घंटे भर का वर्चुअल इवेंट होगा जिसमें ट्रिविया, पुरस्कार, संगीत प्रदर्शन, नाटक रीडिंग, संपादकों पर स्पॉटलाइट और विशेष अतिथि शामिल होंगे। इसे Eventyay और विकिपीडिया के यूट्यूब चैनल पर स्ट्रीम किया जाएगा। तारीख सेव करने और अपडेट पाने के लिए इवेंट के लिए रजिस्टर करें, और अगर आपके कोई सवाल हों तो मुझसे पूछें! –[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 10:20, 12 दिसम्बर 2025 (UTC) == तुरन्त हस्तक्षेप अनुरोध == प्रिय साथी विकीमीडियन्स, मैं आप सभी से अत्यंत आग्रह और गंभीरता के साथ तत्काल सहायता की अपील कर रहा हूँ, ताकि विकीमीडिया ब्लॉग टीम द्वारा की गई एक लंबे समय से चली आ रही अन्यायपूर्ण स्थिति को सुधारा जा सके। 2014 से 2020 के बीच, विकीमीडिया के कुछ स्टाफ सदस्यों के प्रतिकूल और हतोत्साहित करने वाले रवैये के बावजूद, मैंने भारत ( [https://diff.wikimedia.org/2017/04/12/ashish-bhatnagar/ आशीष भटनागर जी] का ब्लॉग इंटरव्यू, [https://diff.wikimedia.org/2015/03/03/hindi-wiki-sammelan/ प्रथम हिन्दी विकि सम्मेलन की रिपोर्ट], आदि), म्यांमार, कोरिया, तुर्की, चेक गणराज्य आदि देशों की विकीमीडिया समुदायों और विकीमीडियन्स का परिचयात्मक दस्तावेज़ीकरण (प्रोफाइलिंग) करने का कार्य किया। मैंने स्वयं गहन शोध किया, प्रमुख और सक्रिय योगदानकर्ताओं की पहचान की, प्रश्नावलियाँ तैयार कीं, विस्तृत प्रोफाइल/साक्षात्कार लिखे और कुल मिलाकर 35 ब्लॉग पोस्ट तैयार कर प्रकाशित करवाईं। दुर्भाग्यवश, विकीमीडिया ब्लॉग टीम के कम से कम दो सदस्य जबरन और अनुचित रूप से लगभग 10 ब्लॉग पोस्टों की लेखकता (Authorship) अपने नाम से दर्शा रहे हैं, जबकि उन लेखों का संपूर्ण शोध, लेखन और सामग्री मेरी ओर से की गई थी। मैं आप सभी से विनम्र लेकिन सशक्त अनुरोध करता हूँ कि इस स्पष्ट अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएँ और यहाँ [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Wikimedia_Blog#Credits मेरी अपील] के नीचे अपने विचार/टिप्पणियाँ दर्ज करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके और वास्तविक लेखक को उसका उचित श्रेय मिल सके। आपका समर्थन न केवल मेरे लिए, बल्कि विकीमीडिया आंदोलन में पारदर्शिता, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। आप सभी का अग्रिम धन्यवाद। [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 07:27, 27 दिसम्बर 2025 (UTC) :बिना विश्वसनीय  स्रोत के, किसी भी विकिपीडिया पेज पर कोई वाक्य नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए कृपया मुझे बताएं कि आप किन पृष्ठों की बात कर रहे हैं?[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 08:03, 13 जनवरी 2026 (UTC) ::बांग्ला जी, आपका और हिन्दी विकिपीडिया समुदाय का धन्यवाद। वैसे कुछ अन्य विकिपीडिया के सज्जन पुरुषों के हस्तक्षेप के कारण [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Diff_(blog)#Blogpost_Credits समस्या सुलझ चुकी है] । [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 21:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Istanbul का सही उच्चारण == "इस्तांबुल" लिखने से यह होगा कि इसका उच्चारण "इस्ताम्बुल" हो जाएगा, क्योंकि त के बाद में "ब" है, जिसके बाद "म" है (प, फ, ब, भ, म)। इसलिए "इस्तान्बुल" ही सही है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 16:10, 28 दिसम्बर 2025 (UTC)Dimple323 :@[[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] लेख के वार्ता पृष्ठ पर चर्चा करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 07:51, 7 जनवरी 2026 (UTC) == ड्राफ्ट की समीक्षा और स्थानांतरण का अनुरोध == नमस्ते, कृपया ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra की समीक्षा करें और यदि उपयुक्त हो तो इसे मुख्य नामस्थान में स्थानांतरित करें। ड्राफ्ट का लिंक: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra धन्यवाद। [[सदस्य:Supraconciencia|Supraconciencia]] ([[सदस्य वार्ता:Supraconciencia|वार्ता]]) 22:03, 8 जनवरी 2026 (UTC) == अनुरोध == मैं आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि आप इस चर्चा में अपनी टिप्पणियाँ जोड़ें: <nowiki>https://hi.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया</nowiki>: पृष्ठ_हटाने_हेतु_चर्चा/लेख/ भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण# भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण ।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 03:58, 11 जनवरी 2026 (UTC) == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप कार्यक्रम सूचना == सभी विकि साथियों को नववर्ष 2026 के लिए शुभकामनाएं। हम यूजर ग्रूप के जनवरी 2026 तक के कार्यों से संबंधित कुछ नए अपडेट साझा करना चाहते हैं: :अक्तूबर तथा नवंबर 2025 में आयोजित संपादनोत्सव के परिणाम घोषित हो चुके हैं: # [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025]] - 2 अक्तूबर 2025 से 18 अक्तूबर 2025 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- 1 नवंबर, 2025 से 14 नवंबर, 2025 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। :जनवरी में नई दिल्ली में दो ऑफ लाइन बैठक/कार्यशाला का आयोजन हो रहा है: # [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका|विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका]] - 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित सांस्थानिक प्रशिक्षण और भागिदारी कार्यशाला। # [[w:hi:विकिपीडिया:प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026|प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026]] - 16 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रबंधक बैठक। : वर्ष 2026 के फरवरी तथा मार्च में दो गुणवत्ता बढ़ाने वाले संपादनोत्सव करने की योजना है: # [[w:hi:विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026|विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026]] – फरवरी 2026 में हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- मार्च में हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।:इन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए तथा इससे संबंधित कोई सुझाव देने के लिए सदस्यों का स्वागत है। : 15 जनवरी को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने को इच्छुक दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिपीडियनों का स्वागत हैं। आप आयोजन पृष्ठ पर अपना पंजीयन कराकर इस कार्यशाला में शामिल हो सकते हैं। :सादर- संपर्क सूत्र -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 18:49, 13 जनवरी 2026 (UTC) ==सहायता== मैं जब भी किसी लेख में संपादित करती करती हूँ तो स्रोत संपादित की जगह संपादित करें आता है जिस कारण मैं ठीक से आडिट नहीं कर पाती हूँ कृपया मेरी इस समस्या में सहायता करें। [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:14, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी, आपको समस्या क्या आ रही है? वहाँ स्रोत सम्पादन और यथादृश्य समादिका (visual editor) के मध्य बदला जा सकता है। यदि आप स्रोत सम्पादन का उपयोग करना चाहें तो उचित बदलाव कर सकते हैं। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 06:19, 15 जनवरी 2026 (UTC) ::{{ping|संजीव कुमार}} लेकिन कहाँ और कैसे बदला जाएगा [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:21, 15 जनवरी 2026 (UTC) :::{{ping|संजीव कुमार}} जी कृपया मार्गदर्शन करें। 14:23, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी वहाँ पर दाहिने ओर ऊपर एक पेन जैसा दिखने वाला बटन होता है जिसे क्लिक करके आप 'यथादृश्य' और 'स्रोत संपादक' में अदल बदल कर सकते हैं। आप कंप्यूटर पे हो तो। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) :::::@[[सदस्य:SM7|SM7]] जी हो गया, धन्यवाद [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 07:44, 17 जनवरी 2026 (UTC) == मसौदे की समीक्षा का अनुरोध == नमस्ते, मैंने हाल ही में एक जीवित व्यक्ति की जीवनी का मसौदा तैयार किया है, जो स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है। मुख्य नामस्थान में स्थानांतरण का अनुरोध पहले ही किया जा चुका है। मसौदा यहाँ उपलब्ध है: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra यदि कोई अनुभवी संपादक इसकी समीक्षा कर सके, तो आभारी रहूँगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 10:03, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::नमस्ते, :: जानकारी देने के लिए धन्यवाद। मेरा उद्देश्य किसी भी प्रकार का प्रचार करना नहीं था। मैं आपके निर्णय का सम्मान करता हूँ और आगे से हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार ही योगदान करूँगा। :: धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 17:53, 16 जनवरी 2026 (UTC) == नये लेख [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] की समीक्षा हेतु अनुरोध == नमस्ते संपादकों, मैंने सम्राट कुमार गुप्ता के बारे में एक लेख (Draft) तैयार किया है जिसमें 3 दशकों के पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के विश्वसनीय संदर्भ दिए गए हैं। कृपया इसकी समीक्षा करें और इसे मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित करने में सहायता करें। लिंक: [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] -- धन्यवाद [[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Supriya|वार्ता]]) 07:43, 16 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:46, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Thank You for Last Year – Join Wiki Loves Ramadan 2026 == Dear Wikimedia communities, We hope you are doing well, and we wish you a happy New Year. ''Last year, we captured light. This year, we’ll capture legacy.'' In 2025, communities around the world shared the glow of Ramadan nights and the warmth of collective iftars. In 2026, ''Wiki Loves Ramadan'' is expanding, bringing more stories, more cultures, and deeper global connections across Wikimedia projects. We invite you to explore the ''Wiki Loves Ramadan 2026'' [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026|Meta page]] to learn how you can participate and [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026/Participating communities|sign up]] your community. 📷 ''Photo campaign on '' [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan 2026|Wikimedia Commons]] If you have questions about the project, please refer to the FAQs: * [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan/FAQ/|Meta-Wiki]] * [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan/FAQ|Wikimedia Commons]] ''Early registration for updates is now open via the '''[[m:Special:RegisterForEvent/2710|Event page]]''''' ''Stay connected and receive updates:'' * [https://t.me/WikiLovesRamadan Telegram channel] * [https://lists.wikimedia.org/postorius/lists/wikilovesramadan.lists.wikimedia.org/ Mailing list] We look forward to collaborating with you and your community. '''The Wiki Loves Ramadan 2026 Organizing Team''' 19:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29879549 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्वागत सन्देश में चित्र == पूर्व चर्चा: [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख 63#स्वागत सन्देश में चित्र]] [[साँचा:सहायता|स्वागत संदेश]] में अंकित किया गया चित्र मशीन द्वारा निर्मित किया गया है। मशीन द्वारा बनाई गई सामग्री इस ज्ञानकोष में मान्य नहीं है। इसलिए अनुरोध है कि जिस सदस्य ने यह चित्र स्थापित किया है, वही इसे हटा भी दे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 09:32, 18 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी, यह चित्र आपको कैसा लगता है? मुझे तो यह पुराने चित्र जैसा ही लग रहा है। इसलिए यदि आप दोनों को यह ठीक लगे, तो हम इसे उपयोग में ले सकते हैं। :[[चित्र:Annapoorni (10641191125).jpg|120px|thumb|right|स्वागत!]] – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:13, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) {{-}} :: [[चित्र:Tableau_noir_dans_le_désert_du_Thar_(Rajasthan).jpg|240px|thumb|center|हिन्दी विकिपीडिया में आपका हार्दिक स्वागत है। इस ज्ञानकोश के विकास और विस्तार में आपके सहयोग की हमें प्रतीक्षा है।]] <center>--[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 18:03, 8 फ़रवरी 2026 (UTC)</center> :::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, ये आपको कैसे लग रहा है कि एआई से जनित चित्र ज्ञानकोशीय नहीं हो सकता? आजकल एआई से ज्ञानकोशीय एनिमेशन बनाये जाते हैं। यह तो बनाने वाले पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त चित्र ज्ञानकोशीय होने के लिए नहीं बल्कि स्वागत के रूप में जोड़ा गया है। :::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] जी, मुझे आपके सुझाव से कोई समस्या नहीं है और आप चाहें तो इसे जोड़ सकते हैं। हालांकि पिछली बार @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी का सुझाव था कि चित्र को हटा दिया जाये, अतः मुझे उनका सुझाव भी उचित ही लगा। लेकिन मैंने परम्परा के तौर पर नया चित्र जोड़ा था क्योंकि स्वागत सन्देश में बहुत बदलावों की आवश्यकता है। :::@[[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] जी, आपका सुझाव भी उचित है लेकिन इससे बेहतर चित्र हम कंप्यूटर पर निर्मित कर सकते हैं जो इससे बेहतर होंगे। इसके लिए चर्चा करना बेहतर होगा। स्वागत सन्देश बड़ा रखने के स्थान पर एक छोटी कड़ी दे सकते हैं जिसपर सभी सन्देशों को सूचीबद्ध किया जा सके। इससे उन सदस्यों को भी सुविधा रहेगी जो हिन्दी नहीं जानते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:34, 9 फ़रवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]]@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]]@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] @[[सदस्य:Hindustanilanguage|Hindustanilanguage]] मेरा अब भी सुझाव है कि चित्र हटा दिया जाय। हालाँकि, अभी जो आपत्ति दर्ज़ की गई है, उसपे इतना ही कहूँगा कि यह चित्र 'ज्ञानकोश' का हिस्सा नहीं है। स्वागत संदेश में इस तरह के चित्र पर आपत्ति उचित नहीं प्रतीत हो रही। ::::संजीव जी जैसा कह रहे, पूरे स्वागत संदेश को पुनर्विचार एवं नये सिरे से बनाने की ज़रूरत है - लंबा काम है - मुझे कोई गुरेज़ नहीं इसमें भागीदारी करने में। ::::पर यह चित्र हटाने वाली बात चर्चा के योग्य भी नहीं। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 10:49, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, एक महिला को हर किसी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े किया जाना महिलाओं के आत्मसम्मान के लिहाज से कहीं न कहीं गरिमापूर्ण प्रतीत नही हो रहा है। इसलिए भी इस चित्र को हटा देना या किसी उपयुक्त चित्र से बदल देना चाहिए। बहुत से ज्ञानकोषों में बिस्किट का प्रयोग किया जाता है क्योंकि संपादन के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, जो बिस्किट से मिलती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 08:23, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी के विचारों से सहमत होते हुए कि स्वागत संदेश को नए सिरे से बनाने की आवश्यकता है, और @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी की आपत्तियों (एआई और गरिमा) को ध्यान में रखते हुए, मेरा सुझाव है कि हम विवादित चित्र के स्थान पर प्राकृतिक फूलों के चित्र का उपयोग किया जाएं। फूल स्वागत का एक गरिमापूर्ण, मानवीय और तटस्थ प्रतीक हैं। ::::::मैंने विकिमीडिया कॉमन्स से कुछ प्राकृतिक और सुंदर चित्रों का चयन किया है। कृपया नीचे दी गई गैलरी में देखकर बताएँ कि इनमें से कौन सा चित्र नए स्वागत संदेश के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा? ::::::File:Lotus 2013 sai.jpg|कमल '''यह चित्र मैने @[[सदस्य:SM7|SM7]] के सदस्य पृष्ठ पर देखा''' ::::::File:Red rose at Square of the Cathedral of Christ the Saviour.jpg|लाल गुलाब ::::::File:Combretum indicum(Rangoon creeper).jpg|मधुमालती (रंगून क्रीपर) '''यह मैने ही अपलोड किया''' ::::::File:(MHNT) Jasminum polyanthum – flowers and buds.jpg|चमेली ::::::File:Marigold 14.jpg|गेंदा ::::::File:Flower bouquet in Tarnowskie Góry, Silesian Voivodeship, Poland, December 2023.jpg|पुष्प गुच्छ ::::::File:Rose and carnation flower bouquet 01.jpg|गुलाब और कार्नेशन ::::::आप सभी वरिष्ठ साथियों की राय का स्वागत है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 14:09, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] जी, फूल लगवाने का कोई विशेष औचित्य? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:38, 9 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, महोदय :::::::: फूल लगवाने का मुख्य औचित्य केवल एक तटस्थ, विवाद-रहित और मानवीय स्वागत-प्रतीक प्रस्तुत करना है। ::::::::महोदय, भारत में फूलों से स्वागत करना सबसे आत्मीय और सहज माना जाता है। ::::::::प्राकृतिक फूल होने के कारण यह AI और गरिमा से जुड़े उन सभी विवादों से पूरी तरह मुक्त है, जो वर्तमान चित्र को लेकर उठे हैं। ::::::::मेरा उद्देश्य सिर्फ एक सकारात्मक चित्र लगाना है। यदि समुदाय को फूल के स्थान पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी का 'बिस्किट' वाला सुझाव या विकिपीडिया का लोगो अधिक उपयुक्त लगता है, तो मेरी उसमें भी पूर्ण सहमति है। प्रमुख उद्देश्य स्वागत संदेश को बेहतर बनाना है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 16:47, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::::भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। फूलों से स्वागत देवताओं का किया जाता है और आजकल लोगों ने चाटुकारिता के लिए इसे मनुष्यों पर लागू करना आरम्भ कर दिया है। चित्रों में प्राकृतिक फूल कैसे हो सकते हैं? वर्तमान चित्र को लेकर मैंने कोई विवाद नहीं देखा, बल्कि चित्र को हटाकर संबंधित सन्देश को पुनः लिखने पर यह चर्चा है। वर्तमान चित्र में क्या नकारात्मक दिखाई दे रहा है? क्या वो भारतीय संस्कृति से संबंधित नहीं है? (हालांकि ऐसा आवश्यक नहीं है)। अभी चर्चा इसपर चाहिए कि चित्र की आवश्यकता ही क्या है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:43, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी,महोदय ::::::::::मेरा उद्देश्य केवल उठे हुए विवाद के बीच एक विकल्प देना था। लेकिन मैं आपसे और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि असली मुद्दा यह है कि स्वागत सन्देश में किसी भी चित्र की आवश्यकता है ही नहीं। पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] महोदय ने बिस्किट के चित्र का उदाहरण दिया था, जिसके लिए मैं पुष्पों का विकल्प दिया था| ::::::::::मेरी ओर से चित्र वाले विषय पर चर्चा यहीं समाप्त है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:59, 12 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::सभी सदस्यो से विनम्र निवेदन है, की कृपया इस [[:File:AI Chatgpt generated Woman in Welcome pose.png|चित्र]] देखने का कष्ट करे, इसको स्वागत सन्देश में लगने के लिए उपयुक्त हो सकता है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:06, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::::@[[सदस्य:Cptabhiimanyuseven|Cptabhiimanyuseven]] जी, चित्र को हटाने पर चर्चा चल रही है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:35, 14 मार्च 2026 (UTC). :::::::::::::::{{Ping|संजीव कुमार}} जी, नमस्ते! चित्र को उपयोग में लिया जा चुका है,पहले चित्र उपयोग में न होने के कारण हटाने हेतु चर्चा के लिए नामांकित किया गया है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:50, 14 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::{{ping|संजीव कुमार}}, आपकी बात सही है कि भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। परंतु, क्योंकि आप और यहां के अधिकतर प्रबंधक पुरुष हैं, और स्वागत करते हुए व्यक्ति का ही चित्र लगाना है तो उचित होगा कि किसी पुरुष का हाथ जोड़कर स्वागत करता हुआ चित्र लगाया जाए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:28, 20 मार्च 2026 (UTC) :{{od}} वर्तमान चर्चा के आधार पर चित्र हटा दिया गया है। भविष्य में चर्चा करके एक उपयुक्त चित्र जोड़ा जा सकता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:51, 18 मार्च 2026 (UTC) == Feminism and Folklore 2026 starts soon == <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;"> [[File:Feminism and Folklore 2026 logo.svg|centre|550px|frameless]] ::<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> ;Invitation to Organize Feminism and Folklore 2026 Dear Wiki Community, We are pleased to invite Wikimedia communities, affiliates, and independent contributors to organize the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026]]''' writing competition on your local Wikipedia. The international campaign will run from '''1 February to 31 March 2026''' and aims to improve coverage of feminism, women’s histories, gender-related topics, and folk culture across Wikipedia projects. ;About the Campaign '''Feminism and Folklore''' is a global writing initiative that complements the '''[[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2026|Wiki Loves Folklore]]''' photography competition. While Wiki Loves Folklore focuses on visual documentation, this writing campaign addresses the '''gender gap on Wikipedia''' by improving encyclopedic content related to folk culture and marginalized voices. ;What Can Participants Write About? Communities can contribute by creating, expanding, or translating articles related to: * Folk festivals, rituals, and celebrations * Folk dances, music, and traditional performances * Women and queer figures in folklore * Women in mythology and oral traditions * Women warriors, witches, and witch-hunting narratives * Fairy tales, folk stories, and legends * Folk games, sports, and cultural practices Participants may work from curated article lists or generate new article suggestions using campaign tools. ;How to Sign Up as an Organizer Organizers are requested to complete the following steps to register their community: # Create a local project page on your wiki [[:m:Feminism and Folklore/Sample|(see sample)]] # Set up the campaign using the '''CampWiz''' tool # Prepare a local article list and clearly mention: #* Campaign timeline #* Local and international prizes # Request a site notice from local administrators [[:mr:Template:SN-FNF|(see sample)]] # Add your local project page and CampWiz link to the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta project page]]''' ;Campaign Tools The Wiki Loves Folklore Tech Team has introduced tools to support organizers and participants: * '''Article List Generator by Topic''' – Helps identify articles available on English Wikipedia but missing in your local language Wikipedia. The tool allows customized filters and provides downloadable article lists in CSV and wikitable formats. * '''CampWiz''' – Enables communities to manage writing campaigns effectively, including jury-based evaluation. This will be the third year CampWiz is officially used for Feminism and Folklore. Both tools are now available for use in the campaign. '''[https://tools.wikilovesfolklore.org/ Click here to access the tools]''' ;Learn More & Get Support For detailed information about rules, timelines, and prizes, please visit the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 project page]]'''. If you have any questions or need assistance, feel free to reach out via: * '''[[:m:Talk:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta talk page]]''' * Email us using details on the contact page. ;Join Us We look forward to your collaboration and coordination in making Feminism and Folklore 2026 a meaningful and impactful campaign for closing gender gaps and enriching folk culture content on Wikipedia. Thank you and best wishes, '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 International Team]]''' ---- ''Stay connected:'' [[File:B&W Facebook icon.png|link=https://www.facebook.com/feminismandfolklore/|30x30px]]&nbsp; [[File:B&W Twitter icon.png|link=https://twitter.com/wikifolklore|30x30px]] </div></div> == Invitation to Host Wiki Loves Folklore 2026 in Your Country == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> [[File:Wiki Loves Folklore Logo.svg|right|150px|frameless]] Hello everyone, We are delighted to invite Wikimedia affiliates, user groups, and community organizations worldwide to participate in '''Wiki Loves Folklore 2026''', an international initiative dedicated to documenting and celebrating folk culture across the globe. ;About Wiki Loves Folklore '''Wiki Loves Folklore''' is an annual international photography competition hosted on Wikimedia Commons. The campaign runs from '''1 February to 31 March 2026''' and encourages photographers, cultural enthusiasts, and community members to contribute photographs that highlight: * Folk traditions and rituals * Cultural festivals and celebrations * Traditional attire and crafts * Performing arts, music, and dance * Everyday practices rooted in folk heritage Through this campaign, we aim to preserve and promote diverse folk cultures and make them freely accessible to the world. [[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026|Project page on Wikimedia Commons]] ; Host a Local Edition As we celebrate the '''eight edition''' of Wiki Loves Folklore, we warmly invite communities to organize a local edition in their country or region. Hosting a local campaign is a great opportunity to: * Increase visibility of your region’s folk culture * Engage new contributors in your community * Enrich Wikimedia Commons with high-quality cultural content '''[[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026/Organize|Sign up to organize]]:''' If your team prefers to organize the competition in ''either February or March only'', please feel free to let us know. If you are unable to organize, we encourage you to share this opportunity with other interested groups or organizations in your region. ;Get in Touch If you have any questions, need support, or would like to explore collaboration opportunities, please feel free to contact us via: * The project Talk pages * Email: '''support@wikilovesfolklore.org''' We are also happy to connect via an online meeting if your team would like to discuss planning or coordination in more detail. Warm regards, '''The Wiki Loves Folklore International Team''' </div> [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 13:21, 18 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikipedia&oldid=29228188 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Tiven2240@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा == <section begin="announcement-content" /> मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा की अवधि शुरू हो चुकी है। आप 9 फरवरी 2026 तक बदलावों के सुझाव दे सकते हैं। यह वार्षिक समीक्षा के कई चरणों का पहला चरण है। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Annual review/2026|मेटा के UCoC पृष्ठ पर अधिक जानकारी पाएँ और जुड़ने के लिए वार्तालाप खोजें]]। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee|सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति]] (U4C) एक वैश्विक समिति है जो UCoC का साम्यिक और सुसंगत कार्यान्वयन करने को समर्पित है। यह वार्षिक समीक्षा U4C द्वारा योजित और लागू की गई है। अधिक जानकारी तथा U4C की ज़िम्मेदारियों के लिए [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee/Charter|आप U4C चार्टर की जाँच कर सकते हैं]]। कृपया जहाँ भी उचित हो, अपने समुदाय के दूसरे सदस्यों के साथ यह जानकारी साझा करें। -- U4C के साथ समन्वय में, [[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|वार्ता]])<section end="announcement-content" /> 21:01, 19 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=29905753 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकि सम्मेलन 2026 समुदाय सहभागिता सर्वे == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप इस वर्ष जुलाई में हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इससे संबंधित हिंदी विकिपीडियनों की रुचि तथा महत्वपूर्ण विषयों को समझने के लिए एक सर्वेक्षण किया जा रहा है। [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeWaqfyOlr9hS7Ef5eXg_Y4mPK8gj1cnzaIBAbQXbjM6KH4aw/viewform हिंदी विकि सम्मेलन 2026] भरकर हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने में सहयोगी बनें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 09:07, 31 जनवरी 2026 (UTC) [[सदस्य:Vishal K Pandey|Vishal K Pandey]] ([[सदस्य वार्ता:Vishal K Pandey|वार्ता]]) 18:11, 26 जनवरी 2026 (UTC) ==गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड== विकिडेटा में गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का लोगो Guinness World Records logo.svg नाम से उपलब्ध है। इसका हिन्दी में उपयोग करना संभव बनाएं। अधिकार संपन्न लोग ऐसा कर सकते हैं। '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:28, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:00, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::समस्या सुलझाने के लिए आपका धन्यवाद - '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) LimcaBookofRecords.jpg इस फाइल के बारे में भी विचार करें। धन्यवाद '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:35, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:02, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::आपको धन्यवाद- '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) == शीर्षक परिवर्तन के लिए अनुरोध == Namaste, I would like the article title '''[[डी एन ए की नकल]]''' to be changed to '''डीएनए प्रतिकृति''', as this form is more accurate and is the one used in most scientific literature. Sorry for writing in English and if this is not the right place to make the request. I have been on a long break from Wikipedia and have forgotten the proper procedure for requesting a title change.<b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 15:32, 3 फ़रवरी 2026 (UTC) :नमस्ते, मैं चाहता हूँ कि लेख का शीर्षक [[डी एन ए की नकल]] बदलकर 'डीएनए प्रतिकृति' कर दिया जाए, क्योंकि यह रूप ज़्यादा सही है और ज़्यादातर वैज्ञानिक किताबों में इसी का इस्तेमाल होता है।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 18:54, 5 फ़रवरी 2026 (UTC) == ''कंप्यूटिंग'' या ''अभिकलन'' == हिन्दी में कंप्यूटिंग को [[अभिकलन]] भी कहा जाता है। परंतु इसके बाद भी कुछ पृष्ठ के नाम [[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] या [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] है। प्रोग्रामिंग को [[क्रमानुदेशन]] कहा जाता है परंतु आधे से ज्यादा निबंध के शीर्षक में [[प्रोग्रामिंग भाषा]] लिखा गया है। हमें निबंध के शीर्षक एक समान रखने चाहिए। जैसे सारे निबंध के शीर्षक में प्रोगामिंग के जगह क्रमानुदेशन लिखा रहेगा। अन्य नाम हम निबंध के मुख्य भाग में लिख सकते है या redirect कर सकते है। जैसे- '''क्रमानुदेशन भाषा''', जिसे '''प्रोग्रामिंग भाषा''' भी कहते है..... [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 11:16, 7 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, नमस्ते! आप एक समाधान प्रस्तावित करें - उसपे चर्चा करके यह कार्य किया जा सकता है। आपका और सभी का स्वागत है इस एकरूपता लाने के प्रयास के लिए। सादर! --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:03, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) ::[[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] का नाम बदलकर [[मोबाइल अभिकलन]] कर देना चाहिए। [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] का [[क्लाउड अभिकलन]] तथा [[प्रोग्रामिंग भाषा]] का नाम [[क्रमानुदेशन भाषा]] कर देना चाहिए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:40, 8 मार्च 2026 (UTC) == हिन्दी विकिपीडिया से गायब हो चुके पुराने संपादक == तकरीबन 8 साल बाद मैं विगत कुछ दिनों से विकिपीडिया पर सक्रिय हूं। इस बीच देख रहा हूं कि यहां से वो तमाम लोग गायब हो चुके हैं जो एक समय में लगातार सक्रिय रहते थे। नए लेखों की गुणवत्ता स्तरीय थी। लेकिन इधर हिन्दी विकिपीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो या तो आत्मप्रचार है या फिर नौसिखियों द्वारा लगातार किया जा रहा प्रयोग। आज मैंने लगभग 25 लोगों को अपनी ओर से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की जो एक जमाने में प्रबंधक रह चुके हैं और जिन्होंने विकिपीडिया पर काफी योगदान दिया है। लेकिन सबने यही कहा कि वो अब सक्रिय नहीं हैं। यह हिन्दी विकिपीडिया के लिए ठीक नहीं है। यद्यपि कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में विकिपीडिया और खासतौर पर अंग्रेजी से इतर भाषाओं में इस ज्ञानकोश की अब पहले जैसी आवश्यकता रह नहीं गई है। क्योंकि अब अंग्रेजी की सामग्री एक क्लिक पर किसी भी दूसरी भाषा में उपलब्ध है। फिर भी हिन्दी में लिखे गए मूल लेखों का महत्व तो हमेशा बना रहेगा। इसलिए विकिपीडिया संपादक समुदाय को एक बार फिर अपना तुच्छ अहंकार छोड़कर दूर जा चुके लोगों को दोबारा सक्रिय करना चाहिए। --'''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 13:54, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:कलमकार|कलमकार]] सर ! आठ साल (हुये तो नहीं!) बाद आप का स्वागत - हमारी ओर से। :कुछ उधार का अर्ज़ कर रहा (बुरा मत मानियेगा) :''"ऐसा नहीं कि उन से ''(मतलब विकि से)'' मोहब्बत नहीं रही :''जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही'' :'' :''सर में वो इंतिज़ार का सौदा नहीं रहा'' :''दिल पर वो धड़कनों की हुकूमत नहीं रही''"'' :यह हमारी स्थिति है। :और जो चले गए उनकी स्थिति यह है कि :''चेहरे को झुर्रियों ने भयानक बना दिया'' :''आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही'' --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:00, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :कलमकार जी, ज्ञानकोष में सक्रियता के प्रति आपकी चिंता वाजिब है। मैंने यहां पर देखा है कि बहुत से सदस्यों द्वारा महनत से बनाए गए पृष्ठ कोई न कोई पैमाना बताकर शीघ्र हटाने के लिए नामांकित कर दिए जाते हैं, फिर कोई अन्य सदस्य उन्हें हटा भी देता है। शायद इससे हताश होकर बहुत से संपादक ज्ञानकोष को छोड़कर चले गए। बहुत से संपादकों के तो सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए हैं। सम्पादकों की सक्रियता में कमी की एक वजह यह भी हो सकती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:21, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, क्या आप कुछ ऐसे सदस्य पृष्ठों के उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें हटाया गया था, और कुछ ऐसे पृष्ठ भी जिन्हें किसी गलत मानदंड के तहत शीघ्र हटाने के लिए नामांकित किया गया और बाद में हटा दिया गया? यदि आपकी चिंता जायज़ होगी, तो अवश्य ही कोई समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:54, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) :::DreamRimmer जी, हाल ही के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, जहां प्रतीत होता है कि संपादकों द्वारा शिद्दत से बनाए गए कुछ पृष्ठों को हटा दिया गया: :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#why are you remove this article "सुमरत सिंह"]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#कृपया गोप्रेक्षेश्वर लेख की पुनः समीक्षा करें और कॉपीराइट उल्लंघन का टैग हटाने की कृपा करें]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#सहायता नोट]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#डॉ. विनोद कुमार पृष्ठ: शीघ्र हटाने नामांकन पर प्रतिक्रिया]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#अभिनव अरोड़ा के पृष्ठ हटाने के विषय में]] :::हटाए गए पृष्ठों की सामग्री देखे बगैर मापदंड की सटीकता पर टिप्पणी करना संभव नही है परंतु बहुत से ऐसे पृष्ठ भी हटाए गए हैं, जहां संपादक लेख में संशोधन करने के लिए तैयार थे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 07:56, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपको प्रचार सामग्री चाहिए या केवल विवाद खड़ा करना उद्देश्य रहा है? यदि आपको प्रचार सामग्री चाहिए तो बताइयेगा, ईमेल से भेज देता हूँ। बैठकर देखते और समझते रहियेगा। अन्यथा आपने मेरा वार्ता पृष्ठ यहाँ क्यों जोड़ा है पता नहीं। मैंने सभी सन्देशों का उत्तर भी दे रखा है। वर्तमान में भी [[विकिपीडिया:शीह|शीघ्र हटाने]] के लिए बहुत लेख नामांकित हैं। कृपया उनकी भी समीक्षा कर लेते समय रहते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:40, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने ऊपर जिन चर्चाओं का उल्लेख किया है, उनसे संबंधित लेख मुझे किसी भी प्रकार से गलत मानदंड के अंतर्गत हटाए गए नहीं लगते। उन विषयों की उल्लेखनीयता और उपलब्ध सामग्री के आधार पर संजीव जी द्वारा लिया गया निर्णय बिल्कुल उचित था, और ऐसी स्थिति में मेरा निर्णय भी यही होता। आपने यह भी कहा कि ऐसे पृष्ठ हटाए गए जहाँ संपादक लेख में सुधार करने के लिए तैयार थे, परंतु सभी जानते हैं कि कोई अनुल्लेखनीय लेख केवल बार-बार संपादन या सुधार करने से उल्लेखनीय नहीं बन जाता। किसी विषय की उल्लेखनीयता तभी स्थापित होती है जब उसे विश्वसनीय स्रोतों में पर्याप्त स्थान मिले, और इसमें स्वाभाविक रूप से समय लगता है। शीघ्र हटाने की नीति इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है; यदि किसी लेख पर सही मानदंड के अनुसार टैग लगाया गया है, तो प्रबंधक उसे किसी भी समय हटा सकता है। यदि लेखक कोई टिप्पणी जोड़ता है, तो भी प्रबंधक उस टिप्पणी से संतुष्ट न होने पर लेख को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं होता। आपने यह भी कहा था कि सदस्यों के सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए, लेकिन इसके समर्थन में आपने कोई लिंक प्रस्तुत नहीं किया। मेरा मानना है कि किसी भी सदस्य के कार्य पर प्रश्न तभी उठाया जाना चाहिए जब पर्याप्त प्रमाण हों; अन्यथा यह बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आक्षेप और निराधार आरोप की श्रेणी में आता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:20, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, जो आपकी नज़र में प्रचार हो, वह संभवतः दूसरों के लिए जानकारी हो सकती है। :::::DreamRimmer जी, ऐसे भी बहुत से पृष्ठ देखें हैं, जहां अनेक विश्वसनीय स्रोत दिए गए थे, उन्हें भी अनुल्लेखनिय बता कर हटाया गया। उदाहरण के लिए: :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#सुमन कुमार घई]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/अप्रैल 2022#रचित यादव]]। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:41, 20 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, समस्या यह ही है कि आप इसे मेरे या आपके नज़र से देख रहे हो। एकबार नज़र हटाकर देखियेगा। "सुमन कुमार घई" नामक लेख पर 15 वर्षों से बिना स्रोत की कुछ सामग्री लिखी थी और बाद में [[विशेष:योगदान/सुमन कुमार घई|इसी नाम के सदस्य]] ने सामग्री हटाकर साहित्य कुंज की कड़ी जोड़ दी। इसी तरह अन्य लेखों को भी या तो सम्बंधित व्यक्ति ने स्वयं (आपके अनुसार उनकी नज़रों में वो स्वयं बहुत उल्लेखनीय व्यक्ति हैं) ने बनाया या अपने किसी रिश्तेदार से बनवाया। यदि आप बिना किसी स्रोत के स्वयं को उल्लेखनीय मानने लग जाओ तो क्या वो उल्लेखनीय हो जायेगा? एकबार इंटरनेट पर उपरोक्त व्यक्तियों के बारे में खोजकर देखें कि इनकी उल्लेखनीयता क्या है? उनके प्रसिद्धि के क्षेत्र में उन्हें कौनसे पुरस्कार मिले हैं? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:26, 25 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य: संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, उल्लेखनीयता का मापदंड इसलिए बनाया गया था, कि यदि एक ही विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक दावेदार आ जाते हैं, तो इस नाम से उस विषय या व्यक्ति का लेख बनेगा जो अधिक उल्लेखनीय होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि विकिपीडिया के संदर्भ में एक phrase कई बार सामने आता है, जिसमें लिखा होता है, "sum of all knowledge""। कहने का तात्पर्य यह है कि उल्लेखनीयता के नाम पर तब तक कोई पृष्ठ नही हटाना चाहिए, जब तक उस विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक असंबंधित संभावनाएं न हों। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 'रमेश सिंह' के नाम से उद्धरण सहित लेख बना रहा है तो वह लेख रहने देना चाहिए, जब तक कि कोई उससे भी अधिक उल्लेखनीय 'रमेश सिंह' नाम के व्यक्ति पर उद्धरण सहित लेख बनाने का दावेदार नहीं आ जाता। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, बहुत अच्छा अर्थ निकाला है आपने। साथ में अपने तर्क के पक्ष में कोई स्रोत भी दे दीजियेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:39, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, [[:en:Wikipedia:Notability]] की भूमिका में लिखा है - ''Information on Wikipedia must be'' '''verifiable'''''... Wikipedia's'' '''concept of notability applies this basic standard''' ''to avoid indiscriminate inclusion of topics... Determining notability does not necessarily depend on things such as fame, importance, or popularity''. -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:53, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने इसके नीचे वाला भाग क्यों नहीं पढ़ा? यद्यपि वो उस विषय की स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं जो नीचे बताए गए दिशानिर्देशों को पूरा करता हो। इसके बाद विस्तार से बहुत कुछ लिखा हुआ है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:04, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::उसके नीचे भी पढ़ा है, वहां लिखा है कि यदि कोई सामग्री एक नया लेख बनाने के लिए उल्लेखनीय नहीं है, तो उस सामग्री को किसी अन्य संबंधित पृष्ठ में विलय कर देना चाहिए। यह सही भी है यदि वह सामग्री स्रोत/संदर्भ युक्त है तो। ऐसा भी देखा गया है कि राष्ट्रपति इत्यादि से अनेक उल्लेखनीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति पर बना लेख उल्लेखनीयता के नाम पर हटा दिया गया परन्तु उसमें दर्ज संदर्भित सामग्री कहीं और संजोई नहीं गई, न ही लेखक को उसे दर्ज करने के लिए किसी अन्य पृष्ठ की ओर निर्देशित किया गया। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:16, 31 मार्च 2026 (UTC) {{od|10}}@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से व्यक्ति उल्लेखनीय कैसे हो गया? विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में [[दीक्षान्त समारोह]] के समय डिग्री वितरण राष्ट्रपति या राज्यपाल के हाथों से करवाया जाता है। आपके अनुसार वो सभी लोग उल्लेखनीय हो गये? सम्बंधित लोगों के नामों की सूची सम्बंधित संस्थान के आधिकारिक जालस्थल पर मिल जायेगा जिसे आप विश्वसनीय स्रोत कह सकते हो। राष्ट्रपति के हाथों से मिला पुरस्कार इतना उल्लेखनीय होना चाहिए जो सम्बंधित व्यक्ति को किसी विशिष्ट कार्य के लिए मिला हो और उस कार्य के कारण व्यक्ति उल्लेखनीय हुआ हो, तो उसे उल्लेखनीय माना जाता है, न कि केवल राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार प्राप्त करने से। ऐसे समारोह राष्ट्रपति भवन में हमेशा होते हैं और उनके समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छपते हैं।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:08, 1 अप्रैल 2026 (UTC) : उदाहरण के लिए, क्या इस ([[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]) पृष्ठ को हटाते समय, इसमें उपलब्ध संदर्भित जानकारी किसी अन्य पृष्ठ पर स्थानांतरित की गई? -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 01:49, 3 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा == नमस्ते, मैं हिंदी विकिपीडिया पर लॉग-इन हूँ। मेरा खाता पुराना है और मैंने कई संपादन भी किए हैं, फिर भी मुझे किसी भी लेख में “स्थानांतरण (Move)” का विकल्प दिखाई नहीं दे रहा। मैंने डेस्कटॉप मोड और अलग ब्राउज़र से भी कोशिश की है। कृपया बताएं कि यह समस्या क्यों आ रही है और इसका समाधान क्या है। धन्यवाद। {{unsigned|ROLEXMEENA}} : अंग्रेजी ज्ञानकोष की तरह यहां भी 'Move' (पृष्ठ स्थानांतरण) का विकल्प होना चाहिए, ताकि संपादक अपने सदस्य स्थान में पृष्ठ बनाकर उसे मुख्य नाम स्थान में स्वयं स्थापित कर सकें। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:27, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) =="अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026" में भाग लें == हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप द्वारा [[अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर विकिपीडिया एवं विकिस्रोत पर संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। # [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—15 फ़रवरी 2026 से 21 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव। # [[s:विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—21 फ़रवरी 2026 से 28 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन गुणवत्ता संवर्द्धन प्रतियोगिता। :इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 04:34, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) == प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन == मैंने [[विकिपीडिया:प्रबन्धन अधिकार हेतु निवेदन#DreamRimmer|यहाँ]] प्रबंधक व अन्तरफलक प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन किया है। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 17:11, 15 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधन अधिकार मिलने पर बहुत बधाई। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:33, 8 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक कैसे बदले == महोदय मुझे बताए कि शीर्षक बीजाणुउद्भिद को कैसे बदलकर बीजाणुद्भिद करे हृदय से धन्यवाद [[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] ([[सदस्य वार्ता:VIKRAM PRATAP7|वार्ता]]) 04:39, 18 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधकों को [[#हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा|कहा था]] कि 'पेज मूव' का ऑप्शन सभी के लिए चालू कर दिया जाए, परंतु अभी तक नहीं किया गया है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:31, 8 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, यह अधिकार प्रबन्धकों के पास नहीं है। बाकी आप तर्क एवं स्रोत के साथ लिखेंगे तो स्थानान्तरण कर दिया जाता है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:42, 18 मार्च 2026 (UTC) :::परंतु यह विकल्प अंग्रेजी ज्ञानकोष पर कैसे उपलब्ध हुआ!? [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:45, 20 मार्च 2026 (UTC) == Reference Previews – experiment == Hi, I’m Johannes from [[m:WMDE Technical Wishes|WMDE Technical Wishes]]. Sorry for writing in English, please support us by providing a translation! Our team is currently working on [[:m:WMDE Technical Wishes/References|improvements to references]], e.g. [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|Sub-referencing]]. In 2021 we developed [[:m:WMDE Technical Wishes/ReferencePreviews|Reference Previews]] in order to provide a MediaWiki feature to preview references when hovering over the footnote marker. Over the course of our current work we’ve noticed that using Reference Previews doesn’t seem to be intuitive for some readers and we would like to improve this. <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Problem === <div class="mw-collapsible-content"> In our usability tests, we repeatedly notice desktop readers – unaware of Reference Previews or how to use the feature – clicking on footnotes instead of hovering over them. Many are confused when they end up in the reference list and don’t know how to jump back to the text passage they were previously reading. Many readers seem unaware that both the ↑ arrow in the reference list and the <sup>a b</sup> (for re-used references) can be used to jump back. This makes jumping to the reference list rather unpleasant, especially in long articles. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Assumption === <div class="mw-collapsible-content"> We assume that most readers do not want to jump to the reference list, but rather want to click on the footnote to open Reference Previews, which provide them with the reference information for the text passage they have just read. At the same time, we believe that some readers – e.g. those who want to delve deeper into a topic rather than just quickly researching a piece of information – are still interested in conveniently accessing the reference list. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Idea === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to try adjustments to Reference Previews in order to best meet the needs of different readers. Specifically, we want to prevent readers from accidentally ending up in the individual reference list; jumping there should be a conscious decision. When clicking on a footnote marker, we want to display Reference Previews instead of jumping to the reference list. The pop-up remains permanently visible until clicking on the "x" or anywhere outside the preview to close it. In addition Reference Previews will provide a link to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – current version.png|Reference Previews – current version File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed version when '''clicking on a footnote marker''' </gallery> When hovering over a footnote marker without clicking on it, we want to display a simplified version of Reference Previews – without the settings icon and the resulting empty space. When moving the mouse pointer over the pop-up, a note will appear indicating that you can click for further options. This will open the persistent version of Reference Previews with a link to allow users to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – hover-state.png|Proposed version when '''hovering over the footnote marker''' File:Reference Previews mock-up – hover-state and options.png|Proposed version when '''hovering over the Reference Preview''' File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed (persistent) version when '''clicking on the hover preview''' </gallery> By improving the usability of Reference Previews, we also hope to mitigate the issue that reference lists with a large number of (reused) references (or [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|sub-references]]) can be confusing for some readers. In addition, the proposed version when hovering over a footnote marker is more compact than the current version. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Experiment === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to test the proposed changes in an [[:en:A/B testing|A/B test]] on several wikis. We want to measure how many readers click on a footnote marker and then proceed to jump to the reference list using the proposed version of Reference Previews compared to readers who receive the current version of Reference Previews. In addition, we will measure how many readers in both groups access the reference list via the table of contents. This will give us data-based insights into how many clicks on the footnote unintentionally open the reference list and how many readers only want to use Reference Previews. We would like to run our experiment on the following Wikipedia language versions: de, pl, fr, sv, fa, hu, hi, my, tl, lv, fy, hr. 10% of readers will see our modified version of Reference Previews in order to obtain sufficient data. The experiment is expected to run for 1-2 weeks at the end of March. We'll restore the current version of Reference Previews for all readers until we have evaluated the experiment, discussed the results with the community, and decided on further steps. </div> </div> We look forward to your feedback [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/Reference Previews|on our talk page]] – or just reply to this post! Once the experiment is ready to go, we will also provide a link that you can use to test the changes yourself. --[[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 12:22, 20 फ़रवरी 2026 (UTC) :As indicated on our project page [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=WMDE_Technical_Wishes/References/Reference_Previews&diff=prev&oldid=30215686], we will only test the proposed change when ''clicking'' on a footnote. Reference Previews will remain ''unchanged when hovering'' over a footnote marker. Reasons for this were concerns that the proposed transition from hover to persistent preview could be disruptive or at least feel unusual when interacting with reference content in the hover preview (e.g. when clicking on links). [[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 13:30, 9 मार्च 2026 (UTC) ==विकि लव्ज़ रमजान 2026== <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;> [[File:Wiki Loves Ramadan Logo Black hi.svg|Left|200px|frameless]] प्रिय विकी समुदाय, आपको [[विकिपीडिया:विकि लव्ज़ रमजान 2026|विकी लव्ज रमज़ान 2026]] में भाग लेने के लिए विनम्रतापूर्वक आमंत्रित किया जाता है, जो कि विभिन्न क्षेत्रों से इस्लामी इतिहास और इस्लामी सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने के लिए विकिपीडिया, विकिवॉयज पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय लेख लेखन प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता 20 फरवरी से 20 अप्रैल 2025 तक आयोजित की जायेगी अभी भाग लें और पुरस्कार के विजेता बने है। धन्यवाद '''[[:m:Wiki Loves Ramadan 2026|विकी लव्स रमज़ान 2026 इंटरनेशनल टीम]]''' -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 15:51, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) </div> == इस हफ्ते पेस्ट जाँच आ रही है == नमस्ते। [[mw:Special:MyLanguage/Help:Edit check#Paste_check|पेस्ट जाँच]] एक प्रकार की [[mw:Special:MyLanguage/Edit check|सम्पादन जाँच]] सुविधा है जो तब दिखाई देगी जब यथादृश्य सम्पादिका का प्रयोग कर रहा कोई नवागंतुक किसी लेख में लंबा पाठ पेस्ट करे, अगर प्रणाली द्वारा यह निर्धारित किया जाए कि वह सामग्री सम्पादक ने संभवतः स्वयं नहीं लिखी है। इस सुविधा का यहाँ पर पिछले वर्ष परीक्षण किया गया था, और शोध के [[mw:Edit check/Paste Check#A/B_Experiment|परिणाम]] सकारात्मक थे: इस जाँच का सामना करने वाले सम्पादकों के द्वारा किए गए सम्पादनों में से पूर्ववत किए गए सम्पादनों की संख्या में नियंत्रण समूह की तुलना में 18% घटाव आया। डिफ़ॉल्ट से पेस्ट जाँच उन सम्पादकों को दिखाई जाएगी जिन्होंने लोकल रूप से 100 या उससे कम सम्पादन किए हुए हों। यह [[{{#special:EditChecks}}]] के माध्यम से प्रबंधकों द्वारा बदला जा सकता है। जब इस आवश्यकता को पूरा करने वाला कोई सम्पादक कहीं और से कम-से-कम 50 कैरेक्टर्स लंबा पाठ पेस्ट करता है, पेस्ट जाँच उससे पूछेगी कि सामग्री उसने स्वयं लिखी है या फिर नहीं। [[mw:Special:MyLanguage/Edit check/Tags|सम्पादनों को टैग किया जाएगा]] ताकि अनुभवी सदस्य उन सम्पादनों का पता लगा पाएँ जहाँ पर पेस्ट जाँच दिखाई गई थी। अंतिम सम्पादन में कोई भी पेस्ट किया हुआ पाठ न होने के बावजूद भी टैग दृश्य होगा। यह सुविधा इस हफ्ते के अंत तक ग्लोबल स्तर पर जारी की जाएगी। इसे परखने में सहायता करने के लिए आप सबका धन्यवाद। [[सदस्य:Quiddity (WMF)|Quiddity (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:Quiddity (WMF)|वार्ता]]) 00:02, 3 मार्च 2026 (UTC) == अली ख़ामेनेई == <nowiki>[[अली ख़ामेनेई]]</nowiki> को हिंदी में <nowiki>[[अली ख़मीने]]</nowiki> लिखा जाना चाहिए, कृपया इसे बदलिए। -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 13:28, 3 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, यह चर्चा [[वार्ता:अली ख़ामेनेई]] पृष्ठ पर होनी चाहिए। यदि आपको लगता है कि वर्तमान नाम सही नहीं है, तो आप [[साँचा:नाम बदले]] का प्रयोग करते हुए पृष्ठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकते हैं। मेरी व्यक्तिगत राय में वर्तमान नाम सही है, क्योंकि [https://www.bbc.com/hindi/articles/c747xp3pke8o BBC], [https://www.aajtak.in/trending/photo/iran-supreme-leader-ali-khamenei-death-reaction-celebration-mourning-tstf-2484137-2026-03-02 Aaj Tak], [https://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/bahraich-shia-community-ali-khamenei-death-mourning-ban-juloos-local18-10235065.html News18] और [https://ndtv.in/world-news/iran-us-tensions-live-updates-trump-ayotallah-khamenei-sanctions-military-buildup-explosions-nuclear-tensions-us-israel-iran-tension-live-11148367 NDTV] सहित कई मीडिया संस्थान भी “ख़ामेनेई” ही लिखते हैं और हिंदी उच्चारण के अनुसार भी यही नाम उचित प्रतीत होता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 13:49, 3 मार्च 2026 (UTC) ::: @[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, फ़ारसी में नाम علی خامنه‌ای लिखा जाता है। इसी आधार पर देवनागरी में इसका निकटतम लिप्यंतरण अली ख़ामेनेई होगा। ::: यहाँ خ ध्वनि के लिए “ख़” का प्रयोग किया जाता है और अंतिम –ई ध्वनि को दर्शाने के लिए “ई” आता है। इसलिए अली ख़ामेनेई फ़ारसी उच्चारण के सबसे क़रीब माना जा सकता है। --[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 01:29, 9 मार्च 2026 (UTC) == Lua त्रुटि == जी, जब भी में [[मॉड्यूल:Designation/list]] नामक पृष्ठ को बनाने का प्रयास करता हूँ, मुझे यह संदेश मिलता है: Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'. मैं अंग्रेज़ी विकिपीडिया के स्रोत कोड का प्रयोग करता हूँ, फिर भी यह संदेश आता है। क्या इसका कोई उपाय है? [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 10:14, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:16, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद ^^ [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 15:45, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] मैंने स्वतः परीक्षित अधिकार के लिए निवेदन भेजा है। यदि आप चाहते हैं तो कृपया अपना मत दें। फिर से धन्यवाद! :3 [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 16:26, 18 मार्च 2026 (UTC) :::समय-समय पर मेरा ध्यान आपके संपादनों पर जाता रहता है। हालाँकि मैंने आपके बनाए लेखों को ठीक से नहीं देखा है, लेकिन नामांकन में दिए गए लेखों में से [[रोलिन' (एयर रेड व्हीकल)]] देखा तो वह मुझे लगभग पूरा मशीनी अनुवाद लगा। इसी तरह दूसरे उदाहरण, जैसे [[तलत जाफ़री]] आदि, भी मुझे मशीनी अनुवाद जैसे लगे। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं इस विषय में आपकी कोई विशेष मदद कर पाऊँगा। बाकी अन्य सदस्य भी आपके नामांकन को देखकर अपने सुझाव दे सकते हैं। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:52, 20 मार्च 2026 (UTC) == सदस्य पृष्ठ हटाने हेतु अनुरोध == नमस्ते प्रशासक महोदय, मैं 'Gahininath gutte' इस खाते का स्वामी हूँ। मैं अपना 'सदस्य वार्ता' पृष्ठ (User Talk Page) हटाना चाहता हूँ क्योंकि यह गूगल सर्च में मेरी निजी जानकारी दिखा रहा है। मैंने लॉगिन किया है, लेकिन सुरक्षा फ़िल्टर के कारण मैं स्वयं <nowiki>{{db-u1}}</nowiki> टैग नहीं लगा पा रहा हूँ। कृपया मेरी सहायता करें और इस पृष्ठ को हटा दें। धन्यवाद। [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 12:40, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{Ping|Gahininath gutte}} नमस्ते! हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार तभी हटाए जाते है, ज़ब उसपे अत्यधिक बर्बरता या निजी जानकारी और गाली गालोच हुआ हो, आमतौर पर सदस्य वार्ता नही हटाए जाते है,अगर आप सदस्य पृष्ठ की बात कर रहे है, तो आप 10 सकारात्मक संपादन करने के उपरांत सदस्य पृष्ठ को हटवाने ले लिए अनुरोध कर सकते है,या हटाने हेतु संबंधित साँचा लगा सकते है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 12:52, 12 मार्च 2026 (UTC) ::<blockquote>महोदय, जवाब के लिए धन्यवाद। मैं समझता हूँ कि वार्ता पृष्ठ हटाना नियमों के विरुद्ध है। लेकिन यह पृष्ठ गूगल सर्च में मेरा नाम और निजी संदर्भ दिखा रहा है, जिससे मुझे प्राइवेसी की समस्या हो रही है। अगर आप इसे हटा नहीं सकते, तो कृपया इस पृष्ठ पर '''<nowiki>__NOINDEX__</nowiki>''' टैग लगा दें ताकि यह गूगल सर्च इंजन में दिखाई न दे। साथ ही, कृपया इस पृष्ठ की पुरानी सामग्री (History) को भी छुपा दें। आपकी बहुत कृपा होगी।"</blockquote> ::[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:03, 12 मार्च 2026 (UTC) ::"नमस्ते, मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद। मैं विकिपीडिया पर अब सक्रिय नहीं रहना चाहता और अपनी निजता (Privacy) की सुरक्षा के लिए 'Right to Vanish' के तहत इस पृष्ठ को स्थायी रूप से (Permanently) हटाने का अनुरोध करता हूँ। इसमें मेरा वास्तविक नाम शामिल है जो गूगल सर्च में दिखाई दे रहा है और यह मेरी निजता का उल्लंघन है। मैं चाहता हूँ कि मेरे खाते से जुड़ी यह पहचान पूरी तरह से मिटा दी जाए। कृपया मेरी सहायता करें।" [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:06, 12 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] जी, मैंने आपके वार्ता पृष्ठ का एक अवतरण हटा दिया है, जिसमें आपकी व्यक्तिगत जानकारी थी। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:56, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::अभि भी मेरा नाम गुगल सर्च मैं दिख रहा है मुझे Wikipedia पर रहना ही नहीं कृपया यहा पर मेरा जो अकाउंट है उसे हटा दे पुरी तरह सें... ::::धन्यवाद...! [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 15:14, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::इसके लिए आप [[विशेष:GlobalVanishRequest]] पर उपलब्ध फ़ॉर्म भर सकते हैं। कृपया अनुरोध करने से पहले फ़ॉर्म पर दिए गए निर्देशों को अवश्य पढ़ लें। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:19, 18 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == [[:en:Embarrasingly parallel]] का शीर्षक अनुवाद में क्या होना चाहिए- * [[एम्बैरसिंगली पैरेलल]] या * [[अति-समानांतरीय]] [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:13, 15 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, सम्भवतः आपके पास टाइपो हुआ है और आप [[:en:Embarrassingly_parallel|Embarrassingly parallel]] की बात कर रहे हो। parallel के लिए हिन्दी में समानांतर शब्द काम में लेते हैं और शब्दकोश नामक वेबसाइट पर इसका अनुवाद अव्यवस्थित समानांतर लिखा है। लेकिन मुझे तार्किक तौर पर कोई तुल्य शब्द याद नहीं आ रहा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:50, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, शब्दकोश नामक वेबसाइट पर एंबैरिसिंगली (Embarrassingly) का अनुवाद "शर्मनाक रूप से" लिखा है, लेकिन हम इसे कंप्यूटर विज्ञान या कोडिंग के संदर्भ में लिख रहे हैं तो क्या "सहज समानांतर" लिख सकते है? इसका मतलब यह है कि समानांतर करने में कोई विशेष दिमाग या मेहनत नहीं लगती। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 17:36, 19 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] जी, इस स्थिति में अंग्रेज़ी वाले का ही देवनागरी में उच्चारण लिख दीजिएगा। लेख की शुरूआत में शब्दशः अनुवाद लिख सकते हैं और भविष्य में विश्वसनीय स्रोत मिलने पर उचित स्थानान्तरण कर दिया जायेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:29, 25 मार्च 2026 (UTC) == Request for Comment: VisualEditor automatic reference names == <div lang="en" dir="ltr"> Hi, I’m Johannes from [[:m:Wikimedia Deutschland|Wikimedia Deutschland]]’s [[:m:WMDE Technical Wishes|Technical Wishes team]]. Apologies for writing in English. {{Int:Please-translate}}! We are considering to work on [[:m:Community Wishlist/W17|Community Wishlist/W17: Improve VE references' automatic names and reuse]]. This has been a long-term issue for wikitext editors (see e.g. [[:en:WP:VisualEditor/Named references]]) which has been among the top-voted wishes in several [[:m:Community Wishlist Survey|Community Wishlist Surveys]], e.g. [[:m:Community Wishlist Survey 2017/Editing/VisualEditor: Allow editing of auto-generated references before adding them|2017]], [[:m:Community Wishlist Survey 2019/Citations/VisualEditor: Allow references to be named|2019]], [[:m:Community Wishlist Survey 2022/Editing/VisualEditor should use human-like names for references|2022]] or [[:m:Community Wishlist Survey 2023/Editing/VisualEditor should use proper names for references|2023]]. We would like your input on the [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Proposed solutions|solutions]] proposed on our project page: '''[[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names]]'''. We are considering several options, which can be combined if desired by the community. * Changing the default pattern for automatically generated reference names (currently <code>":n"</code>, e.g. <code>":0"</code>, <code>":1"</code>...) to use the [[:mw:Help:Reference Previews#Exposed reference types|reference type]] instead (e.g. <code>"book_reference-1"</code>). * Providing a simple mechanism for communities to configure a different default name. * Generating automatic reference names based on the [[:en:domain name|domain name]] (if it’s a web citation). * Generating automatic reference names based on template parameters (e.g. "title" or "last"+"first") – defined by the community. === Feedback === [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names|Visit our project page]] to read about our proposal in detail and share your thoughts [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Request for comment|on metawiki]]. '''Please note''': We will only implement a solution if there’s clear consensus among the global community. Our intention is not to build the perfect solution, but to find a simple and lean one that alleviates the pain caused by auto generated names. We are aware that some experienced VisualEditor users might prefer an option to manually change reference names in VisualEditor, but such a UX intervention is difficult to achieve across reference types and thus out of scope for our team, we can only improve the auto-naming mechanism. We are happy about suggestions for improving certain details of the proposed solutions. Any other feedback and alternative proposals are also welcome – even though it’s out of scope for us, it might still be relevant for future work on this topic. Please support us interpreting consensus by clearly indicating your opinion (e.g. by using support/neutral/oppose templates). We are aware of [[:en:WP:NOTVOTE]], but given that we are facilitating this discussion with users from different wikis, potentially commenting in their native language, clearly indicating your position helps us avoid misunderstandings. Thank you for participating!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[User:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[User talk:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]])</bdi> 11:15, 19 मार्च 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johannes_Richter_(WMDE)/MassMessageRecipients&oldid=30281362 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johannes Richter (WMDE)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मार्च गतिविधि अपडेट == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ: * 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है। * गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया। * फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ। * आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में सामुदायिक बैठक निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं। : हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC) == अंगिका और मैथिली विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" मे भाग ले == नमस्ते , विकिपीडियन ‎[https://anp.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_आरू_लोकगाथा_अंगिका_२०२६ अंगिका] और [https://mai.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_एवं_लोककथा_२०२६ मैथिली] विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" प्रतियोगिता चल रही है, और इनाम जीते। ‎तिथि: 23 मार्च - 31 मार्च 2026 (8 दिन शेष) [[सदस्य:Surajkumar9931|Surajkumar9931]] ([[सदस्य वार्ता:Surajkumar9931|वार्ता]]) 05:33, 23 मार्च 2026 (UTC) == Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki == [Please help translate this message] Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[foundation:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contact_Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[metawiki:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[metawiki:Talk:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|talk page]]. –– [[सदस्य:STei (WMF)|STei (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:STei (WMF)|वार्ता]]) 13:21, 25 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == मैं [[:en:Perpetual calendar]] को अनुवाद कर रहा हूं। इसका शीर्षक क्या मुझे [[परपेचुअल पंचांग]] रखना चाहिए ? इसका तत्सम क्या हो सकता है क्योंकि मुझे इसका कही हिन्दी में प्रयोग नही मिला। [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:40, 25 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, आप की जानकारी के लिए कुछ सन्दर्भ [https://uptoword.com/en/perpetual-calendar-meaning-in-hindi?utm_source=chatgpt.com] [https://fj.voguetimebalfie.com/info/are-perpetual-calendar-watches-accurate-100990981.html] [https://www.google.co.th/books/edition/N%C4%ABh%C4%81rik%C4%81/t6hHAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&printsec=frontcover] [https://www.google.co.th/books/edition/Bhajpa_Ka_Abhyuday_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A4%BE_%E0%A4%95/Cet5EAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&pg=RA1-PA1970&printsec=frontcover] दिए गए है, इन के हिसाब से सतत पंचांग या स्थायी पंचांग लिखा जा सकता है। बाकि जैसी सभी की राय हो। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 08:32, 28 मार्च 2026 (UTC) == विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ हेतु स्कॉलरशिप आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं == नमस्ते, विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ के लिए स्कॉलरशिप हेतु आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं । यह कॉन्फ्रेंस ४ से ६ सितंबर २०२६ तक कोच्चि, भारत में होगी । विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत), दक्षिण एशिया के साथ और भी विकिमीडियन्स, सामुदायिक आयोजकों और योगदानकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह जुड़ने, सीखने, अनुभव बाँटने करने और निःशुल्क ज्ञान के आंदोलन को सशक्त करने हेतु मिलजुलकर करने का एक स्थान है । 🙂 अगर आप विकिमीडिया परियोजनाओं में सक्रिय योगदानकर्ता हैं अथवा सामुदायिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं, तो आपको स्कॉलरशिप के लिए आवेदन हेतु प्रोत्साहित किया जाता है । [[diffblog:2026/03/19/namukku-othukoodam-scholarships-now-open-for-wikiconference-india-2026/|विस्तृत घोषणा]] यहाँ है । आवेदन की अंतिम तिथि: १५ अप्रैल २०२६ रात ११:५९ बजे IST आवेदन की लिंक: [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdA3rR9xX_k31dzJrjM5MTDNYNUIRcAB45S4TflsYCbGJNrzg/viewform आवेदन की लिंक] अधिक जानकारी: [[metawiki:WikiConference_India_2026/Scholarship|मेटा पेज लिंक]] कृपया इस घोषणा को अपने समुदाय में अन्य सदस्यों के साथ भी बाँटें । धन्यवाद ! विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ की आयोजन टीम -[[User:Gnoeee|<span style="color:#990000">❙❚❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span><span style="color:#000"> जिनोय </span><span style="color:#006699">❚❙❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span>]] [[User talk:Gnoeee|✉]] 21:00, 28 मार्च 2026 (UTC) == Join the sixth Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia! == <div lang="en" dir="ltr"> [[File:Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia 2026.png|right|250px|thumb|link=https://meta.wikimedia.org/wiki/Ukraine%27s_Cultural_Diplomacy_Month_2026|Join our campaign!]] {{int:please-translate}} Dear Wikipedians! [[:m:Special:MyLanguage/Wikimedia Ukraine|Wikimedia Ukraine]], in cooperation with the [[:en:Ministry of Foreign Affairs of Ukraine|MFA of Ukraine]] and [[:en:Ukrainian Institute|Ukrainian Institute]], has launched the sixth edition of writing challenge "'''[[:m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Ukraine's Cultural Diplomacy Month]]'''", which lasts from '''1st April''' until '''30th April 2026'''. The initiative aims to promote knowledge about Ukrainian culture abroad by creating and improving Wikipedia articles in multiple languages. This year marks the sixth edition of the campaign, which will focus on contemporary culture, making today’s artistic voices and practices more visible to international audiences. 🧩'''How to participate?''' Choose an article from the suggested list → Write an article in your language, or improve an existing one according to the rules → Add your contribution to the contest page and calculate your points → Win prizes and receive a certificate of participation → Become a promoter of truthful knowledge about Ukraine. 🧩'''[[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Check our main page for more information]]'''. '''If you are interested in coordinating long-term community engagement for the campaign and becoming a local ambassador, we would love to hear from you! Please let us know your interest.''' If not, then we encourage you to translate the [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|landing page of the contest]] and [https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MessageGroupStats?group=Centralnotice-tgroup-UCDM2026banner&messages=&language=en&x=D banner] into your own language. Also, we set up a [[:m:CentralNotice/Request/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|banner]] to notify users of the possibility to participate in this challenge! [[:m:User:OlesiaLukaniuk (WMUA)|OlesiaLukaniuk (WMUA)]] ([[:m:User talk:OlesiaLukaniuk (WMUA)|talk]]) 04:35, 1 April 2026 (UTC) </div> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:OlesiaLukaniuk_(WMUA)/list_of_wikis&oldid=28552112 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:OlesiaLukaniuk (WMUA)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Action Required: Update templates/modules for electoral maps (Migrating from P1846 to P14226) == Hello everyone, This is a notice regarding an ongoing data migration on Wikidata that may affect your election-related templates and Lua modules (such as <code>Module:Itemgroup/list</code>). '''The Change:'''<br /> Currently, many templates pull electoral maps from Wikidata using the property [[:d:Property:P1846|P1846]], combined with the qualifier [[:d:Property:P180|P180]]: [[:d:Q19571328|Q19571328]]. We are migrating this data (across roughly 4,000 items) to a newly created, dedicated property: '''[[:d:Property:P14226|P14226]]'''. '''What You Need To Do:'''<br /> To ensure your templates and infoboxes do not break or lose their maps, please update your local code to fetch data from [[:d:Property:P14226|P14226]] instead of the old [[:d:Property:P1846|P1846]] + [[:d:Property:P180|P180]] structure. A [[m:Wikidata/Property Migration: P1846 to P14226/List|list of pages]] was generated using Wikimedia Global Search. '''Deadline:'''<br /> We are temporarily retaining the old data on [[:d:Property:P1846|P1846]] to allow for a smooth transition. However, to complete the data cleanup on Wikidata, the old [[:d:Property:P1846|P1846]] statements will be removed after '''May 1, 2026'''. Please update your modules and templates before this date to prevent any disruption to your wiki's election articles. Let us know if you have any questions or need assistance with the query logic. Thank you for your help! [[User:ZI Jony|ZI Jony]] using [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 17:12, 3 अप्रैल 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29941252 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Wikimedia Foundation की वार्षिक योजना की चर्चाओं में शामिल होने का आमंत्रण == नमस्ते, मैं आप सभी को '''साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल''' के अप्रैल एडिशन में इनवाइट करना चाहता हूँ, जो विकिमीडिया फाउंडेशन की लीडरशिप के साथ उनके [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan/2026-2027 एनुअल प्लान (2026-2027)] पर चर्चा करेगा। फ़ाउंडेशन की [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan वार्षिक योजना] एक उच्च-स्तरीय रोडमैप है, जिसमें यह बताया गया है कि संगठन आने वाले वर्ष में क्या हासिल करना चाहता है। इसमें न केवल फाउंडेशन के लक्ष्य, प्रगति और योजना शामिल है, बल्कि वैश्विक रुझानों का सारांश भी शामिल है जो हमारे मूवमेंट के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगला '[https://meta.wikimedia.org/wiki/South%20Asia%20Open%20Community%20Call साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल]' नीचे दी गई तारीखों/समय पर आयोजित कि जाएगी। कृपया इसे अपने कैलेंडर में नोट कर लें और [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 यहाँ साइन अप करें।] Platform: Google Meet Date: 17th April, 2026 Time: 1930-2045 IST (1400-1515 UTC) [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 Registration Link] '''नोट:''' सिर्फ़ रजिस्टर्ड लोगों को ही जॉइनिंग लिंक मिलेगा। कॉल पर आपसे मिलने का इंतज़ार रहेगा, --[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 12:49, 6 अप्रैल 2026 (UTC) == पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) अधिकार और नए सुरक्षा स्तर पर पुनर्विचार हेतु प्रस्ताव == सभी सदस्य महोदय, मैं समुदाय का ध्यान पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) से जुड़ी [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख_48#केवल_स्वतः_परीक्षित_सदस्यों_द्वारा_स्थानांतरण|2017 की एक पुरानी चर्चा (पुरालेख 48)]] और नीति की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उस समय अनुचित स्थानांतरणों को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया था कि केवल 'स्वतः परीक्षित' (Autopatrolled), रोलबैकर या प्रबंधक स्तर के सदस्य ही पृष्ठों का स्थानांतरण कर सकेंगे। उस समय की चर्चा में और फैब्रिकेटर (Phabricator) पर एक अन्य विकल्प (विकल्प 2) का भी सुझाव दिया गया था, जिसका उल्लेख आदरणीय @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी ने किया था: '''"एक नया सुरक्षा स्तर बना कर बर्बरता के शिकार पन्नों को इस स्तर पर सुरक्षित करने का।"''' मेरा प्रस्ताव है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हमें अब इस विकल्प (नया स्थानांतरण सुरक्षा स्तर) को लागू करना चाहिए। मेरी रूपरेखा कुछ इस प्रकार है: # '''सुरक्षित पृष्ठ:''' जिन पृष्ठों को अर्ध-सुरक्षा (Semi-protection) या पूर्ण सुरक्षा (Full protection) प्राप्त है या जो बर्बरता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, उन्हें स्थानांतरित करने का अधिकार केवल 'स्वतः परीक्षित', रोलबैकर, पुनरीक्षक, प्रशासक या प्रबंधक स्तर के सदस्यों तक ही सीमित रहे। # '''सामान्य पृष्ठ:''' जो पृष्ठ पूरी तरह से असुरक्षित और सामान्य हैं, उनका स्थानांतरण (नाम परिवर्तन) करने का अधिकार 'स्वतः स्थापित' (Autoconfirmed) सदस्यों को वापस दे दिया जाए (जैसा कि अंग्रेजी व अन्य विकिपीडिया परियोजनाओं पर होता है)। '''इस बदलाव की आवश्यकता क्यों है (ठोस आँकड़े)?''' सक्रिय अधिकार-प्राप्त सदस्यों की भारी कमी के कारण, छोटे-छोटे और स्पष्ट स्थानांतरण कार्यों (जैसे वर्तनी सुधार) के लिए भी सक्रिय 'स्वतः स्थापित' सदस्यों को <code><nowiki>{{नाम बदलें}}</nowiki></code> का अनुरोध करना पड़ता है। इससे काम की गति धीमी होती है और प्रबंधकों पर भी अनावश्यक अनुरोधों का बोझ पड़ता है। हाल ही में मैंने Quarry टूल के माध्यम से हिंदी विकिपीडिया के डेटाबेस का विश्लेषण किया (क्वेरी लिंक: [https://quarry.wmcloud.org/query/104224 Quarry Query: 104224])। इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में दर्जनों ऐसे अधिकार-प्राप्त सदस्य हैं, जिन्होंने पिछले कई महीनों या वर्षों से हिंदी विकिपीडिया पर एक भी संपादन नहीं किया है। आप नीचे दी गई तालिका का विस्तार करके स्वयं देख सकते हैं: {| class="wikitable mw-collapsible mw-collapsed" style="text-align:center; width:80%;" |+ अधिकार प्राप्त सदस्यों के अंतिम संपादन की सूची ! अधिकार (Group) !! सदस्य का नाम !! आखिरी संपादन (दिनांक) |- | autopatrolled || Naziah rizvi || 20-10-2016 |- | autopatrolled || Somesh Tripathi || 05-10-2017 |- | autopatrolled || Jeeteshvaishya || 22-10-2017 |- | autopatrolled || रोहित रावत || 02-09-2018 |- | autopatrolled || Salma Mahmoud || 23-10-2018 |- | rollbacker || FR30799386 || 02-10-2019 |- | autopatrolled || SGill (WMF) || 03-03-2020 |- | autopatrolled || RacIndian || 21-08-2020 |- | autopatrolled || Jaswant Singh4 || 25-09-2020 |- | autopatrolled || Teacher1943 || 28-08-2021 |- | autopatrolled || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | rollbacker || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | autopatrolled || Mala chaubey || 29-12-2021 |- | autopatrolled || Navodian || 20-01-2022 |- | autopatrolled || AbhiSuryawanshi || 08-06-2022 |- | autopatrolled || Innocentbunny || 21-09-2022 |- | autopatrolled || Biplab Anand || 22-10-2022 |- | autopatrolled || सुनील मलेठिया || 08-01-2023 |- | autopatrolled || Sushilmishra || 20-04-2023 |- | autopatrolled || Gaurav561 || 01-05-2023 |- | autopatrolled || Ahmed Nisar || 02-07-2023 |- | autopatrolled || JamesJohn82 || 20-08-2023 |- | autopatrolled || जैन || 02-11-2023 |- | autopatrolled || Samee || 13-01-2024 |- | autopatrolled || Dinesh smita || 15-04-2024 |- | autopatrolled || सीमा1 || 15-04-2024 |- | rollbacker || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | rollbacker || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | autopatrolled || Anamdas || 07-11-2024 |- | autopatrolled || चक्रपाणी || 02-12-2024 |- | autopatrolled || Charan Gill || 14-12-2024 |- | autopatrolled || Satdeep Gill || 10-02-2025 |- | autopatrolled || MKar || 23-03-2025 |- | autopatrolled || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || स || 20-05-2025 |- | autopatrolled || स || 20-05-2025 |- | rollbacker || Stang || 26-05-2025 |- | autopatrolled || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || PQR01 || 12-06-2025 |- | autopatrolled || WhisperToMe || 26-06-2025 |- | autopatrolled || Hunnjazal || 03-07-2025 |- | autopatrolled || MGA73 || 13-07-2025 |- | autopatrolled || Jayprakash12345 || 19-07-2025 |- | rollbacker || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Raju Babu || 03-08-2025 |- | autopatrolled || Trikutdas || 06-10-2025 |- | autopatrolled || Surenders25 || 29-10-2025 |- | rollbacker || राजकुमार || 01-11-2025 |- | rollbacker || Nadzik || 22-11-2025 |- | autopatrolled || Srajaltiwari || 15-12-2025 |- | autopatrolled || Buddhdeo Vibhakar || 22-12-2025 |- | autopatrolled || आशीष भटनागर || 23-12-2025 |- | autopatrolled || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | rollbacker || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | autopatrolled || कलमकार || 12-02-2026 |- | autopatrolled || शीतल सिन्हा || 21-02-2026 |- | rollbacker || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || नीलम || 09-03-2026 |- | autopatrolled || Dr.jagdish || 10-03-2026 |- | rollbacker || Chronos.Zx || 12-03-2026 |- | rollbacker || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Utcursch || 17-03-2026 |- | rollbacker || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || Mahensingha || 27-03-2026 |- | autopatrolled || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || Saroj || 31-03-2026 |- | autopatrolled || Ziv || 01-04-2026 |- | rollbacker || TypeInfo || 02-04-2026 |- | sysop || संजीव कुमार || 07-04-2026 |- | autopatrolled || Dharmadhyaksha || 07-04-2026 |- | autopatrolled || CommonsDelinker || 08-04-2026 |- | sysop || SM7 || 08-04-2026 |- | sysop || अजीत कुमार तिवारी || 09-04-2026 |- | sysop || अनिरुद्ध कुमार || 09-04-2026 |- | autopatrolled || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | rollbacker || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | sysop || DreamRimmer || 09-04-2026 |- | autopatrolled || अनुनाद सिंह || 09-04-2026 |- | sysop || Sanjeev bot || 10-04-2026 |} यदि हम यह नई तकनीकी व्यवस्था लागू करते हैं, तो सक्रिय सदस्यों को काम करने में सहूलियत मिलेगी, विकिपीडिया का विकास तेज़ी से होगा, और प्रबंधकों का कीमती समय बचेगा। कृपया इस प्रस्ताव पर अपने बहुमूल्य विचार साझा करें ताकि हम इस सुधार को प्रबंधकों के माध्यम से लागू करवा सकें। धन्यवाद। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 09:22, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] जी, मुझे आपका उद्देश्य समझ में नहीं आया। जो आवेदन अधूरे हैं उनमें से अधिकतर अधूरे होने का कारण प्रबन्धकों की सक्रियता नहीं बल्कि उचित स्रोत का न होना है। आप चाहते हो कि स्रोतों के अभाव में आवेदन करने वाले सदस्य मनमर्जी से स्थानान्तरण करते रहें? आपने जो उपरोक्त सूची दी है, क्या उनमें कोई सदस्य अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है? यदि हाँ तो सूचित करें। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:48, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] महोदय, ::'''1. मनमर्जी से स्थानांतरण:''' मेरा उद्देश्य इसे बढ़ावा देना बिल्कुल नहीं है। जैसा कि इस विषय पर पहले भी बताया गया था, यह प्रस्ताव केवल स्पष्ट वर्तनी और मात्रा की गलतियों को तुरंत सुधारने के लिए है। यदि कोई 'स्वतः स्थापित' सदस्य अनुचित स्थानांतरण करता है, तो उसे आसानी से पूर्ववत किया जा सकता है। साथ ही, संवेदनशील या विवादित पृष्ठों को नए 'स्थानांतरण सुरक्षा स्तर' से सुरक्षित रखा जा सकता है। या एक विकल्प यह भी है कि किसी भी सुरक्षित पृष्ठ पर स्थानांतरण करने के लिए नामांकन की आवश्यकता है| ::'''2. सूची का उद्देश्य:''' मेरा उद्देश्य किसी पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाना नहीं था। यह सूची केवल यह दर्शाने के लिए थी कि अधिकार-प्राप्त सक्रिय सदस्यों की संख्या वर्तमान में बहुत कम है। इस कारण, नाम सुधारने जैसे छोटे-छोटे कार्यों का पूरा बोझ आप जैसे चंद सक्रिय प्रबंधकों पर ही पड़ता है। ::मेरा यह प्रस्ताव केवल प्रबंधकों का कीमती समय बचाने और सुधारात्मक कार्यों को गति देने का एक तकनीकी सुझाव मात्र है। समुदाय का जो भी निर्णय होगा, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 16:27, 20 अप्रैल 2026 (UTC) :::प्रबन्धकों के समय का निर्धारण आप कैसे कर सकते हैं? किसी प्रबन्धक ने आपको कहा है क्या कि हमारा समय पृष्ठ स्थानान्तरण में जा रहा है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:36, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी नहीं महोदय [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 23:57, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ==आप सभी से विनम्र निवेदन है कि== मेरे [[विकिपीडिया:स्वतः_परीक्षित_अधिकार_हेतु_निवेदन#चाहर_धर्मेंद्र|इस]] निवेदन के संबंध में आपके विचार मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृपया अपना बहुमूल्य समय निकालकर इस पर अपना मत अवश्य साझा करें। आपके सुझाव और प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।<span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 11:34, 10 अप्रैल 2026 (UTC) == अनुरोध == नमस्कार! मैं आपसे [[मॉड्यूल:Lang/data]] पर एक संपादन करने का अनुरोध करता हूँ। ["hbo"] = "Biblical Hebrew" ===> ["hbo"] = "बाइबिली इब्रानी" [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 19:28, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 08:56, 17 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद! [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 09:51, 17 अप्रैल 2026 (UTC) == रोलबैक अधिकार के नामांकन पर आपके विचार/मत हेतु == <div style="background-color: #FFF9E6; padding: 15px; border: 1px solid #DAA520; border-radius: 8px; margin-top: 10px;"> नमस्ते, आशा है आप सकुशल होंगे। मैं पिछले कुछ समय से हिंदी विकिपीडिया पर सक्रिय रूप से गश्त कर रहा हूँ और हाल के बदलावों में स्पष्ट बर्बरता को हटाने का प्रयास कर रहा हूँ। अपने इस कार्य को और अधिक सुचारू बनाने के लिए, मैंने स्वयं को '''रोलबैक अधिकार''' के लिए नामांकित किया है। चूँकि आप हिंदी विकिपीडिया के एक अनुभवी सदस्य हैं, इसलिए मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि कृपया मेरे हालिया योगदानों की समीक्षा करें और अपना बहुमूल्य मत या सुझाव प्रदान करें। आपका समर्थन और मार्गदर्शन मेरे लिए अत्यंत उत्साहजनक होगा। '''नामांकन यहाँ देखें:''' [[विकिपीडिया:रोलबैकर्स अधिकार हेतु निवेदन#AMAN KUMAR|मेरे नामांकन पर अपना मत दें]] सहयोग के लिए अग्रिम धन्यवाद! सादर,<br> [[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 11:44, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> ==अंतिम कुछ दिन: विकि सम्मेलन भारत 2026 छात्रवृत्ति आवेदन== प्रिय विकिमीडिया समुदाय सदस्य, हमें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि '''[[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026|विकि सम्मेलन भारत 2026]]''' के लिए छात्रवृत्ति आवेदन वर्तमान में खुले हैं, और अंतिम तिथि अब बहुत निकट है। विकि सम्मेलन भारत 2026 इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन का चौथा संस्करण है, जो भारत और दक्षिण एशिया में इंडिक भाषाओं के विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स तथा मुक्त ज्ञान आंदोलन से जुड़े विकिमीडियनों और हितधारकों को एक साथ लाता है। यह सम्मेलन 4–6 सितंबर 2026 को कोच्चि, केरल में आयोजित किया जाएगा। * आप अधिक जानकारी और [[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026/Scholarship|आवेदन फॉर्म Meta-Wiki पर उपलब्ध]] छात्रवृत्ति पृष्ठ पर प्राप्त कर सकते हैं। * छात्रवृत्ति की अंतिम तिथि: 15 अप्रैल 2026, रात 11:59 बजे (IST) अब जबकि केवल कुछ ही दिन शेष हैं, हम आपको आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं यदि आपने अभी तक आवेदन नहीं किया है। साथ ही, कृपया इस अवसर को अपने समुदाय में साझा करें और अन्य लोगों को भी आवेदन करने के लिए प्रेरित करें। अधिक जानकारी और नियमित अपडेट के लिए, कृपया सम्मेलन के Meta पृष्ठ पर जाएँ। सादर, <br> विकि सम्मेलन भारत 2026 आयोजन टीम की ओर से <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 23:38, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> == फॉण्ट == हिन्दी विकिपीडिया पर पिछले कुछ दिनों से लैटिन लिपि के लिए जो फॉण्ट है, वे [[:hak:Hakkapedia|Hakkapedia]] एवं [[:nan:Pang-chān:Holopedia|Holopedia]] के फॉण्ट की तरह दिख रहा है। क्या default फॉण्ट को बदल दिया गया है? [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) {{Font color|grey|११:२५, १२ अप्रैल २०२६ (IST)}} == Lua त्रुटि == मॉड्यूल:Designation/lookup को बनाने में मुझे "Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'." त्रुटि मिलती है। कृपया उस पृष्ठ का निर्माण करें। कोड अंग्रेज़ी विकिपीडिया से लिया गया है (Module:Designation/lookup) [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 08:04, 18 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:24, 19 अप्रैल 2026 (UTC) == "यहया" नामक दो लेख? == दोनों [[याह्या (पैग़म्बर)|John the Baptist]] और [[यहया (इस्लाम)|Yahya]] के लेखों के नाम "यहया" क्यों है? केवल इस्लाम में उस व्यक्ति का नाम '''यहया''' होता है। ईसाई धर्म में उनहें '''यूहन्ना बपतिस्मा दाता''' के नाम से जाना जाता है। कृपया इस समस्या पर गौर करें। [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 11:24, 20 अप्रैल 2026 (UTC) == Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications == The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]]. Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects. '''The hackathon is intended for:''' * Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc. * Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc. * Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces. Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach. To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses. '''Apply here:''' * Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form] '''More information:''' We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page. * Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]] If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at contact@indicmediawikidev.org. Best Regards, On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group == सत्य == सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित, तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है। इसके साथ व्यक्ति की मानसिकता का जुड़ाव  है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आंकाक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण ‘अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन’ सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। झूठ बोलना तथा किसी सद् वस्तु के स्वरूप, स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना - ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य है। [[विशेष:योगदान/&#126;2026-24320-85|&#126;2026-24320-85]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-24320-85|वार्ता]]) 08:51, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == साँचा:स्टेटस भाषा == मैं <span style="font-family:'Kalimati', 'Arial', serif;"> [[साँचा:स्टेटस भाषा]] </span> का निर्माण करके वाला हूँ, जो [[बाली विकिपीडिया]] के [[:ban:Mal:Status basa|ᬫᬮ᭄:ᬲ᭄ᬢᬢᬸᬲ᭄ᬩᬲ]] की तरह होगा। इसे [[साँचा:Infobox language|ज्ञानदूसक भाषा]] पर लागु करने के बाद, हमें भाषा का यूनेस्को वर्गीकरण करना बहुत सरल हो जाएगा एवं वे interface भी अच्छा लगेगा। [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) 10:42, 21 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:ङघिञ|ङघिञ]] जी नमस्ते। साँचा का वार्ता पृष्ठ देख लें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 06:06, 22 अप्रैल 2026 (UTC) == यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति संपादनोत्सव में भाग लें == नमस्ते, 'यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति माह 2026' की गतिविधियों को समर्थन देने के लिए 22 अप्रैल 2026 को पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 1 बजे तक नई दिल्ली (भारत) स्थित युक्रेन दूतावास में एक विशेष संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं के विकिपीडिया प्रोजेक्ट्स पर यूक्रेन की संस्कृति से संबंधित जानकारी को समृद्ध करना और उसमें सुधार करना है। इस कार्यक्रम में आप ऑनलाइन जूम मीटिंग के माध्यम से शामिल हो सकते हैं। * समय: बुधवार, 22 अप्रैल 2026 | सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक (IST) * ज़ूम मीटिंग लिंक: [https://zoom.us/j/98031157656?pwd=BUHOGF5D4Qg8YnqQrEdFx3TyXrvKDO.1 ऑनलाइन जुड़ें] * मीटिंग आईडी: 980 3115 7656 * पासकोड: 716372 * आयोजन का मेटा पृष्ठ: [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|w.wiki/LyML]] इस आयोजन का हिस्सा बनें और भारतीय भाषाओं में मुक्त ज्ञान के प्रसार में अपना योगदान दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 22:59, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == आगामी कार्यक्रम == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची: # जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून) # जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई) # अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त) -संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:40, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 == :मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगा तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC) o4ba9siyq8dyurrhdjo5ccsyi43l2k0 6543682 6543680 2026-04-24T17:42:59Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 */ 6543682 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <!-- इस लाइन को न हटायें। नए अनुभाग पृष्ठ पर सबसे नीचे बनायें। --> == Anthony Albanese के सही उच्चारण के संबंध में == विकिपीडिया के अंग्रेज़ी संस्कारण पर Albanese का उच्चारण "/ˌælbəˈniːzi/ ऐल-ब्अ-नी-ज़ी अथवा /ˈælbəniːz/ ऐल-ब्अ-नीज़" दिया गया है, अतः हिन्दी संस्करण पर भी उनका सही नाम का उच्चारण शामिल करें। स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Anthony_Albanese == Derbyshire के सही उच्चारण के संबंध में == Derbyshire का सही उच्चारण "डर्बीशायर" न होकर "ˈdɑː(ɹ).bɪ.ʃə(ɹ) {ड्आ (र्).बि.श्अ(र्)} = "डार्बिशर" प्रतीत हो रहा है। स्रोत: https://en.wiktionary.org/wiki/Derbyshire == Satyajit Rāy के सही वर्तनी == Satyajit Rāy को सत्यजित राय लिखा जाए। एक जगह पर "सत्यजीत" लिखा गया था, उसे "सत्यजित" लिखा जाए। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 13:59, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) :यह कहाँ लिखा है? कृपया लिंक भेज दें ताकि एडमिन आपका मामला देख सकें। [[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 19:31, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) ::[[सत्यजित राय|https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF]] ::वाक्य प्रयोग: सत्यजीत राय (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 02:53, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::yes [[विशेष:योगदान/&#126;2025-39710-56|&#126;2025-39710-56]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2025-39710-56|talk]]) 07:26, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) ::::तो तनिक इसे ठीक करें। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 07:36, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::::कर दिया। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 15 दिसम्बर 2025 (UTC) == लिंक जोडें == मैने इस पृष्ठ https://simple.wikipedia.org/wiki/Minority_appeasement_in_India को हिन्दी में अनुवाद किया है और हिंदी वाला पृष्ठ [[भारत में अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण]] पर पढा जा सकता है, अब कोई उन दोनों को लिंक कीजिए [[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 16:38, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) :मैने उसे स्वयं जोड दिया है -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 20:41, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) == विकिपीडिया का 25वें जन्मदिन समारोह, 15 जनवरी  == [[File:WP25 Anthem video - alternate cut.webm|300px|right|thumbtime=67]] नमस्ते विकिपीडिया के [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:Wikipedia%2025%20Virtual%20Celebration 25वें जन्मदिन समारोह] में आपको आमंत्रित करना चाहता हूँ, जो [https://zonestamp.toolforge.org/1768492800 15 जनवरी को 16:00 UTC] पर हो रहा है। यह एक घंटे भर का वर्चुअल इवेंट होगा जिसमें ट्रिविया, पुरस्कार, संगीत प्रदर्शन, नाटक रीडिंग, संपादकों पर स्पॉटलाइट और विशेष अतिथि शामिल होंगे। इसे Eventyay और विकिपीडिया के यूट्यूब चैनल पर स्ट्रीम किया जाएगा। तारीख सेव करने और अपडेट पाने के लिए इवेंट के लिए रजिस्टर करें, और अगर आपके कोई सवाल हों तो मुझसे पूछें! –[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 10:20, 12 दिसम्बर 2025 (UTC) == तुरन्त हस्तक्षेप अनुरोध == प्रिय साथी विकीमीडियन्स, मैं आप सभी से अत्यंत आग्रह और गंभीरता के साथ तत्काल सहायता की अपील कर रहा हूँ, ताकि विकीमीडिया ब्लॉग टीम द्वारा की गई एक लंबे समय से चली आ रही अन्यायपूर्ण स्थिति को सुधारा जा सके। 2014 से 2020 के बीच, विकीमीडिया के कुछ स्टाफ सदस्यों के प्रतिकूल और हतोत्साहित करने वाले रवैये के बावजूद, मैंने भारत ( [https://diff.wikimedia.org/2017/04/12/ashish-bhatnagar/ आशीष भटनागर जी] का ब्लॉग इंटरव्यू, [https://diff.wikimedia.org/2015/03/03/hindi-wiki-sammelan/ प्रथम हिन्दी विकि सम्मेलन की रिपोर्ट], आदि), म्यांमार, कोरिया, तुर्की, चेक गणराज्य आदि देशों की विकीमीडिया समुदायों और विकीमीडियन्स का परिचयात्मक दस्तावेज़ीकरण (प्रोफाइलिंग) करने का कार्य किया। मैंने स्वयं गहन शोध किया, प्रमुख और सक्रिय योगदानकर्ताओं की पहचान की, प्रश्नावलियाँ तैयार कीं, विस्तृत प्रोफाइल/साक्षात्कार लिखे और कुल मिलाकर 35 ब्लॉग पोस्ट तैयार कर प्रकाशित करवाईं। दुर्भाग्यवश, विकीमीडिया ब्लॉग टीम के कम से कम दो सदस्य जबरन और अनुचित रूप से लगभग 10 ब्लॉग पोस्टों की लेखकता (Authorship) अपने नाम से दर्शा रहे हैं, जबकि उन लेखों का संपूर्ण शोध, लेखन और सामग्री मेरी ओर से की गई थी। मैं आप सभी से विनम्र लेकिन सशक्त अनुरोध करता हूँ कि इस स्पष्ट अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएँ और यहाँ [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Wikimedia_Blog#Credits मेरी अपील] के नीचे अपने विचार/टिप्पणियाँ दर्ज करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके और वास्तविक लेखक को उसका उचित श्रेय मिल सके। आपका समर्थन न केवल मेरे लिए, बल्कि विकीमीडिया आंदोलन में पारदर्शिता, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। आप सभी का अग्रिम धन्यवाद। [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 07:27, 27 दिसम्बर 2025 (UTC) :बिना विश्वसनीय  स्रोत के, किसी भी विकिपीडिया पेज पर कोई वाक्य नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए कृपया मुझे बताएं कि आप किन पृष्ठों की बात कर रहे हैं?[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 08:03, 13 जनवरी 2026 (UTC) ::बांग्ला जी, आपका और हिन्दी विकिपीडिया समुदाय का धन्यवाद। वैसे कुछ अन्य विकिपीडिया के सज्जन पुरुषों के हस्तक्षेप के कारण [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Diff_(blog)#Blogpost_Credits समस्या सुलझ चुकी है] । [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 21:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Istanbul का सही उच्चारण == "इस्तांबुल" लिखने से यह होगा कि इसका उच्चारण "इस्ताम्बुल" हो जाएगा, क्योंकि त के बाद में "ब" है, जिसके बाद "म" है (प, फ, ब, भ, म)। इसलिए "इस्तान्बुल" ही सही है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 16:10, 28 दिसम्बर 2025 (UTC)Dimple323 :@[[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] लेख के वार्ता पृष्ठ पर चर्चा करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 07:51, 7 जनवरी 2026 (UTC) == ड्राफ्ट की समीक्षा और स्थानांतरण का अनुरोध == नमस्ते, कृपया ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra की समीक्षा करें और यदि उपयुक्त हो तो इसे मुख्य नामस्थान में स्थानांतरित करें। ड्राफ्ट का लिंक: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra धन्यवाद। [[सदस्य:Supraconciencia|Supraconciencia]] ([[सदस्य वार्ता:Supraconciencia|वार्ता]]) 22:03, 8 जनवरी 2026 (UTC) == अनुरोध == मैं आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि आप इस चर्चा में अपनी टिप्पणियाँ जोड़ें: <nowiki>https://hi.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया</nowiki>: पृष्ठ_हटाने_हेतु_चर्चा/लेख/ भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण# भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण ।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 03:58, 11 जनवरी 2026 (UTC) == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप कार्यक्रम सूचना == सभी विकि साथियों को नववर्ष 2026 के लिए शुभकामनाएं। हम यूजर ग्रूप के जनवरी 2026 तक के कार्यों से संबंधित कुछ नए अपडेट साझा करना चाहते हैं: :अक्तूबर तथा नवंबर 2025 में आयोजित संपादनोत्सव के परिणाम घोषित हो चुके हैं: # [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025]] - 2 अक्तूबर 2025 से 18 अक्तूबर 2025 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- 1 नवंबर, 2025 से 14 नवंबर, 2025 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। :जनवरी में नई दिल्ली में दो ऑफ लाइन बैठक/कार्यशाला का आयोजन हो रहा है: # [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका|विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका]] - 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित सांस्थानिक प्रशिक्षण और भागिदारी कार्यशाला। # [[w:hi:विकिपीडिया:प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026|प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026]] - 16 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रबंधक बैठक। : वर्ष 2026 के फरवरी तथा मार्च में दो गुणवत्ता बढ़ाने वाले संपादनोत्सव करने की योजना है: # [[w:hi:विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026|विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026]] – फरवरी 2026 में हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- मार्च में हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।:इन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए तथा इससे संबंधित कोई सुझाव देने के लिए सदस्यों का स्वागत है। : 15 जनवरी को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने को इच्छुक दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिपीडियनों का स्वागत हैं। आप आयोजन पृष्ठ पर अपना पंजीयन कराकर इस कार्यशाला में शामिल हो सकते हैं। :सादर- संपर्क सूत्र -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 18:49, 13 जनवरी 2026 (UTC) ==सहायता== मैं जब भी किसी लेख में संपादित करती करती हूँ तो स्रोत संपादित की जगह संपादित करें आता है जिस कारण मैं ठीक से आडिट नहीं कर पाती हूँ कृपया मेरी इस समस्या में सहायता करें। [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:14, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी, आपको समस्या क्या आ रही है? वहाँ स्रोत सम्पादन और यथादृश्य समादिका (visual editor) के मध्य बदला जा सकता है। यदि आप स्रोत सम्पादन का उपयोग करना चाहें तो उचित बदलाव कर सकते हैं। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 06:19, 15 जनवरी 2026 (UTC) ::{{ping|संजीव कुमार}} लेकिन कहाँ और कैसे बदला जाएगा [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:21, 15 जनवरी 2026 (UTC) :::{{ping|संजीव कुमार}} जी कृपया मार्गदर्शन करें। 14:23, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी वहाँ पर दाहिने ओर ऊपर एक पेन जैसा दिखने वाला बटन होता है जिसे क्लिक करके आप 'यथादृश्य' और 'स्रोत संपादक' में अदल बदल कर सकते हैं। आप कंप्यूटर पे हो तो। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) :::::@[[सदस्य:SM7|SM7]] जी हो गया, धन्यवाद [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 07:44, 17 जनवरी 2026 (UTC) == मसौदे की समीक्षा का अनुरोध == नमस्ते, मैंने हाल ही में एक जीवित व्यक्ति की जीवनी का मसौदा तैयार किया है, जो स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है। मुख्य नामस्थान में स्थानांतरण का अनुरोध पहले ही किया जा चुका है। मसौदा यहाँ उपलब्ध है: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra यदि कोई अनुभवी संपादक इसकी समीक्षा कर सके, तो आभारी रहूँगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 10:03, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::नमस्ते, :: जानकारी देने के लिए धन्यवाद। मेरा उद्देश्य किसी भी प्रकार का प्रचार करना नहीं था। मैं आपके निर्णय का सम्मान करता हूँ और आगे से हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार ही योगदान करूँगा। :: धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 17:53, 16 जनवरी 2026 (UTC) == नये लेख [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] की समीक्षा हेतु अनुरोध == नमस्ते संपादकों, मैंने सम्राट कुमार गुप्ता के बारे में एक लेख (Draft) तैयार किया है जिसमें 3 दशकों के पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के विश्वसनीय संदर्भ दिए गए हैं। कृपया इसकी समीक्षा करें और इसे मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित करने में सहायता करें। लिंक: [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] -- धन्यवाद [[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Supriya|वार्ता]]) 07:43, 16 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:46, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Thank You for Last Year – Join Wiki Loves Ramadan 2026 == Dear Wikimedia communities, We hope you are doing well, and we wish you a happy New Year. ''Last year, we captured light. This year, we’ll capture legacy.'' In 2025, communities around the world shared the glow of Ramadan nights and the warmth of collective iftars. In 2026, ''Wiki Loves Ramadan'' is expanding, bringing more stories, more cultures, and deeper global connections across Wikimedia projects. We invite you to explore the ''Wiki Loves Ramadan 2026'' [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026|Meta page]] to learn how you can participate and [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026/Participating communities|sign up]] your community. 📷 ''Photo campaign on '' [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan 2026|Wikimedia Commons]] If you have questions about the project, please refer to the FAQs: * [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan/FAQ/|Meta-Wiki]] * [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan/FAQ|Wikimedia Commons]] ''Early registration for updates is now open via the '''[[m:Special:RegisterForEvent/2710|Event page]]''''' ''Stay connected and receive updates:'' * [https://t.me/WikiLovesRamadan Telegram channel] * [https://lists.wikimedia.org/postorius/lists/wikilovesramadan.lists.wikimedia.org/ Mailing list] We look forward to collaborating with you and your community. '''The Wiki Loves Ramadan 2026 Organizing Team''' 19:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29879549 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्वागत सन्देश में चित्र == पूर्व चर्चा: [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख 63#स्वागत सन्देश में चित्र]] [[साँचा:सहायता|स्वागत संदेश]] में अंकित किया गया चित्र मशीन द्वारा निर्मित किया गया है। मशीन द्वारा बनाई गई सामग्री इस ज्ञानकोष में मान्य नहीं है। इसलिए अनुरोध है कि जिस सदस्य ने यह चित्र स्थापित किया है, वही इसे हटा भी दे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 09:32, 18 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी, यह चित्र आपको कैसा लगता है? मुझे तो यह पुराने चित्र जैसा ही लग रहा है। इसलिए यदि आप दोनों को यह ठीक लगे, तो हम इसे उपयोग में ले सकते हैं। :[[चित्र:Annapoorni (10641191125).jpg|120px|thumb|right|स्वागत!]] – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:13, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) {{-}} :: [[चित्र:Tableau_noir_dans_le_désert_du_Thar_(Rajasthan).jpg|240px|thumb|center|हिन्दी विकिपीडिया में आपका हार्दिक स्वागत है। इस ज्ञानकोश के विकास और विस्तार में आपके सहयोग की हमें प्रतीक्षा है।]] <center>--[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 18:03, 8 फ़रवरी 2026 (UTC)</center> :::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, ये आपको कैसे लग रहा है कि एआई से जनित चित्र ज्ञानकोशीय नहीं हो सकता? आजकल एआई से ज्ञानकोशीय एनिमेशन बनाये जाते हैं। यह तो बनाने वाले पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त चित्र ज्ञानकोशीय होने के लिए नहीं बल्कि स्वागत के रूप में जोड़ा गया है। :::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] जी, मुझे आपके सुझाव से कोई समस्या नहीं है और आप चाहें तो इसे जोड़ सकते हैं। हालांकि पिछली बार @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी का सुझाव था कि चित्र को हटा दिया जाये, अतः मुझे उनका सुझाव भी उचित ही लगा। लेकिन मैंने परम्परा के तौर पर नया चित्र जोड़ा था क्योंकि स्वागत सन्देश में बहुत बदलावों की आवश्यकता है। :::@[[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] जी, आपका सुझाव भी उचित है लेकिन इससे बेहतर चित्र हम कंप्यूटर पर निर्मित कर सकते हैं जो इससे बेहतर होंगे। इसके लिए चर्चा करना बेहतर होगा। स्वागत सन्देश बड़ा रखने के स्थान पर एक छोटी कड़ी दे सकते हैं जिसपर सभी सन्देशों को सूचीबद्ध किया जा सके। इससे उन सदस्यों को भी सुविधा रहेगी जो हिन्दी नहीं जानते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:34, 9 फ़रवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]]@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]]@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] @[[सदस्य:Hindustanilanguage|Hindustanilanguage]] मेरा अब भी सुझाव है कि चित्र हटा दिया जाय। हालाँकि, अभी जो आपत्ति दर्ज़ की गई है, उसपे इतना ही कहूँगा कि यह चित्र 'ज्ञानकोश' का हिस्सा नहीं है। स्वागत संदेश में इस तरह के चित्र पर आपत्ति उचित नहीं प्रतीत हो रही। ::::संजीव जी जैसा कह रहे, पूरे स्वागत संदेश को पुनर्विचार एवं नये सिरे से बनाने की ज़रूरत है - लंबा काम है - मुझे कोई गुरेज़ नहीं इसमें भागीदारी करने में। ::::पर यह चित्र हटाने वाली बात चर्चा के योग्य भी नहीं। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 10:49, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, एक महिला को हर किसी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े किया जाना महिलाओं के आत्मसम्मान के लिहाज से कहीं न कहीं गरिमापूर्ण प्रतीत नही हो रहा है। इसलिए भी इस चित्र को हटा देना या किसी उपयुक्त चित्र से बदल देना चाहिए। बहुत से ज्ञानकोषों में बिस्किट का प्रयोग किया जाता है क्योंकि संपादन के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, जो बिस्किट से मिलती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 08:23, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी के विचारों से सहमत होते हुए कि स्वागत संदेश को नए सिरे से बनाने की आवश्यकता है, और @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी की आपत्तियों (एआई और गरिमा) को ध्यान में रखते हुए, मेरा सुझाव है कि हम विवादित चित्र के स्थान पर प्राकृतिक फूलों के चित्र का उपयोग किया जाएं। फूल स्वागत का एक गरिमापूर्ण, मानवीय और तटस्थ प्रतीक हैं। ::::::मैंने विकिमीडिया कॉमन्स से कुछ प्राकृतिक और सुंदर चित्रों का चयन किया है। कृपया नीचे दी गई गैलरी में देखकर बताएँ कि इनमें से कौन सा चित्र नए स्वागत संदेश के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा? ::::::File:Lotus 2013 sai.jpg|कमल '''यह चित्र मैने @[[सदस्य:SM7|SM7]] के सदस्य पृष्ठ पर देखा''' ::::::File:Red rose at Square of the Cathedral of Christ the Saviour.jpg|लाल गुलाब ::::::File:Combretum indicum(Rangoon creeper).jpg|मधुमालती (रंगून क्रीपर) '''यह मैने ही अपलोड किया''' ::::::File:(MHNT) Jasminum polyanthum – flowers and buds.jpg|चमेली ::::::File:Marigold 14.jpg|गेंदा ::::::File:Flower bouquet in Tarnowskie Góry, Silesian Voivodeship, Poland, December 2023.jpg|पुष्प गुच्छ ::::::File:Rose and carnation flower bouquet 01.jpg|गुलाब और कार्नेशन ::::::आप सभी वरिष्ठ साथियों की राय का स्वागत है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 14:09, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] जी, फूल लगवाने का कोई विशेष औचित्य? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:38, 9 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, महोदय :::::::: फूल लगवाने का मुख्य औचित्य केवल एक तटस्थ, विवाद-रहित और मानवीय स्वागत-प्रतीक प्रस्तुत करना है। ::::::::महोदय, भारत में फूलों से स्वागत करना सबसे आत्मीय और सहज माना जाता है। ::::::::प्राकृतिक फूल होने के कारण यह AI और गरिमा से जुड़े उन सभी विवादों से पूरी तरह मुक्त है, जो वर्तमान चित्र को लेकर उठे हैं। ::::::::मेरा उद्देश्य सिर्फ एक सकारात्मक चित्र लगाना है। यदि समुदाय को फूल के स्थान पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी का 'बिस्किट' वाला सुझाव या विकिपीडिया का लोगो अधिक उपयुक्त लगता है, तो मेरी उसमें भी पूर्ण सहमति है। प्रमुख उद्देश्य स्वागत संदेश को बेहतर बनाना है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 16:47, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::::भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। फूलों से स्वागत देवताओं का किया जाता है और आजकल लोगों ने चाटुकारिता के लिए इसे मनुष्यों पर लागू करना आरम्भ कर दिया है। चित्रों में प्राकृतिक फूल कैसे हो सकते हैं? वर्तमान चित्र को लेकर मैंने कोई विवाद नहीं देखा, बल्कि चित्र को हटाकर संबंधित सन्देश को पुनः लिखने पर यह चर्चा है। वर्तमान चित्र में क्या नकारात्मक दिखाई दे रहा है? क्या वो भारतीय संस्कृति से संबंधित नहीं है? (हालांकि ऐसा आवश्यक नहीं है)। अभी चर्चा इसपर चाहिए कि चित्र की आवश्यकता ही क्या है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:43, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी,महोदय ::::::::::मेरा उद्देश्य केवल उठे हुए विवाद के बीच एक विकल्प देना था। लेकिन मैं आपसे और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि असली मुद्दा यह है कि स्वागत सन्देश में किसी भी चित्र की आवश्यकता है ही नहीं। पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] महोदय ने बिस्किट के चित्र का उदाहरण दिया था, जिसके लिए मैं पुष्पों का विकल्प दिया था| ::::::::::मेरी ओर से चित्र वाले विषय पर चर्चा यहीं समाप्त है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:59, 12 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::सभी सदस्यो से विनम्र निवेदन है, की कृपया इस [[:File:AI Chatgpt generated Woman in Welcome pose.png|चित्र]] देखने का कष्ट करे, इसको स्वागत सन्देश में लगने के लिए उपयुक्त हो सकता है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:06, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::::@[[सदस्य:Cptabhiimanyuseven|Cptabhiimanyuseven]] जी, चित्र को हटाने पर चर्चा चल रही है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:35, 14 मार्च 2026 (UTC). :::::::::::::::{{Ping|संजीव कुमार}} जी, नमस्ते! चित्र को उपयोग में लिया जा चुका है,पहले चित्र उपयोग में न होने के कारण हटाने हेतु चर्चा के लिए नामांकित किया गया है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:50, 14 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::{{ping|संजीव कुमार}}, आपकी बात सही है कि भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। परंतु, क्योंकि आप और यहां के अधिकतर प्रबंधक पुरुष हैं, और स्वागत करते हुए व्यक्ति का ही चित्र लगाना है तो उचित होगा कि किसी पुरुष का हाथ जोड़कर स्वागत करता हुआ चित्र लगाया जाए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:28, 20 मार्च 2026 (UTC) :{{od}} वर्तमान चर्चा के आधार पर चित्र हटा दिया गया है। भविष्य में चर्चा करके एक उपयुक्त चित्र जोड़ा जा सकता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:51, 18 मार्च 2026 (UTC) == Feminism and Folklore 2026 starts soon == <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;"> [[File:Feminism and Folklore 2026 logo.svg|centre|550px|frameless]] ::<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> ;Invitation to Organize Feminism and Folklore 2026 Dear Wiki Community, We are pleased to invite Wikimedia communities, affiliates, and independent contributors to organize the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026]]''' writing competition on your local Wikipedia. The international campaign will run from '''1 February to 31 March 2026''' and aims to improve coverage of feminism, women’s histories, gender-related topics, and folk culture across Wikipedia projects. ;About the Campaign '''Feminism and Folklore''' is a global writing initiative that complements the '''[[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2026|Wiki Loves Folklore]]''' photography competition. While Wiki Loves Folklore focuses on visual documentation, this writing campaign addresses the '''gender gap on Wikipedia''' by improving encyclopedic content related to folk culture and marginalized voices. ;What Can Participants Write About? Communities can contribute by creating, expanding, or translating articles related to: * Folk festivals, rituals, and celebrations * Folk dances, music, and traditional performances * Women and queer figures in folklore * Women in mythology and oral traditions * Women warriors, witches, and witch-hunting narratives * Fairy tales, folk stories, and legends * Folk games, sports, and cultural practices Participants may work from curated article lists or generate new article suggestions using campaign tools. ;How to Sign Up as an Organizer Organizers are requested to complete the following steps to register their community: # Create a local project page on your wiki [[:m:Feminism and Folklore/Sample|(see sample)]] # Set up the campaign using the '''CampWiz''' tool # Prepare a local article list and clearly mention: #* Campaign timeline #* Local and international prizes # Request a site notice from local administrators [[:mr:Template:SN-FNF|(see sample)]] # Add your local project page and CampWiz link to the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta project page]]''' ;Campaign Tools The Wiki Loves Folklore Tech Team has introduced tools to support organizers and participants: * '''Article List Generator by Topic''' – Helps identify articles available on English Wikipedia but missing in your local language Wikipedia. The tool allows customized filters and provides downloadable article lists in CSV and wikitable formats. * '''CampWiz''' – Enables communities to manage writing campaigns effectively, including jury-based evaluation. This will be the third year CampWiz is officially used for Feminism and Folklore. Both tools are now available for use in the campaign. '''[https://tools.wikilovesfolklore.org/ Click here to access the tools]''' ;Learn More & Get Support For detailed information about rules, timelines, and prizes, please visit the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 project page]]'''. If you have any questions or need assistance, feel free to reach out via: * '''[[:m:Talk:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta talk page]]''' * Email us using details on the contact page. ;Join Us We look forward to your collaboration and coordination in making Feminism and Folklore 2026 a meaningful and impactful campaign for closing gender gaps and enriching folk culture content on Wikipedia. Thank you and best wishes, '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 International Team]]''' ---- ''Stay connected:'' [[File:B&W Facebook icon.png|link=https://www.facebook.com/feminismandfolklore/|30x30px]]&nbsp; [[File:B&W Twitter icon.png|link=https://twitter.com/wikifolklore|30x30px]] </div></div> == Invitation to Host Wiki Loves Folklore 2026 in Your Country == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> [[File:Wiki Loves Folklore Logo.svg|right|150px|frameless]] Hello everyone, We are delighted to invite Wikimedia affiliates, user groups, and community organizations worldwide to participate in '''Wiki Loves Folklore 2026''', an international initiative dedicated to documenting and celebrating folk culture across the globe. ;About Wiki Loves Folklore '''Wiki Loves Folklore''' is an annual international photography competition hosted on Wikimedia Commons. The campaign runs from '''1 February to 31 March 2026''' and encourages photographers, cultural enthusiasts, and community members to contribute photographs that highlight: * Folk traditions and rituals * Cultural festivals and celebrations * Traditional attire and crafts * Performing arts, music, and dance * Everyday practices rooted in folk heritage Through this campaign, we aim to preserve and promote diverse folk cultures and make them freely accessible to the world. [[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026|Project page on Wikimedia Commons]] ; Host a Local Edition As we celebrate the '''eight edition''' of Wiki Loves Folklore, we warmly invite communities to organize a local edition in their country or region. Hosting a local campaign is a great opportunity to: * Increase visibility of your region’s folk culture * Engage new contributors in your community * Enrich Wikimedia Commons with high-quality cultural content '''[[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026/Organize|Sign up to organize]]:''' If your team prefers to organize the competition in ''either February or March only'', please feel free to let us know. If you are unable to organize, we encourage you to share this opportunity with other interested groups or organizations in your region. ;Get in Touch If you have any questions, need support, or would like to explore collaboration opportunities, please feel free to contact us via: * The project Talk pages * Email: '''support@wikilovesfolklore.org''' We are also happy to connect via an online meeting if your team would like to discuss planning or coordination in more detail. Warm regards, '''The Wiki Loves Folklore International Team''' </div> [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 13:21, 18 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikipedia&oldid=29228188 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Tiven2240@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा == <section begin="announcement-content" /> मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा की अवधि शुरू हो चुकी है। आप 9 फरवरी 2026 तक बदलावों के सुझाव दे सकते हैं। यह वार्षिक समीक्षा के कई चरणों का पहला चरण है। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Annual review/2026|मेटा के UCoC पृष्ठ पर अधिक जानकारी पाएँ और जुड़ने के लिए वार्तालाप खोजें]]। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee|सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति]] (U4C) एक वैश्विक समिति है जो UCoC का साम्यिक और सुसंगत कार्यान्वयन करने को समर्पित है। यह वार्षिक समीक्षा U4C द्वारा योजित और लागू की गई है। अधिक जानकारी तथा U4C की ज़िम्मेदारियों के लिए [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee/Charter|आप U4C चार्टर की जाँच कर सकते हैं]]। कृपया जहाँ भी उचित हो, अपने समुदाय के दूसरे सदस्यों के साथ यह जानकारी साझा करें। -- U4C के साथ समन्वय में, [[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|वार्ता]])<section end="announcement-content" /> 21:01, 19 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=29905753 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकि सम्मेलन 2026 समुदाय सहभागिता सर्वे == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप इस वर्ष जुलाई में हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इससे संबंधित हिंदी विकिपीडियनों की रुचि तथा महत्वपूर्ण विषयों को समझने के लिए एक सर्वेक्षण किया जा रहा है। [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeWaqfyOlr9hS7Ef5eXg_Y4mPK8gj1cnzaIBAbQXbjM6KH4aw/viewform हिंदी विकि सम्मेलन 2026] भरकर हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने में सहयोगी बनें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 09:07, 31 जनवरी 2026 (UTC) [[सदस्य:Vishal K Pandey|Vishal K Pandey]] ([[सदस्य वार्ता:Vishal K Pandey|वार्ता]]) 18:11, 26 जनवरी 2026 (UTC) ==गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड== विकिडेटा में गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का लोगो Guinness World Records logo.svg नाम से उपलब्ध है। इसका हिन्दी में उपयोग करना संभव बनाएं। अधिकार संपन्न लोग ऐसा कर सकते हैं। '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:28, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:00, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::समस्या सुलझाने के लिए आपका धन्यवाद - '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) LimcaBookofRecords.jpg इस फाइल के बारे में भी विचार करें। धन्यवाद '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:35, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:02, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::आपको धन्यवाद- '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) == शीर्षक परिवर्तन के लिए अनुरोध == Namaste, I would like the article title '''[[डी एन ए की नकल]]''' to be changed to '''डीएनए प्रतिकृति''', as this form is more accurate and is the one used in most scientific literature. Sorry for writing in English and if this is not the right place to make the request. I have been on a long break from Wikipedia and have forgotten the proper procedure for requesting a title change.<b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 15:32, 3 फ़रवरी 2026 (UTC) :नमस्ते, मैं चाहता हूँ कि लेख का शीर्षक [[डी एन ए की नकल]] बदलकर 'डीएनए प्रतिकृति' कर दिया जाए, क्योंकि यह रूप ज़्यादा सही है और ज़्यादातर वैज्ञानिक किताबों में इसी का इस्तेमाल होता है।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 18:54, 5 फ़रवरी 2026 (UTC) == ''कंप्यूटिंग'' या ''अभिकलन'' == हिन्दी में कंप्यूटिंग को [[अभिकलन]] भी कहा जाता है। परंतु इसके बाद भी कुछ पृष्ठ के नाम [[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] या [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] है। प्रोग्रामिंग को [[क्रमानुदेशन]] कहा जाता है परंतु आधे से ज्यादा निबंध के शीर्षक में [[प्रोग्रामिंग भाषा]] लिखा गया है। हमें निबंध के शीर्षक एक समान रखने चाहिए। जैसे सारे निबंध के शीर्षक में प्रोगामिंग के जगह क्रमानुदेशन लिखा रहेगा। अन्य नाम हम निबंध के मुख्य भाग में लिख सकते है या redirect कर सकते है। जैसे- '''क्रमानुदेशन भाषा''', जिसे '''प्रोग्रामिंग भाषा''' भी कहते है..... [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 11:16, 7 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, नमस्ते! आप एक समाधान प्रस्तावित करें - उसपे चर्चा करके यह कार्य किया जा सकता है। आपका और सभी का स्वागत है इस एकरूपता लाने के प्रयास के लिए। सादर! --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:03, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) ::[[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] का नाम बदलकर [[मोबाइल अभिकलन]] कर देना चाहिए। [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] का [[क्लाउड अभिकलन]] तथा [[प्रोग्रामिंग भाषा]] का नाम [[क्रमानुदेशन भाषा]] कर देना चाहिए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:40, 8 मार्च 2026 (UTC) == हिन्दी विकिपीडिया से गायब हो चुके पुराने संपादक == तकरीबन 8 साल बाद मैं विगत कुछ दिनों से विकिपीडिया पर सक्रिय हूं। इस बीच देख रहा हूं कि यहां से वो तमाम लोग गायब हो चुके हैं जो एक समय में लगातार सक्रिय रहते थे। नए लेखों की गुणवत्ता स्तरीय थी। लेकिन इधर हिन्दी विकिपीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो या तो आत्मप्रचार है या फिर नौसिखियों द्वारा लगातार किया जा रहा प्रयोग। आज मैंने लगभग 25 लोगों को अपनी ओर से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की जो एक जमाने में प्रबंधक रह चुके हैं और जिन्होंने विकिपीडिया पर काफी योगदान दिया है। लेकिन सबने यही कहा कि वो अब सक्रिय नहीं हैं। यह हिन्दी विकिपीडिया के लिए ठीक नहीं है। यद्यपि कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में विकिपीडिया और खासतौर पर अंग्रेजी से इतर भाषाओं में इस ज्ञानकोश की अब पहले जैसी आवश्यकता रह नहीं गई है। क्योंकि अब अंग्रेजी की सामग्री एक क्लिक पर किसी भी दूसरी भाषा में उपलब्ध है। फिर भी हिन्दी में लिखे गए मूल लेखों का महत्व तो हमेशा बना रहेगा। इसलिए विकिपीडिया संपादक समुदाय को एक बार फिर अपना तुच्छ अहंकार छोड़कर दूर जा चुके लोगों को दोबारा सक्रिय करना चाहिए। --'''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 13:54, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:कलमकार|कलमकार]] सर ! आठ साल (हुये तो नहीं!) बाद आप का स्वागत - हमारी ओर से। :कुछ उधार का अर्ज़ कर रहा (बुरा मत मानियेगा) :''"ऐसा नहीं कि उन से ''(मतलब विकि से)'' मोहब्बत नहीं रही :''जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही'' :'' :''सर में वो इंतिज़ार का सौदा नहीं रहा'' :''दिल पर वो धड़कनों की हुकूमत नहीं रही''"'' :यह हमारी स्थिति है। :और जो चले गए उनकी स्थिति यह है कि :''चेहरे को झुर्रियों ने भयानक बना दिया'' :''आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही'' --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:00, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :कलमकार जी, ज्ञानकोष में सक्रियता के प्रति आपकी चिंता वाजिब है। मैंने यहां पर देखा है कि बहुत से सदस्यों द्वारा महनत से बनाए गए पृष्ठ कोई न कोई पैमाना बताकर शीघ्र हटाने के लिए नामांकित कर दिए जाते हैं, फिर कोई अन्य सदस्य उन्हें हटा भी देता है। शायद इससे हताश होकर बहुत से संपादक ज्ञानकोष को छोड़कर चले गए। बहुत से संपादकों के तो सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए हैं। सम्पादकों की सक्रियता में कमी की एक वजह यह भी हो सकती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:21, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, क्या आप कुछ ऐसे सदस्य पृष्ठों के उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें हटाया गया था, और कुछ ऐसे पृष्ठ भी जिन्हें किसी गलत मानदंड के तहत शीघ्र हटाने के लिए नामांकित किया गया और बाद में हटा दिया गया? यदि आपकी चिंता जायज़ होगी, तो अवश्य ही कोई समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:54, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) :::DreamRimmer जी, हाल ही के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, जहां प्रतीत होता है कि संपादकों द्वारा शिद्दत से बनाए गए कुछ पृष्ठों को हटा दिया गया: :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#why are you remove this article "सुमरत सिंह"]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#कृपया गोप्रेक्षेश्वर लेख की पुनः समीक्षा करें और कॉपीराइट उल्लंघन का टैग हटाने की कृपा करें]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#सहायता नोट]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#डॉ. विनोद कुमार पृष्ठ: शीघ्र हटाने नामांकन पर प्रतिक्रिया]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#अभिनव अरोड़ा के पृष्ठ हटाने के विषय में]] :::हटाए गए पृष्ठों की सामग्री देखे बगैर मापदंड की सटीकता पर टिप्पणी करना संभव नही है परंतु बहुत से ऐसे पृष्ठ भी हटाए गए हैं, जहां संपादक लेख में संशोधन करने के लिए तैयार थे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 07:56, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपको प्रचार सामग्री चाहिए या केवल विवाद खड़ा करना उद्देश्य रहा है? यदि आपको प्रचार सामग्री चाहिए तो बताइयेगा, ईमेल से भेज देता हूँ। बैठकर देखते और समझते रहियेगा। अन्यथा आपने मेरा वार्ता पृष्ठ यहाँ क्यों जोड़ा है पता नहीं। मैंने सभी सन्देशों का उत्तर भी दे रखा है। वर्तमान में भी [[विकिपीडिया:शीह|शीघ्र हटाने]] के लिए बहुत लेख नामांकित हैं। कृपया उनकी भी समीक्षा कर लेते समय रहते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:40, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने ऊपर जिन चर्चाओं का उल्लेख किया है, उनसे संबंधित लेख मुझे किसी भी प्रकार से गलत मानदंड के अंतर्गत हटाए गए नहीं लगते। उन विषयों की उल्लेखनीयता और उपलब्ध सामग्री के आधार पर संजीव जी द्वारा लिया गया निर्णय बिल्कुल उचित था, और ऐसी स्थिति में मेरा निर्णय भी यही होता। आपने यह भी कहा कि ऐसे पृष्ठ हटाए गए जहाँ संपादक लेख में सुधार करने के लिए तैयार थे, परंतु सभी जानते हैं कि कोई अनुल्लेखनीय लेख केवल बार-बार संपादन या सुधार करने से उल्लेखनीय नहीं बन जाता। किसी विषय की उल्लेखनीयता तभी स्थापित होती है जब उसे विश्वसनीय स्रोतों में पर्याप्त स्थान मिले, और इसमें स्वाभाविक रूप से समय लगता है। शीघ्र हटाने की नीति इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है; यदि किसी लेख पर सही मानदंड के अनुसार टैग लगाया गया है, तो प्रबंधक उसे किसी भी समय हटा सकता है। यदि लेखक कोई टिप्पणी जोड़ता है, तो भी प्रबंधक उस टिप्पणी से संतुष्ट न होने पर लेख को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं होता। आपने यह भी कहा था कि सदस्यों के सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए, लेकिन इसके समर्थन में आपने कोई लिंक प्रस्तुत नहीं किया। मेरा मानना है कि किसी भी सदस्य के कार्य पर प्रश्न तभी उठाया जाना चाहिए जब पर्याप्त प्रमाण हों; अन्यथा यह बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आक्षेप और निराधार आरोप की श्रेणी में आता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:20, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, जो आपकी नज़र में प्रचार हो, वह संभवतः दूसरों के लिए जानकारी हो सकती है। :::::DreamRimmer जी, ऐसे भी बहुत से पृष्ठ देखें हैं, जहां अनेक विश्वसनीय स्रोत दिए गए थे, उन्हें भी अनुल्लेखनिय बता कर हटाया गया। उदाहरण के लिए: :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#सुमन कुमार घई]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/अप्रैल 2022#रचित यादव]]। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:41, 20 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, समस्या यह ही है कि आप इसे मेरे या आपके नज़र से देख रहे हो। एकबार नज़र हटाकर देखियेगा। "सुमन कुमार घई" नामक लेख पर 15 वर्षों से बिना स्रोत की कुछ सामग्री लिखी थी और बाद में [[विशेष:योगदान/सुमन कुमार घई|इसी नाम के सदस्य]] ने सामग्री हटाकर साहित्य कुंज की कड़ी जोड़ दी। इसी तरह अन्य लेखों को भी या तो सम्बंधित व्यक्ति ने स्वयं (आपके अनुसार उनकी नज़रों में वो स्वयं बहुत उल्लेखनीय व्यक्ति हैं) ने बनाया या अपने किसी रिश्तेदार से बनवाया। यदि आप बिना किसी स्रोत के स्वयं को उल्लेखनीय मानने लग जाओ तो क्या वो उल्लेखनीय हो जायेगा? एकबार इंटरनेट पर उपरोक्त व्यक्तियों के बारे में खोजकर देखें कि इनकी उल्लेखनीयता क्या है? उनके प्रसिद्धि के क्षेत्र में उन्हें कौनसे पुरस्कार मिले हैं? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:26, 25 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य: संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, उल्लेखनीयता का मापदंड इसलिए बनाया गया था, कि यदि एक ही विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक दावेदार आ जाते हैं, तो इस नाम से उस विषय या व्यक्ति का लेख बनेगा जो अधिक उल्लेखनीय होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि विकिपीडिया के संदर्भ में एक phrase कई बार सामने आता है, जिसमें लिखा होता है, "sum of all knowledge""। कहने का तात्पर्य यह है कि उल्लेखनीयता के नाम पर तब तक कोई पृष्ठ नही हटाना चाहिए, जब तक उस विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक असंबंधित संभावनाएं न हों। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 'रमेश सिंह' के नाम से उद्धरण सहित लेख बना रहा है तो वह लेख रहने देना चाहिए, जब तक कि कोई उससे भी अधिक उल्लेखनीय 'रमेश सिंह' नाम के व्यक्ति पर उद्धरण सहित लेख बनाने का दावेदार नहीं आ जाता। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, बहुत अच्छा अर्थ निकाला है आपने। साथ में अपने तर्क के पक्ष में कोई स्रोत भी दे दीजियेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:39, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, [[:en:Wikipedia:Notability]] की भूमिका में लिखा है - ''Information on Wikipedia must be'' '''verifiable'''''... Wikipedia's'' '''concept of notability applies this basic standard''' ''to avoid indiscriminate inclusion of topics... Determining notability does not necessarily depend on things such as fame, importance, or popularity''. -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:53, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने इसके नीचे वाला भाग क्यों नहीं पढ़ा? यद्यपि वो उस विषय की स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं जो नीचे बताए गए दिशानिर्देशों को पूरा करता हो। इसके बाद विस्तार से बहुत कुछ लिखा हुआ है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:04, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::उसके नीचे भी पढ़ा है, वहां लिखा है कि यदि कोई सामग्री एक नया लेख बनाने के लिए उल्लेखनीय नहीं है, तो उस सामग्री को किसी अन्य संबंधित पृष्ठ में विलय कर देना चाहिए। यह सही भी है यदि वह सामग्री स्रोत/संदर्भ युक्त है तो। ऐसा भी देखा गया है कि राष्ट्रपति इत्यादि से अनेक उल्लेखनीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति पर बना लेख उल्लेखनीयता के नाम पर हटा दिया गया परन्तु उसमें दर्ज संदर्भित सामग्री कहीं और संजोई नहीं गई, न ही लेखक को उसे दर्ज करने के लिए किसी अन्य पृष्ठ की ओर निर्देशित किया गया। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:16, 31 मार्च 2026 (UTC) {{od|10}}@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से व्यक्ति उल्लेखनीय कैसे हो गया? विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में [[दीक्षान्त समारोह]] के समय डिग्री वितरण राष्ट्रपति या राज्यपाल के हाथों से करवाया जाता है। आपके अनुसार वो सभी लोग उल्लेखनीय हो गये? सम्बंधित लोगों के नामों की सूची सम्बंधित संस्थान के आधिकारिक जालस्थल पर मिल जायेगा जिसे आप विश्वसनीय स्रोत कह सकते हो। राष्ट्रपति के हाथों से मिला पुरस्कार इतना उल्लेखनीय होना चाहिए जो सम्बंधित व्यक्ति को किसी विशिष्ट कार्य के लिए मिला हो और उस कार्य के कारण व्यक्ति उल्लेखनीय हुआ हो, तो उसे उल्लेखनीय माना जाता है, न कि केवल राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार प्राप्त करने से। ऐसे समारोह राष्ट्रपति भवन में हमेशा होते हैं और उनके समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छपते हैं।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:08, 1 अप्रैल 2026 (UTC) : उदाहरण के लिए, क्या इस ([[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]) पृष्ठ को हटाते समय, इसमें उपलब्ध संदर्भित जानकारी किसी अन्य पृष्ठ पर स्थानांतरित की गई? -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 01:49, 3 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा == नमस्ते, मैं हिंदी विकिपीडिया पर लॉग-इन हूँ। मेरा खाता पुराना है और मैंने कई संपादन भी किए हैं, फिर भी मुझे किसी भी लेख में “स्थानांतरण (Move)” का विकल्प दिखाई नहीं दे रहा। मैंने डेस्कटॉप मोड और अलग ब्राउज़र से भी कोशिश की है। कृपया बताएं कि यह समस्या क्यों आ रही है और इसका समाधान क्या है। धन्यवाद। {{unsigned|ROLEXMEENA}} : अंग्रेजी ज्ञानकोष की तरह यहां भी 'Move' (पृष्ठ स्थानांतरण) का विकल्प होना चाहिए, ताकि संपादक अपने सदस्य स्थान में पृष्ठ बनाकर उसे मुख्य नाम स्थान में स्वयं स्थापित कर सकें। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:27, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) =="अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026" में भाग लें == हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप द्वारा [[अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर विकिपीडिया एवं विकिस्रोत पर संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। # [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—15 फ़रवरी 2026 से 21 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव। # [[s:विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—21 फ़रवरी 2026 से 28 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन गुणवत्ता संवर्द्धन प्रतियोगिता। :इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 04:34, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) == प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन == मैंने [[विकिपीडिया:प्रबन्धन अधिकार हेतु निवेदन#DreamRimmer|यहाँ]] प्रबंधक व अन्तरफलक प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन किया है। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 17:11, 15 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधन अधिकार मिलने पर बहुत बधाई। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:33, 8 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक कैसे बदले == महोदय मुझे बताए कि शीर्षक बीजाणुउद्भिद को कैसे बदलकर बीजाणुद्भिद करे हृदय से धन्यवाद [[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] ([[सदस्य वार्ता:VIKRAM PRATAP7|वार्ता]]) 04:39, 18 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधकों को [[#हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा|कहा था]] कि 'पेज मूव' का ऑप्शन सभी के लिए चालू कर दिया जाए, परंतु अभी तक नहीं किया गया है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:31, 8 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, यह अधिकार प्रबन्धकों के पास नहीं है। बाकी आप तर्क एवं स्रोत के साथ लिखेंगे तो स्थानान्तरण कर दिया जाता है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:42, 18 मार्च 2026 (UTC) :::परंतु यह विकल्प अंग्रेजी ज्ञानकोष पर कैसे उपलब्ध हुआ!? [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:45, 20 मार्च 2026 (UTC) == Reference Previews – experiment == Hi, I’m Johannes from [[m:WMDE Technical Wishes|WMDE Technical Wishes]]. Sorry for writing in English, please support us by providing a translation! Our team is currently working on [[:m:WMDE Technical Wishes/References|improvements to references]], e.g. [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|Sub-referencing]]. In 2021 we developed [[:m:WMDE Technical Wishes/ReferencePreviews|Reference Previews]] in order to provide a MediaWiki feature to preview references when hovering over the footnote marker. Over the course of our current work we’ve noticed that using Reference Previews doesn’t seem to be intuitive for some readers and we would like to improve this. <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Problem === <div class="mw-collapsible-content"> In our usability tests, we repeatedly notice desktop readers – unaware of Reference Previews or how to use the feature – clicking on footnotes instead of hovering over them. Many are confused when they end up in the reference list and don’t know how to jump back to the text passage they were previously reading. Many readers seem unaware that both the ↑ arrow in the reference list and the <sup>a b</sup> (for re-used references) can be used to jump back. This makes jumping to the reference list rather unpleasant, especially in long articles. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Assumption === <div class="mw-collapsible-content"> We assume that most readers do not want to jump to the reference list, but rather want to click on the footnote to open Reference Previews, which provide them with the reference information for the text passage they have just read. At the same time, we believe that some readers – e.g. those who want to delve deeper into a topic rather than just quickly researching a piece of information – are still interested in conveniently accessing the reference list. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Idea === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to try adjustments to Reference Previews in order to best meet the needs of different readers. Specifically, we want to prevent readers from accidentally ending up in the individual reference list; jumping there should be a conscious decision. When clicking on a footnote marker, we want to display Reference Previews instead of jumping to the reference list. The pop-up remains permanently visible until clicking on the "x" or anywhere outside the preview to close it. In addition Reference Previews will provide a link to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – current version.png|Reference Previews – current version File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed version when '''clicking on a footnote marker''' </gallery> When hovering over a footnote marker without clicking on it, we want to display a simplified version of Reference Previews – without the settings icon and the resulting empty space. When moving the mouse pointer over the pop-up, a note will appear indicating that you can click for further options. This will open the persistent version of Reference Previews with a link to allow users to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – hover-state.png|Proposed version when '''hovering over the footnote marker''' File:Reference Previews mock-up – hover-state and options.png|Proposed version when '''hovering over the Reference Preview''' File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed (persistent) version when '''clicking on the hover preview''' </gallery> By improving the usability of Reference Previews, we also hope to mitigate the issue that reference lists with a large number of (reused) references (or [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|sub-references]]) can be confusing for some readers. In addition, the proposed version when hovering over a footnote marker is more compact than the current version. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Experiment === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to test the proposed changes in an [[:en:A/B testing|A/B test]] on several wikis. We want to measure how many readers click on a footnote marker and then proceed to jump to the reference list using the proposed version of Reference Previews compared to readers who receive the current version of Reference Previews. In addition, we will measure how many readers in both groups access the reference list via the table of contents. This will give us data-based insights into how many clicks on the footnote unintentionally open the reference list and how many readers only want to use Reference Previews. We would like to run our experiment on the following Wikipedia language versions: de, pl, fr, sv, fa, hu, hi, my, tl, lv, fy, hr. 10% of readers will see our modified version of Reference Previews in order to obtain sufficient data. The experiment is expected to run for 1-2 weeks at the end of March. We'll restore the current version of Reference Previews for all readers until we have evaluated the experiment, discussed the results with the community, and decided on further steps. </div> </div> We look forward to your feedback [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/Reference Previews|on our talk page]] – or just reply to this post! Once the experiment is ready to go, we will also provide a link that you can use to test the changes yourself. --[[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 12:22, 20 फ़रवरी 2026 (UTC) :As indicated on our project page [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=WMDE_Technical_Wishes/References/Reference_Previews&diff=prev&oldid=30215686], we will only test the proposed change when ''clicking'' on a footnote. Reference Previews will remain ''unchanged when hovering'' over a footnote marker. Reasons for this were concerns that the proposed transition from hover to persistent preview could be disruptive or at least feel unusual when interacting with reference content in the hover preview (e.g. when clicking on links). [[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 13:30, 9 मार्च 2026 (UTC) ==विकि लव्ज़ रमजान 2026== <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;> [[File:Wiki Loves Ramadan Logo Black hi.svg|Left|200px|frameless]] प्रिय विकी समुदाय, आपको [[विकिपीडिया:विकि लव्ज़ रमजान 2026|विकी लव्ज रमज़ान 2026]] में भाग लेने के लिए विनम्रतापूर्वक आमंत्रित किया जाता है, जो कि विभिन्न क्षेत्रों से इस्लामी इतिहास और इस्लामी सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने के लिए विकिपीडिया, विकिवॉयज पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय लेख लेखन प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता 20 फरवरी से 20 अप्रैल 2025 तक आयोजित की जायेगी अभी भाग लें और पुरस्कार के विजेता बने है। धन्यवाद '''[[:m:Wiki Loves Ramadan 2026|विकी लव्स रमज़ान 2026 इंटरनेशनल टीम]]''' -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 15:51, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) </div> == इस हफ्ते पेस्ट जाँच आ रही है == नमस्ते। [[mw:Special:MyLanguage/Help:Edit check#Paste_check|पेस्ट जाँच]] एक प्रकार की [[mw:Special:MyLanguage/Edit check|सम्पादन जाँच]] सुविधा है जो तब दिखाई देगी जब यथादृश्य सम्पादिका का प्रयोग कर रहा कोई नवागंतुक किसी लेख में लंबा पाठ पेस्ट करे, अगर प्रणाली द्वारा यह निर्धारित किया जाए कि वह सामग्री सम्पादक ने संभवतः स्वयं नहीं लिखी है। इस सुविधा का यहाँ पर पिछले वर्ष परीक्षण किया गया था, और शोध के [[mw:Edit check/Paste Check#A/B_Experiment|परिणाम]] सकारात्मक थे: इस जाँच का सामना करने वाले सम्पादकों के द्वारा किए गए सम्पादनों में से पूर्ववत किए गए सम्पादनों की संख्या में नियंत्रण समूह की तुलना में 18% घटाव आया। डिफ़ॉल्ट से पेस्ट जाँच उन सम्पादकों को दिखाई जाएगी जिन्होंने लोकल रूप से 100 या उससे कम सम्पादन किए हुए हों। यह [[{{#special:EditChecks}}]] के माध्यम से प्रबंधकों द्वारा बदला जा सकता है। जब इस आवश्यकता को पूरा करने वाला कोई सम्पादक कहीं और से कम-से-कम 50 कैरेक्टर्स लंबा पाठ पेस्ट करता है, पेस्ट जाँच उससे पूछेगी कि सामग्री उसने स्वयं लिखी है या फिर नहीं। [[mw:Special:MyLanguage/Edit check/Tags|सम्पादनों को टैग किया जाएगा]] ताकि अनुभवी सदस्य उन सम्पादनों का पता लगा पाएँ जहाँ पर पेस्ट जाँच दिखाई गई थी। अंतिम सम्पादन में कोई भी पेस्ट किया हुआ पाठ न होने के बावजूद भी टैग दृश्य होगा। यह सुविधा इस हफ्ते के अंत तक ग्लोबल स्तर पर जारी की जाएगी। इसे परखने में सहायता करने के लिए आप सबका धन्यवाद। [[सदस्य:Quiddity (WMF)|Quiddity (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:Quiddity (WMF)|वार्ता]]) 00:02, 3 मार्च 2026 (UTC) == अली ख़ामेनेई == <nowiki>[[अली ख़ामेनेई]]</nowiki> को हिंदी में <nowiki>[[अली ख़मीने]]</nowiki> लिखा जाना चाहिए, कृपया इसे बदलिए। -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 13:28, 3 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, यह चर्चा [[वार्ता:अली ख़ामेनेई]] पृष्ठ पर होनी चाहिए। यदि आपको लगता है कि वर्तमान नाम सही नहीं है, तो आप [[साँचा:नाम बदले]] का प्रयोग करते हुए पृष्ठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकते हैं। मेरी व्यक्तिगत राय में वर्तमान नाम सही है, क्योंकि [https://www.bbc.com/hindi/articles/c747xp3pke8o BBC], [https://www.aajtak.in/trending/photo/iran-supreme-leader-ali-khamenei-death-reaction-celebration-mourning-tstf-2484137-2026-03-02 Aaj Tak], [https://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/bahraich-shia-community-ali-khamenei-death-mourning-ban-juloos-local18-10235065.html News18] और [https://ndtv.in/world-news/iran-us-tensions-live-updates-trump-ayotallah-khamenei-sanctions-military-buildup-explosions-nuclear-tensions-us-israel-iran-tension-live-11148367 NDTV] सहित कई मीडिया संस्थान भी “ख़ामेनेई” ही लिखते हैं और हिंदी उच्चारण के अनुसार भी यही नाम उचित प्रतीत होता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 13:49, 3 मार्च 2026 (UTC) ::: @[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, फ़ारसी में नाम علی خامنه‌ای लिखा जाता है। इसी आधार पर देवनागरी में इसका निकटतम लिप्यंतरण अली ख़ामेनेई होगा। ::: यहाँ خ ध्वनि के लिए “ख़” का प्रयोग किया जाता है और अंतिम –ई ध्वनि को दर्शाने के लिए “ई” आता है। इसलिए अली ख़ामेनेई फ़ारसी उच्चारण के सबसे क़रीब माना जा सकता है। --[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 01:29, 9 मार्च 2026 (UTC) == Lua त्रुटि == जी, जब भी में [[मॉड्यूल:Designation/list]] नामक पृष्ठ को बनाने का प्रयास करता हूँ, मुझे यह संदेश मिलता है: Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'. मैं अंग्रेज़ी विकिपीडिया के स्रोत कोड का प्रयोग करता हूँ, फिर भी यह संदेश आता है। क्या इसका कोई उपाय है? [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 10:14, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:16, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद ^^ [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 15:45, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] मैंने स्वतः परीक्षित अधिकार के लिए निवेदन भेजा है। यदि आप चाहते हैं तो कृपया अपना मत दें। फिर से धन्यवाद! :3 [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 16:26, 18 मार्च 2026 (UTC) :::समय-समय पर मेरा ध्यान आपके संपादनों पर जाता रहता है। हालाँकि मैंने आपके बनाए लेखों को ठीक से नहीं देखा है, लेकिन नामांकन में दिए गए लेखों में से [[रोलिन' (एयर रेड व्हीकल)]] देखा तो वह मुझे लगभग पूरा मशीनी अनुवाद लगा। इसी तरह दूसरे उदाहरण, जैसे [[तलत जाफ़री]] आदि, भी मुझे मशीनी अनुवाद जैसे लगे। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं इस विषय में आपकी कोई विशेष मदद कर पाऊँगा। बाकी अन्य सदस्य भी आपके नामांकन को देखकर अपने सुझाव दे सकते हैं। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:52, 20 मार्च 2026 (UTC) == सदस्य पृष्ठ हटाने हेतु अनुरोध == नमस्ते प्रशासक महोदय, मैं 'Gahininath gutte' इस खाते का स्वामी हूँ। मैं अपना 'सदस्य वार्ता' पृष्ठ (User Talk Page) हटाना चाहता हूँ क्योंकि यह गूगल सर्च में मेरी निजी जानकारी दिखा रहा है। मैंने लॉगिन किया है, लेकिन सुरक्षा फ़िल्टर के कारण मैं स्वयं <nowiki>{{db-u1}}</nowiki> टैग नहीं लगा पा रहा हूँ। कृपया मेरी सहायता करें और इस पृष्ठ को हटा दें। धन्यवाद। [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 12:40, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{Ping|Gahininath gutte}} नमस्ते! हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार तभी हटाए जाते है, ज़ब उसपे अत्यधिक बर्बरता या निजी जानकारी और गाली गालोच हुआ हो, आमतौर पर सदस्य वार्ता नही हटाए जाते है,अगर आप सदस्य पृष्ठ की बात कर रहे है, तो आप 10 सकारात्मक संपादन करने के उपरांत सदस्य पृष्ठ को हटवाने ले लिए अनुरोध कर सकते है,या हटाने हेतु संबंधित साँचा लगा सकते है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 12:52, 12 मार्च 2026 (UTC) ::<blockquote>महोदय, जवाब के लिए धन्यवाद। मैं समझता हूँ कि वार्ता पृष्ठ हटाना नियमों के विरुद्ध है। लेकिन यह पृष्ठ गूगल सर्च में मेरा नाम और निजी संदर्भ दिखा रहा है, जिससे मुझे प्राइवेसी की समस्या हो रही है। अगर आप इसे हटा नहीं सकते, तो कृपया इस पृष्ठ पर '''<nowiki>__NOINDEX__</nowiki>''' टैग लगा दें ताकि यह गूगल सर्च इंजन में दिखाई न दे। साथ ही, कृपया इस पृष्ठ की पुरानी सामग्री (History) को भी छुपा दें। आपकी बहुत कृपा होगी।"</blockquote> ::[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:03, 12 मार्च 2026 (UTC) ::"नमस्ते, मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद। मैं विकिपीडिया पर अब सक्रिय नहीं रहना चाहता और अपनी निजता (Privacy) की सुरक्षा के लिए 'Right to Vanish' के तहत इस पृष्ठ को स्थायी रूप से (Permanently) हटाने का अनुरोध करता हूँ। इसमें मेरा वास्तविक नाम शामिल है जो गूगल सर्च में दिखाई दे रहा है और यह मेरी निजता का उल्लंघन है। मैं चाहता हूँ कि मेरे खाते से जुड़ी यह पहचान पूरी तरह से मिटा दी जाए। कृपया मेरी सहायता करें।" [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:06, 12 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] जी, मैंने आपके वार्ता पृष्ठ का एक अवतरण हटा दिया है, जिसमें आपकी व्यक्तिगत जानकारी थी। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:56, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::अभि भी मेरा नाम गुगल सर्च मैं दिख रहा है मुझे Wikipedia पर रहना ही नहीं कृपया यहा पर मेरा जो अकाउंट है उसे हटा दे पुरी तरह सें... ::::धन्यवाद...! [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 15:14, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::इसके लिए आप [[विशेष:GlobalVanishRequest]] पर उपलब्ध फ़ॉर्म भर सकते हैं। कृपया अनुरोध करने से पहले फ़ॉर्म पर दिए गए निर्देशों को अवश्य पढ़ लें। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:19, 18 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == [[:en:Embarrasingly parallel]] का शीर्षक अनुवाद में क्या होना चाहिए- * [[एम्बैरसिंगली पैरेलल]] या * [[अति-समानांतरीय]] [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:13, 15 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, सम्भवतः आपके पास टाइपो हुआ है और आप [[:en:Embarrassingly_parallel|Embarrassingly parallel]] की बात कर रहे हो। parallel के लिए हिन्दी में समानांतर शब्द काम में लेते हैं और शब्दकोश नामक वेबसाइट पर इसका अनुवाद अव्यवस्थित समानांतर लिखा है। लेकिन मुझे तार्किक तौर पर कोई तुल्य शब्द याद नहीं आ रहा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:50, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, शब्दकोश नामक वेबसाइट पर एंबैरिसिंगली (Embarrassingly) का अनुवाद "शर्मनाक रूप से" लिखा है, लेकिन हम इसे कंप्यूटर विज्ञान या कोडिंग के संदर्भ में लिख रहे हैं तो क्या "सहज समानांतर" लिख सकते है? इसका मतलब यह है कि समानांतर करने में कोई विशेष दिमाग या मेहनत नहीं लगती। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 17:36, 19 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] जी, इस स्थिति में अंग्रेज़ी वाले का ही देवनागरी में उच्चारण लिख दीजिएगा। लेख की शुरूआत में शब्दशः अनुवाद लिख सकते हैं और भविष्य में विश्वसनीय स्रोत मिलने पर उचित स्थानान्तरण कर दिया जायेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:29, 25 मार्च 2026 (UTC) == Request for Comment: VisualEditor automatic reference names == <div lang="en" dir="ltr"> Hi, I’m Johannes from [[:m:Wikimedia Deutschland|Wikimedia Deutschland]]’s [[:m:WMDE Technical Wishes|Technical Wishes team]]. Apologies for writing in English. {{Int:Please-translate}}! We are considering to work on [[:m:Community Wishlist/W17|Community Wishlist/W17: Improve VE references' automatic names and reuse]]. This has been a long-term issue for wikitext editors (see e.g. [[:en:WP:VisualEditor/Named references]]) which has been among the top-voted wishes in several [[:m:Community Wishlist Survey|Community Wishlist Surveys]], e.g. [[:m:Community Wishlist Survey 2017/Editing/VisualEditor: Allow editing of auto-generated references before adding them|2017]], [[:m:Community Wishlist Survey 2019/Citations/VisualEditor: Allow references to be named|2019]], [[:m:Community Wishlist Survey 2022/Editing/VisualEditor should use human-like names for references|2022]] or [[:m:Community Wishlist Survey 2023/Editing/VisualEditor should use proper names for references|2023]]. We would like your input on the [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Proposed solutions|solutions]] proposed on our project page: '''[[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names]]'''. We are considering several options, which can be combined if desired by the community. * Changing the default pattern for automatically generated reference names (currently <code>":n"</code>, e.g. <code>":0"</code>, <code>":1"</code>...) to use the [[:mw:Help:Reference Previews#Exposed reference types|reference type]] instead (e.g. <code>"book_reference-1"</code>). * Providing a simple mechanism for communities to configure a different default name. * Generating automatic reference names based on the [[:en:domain name|domain name]] (if it’s a web citation). * Generating automatic reference names based on template parameters (e.g. "title" or "last"+"first") – defined by the community. === Feedback === [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names|Visit our project page]] to read about our proposal in detail and share your thoughts [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Request for comment|on metawiki]]. '''Please note''': We will only implement a solution if there’s clear consensus among the global community. Our intention is not to build the perfect solution, but to find a simple and lean one that alleviates the pain caused by auto generated names. We are aware that some experienced VisualEditor users might prefer an option to manually change reference names in VisualEditor, but such a UX intervention is difficult to achieve across reference types and thus out of scope for our team, we can only improve the auto-naming mechanism. We are happy about suggestions for improving certain details of the proposed solutions. Any other feedback and alternative proposals are also welcome – even though it’s out of scope for us, it might still be relevant for future work on this topic. Please support us interpreting consensus by clearly indicating your opinion (e.g. by using support/neutral/oppose templates). We are aware of [[:en:WP:NOTVOTE]], but given that we are facilitating this discussion with users from different wikis, potentially commenting in their native language, clearly indicating your position helps us avoid misunderstandings. Thank you for participating!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[User:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[User talk:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]])</bdi> 11:15, 19 मार्च 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johannes_Richter_(WMDE)/MassMessageRecipients&oldid=30281362 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johannes Richter (WMDE)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मार्च गतिविधि अपडेट == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ: * 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है। * गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया। * फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ। * आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में सामुदायिक बैठक निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं। : हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC) == अंगिका और मैथिली विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" मे भाग ले == नमस्ते , विकिपीडियन ‎[https://anp.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_आरू_लोकगाथा_अंगिका_२०२६ अंगिका] और [https://mai.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_एवं_लोककथा_२०२६ मैथिली] विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" प्रतियोगिता चल रही है, और इनाम जीते। ‎तिथि: 23 मार्च - 31 मार्च 2026 (8 दिन शेष) [[सदस्य:Surajkumar9931|Surajkumar9931]] ([[सदस्य वार्ता:Surajkumar9931|वार्ता]]) 05:33, 23 मार्च 2026 (UTC) == Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki == [Please help translate this message] Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[foundation:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contact_Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[metawiki:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[metawiki:Talk:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|talk page]]. –– [[सदस्य:STei (WMF)|STei (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:STei (WMF)|वार्ता]]) 13:21, 25 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == मैं [[:en:Perpetual calendar]] को अनुवाद कर रहा हूं। इसका शीर्षक क्या मुझे [[परपेचुअल पंचांग]] रखना चाहिए ? इसका तत्सम क्या हो सकता है क्योंकि मुझे इसका कही हिन्दी में प्रयोग नही मिला। [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:40, 25 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, आप की जानकारी के लिए कुछ सन्दर्भ [https://uptoword.com/en/perpetual-calendar-meaning-in-hindi?utm_source=chatgpt.com] [https://fj.voguetimebalfie.com/info/are-perpetual-calendar-watches-accurate-100990981.html] [https://www.google.co.th/books/edition/N%C4%ABh%C4%81rik%C4%81/t6hHAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&printsec=frontcover] [https://www.google.co.th/books/edition/Bhajpa_Ka_Abhyuday_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A4%BE_%E0%A4%95/Cet5EAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&pg=RA1-PA1970&printsec=frontcover] दिए गए है, इन के हिसाब से सतत पंचांग या स्थायी पंचांग लिखा जा सकता है। बाकि जैसी सभी की राय हो। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 08:32, 28 मार्च 2026 (UTC) == विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ हेतु स्कॉलरशिप आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं == नमस्ते, विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ के लिए स्कॉलरशिप हेतु आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं । यह कॉन्फ्रेंस ४ से ६ सितंबर २०२६ तक कोच्चि, भारत में होगी । विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत), दक्षिण एशिया के साथ और भी विकिमीडियन्स, सामुदायिक आयोजकों और योगदानकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह जुड़ने, सीखने, अनुभव बाँटने करने और निःशुल्क ज्ञान के आंदोलन को सशक्त करने हेतु मिलजुलकर करने का एक स्थान है । 🙂 अगर आप विकिमीडिया परियोजनाओं में सक्रिय योगदानकर्ता हैं अथवा सामुदायिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं, तो आपको स्कॉलरशिप के लिए आवेदन हेतु प्रोत्साहित किया जाता है । [[diffblog:2026/03/19/namukku-othukoodam-scholarships-now-open-for-wikiconference-india-2026/|विस्तृत घोषणा]] यहाँ है । आवेदन की अंतिम तिथि: १५ अप्रैल २०२६ रात ११:५९ बजे IST आवेदन की लिंक: [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdA3rR9xX_k31dzJrjM5MTDNYNUIRcAB45S4TflsYCbGJNrzg/viewform आवेदन की लिंक] अधिक जानकारी: [[metawiki:WikiConference_India_2026/Scholarship|मेटा पेज लिंक]] कृपया इस घोषणा को अपने समुदाय में अन्य सदस्यों के साथ भी बाँटें । धन्यवाद ! विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ की आयोजन टीम -[[User:Gnoeee|<span style="color:#990000">❙❚❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span><span style="color:#000"> जिनोय </span><span style="color:#006699">❚❙❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span>]] [[User talk:Gnoeee|✉]] 21:00, 28 मार्च 2026 (UTC) == Join the sixth Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia! == <div lang="en" dir="ltr"> [[File:Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia 2026.png|right|250px|thumb|link=https://meta.wikimedia.org/wiki/Ukraine%27s_Cultural_Diplomacy_Month_2026|Join our campaign!]] {{int:please-translate}} Dear Wikipedians! [[:m:Special:MyLanguage/Wikimedia Ukraine|Wikimedia Ukraine]], in cooperation with the [[:en:Ministry of Foreign Affairs of Ukraine|MFA of Ukraine]] and [[:en:Ukrainian Institute|Ukrainian Institute]], has launched the sixth edition of writing challenge "'''[[:m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Ukraine's Cultural Diplomacy Month]]'''", which lasts from '''1st April''' until '''30th April 2026'''. The initiative aims to promote knowledge about Ukrainian culture abroad by creating and improving Wikipedia articles in multiple languages. This year marks the sixth edition of the campaign, which will focus on contemporary culture, making today’s artistic voices and practices more visible to international audiences. 🧩'''How to participate?''' Choose an article from the suggested list → Write an article in your language, or improve an existing one according to the rules → Add your contribution to the contest page and calculate your points → Win prizes and receive a certificate of participation → Become a promoter of truthful knowledge about Ukraine. 🧩'''[[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Check our main page for more information]]'''. '''If you are interested in coordinating long-term community engagement for the campaign and becoming a local ambassador, we would love to hear from you! Please let us know your interest.''' If not, then we encourage you to translate the [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|landing page of the contest]] and [https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MessageGroupStats?group=Centralnotice-tgroup-UCDM2026banner&messages=&language=en&x=D banner] into your own language. Also, we set up a [[:m:CentralNotice/Request/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|banner]] to notify users of the possibility to participate in this challenge! [[:m:User:OlesiaLukaniuk (WMUA)|OlesiaLukaniuk (WMUA)]] ([[:m:User talk:OlesiaLukaniuk (WMUA)|talk]]) 04:35, 1 April 2026 (UTC) </div> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:OlesiaLukaniuk_(WMUA)/list_of_wikis&oldid=28552112 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:OlesiaLukaniuk (WMUA)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Action Required: Update templates/modules for electoral maps (Migrating from P1846 to P14226) == Hello everyone, This is a notice regarding an ongoing data migration on Wikidata that may affect your election-related templates and Lua modules (such as <code>Module:Itemgroup/list</code>). '''The Change:'''<br /> Currently, many templates pull electoral maps from Wikidata using the property [[:d:Property:P1846|P1846]], combined with the qualifier [[:d:Property:P180|P180]]: [[:d:Q19571328|Q19571328]]. We are migrating this data (across roughly 4,000 items) to a newly created, dedicated property: '''[[:d:Property:P14226|P14226]]'''. '''What You Need To Do:'''<br /> To ensure your templates and infoboxes do not break or lose their maps, please update your local code to fetch data from [[:d:Property:P14226|P14226]] instead of the old [[:d:Property:P1846|P1846]] + [[:d:Property:P180|P180]] structure. A [[m:Wikidata/Property Migration: P1846 to P14226/List|list of pages]] was generated using Wikimedia Global Search. '''Deadline:'''<br /> We are temporarily retaining the old data on [[:d:Property:P1846|P1846]] to allow for a smooth transition. However, to complete the data cleanup on Wikidata, the old [[:d:Property:P1846|P1846]] statements will be removed after '''May 1, 2026'''. Please update your modules and templates before this date to prevent any disruption to your wiki's election articles. Let us know if you have any questions or need assistance with the query logic. Thank you for your help! [[User:ZI Jony|ZI Jony]] using [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 17:12, 3 अप्रैल 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29941252 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Wikimedia Foundation की वार्षिक योजना की चर्चाओं में शामिल होने का आमंत्रण == नमस्ते, मैं आप सभी को '''साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल''' के अप्रैल एडिशन में इनवाइट करना चाहता हूँ, जो विकिमीडिया फाउंडेशन की लीडरशिप के साथ उनके [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan/2026-2027 एनुअल प्लान (2026-2027)] पर चर्चा करेगा। फ़ाउंडेशन की [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan वार्षिक योजना] एक उच्च-स्तरीय रोडमैप है, जिसमें यह बताया गया है कि संगठन आने वाले वर्ष में क्या हासिल करना चाहता है। इसमें न केवल फाउंडेशन के लक्ष्य, प्रगति और योजना शामिल है, बल्कि वैश्विक रुझानों का सारांश भी शामिल है जो हमारे मूवमेंट के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगला '[https://meta.wikimedia.org/wiki/South%20Asia%20Open%20Community%20Call साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल]' नीचे दी गई तारीखों/समय पर आयोजित कि जाएगी। कृपया इसे अपने कैलेंडर में नोट कर लें और [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 यहाँ साइन अप करें।] Platform: Google Meet Date: 17th April, 2026 Time: 1930-2045 IST (1400-1515 UTC) [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 Registration Link] '''नोट:''' सिर्फ़ रजिस्टर्ड लोगों को ही जॉइनिंग लिंक मिलेगा। कॉल पर आपसे मिलने का इंतज़ार रहेगा, --[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 12:49, 6 अप्रैल 2026 (UTC) == पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) अधिकार और नए सुरक्षा स्तर पर पुनर्विचार हेतु प्रस्ताव == सभी सदस्य महोदय, मैं समुदाय का ध्यान पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) से जुड़ी [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख_48#केवल_स्वतः_परीक्षित_सदस्यों_द्वारा_स्थानांतरण|2017 की एक पुरानी चर्चा (पुरालेख 48)]] और नीति की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उस समय अनुचित स्थानांतरणों को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया था कि केवल 'स्वतः परीक्षित' (Autopatrolled), रोलबैकर या प्रबंधक स्तर के सदस्य ही पृष्ठों का स्थानांतरण कर सकेंगे। उस समय की चर्चा में और फैब्रिकेटर (Phabricator) पर एक अन्य विकल्प (विकल्प 2) का भी सुझाव दिया गया था, जिसका उल्लेख आदरणीय @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी ने किया था: '''"एक नया सुरक्षा स्तर बना कर बर्बरता के शिकार पन्नों को इस स्तर पर सुरक्षित करने का।"''' मेरा प्रस्ताव है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हमें अब इस विकल्प (नया स्थानांतरण सुरक्षा स्तर) को लागू करना चाहिए। मेरी रूपरेखा कुछ इस प्रकार है: # '''सुरक्षित पृष्ठ:''' जिन पृष्ठों को अर्ध-सुरक्षा (Semi-protection) या पूर्ण सुरक्षा (Full protection) प्राप्त है या जो बर्बरता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, उन्हें स्थानांतरित करने का अधिकार केवल 'स्वतः परीक्षित', रोलबैकर, पुनरीक्षक, प्रशासक या प्रबंधक स्तर के सदस्यों तक ही सीमित रहे। # '''सामान्य पृष्ठ:''' जो पृष्ठ पूरी तरह से असुरक्षित और सामान्य हैं, उनका स्थानांतरण (नाम परिवर्तन) करने का अधिकार 'स्वतः स्थापित' (Autoconfirmed) सदस्यों को वापस दे दिया जाए (जैसा कि अंग्रेजी व अन्य विकिपीडिया परियोजनाओं पर होता है)। '''इस बदलाव की आवश्यकता क्यों है (ठोस आँकड़े)?''' सक्रिय अधिकार-प्राप्त सदस्यों की भारी कमी के कारण, छोटे-छोटे और स्पष्ट स्थानांतरण कार्यों (जैसे वर्तनी सुधार) के लिए भी सक्रिय 'स्वतः स्थापित' सदस्यों को <code><nowiki>{{नाम बदलें}}</nowiki></code> का अनुरोध करना पड़ता है। इससे काम की गति धीमी होती है और प्रबंधकों पर भी अनावश्यक अनुरोधों का बोझ पड़ता है। हाल ही में मैंने Quarry टूल के माध्यम से हिंदी विकिपीडिया के डेटाबेस का विश्लेषण किया (क्वेरी लिंक: [https://quarry.wmcloud.org/query/104224 Quarry Query: 104224])। इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में दर्जनों ऐसे अधिकार-प्राप्त सदस्य हैं, जिन्होंने पिछले कई महीनों या वर्षों से हिंदी विकिपीडिया पर एक भी संपादन नहीं किया है। आप नीचे दी गई तालिका का विस्तार करके स्वयं देख सकते हैं: {| class="wikitable mw-collapsible mw-collapsed" style="text-align:center; width:80%;" |+ अधिकार प्राप्त सदस्यों के अंतिम संपादन की सूची ! अधिकार (Group) !! सदस्य का नाम !! आखिरी संपादन (दिनांक) |- | autopatrolled || Naziah rizvi || 20-10-2016 |- | autopatrolled || Somesh Tripathi || 05-10-2017 |- | autopatrolled || Jeeteshvaishya || 22-10-2017 |- | autopatrolled || रोहित रावत || 02-09-2018 |- | autopatrolled || Salma Mahmoud || 23-10-2018 |- | rollbacker || FR30799386 || 02-10-2019 |- | autopatrolled || SGill (WMF) || 03-03-2020 |- | autopatrolled || RacIndian || 21-08-2020 |- | autopatrolled || Jaswant Singh4 || 25-09-2020 |- | autopatrolled || Teacher1943 || 28-08-2021 |- | autopatrolled || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | rollbacker || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | autopatrolled || Mala chaubey || 29-12-2021 |- | autopatrolled || Navodian || 20-01-2022 |- | autopatrolled || AbhiSuryawanshi || 08-06-2022 |- | autopatrolled || Innocentbunny || 21-09-2022 |- | autopatrolled || Biplab Anand || 22-10-2022 |- | autopatrolled || सुनील मलेठिया || 08-01-2023 |- | autopatrolled || Sushilmishra || 20-04-2023 |- | autopatrolled || Gaurav561 || 01-05-2023 |- | autopatrolled || Ahmed Nisar || 02-07-2023 |- | autopatrolled || JamesJohn82 || 20-08-2023 |- | autopatrolled || जैन || 02-11-2023 |- | autopatrolled || Samee || 13-01-2024 |- | autopatrolled || Dinesh smita || 15-04-2024 |- | autopatrolled || सीमा1 || 15-04-2024 |- | rollbacker || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | rollbacker || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | autopatrolled || Anamdas || 07-11-2024 |- | autopatrolled || चक्रपाणी || 02-12-2024 |- | autopatrolled || Charan Gill || 14-12-2024 |- | autopatrolled || Satdeep Gill || 10-02-2025 |- | autopatrolled || MKar || 23-03-2025 |- | autopatrolled || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || स || 20-05-2025 |- | autopatrolled || स || 20-05-2025 |- | rollbacker || Stang || 26-05-2025 |- | autopatrolled || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || PQR01 || 12-06-2025 |- | autopatrolled || WhisperToMe || 26-06-2025 |- | autopatrolled || Hunnjazal || 03-07-2025 |- | autopatrolled || MGA73 || 13-07-2025 |- | autopatrolled || Jayprakash12345 || 19-07-2025 |- | rollbacker || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Raju Babu || 03-08-2025 |- | autopatrolled || Trikutdas || 06-10-2025 |- | autopatrolled || Surenders25 || 29-10-2025 |- | rollbacker || राजकुमार || 01-11-2025 |- | rollbacker || Nadzik || 22-11-2025 |- | autopatrolled || Srajaltiwari || 15-12-2025 |- | autopatrolled || Buddhdeo Vibhakar || 22-12-2025 |- | autopatrolled || आशीष भटनागर || 23-12-2025 |- | autopatrolled || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | rollbacker || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | autopatrolled || कलमकार || 12-02-2026 |- | autopatrolled || शीतल सिन्हा || 21-02-2026 |- | rollbacker || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || नीलम || 09-03-2026 |- | autopatrolled || Dr.jagdish || 10-03-2026 |- | rollbacker || Chronos.Zx || 12-03-2026 |- | rollbacker || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Utcursch || 17-03-2026 |- | rollbacker || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || Mahensingha || 27-03-2026 |- | autopatrolled || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || Saroj || 31-03-2026 |- | autopatrolled || Ziv || 01-04-2026 |- | rollbacker || TypeInfo || 02-04-2026 |- | sysop || संजीव कुमार || 07-04-2026 |- | autopatrolled || Dharmadhyaksha || 07-04-2026 |- | autopatrolled || CommonsDelinker || 08-04-2026 |- | sysop || SM7 || 08-04-2026 |- | sysop || अजीत कुमार तिवारी || 09-04-2026 |- | sysop || अनिरुद्ध कुमार || 09-04-2026 |- | autopatrolled || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | rollbacker || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | sysop || DreamRimmer || 09-04-2026 |- | autopatrolled || अनुनाद सिंह || 09-04-2026 |- | sysop || Sanjeev bot || 10-04-2026 |} यदि हम यह नई तकनीकी व्यवस्था लागू करते हैं, तो सक्रिय सदस्यों को काम करने में सहूलियत मिलेगी, विकिपीडिया का विकास तेज़ी से होगा, और प्रबंधकों का कीमती समय बचेगा। कृपया इस प्रस्ताव पर अपने बहुमूल्य विचार साझा करें ताकि हम इस सुधार को प्रबंधकों के माध्यम से लागू करवा सकें। धन्यवाद। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 09:22, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] जी, मुझे आपका उद्देश्य समझ में नहीं आया। जो आवेदन अधूरे हैं उनमें से अधिकतर अधूरे होने का कारण प्रबन्धकों की सक्रियता नहीं बल्कि उचित स्रोत का न होना है। आप चाहते हो कि स्रोतों के अभाव में आवेदन करने वाले सदस्य मनमर्जी से स्थानान्तरण करते रहें? आपने जो उपरोक्त सूची दी है, क्या उनमें कोई सदस्य अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है? यदि हाँ तो सूचित करें। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:48, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] महोदय, ::'''1. मनमर्जी से स्थानांतरण:''' मेरा उद्देश्य इसे बढ़ावा देना बिल्कुल नहीं है। जैसा कि इस विषय पर पहले भी बताया गया था, यह प्रस्ताव केवल स्पष्ट वर्तनी और मात्रा की गलतियों को तुरंत सुधारने के लिए है। यदि कोई 'स्वतः स्थापित' सदस्य अनुचित स्थानांतरण करता है, तो उसे आसानी से पूर्ववत किया जा सकता है। साथ ही, संवेदनशील या विवादित पृष्ठों को नए 'स्थानांतरण सुरक्षा स्तर' से सुरक्षित रखा जा सकता है। या एक विकल्प यह भी है कि किसी भी सुरक्षित पृष्ठ पर स्थानांतरण करने के लिए नामांकन की आवश्यकता है| ::'''2. सूची का उद्देश्य:''' मेरा उद्देश्य किसी पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाना नहीं था। यह सूची केवल यह दर्शाने के लिए थी कि अधिकार-प्राप्त सक्रिय सदस्यों की संख्या वर्तमान में बहुत कम है। इस कारण, नाम सुधारने जैसे छोटे-छोटे कार्यों का पूरा बोझ आप जैसे चंद सक्रिय प्रबंधकों पर ही पड़ता है। ::मेरा यह प्रस्ताव केवल प्रबंधकों का कीमती समय बचाने और सुधारात्मक कार्यों को गति देने का एक तकनीकी सुझाव मात्र है। समुदाय का जो भी निर्णय होगा, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 16:27, 20 अप्रैल 2026 (UTC) :::प्रबन्धकों के समय का निर्धारण आप कैसे कर सकते हैं? किसी प्रबन्धक ने आपको कहा है क्या कि हमारा समय पृष्ठ स्थानान्तरण में जा रहा है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:36, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी नहीं महोदय [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 23:57, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ==आप सभी से विनम्र निवेदन है कि== मेरे [[विकिपीडिया:स्वतः_परीक्षित_अधिकार_हेतु_निवेदन#चाहर_धर्मेंद्र|इस]] निवेदन के संबंध में आपके विचार मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृपया अपना बहुमूल्य समय निकालकर इस पर अपना मत अवश्य साझा करें। आपके सुझाव और प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।<span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 11:34, 10 अप्रैल 2026 (UTC) == अनुरोध == नमस्कार! मैं आपसे [[मॉड्यूल:Lang/data]] पर एक संपादन करने का अनुरोध करता हूँ। ["hbo"] = "Biblical Hebrew" ===> ["hbo"] = "बाइबिली इब्रानी" [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 19:28, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 08:56, 17 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद! [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 09:51, 17 अप्रैल 2026 (UTC) == रोलबैक अधिकार के नामांकन पर आपके विचार/मत हेतु == <div style="background-color: #FFF9E6; padding: 15px; border: 1px solid #DAA520; border-radius: 8px; margin-top: 10px;"> नमस्ते, आशा है आप सकुशल होंगे। मैं पिछले कुछ समय से हिंदी विकिपीडिया पर सक्रिय रूप से गश्त कर रहा हूँ और हाल के बदलावों में स्पष्ट बर्बरता को हटाने का प्रयास कर रहा हूँ। अपने इस कार्य को और अधिक सुचारू बनाने के लिए, मैंने स्वयं को '''रोलबैक अधिकार''' के लिए नामांकित किया है। चूँकि आप हिंदी विकिपीडिया के एक अनुभवी सदस्य हैं, इसलिए मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि कृपया मेरे हालिया योगदानों की समीक्षा करें और अपना बहुमूल्य मत या सुझाव प्रदान करें। आपका समर्थन और मार्गदर्शन मेरे लिए अत्यंत उत्साहजनक होगा। '''नामांकन यहाँ देखें:''' [[विकिपीडिया:रोलबैकर्स अधिकार हेतु निवेदन#AMAN KUMAR|मेरे नामांकन पर अपना मत दें]] सहयोग के लिए अग्रिम धन्यवाद! सादर,<br> [[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 11:44, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> ==अंतिम कुछ दिन: विकि सम्मेलन भारत 2026 छात्रवृत्ति आवेदन== प्रिय विकिमीडिया समुदाय सदस्य, हमें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि '''[[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026|विकि सम्मेलन भारत 2026]]''' के लिए छात्रवृत्ति आवेदन वर्तमान में खुले हैं, और अंतिम तिथि अब बहुत निकट है। विकि सम्मेलन भारत 2026 इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन का चौथा संस्करण है, जो भारत और दक्षिण एशिया में इंडिक भाषाओं के विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स तथा मुक्त ज्ञान आंदोलन से जुड़े विकिमीडियनों और हितधारकों को एक साथ लाता है। यह सम्मेलन 4–6 सितंबर 2026 को कोच्चि, केरल में आयोजित किया जाएगा। * आप अधिक जानकारी और [[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026/Scholarship|आवेदन फॉर्म Meta-Wiki पर उपलब्ध]] छात्रवृत्ति पृष्ठ पर प्राप्त कर सकते हैं। * छात्रवृत्ति की अंतिम तिथि: 15 अप्रैल 2026, रात 11:59 बजे (IST) अब जबकि केवल कुछ ही दिन शेष हैं, हम आपको आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं यदि आपने अभी तक आवेदन नहीं किया है। साथ ही, कृपया इस अवसर को अपने समुदाय में साझा करें और अन्य लोगों को भी आवेदन करने के लिए प्रेरित करें। अधिक जानकारी और नियमित अपडेट के लिए, कृपया सम्मेलन के Meta पृष्ठ पर जाएँ। सादर, <br> विकि सम्मेलन भारत 2026 आयोजन टीम की ओर से <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 23:38, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> == फॉण्ट == हिन्दी विकिपीडिया पर पिछले कुछ दिनों से लैटिन लिपि के लिए जो फॉण्ट है, वे [[:hak:Hakkapedia|Hakkapedia]] एवं [[:nan:Pang-chān:Holopedia|Holopedia]] के फॉण्ट की तरह दिख रहा है। क्या default फॉण्ट को बदल दिया गया है? [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) {{Font color|grey|११:२५, १२ अप्रैल २०२६ (IST)}} == Lua त्रुटि == मॉड्यूल:Designation/lookup को बनाने में मुझे "Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'." त्रुटि मिलती है। कृपया उस पृष्ठ का निर्माण करें। कोड अंग्रेज़ी विकिपीडिया से लिया गया है (Module:Designation/lookup) [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 08:04, 18 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:24, 19 अप्रैल 2026 (UTC) == "यहया" नामक दो लेख? == दोनों [[याह्या (पैग़म्बर)|John the Baptist]] और [[यहया (इस्लाम)|Yahya]] के लेखों के नाम "यहया" क्यों है? केवल इस्लाम में उस व्यक्ति का नाम '''यहया''' होता है। ईसाई धर्म में उनहें '''यूहन्ना बपतिस्मा दाता''' के नाम से जाना जाता है। कृपया इस समस्या पर गौर करें। [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 11:24, 20 अप्रैल 2026 (UTC) == Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications == The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]]. Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects. '''The hackathon is intended for:''' * Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc. * Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc. * Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces. Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach. To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses. '''Apply here:''' * Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form] '''More information:''' We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page. * Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]] If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at contact@indicmediawikidev.org. Best Regards, On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group == सत्य == सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित, तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है। इसके साथ व्यक्ति की मानसिकता का जुड़ाव  है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आंकाक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण ‘अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन’ सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। झूठ बोलना तथा किसी सद् वस्तु के स्वरूप, स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना - ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य है। [[विशेष:योगदान/&#126;2026-24320-85|&#126;2026-24320-85]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-24320-85|वार्ता]]) 08:51, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == साँचा:स्टेटस भाषा == मैं <span style="font-family:'Kalimati', 'Arial', serif;"> [[साँचा:स्टेटस भाषा]] </span> का निर्माण करके वाला हूँ, जो [[बाली विकिपीडिया]] के [[:ban:Mal:Status basa|ᬫᬮ᭄:ᬲ᭄ᬢᬢᬸᬲ᭄ᬩᬲ]] की तरह होगा। इसे [[साँचा:Infobox language|ज्ञानदूसक भाषा]] पर लागु करने के बाद, हमें भाषा का यूनेस्को वर्गीकरण करना बहुत सरल हो जाएगा एवं वे interface भी अच्छा लगेगा। [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) 10:42, 21 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:ङघिञ|ङघिञ]] जी नमस्ते। साँचा का वार्ता पृष्ठ देख लें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 06:06, 22 अप्रैल 2026 (UTC) == यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति संपादनोत्सव में भाग लें == नमस्ते, 'यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति माह 2026' की गतिविधियों को समर्थन देने के लिए 22 अप्रैल 2026 को पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 1 बजे तक नई दिल्ली (भारत) स्थित युक्रेन दूतावास में एक विशेष संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं के विकिपीडिया प्रोजेक्ट्स पर यूक्रेन की संस्कृति से संबंधित जानकारी को समृद्ध करना और उसमें सुधार करना है। इस कार्यक्रम में आप ऑनलाइन जूम मीटिंग के माध्यम से शामिल हो सकते हैं। * समय: बुधवार, 22 अप्रैल 2026 | सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक (IST) * ज़ूम मीटिंग लिंक: [https://zoom.us/j/98031157656?pwd=BUHOGF5D4Qg8YnqQrEdFx3TyXrvKDO.1 ऑनलाइन जुड़ें] * मीटिंग आईडी: 980 3115 7656 * पासकोड: 716372 * आयोजन का मेटा पृष्ठ: [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|w.wiki/LyML]] इस आयोजन का हिस्सा बनें और भारतीय भाषाओं में मुक्त ज्ञान के प्रसार में अपना योगदान दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 22:59, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == आगामी कार्यक्रम == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची: # जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून) # जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई) # अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त) -संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:40, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 == :मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगा तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 0f4s7uzylnr4ino7kuqongpq2pc4stu 6543683 6543682 2026-04-24T17:44:55Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 */ 6543683 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <!-- इस लाइन को न हटायें। नए अनुभाग पृष्ठ पर सबसे नीचे बनायें। --> == Anthony Albanese के सही उच्चारण के संबंध में == विकिपीडिया के अंग्रेज़ी संस्कारण पर Albanese का उच्चारण "/ˌælbəˈniːzi/ ऐल-ब्अ-नी-ज़ी अथवा /ˈælbəniːz/ ऐल-ब्अ-नीज़" दिया गया है, अतः हिन्दी संस्करण पर भी उनका सही नाम का उच्चारण शामिल करें। स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Anthony_Albanese == Derbyshire के सही उच्चारण के संबंध में == Derbyshire का सही उच्चारण "डर्बीशायर" न होकर "ˈdɑː(ɹ).bɪ.ʃə(ɹ) {ड्आ (र्).बि.श्अ(र्)} = "डार्बिशर" प्रतीत हो रहा है। स्रोत: https://en.wiktionary.org/wiki/Derbyshire == Satyajit Rāy के सही वर्तनी == Satyajit Rāy को सत्यजित राय लिखा जाए। एक जगह पर "सत्यजीत" लिखा गया था, उसे "सत्यजित" लिखा जाए। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 13:59, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) :यह कहाँ लिखा है? कृपया लिंक भेज दें ताकि एडमिन आपका मामला देख सकें। [[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 19:31, 9 दिसम्बर 2025 (UTC) ::[[सत्यजित राय|https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF]] ::वाक्य प्रयोग: सत्यजीत राय (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 02:53, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::yes [[विशेष:योगदान/&#126;2025-39710-56|&#126;2025-39710-56]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2025-39710-56|talk]]) 07:26, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) ::::तो तनिक इसे ठीक करें। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 07:36, 10 दिसम्बर 2025 (UTC) :::::कर दिया। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 15 दिसम्बर 2025 (UTC) == लिंक जोडें == मैने इस पृष्ठ https://simple.wikipedia.org/wiki/Minority_appeasement_in_India को हिन्दी में अनुवाद किया है और हिंदी वाला पृष्ठ [[भारत में अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण]] पर पढा जा सकता है, अब कोई उन दोनों को लिंक कीजिए [[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 16:38, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) :मैने उसे स्वयं जोड दिया है -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 20:41, 11 दिसम्बर 2025 (UTC) == विकिपीडिया का 25वें जन्मदिन समारोह, 15 जनवरी  == [[File:WP25 Anthem video - alternate cut.webm|300px|right|thumbtime=67]] नमस्ते विकिपीडिया के [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:Wikipedia%2025%20Virtual%20Celebration 25वें जन्मदिन समारोह] में आपको आमंत्रित करना चाहता हूँ, जो [https://zonestamp.toolforge.org/1768492800 15 जनवरी को 16:00 UTC] पर हो रहा है। यह एक घंटे भर का वर्चुअल इवेंट होगा जिसमें ट्रिविया, पुरस्कार, संगीत प्रदर्शन, नाटक रीडिंग, संपादकों पर स्पॉटलाइट और विशेष अतिथि शामिल होंगे। इसे Eventyay और विकिपीडिया के यूट्यूब चैनल पर स्ट्रीम किया जाएगा। तारीख सेव करने और अपडेट पाने के लिए इवेंट के लिए रजिस्टर करें, और अगर आपके कोई सवाल हों तो मुझसे पूछें! –[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 10:20, 12 दिसम्बर 2025 (UTC) == तुरन्त हस्तक्षेप अनुरोध == प्रिय साथी विकीमीडियन्स, मैं आप सभी से अत्यंत आग्रह और गंभीरता के साथ तत्काल सहायता की अपील कर रहा हूँ, ताकि विकीमीडिया ब्लॉग टीम द्वारा की गई एक लंबे समय से चली आ रही अन्यायपूर्ण स्थिति को सुधारा जा सके। 2014 से 2020 के बीच, विकीमीडिया के कुछ स्टाफ सदस्यों के प्रतिकूल और हतोत्साहित करने वाले रवैये के बावजूद, मैंने भारत ( [https://diff.wikimedia.org/2017/04/12/ashish-bhatnagar/ आशीष भटनागर जी] का ब्लॉग इंटरव्यू, [https://diff.wikimedia.org/2015/03/03/hindi-wiki-sammelan/ प्रथम हिन्दी विकि सम्मेलन की रिपोर्ट], आदि), म्यांमार, कोरिया, तुर्की, चेक गणराज्य आदि देशों की विकीमीडिया समुदायों और विकीमीडियन्स का परिचयात्मक दस्तावेज़ीकरण (प्रोफाइलिंग) करने का कार्य किया। मैंने स्वयं गहन शोध किया, प्रमुख और सक्रिय योगदानकर्ताओं की पहचान की, प्रश्नावलियाँ तैयार कीं, विस्तृत प्रोफाइल/साक्षात्कार लिखे और कुल मिलाकर 35 ब्लॉग पोस्ट तैयार कर प्रकाशित करवाईं। दुर्भाग्यवश, विकीमीडिया ब्लॉग टीम के कम से कम दो सदस्य जबरन और अनुचित रूप से लगभग 10 ब्लॉग पोस्टों की लेखकता (Authorship) अपने नाम से दर्शा रहे हैं, जबकि उन लेखों का संपूर्ण शोध, लेखन और सामग्री मेरी ओर से की गई थी। मैं आप सभी से विनम्र लेकिन सशक्त अनुरोध करता हूँ कि इस स्पष्ट अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएँ और यहाँ [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Wikimedia_Blog#Credits मेरी अपील] के नीचे अपने विचार/टिप्पणियाँ दर्ज करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके और वास्तविक लेखक को उसका उचित श्रेय मिल सके। आपका समर्थन न केवल मेरे लिए, बल्कि विकीमीडिया आंदोलन में पारदर्शिता, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। आप सभी का अग्रिम धन्यवाद। [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 07:27, 27 दिसम्बर 2025 (UTC) :बिना विश्वसनीय  स्रोत के, किसी भी विकिपीडिया पेज पर कोई वाक्य नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए कृपया मुझे बताएं कि आप किन पृष्ठों की बात कर रहे हैं?[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 08:03, 13 जनवरी 2026 (UTC) ::बांग्ला जी, आपका और हिन्दी विकिपीडिया समुदाय का धन्यवाद। वैसे कुछ अन्य विकिपीडिया के सज्जन पुरुषों के हस्तक्षेप के कारण [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Diff_(blog)#Blogpost_Credits समस्या सुलझ चुकी है] । [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 21:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Istanbul का सही उच्चारण == "इस्तांबुल" लिखने से यह होगा कि इसका उच्चारण "इस्ताम्बुल" हो जाएगा, क्योंकि त के बाद में "ब" है, जिसके बाद "म" है (प, फ, ब, भ, म)। इसलिए "इस्तान्बुल" ही सही है। [[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] ([[सदस्य वार्ता:Dimple323|वार्ता]]) 16:10, 28 दिसम्बर 2025 (UTC)Dimple323 :@[[सदस्य:Dimple323|Dimple323]] लेख के वार्ता पृष्ठ पर चर्चा करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 07:51, 7 जनवरी 2026 (UTC) == ड्राफ्ट की समीक्षा और स्थानांतरण का अनुरोध == नमस्ते, कृपया ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra की समीक्षा करें और यदि उपयुक्त हो तो इसे मुख्य नामस्थान में स्थानांतरित करें। ड्राफ्ट का लिंक: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra धन्यवाद। [[सदस्य:Supraconciencia|Supraconciencia]] ([[सदस्य वार्ता:Supraconciencia|वार्ता]]) 22:03, 8 जनवरी 2026 (UTC) == अनुरोध == मैं आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि आप इस चर्चा में अपनी टिप्पणियाँ जोड़ें: <nowiki>https://hi.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया</nowiki>: पृष्ठ_हटाने_हेतु_चर्चा/लेख/ भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण# भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण ।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 03:58, 11 जनवरी 2026 (UTC) == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप कार्यक्रम सूचना == सभी विकि साथियों को नववर्ष 2026 के लिए शुभकामनाएं। हम यूजर ग्रूप के जनवरी 2026 तक के कार्यों से संबंधित कुछ नए अपडेट साझा करना चाहते हैं: :अक्तूबर तथा नवंबर 2025 में आयोजित संपादनोत्सव के परिणाम घोषित हो चुके हैं: # [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025]] - 2 अक्तूबर 2025 से 18 अक्तूबर 2025 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- 1 नवंबर, 2025 से 14 नवंबर, 2025 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। :जनवरी में नई दिल्ली में दो ऑफ लाइन बैठक/कार्यशाला का आयोजन हो रहा है: # [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका|विकिपीडिया:हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में अनुवाद और विकिपीडिया की भूमिका]] - 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित सांस्थानिक प्रशिक्षण और भागिदारी कार्यशाला। # [[w:hi:विकिपीडिया:प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026|प्रबंधक बैठक/जनवरी 2026]] - 16 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रबंधक बैठक। : वर्ष 2026 के फरवरी तथा मार्च में दो गुणवत्ता बढ़ाने वाले संपादनोत्सव करने की योजना है: # [[w:hi:विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026|विकिपीडिया:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2026]] – फरवरी 2026 में हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव। # [[S:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]- मार्च में हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।:इन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए तथा इससे संबंधित कोई सुझाव देने के लिए सदस्यों का स्वागत है। : 15 जनवरी को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने को इच्छुक दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिपीडियनों का स्वागत हैं। आप आयोजन पृष्ठ पर अपना पंजीयन कराकर इस कार्यशाला में शामिल हो सकते हैं। :सादर- संपर्क सूत्र -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 18:49, 13 जनवरी 2026 (UTC) ==सहायता== मैं जब भी किसी लेख में संपादित करती करती हूँ तो स्रोत संपादित की जगह संपादित करें आता है जिस कारण मैं ठीक से आडिट नहीं कर पाती हूँ कृपया मेरी इस समस्या में सहायता करें। [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:14, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी, आपको समस्या क्या आ रही है? वहाँ स्रोत सम्पादन और यथादृश्य समादिका (visual editor) के मध्य बदला जा सकता है। यदि आप स्रोत सम्पादन का उपयोग करना चाहें तो उचित बदलाव कर सकते हैं। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 06:19, 15 जनवरी 2026 (UTC) ::{{ping|संजीव कुमार}} लेकिन कहाँ और कैसे बदला जाएगा [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 06:21, 15 जनवरी 2026 (UTC) :::{{ping|संजीव कुमार}} जी कृपया मार्गदर्शन करें। 14:23, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] जी वहाँ पर दाहिने ओर ऊपर एक पेन जैसा दिखने वाला बटन होता है जिसे क्लिक करके आप 'यथादृश्य' और 'स्रोत संपादक' में अदल बदल कर सकते हैं। आप कंप्यूटर पे हो तो। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:32, 16 जनवरी 2026 (UTC) :::::@[[सदस्य:SM7|SM7]] जी हो गया, धन्यवाद [[सदस्य:Mnjkhan|Mnjkhan]] ([[सदस्य वार्ता:Mnjkhan|वार्ता]]) 07:44, 17 जनवरी 2026 (UTC) == मसौदे की समीक्षा का अनुरोध == नमस्ते, मैंने हाल ही में एक जीवित व्यक्ति की जीवनी का मसौदा तैयार किया है, जो स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है। मुख्य नामस्थान में स्थानांतरण का अनुरोध पहले ही किया जा चुका है। मसौदा यहाँ उपलब्ध है: https://hi.wikipedia.org/wiki/ड्राफ्ट:Manuel_Sans_Segarra यदि कोई अनुभवी संपादक इसकी समीक्षा कर सके, तो आभारी रहूँगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 10:03, 15 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) ::नमस्ते, :: जानकारी देने के लिए धन्यवाद। मेरा उद्देश्य किसी भी प्रकार का प्रचार करना नहीं था। मैं आपके निर्णय का सम्मान करता हूँ और आगे से हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार ही योगदान करूँगा। :: धन्यवाद। [[सदस्य:Pi1918|Pi1918]] ([[सदस्य वार्ता:Pi1918|वार्ता]]) 17:53, 16 जनवरी 2026 (UTC) == नये लेख [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] की समीक्षा हेतु अनुरोध == नमस्ते संपादकों, मैंने सम्राट कुमार गुप्ता के बारे में एक लेख (Draft) तैयार किया है जिसमें 3 दशकों के पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के विश्वसनीय संदर्भ दिए गए हैं। कृपया इसकी समीक्षा करें और इसे मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित करने में सहायता करें। लिंक: [[Draft:_सम्राट_कुमार_गुप्ता]] -- धन्यवाद [[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Supriya|वार्ता]]) 07:43, 16 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Kumari Supriya|Kumari Supriya]] मैंने इसे साफ़ प्रचार मानते हुए शीघ्र हटाने हेतु नामांकित किया है। वैसे भी हिंदी विकिपीडिया पर ड्राफ्ट जैसा कोई नामस्थान नहीं है। कृपया आगे से व्यक्तियों के प्रचारात्मक लेख बनाने से परहेज करें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 16:46, 16 जनवरी 2026 (UTC) == Thank You for Last Year – Join Wiki Loves Ramadan 2026 == Dear Wikimedia communities, We hope you are doing well, and we wish you a happy New Year. ''Last year, we captured light. This year, we’ll capture legacy.'' In 2025, communities around the world shared the glow of Ramadan nights and the warmth of collective iftars. In 2026, ''Wiki Loves Ramadan'' is expanding, bringing more stories, more cultures, and deeper global connections across Wikimedia projects. We invite you to explore the ''Wiki Loves Ramadan 2026'' [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026|Meta page]] to learn how you can participate and [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan 2026/Participating communities|sign up]] your community. 📷 ''Photo campaign on '' [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan 2026|Wikimedia Commons]] If you have questions about the project, please refer to the FAQs: * [[m:Special:MyLanguage/Wiki Loves Ramadan/FAQ/|Meta-Wiki]] * [[c:Special:MyLanguage/Commons:Wiki Loves Ramadan/FAQ|Wikimedia Commons]] ''Early registration for updates is now open via the '''[[m:Special:RegisterForEvent/2710|Event page]]''''' ''Stay connected and receive updates:'' * [https://t.me/WikiLovesRamadan Telegram channel] * [https://lists.wikimedia.org/postorius/lists/wikilovesramadan.lists.wikimedia.org/ Mailing list] We look forward to collaborating with you and your community. '''The Wiki Loves Ramadan 2026 Organizing Team''' 19:45, 16 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29879549 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्वागत सन्देश में चित्र == पूर्व चर्चा: [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख 63#स्वागत सन्देश में चित्र]] [[साँचा:सहायता|स्वागत संदेश]] में अंकित किया गया चित्र मशीन द्वारा निर्मित किया गया है। मशीन द्वारा बनाई गई सामग्री इस ज्ञानकोष में मान्य नहीं है। इसलिए अनुरोध है कि जिस सदस्य ने यह चित्र स्थापित किया है, वही इसे हटा भी दे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 09:32, 18 जनवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी, यह चित्र आपको कैसा लगता है? मुझे तो यह पुराने चित्र जैसा ही लग रहा है। इसलिए यदि आप दोनों को यह ठीक लगे, तो हम इसे उपयोग में ले सकते हैं। :[[चित्र:Annapoorni (10641191125).jpg|120px|thumb|right|स्वागत!]] – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:13, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) {{-}} :: [[चित्र:Tableau_noir_dans_le_désert_du_Thar_(Rajasthan).jpg|240px|thumb|center|हिन्दी विकिपीडिया में आपका हार्दिक स्वागत है। इस ज्ञानकोश के विकास और विस्तार में आपके सहयोग की हमें प्रतीक्षा है।]] <center>--[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 18:03, 8 फ़रवरी 2026 (UTC)</center> :::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, ये आपको कैसे लग रहा है कि एआई से जनित चित्र ज्ञानकोशीय नहीं हो सकता? आजकल एआई से ज्ञानकोशीय एनिमेशन बनाये जाते हैं। यह तो बनाने वाले पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त चित्र ज्ञानकोशीय होने के लिए नहीं बल्कि स्वागत के रूप में जोड़ा गया है। :::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] जी, मुझे आपके सुझाव से कोई समस्या नहीं है और आप चाहें तो इसे जोड़ सकते हैं। हालांकि पिछली बार @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी का सुझाव था कि चित्र को हटा दिया जाये, अतः मुझे उनका सुझाव भी उचित ही लगा। लेकिन मैंने परम्परा के तौर पर नया चित्र जोड़ा था क्योंकि स्वागत सन्देश में बहुत बदलावों की आवश्यकता है। :::@[[सदस्य:Hindustanilanguage|मुज़म्मिल]] जी, आपका सुझाव भी उचित है लेकिन इससे बेहतर चित्र हम कंप्यूटर पर निर्मित कर सकते हैं जो इससे बेहतर होंगे। इसके लिए चर्चा करना बेहतर होगा। स्वागत सन्देश बड़ा रखने के स्थान पर एक छोटी कड़ी दे सकते हैं जिसपर सभी सन्देशों को सूचीबद्ध किया जा सके। इससे उन सदस्यों को भी सुविधा रहेगी जो हिन्दी नहीं जानते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:34, 9 फ़रवरी 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]]@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]]@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] @[[सदस्य:Hindustanilanguage|Hindustanilanguage]] मेरा अब भी सुझाव है कि चित्र हटा दिया जाय। हालाँकि, अभी जो आपत्ति दर्ज़ की गई है, उसपे इतना ही कहूँगा कि यह चित्र 'ज्ञानकोश' का हिस्सा नहीं है। स्वागत संदेश में इस तरह के चित्र पर आपत्ति उचित नहीं प्रतीत हो रही। ::::संजीव जी जैसा कह रहे, पूरे स्वागत संदेश को पुनर्विचार एवं नये सिरे से बनाने की ज़रूरत है - लंबा काम है - मुझे कोई गुरेज़ नहीं इसमें भागीदारी करने में। ::::पर यह चित्र हटाने वाली बात चर्चा के योग्य भी नहीं। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 10:49, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, एक महिला को हर किसी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े किया जाना महिलाओं के आत्मसम्मान के लिहाज से कहीं न कहीं गरिमापूर्ण प्रतीत नही हो रहा है। इसलिए भी इस चित्र को हटा देना या किसी उपयुक्त चित्र से बदल देना चाहिए। बहुत से ज्ञानकोषों में बिस्किट का प्रयोग किया जाता है क्योंकि संपादन के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, जो बिस्किट से मिलती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 08:23, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी के विचारों से सहमत होते हुए कि स्वागत संदेश को नए सिरे से बनाने की आवश्यकता है, और @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी की आपत्तियों (एआई और गरिमा) को ध्यान में रखते हुए, मेरा सुझाव है कि हम विवादित चित्र के स्थान पर प्राकृतिक फूलों के चित्र का उपयोग किया जाएं। फूल स्वागत का एक गरिमापूर्ण, मानवीय और तटस्थ प्रतीक हैं। ::::::मैंने विकिमीडिया कॉमन्स से कुछ प्राकृतिक और सुंदर चित्रों का चयन किया है। कृपया नीचे दी गई गैलरी में देखकर बताएँ कि इनमें से कौन सा चित्र नए स्वागत संदेश के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा? ::::::File:Lotus 2013 sai.jpg|कमल '''यह चित्र मैने @[[सदस्य:SM7|SM7]] के सदस्य पृष्ठ पर देखा''' ::::::File:Red rose at Square of the Cathedral of Christ the Saviour.jpg|लाल गुलाब ::::::File:Combretum indicum(Rangoon creeper).jpg|मधुमालती (रंगून क्रीपर) '''यह मैने ही अपलोड किया''' ::::::File:(MHNT) Jasminum polyanthum – flowers and buds.jpg|चमेली ::::::File:Marigold 14.jpg|गेंदा ::::::File:Flower bouquet in Tarnowskie Góry, Silesian Voivodeship, Poland, December 2023.jpg|पुष्प गुच्छ ::::::File:Rose and carnation flower bouquet 01.jpg|गुलाब और कार्नेशन ::::::आप सभी वरिष्ठ साथियों की राय का स्वागत है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 14:09, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] जी, फूल लगवाने का कोई विशेष औचित्य? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:38, 9 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, महोदय :::::::: फूल लगवाने का मुख्य औचित्य केवल एक तटस्थ, विवाद-रहित और मानवीय स्वागत-प्रतीक प्रस्तुत करना है। ::::::::महोदय, भारत में फूलों से स्वागत करना सबसे आत्मीय और सहज माना जाता है। ::::::::प्राकृतिक फूल होने के कारण यह AI और गरिमा से जुड़े उन सभी विवादों से पूरी तरह मुक्त है, जो वर्तमान चित्र को लेकर उठे हैं। ::::::::मेरा उद्देश्य सिर्फ एक सकारात्मक चित्र लगाना है। यदि समुदाय को फूल के स्थान पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी का 'बिस्किट' वाला सुझाव या विकिपीडिया का लोगो अधिक उपयुक्त लगता है, तो मेरी उसमें भी पूर्ण सहमति है। प्रमुख उद्देश्य स्वागत संदेश को बेहतर बनाना है। [[सदस्य :VIKRAM PRATAP7 | विक्रम प्रताप ]] 16:47, 9 मार्च 2026 (UTC) :::::::::भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। फूलों से स्वागत देवताओं का किया जाता है और आजकल लोगों ने चाटुकारिता के लिए इसे मनुष्यों पर लागू करना आरम्भ कर दिया है। चित्रों में प्राकृतिक फूल कैसे हो सकते हैं? वर्तमान चित्र को लेकर मैंने कोई विवाद नहीं देखा, बल्कि चित्र को हटाकर संबंधित सन्देश को पुनः लिखने पर यह चर्चा है। वर्तमान चित्र में क्या नकारात्मक दिखाई दे रहा है? क्या वो भारतीय संस्कृति से संबंधित नहीं है? (हालांकि ऐसा आवश्यक नहीं है)। अभी चर्चा इसपर चाहिए कि चित्र की आवश्यकता ही क्या है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:43, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी,महोदय ::::::::::मेरा उद्देश्य केवल उठे हुए विवाद के बीच एक विकल्प देना था। लेकिन मैं आपसे और @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि असली मुद्दा यह है कि स्वागत सन्देश में किसी भी चित्र की आवश्यकता है ही नहीं। पर @[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] महोदय ने बिस्किट के चित्र का उदाहरण दिया था, जिसके लिए मैं पुष्पों का विकल्प दिया था| ::::::::::मेरी ओर से चित्र वाले विषय पर चर्चा यहीं समाप्त है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:59, 12 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::सभी सदस्यो से विनम्र निवेदन है, की कृपया इस [[:File:AI Chatgpt generated Woman in Welcome pose.png|चित्र]] देखने का कष्ट करे, इसको स्वागत सन्देश में लगने के लिए उपयुक्त हो सकता है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:06, 12 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::::@[[सदस्य:Cptabhiimanyuseven|Cptabhiimanyuseven]] जी, चित्र को हटाने पर चर्चा चल रही है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:35, 14 मार्च 2026 (UTC). :::::::::::::::{{Ping|संजीव कुमार}} जी, नमस्ते! चित्र को उपयोग में लिया जा चुका है,पहले चित्र उपयोग में न होने के कारण हटाने हेतु चर्चा के लिए नामांकित किया गया है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 16:50, 14 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::{{ping|संजीव कुमार}}, आपकी बात सही है कि भारत में हाथ जोड़कर स्वागत किया जाता है। परंतु, क्योंकि आप और यहां के अधिकतर प्रबंधक पुरुष हैं, और स्वागत करते हुए व्यक्ति का ही चित्र लगाना है तो उचित होगा कि किसी पुरुष का हाथ जोड़कर स्वागत करता हुआ चित्र लगाया जाए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:28, 20 मार्च 2026 (UTC) :{{od}} वर्तमान चर्चा के आधार पर चित्र हटा दिया गया है। भविष्य में चर्चा करके एक उपयुक्त चित्र जोड़ा जा सकता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:51, 18 मार्च 2026 (UTC) == Feminism and Folklore 2026 starts soon == <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;"> [[File:Feminism and Folklore 2026 logo.svg|centre|550px|frameless]] ::<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> ;Invitation to Organize Feminism and Folklore 2026 Dear Wiki Community, We are pleased to invite Wikimedia communities, affiliates, and independent contributors to organize the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026]]''' writing competition on your local Wikipedia. The international campaign will run from '''1 February to 31 March 2026''' and aims to improve coverage of feminism, women’s histories, gender-related topics, and folk culture across Wikipedia projects. ;About the Campaign '''Feminism and Folklore''' is a global writing initiative that complements the '''[[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2026|Wiki Loves Folklore]]''' photography competition. While Wiki Loves Folklore focuses on visual documentation, this writing campaign addresses the '''gender gap on Wikipedia''' by improving encyclopedic content related to folk culture and marginalized voices. ;What Can Participants Write About? Communities can contribute by creating, expanding, or translating articles related to: * Folk festivals, rituals, and celebrations * Folk dances, music, and traditional performances * Women and queer figures in folklore * Women in mythology and oral traditions * Women warriors, witches, and witch-hunting narratives * Fairy tales, folk stories, and legends * Folk games, sports, and cultural practices Participants may work from curated article lists or generate new article suggestions using campaign tools. ;How to Sign Up as an Organizer Organizers are requested to complete the following steps to register their community: # Create a local project page on your wiki [[:m:Feminism and Folklore/Sample|(see sample)]] # Set up the campaign using the '''CampWiz''' tool # Prepare a local article list and clearly mention: #* Campaign timeline #* Local and international prizes # Request a site notice from local administrators [[:mr:Template:SN-FNF|(see sample)]] # Add your local project page and CampWiz link to the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta project page]]''' ;Campaign Tools The Wiki Loves Folklore Tech Team has introduced tools to support organizers and participants: * '''Article List Generator by Topic''' – Helps identify articles available on English Wikipedia but missing in your local language Wikipedia. The tool allows customized filters and provides downloadable article lists in CSV and wikitable formats. * '''CampWiz''' – Enables communities to manage writing campaigns effectively, including jury-based evaluation. This will be the third year CampWiz is officially used for Feminism and Folklore. Both tools are now available for use in the campaign. '''[https://tools.wikilovesfolklore.org/ Click here to access the tools]''' ;Learn More & Get Support For detailed information about rules, timelines, and prizes, please visit the '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 project page]]'''. If you have any questions or need assistance, feel free to reach out via: * '''[[:m:Talk:Feminism and Folklore 2026/Project Page|Meta talk page]]''' * Email us using details on the contact page. ;Join Us We look forward to your collaboration and coordination in making Feminism and Folklore 2026 a meaningful and impactful campaign for closing gender gaps and enriching folk culture content on Wikipedia. Thank you and best wishes, '''[[:m:Feminism and Folklore 2026|Feminism and Folklore 2026 International Team]]''' ---- ''Stay connected:'' [[File:B&W Facebook icon.png|link=https://www.facebook.com/feminismandfolklore/|30x30px]]&nbsp; [[File:B&W Twitter icon.png|link=https://twitter.com/wikifolklore|30x30px]] </div></div> == Invitation to Host Wiki Loves Folklore 2026 in Your Country == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <div style="text-align: center; width: 100%;">''{{int:please-translate}}''</div> [[File:Wiki Loves Folklore Logo.svg|right|150px|frameless]] Hello everyone, We are delighted to invite Wikimedia affiliates, user groups, and community organizations worldwide to participate in '''Wiki Loves Folklore 2026''', an international initiative dedicated to documenting and celebrating folk culture across the globe. ;About Wiki Loves Folklore '''Wiki Loves Folklore''' is an annual international photography competition hosted on Wikimedia Commons. The campaign runs from '''1 February to 31 March 2026''' and encourages photographers, cultural enthusiasts, and community members to contribute photographs that highlight: * Folk traditions and rituals * Cultural festivals and celebrations * Traditional attire and crafts * Performing arts, music, and dance * Everyday practices rooted in folk heritage Through this campaign, we aim to preserve and promote diverse folk cultures and make them freely accessible to the world. [[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026|Project page on Wikimedia Commons]] ; Host a Local Edition As we celebrate the '''eight edition''' of Wiki Loves Folklore, we warmly invite communities to organize a local edition in their country or region. Hosting a local campaign is a great opportunity to: * Increase visibility of your region’s folk culture * Engage new contributors in your community * Enrich Wikimedia Commons with high-quality cultural content '''[[:c:Commons:Wiki_Loves_Folklore_2026/Organize|Sign up to organize]]:''' If your team prefers to organize the competition in ''either February or March only'', please feel free to let us know. If you are unable to organize, we encourage you to share this opportunity with other interested groups or organizations in your region. ;Get in Touch If you have any questions, need support, or would like to explore collaboration opportunities, please feel free to contact us via: * The project Talk pages * Email: '''support@wikilovesfolklore.org''' We are also happy to connect via an online meeting if your team would like to discuss planning or coordination in more detail. Warm regards, '''The Wiki Loves Folklore International Team''' </div> [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 13:21, 18 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikipedia&oldid=29228188 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Tiven2240@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा == <section begin="announcement-content" /> मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सार्वभौमिक आचार संहिता और प्रवर्तन के दिशानिर्देशों की वार्षिक समीक्षा की अवधि शुरू हो चुकी है। आप 9 फरवरी 2026 तक बदलावों के सुझाव दे सकते हैं। यह वार्षिक समीक्षा के कई चरणों का पहला चरण है। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Annual review/2026|मेटा के UCoC पृष्ठ पर अधिक जानकारी पाएँ और जुड़ने के लिए वार्तालाप खोजें]]। [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee|सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति]] (U4C) एक वैश्विक समिति है जो UCoC का साम्यिक और सुसंगत कार्यान्वयन करने को समर्पित है। यह वार्षिक समीक्षा U4C द्वारा योजित और लागू की गई है। अधिक जानकारी तथा U4C की ज़िम्मेदारियों के लिए [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Coordinating Committee/Charter|आप U4C चार्टर की जाँच कर सकते हैं]]। कृपया जहाँ भी उचित हो, अपने समुदाय के दूसरे सदस्यों के साथ यह जानकारी साझा करें। -- U4C के साथ समन्वय में, [[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|वार्ता]])<section end="announcement-content" /> 21:01, 19 जनवरी 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=29905753 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकि सम्मेलन 2026 समुदाय सहभागिता सर्वे == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप इस वर्ष जुलाई में हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इससे संबंधित हिंदी विकिपीडियनों की रुचि तथा महत्वपूर्ण विषयों को समझने के लिए एक सर्वेक्षण किया जा रहा है। [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeWaqfyOlr9hS7Ef5eXg_Y4mPK8gj1cnzaIBAbQXbjM6KH4aw/viewform हिंदी विकि सम्मेलन 2026] भरकर हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 आयोजित करने में सहयोगी बनें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 09:07, 31 जनवरी 2026 (UTC) [[सदस्य:Vishal K Pandey|Vishal K Pandey]] ([[सदस्य वार्ता:Vishal K Pandey|वार्ता]]) 18:11, 26 जनवरी 2026 (UTC) ==गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड== विकिडेटा में गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का लोगो Guinness World Records logo.svg नाम से उपलब्ध है। इसका हिन्दी में उपयोग करना संभव बनाएं। अधिकार संपन्न लोग ऐसा कर सकते हैं। '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:28, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:00, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::समस्या सुलझाने के लिए आपका धन्यवाद - '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) LimcaBookofRecords.jpg इस फाइल के बारे में भी विचार करें। धन्यवाद '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:35, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) :[[लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स]] [[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 20:02, 1 फ़रवरी 2026 (UTC) ::आपको धन्यवाद- '''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 08:59, 6 फ़रवरी 2026 (UTC) == शीर्षक परिवर्तन के लिए अनुरोध == Namaste, I would like the article title '''[[डी एन ए की नकल]]''' to be changed to '''डीएनए प्रतिकृति''', as this form is more accurate and is the one used in most scientific literature. Sorry for writing in English and if this is not the right place to make the request. I have been on a long break from Wikipedia and have forgotten the proper procedure for requesting a title change.<b>[[User talk:Dineshswamiin|<span style="color: Green">Dinesh</span>]]</b> ([[User talk:Dineshswamiin|talk]]) 15:32, 3 फ़रवरी 2026 (UTC) :नमस्ते, मैं चाहता हूँ कि लेख का शीर्षक [[डी एन ए की नकल]] बदलकर 'डीएनए प्रतिकृति' कर दिया जाए, क्योंकि यह रूप ज़्यादा सही है और ज़्यादातर वैज्ञानिक किताबों में इसी का इस्तेमाल होता है।-[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 18:54, 5 फ़रवरी 2026 (UTC) == ''कंप्यूटिंग'' या ''अभिकलन'' == हिन्दी में कंप्यूटिंग को [[अभिकलन]] भी कहा जाता है। परंतु इसके बाद भी कुछ पृष्ठ के नाम [[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] या [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] है। प्रोग्रामिंग को [[क्रमानुदेशन]] कहा जाता है परंतु आधे से ज्यादा निबंध के शीर्षक में [[प्रोग्रामिंग भाषा]] लिखा गया है। हमें निबंध के शीर्षक एक समान रखने चाहिए। जैसे सारे निबंध के शीर्षक में प्रोगामिंग के जगह क्रमानुदेशन लिखा रहेगा। अन्य नाम हम निबंध के मुख्य भाग में लिख सकते है या redirect कर सकते है। जैसे- '''क्रमानुदेशन भाषा''', जिसे '''प्रोग्रामिंग भाषा''' भी कहते है..... [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 11:16, 7 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, नमस्ते! आप एक समाधान प्रस्तावित करें - उसपे चर्चा करके यह कार्य किया जा सकता है। आपका और सभी का स्वागत है इस एकरूपता लाने के प्रयास के लिए। सादर! --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:03, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) ::[[मोबाइल कम्प्यूटिंग]] का नाम बदलकर [[मोबाइल अभिकलन]] कर देना चाहिए। [[क्लाउड कम्प्यूटिंग]] का [[क्लाउड अभिकलन]] तथा [[प्रोग्रामिंग भाषा]] का नाम [[क्रमानुदेशन भाषा]] कर देना चाहिए। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:40, 8 मार्च 2026 (UTC) == हिन्दी विकिपीडिया से गायब हो चुके पुराने संपादक == तकरीबन 8 साल बाद मैं विगत कुछ दिनों से विकिपीडिया पर सक्रिय हूं। इस बीच देख रहा हूं कि यहां से वो तमाम लोग गायब हो चुके हैं जो एक समय में लगातार सक्रिय रहते थे। नए लेखों की गुणवत्ता स्तरीय थी। लेकिन इधर हिन्दी विकिपीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो या तो आत्मप्रचार है या फिर नौसिखियों द्वारा लगातार किया जा रहा प्रयोग। आज मैंने लगभग 25 लोगों को अपनी ओर से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की जो एक जमाने में प्रबंधक रह चुके हैं और जिन्होंने विकिपीडिया पर काफी योगदान दिया है। लेकिन सबने यही कहा कि वो अब सक्रिय नहीं हैं। यह हिन्दी विकिपीडिया के लिए ठीक नहीं है। यद्यपि कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में विकिपीडिया और खासतौर पर अंग्रेजी से इतर भाषाओं में इस ज्ञानकोश की अब पहले जैसी आवश्यकता रह नहीं गई है। क्योंकि अब अंग्रेजी की सामग्री एक क्लिक पर किसी भी दूसरी भाषा में उपलब्ध है। फिर भी हिन्दी में लिखे गए मूल लेखों का महत्व तो हमेशा बना रहेगा। इसलिए विकिपीडिया संपादक समुदाय को एक बार फिर अपना तुच्छ अहंकार छोड़कर दूर जा चुके लोगों को दोबारा सक्रिय करना चाहिए। --'''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 13:54, 8 फ़रवरी 2026 (UTC) :@[[सदस्य:कलमकार|कलमकार]] सर ! आठ साल (हुये तो नहीं!) बाद आप का स्वागत - हमारी ओर से। :कुछ उधार का अर्ज़ कर रहा (बुरा मत मानियेगा) :''"ऐसा नहीं कि उन से ''(मतलब विकि से)'' मोहब्बत नहीं रही :''जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही'' :'' :''सर में वो इंतिज़ार का सौदा नहीं रहा'' :''दिल पर वो धड़कनों की हुकूमत नहीं रही''"'' :यह हमारी स्थिति है। :और जो चले गए उनकी स्थिति यह है कि :''चेहरे को झुर्रियों ने भयानक बना दिया'' :''आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही'' --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 11:00, 10 फ़रवरी 2026 (UTC) :कलमकार जी, ज्ञानकोष में सक्रियता के प्रति आपकी चिंता वाजिब है। मैंने यहां पर देखा है कि बहुत से सदस्यों द्वारा महनत से बनाए गए पृष्ठ कोई न कोई पैमाना बताकर शीघ्र हटाने के लिए नामांकित कर दिए जाते हैं, फिर कोई अन्य सदस्य उन्हें हटा भी देता है। शायद इससे हताश होकर बहुत से संपादक ज्ञानकोष को छोड़कर चले गए। बहुत से संपादकों के तो सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए हैं। सम्पादकों की सक्रियता में कमी की एक वजह यह भी हो सकती है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:21, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, क्या आप कुछ ऐसे सदस्य पृष्ठों के उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें हटाया गया था, और कुछ ऐसे पृष्ठ भी जिन्हें किसी गलत मानदंड के तहत शीघ्र हटाने के लिए नामांकित किया गया और बाद में हटा दिया गया? यदि आपकी चिंता जायज़ होगी, तो अवश्य ही कोई समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:54, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) :::DreamRimmer जी, हाल ही के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, जहां प्रतीत होता है कि संपादकों द्वारा शिद्दत से बनाए गए कुछ पृष्ठों को हटा दिया गया: :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#why are you remove this article "सुमरत सिंह"]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#कृपया गोप्रेक्षेश्वर लेख की पुनः समीक्षा करें और कॉपीराइट उल्लंघन का टैग हटाने की कृपा करें]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#सहायता नोट]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#डॉ. विनोद कुमार पृष्ठ: शीघ्र हटाने नामांकन पर प्रतिक्रिया]] :::* [[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार#अभिनव अरोड़ा के पृष्ठ हटाने के विषय में]] :::हटाए गए पृष्ठों की सामग्री देखे बगैर मापदंड की सटीकता पर टिप्पणी करना संभव नही है परंतु बहुत से ऐसे पृष्ठ भी हटाए गए हैं, जहां संपादक लेख में संशोधन करने के लिए तैयार थे। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 07:56, 8 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपको प्रचार सामग्री चाहिए या केवल विवाद खड़ा करना उद्देश्य रहा है? यदि आपको प्रचार सामग्री चाहिए तो बताइयेगा, ईमेल से भेज देता हूँ। बैठकर देखते और समझते रहियेगा। अन्यथा आपने मेरा वार्ता पृष्ठ यहाँ क्यों जोड़ा है पता नहीं। मैंने सभी सन्देशों का उत्तर भी दे रखा है। वर्तमान में भी [[विकिपीडिया:शीह|शीघ्र हटाने]] के लिए बहुत लेख नामांकित हैं। कृपया उनकी भी समीक्षा कर लेते समय रहते। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:40, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने ऊपर जिन चर्चाओं का उल्लेख किया है, उनसे संबंधित लेख मुझे किसी भी प्रकार से गलत मानदंड के अंतर्गत हटाए गए नहीं लगते। उन विषयों की उल्लेखनीयता और उपलब्ध सामग्री के आधार पर संजीव जी द्वारा लिया गया निर्णय बिल्कुल उचित था, और ऐसी स्थिति में मेरा निर्णय भी यही होता। आपने यह भी कहा कि ऐसे पृष्ठ हटाए गए जहाँ संपादक लेख में सुधार करने के लिए तैयार थे, परंतु सभी जानते हैं कि कोई अनुल्लेखनीय लेख केवल बार-बार संपादन या सुधार करने से उल्लेखनीय नहीं बन जाता। किसी विषय की उल्लेखनीयता तभी स्थापित होती है जब उसे विश्वसनीय स्रोतों में पर्याप्त स्थान मिले, और इसमें स्वाभाविक रूप से समय लगता है। शीघ्र हटाने की नीति इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है; यदि किसी लेख पर सही मानदंड के अनुसार टैग लगाया गया है, तो प्रबंधक उसे किसी भी समय हटा सकता है। यदि लेखक कोई टिप्पणी जोड़ता है, तो भी प्रबंधक उस टिप्पणी से संतुष्ट न होने पर लेख को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं होता। आपने यह भी कहा था कि सदस्यों के सदस्य पृष्ठ भी हटा दिए गए, लेकिन इसके समर्थन में आपने कोई लिंक प्रस्तुत नहीं किया। मेरा मानना है कि किसी भी सदस्य के कार्य पर प्रश्न तभी उठाया जाना चाहिए जब पर्याप्त प्रमाण हों; अन्यथा यह बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आक्षेप और निराधार आरोप की श्रेणी में आता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:20, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::{{ping|संजीव कुमार}}, जो आपकी नज़र में प्रचार हो, वह संभवतः दूसरों के लिए जानकारी हो सकती है। :::::DreamRimmer जी, ऐसे भी बहुत से पृष्ठ देखें हैं, जहां अनेक विश्वसनीय स्रोत दिए गए थे, उन्हें भी अनुल्लेखनिय बता कर हटाया गया। उदाहरण के लिए: :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#सुमन कुमार घई]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]। :::::* [[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/अप्रैल 2022#रचित यादव]]। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:41, 20 मार्च 2026 (UTC) ::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, समस्या यह ही है कि आप इसे मेरे या आपके नज़र से देख रहे हो। एकबार नज़र हटाकर देखियेगा। "सुमन कुमार घई" नामक लेख पर 15 वर्षों से बिना स्रोत की कुछ सामग्री लिखी थी और बाद में [[विशेष:योगदान/सुमन कुमार घई|इसी नाम के सदस्य]] ने सामग्री हटाकर साहित्य कुंज की कड़ी जोड़ दी। इसी तरह अन्य लेखों को भी या तो सम्बंधित व्यक्ति ने स्वयं (आपके अनुसार उनकी नज़रों में वो स्वयं बहुत उल्लेखनीय व्यक्ति हैं) ने बनाया या अपने किसी रिश्तेदार से बनवाया। यदि आप बिना किसी स्रोत के स्वयं को उल्लेखनीय मानने लग जाओ तो क्या वो उल्लेखनीय हो जायेगा? एकबार इंटरनेट पर उपरोक्त व्यक्तियों के बारे में खोजकर देखें कि इनकी उल्लेखनीयता क्या है? उनके प्रसिद्धि के क्षेत्र में उन्हें कौनसे पुरस्कार मिले हैं? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:26, 25 मार्च 2026 (UTC) :::::::@[[सदस्य: संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, उल्लेखनीयता का मापदंड इसलिए बनाया गया था, कि यदि एक ही विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक दावेदार आ जाते हैं, तो इस नाम से उस विषय या व्यक्ति का लेख बनेगा जो अधिक उल्लेखनीय होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि विकिपीडिया के संदर्भ में एक phrase कई बार सामने आता है, जिसमें लिखा होता है, "sum of all knowledge""। कहने का तात्पर्य यह है कि उल्लेखनीयता के नाम पर तब तक कोई पृष्ठ नही हटाना चाहिए, जब तक उस विषय या नाम पर लेख बनाने के लिए एक से अधिक असंबंधित संभावनाएं न हों। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 'रमेश सिंह' के नाम से उद्धरण सहित लेख बना रहा है तो वह लेख रहने देना चाहिए, जब तक कि कोई उससे भी अधिक उल्लेखनीय 'रमेश सिंह' नाम के व्यक्ति पर उद्धरण सहित लेख बनाने का दावेदार नहीं आ जाता। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:25, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, बहुत अच्छा अर्थ निकाला है आपने। साथ में अपने तर्क के पक्ष में कोई स्रोत भी दे दीजियेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:39, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, [[:en:Wikipedia:Notability]] की भूमिका में लिखा है - ''Information on Wikipedia must be'' '''verifiable'''''... Wikipedia's'' '''concept of notability applies this basic standard''' ''to avoid indiscriminate inclusion of topics... Determining notability does not necessarily depend on things such as fame, importance, or popularity''. -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 16:53, 31 मार्च 2026 (UTC) ::::::::::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, आपने इसके नीचे वाला भाग क्यों नहीं पढ़ा? यद्यपि वो उस विषय की स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं जो नीचे बताए गए दिशानिर्देशों को पूरा करता हो। इसके बाद विस्तार से बहुत कुछ लिखा हुआ है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:04, 31 मार्च 2026 (UTC) :::::::::::उसके नीचे भी पढ़ा है, वहां लिखा है कि यदि कोई सामग्री एक नया लेख बनाने के लिए उल्लेखनीय नहीं है, तो उस सामग्री को किसी अन्य संबंधित पृष्ठ में विलय कर देना चाहिए। यह सही भी है यदि वह सामग्री स्रोत/संदर्भ युक्त है तो। ऐसा भी देखा गया है कि राष्ट्रपति इत्यादि से अनेक उल्लेखनीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति पर बना लेख उल्लेखनीयता के नाम पर हटा दिया गया परन्तु उसमें दर्ज संदर्भित सामग्री कहीं और संजोई नहीं गई, न ही लेखक को उसे दर्ज करने के लिए किसी अन्य पृष्ठ की ओर निर्देशित किया गया। -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:16, 31 मार्च 2026 (UTC) {{od|10}}@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से व्यक्ति उल्लेखनीय कैसे हो गया? विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में [[दीक्षान्त समारोह]] के समय डिग्री वितरण राष्ट्रपति या राज्यपाल के हाथों से करवाया जाता है। आपके अनुसार वो सभी लोग उल्लेखनीय हो गये? सम्बंधित लोगों के नामों की सूची सम्बंधित संस्थान के आधिकारिक जालस्थल पर मिल जायेगा जिसे आप विश्वसनीय स्रोत कह सकते हो। राष्ट्रपति के हाथों से मिला पुरस्कार इतना उल्लेखनीय होना चाहिए जो सम्बंधित व्यक्ति को किसी विशिष्ट कार्य के लिए मिला हो और उस कार्य के कारण व्यक्ति उल्लेखनीय हुआ हो, तो उसे उल्लेखनीय माना जाता है, न कि केवल राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार प्राप्त करने से। ऐसे समारोह राष्ट्रपति भवन में हमेशा होते हैं और उनके समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छपते हैं।<span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:08, 1 अप्रैल 2026 (UTC) : उदाहरण के लिए, क्या इस ([[विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/लॉग/जनवरी 2022#राजेन्द्ररंजन चतुर्वेदी]]) पृष्ठ को हटाते समय, इसमें उपलब्ध संदर्भित जानकारी किसी अन्य पृष्ठ पर स्थानांतरित की गई? -[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 01:49, 3 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा == नमस्ते, मैं हिंदी विकिपीडिया पर लॉग-इन हूँ। मेरा खाता पुराना है और मैंने कई संपादन भी किए हैं, फिर भी मुझे किसी भी लेख में “स्थानांतरण (Move)” का विकल्प दिखाई नहीं दे रहा। मैंने डेस्कटॉप मोड और अलग ब्राउज़र से भी कोशिश की है। कृपया बताएं कि यह समस्या क्यों आ रही है और इसका समाधान क्या है। धन्यवाद। {{unsigned|ROLEXMEENA}} : अंग्रेजी ज्ञानकोष की तरह यहां भी 'Move' (पृष्ठ स्थानांतरण) का विकल्प होना चाहिए, ताकि संपादक अपने सदस्य स्थान में पृष्ठ बनाकर उसे मुख्य नाम स्थान में स्वयं स्थापित कर सकें। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 22:27, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) =="अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026" में भाग लें == हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप द्वारा [[अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर विकिपीडिया एवं विकिस्रोत पर संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। # [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—15 फ़रवरी 2026 से 21 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव। # [[s:विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]—21 फ़रवरी 2026 से 28 फ़रवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन गुणवत्ता संवर्द्धन प्रतियोगिता। :इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 04:34, 14 फ़रवरी 2026 (UTC) == प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन == मैंने [[विकिपीडिया:प्रबन्धन अधिकार हेतु निवेदन#DreamRimmer|यहाँ]] प्रबंधक व अन्तरफलक प्रबंधक अधिकार हेतु निवेदन किया है। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 17:11, 15 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधन अधिकार मिलने पर बहुत बधाई। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:33, 8 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक कैसे बदले == महोदय मुझे बताए कि शीर्षक बीजाणुउद्भिद को कैसे बदलकर बीजाणुद्भिद करे हृदय से धन्यवाद [[सदस्य:VIKRAM PRATAP7|VIKRAM PRATAP7]] ([[सदस्य वार्ता:VIKRAM PRATAP7|वार्ता]]) 04:39, 18 फ़रवरी 2026 (UTC) :प्रबंधकों को [[#हिंदी विकिपीडिया लेखों में “स्थानांतरण (Move)” विकल्प दिखाई नहीं दे रहा|कहा था]] कि 'पेज मूव' का ऑप्शन सभी के लिए चालू कर दिया जाए, परंतु अभी तक नहीं किया गया है। [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 17:31, 8 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] जी, यह अधिकार प्रबन्धकों के पास नहीं है। बाकी आप तर्क एवं स्रोत के साथ लिखेंगे तो स्थानान्तरण कर दिया जाता है। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:42, 18 मार्च 2026 (UTC) :::परंतु यह विकल्प अंग्रेजी ज्ञानकोष पर कैसे उपलब्ध हुआ!? [[सदस्य:Pkrs1|Pkrs1]] ([[सदस्य वार्ता:Pkrs1|वार्ता]]) 18:45, 20 मार्च 2026 (UTC) == Reference Previews – experiment == Hi, I’m Johannes from [[m:WMDE Technical Wishes|WMDE Technical Wishes]]. Sorry for writing in English, please support us by providing a translation! Our team is currently working on [[:m:WMDE Technical Wishes/References|improvements to references]], e.g. [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|Sub-referencing]]. In 2021 we developed [[:m:WMDE Technical Wishes/ReferencePreviews|Reference Previews]] in order to provide a MediaWiki feature to preview references when hovering over the footnote marker. Over the course of our current work we’ve noticed that using Reference Previews doesn’t seem to be intuitive for some readers and we would like to improve this. <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Problem === <div class="mw-collapsible-content"> In our usability tests, we repeatedly notice desktop readers – unaware of Reference Previews or how to use the feature – clicking on footnotes instead of hovering over them. Many are confused when they end up in the reference list and don’t know how to jump back to the text passage they were previously reading. Many readers seem unaware that both the ↑ arrow in the reference list and the <sup>a b</sup> (for re-used references) can be used to jump back. This makes jumping to the reference list rather unpleasant, especially in long articles. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Assumption === <div class="mw-collapsible-content"> We assume that most readers do not want to jump to the reference list, but rather want to click on the footnote to open Reference Previews, which provide them with the reference information for the text passage they have just read. At the same time, we believe that some readers – e.g. those who want to delve deeper into a topic rather than just quickly researching a piece of information – are still interested in conveniently accessing the reference list. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Idea === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to try adjustments to Reference Previews in order to best meet the needs of different readers. Specifically, we want to prevent readers from accidentally ending up in the individual reference list; jumping there should be a conscious decision. When clicking on a footnote marker, we want to display Reference Previews instead of jumping to the reference list. The pop-up remains permanently visible until clicking on the "x" or anywhere outside the preview to close it. In addition Reference Previews will provide a link to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – current version.png|Reference Previews – current version File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed version when '''clicking on a footnote marker''' </gallery> When hovering over a footnote marker without clicking on it, we want to display a simplified version of Reference Previews – without the settings icon and the resulting empty space. When moving the mouse pointer over the pop-up, a note will appear indicating that you can click for further options. This will open the persistent version of Reference Previews with a link to allow users to jump to the reference in the reference list. <gallery heights="275" widths="250"> File:Reference Previews mock-up – hover-state.png|Proposed version when '''hovering over the footnote marker''' File:Reference Previews mock-up – hover-state and options.png|Proposed version when '''hovering over the Reference Preview''' File:Reference Previews mock-up – persistent-state.png|Proposed (persistent) version when '''clicking on the hover preview''' </gallery> By improving the usability of Reference Previews, we also hope to mitigate the issue that reference lists with a large number of (reused) references (or [[:m:WMDE Technical Wishes/Sub-referencing|sub-references]]) can be confusing for some readers. In addition, the proposed version when hovering over a footnote marker is more compact than the current version. </div> </div> <div class="mw-collapsible mw-collapse"> === Experiment === <div class="mw-collapsible-content"> We would like to test the proposed changes in an [[:en:A/B testing|A/B test]] on several wikis. We want to measure how many readers click on a footnote marker and then proceed to jump to the reference list using the proposed version of Reference Previews compared to readers who receive the current version of Reference Previews. In addition, we will measure how many readers in both groups access the reference list via the table of contents. This will give us data-based insights into how many clicks on the footnote unintentionally open the reference list and how many readers only want to use Reference Previews. We would like to run our experiment on the following Wikipedia language versions: de, pl, fr, sv, fa, hu, hi, my, tl, lv, fy, hr. 10% of readers will see our modified version of Reference Previews in order to obtain sufficient data. The experiment is expected to run for 1-2 weeks at the end of March. We'll restore the current version of Reference Previews for all readers until we have evaluated the experiment, discussed the results with the community, and decided on further steps. </div> </div> We look forward to your feedback [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/Reference Previews|on our talk page]] – or just reply to this post! Once the experiment is ready to go, we will also provide a link that you can use to test the changes yourself. --[[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 12:22, 20 फ़रवरी 2026 (UTC) :As indicated on our project page [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=WMDE_Technical_Wishes/References/Reference_Previews&diff=prev&oldid=30215686], we will only test the proposed change when ''clicking'' on a footnote. Reference Previews will remain ''unchanged when hovering'' over a footnote marker. Reasons for this were concerns that the proposed transition from hover to persistent preview could be disruptive or at least feel unusual when interacting with reference content in the hover preview (e.g. when clicking on links). [[सदस्य:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[सदस्य वार्ता:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]]) 13:30, 9 मार्च 2026 (UTC) ==विकि लव्ज़ रमजान 2026== <div style="border:8px maroon ridge;padding:6px;> [[File:Wiki Loves Ramadan Logo Black hi.svg|Left|200px|frameless]] प्रिय विकी समुदाय, आपको [[विकिपीडिया:विकि लव्ज़ रमजान 2026|विकी लव्ज रमज़ान 2026]] में भाग लेने के लिए विनम्रतापूर्वक आमंत्रित किया जाता है, जो कि विभिन्न क्षेत्रों से इस्लामी इतिहास और इस्लामी सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने के लिए विकिपीडिया, विकिवॉयज पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय लेख लेखन प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता 20 फरवरी से 20 अप्रैल 2025 तक आयोजित की जायेगी अभी भाग लें और पुरस्कार के विजेता बने है। धन्यवाद '''[[:m:Wiki Loves Ramadan 2026|विकी लव्स रमज़ान 2026 इंटरनेशनल टीम]]''' -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:1px;">जे. अंसारी</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:1px;">वार्ता</span>]]''' 15:51, 26 फ़रवरी 2026 (UTC) </div> == इस हफ्ते पेस्ट जाँच आ रही है == नमस्ते। [[mw:Special:MyLanguage/Help:Edit check#Paste_check|पेस्ट जाँच]] एक प्रकार की [[mw:Special:MyLanguage/Edit check|सम्पादन जाँच]] सुविधा है जो तब दिखाई देगी जब यथादृश्य सम्पादिका का प्रयोग कर रहा कोई नवागंतुक किसी लेख में लंबा पाठ पेस्ट करे, अगर प्रणाली द्वारा यह निर्धारित किया जाए कि वह सामग्री सम्पादक ने संभवतः स्वयं नहीं लिखी है। इस सुविधा का यहाँ पर पिछले वर्ष परीक्षण किया गया था, और शोध के [[mw:Edit check/Paste Check#A/B_Experiment|परिणाम]] सकारात्मक थे: इस जाँच का सामना करने वाले सम्पादकों के द्वारा किए गए सम्पादनों में से पूर्ववत किए गए सम्पादनों की संख्या में नियंत्रण समूह की तुलना में 18% घटाव आया। डिफ़ॉल्ट से पेस्ट जाँच उन सम्पादकों को दिखाई जाएगी जिन्होंने लोकल रूप से 100 या उससे कम सम्पादन किए हुए हों। यह [[{{#special:EditChecks}}]] के माध्यम से प्रबंधकों द्वारा बदला जा सकता है। जब इस आवश्यकता को पूरा करने वाला कोई सम्पादक कहीं और से कम-से-कम 50 कैरेक्टर्स लंबा पाठ पेस्ट करता है, पेस्ट जाँच उससे पूछेगी कि सामग्री उसने स्वयं लिखी है या फिर नहीं। [[mw:Special:MyLanguage/Edit check/Tags|सम्पादनों को टैग किया जाएगा]] ताकि अनुभवी सदस्य उन सम्पादनों का पता लगा पाएँ जहाँ पर पेस्ट जाँच दिखाई गई थी। अंतिम सम्पादन में कोई भी पेस्ट किया हुआ पाठ न होने के बावजूद भी टैग दृश्य होगा। यह सुविधा इस हफ्ते के अंत तक ग्लोबल स्तर पर जारी की जाएगी। इसे परखने में सहायता करने के लिए आप सबका धन्यवाद। [[सदस्य:Quiddity (WMF)|Quiddity (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:Quiddity (WMF)|वार्ता]]) 00:02, 3 मार्च 2026 (UTC) == अली ख़ामेनेई == <nowiki>[[अली ख़ामेनेई]]</nowiki> को हिंदी में <nowiki>[[अली ख़मीने]]</nowiki> लिखा जाना चाहिए, कृपया इसे बदलिए। -[[सदस्य:Baangla|Baangla]] ([[सदस्य वार्ता:Baangla|वार्ता]]) 13:28, 3 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, यह चर्चा [[वार्ता:अली ख़ामेनेई]] पृष्ठ पर होनी चाहिए। यदि आपको लगता है कि वर्तमान नाम सही नहीं है, तो आप [[साँचा:नाम बदले]] का प्रयोग करते हुए पृष्ठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकते हैं। मेरी व्यक्तिगत राय में वर्तमान नाम सही है, क्योंकि [https://www.bbc.com/hindi/articles/c747xp3pke8o BBC], [https://www.aajtak.in/trending/photo/iran-supreme-leader-ali-khamenei-death-reaction-celebration-mourning-tstf-2484137-2026-03-02 Aaj Tak], [https://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/bahraich-shia-community-ali-khamenei-death-mourning-ban-juloos-local18-10235065.html News18] और [https://ndtv.in/world-news/iran-us-tensions-live-updates-trump-ayotallah-khamenei-sanctions-military-buildup-explosions-nuclear-tensions-us-israel-iran-tension-live-11148367 NDTV] सहित कई मीडिया संस्थान भी “ख़ामेनेई” ही लिखते हैं और हिंदी उच्चारण के अनुसार भी यही नाम उचित प्रतीत होता है। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 13:49, 3 मार्च 2026 (UTC) ::: @[[सदस्य:Baangla|Baangla]] जी, फ़ारसी में नाम علی خامنه‌ای लिखा जाता है। इसी आधार पर देवनागरी में इसका निकटतम लिप्यंतरण अली ख़ामेनेई होगा। ::: यहाँ خ ध्वनि के लिए “ख़” का प्रयोग किया जाता है और अंतिम –ई ध्वनि को दर्शाने के लिए “ई” आता है। इसलिए अली ख़ामेनेई फ़ारसी उच्चारण के सबसे क़रीब माना जा सकता है। --[[सदस्य:Hindustanilanguage|डॉ. मुज़म्मिल]] ([[सदस्य वार्ता:Hindustanilanguage|वार्ता]]) 01:29, 9 मार्च 2026 (UTC) == Lua त्रुटि == जी, जब भी में [[मॉड्यूल:Designation/list]] नामक पृष्ठ को बनाने का प्रयास करता हूँ, मुझे यह संदेश मिलता है: Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'. मैं अंग्रेज़ी विकिपीडिया के स्रोत कोड का प्रयोग करता हूँ, फिर भी यह संदेश आता है। क्या इसका कोई उपाय है? [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 10:14, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:16, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद ^^ [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 15:45, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] मैंने स्वतः परीक्षित अधिकार के लिए निवेदन भेजा है। यदि आप चाहते हैं तो कृपया अपना मत दें। फिर से धन्यवाद! :3 [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 16:26, 18 मार्च 2026 (UTC) :::समय-समय पर मेरा ध्यान आपके संपादनों पर जाता रहता है। हालाँकि मैंने आपके बनाए लेखों को ठीक से नहीं देखा है, लेकिन नामांकन में दिए गए लेखों में से [[रोलिन' (एयर रेड व्हीकल)]] देखा तो वह मुझे लगभग पूरा मशीनी अनुवाद लगा। इसी तरह दूसरे उदाहरण, जैसे [[तलत जाफ़री]] आदि, भी मुझे मशीनी अनुवाद जैसे लगे। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं इस विषय में आपकी कोई विशेष मदद कर पाऊँगा। बाकी अन्य सदस्य भी आपके नामांकन को देखकर अपने सुझाव दे सकते हैं। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 10:52, 20 मार्च 2026 (UTC) == सदस्य पृष्ठ हटाने हेतु अनुरोध == नमस्ते प्रशासक महोदय, मैं 'Gahininath gutte' इस खाते का स्वामी हूँ। मैं अपना 'सदस्य वार्ता' पृष्ठ (User Talk Page) हटाना चाहता हूँ क्योंकि यह गूगल सर्च में मेरी निजी जानकारी दिखा रहा है। मैंने लॉगिन किया है, लेकिन सुरक्षा फ़िल्टर के कारण मैं स्वयं <nowiki>{{db-u1}}</nowiki> टैग नहीं लगा पा रहा हूँ। कृपया मेरी सहायता करें और इस पृष्ठ को हटा दें। धन्यवाद। [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 12:40, 12 मार्च 2026 (UTC) :{{Ping|Gahininath gutte}} नमस्ते! हिंदी विकिपीडिया की नीतियों के अनुसार तभी हटाए जाते है, ज़ब उसपे अत्यधिक बर्बरता या निजी जानकारी और गाली गालोच हुआ हो, आमतौर पर सदस्य वार्ता नही हटाए जाते है,अगर आप सदस्य पृष्ठ की बात कर रहे है, तो आप 10 सकारात्मक संपादन करने के उपरांत सदस्य पृष्ठ को हटवाने ले लिए अनुरोध कर सकते है,या हटाने हेतु संबंधित साँचा लगा सकते है। <span style="background:Brown;border:1px solid #FF00FF;border-radius:18px;padding:4px">[[User:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:black">Cptabhiimanyuseven</span>]]•[[User talk:Cptabhiimanyuseven|<span style="color:lightgrey">(@píng mє)</span>]]</span> 12:52, 12 मार्च 2026 (UTC) ::<blockquote>महोदय, जवाब के लिए धन्यवाद। मैं समझता हूँ कि वार्ता पृष्ठ हटाना नियमों के विरुद्ध है। लेकिन यह पृष्ठ गूगल सर्च में मेरा नाम और निजी संदर्भ दिखा रहा है, जिससे मुझे प्राइवेसी की समस्या हो रही है। अगर आप इसे हटा नहीं सकते, तो कृपया इस पृष्ठ पर '''<nowiki>__NOINDEX__</nowiki>''' टैग लगा दें ताकि यह गूगल सर्च इंजन में दिखाई न दे। साथ ही, कृपया इस पृष्ठ की पुरानी सामग्री (History) को भी छुपा दें। आपकी बहुत कृपा होगी।"</blockquote> ::[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:03, 12 मार्च 2026 (UTC) ::"नमस्ते, मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद। मैं विकिपीडिया पर अब सक्रिय नहीं रहना चाहता और अपनी निजता (Privacy) की सुरक्षा के लिए 'Right to Vanish' के तहत इस पृष्ठ को स्थायी रूप से (Permanently) हटाने का अनुरोध करता हूँ। इसमें मेरा वास्तविक नाम शामिल है जो गूगल सर्च में दिखाई दे रहा है और यह मेरी निजता का उल्लंघन है। मैं चाहता हूँ कि मेरे खाते से जुड़ी यह पहचान पूरी तरह से मिटा दी जाए। कृपया मेरी सहायता करें।" [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 13:06, 12 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] जी, मैंने आपके वार्ता पृष्ठ का एक अवतरण हटा दिया है, जिसमें आपकी व्यक्तिगत जानकारी थी। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 14:56, 18 मार्च 2026 (UTC) ::::अभि भी मेरा नाम गुगल सर्च मैं दिख रहा है मुझे Wikipedia पर रहना ही नहीं कृपया यहा पर मेरा जो अकाउंट है उसे हटा दे पुरी तरह सें... ::::धन्यवाद...! [[सदस्य:Gahininath gutte|Gahininath gutte]] ([[सदस्य वार्ता:Gahininath gutte|वार्ता]]) 15:14, 18 मार्च 2026 (UTC) :::::इसके लिए आप [[विशेष:GlobalVanishRequest]] पर उपलब्ध फ़ॉर्म भर सकते हैं। कृपया अनुरोध करने से पहले फ़ॉर्म पर दिए गए निर्देशों को अवश्य पढ़ लें। – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 15:19, 18 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == [[:en:Embarrasingly parallel]] का शीर्षक अनुवाद में क्या होना चाहिए- * [[एम्बैरसिंगली पैरेलल]] या * [[अति-समानांतरीय]] [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:13, 15 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, सम्भवतः आपके पास टाइपो हुआ है और आप [[:en:Embarrassingly_parallel|Embarrassingly parallel]] की बात कर रहे हो। parallel के लिए हिन्दी में समानांतर शब्द काम में लेते हैं और शब्दकोश नामक वेबसाइट पर इसका अनुवाद अव्यवस्थित समानांतर लिखा है। लेकिन मुझे तार्किक तौर पर कोई तुल्य शब्द याद नहीं आ रहा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:50, 18 मार्च 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी, शब्दकोश नामक वेबसाइट पर एंबैरिसिंगली (Embarrassingly) का अनुवाद "शर्मनाक रूप से" लिखा है, लेकिन हम इसे कंप्यूटर विज्ञान या कोडिंग के संदर्भ में लिख रहे हैं तो क्या "सहज समानांतर" लिख सकते है? इसका मतलब यह है कि समानांतर करने में कोई विशेष दिमाग या मेहनत नहीं लगती। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 17:36, 19 मार्च 2026 (UTC) :::@[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|चाहर धर्मेंद्र]] जी, इस स्थिति में अंग्रेज़ी वाले का ही देवनागरी में उच्चारण लिख दीजिएगा। लेख की शुरूआत में शब्दशः अनुवाद लिख सकते हैं और भविष्य में विश्वसनीय स्रोत मिलने पर उचित स्थानान्तरण कर दिया जायेगा। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 14:29, 25 मार्च 2026 (UTC) == Request for Comment: VisualEditor automatic reference names == <div lang="en" dir="ltr"> Hi, I’m Johannes from [[:m:Wikimedia Deutschland|Wikimedia Deutschland]]’s [[:m:WMDE Technical Wishes|Technical Wishes team]]. Apologies for writing in English. {{Int:Please-translate}}! We are considering to work on [[:m:Community Wishlist/W17|Community Wishlist/W17: Improve VE references' automatic names and reuse]]. This has been a long-term issue for wikitext editors (see e.g. [[:en:WP:VisualEditor/Named references]]) which has been among the top-voted wishes in several [[:m:Community Wishlist Survey|Community Wishlist Surveys]], e.g. [[:m:Community Wishlist Survey 2017/Editing/VisualEditor: Allow editing of auto-generated references before adding them|2017]], [[:m:Community Wishlist Survey 2019/Citations/VisualEditor: Allow references to be named|2019]], [[:m:Community Wishlist Survey 2022/Editing/VisualEditor should use human-like names for references|2022]] or [[:m:Community Wishlist Survey 2023/Editing/VisualEditor should use proper names for references|2023]]. We would like your input on the [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Proposed solutions|solutions]] proposed on our project page: '''[[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names]]'''. We are considering several options, which can be combined if desired by the community. * Changing the default pattern for automatically generated reference names (currently <code>":n"</code>, e.g. <code>":0"</code>, <code>":1"</code>...) to use the [[:mw:Help:Reference Previews#Exposed reference types|reference type]] instead (e.g. <code>"book_reference-1"</code>). * Providing a simple mechanism for communities to configure a different default name. * Generating automatic reference names based on the [[:en:domain name|domain name]] (if it’s a web citation). * Generating automatic reference names based on template parameters (e.g. "title" or "last"+"first") – defined by the community. === Feedback === [[:m:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names|Visit our project page]] to read about our proposal in detail and share your thoughts [[:m:Talk:WMDE Technical Wishes/References/VisualEditor automatic reference names#Request for comment|on metawiki]]. '''Please note''': We will only implement a solution if there’s clear consensus among the global community. Our intention is not to build the perfect solution, but to find a simple and lean one that alleviates the pain caused by auto generated names. We are aware that some experienced VisualEditor users might prefer an option to manually change reference names in VisualEditor, but such a UX intervention is difficult to achieve across reference types and thus out of scope for our team, we can only improve the auto-naming mechanism. We are happy about suggestions for improving certain details of the proposed solutions. Any other feedback and alternative proposals are also welcome – even though it’s out of scope for us, it might still be relevant for future work on this topic. Please support us interpreting consensus by clearly indicating your opinion (e.g. by using support/neutral/oppose templates). We are aware of [[:en:WP:NOTVOTE]], but given that we are facilitating this discussion with users from different wikis, potentially commenting in their native language, clearly indicating your position helps us avoid misunderstandings. Thank you for participating!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[User:Johannes Richter (WMDE)|Johannes Richter (WMDE)]] ([[User talk:Johannes Richter (WMDE)|वार्ता]])</bdi> 11:15, 19 मार्च 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johannes_Richter_(WMDE)/MassMessageRecipients&oldid=30281362 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johannes Richter (WMDE)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मार्च गतिविधि अपडेट == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ: * 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है। * गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया। * फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ। * आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में सामुदायिक बैठक निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं। : हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC) == अंगिका और मैथिली विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" मे भाग ले == नमस्ते , विकिपीडियन ‎[https://anp.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_आरू_लोकगाथा_अंगिका_२०२६ अंगिका] और [https://mai.wikipedia.org/wiki/विकिपीडिया:नारीवाद_एवं_लोककथा_२०२६ मैथिली] विकिपीडिया पर आयोजित "नारीवाद और लोककथा 2026" प्रतियोगिता चल रही है, और इनाम जीते। ‎तिथि: 23 मार्च - 31 मार्च 2026 (8 दिन शेष) [[सदस्य:Surajkumar9931|Surajkumar9931]] ([[सदस्य वार्ता:Surajkumar9931|वार्ता]]) 05:33, 23 मार्च 2026 (UTC) == Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki == [Please help translate this message] Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[foundation:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contact_Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[metawiki:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[metawiki:Talk:Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|talk page]]. –– [[सदस्य:STei (WMF)|STei (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:STei (WMF)|वार्ता]]) 13:21, 25 मार्च 2026 (UTC) == शीर्षक अनुवाद में मदद == मैं [[:en:Perpetual calendar]] को अनुवाद कर रहा हूं। इसका शीर्षक क्या मुझे [[परपेचुअल पंचांग]] रखना चाहिए ? इसका तत्सम क्या हो सकता है क्योंकि मुझे इसका कही हिन्दी में प्रयोग नही मिला। [[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] ([[सदस्य वार्ता:Sarangem|वार्ता]]) 13:40, 25 मार्च 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Sarangem|Sarangem]] जी, आप की जानकारी के लिए कुछ सन्दर्भ [https://uptoword.com/en/perpetual-calendar-meaning-in-hindi?utm_source=chatgpt.com] [https://fj.voguetimebalfie.com/info/are-perpetual-calendar-watches-accurate-100990981.html] [https://www.google.co.th/books/edition/N%C4%ABh%C4%81rik%C4%81/t6hHAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&printsec=frontcover] [https://www.google.co.th/books/edition/Bhajpa_Ka_Abhyuday_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A4%BE_%E0%A4%95/Cet5EAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0&pg=RA1-PA1970&printsec=frontcover] दिए गए है, इन के हिसाब से सतत पंचांग या स्थायी पंचांग लिखा जा सकता है। बाकि जैसी सभी की राय हो। <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 08:32, 28 मार्च 2026 (UTC) == विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ हेतु स्कॉलरशिप आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं == नमस्ते, विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ के लिए स्कॉलरशिप हेतु आवेदन अब प्रारम्भ हो चुके हैं । यह कॉन्फ्रेंस ४ से ६ सितंबर २०२६ तक कोच्चि, भारत में होगी । विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत), दक्षिण एशिया के साथ और भी विकिमीडियन्स, सामुदायिक आयोजकों और योगदानकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह जुड़ने, सीखने, अनुभव बाँटने करने और निःशुल्क ज्ञान के आंदोलन को सशक्त करने हेतु मिलजुलकर करने का एक स्थान है । 🙂 अगर आप विकिमीडिया परियोजनाओं में सक्रिय योगदानकर्ता हैं अथवा सामुदायिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं, तो आपको स्कॉलरशिप के लिए आवेदन हेतु प्रोत्साहित किया जाता है । [[diffblog:2026/03/19/namukku-othukoodam-scholarships-now-open-for-wikiconference-india-2026/|विस्तृत घोषणा]] यहाँ है । आवेदन की अंतिम तिथि: १५ अप्रैल २०२६ रात ११:५९ बजे IST आवेदन की लिंक: [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdA3rR9xX_k31dzJrjM5MTDNYNUIRcAB45S4TflsYCbGJNrzg/viewform आवेदन की लिंक] अधिक जानकारी: [[metawiki:WikiConference_India_2026/Scholarship|मेटा पेज लिंक]] कृपया इस घोषणा को अपने समुदाय में अन्य सदस्यों के साथ भी बाँटें । धन्यवाद ! विकीकॉन्फ्रेंस इंडिया (भारत) २०२६ की आयोजन टीम -[[User:Gnoeee|<span style="color:#990000">❙❚❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span><span style="color:#000"> जिनोय </span><span style="color:#006699">❚❙❚</span><span style="color:#339966">❙❙</span>]] [[User talk:Gnoeee|✉]] 21:00, 28 मार्च 2026 (UTC) == Join the sixth Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia! == <div lang="en" dir="ltr"> [[File:Ukraine’s Cultural Diplomacy Month on Wikipedia 2026.png|right|250px|thumb|link=https://meta.wikimedia.org/wiki/Ukraine%27s_Cultural_Diplomacy_Month_2026|Join our campaign!]] {{int:please-translate}} Dear Wikipedians! [[:m:Special:MyLanguage/Wikimedia Ukraine|Wikimedia Ukraine]], in cooperation with the [[:en:Ministry of Foreign Affairs of Ukraine|MFA of Ukraine]] and [[:en:Ukrainian Institute|Ukrainian Institute]], has launched the sixth edition of writing challenge "'''[[:m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Ukraine's Cultural Diplomacy Month]]'''", which lasts from '''1st April''' until '''30th April 2026'''. The initiative aims to promote knowledge about Ukrainian culture abroad by creating and improving Wikipedia articles in multiple languages. This year marks the sixth edition of the campaign, which will focus on contemporary culture, making today’s artistic voices and practices more visible to international audiences. 🧩'''How to participate?''' Choose an article from the suggested list → Write an article in your language, or improve an existing one according to the rules → Add your contribution to the contest page and calculate your points → Win prizes and receive a certificate of participation → Become a promoter of truthful knowledge about Ukraine. 🧩'''[[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|Check our main page for more information]]'''. '''If you are interested in coordinating long-term community engagement for the campaign and becoming a local ambassador, we would love to hear from you! Please let us know your interest.''' If not, then we encourage you to translate the [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|landing page of the contest]] and [https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MessageGroupStats?group=Centralnotice-tgroup-UCDM2026banner&messages=&language=en&x=D banner] into your own language. Also, we set up a [[:m:CentralNotice/Request/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|banner]] to notify users of the possibility to participate in this challenge! [[:m:User:OlesiaLukaniuk (WMUA)|OlesiaLukaniuk (WMUA)]] ([[:m:User talk:OlesiaLukaniuk (WMUA)|talk]]) 04:35, 1 April 2026 (UTC) </div> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:OlesiaLukaniuk_(WMUA)/list_of_wikis&oldid=28552112 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:OlesiaLukaniuk (WMUA)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Action Required: Update templates/modules for electoral maps (Migrating from P1846 to P14226) == Hello everyone, This is a notice regarding an ongoing data migration on Wikidata that may affect your election-related templates and Lua modules (such as <code>Module:Itemgroup/list</code>). '''The Change:'''<br /> Currently, many templates pull electoral maps from Wikidata using the property [[:d:Property:P1846|P1846]], combined with the qualifier [[:d:Property:P180|P180]]: [[:d:Q19571328|Q19571328]]. We are migrating this data (across roughly 4,000 items) to a newly created, dedicated property: '''[[:d:Property:P14226|P14226]]'''. '''What You Need To Do:'''<br /> To ensure your templates and infoboxes do not break or lose their maps, please update your local code to fetch data from [[:d:Property:P14226|P14226]] instead of the old [[:d:Property:P1846|P1846]] + [[:d:Property:P180|P180]] structure. A [[m:Wikidata/Property Migration: P1846 to P14226/List|list of pages]] was generated using Wikimedia Global Search. '''Deadline:'''<br /> We are temporarily retaining the old data on [[:d:Property:P1846|P1846]] to allow for a smooth transition. However, to complete the data cleanup on Wikidata, the old [[:d:Property:P1846|P1846]] statements will be removed after '''May 1, 2026'''. Please update your modules and templates before this date to prevent any disruption to your wiki's election articles. Let us know if you have any questions or need assistance with the query logic. Thank you for your help! [[User:ZI Jony|ZI Jony]] using [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) 17:12, 3 अप्रैल 2026 (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Non-Technical_Village_Pumps_distribution_list&oldid=29941252 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Wikimedia Foundation की वार्षिक योजना की चर्चाओं में शामिल होने का आमंत्रण == नमस्ते, मैं आप सभी को '''साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल''' के अप्रैल एडिशन में इनवाइट करना चाहता हूँ, जो विकिमीडिया फाउंडेशन की लीडरशिप के साथ उनके [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan/2026-2027 एनुअल प्लान (2026-2027)] पर चर्चा करेगा। फ़ाउंडेशन की [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikimedia%20Foundation%20Annual%20Plan वार्षिक योजना] एक उच्च-स्तरीय रोडमैप है, जिसमें यह बताया गया है कि संगठन आने वाले वर्ष में क्या हासिल करना चाहता है। इसमें न केवल फाउंडेशन के लक्ष्य, प्रगति और योजना शामिल है, बल्कि वैश्विक रुझानों का सारांश भी शामिल है जो हमारे मूवमेंट के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगला '[https://meta.wikimedia.org/wiki/South%20Asia%20Open%20Community%20Call साउथ एशिया ओपन कम्युनिटी कॉल]' नीचे दी गई तारीखों/समय पर आयोजित कि जाएगी। कृपया इसे अपने कैलेंडर में नोट कर लें और [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 यहाँ साइन अप करें।] Platform: Google Meet Date: 17th April, 2026 Time: 1930-2045 IST (1400-1515 UTC) [https://meta.wikimedia.org/wiki/Event:South%20Asia%20Open%20Community%20Call,%20April%202026 Registration Link] '''नोट:''' सिर्फ़ रजिस्टर्ड लोगों को ही जॉइनिंग लिंक मिलेगा। कॉल पर आपसे मिलने का इंतज़ार रहेगा, --[[सदस्य:RASharma (WMF)|RASharma (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:RASharma (WMF)|वार्ता]]) 12:49, 6 अप्रैल 2026 (UTC) == पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) अधिकार और नए सुरक्षा स्तर पर पुनर्विचार हेतु प्रस्ताव == सभी सदस्य महोदय, मैं समुदाय का ध्यान पृष्ठ स्थानांतरण (Page Move) से जुड़ी [[विकिपीडिया:चौपाल/पुरालेख_48#केवल_स्वतः_परीक्षित_सदस्यों_द्वारा_स्थानांतरण|2017 की एक पुरानी चर्चा (पुरालेख 48)]] और नीति की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उस समय अनुचित स्थानांतरणों को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया था कि केवल 'स्वतः परीक्षित' (Autopatrolled), रोलबैकर या प्रबंधक स्तर के सदस्य ही पृष्ठों का स्थानांतरण कर सकेंगे। उस समय की चर्चा में और फैब्रिकेटर (Phabricator) पर एक अन्य विकल्प (विकल्प 2) का भी सुझाव दिया गया था, जिसका उल्लेख आदरणीय @[[सदस्य:SM7|SM7]] जी ने किया था: '''"एक नया सुरक्षा स्तर बना कर बर्बरता के शिकार पन्नों को इस स्तर पर सुरक्षित करने का।"''' मेरा प्रस्ताव है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हमें अब इस विकल्प (नया स्थानांतरण सुरक्षा स्तर) को लागू करना चाहिए। मेरी रूपरेखा कुछ इस प्रकार है: # '''सुरक्षित पृष्ठ:''' जिन पृष्ठों को अर्ध-सुरक्षा (Semi-protection) या पूर्ण सुरक्षा (Full protection) प्राप्त है या जो बर्बरता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, उन्हें स्थानांतरित करने का अधिकार केवल 'स्वतः परीक्षित', रोलबैकर, पुनरीक्षक, प्रशासक या प्रबंधक स्तर के सदस्यों तक ही सीमित रहे। # '''सामान्य पृष्ठ:''' जो पृष्ठ पूरी तरह से असुरक्षित और सामान्य हैं, उनका स्थानांतरण (नाम परिवर्तन) करने का अधिकार 'स्वतः स्थापित' (Autoconfirmed) सदस्यों को वापस दे दिया जाए (जैसा कि अंग्रेजी व अन्य विकिपीडिया परियोजनाओं पर होता है)। '''इस बदलाव की आवश्यकता क्यों है (ठोस आँकड़े)?''' सक्रिय अधिकार-प्राप्त सदस्यों की भारी कमी के कारण, छोटे-छोटे और स्पष्ट स्थानांतरण कार्यों (जैसे वर्तनी सुधार) के लिए भी सक्रिय 'स्वतः स्थापित' सदस्यों को <code><nowiki>{{नाम बदलें}}</nowiki></code> का अनुरोध करना पड़ता है। इससे काम की गति धीमी होती है और प्रबंधकों पर भी अनावश्यक अनुरोधों का बोझ पड़ता है। हाल ही में मैंने Quarry टूल के माध्यम से हिंदी विकिपीडिया के डेटाबेस का विश्लेषण किया (क्वेरी लिंक: [https://quarry.wmcloud.org/query/104224 Quarry Query: 104224])। इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में दर्जनों ऐसे अधिकार-प्राप्त सदस्य हैं, जिन्होंने पिछले कई महीनों या वर्षों से हिंदी विकिपीडिया पर एक भी संपादन नहीं किया है। आप नीचे दी गई तालिका का विस्तार करके स्वयं देख सकते हैं: {| class="wikitable mw-collapsible mw-collapsed" style="text-align:center; width:80%;" |+ अधिकार प्राप्त सदस्यों के अंतिम संपादन की सूची ! अधिकार (Group) !! सदस्य का नाम !! आखिरी संपादन (दिनांक) |- | autopatrolled || Naziah rizvi || 20-10-2016 |- | autopatrolled || Somesh Tripathi || 05-10-2017 |- | autopatrolled || Jeeteshvaishya || 22-10-2017 |- | autopatrolled || रोहित रावत || 02-09-2018 |- | autopatrolled || Salma Mahmoud || 23-10-2018 |- | rollbacker || FR30799386 || 02-10-2019 |- | autopatrolled || SGill (WMF) || 03-03-2020 |- | autopatrolled || RacIndian || 21-08-2020 |- | autopatrolled || Jaswant Singh4 || 25-09-2020 |- | autopatrolled || Teacher1943 || 28-08-2021 |- | autopatrolled || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | rollbacker || Navinsingh133 || 23-12-2021 |- | autopatrolled || Mala chaubey || 29-12-2021 |- | autopatrolled || Navodian || 20-01-2022 |- | autopatrolled || AbhiSuryawanshi || 08-06-2022 |- | autopatrolled || Innocentbunny || 21-09-2022 |- | autopatrolled || Biplab Anand || 22-10-2022 |- | autopatrolled || सुनील मलेठिया || 08-01-2023 |- | autopatrolled || Sushilmishra || 20-04-2023 |- | autopatrolled || Gaurav561 || 01-05-2023 |- | autopatrolled || Ahmed Nisar || 02-07-2023 |- | autopatrolled || JamesJohn82 || 20-08-2023 |- | autopatrolled || जैन || 02-11-2023 |- | autopatrolled || Samee || 13-01-2024 |- | autopatrolled || Dinesh smita || 15-04-2024 |- | autopatrolled || सीमा1 || 15-04-2024 |- | rollbacker || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || कन्हाई प्रसाद चौरसिया || 05-10-2024 |- | autopatrolled || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | rollbacker || निधिलता तिवारी || 23-10-2024 |- | autopatrolled || Anamdas || 07-11-2024 |- | autopatrolled || चक्रपाणी || 02-12-2024 |- | autopatrolled || Charan Gill || 14-12-2024 |- | autopatrolled || Satdeep Gill || 10-02-2025 |- | autopatrolled || MKar || 23-03-2025 |- | autopatrolled || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || ArmouredCyborg || 15-05-2025 |- | rollbacker || स || 20-05-2025 |- | autopatrolled || स || 20-05-2025 |- | rollbacker || Stang || 26-05-2025 |- | autopatrolled || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || AshokChakra || 29-05-2025 |- | rollbacker || PQR01 || 12-06-2025 |- | autopatrolled || WhisperToMe || 26-06-2025 |- | autopatrolled || Hunnjazal || 03-07-2025 |- | autopatrolled || MGA73 || 13-07-2025 |- | autopatrolled || Jayprakash12345 || 19-07-2025 |- | rollbacker || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Nilesh shukla || 21-07-2025 |- | autopatrolled || Raju Babu || 03-08-2025 |- | autopatrolled || Trikutdas || 06-10-2025 |- | autopatrolled || Surenders25 || 29-10-2025 |- | rollbacker || राजकुमार || 01-11-2025 |- | rollbacker || Nadzik || 22-11-2025 |- | autopatrolled || Srajaltiwari || 15-12-2025 |- | autopatrolled || Buddhdeo Vibhakar || 22-12-2025 |- | autopatrolled || आशीष भटनागर || 23-12-2025 |- | autopatrolled || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | rollbacker || सौरभ तिवारी 05 || 15-01-2026 |- | autopatrolled || कलमकार || 12-02-2026 |- | autopatrolled || शीतल सिन्हा || 21-02-2026 |- | rollbacker || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || रोहित साव27 || 22-02-2026 |- | autopatrolled || नीलम || 09-03-2026 |- | autopatrolled || Dr.jagdish || 10-03-2026 |- | rollbacker || Chronos.Zx || 12-03-2026 |- | rollbacker || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Eihel || 13-03-2026 |- | autopatrolled || Utcursch || 17-03-2026 |- | rollbacker || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || J ansari || 24-03-2026 |- | autopatrolled || Mahensingha || 27-03-2026 |- | autopatrolled || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || 1997kB || 29-03-2026 |- | rollbacker || Saroj || 31-03-2026 |- | autopatrolled || Ziv || 01-04-2026 |- | rollbacker || TypeInfo || 02-04-2026 |- | sysop || संजीव कुमार || 07-04-2026 |- | autopatrolled || Dharmadhyaksha || 07-04-2026 |- | autopatrolled || CommonsDelinker || 08-04-2026 |- | sysop || SM7 || 08-04-2026 |- | sysop || अजीत कुमार तिवारी || 09-04-2026 |- | sysop || अनिरुद्ध कुमार || 09-04-2026 |- | autopatrolled || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | rollbacker || हिंदुस्थान वासी || 09-04-2026 |- | sysop || DreamRimmer || 09-04-2026 |- | autopatrolled || अनुनाद सिंह || 09-04-2026 |- | sysop || Sanjeev bot || 10-04-2026 |} यदि हम यह नई तकनीकी व्यवस्था लागू करते हैं, तो सक्रिय सदस्यों को काम करने में सहूलियत मिलेगी, विकिपीडिया का विकास तेज़ी से होगा, और प्रबंधकों का कीमती समय बचेगा। कृपया इस प्रस्ताव पर अपने बहुमूल्य विचार साझा करें ताकि हम इस सुधार को प्रबंधकों के माध्यम से लागू करवा सकें। धन्यवाद। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 09:22, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] जी, मुझे आपका उद्देश्य समझ में नहीं आया। जो आवेदन अधूरे हैं उनमें से अधिकतर अधूरे होने का कारण प्रबन्धकों की सक्रियता नहीं बल्कि उचित स्रोत का न होना है। आप चाहते हो कि स्रोतों के अभाव में आवेदन करने वाले सदस्य मनमर्जी से स्थानान्तरण करते रहें? आपने जो उपरोक्त सूची दी है, क्या उनमें कोई सदस्य अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है? यदि हाँ तो सूचित करें। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 15:48, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] महोदय, ::'''1. मनमर्जी से स्थानांतरण:''' मेरा उद्देश्य इसे बढ़ावा देना बिल्कुल नहीं है। जैसा कि इस विषय पर पहले भी बताया गया था, यह प्रस्ताव केवल स्पष्ट वर्तनी और मात्रा की गलतियों को तुरंत सुधारने के लिए है। यदि कोई 'स्वतः स्थापित' सदस्य अनुचित स्थानांतरण करता है, तो उसे आसानी से पूर्ववत किया जा सकता है। साथ ही, संवेदनशील या विवादित पृष्ठों को नए 'स्थानांतरण सुरक्षा स्तर' से सुरक्षित रखा जा सकता है। या एक विकल्प यह भी है कि किसी भी सुरक्षित पृष्ठ पर स्थानांतरण करने के लिए नामांकन की आवश्यकता है| ::'''2. सूची का उद्देश्य:''' मेरा उद्देश्य किसी पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाना नहीं था। यह सूची केवल यह दर्शाने के लिए थी कि अधिकार-प्राप्त सक्रिय सदस्यों की संख्या वर्तमान में बहुत कम है। इस कारण, नाम सुधारने जैसे छोटे-छोटे कार्यों का पूरा बोझ आप जैसे चंद सक्रिय प्रबंधकों पर ही पड़ता है। ::मेरा यह प्रस्ताव केवल प्रबंधकों का कीमती समय बचाने और सुधारात्मक कार्यों को गति देने का एक तकनीकी सुझाव मात्र है। समुदाय का जो भी निर्णय होगा, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 16:27, 20 अप्रैल 2026 (UTC) :::प्रबन्धकों के समय का निर्धारण आप कैसे कर सकते हैं? किसी प्रबन्धक ने आपको कहा है क्या कि हमारा समय पृष्ठ स्थानान्तरण में जा रहा है? <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 16:36, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ::::@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] जी नहीं महोदय [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 23:57, 20 अप्रैल 2026 (UTC) ==आप सभी से विनम्र निवेदन है कि== मेरे [[विकिपीडिया:स्वतः_परीक्षित_अधिकार_हेतु_निवेदन#चाहर_धर्मेंद्र|इस]] निवेदन के संबंध में आपके विचार मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृपया अपना बहुमूल्य समय निकालकर इस पर अपना मत अवश्य साझा करें। आपके सुझाव और प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।<span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 11:34, 10 अप्रैल 2026 (UTC) == अनुरोध == नमस्कार! मैं आपसे [[मॉड्यूल:Lang/data]] पर एक संपादन करने का अनुरोध करता हूँ। ["hbo"] = "Biblical Hebrew" ===> ["hbo"] = "बाइबिली इब्रानी" [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 19:28, 10 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 08:56, 17 अप्रैल 2026 (UTC) ::@[[सदस्य:DreamRimmer|DreamRimmer]] धन्यवाद! [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 09:51, 17 अप्रैल 2026 (UTC) == रोलबैक अधिकार के नामांकन पर आपके विचार/मत हेतु == <div style="background-color: #FFF9E6; padding: 15px; border: 1px solid #DAA520; border-radius: 8px; margin-top: 10px;"> नमस्ते, आशा है आप सकुशल होंगे। मैं पिछले कुछ समय से हिंदी विकिपीडिया पर सक्रिय रूप से गश्त कर रहा हूँ और हाल के बदलावों में स्पष्ट बर्बरता को हटाने का प्रयास कर रहा हूँ। अपने इस कार्य को और अधिक सुचारू बनाने के लिए, मैंने स्वयं को '''रोलबैक अधिकार''' के लिए नामांकित किया है। चूँकि आप हिंदी विकिपीडिया के एक अनुभवी सदस्य हैं, इसलिए मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि कृपया मेरे हालिया योगदानों की समीक्षा करें और अपना बहुमूल्य मत या सुझाव प्रदान करें। आपका समर्थन और मार्गदर्शन मेरे लिए अत्यंत उत्साहजनक होगा। '''नामांकन यहाँ देखें:''' [[विकिपीडिया:रोलबैकर्स अधिकार हेतु निवेदन#AMAN KUMAR|मेरे नामांकन पर अपना मत दें]] सहयोग के लिए अग्रिम धन्यवाद! सादर,<br> [[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 11:44, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> ==अंतिम कुछ दिन: विकि सम्मेलन भारत 2026 छात्रवृत्ति आवेदन== प्रिय विकिमीडिया समुदाय सदस्य, हमें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि '''[[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026|विकि सम्मेलन भारत 2026]]''' के लिए छात्रवृत्ति आवेदन वर्तमान में खुले हैं, और अंतिम तिथि अब बहुत निकट है। विकि सम्मेलन भारत 2026 इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन का चौथा संस्करण है, जो भारत और दक्षिण एशिया में इंडिक भाषाओं के विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स तथा मुक्त ज्ञान आंदोलन से जुड़े विकिमीडियनों और हितधारकों को एक साथ लाता है। यह सम्मेलन 4–6 सितंबर 2026 को कोच्चि, केरल में आयोजित किया जाएगा। * आप अधिक जानकारी और [[m:Special:MyLanguage/WikiConference India 2026/Scholarship|आवेदन फॉर्म Meta-Wiki पर उपलब्ध]] छात्रवृत्ति पृष्ठ पर प्राप्त कर सकते हैं। * छात्रवृत्ति की अंतिम तिथि: 15 अप्रैल 2026, रात 11:59 बजे (IST) अब जबकि केवल कुछ ही दिन शेष हैं, हम आपको आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं यदि आपने अभी तक आवेदन नहीं किया है। साथ ही, कृपया इस अवसर को अपने समुदाय में साझा करें और अन्य लोगों को भी आवेदन करने के लिए प्रेरित करें। अधिक जानकारी और नियमित अपडेट के लिए, कृपया सम्मेलन के Meta पृष्ठ पर जाएँ। सादर, <br> विकि सम्मेलन भारत 2026 आयोजन टीम की ओर से <span style="color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 23:38, 11 अप्रैल 2026 (UTC) </div> == फॉण्ट == हिन्दी विकिपीडिया पर पिछले कुछ दिनों से लैटिन लिपि के लिए जो फॉण्ट है, वे [[:hak:Hakkapedia|Hakkapedia]] एवं [[:nan:Pang-chān:Holopedia|Holopedia]] के फॉण्ट की तरह दिख रहा है। क्या default फॉण्ट को बदल दिया गया है? [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) {{Font color|grey|११:२५, १२ अप्रैल २०२६ (IST)}} == Lua त्रुटि == मॉड्यूल:Designation/lookup को बनाने में मुझे "Lua error पंक्ति 1 पर: unexpected symbol near '{'." त्रुटि मिलती है। कृपया उस पृष्ठ का निर्माण करें। कोड अंग्रेज़ी विकिपीडिया से लिया गया है (Module:Designation/lookup) [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 08:04, 18 अप्रैल 2026 (UTC) :{{done}} – [[User:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF">'''Dream'''Rimmer</span>]] [[User talk:DreamRimmer|<span style="color:#5A4FCF;">&#9632;</span>]] 16:24, 19 अप्रैल 2026 (UTC) == "यहया" नामक दो लेख? == दोनों [[याह्या (पैग़म्बर)|John the Baptist]] और [[यहया (इस्लाम)|Yahya]] के लेखों के नाम "यहया" क्यों है? केवल इस्लाम में उस व्यक्ति का नाम '''यहया''' होता है। ईसाई धर्म में उनहें '''यूहन्ना बपतिस्मा दाता''' के नाम से जाना जाता है। कृपया इस समस्या पर गौर करें। [[सदस्य:The Sorter|The Sorter]] ([[सदस्य वार्ता:The Sorter|वार्ता]]) 11:24, 20 अप्रैल 2026 (UTC) == Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications == The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]]. Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects. '''The hackathon is intended for:''' * Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc. * Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc. * Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces. Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach. To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses. '''Apply here:''' * Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form] '''More information:''' We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page. * Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]] If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at contact@indicmediawikidev.org. Best Regards, On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group == सत्य == सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित, तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है। इसके साथ व्यक्ति की मानसिकता का जुड़ाव  है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आंकाक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण ‘अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन’ सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। झूठ बोलना तथा किसी सद् वस्तु के स्वरूप, स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना - ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य है। [[विशेष:योगदान/&#126;2026-24320-85|&#126;2026-24320-85]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-24320-85|वार्ता]]) 08:51, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == साँचा:स्टेटस भाषा == मैं <span style="font-family:'Kalimati', 'Arial', serif;"> [[साँचा:स्टेटस भाषा]] </span> का निर्माण करके वाला हूँ, जो [[बाली विकिपीडिया]] के [[:ban:Mal:Status basa|ᬫᬮ᭄:ᬲ᭄ᬢᬢᬸᬲ᭄ᬩᬲ]] की तरह होगा। इसे [[साँचा:Infobox language|ज्ञानदूसक भाषा]] पर लागु करने के बाद, हमें भाषा का यूनेस्को वर्गीकरण करना बहुत सरल हो जाएगा एवं वे interface भी अच्छा लगेगा। [[User:ङघिञ|<span style="color:orange;">'''ङघिञ'''</span>]] ([[User talk:ङघिञ|वार्ता]]) 10:42, 21 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:ङघिञ|ङघिञ]] जी नमस्ते। साँचा का वार्ता पृष्ठ देख लें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 06:06, 22 अप्रैल 2026 (UTC) == यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति संपादनोत्सव में भाग लें == नमस्ते, 'यूक्रेन सांस्कृतिक कूटनीति माह 2026' की गतिविधियों को समर्थन देने के लिए 22 अप्रैल 2026 को पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 1 बजे तक नई दिल्ली (भारत) स्थित युक्रेन दूतावास में एक विशेष संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं के विकिपीडिया प्रोजेक्ट्स पर यूक्रेन की संस्कृति से संबंधित जानकारी को समृद्ध करना और उसमें सुधार करना है। इस कार्यक्रम में आप ऑनलाइन जूम मीटिंग के माध्यम से शामिल हो सकते हैं। * समय: बुधवार, 22 अप्रैल 2026 | सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक (IST) * ज़ूम मीटिंग लिंक: [https://zoom.us/j/98031157656?pwd=BUHOGF5D4Qg8YnqQrEdFx3TyXrvKDO.1 ऑनलाइन जुड़ें] * मीटिंग आईडी: 980 3115 7656 * पासकोड: 716372 * आयोजन का मेटा पृष्ठ: [[m:Special:MyLanguage/Ukraine's Cultural Diplomacy Month 2026|w.wiki/LyML]] इस आयोजन का हिस्सा बनें और भारतीय भाषाओं में मुक्त ज्ञान के प्रसार में अपना योगदान दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 22:59, 21 अप्रैल 2026 (UTC) == आगामी कार्यक्रम == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची: # जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून) # जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई) # अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त) -संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:40, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 == :मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 17:41, 24 अप्रैल 2026 (UTC) lt18c7atrgiv8jc581i2p5s1t9ku03p कोंकणी भाषा 0 1608 6543802 6376919 2026-04-25T09:35:43Z Sequencesolved 173771 एक चित्र जोडा। 6543802 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Geographic Distribution of Native Konkani Speakers.png]] '''कोंकणी''' [[गोवा]], [[महाराष्ट्र]] के दक्षिणी और पश्चिमी भाग, [[कर्नाटक]] के उत्तरी भाग, [[केरल]] के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है। भाषायी तौर पर यह 'आर्य' भाषा परिवार से संबंधित है और [[मराठी भाषा|मराठी]] से इसका काफी निकट का संबंध है। राजनैतिक तौर पर इस भाषा tको अपनी पहचान के लिये [[मराठी भाषा|मराठी]] भाषा से काफी संघर्ष करना पड़ा है। अब [[भारत का संविधान|भारतीय संविधान]] के तहत कोंकणी को [[आठवीं अनुसूची]] में स्थान प्राप्त है। {{Infobox language|nativename=कोंकणी|name=कोंकणी|states=[[गोआ]], [[महाराष्ट्र]]|familycolor=Indo-European|fam1=[[हिन्दv-यूरोपीय भाषा-परिवार]]}} १९८७ में गोवा में कोंकणी को मराठी के बराबर राजभाषा का दर्जा दिया गया किन्तु लिपि पर असहमति के कारण आजतक इस पर अमल नहीं किया जा सका।<ref>{{cite news|url = http://www.navhindtimes.in/panorama/implementing-goa-s-official-language-act|title = Implementing Goa’s Official Language Act|publisher = The Navhind Times|accessdate = 17 जुलाई 2013|archive-url = https://web.archive.org/web/20130922095915/http://www.navhindtimes.in/panorama/implementing-goa-s-official-language-act|archive-date = 22 सितंबर 2013|url-status = dead}}</ref> कोंकणी अनेक [[लिपि]]यों में लिखी जाती रही है; जैसे - [[देवनागरी]], [[कन्नड़ भाषा|कन्नड]], [[मलयालम भाषा|मलयालम]] और [[रोमन]]। [[गोवा]] को राज्य का दर्जा मिलने के बाद दवनागरी लिपि में कोंकणी को वहाँ की राजभाषा घोषित किया गया है। == परिचय == भारत के पश्चिमी तट स्थित कोंकण प्रदेश में प्रचलित बोलियों को सामान्यत: कोंकणी कहते है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के परिणामस्वरूव इस प्रदेश में बोली जानेवाली भाषा के तीन रूप हैं- * (1) मराठीभाषी क्षेत्र से संलग्न मालवण-रत्नगिरि क्षेत्र की भाषा; * (2) मंगलूर से संलग्न दक्षिण कोंकणी क्षेत्र की भाषा जिसका कन्नड़ से संपर्क है तथा * (3) मध्य कोंकण अथवा [[गोमांतक]] (गोवा) कारवार में प्रचलित भाषा। [[चित्र:Konkani languages.png|500px|thumb|कोंकण भाषा-परिवार का वेन-आरेख]] गोवावाला प्रदेश अनेक शती तक [[पुर्तगाल]] के अधीन था। वहाँ पुर्तगालियों ने जोर जबर्दस्ती के बल पर लोगें से धर्मपरिवर्तन कराया और उनके मूल सांस्कृतिक रूप को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया। इन सब के बावजूद लोगों ने अपनी मातृभाषा का परित्याग नहीं किया। उल्टे अपने धर्मोपदेश के निमित्त ईसाई पादरियों ने वहाँ की बोली में अपने गंथ रचे। धर्मांतरित हुए नए ईसाई प्राय: अशिक्षित लोग थे। उन्हें [[ईसाई धर्म]] का तत्व समझाने के लिये पुर्तगाली पादरियों ने कोंकणी का आश्रय लिया। प्राचीन काल में गोवा से [[साष्टी]] तक के भूभाग में जो बोली बोली जाती थी उसे ही लोग विशुद्ध कोंकणी मानते थे और उसे '''गोमांतकी''' नाम से पुकारते थे तथापि सोलहवीं शती तक उसके लिये कोई विशिष्ट नाम रूढ़ नहीं था। पुर्तगालियों को जैसा समझ में आया, वैसा ही नाम उसे दिया और पुकारा। 1553 ई. के जेसुइट पादरियों के आलेखों में उसे कानारी नाम दिया गया है। 17वीं शती में पादरी स्टीफेंस ने दौत्रीन क्रिश्तां नामक पुस्तक लिखी। उसमें उनका कहना था कि उसे उन्होंने कानारी में लिखा है और गोमांतकी बोली का जो व्याकरण उन्होंने तैयार किया उसे उन्होंने ‘कानारी भाषा का व्याकरण’ नाम दिया। इस कानारी शब्द का संबंध कन्नड़ से तनिक भी नहीं है। वरन् समझा जाता है कि समुद्र के किनारे की भाषा होने के कारण ही उसे कानारी कहा गया। टॉम पीरिश नामक यात्री ने अपनी पुस्तक ‘सूम ऑरिएंताल’ में, जो 1515 ई. में लिखी गई थी, गोवा की बोली का नाम कोंकोनी दिया है। 1658 में जेसुइट पादरी मिगलेद आल्मैद ने भी गोमंतकी के लिये 'कोंकणी' शब्द का प्रयोग किया है। अब यह शब्द प्राय: पूरे कोंकण प्रदेश की भाषा के लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसे मराठी की उपभाषा मानते हैं तो कुछ कन्नड़ की। कुछ अन्य भाषावैज्ञानिक इसे आर्यवंश से उद्भूत स्वतंत्र समृद्ध भाषा बताते है। == साहित्य == सत्रहवीं शती से पूर्व इस भाषा का कोई लिखित [[साहित्य]] उपलब्ध नहीं है। इस भाषा के साहित्यिक प्रयोग का श्रेय ईसाई मिशनरियों को है। पादरी स्टिफेस की पुस्तक '''दौत्रीन क्रिश्तां''' इस भाषा की प्रथम पुस्तक है जो 1622 ई. में लिखी गई थी। उसके बाद 1640 ई. में उन्होंने [[पुर्तगाली भाषा]] में इसका [[व्याकरण]] 'आर्ति द लिंग्व कानारी’ नाम से लिखा। इससे पूर्व 1563 ई. के आसपास किसी स्थानीय धर्मांतरित निवासी द्वारा इस भाषा का कोश तैयार हुआ और ईसाई धर्म के अनेक ग्रंथ लिखे गए। पुर्तगाली शासन के परिणामस्वरूप साहित्य निर्माण की गति अत्यंत मंद रही किंतु अब इस भाषा ने एक समृद्ध साहित्य की भाषा का रूप धारण कर लिया है। [[लोककथा]], [[लोकगीत]], [[लोकनाट्य]] तो संगृहित हुए ही हैं, आधुनिक [[नाटक]] (सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक) और [[एकांकी]] की रचना भी हुई है। अन्य विधाओं में भी रचनाएँ की जाने लगी है। == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20120819190929/http://konkanverter.com/conversion-tool/ '''कोंकन्वर्टर''' : कोंकणी की विभिन्न लिपियों में परस्पर लिप्यंतरण का उपकरण] * [https://web.archive.org/web/20120805011409/http://www.goanews.com/blogs_disp.php?uid=29 गोवा_न्यूज] * [https://web.archive.org/web/20140201184121/https://wikisource.org/wiki/Index:Konkani_Viswakosh_Vol1.pdf कोंकणी विश्वकोश] {{हिन्द-आर्य भाषाएँ}} {{भारत की भाषाएँ |state=autocollapse}} [[श्रेणी:हिन्द-आर्य भाषाएँ]] [[श्रेणी:भारत की भाषाएँ]] [[श्रेणी:गोवा की भाषाएँ]] [[श्रेणी:गोवा की संस्कृति]] luktdtxi5eg5xih1g11v1ck0h0h27io 6543814 6543802 2026-04-25T10:15:11Z AMAN KUMAR 911487 केवल चित्र आकर को सुधारा 6543814 wikitext text/x-wiki {{Infobox language|nativename=कोंकणी|name=कोंकणी|states=[[गोआ]], [[महाराष्ट्र]]|familycolor=Indo-European|fam1=[[हिन्दv-यूरोपीय भाषा-परिवार]]|image=Geographic Distribution of Native Konkani Speakers.png}} '''कोंकणी''' [[गोवा]], [[महाराष्ट्र]] के दक्षिणी और पश्चिमी भाग, [[कर्नाटक]] के उत्तरी भाग, [[केरल]] के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है। भाषायी तौर पर यह 'आर्य' भाषा परिवार से संबंधित है और [[मराठी भाषा|मराठी]] से इसका काफी निकट का संबंध है। राजनैतिक तौर पर इस भाषा tको अपनी पहचान के लिये [[मराठी भाषा|मराठी]] भाषा से काफी संघर्ष करना पड़ा है। अब [[भारत का संविधान|भारतीय संविधान]] के तहत कोंकणी को [[आठवीं अनुसूची]] में स्थान प्राप्त है। १९८७ में गोवा में कोंकणी को मराठी के बराबर राजभाषा का दर्जा दिया गया किन्तु लिपि पर असहमति के कारण आजतक इस पर अमल नहीं किया जा सका।<ref>{{cite news|url = http://www.navhindtimes.in/panorama/implementing-goa-s-official-language-act|title = Implementing Goa’s Official Language Act|publisher = The Navhind Times|accessdate = 17 जुलाई 2013|archive-url = https://web.archive.org/web/20130922095915/http://www.navhindtimes.in/panorama/implementing-goa-s-official-language-act|archive-date = 22 सितंबर 2013|url-status = dead}}</ref> कोंकणी अनेक [[लिपि]]यों में लिखी जाती रही है; जैसे - [[देवनागरी]], [[कन्नड़ भाषा|कन्नड]], [[मलयालम भाषा|मलयालम]] और [[रोमन]]। [[गोवा]] को राज्य का दर्जा मिलने के बाद दवनागरी लिपि में कोंकणी को वहाँ की राजभाषा घोषित किया गया है। == परिचय == भारत के पश्चिमी तट स्थित कोंकण प्रदेश में प्रचलित बोलियों को सामान्यत: कोंकणी कहते है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के परिणामस्वरूव इस प्रदेश में बोली जानेवाली भाषा के तीन रूप हैं- * (1) मराठीभाषी क्षेत्र से संलग्न मालवण-रत्नगिरि क्षेत्र की भाषा; * (2) मंगलूर से संलग्न दक्षिण कोंकणी क्षेत्र की भाषा जिसका कन्नड़ से संपर्क है तथा * (3) मध्य कोंकण अथवा [[गोमांतक]] (गोवा) कारवार में प्रचलित भाषा। [[चित्र:Konkani languages.png|thumb|कोंकण भाषा-परिवार का वेन-आरेख]] गोवावाला प्रदेश अनेक शती तक [[पुर्तगाल]] के अधीन था। वहाँ पुर्तगालियों ने जोर जबर्दस्ती के बल पर लोगें से धर्मपरिवर्तन कराया और उनके मूल सांस्कृतिक रूप को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया। इन सब के बावजूद लोगों ने अपनी मातृभाषा का परित्याग नहीं किया। उल्टे अपने धर्मोपदेश के निमित्त ईसाई पादरियों ने वहाँ की बोली में अपने गंथ रचे। धर्मांतरित हुए नए ईसाई प्राय: अशिक्षित लोग थे। उन्हें [[ईसाई धर्म]] का तत्व समझाने के लिये पुर्तगाली पादरियों ने कोंकणी का आश्रय लिया। प्राचीन काल में गोवा से [[साष्टी]] तक के भूभाग में जो बोली बोली जाती थी उसे ही लोग विशुद्ध कोंकणी मानते थे और उसे '''गोमांतकी''' नाम से पुकारते थे तथापि सोलहवीं शती तक उसके लिये कोई विशिष्ट नाम रूढ़ नहीं था। पुर्तगालियों को जैसा समझ में आया, वैसा ही नाम उसे दिया और पुकारा। 1553 ई. के जेसुइट पादरियों के आलेखों में उसे कानारी नाम दिया गया है। 17वीं शती में पादरी स्टीफेंस ने दौत्रीन क्रिश्तां नामक पुस्तक लिखी। उसमें उनका कहना था कि उसे उन्होंने कानारी में लिखा है और गोमांतकी बोली का जो व्याकरण उन्होंने तैयार किया उसे उन्होंने ‘कानारी भाषा का व्याकरण’ नाम दिया। इस कानारी शब्द का संबंध कन्नड़ से तनिक भी नहीं है। वरन् समझा जाता है कि समुद्र के किनारे की भाषा होने के कारण ही उसे कानारी कहा गया। टॉम पीरिश नामक यात्री ने अपनी पुस्तक ‘सूम ऑरिएंताल’ में, जो 1515 ई. में लिखी गई थी, गोवा की बोली का नाम कोंकोनी दिया है। 1658 में जेसुइट पादरी मिगलेद आल्मैद ने भी गोमंतकी के लिये 'कोंकणी' शब्द का प्रयोग किया है। अब यह शब्द प्राय: पूरे कोंकण प्रदेश की भाषा के लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसे मराठी की उपभाषा मानते हैं तो कुछ कन्नड़ की। कुछ अन्य भाषावैज्ञानिक इसे आर्यवंश से उद्भूत स्वतंत्र समृद्ध भाषा बताते है। == साहित्य == सत्रहवीं शती से पूर्व इस भाषा का कोई लिखित [[साहित्य]] उपलब्ध नहीं है। इस भाषा के साहित्यिक प्रयोग का श्रेय ईसाई मिशनरियों को है। पादरी स्टिफेस की पुस्तक '''दौत्रीन क्रिश्तां''' इस भाषा की प्रथम पुस्तक है जो 1622 ई. में लिखी गई थी। उसके बाद 1640 ई. में उन्होंने [[पुर्तगाली भाषा]] में इसका [[व्याकरण]] 'आर्ति द लिंग्व कानारी’ नाम से लिखा। इससे पूर्व 1563 ई. के आसपास किसी स्थानीय धर्मांतरित निवासी द्वारा इस भाषा का कोश तैयार हुआ और ईसाई धर्म के अनेक ग्रंथ लिखे गए। पुर्तगाली शासन के परिणामस्वरूप साहित्य निर्माण की गति अत्यंत मंद रही किंतु अब इस भाषा ने एक समृद्ध साहित्य की भाषा का रूप धारण कर लिया है। [[लोककथा]], [[लोकगीत]], [[लोकनाट्य]] तो संगृहित हुए ही हैं, आधुनिक [[नाटक]] (सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक) और [[एकांकी]] की रचना भी हुई है। अन्य विधाओं में भी रचनाएँ की जाने लगी है। == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20120819190929/http://konkanverter.com/conversion-tool/ '''कोंकन्वर्टर''' : कोंकणी की विभिन्न लिपियों में परस्पर लिप्यंतरण का उपकरण] * [https://web.archive.org/web/20120805011409/http://www.goanews.com/blogs_disp.php?uid=29 गोवा_न्यूज] * [https://web.archive.org/web/20140201184121/https://wikisource.org/wiki/Index:Konkani_Viswakosh_Vol1.pdf कोंकणी विश्वकोश] {{हिन्द-आर्य भाषाएँ}} {{भारत की भाषाएँ |state=autocollapse}} [[श्रेणी:हिन्द-आर्य भाषाएँ]] [[श्रेणी:भारत की भाषाएँ]] [[श्रेणी:गोवा की भाषाएँ]] [[श्रेणी:गोवा की संस्कृति]] a0bi7t8997u63yvra3q0sqh12uofz75 राम 0 2977 6543675 6534868 2026-04-24T17:31:25Z ~2026-25182-14 921708 6543675 wikitext text/x-wiki {{Infobox deity | type = Hindu | image = Lord Rama with arrows.jpg | caption = धनुष और बाण लेकर खड़े हुए श्याम वर्ण राम | name = श्रीराम | symbol = कोदंड/ सारंग [[धनुष]] <br> [[बाण]] <br> [[शंख]] <br> [[कमल]] | Devanagari = राम | Sanskrit_transliteration = {{IAST|Rāma}} | member_of = [[दशावतार]] | other_names = <!--Only significant and notable names should be included.-->परमपुरुष,सनातन पुरुष,वैकर्तन , राघव, श्रीरामचंद्र, श्रीदशरथसुत, श्रीकौशल्यानंदन, श्रीसीतावल्लभ, श्रीरघुनन्दन, श्रीरघुवर, श्रीरघुनाथ, काकुत्स्थ, श्रीरामचन्द्र, श्रीराम, राम पण्डित , बोधिसत्वककुत्स्थकुलनंदन, रामजानकीवल्लभ , ककुत्स्थकुलनंदनसीतापती, मायापति आदि। | god_of = {{hlist|मर्यादा पुरुषोत्तम<br> धर्म, मर्यादा, पराक्रम, विद्या, मोक्ष के ईश्वर<br> [[विष्णु]] के सातवें तथा सर्वश्रेष्ठ अवतार<br> [[परब्रह्म]] पुरुषोत्तम नारायण }} | affiliation = भगवान के सातवें तथा सर्वश्रेष्ठ अवतार, सर्वोच्च भगवान | day = [[गुरुवार]] | parents = {{unbulleted list|[[दशरथ]] (father)|[[कौशल्या]] (mother)|[[कैकयी]] (step-mother)|[[सुमित्रा]] (step-mother)}} | spouse = [[सीता|सीताजी]]{{sfn|James G. Lochtefeld|2002|p=555}} | abode = {{hlist|[[अयोध्या]]|[[साकेतधाम]]|[[वैकुंठ]]}} | weapon = कोदंड धनुष्य तथा बाण, कौमुदी [[गदा]], तलवार | texts = [[वाल्मीकि रामायण]]<br>[[रामचरितमानस]]<br>[[विष्णु पुराण]]<br>[[भागवत पुराण]]<br>[[अध्यात्म रामायण]]<br>अदभुत रामायण<br> दसरथ जातक <br>[[पद्मपुराण]] | siblings = {{unbulleted list|[[लक्ष्मण]] (half-brother)|[[भरत]] (half-brother)|[[शत्रुध्न]] (half-brother)}} | festivals = {{hlist|[[राम नवमी]]|विवाह पंचमी|[[दिवाली]]|[[विजयादशमी]]|[[वसंतोत्सव]]}} | avatar_birth = [[Ayodhya (Ramayana)|Ayodhya]], [[Kosala]] (present-day [[Uttar Pradesh]], [[India]]) | avatar_end = [[Ghaghara|Sarayu River]], Ayodhya, Kosala (present-day Uttar Pradesh, India) | children = {{unbulleted list|[[लव]] (son)|[[कुश]] (son)}} | dynasty = [[Raghuvaṃśa (dynasty)|Raghuvamsha]]-[[Solar Dynasty|Suryavamsha]] | predecessor = [[Dasharatha]] | gender = Male | successor = [[Lava (Ramayana)|Lava]] (North Kosala) [[Kusha (Ramayana)|Kusha]] (South Kosala) | mantra = [[जय श्री राम]]<br/>जय सियाराम<br>ॐ श्रीरामचंद्राय नमः ।।<br>ॐ जानकीवल्लभाय नमः । <br> हरे राम <br> [[सीताराम]] repetition | weapons = | army = वानर सेना<br>वैष्णवी सेना | venerated_in = [[Ramanandi Sampradaya]]<br>[[Sri Vaishnavism]]<br/>[[Smartism]] }} {{Infobox royalty | name = दशावतार क्रमांक | predecessor = [[परशुराम]] | successor = [[कृष्ण]] }} '''श्रीराम '''एक देवता हैं, जिन्हें [[भगवान विष्णु]] का सातवां अवतार माना जाता हैं। उनका धर्म युक्त निष्कलंक जीवन होने के कारण उन्हें ''' मर्यादा पुरुषोत्तम ''' भी कहा जाता है। <ref>{{Cite web|url=https://study.com/academy/lesson/rama-hindu-god-history-facts-overview.html|title=Shri Ram}}</ref> [[वैष्णव]] परंपराओं में उनको भगवान के रुप में पूजा जाता है। उनके जीवन पर आधारित [[वाल्मीकि रामायण]] महाकाव्य है। राम को भारत तथा संपूर्ण विश्व में पूजा जाता है। रामचन्द्रजी के जीवनचरित्र का आधार [[संस्कृत ]]भाषा का आदिकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत [[रामायण]] है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस एवं कम्ब रामायण इत्यादि ग्रंथों के अनुसार [[त्रेतायुग]]में जब लंका का राजा राक्षसराज [[रावण]] पूरे विश्व में अधर्म, अत्याचार फैला रहा था, देवताओं, ऋषियों ओर निर्दोष जीवो को दुख दे रहा था तभी अयोध्या के महाराज [[दशरथ]] और उनकी तीन महारानी [[कौशल्या]],[[सुमित्रा]], [[कैकयी]] वर्षों बाद भी पुत्रहीन थे। रावण के अत्याचारों का अंत करने एवं धर्म के रक्षा करने के लिए [[भगवान विष्णु]]ने [[कौशल्या]] के गर्भ से रामावतार धारण किया, उनकी सहायता के लिए उनकी संगिनी [[लक्ष्मी|लक्ष्मीजी]] ने देवी सीता, [[शेषनाग]] ने [[लक्ष्मण]], [[शिव|शिवजी]] ने [[हनुमान|हनुमानजी]] आदि रूप में अवतार लिया। चैत्र सुद नवमी के दिन राम,लक्ष्मण, [[भरत]],[[शत्रुघ्न]] का जन्म हुआ। बाल्यकाल में अनेक लीलाएं करके उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा प्राप्त करके राम-लक्ष्मण ऋषि [[विश्वामित्र]] के साथ ऋषिआश्रमों में राक्षसों का संहार करने गए। राक्षसदमन तथा यज्ञ की रक्षा करने के बाद उन्होंने मिथिला में सीता स्वयंवर में भाग लिया। जहां रामने शिव धनुष पिनाक भंग करके अपनी शाश्वत संगिनी देवी [[सीता|सीताजी]] से विवाह किया। कुछ समय बाद वहीं राजा दशरथ ने अपने पुत्र राम को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया, लेकिन महारानी [[कैकेयी|कैकयी]] षडयंत्र रचके वचनपालक दशरथ से वचन में राम को १४ वर्षका वनवास और अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राज्य दिलवाया। अपने माता पिता के वचन और आज्ञा को शिरोधार्य कर राजसुख त्याग कर श्रीराम ने अपना कर्तव्य निभाया। भ्राता लक्ष्मण और पतिव्रता देवी सीताने भी राम का साथ दिया। वनवास के दौरान रामचन्द्रजी ने अनेक राक्षसों का संहार भी किया, अंत में [[दंडकारण्य]] में निवास किया। वहां श्रीराम ने रावण के भाई खर और दूषण का सेना समेत नाश किया और रावण की कामी बहन [[शूर्पणखा]] का अपमान किया क्योंकि वह राक्षसी काम के वशीभूत होकर श्रीराम से विवाह करना चाहती थी। रावण ने शूर्पणखा के भड़काने पर अहंकारवश श्रीराम से बदला लेने के लिए देवी सीताजी का ब्राह्मण के छद्मवेष में कपट से अपहरण किया, और देवी सीता की रक्षा करने के कारण [[जटायु]] को भी मार डाला। राम-लक्ष्मण ने जटायु ओर माता [[शबरी]] को सदगती दे कर वानरराज [[सुग्रीव]] से मित्रता की। रामने पापी [[बाली]] का वध कर सुग्रीव को राजा बनाया। रामने समस्त वानर और रिंछ जाति की सहायता से सीताजी को ढूंढा, रामचंद्रजी ने अपने प्रताप से समुद्र पर [[रामसेतु]] बांधा, [[रामेश्वरम तीर्थ|रामेश्वर ज्योतिर्लिंग]] की स्थापना की। लंकादहन के बाद राम और रावण में घमासान युद्ध हुआ। जिसमें रामने [[कुंभकर्ण]], [[इंद्रजीत]], [[रावण]] सहित समस्त राक्षसकुल का अंत कर के अपनी धर्मपत्नी सीताजी तथा बंधक देवताओं, ऋषियों को मुक्त करवाया। पश्चाद् सीताराम का राज्याभिषेक हुआ। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार रामचन्द्रजी ने ११ हजार वर्ष तक [[अयोध्या]] पर सुशासन किया, जिसे "रामराज्य" भी कहते है।<ref>{{Cite web|url=https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1|title=Valmiki Ramayana}}</ref> रामराज्य में प्रजा सर्व रूप से सुखी थी, सभी लोग अपने स्वधर्म का पालन करते थे, समाज से अनाचार, अधर्म, अशांति खत्म हो चुकी थी।<ref name=":0" /> [[File:Sree Raghunandan - Ram Laxman Sita and Hanuman, M V Dhurandar.jpg|thumb]] अपने समस्त कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्र [[लव]] और [[कुश]] को राज्य सौंप कर श्रीरामने वैकुंठगमन किया। इस प्रकार रामने आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा का कर्तव्य निभाया ओर धर्म की स्थापना की। राम की यह सभी जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है।<ref>{{Cite book|title=रामचरितमानस|last=गोस्वामी|first=तुलसीदास|publisher=गीताप्रेस गोरखपुर|year=2019|location=गोरखपुर}}</ref> == नाम-व्युत्पत्ति एवं अर्थ == 'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है।<ref>संस्कृत-हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे।</ref> 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास) करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें 'रमण' करते (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं - "रमते कणे कणे इति रामः"। '[[विष्णुसहस्रनाम]]' पर लिखित अपने भाष्य में आद्य [[शंकराचार्य]] ने [[पद्मपुराण]] का हवाला देते हुए कहा है कि ''नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।''<ref>श्रीविष्णुसहस्रनाम, सानुवाद शांकर भाष्य सहित, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999, पृष्ठ-143.</ref> == अवतार रूप में प्राचीनता == [[वैदिक साहित्य]] में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है। [[ऋग्वेद]] में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-348.</ref> (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से भी एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्य कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-3892.</ref> तथा शेष एक जगह ही व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्यजी कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-4406.</ref>; लेकिन वहाँ भी उनके अवतारी पुरुष या दशरथ के पुत्र होने का कोई संकेत नहीं है। यद्यपि [[नीलकण्ठ चतुर्धर]] ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं, परन्तु यह उनकी निजी मान्यता है। स्वयं ऋग्वेद के उन प्रकरणों में प्राप्त किसी संकेत या किसी अन्य भाष्यकार के द्वारा उन मंत्रों का रामकथापरक अर्थ सिद्ध नहीं हो पाया है। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-79.</ref> तथा एक स्थल पर<ref>वैदिक-पदानुक्रम-कोषः, संहिता विभाग, तृतीय खण्ड, संपादक- विश्वबन्धुजी शास्त्री, [[विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान]], होशिआरपुर, संस्करण-1956, पृष्ठ-1550; एवं ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-195.</ref> 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है। परन्तु उनके राम से सम्बद्ध होने का कोई संकेत नहीं मिल पाता है।<ref>हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, संपादक- डॉ० धीरेंद्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-2011, पृष्ठ-497.</ref> ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग [[ऐतरेय ब्राह्मण]] में दो स्थलों पर<ref name="अ">वैदिक-पदानुक्रमकोषः, ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, द्वितीय खण्ड, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर, संस्करण-1936, पृष्ठ-852.</ref> (७-५-१{=७-२७} तथा ७-५-८{=७-३४})हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य सायण के अनुसार 'मृगवु' नामक स्त्री का पुत्र है।<ref>ऐतरेयब्राह्मणम् (सायण भाष्य एवं हिन्दी अनुवाद सहित) भाग-2, संपादक एवं अनुवादक- डॉ० सुधाकर मालवीय, तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी, संस्करण-1983, पृष्ठ-1201.</ref> [[शतपथ ब्राह्मण]] में एक स्थल पर<ref name="अ" /> 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (४-६-१-७)। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में है तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है।<ref>शतपथब्राह्मण (सटीक), भाग-1, विजयकुमार गोविंदराम हासानंद, दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-657.</ref> तात्पर्य यह कि प्रचलित राम का अवतारी रूप [[वाल्मीकि रामायण|वाल्मीकीय रामायण]] एवं [[पुराण|पुराणों]] की ही देन है। == जन्म == [[File:The Birth of rama.jpg |thumb|राम-जन्म, अकबर की रामायण से ]] रामजी के कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में रामजी के-जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:- '''...................... चैत्रे नावमिके तिथौ।।''' '''नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।''' '''ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।'''<ref name=":0">श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सटीक), प्रथम भाग, बालकाण्ड- 1.1.97; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996 ई०, पृष्ठ-57.</ref> अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (रामजी का जन्म हुआ)। यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य के उच्च (मेष में) होने पर बुद्ध का उच्च (कन्या में) होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह -- मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने रामजी के-जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। === भगवान राम के जन्म-समय पर आधुनिक शोध === परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में, विशेषतः पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं, जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष तथा द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेता युग में अर्थात द्वापर से पहले हुआ था। चूँकि कलियुग का अभी प्रारंभ ही हुआ है (लगभग 5,500 वर्ष ही बीते हैं) और राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ तथा अवतार लेकर धरती पर उनके वर्तमान रहने का समय परंपरागत रूप से 11,000 वर्ष माना गया है।<ref>श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, पूर्ववत्,1.15.29; पृ०-64.</ref> अतः द्वापर युग के 8,64,000 वर्ष + राम की वर्तमानता के 11,000 वर्ष + द्वापर युग के अंत से अबतक बीते 5,100 वर्ष = कुल 8,80,100 वर्ष। अतएव परंपरागत रूप से राम का जन्म आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पहले माना जाता है। प्रख्यात मराठी शोधकर्ता विद्वान डॉ॰ [[पद्माकर विष्णु वर्तक]] ने एक दृष्टि से इस समय को संभाव्य माना है। उनका कहना है कि वाल्मीकीय रामायण में एक स्थल पर विन्ध्याचल तथा हिमालय की ऊँचाई को समान बताया गया है। विन्ध्याचल की ऊँचाई 5,000 फीट है तथा यह प्रायः स्थिर है, जबकि हिमालय की ऊँचाई वर्तमान में 29,029 फीट है तथा यह निरंतर वर्धनशील है। दोनों की ऊँचाई का अंतर 24,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार हिमालय 100 वर्षो में 3 फीट बढ़ता है। अतः 24,029 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,01,000 वर्ष लगे होंगे। अतः अभी से करीब 8,01,000 वर्ष पहले हिमालय की ऊँचाई विन्ध्याचल के समान रही होगी, जिसका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण में वर्तमानकालिक रूप में हुआ है। इस तरह डाॅ॰ वर्तक को एक दृष्टि से यह समय संभव लगता है, परंतु उनका स्वयं मानना है कि वे किसी अन्य स्रोत से इस समय की पुष्टि नहीं कर सकते हैं।<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA (Translation of the Original Book ‘VASTAVA RAMAYANA’ in Marathi), Dr. Padmakar Vishnu Vartak, English Translation by Vidyakar Vasudev Bhide, Blue Bird (India) Limited, Pune, First Edition-2008, p.282.</ref> अपने सुविख्यात ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में डॉ॰ वर्तक ने मुख्यतः ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.290-300.</ref> वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार राम की वास्तविक जन्म-तिथि 4 दिसंबर 7323 ईसापूर्व को सुनिश्चित किया है। उनके अनुसार इसी तिथि को दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा।<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.300.</ref> डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक के शोध के अनेक वर्षों के बाद<ref>डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक की पुस्तक 'वास्तव रामायण' (मराठी) का चतुर्थ संस्करण 1993 में निकल चुका था</ref> (2004 ईस्वी से) 'आई-सर्व' के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके रामजी का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। उनका मानना था कि इस तिथि को ग्रहों की वही स्थिति थी जिसका वर्णन वाल्मीकीय रामायण में है। परंतु यह समय काफी संदेहास्पद हो गया है। 'आई-सर्व' के शोध दल ने जिस 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया वह वास्तव में ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह-गणित करने में सक्षम नहीं है।<ref>इतिहास का उपहास (राम की जन्मतिथि एवं जन्मकुण्डली की भ्रामक व्याख्या का निराकरण), विनय झा, अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्, वाराणसी, संस्करण-2015, पृष्ठ-10-11.</ref> वस्तुतः 2013 ईस्वी से पहले इतने पहले का ग्रह-गणित करने हेतु सक्षम सॉफ्टवेयर उपलब्ध ही नहीं था।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-10 तथा 30.</ref> इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न होकर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था तथा तिथि भी अष्टमी ही थी।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-29.</ref> बाद में अन्य विशेषज्ञ द्वारा "ejplde431" सॉफ्टवेयर द्वारा की गयी सही गणना में तिथि तो नवमी हो जाती है परन्तु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-37.</ref> अतः 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व की तिथि वस्तुतः राम की जन्म-तिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। ऐसी स्थिति में अब यदि डॉ० पी० वी० वर्तक द्वारा पहले ही परिशोधित तिथि सॉफ्टवेयर द्वारा प्रमाणित हो जाए तभी रामजी का वास्तविक समय प्रायः सर्वमान्य हो पाएगा अथवा प्रमाणित न हो पाने की स्थिति में नवीन तिथि के शोध का रास्ता खुलेगा। == राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ == === बालपन और सीता-स्वयंवर === पुराणों में राम के जन्म के बारे में स्पष्ट प्रमाण मिलते कि राम का जन्म वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]] के [[अयोध्या]] जिले के [[अयोध्या]] नामक नगर में हुआ था। अयोध्या जो कि भगवान राम के पूर्वजों की ही राजधानी थी। रामचन्द्र के पूर्वज रघु थे। [[File:Birth of rama.jpg|राम जन्म|thumb]] भगवान राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्‍हें '''मर्यादा पुरूषोत्तम राम''' के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्‍यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था। इसलिए भारत में जब भी सुराज (अच्छे राज) की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरू वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु [[विश्वामित्र]] उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गये। राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ थे। [[ताड़का]] नामक राक्षसी बक्सर (बिहार) में रहती थी। वहीं पर उसका वध हुआ। राम ने उस समय [[ताड़का]] नामक राक्षसी को मारा तथा [[मारीच]] को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही गुरु विश्‍वामित्र उन्हें [[मिथिला]] ले गये। वहाँ के विदेह राजा [[जनक]] ने अपनी पुत्री [[सीता]] के विवाह के लिए एक स्वयंवर समारोह आयोजित किया था। जहाँ भगवान [[शिव]] का एक धनुष था जिसकी प्रत्‍यंचा चढ़ाने वाले शूरवीर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे। जब बहुत से राजा प्रयत्न करने के बाद भी धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ाना तो दूर उसे उठा तक नहीं सके, तब विश्‍वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्‍यंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्‍यंचा चढाने के प्रयत्न में वह महान धनुष घोर ध्‍‍वनि करते हुए टूट गया। [[File:Rama breaking the bow to win Sita as wife.jpg|thumb ]] महर्षि [[परशुराम]] ने जब इस घोर ध्‍वनि को सुना तो वे वहाँ आ गये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्‍यक्‍त करने लगे। लक्ष्‍मण उग्र स्‍वभाव के थे। उनका विवाद परशुराम से हुआ। (वाल्मिकी रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं मिलता है।) तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्‍त लोगों ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे। [[File:Rama Sita Playing.jpg|thumb|सीताराम]] लोग राम को बहुत चाहते थे। उनकी मृदुल, जनसेवायुक्‍त भावना और न्‍यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्‍थ की ओर अग्रसर हो रहे थे। अत: उन्‍होंने राज्‍यभार राम को सौंपनें का सोचा। जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्‍त करनेवाले हैं। उस समय राम के अन्‍य दो भाई भरत और शत्रुघ्‍न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी [[मन्थरा]] ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्‍हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्‍हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चा‍हते हैं। भगवान राम के बचपन की विस्तार-पूर्वक विवरण स्वामी तुलसीदास की [[रामचरितमानस]] के [[बालकाण्ड]] से मिलती है। === वनवास === [[File:Rama, Sita, Lakshmana in exile in forest having a meal, pahari painting.jpg|सीताराम और लक्ष्मण वनवास के दौरान|thumb ]] राजा [[दशरथ]] के तीन रानियाँ थीं: [[कौशल्या]], [[सुमित्रा]] और [[कैकेयी]]। भगवान राम कौशल्या के पुत्र थे, सुमित्रा के दो पुत्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पुत्र भरत थे। राज्य नियमो से राजा का ज्येष्ठ लड़का ही राजा बनने का पात्र होता है अत: राम को अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होने दो बार दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो वन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती है। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी उसका पुत्र भरत ही राजा बनें, इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंदे राजा दशरथ को मजबूरन यह स्वीकार करना पड़ा। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे। === सीता का हरण === वनवास के समय, [[रावण]] ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था। रामायण के अनुसार, जब राम , सीता और लक्ष्मण कुटिया में थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीताजी व्याकुल हो गए। वह हिरण रावण का मामा [[मारीच]] था। उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता उसे देख कर मोहित हो गए और राम से उस हिरण को पकड़ने का अनुरोध किया। राम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा| मारीच राम को बहुत दूर ले गया। मौका मिलते ही रामने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! हे लक्ष्मण!" की आवाज़ लगायी| उस आवाज़ को सुन सीताजी चिन्तित हो गए और उन्होंने लक्ष्मण को राम के पास जाने को कहा| लक्ष्मण जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची, जो [[लक्ष्मण रेखा]] के नाम से प्रसिद्ध है। [[File:Ravi Varma-Ravana Sita Jathayu.jpg|Ravi_Varma-Ravana_Sita_Jathayu|thumb]] भगवान राम, अपने भाई [[लक्ष्मण]] के साथ [[सीता]] की खोज में दर-दर भटक रहे थे। तब वे [[हनुमान]] और [[सुग्रीव]] नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बड़े भक्त बने। === रावण का वध === [[File:Anonymous - Rama and Laksmana Fighting Ravana - 1953.357 - Cleveland Museum of Art.tiff|thumb]] सीता को को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान,विभीषण और वानर सेना की मदद से रावन के सभी बंधु-बांधवों और उसके वंशजों को पराजित किया तथा लौटते समय विभीषण को लंका का राजा बनाकर अच्छे शासक के लिए मार्गदर्शन किया। === अयोध्या वापसी === [[File:Rama and Sita, with Lakshmana returning to Ayodhya.jpg|thumb|राम का अयोध्या में पुनः आगमन]] राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। राम, सीता, लक्षमण और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। वहां सबसे मिलने के बाद राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ। पूरा राज्य कुशल समय व्यतीत करने लगा। [[File:Lord Rama Raj Tilak Ramayana.jpg|thumb|सीताराम का राज्याभिषेक ]] अपने समस्त कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्र [[लव]] और [[कुश]] को राज्य सौंप कर श्रीरामने साकेतगमन किया। इस प्रकार रामने आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा का कर्तव्य निभाया ओर धर्म की स्थापना की। राम की यह सभी जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है। [[File:2016 Singapur, Rochor, Świątynia Sri Krishnan (21).jpg|thumb|राम सभा]] ==दैहिक त्याग== [[File:Rama meet Brahma at heaven.jpg |thumb| ब्रह्मा द्वारा राम का स्वर्ग मे स्वागत]] सीता की सती प्रमाणिकता सिद्ध होने के पश्चात सीता अपने दोनों पुत्रों [[कुश]] और [[लव]] को राम के गोद में सौंप कर धरती माता के साथ भूगर्भ में चली गई। ततपश्चात रामजन्म की जीवन भी पूर्ण हो गई थी। अतः उन्होंने यमराज की सहमति से सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग कर पुनः [[साकेतधाम]] में अपनी शाश्वत संगिनी देवी सीता और पार्षदों सहित दिव्य स्वरूप में विराजमान हो गये। ==संबंधित पृष्ठ== * [[रामायण]] * [[माता सीता]] * [[रामचरितमानस]] * [[साकेतधाम]] * [[हनुमानजी]] * [[जैन धर्म में राम]] * [[रामानंदी संप्रदाय]] * [[तुलसीदास]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Rama|राम}} * [https://hanumanchalisalyrics.co.in/ram-ringtone-download-mp3 Jai Shri Ram Ringtones ] * [https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1 वाल्मिकी रामायण] * [http://www.merikhabar.com/News/श्री_राम_हैं_‘मैनेजमेंट_गुरु’___N19655.html श्री राम जी हैं ‘मैनेजमेंट गुरु’] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20121119042909/http://www.merikhabar.com/News/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_%E2%80%98%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E2%80%99___N19655.html |date=19 नवंबर 2012 }} {{श्री राम चरित मानस}} {{दशावतार}} {{हिन्दू देवी देवता}} {{Authority control}} [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]] [[श्रेणी:राम]] [[श्रेणी:अयोध्याकुल]] [[श्रेणी:विष्णु अवतार]] [[श्रेणी:रामायण के पात्र]] 7eb06p5ylrj2b7vawld2ppuws7b236s 6543714 6543675 2026-04-25T00:28:58Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/संजीव कुमार|संजीव कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:संजीव कुमार|वार्ता]]) के अवतरण 6477906 पर पुनर्स्थापित : पूर्ववत किया 6543714 wikitext text/x-wiki {{Infobox deity | type = Hindu | image = Lord Rama with arrows.jpg | caption = धनुष और बाण लेकर खड़े हुए श्याम वर्ण राम | name = श्रीराम | symbol = कोदंड/ सारंग [[धनुष]] <br> [[बाण]] <br> [[शंख]] <br> [[कमल]] | Devanagari = राम | Sanskrit_transliteration = {{IAST|Rāma}} | member_of = [[दशावतार]] | other_names = <!--Only significant and notable names should be included.-->परमपुरुष,सनातन पुरुष,वैकर्तन , राघव, श्रीरामचंद्र, श्रीदशरथसुत, श्रीकौशल्यानंदन, श्रीसीतावल्लभ, श्रीरघुनन्दन, श्रीरघुवर, श्रीरघुनाथ, काकुत्स्थ, श्रीरामचन्द्र, श्रीराम, राम पण्डित , बोधिसत्वककुत्स्थकुलनंदन, रामजानकीवल्लभ , ककुत्स्थकुलनंदनसीतापती, मायापति आदि। | god_of = {{hlist|मर्यादा पुरुषोत्तम<br> धर्म, मर्यादा, पराक्रम, विद्या, मोक्ष के ईश्वर<br> [[विष्णु]] के सातवें तथा सर्वश्रेष्ठ अवतार<br> [[परब्रह्म]] पुरुषोत्तम नारायण }} | affiliation = भगवान के सातवें तथा सर्वश्रेष्ठ अवतार, सर्वोच्च भगवान | day = [[गुरुवार]] | parents = {{unbulleted list|[[दशरथ]] (father)|[[कौशल्या]] (mother)|[[कैकयी]] (step-mother)|[[सुमित्रा]] (step-mother)}} | spouse = [[सीता|सीताजी]]{{sfn|James G. Lochtefeld|2002|p=555}} | abode = {{hlist|[[अयोध्या]]|[[साकेतधाम]]|[[वैकुंठ]]}} | weapon = कोदंड धनुष्य तथा बाण, कौमुदी [[गदा]], तलवार | texts = [[वाल्मीकि रामायण]]<br>[[रामचरितमानस]]<br>[[विष्णु पुराण]]<br>[[भागवत पुराण]]<br>[[अध्यात्म रामायण]]<br>अदभुत रामायण<br> दसरथ जातक <br>[[पद्मपुराण]] | siblings = {{unbulleted list|[[लक्ष्मण]] (half-brother)|[[भरत]] (half-brother)|[[शत्रुध्न]] (half-brother)}} | festivals = {{hlist|[[राम नवमी]]|विवाह पंचमी|[[दिवाली]]|[[विजयादशमी]]|[[वसंतोत्सव]]}} | avatar_birth = [[Ayodhya (Ramayana)|Ayodhya]], [[Kosala]] (present-day [[Uttar Pradesh]], [[India]]) | avatar_end = [[Ghaghara|Sarayu River]], Ayodhya, Kosala (present-day Uttar Pradesh, India) | children = {{unbulleted list|[[लव]] (son)|[[कुश]] (son)}} | dynasty = [[Raghuvaṃśa (dynasty)|Raghuvamsha]]-[[Solar Dynasty|Suryavamsha]] | predecessor = [[Dasharatha]] | gender = Male | successor = [[Lava (Ramayana)|Lava]] (North Kosala) [[Kusha (Ramayana)|Kusha]] (South Kosala) | mantra = [[जय श्री राम]]<br/>जय सियाराम<br>ॐ श्रीरामचंद्राय नमः ।।<br>ॐ जानकीवल्लभाय नमः । <br> हरे राम <br> [[सीताराम]] repetition | weapons = | army = वानर सेना<br>वैष्णवी सेना | venerated_in = [[Ramanandi Sampradaya]]<br>[[Sri Vaishnavism]]<br/>[[Smartism]] }} {{Infobox royalty | name = दशावतार क्रमांक | predecessor = [[परशुराम]] | successor = [[कृष्ण]] }} '''श्रीराम '''एक प्रसिद्ध हिंदू देवता हैं, जिन्हें [[भगवान विष्णु]] का सातवां तथा सर्वश्रेष्ठ अवतार माना जाता हैं। उनका उच्च धर्मयुक्त निष्कलंक जीवन एक आदर्श होने के कारण उन्हें ''' मर्यादा पुरुषोत्तम ''' भी कहा जाता है। <ref>{{Cite web|url=https://study.com/academy/lesson/rama-hindu-god-history-facts-overview.html|title=Shri Ram}}</ref> [[वैष्णव]] परंपराओं में उनको सर्वोपरि भगवान के रुपमे पूजा जाता है। उनके जीवन पर आधारित [[वाल्मीकि रामायण]] महाकाव्य ऐतिहासिक रूपसे लोकप्रिय है। राम को भारत तथा संपूर्ण दक्षिण एशिया में व्यापक तौर पर पूजा जाता है। रामचन्द्रजी के जीवनचरित्र का मुख्य आधार [[संस्कृत ]]भाषा का आदिकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत [[रामायण]] है। जिसके अनुसार [[त्रेतायुग]]में जब राक्षसराज [[रावण]] पूरे विश्व में अधर्म, अत्याचार फैला रहा था, देवताओं, ऋषियों ओर निर्दोष जीवो को दुख दे रहा था तभी अयोध्या के महाराज [[दशरथ]] और उनकी तीन महारानी [[कौशल्या]],[[सुमित्रा]], [[कैकयी]] वर्षों बाद भी पुत्रहीन थे। रावण के अत्याचारों का अंत करने एवं धर्म के रक्षा करने के लिए [[भगवान विष्णु]]ने [[कौशल्या]] के गर्भ से रामावतार धारण किया, उनकी सहायता के लिए उनकी संगिनी [[लक्ष्मी|लक्ष्मीजी]] ने देवी सीता, [[शेषनाग]] ने [[लक्ष्मण]], [[शिव|शिवजी]] ने [[हनुमान|हनुमानजी]] आदि रूप में अवतार लिया। चैत्र सुद नवमी के दिन राम,लक्ष्मण, [[भरत]],[[शत्रुघ्न]] का जन्म हुआ। बाल्यकाल में अनेक लीलाएं करके उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा प्राप्त करके राम-लक्ष्मण ऋषि [[विश्वामित्र]] के साथ ऋषिआश्रमों में राक्षसों का संहार करने गए। राक्षसदमन तथा यज्ञ की रक्षा करने के बाद उन्होंने मिथिला में सीता स्वयंवर में भाग लिया। जहां रामने शिवधनुष्य भंग करके अपनी शाश्वत संगिनी देवी [[सीता|सीताजी]] से विवाह किया। कुछ समय बाद वहीं राजा दशरथ ने अपने प्रिय पुत्र राम को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया, लेकिन महारानी [[कैकेयी|केकयी]] षडयंत्र रचके वचनपालक दशरथ से वचन में राम को १४ वर्षका वनवास ओर अपने पुत्र भरत को अयोध्याका राज्य दिलवाया। अपने मातापिता के वचन और आज्ञा को शिरोधार्य कर राजसुख त्याग कर श्रीरामने अपना कर्तव्य निभाया महान आदर्श स्थापित किया। भ्रातृभक्त लक्ष्मण और पतिव्रता देवी सीताने भी राम का साथ दिया। वनवास के दौरान रामचन्द्रजी ने अनेक राक्षसों का संहार भी किया, अंत में [[दंडकारण्य]] में निवास किया। वहा रामने रावण के भाई खरदूषणका सेना समेत नाश किया ओर [[शूर्पणखा]] का अपमान किया। वहीं रावण ने सीताजी की सुंदरता से आकर्षित होकर छद्मवेष में कपटसे उनका अपहरण किया, पक्षीराज [[जटायु]] को भी मार डाला। राम-लक्ष्मण ने जटायु ओर माता [[शबरी]] को सदगती दे कर वानरराज [[सुग्रीव]] से मित्रता की। रामने पापी [[बाली]] का वध कर सुग्रीव को राजा बनाया। रामने समस्त वानर और रिंछ जाति की सहायता से सीताजी को ढूंढा, रामचंद्रजी ने अपने प्रताप से समुद्र पर [[रामसेतु]] बांधा, [[रामेश्वरम तीर्थ|रामेश्वर ज्योतिर्लिंग]] की स्थापना की। लंकादहन के बाद राम और रावण में घमासान युद्ध हुआ। जिसमें रामने [[कुंभकर्ण]], [[इंद्रजीत]], [[रावण]] सहित समस्त राक्षसकुल का अंत कर के अपनी धर्मपत्नी सीताजी तथा बंधक देवताओं, ऋषियों को मुक्त करवाया। पश्चाद् सीताराम का राज्याभिषेक हुआ। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार रामचन्द्रजी ने ११ हजार वर्ष तक [[अयोध्या]] पर सुशासन किया, जिसे "रामराज्य" भी कहते है।<ref>{{Cite web|url=https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1|title=Valmiki Ramayana}}</ref> रामराज्य में प्रजा सर्व रूप से सुखी थी, सभी लोग अपने स्वधर्म का पालन करते थे, समाज से अनाचार, अधर्म, अशांति खत्म हो चुकी थी।<ref name=":0" /> [[File:Sree Raghunandan - Ram Laxman Sita and Hanuman, M V Dhurandar.jpg|thumb]] अपने समस्त कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्र [[लव]] और [[कुश]] को राज्य सौंप कर श्रीरामने वैकुंठगमन किया। इस प्रकार रामने आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा का कर्तव्य निभाया ओर धर्म की स्थापना की। राम की यह सभी जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है।<ref>{{Cite book|title=रामचरितमानस|last=गोस्वामी|first=तुलसीदास|publisher=गीताप्रेस गोरखपुर|year=2019|location=गोरखपुर}}</ref> == नाम-व्युत्पत्ति एवं अर्थ == 'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है।<ref>संस्कृत-हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे।</ref> 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास) करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें 'रमण' करते (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं - "रमते कणे कणे इति रामः"। '[[विष्णुसहस्रनाम]]' पर लिखित अपने भाष्य में आद्य [[शंकराचार्य]] ने [[पद्मपुराण]] का हवाला देते हुए कहा है कि ''नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।''<ref>श्रीविष्णुसहस्रनाम, सानुवाद शांकर भाष्य सहित, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999, पृष्ठ-143.</ref> == अवतार रूप में प्राचीनता == [[वैदिक साहित्य]] में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है। [[ऋग्वेद]] में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-348.</ref> (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से भी एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्य कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-3892.</ref> तथा शेष एक जगह ही व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्यजी कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-4406.</ref>; लेकिन वहाँ भी उनके अवतारी पुरुष या दशरथ के पुत्र होने का कोई संकेत नहीं है। यद्यपि [[नीलकण्ठ चतुर्धर]] ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं, परन्तु यह उनकी निजी मान्यता है। स्वयं ऋग्वेद के उन प्रकरणों में प्राप्त किसी संकेत या किसी अन्य भाष्यकार के द्वारा उन मंत्रों का रामकथापरक अर्थ सिद्ध नहीं हो पाया है। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-79.</ref> तथा एक स्थल पर<ref>वैदिक-पदानुक्रम-कोषः, संहिता विभाग, तृतीय खण्ड, संपादक- विश्वबन्धुजी शास्त्री, [[विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान]], होशिआरपुर, संस्करण-1956, पृष्ठ-1550; एवं ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-195.</ref> 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है। परन्तु उनके राम से सम्बद्ध होने का कोई संकेत नहीं मिल पाता है।<ref>हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, संपादक- डॉ० धीरेंद्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-2011, पृष्ठ-497.</ref> ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग [[ऐतरेय ब्राह्मण]] में दो स्थलों पर<ref name="अ">वैदिक-पदानुक्रमकोषः, ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, द्वितीय खण्ड, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर, संस्करण-1936, पृष्ठ-852.</ref> (७-५-१{=७-२७} तथा ७-५-८{=७-३४})हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य सायण के अनुसार 'मृगवु' नामक स्त्री का पुत्र है।<ref>ऐतरेयब्राह्मणम् (सायण भाष्य एवं हिन्दी अनुवाद सहित) भाग-2, संपादक एवं अनुवादक- डॉ० सुधाकर मालवीय, तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी, संस्करण-1983, पृष्ठ-1201.</ref> [[शतपथ ब्राह्मण]] में एक स्थल पर<ref name="अ" /> 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (४-६-१-७)। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में है तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है।<ref>शतपथब्राह्मण (सटीक), भाग-1, विजयकुमार गोविंदराम हासानंद, दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-657.</ref> तात्पर्य यह कि प्रचलित राम का अवतारी रूप [[वाल्मीकि रामायण|वाल्मीकीय रामायण]] एवं [[पुराण|पुराणों]] की ही देन है। == जन्म == [[File:The Birth of rama.jpg |thumb|राम-जन्म, अकबर की रामायण से ]] रामजी के कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में रामजी के-जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:- '''...................... चैत्रे नावमिके तिथौ।।''' '''नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।''' '''ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।'''<ref name=":0">श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सटीक), प्रथम भाग, बालकाण्ड- 1.1.97; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996 ई०, पृष्ठ-57.</ref> अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (रामजी का जन्म हुआ)। यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य के उच्च (मेष में) होने पर बुद्ध का उच्च (कन्या में) होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह -- मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने रामजी के-जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। === भगवान राम के जन्म-समय पर आधुनिक शोध === परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में, विशेषतः पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं, जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष तथा द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेता युग में अर्थात द्वापर से पहले हुआ था। चूँकि कलियुग का अभी प्रारंभ ही हुआ है (लगभग 5,500 वर्ष ही बीते हैं) और राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ तथा अवतार लेकर धरती पर उनके वर्तमान रहने का समय परंपरागत रूप से 11,000 वर्ष माना गया है।<ref>श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, पूर्ववत्,1.15.29; पृ०-64.</ref> अतः द्वापर युग के 8,64,000 वर्ष + राम की वर्तमानता के 11,000 वर्ष + द्वापर युग के अंत से अबतक बीते 5,100 वर्ष = कुल 8,80,100 वर्ष। अतएव परंपरागत रूप से राम का जन्म आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पहले माना जाता है। प्रख्यात मराठी शोधकर्ता विद्वान डॉ॰ [[पद्माकर विष्णु वर्तक]] ने एक दृष्टि से इस समय को संभाव्य माना है। उनका कहना है कि वाल्मीकीय रामायण में एक स्थल पर विन्ध्याचल तथा हिमालय की ऊँचाई को समान बताया गया है। विन्ध्याचल की ऊँचाई 5,000 फीट है तथा यह प्रायः स्थिर है, जबकि हिमालय की ऊँचाई वर्तमान में 29,029 फीट है तथा यह निरंतर वर्धनशील है। दोनों की ऊँचाई का अंतर 24,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार हिमालय 100 वर्षो में 3 फीट बढ़ता है। अतः 24,029 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,01,000 वर्ष लगे होंगे। अतः अभी से करीब 8,01,000 वर्ष पहले हिमालय की ऊँचाई विन्ध्याचल के समान रही होगी, जिसका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण में वर्तमानकालिक रूप में हुआ है। इस तरह डाॅ॰ वर्तक को एक दृष्टि से यह समय संभव लगता है, परंतु उनका स्वयं मानना है कि वे किसी अन्य स्रोत से इस समय की पुष्टि नहीं कर सकते हैं।<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA (Translation of the Original Book ‘VASTAVA RAMAYANA’ in Marathi), Dr. Padmakar Vishnu Vartak, English Translation by Vidyakar Vasudev Bhide, Blue Bird (India) Limited, Pune, First Edition-2008, p.282.</ref> अपने सुविख्यात ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में डॉ॰ वर्तक ने मुख्यतः ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.290-300.</ref> वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार राम की वास्तविक जन्म-तिथि 4 दिसंबर 7323 ईसापूर्व को सुनिश्चित किया है। उनके अनुसार इसी तिथि को दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा।<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.300.</ref> डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक के शोध के अनेक वर्षों के बाद<ref>डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक की पुस्तक 'वास्तव रामायण' (मराठी) का चतुर्थ संस्करण 1993 में निकल चुका था</ref> (2004 ईस्वी से) 'आई-सर्व' के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके रामजी का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। उनका मानना था कि इस तिथि को ग्रहों की वही स्थिति थी जिसका वर्णन वाल्मीकीय रामायण में है। परंतु यह समय काफी संदेहास्पद हो गया है। 'आई-सर्व' के शोध दल ने जिस 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया वह वास्तव में ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह-गणित करने में सक्षम नहीं है।<ref>इतिहास का उपहास (राम की जन्मतिथि एवं जन्मकुण्डली की भ्रामक व्याख्या का निराकरण), विनय झा, अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्, वाराणसी, संस्करण-2015, पृष्ठ-10-11.</ref> वस्तुतः 2013 ईस्वी से पहले इतने पहले का ग्रह-गणित करने हेतु सक्षम सॉफ्टवेयर उपलब्ध ही नहीं था।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-10 तथा 30.</ref> इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न होकर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था तथा तिथि भी अष्टमी ही थी।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-29.</ref> बाद में अन्य विशेषज्ञ द्वारा "ejplde431" सॉफ्टवेयर द्वारा की गयी सही गणना में तिथि तो नवमी हो जाती है परन्तु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में।<ref>इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-37.</ref> अतः 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व की तिथि वस्तुतः राम की जन्म-तिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। ऐसी स्थिति में अब यदि डॉ० पी० वी० वर्तक द्वारा पहले ही परिशोधित तिथि सॉफ्टवेयर द्वारा प्रमाणित हो जाए तभी रामजी का वास्तविक समय प्रायः सर्वमान्य हो पाएगा अथवा प्रमाणित न हो पाने की स्थिति में नवीन तिथि के शोध का रास्ता खुलेगा। == राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ == === बालपन और सीता-स्वयंवर === पुराणों में राम के जन्म के बारे में स्पष्ट प्रमाण मिलते कि राम का जन्म वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]] के [[अयोध्या]] जिले के [[अयोध्या]] नामक नगर में हुआ था। अयोध्या जो कि भगवान राम के पूर्वजों की ही राजधानी थी। रामचन्द्र के पूर्वज रघु थे। [[File:Birth of rama.jpg|राम जन्म|thumb]] भगवान राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्‍हें '''मर्यादा पुरूषोत्तम राम''' के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्‍यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था। इसलिए भारत में जब भी सुराज (अच्छे राज) की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरू वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु [[विश्वामित्र]] उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गये। राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ थे। [[ताड़का]] नामक राक्षसी बक्सर (बिहार) में रहती थी। वहीं पर उसका वध हुआ। राम ने उस समय [[ताड़का]] नामक राक्षसी को मारा तथा [[मारीच]] को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही गुरु विश्‍वामित्र उन्हें [[मिथिला]] ले गये। वहाँ के विदेह राजा [[जनक]] ने अपनी पुत्री [[सीता]] के विवाह के लिए एक स्वयंवर समारोह आयोजित किया था। जहाँ भगवान [[शिव]] का एक धनुष था जिसकी प्रत्‍यंचा चढ़ाने वाले शूरवीर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे। जब बहुत से राजा प्रयत्न करने के बाद भी धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ाना तो दूर उसे उठा तक नहीं सके, तब विश्‍वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्‍यंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्‍यंचा चढाने के प्रयत्न में वह महान धनुष घोर ध्‍‍वनि करते हुए टूट गया। [[File:Rama breaking the bow to win Sita as wife.jpg|thumb ]] महर्षि [[परशुराम]] ने जब इस घोर ध्‍वनि को सुना तो वे वहाँ आ गये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्‍यक्‍त करने लगे। लक्ष्‍मण उग्र स्‍वभाव के थे। उनका विवाद परशुराम से हुआ। (वाल्मिकी रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं मिलता है।) तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्‍त लोगों ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे। [[File:Rama Sita Playing.jpg|thumb|सीताराम]] लोग राम को बहुत चाहते थे। उनकी मृदुल, जनसेवायुक्‍त भावना और न्‍यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्‍थ की ओर अग्रसर हो रहे थे। अत: उन्‍होंने राज्‍यभार राम को सौंपनें का सोचा। जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्‍त करनेवाले हैं। उस समय राम के अन्‍य दो भाई भरत और शत्रुघ्‍न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी [[मन्थरा]] ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्‍हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्‍हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चा‍हते हैं। भगवान राम के बचपन की विस्तार-पूर्वक विवरण स्वामी तुलसीदास की [[रामचरितमानस]] के [[बालकाण्ड]] से मिलती है। === वनवास === [[File:Rama, Sita, Lakshmana in exile in forest having a meal, pahari painting.jpg|सीताराम और लक्ष्मण वनवास के दौरान|thumb ]] राजा [[दशरथ]] के तीन रानियाँ थीं: [[कौशल्या]], [[सुमित्रा]] और [[कैकेयी]]। भगवान राम कौशल्या के पुत्र थे, सुमित्रा के दो पुत्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पुत्र भरत थे। राज्य नियमो से राजा का ज्येष्ठ लड़का ही राजा बनने का पात्र होता है अत: राम को अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होने दो बार दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो वन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती है। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी उसका पुत्र भरत ही राजा बनें, इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंदे राजा दशरथ को मजबूरन यह स्वीकार करना पड़ा। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे। === सीता का हरण === वनवास के समय, [[रावण]] ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था। रामायण के अनुसार, जब राम , सीता और लक्ष्मण कुटिया में थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीताजी व्याकुल हो गए। वह हिरण रावण का मामा [[मारीच]] था। उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता उसे देख कर मोहित हो गए और राम से उस हिरण को पकड़ने का अनुरोध किया। राम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा| मारीच राम को बहुत दूर ले गया। मौका मिलते ही रामने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! हे लक्ष्मण!" की आवाज़ लगायी| उस आवाज़ को सुन सीताजी चिन्तित हो गए और उन्होंने लक्ष्मण को राम के पास जाने को कहा| लक्ष्मण जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची, जो [[लक्ष्मण रेखा]] के नाम से प्रसिद्ध है। [[File:Ravi Varma-Ravana Sita Jathayu.jpg|Ravi_Varma-Ravana_Sita_Jathayu|thumb]] भगवान राम, अपने भाई [[लक्ष्मण]] के साथ [[सीता]] की खोज में दर-दर भटक रहे थे। तब वे [[हनुमान]] और [[सुग्रीव]] नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बड़े भक्त बने। === रावण का वध === [[File:Anonymous - Rama and Laksmana Fighting Ravana - 1953.357 - Cleveland Museum of Art.tiff|thumb]] सीता को को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान,विभीषण और वानर सेना की मदद से रावन के सभी बंधु-बांधवों और उसके वंशजों को पराजित किया तथा लौटते समय विभीषण को लंका का राजा बनाकर अच्छे शासक के लिए मार्गदर्शन किया। === अयोध्या वापसी === [[File:Rama and Sita, with Lakshmana returning to Ayodhya.jpg|thumb|राम का अयोध्या में पुनः आगमन]] राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। राम, सीता, लक्षमण और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। वहां सबसे मिलने के बाद राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ। पूरा राज्य कुशल समय व्यतीत करने लगा। [[File:Lord Rama Raj Tilak Ramayana.jpg|thumb|सीताराम का राज्याभिषेक ]] अपने समस्त कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्र [[लव]] और [[कुश]] को राज्य सौंप कर श्रीरामने साकेतगमन किया। इस प्रकार रामने आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा का कर्तव्य निभाया ओर धर्म की स्थापना की। राम की यह सभी जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है। [[File:2016 Singapur, Rochor, Świątynia Sri Krishnan (21).jpg|thumb|राम सभा]] ==दैहिक त्याग== [[File:Rama meet Brahma at heaven.jpg |thumb| ब्रह्मा द्वारा राम का स्वर्ग मे स्वागत]] सीता की सती प्रमाणिकता सिद्ध होने के पश्चात सीता अपने दोनों पुत्रों [[कुश]] और [[लव]] को राम के गोद में सौंप कर धरती माता के साथ भूगर्भ में चली गई। ततपश्चात रामजन्म की जीवन भी पूर्ण हो गई थी। अतः उन्होंने यमराज की सहमति से सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग कर पुनः [[साकेतधाम]] में अपनी शाश्वत संगिनी देवी सीता और पार्षदों सहित दिव्य स्वरूप में विराजमान हो गये। ==संबंधित पृष्ठ== * [[रामायण]] * [[माता सीता]] * [[रामचरितमानस]] * [[साकेतधाम]] * [[हनुमानजी]] * [[जैन धर्म में राम]] * [[रामानंदी संप्रदाय]] * [[तुलसीदास]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Rama|राम}} * [http://www.ramhanuman.in/shri-ram/about-lord-ram.html श्री राम जी पर आधारित वेबसाइट] * [https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1 वाल्मिकी रामायण] * [http://www.merikhabar.com/News/श्री_राम_हैं_‘मैनेजमेंट_गुरु’___N19655.html श्री राम जी हैं ‘मैनेजमेंट गुरु’] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20121119042909/http://www.merikhabar.com/News/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_%E2%80%98%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E2%80%99___N19655.html |date=19 नवंबर 2012 }} {{श्री राम चरित मानस}} {{दशावतार}} {{हिन्दू देवी देवता}} {{Authority control}} [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]] [[श्रेणी:राम]] [[श्रेणी:अयोध्याकुल]] [[श्रेणी:विष्णु अवतार]] [[श्रेणी:रामायण के पात्र]] brelhb27niwctaiykfs90a44oebp73v 6543715 6543714 2026-04-25T00:42:22Z AMAN KUMAR 911487 इन्फोबॉक्स का हिंदीकरण किया गया, आदरसूचक शब्दों को हटाया गया, स्पैम लिंक हटाए गए और व्याकरणिक अशुद्धियों को ठीक किया गया। 6543715 wikitext text/x-wiki {{Infobox deity | type = Hindu | image = Lord Rama with arrows.jpg | caption = धनुष और बाण लेकर खड़े हुए श्याम वर्ण राम | name = राम | symbol = कोदंड/सारंग [[धनुष]] <br> [[बाण]] <br> [[शंख]] <br> [[कमल]] | Devanagari = राम | Sanskrit_transliteration = {{IAST|Rāma}} | member_of = [[दशावतार]] | other_names = राघव, रामचन्द्र, रघुनन्दन, काकुत्स्थ, सीतावल्लभ, कौशल्यानंदन | god_of = {{hlist|मर्यादा पुरुषोत्तम<br> [[विष्णु]] के सातवें अवतार}} | affiliation = विष्णु के सातवें अवतार | day = [[गुरुवार]] | parents = {{unbulleted list|[[दशरथ]] (पिता)|[[कौशल्या]] (माता)|[[कैकयी]] (सौतेली माता)|[[सुमित्रा]] (सौतेली माता)}} | spouse = [[सीता]] | abode = {{hlist|[[अयोध्या]]|[[साकेतधाम]]|[[वैकुंठ]]}} | weapon = कोदंड धनुष तथा बाण, कौमुदी [[गदा]], तलवार | texts = [[वाल्मीकि रामायण]]<br>[[रामचरितमानस]]<br>[[विष्णु पुराण]]<br>[[भागवत पुराण]]<br>[[अध्यात्म रामायण]] | siblings = {{unbulleted list|[[लक्ष्मण]] (सौतेला भाई)|[[भरत]] (सौतेला भाई)|[[शत्रुघ्न]] (सौतेला भाई)}} | festivals = {{hlist|[[राम नवमी]]|विवाह पंचमी|[[दिवाली]]|[[विजयादशमी]]|[[वसंतोत्सव]]}} | avatar_birth = [[अयोध्या]], [[कोसल]] (वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]) | avatar_end = [[सरयू|सरयू नदी]], अयोध्या, कोसल (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत) | children = {{unbulleted list|[[लव]] (पुत्र)|[[कुश]] (पुत्र)}} | dynasty = [[रघुवंश]]-[[सूर्यवंश]] | predecessor = [[दशरथ]] | gender = पुरुष | successor = [[लव]] (उत्तर कोसल)<br>[[कुश]] (दक्षिण कोसल) | mantra = [[जय श्री राम]]<br/>जय सियाराम<br>ॐ श्रीरामचंद्राय नमः<br>[[सीताराम]] | army = वानर सेना | venerated_in = [[रामानंदी संप्रदाय]]<br>[[श्री वैष्णव संप्रदाय]]<br/>[[स्मार्त संप्रदाय]] }} {{Infobox royalty | name = दशावतार क्रमांक | predecessor = [[परशुराम]] | successor = [[कृष्ण]] }} '''राम''' (जिन्हें '''श्रीराम''' भी कहा जाता है) एक प्रसिद्ध हिंदू देवता हैं, जिन्हें [[भगवान विष्णु]] का सातवां अवतार माना जाता है। उनका जीवन धर्मयुक्त और आदर्श माना जाता है, जिसके कारण उन्हें '''मर्यादा पुरुषोत्तम''' भी कहा जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://study.com/academy/lesson/rama-hindu-god-history-facts-overview.html|title=Shri Ram}}</ref> [[वैष्णव]] परंपराओं में उन्हें सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता है। उनके जीवन पर आधारित महाकाव्य [[वाल्मीकि रामायण]] ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से अत्यंत लोकप्रिय है। राम को भारत तथा संपूर्ण दक्षिण एशिया में व्यापक तौर पर पूजा जाता है। राम के जीवनचरित्र का मुख्य आधार [[संस्कृत]] भाषा का आदिकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत [[रामायण]] है। इसके अनुसार [[त्रेतायुग]] में जब लंका का राजा [[रावण]] अधर्म और अत्याचार फैला रहा था, तब अयोध्या के महाराज [[दशरथ]] और उनकी तीन रानियां [[कौशल्या]], [[सुमित्रा]] और [[कैकयी]] पुत्रहीन थे। रावण के अत्याचारों का अंत करने एवं धर्म की रक्षा करने के लिए [[भगवान विष्णु]] ने कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में अवतार लिया। उनकी सहायता के लिए [[लक्ष्मी]] ने [[सीता]], [[शेषनाग]] ने [[लक्ष्मण]], और [[शिव]] ने [[हनुमान]] के रूप में अवतार लिया। चैत्र शुक्ल नवमी के दिन राम, लक्ष्मण, [[भरत]] और [[शत्रुघ्न]] का जन्म हुआ। बाल्यकाल में उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात राम और लक्ष्मण ऋषि [[विश्वामित्र]] के साथ आश्रमों में राक्षसों का संहार करने गए। यज्ञ की रक्षा करने के बाद उन्होंने मिथिला में सीता स्वयंवर में भाग लिया। वहां राम ने शिव धनुष को भंग करके [[सीता]] से विवाह किया। कुछ समय बाद राजा दशरथ ने राम को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया, लेकिन महारानी [[कैकेयी|कैकयी]] ने दासी मन्थरा के बहकावे में आकर दशरथ से अपने वचनों के रूप में राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। अपने माता-पिता के वचन और आज्ञा को शिरोधार्य कर राजसुख त्याग कर राम ने वनवास स्वीकार किया। भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता ने भी राम का साथ दिया। वनवास के दौरान राम ने अनेक राक्षसों का संहार किया और अंत में [[दंडकारण्य]] में निवास किया। वहां राम ने रावण के भाई खर-दूषण का सेना समेत नाश किया और [[शूर्पणखा]] को दंडित किया। इसके प्रतिशोध में रावण ने सीता की सुंदरता से आकर्षित होकर छद्मवेष में कपट से उनका अपहरण कर लिया और उन्हें बचाने आए पक्षीराज [[जटायु]] का वध कर दिया। राम और लक्ष्मण ने जटायु और [[शबरी]] को सद्गति देकर वानरराज [[सुग्रीव]] से मित्रता की। राम ने [[बाली]] का वध कर सुग्रीव को राजा बनाया। समस्त वानर और रीछ जाति की सहायता से सीता की खोज की गई। राम ने अपने प्रताप से समुद्र पर [[रामसेतु]] का निर्माण किया और [[रामेश्वरम तीर्थ|रामेश्वर ज्योतिर्लिंग]] की स्थापना की। लंका युद्ध में राम ने [[कुंभकर्ण]], [[इंद्रजीत]] और [[रावण]] सहित समस्त राक्षस सेना का अंत करके सीता और बंधक देवताओं को मुक्त करवाया। पश्चात सीता और राम का राज्याभिषेक हुआ। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार राम ने 11 हजार वर्ष तक [[अयोध्या]] पर सुशासन किया, जिसे "रामराज्य" कहा जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1|title=Valmiki Ramayana}}</ref> रामराज्य में प्रजा सुखी थी और समाज से अधर्म व अशांति समाप्त हो चुकी थी।<ref name=":0" /> [[File:Sree Raghunandan - Ram Laxman Sita and Hanuman, M V Dhurandar.jpg|thumb]] अपने कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्रों [[लव]] और [[कुश]] को राज्य सौंप कर राम ने वैकुंठ गमन किया। राम ने एक आदर्श पुत्र, मित्र, भाई, पति और राजा का कर्तव्य निभाया। राम की यह जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है।<ref>{{Cite book|title=रामचरितमानस|last=गोस्वामी|first=तुलसीदास|publisher=गीताप्रेस गोरखपुर|year=2019|location=गोरखपुर}}</ref> == नाम-व्युत्पत्ति एवं अर्थ == 'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है।<ref>संस्कृत-हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे।</ref> 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें ध्याननिष्ठ होते हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं - "रमते कणे कणे इति रामः"। '[[विष्णुसहस्रनाम]]' पर लिखित अपने भाष्य में आद्य [[शंकराचार्य]] ने [[पद्मपुराण]] का हवाला देते हुए कहा है कि ''नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।''<ref>श्रीविष्णुसहस्रनाम, सानुवाद शांकर भाष्य सहित, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999, पृष्ठ-143.</ref> == अवतार रूप में प्राचीनता == [[वैदिक साहित्य]] में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है। [[ऋग्वेद]] में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-348.</ref> (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्य कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-3892.</ref> तथा एक जगह व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है<ref>ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्यजी कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-4406.</ref>; लेकिन वहाँ भी उनके अवतारी पुरुष या दशरथ के पुत्र होने का कोई संकेत नहीं है। यद्यपि [[नीलकण्ठ चतुर्धर]] ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं, परन्तु यह उनकी निजी मान्यता है। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का<ref>ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-79.</ref> तथा एक स्थल पर<ref>वैदिक-पदानुक्रम-कोषः, संहिता विभाग, तृतीय खण्ड, संपादक- विश्वबन्धुजी शास्त्री, [[विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान]], होशिआरपुर, संस्करण-1956, पृष्ठ-1550; एवं ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-195.</ref> 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है, परन्तु उनके राम से सम्बद्ध होने का कोई संकेत नहीं मिल पाता।<ref>हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, संपादक- डॉ० धीरेंद्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-2011, पृष्ठ-497.</ref> ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग [[ऐतरेय ब्राह्मण]] में दो स्थलों पर<ref name="अ">वैदिक-पदानुक्रमकोषः, ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, द्वितीय खण्ड, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर, संस्करण-1936, पृष्ठ-852.</ref> हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य सायण के अनुसार 'मृगवु' नामक स्त्री का पुत्र है।<ref>ऐतरेयब्राह्मणम् (सायण भाष्य एवं हिन्दी अनुवाद सहित) भाग-2, संपादक एवं अनुवादक- डॉ० सुधाकर मालवीय, तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी, संस्करण-1983, पृष्ठ-1201.</ref> [[शतपथ ब्राह्मण]] में एक स्थल पर<ref name="अ" /> 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में हैं तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है।<ref>शतपथब्राह्मण (सटीक), भाग-1, विजयकुमार गोविंदराम हासानंद, दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-657.</ref> तात्पर्य यह है कि प्रचलित राम का अवतारी रूप [[वाल्मीकि रामायण|वाल्मीकीय रामायण]] एवं [[पुराण|पुराणों]] की ही देन है। == जन्म == [[File:The Birth of rama.jpg |thumb|राम-जन्म, अकबर की रामायण से ]] राम की कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ वाल्मीकीय रामायण में राम के जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:- '''...................... चैत्रे नावमिके तिथौ।।''' '''नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।''' '''ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।'''<ref name=":0">श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सटीक), प्रथम भाग, बालकाण्ड- 1.1.97; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996 ई०, पृष्ठ-57.</ref> अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर राम का जन्म हुआ। यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। प्रायः विद्वानों ने राम के जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। === जन्म-समय पर आधुनिक शोध === परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं। चूँकि कलियुग का अभी प्रारंभ ही हुआ है (लगभग 5,500 वर्ष ही बीते हैं) और राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ, अतः परंपरागत रूप से राम का जन्म आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पहले माना जाता है। प्रख्यात शोधकर्ता डॉ॰ [[पद्माकर विष्णु वर्तक]] ने अपने ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में मुख्यतः ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.290-300.</ref> वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार राम की जन्म-तिथि 4 दिसंबर 7323 ईसापूर्व सुनिश्चित की है।<ref>A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.300.</ref> डॉ॰ वर्तक के शोध के अनेक वर्षों बाद 'आई-सर्व' के एक शोध दल ने राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। परंतु यह समय संदेहास्पद माना गया क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त सॉफ्टवेयर ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह-गणित करने में सक्षम नहीं था।<ref>इतिहास का उपहास (राम की जन्मतिथि एवं जन्मकुण्डली की भ्रामक व्याख्या का निराकरण), विनय झा, अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्, वाराणसी, संस्करण-2015, पृष्ठ-10-11.</ref> == जीवन की प्रमुख घटनाएँ == === बालपन और सीता-स्वयंवर === पुराणों के अनुसार राम का जन्म वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]] के [[अयोध्या]] में हुआ था। राम के पूर्वज रघु थे। [[File:Birth of rama.jpg|राम जन्म|thumb]] राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया। राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरु वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु [[विश्वामित्र]] उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गए, जहाँ राम ने [[ताड़का]] नामक राक्षसी का वध किया तथा [[मारीच]] को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान गुरु विश्‍वामित्र उन्हें [[मिथिला]] ले गए, जहाँ राजा [[जनक]] ने अपनी पुत्री [[सीता]] के लिए स्वयंवर आयोजित किया था। राम ने शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे भंग कर दिया और सीता से उनका विवाह हुआ। [[File:Rama breaking the bow to win Sita as wife.jpg|thumb ]] धनुष टूटने की ध्वनि सुनकर महर्षि [[परशुराम]] वहाँ आ गए और क्रोधित हुए। लक्ष्‍मण से उनका विवाद हुआ, तब राम ने बीच-बचाव किया। इसके पश्चात् राम और सीता सुखपूर्वक अयोध्या में रहने लगे। [[File:Rama Sita Playing.jpg|thumb|सीताराम]] === वनवास === [[File:Rama, Sita, Lakshmana in exile in forest having a meal, pahari painting.jpg|सीताराम और लक्ष्मण वनवास के दौरान|thumb ]] राजा दशरथ के वानप्रस्थ लेने का समय आने पर उन्होंने राम को राज्य सौंपने का विचार किया। परंतु कैकेयी की दासी [[मन्थरा]] ने कैकेयी को भड़का दिया। कैकेयी ने राजा दशरथ से पूर्व में मिले दो वरों के आधार पर राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन मांग लिया। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े। === सीता का हरण === वनवास के समय, लंका के राजा [[रावण]] ने सीता का हरण किया। रामायण के अनुसार, रावण के मामा [[मारीच]] ने सुनहरे हिरण का रूप धारण किया। सीता के अनुरोध पर राम उसका पीछा करते हुए दूर चले गए। राम के बाण से मरते हुए मारीच ने राम की आवाज़ में लक्ष्मण को पुकारा। सीता के आग्रह पर लक्ष्मण राम की खोज में गए और सुरक्षा के लिए एक रेखा खींची जिसे [[लक्ष्मण रेखा]] कहा जाता है। लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण ने साधु का वेश धरकर सीता का अपहरण कर लिया। [[File:Ravi Varma-Ravana Sita Jathayu.jpg|Ravi_Varma-Ravana_Sita_Jathayu|thumb]] सीता की खोज में राम और लक्ष्मण की भेंट [[हनुमान]] और [[सुग्रीव]] से हुई। हनुमान राम के सबसे बड़े भक्त बने। === रावण का वध === [[File:Anonymous - Rama and Laksmana Fighting Ravana - 1953.357 - Cleveland Museum of Art.tiff|thumb]] सीता को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान, विभीषण और वानर सेना की मदद से रावण और उसकी सेना को पराजित किया। लौटते समय राम ने विभीषण को लंका का राजा नियुक्त किया। === अयोध्या वापसी === [[File:Rama and Sita, with Lakshmana returning to Ayodhya.jpg|thumb|राम का अयोध्या में पुनः आगमन]] रावण को परास्त करने के पश्चात् राम, सीता, लक्ष्मण और अन्य वानर पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे। राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ। [[File:Lord Rama Raj Tilak Ramayana.jpg|thumb|सीताराम का राज्याभिषेक ]] == दैहिक त्याग == [[File:Rama meet Brahma at heaven.jpg |thumb| ब्रह्मा द्वारा राम का स्वर्ग मे स्वागत]] सीता के भूगर्भ में समा जाने के पश्चात, राम ने अपने दोनों पुत्रों [[कुश]] और [[लव]] को राज्य सौंप दिया। अंततः उन्होंने सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग किया और पुनः [[साकेतधाम]] में अपने दिव्य स्वरूप में विराजमान हो गए। == संबंधित पृष्ठ == * [[रामायण]] * [[सीता]] * [[रामचरितमानस]] * [[साकेतधाम]] * [[हनुमान]] * [[जैन धर्म में राम]] * [[रामानंदी संप्रदाय]] * [[तुलसीदास]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Rama|राम}} * [https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=1 वाल्मीकि रामायण] * [http://www.merikhabar.com/News/श्री_राम_हैं_‘मैनेजमेंट_गुरु’___N19655.html श्री राम जी हैं ‘मैनेजमेंट गुरु’] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20121119042909/http://www.merikhabar.com/News/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_%E2%80%98%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E2%80%99___N19655.html |date=19 नवंबर 2012 }} {{श्री राम चरित मानस}} {{दशावतार}} {{हिन्दू देवी देवता}} {{Authority control}} [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]] [[श्रेणी:राम]] [[श्रेणी:अयोध्याकुल]] [[श्रेणी:विष्णु अवतार]] [[श्रेणी:रामायण के पात्र]] fnnpa1ru7p6xaqfjiqhk197lozrzblj कुम्भ मेला 0 3451 6543643 6451911 2026-04-24T15:08:28Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543643 wikitext text/x-wiki {{Infobox intangible heritage | Image =Kumbh Mela2001.JPG | Caption = २००१ के [[प्रयाग कुंभ]] के दौरान पीपे के पुल से गुजरता अखाड़ा दल | ICH = कुम्भ मेला | State Party = भारत | Domains = तीर्थ यात्रा, स्नान, धार्मिक अनुष्ठान | Observed by = [[हिन्दू]] | Begins = [[मकर संक्रान्ति]] | Ends = [[महा शिवरात्रि]] | Criteria = | ID = ०१२५८ | Region = APA | Year = २०१७ | Session = १२वाँ | List = Representative | Link = https://khatushyambaba.in/blogdetails5 | Below = [[File:Unesco Cultural Heritage logo.svg|100px]] | Note = प्रत्येक चार वर्ष बाद [[प्रयाग]], [[हरिद्वार]], [[नासिक]] और [[उज्जैन]] में क्रम से आयोजित }} '''कुम्भ मेला''' भारत में आयोजित होने वाला एक विशाल मेला है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु हर बारहवें वर्ष [[प्रयाग]], [[हरिद्वार]], [[उज्जैन]] और [[नासिक]] में से किसी एक स्थान पर एकत्र होते हैं और नदी में पवित्र [[स्नान]] करते हैं। प्रत्येक १२वें वर्ष के अतिरिक्त प्रयाग में दो कुम्भ पर्वों के बीच छह वर्ष के अन्तराल में अर्धकुम्भ भी होता है; २०१३ के कुंभ के बाद २०१९ में प्रयाग में अर्धकुम्भ मेले का आयोजन हुआ था और अब २०२५ में पुनः कुंभ मेले का आयोजन हो रहा है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार यह मेला पौष पूर्णिमा के दिन आरंभ होता है और [[मकर संक्रान्ति]] इसका विशेष ज्योतिषीय पर्व होता है, जब सूर्य और [[चन्द्रमा]], वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, [[मेष राशि]] में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रान्ति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन [[स्नान]] करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात् [[स्वर्ग]] दर्शन माना जाता है।{{cn|date=जनवरी 2025}} 'कुम्भ' का शाब्दिक अर्थ “घड़ा, सुराही, बर्तन” है। यह वैदिक ग्रन्थों में पाया जाता है। इसका अर्थ, अक्सर पानी के विषय में या पौराणिक कथाओं में अमरता (अमृत) के बारे में बताया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.jagran.com/blogs/religious/astrological-and-mythical-reason-behind-kumbh-mela/|title=कुंभ मेला के पीछे ये हैं ज्योतिषीय और पौराणिक कारण|website=Jagran blog|language=hi|access-date=2021-12-12|archive-date=12 दिसंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211212103301/https://www.jagran.com/blogs/religious/astrological-and-mythical-reason-behind-kumbh-mela/|url-status=dead}}</ref> [[मेला]] शब्द का अर्थ है, किसी एक स्थान पर मिलना, एक साथ चलना, सभा में या फिर विशेष रूप से सामुदायिक उत्सव में उपस्थित होना। यह शब्द [[ऋग्वेद]] और अन्य प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में भी पाया जाता है। इस प्रकार, कुम्भ मेले का अर्थ है “अमरत्व का मेला” है।<ref>{{Cite web|url=https://radhe-radhe.net/kumbh-mela/|title=कुम्भ मेला (Kumbh Mela) इतिहास महत्व और आयोजन|last=admin|first=Manish|date=2021-01-26|website=राधे राधे|language=en-US|archive-url=|archive-date=|dead-url=|access-date=2021-01-29}}</ref> ===ज्योतिषीय महत्व=== पौराणिक विश्वास जो कुछ भी हो, ज्योतिषियों के अनुसार कुम्भ का असाधारण महत्व [[बृहस्पति]] के कुम्भ राशि में प्रवेश तथा [[सूर्य]] के [[मेष राशि]] में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित [[हर की पौड़ी]] स्थान पर [[गंगा नदी]] के जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अन्तरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुम्भ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।<ref>{{Cite web |url=http://timesofindia.indiatimes.com/city/nashik/Nashik-Garbage-collection-slows-down-after-Kumbh-Mela/articleshow/49534612.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=17 नवंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20151027142347/http://timesofindia.indiatimes.com/city/nashik/Nashik-Garbage-collection-slows-down-after-Kumbh-Mela/articleshow/49534612.cms |archive-date=27 अक्तूबर 2015 |url-status=live }}</ref> हालाँकि सभी हिन्दू त्योहार समान श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए <ref>{{Cite web |url=http://www.tribuneindia.com/news/uttarakhand/ardh-kumbh-mela-force-cleans-ganga-canal/155848.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=17 नवंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20151118190944/http://www.tribuneindia.com/news/uttarakhand/ardh-kumbh-mela-force-cleans-ganga-canal/155848.html |archive-date=18 नवंबर 2015 |url-status=live }}</ref> जाते है, पर यहाँ अर्ध कुम्भ तथा कुम्भ मेले के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है।<ref>{{Cite web |url=http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/modi-government-could-nominate-kumbh-mela-for-unescos-cultural-heritage-list/articleshow/49545922.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=17 नवंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20151030024316/http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/modi-government-could-nominate-kumbh-mela-for-unescos-cultural-heritage-list/articleshow/49545922.cms |archive-date=30 अक्तूबर 2015 |url-status=live }}</ref> == पौराणिक कथाएँ == [[चित्र:Sagar manthan (painting) circa 1820.jpg|thumb|250px|सागर मन्थन]] कुम्भ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा [[समुद्र मन्थन]] से प्राप्त [[अमृत कुम्भ]] से [[अमृत]] बूँदें गिरने को लेकर है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=MALacgnsroMC&printsec=frontcover&dq=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&redir_esc=y#v=onepage&q=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE&f=false|title=Pilgrimage and Power: The Kumbh Mela in Allahabad, 1765-1954|last=Maclean|first=Kama|date=2008-08-28|publisher=OUP USA|isbn=978-0-19-533894-2|language=en}}</ref> इस कथा के अनुसार [[महर्षि दुर्वासा]] के शाप के कारण जब [[इन्द्र]] और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान [[विष्णु]] के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर [[क्षीरसागर]] का [[मन्थन]] करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर सम्पूर्ण देवता दैत्यों के साथ सन्धि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुम्भ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इन्द्रपुत्र [[जयन्त]] अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु [[शुक्राचार्य]] के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयन्त का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयन्त को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों ([[प्रयाग]], [[हरिद्वार]], [[उज्जैन]], [[नासिक]]) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चन्द्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं [[शनि]] ने [[देवेन्द्र]] के भय से घट की रक्षा की। कलह शान्त करने के लिए भगवान ने [[मोहिनी अवतार|मोहिनी]] रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अन्त किया गया। अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरन्तर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुम्भ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है। जिस समय में चन्द्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चन्द्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुम्भ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुम्भ पर्व होता है। == विशेष दिन == [[चित्र:Kumbh-Mela-1998.jpg|right|thumb|१९९८ के कुम्भ मेले में स्नान के लिए जाते हुए [[नागा]] साधु]] * पौष पूर्णिमा * [[मकर संक्रान्ति]] * [[मौनी अमावस्या]] * [[वसन्त पंचमी]] * माघी पूर्णिमा * [[महाशिवरात्रि]] == इतिहास == [[चित्र:Haridwar Kumbh Mela - 1850s.jpg|thumb|right|अंग्रेज चित्रकार जे एम डब्ल्यू टर्नर द्वारा चित्रित 'हरिद्वार कुम्भ मेला' ; यह चित्र १८५० के दशक में बनाया गया था।]] [[चित्र:Kumbh Mela 2001.jpg|thumb|2001 के इलाहाबाद कुम्भ मेले का दृष्य]] [[चित्र:Bathing ghat on the Ganges during Kumbh Mela, 2010, Haridwar.jpg|thumb|हरिद्वार के कुम्भ मेले (२०१०) के दौरान गंगा किनारे स्नान घाट पर श्रद्धालु]] * १०,००० ईपू - अनुष्ठानिक नदी स्नान की अवधारणा के प्रमाण (इतिहासकार एस बी राय के अनुसार) * ६०० ईपू - बौद्ध लेखों में नदी मेलों की उपस्थिति। * ४०० ईपू - सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले को प्रतिवेदित किया। * ३०० - रॉय मानते हैं कि मेले के वर्तमान स्वरूप ने इसी काल में स्वरूप लिया था। विभिन्न पुराणों और अन्य प्राचीन मौखिक परम्पराओं पर आधारित पाठों में पृथ्वी पर चार विभिन्न स्थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है। सर्व प्रथम आगम अखाड़े की स्थापना हुई कालान्तर मे विखण्डन होकर अन्य अखाड़े बने * ५४७ - अभान नामक सबसे प्रारम्भिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन इसी समय का है। * ६०० - चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग (वर्तमान इलाहाबाद|प्रयागराज) पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुम्भ में स्नान किया। * ९०४ - निरंजनी अखाड़े का गठन। * ११४६ - जूना अखाड़े का गठन। * १३०० - कानफटा योगी चरमपन्थी साधु राजस्थान सेना में कार्यरत। * १३९८ - [[तैमूरलंग|तैमूर]], हिन्दुओं के प्रति सुल्तान की सहिष्णुता के दण्ड स्वरूप दिल्ली को ध्वस्त करता है और फिर हरिद्वार मेले की ओर कूच करता है और हजा़रों [[हिन्दू|श्रद्धालुओं]] का नरसंहार करता है। * १५६५ - मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यव्स्था की लड़ाका इकाइयों का गठन। * १६७८ - प्रणामी सम्प्रदायके प्रवर्तक, महामति श्री प्राणनाथजीको विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक घोषित । * १६८४ - फ़्रांसीसी यात्री तवेर्निए नें भारत में १२|12 लाख हिन्दू साधुओं के होने का अनुमान लगाया। * १६९० - नासिक में शैव और वैष्णव सम्प्रदाय|वैष्णव साम्प्रदायों में संघर्ष; ६०,००० मरे। * १७६० - शैवों और वैष्णवों के बीच हरिद्वार मेलें में संघर्ष; १,८०० मरे। * १७८० - ब्रिटिशों द्वारा मठवासी समूहों के शाही स्नान के लिए व्यवस्था की स्थापना। * १८२० - हरिद्वार मेले में हुई भगदड़ से ४३० लोग मारे गए। * १९०६ - ब्रिटिश कलवारी ने साधुओं के बीच मेला में हुई लड़ाई में बीचबचाव किया। * १९५४ - चालीस लाख लोगों अर्थात भारत की १% जनसंख्या ने इलाहाबाद में आयोजित कुम्भ में भागीदारी की; भगदड़ में कई सौ लोग मरे। * १९८९ - गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स|गिनिज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने ६ फरवरी के प्रयाग मेले में १.५ करोड़ लोगों की उपस्थिति प्रमाणित की, जोकी उस समय तक किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्रित लोगों की सबसे बड़ी भीड़ थी। * १९९५ - इलाहाबाद के “अर्धकुम्भ” के दौरान 30 जनवरी के स्नान दिवस को 2 करोड़ लोगों की उपस्थिति। * १९९८ - हरिद्वार महाकुम्भ में 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु चार महीनों के दौरान पधारे; १४ अप्रैल के एक दिन में 1 करोड़ लोग उपस्थित। * २००१ - प्रयागराज के मेले में छः सप्ताहों के दौरान 7 करोड़ श्रद्धालु, 24 जनवरी के अकेले दिन 3 करोड़ लोग उपस्थित। * २००३ - नासिक मेले में मुख्य स्नान दिवस पर 60 लाख लोग उपस्थित। * २००४ - उज्जैन मेला; मुख्य दिवस ५ अप्रैल, १९ अप्रैल, २२ अप्रैल, २४ अप्रैल और ४ मई। * २००७ - इलाहाबाद में अर्धकुम्भ * २०१० - [[२०१० हरिद्वार महाकुम्भ|हरिद्वार में कुम्भ]] * २०१३ - इलाहाबाद का कुम्भ १४ जनवरी से १० मार्च २०१३ के बीच आयोजित किया गया। यह कुल ५५ दिनों के लिए था, इस दौरान इलाहाबाद (प्रयागराज) सर्वाधिक लोकसंख्या वाला शहर बन जाता है। ५ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में ८ करोड़ लोगों का उपस्थित होना विश्व की सबसे अद्भुत घटना है। * २०१५ - नाशिक और त्रम्बकेश्वर में एक साथ जुलाई 14, 2015 को प्रातः ६:१६ पर वर्ष २०१५ का कुम्भ मेला प्रारम्भ हुआ और २५ सितम्बर २०१५ को कुम्भ मेला समाप्त हुआ।<ref>{{Cite web |url=http://www.jagran.com/spiritual/puja-path-kumbh-mela-begins-lakhs-of-devotees-converge-for-holy-dip-12595137.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 जुलाई 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150716022309/http://www.jagran.com/spiritual/puja-path-kumbh-mela-begins-lakhs-of-devotees-converge-for-holy-dip-12595137.html |archive-date=16 जुलाई 2015 |url-status=live }}</ref> * २०१६ - उज्जैन में २२ अप्रैल से आरम्भ * २०१९ - इलाहाबाद में अर्धकुम्भ * २०२१ - हरिद्वार में कुम्भ लगा। * २०२५ - [[महाकुंभ, (प्रयागराज)2025]] == फोटो गैलरी == <gallery> File:2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Dancers from Haryana.jpg|कुम्भ मेले में हरियाणवी नृत्य File:2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Folk Musician 1.jpg|कुम्भ मेले में बाबा 2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Mauni Amavasya Crowd 16.jpg|कुम्भ मेले में उमड़ी भीड़ 2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Portrait 1.jpg|कुम्भ मेले में एक सन्त 2019 Jan 16 - Prayagraj Kumbh Mela - Portrait of a Sadhu Worshipping at the Yamuna.jpg|कुम्भ मेले में एक सन्त पूजा करते हुए 2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Portrait 16 - Boy with Cow to Worship.jpg|कुम्भ मेले में गाय की पूजा File:2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Portrait 31 - Naga Baba Blesses Lady.jpg|एक महिला को आशीर्वाद देते नागा साधु 2019 Feb 04 - Kumbh Mela - Puja.jpg|कुम्भ मेले में पूजा 2019 Jan 16 - Prayagraj Kumbh Mela - Folk Singer And Drummer.jpg|कुम्भ मेले में गायन 2019 Jan 16 - Kumbh Mela - Portrait of Devotees.jpg|कुम्भ मेले में भक्त 2019 Jan 15 - Prayagraj Kumbh Mela - Reading Holy Booklet.jpg|धार्मिक ग्रन्थ पढ़ते हुए </gallery> == सन्दर्भ == {{Reflist|30em}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://prayagraj.nic.in/hi/event/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%be-2025/ महाकुम्भ २०२५] * [https://khatushyambaba.in/blogdetails5 फाल्गुन लखी मेला खाटू श्याम जी] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20250119222738/https://khatushyambaba.in/blogdetails5 |date=19 जनवरी 2025 }} * [https://web.archive.org/web/20110921002606/http://hindi.webdunia.com/news/news/regional/0905/31/1090531078_1.htm महाकुम्भ समाचार] * [https://web.archive.org/web/20131029185715/http://www.spin360.it/photo/photo.php?id=105&idCat=28 Photos by Spin360] * [https://web.archive.org/web/20190221224038/https://www.sergebouvet.com/kumbh-mela/ Kumbh Mela 2019 at Prayagraj : photo documentary of the one of the world's largest religious gatherings.] {{हिन्दू पर्व-त्यौहार}} {{गंगा}} [[श्रेणी:हिन्दू त्यौहार]] [[श्रेणी:हिन्दू पर्व]] [[श्रेणी:कुम्भ मेला|*]] sv6tvnmwnl5e8birfrb02y96l5mkesv श्रेणी:संस्कृति 14 4525 6543634 6448286 2026-04-24T14:41:07Z चाहर धर्मेंद्र 703114 [[Special:Contributions/Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[User talk:Sanjeev bot|वार्ता]]) द्वारा किए गए बदलाव [[Special:Diff/6448286|6448286]] को पूर्ववत किया 6543634 wikitext text/x-wiki यह श्रेणी संस्कृति से संबंधि. लेखों का वर्गीकरण करती है। [[लोक संस्कृति]] {{Commonscat|Culture}} [[श्रेणी:प्रमुख विषय]] l4zxgvevbr2a0an5uwexbq1rfdjhor4 क्षेत्रफल के अनुसार देशों की सूची 0 5370 6543847 6488031 2026-04-25T11:35:04Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543847 wikitext text/x-wiki यह दुनिया के देशों और भूमि, जल और कुल क्षेत्रफल के आधार पर उनकी निर्भरता की एक सूची है, जो कुल क्षेत्रफल के आधार पर क्रमबद्ध है। [[File:Fuller projection with largest countries.svg|thumb|क्षेत्रफल के अनुसार 30 सबसे बड़े देशों और क्षेत्रों के साथ दुनिया का [[डायमैक्सियम नक्शा|डायमैक्सियम मानचित्र]]]] इस सूची में प्रविष्टियाँ [[आइएसओ ३१६६ - १|आईएसओ 3166-1]] मानक में शामिल हैं, लेकिन इन्हीं तक सीमित नहीं हैं, जिसमें संप्रभु राज्य और आश्रित क्षेत्र शामिल हैं। [[संयुक्त राष्ट्र]] के सभी 193 सदस्य देशों और दो पर्यवेक्षक राज्यों को एक रैंक नंबर दिया जाता है। बड़े पैमाने पर [[अमान्य देशों की सूची|गैर-मान्यता प्राप्त राज्य]] जो [[आइएसओ ३१६६ - १|आईएसओ 3166-1]] में नहीं हैं, उन्हें रैंक क्रम में सूची में शामिल किया गया है। ऐसे बड़े पैमाने पर गैर-मान्यता प्राप्त राज्यों के क्षेत्र ज्यादातर मामलों में अधिक व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त राज्यों के क्षेत्रों में भी शामिल होते हैं जो समान क्षेत्र का दावा करते हैं। सूची में [[अंटार्कटिका]] महाद्वीप के कुछ हिस्सों या [[यूरोपीय संघ]] जैसी संस्थाओं पर अलग-अलग देशों के दावे शामिल नहीं हैं, जिनके पास कुछ हद तक संप्रभुता है लेकिन वे खुद को संप्रभु देश या आश्रित क्षेत्र नहीं मानते हैं। इस सूची में क्षेत्रफल के तीन माप शामिल हैं: *'''कुल क्षेत्रफल:''' अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं और समुद्र तट के भीतर भूमि और जल क्षेत्रों का योग। *'''भूमि क्षेत्र:''' जल क्षेत्र को छोड़कर, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और समुद्र तट के भीतर सभी भूमि का योग। *'''जल क्षेत्र:''' अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं और समुद्र तट के भीतर सभी अंतर्देशीय जल निकायों ([[झीलों]], [[जलाशय|जलाशयों]] और [[नदियों]]) के सतह क्षेत्रों का योग। तटीय आंतरिक जल को शामिल किया जा सकता है। जब तक अन्यथा उल्लेख न किया गया हो, प्रादेशिक समुद्र शामिल नहीं हैं। सन्निहित क्षेत्र और [[विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र]] शामिल नहीं हैं। जानकारी संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी प्रभाग से लिया गया है जब तक कि अन्यथा उल्लेख न किया गया हो।<ref>{{Cite web|url=https://www.cia.gov/the-world-factbook/field/area/country-comparison/|title=Area|website=www.cia.gov|access-date=2023-08-04|archive-date=4 फ़रवरी 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210204222711/https://www.cia.gov/the-world-factbook/field/area/country-comparison/|url-status=dead}}</ref> ==मानचित्र== {| style=margin:auto |- style=vertical-align:top |[[File: Countries by area.svg | left | thumb | upright=4.55|मानचित्र में दुनिया के सभी देश]] |} ==देशों की सूची== {| class="sortable wikitable" style="text-align: right" ! क्रम !! क्षेत्र !! कुल (किमी²) !! कुल (वर्ग मील) !! भूमि (किमी²) !! भूमि (वर्ग मील) !! जल (किमी²)!! जल (वर्ग मील) !! % जल !! class="unsortable"| टिप्पणी |- | - || align=center | '''''{{noflag| [[पृथ्वी]] }}''''' || {{convert|510072000|km2|sqmi|disp=table}} ||{{convert|148940000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|361132000|km2|sqmi|disp=table}} || 70.8 || |- | 1 || align=left| {{पताका|रूस}}|| {{convert|17098242|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|16377742|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|720500|km2|sqmi|disp=table}} || 4.21 || align=left | दुनिया का सबसे बड़ा देश है। |- | 2|| align="left" | ''{{पताका|अंटार्कटिका}} '' || {{convert|14000000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|14000000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | {{convert|13720000|km2|sqmi|abbr=on}} का भूमि क्षेत्र बर्फ से आच्छादित है। |- | 2 || align=left| {{पताका|कनाडा}} || {{convert|9985000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9093507|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|891163|km2|sqmi|disp=table}} || 8.93 || align=left | |- | 3 || align=left| {{पताका| अमेरिका }} || {{convert|9,826,675|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9569901|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|27060|km2|sqmi|disp=table}} || 1.41 || align=left | [[महाअमेरिका]] में सबसे बड़ा देश है। |- | 4 || align=left| {{पताका| चीन}} || {{convert|9,596,961|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9161966|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|664709|km2|sqmi|disp=table}} || 2.23|| align=left | [[एशिया]] में सम्पूर्णतः स्थित होने वाला सबसे बड़ा देश है। |- | 5 || align=left| {{पताका|ब्राज़ील}} || {{convert|8,510,346|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8460415|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|55,352|km2|sqmi|disp=table}} || 0.6 || align=left | [[दक्षिण अमेरिका]] और [[दक्षिणी गोलार्ध]] में सबसे बड़ा देश है। |- | 6 || align=left| {{पताका|ऑस्ट्रेलिया }} || {{convert|7741220|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|7682300|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|58920|km2|sqmi|disp=table}} || 0.76 || align=left | [[ओशिआनिया|ओशिनिया]] में सबसे बड़ा देश, एवं सबसे बड़ा सीमाहीन देश है। [[दक्षिणी गोलार्ध]] में सम्पूर्णतः स्थित होने वाला सबसे बड़ा देश है। |- | 7 || align=left| {{पताका|भारत }} || {{convert|3287263|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2973193|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|314070|km2|sqmi|disp=table}} || 9.55 || align=left | |- | 8 || align=left| {{पताका| अर्जेण्टीना }} || {{convert|2780400|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2736690|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|43710|km2|sqmi|disp=table}} || 1.57 || align=left | |- | 9 || align=left| {{पताका| कज़ाख़िस्तान}} || {{convert|2724900|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2699700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|25200|km2|sqmi|disp=table}} || 0.92 || align=left | सबसे बड़ा [[स्थल-रुद्ध देश]]। |- | 10 || align=left| {{पताका| अल्जीरिया }} || {{convert|2381741|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2381741|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[अफ़्रीका|अफ्रीका]] का सबसे बड़ा देश। |- | 11 || align=left| {{पताका| कांगो }} || {{convert|2344858|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2267048|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|77810|km2|sqmi|disp=table}} || 3.32 || align=left | [[उप-सहारा अफ़्रीका]] में सबसे बड़ा देश। |- | 12 || align=left| ''{{पताका| ग्रीनलैंड }} ([[डेनमार्क]])'' || {{convert|2166086|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2166086|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 81.05 || align=left | [[डेनमार्क]] राज्य का हिस्सा। |- | 13 || align=left| {{पताका| सऊदी अरब }} || {{convert|2149690|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2149690|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 14 || align=left| {{पताका| मेक्सिको }} || {{convert|1964375|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1943945|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20430|km2|sqmi|disp=table}} || 1.04 || align=left | |- | 15 || align=left| {{पताका| इंडोनेशिया }} || {{convert|1904569|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1811569|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|93000|km2|sqmi|disp=table}} || 4.88 || align=left | सबसे बड़ा देश जो पूरी तरह से द्वीप पर है। |- | 16 || align=left| {{पताका| सूडान }} || {{convert|1861484|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|1765050}}{{abbr|ला. न.|लागू नहीं}} || {{hs|681490}}NA || {{hs|96434}}{{abbr|ला. न.|लागू नहीं}} || {{hs|37233}}{{abbr|ला. न.|लागू नहीं}} || {{hs|5.18}}{{abbr|ला. न.|लागू नहीं}} || align=left | पहले अफ्रीका का सबसे बड़ा देश हुआ करता था। |- | 17 || align=left| {{पताका| लीबिया }} || {{convert|1759540|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1759540|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 18 || align=left| {{पताका| ईरान }} || {{convert|1648195|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1531595|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|116600|km2|sqmi|disp=table}} || 7.07 || align=left | |- | 19 || align=left| {{पताका| मंगोलिया }} || {{convert|1564116|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1553556|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10560|km2|sqmi|disp=table}} || 0.68 || align=left | |- | 20 || align=left| {{पताका| पेरू }} || {{convert|1285216|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1279996|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|5220|km2|sqmi|disp=table}} || 0.41 || align=left | |- | 21 || align=left| {{पताका| चाड}} || {{convert|1284000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1259200|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|24800|km2|sqmi|disp=table}} || 1.93 || align=left | |- | 22 || align=left| {{पताका| नाइजर }} || {{convert|1267000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1266700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|300|km2|sqmi|disp=table}} || 0.02 || align=left | |- | 23 || align=left| {{पताका| अंगोला }} || {{convert|1246700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1246700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 24 || align=left| {{पताका| माली }} || {{convert|1240192|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1220190|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20002|km2|sqmi|disp=table}} || 1.61 || align=left | |- | 25 || align=left| {{पताका| दक्षिण अफ्रीका }} || {{convert|1219090|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1214470|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4620|km2|sqmi|disp=table}} || 0.38 || align=left | |- | 26 || align=left| {{पताका| कोलम्बिया }} || {{convert|1138910|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1038700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|100210|km2|sqmi|disp=table}} || 8.8 || align=left | |- | 27 || align=left| {{पताका| इथियोपिया }} || {{convert|1104300|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1000000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|104300|km2|sqmi|disp=table}} || 9.44 || align=left | |- | 28 || align=left| {{पताका| बोलीविया }} || {{convert|1098581|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1083301|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|15280|km2|sqmi|disp=table}} || 1.39 || align=left | |- | 29 || align=left| {{पताका| मॉरिटानिया }} || {{convert|1030700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1030700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 30 || align=left| {{पताका| मिस्र }} || {{convert|1001450|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|995450|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6000|km2|sqmi|disp=table}} || 0.6 || align=left | |- | 31 || align=left| {{पताका| तंज़ानिया }} || {{convert|947300|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|885800|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|61500|km2|sqmi|disp=table}} || 6.49 || align=left | |- | 32 || align=left| {{पताका| नाइजीरिया }} || {{convert|923768|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|910768|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13000|km2|sqmi|disp=table}} || 1.41 || align=left | |- | 33 || align=left| {{पताका| वेनेज़ुएला }} || {{convert|912050|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|882050|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|30000|km2|sqmi|disp=table}} || 3.29 || align=left | |- | 34 || align=left| {{पताका| पाकिस्तान }} || {{convert|881913|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|856690|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|25223|km2|sqmi|disp=table}} || 3.17 || align=left | |- | 35 || align=left| {{पताका| नामीबिया }} || {{convert|824292|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|823290|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1002|km2|sqmi|disp=table}} || 0.12 || align=left | |- | 36 || align=left| {{पताका| मोज़ाम्बिक }} || {{convert|799380|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|786380|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13000|km2|sqmi|disp=table}} || 1.63 || align=left | |- | 37 || align=left| {{पताका| तुर्की}} || {{convert|783562|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|769632|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13930|km2|sqmi|disp=table}} || 1.78 || align=left | |- | 38 || align=left| {{पताका| चिली }} || {{convert|756102|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|743812|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|12290|km2|sqmi|disp=table}} || 1.63 || align=left | |- | 39 || align=left| {{पताका| ज़ाम्बिया}} || {{convert|752618|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|743398|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9220|km2|sqmi|disp=table}} || 1.23 || align=left | |- | 40 || align=left| {{पताका| बर्मा }} || {{convert|676578|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|653508|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|23070|km2|sqmi|disp=table}} || 3.41 || align=left | |- | 41 || align=left| {{पताका| अफ़ग़ानिस्तान }} || {{convert|652230|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|652230|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 42 || align=left| {{पताका| दक्षिण सूडान }} || {{convert|644329|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|610950}}NA || {{hs|235889}}NA || {{hs|33379}}NA || {{hs|12888}}NA || |- | 43 || align=left| {{पताका| फ्रांस }} || {{convert|643801|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|640427|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3374|km2|sqmi|disp=table}} || 0.52 || align=left | |- | 44 || align=left| {{पताका| सोमालिया}} || {{convert|637657|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|627337|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10320|km2|sqmi|disp=table}} || 1.62 || align=left | |- | 45 || align=left| {{पताका| मध्य अफ़्रीकी गणराज्य }} || {{convert|622984|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|622984|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 46 || align=left| {{पताका| यूक्रेन }} || {{convert|603550|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|579330|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|24220|km2|sqmi|disp=table}} || 4.01 || align=left | सबसे बड़ा देश जो संपूर्णतः [[यूरोप]] में स्थित है। |- | 47 || align=left| {{पताका| माडागास्कार}} || {{convert|587041|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|581540|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|5501|km2|sqmi|disp=table}} || 0.94 || align=left | |- | 48 || align=left| {{पताका| बोत्सवाना }} || {{convert|581730|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|566730|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|15000|km2|sqmi|disp=table}} || 2.58 || align=left | |- | 49 || align=left| {{पताका| केन्या }} || {{convert|580367|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|569140|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|11227|km2|sqmi|disp=table}} || 1.93 || align=left | |- | 50 || align=left| {{पताका| यमन }} || {{convert|527968|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|527968|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 51 || align=left| {{पताका| थाईलैंड }} || {{convert|513120|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|510890|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2230|km2|sqmi|disp=table}} || 0.43 || align=left | |- | 52 || align=left| {{पताका| स्पेन }} || {{convert|505370|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|498980|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6390|km2|sqmi|disp=table}} || 1.26 || align=left | |- | 53 || align=left| {{पताका| तुर्कमेनिस्तान }} || {{convert|488100|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|469930|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|18170|km2|sqmi|disp=table}} || 3.72 || align=left | |- | 54 || align=left| {{पताका| कैमरून }} || {{convert|475440|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|472710|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2730|km2|sqmi|disp=table}} || 0.57 || align=left | |- | 55 || align=left| {{पताका| पापुआ न्यू गिनी }} || {{convert|462840|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|452860|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9980|km2|sqmi|disp=table}} || 2.16 || align=left | |- | 56 || align=left| {{पताका| स्वीडन }} || {{convert|450295|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|410335|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|39960|km2|sqmi|disp=table}} || 8.87 || align=left | |- | 57 || align=left| {{पताका| उज्बेकिस्तान }} || {{convert|447400|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|425400|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|22000|km2|sqmi|disp=table}} || 4.92 || align=left | |- | 58 || align=left| {{पताका| मोरक्को }} || {{convert|446550|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|446300|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|250|km2|sqmi|disp=table}} || 0.06 || align=left | |- | 59 || align=left| {{पताका| इराक }} || {{convert|438317|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|437367|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|950|km2|sqmi|disp=table}} || 0.22 || align=left | |- | 60 || align=left| {{पताका| पैराग्वे}} || {{convert|406752|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|397302|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9450|km2|sqmi|disp=table}} || 2.32 || align=left | |- | 61 || align=left| {{पताका| ज़िम्बाब्वे }} || {{convert|390757|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|386847|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3910|km2|sqmi|disp=table}} || 1 || align=left | |- | 62 || align=left| {{पताका| जापान }} || {{convert|377915|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|364485|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13430|km2|sqmi|disp=table}} || 3.55 || align=left | |- | 63 || align=left| {{पताका| जर्मनी }} || {{convert|357022|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|348672|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8350|km2|sqmi|disp=table}} || 2.34 || align=left | |- | 64 || align=left| {{पताका| कांगो गणराज्य}} || {{convert|342000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|341500|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|500|km2|sqmi|disp=table}} || 0.15 || align=left | |- | 65 || align=left| {{पताका| फिनलैंड }} || {{convert|338145|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|303815|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|34330|km2|sqmi|disp=table}} || 10.15 || align=left | |- | 66 || align=left| {{पताका| वियतनाम }} || {{convert|331210|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|310070|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|21140|km2|sqmi|disp=table}} || 6.38 || align=left | |- | 67 || align=left| {{पताका| मलेशिया }} || {{convert|330803|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|329613|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1190|km2|sqmi|disp=table}} || 0.36 || align=left | |- | 68 || align=left| {{पताका| नॉर्वे }} || {{convert|323802|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|304282|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|19520|km2|sqmi|disp=table}} || 6.03 || align=left | |- | 69 || align=left| {{पताका| कोत द'ईवोआर}} || {{convert|322463|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|318003|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4460|km2|sqmi|disp=table}} || 1.38 || align=left | |- | 70 || align=left| {{पताका| पोलैंड }} || {{convert|312685|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|304255|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8430|km2|sqmi|disp=table}} || 2.7 || align=left | |- | 71 || align=left| {{पताका| ओमान }} || {{convert|309500|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|309500|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 72 || align=left| {{पताका| इटली }} || {{convert|301340|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|294140|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|7200|km2|sqmi|disp=table}} || 2.39 || align=left | |- | 73 || align=left| {{पताका| फ़िलीपीन्स }} || {{convert|300000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|298170|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1830|km2|sqmi|disp=table}} || 0.61 || align=left | |- | 74 || align=left| {{पताका| बुर्किना फासो }} || {{convert|272967|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|273800|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|400|km2|sqmi|disp=table}} || 0.15 || align=left | |- | 75 || align=left| {{पताका| न्यूजीलैंड}} || {{convert|270467|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|262443|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4395|km2|sqmi|disp=table}} || 1.65 || align=left | |- | 76 || align=left| {{पताका| गैबॉन}} || {{convert|267668|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|257667|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10000|km2|sqmi|disp=table}} || 3.74 || align=left | |- | 77 || align=left| ''{{पताका| पश्चिमी सहारा }}'' || {{convert|266000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|266000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | विवादित क्षेत्र। |- | 78 || align=left| {{पताका| इक्वेडोर }} || {{convert|256369|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|276841|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6720|km2|sqmi|disp=table}} || 2.37 || align=left | |- | 79 || align=left| {{पताका| गिनी }} || {{convert|245857|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|245717|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|140|km2|sqmi|disp=table}} || 0.06 || align=left | |- | 80 || align=left| {{पताका| यूनाइटेड किंगडम }} || {{convert|242900|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|241930|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1680|km2|sqmi|disp=table}} || 0.69 || align=left | |- | 81 || align=left| {{पताका| युगाण्डा }} || {{convert|241550|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|197100|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|43938|km2|sqmi|disp=table}} || 18.23 || align=left | |- | 82 || align=left| {{पताका| घाना }} || {{convert|238533|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|227533|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|11000|km2|sqmi|disp=table}} || 4.61 || align=left | |- | 83 || align=left| {{पताका| रोमानिया }} || {{convert|238391|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|229891|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8500|km2|sqmi|disp=table}} || 3.57 || align=left | |- | 84 || align=left| {{पताका| लाओस }} || {{convert|236800|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|230800|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6000|km2|sqmi|disp=table}} || 2.53 || align=left | |- | 85 || align=left| {{पताका| गुयाना }} || {{convert|214969|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|196849|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|18120|km2|sqmi|disp=table}} || 8.43 || align=left | |- | 86 || align=left| {{पताका| बेलारूस }} || {{convert|207600|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|202900|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4700|km2|sqmi|disp=table}} || 2.26 || align=left | |- | 87 || align=left| {{पताका|किर्गिज़स्तान}} || {{convert|199951|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|191801|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8150|km2|sqmi|disp=table}} || 4.08 || align=left | |- | 88 || align=left| {{पताका| सेनेगल }} || {{convert|196722|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|192530|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4192|km2|sqmi|disp=table}} || 2.13 || align=left | |- | 89 || align=left| {{पताका| सीरिया }} || {{convert|185180|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|183630|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1550|km2|sqmi|disp=table}} || 0.84 || align=left | |- | 90 || align=left| {{पताका| कंबोडिया }} || {{convert|181035|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|176515|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4520|km2|sqmi|disp=table}} || 2.5 || align=left | |- | 91 || align=left| {{पताका| उरुग्वे }} || {{convert|181034|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|175015|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1200|km2|sqmi|disp=table}} || 0.68 || align=left | |- | 92 || align=left| {{पताका| सूरीनाम }} || {{convert|163820|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|156000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|7820|km2|sqmi|disp=table}} || 4.77 || align=left | [[दक्षिण अमेरिका]] का सबसे छोटा देश। |- | 93 || align=left| {{पताका| ट्यूनीशिया }} || {{convert|163610|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|155360|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8250|km2|sqmi|disp=table}} || 5.04 || align=left | |- | 94 || align=left| {{पताका| बांग्लादेश }} || {{convert|147570|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|130168|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13830|km2|sqmi|disp=table}} || 9.6 || align=left | |- | 95 || align=left| {{पताका| नेपाल }} || {{convert|147181|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|143351|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3830|km2|sqmi|disp=table}} || 2.6 || align=left | |- | 96 || align=left| {{पताका| ताजिकिस्तान }} || {{convert|143100|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|141510|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2590|km2|sqmi|disp=table}} || 1.81 || align=left | |- | - || align=left| {{पताका| सोमालीलैंड }} || {{convert|137600|km2|sqmi|disp=table}} || NA || NA || NA ||NA || |- | 97 || align=left| {{पताका| ग्रीस }} || {{convert|131990|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|130647|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1310|km2|sqmi|disp=table}} || 0.99 || align=left | |- | 98 || align=left| {{पताका| निकारागुआ }} || {{convert|130373|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|119990|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10380|km2|sqmi|disp=table}} || 7.96 || align=left | |- | 99 || align=left| {{पताका| उत्तर कोरिया }} || {{convert|120538|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|120408|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|130|km2|sqmi|disp=table}} || 0.11 || align=left | |- | 100 || align=left| {{पताका| मलावी }} || {{convert|118484|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|94080|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|24404|km2|sqmi|disp=table}} || 20.6 || align=left | |- | 101 || align=left| {{पताका| इरीट्रिया }} || {{convert|117600|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|101000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|16600|km2|sqmi|disp=table}} || 14.12 || align=left | |- | 102 || align=left| {{पताका| बेनिन }} || {{convert|112622|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|110622|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2000|km2|sqmi|disp=table}} || 1.78 || align=left | |- | 103 || align=left| {{पताका|हौण्डुरस }} || {{convert|112492|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|111890|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|200|km2|sqmi|disp=table}} || 0.18 || align=left | |- | 104 || align=left| {{पताका| लाइबेरिया }} || {{convert|111369|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|96320|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|15049|km2|sqmi|disp=table}} || 13.51 || align=left | |- | 105 || align=left| {{पताका| बुल्गारिया }} || {{convert|110879|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|108489|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2390|km2|sqmi|disp=table}} || 2.16 || align=left | |- | 106 || align=left| {{पताका| क्यूबा }} || {{convert|109884|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|109820|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 107 || align=left| {{पताका| ग्वाटेमाला }} || {{convert|108889|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|107159|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1730|km2|sqmi|disp=table}} || 1.59 || align=left | |- | 108 || align=left| {{पताका| आइसलैंड }} || {{convert|103000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|100250|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2750|km2|sqmi|disp=table}} || 2.67 || align=left | |- | 109 || align=left| {{पताका| दक्षिण कोरिया }} || {{convert|100210|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|99909|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|301|km2|sqmi|disp=table}} || 0.3|| align=left | |- | 110 || align=left| {{पताका| हंगरी }} || {{convert|93028|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|89608|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3420|km2|sqmi|disp=table}} || 3.68 || align=left | |- | 111 || align=left| {{पताका| पुर्तगाल }} || {{convert|92090|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|91470|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|620|km2|sqmi|disp=table}} || 0.67 || align=left | |- | 112 || align=left| {{पताका| जॉर्डन }} || {{convert|89342|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|88802|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|540|km2|sqmi|disp=table}} || 0.6 || align=left | |- | 113 || align=left| {{पताका| सर्बिया}} || {{convert|88361|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|88246|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|115|km2|sqmi|disp=table}} || 0.13 || align=left | |- | 114 || align=left| {{पताका| अज़रबैजान}} || {{convert|86600|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|82629|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3971|km2|sqmi|disp=table}} || 4.59 || align=left | |- | 115 || align=left| {{पताका| ऑस्ट्रिया}} || {{convert|83871|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|82445|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1426|km2|sqmi|disp=table}} || 1.7 || align=left | |- | 116 || align=left| {{पताका| संयुक्त अरब अमीरात }} || {{convert|83600|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|83600|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 117 || align=left| {{पताका| चेक गणराज्य }} || {{convert|78865|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|77247|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1620|km2|sqmi|disp=table}} || 2.05 || align=left | |- | 118 || align=left| {{पताका| पनामा }} || {{convert|75417|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|74340|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1080|km2|sqmi|disp=table}} || 1.43 || align=left | |- | 119 || align=left| {{पताका| सिएरा लियोन }} || {{convert|71740|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|71620|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|120|km2|sqmi|disp=table}} || 0.17 || align=left | |- | 120|| align=left| {{पताका|आयरलैंड }} || {{convert|70273|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|68883|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1390|km2|sqmi|disp=table}} || 1.98 || align=left | |- | 121 || align=left| {{पताका| जॉर्जिया }} || {{convert|69700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|69700|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 122 || align=left| {{पताका| श्रीलंका }} || {{convert|65610|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|62732|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2878|km2|sqmi|disp=table}} || 4.4 || align=left | |- | 123 || align=left| {{पताका|लिथुआनिया }} || {{convert|65300|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|62680|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2620|km2|sqmi|disp=table}} || 4.01 || align=left | |- | 124 || align=left| {{पताका| लातविया}} || {{convert|64559|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|62249|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2340|km2|sqmi|disp=table}} || 3.62 || align=left | |- | 125 || align=left| ''{{पताका| स्वालबार्ड }}'' || {{convert|62045|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|62045|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 126 || align=left| {{पताका| टोगो }} || {{convert|56785|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|54385|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2400|km2|sqmi|disp=table}} || 4.23 || align=left | |- | 127 || align=left| {{पताका| क्रोएशिया }} || {{convert|56594|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|55974|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|620|km2|sqmi|disp=table}} || 1.1 || align=left | |- | 125 || align=left| {{पताका| बॉस्निया और हर्ज़ेगोविना }} || {{convert|51197|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|51187|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 0.02 || align=left | |- | 126 || align=left| {{पताका| कोस्टा रिका }} || {{convert|51100|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|51060|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|40|km2|sqmi|disp=table}} || 0.08 || align=left | |- | 127 || align=left| {{पताका| स्लोवाकिया }} || {{convert|49035|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|48105|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|930|km2|sqmi|disp=table}} || 1.9 || align=left | |- | 128 || align=left| {{पताका|डॉमिनिक गणराज्य}} || {{convert|48670|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|48320|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|350|km2|sqmi|disp=table}} || 0.72 || align=left | |- | 129 || align=left| {{पताका| एस्तोनिया }} || {{convert|45228|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|42388|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2840|km2|sqmi|disp=table}} || 6.28 || align=left | |- | 130 || align=left| {{पताका| डेनमार्क }} || {{convert|43094|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|42434|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|660|km2|sqmi|disp=table}} || 1.53 || align=left | |- | 131 || align=left| {{पताका| नीदरलैंड }} || {{convert|41543|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|33893|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|7650|km2|sqmi|disp=table}} || 18.41 || align=left | |- | 132 || align=left| {{पताका| स्विट्ज़रलैण्ड }} || {{convert|41277|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|39997|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1280|km2|sqmi|disp=table}} || 3.1 || align=left | |- | 133 || align=left| {{पताका| भूटान }} || {{convert|38394|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|38394|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 134 || align=left| {{पताका| गिनी-बिसाऊ }} || {{convert|36125|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|28120|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8005|km2|sqmi|disp=table}} || 22.16 || align=left | |- | 135 || align=left| {{पताका| चीनी गणराज्य | name= चीनी गणराज्य (ताएवान) }} || {{convert|35980|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|32260|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3720|km2|sqmi|disp=table}} || 10.34 || align=left | |- | 136 || align=left| {{पताका| मॉल्डोवा}} || {{convert|33851|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|32891|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|960|km2|sqmi|disp=table}} || 2.84 || align=left | |- | 137 || align=left| {{पताका| बेल्जियम }} || {{convert|30528|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|30278|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|250|km2|sqmi|disp=table}} || 0.82 || align=left | |- | 138 || align=left| {{पताका|लेसोथो }} || {{convert|30355|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|30355|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 139 || align=left| {{पताका| आर्मीनिया}} || {{convert|29743|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|28203|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1540|km2|sqmi|disp=table}} || 5.18 || align=left | |- | 140 || align=left| {{पताका| सोलोमन आइलैंड्स }} || {{convert|28896|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|27986|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|910|km2|sqmi|disp=table}} || 3.15 || align=left | |- | 141 || align=left| {{पताका|अल्बानिया }} || {{convert|28748|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|27398|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1350|km2|sqmi|disp=table}} || 4.7 || align=left | |- | 142 || align=left| {{पताका| इक्वेटोरियल गिनी }} || {{convert|28051|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|28051|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 143 || align=left| {{पताका| बुरुण्डी }} || {{convert|27830|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|25680|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2150|km2|sqmi|disp=table}} || 7.73 || align=left | |- | 144 || align=left| {{पताका| हैती }} || {{convert|27750|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|27560|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|190|km2|sqmi|disp=table}} || 0.68 || align=left | |- | 145 || align=left| {{पताका| रवांडा}} || {{convert|26338|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|24668|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1670|km2|sqmi|disp=table}} || 6.34 || align=left | |- | 146 || align=left| {{पताका| मैसेडोनिया }} || {{convert|25713|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|25433|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|280|km2|sqmi|disp=table}} || 1.09 || align=left | |- | 147 || align=left| {{पताका| जिबूती }} || {{convert|23200|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|23180|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20|km2|sqmi|disp=table}} || 0.09 || align=left | |- | 148 || align=left| {{पताका| बेलीज़ }} || {{convert|22966|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|22806|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|160|km2|sqmi|disp=table}} || 0.7 || align=left | |- | 149 || align=left| {{पताका| अल साल्वाडोर }} || {{convert|21041|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20721|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|320|km2|sqmi|disp=table}} || 1.52 || align=left | |- | 150 || align=left| {{पताका| इज़राइल }} || {{convert|20770|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20330|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|440|km2|sqmi|disp=table}} || 2.12 || align=left | |- | 151 || align=left| {{पताका| स्लोवेनिया }} || {{convert|20273|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|20151|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|122|km2|sqmi|disp=table}} || 0.6 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| न्यू कैलेडोनिया }}'' || {{convert|18575|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|18275|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|300|km2|sqmi|disp=table}} || 1.62 || align=left | |- | 152 || align=left| {{पताका| फ़िजी}} || {{convert|18274|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|18274|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 153 || align=left| {{पताका| कुवैत }} || {{convert|17818|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|17818|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 154 || align=left| {{पताका| स्वाज़ीलैंड }} || {{convert|17364|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|17204|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|160|km2|sqmi|disp=table}} || 0.92 || align=left | |- | 155 || align=left| {{पताका| पूर्वी तिमोर }} || {{convert|14874|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|14874|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 156 || align=left| {{पताका| बहामास }} || {{convert|13880|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10010|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3870|km2|sqmi|disp=table}} || 27.88 || align=left | |- | 157 || align=left| {{पताका| मॉन्टेनीग्रो}} || {{convert|13812|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|13452|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|360|km2|sqmi|disp=table}} || 2.61 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| प्युर्तो रिको }}'' || {{convert|13790|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|8870|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4921|km2|sqmi|disp=table}} || 35.69 || align=left | |- | 158 || align=left| {{पताका| वानूआटू }} || {{convert|12189|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|12189|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| फ़ाकलैण्ड द्वीपसमूह }}'' || {{convert|12173|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|12173|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 159 || align=left| {{पताका| मार्शल द्वीप }} || {{convert|11854|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|181|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|11673|km2|sqmi|disp=table}} || 98.47 || align=left | |- | 160 || align=left| {{पताका| कतर }} || {{convert|11586|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|11586|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 161 || align=left| {{पताका| गाम्बिया }} || {{convert|11295|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10000|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1295|km2|sqmi|disp=table}} || 11.47 || align=left | Smallest country in continental [[Africa]]. |- | 162 || align=left| {{पताका| जमैका }} || {{convert|10991|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10831|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|160|km2|sqmi|disp=table}} || 1.46 || align=left | |- | 163 || align=left| {{पताका| कोसोवो }} || {{convert|10887|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10887|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 164 || align=left| {{पताका| लेबनान }} || {{convert|10400|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10230|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|170|km2|sqmi|disp=table}} || 1.63 || align=left | Smallest country in continental [[एशिया|Asia]]. |- | 165 || align=left| {{पताका| सायप्रस }} || {{convert|9251|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|9241|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 0.11 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| फ्रांस के दक्षिणी और अंटार्कटिक लैंड्स }}'' || {{convert|7747.4|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|7667.6|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|79.8|km2|sqmi|disp=table}} || 1.03 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| संयुक्त राज्य अमेरिका प्रशांत द्वीप वन्यजीव शरणार्थी }}'' || {{convert|6959.41|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|22.41|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6937|km2|sqmi|disp=table}} || 99.68 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| वेस्ट बैंक }}'' || {{convert|5860|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|5640|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|220|km2|sqmi|disp=table}} || 3.75 || align=left | |- | 166 || align=left| {{पताका| ब्रूनेई }} || {{convert|5765|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|5265|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|500|km2|sqmi|disp=table}} || 8.67 || align=left | |- | 167 || align=left| {{पताका| त्रिनिदाद एवं टोबेगो }} || {{convert|5128|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|5128|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| फ़्रेंच पोलिनेशिया}}'' || {{convert|4167|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3827|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|340|km2|sqmi|disp=table}} || 8.16 || align=left | French [[overseas collectivity]]. |- | 168 || align=left| {{पताका| केप वर्ड }} || {{convert|4033|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|4033|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| दक्षिण जॉर्जिया और दक्षिण सैण्डविच द्वीपसमूह }}'' || {{convert|3903|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|3903|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 169 || align=left| {{पताका| सामोआ}} || {{convert|2831|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2821|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 0.35 || align=left | |- | 170 || align=left| {{पताका| लक्ज़मबर्ग }} || {{convert|2586|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2586|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 171 || align=left| {{पताका| मॉरिशस }} || {{convert|2040|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2030|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 0.49 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| संयुक्त राज्य अमेरिका वर्जिन द्वीप समूह}}'' || {{convert|1910|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|346|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1564|km2|sqmi|disp=table}} || 81.88 || align=left | |- | 172 || align=left| {{पताका| कोमोरोज}} || {{convert|1862|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1862|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| फ़ैरो आइलैंड्स }}'' || {{convert|1393|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1393|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|0.1}}0 || {{hs|0.01}}0 || {{hs|0.001}}0.00 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| हाँग काँग }}'' || {{convert|1104|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|1054|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|50|km2|sqmi|disp=table}} || 4.53 || align=left | |- | 173 || align=left| {{पताका| साओ तोमे और प्रिन्सिपी}} || {{convert|964|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|964|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 174 || align=left| {{पताका| किरिबाती}} || {{convert|811|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|811|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 175 || align=left| {{पताका| बहरीन }} || {{convert|760|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|760|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 176 || align=left| {{पताका| डोमिनिका }} || {{convert|751|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|751|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 177 || align=left| {{पताका| टोंगा }} || {{convert|747|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|717|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|30|km2|sqmi|disp=table}} || 4.02 || align=left | |- | 178 || align=left| {{पताका| माइक्रोनेशिया }} || {{convert|702|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|702|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|0.1}}0 || {{hs|0.01}}0 || {{hs|0.001}}0.00 || align=left | |- | 179 || align=left| {{पताका| सिंगापुर }} || {{convert|697|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|687|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 1.43 || align=left | |- | 180 || align=left| {{पताका| सेंट लूसिया}} || {{convert|616|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|606|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|10|km2|sqmi|disp=table}} || 1.62 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| आइल ऑफ मैन }}'' || {{convert|572|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|572|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | ब्रिटिश [[क्राउन निर्भरता]]. |- | || align=left| ''{{पताका| गुआम }}'' || {{convert|544|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|544|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 181 || align=left| {{पताका| अंडोरा}} || {{convert|468|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|468|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| उत्तरी मैरियाना द्वीपसमूह }}'' || {{convert|464|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|464|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 182 || align=left| {{पताका| पलाउ}} || {{convert|459|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|459|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 183 || align=left| {{पताका| सेशेल्स }} || {{convert|455|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|455|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | Smallest country in [[Africa]]. |- | || align=left| ''{{पताका| कुराकाओ }}'' || {{convert|444|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|444|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | Country of the [[Kingdom of the Netherlands]]. |- | 184 || align=left| {{पताका| अण्टीगुआ और बारबूडा }} || {{convert|442.6|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|442.6|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 185 || align=left| {{पताका| बारबाडोस }} || {{convert|431|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|431|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| तुर्क और केकोस द्वीपसमूह }}'' || {{convert|430|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|430|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| हर्ड आइलैंड और मैकडोनाल्ड आइलैंड्स }}'' || {{convert|412|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|412|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 186 || align=left| {{पताका| सन्त विन्सेण्ट और ग्रेनाडाइन्स}} || {{convert|389|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|389|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| जन मायेन }}'' || {{convert|377|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|377|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| गाजा पट्टी }}'' || {{convert|360|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|360|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 187 || align=left| {{पताका| ग्रेनेडा }} || {{convert|344|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|344|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 188 || align=left| {{पताका| माल्टा }} || {{convert|316|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|316|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| सन्त हेलेना | सेंट हेलेना, उदगम और त्रिस्तान दा कुन्हा }}'' || {{convert|308|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|308|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 189 || align=left| {{पताका| मालदीव }} || {{convert|298|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|298|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | Smallest country in [[एशिया|Asia]]. |- | || align=left| ''{{पताका| केमन द्वीपसमूह }}'' || {{convert|264|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|264|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 190 || align=left| {{पताका| सन्त किट्स और नेविस }} || {{convert|261|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|261|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| नीयुए }}'' || {{convert|260|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|260|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका|अक्रोत्तिरी और धेकेलिया}}'' || {{convert|253.8|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|253.8}}NA || {{hs|97.99}}NA || {{hs|0.1}}NA || {{hs|0.01}}NA || {{hs|0.001}}NA || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| सन्त पियर और मिकलान }}'' || {{convert|242|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|242|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| कुक द्वीपसमूह }}'' || {{convert|236|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|236|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| अमेरिकन समोआ }}'' || {{convert|199|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|199|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| अरूबा }}'' || {{convert|180|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|180|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 191 || align=left| {{पताका| लिक्टेन्स्टाइन }} || {{convert|160|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|160|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स }}'' || {{convert|151|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|151|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[British Overseas Territory]] |- | || align=left| ''{{पताका| वालिस और फ्यूचूना }}'' || {{convert|142|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|142|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | French [[overseas collectivity]]. |- | || align=left| ''{{पताका| क्रिसमस द्वीप}}'' || {{convert|135|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|135|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| जर्सी }}'' || {{convert|116|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|116|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | British [[Crown dependency]]. |- | || align=left| ''{{पताका| मॉन्स्टेरॉट}}'' || {{convert|102|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|102|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[British Overseas Territories|British Overseas Territory]]. |- | || align=left| ''{{पताका| ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र}}'' || {{convert|54400|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|60|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|54340|km2|sqmi|disp=table}} || 99.89 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| अंगुइला }}'' || {{convert|91|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|91|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[British Overseas Territories|British Overseas Territory]]. |- | || align=left| ''{{पताका| गर्नजी}}'' || {{convert|78|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|78|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | British [[Crown dependency]]. |- | 192 || align=left| {{पताका| सान मारिनो }} || {{convert|61|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|61|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| सन्त मार्टिन }}'' || {{convert|54.4|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|54.4|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|0.1}}''Negligible'' || {{hs|0.01}}''Negligible'' || {{hs|0.001}}0.00 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| बरमूडा }}'' || {{convert|54|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|54|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[British Overseas Territory]]. |- | || align=left| ''{{पताका| बुवेत आइलैंड}}'' || {{convert|49|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|49|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| पिटकेर्न द्वीपसमूह }}'' || {{convert|47|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|47|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| नॉरफ़ॉक आइलैंड}}'' || {{convert|36|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|36|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | Self-governing territory of Australia. |- | || align=left| ''{{पताका| सिण्ट मार्टेन }}'' || {{convert|34|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|34|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | Country of the [[Kingdom of the Netherlands]]. |- | || align=left| ''{{पताका| मकाउ}}'' || {{convert|28.2|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|28.2|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 193 || align=left| {{पताका| टुवालु }} || {{convert|26|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|26|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 194 || align=left| {{पताका| नाउरु }} || {{convert|21|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|21|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| सन्त बार्थेलेमी }}'' || {{convert|21|km2|sqmi|disp=table}} || {{hs|21}}NA || {{hs|8.1}}NA || {{hs|0.1}}NA || {{hs|0.01}}NA || {{hs|0.001}}NA || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| कोकोज (कीलिंग) द्वीप समूह }}'' || {{convert|14|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|14|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| टोकेलाउ}}'' || {{convert|12|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|12|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{noflag| [[पार्सेल आइलैंड्स]] }}'' || {{hs|7.75}}ca. 7.75 || {{hs|2.99}}ca. 2.99 || {{hs|7.75}}ca. 7.75 || {{hs|2.99}}ca. 2.99 || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| जिब्राल्टर }}'' || {{convert|6.5|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6.5|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | [[British Overseas Territory]]. |- | || align=left| ''{{पताका| वेक द्वीप}}'' || {{convert|6.5|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|6.5|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{noflag| [[स्प्रैटली आइलैंड्स]] }}'' || {{hs|4.9}}<5 || {{hs|1.8}}<2 || {{hs|4.9}}<5 || {{hs|1.8}}<2 || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | || align=left| ''{{पताका| कोरल सागर द्वीप }}'' || {{hs|2.9}}<3 || {{hs|1}}<2 || {{hs|2.9}}<3 || {{hs|1}}<2 || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 195 || align=left| {{पताका| मोनाको }} || {{convert|2|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|2|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |- | 196 || align=left| {{पताका| वैटिकन नगर }} || {{convert|0.44|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0.44|km2|sqmi|disp=table}} || {{convert|0|km2|sqmi|disp=table}} || 0 || align=left | |} == सन्दर्भ == {{सन्दर्भ}} [[श्रेणी:भूगोल-सम्बंधित सूचियाँ]] [[श्रेणी:प्रादेशिक भूगोल]] [[श्रेणी:अधूरी सूचियाँ]] r8higvxz6p229opoihkjbdj3rhq1sov विज्ञान 0 5583 6543788 6530218 2026-04-25T08:22:29Z ~2026-21496-92 919279 आधुनिक विज्ञान --> विज्ञान 6543788 wikitext text/x-wiki {{विज्ञान}} '''विज्ञान''' अथवा '''साइंस''' (science) सृष्टि के बारे में परीक्षण योग्य [[परिकल्पना|परिकल्पनाओं]] और [[प्रागुक्ति|पूर्वानुमानों]] को उत्पादित करने वाले ज्ञान को क्रमबद्ध रखने वाला विषय है।<ref name="EOWilson1999a2">{{Cite book|url=https://archive.org/details/consilienceunity00wils_135|title=Consilience: The Unity of Knowledge|last=विल्सन|first=एडवर्ड ओ॰|publisher=विंटेज|year=1999|isbn=978-0-679-76867-8|edition=पुनः मुद्रित|location=न्यूयॉर्क|pages=[https://archive.org/details/consilienceunity00wils_135/page/n55 49]–71|language=en|trans-title=अंतःकरण: ज्ञान की अन्विति|chapter=The natural sciences|trans-chapter=प्राकृतिक विज्ञान|url-access=limited}}</ref><ref name="Heilbron">{{cite book|title=The Oxford Companion to the History of Modern Science|last=हेइलब्रॉन|first=जे॰एल॰|publisher=ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस|year=2003|isbn=978-0-19-511229-0|location=न्यूयॉर्क|pages=vii–x|language=en|trans-title=आधुनिक विज्ञान के इतिहास का ऑक्सफोर्ड कम्पेनियन (साथी)|chapter=Preface|trans-chapter=भूमिका|quote=...modern science is a discovery as well as an invention. It was a discovery that nature generally acts regularly enough to be described by laws and even by mathematics; and required invention to devise the techniques, abstractions, apparatus, and organization for exhibiting the regularities and securing their law-like descriptions.|display-authors=etal|author-link=जॉन हेइलब्रॉन}}</ref> आधुनिक विज्ञान को सामान्यतः २ या ३ बड़ी शाखाओं में विभाजित किया जाता हैः [[ब्रह्माण्ड|भौतिक जगत्]] का अध्ययन करने वाला [[प्राकृतिक विज्ञान]] (उदाहरणः [[भौतिक शास्त्र]], [[रसायन विज्ञान|रसायन शास्त्र]] एवं [[जीव विज्ञान]]) और व्यष्टिगत व सामाजिक अध्ययन करने वाला [[व्यवहारपरक विज्ञान]] (उदाहरणः [[अर्थशास्त्र]], [[मनोविज्ञान]] एवं [[समाजशास्त्र]])।<ref name="colanderhunt2019">{{cite book |last1=Colander |first1=David C. |title=Social Science: An Introduction to the Study of Society |last2=Hunt |first2=Elgin F. |date=2019 |publisher=Routledge |edition=17th |location=New York, NY |pages=1–22 |chapter=Social science and its methods}}</ref><ref name="nisbetgreenfeld2021">{{cite encyclopedia |title=Social Science |encyclopedia=Encyclopedia Britannica |publisher=Encyclopædia Britannica, Inc. |url=https://www.britannica.com/topic/social-science |access-date=9 मई 2021 |date=16 अक्टूबर 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220202193947/https://www.britannica.com/topic/social-science |archive-date=2 फ़रवरी 2022 |last2=Greenfeld |first2=Liah |last1=Nisbet |first1=Robert A. |url-status=live}}</ref> कुछ [[अभिगृहीत|अभिगृहीतों]] और नियमावली से नियंत्रित [[औपचारिक तंत्र|औपचारिक तंत्रों]] का अध्ययन [[रूपबद्ध विज्ञान|आकारिक विज्ञान]] (उदाहरणः [[तर्कशास्त्र]], गणित एवं [[सैद्धान्तिक कंप्यूटर विज्ञान]])<ref name="löwe2002">{{cite journal |last=Löwe |first=Benedikt |author-link=Benedikt Löwe |year=2002 |title=The formal sciences: their scope, their foundations, and their unity |journal=Synthese |volume=133 |issue=1/2 |pages=5–11 |doi=10.1023/A:1020887832028 |issn=0039-7857 |s2cid=9272212}}</ref><ref name="rucker2019">{{cite book |last=Rucker |first=Rudy |author-link=Rudy Rucker |url=http://www.rudyrucker.com/infinityandthemind/#calibre_link-328 |title=Infinity and the Mind: The Science and Philosophy of the Infinite |publisher=Princeton University Press |year=2019 |isbn=978-0-691-19138-6 |edition=Reprint |location=Princeton, New Jersey |pages=157–188 |chapter=Robots and souls |access-date=11 मई 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210226212447/http://www.rudyrucker.com/infinityandthemind/#calibre_link-328 |archive-date=26 फ़रवरी 2021 |url-status=live}}</ref> को भी कई बार आधुनिक विज्ञान में गिना जाता है। हालांकि इन्हें प्रायः अलग क्षेत्र के रूप में वर्णित किया जाता है क्योंकि इन में विज्ञान की मुख्य विधियों [[अनुभवजन्य साक्ष्य|आनुभविक साक्ष्य]] व [[वैज्ञानिक विधि|वैज्ञानिक विधियों]] के स्थान पर [[निगमनात्मक तर्क]] का उपयोग किया जाता है।<ref name="Fetzer2013">{{cite book |last1=Fetzer |first1=James H. |title=Computers and Cognition: Why Minds are not Machines |publisher=Kluwer Academic Publishers |year=2013 |isbn=978-1-4438-1946-6 |location=Newcastle, United Kingdom |pages=271–308 |chapter=Computer reliability and public policy: Limits of knowledge of computer-based systems}}</ref><ref name="nickles2013">{{cite book |last1=Nickles |first1=Thomas |title=Philosophy of Pseudoscience: Reconsidering the Demarcation Problem |publisher=The University of Chicago Press |year=2013 |location=Chicago |page=104 |chapter=The Problem of Demarcation}}</ref> [[अभियान्त्रिकी]] और [[आयुर्विज्ञान]] जैसे [[अनुप्रयुक्त विज्ञान]] के क्षेत्र में वैज्ञानिक ज्ञान को प्रायोगिक उद्देश्यों के लिए काम में लिया जाता है।<ref name="fischer20142">{{Cite journal |last1=Fischer |first1=M.R. |last2=Fabry |first2=G |year=2014 |title=Thinking and acting scientifically: Indispensable basis of medical education |journal=GMS Zeitschrift für Medizinische Ausbildung |volume=31 |issue=2 |pages=Doc24 |doi=10.3205/zma000916 |pmc=4027809 |pmid=24872859}}</ref><ref name="sinclair19932">{{Cite journal |last=Sinclair |first=Marius |year=1993 |title=On the Differences between the Engineering and Scientific Methods |url=https://www.ijee.ie/contents/c090593.html |url-status=live |journal=The International Journal of Engineering Education |archive-url=https://web.archive.org/web/20171115220102/https://www.ijee.ie/contents/c090593.html |archive-date=15 नवम्बर 2017 |access-date=7 सितम्बर 2018}}</ref><ref name="mbunge1966">{{Cite book |last=Bunge |first=M |title=Contributions to a Philosophy of Technology |publisher=Springer |year=1966 |isbn=978-94-010-2184-5 |editor-last=Rapp |editor-first=F. |location=Dordrecht, Netherlands |pages=19–39 |chapter=Technology as Applied Science |doi=10.1007/978-94-010-2182-1_2 |s2cid=110332727}}</ref> [[विज्ञान का इतिहास]] ऐतिहासिक रूप से बहुत लम्बा है। इस की शुरुआत बहुत पुराने भारतीय सभ्यता से हुई। पहचान योग्य (अभिज्ञेय) लिखित अभिलेखों से लेकर [[कांस्य युग]] कालनिर्धारण तक एवं ३००० से १२०० [[आम युग|ईसा पूर्व]] के लगभग के [[प्राचीन मिस्र]] और [[मेसोपोटामिया]] शामिल हैं। उन के गणित, [[खगोल शास्त्र]] और आयुर्विज्ञान के क्षेत्रों में योगदानों ने [[शास्त्रीय प्राचीनकाल|श्रेण्य पुरावशेष]] के यूनानी [[प्राकृतिक दर्शनशास्त्र]] ने आकार देने का काम किया। इसी क्रम में [[ब्रह्माण्ड|प्राकृतिक]] घटनाओं की व्याख्या उपलब्ध करने के रूपात्मक (औपचारिक) प्रयास आरम्भ हुये। वस्तुतः विज्ञान का उन्नत विकास [[भारत के स्वर्णयुग]] के दौरान [[भारतीय अंक प्रणाली]], भारतीय गणित, भारतीय चिकित्सा के रूप में हुआ।<ref name="Lindberg2007a">{{Cite book |last=Lindberg |first=David C. |title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context |url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5 |publisher=University of Chicago Press |year=2007 |isbn=978-0226482057 |edition=2nd}}</ref>{{rp|p=12}}<ref name="Grant2007a">{{cite book |last=Grant |first=Edward |title=A History of Natural Philosophy: From the Ancient World to the Nineteenth Century |publisher=Cambridge University Press |year=2007 |isbn=978-0-521-68957-1 |location=New York |pages=1–26 |chapter=Ancient Egypt to Plato |chapter-url=https://archive.org/details/historynaturalph00gran/page/n16 |chapter-url-access=limited}}</ref><ref>[https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ Building Bridges Among the BRICs] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230418081025/https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ |date=18 अप्रैल 2023 }}, p. 125, Robert Crane, Springer, 2014</ref><ref name="Keay">{{Cite book |last=Keay |first=John |url=https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132 |title=India: A history |publisher=Atlantic Monthly Press |year=2000 |isbn=978-0-87113-800-2 |page=[https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132 132] |quote=The great era of all that is deemed classical in Indian literature, art and science was now dawning. It was this crescendo of creativity and scholarship, as much as ... political achievements of the Guptas, which would make their age so golden. |author-link=John Keay}}</ref> मध्य युग के पूर्वार्द्ध (४०० से १००० ई॰) के दौरान पश्चिम रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात वहां वैज्ञानिक शोध की अवनति आरम्भ हो गयी। लेकिन मध्यकालीन पुनर्जागरण (कैरोलिंगियन पुनर्जागरण, ओट्टोनियन पुनर्जागरण और १२वीं सदी का पुनर्जागरण) के दौरान इस में पुनः विकास आरम्भ हो गया। कुछ यूनानी पांडुलिपियाँ पश्चिम में खो गयीं जिन्हें [[इस्लामी स्वर्ण युग]] के दौरान मध्य युग में सरंक्षण और विस्तार मिला।<ref name="Lindberg8">{{cite book |last=Lindberg |first=David C. |title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context |url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5 |publisher=University of Chicago Press |year=2007 |isbn=978-0-226-48205-7 |edition=2nd |location=Chicago |pages=[https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5/page/162 163]–92 |chapter=Islamic science}}</ref> बीजान्टिन यूनानी विद्वानों के प्रयासों से यूनानी पांडुलिपियों को पतन की ओर अग्रसर [[बाइज़ेंटाइन साम्राज्य|बीजान्टिन साम्राज्य]] से पश्चिमी यूरोप में लेकर जाने में सफलता प्राप्त की। पश्चिमी यूरोप में १०वीं से १३वीं सदी तक यूनानी कार्य और इस्लामी अन्वेषणों की पुनर्प्राप्ति व आत्मसात करके "[[प्राकृतिक दर्शनशास्त्र]]" को पुनर्जीवित किया।<ref name="Lindberg9">{{cite book |last=Lindberg |first=David C. |title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context |url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5 |publisher=University of Chicago Press |year=2007 |isbn=978-0-226-48205-7 |edition=2nd |location=Chicago |pages=[https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5/page/192 193]–224 |chapter=The revival of learning in the West}}</ref><ref name="Lindberg10">{{cite book |last=Lindberg |first=David C. |title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context |url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5 |publisher=University of Chicago Press |year=2007 |isbn=978-0-226-48205-7 |edition=2nd |location=Chicago |pages=[https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5/page/224 225]–53 |chapter=The recovery and assimilation of Greek and Islamic science}}</ref><ref>Sease, Virginia; Schmidt-Brabant, Manfrid. Thinkers, Saints, Heretics: Spiritual Paths of the Middle Ages. 2007. [https://books.google.com/books?id=8Lkzp-StZGUC&dq=%22Everything+we+would+today+call+science+came+through+Islam%22&pg=PA80 Pages 80–81]. अभिगमन तिथि 26 अक्टूबर 2024</ref> इस से १६वीं सदी के आरम्भ में आधुनिक [[वैज्ञानिक क्रांति]] आ गई<ref name="Principe2011">{{cite book |last=Principe |first=Lawrence M. |title=Scientific Revolution: A Very Short Introduction |publisher=Oxford University Press |year=2011 |isbn=978-0-19-956741-6 |edition= |location=New York |pages=1–3 |chapter=Introduction}}</ref> और पुराने अवधारणाओं और परम्पराओं से नये विचार और आविष्कार सामने आये।<ref name="Lindberg14">{{cite book |last=Lindberg |first=David C. |title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context |url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5 |publisher=University of Chicago Press |year=2007 |isbn=978-0-226-48205-7 |edition=2nd |location=Chicago |pages=[https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5/page/356 357]–368 |chapter=The legacy of ancient and medieval science}}</ref><ref name="Grant2007c">{{cite book |last=Grant |first=Edward |url=https://archive.org/details/historynaturalph00gran |title=A History of Natural Philosophy: From the Ancient World to the Nineteenth Century |publisher=Cambridge University Press |year=2007 |isbn=978-0-521-68957-1 |edition=|location=New York |pages=[https://archive.org/details/historynaturalph00gran/page/n289 274]–322 |chapter=Transformation of medieval natural philosophy from the early period modern period to the end of the nineteenth century |url-access=limited}}</ref> ज्ञान को और विकसित करने के लिए शीघ्र ही [[वैज्ञानिक विधि|वैज्ञानिक विधियों]] का विकास हुआ तथा १९वीं सदी के अंत से पहले ही विभिन्न विज्ञान के संस्थागत व व्यावसायिक रूप में सामने आने लग गया।<ref name="Cahan Natural Philosophy">{{cite book |title=From Natural Philosophy to the Sciences: Writing the History of Nineteenth-Century Science |date=2003 |publisher=University of Chicago Press |isbn=978-0-226-08928-7 |editor1-last=Cahan |editor1-first=David |location=Chicago}}</ref><ref name="Lightman 19th2">{{cite book |last1=Lightman |first1=Bernard |title=Wrestling with Nature: From Omens to Science |date=2011 |publisher=University of Chicago Press |isbn=978-0-226-31783-0 |editor1-last=Shank |editor1-first=Michael |location=Chicago |page=367 |chapter=13. Science and the Public |editor2-last=Numbers |editor2-first=Ronald |editor3-last=Harrison |editor3-first=Peter}}</ref> इस के साथ ही "प्राकृतिक दर्शनशास्त्र" ने "प्राकृतिक विज्ञान" का रूप लेना आरम्भ कर दिया।<ref>{{cite book |last1=Harrison |first1=Peter |title=The Territories of Science and Religion |date=2015 |publisher=University of Chicago Press |isbn=978-0-226-18451-7 |location=Chicago |pages=164–165 |quote=The changing character of those engaged in scientific endeavors was matched by a new nomenclature for their endeavors. The most conspicuous marker of this change was the replacement of "natural philosophy" by "natural science". In 1800 few had spoken of the "natural sciences" but by 1880 this expression had overtaken the traditional label "natural philosophy". The persistence of "natural philosophy" in the twentieth century is owing largely to historical references to a past practice (see figure 11). As should now be apparent, this was not simply the substitution of one term by another, but involved the jettisoning of a range of personal qualities relating to the conduct of philosophy and the living of the philosophical life. |author-link1=Peter Harrison (historian)}}</ref> विज्ञान के क्षेत्र में नये ज्ञान का विकास वैज्ञानिकों के उन्नत शोधों से आगे बढ़ा। वैज्ञानिकों के समस्याओं को हल करने के इच्छा और उन की जिज्ञासा से प्रेरित होना इस में बहुत सहायक रहा।<ref name="macritchie2011">{{cite book |last=MacRitchie |first=Finlay |url=https://www.routledge.com/Scientific-Research-as-a-Career/MacRitchie/p/book/9781439869659 |title=Scientific Research as a Career |publisher=Routledge |year=2011 |isbn=978-1-4398-6965-9 |location=New York |pages=1–6 |chapter=Introduction |access-date=5 मई 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210505074020/https://www.routledge.com/Scientific-Research-as-a-Career/MacRitchie/p/book/9781439869659 |archive-date=5 मई 2021 |url-status=live}}</ref><ref name="marder2011">{{cite book |last=Marder |first=Michael P. |url=https://www.cambridge.org/core/books/research-methods-for-science/1C04E5D747781B68C52A79EE86BF584B |title=Research Methods for Science |publisher=Cambridge University Press |year=2011 |isbn=978-0-521-14584-8 |location=New York |pages=1–17 |chapter=Curiosity and research |access-date=5 मई 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210505001547/https://www.cambridge.org/core/books/research-methods-for-science/1C04E5D747781B68C52A79EE86BF584B |archive-date=5 मई 2021 |url-status=live}}</ref> समकालीन वैज्ञानिक अनुसंधान व्यापक रूप से सहयोगात्मक है और सरकारी अभिकरणों,<ref name="lindberg2007h">{{cite book|title=The beginnings of Western science: the European Scientific tradition in philosophical, religious, and institutional context|url=https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5|last=Lindberg|first=David C.|publisher=University of Chicago Press|year=2007|isbn=978-0-226-48205-7|edition=2nd|location=Chicago|pages=[https://archive.org/details/beginningsofwest0000lind_d9a5/page/162 163]–192|chapter=Islamic science}}</ref> कंपनियों,<ref name="gertner2013">{{cite book|url=https://www.routledge.com/Commercialization-Secrets-for-Scientists-and-Engineers/Szycher/p/book/9781498730600|title=Commercialization Secrets for Scientists and Engineers|last=Szycher|first=Michael|publisher=Routledge|year=2016|isbn=978-1-138-40741-1|location=New York|pages=159–176|chapter=Establishing your dream team|access-date=5 मई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210818032914/https://www.routledge.com/Commercialization-Secrets-for-Scientists-and-Engineers/Szycher/p/book/9781498730600|archive-date=18 अगस्त 2021|url-status=live}}</ref> अकादमिक एवं [[अनुसन्धान संस्थान|अनुसंधान संस्थानों]] के समूहों द्वारा इसे आगे बढ़ाया जाता है।<ref name="deridder2020">{{cite book |last=de Ridder |first=Jeroen |url=https://www.routledge.com/What-is-Scientific-Knowledge-An-Introduction-to-Contemporary-Epistemology/McCain-Kampourakis/p/book/9781138570153 |title=What is Scientific Knowledge? An Introduction to Contemporary Epistemology of Science |publisher=Routledge |year=2020 |isbn=978-1-138-57016-0 |editor-last1=McCain |editor-first1=Kevin |location=New York |pages=3–17 |chapter=How many scientists does it take to have knowledge? |access-date=5 मई 2021 |editor-last2=Kampourakis |editor-first2=Kostas |archive-url=https://web.archive.org/web/20210505044353/https://www.routledge.com/What-is-Scientific-Knowledge-An-Introduction-to-Contemporary-Epistemology/McCain-Kampourakis/p/book/9781138570153 |archive-date=5 मई 2021 |url-status=live}}</ref> इस का प्रायोगिक प्रभाव यह हुआ कि उन के काम के लिए वैज्ञानिक नीतियों का उद्भव हुआ। इस से वाणिज्यिक उत्पादों, हथियार, स्वास्थ्य देखभाल और [[पर्यावरण संरक्षण]] के लिए विभिन्न आचारिक और नैतिक विकास की प्राथमिकता को आवश्यक हुवी। == शब्द व्युत्पत्ति == संस्कृत से विज्ञान शब्द की व्युत्पत्ति हुवी है। "ज्ञान" में "वि" उपसर्ग जोड़ कर इस शब्द का निर्माण हुवा। विज्ञान का अर्थ विशेष ज्ञान है। उदाहरण - पेड़ को देख के उस का आकार और उस के सामान्य उपयोग बताना सामान्य ज्ञान की श्रेणी में आता है और उसी पेड़ की प्रजाति, उस के लिए आवश्यक जलवायु और मौसम का ज्ञान और उस के विकास का विशेष ज्ञान विज्ञान कहलाता है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=utEREQAAQBAJ&newbks=1&newbks_redir=0&printsec=frontcover&pg=PA14|title=भाषा विज्ञान, हिंदी भाषा तथा देवनागरी लिपि|last=रस्तोगी|first=शिखा|last2=शर्मा 'विशेष'|first2=पुष्पा|publisher=एसबीपीडी पब्लिशिंग हाउस|year=2004|isbn=9788119142484|pages=14}}</ref> विज्ञान के लिए प्रचलित अन्य शब्द "साईंस" विदेशी आंग्ल भाषा का है। ''साईंस'' शब्द का उपयोग १४वीं सदी तक [[मध्य अंग्रेज़ी]] में "ज्ञान की अवस्था" के अर्थ में होता था। यह शब्द एंग्लो नॉर्मन भाषा के प्रत्यय ''{{lang|xno|-सिंस}}'' (-''cience'') से अंग्रेज़ी में आया। ''सिंस'' शब्द का मूल [[लातिन भाषा|लैटिन]] शब्द सैंसिया ({{lang|la|[[wikt:scientia|scientia]]}}) से बना है जिस का अर्थ "ज्ञान, जागरुकता, समझ" है। सैंसिया शब्द अन्य लैटिन शब्द ''सैइंस'' ({{lang|la|[[wikt:sciens|sciens]]}}) का संज्ञात्मक व्युत्पन्न है जिस का अर्थ ज्ञात होने से है। ''सैइंस'' शब्द की व्युत्पति ''सियो'' ({{lang|la|[[wikt:scio|sciō]]}}) से हुई जो ''सिरे'' (''{{lang|la|[[wikt:scire|scīre]]}}'') का वर्तमानकालिक विशेषण है और इस अर्थ "जानने की इच्छा" होती है।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/m-de-vaan-2008-etymological-dictionary-of-latin-and-the-other-italic-languages/page/544/|title=Etymological dictionary of Latin and the other italic languages|last=Vaan|first=Michiel de|date=2008|publisher=Brill|isbn=978-90-04-16797-1|series=Leiden Indo-European etymological dictionary series|location=Leiden}}</ref> साईंस शब्द के मूल के बारे में विभिन्न परिकल्पनायें हैं। हिन्द यूरोपीय और डच भाषाविद् माइकल ड के अनुसार ''सियो'' की उत्पत्ति प्रोटो इटाली भाषा के शब्द *''स्किजे'' - ({{lang|itc-x-proto|*skije-}} या *''स्किजो'' ({{lang|itc-x-proto|*skijo-}}) से हुई जिस का अर्थ "जानने से" है। इन शब्दों की व्युत्पत्ति प्रोटो हिन्द यूरोपीय भाषा के शब्दों ''{{PIE|*skh<sub>1</sub>-ie}}, {{PIE|*skh<sub>1</sub>-io}}'' से हुई जिन का अर्थ "उत्कीर्ण" से है। ''लेक्सिकॉन डेर इंडो-जर्मेनिशन वर्बेन'' (''Lexikon der indogermanischen Verben)'' शब्दकोश ''सियो'' ({{lang|la|sciō}}) को ''निसिरे'' ({{lang|la|[[wikt:nescire|nescīre]]}}) का वापस गठन माना जिसका अर्थ "नहीं जानने, या अनभिज्ञ होने" से है। "''निसिरे"'' शब्द की व्यत्पत्ति प्रोटो-हिन्द-यूरोपीय *''सेख'' (''{{PIE|[[wikt:Reconstruction:Proto-Indo-European/sek-|*sekH-]]}}'') से हुवी जिस के तुल्य लैटिन शब्द ''सेचारे'' ({{lang|la|[[wikt:secare|secāre]]}}) अथवा ''{{PIE|*skh<sub>2</sub>-}}'', है जो ''{{PIE|*sḱʰeh2(i)-}}'' से बना है और इस का अर्थ "काटने" से है।<ref>{{Cite encyclopedia|year=2008|title=sciō|encyclopedia=Etymological Dictionary of Latin and the other Italic Languages|url=https://archive.org/details/m-de-vaan-2008-etymological-dictionary-of-latin-and-the-other-italic-languages/page/544/|last=Vaan|first=Michiel de|author-link=Michiel de Vaan|series=[[Indo-European Etymological Dictionary]]|pages=545|isbn=978-90-04-16797-1}}</ref><!-- मैं स्रोत के कुछ शब्दों को पढ़ने में अक्षम हूँ। आप यदि इसके बारे में उचित स्रोतों के साथ पढ़ने की क्षमता रखते हो तो इसे सुधारा जा सकता है। --> पहले साइंस को "ज्ञान" अथवा "अध्ययन" का प्रयायवाची शब्द माना जाता था जिसे लटिन मूल के रूप में रखा जाता था। वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले व्यक्ति को "प्राकृतिक दार्शनिक" (natural philosopher) अथवा "वैज्ञानिक" (man of science) कहा जाता है।<ref>{{Cite book|url=https://www.worldcat.org/oclc/51330464|title=From natural philosophy to the sciences : writing the history of nineteenth-century science|last=Cahan|first=David|date=2003|publisher=University of Chicago Press|isbn=0-226-08927-4|location=Chicago|pages=3–15|oclc=51330464|access-date=31 मई 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220531071721/https://www.worldcat.org/title/from-natural-philosophy-to-the-sciences-writing-the-history-of-nineteenth-century-science/oclc/51330464|archive-date=31 मई 2022|url-status=live}}</ref> सन् १८३४ में [[विलियम ह्वेवेल]] ने [[मैरी सोमरविल]] की पुस्तक ''ऑन द कनेक्सन ऑफ़ द फिजिकल साइंसेज'' (On the Connexion of the Physical Sciences) की समीक्षा के दौरान "साइंटिस्ट" शब्द की रचना की,<ref name="Whewell scientist">{{Cite journal|last=Ross|first=Sydney|year=1962|title=Scientist: The story of a word|journal=एन्नल्स ऑफ़ साइंस|volume=18|issue=2|pages=65–85|doi=10.1080/00033796200202722|doi-access=free}}</ref> जिस के अनुसार ये लोग "कुछ प्रतिभाशाली सज्जन" (सम्भवतः स्वयं के लिए) हैं।<ref>{{OED|scientist}}</ref> == इतिहास == {{Main|विज्ञान का इतिहास}} === शुरूआती इतिहास === [[चित्र:Plimpton_322.jpg|पाठ=चिह्नों के साथ मिट्टी की पट्टिका, संख्याओं के लिए तीन स्तंभ और क्रमिक संख्याओं के लिए एक स्तंभ|अंगूठाकार|[[कसदी|बेबिलोनियाई]] रिकार्डों के प्लिम्पटन ३२२ टैब्लेट से पायथोगोरीय त्रिक, इसे लगभग १८०० ईसा पूर्व लिखा गया। ]] आधुनिक दृष्टि से विज्ञान का आरंभ किसी एक विशेष समय से नहीं हुवा बल्कि विश्व के भिन्न भिन्न भागों में सहस्रों वर्षों में धीरे धीरे विभिन्न क्रमबद्ध विधियों का विकास होता रहा।<ref name="cognitive-basis">{{Citation |last=Carruthers |first=Peter |title=The roots of scientific reasoning: infancy, modularity and the art of tracking |date=2 मई 2002 |work=The Cognitive Basis of Science |pages=73–96 |editor-last=Carruthers |editor-first=Peter |publisher=Cambridge University Press |doi=10.1017/cbo9780511613517.005 |isbn=978-0-521-81229-0 |editor2-last=Stich |editor2-first=Stephen |editor3-last=Siegal |editor3-first=Michael}}</ref><ref name="causal-cognition">{{Cite journal |last1=Lombard |first1=Marlize |last2=Gärdenfors |first2=Peter |year=2017 |title=Tracking the Evolution of Causal Cognition in Humans |journal=Journal of Anthropological Sciences |volume=95 |issue=95 |pages=219–234 |doi=10.4436/JASS.95006 |pmid=28489015 |issn=1827-4765}}</ref> प्रागैतिहासिक विज्ञान में सम्भवतः [[विज्ञान में महिलायें|महिलाओं]] ने केन्द्रीय भूमिका निभाई<ref>{{cite book|title=द डॉन ऑफ़ एवरिथिंग|last1=Graeber|first1=David|last2=Wengrow|first2=David|date=2021|page=248|language=en|script-title=hi:The Dawn of Everything|author-link1=David Graeber|author-link2=David Wengrow}}</ref> क्योंकि अधिकतर [[अनुष्ठान|धार्मिक अनुष्ठानों]] में उन का योगदान अधिक होता था।<ref>{{cite journal |title=The Faerie Smith Meets the Bronze Industry: Magic Versus Science in the Interpretation of Prehistoric Metal-Making |jstor=124782 |last1=Budd |first1=Paul |last2=Taylor |first2=Timothy |journal=World Archaeology |year=1995 |volume=27 |issue=1 |pages=133–143 |doi=10.1080/00438243.1995.9980297 }}</ref> प्राचीन (प्रागैतिहासिक) वैज्ञानिक गतिविधियों को कुछ विद्वान् "प्रोटॉसाइंस" (protoscience) या [[आद्यविज्ञान]] कहते हैं जिन के कुछ गुणधर्म आधुनिक विज्ञान के सदृश्य हैं पंरतु सभी गुणधर्म समरूप नहीं हैं।<ref>{{cite book|last=Tuomela |first=Raimo |year=1987 |chapter=Science, Protoscience, and Pseudoscience |editor-last1=Pitt |editor-first1=J.C. |editor-last2=Pera |editor-first2=M. |title=Rational Changes in Science |series=Boston Studies in the Philosophy of Science |volume=98 |pages=83–101 |publisher=Springer |location=Dordrecht |doi=10.1007/978-94-009-3779-6_4|isbn=978-94-010-8181-8 }}</ref><ref>{{cite journal|doi=10.1086/599864 |first=Pamela H. |last=Smith |title=Science on the Move: Recent Trends in the History of Early Modern Science |url=https://archive.org/details/sim_renaissance-quarterly_summer-2009_62_2/page/n9 |journal=Renaissance Quarterly |volume=62 |number=2 |year=2009 |pages=345–375|pmid=19750597 |s2cid=43643053 }}</ref><ref>{{Cite journal |last=Fleck |first=Robert |date=मार्च 2021 |title=Fundamental Themes in Physics from the History of Art |journal=Physics in Perspective |language=en |volume=23 |issue=1 |pages=25–48 |doi=10.1007/s00016-020-00269-7 |bibcode=2021PhP....23...25F |s2cid=253597172 |issn=1422-6944|doi-access=free }}</ref> हालांकि ऐसे शब्दों को निंदनीय,<ref>{{cite encyclopedia |last=Scott |first=Colin |encyclopedia=The Postcolonial Science and Technology Studies Reader |title=Science for the West, Myth for the Rest? |publisher=Duke University Press |location=Durham |editor-last=Harding |editor-first=Sandra |isbn=978-0-8223-4936-5 |year=2011 |oclc=700406626 |page=175 |doi=10.2307/j.ctv11g96cc.16 }}</ref> अथवा अति [[वर्तमानवाद]] सूचक, अथवा केवल वर्तमान श्रेणियों के सम्बंध में उन गतिविधियों के बारे में सोचने के रूप में भी देखा जाता है।<ref>{{cite journal|doi=10.1177/007327531205000203 |first=Peter |last=Dear |title=Historiography of Not-So-Recent Science |journal=History of Science |volume=50 |number=2 |year=2012 |pages=197–211|s2cid=141599452 }}</ref> प्राचीन भारतीय सभ्यता में [[लिपि|लेखन प्रणालियों]] (लिपि) के प्रादुर्भाव के साथ वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रत्यक्ष साक्ष्य स्पष्ट रूप से मिलते हैं। कुछ साक्ष्य मिस्र, मैसोपोटामिया आदि सभ्यताओं में भी मिलते हैं। मोटा अनुमान है कि [[विज्ञान का इतिहास|विज्ञान के इतिहास]] में सबसे प्रारंभिक लिखित अभिलेख लगभग ३००० से १२०० [[आम युग|ईसा पूर्व]] के बीच निर्मित हुए।<ref name=Lindberg2007a/><ref name="Grant2007a" /> यद्यपि "विज्ञान", "साइंस", "प्रकृति" और "नैचर" जैसे शब्द और अवधारणायें उस समय के वैचारिक परिदृश्य में नहीं थे। प्राचीन मिस्र और मैसोपोटामिया के योगदान बाद में यूनानी और मध्यकालीन विज्ञान में गणित, खगोलशास्त्र और आयुर्विज्ञान में स्थान प्राप्त करने में सफल रहे।<ref>{{cite book|last1= Rochberg|first1= Francesca|author-link=Francesca Rochberg|editor1-last= Shank|editor1-first= Michael|editor2-last= Numbers|editor2-first= Ronald|editor3-last= Harrison|editor3-first= Peter|title= Wrestling with Nature: From Omens to Science|date= 2011|publisher= University of Chicago Press|location=Chicago|isbn= 978-0-226-31783-0|page= 9|chapter= Ch.1 Natural Knowledge in Ancient Mesopotamia}}</ref><ref name=Lindberg2007a/> तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से प्राचीन भारतीय गणित के विद्वानों ने [[दशमलव पद्धति|दशमलव संख्या प्रद्धति]] विकसित की,<ref>{{Cite book|title=Groundbreaking Scientific Experiments, Inventions, and Discoveries of the Middle Ages and the Renaissance|url=https://archive.org/details/groundbreakingsc0000kreb_p4w4|last=Krebs|first=Robert E.|publisher=ग्रीनवुड पब्लिशिंग ग्रुप|year=2004|isbn=978-0313324338|pages=[https://archive.org/details/groundbreakingsc0000kreb_p4w4/page/n156 127]}}</ref> [[ज्यामिति]] (रेखागणित) का उपयोग कर के व्यावहारिक समस्याओं को हल किया<ref>{{cite book |last1=Erlich |first1=Ḥaggai |author-link=Haggai Erlich |url=https://books.google.com/books?id=LcsJosc239YC&q=egyptian%20geometry%20Nile&pg=PA80 |title=The Nile: Histories, Cultures, Myths |last2=Gershoni |first2=Israel |date=2000 |publisher=Lynne Rienner Publishers |isbn=978-1-55587-672-2 |pages=80–81 |language=en |quote=The Nile occupied an important position in Egyptian culture; it influenced the development of mathematics, geography, and the calendar; Egyptian geometry advanced due to the practice of land measurement "because the overflow of the Nile caused the boundary of each person's land to disappear." |access-date=9 जनवरी 2020 |archive-date=31 मई 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220531025639/https://books.google.com/books?id=LcsJosc239YC&q=egyptian+geometry+Nile&pg=PA80 |url-status=live }}</ref> और एक पंचांग (कालदर्शक) विकसित किया।<ref>{{Cite web |title=Telling Time in Ancient Egypt |url=https://www.metmuseum.org/toah/hd/tell/hd_tell.htm |access-date=27 मई 2022 |website=The Met's Heilbrunn Timeline of Art History |archive-date=3 मार्च 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220303133140/https://www.metmuseum.org/toah/hd/tell/hd_tell.htm |url-status=live }}</ref> उन के स्वास्थ्यवर्धक उपचारों में दवा उपचार और अलौकिक उपचार जैसे प्रार्थना, [[अभिचार|मंत्रोचार]] एवं अनुष्ठान आदि शामिल थे।<ref name=Lindberg2007a/> प्राचीन भारत में लोग विभिन्न प्राकृतिक रसायनों के गुणों के बारे में ज्ञान का उपयोग करते थे। इस से वे [[मृद्भाण्ड|मिट्टी के बर्तन]], [[फ़ाइनेस|प्रकाचित वस्तु]] (चीनी मिट्टी), कांच, साबुन, धातु, [[चूना प्लास्टर]] और जलरोधी बर्तनों का निर्माण और उपयोग करते थे।<ref name="McIntosh2005">{{cite book|last1= McIntosh|first1= Jane R.|author-link= Jane McIntosh|title= Ancient Mesopotamia: New Perspectives|date= 2005|publisher= ABC-CLIO|location= Santa Barbara, California, Denver, Colorado, and Oxford, England|isbn= 978-1-57607-966-9|pages= 273–76|url= https://books.google.com/books?id=9veK7E2JwkUC&q=science+in+ancient+Mesopotamia|access-date= 20 अक्टूबर 2020|archive-date= 5 फ़रवरी 2021|archive-url= https://web.archive.org/web/20210205162758/https://books.google.com/books?id=9veK7E2JwkUC&q=science+in+ancient+Mesopotamia|url-status= live}}</ref> उन्होंने भविष्यवाणी के उद्देश्य से [[फलित ज्योतिष|ज्योतिष]], [[शरीरक्रिया विज्ञान|पशु कार्यिकी]], [[शारीरिकी]] और जैव पारिस्थितिकी का अध्ययन किया।<ref>{{Cite journal|last=Aaboe|first=Asger|author-link=Asger Aaboe|date=2 मई 1974|title=Scientific Astronomy in Antiquity|journal=फिलोसोफिकल ट्रांजेक्शन्स ऑफ़ द रॉयल सोसाइटी|volume=276|issue=1257|pages=21–42|bibcode=1974RSPTA.276...21A|doi=10.1098/rsta.1974.0007|jstor=74272|s2cid=122508567}}</ref> मेसोपोटामियावासियों की चिकित्सा में रुचि थी और सबसे प्रारंभिक [[औषधनिर्देश पत्र|औषधि पत्र]] [[उर का तीसरा राजवंश|उर के तीसरे राजवंश]] के दौरान [[सुमेरी भाषा]] में मिलते हैं।<ref name="McIntosh2005" /><ref>{{cite journal |title= Medicine, Surgery, and Public Health in Ancient Mesopotamia |first= R D. |last= Biggs |journal=Journal of Assyrian Academic Studies |volume= 19 |number= 1 |year= 2005 |pages= 7–18}}</ref> ऐसा लगता है कि उन्होंने ऐसे वैज्ञानिक विषयों का अध्ययन किया था जिन का व्यावहारिक या धार्मिक अनुप्रयोग था तथा जिज्ञासा को संतुष्ट करने में बहुत कम रुचि थी।<ref name="McIntosh2005" /> === श्रेण्य पुरावशेषकाल === [[चित्र:MANNapoli_124545_plato's_academy_mosaic.jpg|पाठ=दार्शनिकों के एकत्रित होने और बातचीत करने का फ़्रेमयुक्त मोज़ेक|बाएँ|अंगूठाकार|प्लेटोज एकैडमी मोज़ेक, १०० ईसा पूर्व से ७९ ई॰ के मध्य में निर्मित, इस में विभिन्न यूनानी दार्शनिक और विद्वानों को दिखाया गया है।]]<!-- === मध्य युग === === पुनर्जागरण === === ज्ञानोदय का युग === === उन्नीसवीं सदी === === बीसवीं सदी === === इक्कीशवीं सदी ===--> ==टिप्पणी== {{notelist}} ==सन्दर्भ== {{reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == {{wiktionary|विज्ञान}} {{Subject bar|auto=1|portal1=विज्ञान}} [[श्रेणी:विज्ञान]] 3zskr2lwl9m06els5w6lusuq9g7le4u बृहदीश्वर मन्दिर 0 7730 6543754 6454932 2026-04-25T04:52:29Z अनुनाद सिंह 1634 /* इन्हें भी देखें */ 6543754 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक हिन्दू मन्दिर | image = Le temple de Brihadishwara (Tanjore, Inde) (14354574611).jpg | caption= बृहदीश्वर मंदिर प्रांगण | alt = Brihadisvara temple complex is a part of the UNESCO World Heritage Site known as the Great Living Chola Temples | map_type = India Tamil Nadu#India | map_caption = तमिलनाडु में अवस्थिति | coordinates = {{coord|10|46|58|N|79|07|54|E|type:landmark_region:IN|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] | district = | location = [[तंजावुर]], तमिलनाडु | elevation_m = 66 | deity = [[शिव]] | festivals= [[महाशिवरात्रि]] | architecture_style = द्रविड़ शैली | inscriptions = तमिल और ग्रन्थ लिपियाँ | year_completed = 1010 AD<ref name=britbrihadthanj/><ref name=mitchell/> | creator = [[राजाराज चोल १|राजा राज चोल-I]] | website = | footnotes = {{Infobox UNESCO World Heritage Site | child = yes | official_name = बृहदीश्वर मन्दिर प्रांगण, तंजावुर | part_of = Great Living Chola Temples | criteria = {{UNESCO WHS type|(ii), (iii)}}(ii), (iii) | ID = 250bis-001 | year = 1987 | extension = 2004 | area = {{convert|18.07|ha|acre|abbr=on}} | buffer_zone = {{convert|9.58|ha|acre|abbr=on}} }} }} [[चित्र:Thanjavur Brihadeeswara Temple Entrance.JPG|300px|thumb|right|बृहदीश्वर मंदिर का प्रवेश द्वार]] '''बृहदीश्वर''' (या '''वृहदीश्वर''') '''मन्दिर''' या '''राजराजेश्वरम्''' [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] के [[तंजावुर जिला|तंजौर]] में स्थित एक [[हिन्दू धर्म|हिंदू]] [[मन्दिर|मंदिर]] है जो 11वीं सदी के आरम्भ में बनाया गया था। इसे '''पेरुवुटैयार कोविल''' भी कहते हैं। यह मंदिर पूरी तरह से [[ग्रेनाइट]] नि‍र्मि‍त है। विश्व में यह अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। यह अपनी भव्यता, वास्‍तुशिल्‍प और केन्द्रीय गुम्बद से लोगों को आकर्षित करता है। इस मंदिर को [[युनेस्को|यूनेस्को]] ने [[विश्व धरोहर]] घोषित किया है।<ref>[http://pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx?relid=27922 बृहदेश्वर मंदिर- दक्षिण भारत की वाjhyfhijस्तुकला की एक भव्य मिसाल]</ref> इसका निर्माण 1003-1010 ई. के बीच [[चोल राजवंश|चोल]] शासक [[राजाराज चोल १|प्रथम राजराज चोल]] ने करवाया था। उनके नाम पर इसे '''राजराजेश्वर मन्दिर''' का नाम भी दिया जाता है। यह अपने समय के विश्व के विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था। इसके तेरह (13) मंजिलें भवन (सभी हिंदू अधिस्थापनाओं में मंजिलो की संख्या विषम होती है।) की ऊँचाई लगभग 66 मीटर है। मंदिर भगवान [[शिव]] की आराधना को समर्पित है। यह कला की प्रत्येक शाखा - [[वास्तुकला]], पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रांकन, [[नृत्य]], [[संगीत]], आभूषण एवं उत्कीर्णकला का भंडार है। यह मंदिर उत्कीर्ण [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] व [[तमिल]] [[पुरालेख]] सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पाषाण पर यह कलश स्थित है, अनुमानत: उसका भार 2200 मन (88 टन) है और यह '''एक ही पाषाण से''' बना है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य [[शिवलिंग]] को देखने पर उनका वृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है। मंदिर में प्रवेश करने पर [[गोपुरम]]्‌ के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर [[नन्दी]] जी विराजमान हैं। नन्दी जी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी तथा 3.7 मीटर ऊंची है। भारतवर्ष में एक ही पत्थर से निर्मित नन्दी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है। तंजौर में अन्य दर्शनीय मंदिर हैं- तिरुवोरिर्युर, गंगैकोंडचोलपुरम तथा दारासुरम्‌। ==छबिदीर्घा== <gallery> File:Brihadeeswarar Temple 04.jpg|गणेश मंदिर File:Brihadeeswarar Temple 03.jpg|सुब्रमण्य मंदिर File:Ganesha, Brihadeeswarar Temple.jpg|गणेश प्रतिमा File:MainGopuram-BrihadisvaraTemple-Thanjavur,India.jpg|मुख्य गोपुरम् File:Nandi-CeilingFresco-BrihadisvaraTemple-Thanjavur,India.jpg|नन्दी के ऊपर की छत की चित्रकला File:OrnamentedPillar-BrihadisvaraTemple-Thanjavur,India.jpg|अलंकृत स्तम्भ File:Brihadeeswarar Temple 02.jpg|मुख्य द्वार File:TanjoreTemple.jpg|सामान्य दृष्य File:Inscriptions around the temple.JPG|मंदिर में शिलालेख File:Big Temple-Gopuram Detail.jpg|गोपुरम के एक भाग का विस्तृत दृष्य File:Bhikshatana_tanjore.jpg|[[भिक्षाटन]] प्रतिमा (मुख्य गोपुरम्) </gallery> ==सन्दर्भ== {{Reflist}} == इन्हें भी देखें == * [[मन्दिर|मंदिर]] * [[मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मन्दिर|मीनाक्षी मंदिर]] * [[कामाख्या मन्दिर|कामाख्या मंदिर]] * [[नवग्रह मंदिर]] * [[चिदंबरम मंदिर]] * [[कैलाश मन्दिर]] -- एलोरा का कैलाश मन्दिर जो एक ही पत्थर से निर्मित है, भारतीय वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Brihadisvara Temple|बृहदेश्वर मन्दिर}} * [http://www.janokti.com/2009/11/15/ब़ृहदेश्‍वर-मंदिर-चोल-स्/ वृहदेश्‍वर मंदिर चोल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100121122854/http://www.janokti.com/2009/11/15/%E0%A4%AC%E0%A4%BC%E0%A5%83%E0%A4%B9%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A5%8D/ |date=21 जनवरी 2010 }} * [http://bharat.gov.in/knowindia/brihadisvara.php बृहदेश्‍वर मंदिर - तंजौर] * [http://mallar.wordpress.com/2010/08/10/ब्रिहदेश्वर-मंदिर-तंजाव/ वृहदेश्वर मंदिर, तंजावूर] * [http://asi.nic.in/asi_hn_monu_tktd_tamilnadu_chol_mandir_brahdishwar_mandir.asp विश्व विरासत स्थल : बृहदीश्‍वर चोल मंदिर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170301183538/http://asi.nic.in/asi_hn_monu_tktd_tamilnadu_chol_mandir_brahdishwar_mandir.asp |date=1 मार्च 2017 }} * [https://achhigyan.com/brihadeeswarar-temple-history/ बृहदेश्वर मन्दिर का इतिहास और रोचक बातें] * [https://www.businessinsider.in/This-tallest-temple-in-Indias-Tamil-Nadu-is-over-1000-years-old-and-its-engineering-is-still-a-mystery-to-historians/articleshow/53945141.cms This tallest temple in India’s Tamil Nadu is over 1,000 years old and its engineering is still a mystery to historians] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170404003239/http://www.businessinsider.in/This-tallest-temple-in-Indias-Tamil-Nadu-is-over-1000-years-old-and-its-engineering-is-still-a-mystery-to-historians/articleshow/53945141.cms |date=4 अप्रैल 2017 }} [[श्रेणी:तमिल नाडु में हिन्दू मन्दिर]] [[श्रेणी:तंजावूर ज़िले में हिन्दू मंदिर]] [[श्रेणी:शिव मंदिर]] [[श्रेणी:तंजावूर ज़िला]] p8c2bw9qmumjz1qgsl066hqfj1mjukt केनरा बैंक 0 8934 6543696 6506529 2026-04-24T19:49:06Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543696 wikitext text/x-wiki {{Infobox company | name = केनरा बैंक | logo = [[चित्र:Canara Bank Logo.svg]] | image = Canara_Bank_Head_Office_Bengaluru.jpg | image_caption = केनरा बैंक प्रधान कार्यालय टाउन हॉल जंक्शन, [[बेंगलुरु]], [[कर्नाटक]] | type = [[सार्वजनिक कंपनी|सार्वजनिक]] | traded_as = {{BSE|532483}}<br />{{NSE|CANBK}} | industry = {{ubl | [[बैंकिंग]] | [[वित्तीय सेवाएँ]] }} | hq_location_country = [[भारत]] | num_locations = 9,861 शाखाएँ एवं 7907 ATM & 2940 CRM | num_locations_year = जून 2025 | key_people = विजय श्रीरंगन <br />{{small|(गैर-कार्यकारी अध्यक्ष)}} <br /> के सत्यनारायण राजू<br /> {{small|([[मुख्य कार्यकारी अधिकारी|MD]] & [[मुख्य कार्यकारी अधिकारी|CEO]])}} | products = {{ubl|[[खुदरा बैंकिंग]]|[[कॉर्पोरेट बैंकिंग]]|[[निवेश बैंकिंग]]|[[बंधक ऋण]]s| [[निजी बैंकिंग]]|[[धन प्रबन्धन]]|[[निवेश प्रबंधन]]|[[निवेश प्रबंधन]]|[[क्रेडिट कार्ड]]|[[बीमा]] }} | services = | revenue = {{increase}} {{INRConvert|152657.89|c}}{{Citation needed|date=November 2025}} | revenue_year = जून 2025 | operating_income = {{increase}} {{INRConvert|31390.26|c}}{{Citation needed|date=November 2025}} | income_year = 2025 | net_income = {{increase}} {{INRConvert|17026.67|c}}{{Citation needed|date=November 2025}} | net_income_year = 2025 | assets = {{increase}} {{INRConvert|1811503|c}}{{Citation needed|date=November 2025}} | assets_year = सितंबर 2025 | equity = | owner = [[भारत सरकार]] (62.93%)<ref>{{cite news |title=Canara Bank gains after Q2 PAT climbs 89% YoY to Rs 2,525 cr |url=https://www.business-standard.com/article/news-cm/canara-bank-gains-after-q2-pat-climbs-89-yoy-to-rs-2-525-cr-122102000531_1.html |access-date=27 March 2023 |work=Business Standard |date=20 October 2022}}</ref> | num_employees_year = मार्च 2025 | parent = | num_employees = 81,260 | subsid = | ratio = 16.59% | foundation = केनरा बैंक हिन्दु स्थायी कोष ({{start date and age|df=yes|1906}})<br />केनरा बैंक लिमिटेड (1910)<br />केनरा बैंक (1969) | founder = [[अम्मेम्बल सुब्बा राव पई]] | hq_location_city = [[बेंगलुरु]] | homepage = {{URL|https://canarabank.bank.in/}} | footnotes = <ref name="Canara Bank 2020">{{Cite web|url=https://www.bseindia.com/bseplus/AnnualReport/532483/68835532483.pdf|title=Balance Sheet 31.03.2021}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> }} '''केनरा बैंक''' [[भारत]] की एक प्रमुख वाणिज्यिक बैंक है। भारत में इसकी स्थापना 1906 में, [[अम्मेम्बल सुब्बा राव पई|श्री अम्मेम्बल सुब्बा राव पाई]], एक महान दूरदर्शी और परोपकारी द्वारा की गयी थी<ref>{{cite web |url=http://www.canarabank.com/English/scripts/aboutus.aspx |title=Canara Bank - About |accessdate=2013-05-25 |date=2013-05-25 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130517104749/http://www.canarabank.com/english/scripts/aboutus.aspx |archive-date=17 मई 2013 |url-status=dead }}</ref> इस नाते यह भारत के सबसे पुराने भारतीय बैंकों में से एक है। 2013 तक केनरा बैंक की भारत और अन्य देशों में 3600 से अधिक शाखायें थीं, बैंगलोर में अधिकतम शाखाओं के साथ।<ref>{{cite web |url=http://www.allindiacodes.com/canara-bank/ |title=Canara Bank - Branches |accessdate=2013-05-25 |date=2013-05-25 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130524055258/http://www.allindiacodes.com/canara-bank/ |archive-date=24 मई 2013 |url-status=dead }}</ref> इसका मुख्य कार्यालय बंगलूरू में स्थित है। केनरा बैंक, विदेशी मुद्रा व्यापार करने के लिए आवश्यक बल देने के विशेष रूप से निर्यात और अनिवासी भारतीयों की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसके विभिन्न विदेशी विभागों के कामकाज की निगरानी के लिए, 1976 में अपने अंतर्राष्ट्रीय प्रभाग की स्थापना की।<ref>{{cite web |url=http://www.canarabank.com/English/scripts/Pblinternatbranches.aspx |title=Canara Bank - International |accessdate=2013-05-25 |date=2013-05-25 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110307201645/http://www.canarabank.com/English/Scripts/pblinternatbranches.aspx |archive-date=7 मार्च 2011 |url-status=dead }}</ref> बैंक की अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति, [[लंदन]], [[दुबई]] और [[न्यूयॉर्क नगर|न्यूयॉर्क]] जैसे केन्द्रों मे है।<ref>{{Cite news|url=http://www.thehindubusinessline.com/markets/stock-markets/canara-bank-shelves-plan-to-sell-stake-in-amc-arm/article10005883.ece|title=Canara Bank shelves plan to sell stake in AMC arm|date=2017-12-29|work=The Hindu Business Line|access-date=2018-01-15|language=en}}</ref> व्यापार के संदर्भ में यह एक भारत के सबसे बडे़ राष्ट्रीयकृत बैंको में से एक है, जिसका कुल कारोबार 598,033 करोड़ रुपयों का है।<ref>{{cite web |url=http://www.canarabank.com/English/scripts/History.aspx |title=Canara Bank - History |accessdate=2013-05-25 |date=2013-05-25 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110307195532/http://www.canarabank.com/English/Scripts/History.aspx |archive-date=7 मार्च 2011 |url-status=dead }}</ref> == इतिहास == [[File:Canara Bank Head Office.jpg|thumb|केनरा बैंक, बेंगलुरु के प्रधान कार्यालय में प्रतीक चिन्ह]] [[अम्मेम्बल सुब्बा राव पई]], एक महान दूरदर्शी और परोपकारी, ने 1 जुलाई 1906 को [[मैंगलोर]], भारत में ''केनरा हिंदू स्थायी कोष'' की स्थापना की।<ref>{{Cite web|url=https://canarabank.bank.in/pages/about-us| title = Canara Bank::About us |website=www.canarabank.bank.in|access-date=2025-12-23}}</ref> केनरा बैंक का पहला अधिग्रहण 1961 में हुआ जब उसने बैंक ऑफ केरल का अधिग्रहण किया। केनरा बैंक का पहला एक्विजिशन 1961 में हुआ था जब उसने बैंक ऑफ़ केरल को एक्वायर किया था। यह सितंबर 1944 में शुरू हुआ था और 20 मई 1961 को इसके अधिग्रहण के समय इसकी तीन ब्रांच थीं। दूसरा बैंक जिसे केनरा बैंक ने अधिग्रहण किया, वह सीसिया मिडलैंड बैंक (एलेप्पी) था, जो 26 जुलाई 1930 को बना था और टेकओवर के समय इसकी सात ब्रांच थीं। केनरा बैंक का पहला अधिग्रहण 1961 में हुआ जब उसने बैंक ऑफ केरल का अधिग्रहण किया। इसकी स्थापना सितंबर 1944 में हुई थी और 20 मई 1961 को इसके अधिग्रहण के समय इसकी तीन शाखाएँ थीं।दूसरा बैंक जिसे केनरा बैंक ने अधिग्रहण किया, वह सीसिया मिडलैंड बैंक ([[आलाप्पुड़ा|एलेप्पी]]) था, जिसे 26 जुलाई 1930 को बनाया गया था और अधिग्रहण के समय इसकी सात शाखाएँ थीं। 1958 में, [[भारतीय रिज़र्व बैंक]] ने केनरा बैंक को [[हैदराबाद]] में जी. रघुमथमुल बैंक का अधिग्रहण करने का आदेश दिया था। यह बैंक 1870 में बना था, और 1925 में एक सीमित कंपनी (लिमिटेड कंपनी) में बदल गया था। अधिग्रहण के समय जी. रघुमथमुल बैंक की पाँच शाखाएँ थीं। यह विलय 1961 में प्रभावी हुआ। बाद में 1961 में, केनरा बैंक ने त्रिवेंद्रम परमानेंट बैंक का अधिग्रहण किया। इसकी स्थापना 7 फरवरी 1899 को हुई थी और अधिग्रहण के समय इसकी 14 शाखाएँ थीं। केनरा बैंक ने 1963 में चार बैंकों का अधिग्रहण किया: [[त्रिप्पुनितुरा]] का श्री पूर्णाथ्र्येसा विलासम बैंक, [[तिरुचिरापल्ली]] का अर्नद बैंक, कोचीन का कोचीन कमर्शियल बैंक और [[मदुरई]] का पांडियन बैंक। श्री पूर्णाथ्र्येसा विलासम बैंक की स्थापना 21 फरवरी 1923 को हुई थी और अधिग्रहण के समय इसकी 14 शाखाएँ थीं। अर्नद बैंक की स्थापना 23 दिसंबर 1942 को हुई थी और अधिग्रहण के समय इसकी केवल एक शाखा थी। कोचीन कमर्शियल बैंक की स्थापना 3 जनवरी 1936 को हुई थी और अधिग्रहण के समय इसकी 13 शाखाएँ थीं। पांडियन बैंक की स्थापना मदुरई, तमिलनाडु में एस. एन. के. सुंदरम द्वारा 11 दिसंबर 1946 को की गई थी। इसने 1947 में टाउन हॉल रोड, मदुरई में एक केवल महिलाओं की शाखा बनाई, जिसमें दस महिलाएं काम करती थीं, जिनमें से एक एस.एन.के. सुंदरम की बेटी कमला सुंदरम थीं। केनरा बैंक के साथ विलय 2 दिसंबर 1963 को लागू हुआ। अधिग्रहण के समय, पांडियन बैंक की 83 शाखाएँ थीं। [[भारत सरकार]] ने 19 जुलाई 1969 को केनरा बैंक के साथ-साथ भारत के 13 दूसरे बड़े व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। राष्ट्रीयकरण के बाद करकला पुलकेरी जनार्दन प्रभु (KPJ प्रभु) बैंक के चेयरमैन बने। 1976 में, केनरा बैंक ने अपनी 1000वीं शाखा खोली। 1985 में, केनरा बैंक ने एक बचाव के तौर पर लक्ष्मी कमर्शियल बैंक का अधिग्रहण किया। 1996 में, केनरा बैंक बैंगलोर में अपनी शेषाद्रिपुरम ब्रांच के लिए "संपूर्ण शाखा बैंकिंग" के लिए [[आइएसओ ९०००|आईएसओ प्रमाणन]] (ISO सर्टिफिकेशन) पाने वाला पहला भारतीय बैंक बना। केनरा बैंक ने अब शाखाओं के आईएसओ प्रमाणन का विकल्प चुनना बंद कर दिया है। 30 अगस्त 2019 को, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की कि सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय किया जाएगा। प्रस्तावित विलय से देश का चौथा सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक बनेगा, जिसका कुल कारोबार ₹15.20 लाख करोड़ (US$180 बिलियन) और 10,324 शाखाएँ होंगी।<ref>{{cite news |url=https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/government-unveils-mega-bank-mergers-to-revive-growth-from-5-year-low/articleshow/70911359.cms |access-date=30 August 2019|title=Bank Merger News: Government unveils mega bank mergers to revive growth from 5-year low &#124; India Business News - Times of India|website=[[The Times of India]] |date=30 August 2019 }}</ref><ref>{{cite web |author=Staff Writer |title=10 public sector banks to be merged into four |url=https://www.livemint.com/news/india/pnb-obc-and-united-bank-to-be-merged-nirmala-sitharaman-1567158678718.html |website=Mint |access-date=30 August 2019 |language=en |date=30 August 2019}}</ref> केनरा बैंक के निदेशक मंडल ने 13 सितंबर को विलय को मंज़ूरी दे दी।<ref>{{cite web |title=Canara Bank board gives approval for merger with Syndicate Bank |url=https://www.businesstoday.in/sectors/banks/canara-bank-board-gives-approval-for-merger-with-syndicate-bank/story/378909.html |website=Business Today |date=13 September 2019 |access-date=13 September 2019}}</ref><ref>{{cite web |title=PSU Bank merger: Canara Bank board approves merger with Syndicate Bank; key things to know |url=https://www.financialexpress.com/industry/banking-finance/psu-bank-merger-canara-bank-board-approves-merger-with-syndicate-bank-key-things-to-know/1705359/ |website=The Financial Express |access-date=13 September 2019 |date=13 September 2019}}</ref> केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 मार्च 2020 को विलय को मंजूरी दी। विलय 1 अप्रैल 2020 को पूरा हुआ और सिंडिकेट बैंक के शेयरधारकों को उनके प्रत्येक 1,000 शेयरों के लिए केनरा बैंक में 158 इक्विटी शेयर प्राप्त हुए।<ref>{{cite news |last1=Reporter |first1=S. I. |title=Syndicate Bank, Oriental Bank gain on Cabinet nod for merger of 10 PSBs |url=https://www.business-standard.com/article/markets/select-psbs-gain-on-government-nod-for-merger-of-10-banks-into-4-120030500347_1.html |newspaper=Business Standard India |access-date=6 March 2020 |date=5 March 2020}}</ref><ref>{{Cite web|title=Canara Bank, Syndicate Bank to merge to become 4th largest public sector bank|url=https://www.businesstoday.in/sectors/banks/canara-bank-syndicate-bank-merge-become-4th-largest-public-sector-bank/story/376286.html|access-date=2020-05-31|website=www.businesstoday.in|date=30 August 2019 }}</ref><ref>{{Cite news|last=Mohapatra|first=Debasis|date=2019-12-07|title=30 committees monitoring the Canara-Syndicate Bank merger process|work=Business Standard India|url=https://www.business-standard.com/article/finance/30-committees-monitoring-the-canara-syndicate-bank-merger-process-119120700064_1.html|access-date=2020-05-31}}</ref><ref>{{Cite web|last=Ghosh|first=Shayan|date=2020-04-01|title=Canara Bank now 4th largest PSU bank after merger with Syndicate|url=https://www.livemint.com/industry/banking/canara-bank-now-4th-largest-psu-bank-after-merger-with-syndicate-11585745401655.html|access-date=2020-05-31|website=Livemint|language=en}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.moneycontrol.com/financials/canarabank/balance-sheetVI/CB06|title=Canara Bank Balance Sheet, Canara Bank Financial Statement & Accounts}}</ref> 2024 में, केनरा बैंक ने अपनी आईएफएससी बैंकिंग इकाई के माध्यम से $३०० मिलियन जुटाए।<ref>{{Cite news |date=September 2024 |title=State-owned Canara Bank mobilises $300 mn through IFSC banking unit |url=https://www.business-standard.com/companies/news/state-owned-canara-bank-mobilises-300-mn-through-ifsc-banking-unit-124090401381_1.html |work=Business Standard}}</ref> == शेयर होल्डिंग == अक्टूबर 2025 तक, बैंक में प्रमोटर होल्डिंग 62.93% और पब्लिक होल्डिंग 37.07% है।<ref>{{Cite web |title=Latest Shareholding Pattern - Canara Bank |url=https://trendlyne.com/equity/share-holding/232/CANBK/latest/canara-bank/ |access-date=2023-02-23 |website=Trendlyne.com |language=en}}</ref> == सहायक == === घरेलू सहायक कंपनियां === *कैनफिन होम्स लिमिटेड (सीएफएचएल) - पूरे भारत में 110 शाखाओं और 28 दूरगामी कार्यालयों का एक नेटवर्क <ref>{{Cite web|url=https://www.canfinhomes.com/|title=Welcome CanFin Homes Limited|website=Can Fin Homes Ltd}}</ref> *कैनबैंक फैक्टर्स लिमिटेड<ref>{{Cite web |title=Welcome To Canbank Factors LTD. |url=https://canbankfactors.com/ |access-date=2024-09-24 |language=en-US}}</ref> *कैनबैंक वेंचर कैपिटल फंड लिमिटेड<ref>{{Cite web |title=WELCOME TO CANBANKVENTURE |url=https://www.canbank.vc/ |access-date=2024-09-24 |website=www.canbank.vc}}</ref> *कैनबैंक कंप्यूटर सर्विसेज लिमिटेड<ref>{{Cite web |title=Canbank Computer Services Ltd |url=https://ccsl.co.in/ |access-date=2024-09-24 |website=ccsl.co.in}}</ref> *केनरा बैंक सिक्योरिटीज लिमिटेड<ref>{{Cite web |title=Leading Financial Service Provider in India {{!}} Canara Bank Securities Ltd |url=https://www.canmoney.in/ |access-date=2024-09-24 |website=www.canmoney.in}}</ref> *केनरा रोबेको एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड<ref>{{Cite web|url=https://www.canararobeco.com/|title=Canara Robeco Mutual Fund - Mutual Fund India - Online MF Investment}}</ref> *कैनबैंक फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड === संयुक्त उद्यम === *केनरा एचएसबीसी लाइफ इंश्योरेंस === विदेशी शाखाएँ === *लंदन शाखा (यू.के.)<ref name="branches">https://canarabank.com/branches-and-offices-abroad {{Bare URL inline|date=July 2025}}{{Dead link|date=September 2025}}</ref> *न्यूयॉर्क शाखा (यू.एस.ए.)<ref name="branches" /> *दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर शाखा (यूएई)<ref name="branches" /> === विदेशी सहायक कंपनियां === *केनरा बैंक (तंजानिया) लिमिटेड<ref name="branches" /> === अंतर्राष्ट्रीय धन प्रबंधन === 1983 से, केनरा बैंक ईस्टर्न एक्सचेंज कंपनी WLL<ref>{{Cite web |title=Eastern Exchange Company |url=https://easternexchangeqatar.com/ |access-date=2024-09-24 |website=Eastern Exchange Company |language=en-US}}</ref> [[दोहा, क़तर|दोहा]], [[क़तर]] के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। जिसे अब्दुल रहमान एम.एम. अल मुफ्ता ने 1979 में स्थापित किया था।<ref>{{Cite web |url=http://www.easternexchange.com.qa/ |title=Eastern Exchange |access-date=22 October 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140516231532/http://easternexchange.com.qa/ |archive-date=16 May 2014 |url-status=dead }}</ref> == क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक == केनरा बैंक ने दो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) को प्रयोजन करता है: * [[केरल ग्रामीण बैंक]] इसका हेडक्वार्टर [[मलप्पुरम]] में है और यह [[केरल]] के सभी जिलों में काम करता है। इसे 08 जुलाई, 2013 को एक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक के तौर पर शुरू किया गया था।<ref>{{Cite web |url=https://kgb.bank.in/ |title=Kerala Grameena Bank |access-date=29 August 2025 |archive-date=29 August 2025 |archive-url=https://web.archive.org/web/20250829162630/https://kgb.bank.in/#expand}}</ref> * [[कर्नाटक ग्रामीण बैंक]] इसका हेडक्वार्टर [[बेल्लारी]], कर्नाटक में है, और [[कर्नाटक]] के सभी जिलों में इसकी 1750 शाखाएँ हैं। इसकी स्थापना 1 मई, 2025 को "एक राज्य, एक RRB" नीति के तहत की गई थी।<ref>{{cite web | author1=Livemint | title='One state-one RRB' to be effective from May 1 after govt approves consolidation of 15 regional rural banks &#124; Mint | work=mint | date=8 April 2025 | url=https://www.livemint.com/economy/one-state-one-rrb-to-be-effective-from-may-1-after-govt-approves-consolidation-of-15-regional-rural-banks-11744118507326.html }}</ref> == सन्दर्भ == {{reflist}} {{भारत के बैंक}} {{प्रमुख भारतीय कंपनियाँ}} {{प्रमुख भारतीय कंपनियाँ}} [[श्रेणी:भारतीय बैंक]] {{substub}} cpwukvqxjv9d98xql0n6pt850m82ofj झरोखा 0 9203 6543799 3578659 2026-04-25T09:28:02Z The Sorter 845290 [[खिड़की]] तक का अनुप्रेषण हटाया 6543799 wikitext text/x-wiki {{Short description|भारतीय वास्तुतत्व}} [[File:Jodhpur Mehrangarh - Palast 4a Jharokha.jpg|thumb|[[मेहरानगढ़]] के छज्जे पर '''झरोखा''']] [[Image:Maheshwar Fort - Jharokha 02.jpg|thumb|upright|[[महेश्वर, खरगोन|महेश्वर]] क़िले का एक '''झरोखा''']] '''झरोखा''' ऊपरी मंज़िल वाली इमारत की बाहरी दीवार पर पत्थर की खिड़की होती है। यह [[भारतीय वास्तुकला]] का भाग है, जो ख़ासकर [[राजपूत वास्तुकला]] में मौजूद है। हालाँकि यह जाली से बंद होता है, इसे लोगों के लिए थोड़ा खोला जाता है। झरोखा एक [[ओरियल खिड़की]] से अधिक औपचारिक और सजावटी होता है तथा मध्यकालीन राजपूत वास्तुकला के [[फ़साड]] की एक विशिष्ट विशेषता है। [[श्रेणी:भारत की वास्तुकला]] [[श्रेणी:राजस्थान की वास्तुकला]] [[श्रेणी:इस्लामी वास्तुतत्व]] 1k6orjqc9mpsekye5jynav3f922zbek कृत्रिम बुद्धि 0 10712 6543638 6538211 2026-04-24T14:57:32Z ~2026-25229-18 921691 /* इन्हें भी देखें */ 6543638 wikitext text/x-wiki {{खराब अनुवाद}} {{लम्बा}} [[File:Kismet robot at MIT Museum.jpg|thumb|200px|कृत्रिम बुद्धि से बना [[रोबोट]]]] '''कृत्रिम बुद्धिमत्ता''' अथवा '''कृत्रिम बुद्धि''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: Artificial Intelligence; संक्षेप में: '''AI''', '''एआई''', '''कृ॰बु॰''') मानव और अन्य जन्तुओं द्वारा प्रदर्शित प्राकृतिक बुद्धि के विपरीत मशीनों द्वारा प्रदर्शित बुद्धि है। [[कम्प्यूटर विज्ञान|कंप्यूटर विज्ञान]] में कृत्रिम बुद्धि के शोध को "इंटेलिजेंट एजेंट" का अध्ययन माना जाता है। इंटेलिजेंट एजेंट एक ऐसा सयंत्र है जो अपने आस-पास के माहौल को देखकर, अपने लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करता है। इसके लिए आम बोलचाल की भाषा में, "कृत्रिम बुद्धि" शब्द का प्रयोग होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए एक मशीन इंसानों के "सोचने-समझने" वाले कामों की नकल करती है। [[एंड्रियास कपलान]] और माइकल हाएनलेन कृत्रिम बुद्धिमत्ता को “किसी प्रणाली के द्वारा बाहरी जानकारी को सही ढंग से समझने, ऐसे जानकारी से खुद सीखने और आसान बदलाव के माध्यम से खास लक्ष्यों और कामों को पूरा करने में उन सीखी हुई चीजों का उपयोग करने की क्षमता” के रूप में परिभाषित करते हैं।<ref>{{Cite web |url=[https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393](https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393) |title=Andreas Kaplan; Michael Haenlein (2018) Siri, Siri in my Hand, who's the Fairest in the Land? On the Interpretations, Illustrations and Implications of Artificial Intelligence, Business Horizons, 62(1) |access-date=17 नवंबर 2018 |archive-url=[https://web.archive.org/web/20181121191205/https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393](https://web.archive.org/web/20181121191205/https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393) |archive-date=21 नवंबर 2018 |url-status=live }}</ref><ref>[[एंड्रियास कपलान|Andreas Kaplan]] (2022). [[https://www.routledge.com/Artificial-Intelligence-Business-and-Civilization-Our-Fate-Made-in-Machines/Kaplan/p/book/9781032155319](https://www.routledge.com/Artificial-Intelligence-Business-and-Civilization-Our-Fate-Made-in-Machines/Kaplan/p/book/9781032155319) Artificial Intelligence, Business and Civilization: Our Fate Made in Machines]. Routledge</ref> यह कार्य "सीखने" और "समस्या हल करने" को एक साथ जोड़ती है। {{sfn|Russell|Norvig|2009|p=2}} कृत्रिम बुद्धि (प्रज्ञाकल्प, कृत्रिमप्रज्ञा, कृतकधी) [[कंप्यूटर|संगणक]] में दी गई बुद्धि है। मानव सोचने, जाँच करने व याद रखने का काम भी अपने दिमाग के स्थान पर [[कंप्यूटर|कम्प्यूटर]] से कराना चाहता है।<ref>{{Cite web|url=[https://app.stocks.news/news/ai-worries-heighten-as-kerrisdale-plays-hindenburg-with-smoke-and-mirror-lumen-tech-allegations|title=AI](https://app.stocks.news/news/ai-worries-heighten-as-kerrisdale-plays-hindenburg-with-smoke-and-mirror-lumen-tech-allegations|title=AI) Worries Heighten As Kerrisdale Plays "Hindenburg" With Smoke and Mirror Lumen Tech Allegations...|website=app.stocks.news}}</ref> AI यानी '''Artificial Intelligence (कृत्रिम बुद्धिमत्ता)''' एक ऐसी तकनीक है जिसमें मशीनों और कंप्यूटर सिस्टम्स को मानव की तरह '''सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता''' दी जाती है। इसे सरल शब्दों में कहें तो, AI मशीनों को “स्मार्ट” बनाने की कला है ताकि वे इंसानों की तरह काम कर सकें।<ref>{{Cite web|url=https://vittiyasaksharta.in/ai-kya-hai-aur-iske-prakar/|title=AI क्या है और इसके प्रकार - वित्तीय साक्षरता}}</ref> {{कृत्रिम बुद्धिमत्ता}} [https://www.palamsolutions.com/category/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b2-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8/ कृत्रिम बुद्धि], [[कंप्यूटर विज्ञान]] की एक शाखा है जो मशीनों और सॉफ्टवेयर को बुद्धि के साथ विकसित करता है। 1955 में जॉन मैकार्थी ने इसको कृत्रिम बुद्धि का नाम दिया और इसे "विज्ञान और इंजीनियरिंग के द्वारा बुद्धिमान मशीनों को बनाने" के रूप परिभाषित किया। कृत्रिम बुद्धि अनुसंधान के लक्ष्यों में तर्क, ज्ञान की योजना बनाना, सीखना, धारण करना और वस्तुओं में हेरफेर करने की क्षमता, आदि शामिल हैं। वर्तमान में, इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सांख्यिकीय विधियों, कम्प्यूटेशनल बुद्धि और पारंपरिक खुफिया तकनीकी शामिल हैं। कृत्रिम बुद्धि को लेकर दावा किया जाता है कि यह मानव की बुद्धि का एक केंद्रीय संपत्ति के रूप में मशीन द्वारा अनुकरण कर सकता है। वहाँ दार्शनिक मुद्दों के प्राणी बनाने की नैतिकता के बारे में प्रश्न् उठाए गए थे। लेकिन आज, यह प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा बन गया है। कृत्रिम बुद्धि (एआई) का दायरा विवादित है: क्योंकि मशीनें तेजी से सक्षम हो रहीं हैं, जिन कार्यों के लिए पहले मानव की बुद्धिमत्ता चाहिए थी, अब वह कार्य "कृत्रिम बुद्धिमत्ता" के दायरे में आते हैं। उद्धाहरण के लिए, लिखे हुए शब्दों को पहचानने में अब मशीन इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि इसे अब होशियारी नहीं माना जाता है।<ref>{{cite magazine |last=Schank |first=Roger C. |title=Where's the AI |url=https://archive.org/details/sim_ai-magazine_winter-1991_12_4/page/38 |magazine=AI magazine |volume=12 |issue=4 |year=1991|p=38}}</ref> आज कल, एआई के दायरे में आने वाले कार्य हैं, इंसानी वाणी को समझना {{sfn|Russell|Norvig|2009}}, शतरंज या "गो"<ref name="bbc-alphago"/> के खेल में माहिर इंसानों से भी जीतना, बिना इंसानी सहारे के गाड़ी खुद चलाना। कृत्रिम बुद्धि का वैज्ञानिकों ने सन १९५६ में अध्ययन करना चालू किया। इसके इतिहास में कई आशावादी लहरें आती रही, फिर असफलता से निराशा, और फिर नए तरीके जो फिर आशा जगाते थे।<ref name="Optimism of early AI"/><ref name="AI in the 80s"/><ref name="AI in 2000s"/> अपने अधिकांश इतिहास के लिए, एआई अनुसंधान को उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जो अक्सर एक-दूसरे के साथ संवाद करने में विफल रहते हैं।<ref name="Fragmentation of AI"/> ये उप-क्षेत्र तकनीकी विचारों पर आधारित हैं, जैसे कि विशेष लक्ष्यों (जैसे "रोबोटिक्स" या "[[यंत्र शिक्षण|मशीन लर्निंग]]"),<ref name="Problems of AI"/> विशेष उपकरण ("तर्क" या "तंत्रिका नेटवर्क"), या गहरे तात्विक अंतर।<ref name="Biological intelligence vs. intelligence in general"/><ref name="Neats vs. scruffies"/><ref name="Symbolic vs. sub-symbolic"/> उप-क्षेत्र सामाजिक कारकों पर भी आधारित हैं (जैसे निजी संस्थानों या निजी शोधकर्ताओं के काम)।<ref name="Fragmentation of AI"/> एआई अनुसंधान की पारंपरिक समस्याओं (या लक्ष्यों) में तर्क , ज्ञान प्रतिनिधित्व , योजना , सीखना , भाषा समझना , धारणा और वस्तुओं को कुशलतापूर्वक उपयोग करने की क्षमता शामिल है। मानव जैसे होशियारी क्षेत्र के दीर्घकालिक लक्ष्यों में से एक है। इस समस्या का हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने सांख्यिकीय (स्टैटिस्टिकल) तरीके, और पारम्परिक "सांकेतिक" तरीके अपनाए हैं। एआई विज्ञान के लिए कंप्यूटर विज्ञान , गणित , मनोविज्ञान , भाषाविज्ञान , तत्वविज्ञान और कई अन्य के क्षेत्र गए हैं। इस वैज्ञानिक क्षेत्र को इस धारणा पर स्थापना की गई थी कि मानवीय बुध्दि को "इतने सटीक रूप से वर्णित किया जा सकता है कि इसे नकल करने के लिए एक मशीन बनाई जा सकती है"।<ref> [[Dartmouth Workshop|Dartmouth proposal]] देखे, [[कृत्रिम बुद्धि#Philosophy|Philosophy]] के निचे</ref>  यह मन की प्रकृति और मानव-जैसी बुद्धि के साथ कृत्रिम प्राणियों के निर्माण के नैतिकता के बारे में प्रश्न उठाता है, जो प्राचीन काल से कथाओं के द्वारा खोजे गए हैं।<ref name="McCorduck's thesis"/>  कुछ लोग कृत्रिम बुद्धि (एआई) को मानवता के लिए खतरा मानते हैं, अगर यह अनावश्यक रूप से प्रगति करता है।<ref>{{cite web|url=https://betanews.com/2016/10/21/artificial-intelligence-stephen-hawking/|title=Stephen Hawking believes AI could be mankind's last accomplishment|date=21 October 2016|website=BetaNews|url-status=live|archiveurl=https://web.archive.org/web/20170828183930/https://betanews.com/2016/10/21/artificial-intelligence-stephen-hawking/|archivedate=28 August 2017|df=dmy-all}}</ref> अन्य मानते हैं कि एआई, पिछले तकनीकी क्रांति के विपरीत, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी का खतरा पैदा करेगा।<ref name="guardian jobs debate"/> == इतिहास == यांत्रिक या "औपचारिक" तर्क का अध्ययन गणितज्ञों के साथ प्राचीन काल में शुरू हुआ। गणितीयतर्क के अध्ययन ने "एलन ट्यूरिंग" (जो एक कंप्यूटर वैज्ञानिक थे) के "कंप्यूटर सिद्धांत" का जन्म दिया। इस सिद्धांत का मानना है की मशीन, "०" और "१" जैसे सरल चिह्न, को जोड़-तोड़ के कोई भी बोधगम्य गणना कर सकते हैं। वह यह भी कहता है की आज के साधारण कंप्यूटर ऐसे मशीन हैं। यह दृष्टि, कि कंप्यूटर औपचारिक तर्क की किसी भी प्रक्रिया को अनुकरण कर सकते हैं, जिसे चर्च-ट्यूरिंग थीसिस के नाम से जाना जाता है। न्यूरोबायोलॉजी (दिमाग का जीवविज्ञान), सूचना का विज्ञानं और साइबरनेटिक में खोजों ने शोधकर्ताओं को इलेक्ट्रॉनिक मस्तिष्क बनाने की संभावना पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। ट्यूरिंग (एक कंप्यूटर वैज्ञानिक) ने प्रस्तावित किया कि "यदि कोई मनुष्य मशीन और मानव से प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर नहीं कर सकता है, तो मशीन को "मानव की तरह बुद्धिमान" माना जा सकता है। पहला काम जिसे आम तौर पर एआई के रूप में पहचाना जाता है वह "मैकुलचच" और "पिट्स" के 1943 औपचारिक डिजाइन "ट्यूरिंग-पूर्ण" "कृत्रिम न्यूरॉन्स" के लिए था। एक "ट्यूरिंग-पूर्ण" मशीन कोई भी बोधगम्य गणना कर सकते हैं। 1950 के दशक तक, मशीनी बुद्धिमत्ता को कैसे प्राप्त किया जाए, इसके लिए दो दृष्टिकोण सामने आए। एक दृष्टि, जिसे प्रतीकात्मक AI या GOFAI {{Citation needed}} के रूप में जाना जाता है , कंप्यूटर का उपयोग दुनिया और सिस्टम का एक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व बनाने के लिए करना था जो दुनिया के बारे में तर्क कर सके। समर्थकों में एलन नेवेल , हर्बर्ट ए साइमन और मार्विन मिन्स्की शामिल थे । इस दृष्टिकोण के साथ निकटता से जुड़ा "अनुमानी खोज" दृष्टिकोण था, जिसने बुद्धिमत्ता की तुलना उत्तर के लिए संभावनाओं के स्थान की खोज की समस्या से की। दूसरी दृष्टि, जिसे कनेक्शनवादी दृष्टिकोण के रूप में जाना जाता है , ने सीखने के माध्यम से बुद्धि प्राप्त करने की मांग की। इस दृष्टिकोण के समर्थक, सबसे प्रमुख रूप से फ्रैंक रोसेनब्लैट, न्यूरॉन्स के कनेक्शन से प्रेरित तरीकों से परसेप्ट्रॉन को जोड़ने की मांग की । जेम्स मन्यिका और अन्य ने दिमाग (प्रतीकात्मक एआई) और मस्तिष्क (कनेक्शनिस्ट) के दो दृष्टिकोणों की तुलना की है। मन्यिका का तर्क है कि डेसकार्टे , बूले , गॉटलोब फ्रेगे , बर्ट्रेंड रसेल और अन्य की बौद्धिक परंपराओं के संबंध में इस अवधि में प्रतीकात्मक दृष्टिकोण कृत्रिम बुद्धि के लिए महत्वपूर्ण रही। साइबरनेटिक्स या कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क<ref>{{Cite web|url=https://www.employmentjapan.com/tech-corner/ai-machine-learning-and-deep-learning/building-the-simplest-deep-neural-net-in-javascript/|title=Building the Simplest Deep Neural Net in JavaScript|last=Achu|first=Somto|last2=Achu|first2=Somto|date=2022-04-10|website=Employment Japan|language=en-US|access-date=2022-07-15|archive-date=15 जुलाई 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220715025542/https://www.employmentjapan.com/tech-corner/ai-machine-learning-and-deep-learning/building-the-simplest-deep-neural-net-in-javascript/|url-status=dead}}</ref> पर आधारित सम्बन्धवादी दृष्टिकोण को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था, लेकिन हाल के दशकों में नई प्रमुखता प्राप्त हुई है। भले की मशीनों के बुद्धि विकसित के शोध का शुरूआत 1943 हुआ हो लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता शब्द का पहली बार इस्तेमाल जॉन मैकार्थी ने ही 1956 में [[:en:Dartmouth workshop]] किया था और कहा था कि विज्ञान और अभियांत्रिकी का इस्तेमाल करके एक ऐसा कंप्यूटर बनाया जा सकता है जो कि स्वयं से ही सोच समझकर निर्णय ले सकें इसलिए हम john McCarthy को ही Artificial Intelligence के पिता के रूप में जानते है == कटौती, तर्क और समस्या को सुलझाने == पहले, कृत्रिम बुद्धि शोधकर्ताओं ने ऐसा एल्गोरिदम विकसित किया जो मनुष्य को हल करते समय उपयोग या तार्किक निर्णय लेने के लिए उपयोग करते थे। वे अनिश्चित या अधूरी जानकारी के साथ संभावना का संकल्पना निपटते है। == ज्ञान प्रतिनिधित्व == समस्याओं का हल करते समय, मशीनों को दुनिया के बारे में व्यापक ज्ञान की आवश्यकता होगी। कृत्रिम बुद्धि को प्रतिनिधित्व करने के लिए जरूरत कि चीजों है: वस्तुओं, गुण, श्रेणियों, समाधान, घटनाओं, समय, कारण और प्रभाव के बीच संबंधों और आदि। == प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण == प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण सबसे तेज़ गति से विकास करने वाले AI क्षेत्रों में से एक है। प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण में भाषा-संबंधी AI एप्लिकेशन के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाता हैं, जैसे वॉयस असिस्टेंट, चैटबॉट और भाषा अनुवाद (Language Translation)। वॉयस-टू-टेक्स्ट समझ को सक्षम करके, मानव-कंप्यूटर इंटरैक्शन को बढ़ाया जा सकता हैं। == उपकरण == === तर्क === तर्क, मुख्य रूप से ज्ञान प्रतिनिधित्व और समस्या को हल करने के लिए उपयोग किया जाता है। लेकिन यह अन्य समस्याओं के लिए भी किया जा सकता है। तर्क के कई अलग अलग रूपों एस कृत्रिम बुद्धि अनुसंधान में किया जाता है। तर्क के सहायता से हमको निर्णय कर सकते हैं कि क्या सही है या क्या गलत है। === अनिश्चित तर्क के लिए संभाव्य तरीकों === समस्याओं के अधिकांश यहाँ अनिश्चित और अधूरी जानकारी है। कृत्रिम बुद्धि शोधकर्ताओं संभाव्यता सिद्धांत और अर्थशास्त्र से विधियों का उपयोग कर इन समस्याओं को हल करने के लिए शक्तिशाली उपकरण की एक संख्या तैयार कर लिया है। संभाव्यता एल्गोरिदम को छानने और डेटा की भविष्यवाणी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता। == AI टेक्नोलॉजी के अनुप्रयोग== <ref>{{cite web | url=https://artificial-future.com | title=distructive nature of Artificial intelligence | access-date=16 जून 2020 | archive-url=https://web.archive.org/web/20181227011528/http://artificial-future.com/ | archive-date=27 दिसंबर 2018 | url-status=dead }}</ref> आज के तकनीकी दौर में जहां मशीनें कई व्यवसायों में अपनी सेवाएं दे रहीं हैं वहीं AI टेक्नोलॉजी भी अब कुछ सीमित इंडस्ट्रीज से निकलकर कई अन्य महत्वपूर्ण इंडस्ट्रीज में प्रयोग की जाने लगी है। कुछ वर्षों पहले तक AI टेक्नोलॉजी को कंप्यूटर तथा इससे जुड़ी सेवाओं तक ही सीमित माना जाता था, परंतु वर्तमान समय में AI टेक्नोलॉजी का विस्तार अन्य कई इंडस्ट्रीज में भी देखने को मिल रहा है। आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग शिक्षा, ग्राहक सेवा, मनोरंजन, ऑटोमोबाइल और इसके साथ ही साथ परिवहन व संचार के क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है। आने वाले समय में इस तकनीकी का प्रयोग बड़े पैमाने पर दूसरी इंडस्ट्रीज में भी होने की अटूट संभावना है। इस कारण से [https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html AI टेक्नोलॉजी से संबंधित कंपनियों] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20250825222718/https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html |date=25 अगस्त 2025 }} को बड़े पैमाने पर फ़ायदे की उम्मीद भी है। इसका एक उदाहरण Neuralink द्वारा इंसानी दिमाग में एक चिपसेट को इंप्लांट किया जाना है। हाल ही में एलन मस्क की कंपनी neuralink ने पहली बार इंसानी दिमाग में एआई चिपसेट को इंप्लांट किया है।<ref>{{Cite web|url=https://aipur.in/elon-musk-will-implant-a-chip-in-the-human-brain-using-telepathy-technology/|title=एलन मस्क 2030 तक 22000 इंसानों के दिमाग में लगाएंगे चिप, टेलीपैथी तकनीक से दिव्यांगो को मिलेगा फायदा|last=Saran|first=Bhanu|date=4/02/2024|website=Aipur|access-date=1 अप्रैल 2024|archive-date=1 अप्रैल 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240401151943/https://aipur.in/elon-musk-will-implant-a-chip-in-the-human-brain-using-telepathy-technology/|url-status=dead}}</ref> कंपनी ने इस चिपसेट का नाम टेलीपैथी रखा है, जो दिव्यांगों के लिए काफी उपयोगी होने वाली है, क्योंकि इस टेलीपैथी चिपसेट की मदद से विकलांग लोग अपने दिमाग से ही बिना कंप्यूटर और स्मार्टफोन को छुए कंट्रोल कर पाएंगे। साथ ही [[एलन मस्क]] का कहना है कि उनकी कंपनी 2030 तक 22000 से अधिक विकलांग लोगों के दिमाग में यह चिपसेट लगाकर उनकी मदद की करेगी। == रचनात्मकता == कृत्रिम बुद्धि की एक उप-क्षेत्र के सैद्धांतिक रूप से (एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक नजरिए से) रचनात्मकता दोनों पता लगाता है और व्यावहारिक रूप से (द्वारा उत्पन्न उत्पादन रचनात्मक माना जा सकता है कि सिस्टम, या सिस्टम है कि पहचानने और रचनात्मकता का आकलन के implementations विशिष्ट)। कम्प्यूटेशनल रिसर्च के संबंधित क्षेत्रों कृत्रिम अंतर्ज्ञान और कृत्रिम सोच रहे हैं। == सामान्य बुद्धि == शोधकर्ताओं व उनके काम: एक मशीन में सामान्य बुद्धि के साथ (मजबूत एअर इंडिया के रूप में जाना जाता है), शामिल किया जाएगा कि लगता है सब से ऊपर कौशल और मानवीय क्षमताओं में सबसे अधिक से अधिक के या उन सभी के संयोजन। कुछ विश्वास है कि कृत्रिम चेतना या एक कृत्रिम मस्तिष्क की तरह मानवाकृतीय सुविधाएँ ऐसी एक परियोजना के लिए आवश्यकता हो सकती। उपरोक्त समस्याओं के कई विचार किया जा करने के लिए सामान्य बुद्धि की आवश्यकता हो सकता हल हो। उदाहरण के लिए, यहां तक कि मशीनी अनुवाद की तरह एक सीधा, विशिष्ट कार्य मशीन पढ़ा और (एनएलपी) दोनों भाषाओं में लिखने, लेखक का तर्क (कारण) का पालन करें, पता है क्या (ज्ञान) के बारे में बात की जा रही है कि और सच्चाई से लेखक का इरादा (सामाजिक बुद्धि) को पुन: उत्पन्न की आवश्यकता है। मशीनी अनुवाद की तरह एक समस्या "ऐ-पूर्ण" माना जाता है। इस विशेष समस्या को हल करने के लिए, आप सभी समस्याओं को हल करना चाहिए। == AI सुरक्षा (AI Security) == === परिभाषा === एआई सुरक्षा वह शाखा है जो एआई-सिस्टम्स, उनके प्रशिक्षण डेटा, मॉडल तथा समर्थन इंफ्रास्ट्रक्चर को विभिन्न प्रकार के खतरों और कमजोरियों से सुरक्षित रखने का कार्य करती है। === प्रमुख खतरें एवं चुनौतियाँ === * '''डेटा पॉइज़निंग''' – जब प्रशिक्षण डेटा में दुर्भावनापूर्ण या ग़लत डेटा शामिल कर दिया जाता है, जिससे मॉडल गलत या हानिकारक निर्णय लेने लगे। * '''मॉडल इनवर्ज़न आक्रमण''' – मॉडल के आउटपुट के आधार पर हमलावर प्रशिक्षण डेटा या संवेदनशील जानकारी का उजागर कर सकते हैं। * '''प्रतिस्पर्धात्मक (एडवर्सेरियल) आक्रमण''' – मॉडल को ऐसे इनपुट दिए जाते हैं जिनसे वह गलत या मनचाहा आउटपुट देने लगे। * '''प्रॉम्प्ट इंजेक्शन''' – विशेष रूप से लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) में इनपुट के माध्यम से मॉडल को गैर-इच्छित क्रियाएँ करने के लिए प्रेरित करना।<ref>[https://www.modernsecurity.io/pages/blog?p=prompt-injection-llm-security-risk Modern Security – “Prompt Injection: LLM Security Risk”] — लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) में प्रॉम्प्ट इंजेक्शन से उत्पन्न सुरक्षा खतरों का विश्लेषण (प्रवेश तिथि: 10 अक्टूबर 2025)।</ref> === सुरक्षा प्रमुख बिंदु एवं उपाय === * '''गोपनीयता, अखंडता, उपलब्धता (CIA) त्रय''' – एआई प्रणाली में इन तीन मौलिक सुरक्षा गुणों को सुनिश्चित करना आवश्यक है। * '''निरंतर निगरानी एवं जोखिम आकलन''' – मॉडल और उसके परिवेश में समय-समय पर सुरक्षा परीक्षण, मॉनिटरिंग और आकलन जरूरी है। * '''की पहुँच नियंत्रण और एन्क्रिप्शन''' – प्रशिक्षण डेटा, मॉडल व आउटपुट तक पहुँच को सीमित करना तथा डेटा ट्रांसमिशन और संग्रहण में एन्क्रिप्शन उपयोग करना।<ref>[https://www.netskope.com/security-defined/what-is-ai-security What is AI Security? - Netskope] — एआई संसाधनों की सुरक्षा के लिए एन्क्रिप्शन व पहुँच नियंत्रण।</ref> * '''देरी-रहित प्रतिक्रिया (Incident Response)''' – एआई द्वारा उत्पन्न या प्रभावित घटना के लिए त्वरित प्रतिक्रिया योजनाएँ व स्वचालित नियंत्रण। === एआई सुरक्षा का अनुप्रयोग क्षेत्र === एआई सुरक्षा व्यापक रूप से नीचे-लिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: * वित्तीय सेवाएँ — धोखाधड़ी पहचान, जोखिम आकलन तथा लेन-देह सुरक्षा। * स्वास्थ्य सेवा — रोग निदान मॉडल्स, रोग-सम्बंधित डेटा तथा गोपनीयता। * आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) — स्मार्ट ग्रिड्स, IoT उपकरण तथा संवेदनशील सिस्टम्स। * रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र — स्वायत्त प्रणालियाँ, ड्रोन और निर्णय-सहायक प्रणाली।<ref>[https://www.modernsecurity.io/courses/ai-security-certification AI Security Certification – Modern Security] — एआई/एलएलएम सुरक्षा, वास्तविक-विश्व आक्रमण और संरक्षण तकनीकों से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (प्रवेश तिथि: 27 अक्टूबर 2025)।</ref> === उभरते रुझान === एआई सुरक्षा में हाल-ही में निम्नलिखित प्रमुख रुझान देखे जा रहे हैं: * एजेंटिक एआई और स्वायत्त हमलावर उपकरणों-पर आधारित खतरे।<ref>[https://www.modernsecurity.io/pages/blog?p=how-has-generative-ai-affected-security Modern Security – “How Has Generative AI Affected Security?”] — जनरेटिव एआई के सुरक्षा पर प्रभाव का ब्लॉग (प्रवेश तिथि: 27 अक्टूबर 2025)।</ref> * एआई जीवन-चक्र (डेटा → मॉडल → तैनाती → उपयोग) को सुरक्षित रखने के लिए समग्र सुरक्षा फ्रेमवर्क।<ref>[https://safety.google/intl/en_in/safety/saif/ Google Secure AI Framework (SAIF)] — पूरी एआई लाइफ-साइकल को सुरक्षित बनाने के लिए।</ref> * नियामक, नैतिकता एवं जवाबदेही — एआई के निर्णय, पूर्वाग्रह व पारदर्शिता द्वारा सुरक्षा जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। == कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग की संभावनाएँ == कुछ अर्थशास्त्री वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता की लहर की उत्पादनक्षमता और आर्थिक वृद्धि बढ़ाने की क्षमता के बारे में आशावादी हैं। विशेष रूप से, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री एरिक ब्रिन्योल्फ़सन ने एक श्रृंखला लेखों में "AI द्वारा संचालित उत्पादकता बूम"<ref>{{Cite web|title=Erik Brynjolfsson - Exclusive Speaker & Advisor|url=https://sternstrategy.com/speakers/erik-brynjolfsson/|access-date=2026-01-18|work=sternstrategy.com}}</ref> और "आगामी उत्पादकता बूम" का वर्णन किया। वहीं दूसरी ओर, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री रॉबर्ट गॉर्डन जैसे अन्य अधिक निराशावादी बने हुए हैं । ब्रिन्योल्फ़सन और गॉर्डन ने 2020 के दशक में उत्पादकता वृद्धि की दरों पर 'दीर्घकालिक दांव' के रूप में दर्ज एक औपचारिक बेट (पारि) लगाया, जिसे दशक के अंत तक निपटाने का निर्णय होना है।<ref>{{Cite web|title=Private Nonfarm business productivity growth will average over 1.8 percent per year from the first quarter (Q1) of 2020 to the last quarter of 2029 (Q4)|url=https://longbets.org/868/|access-date=2026-01-18|work=longbets.org}}</ref><ref>{{Cite web|title=Economists are betting on an AI productivity boom|url=https://www.marketplace.org/story/2025/03/20/economists-are-betting-on-an-ai-productivity-boom|access-date=2026-01-18|work=www.marketplace.org}}</ref> विभिन्न उद्योगों में जनरेटिव एआई उपकरण AI बूम के कारण व्यापक रूप से उपलब्ध होते जा रहे हैं और विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार में इनका उपयोग बढ़ रहा है। मुख्य उपयोग क्षेत्र — डेटा विश्लेषण है। मशीन लर्निंग, जिसे क्रमिक परिवर्तन माना जाता है, उद्योग के प्रदर्शन को बेहतर बना रही है। कंपनियां बताती हैं कि एआई प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ाने, निर्णय लेने में सुधार करने और मौजूदा सेवाओं व उत्पादों को मजबूत करने में सबसे अधिक सहायक है।<ref>{{Cite web|title=How AI decision-making improves business outcomes|url=https://lumenalta.com/insights/how-ai-decision-making-improves-business-outcomes|access-date=2026-01-18|work=lumenalta.com}}</ref><ref>{{Cite web|title=Advantages and challenges of AI in companies|url=https://www.esade.edu/beyond/en/advantages-and-challenges-of-ai-in-companies/|access-date=2026-01-18|work=www.esade.edu}}</ref> एआई के कार्यान्वयन के कारण पहले ही विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में राजस्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कंपनियों ने राजस्व में 16% तक की वृद्धि दर्ज की है, मुख्यतः उत्पादन, जोखिम प्रबंधन और अनुसंधान व विकास में। अचल संपत्ति के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तकनीकों का पहले से ही प्रभावी उपयोग भविष्य के पेशेवरों की तैयारी के लिए किया जा रहा है। कुछ रियल एस्टेट सॉफ्टवेयर उत्पाद डिजिटल मार्केटिंग और एआई तकनीकों के उपयोग के लिए एक अनूठा दृष्टिकोण पेश करते हैं। ये प्लेटफ़ॉर्म एआइ द्वारा उत्पन्न डेटा-आधारित विश्लेषणात्मक निष्कर्ष प्रदान करते हैं, जो रियल एस्टेट पेशेवरों को उनके काम में सफलता पाने में मदद करते हैं।<ref>{{Cite web|title=AI analyst for CRE & PE|url=https://leni.co/news/unlocking-the-potential-of-ai-in-commercial-real-estate-a-guide-for-real-estate-professionals/|access-date=2026-01-18|work=leni.co}}</ref> AI और जनरेटिव AI में निवेश बूम के साथ बढ़ा है — 2014 में 18 अरब डॉलर से बढ़कर 2021 में 119 अरब डॉलर हो गया।<ref>{{Cite web|title=AI Bubble Analysis: Is 2025 the New Dot-Com Era?|url=https://tekta.ai/insights/ai-bubble-dotcom-comparison-economy-media-2025|access-date=2026-01-18|work=tekta.ai}}</ref> सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि 2023 में जनरेटिव एआई में निवेश का हिस्सा लगभग 30% था।<ref>{{Cite web|title=Worldwide investment in startups & scaleups using AI vs Generative AI|url=https://datawrapper.dwcdn.net/PgFO7/7/|access-date=2026-01-18|work=datawrapper.dwcdn.net}}</ref> इसके अतिरिक्त, जनरेटिव एआई व्यवसाय में बड़े पैमाने पर वेंचर निवेश किया गया है, भले ही नियामक और आर्थिक परिदृश्य अनिश्चित बने हुए हों।<ref>{{Cite web|title=Jasper AI: A Dilemma of a Thin Wrapper|url=https://www.turingpost.com/p/jasperai|access-date=2026-01-18|work=www.turingpost.com}}</ref> टेक्नॉलॉजी दिग्गज एआई से अधिकतर राजस्व प्राप्त कर रहे हैं और व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं तथा अन्य व्यवसायों के लिए बड़े प्रदाता या ग्राहक के रूप में कार्य कर रहे हैं। एआई के परिनियोजन के साथ व्यवसाय में उत्पादन में घातीय वृद्धि देखी जा रही है।<ref>{{Cite web|title=The Artificial Intelligence (AI) Effect on Business|url=https://enterprisegrowth.com/resources/blog/artificial-intelligence-ai-effect-business|access-date=2026-01-18|work=enterprisegrowth.com}}</ref> अपेक्षा है कि कर्मचारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों का उपयोग करके अपनी उत्पादकता बढ़ा सकेंगे। चूँकि कई छोटे उद्यम एआई का उपयोग नहीं कर रहे हैं, माना जाता है कि यदि और अधिक व्यवसाय इसे अपनाते हैं तो कार्य संरचना पूरी तरह बदल सकती है, क्योंकि कई कार्य एआई द्वारा स्वचालित कर दिए जाएंगे। == इन्हें भी देखें == *[[क्वांटम कम्प्यूटिंग|प्रमात्रा संगणन (क्वांटम कंप्यूटिंग)]] *[https://parikchha.blogspot.com/2026/04/artificial-intelligence-kya-hai.html AI का भविष्य] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * कृत्रिम बुद्धिमत्ता [https://tajakhabar.travelnaturalindia.com/index.php/2024/01/01/artificial-intelligence-courses/ पाठ्यक्रम] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20240118041129/https://tajakhabar.travelnaturalindia.com/index.php/2024/01/01/artificial-intelligence-courses/ |date=18 जनवरी 2024 }} * {{IEP|इंटरनेट दार्शनिक विश्वकोश|कृत्रिम बुद्धिमत्ता}} * {{cite SEP |url-id=logic-ai |title=तर्कशास्त्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता |last=थोमसन |first=रिचमंड}} * [https://www.bbc.co.uk/programmes/p003k9fc कृत्रिम बुद्धिमत्ता]. बीबीसी रेडियो ४ पर जॉन एगर, एलिसन ऐडम तथा इगोर अलेक्ज़ैण्डर के साथ परिचर्चा (इन आवर टाइम, ८ दिसम्बर २००५ ई॰ / मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष, संवत् २०६२)। * [https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सम्बद्ध शेयर्स — २०२४ में श्रेष्ठ ए॰आई॰ निवेश विकल्प। में बेहतरीन AI शेयर्स] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20250825222718/https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html |date=25 अगस्त 2025 }} [[श्रेणी:कृत्रिम बुद्धिमत्ता]] [[श्रेणी:साइबरनेटिक्स]] [[श्रेणी:रूपबद्ध विज्ञान]] [[श्रेणी:समाज में प्रौद्योगिकी]] [[श्रेणी:बोध]] njwj5w3nlik8iobf3aox85aq52av4fc 6543651 6543638 2026-04-24T15:30:49Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Iamtaptwice|Iamtaptwice]] ([[सदस्य वार्ता:Iamtaptwice|वार्ता]]) के अवतरण 6538211 पर पुनर्स्थापित : प्रचार हटाया 6543651 wikitext text/x-wiki {{खराब अनुवाद}} {{लम्बा}} [[File:Kismet robot at MIT Museum.jpg|thumb|200px|कृत्रिम बुद्धि से बना [[रोबोट]]]] '''कृत्रिम बुद्धिमत्ता''' अथवा '''कृत्रिम बुद्धि''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: Artificial Intelligence; संक्षेप में: '''AI''', '''एआई''', '''कृ॰बु॰''') मानव और अन्य जन्तुओं द्वारा प्रदर्शित प्राकृतिक बुद्धि के विपरीत मशीनों द्वारा प्रदर्शित बुद्धि है। [[कम्प्यूटर विज्ञान|कंप्यूटर विज्ञान]] में कृत्रिम बुद्धि के शोध को "इंटेलिजेंट एजेंट" का अध्ययन माना जाता है। इंटेलिजेंट एजेंट एक ऐसा सयंत्र है जो अपने आस-पास के माहौल को देखकर, अपने लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करता है। इसके लिए आम बोलचाल की भाषा में, "कृत्रिम बुद्धि" शब्द का प्रयोग होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए एक मशीन इंसानों के "सोचने-समझने" वाले कामों की नकल करती है। [[एंड्रियास कपलान]] और माइकल हाएनलेन कृत्रिम बुद्धिमत्ता को “किसी प्रणाली के द्वारा बाहरी जानकारी को सही ढंग से समझने, ऐसे जानकारी से खुद सीखने और आसान बदलाव के माध्यम से खास लक्ष्यों और कामों को पूरा करने में उन सीखी हुई चीजों का उपयोग करने की क्षमता” के रूप में परिभाषित करते हैं।<ref>{{Cite web |url=[https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393](https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393) |title=Andreas Kaplan; Michael Haenlein (2018) Siri, Siri in my Hand, who's the Fairest in the Land? On the Interpretations, Illustrations and Implications of Artificial Intelligence, Business Horizons, 62(1) |access-date=17 नवंबर 2018 |archive-url=[https://web.archive.org/web/20181121191205/https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393](https://web.archive.org/web/20181121191205/https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0007681318301393) |archive-date=21 नवंबर 2018 |url-status=live }}</ref><ref>[[एंड्रियास कपलान|Andreas Kaplan]] (2022). [[https://www.routledge.com/Artificial-Intelligence-Business-and-Civilization-Our-Fate-Made-in-Machines/Kaplan/p/book/9781032155319](https://www.routledge.com/Artificial-Intelligence-Business-and-Civilization-Our-Fate-Made-in-Machines/Kaplan/p/book/9781032155319) Artificial Intelligence, Business and Civilization: Our Fate Made in Machines]. Routledge</ref> यह कार्य "सीखने" और "समस्या हल करने" को एक साथ जोड़ती है। {{sfn|Russell|Norvig|2009|p=2}} कृत्रिम बुद्धि (प्रज्ञाकल्प, कृत्रिमप्रज्ञा, कृतकधी) [[कंप्यूटर|संगणक]] में दी गई बुद्धि है। मानव सोचने, जाँच करने व याद रखने का काम भी अपने दिमाग के स्थान पर [[कंप्यूटर|कम्प्यूटर]] से कराना चाहता है।<ref>{{Cite web|url=[https://app.stocks.news/news/ai-worries-heighten-as-kerrisdale-plays-hindenburg-with-smoke-and-mirror-lumen-tech-allegations|title=AI](https://app.stocks.news/news/ai-worries-heighten-as-kerrisdale-plays-hindenburg-with-smoke-and-mirror-lumen-tech-allegations|title=AI) Worries Heighten As Kerrisdale Plays "Hindenburg" With Smoke and Mirror Lumen Tech Allegations...|website=app.stocks.news}}</ref> AI यानी '''Artificial Intelligence (कृत्रिम बुद्धिमत्ता)''' एक ऐसी तकनीक है जिसमें मशीनों और कंप्यूटर सिस्टम्स को मानव की तरह '''सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता''' दी जाती है। इसे सरल शब्दों में कहें तो, AI मशीनों को “स्मार्ट” बनाने की कला है ताकि वे इंसानों की तरह काम कर सकें।<ref>{{Cite web|url=https://vittiyasaksharta.in/ai-kya-hai-aur-iske-prakar/|title=AI क्या है और इसके प्रकार - वित्तीय साक्षरता}}</ref> {{कृत्रिम बुद्धिमत्ता}} [https://www.palamsolutions.com/category/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b2-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8/ कृत्रिम बुद्धि], [[कंप्यूटर विज्ञान]] की एक शाखा है जो मशीनों और सॉफ्टवेयर को बुद्धि के साथ विकसित करता है। 1955 में जॉन मैकार्थी ने इसको कृत्रिम बुद्धि का नाम दिया और इसे "विज्ञान और इंजीनियरिंग के द्वारा बुद्धिमान मशीनों को बनाने" के रूप परिभाषित किया। कृत्रिम बुद्धि अनुसंधान के लक्ष्यों में तर्क, ज्ञान की योजना बनाना, सीखना, धारण करना और वस्तुओं में हेरफेर करने की क्षमता, आदि शामिल हैं। वर्तमान में, इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सांख्यिकीय विधियों, कम्प्यूटेशनल बुद्धि और पारंपरिक खुफिया तकनीकी शामिल हैं। कृत्रिम बुद्धि को लेकर दावा किया जाता है कि यह मानव की बुद्धि का एक केंद्रीय संपत्ति के रूप में मशीन द्वारा अनुकरण कर सकता है। वहाँ दार्शनिक मुद्दों के प्राणी बनाने की नैतिकता के बारे में प्रश्न् उठाए गए थे। लेकिन आज, यह प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा बन गया है। कृत्रिम बुद्धि (एआई) का दायरा विवादित है: क्योंकि मशीनें तेजी से सक्षम हो रहीं हैं, जिन कार्यों के लिए पहले मानव की बुद्धिमत्ता चाहिए थी, अब वह कार्य "कृत्रिम बुद्धिमत्ता" के दायरे में आते हैं। उद्धाहरण के लिए, लिखे हुए शब्दों को पहचानने में अब मशीन इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि इसे अब होशियारी नहीं माना जाता है।<ref>{{cite magazine |last=Schank |first=Roger C. |title=Where's the AI |url=https://archive.org/details/sim_ai-magazine_winter-1991_12_4/page/38 |magazine=AI magazine |volume=12 |issue=4 |year=1991|p=38}}</ref> आज कल, एआई के दायरे में आने वाले कार्य हैं, इंसानी वाणी को समझना {{sfn|Russell|Norvig|2009}}, शतरंज या "गो"<ref name="bbc-alphago"/> के खेल में माहिर इंसानों से भी जीतना, बिना इंसानी सहारे के गाड़ी खुद चलाना। कृत्रिम बुद्धि का वैज्ञानिकों ने सन १९५६ में अध्ययन करना चालू किया। इसके इतिहास में कई आशावादी लहरें आती रही, फिर असफलता से निराशा, और फिर नए तरीके जो फिर आशा जगाते थे।<ref name="Optimism of early AI"/><ref name="AI in the 80s"/><ref name="AI in 2000s"/> अपने अधिकांश इतिहास के लिए, एआई अनुसंधान को उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जो अक्सर एक-दूसरे के साथ संवाद करने में विफल रहते हैं।<ref name="Fragmentation of AI"/> ये उप-क्षेत्र तकनीकी विचारों पर आधारित हैं, जैसे कि विशेष लक्ष्यों (जैसे "रोबोटिक्स" या "[[यंत्र शिक्षण|मशीन लर्निंग]]"),<ref name="Problems of AI"/> विशेष उपकरण ("तर्क" या "तंत्रिका नेटवर्क"), या गहरे तात्विक अंतर।<ref name="Biological intelligence vs. intelligence in general"/><ref name="Neats vs. scruffies"/><ref name="Symbolic vs. sub-symbolic"/> उप-क्षेत्र सामाजिक कारकों पर भी आधारित हैं (जैसे निजी संस्थानों या निजी शोधकर्ताओं के काम)।<ref name="Fragmentation of AI"/> एआई अनुसंधान की पारंपरिक समस्याओं (या लक्ष्यों) में तर्क , ज्ञान प्रतिनिधित्व , योजना , सीखना , भाषा समझना , धारणा और वस्तुओं को कुशलतापूर्वक उपयोग करने की क्षमता शामिल है। मानव जैसे होशियारी क्षेत्र के दीर्घकालिक लक्ष्यों में से एक है। इस समस्या का हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने सांख्यिकीय (स्टैटिस्टिकल) तरीके, और पारम्परिक "सांकेतिक" तरीके अपनाए हैं। एआई विज्ञान के लिए कंप्यूटर विज्ञान , गणित , मनोविज्ञान , भाषाविज्ञान , तत्वविज्ञान और कई अन्य के क्षेत्र गए हैं। इस वैज्ञानिक क्षेत्र को इस धारणा पर स्थापना की गई थी कि मानवीय बुध्दि को "इतने सटीक रूप से वर्णित किया जा सकता है कि इसे नकल करने के लिए एक मशीन बनाई जा सकती है"।<ref> [[Dartmouth Workshop|Dartmouth proposal]] देखे, [[कृत्रिम बुद्धि#Philosophy|Philosophy]] के निचे</ref>  यह मन की प्रकृति और मानव-जैसी बुद्धि के साथ कृत्रिम प्राणियों के निर्माण के नैतिकता के बारे में प्रश्न उठाता है, जो प्राचीन काल से कथाओं के द्वारा खोजे गए हैं।<ref name="McCorduck's thesis"/>  कुछ लोग कृत्रिम बुद्धि (एआई) को मानवता के लिए खतरा मानते हैं, अगर यह अनावश्यक रूप से प्रगति करता है।<ref>{{cite web|url=https://betanews.com/2016/10/21/artificial-intelligence-stephen-hawking/|title=Stephen Hawking believes AI could be mankind's last accomplishment|date=21 October 2016|website=BetaNews|url-status=live|archiveurl=https://web.archive.org/web/20170828183930/https://betanews.com/2016/10/21/artificial-intelligence-stephen-hawking/|archivedate=28 August 2017|df=dmy-all}}</ref> अन्य मानते हैं कि एआई, पिछले तकनीकी क्रांति के विपरीत, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी का खतरा पैदा करेगा।<ref name="guardian jobs debate"/> == इतिहास == यांत्रिक या "औपचारिक" तर्क का अध्ययन गणितज्ञों के साथ प्राचीन काल में शुरू हुआ। गणितीयतर्क के अध्ययन ने "एलन ट्यूरिंग" (जो एक कंप्यूटर वैज्ञानिक थे) के "कंप्यूटर सिद्धांत" का जन्म दिया। इस सिद्धांत का मानना है की मशीन, "०" और "१" जैसे सरल चिह्न, को जोड़-तोड़ के कोई भी बोधगम्य गणना कर सकते हैं। वह यह भी कहता है की आज के साधारण कंप्यूटर ऐसे मशीन हैं। यह दृष्टि, कि कंप्यूटर औपचारिक तर्क की किसी भी प्रक्रिया को अनुकरण कर सकते हैं, जिसे चर्च-ट्यूरिंग थीसिस के नाम से जाना जाता है। न्यूरोबायोलॉजी (दिमाग का जीवविज्ञान), सूचना का विज्ञानं और साइबरनेटिक में खोजों ने शोधकर्ताओं को इलेक्ट्रॉनिक मस्तिष्क बनाने की संभावना पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। ट्यूरिंग (एक कंप्यूटर वैज्ञानिक) ने प्रस्तावित किया कि "यदि कोई मनुष्य मशीन और मानव से प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर नहीं कर सकता है, तो मशीन को "मानव की तरह बुद्धिमान" माना जा सकता है। पहला काम जिसे आम तौर पर एआई के रूप में पहचाना जाता है वह "मैकुलचच" और "पिट्स" के 1943 औपचारिक डिजाइन "ट्यूरिंग-पूर्ण" "कृत्रिम न्यूरॉन्स" के लिए था। एक "ट्यूरिंग-पूर्ण" मशीन कोई भी बोधगम्य गणना कर सकते हैं। 1950 के दशक तक, मशीनी बुद्धिमत्ता को कैसे प्राप्त किया जाए, इसके लिए दो दृष्टिकोण सामने आए। एक दृष्टि, जिसे प्रतीकात्मक AI या GOFAI {{Citation needed}} के रूप में जाना जाता है , कंप्यूटर का उपयोग दुनिया और सिस्टम का एक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व बनाने के लिए करना था जो दुनिया के बारे में तर्क कर सके। समर्थकों में एलन नेवेल , हर्बर्ट ए साइमन और मार्विन मिन्स्की शामिल थे । इस दृष्टिकोण के साथ निकटता से जुड़ा "अनुमानी खोज" दृष्टिकोण था, जिसने बुद्धिमत्ता की तुलना उत्तर के लिए संभावनाओं के स्थान की खोज की समस्या से की। दूसरी दृष्टि, जिसे कनेक्शनवादी दृष्टिकोण के रूप में जाना जाता है , ने सीखने के माध्यम से बुद्धि प्राप्त करने की मांग की। इस दृष्टिकोण के समर्थक, सबसे प्रमुख रूप से फ्रैंक रोसेनब्लैट, न्यूरॉन्स के कनेक्शन से प्रेरित तरीकों से परसेप्ट्रॉन को जोड़ने की मांग की । जेम्स मन्यिका और अन्य ने दिमाग (प्रतीकात्मक एआई) और मस्तिष्क (कनेक्शनिस्ट) के दो दृष्टिकोणों की तुलना की है। मन्यिका का तर्क है कि डेसकार्टे , बूले , गॉटलोब फ्रेगे , बर्ट्रेंड रसेल और अन्य की बौद्धिक परंपराओं के संबंध में इस अवधि में प्रतीकात्मक दृष्टिकोण कृत्रिम बुद्धि के लिए महत्वपूर्ण रही। साइबरनेटिक्स या कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क<ref>{{Cite web|url=https://www.employmentjapan.com/tech-corner/ai-machine-learning-and-deep-learning/building-the-simplest-deep-neural-net-in-javascript/|title=Building the Simplest Deep Neural Net in JavaScript|last=Achu|first=Somto|last2=Achu|first2=Somto|date=2022-04-10|website=Employment Japan|language=en-US|access-date=2022-07-15|archive-date=15 जुलाई 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220715025542/https://www.employmentjapan.com/tech-corner/ai-machine-learning-and-deep-learning/building-the-simplest-deep-neural-net-in-javascript/|url-status=dead}}</ref> पर आधारित सम्बन्धवादी दृष्टिकोण को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था, लेकिन हाल के दशकों में नई प्रमुखता प्राप्त हुई है। भले की मशीनों के बुद्धि विकसित के शोध का शुरूआत 1943 हुआ हो लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता शब्द का पहली बार इस्तेमाल जॉन मैकार्थी ने ही 1956 में [[:en:Dartmouth workshop]] किया था और कहा था कि विज्ञान और अभियांत्रिकी का इस्तेमाल करके एक ऐसा कंप्यूटर बनाया जा सकता है जो कि स्वयं से ही सोच समझकर निर्णय ले सकें इसलिए हम john McCarthy को ही Artificial Intelligence के पिता के रूप में जानते है == कटौती, तर्क और समस्या को सुलझाने == पहले, कृत्रिम बुद्धि शोधकर्ताओं ने ऐसा एल्गोरिदम विकसित किया जो मनुष्य को हल करते समय उपयोग या तार्किक निर्णय लेने के लिए उपयोग करते थे। वे अनिश्चित या अधूरी जानकारी के साथ संभावना का संकल्पना निपटते है। == ज्ञान प्रतिनिधित्व == समस्याओं का हल करते समय, मशीनों को दुनिया के बारे में व्यापक ज्ञान की आवश्यकता होगी। कृत्रिम बुद्धि को प्रतिनिधित्व करने के लिए जरूरत कि चीजों है: वस्तुओं, गुण, श्रेणियों, समाधान, घटनाओं, समय, कारण और प्रभाव के बीच संबंधों और आदि। == प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण == प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण सबसे तेज़ गति से विकास करने वाले AI क्षेत्रों में से एक है। प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण में भाषा-संबंधी AI एप्लिकेशन के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाता हैं, जैसे वॉयस असिस्टेंट, चैटबॉट और भाषा अनुवाद (Language Translation)। वॉयस-टू-टेक्स्ट समझ को सक्षम करके, मानव-कंप्यूटर इंटरैक्शन को बढ़ाया जा सकता हैं। == उपकरण == === तर्क === तर्क, मुख्य रूप से ज्ञान प्रतिनिधित्व और समस्या को हल करने के लिए उपयोग किया जाता है। लेकिन यह अन्य समस्याओं के लिए भी किया जा सकता है। तर्क के कई अलग अलग रूपों एस कृत्रिम बुद्धि अनुसंधान में किया जाता है। तर्क के सहायता से हमको निर्णय कर सकते हैं कि क्या सही है या क्या गलत है। === अनिश्चित तर्क के लिए संभाव्य तरीकों === समस्याओं के अधिकांश यहाँ अनिश्चित और अधूरी जानकारी है। कृत्रिम बुद्धि शोधकर्ताओं संभाव्यता सिद्धांत और अर्थशास्त्र से विधियों का उपयोग कर इन समस्याओं को हल करने के लिए शक्तिशाली उपकरण की एक संख्या तैयार कर लिया है। संभाव्यता एल्गोरिदम को छानने और डेटा की भविष्यवाणी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता। == AI टेक्नोलॉजी के अनुप्रयोग== <ref>{{cite web | url=https://artificial-future.com | title=distructive nature of Artificial intelligence | access-date=16 जून 2020 | archive-url=https://web.archive.org/web/20181227011528/http://artificial-future.com/ | archive-date=27 दिसंबर 2018 | url-status=dead }}</ref> आज के तकनीकी दौर में जहां मशीनें कई व्यवसायों में अपनी सेवाएं दे रहीं हैं वहीं AI टेक्नोलॉजी भी अब कुछ सीमित इंडस्ट्रीज से निकलकर कई अन्य महत्वपूर्ण इंडस्ट्रीज में प्रयोग की जाने लगी है। कुछ वर्षों पहले तक AI टेक्नोलॉजी को कंप्यूटर तथा इससे जुड़ी सेवाओं तक ही सीमित माना जाता था, परंतु वर्तमान समय में AI टेक्नोलॉजी का विस्तार अन्य कई इंडस्ट्रीज में भी देखने को मिल रहा है। आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग शिक्षा, ग्राहक सेवा, मनोरंजन, ऑटोमोबाइल और इसके साथ ही साथ परिवहन व संचार के क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है। आने वाले समय में इस तकनीकी का प्रयोग बड़े पैमाने पर दूसरी इंडस्ट्रीज में भी होने की अटूट संभावना है। इस कारण से [https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html AI टेक्नोलॉजी से संबंधित कंपनियों] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20250825222718/https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html |date=25 अगस्त 2025 }} को बड़े पैमाने पर फ़ायदे की उम्मीद भी है। इसका एक उदाहरण Neuralink द्वारा इंसानी दिमाग में एक चिपसेट को इंप्लांट किया जाना है। हाल ही में एलन मस्क की कंपनी neuralink ने पहली बार इंसानी दिमाग में एआई चिपसेट को इंप्लांट किया है।<ref>{{Cite web|url=https://aipur.in/elon-musk-will-implant-a-chip-in-the-human-brain-using-telepathy-technology/|title=एलन मस्क 2030 तक 22000 इंसानों के दिमाग में लगाएंगे चिप, टेलीपैथी तकनीक से दिव्यांगो को मिलेगा फायदा|last=Saran|first=Bhanu|date=4/02/2024|website=Aipur|access-date=1 अप्रैल 2024|archive-date=1 अप्रैल 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240401151943/https://aipur.in/elon-musk-will-implant-a-chip-in-the-human-brain-using-telepathy-technology/|url-status=dead}}</ref> कंपनी ने इस चिपसेट का नाम टेलीपैथी रखा है, जो दिव्यांगों के लिए काफी उपयोगी होने वाली है, क्योंकि इस टेलीपैथी चिपसेट की मदद से विकलांग लोग अपने दिमाग से ही बिना कंप्यूटर और स्मार्टफोन को छुए कंट्रोल कर पाएंगे। साथ ही [[एलन मस्क]] का कहना है कि उनकी कंपनी 2030 तक 22000 से अधिक विकलांग लोगों के दिमाग में यह चिपसेट लगाकर उनकी मदद की करेगी। == रचनात्मकता == कृत्रिम बुद्धि की एक उप-क्षेत्र के सैद्धांतिक रूप से (एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक नजरिए से) रचनात्मकता दोनों पता लगाता है और व्यावहारिक रूप से (द्वारा उत्पन्न उत्पादन रचनात्मक माना जा सकता है कि सिस्टम, या सिस्टम है कि पहचानने और रचनात्मकता का आकलन के implementations विशिष्ट)। कम्प्यूटेशनल रिसर्च के संबंधित क्षेत्रों कृत्रिम अंतर्ज्ञान और कृत्रिम सोच रहे हैं। == सामान्य बुद्धि == शोधकर्ताओं व उनके काम: एक मशीन में सामान्य बुद्धि के साथ (मजबूत एअर इंडिया के रूप में जाना जाता है), शामिल किया जाएगा कि लगता है सब से ऊपर कौशल और मानवीय क्षमताओं में सबसे अधिक से अधिक के या उन सभी के संयोजन। कुछ विश्वास है कि कृत्रिम चेतना या एक कृत्रिम मस्तिष्क की तरह मानवाकृतीय सुविधाएँ ऐसी एक परियोजना के लिए आवश्यकता हो सकती। उपरोक्त समस्याओं के कई विचार किया जा करने के लिए सामान्य बुद्धि की आवश्यकता हो सकता हल हो। उदाहरण के लिए, यहां तक कि मशीनी अनुवाद की तरह एक सीधा, विशिष्ट कार्य मशीन पढ़ा और (एनएलपी) दोनों भाषाओं में लिखने, लेखक का तर्क (कारण) का पालन करें, पता है क्या (ज्ञान) के बारे में बात की जा रही है कि और सच्चाई से लेखक का इरादा (सामाजिक बुद्धि) को पुन: उत्पन्न की आवश्यकता है। मशीनी अनुवाद की तरह एक समस्या "ऐ-पूर्ण" माना जाता है। इस विशेष समस्या को हल करने के लिए, आप सभी समस्याओं को हल करना चाहिए। == AI सुरक्षा (AI Security) == === परिभाषा === एआई सुरक्षा वह शाखा है जो एआई-सिस्टम्स, उनके प्रशिक्षण डेटा, मॉडल तथा समर्थन इंफ्रास्ट्रक्चर को विभिन्न प्रकार के खतरों और कमजोरियों से सुरक्षित रखने का कार्य करती है। === प्रमुख खतरें एवं चुनौतियाँ === * '''डेटा पॉइज़निंग''' – जब प्रशिक्षण डेटा में दुर्भावनापूर्ण या ग़लत डेटा शामिल कर दिया जाता है, जिससे मॉडल गलत या हानिकारक निर्णय लेने लगे। * '''मॉडल इनवर्ज़न आक्रमण''' – मॉडल के आउटपुट के आधार पर हमलावर प्रशिक्षण डेटा या संवेदनशील जानकारी का उजागर कर सकते हैं। * '''प्रतिस्पर्धात्मक (एडवर्सेरियल) आक्रमण''' – मॉडल को ऐसे इनपुट दिए जाते हैं जिनसे वह गलत या मनचाहा आउटपुट देने लगे। * '''प्रॉम्प्ट इंजेक्शन''' – विशेष रूप से लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) में इनपुट के माध्यम से मॉडल को गैर-इच्छित क्रियाएँ करने के लिए प्रेरित करना।<ref>[https://www.modernsecurity.io/pages/blog?p=prompt-injection-llm-security-risk Modern Security – “Prompt Injection: LLM Security Risk”] — लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) में प्रॉम्प्ट इंजेक्शन से उत्पन्न सुरक्षा खतरों का विश्लेषण (प्रवेश तिथि: 10 अक्टूबर 2025)।</ref> === सुरक्षा प्रमुख बिंदु एवं उपाय === * '''गोपनीयता, अखंडता, उपलब्धता (CIA) त्रय''' – एआई प्रणाली में इन तीन मौलिक सुरक्षा गुणों को सुनिश्चित करना आवश्यक है। * '''निरंतर निगरानी एवं जोखिम आकलन''' – मॉडल और उसके परिवेश में समय-समय पर सुरक्षा परीक्षण, मॉनिटरिंग और आकलन जरूरी है। * '''की पहुँच नियंत्रण और एन्क्रिप्शन''' – प्रशिक्षण डेटा, मॉडल व आउटपुट तक पहुँच को सीमित करना तथा डेटा ट्रांसमिशन और संग्रहण में एन्क्रिप्शन उपयोग करना।<ref>[https://www.netskope.com/security-defined/what-is-ai-security What is AI Security? - Netskope] — एआई संसाधनों की सुरक्षा के लिए एन्क्रिप्शन व पहुँच नियंत्रण।</ref> * '''देरी-रहित प्रतिक्रिया (Incident Response)''' – एआई द्वारा उत्पन्न या प्रभावित घटना के लिए त्वरित प्रतिक्रिया योजनाएँ व स्वचालित नियंत्रण। === एआई सुरक्षा का अनुप्रयोग क्षेत्र === एआई सुरक्षा व्यापक रूप से नीचे-लिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: * वित्तीय सेवाएँ — धोखाधड़ी पहचान, जोखिम आकलन तथा लेन-देह सुरक्षा। * स्वास्थ्य सेवा — रोग निदान मॉडल्स, रोग-सम्बंधित डेटा तथा गोपनीयता। * आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) — स्मार्ट ग्रिड्स, IoT उपकरण तथा संवेदनशील सिस्टम्स। * रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र — स्वायत्त प्रणालियाँ, ड्रोन और निर्णय-सहायक प्रणाली।<ref>[https://www.modernsecurity.io/courses/ai-security-certification AI Security Certification – Modern Security] — एआई/एलएलएम सुरक्षा, वास्तविक-विश्व आक्रमण और संरक्षण तकनीकों से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (प्रवेश तिथि: 27 अक्टूबर 2025)।</ref> === उभरते रुझान === एआई सुरक्षा में हाल-ही में निम्नलिखित प्रमुख रुझान देखे जा रहे हैं: * एजेंटिक एआई और स्वायत्त हमलावर उपकरणों-पर आधारित खतरे।<ref>[https://www.modernsecurity.io/pages/blog?p=how-has-generative-ai-affected-security Modern Security – “How Has Generative AI Affected Security?”] — जनरेटिव एआई के सुरक्षा पर प्रभाव का ब्लॉग (प्रवेश तिथि: 27 अक्टूबर 2025)।</ref> * एआई जीवन-चक्र (डेटा → मॉडल → तैनाती → उपयोग) को सुरक्षित रखने के लिए समग्र सुरक्षा फ्रेमवर्क।<ref>[https://safety.google/intl/en_in/safety/saif/ Google Secure AI Framework (SAIF)] — पूरी एआई लाइफ-साइकल को सुरक्षित बनाने के लिए।</ref> * नियामक, नैतिकता एवं जवाबदेही — एआई के निर्णय, पूर्वाग्रह व पारदर्शिता द्वारा सुरक्षा जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। == कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग की संभावनाएँ == कुछ अर्थशास्त्री वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता की लहर की उत्पादनक्षमता और आर्थिक वृद्धि बढ़ाने की क्षमता के बारे में आशावादी हैं। विशेष रूप से, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री एरिक ब्रिन्योल्फ़सन ने एक श्रृंखला लेखों में "AI द्वारा संचालित उत्पादकता बूम"<ref>{{Cite web|title=Erik Brynjolfsson - Exclusive Speaker & Advisor|url=https://sternstrategy.com/speakers/erik-brynjolfsson/|access-date=2026-01-18|work=sternstrategy.com}}</ref> और "आगामी उत्पादकता बूम" का वर्णन किया। वहीं दूसरी ओर, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री रॉबर्ट गॉर्डन जैसे अन्य अधिक निराशावादी बने हुए हैं । ब्रिन्योल्फ़सन और गॉर्डन ने 2020 के दशक में उत्पादकता वृद्धि की दरों पर 'दीर्घकालिक दांव' के रूप में दर्ज एक औपचारिक बेट (पारि) लगाया, जिसे दशक के अंत तक निपटाने का निर्णय होना है।<ref>{{Cite web|title=Private Nonfarm business productivity growth will average over 1.8 percent per year from the first quarter (Q1) of 2020 to the last quarter of 2029 (Q4)|url=https://longbets.org/868/|access-date=2026-01-18|work=longbets.org}}</ref><ref>{{Cite web|title=Economists are betting on an AI productivity boom|url=https://www.marketplace.org/story/2025/03/20/economists-are-betting-on-an-ai-productivity-boom|access-date=2026-01-18|work=www.marketplace.org}}</ref> विभिन्न उद्योगों में जनरेटिव एआई उपकरण AI बूम के कारण व्यापक रूप से उपलब्ध होते जा रहे हैं और विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार में इनका उपयोग बढ़ रहा है। मुख्य उपयोग क्षेत्र — डेटा विश्लेषण है। मशीन लर्निंग, जिसे क्रमिक परिवर्तन माना जाता है, उद्योग के प्रदर्शन को बेहतर बना रही है। कंपनियां बताती हैं कि एआई प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ाने, निर्णय लेने में सुधार करने और मौजूदा सेवाओं व उत्पादों को मजबूत करने में सबसे अधिक सहायक है।<ref>{{Cite web|title=How AI decision-making improves business outcomes|url=https://lumenalta.com/insights/how-ai-decision-making-improves-business-outcomes|access-date=2026-01-18|work=lumenalta.com}}</ref><ref>{{Cite web|title=Advantages and challenges of AI in companies|url=https://www.esade.edu/beyond/en/advantages-and-challenges-of-ai-in-companies/|access-date=2026-01-18|work=www.esade.edu}}</ref> एआई के कार्यान्वयन के कारण पहले ही विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में राजस्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कंपनियों ने राजस्व में 16% तक की वृद्धि दर्ज की है, मुख्यतः उत्पादन, जोखिम प्रबंधन और अनुसंधान व विकास में। अचल संपत्ति के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तकनीकों का पहले से ही प्रभावी उपयोग भविष्य के पेशेवरों की तैयारी के लिए किया जा रहा है। कुछ रियल एस्टेट सॉफ्टवेयर उत्पाद डिजिटल मार्केटिंग और एआई तकनीकों के उपयोग के लिए एक अनूठा दृष्टिकोण पेश करते हैं। ये प्लेटफ़ॉर्म एआइ द्वारा उत्पन्न डेटा-आधारित विश्लेषणात्मक निष्कर्ष प्रदान करते हैं, जो रियल एस्टेट पेशेवरों को उनके काम में सफलता पाने में मदद करते हैं।<ref>{{Cite web|title=AI analyst for CRE & PE|url=https://leni.co/news/unlocking-the-potential-of-ai-in-commercial-real-estate-a-guide-for-real-estate-professionals/|access-date=2026-01-18|work=leni.co}}</ref> AI और जनरेटिव AI में निवेश बूम के साथ बढ़ा है — 2014 में 18 अरब डॉलर से बढ़कर 2021 में 119 अरब डॉलर हो गया।<ref>{{Cite web|title=AI Bubble Analysis: Is 2025 the New Dot-Com Era?|url=https://tekta.ai/insights/ai-bubble-dotcom-comparison-economy-media-2025|access-date=2026-01-18|work=tekta.ai}}</ref> सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि 2023 में जनरेटिव एआई में निवेश का हिस्सा लगभग 30% था।<ref>{{Cite web|title=Worldwide investment in startups & scaleups using AI vs Generative AI|url=https://datawrapper.dwcdn.net/PgFO7/7/|access-date=2026-01-18|work=datawrapper.dwcdn.net}}</ref> इसके अतिरिक्त, जनरेटिव एआई व्यवसाय में बड़े पैमाने पर वेंचर निवेश किया गया है, भले ही नियामक और आर्थिक परिदृश्य अनिश्चित बने हुए हों।<ref>{{Cite web|title=Jasper AI: A Dilemma of a Thin Wrapper|url=https://www.turingpost.com/p/jasperai|access-date=2026-01-18|work=www.turingpost.com}}</ref> टेक्नॉलॉजी दिग्गज एआई से अधिकतर राजस्व प्राप्त कर रहे हैं और व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं तथा अन्य व्यवसायों के लिए बड़े प्रदाता या ग्राहक के रूप में कार्य कर रहे हैं। एआई के परिनियोजन के साथ व्यवसाय में उत्पादन में घातीय वृद्धि देखी जा रही है।<ref>{{Cite web|title=The Artificial Intelligence (AI) Effect on Business|url=https://enterprisegrowth.com/resources/blog/artificial-intelligence-ai-effect-business|access-date=2026-01-18|work=enterprisegrowth.com}}</ref> अपेक्षा है कि कर्मचारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों का उपयोग करके अपनी उत्पादकता बढ़ा सकेंगे। चूँकि कई छोटे उद्यम एआई का उपयोग नहीं कर रहे हैं, माना जाता है कि यदि और अधिक व्यवसाय इसे अपनाते हैं तो कार्य संरचना पूरी तरह बदल सकती है, क्योंकि कई कार्य एआई द्वारा स्वचालित कर दिए जाएंगे। == इन्हें भी देखें == *[[क्वांटम कम्प्यूटिंग|प्रमात्रा संगणन (क्वांटम कंप्यूटिंग)]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * कृत्रिम बुद्धिमत्ता [https://tajakhabar.travelnaturalindia.com/index.php/2024/01/01/artificial-intelligence-courses/ पाठ्यक्रम] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20240118041129/https://tajakhabar.travelnaturalindia.com/index.php/2024/01/01/artificial-intelligence-courses/ |date=18 जनवरी 2024 }} * {{IEP|इंटरनेट दार्शनिक विश्वकोश|कृत्रिम बुद्धिमत्ता}} * {{cite SEP |url-id=logic-ai |title=तर्कशास्त्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता |last=थोमसन |first=रिचमंड}} * [https://www.bbc.co.uk/programmes/p003k9fc कृत्रिम बुद्धिमत्ता]. बीबीसी रेडियो ४ पर जॉन एगर, एलिसन ऐडम तथा इगोर अलेक्ज़ैण्डर के साथ परिचर्चा (इन आवर टाइम, ८ दिसम्बर २००५ ई॰ / मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष, संवत् २०६२)। * [https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सम्बद्ध शेयर्स — २०२४ में श्रेष्ठ ए॰आई॰ निवेश विकल्प। में बेहतरीन AI शेयर्स] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20250825222718/https://www.thestockbeat.in/2024/08/ai-stocks-in-india-2024-ai.html |date=25 अगस्त 2025 }} [[श्रेणी:कृत्रिम बुद्धिमत्ता]] [[श्रेणी:साइबरनेटिक्स]] [[श्रेणी:रूपबद्ध विज्ञान]] [[श्रेणी:समाज में प्रौद्योगिकी]] [[श्रेणी:बोध]] ha04ged3hmwhnqcgjrxo77rkram8zit कमाल अतातुर्क 0 12552 6543836 6301305 2026-04-25T11:10:20Z The Sorter 845290 6543836 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Atatürk Kemal.jpg|thumb|right|200px|कमाल अतातुर्क]] [[चित्र:Signature of Mustafa Kemal Atatürk.svg|thumb|right|200px|अतातुर्क के हस्ताक्षर]] '''कमाल अतातुर्क''' उर्फ '''मुस्तफ़ा कमाल पाशा''' (1881 - 1938) एक तुर्की क्षेत्र के मार्शल, क्रांतिकारी राजनेता, लेखक और तुर्की गणराज्य के संस्थापक, 1923 से अपनी मृत्यु तक (1938 तक) इसके पहले राष्ट्रपति के रूप में सेवा करते हुए। उन्होंने प्रगतिशील सुधारों की पहल की, जिसने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष, औद्योगिक राष्ट्र के रूप में बदल दिया। वैचारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्षतावादी और राष्ट्रवादी कमाल अतातुर्क की नीतियों और सिद्धांतों को कमालवाद के रूप में जाना जाता है। अपनी सैन्य और राजनीतिक उपलब्धियों के कारण, अतातुर्क को 20 वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक नेताओं में से एक माना जाता है। [[चित्र:Stamp of India - 1989 - Colnect 165310 - Mustafa Kemal Ataturk - Turkish Statesman - 50th Death Ann.jpeg|thumb|right|200px|1989 में भारत का डाक टिकट]] == जन्म और बचपन == '''कमाल पाशा''' का जन्म 19 मई सन् 1881 में सलोनिका (सैलोनिका) के एक किसान परिवार में हुआ था। इनकी [[माता]] का नाम जुवैदा व [[पिता]] का अली रजा था। अली रजा सलोनिका के चुंगी दफ्तर में क्लर्क थे। उनका बचपन का नाम मुस्तफा था। जन्म के कुछ वर्ष बाद ही पिता की मृत्यु हो गयी। माता जुबैदा ने मजहबी तालीम दिलाने के उद्देश्य से मदरसे में दाखिल करा दिया जहाँ उनके सीनियर छात्रो के तंग (रैंगिंग) करने पर वह मरने मारने पर उतर आये। मात्र 11 साल की उम्र में ही वह इतने दुर्दान्त (मार पिटाई करने वाले) हो गये थे कि उन्हें मक्तब से निकालना पड़ा। बाद में उन्हें मोनास्तीर (मैनिस्टर) के सैनिक स्कूल में भर्ती कराया गया। परन्तु वहाँ भी उनका मर मिटने वाला उग्रवादी स्वभाव बना रहा लेकिन सैन्य-शिक्षा में दिलचस्पी के कारण उनकी पढाई बदस्तूर जारी रही, उसमें कोई व्यवधान नहीं आया। == सैन्य शिक्षा == बालक मुस्तफा उग्र अवश्य था परन्तु गणित में उसकी गति आश्चर्य जनक थी। अध्यापक के ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखते ही वह उसे मुँहजबानी हल कर दिया करता था। उसमें कमाल की काबिलियत देखकर स्कूल के गणित अध्यापक कैप्टन मुस्तफा उफैंदी ने नाम बदल कर कमाल रख दिया। उसके बाद ही वह कमाल पाशा के नाम से जाना जाने लगा। 17 साल की उम्र में मोनास्तीर के प्राइमरी सैनिक स्कूल में प्रारम्भिक सैन्य शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें कुस्तुन्तुनिया (कांस्टेण्टीनोपिल) के स्टाफ़ कालेज (वार एकेडमी) में उच्च सैन्य शिक्षा हेतु भेज दिया गया। उन दिनों कुस्तुन्तुनिया में अब्दुल हमीद (द्वितीय) की सल्तनत थी और उसके राज्याधिपति को सुल्तान कहा जाता था। == वतन से दोस्ती == वहाँ वह अध्ययन के साथ-साथ बुरी संगत में घूमते रहे। कुछ काल तक उद्दण्डतापूर्ण जीवन बिताने के बाद वह '''वतन''' नामक एक गुप्त क्रान्तिकारी दल के पहले सदस्य बने और थोड़े ही दिनों बाद उसके नेता हो गये। वतन का उद्देश्य एक तरफ सुल्तान की तानाशाही और दूसरी तरफ विदेशी षड्यन्त्रों को जड से मिटाना था। एक दिन दल की बैठक चल रही थी कि किसी गुप्तचर ने सुल्तान को खबर दे दी और सबके सब षड्यन्त्रकारी अफसर गिरफ्तार करके जेल भेज दिये गये। प्रचलित कानून के अनुसार उन सबको मृत्युदण्ड दिया जा सकता था, पर दुर्बलचित्त सुल्तान को भय था कि कहीं ऐसा करने पर देश में विद्रोह न भड़क उठे, अत: उसने सबकों क्षमादान देने का निश्चय किया। == क्षमादान के पश्चात फिर वही कार्य == इस प्रकार अन्य सनिकों के साथ कमाल भी क्षमादान में छोड़ दिये गये। तत्पश्चात सुल्तान ने द्रूज जाति के विद्रोह को दबाने के लिये उन्हें दमिश्क भेज दिया। वहाँ कमाल ने काम तो कमाल का ही किया, पर स्वभाव के अनुसार कुस्तन्तुनिया वापस लौटते ही उन्होंने स्ताम्बूल (स्टैम्बोल) में एक कमरा लेकर वतन-ओ-हुर्रियत पार्टी का कार्यालय खोलकर उसमें आजादी की गुप्त संस्था का कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच उन्हें यह ज्ञात हुआ कि मकदूनिया में सुल्तान के विरुद्ध खुला विद्रोह होने वाला है। मौके की नजाकत को भाँपते हुए कमाल ने सुल्तान की सेना से छुट्टी ले ली और याफ़ा, मिरुा व एथेंस होते हुए वेश बदलकर विद्रोह के केन्द्र सलोनिका जा पहुँचे। परन्तु वहाँ पर उन्हें पहचान लिया गया। === पलायनावस्था === फिर वह ग्रीस होते हुए याफ़ा की ओर भागे। पर तब तक उनकी गिरफ्तारी का आदेश वहाँ भी पहुँच चुका था। अहमद बे नामक एक अफसर पर कमाल को पकड़ने का भार था, पर चूँकि अहमद स्वयं वतन का सदस्य था, इसलिए उसने कमाल को गिरफ्तार करने के बजाय गाजा मोर्चे पर भेज दिया और यह सुल्तान को यह रिपोर्ट भेज दी कि वह छुट्टी पर गये ही नहीं थे। यद्यपि कमाल सलोनिका में बहुत थोड़े समय तक ही रह पाये, फिर भी उन्होंने यह भली-भाँति समझ लिया था कि सलोनिका को ही विद्रोह का केन्द्र बनाना ठीक रहेगा, इसलिये बड़े प्रयत्नों के बाद सन् 1908 में उन्होंने अपना स्थानान्तरण सलोनिका ही करवा लिया। == अनवर पाशा का क्रान्ति-प्रयास == यहाँ अनवर के नेतृत्व में दो साल पहले ही ''एकता और प्रगति समिति'' के नाम से एक क्रान्तिकारी दल की स्थापना हो चुकी थी। कमाल तत्काल उसके सदस्य बन गये, परन्तु दल के नेताओं से उनकी नहीं बनीं। फिर भी वे समिति का काम निरन्तर करते रहे। इस दल के एक नेता नियाज़ी ने केवल कुछ सौ आदमियों को लेकर तुर्की सरकार के विरुद्ध विद्रोह बोल दिया। यद्यपि थी तो यह बड़ी मूर्खता की बात, परन्तु चूँकि सारा देश तैयार था, इसलिए जो सेना उससे लड़ने के लिए भेजी गयी थी, वह भी अनवर से जा मिली। इस प्रकार देश में अनवर का जय-जयकार हो गया। === अनवर की असफल क्रान्ति === अब सह सम्मिलित सेना राजधानी पर आक्रमण करने की तैयारी कर रही थी। सुल्तान ने इन्हीं दिनों कुछ शासन-सुधार भी किये। फिर भी विद्रोह की शक्तियाँ अपना काम करती रहीं, पर जब विद्रोह सफल हो चुका तब सुल्तान अब्दुल हमीद ने सेना के कुछ लोगों को यथेष्ट घूस देकर अपने साथ मिला लिया, जिससे सैनिकों ने विद्रोह करके अपने अफसरों को मार डाला और फिर एक बार इस्लाम, सुल्तान और खलीफ़ा की जय के नारे बुलन्द हुए। === अनवर का पाशा पलट पुनर्प्रयास === इन दिनों अनवर बर्लिन में थे। वह जल्दी ही लौटे और उन्होंने अब्दुल हमीद को गद्दी से उतार कर अनेक प्रतिक्रियावादी नेताओं की फाँसी पर चढ़ा दिया। इस प्रकार अनवर की क्रान्तिकारी समिति के हाथ में प्रशासनिक शक्ति आ गयी। आम जनता को दिग्भ्रमित करने के लिये सुल्तान के भान्जे को सिंहासन पर बिठा दिया गया। === कमाल व अनवर में सत्ता-संघर्ष === इधर कमाल पाशा अनवर के विरुद्ध निरन्तर षड्यन्त्र करते रहे क्योंकि उनके विचार से अनवर बेशक आदर्शवादी थे किन्तु अव्यावहारिक अधिक व्यक्ति थे। बावजूद इस सबके अनवर ने उस समय होने वाले विदेशी आक्रमणों को एक के बाद एक लगातार विफल किया इससे जनता में अनवर की ख्याति और अधिक बढ़ी। == अनवर के इस्लामीकरण के विरुद्ध कमाल का आन्दोलन == [[File:Kemal Atatürk portrait.jpg|thumb|कमाल पाशा सैनिक वेष में (1918 का चित्र)]] इसके बाद अनवर ने अपने सर्व इस्लामी स्वप्न को सत्य करने के लिए कार्य आरम्भ किया और उन्होंने इसके लिए सबसे पहला काम यह किया कि तुर्की सेना को संगठित करने का भार एक जर्मन जनरल को दिया। कमाल ने इसके विरुद्ध यह कहते हुए आन्दोलन प्रारम्भ किया कि यह तो तुर्की जाति का अपमान है। इस पर कमाल को सैनिक दूत बनाकर सोफ़िया भेज दिया गया। === महायुद्ध के भँवर-जाल में === इसी बीच महायुद्ध छिड़ गया। इसमें अनवर सफल नहीं हो सके, पर कमाल ने एक युद्ध में कुस्तन्तुनिया पर अधिकार करने की ब्रिाटिश चाल को विफल कर दिया और उसके बाद उनकी जीत पर जीत होती चली गयी। फिर भी महायुद्ध में तुर्की हार गया। कमाल दिन रात परिश्रम करके विदेशियों के विरुद्ध आन्दोलन करते रहे। 1920 में सेव्रा की सन्धि की घोषणा हुई परन्तु इसकी शर्तें इतनी खराब थीं कि कमाल ने फौरन ही एक सेना तैयार कर कुस्तुन्तुनिया पर आक्रमण की तैयारी की। === ग्रीस का आक्रमण === इसी बीच ग्रीस ने तुर्की पर हमला कर दिया और स्मरना में सेना उतार दी जो कमाल के प्रधान केन्द्र अंगारा की तरफ बढ़ने लगी। अब तो कमाल के लिये बड़ी समस्या पैदा हो गई, क्योंकि इस युद्ध में यदि वे हार जाते तो आगे कोई संभावना न रहती। इसलिये उन्होंने बड़ी तैयारी के साथ युद्ध किया जिसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे ग्रीक सेना को पीछे हटना पड़ा। === फ्रांस व रूस की सहायता === इस बीच फ्रांस और रूस ने भी कमाल को गुप्त रूप से सहायता देना शुरू किया। थोड़े दिनों में ही ग्रीक निकाल बाहर किए गए। ग्रीकों को भगाने के बाद ही अंग्रेजों के हाथ से बाकी हिस्से निकालने का प्रश्न था। देश उनके साथ था, इसके अतिरिक्त ब्रिाटेन अब लड़ने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं था। इस कारण यह समस्या भी सुलझ गई। == तुर्की में प्रजातन्त्र == [[File:Elmalı 35 baskısı.jpg|thumb|अतातुर्क के आदेशानुसार तुर्की भाषा में अनुवादित कुरान की पुरानी प्रति]] कमाल ने देश को प्रजातन्त्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने। अब राज्य लगभग निष्कण्टक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका निरन्तर विरोध हो रहा था। इसपर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फतवे जारी कर दिये और यह कहना शुरू किया कि कमाल ने अंगोरा में स्त्रियों को पर्दे से बाहर निकाल कर देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं, इसका अन्त होना चहिए। हर मस्जिद से यह आवाज उठायी गयी। तब कमाल ने 1924 के मार्च में खिलाफत प्रथा का अन्त किया और तुर्की को धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक संसद में रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें कसके धमकाया। उनकी इस धमकी का पुरजोर असर हुआ और विधेयक पारित हो गया। === प्रतिक्रियावादियों के खिलाफ संघर्ष === पर भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग बराब सुलगती रही। कमाल के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गये थे। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया था। कमाल ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया। कमाल ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है। === सामाजिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन === कमाल ने पहला हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी कानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी-अच्छी बातें शामिल थीं। बहु-विवाह गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गईं। स्त्रियों के पहनावे से पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे। === भाषायी क्रान्ति से राष्ट्रीय एकता की स्थापना === इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर पूरे देश में रोमन लिपि की स्थापना की गयी। कमाल स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्ण-माला में तुर्की भाषा पढ़ाते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि सारा तुर्की संगठित होकर एक हो गया और अलगाव की भावना समाप्त हो गयी। === सैन्य व्यवस्था में सुधार === इसके साथ ही कमाल ने तुर्की सेना को अत्यन्त आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति कमाल पाशा के कारण आधुनिक जाति बनी। सन् 1938 के नवम्बर मास की 10 तारीख को मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तब तक आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में सूरज की तरह चमक चुका था। == व्यक्तिगत जीवन == [[File:Mustafa Kemal Atatürk and Latife Uşşaki (1923).jpg|thumb|मुस्तफ़ा कमाल पाशा व उसकी पत्नी लतीफी]] वैसे तो कमाल पाशा के जीवन में चार स्त्रियों के साथ उसका प्रेम प्रसंग चला किन्तु शादी उसने केवल लतीफी उस्साकी से ही की। यद्यपि उससे कमाल को कोई सन्तान नहीं हुई और वह निस्संतान ही मर गयी। बीबी के मरने के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने कभी विवाह नहीं किया। जीवन के एकाकीपन को दूर करने के लिये उसने तेरह अनाथ बच्चों को गोद लिया और उनकी बेहतर ढँग से परवरिश की। इन तेरह बच्चों में भी बारह लड़कियाँ थीं और केवल एक ही लड़का था। == सन्दर्भ == {{reflist}} * [[राम प्रसाद 'बिस्मिल']] का लेख '''विजयी कमाल पाशा''' नवम्बर १९२२ '''प्रभा''' खण्डवा (म०प्र०) [[भारत]] * [[राम प्रसाद 'बिस्मिल']] का लेख '''अनवर पाशा''' जून १९२३ '''प्रभा''' खण्डवा (म०प्र०) [[भारत]] == इन्हें भी देखें== * [[तुर्की का स्वतंत्रता संग्राम]] * [[तुर्की का राष्ट्रीय स्मारक]] == बाहरी कड़ियाँ== * [https://web.archive.org/web/20140106062446/http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2_%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5_%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1-2 '''बिस्मिल की आत्मकथा''' चतुर्थ खण्ड-2] * {{cite book |url=http://www.worldcat.org/title/musings-from-the-gallows-autobiography-of-ram-prasad-bismil/oclc/180690320&referer=brief_results |title=Musings from the gallows : autobiography of Ram Prasad Bismil |first=Malwinder Jit Singh |last=Waraich |page=80 |publisher=Unistar Books, Ludhiana |year=2007 |access-date=16 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180623112829/http://www.worldcat.org/title/musings-from-the-gallows-autobiography-of-ram-prasad-bismil/oclc/180690320%26referer%3Dbrief_results |archive-date=23 जून 2018 |url-status=live }} [[श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना]] [[श्रेणी:तुर्की के लोग]] [[श्रेणी:तुर्की के राजनेता]] [[श्रेणी:तुर्की]] [[श्रेणी:1881 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:१९३८ में निधन]] nnta9r6deh2itymoigqko5timu4ni4p राणा मोकल 0 13473 6543719 6417506 2026-04-25T01:55:57Z ~2026-25168-60 921732 6543719 wikitext text/x-wiki '''राणा मोकल''' [[मेवाड़]] के [[राणा लाखा]] तथा [[मारवाड़]] की राजकुमारी [[रानी हंसाबाई|रानी हंंसाबाई]] केे पुत्र थेे। ;मेवाड़ वंशावली {{मेवाड़ी राणा}} मेवाड़ राज्य की विषय परिस्थितियों का दौर राणा लाखा की मृत्यु के बाद प्रारंभ हो गया। राणा मोकल को परिस्थितियाँ विरासत के रूप में प्राप्त हुई, क्योंकि इनके पिता लाखा का विवाह मारवाड़ की राजकुमारी हंसाबाई से वृद्धावस्था में हुआ और बहुत जल्द ही राणा लाखा की मृत्यु हो गयी। 1421 में जब मोकल शासक बना तो अल्पायु होने के कारण चूण्डा ने उसके संरक्षक के रुप में कार्य किया, मृत्यु के पश्चात् मेवाड़ का शासन हंसाबाई व उसके भाई राव रणमल केे हाथों में आ गया, कुुंवर चूड़ा अपने अपमान के कारण [[माण्डू|मांंडू]] ( मध्य प्रदेश) चला गया, ओर राणा मोकल की सुरक्षा का जिम्मा चूंडा के भाई राघवदेव पर आ गया । राणा मोकल का शासनकाल 1421 ई.-1433 ई. के बीच माना जाता है। राणा मोकल नेे अपनी पुत्री [[लाला मेेेवाड़ी|लाला मेेेवाड़ी]] का विवाह [[गागरौन दुर्ग|गागरोण]] के शासक [[अचलदास खींची]] सेे कर दी। उन्होंने 1428 ई. के रामपुरा युद्ध में [[नागौर]] शासक फिरोज खाँ को पराजित किया। मेवाड़ राज्य में राणा मोकल ने हिंदू परम्परा को स्थापित करने के लिए तुुुलादान पद्दति को लागू किया इस परम्परा के तहत् मंंदिरों के लिए सोना-चाँदी दान के रूप में दिया जाता था। महाराणाा मोकल ने एकलिंंगजी के मंदिर के परकोटे का निर्माण कराया। इसी प्रकार चित्तौड़ में स्थित त्रिभुवन नारायण मंदिर का पुनः निर्माण इन्ही के काल में हुआ, जिसेे समधीश्ववर मंंदिर केे नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार कुुुम्भा सेे पूूूर्व राणा मोकल ने मेवाड़ की धार्मिक आस्था को बनाए रखा। राणा को स्थापत्य कला से भी प्रेम था इनके दरबार में फना , मना , विशल नामक वास्तुकार शोभा बढ़ाते थे। [[एकलिंगजी|एकलिंंग]] मंदिर के परकोटे का निर्माण किया। जब राणा मोकल गुजरात के शासक अहमद शाह के विरुद्ध अभियान पर जा रहे थे तो रास्ते मे जिलवाडा नामक स्थान पर राणा क्षेेेत्र सिंह के दासीपुुत्र चाचा व मेरा ने राणा मोकल की हत्या कर दी। वस्तुतः शाही परिवार में शासक की विजातीय पत्नी को पासवान/ पङदायत/ खवास कहा जाता था। इनकी संतानो को चेला /गोटा बरदार/खवास पुत्र/लालजी/वाभा कहा जाता था । मारवाड़ में ऐसी संतानो को महाराजा श्री तख्त सिंह जी के शासनकाल में राव राजा कहा जाता था। इनको बङे बङे ठिकाने इनायत किये जाते थे ताकि उनका जीवन स्तर राजपरिवार के स्तर पर के अनुकूल बना रहे। चाचा और मेरा भी ऐसे ही पासवान पुत्र थे। इसके उपरांत 1433 ई. में [[महाराणा कुम्भा]] गद्दी पर बैठे। {{stub|नाम=महाराणा मोकल|शासन=1421 - 1433|माता=महारानी हंसाबाई|Death=1433|संतान=महाराणा कुुुम्भा|पिता=महाराणा मोकल}} [[श्रेणी:मेवाड़ के शासक]] 18s5rektauq7ylfqcqj0ogdsi4ndonn 6543775 6543719 2026-04-25T07:03:15Z चाहर धर्मेंद्र 703114 सन्दर्भ रहित जानकारी 6543775 wikitext text/x-wiki '''राणा मोकल''' [[मेवाड़]] के [[राणा लाखा]] तथा [[मारवाड़]] की राजकुमारी [[रानी हंसाबाई|रानी हंंसाबाई]] केे पुत्र थेे। ;मेवाड़ वंशावली {{मेवाड़ी राणा}} मेवाड़ राज्य की विषय परिस्थितियों का दौर राणा लाखा की मृत्यु के बाद प्रारंभ हो गया। राणा मोकल को परिस्थितियाँ विरासत के रूप में प्राप्त हुई, क्योंकि इनके पिता लाखा का विवाह मारवाड़ की राजकुमारी हंसाबाई से वृद्धावस्था में हुआ और बहुत जल्द ही राणा लाखा की मृत्यु हो गयी। 1421 में जब मोकल शासक बना तो अल्पायु होने के कारण चूण्डा ने उसके संरक्षक के रुप में कार्य किया, मृत्यु के पश्चात् मेवाड़ का शासन हंसाबाई व उसके भाई राव रणमल केे हाथों में आ गया, कुुंवर चूड़ा अपने अपमान के कारण [[माण्डू|मांंडू]] ( मध्य प्रदेश) चला गया, राणा मोकल का शासनकाल 1421 ई.-1433 ई. के बीच माना जाता है। राणा मोकल नेे अपनी पुत्री [[लाला मेेेवाड़ी|लाला मेेेवाड़ी]] का विवाह [[गागरौन दुर्ग|गागरोण]] के शासक [[अचलदास खींची]] सेे कर दी। उन्होंने 1428 ई. के रामपुरा युद्ध में [[नागौर]] शासक फिरोज खाँ को पराजित किया। मेवाड़ राज्य में राणा मोकल ने हिंदू परम्परा को स्थापित करने के लिए तुुुलादान पद्दति को लागू किया इस परम्परा के तहत् मंंदिरों के लिए सोना-चाँदी दान के रूप में दिया जाता था। महाराणाा मोकल ने एकलिंंगजी के मंदिर के परकोटे का निर्माण कराया। इसी प्रकार चित्तौड़ में स्थित त्रिभुवन नारायण मंदिर का पुनः निर्माण इन्ही के काल में हुआ, जिसेे समधीश्ववर मंंदिर केे नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार कुुुम्भा सेे पूूूर्व राणा मोकल ने मेवाड़ की धार्मिक आस्था को बनाए रखा। राणा को स्थापत्य कला से भी प्रेम था इनके दरबार में फना , मना , विशल नामक वास्तुकार शोभा बढ़ाते थे। [[एकलिंगजी|एकलिंंग]] मंदिर के परकोटे का निर्माण किया। जब राणा मोकल गुजरात के शासक अहमद शाह के विरुद्ध अभियान पर जा रहे थे तो रास्ते मे जिलवाडा नामक स्थान पर राणा क्षेेेत्र सिंह के दासीपुुत्र चाचा व मेरा ने राणा मोकल की हत्या कर दी। वस्तुतः शाही परिवार में शासक की विजातीय पत्नी को पासवान/ पङदायत/ खवास कहा जाता था। इनकी संतानो को चेला /गोटा बरदार/खवास पुत्र/लालजी/वाभा कहा जाता था । मारवाड़ में ऐसी संतानो को महाराजा श्री तख्त सिंह जी के शासनकाल में राव राजा कहा जाता था। इनको बङे बङे ठिकाने इनायत किये जाते थे ताकि उनका जीवन स्तर राजपरिवार के स्तर पर के अनुकूल बना रहे। चाचा और मेरा भी ऐसे ही पासवान पुत्र थे। इसके उपरांत 1433 ई. में [[महाराणा कुम्भा]] गद्दी पर बैठे। {{stub|नाम=महाराणा मोकल|शासन=1421 - 1433|माता=महारानी हंसाबाई|Death=1433|संतान=महाराणा कुुुम्भा|पिता=महाराणा मोकल}} [[श्रेणी:मेवाड़ के शासक]] jra81lkvt6a1k1ok361ncze7np8h0d9 अमर सिंह प्रथम 0 13481 6543792 5994814 2026-04-25T08:47:19Z Sequencesolved 173771 छोटा सा सुधार किया। 6543792 wikitext text/x-wiki {{Infobox royalty | native_name = राणा अमर सिंहजी | title = 13वें [[मेवाड़]] के [[महाराणा]] | image = Raja Ravi Varma, Maharana Amar Singh - I.jpg | caption = '''महाराणा अमर सिंहजी प्रथम''' का [[राजा रवि वर्मा]] द्वारा निर्मित चित्र | succession = 13वें [[मेवाड़]] के [[महाराणा]] | reign = 23 जनवरी 1597 – 26जनवरी 1620 | coronation = 23 जनवरी 1597 [[उदयपुर]], [[राजस्थान]], [[भारत]] | religion = [[हिन्दू धर्म|हिंदू धर्म]] | predecessor = [[महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम]] | successor = [[महाराणा करण सिंहजी]] | | issue = पुत्र :- महाराणा कर्ण सिंहजी राजाधिराज सूरजमल सिंहजी (शाहपुरा) राजा भीम सिंहजी (तोडा-रायसिंह) कुंवर अर्जुन सिंहजी कुंवर रतन सिंहजी कुंवर बाघ सिंहजी पुत्रियां :- कुंवरी केसर कँवरजी राव सूरतन सिंहजी देवड़ा प्रथम सिरोही के साथ विवाह | royal house = [[सिसोदिया]] सूर्यवंशी | father = [[महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम ]] | mother = रानी परमारजी अजब कँवरजी पुत्री राव मामरख सिंहजी बिजोलिया-मेवाड़ | birth_date = {{birth date|1559|03|16|df=y}} | birth_place = [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग]],चित्तौड़गढ़ [[राजस्थान]] | death_date = {{death date and age|1620|01|26|1559|03|16|df=y}} | death_place = [[उदयपुर]], [[राजस्थान]] | place of funeral= [[उदयपुर]], [[राजस्थान]] |spouse=रानी तोमरजी श्याम कँवरजी पुत्री युवराज शालीवाहन सिंहजी तोमर ग्वालियर रानी राठौड़जी लक्ष्य कँवरजी पुत्री राव नारायणदास जी द्वितीय ईडर रानी राठौड़जी राम कँवरजी पुत्री कुंवर जैत सिंहजी पौत्री मोटा राजा उदय सिंहजी जोधपुर-मारवाड़ रानी सोलंकिनीजी मानभवत कँवरजी पुत्री राना अखैराज सिहजी वनवीर सिहजी वीरपुर महिकांता-गुजरात रानी झालीजी राज कँवरजी पुत्री राज राणा मान सिंहजी झाला देलवाड़ा-मेवाड़}} '''महाराणा अमर सिंहजी प्रथम''' ( जीवनकाल: 1559 – 1620 ई० ) [[मेवाड़]] के [[सिसोदिया (राजपूत)|सिसोदिया सूर्यवंशी]] साहसी jaati vansh k शासक थे। वे [[महाराणा प्रताप|महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम]] के जेष्ठ पुत्र तथा [[उदयसिंह द्वितीय|महाराणा उदयसिंहजी द्वितीय]] के पौत्र थे।<ref>{{cite book| last=Sharma|first=Sri Ram|title=Maharana Raj Singh and his Times| year=1971| isbn=8120823982| page=14}}</ref> महाराणा प्रताप सिंहजी की मृत्यु के पश्चात वो उदयपुर मेवाड़ में उनके उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर बैठे। == प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक == अमर सिंह [[महाराणा प्रताप]] के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका परिवार [[मेवाड़]] के शाही परिवार का [[सिसोदिया (राजपूत)|सिसोदिया]] [[राजपूत]] था। उनका जन्म चित्तौड़ में 16 मार्च 1559 को [[महाराणा प्रताप]] और [[अजबदे पंवार|महारानी अजबदे पुंवर]] के घर हुआ था, उसी वर्ष, जब [[उदयपुर]] की नींव उनके दादा [[उदयसिंह द्वितीय|उदय सिंह द्वितीय]] ने रखी थी। महाराणा प्रताप ने 19 जनवरी 1597 में अपनी मृत्यु के समय अमर सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया और 26 जनवरी 1620 को अपनी मृत्यु तक मेवाड़ के शासक रहे।{{Ahnentafel-compact5|'''महाराणा अमर सिंह'''|[[महाराणा प्रताप|प्रताप सिंह]]|[[अजबदे पंवार]]|[[उदयसिंह द्वितीय|महाराणा उदयसिंह]]|[[महाराणी जयवंताबाई|जयवंताबाई]]|राव माम्रक सिंह|[[हंसा बाई]]|[[राणा सांगा]]|[[रानी कर्णावती]]|राणा रायभान|राज सोंगरा चौहान|राव मोहर सिंह||गोविंदा सिंह|चंद्रा बाई|boxstyle=centre|Alignment=centre|compressible=yes}}{{मेवाड़ी राणा}} == मुगल-मेवाड़ संघर्ष में भूमिका == लंबे समय से चले आ रहे मुगल-मेवाड़ संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब [[उदयसिंह द्वितीय|उदय सिंह द्वितीय]] ने [[मेवाड़]] के पहाड़ों में शरण ली और अपने छिपने के लिए कभी बाहर नहीं निकले। 1572 में उनकी मृत्यु के बाद, शत्रुताएं फैल गईं, जब उनके बेटे [[प्रताप सिंह]] I को मेवाड़ के राणा के रूप में नियुक्त किया गया। प्रारंभ में, प्रताप को अपने पिता [[उदय सिंह]] द्वारा पीछा की गई निष्क्रिय रणनीति से बचना था। यहां तक ​​कि उन्होंने अपने बेटे अमर सिंह को भी मुगल दरबार में भेजा, लेकिन खुद उनके पिता भी व्यक्तिगत उपस्थिति से परहेज करते थे। दूसरी ओर अकबर चाहता था कि वह व्यक्ति की सेवा करे और रामप्रसाद नाम के एक हाथी पर भी नज़र रखे, जो राणा के कब्जे में था। प्रताप ने हाथी और स्वयं दोनों को जमा करने से मना कर दिया और अकबर के शाही सेनापति राजा मान सिंह को भी उनसे सौहार्द नहीं मिला। यहां तक ​​कि उसके साथ भोजन करने से भी मना कर दिया। प्रताप सिंह की गतिविधियों ने मुगलों को एक बार फिर मेवाड़ में ला दिया और बाद की व्यस्तताओं में, मुगलों ने लगभग सभी सगाई जीतकर मेवाड़ियों पर एक भयानक कत्लेआम मचा दिया। राणा को जंगलों में गहरे भागना पड़ा और [[उदयपुर]] को भी [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] ने अपने कब्जे में ले लिया। परंतु; तमाम प्रयासों के बावजूद मुग़ल उसे पूरी तरह से अपने अधीन करने में सफल नहीं रहे। प्रताप के बाद, अमर सिंह ने मुगलों की अवहेलना जारी रखी और उनके पास कुछ भी नहीं था, हालांकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था, क्योंकि शुरुआती हमलों में [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] ने मेवाड़ के मैदानों पर कब्जा कर लिया था, और वह अपने पिता के साथ छिपने के लिए मजबूर थे। महाराणा प्रताप को मृत्यु के बाद अमरसिंह ने मुगलों पर तेजी से हमले किए जिसके कारण मुगलों को भागना पड़ा। अकबर द्वारा मेवाड़ को न जीत पाने के कारण संधि स्वरूप अमरसिंह से अपनी पुत्री का विवाह किया। परंतु यह संधि ज्यादा समय तक सफल नहीं रही। जब जहांगीर सिंहासन पर चढ़ा तो उसने अमर सिंह के खिलाफ कई हमले किए। शायद, वह उसे और मेवाड़ को वश में न कर पाने की अक्षमता के लिए दोषी महसूस करता था, हालांकि उसे यह कार्य करने के लिए अकबर द्वारा दो बार सौंपा गया था। जहाँगीर के लिए, यह सिर की बात बन गई और उसने अमर सिंह को वश में करने के लिए राजकुमार परविज़ को भेजा और देवर की लड़ाई हुई, लेकिन ख़ुसरू मिर्ज़ा के विद्रोह के कारण परवेज को रोकना पड़ा। परविज़ लड़ाई में केवल लाक्षणिक सेनापति था, जबकि वास्तव में, वास्तव में सेनापति [[जहाँगीर]] का साला, [[आसफ़ुद्दौला|आसफ़ ख़ान]] था। == व्यक्तिगत जीवन == महाराणा अमर सिंह प्रथम का निधन चार सौ  साल पहले 26 जनवरी, 1620 को हुआ। महा सतियाँ आहड़ में बनी छतरियों में पहली छतरी महाराणा अमर सिंह प्रथम की ही है।   इससे पहले के सिसोदिया शासकों के छतरिया उदयपुर में नहीं हैं।  महाराणा अमर सिंह ने 1615 की मेवाड़- मुग़ल संधि के बाद  सारा राज काज अपने पुत्र करण सिंह के हाथों में दे दिया व उनके जीवन के अंतिम पांच साल उन्होंने महा सतियाँ प्रांगण में एक निवृत राणा के रूप में भगवत आराधना में गुजारे व यहीं उनका निधन आज ही के दिन चार सौ साल पहले हुआ।   1615 में, अमर सिंह ने मुगलों को सौंप दिया। प्रस्तुत करने की शर्त को इस तरह से तैयार किया गया था ताकि दोनों पक्षों के बीच बहस हो सके। वृद्धावस्था के कारण, अमर सिंह को मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिए नहीं कहा गया था और चित्तौड़ सहित मेवाड़ को उन्हें वतन जगीर के रूप में सौंपा गया था। दूसरी ओर, अमर सिंह के उत्तराधिकारी, करण सिंह को 5000 का रैंक दिया गया था। दूसरी ओर मुगलों ने मेवाड़ के किलेबंदी को रोककर अपनी रुचि प्राप्त की। == शांति संधियाँ == मुगलों के खिलाफ कई लड़ाइयों के कारण मेवाड़ आर्थिक रूप से और जनशक्ति में तबाह हो गया था, अमर सिंह ने 1615 में शाहजहाँ (जिन्होंने जहांगीर की ओर से बातचीत की) के साथ संधि करने का विचार किया और अंत में उनके साथ बातचीत शुरू करना मुनासिब समझा। इस युद्ध की प्रथम संधि अकबर ने की थी जिसमें अकबर ने अपनी पुत्री शहजादी खानुम का विवाह अमरसिंह से करवाया था परन्तु यह संधि ज्यादा समय तक सफल नहीं रही।अंत में जहांगीर ने संधि प्रस्ताव का आमंत्रण दिया। अमरसिंह के परिषद और उनकी दादी जयवंता बाई, उनके सलाहकारों ने इसपर विचार समर्थन किया संधि में, इस बात पर सहमति थी कि: # मेवाड़ के शासक, मुगल दरबार में स्वयं को पेश करने के लिए बाध्य नहीं होंगे, इसके बजाय, राणा का एक रिश्तेदार मुगल सम्राट पर इंतजार करेगा और उसकी सेवा करेगा। # यह भी सहमति थी कि मेवाड़ के राणा मुगलों के साथ वैवाहिक संबंधों में प्रवेश नहीं करेंगे। # मेवाड़ को मुगल सेवा में 1500 घुड़सवारों की टुकड़ी रखनी होगी। # चित्तौड़ और मेवाड़ के अन्य मुगल कब्जे वाले क्षेत्रों को राणा को वापस कर दिया जाएगा, लेकिन चित्तौड़ किले की मरम्मत कभी नहीं की जाएगी। इस अंतिम स्थिति का कारण यह था कि चित्तौड़ का किला एक बहुत शक्तिशाली गढ़ था और मुगल इसे भविष्य के किसी भी विद्रोह में इस्तेमाल किए जाने से सावधान थे। # राणा को 5000 ज़ात और 5000 सोवरों की मुग़ल रैंक दी जाएगी। # डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासक (जो अकबर के शासनकाल के दौरान स्वतंत्र हो गए थे) एक बार फिर मेवाड़ के जागीरदार बने और राणा को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। # बाद में, जब अमर सिंह अजमेर में जहांगीर से मिलने गए, तो उनका मुगल सम्राट द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया और चित्तौड़ किले के साथ-साथ चित्तौड़ के आसपास के क्षेत्रों को सद्भावना के रूप में मेवाड़ वापस दे दिया गया। हालांकि, उदयपुर मेवाड़ राज्य की राजधानी बना रहा। ==इन्हें भी देखें== *[[दिवेर का युद्ध]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == स्रोत == * {{citation|last=Nicoll|first=Fergus|title=Shah Jahan|year=2009|location=[[India]]|publisher=Penguin Books|isbn=9780670083039}} * {{citation|last=Chandra|first=Satish|title=Medieval India: From Sultanat to the Mughals (1206–1526)|date=2006|volume=2|publisher=Har-Anand Publications}} * {{citation|last=Mathur|first=Pushpa Rani|title=Costumes of the Rulers of Mewar: With Patterns and Construction Techniques|date=1994|url=https://books.google.com/books?id=HnZKSg4crdcC|isbn=9788170172932}} * {{citation|last=Srivastava|first=Ashirbadi Lal|title=The Mughul Empire (1526–1803 A.D.)|date=1969}} * {{citation|last=Thorpe|title=The Pearson Guide To The Central Police Forces Examination, 2/E|date=September 2010|url=https://books.google.com/books?id=_LgHK5PNxXUC|isbn=9788131729052}} [[श्रेणी:मेवाड़ के शासक]] fmcewwnp3q4j4qca7wjcvvgnv5wo8zb 6543813 6543792 2026-04-25T10:11:42Z AMAN KUMAR 911487 jaati vansh k हटाया 6543813 wikitext text/x-wiki {{Infobox royalty | native_name = राणा अमर सिंहजी | title = 13वें [[मेवाड़]] के [[महाराणा]] | image = Raja Ravi Varma, Maharana Amar Singh - I.jpg | caption = '''महाराणा अमर सिंहजी प्रथम''' का [[राजा रवि वर्मा]] द्वारा निर्मित चित्र | succession = 13वें [[मेवाड़]] के [[महाराणा]] | reign = 23 जनवरी 1597 – 26जनवरी 1620 | coronation = 23 जनवरी 1597 [[उदयपुर]], [[राजस्थान]], [[भारत]] | religion = [[हिन्दू धर्म|हिंदू धर्म]] | predecessor = [[महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम]] | successor = [[महाराणा करण सिंहजी]] | | issue = पुत्र :- महाराणा कर्ण सिंहजी राजाधिराज सूरजमल सिंहजी (शाहपुरा) राजा भीम सिंहजी (तोडा-रायसिंह) कुंवर अर्जुन सिंहजी कुंवर रतन सिंहजी कुंवर बाघ सिंहजी पुत्रियां :- कुंवरी केसर कँवरजी राव सूरतन सिंहजी देवड़ा प्रथम सिरोही के साथ विवाह | royal house = [[सिसोदिया]] सूर्यवंशी | father = [[महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम ]] | mother = रानी परमारजी अजब कँवरजी पुत्री राव मामरख सिंहजी बिजोलिया-मेवाड़ | birth_date = {{birth date|1559|03|16|df=y}} | birth_place = [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग]],चित्तौड़गढ़ [[राजस्थान]] | death_date = {{death date and age|1620|01|26|1559|03|16|df=y}} | death_place = [[उदयपुर]], [[राजस्थान]] | place of funeral= [[उदयपुर]], [[राजस्थान]] |spouse=रानी तोमरजी श्याम कँवरजी पुत्री युवराज शालीवाहन सिंहजी तोमर ग्वालियर रानी राठौड़जी लक्ष्य कँवरजी पुत्री राव नारायणदास जी द्वितीय ईडर रानी राठौड़जी राम कँवरजी पुत्री कुंवर जैत सिंहजी पौत्री मोटा राजा उदय सिंहजी जोधपुर-मारवाड़ रानी सोलंकिनीजी मानभवत कँवरजी पुत्री राना अखैराज सिहजी वनवीर सिहजी वीरपुर महिकांता-गुजरात रानी झालीजी राज कँवरजी पुत्री राज राणा मान सिंहजी झाला देलवाड़ा-मेवाड़}} '''महाराणा अमर सिंहजी प्रथम''' ( जीवनकाल: 1559 – 1620 ई० ) [[मेवाड़]] के [[सिसोदिया (राजपूत)|सिसोदिया सूर्यवंशी]] साहसी शासक थे। वे [[महाराणा प्रताप|महाराणा प्रताप सिंहजी प्रथम]] के जेष्ठ पुत्र तथा [[उदयसिंह द्वितीय|महाराणा उदयसिंहजी द्वितीय]] के पौत्र थे।<ref>{{cite book| last=Sharma|first=Sri Ram|title=Maharana Raj Singh and his Times| year=1971| isbn=8120823982| page=14}}</ref> महाराणा प्रताप सिंहजी की मृत्यु के पश्चात वो उदयपुर मेवाड़ में उनके उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर बैठे। == प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक == अमर सिंह [[महाराणा प्रताप]] के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका परिवार [[मेवाड़]] के शाही परिवार का [[सिसोदिया (राजपूत)|सिसोदिया]] [[राजपूत]] था। उनका जन्म चित्तौड़ में 16 मार्च 1559 को [[महाराणा प्रताप]] और [[अजबदे पंवार|महारानी अजबदे पुंवर]] के घर हुआ था, उसी वर्ष, जब [[उदयपुर]] की नींव उनके दादा [[उदयसिंह द्वितीय|उदय सिंह द्वितीय]] ने रखी थी। महाराणा प्रताप ने 19 जनवरी 1597 में अपनी मृत्यु के समय अमर सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया और 26 जनवरी 1620 को अपनी मृत्यु तक मेवाड़ के शासक रहे।{{Ahnentafel-compact5|'''महाराणा अमर सिंह'''|[[महाराणा प्रताप|प्रताप सिंह]]|[[अजबदे पंवार]]|[[उदयसिंह द्वितीय|महाराणा उदयसिंह]]|[[महाराणी जयवंताबाई|जयवंताबाई]]|राव माम्रक सिंह|[[हंसा बाई]]|[[राणा सांगा]]|[[रानी कर्णावती]]|राणा रायभान|राज सोंगरा चौहान|राव मोहर सिंह||गोविंदा सिंह|चंद्रा बाई|boxstyle=centre|Alignment=centre|compressible=yes}}{{मेवाड़ी राणा}} == मुगल-मेवाड़ संघर्ष में भूमिका == लंबे समय से चले आ रहे मुगल-मेवाड़ संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब [[उदयसिंह द्वितीय|उदय सिंह द्वितीय]] ने [[मेवाड़]] के पहाड़ों में शरण ली और अपने छिपने के लिए कभी बाहर नहीं निकले। 1572 में उनकी मृत्यु के बाद, शत्रुताएं फैल गईं, जब उनके बेटे [[प्रताप सिंह]] I को मेवाड़ के राणा के रूप में नियुक्त किया गया। प्रारंभ में, प्रताप को अपने पिता [[उदय सिंह]] द्वारा पीछा की गई निष्क्रिय रणनीति से बचना था। यहां तक ​​कि उन्होंने अपने बेटे अमर सिंह को भी मुगल दरबार में भेजा, लेकिन खुद उनके पिता भी व्यक्तिगत उपस्थिति से परहेज करते थे। दूसरी ओर अकबर चाहता था कि वह व्यक्ति की सेवा करे और रामप्रसाद नाम के एक हाथी पर भी नज़र रखे, जो राणा के कब्जे में था। प्रताप ने हाथी और स्वयं दोनों को जमा करने से मना कर दिया और अकबर के शाही सेनापति राजा मान सिंह को भी उनसे सौहार्द नहीं मिला। यहां तक ​​कि उसके साथ भोजन करने से भी मना कर दिया। प्रताप सिंह की गतिविधियों ने मुगलों को एक बार फिर मेवाड़ में ला दिया और बाद की व्यस्तताओं में, मुगलों ने लगभग सभी सगाई जीतकर मेवाड़ियों पर एक भयानक कत्लेआम मचा दिया। राणा को जंगलों में गहरे भागना पड़ा और [[उदयपुर]] को भी [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] ने अपने कब्जे में ले लिया। परंतु; तमाम प्रयासों के बावजूद मुग़ल उसे पूरी तरह से अपने अधीन करने में सफल नहीं रहे। प्रताप के बाद, अमर सिंह ने मुगलों की अवहेलना जारी रखी और उनके पास कुछ भी नहीं था, हालांकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था, क्योंकि शुरुआती हमलों में [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] ने मेवाड़ के मैदानों पर कब्जा कर लिया था, और वह अपने पिता के साथ छिपने के लिए मजबूर थे। महाराणा प्रताप को मृत्यु के बाद अमरसिंह ने मुगलों पर तेजी से हमले किए जिसके कारण मुगलों को भागना पड़ा। अकबर द्वारा मेवाड़ को न जीत पाने के कारण संधि स्वरूप अमरसिंह से अपनी पुत्री का विवाह किया। परंतु यह संधि ज्यादा समय तक सफल नहीं रही। जब जहांगीर सिंहासन पर चढ़ा तो उसने अमर सिंह के खिलाफ कई हमले किए। शायद, वह उसे और मेवाड़ को वश में न कर पाने की अक्षमता के लिए दोषी महसूस करता था, हालांकि उसे यह कार्य करने के लिए अकबर द्वारा दो बार सौंपा गया था। जहाँगीर के लिए, यह सिर की बात बन गई और उसने अमर सिंह को वश में करने के लिए राजकुमार परविज़ को भेजा और देवर की लड़ाई हुई, लेकिन ख़ुसरू मिर्ज़ा के विद्रोह के कारण परवेज को रोकना पड़ा। परविज़ लड़ाई में केवल लाक्षणिक सेनापति था, जबकि वास्तव में, वास्तव में सेनापति [[जहाँगीर]] का साला, [[आसफ़ुद्दौला|आसफ़ ख़ान]] था। == व्यक्तिगत जीवन == महाराणा अमर सिंह प्रथम का निधन चार सौ  साल पहले 26 जनवरी, 1620 को हुआ। महा सतियाँ आहड़ में बनी छतरियों में पहली छतरी महाराणा अमर सिंह प्रथम की ही है।   इससे पहले के सिसोदिया शासकों के छतरिया उदयपुर में नहीं हैं।  महाराणा अमर सिंह ने 1615 की मेवाड़- मुग़ल संधि के बाद  सारा राज काज अपने पुत्र करण सिंह के हाथों में दे दिया व उनके जीवन के अंतिम पांच साल उन्होंने महा सतियाँ प्रांगण में एक निवृत राणा के रूप में भगवत आराधना में गुजारे व यहीं उनका निधन आज ही के दिन चार सौ साल पहले हुआ।   1615 में, अमर सिंह ने मुगलों को सौंप दिया। प्रस्तुत करने की शर्त को इस तरह से तैयार किया गया था ताकि दोनों पक्षों के बीच बहस हो सके। वृद्धावस्था के कारण, अमर सिंह को मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिए नहीं कहा गया था और चित्तौड़ सहित मेवाड़ को उन्हें वतन जगीर के रूप में सौंपा गया था। दूसरी ओर, अमर सिंह के उत्तराधिकारी, करण सिंह को 5000 का रैंक दिया गया था। दूसरी ओर मुगलों ने मेवाड़ के किलेबंदी को रोककर अपनी रुचि प्राप्त की। == शांति संधियाँ == मुगलों के खिलाफ कई लड़ाइयों के कारण मेवाड़ आर्थिक रूप से और जनशक्ति में तबाह हो गया था, अमर सिंह ने 1615 में शाहजहाँ (जिन्होंने जहांगीर की ओर से बातचीत की) के साथ संधि करने का विचार किया और अंत में उनके साथ बातचीत शुरू करना मुनासिब समझा। इस युद्ध की प्रथम संधि अकबर ने की थी जिसमें अकबर ने अपनी पुत्री शहजादी खानुम का विवाह अमरसिंह से करवाया था परन्तु यह संधि ज्यादा समय तक सफल नहीं रही।अंत में जहांगीर ने संधि प्रस्ताव का आमंत्रण दिया। अमरसिंह के परिषद और उनकी दादी जयवंता बाई, उनके सलाहकारों ने इसपर विचार समर्थन किया संधि में, इस बात पर सहमति थी कि: # मेवाड़ के शासक, मुगल दरबार में स्वयं को पेश करने के लिए बाध्य नहीं होंगे, इसके बजाय, राणा का एक रिश्तेदार मुगल सम्राट पर इंतजार करेगा और उसकी सेवा करेगा। # यह भी सहमति थी कि मेवाड़ के राणा मुगलों के साथ वैवाहिक संबंधों में प्रवेश नहीं करेंगे। # मेवाड़ को मुगल सेवा में 1500 घुड़सवारों की टुकड़ी रखनी होगी। # चित्तौड़ और मेवाड़ के अन्य मुगल कब्जे वाले क्षेत्रों को राणा को वापस कर दिया जाएगा, लेकिन चित्तौड़ किले की मरम्मत कभी नहीं की जाएगी। इस अंतिम स्थिति का कारण यह था कि चित्तौड़ का किला एक बहुत शक्तिशाली गढ़ था और मुगल इसे भविष्य के किसी भी विद्रोह में इस्तेमाल किए जाने से सावधान थे। # राणा को 5000 ज़ात और 5000 सोवरों की मुग़ल रैंक दी जाएगी। # डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासक (जो अकबर के शासनकाल के दौरान स्वतंत्र हो गए थे) एक बार फिर मेवाड़ के जागीरदार बने और राणा को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। # बाद में, जब अमर सिंह अजमेर में जहांगीर से मिलने गए, तो उनका मुगल सम्राट द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया और चित्तौड़ किले के साथ-साथ चित्तौड़ के आसपास के क्षेत्रों को सद्भावना के रूप में मेवाड़ वापस दे दिया गया। हालांकि, उदयपुर मेवाड़ राज्य की राजधानी बना रहा। ==इन्हें भी देखें== *[[दिवेर का युद्ध]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == स्रोत == * {{citation|last=Nicoll|first=Fergus|title=Shah Jahan|year=2009|location=[[India]]|publisher=Penguin Books|isbn=9780670083039}} * {{citation|last=Chandra|first=Satish|title=Medieval India: From Sultanat to the Mughals (1206–1526)|date=2006|volume=2|publisher=Har-Anand Publications}} * {{citation|last=Mathur|first=Pushpa Rani|title=Costumes of the Rulers of Mewar: With Patterns and Construction Techniques|date=1994|url=https://books.google.com/books?id=HnZKSg4crdcC|isbn=9788170172932}} * {{citation|last=Srivastava|first=Ashirbadi Lal|title=The Mughul Empire (1526–1803 A.D.)|date=1969}} * {{citation|last=Thorpe|title=The Pearson Guide To The Central Police Forces Examination, 2/E|date=September 2010|url=https://books.google.com/books?id=_LgHK5PNxXUC|isbn=9788131729052}} [[श्रेणी:मेवाड़ के शासक]] 1j0yg5hhjhfuoli3yjopj8e0guao045 डॉन डेलिलो 0 14949 6543820 4608886 2026-04-25T10:47:01Z Niegodzisie 444887 6543820 wikitext text/x-wiki [[File:Don delillo nyc 02.jpg|thumb]] [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमेरिका]] का [[नेशनल बुक अवॉर्ड (संयुक्त राज्य)|राष्ट्रिय पुस्तक पुरस्कार]] विजेता [[श्रेणी:अमेरिकी लेखक]] [[श्रेणी:1936 में जन्मे लोग]] {{लेखक-आधार}} 2wr0f7kooz2asenckyawl88r510flko बंगाल का विभाजन (1905) 0 25258 6543618 6159157 2026-04-24T13:42:53Z Aviispro 921685 It is population which was about 7.85 cr in 1906 AD 6543618 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Bengal gazetteer 1907-9.jpg|right|thumb|300px|पूर्वी बंगाल और असम प्रांत के मानचित्र]] '''बंगाल विभाजन''' के निर्णय की घोषणा '''19/20 जुलाई 1905''' को भारत के तत्कालीन वाइसराय [[कर्जन]] के द्वारा किया गया था। एक मुस्लिम बहुल प्रान्त का सृजन करने के उद्देश्य से ही [[भारत]] के [[बंगाल]] को दो भागों में बाँट दिये जाने का निर्णय लिया गया था। बंगाल-विभाजन '''16 अक्टूबर 1905''' से प्रभावी हुआ। इतिहास में इसे '''बंगभंग''' के नाम से भी जाना जाता है। यह अंग्रेजों की "फूट डालो - शासन करो" वाली नीति का ही एक अंग था। अत: इसके विरोध में 1905 ई. में सम्पूर्ण देश में `बंग-भंग' आन्दोलन शुरु हो गया।<ref>{{cite web|url= इसके विरोध में आंदोलन का प्रस्ताव 7 अगस्त 1905 को आया http://www.abhyuday.org/xprajna/html/himanshu.php|title= महामना : एक विलक्षण व्यक्तित्व|access-date= [[28 जुलाई]] [[2007]]|format= पीएचपी|publisher= अभ्यदय.ऑर्ग|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20070928000549/http://www.abhyuday.org/xprajna/html/himanshu.php|archive-date= 28 सितंबर 2007|url-status= dead}}</ref> इस विभाजन के कारण उत्पन्न उच्च स्तरीय राजनीतिक अशांति के कारण 1911 में दोनो तरफ की भारतीय जनता के दबाव की वजह से बंगाल के पूर्वी एवं पश्चिमी हिस्से पुनः एक हो गए। == उत्पत्ति == [[बंगाल]] प्रान्त का क्षेत्रफल '''489,500 वर्ग किलोमीटर''' और जनसंख्या '''लगभग 7.85 करोड़ थी'''। पूर्वी बंगाल भौगोलिक रूप से एवं कम संचार साधनों के कारण पश्चिमी बंगाल से लगभग अलग-थलग था। 1836 में, ऊपरी प्रांतों को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के शासन के अंतर्गत कर दिया गया और 1854 में गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल को बंगाल के प्रत्यक्ष प्रशासन से मुक्त कर दिया गया। अलग चीफ-कमिश्नरशिप बनाने के लिए 1874 में [[असम|आसाम]] को सिलहट सहित, बंगाल से अलग कर दिया गया और बाद में 1898 में लुशाई हिल्स को भी इसमें शामिल कर दिया गया। बंगाल जैसे बड़े और इतनी अधिक आबादी वाले प्रान्त का प्रबंधन बहुत कठिन था। == पृष्ठभूमि == सर्वप्रथम 1903 में बंगाल के विभाजन के बारे में सोचा गया। [[चटगाँव]] तथा [[ढाका]] और [[मिमन सिंह जिला|मैमनसिंह]] के जिलों को बंगाल से अलग कर [[असम]] प्रान्त में मिलाने के अतिरिक्त प्रस्ताव भी रखे गए थे। इसी प्रकार [[छोटा नागपुर]] को भी केन्द्रीय प्रान्त से मिलाया जाना था। सन् 1903 में ही [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] का भी 19वाँ अधिवेशन [[मद्रास]] में हुआ था। उसी अवसर पर उसके सभापति श्री [[लालमोहन घोष]] ने अपने अभिभाषण में सरकार की प्रतिक्रियावादी नीति की आलोचना करते हुए एक अखिल भारतीय मंचपर आसन्न वंगभंग की सूचना दी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का एक षड्यंत्र चल रहा है। सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1904 की जनवरी में यह विचार प्रकाशित किया और फरवरी में [[लॉर्ड कर्ज़न]] ने बंगाल के पूर्वी जिलों में विभाजन पर जनता की राय का आकलन करने के लिए आधिकारिक दौरे किये। उन्होंने प्रमुख हस्तियों के साथ परामर्श किया और ढाका, चटगांव तथा मैमनसिंह में भाषण देकर विभाजन पर सरकार के रुख को समझाने का प्रयास किया। [[हेनरी कॉटन|हेनरी जॉन स्टेडमैन कॉटन]], जो कि 1896 से 1902 के बीच आसाम के मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) थे, ने इस विचार का विरोध किया। काँग्रेस के अगले अधिवेशन में सभापति पद से बोलते हुए सर हेनरी कॉटन ने भी यह कहा कि यदि यह बहाना है कि इतने बड़े प्रान्त को एक राज्यपाल सँभाल नहीं सकता तो या तो बंबई और मद्रास की तरह बंगाल का शासनसूत्र सपरिषद् राज्यपाल के सिपुर्द हो या बँगला भाषियों को अलग करके एक प्रान्त बनाया जाए। उन दिनों बंगाल प्रांत में [[बिहार]] और [[उड़ीसा]] भी शामिल थे। पर ब्रिटिश सरकार ने न तो कांग्रेस की परवाह की, न जनमत की। उस समय के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने लैंड होल्डर्स एसोसिएशन या जमींदार सभा में लोगों को यह समझाने की चेष्टा की कि वंगभंग से लाभ ही होगा। वह स्वयं पूर्व बंगाल में भी गए, पर मुट्ठी भर मुसलमानों के अतिरिक्त किसी ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। मुसलमानों में प्रतिष्ठित ढाका के तत्कालीन नवाब ने भी प्रथम आवेश में इसका विरोध किया था। == '''विभाजन''' == 1905 में 16 अक्टूबर को भारत के तत्कालीन वॉयसराय लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया। विभाजन को प्रशासकीय कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया गया, बंगाल लगभग फ्रांस जितना बड़ा था जबकि उसकी आबादी फ्रांस से कहीं अधिक थी। ऐसा सोचा गया कि पूर्वी क्षेत्र उपेक्षित और उचित रूप से शासित नहीं था। प्रान्त के बँटवारे से पूर्वीय क्षेत्र में बेहतर प्रशासन स्थापित किया जा सकता था जिससे अंततः वहाँ की जनता स्कूल और रोजगार के मौकों से लाभान्वित होती। हालाँकि, विभाजन की योजना के पीछे अन्य उद्देश्य भी छिपे थे। बंगाली हिंदू, शासन में अधिक से अधिक भागीदारी के लिए राजनैतिक आंदोलन में अग्रणी थे, अतः अब पूर्व में मुस्लिमों का वर्चस्व बढ़ने से उनकी स्थिति कमजोर हो रही थी| हिंदू और मुस्लिम दोनो ही ने विभाजन का विरोध किया| विभाजन के बाद, हालाँकि, लगभग राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश विरोधी आंदोलन प्रबल हुआ जिसमें कि अहिंसक और हिंसक विरोध प्रदर्शन, बहिष्कार और यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल के नए प्रांत के राज्यपाल की हत्या का प्रयास भी शामिल था। प्रबल सार्वजनिक विरोध के बावजूद 19 जुलाई 1905 को वंगभंग के प्रस्ताव पर भारत सचिव का ठप्पा लग गया। [[राजशाही]], [[ढाका]] तथा [[चटगाँव]] कमिश्नरियों को आसाम के साथ मिलाकर एक प्रांत बनाया गया, जिसका नाम '''पूर्ववंग और आसाम''' रखा गया और बाकी हिस्सा यानी प्रेसीडेन्सी और वर्धमान कमिश्नरियाँ बिहार, उड़ीसा और इसका कोई आधार था। इस अवसर पर हिंदुओं और मुसलमानों को यह कहकर लड़ाने की चेष्टा की गई कि इस विभाजन से मुसलमानों को फायदा है क्योंकि पूर्ववंग और आसाम में उन्हीं का बहुमत रहेगा। ढाका के नवाब ने पहले विरोध किया था, पर जब वंगभंग हो गया तो वह उसके पक्ष में हो गए। सर जोजेफ बैमफील्ड फुलर (Joseph Bamfylde Fuller) पूर्ववंग और आसाम के नए लेफ्टिनैंट गवर्नर बने। कहा जाता है, उन्होंने कई जगह खुल्लमखुल्ला कहा कि हिंदू और मुसलमान उनकी दो बीबियाँ हैं, इनमें से मुसलमान उनकी चहेती हैं। इस कथन का आशय स्पष्ट था। बंगभंग का उद्देश्य प्रशासन की सुविधा उत्पन्न करना नहीं था, जैसा दावा किया गया था, बल्कि इसके दो स्पष्ट उद्देश्य थे, एक हिंदू मुसलमान को लड़ाना और दूसरे नवजाग्रत बंगाल को चोट पहुंचाना। यदि गहराई से देखा जाए तो यहीं से पाकिस्तान का बीजारोपण हुआ। मुस्लिम लीग के 1906 के अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुए, उनमें से एक यह भी था कि बंगभंग मुसलमानों के लिए अच्छा है और जो लोग इसके विरुद्ध आंदोलन करते हैं, वे गलत काम करते हैं और वे मुसलमानों को नुक्सान पहुंचाते हैं। बाद को चलकर लीग के 1908 के अधिवेशन में भी यह प्रस्ताव पारित हुआ कि कांग्रेस ने बंगभंग के विरोध का जो प्रस्ताव रखा है, वह स्वीकृति के योग्य नहीं। नए प्रान्त में पहाड़ी राज्य [[त्रिपुरा]], चिट्टागांग मंडल, ढाका और राजशाही ([[दार्जिलिंग]] को छोड़ कर) शामिल हुए और मालदा जिले को आसाम प्रान्त में मिला दिया गया। बंगाल को न केवल इन बड़े पूर्वी प्रदेशों को छोड़ना पड़ा, बल्कि पाँच हिंदी भाषी राज्यों को भी मध्य प्रांत के लिए गँवाना पड़ा था। पश्चिम की तरफ से इसे मध्य प्रान्त से [[संबलपुर]] और पाँच छोटे [[ओड़िया भाषा|उड़िया]]-भाषी राज्य प्रदान किये गए। बंगाल के पास{{convert|141580|sqmi|km2|sigfig=4}} क्षेत्रफल और पाँच करोड़ चालीस लाख की जनसंख्या ही बची थी, जिसमें चार करोड़ बीस लाख [[सनातन धर्म|हिन्दू]] और नब्बे लाख [[मुसलमान|मुस्लिम]] थे। नए प्रान्त का नाम क्रमशः पूर्वी बंगाल और आसाम था जिसमें पूर्वी बंगाल की राजधानी ढाका और आसाम का अधीनस्थ मुख्यालय चिट्टागांग था। इसका क्षेत्रफल {{convert|106540|sqmi|km2|sigfig=5}} था और जनसंख्या तीन करोड़ दस लाख थी, जिसमे एक करोड़ अस्सी लाख मुस्लिम और एक करोड़ बीस लाख हिन्दू थे। प्रशासन के लिए वहाँ एक विधान परिषद् तथा एक द्वि-सदस्यीय राजस्व बोर्ड था और कलकत्ता उच्च न्यायलय के अधिकार-क्षेत्र को बदला नहीं गया था। सरकार ने इंगित किया कि पूर्वी बंगाल और आसाम के बीच एक सही ढंग से निर्धारित पश्चिमी सीमा होगी और सुपरिभाषित भौगोलिक, नृकुल विज्ञानी, भाषीय एवं सामाजिक विशेषताएं होंगी। भारत सरकार ने अपना अंतिम निर्णय 20 जुलाई 1905 के स्वीकृत प्रस्ताव से प्रचारित किया और बंगाल का विभाजन उसी वर्ष 16 अक्टूबर 1905 से लागू हो गया। == प्रभाव == 1911 में रद्द किये जाने से पूर्व, विभाजन बमुश्किल आधे दशक तक चल पाया था। हालाँकि बंटवारे के पीछे ब्रिटेन की नीति ''डिवाइड एट इम्पेरा'' (विभाजित करके शासन करो) थी, जो कि पुनर्संगठित प्रान्त को प्रभावित करती रही। 1919 में, मुसलमानों और हिंदुओं के लिए अलग-अलग चुनाव व्यवस्था स्थापित की गयी। इस से पहले, दोनों समुदायों के कई सदस्यों ने सभी बंगालियों के लिए राष्ट्रीय एकता की वकालत की थी। अब, अलग-अलग समुदायों ने अपने-अपने राजनैतिक मुद्दे विकसित कर लिए। मुस्लिमों ने भी अपनी समग्र संख्यात्मक शक्ति के बल पर, जो कि मोटे तौर पर दो करोड़ बीस लाख से दो करोड़ अस्सी लाख के बीच थी, विधानमंडल में वर्चस्व हासिल किया। राष्ट्रीय स्तर पर हिंदुओं और मुसलमानों के लिए दो स्वतंत्र राज्यों के निर्माण की माँग उठने लगी, अधिकांश बंगाली हिन्दू अब हिंदू बहुमत क्षेत्र और मुस्लिम बहुमत क्षेत्र के आधार पर होने वाले बंगाल के बंटवारे का पक्ष लेने लगे। मुस्लिम अब पूरे प्रान्त को मुस्लिम राज्य, पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते थे। 1947 में बंगाल दूसरी बार, इस बार धार्मिक आधार पर, विभाजित हुआ। यह पूर्वी पाकिस्तान बन गया। हालाँकि, 1971 में पश्चिमी पाकिस्तानी सैन्य शासन के साथ एक सफल मुक्ति युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश नाम का स्वतंत्र राज्य बन गया। बंगाल के दोनों विभाजनों में रक्तपात हुआ। इसने एक बड़ा राजनीतिक संकट पैदा किया। पूर्वी बंगाल में मुस्लिमों की धारणा थी कि एक अलग क्षेत्र उन्हें शिक्षा, रोजगार आदि के अधिक अवसर उपलब्ध कराएगा, जबकि पश्चिमी बंगाल के लोगों को यह बंटवारा पसंद नहीं आया और इस समय के दौरान बड़ी मात्रा में राष्ट्रवादी साहित्य की रचना की गयी। [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] द्वारा किये गए विरोध का नेतृत्व सर हेनरी जॉन स्टेडमैन कॉटन ने किया जो पूर्व में आसाम के मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) थे, परन्तु कर्ज़न अडिग रहे। बाद में कॉटन ने, जो अब पूर्वी नाटिंघम के उदारवादी सांसद बन गए थे, सर बेम्पफील्ड फुलर, जो पूर्वी बंगाल के पहले लेफ्टिनेंट-गवर्नर थे, को निकालने के अभियान का सफलता पूर्वक संचालन किया। 1906 में [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] ने ''[[आमार शोनार बांग्ला]]'' की रचना की जो बंटवारे का विरोध करने वालों का रैली नारा था, वह काफी बाद, 1972 में [[बांग्लादेश]] का [[राष्ट्रगीत|राष्ट्रगान]] बन गया। इन राजनीतिक विरोधों के कारण, बंगाल के दोनों भाग 1911 में फिर से जुड़ गए थे। एक नया बंटवारा हुआ जिसने प्रान्त को धार्मिक के स्थान पर भाषाई आधार पर बाँटा जा सका, जिससे हिंदी, उड़िया और असमिया भाषी क्षेत्रों को नयी प्रशासनिक इकाइयों बनाने के लिए अलग किया गया। इसके साथ ही साथ ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक राजधानी को [[कोलकाता|कलकत्ता]] से [[नई दिल्ली (प्रशासनिक राजधानी क्षेत्र)|नई दिल्ली]] ले जाया गया। हालाँकि, मुस्लिमों और हिंदुओं के बीच का टकराव नए कानूनों की उत्पत्ति के रूप में परिणित हुआ जिससे दोनों वर्गों की राजनैतिक आवश्यकताएं संतुष्ट की जा सकें। == बंगभंग के विरुद्ध आन्दोलन == बंगभंग के विरुद्ध बंगाल के बाहर बहुत भारी आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में देश के प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन ने [[बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय]] के [[वंदे मातरम्]] गीत को नई बुलंदियाँ प्रदान की। उस समय बंगाल को बाँट देने का अंग्रेजी कुचक्र तो टूटा ही, सारे देश में और विदेशों में इसे असाधारण ख्याति मिली। जर्मन और कनाडा जैसे देश भी इससे प्रभावित हुए। [[कामागाटामारू]] नामक जहाज के झंडे पर 'वन्दे मातरम्' अंकित किया गया था। तब से सन् 1930 के नमक सत्याग्रह और सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन तक सभी सम्प्रदायों से उभरे युवा स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों का सबसे प्रेरक और प्रिय नारा रहा 'वन्दे मातरम्'। भारत वासियों की अन्तर्भावना इसे नैतिक आधार पर भली प्रकार स्वीकार कर चुकी थी।<ref>{{cite web|url= http://www.pragyaabhiyan.info/?news/100|title= वन्देमातरम् गीत को नैतिक एवं संवैधानिक दोनों मान्यताएँ प्राप्त हैं|access-date= [[28 जुलाई]] [[2007]]|format= पीएचपी|publisher= प्रज्ञाभियान.इन्फ़ो|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20160304142337/http://www.pragyaabhiyan.info/?news%2F100|archive-date= 4 मार्च 2016|url-status= dead}}</ref> == बंगभंग की समाप्ति == सन् 1911 के 12 दिसम्बर को दिल्ली में एक दरबार हुआ, जिसमें सम्राट् पंचम जार्ज, सम्राज्ञी मेरी तथा भारत सचिव लार्ड क्रू आए थे। इस दरबार के अवसर पर एक राजकीय घोषणा-द्वारा पश्चिम और पूर्व वंग के बँगला भाषी इलाकों को एक प्रांत में लाने का आदेश किया गया। राजधानी कलकत्ते से दिल्ली में हटा दी गई। मुस्लिम लीग का 1912 का वार्षिक अधिवेशन नवाब सलीमुल्ला खाँ के सभापतित्व में ढाके में हुआ। इसमें नवाब ने अपने अभिभाषण में हिंदुओं की शोरिशों और सरकार की बेमुरव्वतियों का बड़ा जोरदार चित्र खींचा और वंगभंग रद्द करने का विरोध प्रकट किया। == इन्हें भी देखें == * [[स्वदेशी आन्दोलन]] * '''[[देशेर कथा]]''' - [[सखाराम गणेश देउस्कर]] की बंगला रचना जिसने बंगभंग आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। * [[बांग्लादेश]] * [[पश्चिम बंगाल]] * [[बंगाल का विभाजन (1947)]] == सन्दर्भ == <references/> == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20090303104726/http://banglapedia.search.com.bd/HT/P_0100.htm बंगाल के विभाजन पर बंगलापीडिया अनुच्छेद] {{Indian independence movement}} {{Pakistan Movement}} [[श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम]] [[श्रेणी:बांग्लादेश का इतिहास]] [[श्रेणी:बंगाल का इतिहास]] [[श्रेणी:भारत का विभाजन]] [[श्रेणी:विभाजन]] [[श्रेणी:भारत में 1905]] [[श्रेणी:गूगल परियोजना]] 6k2lmw4xikv2b2ktbajvaqa4dpjmnq1 यूनेस्को 0 38565 6543621 6493945 2026-04-24T14:05:25Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543621 wikitext text/x-wiki {{Infobox organization | logo_size = 200px | image = Flag of UNESCO.svg | name = संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन | caption = यूनेस्को का ध्वज | map = | map_size = | map_caption = |staff=2,341 |staff_year= 2022<ref>https://unsceb.org/hr-organization</ref> | type = संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेष एजेंसी | abbreviation = यूनेस्को (UNESCO) | leader_title = महानिदेशक | leader_name = [[ऑद्रे अजोले]] | leader_title2 = उपमहानिदेशक | leader_name2 = शिंग कू | status = सक्रिय | formation = {{start date and age|1945|11|16|df=yes}} | logo = Logo UNESCO 2021.svg | headquarters = [[पेरिस]], फ़्रान्स | website = {{official URL}} | parent_organization = [[संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद]] | subsidiaries = | footnotes = {{Portal-inline|राजनीति|size=tiny}} }} '''संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन''' (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization; संक्षिप्त: UNESCO; देवनागरी: यूनेस्को)<ref>{{Cite book|url=https://ncert.nic.in/textbook/pdf/fhes107.pdf|title=भारत की सांस्‍कृतिक जड़ें|publisher=[[राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद]]|location=नई दिल्ली|pages=3|quote=यूनेस्को का पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन है। यह संगठन शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से लोगों और राष्ट्रों के बीच संवाद को बढ़ावा देता है।}}</ref> [[संयुक्त राष्ट्र संघ]] का एक घटक निकाय है। इसका कार्य शिक्षा, प्रकृति तथा समाज विज्ञान, संस्कृति तथा संचार के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना है। वर्तमान में इसके 194 सदस्य देश और 12 सह सदस्य हैं।<ref>{{cite web|url=https://www.unesco.org/en/countries|title=List of UNESCO members and associates|publisher=यूनेस्को|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20220815012241/https://en.unesco.org/countries/|archive-date=15 अगस्त 2022|access-date=11 नवम्बर 2024|url-status=live}}</ref> इनमें [[अशासकीय संस्था|अशासकीय संस्थान]], [[अन्तर्राष्ट्रीय संगठन]] और निजी क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.unesco.org/en/partnerships|title=Partnerships|date=25 June 2013|website=यूनेस्को|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200823220827/https://en.unesco.org/partnerships|archive-date=23 अगस्त 2020|access-date=11 नवम्बर 2024|url-status=live}}</ref> इसका मुख्यालय फ़्रान्स की राजधानी [[पेरिस]] में है और इसके 53 क्षेत्रीय कार्यालय<ref>{{Cite web|url=https://en.unesco.org/fieldoffice|title=Field offices|website=यूनेस्को|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200817141658/https://en.unesco.org/fieldoffice/|archive-date=17 अगस्त 2020|url-status=live}}</ref> व 199 राष्ट्रीय आयोग हैं।<ref>{{Cite web|url=https://en.unesco.org/countries/national-commissions|title=National Commissions|date=28 सितम्बर 2012|website=यूनेस्को|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200822204031/https://en.unesco.org/countries/national-commissions|archive-date=22 अगस्त 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://en.unesco.org/fieldoffice/apia/about|title=About UNESCO Office for the Pacific States|last=|date=1 अगस्त 2019|website=यूनेस्को|language=en}}</ref> संयुक्त राष्ट्र की इस विशेष संस्था का गठन 16 नवम्बर 1945 को हुआ था। इसका उद्देश्य शिक्षा एवं संस्कृति के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से शांति एवं सुरक्षा की स्थापना करना है, ताकि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में वर्णित न्याय, कानून का राज, मानवाधिकार एवं मौलिक स्वतंत्रता हेतु वैश्विक सहमति बने। == इतिहास == === उत्पति === === संस्थान === == सन्दर्भ == {{reflist}} == बाहरी कडियाँ == * [https://web.archive.org/web/20120214054326/http://www2.unesco.org/ UNESCO.org] आधिकारिक यूनेस्को वेबसाइट ** [https://web.archive.org/web/20170709093950/http://whc.unesco.org/ whc.unesco.org] आधिकारिक विश्व धरोहर वेबसाइट {{संयुक्त राष्ट्र}} [[श्रेणी:यूनेस्को]] [[श्रेणी:संगठन]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] gsqpnioqmtc67tk3suw0c6z99vnh6g6 साजन का घर 0 38778 6543689 6452813 2026-04-24T18:23:39Z ~2026-25067-25 921710 6543689 wikitext text/x-wiki {{Infobox Film | name = साजन का घर | image = साजन का घर.jpg | caption = '''साजन का घर''' का पोस्टर | producer = सुनील बोहरा <br /> सुरेंद्र बोहरा <br /> फारूक <br /> नूतन | director = सुरेंद्र कुमार बोहरा | music = [[नदीम श्रवण]] | writer = | starring = [[ऋषि कपूर]], <br />[[जूही चावला]], <br />[[दीपक तिजोरी]], <br />[[अनुपम खेर]], <br />[[बिन्दू]] <br /> | screenplay = | released = 29 अप्रैल, 1994 | country = [[भारत]] | language = [[हिन्दी]] | budget = }} '''साजन का घर''' 1994 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है। इसका निर्देशन सुरेंद्र कुमार बोहरा ने किया और मुख्य भूमिकाओं में [[ऋषि कपूर]] और [[जूही चावला]] है।<ref>{{cite news |title=कभी ऐसी दिखती थीं जूही चावला, इस वजह से लुक में आ गया इतना चेंज |url=https://bollywood.bhaskar.com/news/ENT-BOL-IFTM-juhi-chawla-suffered-most-frightening-chemical-reaction-on-face-5839087-PHO.html |accessdate=21 जुलाई 2018 |work=[[दैनिक भास्कर]] |date=28 मार्च 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180721073323/https://bollywood.bhaskar.com/news/ENT-BOL-IFTM-juhi-chawla-suffered-most-frightening-chemical-reaction-on-face-5839087-PHO.html |archive-date=21 जुलाई 2018 |url-status=dead }}</ref> फिल्म व्यवसायिक रूप से सफल रही थी और इसे जूही चावला की सुपरहिट फिल्मों में गिना जाता है।<ref>{{cite news |title=Happy Birthday Juhi : दिलकश अदाओं से जूही ने करोड़ों लोगों को बनाया दीवाना |url=http://www.chauthiduniya.com/2017/11/happy-birthday-juhi-chawla-juhi-made-crores-of-crazy-people-from-savory-aday.html |accessdate=21 जुलाई 2018 |work=[[चौथी दुनिया]] |date=13 नवम्बर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180721073237/http://www.chauthiduniya.com/2017/11/happy-birthday-juhi-chawla-juhi-made-crores-of-crazy-people-from-savory-aday.html |archive-date=21 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> == संक्षेप == धनराज ([[अनुपम खेर]]) एक गरीब और बहुत ही ज्यादा लालची इंसान रहता है। उसकी पत्नी एक बेटी, लक्ष्मी ([[जूही चावला]]) को जन्म देने के तुरंत बाद मर जाती है। वहीं उसके जन्म के साथ ही वो एक बहुत ही बड़ी लॉटरी भी जीत जाता है, और काफी अमीर हो जाता है। धनराज को लॉटरी जीतने के बावजूद भी ऐसा लगता है कि उसकी बेटी अशुभ या खराब किस्मत वाली है और उसके जन्म लेने के कारण ही उसकी पत्नी की मौत हुई है। वो सारा दोष उसकी बेटी, लक्ष्मी पर लगा देता है और उसे देखने से भी इंकार कर देता है। इसके बाद वो दूसरी शादी कर लेता है। उसके दूसरी बीवी से उसके घर एक पुत्र, सूरज ([[दीपक तिजोरी]]) का जन्म होता है। लक्ष्मी और सूरज बड़े हो जाते हैं। इतने सालों बाद भी धनराज और उसकी सौतेली माँ उसे बुरी किस्मत वाली ही सोचते रहते हैं और उसके साथ बहुत खराब व्यवहार करते रहते हैं। सूरज इस बात से असहमत रहता है कि उसकी बहन बुरी किस्मत वाली है। वो जितना हो सकते, उतना अपनी बहन को उनसे बचाने की कोशिश करते रहता है। उसकी माँ सूरज को लक्ष्मी से दूर रहने बोलती है, लेकिन वो रक्षा बंधन के दिन उससे राखी बंधाने उसके पास चले जाता है। बाद में एक दुर्घटना में वो अपना एक हाथ खो देता है। उसकी माँ लक्ष्मी को ही इसका कारण मानती है। लक्ष्मी के पिता और सौतेली माँ उसकी शादी सेना के एक अधिकारी, अमर ([[ऋषि कपूर]]) से तय कराते हैं। शादी होने के बाद धनराज की मौत हो जाती है और सारी संपत्ति भी चले जाती है। उनकी हालत इतनी खराब हो जाती है कि उन्हें बंगले से बाहर होना पड़ता है। इसी बीच लक्ष्मी का गर्भपात हो जाता है। अमर से डॉक्टर कहता है कि यदि लक्ष्मी माँ बनती है तो उसकी मौत हो जाएगी। किसी को दुःख न हो, इस कारण अमर ये बात किसी को नहीं बताता है। अमर की माँ को लगता है कि अब लक्ष्मी को कोई बच्चा नहीं होगा और वो अब उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगती है ताकि अमर की किसी और लड़की से शादी करा सके। लक्ष्मी एक दिन अमर को गर्भपात और उसके प्रभाव के बारे में बात करते हुए सुन लेती है। वो फैसला करती है कि चाहे वो मर भी जाये, लेकिन वो बच्चे को जन्म जरूर देगी। वो अमर को ताने मारती है और उत्तेजित करती है, जिससे अमर भूल जाता है कि उसकी बीवी गर्भवती होने पर मर जाएगी और वो उसके साथ रात गुजारता है। अगले दिन वो डर जाता है कि ये उसने क्या कर दिया, पर वो डॉक्टर से बात करना छोड़, काम पर चले जाता है। अमर के जाने के बाद उसकी माँ लक्ष्मी को घर से निकाल देती है। लक्ष्मी उस गाँव में ही इधर उधर काम कर अपना जीवन बिताते रहती है और एक बच्चे को जन्म देती है। बच्चे को जन्म देने के बाद वो उसे ससुराल ले जाती है और अपनी आखिरी सांस लेते समय ही अमर घर आता है। लक्ष्मी की मौत हो जाती है और परिवार वाले बस यही सोचते रह जाते हैं कि काश उन लोगों ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया होता। इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है। == मुख्य कलाकार == * [[ऋषि कपूर]] - अमर खन्ना * [[जूही चावला]] - लक्ष्मी खन्ना * [[दीपक तिजोरी]] - सूरज धनराज * [[फरहीन]] - किरन * [[अनुपम खेर]] - धनराज * [[कादर ख़ान]] - चाचा * [[बिन्दू]] - श्रीमती धनराज * [[शुभा खोटे]] - कमला खन्ना * [[आलोक नाथ]] - राम खन्ना * [[अंजना मुमताज़]] - शांति * [[बीना बैनर्जी|बीना]] - गीता * [[जॉनी लीवर]] - दिलीप बोस / चंपा बोस * [[मोहनीश बहल]] - विकी (अतिथि भूमिका) * [[तेज सप्रू]] - तेजा * [[दिनेश हिंगू]] == संगीत == {{Tracklist | heading = गीत | extra_column = गायक | all_lyrics = [[समीर (गीतकार)|समीर]] | all_music = [[नदीम-श्रवण]] | title1 = अपनी भी जिंदगी में | extra1 = [[कुमार सानु]], [[अलका याज्ञिक]] | length1 = 6:39 | title2 = बाबुल दे दो दुआ | extra2 = [[सुरेश वाडकर]], अलका याज्ञिक | length2 = 6:59 | title3 = बोझ से ग़मों के | extra3 = अलका याज्ञनिक | length3 = 1:46 | title4 = चाँदी की डोरी | extra4 = अलका याज्ञनिक | length4 = 2:26 | title5 = दर्द सहेंगे कुछ न कहेंगे | extra5 = [[मनहर उधास]], [[साधना सरगम]] | length5 = 5:15 | title6 = मैं करती हूँ तुझे प्यार | extra6 = कुमार सानु, अलका याज्ञिक | length6 = 5:17 | title7 = नज़र जिधर जिधर जाए | extra7 = कुमार सानु, अलका याज्ञिक | length7 = 5:11 | title8 = रब ने भी मुझ पे सितम | extra8 = अलका याज्ञिक | length8 = 9:14 | title9 = सावन आया बादल छाये | extra9 = साधना सरगम, कुमार सानु | length9 = 5:56 }} ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * {{imdb title|0173156|साजन का घर}} * इस फिल्म को नाम श्री सत्य नारायण साह जी के द्वारा फिल्म रिलीज होने से पहले दी गई थी, जो कि बिहार के निवासी है। [[श्रेणी:1994 में बनी हिन्दी फ़िल्म]] [[श्रेणी:नदीम–श्रवण द्वारा संगीतबद्ध फिल्में]] j64zhamy8nst7gdfxs6vswet7t3xuv2 6543716 6543689 2026-04-25T00:49:16Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) के अवतरण 6452813 पर पुनर्स्थापित : पूर्ववत किया 6543716 wikitext text/x-wiki {{Infobox Film | name = साजन का घर | image = साजन का घर.jpg | caption = '''साजन का घर''' का पोस्टर | producer = सुनील बोहरा <br /> सुरेंद्र बोहरा <br /> फारूक <br /> नूतन | director = सुरेंद्र कुमार बोहरा | music = [[नदीम श्रवण]] | writer = | starring = [[ऋषि कपूर]], <br />[[जूही चावला]], <br />[[दीपक तिजोरी]], <br />[[अनुपम खेर]], <br />[[बिन्दू]] <br /> | screenplay = | released = 29 अप्रैल, 1994 | country = [[भारत]] | language = [[हिन्दी]] | budget = }} '''साजन का घर''' 1994 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है। इसका निर्देशन सुरेंद्र कुमार बोहरा ने किया और मुख्य भूमिकाओं में [[ऋषि कपूर]] और [[जूही चावला]] है।<ref>{{cite news |title=कभी ऐसी दिखती थीं जूही चावला, इस वजह से लुक में आ गया इतना चेंज |url=https://bollywood.bhaskar.com/news/ENT-BOL-IFTM-juhi-chawla-suffered-most-frightening-chemical-reaction-on-face-5839087-PHO.html |accessdate=21 जुलाई 2018 |work=[[दैनिक भास्कर]] |date=28 मार्च 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180721073323/https://bollywood.bhaskar.com/news/ENT-BOL-IFTM-juhi-chawla-suffered-most-frightening-chemical-reaction-on-face-5839087-PHO.html |archive-date=21 जुलाई 2018 |url-status=dead }}</ref> फिल्म व्यवसायिक रूप से सफल रही थी और इसे जूही चावला की सुपरहिट फिल्मों में गिना जाता है।<ref>{{cite news |title=Happy Birthday Juhi : दिलकश अदाओं से जूही ने करोड़ों लोगों को बनाया दीवाना |url=http://www.chauthiduniya.com/2017/11/happy-birthday-juhi-chawla-juhi-made-crores-of-crazy-people-from-savory-aday.html |accessdate=21 जुलाई 2018 |work=[[चौथी दुनिया]] |date=13 नवम्बर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180721073237/http://www.chauthiduniya.com/2017/11/happy-birthday-juhi-chawla-juhi-made-crores-of-crazy-people-from-savory-aday.html |archive-date=21 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> == संक्षेप == धनराज ([[अनुपम खेर]]) एक गरीब और बहुत ही ज्यादा लालची इंसान रहता है। उसकी पत्नी एक बेटी, लक्ष्मी ([[जूही चावला]]) को जन्म देने के तुरंत बाद मर जाती है। वहीं उसके जन्म के साथ ही वो एक बहुत ही बड़ी लॉटरी भी जीत जाता है, और काफी अमीर हो जाता है। धनराज को लॉटरी जीतने के बावजूद भी ऐसा लगता है कि उसकी बेटी अशुभ या खराब किस्मत वाली है और उसके जन्म लेने के कारण ही उसकी पत्नी की मौत हुई है। वो सारा दोष उसकी बेटी, लक्ष्मी पर लगा देता है और उसे देखने से भी इंकार कर देता है। इसके बाद वो दूसरी शादी कर लेता है। उसके दूसरी बीवी से उसके घर एक पुत्र, सूरज ([[दीपक तिजोरी]]) का जन्म होता है। लक्ष्मी और सूरज बड़े हो जाते हैं। इतने सालों बाद भी धनराज और उसकी सौतेली माँ उसे बुरी किस्मत वाली ही सोचते रहते हैं और उसके साथ बहुत खराब व्यवहार करते रहते हैं। सूरज इस बात से असहमत रहता है कि उसकी बहन बुरी किस्मत वाली है। वो जितना हो सकते, उतना अपनी बहन को उनसे बचाने की कोशिश करते रहता है। उसकी माँ सूरज को लक्ष्मी से दूर रहने बोलती है, लेकिन वो रक्षा बंधन के दिन उससे राखी बंधाने उसके पास चले जाता है। बाद में एक दुर्घटना में वो अपना एक हाथ खो देता है। उसकी माँ लक्ष्मी को ही इसका कारण मानती है। लक्ष्मी के पिता और सौतेली माँ उसकी शादी सेना के एक अधिकारी, अमर ([[ऋषि कपूर]]) से तय कराते हैं। शादी होने के बाद धनराज की मौत हो जाती है और सारी संपत्ति भी चले जाती है। उनकी हालत इतनी खराब हो जाती है कि उन्हें बंगले से बाहर होना पड़ता है। इसी बीच लक्ष्मी का गर्भपात हो जाता है। अमर से डॉक्टर कहता है कि यदि लक्ष्मी माँ बनती है तो उसकी मौत हो जाएगी। किसी को दुःख न हो, इस कारण अमर ये बात किसी को नहीं बताता है। अमर की माँ को लगता है कि अब लक्ष्मी को कोई बच्चा नहीं होगा और वो अब उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगती है ताकि अमर की किसी और लड़की से शादी करा सके। लक्ष्मी एक दिन अमर को गर्भपात और उसके प्रभाव के बारे में बात करते हुए सुन लेती है। वो फैसला करती है कि चाहे वो मर भी जाये, लेकिन वो बच्चे को जन्म जरूर देगी। वो अमर को ताने मारती है और उत्तेजित करती है, जिससे अमर भूल जाता है कि उसकी बीवी गर्भवती होने पर मर जाएगी और वो उसके साथ रात गुजारता है। अगले दिन वो डर जाता है कि ये उसने क्या कर दिया, पर वो डॉक्टर से बात करना छोड़, काम पर चले जाता है। अमर के जाने के बाद उसकी माँ लक्ष्मी को घर से निकाल देती है। लक्ष्मी उस गाँव में ही इधर उधर काम कर अपना जीवन बिताते रहती है और एक बच्चे को जन्म देती है। बच्चे को जन्म देने के बाद वो उसे ससुराल ले जाती है और अपनी आखिरी सांस लेते समय ही अमर घर आता है। लक्ष्मी की मौत हो जाती है और परिवार वाले बस यही सोचते रह जाते हैं कि काश उन लोगों ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया होता। इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है। == मुख्य कलाकार == * [[ऋषि कपूर]] - अमर खन्ना * [[जूही चावला]] - लक्ष्मी खन्ना * [[दीपक तिजोरी]] - सूरज धनराज * [[फरहीन]] - किरन * [[अनुपम खेर]] - धनराज * [[कादर ख़ान]] - चाचा * [[बिन्दू]] - श्रीमती धनराज * [[शुभा खोटे]] - कमला खन्ना * [[आलोक नाथ]] - राम खन्ना * [[अंजना मुमताज़]] - शांति * [[बीना बैनर्जी|बीना]] - गीता * [[जॉनी लीवर]] - दिलीप बोस / चंपा बोस * [[मोहनीश बहल]] - विकी (अतिथि भूमिका) * [[तेज सप्रू]] - तेजा * [[दिनेश हिंगू]] == संगीत == {{Tracklist | heading = गीत | extra_column = गायक | all_lyrics = [[समीर (गीतकार)|समीर]] | all_music = [[नदीम-श्रवण]] | title1 = अपनी भी जिंदगी में | extra1 = [[कुमार सानु]], [[अलका याज्ञिक]] | length1 = 6:39 | title2 = बाबुल दे दो दुआ | extra2 = [[सुरेश वाडकर]], अलका याज्ञिक | length2 = 6:59 | title3 = बोझ से ग़मों के | extra3 = अलका याज्ञनिक | length3 = 1:46 | title4 = चाँदी की डोरी | extra4 = अलका याज्ञनिक | length4 = 2:26 | title5 = दर्द सहेंगे कुछ न कहेंगे | extra5 = [[मनहर उधास]], [[साधना सरगम]] | length5 = 5:15 | title6 = मैं करती हूँ तुझे प्यार | extra6 = कुमार सानु, अलका याज्ञिक | length6 = 5:17 | title7 = नज़र जिधर जिधर जाए | extra7 = कुमार सानु, अलका याज्ञिक | length7 = 5:11 | title8 = रब ने भी मुझ पे सितम | extra8 = अलका याज्ञिक | length8 = 9:14 | title9 = सावन आया बादल छाये | extra9 = साधना सरगम, कुमार सानु | length9 = 5:56 }} ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * {{imdb title|0173156|साजन का घर}} [[श्रेणी:1994 में बनी हिन्दी फ़िल्म]] [[श्रेणी:नदीम–श्रवण द्वारा संगीतबद्ध फिल्में]] bnp3fyz5hb2i9o412xzkrjfo42meew0 कृष्णकुमार बिड़ला 0 46007 6543685 5841516 2026-04-24T17:46:01Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543685 wikitext text/x-wiki {{आज का आलेख}} {{Infobox Celebrity | name = कृष्णकुमार बिड़ला | image = | image_size = 200px | birth_date = [[१२ अक्तूबर|१२ अक्टूबर]], [[१९१७]] | birth_place = | death_date = [[३० अगस्त]], [[२००८]] | death_place = | occupation = [[उद्योगपति]] | ethnicity = [[मारवाड़ी]] | religion = [[हिन्दू]] | salary = | networth = <!-- {{gain}} [[US$]] --> | spouse = मनोरमा देवी | website = | footnotes = | children = नंदिनी नुपानी,<br />[[शोभना भारतीय]] <br />सरोज पोतदार }} '''कृष्णकुमार बिड़ला''' ([[१२ अक्तूबर|१२ अक्टूबर]], [[१९१८]] - [[३० अगस्त]], [[२००८]]) भारत के प्रख्यात उद्योगपति और [[राज्य सभा|राज्यसभा]] के पूर्व [[राज्य सभा]] सदस्य थे। [[घनश्यामदास बिड़ला|घनश्याम दास बिड़ला]] के पुत्र कृष्णकांत बिड़ला का जन्म [[१२ अक्तूबर|१२ अक्टूबर]], [[१९१८]] को [[राजस्थान]] के [[पिलानी]] में हुआ था। उनके पिता [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वतंत्रता संग्राम]] के समय [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] के समर्थकों और [[महात्मा गांधी|गांधी जी]] के निकटवर्तियों में शामिल थे। उनकी उच्च शिक्षा [[कोलकाता]], [[दिल्ली]] और [[पंजाब विश्वविद्यालय]] से हुई।<ref name="दैट्स">[http://thatshindi.oneindia.in/news/2008/08/30/200808303316900.html के. के. बिड़ला के निधन पर उद्योग जगत में शोक] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20191020095217/https://hindi.oneindia.com/news/2008/08/30/200808303316900.html |date=20 अक्तूबर 2019 }}। दैट्स हिन्दी। शनिवार, अगस्त 30, 2008</ref> ये [[१९८४]] से [[२०००]] तक लगातार १८ वर्षों के लिये राज्यसभा के सदस्य भी रहे और इस दौरान [[भारतीय संसद|संसद]] की कई समितियों की अध्यक्षता की। भारतीय [[चीनी]] उद्योग के वे संस्थापक सदस्यों में थे।<ref>[http://rashtryaujala.blogspot.com/2008/08/blog-post_2790.html उद्योगपति के अलावा भी बहुत कुछ थे के. के. बिड़ला]। राष्ट्रीय उजाला</ref> बिड़ला के औद्योगिक साम्राज्य में चीनी, उर्वरक, रसायन, हैवी इंजीनियरिंग, वस्त्र, जहाजरानी और समाचार-पत्र जैसे मुख्य उद्योग शामिल हैं। कृष्ण कुमार एक उद्योगपति होने के अलावा एक सम्मानित सांसद, समाजसेवी और विद्वान व्यक्ति थे। [[१९६१]] में वे कलकत्ता के शेरिफ चुने गए थे और [[१९९७]] में उन्हें [[पांडीचेरी विश्वविद्यालय|पांडिचेरी विश्वविद्यालय]] ने डॉक्टर ऑफ लेटर्स से सम्मानित किया था। उन्होंने भारतीय चीनी उद्योग एसोशिएसन, फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स (''फिक्की'') और इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स (आईसीसी) की भी अध्यक्षता की। उन्होंने [[के के बिड़ला फाउंडेशन|केके बिड़ला फाउंडेशन]] की स्थापना की, जो [[भारतीय साहित्य]], वैज्ञानिक अनुसंधान और भारतीय [[दर्शनशास्त्र]] में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा करता है।<ref name="दैट्स"/> [[हिन्दुस्तान टाईम्स|हिन्दुस्तान टाइम्स]] और बिड़ला समूह के अनेक उद्योगों के अध्यक्ष बिड़ला के परिवार में उनकी तीन पुत्रियाँ नंदिनी नुपानी, शोभना भारतीय और सरोज पोतदार हैं। शोभना भारतीय भारत के बड़े समाचारपत्र [[हिन्दुस्तान टाईम्स|हिन्दुस्तान टाइम्स]] की संपादकीय सलाहकार हैं। उनकी पत्नी मनोरमा देवी बिड़ला का इनसे एक माह पूर्व जुलाई, २००८ में निधन हो गया था। == इन्हें भी देखें == * [[बिड़ला परिवार]] * [[घनश्यामदास बिड़ला]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * [http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4770068/ भारतीय उद्योग जगत के मजबूत स्तंभ थे बिड़ला]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} (याहू-जागरण) [[श्रेणी:बिड़ला परिवार]] [[श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना]] 0t30fpwomq2ouyf2lq9d7k71mulr2of मेहरानगढ़ 0 47322 6543804 6454254 2026-04-25T09:36:21Z The Sorter 845290 6543804 wikitext text/x-wiki {{Infobox military installation|location=[[जोधपुर]], [[राजस्थान]], [[भारत]]|image={{Photomontage | photo1a = Mehrangarh Fort sanhita.jpg | photo2a =Jodhpur mehrangarh fort (enhanced).jpg | size = 250 | color = #FFFFFF | border = 3 | color_border = #808080 | text = | text_background = #F5F5F5 }}|caption='''ऊपर''': दिन में क़िले का दृश्य <br/> '''नीचे''': दिन में क़िले का दृश्य|map_type=India Rajasthan#India|map_size=270px|map_caption=|type=[[क़िला]]|coordinates={{coord|26|17|53|N|73|01|08|E|type:landmark|display=inline,title}}|code=|built={{start date and age|1459}}|builder=[[राठौड़|राठौड़ राजवंश]]|materials=[[लाल बलुआ पत्थर]]|height=|used=|demolished=|condition=संरक्षित|open_to_public=हाँ|controlledby=मेहरानगढ़ संग्रहालय न्यास|garrison=|commanders=|occupants=|battles=|events=|website={{URL|https://www.mehrangarh.org/}}}} '''मेहरानगढ़''' एक ऐतिहासिक किला है जो [[जोधपुर]], [[राजस्थान]], [[भारत]] में स्थित है। यह एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है, जो आसपास के मैदानों से लगभग 122 मीटर (400 फीट) ऊपर उठता है, और इसका परिसर लगभग 1,200 एकड़ (486 हेक्टेयर) में फैला हुआ है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=uSsKEAAAQBAJ&pg=PP5&dq=%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC+%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&sa=X&ved=2ahUKEwj9jILQlsSOAxWfhq8BHdVLERoQ6AF6BAgNEAM#v=onepage&q=%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC%20%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE&f=false|title=MERE DESH KE PRASIDDHA KILE: Mere Desh Ke Prasiddha Kile: India's Celebrated Forts - Exploring the Rich History of India's Renowned Fortresses|last=KUMAR|first=ANUJ|date=2020-04-19|publisher=Prabhat Prakashan|language=hi}}</ref> इसकी स्थापना लगभग 1459 में [[राठौड़|राठौड़ वंश]] के शासक [[राव जोधा]] द्वारा की गई थी,<ref>{{Cite web|url=https://rajasthanhistory.com/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97/|title=मेहरानगढ़ दुर्ग|last=Gupta|first=Dr Mohanlal|date=2024-10-01|website=राजस्थान - शूरवीरों, संतों एवं सुरों की धरती|language=en-US|access-date=2025-07-17}}</ref> हालांकि इसका अधिकांश वर्तमान स्वरूप 17वीं शताब्दी में उनके उत्तराधिकारियों द्वारा बनाया गया था। मेहरानगढ़ किला विशाल दीवारों द्वारा संरक्षित है। इस किले का प्रवेश द्वार एक पहाड़ी के ऊपर है जो बेहद शाही है। किले में सात द्वार हैं जिनमें विक्ट्री गेट, फतेह गेट, भैरों गेट, डेढ़ कामग्रा गेट, फतेह गेट, मार्टी गेट और लोहा गेट के नाम शामिल है। == मेहरानगढ़ किले का इतिहास == मेहरानगढ़ किले का इतिहास काफी दिलचस्प है जो हमें उस समय में वापस ले जाता है जब 15 वीं शताब्दी के दौरान राठौर शासक राव जोधा ने 1459 में जोधपुर की स्थापना की थी। राजा राम मल के पुत्र राव जोधा ने शहर को मंडोर से शासित किया लेकिन फिर उसने अपनी राजधानी को जोधपुर स्थानांतरित कर दिया था। इसके बाद उन्होंने भाऊचेरिया पहाड़ी पर किले की नीव रखी जिसकी दूरी मंडोर से सिर्फ 9 किमी थी। ‘मेहरान’ का अर्थ सूर्य है इसलिए राठोरों ने अपने मुख्य देवता सूर्य के नाम से इस किले को मेहरानगढ़ किले के रूप में नामित किया। इस किले के मुख्य निर्माण के बाद जोधपुर के अन्य शासकों मालदेव महाराजा, अजीत सिंह महाराजा, तखत सिंह और महाराजा हनवंत सिंह द्वारा इस किले में अन्य निर्माण किए, मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण के समय एक व्यक्ति की स्वैच्छिक बलि चाहिए थी जिसके लिए राजाराम मेघवाल ने स्वैच्छिक बलि दी थी । [[चित्र:DSC 5097b Mehrangarh.jpg|अंगूठाकार|मेहरानगढ़ किले का आंतरिक भाग]] == मेहरानगढ़ किले की वास्तुकला == 500 साल की अवधि में मेहरानगढ़ किले और महलों को बनाया गया था। किले की वास्तुकला में आप 20 वीं शताब्दी की वास्तुकला की विशेषताओं के साथ 5 वीं शताब्दी की बुनियादी वास्तुकला शैली को भी देख सकते हैं। किले में 68 फीट चौड़ी और 117 फीट लंबी दीवारें है। मेहरानगढ़ किले में सात द्वार हैं जिनमें से जयपोली सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। किले की वास्तुकला 500 वर्षों की अवधि के विकास से गुजरी है। महाराजा अजीत सिंह के शासन के समय इस किले की कई इमारतों का निर्माण मुगल डिजाइन में किया गया है। इस किले में पर्यटकों को आकर्षित कर देने वाले सात द्वारों के अलावा मोती महल (पर्ल पैलेस), फूल महल (फूल महल), दौलत खाना, शीश महल (दर्पण पैलेस) और सुरेश खान जैसे कई शानदार शैली में बने कमरें हैं। मोती महल का निर्माण राजा सूर सिंह द्वारा बनवाया गया था। शीश महल, या हॉल ऑफ मिरर्स बेहद आकर्षक है जो अपनी दर्पण के टुकड़ों पर जटिल डिजाइन की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। फूल महल का निर्माण महाराजा अभय सिंह ने करवाया था। ==मेहरानगढ़ फोर्ट की विशेषता == मेहरानगढ़ किला राजस्थान के सबसे बड़े, संरक्षित और सबसे प्रभावशाली स्मारकों में से एक है। यह किला एक लंबवत चट्टान पर बना हुआ है और यह लगभग चार सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है। किले के निर्माण के लिए राव जोधा को एक ऋषि चीरिया नाथजी को जबरदस्ती इस जगह से हटाया था जिसके बाद उस ऋषि ने राजा को शाप दिया था कि इस किले को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन बाद में राव जोधा ने उनके लिए एक मंदिर और एक घर बनवाकर उन्हें प्रसन्न किया। जब आप इस किले को देखने के लिए जायेंगे तो इसके मुख्य द्वार के सामने आपको कुछ लोग लोक नृत्य करते नजर आयेंगे। कई हॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्मों को किले में शूट किया गया है जिसमें फिल्म द डार्क नाइट राइजेस, द लायन किंग,और ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के नाम शामिल हैं। ==मेहरानगढ़ किले का दौरा करने का सबसे अच्छा समय == यहां जाने का सबसे अच्छा समय सर्दियों के मौसम का है। अक्टूबर से मार्च के के महीनों के बीच यहां का मौसम काफी ठंडा और सुखद रहता है। इस मौसम में आप पूरे किले को एक्सप्लोर कर सकते हैं। किला घूमने के लिए आप सर्दियों के मौसम में सुबह के समय जाएँ। <big>'''मेहरानगढ़ किला जोधपुर समय'''</big> {| class="wikitable" !दिन !समय |- |सोमवार |[https://www.esyearning.com/top-10-universities-in-the-world-2024-edition/ सुबह] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20240304163401/https://www.esyearning.com/top-10-universities-in-the-world-2024-edition/ |date=4 मार्च 2024 }} 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |मंगलवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |बुधवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |गुरुवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |शुक्रवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |शनिवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |- |रविवार |सुबह 9:00 बजे - शाम 5:00 बजे तक |} ===== '''<big>मेहरानगढ़ किला जोधपुर प्रवेश टिकट</big>''' ===== {| class="wikitable" !'''टिकट''' !'''राशि (रु.)''' |- |अंतर्राष्ट्रीय अतिथि (ऑडियो शामिल है) |600 |- |अंतर्राष्ट्रीय अतिथि (छात्र) |400 |- |घरेलू मेहमान |100 |- |घरेलू मेहमान (वरिष्ठ नागरिक, छात्र, अर्धसैनिक कर्मी) |50 |- |फोटोग्राफी परमिट: फिर भी |100 |- |फोटोग्राफी परमिट: वीडियो |200 |- |लिफ्ट (एकतरफ़ा) |50 |- |टूर एस्कॉर्ट शुल्क |120 |- |ऑडियो गाइड |180 |- |ऑडियो गाइड (रियायत) |120 |} == जोधपुर में स्थानीय भोजन और रेस्तरां == जोधपुर एक ऐसा शहर है जहां के व्यंजन मिर्च मसाले से भरपूर होते हैं। यहां पर पर्याप्त मात्रा में स्ट्रीट फूड और मिठाइयां उपलब्ध हैं। यहां आप मिर्ची बड़ा, मावा कचोरी और प्याज़ कचोरी जैसे कुछ स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड का स्वाद भी ले सकते हैं इसके अलावा यहां के मखानिया लस्सी भी काफी लोकप्रिय है। अगर आप इस शहर में कुछ मीठा खाना चाहते हैं तो यहां मिलने वाले भोग बेसन की चक्की, मावे की कचौरी, मोतीचूर के लड्डू और मखान वडे का मजा भी ले सकते हैं। == मेहरानगढ़ किले के आसपास पर्यटन स्थल == '''1. राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क''' राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क किले के पास स्थित है जो प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग के सामान है। यह पार्क 72 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ है जहां रेगिस्तान और शुष्क वनस्पति पाई जाती है। इस पार्क में पर्यटक गाइड के साथ 880 से 1100 मीटर लंबे रोमांचक रास्ते जा सकते हैं जहां पर कुछ अनोखे पौधों को देखा जा सकता है। '''2.चोकेलो गार्डन''' चोकेलो गार्डन मेहरानगढ़ किले के ठीक नीचे स्थित है जिसे आपको अपनी किले की यात्रा में जरुर शामिल करना चाहिए। यह गार्डन 18 वीं शताब्दी का है जिसके बाद इसका जीर्णोद्धार किया गया है। इस गार्डन में एक रेस्टोरेंट भी है जहां से आप मनोरम दृश्य का आनंद लिया जा सकता है। '''3. नागणेचजी मंदिर''' नागणेचजी मंदिर किले के बिलकुल दाईं ओर स्थित है जिसका निर्माण 14 वीं शताब्दी में किया गया था, जब राव धुहड़ ने मूर्ति को मारवाड़ में लाया था जिसको बाद में किले में स्थापित कर दिया गया था। '''4. चामुंडा माताजी मंदिर''' जब राव जोधा अपनी अपनी राजधानी को मंडोर से जोधपुर स्थानांतरित किया था तब वह अपने साथ दुर्गा माता की मूर्ति को भी ले गए थे। इस मूर्ति को मेहरानगढ़ किले में स्थापित किया गया था जिसे आज चामुंडा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। [[चित्र:Mehrangarh Fort.jpg|right|thumb|मेहरानगढ़ दुर्ग]][[चित्र:Chamunda Devi Temple Jodhpur.jpg|right|thumb|चामुंडा माता मंदिर]] <ref>{{Cite web|url=https://hindi.holidayrider.com/mehrangarh-fort-in-hindi/|title=मेहरानगढ़ किले का इतिहास और घूमने की जानकारी - Information About The History Of Mehrangarh Fort In Hindi|date=2019-03-31|website=Holidayrider.Com|language=en-US|access-date=2022-09-12}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{भारत के किले}} [[श्रेणी:जोधपुर]] [[श्रेणी:राजस्थान में दुर्ग]] [[श्रेणी:राजस्थान का इतिहास]] [[श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना]] b0b0tn8ezwzpuhvh6csgs00yevxcdon डाबर 0 48822 6543664 5967382 2026-04-24T16:26:50Z ~2026-24944-85 921699 6543664 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक कम्पनी | name = Dabur India Limited | logo = [[चित्र:Dabur Logo.svg.png|150px]] | caption = Celebrate Life | company_type = [[सार्वजनिक कंपनी|सार्वजनिक]] ([[नैशनल स्टॉक एक्सचेंज|NSE]], [[बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज|BSE]]) | foundation = {{Start date and age|1884|df=yes}} | founder = डा. एस के बर्मन | defunct = | location_city = डाबर टॉवर, कौशाम्बी, साहिबाबाद, [[गाज़ियाबाद]] - 201010 (यूपी) | location_country = [[भारत]] | area_served = विश्वव्यापी | key_people = '''डा. आनन्द बर्मन'''<br /><small>[[चेयरमैन]]</small><br />'''मि. अमित बर्मन '''<br /><small>[[उप चेयरमैन]]</small><br />'''मि. सुनील दुग्गल'''<br /><small>[[मुख्य कार्यकारी अधिकारी]]</small> | industry = [[स्वास्थय सेवा]], [[भोजन]] | products = डाबर आँवला, च्यवनप्राश, वाटिका, हाजमोला | production = | services = | revenue = | operating_income = | net_income = (INR) 425 करोड़ (2008-09) | aum = | assets = (INR) 559 करोड़ (2008-09) | equity = | owner = | num_employees = 3000 (Approx.)<ref>{{Cite web |url=http://www.dabur.com/en/Investors1/Annual_reports/2008-09/KnowUsBetter.pdf |title=Annual Report |access-date=21 फ़रवरी 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110708220758/http://www.dabur.com/en/Investors1/Annual_reports/2008-09/KnowUsBetter.pdf |archive-date=8 जुलाई 2011 |url-status=dead }}</ref> | parent = | divisions = डाबर नेपाल प्रा॰लि॰ (नेपाल),<br /> डाबर एज़िप्ट लि॰ (एज़िप्ट),<br /> एशियन कंज्यूमर केयर (बांग्लादेश),<br /> एशियन कंज्यूमर केयर (पाकिस्तान),<br /> अफ्रीकन कंज्यूमर केयर (नाईज़ीरिया),<br /> नैचुरेल एल.एल.सी (रास अल खैमा-यूएई),<br /> वीकफ़ील्ड इंटरनैशनल (यूएई), and<br /> जैक़्लीन इंक. (यूएसए). | subsid = डाबर इंटरनैशनल,<br /> [http://www.femcareworld.com Fem Care Pharma],<br /> [http://www.newu.in newu] | homepage = [http://www.dabur.com Dabur.com] | footnotes = | intl = }} '''डाबर इण्डिया लिमिटेड''' [[भारत]] में स्वास्थ्य, व्यक्तिगत ध्यान एवं भोज्य उत्पादों के क्षेत्र में निवेश करने वाली चौथी सबसे बड़ी कम्पनी है। डाबर का '''च्यवनप्राश''' एवं '''हाजमोला''' बहुत ही लोकप्रिय है। == परिचय == 1884 में बर्मन परिवार ने जब एक छोटी आयुर्वेदिक दवा कंपनी के रूप में शुरुआत की थी तो 125 साल बाद यह नंबर वन कंपनी बन जाएगी किसी ने सोचा नहीं होगा। कोलकाता के बर्मन परिवार की कंपनी डाबर इंडिया लिमिटेड ने अब पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा दिया है। आयुर्वेदिक व प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में 125 साल की हो गई इस कंपनी का अब कोई सानी नहीं है। आज वह देश का हर्बल और नेचुरल प्रॉडक्ट की सबसे बड़ी पेशेवर कंपनी बन गई है। डाबर इंडिया के 250 से अधिक उत्पादों की बाजार में तूती बोल रही है। दवाई से लेकर फूड तक में हर जगह डाबर मौजूद दिखता है। डाबर के उत्पाद पूरी दुनिया के 60 से अधिक देशों में उपलब्ध हैं। सिर्फ विदेश में ही इसका कारोबार 500 करोड़ रुपए का है। [[कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय]] से एमबीए की डिग्री हासिल कर डाबर इंडिया लिमिटेड की कमान संभालने वाले कंपनी के उपाध्यक्ष अमित बर्मन एक पायलट भी हैं। उन्हें हवा में उड़ना बहुत अच्छा लगता है। अगर यह कहें कि अमित बर्मन की उड़ने की इसी ललक ने डाबर इंडिया लिमिटेड को आयुर्वेद की बुलंदियों पर पहुँचा दिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कहते हैं अमित बर्मन कंपनी के 'पायलट' हैं तो इसकी उड़ने की सीमा आकाश ही है। ==आयुर्वेदिक उत्पाद== [[पतंजलि आयुर्वेद]] की बढती चुनौती से निपटने के लिये अब डाबर कंपनी अपनी नई रणनीति तैयार कर रही है, जिसके साथ ही कंपनी अपने आयुर्वेदिक उत्पादों में आधुनिक समय के मुताबिक बदलाव कर बाज़ार में अपने नए उत्पाद उतारने की तैयारी में है। <ref>{{cite news|url=http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/dabur-plans-to-counter-patanjali/articleshow/50435848.cms|title=dabur-plans-to-counter-patanjali|publisher=नवभारत टाइम्स|access-date=5 जनवरी 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160106041048/http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/dabur-plans-to-counter-patanjali/articleshow/50435848.cms|archive-date=6 जनवरी 2016|url-status=live}}</ref> डाबर शुरूआत में महिलाओं के हेल्थकेयर से जुड़े प्रोडक्टस को आधुनिक फॉर्मेट में लाएगा और इसके बाद बेबी सेगमेंट में अपने प्रोडक्टस लॉंच करेगा। <ref>{{Cite web |url=http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/Dabur-plans-to-counter-Patanjali/articleshow/50431387.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=9 जनवरी 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160106144427/http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/Dabur-plans-to-counter-Patanjali/articleshow/50431387.cms |archive-date=6 जनवरी 2016 |url-status=live }}</ref> == सन्दर्भ == {{reflist}} ==इन्हें भी देखें== *[[आयुर्वेद]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20090917093616/http://www.dabur.com/ डाबर का जालघर] * [https://web.archive.org/web/20100302002209/http://www.nafanuksan.com/DetailNews.aspx?newsid=2910&categoryid=124&status=other डाबर के तेजी से बढ़ते कदम] *[https://homegrown.co.in/homegrown-voices/how-a-19th-century-bengali-doctor-built-the-worlds-largest-ayurvedic-company?utm_source=pocket-newtab-en-intl How A 19th-Century Bengali Doctor Built The World's Largest Ayurvedic Company] [[श्रेणी:संस्थान]] [[श्रेणी:भारत की दवा कंपनियां]] {{प्रमुख भारतीय कंपनियाँ}} o2jiktyc8o6qjrjusc5d2fqkx4xcdcz केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो 0 49120 6543697 6536035 2026-04-24T20:05:00Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543697 wikitext text/x-wiki {{Infobox government agency | name = केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो<br>Central Bureau of Investigation | abbreviation = CBI | type = | seal = | seal_width = | seal_caption = | logo = Cbi logo.svg | logo_width = 200px | logo_caption = [[Seal (emblem)|Seal]] of CBI | motto = ''Industry, Impartiality, Integrity'' | employees = Sanctioned: 7274<br />Actual: 5685<br />Vacant: 1589 (21.84%)<br /><small>as on 01 Mar 2017</small><ref name=cbi_vacancy_Mar2017>{{cite web|title=OVER ALL VACANCY POSITION OF CBI AS ON 01.03.2017|url=http://www.cbi.nic.in/rt_infoact/cbi_vac20170301.pdf|page=01|accessdate=21 मार्च 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170321181846/http://www.cbi.nic.in/rt_infoact/cbi_vac20170301.pdf|archive-date=21 मार्च 2017|url-status=dead}}</ref> | budget = {{INRConvert|695.62|c|1}} <small>(FY2017-18)</small><ref>{{Cite web |url=http://www.financialexpress.com/budget/union-budget-2017-cbi-gets-marginal-increase-of-8-31-pc-in-budgetary-allocation/533255/ |title=Union Budget 2017: CBI gets marginal increase of 8.31 pc in budgetary allocation |access-date=18 सितंबर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170918154425/http://www.financialexpress.com/budget/union-budget-2017-cbi-gets-marginal-increase-of-8-31-pc-in-budgetary-allocation/533255/ |archive-date=18 सितंबर 2017 |url-status=live }}</ref> | formed = 1963 as the Special Police Establishment | headquarters = [[नई दिल्ली]], [[भारत]] | chief1_name = [[नरेन्द्र मोदी]] | chief1_position = प्रधानमन्त्री | jurisdiction = [[भारत सरकार]] | parent_agency = [[गृह मन्त्रालय]] | website = {{URL|http://cbi.nic.in/}} | footnotes = }} '''केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो''' ({{lang-en|Central Bureau of Investigation}}) या '''सीबीआई''' [[भारत सरकार]] की प्रमुख जाँच एजेन्सी है। यह [[अपराध|आपराधिक]] एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के मामलों की जाँच करने के लिये लगायी जाती है। यह कार्मिक एवम् प्रशिक्षण विभाग के अधीन कार्य करती है। यद्यपि इसका संगठन [[फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन]] से मिलता-जुलता है किन्तु इसके अधिकार एवं कार्य-क्षेत्र एफ़बीआई की तुलना में बहुत सीमित हैं। इसके अधिकार एवं कार्य दिल्ली विशेष पुलिस संस्थापन अधिनियम (Delhi Special Police Establishment Act), [[१९४६|1946]] से परिभाषित हैं। भारत के लिये सीबीआई ही [[इण्टरपोल|इन्टरपोल]] की आधिकारिक इकाई है। == इतिहास == केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो की उत्‍पत्ति भारत सरकार द्वारा सन् 1941 में स्‍थापित विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान से हुई है। उस समय विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान का कार्य द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान भारतीय युद्ध और आपूर्ति विभाग में लेन-देन में घूसखोरी और भ्रष्‍टाचार के मामलों की जांच करना था। विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान का अधीक्षण युद्ध विभाग के जिम्‍मे था।<ref>{{Cite web |url=http://cbi.nic.in/hn/aboutus/history.php |title=केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो का संक्षिप्त इतिहास |access-date=18 दिसंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20151219165804/http://cbi.nic.in/hn/aboutus/history.php |archive-date=19 दिसंबर 2015 |url-status=dead }}</ref> युद्ध समाप्ति के बाद भी, केन्‍द्र सरकार के कर्मचारियों द्वारा घूसखोरी और भ्रष्‍टाचार के मामलों की जांच करने हेतु एक केन्‍द्रीय सरकारी एजेंसी की जरूरत महसूस की गई। इसीलिए सन् 1946 में दिल्‍ली विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम के द्वारा विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान का अधीक्षण गृह विभाग को हस्‍तांतरित हो गया और इसके कामकाज को विस्‍तार करके भारत सरकार के सभी विभागों को कवर कर लिया गया। विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान का क्षेत्राधिकार सभी संघ राज्य क्षेत्रों तक विस्‍तृत कर दिया गया और सम्‍बन्धित राज्‍य सरकार की सहमति से राज्‍यों तक भी इसका विस्‍तार किया जा सकता था। दिल्‍ली विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान को इसका लोकप्रिय नाम ‘केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो’ गृह मंत्रालय संकल्‍प दिनांक 1.4.1963 द्वारा मिला। आरम्‍भ में केन्‍द्र सरकार द्वारा सूचित अपराध केवल केन्‍द्रीय सरकार के कर्मचारियों द्वारा भ्रष्‍टाचार से ही सम्‍बन्धित था। धीरे-धीरे, बड़ी संख्‍या में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्‍थापना के साथ ही इन उपक्रमों के कर्मचारियों को भी केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्यूरो के क्षेत्र के अधीन लाया गया। इसी प्रकार, सन्1969 में बैंकों के राष्‍ट्रीयकरण के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और उनके कर्मचारी भी केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो के क्षेत्र के अधीन आ गए। '''संगठन और रैंक संरचना''' अधिक जानकारी: सीबीआई संगठनात्मक चार्ट और भारत में पुलिस रैंकों की सूची सीबीआई ने एक निदेशक, पुलिस महानिदेशक या पुलिस (राज्य) के आयुक्त के रैंक के एक आईपीएस अधिकारी के नेतृत्व में है। निदेशक सीवीसी अधिनियम 2003 के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर चुना जाता है और 2 साल की अवधि है। सीबीआई में अन्य महत्वपूर्ण रैंकों आईआरएस द्वारा भी किया जा सकता है के रूप में आईपीएस अधिकारियों के रूप में अच्छी तरह से संभाला विशेष निदेशक, अतिरिक्त निदेशक, संयुक्त निदेशक, पुलिस उपमहानिरीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, उप अधीक्षक पुलिस. बाकी सीधे सीबीआई, उप निरीक्षक, सहायक उप निरीक्षक, हेड कांस्टेबल, वरिष्ठ कांस्टेबल और कांस्टेबल भर्ती कर रहे हैं। सीबीआई की वार्षिक रिपोर्ट कर्मचारी के अनुसार आमतौर पर अनुसचिवीय कर्मचारी, पूर्व संवर्ग पदों है जो तकनीकी प्रकृति, कार्यकारी स्टाफ और ईडीपी स्टाफ के आम तौर पर कर रहे हैं के बीच विभाजित है। हिन्दी भाषा स्टाफ आधिकारिक भाषाओं में से विभाग के अंतर्गत आता है। अनुसचिवीय कर्मचारी एलडीसी, UDC, अपराध आदि सहायकों कार्यकारी कर्मचारी कांस्टेबल, एएसआई, उप निरीक्षक, निरीक्षकों आदि ईडीपी कर्मचारी डाटा एंट्री ऑपरेटर, डाटा प्रोसेसिंग सहायकों, सहायक प्रोग्रामर, प्रोग्रामर और सर्व शिक्षा अभियान में शामिल है ==विवाद और आलोचना== केन्द्रीय अनुसंधान ब्यूरो प्रायः विवादों और आरोपों से घिरी रहती है। इस पर केन्द्रीय सरकार के एजेंट के रूप में पक्षपातपूर्ण काम करने का आरोप लगताहै। ===भ्रष्टाचार=== 2013 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने) आर. एम. लोढ़ा ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे “अपने मालिक की आवाज़ में बोलने वाला पिंजरे में बंद तोता” कहा था। उनका यह कथन इस व्यापक धारणा को प्रतिबिंबित करता है कि सत्ता में किसी भी राजनीतिक दल के रहते हुए सीबीआई पर अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप बना रहता है, जिससे उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।<ref name="reuters">{{cite news|url=http://in.reuters.com/article/cbi-supreme-court-parrot-coal-idINDEE94901W20130510 |archive-url=https://web.archive.org/web/20151220025736/http://in.reuters.com/article/cbi-supreme-court-parrot-coal-idINDEE94901W20130510 |archive-date=20 December 2015 |title=A 'caged parrot' - Supreme Court describes CBI |agency=[[रॉयटर्स]] |author=रॉस कोल्विन और सतरूपा भट्टाचार्य |date=10 मई 2013 |access-date=10 मई 2013 }}</ref><ref name="TOI">{{cite news|url=http://timesofindia.indiatimes.com/india/CBI-a-caged-parrot-heart-of-Coalgate-report-changed-Supreme-Court/articleshow/19952260.cms |title=CBI a 'caged parrot', 'heart' of Coalgate report changed: Supreme Court |work=[[द टाइम्स ऑफ इंडिया ]] |date=8 मई 2013 |access-date=8 मई 2013 }}</ref> सीबीआई के कथित राजनीतिक झुकाव<ref name="firstpost1">{{cite web | url=http://www.firstpost.com/politics/cbis-on-off-raids-how-congress-bureau-of-investigation-works-669666.html | title=CBI's on-off raids: How 'Congress Bureau of Investigation' works | publisher=firstpost.com | date=21 मार्च 2013 | access-date=2013-04-26 | author=वेंकी वेम्बू}}</ref> और कार्यशैली को लेकर समय-समय पर उसके पूर्व अधिकारियों ने भी गंभीर आपत्तियाँ दर्ज की हैं। पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह तथा संयुक्त निदेशक बी. आर. लाल ने संगठन के भीतर भाई-भतीजावाद, त्रुटिपूर्ण अभियोजन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उजागर किया है। विशेष रूप से, बी. आर. लाल ने अपनी पुस्तक “हू ओन्स सीबीआई” में विस्तार से वर्णन किया है कि किस प्रकार जाँच प्रक्रियाओं में हेरफेर किया जाता है और उन्हें जानबूझकर प्रभावित या पटरी से उतारा जाता है।<ref>{{cite news |url=http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2006-11-27/india/27799838_1_cbi-joint-director-hawala-official-letters |archive-url=https://web.archive.org/web/20121103163030/http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2006-11-27/india/27799838_1_cbi-joint-director-hawala-official-letters |archive-date=3 नवंबर 2012 |title=Origin of Hawala funds were not traced | first1=विश्व |last1=मोहन |newspaper=[[द टाइम्स ऑफ इंडिया]] |date=27 नवंबर 2006}}</ref> इसके अतिरिक्त, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त जानकारियों में भी संगठन के भीतर व्याप्त अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के संकेत मिले हैं।<ref>{{cite news|title=CBI Arrests Own Cop in Bribery Case |url=http://news.outlookindia.com/items.aspx?artid=775478|access-date=18 सितंबर 2012|newspaper=आउटलुक इंडिया|date=17 सितंबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130502151654/http://news.outlookindia.com/items.aspx?artid=775478|archive-date=2 मई 2013}}</ref><ref name="Adarsh Scam: CBI Arrests Own Lawyer, Ex-Cong MLC">{{cite news|url=http://news.outlookindia.com/items.aspx?artid=754366 |title=Adarsh Scam: CBI Arrests Own Lawyer, Ex-Cong MLC |date=6 मार्च 2012 |access-date=27 मार्च 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130502151002/http://news.outlookindia.com/items.aspx?artid=754366 |archive-date=2 मई 2013}}</ref> आरटीआई कार्यकर्ता कृष्णानंद त्रिपाठी ने यह आरोप लगाया कि उनके द्वारा किए गए खुलासों के कारण उन्हें सीबीआई द्वारा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा,<ref>{{cite news |url=http://www.mid-day.com/news/2010/apr/060410-Delhi-RTI-activist-complaint-CIC-CBI.htm |title=CBI is harassing me |author=अंशुमन जी दत्ता |publisher=मिड-डे |date=4 जून 2011 | access-date=14 जून 2011}}</ref> जो संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाता है।<ref>{{cite news |url=http://www.outlookindia.com/article.aspx?261778 |title=Grease on the Lens |author=सैकत दत्ता |publisher=outlookindia.com |date=21 सितंबर 2009 | access-date=9 October 2010}}</ref> इन्हीं कारणों से कई राज्यों ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। इन राज्यों का आरोप है कि केंद्र सरकार इस एजेंसी का उपयोग वैचारिक रूप से विरोधी दलों को अनुचित रूप से निशाना बनाने के लिए एक उपकरण के रूप में करती है।<ref name="general-consent">{{cite news|url=https://indianexpress.com/article/explained/sc-state-government-consent-cbi-investigation-7617317/ |title=General consent for the CBI: The law, and political reasons for its denial |work=[[द इंडियन एक्सप्रेस]]|date=12 नवंबर 2021 |author=दीप्तिमान तिवारी}}</ref> इस समूचे परिदृश्य से यह स्पष्ट होता है कि सीबीआई की विश्वसनीयता, स्वायत्तता और निष्पक्षता को लेकर व्यापक बहस और चिंताएँ निरंतर बनी हुई हैं। ===राजनीतिक हस्तक्षेप=== सामान्यतः, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपे जाने वाले मामले अत्यंत संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के होते हैं। प्रायः राज्य पुलिस विभाग किसी प्रकरण को सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित करने की अनुशंसा करते हैं, जो एक स्थापित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके अतिरिक्त, आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार भी किसी मामले को सीधे सीबीआई को हस्तांतरित कर सकती है, विशेषकर तब जब प्रकरण का दायरा व्यापक, जटिल या बहु-राज्यीय हो। हालाँकि, एजेंसी को कई प्रमुख घोटालों के कथित कुप्रबंधन को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।<ref name="CBI has long history of listening to its political master's voice">{{cite web | url=http://www.sunday-guardian.com/investigation/cbi-has-long-history-of-listening-to-its-political-masters-voice | title=CBI has long history of listening to its political master's voice | work=द संडे गार्जियन | access-date=1 फरवरी 2012 | archive-date=7 फरवरी 2012 | archive-url=https://web.archive.org/web/20120207101040/http://www.sunday-guardian.com/investigation/cbi-has-long-history-of-listening-to-its-political-masters-voice }}</ref><ref name="Restoring Public Confidence in CBI">{{cite web | url=http://www.outlookindia.com/article.aspx?269847 | title=Restoring Public Confidence in CBI | publisher=आउटलुक इंडिया| date=30 दिसंबर 2010 | access-date=1 फरवरी 2012}}</ref><ref name="OpenMagazine_CBI">{{cite web | url=http://www.openthemagazine.com/article/nation/the-congress-bureau-of-investigation | title=The Congress Bureau of Investigation: Big stick politics. Will it ever end? | publisher= ओपन द मैगज़ीन | date=6 अप्रैल 2013 | access-date=22 अप्रैल 2013}}</ref> इसके अतिरिक्त, उस पर यह आरोप भी लगाया गया है कि उसने कुछ उच्च-प्रोफ़ाइल राजनीतिक मामलों में अपेक्षित तत्परता और कठोरता नहीं दिखाई। पूर्व प्रधानमंत्री [[पी॰ वी॰ नरसिम्हा राव]], तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री [[जयललिता |जे. जयललिता]], बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री [[लालू प्रसाद यादव]], उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री [[मायावती]] तथा [[मुलायम सिंह यादव]] जैसे प्रभावशाली नेताओं से संबंधित मामलों में जाँच की गति और दिशा को लेकर प्रश्न उठाए गए हैं। आलोचकों का मत है कि इस प्रकार की ढिलाई या अनिश्चितता ने कई मामलों में अभियोजन को कमजोर किया, जिसके परिणामस्वरूप या तो आरोपित व्यक्तियों को बरी कर दिया गया या उनके विरुद्ध मुकदमा प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ सका।<ref name="guardian_cbi">{{cite news | url=http://www.sunday-guardian.com/investigation/cbi-ineffective-in-dealing-with-political-cases | title=CBI ineffective in dealing with political cases | work=[[द गार्डियन]] | date=26 जनवरी 2013 | access-date=2013-05-19 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> इन घटनाओं ने सीबीआई की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया है, जो आज भी सार्वजनिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20151219013432/http://cbi.nic.in/hn/index_hn.php सीबीआई का जालस्थल] * [http://www.prabhasakshi.com/crusade/National_News.aspx?title=सीबीआई_को_सरकार_से_मुक्त_किया_जाए:_किरण_बेदी&id=110821120043010111 सीबीआई को सरकार से मुक्त किया जाए: किरण बेदी]{{Dead link|date=मई 2021 |bot=InternetArchiveBot }} * [http://rajnama.com/?p=2029 अपनी सर्वोच्चता की छवि को खुद खंडित किया है सीबीआई ने] * [https://web.archive.org/web/20120321221644/http://www.janokti.com/%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE/%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-2/ सीबीआई की स्वतंत्रता] * [https://web.archive.org/web/20081013220931/http://www.indlawnews.com/ अद्यतन भारतीय न्यायिक समाचार] (Latest in Indian legal news) * '''[https://www.newtechapp.com/2020/12/cbi-full-form-hindi.html?m=1 सीबीआई क्या है जानें]''' {{भारत में कानून प्रवर्तन}} [[श्रेणी:भारत सरकार की कार्यकारी शाखा]] miti7yf0qu30ovztsuxabr02pn4d2e5 पाइथागोरस प्रमेय 0 50518 6543630 6453756 2026-04-24T14:29:57Z ~2026-25147-04 921689 /* इन्हें भी देखें */ 6543630 wikitext text/x-wiki {{Translation/Ref|en|Pythagorean theorem|oldid=286316408}} {{ज्यामिति}} {{त्रिकोणमिति}} '''पाइथागोरस''' या '''फ़ीसाग़ूरस प्रमेय''' [[यूक्लिडीय ज्यामिति]] में किसी [[समकोण त्रिभुज]] के तीनों भुजाओं के बीच एक सम्बन्ध बताने वाला प्रमेय है। इस [[प्रमेय]] को आमतौर पर एक [[समीकरण]] के रूप में निम्नलिखित तरीके से अभिव्यक्त किया जाता है- :<math>a^2 + b^2 = c^2\!\,</math> जहाँ ''c'' समकोण त्रिभुज के [[कर्ण]] की लंबाई है तथा ''a'' और ''b'' अन्य दो भुजाओं की लम्बाई है। [[पाइथागोरस]] [[यूनान]] के [[गणितज्ञ]] थे। परम्परानुसार उन्हें ही इस प्रमेय की खोज का श्रेय दिया जाता है<ref>{{cite book |last1=Thomas |first1=Heath |title=A History of Greek Mathematics (Vol. 1) |date=1921 |publisher=Oxford University Press |location=London |page=144 |url=https://www.wilbourhall.org/pdfs/heath/HeathVolI.pdf |access-date=14 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20161025124316/http://www.wilbourhall.org/pdfs/heath/HeathVolI.pdf |archive-date=25 अक्तूबर 2016 |url-status=dead }}</ref>। हालांकि यह माना जाने लगा है कि इस प्रमेय की जानकारी उनसे पूर्व तिथि की है। [[भारत]] के प्राचीन ग्रंथ [[बौधायन का शुल्बसूत्र|बौधायन शुल्बसूत्र]] में यह प्रमेय दिया हुआ है। काफी प्रमाण है कि बेबीलोन के गणितज्ञ भी इस सिद्धांत को जानते थे। == सूत्र के रूप में == अगर हम कर्ण की [[लम्बाई|लंबाई]] को ''c'' और अन्य दो भुजाओं की लंबाई को ''a'' और ''b'' लेते हैं, तो प्रमेय को निम्नलिखित समीकरण के रूप में व्यक्त किया जा सकता है: : <math>a^2 + b^2 = c^2\, </math> या, : <math> c = \sqrt{a^2 + b^2}. \,</math> यदि ''c'' तथा एक भुजा का मान पहले से दिया गया है और तीसरी भुजा की लंबाई निकालनी हो, तो निम्नलिखित समीकरण का उपयोग किया जा सकता है : : <math>c^2 - a^2 = b^2\, </math> या : <math>c^2 - b^2 = a^2.\, </math> यह समीकरण समकोण त्रिकोण के तीनों भुजाओं के बीच एक सरल सम्बन्ध प्रदान करता है। इस प्रमेय का सामान्यीकरण '[[कोज्या नियम]]' (Cosine rule) कहलाता है जिसकी सहायता से किसी भी त्रिकोण के तीसरी भुजा की लम्बाई की गणना की जा सकती है यदि शेष दो भुजाओं की लंबाई और उनके बीच के कोण की माप दी गयी हो। == प्रमाण == यह एक ऐसा [[प्रमेय]] है जिसके अन्य प्रमेयों की तुलना में सम्भवतः सर्वाधिक प्रमाण ज्ञात हैं ([[द्विघाती पारस्परिकता]] का नियम भी इस गौरव के लिए प्रतियोगी रह चुका है)। एलीशा स्कॉट लूमिस द्वारा रचित ''पायथागॉरियन थिअरम'' किताब में, 367 प्रमाण दिए गए हैं। === समरूप त्रिभुज के उपयोग से प्रमाण === [[चित्र:Proof-Pythagorean-Theorem.svg|thumb|right|समरूप त्रिभुज के उपयोग द्वारा प्रमाण]] पाइथागोरस प्रमेय के अधिकांश प्रमाणों की तरह, यह दो [[समरूप त्रिभुज|समरूप त्रिभुजों]] की भुजाओं के समानुपाती होने के गुण पर आधारित है। माना ''ABC'' एक समकोण त्रिभुज है, जिसमें कोण ''C'' समकोण है, जैसा आकृति में दिखाया गया है। हम ''C'' बिंदु से कर्ण पर लम्ब डालते हैं और भुजा ''AB'' के साथ उस लम्ब की लम्बाई ''H'' हैं। यह नया त्रिकोण ''ACH'' हमारे त्रिकोण ''ABC'' के समरूप है, क्योंकि उन दोनों में ही समकोण है (ऊंचाई की परिभाषा के द्वारा) और A कोण उनका हिस्सा है। इसका मतलब है की तीसरा कोण भी दोनों त्रिभुजों में समान है। इसी आधार पर त्रिभुज CBH भी ''ABC'' के समरूप है। इन समरूपताओं से हमें दो समानुपात प्राप्त होते हैं: जैसे :<math> BC=a, AC=b, \text{ and } AB=c, \!</math> तथा :<math> \frac{a}{c}=\frac{HB}{a} \mbox{ and } \frac{b}{c}=\frac{AH}{b}.\,</math> इन्हें ऐसे भी लिखा जा सकता है :<math>a^2=c\times HB \mbox{ and }b^2=c\times AH. \,</math> इन दो समीकरणों का संक्षेप करने पर, :<math>a^2+b^2=c\times HB+c\times AH=c\times(HB+AH)=c^2 .\,\!</math> अन्य शब्दों में, बौधायन प्रमेय : :<math>a^2+b^2=c^2.\,\!</math> === यूक्लिड के प्रमाण === [[चित्र:Illustration to Euclid's proof of the Pythagorean theorem.svg|thumb|यूक्लिड के तत्वों में प्रमाण]][[यूक्लिड|यूक्लिड के]] "एलिमेन्ट्स" (elements) में, पुस्तक 1 का प्रस्ताव 47, बौधायन प्रमेय निम्नलिखित लाइनों के साथ एक तर्क से साबित होता है।''A'', ''B'', ''C'' को समकोण त्रिकोण के कोने मानते हैं, जिसमें समकोण ''A'' पर होगा. ''A'' से कर्ण के विपरीत एक अधोलंब छोडें वर्ग में कर्ण पर.वो रेखा कर्ण पर वर्ग को दो आयातों में विभाजित करती है, प्रत्येक का समान क्षेत्र है क्यूंकि दोनों में से एक पैरों में वर्ग बनता है। औपचारिक प्रमाण के लिए, हमें चार प्राथमिक लेम्मटा की आवश्यकता है: # यदि दो त्रिकोण के दो पार्श्वों में से एक पार्श्व दूसरे के दो पार्श्वों के बराबर हो, प्रत्येक के लिए प्रत्येक और उन पार्श्वों द्वारा बना कोण बराबर हो, तो त्रिकोण अनुकूल हैं। (पार्श्व - कोण - पार्श्व प्रमेय) # एक त्रिकोण का क्षेत्रफल एक ही तल और ऊंचाई पर किसी भी समानांतर चतुर्भुज का आधा क्षेत्रफल है। # किसी भी वर्ग का क्षेत्रफल उसके दो पार्श्वों के उत्पाद के बराबर होता है। # किसी भी आयत का क्षेत्रफल उसके दो संलग्न पार्श्वों के उत्पाद के बराबर होता है (लेम्मा 3 से पालन करती है). इस प्रमाण के पीछे सहज विचार, जो इसका पालन करना आसान बना सकता है, कि ऊपर के दो वर्गों को एक ही आकार के [[समानांतर चतुर्भुज]] में बदला गया है, फिर मोड़कर और बाएं और दाहिने आयत को निचले वर्ग में बदला गया है, फिर निरंतर क्षेत्र में.{{-}}[[चित्र:Illustration to Euclid's proof of the Pythagorean theorem2.svg|thumb|200px|नई लाइनें को शामिल करके चित्रण]] प्रमाण निम्नानुसार है: # ACB को समकोण त्रिकोण मानते हैं जिसमें समकोण CAB है। # प्रत्येक पार्श्वों BC, AB और CA में, चौरस बनाया गया है, CBDE, BAGF, and ACIH, इस क्रम में. # A से, BD और CE करने के लिए एक समानांतर रेखा बनाएँ. यह लंबरूप में BC और DE को K और L में क्रमशः, काटता है। # CF और AD को जोडें, BCF और BDA त्रिकोण बनाने के लिए. # कोण CAB और BAG दोनों समकोण हैं; इसलिए C, A और G [[एकरेखस्थ]] हैं। इसी प्रकार बी, के लिए एक और एच. # कोण CBD और FBA दोनों समकोण हैं; इसलिए कोण ABD कोण FBC के बराबर है, क्यूंकि दोनों एक समकोण और कोण एबीसी के जोड़ के बराबर हैं। # क्योंकि AB और BD, FB and बक के बराबर हैं, क्रमशः, ABD त्रिकोण FBC त्रिकोण के बराबर होना चाहिए. # क्यूंकि A, K और L के साथ एकरेखस्थ है, आयत BDLK का क्षेत्रफल ABD त्रिकोण से दुगना होना चाहिए. # क्यूंकि C, A और G के साथ एकरेखस्थ है, वर्ग BAGF का क्षेत्रफल FBC त्रिकोण से दुगना होना चाहिए. # इसलिए आयत BDLK का क्षेत्रफल वर्ग BAGF के बराबर होना चाहिए = AB<sup>2</sup>. # इसी प्रकार, यह दिखाया जा सकता है की आयत चकले का क्षेत्रफल वर्ग ACIH के बराबर होना चाहिए= AC<sup>2</sup>. # इन दो परिणामों को जोड़कर, AB<sup>2</sup> + AC<sup>2</sup> = BD × BK + KL × KC # क्यूंकि BD = KL, BD* BK + KL × KC = BD(BK + KC) = BD × BC # इसलिए एबी AB<sup>2</sup> + AC<sup>2</sup> = BC<sup>2</sup>, क्यूंकि CBDE एक वर्ग है। यह प्रमाण यूक्लिड के ''तत्वों'' में प्रस्ताव 1.47 के रूप में पेश होता है।<ref>{{Cite web |url=http://www.perseus.tufts.edu/cgi-bin/ptext?doc=Perseus:text:1999.01.0085:book=1:proposition=47 |title=तत्वों 1.47 |access-date=4 सितंबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080411165747/http://www.perseus.tufts.edu/cgi-bin/ptext?doc=Perseus:text:1999.01.0085:book=1:proposition=47 |archive-date=11 अप्रैल 2008 |url-status=live }}</ref> === गारफील्ड के प्रमाण === [[जेम्स ए. गारफील्ड]] (परवर्ती संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति) को एक उपन्यास बीजीय प्रमाण द्वारा श्रेय दिया गया है:<ref>सिर, एंजी.</ref> पूरा [[ट्रेपेजोइड|समलम्ब]] (a+b) बाई (a+b) वर्ग का आधा है, तो उसका क्षेत्रफल = (a+b)<sup>2</sup>/2 = a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 + ab. त्रिकोण 1 और त्रिकोण 2 प्रत्येक क्षेत्रफल ab/2 है। त्रिकोण 3 का क्षेत्रफल c<sup>2</sup>/2 है और यह कर्ण पर वर्ग का आधा है। लेकिन त्रिकोण 3 का क्षेत्रफल भी = (समलम्ब का क्षेत्रफल) - (त्रिकोण 1 और 2 का क्षेत्रफल) := a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 + ab - ab/2 - ab/2 ::= a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 :::= अन्य दो पार्श्वों के वर्गों के जोड़ का आधा है। इसलिए कर्ण पर वर्ग = अन्य दो पार्श्वों के वर्गों का जोड़ है। === व्यवकलन द्वारा प्रमाण === इस प्रमाण में, कर्ण पर वर्ग प्लस त्रिकोण की 4 प्रतियां को अन्य दो पार्श्वों में वर्गों के रूप में जोड़ सकते हैं प्लस त्रिकोण की 4 प्रतियां.यह प्रमाण चीन से दर्ज की गई है।[[चित्र:Pythagorean proof (1).svg|thumb|क्षेत्र घटाव के उपयोग द्वारा प्रमाण]] === समानता प्रमाण === ऊपर यूक्लिड के प्रमाण के चित्र से, हम तीन [[समानता (ज्यामिति)|समान]] आंकड़ों को देख सकते हैं, प्रत्येक में "एक वर्ग के ऊपर त्रिकोण" है। क्यूंकि बड़ा त्रिकोण दो छोटे त्रिकोण से बना है, उसका क्षेत्रफल इन दो छोटे का जोड़ है। समानता से, तीन वर्ग एक दूसरे के साथ उसी अनुपात में हैं जैसे वह तीन त्रिकोण और इसी तरह के बड़े वर्ग का क्षेत्रफल दो छोटे वर्गों के क्षेत्रफल का जोड़ है। === विपर्यय से प्रमाण === [[चित्र:pythag.gif|thumb|left|4 समान समकोण त्रिकोण के पुनर्निर्माण के द्वारा पायथागॉरियन प्रमेय के 101 pxप्रमाण: चूंकि कुल क्षेत्र और त्रिकोण के क्षेत्र सभी निरंतर हैं, कुल काला क्षेत्र निरंतर है। लेकिन यह वर्ग विभाजित किया जा सकता है a, b, c, पार्श्वों के त्रिकोण से चित्रित प्रदर्शन के द्वारा [4] = c2.]]विपर्यय से प्रमाण को चित्रण और एनीमेशन के द्वारा दिया गया है। इस उदाहरण में, हर एक बड़े वर्ग का क्षेत्रफल {{nowrap|(''a'' + ''b'')<sup>2</sup>}} है। दोनों में, चरों समान त्रिकोण का क्षेत्रफल हटा दिया गया है। शेष क्षेत्रों, {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup>}} और ''c''<sup>2</sup>, बराबर हैं।[[Q.E.D.|Q.E.D]][[चित्र:Pythagoras-2a.gif|thumb|right|200px|एनिमेशन द्वारा विपर्यय से एक और प्रमाण दिखाया]][[चित्र:Pythagorean graphic.svg|thumb|विपर्यय का उपयोग करके प्रमाण]][[चित्र:Pythagproof.svg|thumb|right|बीजीय प्रमाण: एक वर्ग जो चार समकोण त्रिकोण और एक बड़े वर्ग को श्रेणीबद्ध करके निर्मित किया है]] यह प्रमाण वास्तव में बहुत आसान है, लेकिन यह प्रारंभिक नहीं है, इस अर्थ में कि यह केवल सबसे बुनियादी सिद्धांत और युक्लीडियन ज्यामिति के प्रमेयों पर निर्भर नहीं है। विशेष रूप से, जब त्रिकोण और वर्गों के क्षेत्रफल का सूत्र देना बहुत आसान है, यह साबित करने के लिए आसान नहीं है कि एक वर्ग का क्षेत्रफल उसके टुकडों के क्षेत्रों का जोड़ है। वास्तव में, आवश्यक गुण साबित करना पायथागॉरियन प्रमेय सिद्ध करने की तुलना में कठिन है (लेबेस्गु उपाय और बनाच-टार्स्कि विरोधाभास देखें).वास्तव में, यह कठिनाई सभी साधारण क्षेत्र शामिल युक्लीडियन प्रमाण को प्रभावित करता है; उदाहरण के लिए, एक समकोण त्रिकोण का क्षेत्र पाने के लिए एक धारणा शामिल है कि यह एक ही ऊंचाई और तल के एक आयत का आधा क्षेत्र है। इसी कारण से, ज्यामिति के लिए स्वयंसिद्ध परिचय आम तौर पर त्रिकोण की समानता के आधार पर एक और प्रमाण का प्रयोग करता है (ऊपर देखें). इस पायथागॉरियन प्रमेय का तीसरा ग्राफिक चित्रण में (दाहिने में पीले और नीले रंग में) कर्ण का वर्ग पार्श्वों के वर्ग में फिट बैठता है। एक संबंधित प्रमाण यह दिखा सकता है की पुनः स्थापित भाग मूल के समान हैं और, क्यूंकि समान का जोड़ समान है, की उनके क्षेत्र भी समान हैं। यह दिखाने के लिए की एक वर्ग ही परिणाम है, हमे नए पार्श्वों की लंबाई को ''c'' के बराबर दिखाना पड़ेगा.ध्यान दें की इस प्रमाण के काम करने के लिए, हमे छोटे वर्ग को और अधिक हिस्सों में काटने के तरीके को संभालने के लिए रास्ता प्रदान करना होगा चूंकि पार्श्व और छोटे होते जाएँगे.[http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/FaultyPythPWW.shtml<ref>पायथागॉरियन प्रमेय: दृश्य प्रमाण के सूक्ष्म खतरे</ref>]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} === बीजीय प्रमाण === इस प्रमाण का बीजीय भिन्नरूप निम्न तर्क द्वारा प्रदान किया गया है। चित्रण को देखते हुए जो एक बड़ा वर्ग है जिसके कोनों में समान समकोण त्रिकोण है, इन चार त्रिकोण में प्रत्येक का क्षेत्र ''C'' के साथ एक कोण के द्वारा दिया गया है। :<math>\frac{1}{2} AB.</math> इन त्रिकोण के ''A''-पार्श्व कोण और ''B''-पार्श्व कोण [[अनुपूरक कोण]] हैं, नीले क्षेत्र के प्रत्येक कोण समकोण हैं, इस क्षेत्र को एक वर्ग बनाते हुए जिसके पार्श्व की लंबाई ''C'' है। इस वर्ग का क्षेत्रफल है C''2''.इस तरह समस्त का क्षेत्र दिया जाता है: :<math>4\left(\frac{1}{2}AB\right)+C^2.</math> हालांकि, बड़े वर्ग के पार्श्वों की लंबाई {{nowrap|''A'' + ''B''}}[7], हम उसके क्षेत्रफल की गणना कर सकते हैं जैसे {{nowrap|(''A'' + ''B'')<sup>2</sup>}}[8], जो {{nowrap|''A''<sup>2</sup> + ''2AB'' + ''B''<sup>2</sup>}}[9] में विस्तारित होता है। : <math>A^2+2AB+B^2=4\left(\frac{1}{2}AB\right)+C^2.\,\!</math> ::(4 का वितरण)<math>A^2+2AB+B^2=2AB+C^2\,\!</math> :::(''2AB'' का व्यवकलन)<math>A^2+B^2=C^2\,\!</math> === विभेदक समीकरणों द्वारा प्रमाण === बौधायन प्रमेय में पहुंचा जा सकता है निम्नलिखित चित्र के अध्ययन से की एक पार्श्व में परिवर्तन कैसे कर्ण में एक परिवर्तन के उत्पादन कर सकता है और एक थोडा [[कैलकुलस|कलन]] का उपयोग करके.<ref>हार्डी.</ref> [[चित्र:PythagoreanDerivation.svg|thumb|right|विभेदक समीकरण का उपयोग करके प्रमाण]] पार्श्व ''a'' के ''da'' में परिवर्तन के परिणाम स्वरुप, :<math>\frac {da}{dc} = \frac {c}{a}</math> त्रिकोण की समानता और अंतर में बदलाव के लिए.इसलिए :<math>c\, dc = a\,da</math> [[चरों की जुदाई|चर के वियोजन]] पर. पार्श्व ''b'' में परिवर्तन के लिए एक दूसरा कार्यकाल जोड़ने का परिणाम है। समेकित देता है :<math>c^2 = a^2 + \mathrm{constant}.\ \,\!</math> जब ''a'' = 0 तब ''c ''= ''b'', तो ''b''<sup>2</sup> "निरंतर" है। इसलिए :<math>c^2 = a^2 + b^2.\,</math> जैसे देखा जा सकता है, परिवर्तन और पार्श्वों के बीच विशेष [[समानता (गणित)|अनुपात]] के कारण है यह वर्ग जबकि पार्श्वों में परिवर्तन की स्वतंत्र योगदान का परिणाम राशि है जो ज्यामितीय साक्ष्यों से स्पष्ट नहीं है। इस दिए गए अनुपात से यह दिखाया जा सकता है की पार्श्वों में परिवर्तन पार्श्वों से प्रतीपानुपाती अनुपात हैं। इस [[विभेदक समीकरण]] सुझाव देता है की यह प्रमेय संबंधित परिवर्तन के कारण है और इसके व्युत्पत्ति लगभग [[लाइन इंटीग्रल|लाइन अभिन्न]] अभिकलन के समान है। यह मात्रा ''da'' और ''dc'' क्रमशः ''a'' और ''c'' में अत्यंत छोटे परिवर्तन हैं। लेकिन हम इसके बदले वास्तविक संख्या Δa and Δc का उपयोग करते हैं, तब उनके अनुपात की सीमा da/dc है जब उनका आकार शून्य निकटता, व्युत्पन्नी और c/a भी निकटता है, त्रिकोण के पार्श्वों की लंबाई का अनुपात और विभेदक समीकरण का परिणाम पता चलता है। == विपर्याय == इस प्रमेय का विपर्याय भी सच है:<blockquote>किसी भी तीन धनात्मक संख्या ''a'', ''b'' और ''c'' ऐसी है {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}[10], वहाँ एक त्रिकोण मौजूद है जिसके पार्श्व हैं ''a'', ''b'' और ''c'' और हर ऐसे त्रिकोण में पार्श्वों के बीच एक समकोण है जिनकी लम्बाई ''a'' और ''b'' है।</blockquote> यह विपर्याय यूक्लिड के ''तत्वों'' में मौजूद होता है।[[कोसाइन के नियम|कोसाइन की विधि]] का प्रयोग करके यह साबित किया जा सकता है (नीचे देखें सामान्यकरण के नीचे), या निम्नलिखित प्रमाण के द्वारा: ''ABC'' को एक त्रिकोण मानते हैं जिसके पार्श्वों की लम्बाई ''a'', ''b'' और ''c'' है, {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}} के साथ.हमें यह साबित करना है कि ''a'' और ''b'' पार्श्वों के बीच के कोण समकोण है। हम एक और त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसमें पार्श्वों के बीच एक समकोण है जिसकी लंबाई ''a'' और ''b'' है। पायथागॉरियन प्रमेय से, निम्नानुसार है कि इस त्रिकोण के कर्ण लंबाई भी ''c'' है। चूंकि दोनों त्रिकोण के पार्श्वों की एक ही लंबाई है a, b और c, वे अनुकूल हैं और इसलिए उनका एक ही कोण होना चाहिए.इसलिए, जिन पार्श्वों की लंबाई ''a'' और ''b'' है हमारे मूल त्रिकोण में उनके बीच का कोण एक समकोण है। पायथागॉरियन प्रमेय के विपर्याय का एक [[परिणाम|अनुमान]] है की निर्धारण करने का एक सरल तरीका है की यदि एक त्रिकोण समकोण, ओब्ट्युस, या अक्यूट है, इस प्रकार से.जहाँ ''c'' को तीनों पार्श्वों में लंबा चुना गया है: * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण समकोण है। * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> > ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण ओब्ट्युस है। * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> < ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण अक्यूट है। == इस प्रमेय परिणाम और उपयोग == === पायथागॉरियन ट्रिपल === {{main|Pythagorean triple}} एक पायथागॉरियन ट्रिपल में तीन सकारात्मक पूर्णांक हैं ''a'', ''b'' और ''c'', जैसे की {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}.अन्य शब्दों में, एक पायथागॉरियन ट्रिपल एक समकोण के पार्श्वों की लंबाई का वर्णन करता है जहाँ तीनों पार्श्व की पूर्णांक लंबाई है। उत्तरी यूरोप के बड़े पत्थरों से बने स्मारकों से साक्ष्य यह दिखाते हैं कि ऐसे ट्रिपल लिखने की खोज से पहले से जाने जानते थे। इस तरह के ट्रिपल सामान्यतः से लिखे गए हैं {{nowrap|(''a'', ''b'', ''c'')}}.कुछ प्रसिद्ध उदाहरण हैं {{nowrap|(3, 4, 5)}} और {{nowrap|(5, 12, 13)}} === आदिम पायथागॉरियन के ट्रिपल की 100 तक की सूची === (3, 4, 5), (5, 12, 13), (6,8,10) (7, 24, 25), (8, 15, 17), (9, 40, 41), (11, 60, 61), (12, 35, 37), (13, 84, 85), (16, 63, 65), (20, 21, 29), (28, 45, 53), (33, 56, 65), (36, 77, 85), (39, 80, 89), (48, 55, 73), (65, 72, 97) === तर्कहीन संख्या का अस्तित्व === पायथागॉरियन प्रमेय के परिणामों में से एक है कि [[आनुपातिक (गणित)|तारतम्यहीन]] लंबाई (ie. उनके अनुपात [[तर्कहीन संख्या]] में है), जैसे की 2 का वर्गमूल, बनाया जा सकता है। एक समकोण जिसके पैर दोनों एक इकाई के बराबर हैं उसके कर्ण की लंबाई 2 का वर्गमूल है। यह प्रमाण कि 2 का वर्गमूल तर्कहीन है लंबे समय से आयोजित विश्वास के विपरीत था कि सब कुछ तर्कसंगत था। पौराणिक कथा के अनुसार, [[हिप्पासुस]], जिसने दो के वर्गमूल की तर्कशून्यता सबसे पहले साबित करी थी, उसे परिणाम के रूप में समुद्र में डूब गया था।<ref>हीथ, ग्रंथ I, pp.</ref><ref>65, 154, स्टिलवेल, p.</ref><ref>9-8.</ref> === काटीज़ियन निर्देशांक में दूरस्थ === काटीज़ियन निर्देशांक में दूरस्थ फार्मूला को पायथागॉरियन प्रमेय से से प्राप्त किया गया है। अगर (''x''<sub>0</sub>, ''y''<sub>0</sub>) और (''x''<sub>1</sub>, ''y''<sub>1</sub>) चौरस में अंक हैं, तो उनके बीच की दूरी, जिसे [[यूक्लिडियन दूरी|युक्लीडियन दूरी]] भी कहा जाता है, जो दिया जाता है :<math> \sqrt{(x_1-x_0)^2 + (y_1-y_0)^2}. </math> अतिरिक्त सामान्यतः से, [[यूक्लिडियन जगह|युक्लीडियन में ''n''-अन्तर]], दो बिन्दुओं के बीच की युक्लीडियन दूरी, <math>\scriptstyle A\,=\, (a_1,a_2,\dots,a_n)</math> और <math>\scriptstyle A\,=\, (a_1,a_2,\dots,a_n)</math>, पायथागॉरियन प्रमेय का उपयोग करते हुए, परिभाषित किया गया है: :<math>\sqrt{(a_1-b_1)^2 + (a_2-b_2)^2 + \cdots + (a_n-b_n)^2} = \sqrt{\sum_{i=1}^n (a_i-b_i)^2}.</math> == सामान्यकरण == [[चित्र:Pythagoras-for similar triangles.svg|thumb|right|200px|समान त्रिकोणों के सामान्यकरण, हरा [20] क्षेत्र]] [[यूक्लिड]] के [[यूक्लिड के तत्व|''तत्वों'']] में बौधायन प्रमेय को सामान्यकृत किया गया था: <blockquote>अगर कोई एक समान आंकड़े खड़ा करता है ([[यूक्लिडियन ज्यामिति|युक्लीडियन ज्यामिति]] देखें) एक समकोण त्रिकोण के पार्श्वों में, तो दो छोटों के क्षेत्रों का जोड़ बड़े के क्षेत्रफल के बराबर है।</blockquote> बौधायन प्रमेय, पार्श्वों की लंबाई से संबंधित अधिक सामान्य प्रमेय का एक विशेष केस है, [[कोसाइन के नियम|कोसाइन की विधि]]: : :: <math>a^2+b^2-2ab\cos{\theta}=c^2, \,</math> ::जहां θ पार्श्वों ''a'' और ''b'' के बीच का कोण है। :::जब θ 90 डिग्री हो, तो Cos(θ) = 0, तो फार्मूला सामान्य बौधायन प्रमेय में बन जाता है। इस [[जटिल संख्या|जटिल]] [[आंतरिक उत्पाद जगह|आंतरिक उत्पाद अंतरिक्ष]] में दो [[वेक्टर जगह|वेक्टर]] '''v''' और '''w''' दिया जाए, तो बौधायन प्रमेय निम्नलिखित रूप ले लेती है: : ::<math>\|\mathbf{v}+\mathbf{w}\|^2 = \|\mathbf{v}\|^2 + \|\mathbf{w}\|^2 + 2\,\mbox{Re}\,\langle\mathbf{v},\mathbf{w}\rangle.</math> विशेष रूप से,||'''v''' + '''w'''||<sup>2</sup> =||'''v'''||<sup>2</sup> +||'''w'''||<sup>2</sup> अगर '''v''' और '''w''' आयतीय हैं, हालांकि विपर्याय का सच होना ज़रूरी नहीं है। गणितीय प्रेरण का प्रयोग करके, पिछला परिणाम किसी परिमित संख्या के जोडों में आयतीय वेक्टर तक बढ़ाया जा सकता है। के किसी भी परिमित [[आयतीय|संख्या को बढ़ाया]] जा सकता है।'''v'''<sub>1</sub>, '''v'''<sub>2</sub>,…, '''v'''<sub>n</sub> को वेक्टर मानते हैं एक आंतरिक उत्पाद अंतरिक्ष में जिसमें <'''v'''<sub>i</sub>, '''v'''''j''> = 0 जब 1 ≤ ''i'' < ''j'' ≤ ''n''.तब : ::<math>\left\|\,\sum_{k=1}^{n}\mathbf{v}_k\,\right\|^2 = \sum_{k=1}^{n} \|\mathbf{v}_k\|^2.</math> इस ''अनंत-आयामी'' को [[वास्तविक संख्या|असली]] आंतरिक उत्पाद स्थान के परिणाम के सामान्यकरण को [[पारसेवल की पहचान|पार्सेवल की पहचान]] के रूप में जाना जाता है। जब ऊपर के प्रमेय वेक्टर के बारे में ठोस ज्यामिति में पुनः लिखा जाता है, तो यह निम्नलिखित प्रमेय बन जाता है। यदि AB और BC रेखाएं B में समकोण बनाते हैं, BC और कद रेखाएं C में समकोण बनाते हैं और अगर CD अधोलंब के अधोलंब है जिसमें AB और BC रेखाएं शामिल है, तो AB, BC और CD की लम्बाई के वर्ग का जोड़ AD के वर्ग के जोड़ के बराबर है। यह प्रमाण तुच्छ है। तीन आयामों के लिए बौधायन प्रमेय का एक अन्य सामान्यकरण [[डी गुआ का प्रमेय]] है, जो [[जीन पॉल डी गुआ डे माल्व्स]] के नाम पर रखा गया है: यदि एक [[चतुष्फलक|टेट्राहेड्रोन]] में एक समकोण कोन है (एक [[घन (ज्यामिति)|घन]] की तरह एक कोने), तो वर्ग का क्षेत्रफल जो समकोण कोने के विपरीत तरफ है वो अन्य तीन तरफ के क्षेत्रों के जोड़े के बराबर है। चार और अधिक आयामों में इन प्रमेयों के अनुरूप भी हैं . जिन त्रिकोण में तीन [[कोण|अक्युट कोण]] होते हैं, ''α'' + ''β'' > ''γ'' होता है। इसलिए, ''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> > ''c''<sup>2</sup> होता है। जिन त्रिकोण में एक [[कोण|ओब्ट्युस कोण]] होता है, ''α'' + ''β'' < ''γ'' होता है। इसलिए, ''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> < ''c''<sup>2</sup> होता है। [[एड्स्जर डिजक्स्त्रा]] ने इस प्रस्ताव को अक्युट, समकोण और ओब्ट्युस त्रिकोण के बारे में इस भाषा में कहा है: : ::[[साइन प्रकार्य|sgn]](''α'' + ''β'' − ''γ'') = [[साइन प्रकार्य|sgn]](''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> − ''c''<sup>2</sup>) जहाँ कोण ''α'' पार्श्व ''a'' के विपरीत है, कोण ''β'' पार्श्व ''b'' के विपरीत है और कोण ''γ'' पार्श्व ''c'' के विपरीत है।<ref>{{cite web|url=http://www.cs.utexas.edu/users/EWD/ewd09xx/EWD975.PDF|title=Dijkstra's generalization|format=PDF|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121003082829/http://www.cs.utexas.edu/users/EWD/ewd09xx/EWD975.PDF|archive-date=3 अक्तूबर 2012|url-status=live}}</ref> === बिना युक्लीडियन ज्यामिति के पायथागॉरियन प्रमेय === युक्लीडियन ज्यामिति के सिद्धांत से पायथागॉरियन प्रमेय से प्राप्त हुआ है, वास्तव में, ऊपर बताए पायथागॉरियन प्रमेय का युक्लीडियन प्रकार बिना [[यूक्लिडियन ज्यामिति|युक्लीडियन ज्यामिति]] के नहीं होता है। (यह वास्तव में यूक्लिड के समांतर (पांचवां) स्वसिद्ध के बराबर दिखाया गया है।) उदाहरण के लिए, [[गोलाकार ज्यामिति|गोलीय ज्यामिति]] में, ओक्टेट से सीमित इकाई क्षेत्र के समकोण त्रिकोण के तीनों पार्श्वों की लंबाई <math>\scriptstyle \pi/2</math> के बराबर है; युक्लीडियन पायथागॉरियन प्रमेय का उल्लंघन करती है क्यूंकि <math>\scriptstyle \pi/2</math> इसका मतलब है की बिना युक्लीडियन प्रमेय में, पायथागॉरियन प्रमेय को युक्लीडियन प्रमेय से एक अलग रूप लेना चाहिए.यहाँ दो मामलों पर विचार करना पड़ेगा- [[गोलाकार ज्यामिति]] और [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति|अतिशयोक्तिपूर्ण समतल ज्यामिति]] हैं; हर मामले में, युक्लीडियन मामले की तरह, उचित कोसाइन के नियम से परिणाम निकलता है: एक गोला जिसकी त्रिज्या ''R'' है उसपर कोई भी समकोण त्रिकोण के लिए, पायथागॉरियन प्रमेय यह रूप लेता है :<math> \cos \left(\frac{c}{R}\right)=\cos \left(\frac{a}{R}\right)\,\cos \left(\frac{b}{R}\right).</math> यह समीकरण [[कोसाइन का गोलाकार कानून|कोसाइन के गोलाकार कानून]] का एक विशेष मामले के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। इस कोसाइन समारोह के लिए [[मैकलौरिन श्रृंखला]] का उपयोग करके, यह दिखाया जा सकता है कि त्रिज्या ''R'' अनन्तता तक पहुंचता है, के रूप में है, पायथागॉरियन प्रमेय का गोलाकार रूप युक्लीडियन रूप तक पहुंचता है। इस [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति|अतिशयोक्तिपूर्ण समतल]] में किसी भी त्रिकोण के लिए (गौस्सियन [[वक्रता]] -1 के साथ), पायथागॉरियन प्रमेय यह रूप लेता है :<math> \cosh c=\cosh a\,\cosh b</math> जहाँ cosh के अतिशयोक्तिपूर्ण कोसाइन है। इस प्रकार्य के लिए मैकलौरिन श्रृंखला का उपयोग करके, यह दिखाया जा सकता है कि जिस तरह अतिशयोक्तिपूर्ण त्रिकोण बहुत छोटी हो जात है (अर्थात जब ''a'', ''b'' और ''c'' शून्य निकटते हैं), पायथागॉरियन प्रमेय का अतिशयोक्तिपूर्ण रूप युक्लीडियन रूप को निकटता है। [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति]] में, एक समकोण त्रिकोण के लिए भी लिखा जा सकता है, :<math>\sin \bar a \sin \bar b = \sin \bar c</math> जहाँ <math>\scriptstyle\bar a</math> रेखा खंड अब की [[समानता का कोण]] जो <math>\scriptstyle\bar a</math> जहाँ μ [[गुणन दूरी|गुणात्मक दूरी]] प्रकार्य है ([[अंत की हिल्बर्ट की गणित|हिल्बर्ट के अंत के अंकगणितीय]] ''देखें''). अतिशयोक्तिपूर्ण त्रिकोणमिति में, साइन के कोण की समानता संतुष्ट करता है :<math>\sin \bar a = \frac{2a}{1+a^2}.</math> इस प्रकार, यह समीकरण रूप लेता है :<math>\frac{2a}{1+a^2} \frac{2b}{1+b^2}=\frac{2c}{1+c^2}</math> जहाँ ''a'', ''b'', and ''c'' समकोण त्रिकोण के पार्श्वों की गणात्मक दूरियाँ हैं (हार्टशोर्न, 2000). === 2 से अधिक आयामों में === 3 आयामों में अंक { and { के बीच की दूरी √([√((a-d)<sup>2</sup>+(b-e)<sup>2</sup>)]<sup>2</sup>+(c-f)<sup>2</sup>) = √((a-d)<sup>2</sup>+(b-d)<sup>2</sup>+(c-f)<sup>2</sup>) है और इसी प्रकार 4 या अधिक आयामों के लिए. === जटिल अंकगणितीय में: मान्य नहीं === पायथागॉरस फार्मूला को [[काटीज़ियन|कार्टीज़इयन]] निर्देशांक समतल में दो अंकों के बीच की दूरी पता करने के लिए प्रयोग किया जाता है और मान्य है अगर सब निर्देशांक असली हैं: अंक {2+(b-d)<sup>2</sup>).लेकिन [[जटिल अंकगणितीय|जटिल निर्देशांक]] के साथ: उदाहरण, अंक { और {i,0} के बीच की दूरी शून्य बनेगी, जिसका परिणाम है [[रिड़कशियो एड अबसरडम|''रिडाक्शियो एड़ अब्सुर्डम'']].यह इसलिए है क्योंकि यह फार्मूला पायथागॉरस की प्रमेय पर निर्भर है, जो अपने हस प्रमाण में क्षेत्रफल पर निर्भर है और क्षेत्रफल त्रिकोण पर निर्भर है और अन्य ज्यामितीय आंकडों पर जो अंदर को बहार से अलग करती है, जो मुमकिन नहीं होता अगर निर्देशांक जटिल होते. == इतिहास == {{Refimprovesect|date=अप्रैल 2008}} [[चित्र:Chinese pythagoras.jpg|thumb|300px|चौ पी सुआन चिंग 500-200 BC में के रूप में (3, 4, 5) त्रिकोण का दृश्य प्रमाण]] इस बात पर बहस है कि क्या पाइथागोरस प्रमेय की खोज एक बार, या कई बार हुई थी, और पहली खोज की तारीख अनिश्चित है, जैसा कि पहले प्रमाण की तारीख है। मेसोपोटामिया के गणित के इतिहासकारों ने निष्कर्ष निकाला है कि पाइथागोरस के जन्म से एक हजार साल पहले, पुराने बेबीलोनियन काल (20 वीं से 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान पाइथागोरस शासन का व्यापक उपयोग था। [69] [70] [71] [72] प्रमेय के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है: पाइथागोरस त्रिगुणों का ज्ञान, एक समकोण त्रिभुजों के बीच संबंधों का ज्ञान, निकटवर्ती कोणों के बीच संबंधों का ज्ञान और कुछ समर्पण प्रणाली के भीतर प्रमेय के प्रमाण। 2000 और 1786 ईसा पूर्व के बीच लिखे गए, मध्य साम्राज्य मिस्र के बर्लिन पपीरस 6619 में एक समस्या शामिल है जिसका समाधान पायथागॉरियन ट्रिपल 6: 8: 10 है, लेकिन समस्या एक त्रिकोण का उल्लेख नहीं करती है। मेसोपोटामियन टैबलेट प्लाम्पटन 322, 1790 और 1750 ईसा पूर्व के बीच हम्मुराबी द ग्रेट के शासनकाल के दौरान लिखा गया था, जिसमें पाइथागोरियन त्रिगुणों से संबंधित कई प्रविष्टियां शामिल हैं। भारत में, बौधायन सुलबा सूत्र, जिनकी तिथियां 8 वीं और 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच बताई गई हैं, [73] में पाइथोगोरियन त्रिगुणों की एक सूची और पाइथागोरस प्रमेय का विवरण शामिल है, दोनों समद्विबाहु के विशेष मामले में दोनों त्रिभुज और सामान्य मामले में, जैसा कि आपस्तम्बा सुलबा सूत्र (c। 600 ईसा पूर्व) है। Van der Waerden का मानना ​​था कि यह सामग्री "निश्चित रूप से पहले की परंपराओं पर आधारित थी"। कार्ल बोयर कहते हैं कि औलबा-सत्तरम में पाइथागोरस प्रमेय प्राचीन मेसोपोटामियन गणित से प्रभावित हो सकता है, लेकिन इस संभावना के पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णायक सबूत नहीं है। [the४] इस प्रमेय का इतिहास चार भागों में बाँटा जा सकता है: [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] का ज्ञान, [[समकोण त्रिकोण]] पार्श्वों के बीच के रिश्ते का ज्ञान, आसन्न कोण के बीच संबंधों के ज्ञान और प्रमेय के प्रमाण. [[मिस्र]] में [[बड़े पत्थरों का बना स्मारक]] लगभग 2500 BC से और [[उत्तरी यूरोप]] में, पूर्णांक पार्श्वों के समकोण त्रिकोण शामिल हैं।<ref>{{cite web|url=http://hyperion.cc.uregina.ca/~astro/Mega_circ.html|title=Megalithic Monuments.|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20110706211316/http://hyperion.cc.uregina.ca/%7Eastro/Mega_circ.html|archive-date=6 जुलाई 2011|url-status=dead}}</ref> [[बर्टेल लीनडार्ट वन डर वैरडेन|बार्टेल लीनडर्ट वॉन ड़र वार्डेन]] का अनुमान है की यह पायथागॉरियन ट्रिपल की खोज [[बीजगणित|बीजीय]] से हुई है।<ref>वॉन ड़र वार्डेन 1983.</ref> 2000 और 1786 BC के बीच लिखा गया, [[मिस्र]] की [[मिस्र के मध्यम साम्राज्य|मध्यम किंगडम]] पापिरुस [[बर्लिन पापिरुस|''बर्लिन 6619'']] में एक समस्या शामिल है जिसका समाधान एक [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] है। [[मेसोपोटामिया]] के नोटबुक [[प्लिम्पटन 322|''प्लिम्प्टन 322'']], [[18 वीं शताब्दी BC|1790]] और 1750 BC में महान [[हाम्मुरबी]] के शासनकाल के दौरान लिखा गया था, जिसमें कई प्रविष्टियों शामिल हैं जो पायथागॉरियन ट्रिपल के निकटता से संबंधित. ''[[बौधयाना]][[सुल्बा सूत्र]]'', जिसकी विभिन्न तारीक 8 वीं शताब्दी BC और 2 वीं शताब्दी BC के बीच दिए गए हैं, [[भारत का इतिहास|भारत]] में, जिसमें [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] की एक सूची शामिल है जिसकी खोज बीजीय से हुई है, पायथागॉरियन प्रमेय का एक बयान और एक [[समद्विबाहु]] त्रिकोण ''[[अपास्ताम्बा]] सुल्बा सूत्र'' (लगभग 600 BC) में सामान्य पायथागॉरियन प्रमेय की संख्यात्मक प्रमाण शामिल हैं, एक क्षेत्र संगणना के उपयोग से.[[वॉन ड़र वार्डेन]] का विश्वास है "यह निश्चित रूप से पहले के परंपराओं पर आधारित थी" [[पायथागॉरस]] ने, जिसकी तारीखें सामान्यतः 569-475 BC दी गई है, पायथागॉरियन ट्रिपल के निर्माण के लिए बीजीय तरीके का इस्तेमाल करके, [[यूक्लिड]] में [[प्रोक्लुस|प्रोक्लोस]] की कमेंट्री के अनुसार.प्रोक्लोस ने, तथापि, 410 और 485 AD के बीच लिखा था। [[टी.एल.हीथ|सर थॉमस एल. हीथ]] के अनुसार, पायथागॉरस को प्रमेय का कोई रोपण नहीं था पाँच सदियों तक पायथागॉरस के जीवित रहने तक.हालांकि, जब [[प्लूटार्क|प्लूटार्च]] और [[सिसरौ|सिसेरौ]] जैसे लेखकों ने पायथागॉरस को प्रमेय ठहराया, उन्होंने इस तरह से किया जो कि रोपण व्यापक रूप से जाना जाए और निस्संदेह रहे.<ref name="Heath, Vol I, p. 144"/> 400 BC के दौरान, प्रोक्लोस के अनुसार, [[प्लेटो]] ने पायथागॉरियन ट्रिपल को खोजने की एक विधि दी जिसे बीजगणित और ज्यामिति संघटित हुआ। लगभग 300 BC, [[यूक्लिड के तत्व|यूक्लिड के "तत्वों"]] में, प्रमेय का सबसे पुराना वर्तमान [[गणित|सिद्धांतों वाला प्रमाण]] पेश किया गया था। कुछ समय 500 BC और 200 AD के बीच लिखा गया था, [[चीन|चीनी]] पाठ [[चौ पी सुआन चिंग|''चौ पी सुअन चिंग'']] (周髀算经), (''ग्नोमोन के अंकगणितीय शास्त्रीय और स्वर्ग का परिपत्र रास्ता'') पायथागॉरियन प्रमेय का एक दृश्य प्रमाण देता है - चीन में इसे "गौगु प्रमेय" कहा जाता है (勾股定理) — त्रिकोण (3, 4, 5) के लिए.[[हान राजवंश]] के दौरान, 202 BC से 220 AD तक, पायथागॉरियन ट्रिपल को [[गणितीय कला पर नौ अध्याय|''गणितीय कला के नौवें अध्याय'']] में देखा गया है, समकोण त्रिकोण के एक उल्लेख के साथ.<ref>स्वेट्ज़.</ref> [[चीन]] में पहला रिकॉर्ड किया गया उपयोग है, जो "गौगु प्रमेय" (勾股定理) के नाम से जाना जाता है, [[भारत]] में भास्कर प्रमेय के नाम से जाना जाता है। काफी बहस है की क्या पायथागॉरियन प्रमेय की खोज एक या कई बार हुई थी। बोयर (1991) का सोचना है की शुल्बा सूत्र में पाए गए तत्व मेसोपोटामिया व्युत्पत्ति के हो सकते हैं।<ref>{{cite book|last=Boyer|authorlink=Carl Benjamin Boyer|year=1991|chapter=China and India|pages=207|quote=we find rules for the construction of right angles by means of triples of cords the lengths of which form Pythagorean triages, such as 3, 4, and 5, or 5, 12, and 13, or 8, 15, and 17, or 12, 35, and 37. However all of these triads are easily derived from the old Babylonian rule; hence, Mesopotamian influence in the ''Sulvasutras'' is not unlikely. Aspastamba knew that the square on the diagonal of a rectangle is equal to the sum of the squares on the two adjacent sides, but this form of the Pythagorean theorem also may have been derived from Mesopotamia. [...] So conjectural are the origin and period of the ''Sulbasutras'' that we cannot tell whether or not the rules are related to early Egyptian surveying or to the later Greek problem of alter doubling. They are variously dated within an interval of almost a thousand years stretching from the eighth century B.C. to the second century of our era.}}</ref> == पायथागॉरियन प्रमेय के सांस्कृतिक संदर्भ == पायथागॉरियन प्रमेय पूरे इतिहास में कई किस्म की मास मीडिया में संदर्भित है। * [[मेजर-जनरल के गीत|मेजर-जनरल के संगीत]] का एक पद्य [[गिल्बर्ट और सुलिवेन|गिलबर्ट और सुलिवेन]] संगीतिक [[पेनज़ैन्स के समुद्री डाकू]], "द्विपद प्रमेय के बारे में मैं बहुत से समाचार से भरा हुआ हूँ, कर्ण के वर्ग के कई हंसमुख तथ्यों के साथ", प्रमेय के तिरछा संदर्भ के द्वारा. * [[विज़र्ड ऑफ़ ओज़ (1939 फ़िल्म)|''[[जादूगर (ओज़)|विज़र्ड]] ऑफ़ ओज़'']] का [[बिजूखा (ओज़)|बिजूखा]] इस प्रमेय का एक और अधिक विशिष्ट संदर्भ बनाता है जब उसे जादूगर से डिप्लोमा प्राप्त होता है। उसने तुरंत अपने "ज्ञान" प्रदर्शन एक वध और गलत संस्करण पढ़ने के द्वारा: "एक समद्विबाहु त्रिकोण के किसी भी दो पार्श्वों के वर्ग जड़ों का जोड़ शेष पार्श्वों के वर्ग जड़ों के बराबर है। ओह, आनन्द, ओह, उमंग.मुझेमें दिमाग है ! "बिजूखा द्वारा प्रदर्शित "ज्ञान" गलत है। सही बयान "एक समकोण त्रिकोण के पैरों के वर्गों का जोड़ बाकी पार्श्वों के वर्ग के बराबर हैं" होता.<ref>{{cite web|url=http://www.geocities.com/hollywood/hills/6396/ozmath.htm|title=The Scarecrow's Formula|archiveurl=https://web.archive.org/web/20020314022442/http://www.geocities.com/hollywood/hills/6396/ozmath.htm|archivedate=14 मार्च 2002|access-date=4 सितंबर 2012|url-status=dead}}</ref> * [[द सिंपसन्स|''द सिंपसन्स'']] के एक प्रकरण में, [[हेनरी किसिंजर]] के चश्मे को [[स्प्रिंगफील्ड परमाणु ऊर्जा संयंत्र|स्प्रिंगफील्ड में परमाणु ऊर्जा संयंत्र]] के शौचालय में ढूँढने के बाद, [[होमर सिम्पसन|होमर]] उन्हें पहनता है और उद्धरण करता है ओज़ बिजूखा के सूत्र का वध संस्करण.पास में एक शौचालय दुकान में एक आदमी रोकता है और चिलाता है "यह एक ''समकोण'' त्रिकोण है, बेवकूफ ! "(वर्ग जड़ों के बारे में टिप्पणी कभी सही नहीं हुआ।) * इसी तरह, [[Apple Inc.|Apple]] [[MacBook]] की भाषण सॉफ्टवेयर बिजूखा के गलत बयान को संदर्भित करता है। यह भाषण का नमूना है जब आवाज सेटिंग राल्फ को चुना जाता है। * [[फ्रीमेसनरी|संगतराशों]] में, [[विगत के मास्टर (राजमिस्री के कार्य से)|विगत के मास्टर]] का एक प्रतीक यूक्लिड के 47 प्रस्ताव से एक चित्र है, पायथागॉरियन प्रमेय के यूक्लिड के प्रमाण में प्रयुक्त.राष्ट्रपति गारफील्ड एक संगतराश थे। * 2000 में, [[युगांडा]] ने एक समकोण त्रिकोण के आकार का एक सिक्का जारी किया। सिक्के की पूँछ में पैथागोरस और पायथागॉरियन प्रमेय का चित्रण था, "पायथागॉरस मिलेनियम" के उल्लेख के साथ.<ref>{{cite web|url=http://homepage.sefanet.ch/meylan-sa/saviez-vous1.htm|title=Le Saviez-vous ?|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20090921060307/http://homepage.sefanet.ch/meylan-sa/saviez-vous1.htm|archive-date=21 सितंबर 2009|url-status=dead}}</ref> [[ग्रीस]], [[जापान]], [[सैन मैरिनो]], [[सियरा लेओन]] और [[सूरीनाम]] [[डाक टिकट]] जारी किए हैं पायथागॉरस और पायथागॉरियन प्रमेय के चित्रण के साथ.<ref>{{cite web|url=http://members.tripod.com/jeff560/index.html|title=Images of Mathematicians on Postage Stamps|first=Jeff|last=Miller|date=[[3 अगस्त 2007]]|accessdate=6 अगस्त 2007}}</ref> * [[नील स्टीफेंसन|नील स्टीफेनसन]] के विचारवान कल्पना [[ऐनथम|''ऐनथम'']] में, पायथागॉरियन प्रमेय को "अड्राखोनिक प्रमेय" के रूप में संदर्भित किया गया है। इस प्रमेय का एक ज्यामितिक प्रमाण एक विदेशी जहाज की एक तरफ गणित की उनकी समझ प्रदर्शित करने के लिए प्रदर्शित किया। == इन्हें भी देखें == <div> * [[बौधायन का शुल्बसूत्र]] * [[बौधायन]] * [[कात्यायन (गणितज्ञ)|कात्यायन]] * [[रैखिक बीजगणित]] * [[फर्मा का अन्तिम प्रमेय]] * [[पायथागोरीय प्रायिकता]] * [https://parikchha.blogspot.com/2026/04/pythagoras-theorem-in-hindi.html समकोण त्रिभुज] </div> == नोट्स == {{reflist|2}} == सन्दर्भ == <div class="references"> * बेल, जॉन एल., [https://web.archive.org/web/20120805183429/http://publish.uwo.ca/~jbell/ ''सुगम की कला: एक प्रारंभिक सर्वेक्षण गणित की संकल्पनात्मक विकास,''] क्लुव्र, 1999 में.ISBN 0-7923-5972-0. * यूक्लिड, ''यह तत्व,'' एक परिचय और कमेंटरी में अनुवादित साहब थॉमस एल. हीथ के द्वारा, डोवर, (3 ग्रंथ), 2 संस्करण, 1956. * हार्डी, माइकल, "पायथागॉरस को मुश्किल बनाया गया".{}गणितीय बुद्धिजीवी, '''10''' (3), p.&nbsp;31, 1988. * [[टी.एल.हीथ|हीथ, सर थॉमस]], ''ग्रीक गणित का इतिहास'' (2 ग्रंथ), क्लैरेंडोन प्रेस, ऑक्सफोर्ड (1921), डोवर प्रकाशन, Inc (1981), ISBN 0-486-24073-8. * लूमिस, एलीशा स्कॉट, ''पायथागॉरियन प्रस्ताव.'' 2 संस्करण, वाशिंगटन, D.C: गणित शिक्षक राष्ट्रीय परिषद, 1968.ISBN 978-0-87353-036-1. * मोर, एली, ''पायथागॉरियन प्रमेय: एक 4000 साल का इतिहास.''प्रिंसटन, न्यू जर्सी: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2007, ISBN 978-0-691-12526-8. * स्टिलवेल, जॉन, ''गणित और उसका इतिहास,'' स्प्रिंगर-वेर्लग, 1989.ISBN 0-387-96981-0 और ISBN 3-540-96981-0. * स्वेट्ज़, फ्रैंक, काओ, टी.आइ.,''पायथागॉरस चीनी था?: समकोण त्रिकोण सिद्धांत की प्राचीन चीन एक परीक्षा,'' पेंसिल्वेनिया राज्य विश्वविद्यालय प्रेस.1997. * वॉन ड़र वार्डेन, बी.एल., ''प्राचीन सभ्यताओं में ज्यामिति और बीजगणित,'' स्प्रिंगर, 1983. </div> == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Pythagorean theorem}} * [https://web.archive.org/web/20120825143042/http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/index.shtml पायथागॉरियन प्रमेय] ([[कट-द-नॉट|कट-डी-नॉट]] से 70 से अधिक प्रमाण) * इंटरैक्टिव लिंक: ** [[जावा]] में पायथागॉरियन प्रमेय का [https://web.archive.org/web/20120712151940/http://sunsite.ubc.ca/LivingMathematics/V001N01/UBCExamples/Pythagoras/pythagoras.html इंटरएक्टिव प्रमाण] ** [https://web.archive.org/web/20120826130543/http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/Perigal.shtml][[जावा]] में पायथागॉरियन प्रमेय का एक और इंटरएक्टिव प्रमाण ** इंटरैक्टिव एनीमेशन के साथ [https://web.archive.org/web/20120911234427/http://www.mathopenref.com/pythagorastheorem.html पायथागॉरियन प्रमेय] ** एनिमेटेड, अनि-बीजीय और [https://web.archive.org/web/20090530072020/http://math.ucr.edu/~jdp/Relativity/Pythagorus.html उपयोगकर्ता-गति] में पायथागॉरियन प्रमेय * {{MathWorld|title=Pythagorean theorem|urlname=PythagoreanTheorem}} * [https://web.archive.org/web/20120709073734/http://www.gogeometry.com/pythagoras/right_triangle_formulas_facts.htm पायथागॉरियन प्रमेय और समकोण त्रिकोण के फ़ार्मुले] [[श्रेणी:कोण]] [[श्रेणी:क्षेत्रफल]] [[श्रेणी:समीकरण ]] [[श्रेणी:यूक्लिडीय समतल ज्यामिति]] [[श्रेणी:गणितीय प्रमेय]] [[श्रेणी:त्रिभुज ज्यामिति]] elz2yv15pl869a5ljpdcerxwm70nazr 6543647 6543630 2026-04-24T15:26:21Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Tanbiruzzaman|Tanbiruzzaman]] ([[सदस्य वार्ता:Tanbiruzzaman|वार्ता]]) के अवतरण 6453756 पर पुनर्स्थापित : प्रचार हटाया 6543647 wikitext text/x-wiki {{Translation/Ref|en|Pythagorean theorem|oldid=286316408}} {{ज्यामिति}} {{त्रिकोणमिति}} '''पाइथागोरस''' या '''फ़ीसाग़ूरस प्रमेय''' [[यूक्लिडीय ज्यामिति]] में किसी [[समकोण त्रिभुज]] के तीनों भुजाओं के बीच एक सम्बन्ध बताने वाला प्रमेय है। इस [[प्रमेय]] को आमतौर पर एक [[समीकरण]] के रूप में निम्नलिखित तरीके से अभिव्यक्त किया जाता है- :<math>a^2 + b^2 = c^2\!\,</math> जहाँ ''c'' समकोण त्रिभुज के [[कर्ण]] की लंबाई है तथा ''a'' और ''b'' अन्य दो भुजाओं की लम्बाई है। [[पाइथागोरस]] [[यूनान]] के [[गणितज्ञ]] थे। परम्परानुसार उन्हें ही इस प्रमेय की खोज का श्रेय दिया जाता है<ref>{{cite book |last1=Thomas |first1=Heath |title=A History of Greek Mathematics (Vol. 1) |date=1921 |publisher=Oxford University Press |location=London |page=144 |url=https://www.wilbourhall.org/pdfs/heath/HeathVolI.pdf |access-date=14 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20161025124316/http://www.wilbourhall.org/pdfs/heath/HeathVolI.pdf |archive-date=25 अक्तूबर 2016 |url-status=dead }}</ref>। हालांकि यह माना जाने लगा है कि इस प्रमेय की जानकारी उनसे पूर्व तिथि की है। [[भारत]] के प्राचीन ग्रंथ [[बौधायन का शुल्बसूत्र|बौधायन शुल्बसूत्र]] में यह प्रमेय दिया हुआ है। काफी प्रमाण है कि बेबीलोन के गणितज्ञ भी इस सिद्धांत को जानते थे। == सूत्र के रूप में == अगर हम कर्ण की [[लम्बाई|लंबाई]] को ''c'' और अन्य दो भुजाओं की लंबाई को ''a'' और ''b'' लेते हैं, तो प्रमेय को निम्नलिखित समीकरण के रूप में व्यक्त किया जा सकता है: : <math>a^2 + b^2 = c^2\, </math> या, : <math> c = \sqrt{a^2 + b^2}. \,</math> यदि ''c'' तथा एक भुजा का मान पहले से दिया गया है और तीसरी भुजा की लंबाई निकालनी हो, तो निम्नलिखित समीकरण का उपयोग किया जा सकता है : : <math>c^2 - a^2 = b^2\, </math> या : <math>c^2 - b^2 = a^2.\, </math> यह समीकरण समकोण त्रिकोण के तीनों भुजाओं के बीच एक सरल सम्बन्ध प्रदान करता है। इस प्रमेय का सामान्यीकरण '[[कोज्या नियम]]' (Cosine rule) कहलाता है जिसकी सहायता से किसी भी त्रिकोण के तीसरी भुजा की लम्बाई की गणना की जा सकती है यदि शेष दो भुजाओं की लंबाई और उनके बीच के कोण की माप दी गयी हो। == प्रमाण == यह एक ऐसा [[प्रमेय]] है जिसके अन्य प्रमेयों की तुलना में सम्भवतः सर्वाधिक प्रमाण ज्ञात हैं ([[द्विघाती पारस्परिकता]] का नियम भी इस गौरव के लिए प्रतियोगी रह चुका है)। एलीशा स्कॉट लूमिस द्वारा रचित ''पायथागॉरियन थिअरम'' किताब में, 367 प्रमाण दिए गए हैं। === समरूप त्रिभुज के उपयोग से प्रमाण === [[चित्र:Proof-Pythagorean-Theorem.svg|thumb|right|समरूप त्रिभुज के उपयोग द्वारा प्रमाण]] पाइथागोरस प्रमेय के अधिकांश प्रमाणों की तरह, यह दो [[समरूप त्रिभुज|समरूप त्रिभुजों]] की भुजाओं के समानुपाती होने के गुण पर आधारित है। माना ''ABC'' एक समकोण त्रिभुज है, जिसमें कोण ''C'' समकोण है, जैसा आकृति में दिखाया गया है। हम ''C'' बिंदु से कर्ण पर लम्ब डालते हैं और भुजा ''AB'' के साथ उस लम्ब की लम्बाई ''H'' हैं। यह नया त्रिकोण ''ACH'' हमारे त्रिकोण ''ABC'' के समरूप है, क्योंकि उन दोनों में ही समकोण है (ऊंचाई की परिभाषा के द्वारा) और A कोण उनका हिस्सा है। इसका मतलब है की तीसरा कोण भी दोनों त्रिभुजों में समान है। इसी आधार पर त्रिभुज CBH भी ''ABC'' के समरूप है। इन समरूपताओं से हमें दो समानुपात प्राप्त होते हैं: जैसे :<math> BC=a, AC=b, \text{ and } AB=c, \!</math> तथा :<math> \frac{a}{c}=\frac{HB}{a} \mbox{ and } \frac{b}{c}=\frac{AH}{b}.\,</math> इन्हें ऐसे भी लिखा जा सकता है :<math>a^2=c\times HB \mbox{ and }b^2=c\times AH. \,</math> इन दो समीकरणों का संक्षेप करने पर, :<math>a^2+b^2=c\times HB+c\times AH=c\times(HB+AH)=c^2 .\,\!</math> अन्य शब्दों में, बौधायन प्रमेय : :<math>a^2+b^2=c^2.\,\!</math> === यूक्लिड के प्रमाण === [[चित्र:Illustration to Euclid's proof of the Pythagorean theorem.svg|thumb|यूक्लिड के तत्वों में प्रमाण]][[यूक्लिड|यूक्लिड के]] "एलिमेन्ट्स" (elements) में, पुस्तक 1 का प्रस्ताव 47, बौधायन प्रमेय निम्नलिखित लाइनों के साथ एक तर्क से साबित होता है।''A'', ''B'', ''C'' को समकोण त्रिकोण के कोने मानते हैं, जिसमें समकोण ''A'' पर होगा. ''A'' से कर्ण के विपरीत एक अधोलंब छोडें वर्ग में कर्ण पर.वो रेखा कर्ण पर वर्ग को दो आयातों में विभाजित करती है, प्रत्येक का समान क्षेत्र है क्यूंकि दोनों में से एक पैरों में वर्ग बनता है। औपचारिक प्रमाण के लिए, हमें चार प्राथमिक लेम्मटा की आवश्यकता है: # यदि दो त्रिकोण के दो पार्श्वों में से एक पार्श्व दूसरे के दो पार्श्वों के बराबर हो, प्रत्येक के लिए प्रत्येक और उन पार्श्वों द्वारा बना कोण बराबर हो, तो त्रिकोण अनुकूल हैं। (पार्श्व - कोण - पार्श्व प्रमेय) # एक त्रिकोण का क्षेत्रफल एक ही तल और ऊंचाई पर किसी भी समानांतर चतुर्भुज का आधा क्षेत्रफल है। # किसी भी वर्ग का क्षेत्रफल उसके दो पार्श्वों के उत्पाद के बराबर होता है। # किसी भी आयत का क्षेत्रफल उसके दो संलग्न पार्श्वों के उत्पाद के बराबर होता है (लेम्मा 3 से पालन करती है). इस प्रमाण के पीछे सहज विचार, जो इसका पालन करना आसान बना सकता है, कि ऊपर के दो वर्गों को एक ही आकार के [[समानांतर चतुर्भुज]] में बदला गया है, फिर मोड़कर और बाएं और दाहिने आयत को निचले वर्ग में बदला गया है, फिर निरंतर क्षेत्र में.{{-}}[[चित्र:Illustration to Euclid's proof of the Pythagorean theorem2.svg|thumb|200px|नई लाइनें को शामिल करके चित्रण]] प्रमाण निम्नानुसार है: # ACB को समकोण त्रिकोण मानते हैं जिसमें समकोण CAB है। # प्रत्येक पार्श्वों BC, AB और CA में, चौरस बनाया गया है, CBDE, BAGF, and ACIH, इस क्रम में. # A से, BD और CE करने के लिए एक समानांतर रेखा बनाएँ. यह लंबरूप में BC और DE को K और L में क्रमशः, काटता है। # CF और AD को जोडें, BCF और BDA त्रिकोण बनाने के लिए. # कोण CAB और BAG दोनों समकोण हैं; इसलिए C, A और G [[एकरेखस्थ]] हैं। इसी प्रकार बी, के लिए एक और एच. # कोण CBD और FBA दोनों समकोण हैं; इसलिए कोण ABD कोण FBC के बराबर है, क्यूंकि दोनों एक समकोण और कोण एबीसी के जोड़ के बराबर हैं। # क्योंकि AB और BD, FB and बक के बराबर हैं, क्रमशः, ABD त्रिकोण FBC त्रिकोण के बराबर होना चाहिए. # क्यूंकि A, K और L के साथ एकरेखस्थ है, आयत BDLK का क्षेत्रफल ABD त्रिकोण से दुगना होना चाहिए. # क्यूंकि C, A और G के साथ एकरेखस्थ है, वर्ग BAGF का क्षेत्रफल FBC त्रिकोण से दुगना होना चाहिए. # इसलिए आयत BDLK का क्षेत्रफल वर्ग BAGF के बराबर होना चाहिए = AB<sup>2</sup>. # इसी प्रकार, यह दिखाया जा सकता है की आयत चकले का क्षेत्रफल वर्ग ACIH के बराबर होना चाहिए= AC<sup>2</sup>. # इन दो परिणामों को जोड़कर, AB<sup>2</sup> + AC<sup>2</sup> = BD × BK + KL × KC # क्यूंकि BD = KL, BD* BK + KL × KC = BD(BK + KC) = BD × BC # इसलिए एबी AB<sup>2</sup> + AC<sup>2</sup> = BC<sup>2</sup>, क्यूंकि CBDE एक वर्ग है। यह प्रमाण यूक्लिड के ''तत्वों'' में प्रस्ताव 1.47 के रूप में पेश होता है।<ref>{{Cite web |url=http://www.perseus.tufts.edu/cgi-bin/ptext?doc=Perseus:text:1999.01.0085:book=1:proposition=47 |title=तत्वों 1.47 |access-date=4 सितंबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080411165747/http://www.perseus.tufts.edu/cgi-bin/ptext?doc=Perseus:text:1999.01.0085:book=1:proposition=47 |archive-date=11 अप्रैल 2008 |url-status=live }}</ref> === गारफील्ड के प्रमाण === [[जेम्स ए. गारफील्ड]] (परवर्ती संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति) को एक उपन्यास बीजीय प्रमाण द्वारा श्रेय दिया गया है:<ref>सिर, एंजी.</ref> पूरा [[ट्रेपेजोइड|समलम्ब]] (a+b) बाई (a+b) वर्ग का आधा है, तो उसका क्षेत्रफल = (a+b)<sup>2</sup>/2 = a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 + ab. त्रिकोण 1 और त्रिकोण 2 प्रत्येक क्षेत्रफल ab/2 है। त्रिकोण 3 का क्षेत्रफल c<sup>2</sup>/2 है और यह कर्ण पर वर्ग का आधा है। लेकिन त्रिकोण 3 का क्षेत्रफल भी = (समलम्ब का क्षेत्रफल) - (त्रिकोण 1 और 2 का क्षेत्रफल) := a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 + ab - ab/2 - ab/2 ::= a<sup>2</sup>/2 + b<sup>2</sup>/2 :::= अन्य दो पार्श्वों के वर्गों के जोड़ का आधा है। इसलिए कर्ण पर वर्ग = अन्य दो पार्श्वों के वर्गों का जोड़ है। === व्यवकलन द्वारा प्रमाण === इस प्रमाण में, कर्ण पर वर्ग प्लस त्रिकोण की 4 प्रतियां को अन्य दो पार्श्वों में वर्गों के रूप में जोड़ सकते हैं प्लस त्रिकोण की 4 प्रतियां.यह प्रमाण चीन से दर्ज की गई है।[[चित्र:Pythagorean proof (1).svg|thumb|क्षेत्र घटाव के उपयोग द्वारा प्रमाण]] === समानता प्रमाण === ऊपर यूक्लिड के प्रमाण के चित्र से, हम तीन [[समानता (ज्यामिति)|समान]] आंकड़ों को देख सकते हैं, प्रत्येक में "एक वर्ग के ऊपर त्रिकोण" है। क्यूंकि बड़ा त्रिकोण दो छोटे त्रिकोण से बना है, उसका क्षेत्रफल इन दो छोटे का जोड़ है। समानता से, तीन वर्ग एक दूसरे के साथ उसी अनुपात में हैं जैसे वह तीन त्रिकोण और इसी तरह के बड़े वर्ग का क्षेत्रफल दो छोटे वर्गों के क्षेत्रफल का जोड़ है। === विपर्यय से प्रमाण === [[चित्र:pythag.gif|thumb|left|4 समान समकोण त्रिकोण के पुनर्निर्माण के द्वारा पायथागॉरियन प्रमेय के 101 pxप्रमाण: चूंकि कुल क्षेत्र और त्रिकोण के क्षेत्र सभी निरंतर हैं, कुल काला क्षेत्र निरंतर है। लेकिन यह वर्ग विभाजित किया जा सकता है a, b, c, पार्श्वों के त्रिकोण से चित्रित प्रदर्शन के द्वारा [4] = c2.]]विपर्यय से प्रमाण को चित्रण और एनीमेशन के द्वारा दिया गया है। इस उदाहरण में, हर एक बड़े वर्ग का क्षेत्रफल {{nowrap|(''a'' + ''b'')<sup>2</sup>}} है। दोनों में, चरों समान त्रिकोण का क्षेत्रफल हटा दिया गया है। शेष क्षेत्रों, {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup>}} और ''c''<sup>2</sup>, बराबर हैं।[[Q.E.D.|Q.E.D]][[चित्र:Pythagoras-2a.gif|thumb|right|200px|एनिमेशन द्वारा विपर्यय से एक और प्रमाण दिखाया]][[चित्र:Pythagorean graphic.svg|thumb|विपर्यय का उपयोग करके प्रमाण]][[चित्र:Pythagproof.svg|thumb|right|बीजीय प्रमाण: एक वर्ग जो चार समकोण त्रिकोण और एक बड़े वर्ग को श्रेणीबद्ध करके निर्मित किया है]] यह प्रमाण वास्तव में बहुत आसान है, लेकिन यह प्रारंभिक नहीं है, इस अर्थ में कि यह केवल सबसे बुनियादी सिद्धांत और युक्लीडियन ज्यामिति के प्रमेयों पर निर्भर नहीं है। विशेष रूप से, जब त्रिकोण और वर्गों के क्षेत्रफल का सूत्र देना बहुत आसान है, यह साबित करने के लिए आसान नहीं है कि एक वर्ग का क्षेत्रफल उसके टुकडों के क्षेत्रों का जोड़ है। वास्तव में, आवश्यक गुण साबित करना पायथागॉरियन प्रमेय सिद्ध करने की तुलना में कठिन है (लेबेस्गु उपाय और बनाच-टार्स्कि विरोधाभास देखें).वास्तव में, यह कठिनाई सभी साधारण क्षेत्र शामिल युक्लीडियन प्रमाण को प्रभावित करता है; उदाहरण के लिए, एक समकोण त्रिकोण का क्षेत्र पाने के लिए एक धारणा शामिल है कि यह एक ही ऊंचाई और तल के एक आयत का आधा क्षेत्र है। इसी कारण से, ज्यामिति के लिए स्वयंसिद्ध परिचय आम तौर पर त्रिकोण की समानता के आधार पर एक और प्रमाण का प्रयोग करता है (ऊपर देखें). इस पायथागॉरियन प्रमेय का तीसरा ग्राफिक चित्रण में (दाहिने में पीले और नीले रंग में) कर्ण का वर्ग पार्श्वों के वर्ग में फिट बैठता है। एक संबंधित प्रमाण यह दिखा सकता है की पुनः स्थापित भाग मूल के समान हैं और, क्यूंकि समान का जोड़ समान है, की उनके क्षेत्र भी समान हैं। यह दिखाने के लिए की एक वर्ग ही परिणाम है, हमे नए पार्श्वों की लंबाई को ''c'' के बराबर दिखाना पड़ेगा.ध्यान दें की इस प्रमाण के काम करने के लिए, हमे छोटे वर्ग को और अधिक हिस्सों में काटने के तरीके को संभालने के लिए रास्ता प्रदान करना होगा चूंकि पार्श्व और छोटे होते जाएँगे.[http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/FaultyPythPWW.shtml<ref>पायथागॉरियन प्रमेय: दृश्य प्रमाण के सूक्ष्म खतरे</ref>]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} === बीजीय प्रमाण === इस प्रमाण का बीजीय भिन्नरूप निम्न तर्क द्वारा प्रदान किया गया है। चित्रण को देखते हुए जो एक बड़ा वर्ग है जिसके कोनों में समान समकोण त्रिकोण है, इन चार त्रिकोण में प्रत्येक का क्षेत्र ''C'' के साथ एक कोण के द्वारा दिया गया है। :<math>\frac{1}{2} AB.</math> इन त्रिकोण के ''A''-पार्श्व कोण और ''B''-पार्श्व कोण [[अनुपूरक कोण]] हैं, नीले क्षेत्र के प्रत्येक कोण समकोण हैं, इस क्षेत्र को एक वर्ग बनाते हुए जिसके पार्श्व की लंबाई ''C'' है। इस वर्ग का क्षेत्रफल है C''2''.इस तरह समस्त का क्षेत्र दिया जाता है: :<math>4\left(\frac{1}{2}AB\right)+C^2.</math> हालांकि, बड़े वर्ग के पार्श्वों की लंबाई {{nowrap|''A'' + ''B''}}[7], हम उसके क्षेत्रफल की गणना कर सकते हैं जैसे {{nowrap|(''A'' + ''B'')<sup>2</sup>}}[8], जो {{nowrap|''A''<sup>2</sup> + ''2AB'' + ''B''<sup>2</sup>}}[9] में विस्तारित होता है। : <math>A^2+2AB+B^2=4\left(\frac{1}{2}AB\right)+C^2.\,\!</math> ::(4 का वितरण)<math>A^2+2AB+B^2=2AB+C^2\,\!</math> :::(''2AB'' का व्यवकलन)<math>A^2+B^2=C^2\,\!</math> === विभेदक समीकरणों द्वारा प्रमाण === बौधायन प्रमेय में पहुंचा जा सकता है निम्नलिखित चित्र के अध्ययन से की एक पार्श्व में परिवर्तन कैसे कर्ण में एक परिवर्तन के उत्पादन कर सकता है और एक थोडा [[कैलकुलस|कलन]] का उपयोग करके.<ref>हार्डी.</ref> [[चित्र:PythagoreanDerivation.svg|thumb|right|विभेदक समीकरण का उपयोग करके प्रमाण]] पार्श्व ''a'' के ''da'' में परिवर्तन के परिणाम स्वरुप, :<math>\frac {da}{dc} = \frac {c}{a}</math> त्रिकोण की समानता और अंतर में बदलाव के लिए.इसलिए :<math>c\, dc = a\,da</math> [[चरों की जुदाई|चर के वियोजन]] पर. पार्श्व ''b'' में परिवर्तन के लिए एक दूसरा कार्यकाल जोड़ने का परिणाम है। समेकित देता है :<math>c^2 = a^2 + \mathrm{constant}.\ \,\!</math> जब ''a'' = 0 तब ''c ''= ''b'', तो ''b''<sup>2</sup> "निरंतर" है। इसलिए :<math>c^2 = a^2 + b^2.\,</math> जैसे देखा जा सकता है, परिवर्तन और पार्श्वों के बीच विशेष [[समानता (गणित)|अनुपात]] के कारण है यह वर्ग जबकि पार्श्वों में परिवर्तन की स्वतंत्र योगदान का परिणाम राशि है जो ज्यामितीय साक्ष्यों से स्पष्ट नहीं है। इस दिए गए अनुपात से यह दिखाया जा सकता है की पार्श्वों में परिवर्तन पार्श्वों से प्रतीपानुपाती अनुपात हैं। इस [[विभेदक समीकरण]] सुझाव देता है की यह प्रमेय संबंधित परिवर्तन के कारण है और इसके व्युत्पत्ति लगभग [[लाइन इंटीग्रल|लाइन अभिन्न]] अभिकलन के समान है। यह मात्रा ''da'' और ''dc'' क्रमशः ''a'' और ''c'' में अत्यंत छोटे परिवर्तन हैं। लेकिन हम इसके बदले वास्तविक संख्या Δa and Δc का उपयोग करते हैं, तब उनके अनुपात की सीमा da/dc है जब उनका आकार शून्य निकटता, व्युत्पन्नी और c/a भी निकटता है, त्रिकोण के पार्श्वों की लंबाई का अनुपात और विभेदक समीकरण का परिणाम पता चलता है। == विपर्याय == इस प्रमेय का विपर्याय भी सच है:<blockquote>किसी भी तीन धनात्मक संख्या ''a'', ''b'' और ''c'' ऐसी है {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}[10], वहाँ एक त्रिकोण मौजूद है जिसके पार्श्व हैं ''a'', ''b'' और ''c'' और हर ऐसे त्रिकोण में पार्श्वों के बीच एक समकोण है जिनकी लम्बाई ''a'' और ''b'' है।</blockquote> यह विपर्याय यूक्लिड के ''तत्वों'' में मौजूद होता है।[[कोसाइन के नियम|कोसाइन की विधि]] का प्रयोग करके यह साबित किया जा सकता है (नीचे देखें सामान्यकरण के नीचे), या निम्नलिखित प्रमाण के द्वारा: ''ABC'' को एक त्रिकोण मानते हैं जिसके पार्श्वों की लम्बाई ''a'', ''b'' और ''c'' है, {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}} के साथ.हमें यह साबित करना है कि ''a'' और ''b'' पार्श्वों के बीच के कोण समकोण है। हम एक और त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसमें पार्श्वों के बीच एक समकोण है जिसकी लंबाई ''a'' और ''b'' है। पायथागॉरियन प्रमेय से, निम्नानुसार है कि इस त्रिकोण के कर्ण लंबाई भी ''c'' है। चूंकि दोनों त्रिकोण के पार्श्वों की एक ही लंबाई है a, b और c, वे अनुकूल हैं और इसलिए उनका एक ही कोण होना चाहिए.इसलिए, जिन पार्श्वों की लंबाई ''a'' और ''b'' है हमारे मूल त्रिकोण में उनके बीच का कोण एक समकोण है। पायथागॉरियन प्रमेय के विपर्याय का एक [[परिणाम|अनुमान]] है की निर्धारण करने का एक सरल तरीका है की यदि एक त्रिकोण समकोण, ओब्ट्युस, या अक्यूट है, इस प्रकार से.जहाँ ''c'' को तीनों पार्श्वों में लंबा चुना गया है: * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण समकोण है। * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> > ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण ओब्ट्युस है। * अगर {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> < ''c''<sup>2</sup>}}, तो त्रिकोण अक्यूट है। == इस प्रमेय परिणाम और उपयोग == === पायथागॉरियन ट्रिपल === {{main|Pythagorean triple}} एक पायथागॉरियन ट्रिपल में तीन सकारात्मक पूर्णांक हैं ''a'', ''b'' और ''c'', जैसे की {{nowrap|''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> {{=}} ''c''<sup>2</sup>}}.अन्य शब्दों में, एक पायथागॉरियन ट्रिपल एक समकोण के पार्श्वों की लंबाई का वर्णन करता है जहाँ तीनों पार्श्व की पूर्णांक लंबाई है। उत्तरी यूरोप के बड़े पत्थरों से बने स्मारकों से साक्ष्य यह दिखाते हैं कि ऐसे ट्रिपल लिखने की खोज से पहले से जाने जानते थे। इस तरह के ट्रिपल सामान्यतः से लिखे गए हैं {{nowrap|(''a'', ''b'', ''c'')}}.कुछ प्रसिद्ध उदाहरण हैं {{nowrap|(3, 4, 5)}} और {{nowrap|(5, 12, 13)}} === आदिम पायथागॉरियन के ट्रिपल की 100 तक की सूची === (3, 4, 5), (5, 12, 13), (6,8,10) (7, 24, 25), (8, 15, 17), (9, 40, 41), (11, 60, 61), (12, 35, 37), (13, 84, 85), (16, 63, 65), (20, 21, 29), (28, 45, 53), (33, 56, 65), (36, 77, 85), (39, 80, 89), (48, 55, 73), (65, 72, 97) === तर्कहीन संख्या का अस्तित्व === पायथागॉरियन प्रमेय के परिणामों में से एक है कि [[आनुपातिक (गणित)|तारतम्यहीन]] लंबाई (ie. उनके अनुपात [[तर्कहीन संख्या]] में है), जैसे की 2 का वर्गमूल, बनाया जा सकता है। एक समकोण जिसके पैर दोनों एक इकाई के बराबर हैं उसके कर्ण की लंबाई 2 का वर्गमूल है। यह प्रमाण कि 2 का वर्गमूल तर्कहीन है लंबे समय से आयोजित विश्वास के विपरीत था कि सब कुछ तर्कसंगत था। पौराणिक कथा के अनुसार, [[हिप्पासुस]], जिसने दो के वर्गमूल की तर्कशून्यता सबसे पहले साबित करी थी, उसे परिणाम के रूप में समुद्र में डूब गया था।<ref>हीथ, ग्रंथ I, pp.</ref><ref>65, 154, स्टिलवेल, p.</ref><ref>9-8.</ref> === काटीज़ियन निर्देशांक में दूरस्थ === काटीज़ियन निर्देशांक में दूरस्थ फार्मूला को पायथागॉरियन प्रमेय से से प्राप्त किया गया है। अगर (''x''<sub>0</sub>, ''y''<sub>0</sub>) और (''x''<sub>1</sub>, ''y''<sub>1</sub>) चौरस में अंक हैं, तो उनके बीच की दूरी, जिसे [[यूक्लिडियन दूरी|युक्लीडियन दूरी]] भी कहा जाता है, जो दिया जाता है :<math> \sqrt{(x_1-x_0)^2 + (y_1-y_0)^2}. </math> अतिरिक्त सामान्यतः से, [[यूक्लिडियन जगह|युक्लीडियन में ''n''-अन्तर]], दो बिन्दुओं के बीच की युक्लीडियन दूरी, <math>\scriptstyle A\,=\, (a_1,a_2,\dots,a_n)</math> और <math>\scriptstyle A\,=\, (a_1,a_2,\dots,a_n)</math>, पायथागॉरियन प्रमेय का उपयोग करते हुए, परिभाषित किया गया है: :<math>\sqrt{(a_1-b_1)^2 + (a_2-b_2)^2 + \cdots + (a_n-b_n)^2} = \sqrt{\sum_{i=1}^n (a_i-b_i)^2}.</math> == सामान्यकरण == [[चित्र:Pythagoras-for similar triangles.svg|thumb|right|200px|समान त्रिकोणों के सामान्यकरण, हरा [20] क्षेत्र]] [[यूक्लिड]] के [[यूक्लिड के तत्व|''तत्वों'']] में बौधायन प्रमेय को सामान्यकृत किया गया था: <blockquote>अगर कोई एक समान आंकड़े खड़ा करता है ([[यूक्लिडियन ज्यामिति|युक्लीडियन ज्यामिति]] देखें) एक समकोण त्रिकोण के पार्श्वों में, तो दो छोटों के क्षेत्रों का जोड़ बड़े के क्षेत्रफल के बराबर है।</blockquote> बौधायन प्रमेय, पार्श्वों की लंबाई से संबंधित अधिक सामान्य प्रमेय का एक विशेष केस है, [[कोसाइन के नियम|कोसाइन की विधि]]: : :: <math>a^2+b^2-2ab\cos{\theta}=c^2, \,</math> ::जहां θ पार्श्वों ''a'' और ''b'' के बीच का कोण है। :::जब θ 90 डिग्री हो, तो Cos(θ) = 0, तो फार्मूला सामान्य बौधायन प्रमेय में बन जाता है। इस [[जटिल संख्या|जटिल]] [[आंतरिक उत्पाद जगह|आंतरिक उत्पाद अंतरिक्ष]] में दो [[वेक्टर जगह|वेक्टर]] '''v''' और '''w''' दिया जाए, तो बौधायन प्रमेय निम्नलिखित रूप ले लेती है: : ::<math>\|\mathbf{v}+\mathbf{w}\|^2 = \|\mathbf{v}\|^2 + \|\mathbf{w}\|^2 + 2\,\mbox{Re}\,\langle\mathbf{v},\mathbf{w}\rangle.</math> विशेष रूप से,||'''v''' + '''w'''||<sup>2</sup> =||'''v'''||<sup>2</sup> +||'''w'''||<sup>2</sup> अगर '''v''' और '''w''' आयतीय हैं, हालांकि विपर्याय का सच होना ज़रूरी नहीं है। गणितीय प्रेरण का प्रयोग करके, पिछला परिणाम किसी परिमित संख्या के जोडों में आयतीय वेक्टर तक बढ़ाया जा सकता है। के किसी भी परिमित [[आयतीय|संख्या को बढ़ाया]] जा सकता है।'''v'''<sub>1</sub>, '''v'''<sub>2</sub>,…, '''v'''<sub>n</sub> को वेक्टर मानते हैं एक आंतरिक उत्पाद अंतरिक्ष में जिसमें <'''v'''<sub>i</sub>, '''v'''''j''> = 0 जब 1 ≤ ''i'' < ''j'' ≤ ''n''.तब : ::<math>\left\|\,\sum_{k=1}^{n}\mathbf{v}_k\,\right\|^2 = \sum_{k=1}^{n} \|\mathbf{v}_k\|^2.</math> इस ''अनंत-आयामी'' को [[वास्तविक संख्या|असली]] आंतरिक उत्पाद स्थान के परिणाम के सामान्यकरण को [[पारसेवल की पहचान|पार्सेवल की पहचान]] के रूप में जाना जाता है। जब ऊपर के प्रमेय वेक्टर के बारे में ठोस ज्यामिति में पुनः लिखा जाता है, तो यह निम्नलिखित प्रमेय बन जाता है। यदि AB और BC रेखाएं B में समकोण बनाते हैं, BC और कद रेखाएं C में समकोण बनाते हैं और अगर CD अधोलंब के अधोलंब है जिसमें AB और BC रेखाएं शामिल है, तो AB, BC और CD की लम्बाई के वर्ग का जोड़ AD के वर्ग के जोड़ के बराबर है। यह प्रमाण तुच्छ है। तीन आयामों के लिए बौधायन प्रमेय का एक अन्य सामान्यकरण [[डी गुआ का प्रमेय]] है, जो [[जीन पॉल डी गुआ डे माल्व्स]] के नाम पर रखा गया है: यदि एक [[चतुष्फलक|टेट्राहेड्रोन]] में एक समकोण कोन है (एक [[घन (ज्यामिति)|घन]] की तरह एक कोने), तो वर्ग का क्षेत्रफल जो समकोण कोने के विपरीत तरफ है वो अन्य तीन तरफ के क्षेत्रों के जोड़े के बराबर है। चार और अधिक आयामों में इन प्रमेयों के अनुरूप भी हैं . जिन त्रिकोण में तीन [[कोण|अक्युट कोण]] होते हैं, ''α'' + ''β'' > ''γ'' होता है। इसलिए, ''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> > ''c''<sup>2</sup> होता है। जिन त्रिकोण में एक [[कोण|ओब्ट्युस कोण]] होता है, ''α'' + ''β'' < ''γ'' होता है। इसलिए, ''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> < ''c''<sup>2</sup> होता है। [[एड्स्जर डिजक्स्त्रा]] ने इस प्रस्ताव को अक्युट, समकोण और ओब्ट्युस त्रिकोण के बारे में इस भाषा में कहा है: : ::[[साइन प्रकार्य|sgn]](''α'' + ''β'' − ''γ'') = [[साइन प्रकार्य|sgn]](''a''<sup>2</sup> + ''b''<sup>2</sup> − ''c''<sup>2</sup>) जहाँ कोण ''α'' पार्श्व ''a'' के विपरीत है, कोण ''β'' पार्श्व ''b'' के विपरीत है और कोण ''γ'' पार्श्व ''c'' के विपरीत है।<ref>{{cite web|url=http://www.cs.utexas.edu/users/EWD/ewd09xx/EWD975.PDF|title=Dijkstra's generalization|format=PDF|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121003082829/http://www.cs.utexas.edu/users/EWD/ewd09xx/EWD975.PDF|archive-date=3 अक्तूबर 2012|url-status=live}}</ref> === बिना युक्लीडियन ज्यामिति के पायथागॉरियन प्रमेय === युक्लीडियन ज्यामिति के सिद्धांत से पायथागॉरियन प्रमेय से प्राप्त हुआ है, वास्तव में, ऊपर बताए पायथागॉरियन प्रमेय का युक्लीडियन प्रकार बिना [[यूक्लिडियन ज्यामिति|युक्लीडियन ज्यामिति]] के नहीं होता है। (यह वास्तव में यूक्लिड के समांतर (पांचवां) स्वसिद्ध के बराबर दिखाया गया है।) उदाहरण के लिए, [[गोलाकार ज्यामिति|गोलीय ज्यामिति]] में, ओक्टेट से सीमित इकाई क्षेत्र के समकोण त्रिकोण के तीनों पार्श्वों की लंबाई <math>\scriptstyle \pi/2</math> के बराबर है; युक्लीडियन पायथागॉरियन प्रमेय का उल्लंघन करती है क्यूंकि <math>\scriptstyle \pi/2</math> इसका मतलब है की बिना युक्लीडियन प्रमेय में, पायथागॉरियन प्रमेय को युक्लीडियन प्रमेय से एक अलग रूप लेना चाहिए.यहाँ दो मामलों पर विचार करना पड़ेगा- [[गोलाकार ज्यामिति]] और [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति|अतिशयोक्तिपूर्ण समतल ज्यामिति]] हैं; हर मामले में, युक्लीडियन मामले की तरह, उचित कोसाइन के नियम से परिणाम निकलता है: एक गोला जिसकी त्रिज्या ''R'' है उसपर कोई भी समकोण त्रिकोण के लिए, पायथागॉरियन प्रमेय यह रूप लेता है :<math> \cos \left(\frac{c}{R}\right)=\cos \left(\frac{a}{R}\right)\,\cos \left(\frac{b}{R}\right).</math> यह समीकरण [[कोसाइन का गोलाकार कानून|कोसाइन के गोलाकार कानून]] का एक विशेष मामले के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। इस कोसाइन समारोह के लिए [[मैकलौरिन श्रृंखला]] का उपयोग करके, यह दिखाया जा सकता है कि त्रिज्या ''R'' अनन्तता तक पहुंचता है, के रूप में है, पायथागॉरियन प्रमेय का गोलाकार रूप युक्लीडियन रूप तक पहुंचता है। इस [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति|अतिशयोक्तिपूर्ण समतल]] में किसी भी त्रिकोण के लिए (गौस्सियन [[वक्रता]] -1 के साथ), पायथागॉरियन प्रमेय यह रूप लेता है :<math> \cosh c=\cosh a\,\cosh b</math> जहाँ cosh के अतिशयोक्तिपूर्ण कोसाइन है। इस प्रकार्य के लिए मैकलौरिन श्रृंखला का उपयोग करके, यह दिखाया जा सकता है कि जिस तरह अतिशयोक्तिपूर्ण त्रिकोण बहुत छोटी हो जात है (अर्थात जब ''a'', ''b'' और ''c'' शून्य निकटते हैं), पायथागॉरियन प्रमेय का अतिशयोक्तिपूर्ण रूप युक्लीडियन रूप को निकटता है। [[अतिशयोक्तिपूर्ण ज्यामिति]] में, एक समकोण त्रिकोण के लिए भी लिखा जा सकता है, :<math>\sin \bar a \sin \bar b = \sin \bar c</math> जहाँ <math>\scriptstyle\bar a</math> रेखा खंड अब की [[समानता का कोण]] जो <math>\scriptstyle\bar a</math> जहाँ μ [[गुणन दूरी|गुणात्मक दूरी]] प्रकार्य है ([[अंत की हिल्बर्ट की गणित|हिल्बर्ट के अंत के अंकगणितीय]] ''देखें''). अतिशयोक्तिपूर्ण त्रिकोणमिति में, साइन के कोण की समानता संतुष्ट करता है :<math>\sin \bar a = \frac{2a}{1+a^2}.</math> इस प्रकार, यह समीकरण रूप लेता है :<math>\frac{2a}{1+a^2} \frac{2b}{1+b^2}=\frac{2c}{1+c^2}</math> जहाँ ''a'', ''b'', and ''c'' समकोण त्रिकोण के पार्श्वों की गणात्मक दूरियाँ हैं (हार्टशोर्न, 2000). === 2 से अधिक आयामों में === 3 आयामों में अंक { and { के बीच की दूरी √([√((a-d)<sup>2</sup>+(b-e)<sup>2</sup>)]<sup>2</sup>+(c-f)<sup>2</sup>) = √((a-d)<sup>2</sup>+(b-d)<sup>2</sup>+(c-f)<sup>2</sup>) है और इसी प्रकार 4 या अधिक आयामों के लिए. === जटिल अंकगणितीय में: मान्य नहीं === पायथागॉरस फार्मूला को [[काटीज़ियन|कार्टीज़इयन]] निर्देशांक समतल में दो अंकों के बीच की दूरी पता करने के लिए प्रयोग किया जाता है और मान्य है अगर सब निर्देशांक असली हैं: अंक {2+(b-d)<sup>2</sup>).लेकिन [[जटिल अंकगणितीय|जटिल निर्देशांक]] के साथ: उदाहरण, अंक { और {i,0} के बीच की दूरी शून्य बनेगी, जिसका परिणाम है [[रिड़कशियो एड अबसरडम|''रिडाक्शियो एड़ अब्सुर्डम'']].यह इसलिए है क्योंकि यह फार्मूला पायथागॉरस की प्रमेय पर निर्भर है, जो अपने हस प्रमाण में क्षेत्रफल पर निर्भर है और क्षेत्रफल त्रिकोण पर निर्भर है और अन्य ज्यामितीय आंकडों पर जो अंदर को बहार से अलग करती है, जो मुमकिन नहीं होता अगर निर्देशांक जटिल होते. == इतिहास == {{Refimprovesect|date=अप्रैल 2008}} [[चित्र:Chinese pythagoras.jpg|thumb|300px|चौ पी सुआन चिंग 500-200 BC में के रूप में (3, 4, 5) त्रिकोण का दृश्य प्रमाण]] इस बात पर बहस है कि क्या पाइथागोरस प्रमेय की खोज एक बार, या कई बार हुई थी, और पहली खोज की तारीख अनिश्चित है, जैसा कि पहले प्रमाण की तारीख है। मेसोपोटामिया के गणित के इतिहासकारों ने निष्कर्ष निकाला है कि पाइथागोरस के जन्म से एक हजार साल पहले, पुराने बेबीलोनियन काल (20 वीं से 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान पाइथागोरस शासन का व्यापक उपयोग था। [69] [70] [71] [72] प्रमेय के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है: पाइथागोरस त्रिगुणों का ज्ञान, एक समकोण त्रिभुजों के बीच संबंधों का ज्ञान, निकटवर्ती कोणों के बीच संबंधों का ज्ञान और कुछ समर्पण प्रणाली के भीतर प्रमेय के प्रमाण। 2000 और 1786 ईसा पूर्व के बीच लिखे गए, मध्य साम्राज्य मिस्र के बर्लिन पपीरस 6619 में एक समस्या शामिल है जिसका समाधान पायथागॉरियन ट्रिपल 6: 8: 10 है, लेकिन समस्या एक त्रिकोण का उल्लेख नहीं करती है। मेसोपोटामियन टैबलेट प्लाम्पटन 322, 1790 और 1750 ईसा पूर्व के बीच हम्मुराबी द ग्रेट के शासनकाल के दौरान लिखा गया था, जिसमें पाइथागोरियन त्रिगुणों से संबंधित कई प्रविष्टियां शामिल हैं। भारत में, बौधायन सुलबा सूत्र, जिनकी तिथियां 8 वीं और 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच बताई गई हैं, [73] में पाइथोगोरियन त्रिगुणों की एक सूची और पाइथागोरस प्रमेय का विवरण शामिल है, दोनों समद्विबाहु के विशेष मामले में दोनों त्रिभुज और सामान्य मामले में, जैसा कि आपस्तम्बा सुलबा सूत्र (c। 600 ईसा पूर्व) है। Van der Waerden का मानना ​​था कि यह सामग्री "निश्चित रूप से पहले की परंपराओं पर आधारित थी"। कार्ल बोयर कहते हैं कि औलबा-सत्तरम में पाइथागोरस प्रमेय प्राचीन मेसोपोटामियन गणित से प्रभावित हो सकता है, लेकिन इस संभावना के पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णायक सबूत नहीं है। [the४] इस प्रमेय का इतिहास चार भागों में बाँटा जा सकता है: [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] का ज्ञान, [[समकोण त्रिकोण]] पार्श्वों के बीच के रिश्ते का ज्ञान, आसन्न कोण के बीच संबंधों के ज्ञान और प्रमेय के प्रमाण. [[मिस्र]] में [[बड़े पत्थरों का बना स्मारक]] लगभग 2500 BC से और [[उत्तरी यूरोप]] में, पूर्णांक पार्श्वों के समकोण त्रिकोण शामिल हैं।<ref>{{cite web|url=http://hyperion.cc.uregina.ca/~astro/Mega_circ.html|title=Megalithic Monuments.|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20110706211316/http://hyperion.cc.uregina.ca/%7Eastro/Mega_circ.html|archive-date=6 जुलाई 2011|url-status=dead}}</ref> [[बर्टेल लीनडार्ट वन डर वैरडेन|बार्टेल लीनडर्ट वॉन ड़र वार्डेन]] का अनुमान है की यह पायथागॉरियन ट्रिपल की खोज [[बीजगणित|बीजीय]] से हुई है।<ref>वॉन ड़र वार्डेन 1983.</ref> 2000 और 1786 BC के बीच लिखा गया, [[मिस्र]] की [[मिस्र के मध्यम साम्राज्य|मध्यम किंगडम]] पापिरुस [[बर्लिन पापिरुस|''बर्लिन 6619'']] में एक समस्या शामिल है जिसका समाधान एक [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] है। [[मेसोपोटामिया]] के नोटबुक [[प्लिम्पटन 322|''प्लिम्प्टन 322'']], [[18 वीं शताब्दी BC|1790]] और 1750 BC में महान [[हाम्मुरबी]] के शासनकाल के दौरान लिखा गया था, जिसमें कई प्रविष्टियों शामिल हैं जो पायथागॉरियन ट्रिपल के निकटता से संबंधित. ''[[बौधयाना]][[सुल्बा सूत्र]]'', जिसकी विभिन्न तारीक 8 वीं शताब्दी BC और 2 वीं शताब्दी BC के बीच दिए गए हैं, [[भारत का इतिहास|भारत]] में, जिसमें [[पायथागॉरियन ट्रिपल]] की एक सूची शामिल है जिसकी खोज बीजीय से हुई है, पायथागॉरियन प्रमेय का एक बयान और एक [[समद्विबाहु]] त्रिकोण ''[[अपास्ताम्बा]] सुल्बा सूत्र'' (लगभग 600 BC) में सामान्य पायथागॉरियन प्रमेय की संख्यात्मक प्रमाण शामिल हैं, एक क्षेत्र संगणना के उपयोग से.[[वॉन ड़र वार्डेन]] का विश्वास है "यह निश्चित रूप से पहले के परंपराओं पर आधारित थी" [[पायथागॉरस]] ने, जिसकी तारीखें सामान्यतः 569-475 BC दी गई है, पायथागॉरियन ट्रिपल के निर्माण के लिए बीजीय तरीके का इस्तेमाल करके, [[यूक्लिड]] में [[प्रोक्लुस|प्रोक्लोस]] की कमेंट्री के अनुसार.प्रोक्लोस ने, तथापि, 410 और 485 AD के बीच लिखा था। [[टी.एल.हीथ|सर थॉमस एल. हीथ]] के अनुसार, पायथागॉरस को प्रमेय का कोई रोपण नहीं था पाँच सदियों तक पायथागॉरस के जीवित रहने तक.हालांकि, जब [[प्लूटार्क|प्लूटार्च]] और [[सिसरौ|सिसेरौ]] जैसे लेखकों ने पायथागॉरस को प्रमेय ठहराया, उन्होंने इस तरह से किया जो कि रोपण व्यापक रूप से जाना जाए और निस्संदेह रहे.<ref name="Heath, Vol I, p. 144"/> 400 BC के दौरान, प्रोक्लोस के अनुसार, [[प्लेटो]] ने पायथागॉरियन ट्रिपल को खोजने की एक विधि दी जिसे बीजगणित और ज्यामिति संघटित हुआ। लगभग 300 BC, [[यूक्लिड के तत्व|यूक्लिड के "तत्वों"]] में, प्रमेय का सबसे पुराना वर्तमान [[गणित|सिद्धांतों वाला प्रमाण]] पेश किया गया था। कुछ समय 500 BC और 200 AD के बीच लिखा गया था, [[चीन|चीनी]] पाठ [[चौ पी सुआन चिंग|''चौ पी सुअन चिंग'']] (周髀算经), (''ग्नोमोन के अंकगणितीय शास्त्रीय और स्वर्ग का परिपत्र रास्ता'') पायथागॉरियन प्रमेय का एक दृश्य प्रमाण देता है - चीन में इसे "गौगु प्रमेय" कहा जाता है (勾股定理) — त्रिकोण (3, 4, 5) के लिए.[[हान राजवंश]] के दौरान, 202 BC से 220 AD तक, पायथागॉरियन ट्रिपल को [[गणितीय कला पर नौ अध्याय|''गणितीय कला के नौवें अध्याय'']] में देखा गया है, समकोण त्रिकोण के एक उल्लेख के साथ.<ref>स्वेट्ज़.</ref> [[चीन]] में पहला रिकॉर्ड किया गया उपयोग है, जो "गौगु प्रमेय" (勾股定理) के नाम से जाना जाता है, [[भारत]] में भास्कर प्रमेय के नाम से जाना जाता है। काफी बहस है की क्या पायथागॉरियन प्रमेय की खोज एक या कई बार हुई थी। बोयर (1991) का सोचना है की शुल्बा सूत्र में पाए गए तत्व मेसोपोटामिया व्युत्पत्ति के हो सकते हैं।<ref>{{cite book|last=Boyer|authorlink=Carl Benjamin Boyer|year=1991|chapter=China and India|pages=207|quote=we find rules for the construction of right angles by means of triples of cords the lengths of which form Pythagorean triages, such as 3, 4, and 5, or 5, 12, and 13, or 8, 15, and 17, or 12, 35, and 37. However all of these triads are easily derived from the old Babylonian rule; hence, Mesopotamian influence in the ''Sulvasutras'' is not unlikely. Aspastamba knew that the square on the diagonal of a rectangle is equal to the sum of the squares on the two adjacent sides, but this form of the Pythagorean theorem also may have been derived from Mesopotamia. [...] So conjectural are the origin and period of the ''Sulbasutras'' that we cannot tell whether or not the rules are related to early Egyptian surveying or to the later Greek problem of alter doubling. They are variously dated within an interval of almost a thousand years stretching from the eighth century B.C. to the second century of our era.}}</ref> == पायथागॉरियन प्रमेय के सांस्कृतिक संदर्भ == पायथागॉरियन प्रमेय पूरे इतिहास में कई किस्म की मास मीडिया में संदर्भित है। * [[मेजर-जनरल के गीत|मेजर-जनरल के संगीत]] का एक पद्य [[गिल्बर्ट और सुलिवेन|गिलबर्ट और सुलिवेन]] संगीतिक [[पेनज़ैन्स के समुद्री डाकू]], "द्विपद प्रमेय के बारे में मैं बहुत से समाचार से भरा हुआ हूँ, कर्ण के वर्ग के कई हंसमुख तथ्यों के साथ", प्रमेय के तिरछा संदर्भ के द्वारा. * [[विज़र्ड ऑफ़ ओज़ (1939 फ़िल्म)|''[[जादूगर (ओज़)|विज़र्ड]] ऑफ़ ओज़'']] का [[बिजूखा (ओज़)|बिजूखा]] इस प्रमेय का एक और अधिक विशिष्ट संदर्भ बनाता है जब उसे जादूगर से डिप्लोमा प्राप्त होता है। उसने तुरंत अपने "ज्ञान" प्रदर्शन एक वध और गलत संस्करण पढ़ने के द्वारा: "एक समद्विबाहु त्रिकोण के किसी भी दो पार्श्वों के वर्ग जड़ों का जोड़ शेष पार्श्वों के वर्ग जड़ों के बराबर है। ओह, आनन्द, ओह, उमंग.मुझेमें दिमाग है ! "बिजूखा द्वारा प्रदर्शित "ज्ञान" गलत है। सही बयान "एक समकोण त्रिकोण के पैरों के वर्गों का जोड़ बाकी पार्श्वों के वर्ग के बराबर हैं" होता.<ref>{{cite web|url=http://www.geocities.com/hollywood/hills/6396/ozmath.htm|title=The Scarecrow's Formula|archiveurl=https://web.archive.org/web/20020314022442/http://www.geocities.com/hollywood/hills/6396/ozmath.htm|archivedate=14 मार्च 2002|access-date=4 सितंबर 2012|url-status=dead}}</ref> * [[द सिंपसन्स|''द सिंपसन्स'']] के एक प्रकरण में, [[हेनरी किसिंजर]] के चश्मे को [[स्प्रिंगफील्ड परमाणु ऊर्जा संयंत्र|स्प्रिंगफील्ड में परमाणु ऊर्जा संयंत्र]] के शौचालय में ढूँढने के बाद, [[होमर सिम्पसन|होमर]] उन्हें पहनता है और उद्धरण करता है ओज़ बिजूखा के सूत्र का वध संस्करण.पास में एक शौचालय दुकान में एक आदमी रोकता है और चिलाता है "यह एक ''समकोण'' त्रिकोण है, बेवकूफ ! "(वर्ग जड़ों के बारे में टिप्पणी कभी सही नहीं हुआ।) * इसी तरह, [[Apple Inc.|Apple]] [[MacBook]] की भाषण सॉफ्टवेयर बिजूखा के गलत बयान को संदर्भित करता है। यह भाषण का नमूना है जब आवाज सेटिंग राल्फ को चुना जाता है। * [[फ्रीमेसनरी|संगतराशों]] में, [[विगत के मास्टर (राजमिस्री के कार्य से)|विगत के मास्टर]] का एक प्रतीक यूक्लिड के 47 प्रस्ताव से एक चित्र है, पायथागॉरियन प्रमेय के यूक्लिड के प्रमाण में प्रयुक्त.राष्ट्रपति गारफील्ड एक संगतराश थे। * 2000 में, [[युगांडा]] ने एक समकोण त्रिकोण के आकार का एक सिक्का जारी किया। सिक्के की पूँछ में पैथागोरस और पायथागॉरियन प्रमेय का चित्रण था, "पायथागॉरस मिलेनियम" के उल्लेख के साथ.<ref>{{cite web|url=http://homepage.sefanet.ch/meylan-sa/saviez-vous1.htm|title=Le Saviez-vous ?|access-date=4 सितंबर 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20090921060307/http://homepage.sefanet.ch/meylan-sa/saviez-vous1.htm|archive-date=21 सितंबर 2009|url-status=dead}}</ref> [[ग्रीस]], [[जापान]], [[सैन मैरिनो]], [[सियरा लेओन]] और [[सूरीनाम]] [[डाक टिकट]] जारी किए हैं पायथागॉरस और पायथागॉरियन प्रमेय के चित्रण के साथ.<ref>{{cite web|url=http://members.tripod.com/jeff560/index.html|title=Images of Mathematicians on Postage Stamps|first=Jeff|last=Miller|date=[[3 अगस्त 2007]]|accessdate=6 अगस्त 2007}}</ref> * [[नील स्टीफेंसन|नील स्टीफेनसन]] के विचारवान कल्पना [[ऐनथम|''ऐनथम'']] में, पायथागॉरियन प्रमेय को "अड्राखोनिक प्रमेय" के रूप में संदर्भित किया गया है। इस प्रमेय का एक ज्यामितिक प्रमाण एक विदेशी जहाज की एक तरफ गणित की उनकी समझ प्रदर्शित करने के लिए प्रदर्शित किया। == इन्हें भी देखें == <div> * [[बौधायन का शुल्बसूत्र]] * [[बौधायन]] * [[कात्यायन (गणितज्ञ)|कात्यायन]] * [[रैखिक बीजगणित]] * [[फर्मा का अन्तिम प्रमेय]] * [[पायथागोरीय प्रायिकता]] </div> == नोट्स == {{reflist|2}} == सन्दर्भ == <div class="references"> * बेल, जॉन एल., [https://web.archive.org/web/20120805183429/http://publish.uwo.ca/~jbell/ ''सुगम की कला: एक प्रारंभिक सर्वेक्षण गणित की संकल्पनात्मक विकास,''] क्लुव्र, 1999 में.ISBN 0-7923-5972-0. * यूक्लिड, ''यह तत्व,'' एक परिचय और कमेंटरी में अनुवादित साहब थॉमस एल. हीथ के द्वारा, डोवर, (3 ग्रंथ), 2 संस्करण, 1956. * हार्डी, माइकल, "पायथागॉरस को मुश्किल बनाया गया".{}गणितीय बुद्धिजीवी, '''10''' (3), p.&nbsp;31, 1988. * [[टी.एल.हीथ|हीथ, सर थॉमस]], ''ग्रीक गणित का इतिहास'' (2 ग्रंथ), क्लैरेंडोन प्रेस, ऑक्सफोर्ड (1921), डोवर प्रकाशन, Inc (1981), ISBN 0-486-24073-8. * लूमिस, एलीशा स्कॉट, ''पायथागॉरियन प्रस्ताव.'' 2 संस्करण, वाशिंगटन, D.C: गणित शिक्षक राष्ट्रीय परिषद, 1968.ISBN 978-0-87353-036-1. * मोर, एली, ''पायथागॉरियन प्रमेय: एक 4000 साल का इतिहास.''प्रिंसटन, न्यू जर्सी: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2007, ISBN 978-0-691-12526-8. * स्टिलवेल, जॉन, ''गणित और उसका इतिहास,'' स्प्रिंगर-वेर्लग, 1989.ISBN 0-387-96981-0 और ISBN 3-540-96981-0. * स्वेट्ज़, फ्रैंक, काओ, टी.आइ.,''पायथागॉरस चीनी था?: समकोण त्रिकोण सिद्धांत की प्राचीन चीन एक परीक्षा,'' पेंसिल्वेनिया राज्य विश्वविद्यालय प्रेस.1997. * वॉन ड़र वार्डेन, बी.एल., ''प्राचीन सभ्यताओं में ज्यामिति और बीजगणित,'' स्प्रिंगर, 1983. </div> == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat|Pythagorean theorem}} * [https://web.archive.org/web/20120825143042/http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/index.shtml पायथागॉरियन प्रमेय] ([[कट-द-नॉट|कट-डी-नॉट]] से 70 से अधिक प्रमाण) * इंटरैक्टिव लिंक: ** [[जावा]] में पायथागॉरियन प्रमेय का [https://web.archive.org/web/20120712151940/http://sunsite.ubc.ca/LivingMathematics/V001N01/UBCExamples/Pythagoras/pythagoras.html इंटरएक्टिव प्रमाण] ** [https://web.archive.org/web/20120826130543/http://www.cut-the-knot.org/pythagoras/Perigal.shtml][[जावा]] में पायथागॉरियन प्रमेय का एक और इंटरएक्टिव प्रमाण ** इंटरैक्टिव एनीमेशन के साथ [https://web.archive.org/web/20120911234427/http://www.mathopenref.com/pythagorastheorem.html पायथागॉरियन प्रमेय] ** एनिमेटेड, अनि-बीजीय और [https://web.archive.org/web/20090530072020/http://math.ucr.edu/~jdp/Relativity/Pythagorus.html उपयोगकर्ता-गति] में पायथागॉरियन प्रमेय * {{MathWorld|title=Pythagorean theorem|urlname=PythagoreanTheorem}} * [https://web.archive.org/web/20120709073734/http://www.gogeometry.com/pythagoras/right_triangle_formulas_facts.htm पायथागॉरियन प्रमेय और समकोण त्रिकोण के फ़ार्मुले] [[श्रेणी:कोण]] [[श्रेणी:क्षेत्रफल]] [[श्रेणी:समीकरण ]] [[श्रेणी:यूक्लिडीय समतल ज्यामिति]] [[श्रेणी:गणितीय प्रमेय]] [[श्रेणी:त्रिभुज ज्यामिति]] pfhylm8ecqgrjy1u0ztfm1huoj08zxw सृजन और विलोपन संकारक 0 66065 6543665 6457282 2026-04-24T16:51:30Z ~2026-21496-92 919279 लेख आरम्भ किया 6543665 wikitext text/x-wiki '''सृजन/उत्पति संकारक''' (Creation operators) और '''विलोपन संकारक''' (annihilation operators) एक गणितीय संकारक है जिनके [[क्वांटम यांत्रिकी]] में व्यापक अनुप्रयोग हैं। मुख्य अनुप्रयोग बहु-कण निकाय और [[क्वांटम सरल आवर्ती दोलक]] के अध्ययन में मिलते हैं।<ref name="Feynman1998p151">{{harvnb|Feynman|1998|p=151}}</ref> विलोपन संकारक (सामान्यतः <math>\hat{a}</math> लिखा जाता है) दी गयी प्रावस्था में कणों की संख्या में एक कम करता है। सृजन संकारक (सामान्यतः <math>\hat{a}^\dagger</math> लिखा जाता है) दी गयी प्रावस्था में एक कण की वृद्धि करता है। सृजन संकारका और विलोपन संकारक एक दूसरे के संलग्नक (adjoint अथवा सहखंडज) होते हैं। [[भौतिक शास्त्र|भौतिकी]] एवं [[रसायन विज्ञान|रसायनिकी]] के उपक्षेत्रों में [[तरंगफलन|तरंगफलनो]] के स्थान पर इन संकारकों का उपयोग [[द्वितीय क्वान्टीकरण]] के रूप में जाना जाता है। यह [[पॉल डिरॅक]] की प्रस्तुति से आरम्भ होता है।<ref> Dirac, P. A. M. (1927). "The quantum theory of the emission and absorption of radiation", ''Proc Roy Soc London Ser A'', '''114''' (767), 243-265. </ref> == सन्दर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत]] 05s1i2m72y1jrnsx4vdbjeua4xb6j4h 6543667 6543665 2026-04-24T16:54:45Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[साँचा:१९५७ में पद्म भूषण धारक]] को [[सृजन और विलोपन संकारक]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 6543665 wikitext text/x-wiki '''सृजन/उत्पति संकारक''' (Creation operators) और '''विलोपन संकारक''' (annihilation operators) एक गणितीय संकारक है जिनके [[क्वांटम यांत्रिकी]] में व्यापक अनुप्रयोग हैं। मुख्य अनुप्रयोग बहु-कण निकाय और [[क्वांटम सरल आवर्ती दोलक]] के अध्ययन में मिलते हैं।<ref name="Feynman1998p151">{{harvnb|Feynman|1998|p=151}}</ref> विलोपन संकारक (सामान्यतः <math>\hat{a}</math> लिखा जाता है) दी गयी प्रावस्था में कणों की संख्या में एक कम करता है। सृजन संकारक (सामान्यतः <math>\hat{a}^\dagger</math> लिखा जाता है) दी गयी प्रावस्था में एक कण की वृद्धि करता है। सृजन संकारका और विलोपन संकारक एक दूसरे के संलग्नक (adjoint अथवा सहखंडज) होते हैं। [[भौतिक शास्त्र|भौतिकी]] एवं [[रसायन विज्ञान|रसायनिकी]] के उपक्षेत्रों में [[तरंगफलन|तरंगफलनो]] के स्थान पर इन संकारकों का उपयोग [[द्वितीय क्वान्टीकरण]] के रूप में जाना जाता है। यह [[पॉल डिरॅक]] की प्रस्तुति से आरम्भ होता है।<ref> Dirac, P. A. M. (1927). "The quantum theory of the emission and absorption of radiation", ''Proc Roy Soc London Ser A'', '''114''' (767), 243-265. </ref> == सन्दर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत]] 05s1i2m72y1jrnsx4vdbjeua4xb6j4h राष्ट्रीय उद्यान 0 99310 6543614 6543544 2026-04-24T13:29:56Z चाहर धर्मेंद्र 703114 विकि कड़ियाँ 6543614 wikitext text/x-wiki [[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]] [[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]] [[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]] '''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, [[ऐतिहासिक स्थलों का राष्ट्रीय पंजीकरण|ऐतिहासिक]] या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक [[पारिस्थितिकी]], [[जैव विविधता]] और [[सांस्कृतिक विरासत]] को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण संरक्षण के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं। सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया। हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, [[मेन रिज, टोबेगो|टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व]], जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref> प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया। [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है। इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है। यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। ==परिभाषाएं== [[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]] [[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]] [[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]] वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref> * इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है। * इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। * इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है। वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि * ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके। * इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके। * केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके। * इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप, * स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है। * इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है, * जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है। * इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है। * विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है। * इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है, * जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है। इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते। इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है। इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है। ===शब्दावली=== [[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]] प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है। उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते। इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। ==इतिहास== ===प्रारंभिक सन्दर्भ=== अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref> हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी। इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref> इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। ===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी=== [[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]] प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी। हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/> प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका। जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref> इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था। हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके। ===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन=== [[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]] वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया। हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था। येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref> ===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास=== [[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]] “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई। हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया। [[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]] येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref> इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई। [[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]] यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था। [[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]] अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी। [[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है। इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref> कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई। ===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ=== विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref> इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया। [[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग  1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]] आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है। ==आर्थिक परिणाम== कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> ===पर्यटन=== राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे। ===कर्मचारी=== पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें। रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/> ==चिंताएँ== पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref> किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है। कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है। वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है। आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके। ==इन्हें भी देखें== * [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]] * [[जैव संरक्षण]] * [[संरक्षण आंदोलन]] * [[भूद्यान]] * [[राष्ट्रीय स्मारक]] * [[संधारणीय विकास]] * [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]] * [[संरक्षण (नैतिक)]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} ===सूत्रों का कहना है=== * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages. * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages. * शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}} ==अग्रिम पठन== * क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080 * अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6 * एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869 ==बाहरी कड़ियाँ== {{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }} *{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}} *{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}} *{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}} *{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}} *{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}} *{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}} *{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}} *{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}} *{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}} *{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}} [[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]] [[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]] ofkety976iiwe2mmxchhgi4ur22modw 6543615 6543614 2026-04-24T13:31:58Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543615 wikitext text/x-wiki [[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]] [[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]] [[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]] '''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, [[ऐतिहासिक स्थलों का राष्ट्रीय पंजीकरण|ऐतिहासिक]] या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक [[पारिस्थितिकी]], [[जैव विविधता]] और [[सांस्कृतिक विरासत]] को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल [[पर्यावरण संरक्षण]] के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं। सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया। हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, [[मेन रिज, टोबेगो|टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व]], जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref> प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया। [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है। इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है। यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। ==परिभाषाएं== [[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]] [[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]] [[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]] वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref> * इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है। * इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। * इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है। वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि * ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके। * इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके। * केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके। * इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप, * स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है। * इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है, * जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है। * इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है। * विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है। * इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है, * जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है। इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते। इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है। इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है। ===शब्दावली=== [[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]] प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है। उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते। इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। ==इतिहास== ===प्रारंभिक सन्दर्भ=== अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref> हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी। इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref> इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। ===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी=== [[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]] प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी। हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/> प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका। जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref> इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था। हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके। ===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन=== [[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]] वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया। हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था। येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref> ===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास=== [[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]] “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई। हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया। [[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]] येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref> इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई। [[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]] यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था। [[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]] अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी। [[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है। इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref> कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई। ===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ=== विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref> इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया। [[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग  1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]] आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है। ==आर्थिक परिणाम== कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> ===पर्यटन=== राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे। ===कर्मचारी=== पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें। रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/> ==चिंताएँ== पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref> किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है। कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है। वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है। आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके। ==इन्हें भी देखें== * [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]] * [[जैव संरक्षण]] * [[संरक्षण आंदोलन]] * [[भूद्यान]] * [[राष्ट्रीय स्मारक]] * [[संधारणीय विकास]] * [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]] * [[संरक्षण (नैतिक)]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} ===सूत्रों का कहना है=== * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages. * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages. * शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}} ==अग्रिम पठन== * क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080 * अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6 * एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869 ==बाहरी कड़ियाँ== {{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }} *{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}} *{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}} *{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}} *{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}} *{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}} *{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}} *{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}} *{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}} *{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}} *{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}} [[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]] [[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]] 2zt6ls71jgx689p7b56b36lbr1r6xwv 6543626 6543615 2026-04-24T14:18:22Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543626 wikitext text/x-wiki [[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]] [[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]] [[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]] '''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, [[ऐतिहासिक स्थलों का राष्ट्रीय पंजीकरण|ऐतिहासिक]] या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक [[पारिस्थितिकी]], [[जैव विविधता]] और [[सांस्कृतिक विरासत]] को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल [[पर्यावरण संरक्षण]] के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं। सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया। हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, [[मेन रिज, टोबेगो|टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व]], जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref> प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया। [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत [[विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग|संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग]] ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है। इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है। यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। ==परिभाषाएं== [[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]] [[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]] [[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]] वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref> * इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है। * इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। * इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है। वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि * ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके। * इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके। * केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके। * इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से संसाधनों के दोहन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप, * स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है। * इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है, * जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है। * इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है। * विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है। * इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है, * जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है। इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते। इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है। इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है। ===शब्दावली=== [[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]] प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है। उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते। इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। ==इतिहास== ===प्रारंभिक सन्दर्भ=== अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref> हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी। इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref> इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। ===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी=== [[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]] प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी। हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/> प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका। जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref> इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था। हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके। ===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन=== [[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]] वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया। हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था। येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref> ===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास=== [[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]] “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई। हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया। [[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]] येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref> इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई। [[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]] यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था। [[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]] अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी। [[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है। इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref> कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई। ===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ=== विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref> इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया। [[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग  1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]] आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है। ==आर्थिक परिणाम== कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> ===पर्यटन=== राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे। ===कर्मचारी=== पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें। रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/> ==चिंताएँ== पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref> किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है। कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है। वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है। आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके। ==इन्हें भी देखें== * [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]] * [[जैव संरक्षण]] * [[संरक्षण आंदोलन]] * [[भूद्यान]] * [[राष्ट्रीय स्मारक]] * [[संधारणीय विकास]] * [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]] * [[संरक्षण (नैतिक)]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} ===सूत्रों का कहना है=== * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages. * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages. * शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}} ==अग्रिम पठन== * क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080 * अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6 * एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869 ==बाहरी कड़ियाँ== {{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }} *{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}} *{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}} *{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}} *{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}} *{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}} *{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}} *{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}} *{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}} *{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}} *{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}} [[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]] [[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]] tju4zhw3nhzb0nokt9tn5v82csvaarw 6543657 6543626 2026-04-24T16:02:30Z चाहर धर्मेंद्र 703114 /* परिभाषाएं */ 6543657 wikitext text/x-wiki [[File:Parque Nacional Los cardones.jpg|thumb|upright|upright=1.25|[[अर्जेण्टीना|आर्जेन्टीना]] के साल्ता प्रान्त में लोस कार्दोनेस राष्ट्रीय उद्यान]] [[File:Bogdkhan Uul Strictly Protected Area, Mongolia (149199747).jpg|thumb|[[मंगोलिया]] में स्थित बोग्ड खान उउल राष्ट्रीय उद्यान उन सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है जिन्हें अब राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है।]] [[File:Stambecchi nel Parco Nazionale del Gran Paradiso.jpg|thumb|राष्ट्रीय उद्यान अक्सर संरक्षित प्रजातियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं। चित्र में इटली के पीडमोंट में स्थित ग्रैन पैराडिसो राष्ट्रीय उद्यान में अल्पाइन आइबेक्स ( कैप्रा आइबेक्स ) दिखाए गए हैं । 1922 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद से आइबेक्स की आबादी में दस गुना वृद्धि हुई है।]] '''राष्ट्रीय उद्यान''' (national park) वह [[प्राकृतिक उद्यान|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र]] होता है, जिसे उसके विशिष्ट प्राकृतिक, [[ऐतिहासिक स्थलों का राष्ट्रीय पंजीकरण|ऐतिहासिक]] या सांस्कृतिक महत्व के कारण विशेष संरक्षण प्रदान किया जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक, अर्ध-प्राकृतिक अथवा आंशिक रूप से विकसित भूमि का स्वरूप धारण कर सकता है, परंतु इसका मूल उद्देश्य उसकी मौलिक [[पारिस्थितिकी]], [[जैव विविधता]] और [[सांस्कृतिक विरासत]] को सुरक्षित रखना होता है। प्रायः ऐसे उद्यानों का स्वामित्व और संरक्षण सरकार के अधीन होता है, ताकि उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। यद्यपि विभिन्न देशों में राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के मानदंड भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, फिर भी इन सबके पीछे एक समान भावना कार्य करती है—प्रकृति की अनुपम धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना<ref name=":0" /><ref>यूरोपार्क फेडरेशन (संपादक) 2009, Living Parks, 100 Years of National Parks in Europe, Oekom Verlag, München</ref> और उसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित करना। यही कारण है कि विश्व भर में राष्ट्रीय उद्यान केवल [[पर्यावरण संरक्षण]] के केंद्र ही नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व के सजीव उदाहरण भी हैं। सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यान जनता के लिए खुले होते हैं, ताकि लोग प्रकृति के निकट आ सकें, उसका अनुभव कर सकें<ref name="Gissibl, B. 2012">गिस्सिबल, बी., एस. होहलर और पी. कुप्पर, 2012, ''Civilizing Nature, National Parks in Global Historical Perspective'', बर्गहान, ऑक्सफोर्ड</ref> और उसके महत्व को समझ सकें। अधिकांश देशों में इन उद्यानों का विकास, स्वामित्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि, संघीय या विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था वाले कुछ देशों में यह दायित्व क्षेत्रीय या स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को भी सौंपा जा सकता है, जो अपने-अपने स्तर पर इन अमूल्य प्राकृतिक क्षेत्रों की देखरेख और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 1872 में [[यलोस्टोन नेशनल पार्क|येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना की, जिसे “जनता के लाभ और आनंद के लिए पहला सार्वजनिक उद्यान अथवा मनोरंजन स्थल” के रूप में परिकल्पित किया गया था।<ref>{{Cite web|url=http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002//amrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r?ammem/consrvbib:@field(NUMBER+@band(amrvl+vl002))&linkText=0|archive-url=https://web.archive.org/web/20170123114358/http://memory.loc.gov/cgi-bin/ampage?collId=amrvl&fileName=vl002%2F%2Famrvlvl002.db&recNum=1&itemLink=r%3Fammem%2Fconsrvbib%3A%40field%28NUMBER%2B%40band%28amrvl%2Bvl002%29%29&linkText=0|title=Evolution of the Conservation Movement, 1850-1920|archive-date=23 January 2017|website=अमेरिकन मेमोरी - लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस }}</ref> यद्यपि उस समय इसे औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी गई थी,<ref>[https://archive.org/stream/annualreports18721880#page/n7/mode/2up Report of the Superintendent of Yellowstone National Park for the Year 1872] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160403152134/https://archive.org/stream/annualreports18721880 |date=3 अप्रैल 2016 }}, 43rd Congress, 3rd Session, ex. doc. 35, quoting Department of Interior letter of 10 May 1872, "The reservation so set apart is to be known as the "Yellowstone National Park"."</ref> फिर भी व्यवहार में इसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम और सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है।<ref>{{cite web |title=Yellowstone National Park |url=https://whc.unesco.org/en/list/28 |publisher=[[यूनेस्को]] |access-date=18 जुलाई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230603014000/https://whc.unesco.org/en/list/28/ |archive-date=3 जून 2023}}</ref> इस पहल ने प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की वैश्विक अवधारणा को एक नई दिशा प्रदान की और आने वाले समय में अनेक देशों को इसी प्रकार के [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित क्षेत्रों]] की स्थापना के लिए प्रेरित किया। हालांकि, यदि इतिहास की गहराइयों में देखा जाए, तो कुछ अन्य क्षेत्र इससे भी पूर्व संरक्षण के अंतर्गत आ चुके थे। उदाहरणस्वरूप, [[मेन रिज, टोबेगो|टोबैगो मेन रिज फॉरेस्ट रिजर्व]], जिसकी स्थापना 1776 में हुई थी,<ref>{{cite web | date=17 अगस्त 2011 |url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | title=Tobago Main Ridge Forest Reserve | publisher=[[यूनेस्को]] | access-date=13 अगस्त 2018 | archive-date=15 अगस्त 2018 | archive-url=https://web.archive.org/web/20180815051851/http://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/ | url-status=live }}</ref> तथा [[बोगद खान पर्वत]] के आसपास का क्षेत्र, जिसे 1778 में संरक्षित किया गया, ऐसे आरंभिक उदाहरण हैं जहाँ प्राकृतिक परिवेश को विधिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे इन्हें विश्व के सबसे पुराने विधिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों में स्थान प्राप्त हुआ।<ref>{{cite web | author=हार्डी, यू.| date=9 अप्रैल 2017 |url=https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | title=The 10 Oldest National Parks in the World | publisher=द कल्चरट्रिप. | access-date=21 दिसंबर 2017 | archive-date=17 अक्टूबर 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20191017141141/https://theculturetrip.com/north-america/articles/the-10-oldest-national-parks-in-the-world/ | url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{cite book| author=बोनेट, ए. | year=2016 | title=The Geography of Nostalgia: Global and Local Perspectives on Modernity and Loss | publisher= रूटलेज | page=68 | isbn=978-1-315-88297-0 }}</ref> प्राकृतिक संरक्षण की इस विकसित होती परंपरा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम वर्ष 1911 में उठाया गया, जब [[पार्क्स कनाडा]] की स्थापना की गई। यह संस्था विश्व की सबसे पुरानी राष्ट्रीय उद्यान सेवा मानी जाती है,<ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date= मई 13, 2011|work=टोरंटो स्टार|access-date=मई 18, 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=मई 16, 2011}}</ref> जिसने न केवल कनाडा में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रीय उद्यानों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया। [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] तथा इसके अधीन कार्यरत [[विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग|संरक्षित क्षेत्रों पर विश्व आयोग]] ने “राष्ट्रीय उद्यान” को संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणी द्वितीय के अंतर्गत परिभाषित किया है।<ref>{{Cite web|date=5 फरवरी 2016|title=Category II: National Park|url=https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|website= आईयूसीएन |access-date=25 जुलाई 2018|archive-date=18 नवंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191118152025/https://www.iucn.org/theme/protected-areas/about/protected-areas-categories/category-ii-national-park|url-status=live}}</ref> इस वर्गीकरण के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है, साथ ही सीमित रूप में जनसुलभता भी सुनिश्चित की जाती है। इस मानक के आधार पर, वर्ष 2006 तक विश्व भर में लगभग 6,555 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे थे जो इन मापदंडों पर खरे उतरते थे। तथापि, प्रकृति संरक्षण के बदलते स्वरूप और नई पर्यावरणीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ अब भी राष्ट्रीय उद्यान की परिभाषा और उसके मानकों को और अधिक सुस्पष्ट एवं समकालीन बनाने के लिए निरंतर विमर्श करता रहता है। यदि आकार की दृष्टि से देखा जाए, तो इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाला विश्व का सबसे विशाल राष्ट्रीय उद्यान [[पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान]] है, जिसकी स्थापना वर्ष 1974 में हुई थी। लगभग 9,72,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह उद्यान न केवल आकार की दृष्टि से अद्वितीय है,<ref>{{Cite book |title=1993 United Nations list of national parks and protected areas: = Liste des Nations Unies des parcs nationaux et des aires protégées 1993 = Lista de las Naciones Unidas de parques nacionales y areas protegidas 1993 |date=1994 |publisher=आईयूसीएन/यूआईसीएन |isbn=978-2-8317-0190-5 |editor-last=वेरीन्ते नेशनेन |location=Gland |editor-last2=विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र}}</ref> बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और वन्य जीवन के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। ==परिभाषाएं== [[File:Koli 2019 2.jpg|thumb|[[फ़िनलैंड]] के उत्तरी कारेलिया में कोली राष्ट्रीय उद्यान के परिदृश्यों ने जीन सिबेलियस , जुहानी अहो और एरो जार्नेफेल्ट सहित कई चित्रकारों और संगीतकारों को प्रेरित किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|title=History of Koli National Park|website=Nationalparks.fi|access-date=16 अगस्त 2020|archive-date=27 नवंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211127160710/https://www.nationalparks.fi/kolinp/history|url-status=live}}</ref>]] [[File:Puerto Escondido P N Manuel Antonio.JPG|thumb|[[फ़ोर्ब्स]] ने कोस्टा रिका में मैनुअल एंटोनियो नेशनल पार्क को दुनिया के 12 सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है।<ref>{{cite news|url=https://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|title=The World's Most Beautiful National Parks|author=जेन लेवेरे|work=[[फ़ोर्ब्स]]|date=29 अगस्त 2011|access-date=4 अक्टूबर 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20111001031720/http://www.forbes.com/sites/janelevere/2011/08/29/the-worlds-most-beautiful-national-parks/|archive-date=1 October 2011|df=dmy-all}}</ref>]] [[File:Beech trees in Mallard Wood, New Forest - geograph.org.uk - 779513.jpg|thumb|इंग्लैंड के हैम्पशायर में स्थित न्यू फॉरेस्ट नेशनल पार्क के मल्लार्ड वुड में बीच के पेड़]] वर्ष 1969 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए इसे कुछ विशिष्ट विशेषताओं वाले अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया।<ref>गुलेज़, सुमेर (1992). A method of evaluating areas for national park status.</ref> * इस परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यान ऐसे क्षेत्रों को कहा गया जहाँ एक या एक से अधिक [[पारितंत्र|पारिस्थितिकी तंत्र]] मानव हस्तक्षेप, शोषण और स्थायी कब्जे से लगभग पूर्णतः अप्रभावित रहते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, भू-आकृतिक संरचनाएँ और प्राकृतिक आवास न केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि वे मनोरंजन और सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान होते हैं, जिनमें प्रकृति की विलक्षण छटा सजीव रूप में विद्यमान रहती है। * इस परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संबंधित देश का सर्वोच्च सक्षम प्राधिकारी इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के शोषण या अवैध कब्जे को रोकने अथवा समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है। साथ ही, वह यह सुनिश्चित करता है कि इन उद्यानों की पारिस्थितिक, भू-आकृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी विशेषताओं का संरक्षण और सम्मान निरंतर बना रहे। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान केवल संरक्षण के क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक संगठित और उत्तरदायी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। * इसके अतिरिक्त, विशेष परिस्थितियों में इन उद्यानों को आम जनता के लिए भी खोला जाता है, ताकि लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें, प्रकृति के प्रति जागरूक बनें और शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मनोरंजक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान मानव और प्रकृति के बीच एक संतुलित सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और सहभागिता का सामंजस्यपूर्ण मेल दिखाई देता है। वर्ष 1971 में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने पूर्व निर्धारित मानदंडों को और अधिक विस्तृत एवं स्पष्ट रूप प्रदान किया, जिससे राष्ट्रीय उद्यानों के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए अधिक ठोस दिशानिर्देश स्थापित हो सके। इन संशोधित मानकों के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया कि * ऐसे क्षेत्रों का न्यूनतम विस्तार सामान्यतः 1,000 हेक्टेयर होना चाहिए, जहाँ प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती हो और पारिस्थितिकी तंत्र को यथासंभव अप्रभावित बनाए रखा जा सके। * इसके साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय उद्यानों को विधिक रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त हो, ताकि उनके संरक्षण को कानूनी आधार मिल सके और किसी भी प्रकार के अतिक्रमण या दोहन को प्रभावी रूप से रोका जा सके। * केवल कानूनी मान्यता ही पर्याप्त नहीं मानी गई, बल्कि यह भी अपेक्षित किया गया कि इन उद्यानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशिक्षित मानवबल उपलब्ध हों, जिससे संरक्षण उपायों को व्यवहारिक रूप में लागू किया जा सके। * इन मानदंडों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण से संबंधित है। उद्यानों के भीतर खेलकूद, शिकार, मछली पकड़ने या अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से [[प्राकृतिक संसाधनों का दोहन|संसाधनों के दोहन]] पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए, यहाँ तक कि बड़े निर्माण कार्य, जैसे बाँधों का विकास भी वर्जित माना गया। इस प्रकार, 1971 के ये विस्तारित मानदंड राष्ट्रीय उद्यानों को केवल नाममात्र के संरक्षित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सुदृढ़ संरक्षण, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। यद्यपि “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की गई है, तथापि व्यवहार में विभिन्न देशों में अनेक संरक्षित क्षेत्रों को अब भी “राष्ट्रीय उद्यान” कहा जाता है, भले ही वे आईयूसीएन की संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन की अन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हों। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि नामकरण की परंपरा और वास्तविक प्रबंधन श्रेणियाँ कई बार एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।<ref name="Gissibl, B. 2012"/><ref>यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download ''Protected areas in Europe – an overview''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150924010816/http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download |date=24 सितंबर 2015 }} In: EEA Report No 5/2012 Kopenhagen: 2012 {{ISBN|978-92-9213-329-0}} {{ISSN|1725-9177}} [http://www.eea.europa.eu/publications/protected-areas-in-europe-2012/download pdf] doi=10.2800/55955</ref> उदाहरणस्वरूप, * स्विस राष्ट्रीय उद्यान (स्विट्जरलैंड) आईयूसीएन की श्रेणी ‘कठोर प्रकृति संरक्षण क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है, जहाँ मानव हस्तक्षेप को अत्यंत सीमित रखा जाता है। * इसी प्रकार, एवरग्लेड्स राष्ट्रीय उद्यान (संयुक्त राज्य अमेरिका) ‘वन्य क्षेत्र’ श्रेणी में सम्मिलित है, * जबकि कोली राष्ट्रीय उद्यान (फिनलैंड) उस श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में ही परिभाषित किया जाता है। * इसके अतिरिक्त, विक्टोरिया फॉल्स राष्ट्रीय उद्यान (जिम्बाब्वे) आईयूसीएन की ‘राष्ट्रीय स्मारक’ श्रेणी में आता है, जहाँ विशिष्ट प्राकृतिक या सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण प्रमुख होता है। * विटोशा राष्ट्रीय उद्यान (बुल्गारिया) ‘पर्यावास प्रबंधन क्षेत्र’ के अंतर्गत वर्गीकृत है, जहाँ विशेष प्रजातियों और आवासों के संरक्षण पर बल दिया जाता है। * इसी क्रम में, न्यू फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान (यूनाइटेड किंगडम) ‘संरक्षित भूदृश्य’ श्रेणी का उदाहरण है, जहाँ मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है, * जबकि एटनिको यग्रोटोपिको पार्को डेल्टा एवरौ (ग्रीस) ‘प्रबंधित संसाधन संरक्षित क्षेत्र’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और नियंत्रित उपयोग संभव होता है। इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” का नाम सार्वभौमिक रूप से प्रचलित होने के बावजूद, उनके संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग की वास्तविक प्रकृति देश-विशेष की नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। यद्यपि सामान्यतः “राष्ट्रीय उद्यान” नाम से ही यह संकेत मिलता है कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय सरकारों के अधीन होता है, वास्तविकता में विभिन्न देशों में इसकी संरचना भिन्न रूपों में विकसित हुई है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में केवल कुछ ही राष्ट्रीय उद्यान सीधे संघीय सरकार के अधीन हैं, जबकि अधिकांश का संचालन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन उद्यानों में से कई की स्थापना ऑस्ट्रेलियाई संघ के गठन से भी पूर्व हो चुकी थी, जिससे उनकी प्रशासनिक व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से राज्य स्तर पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार, नीदरलैंड में राष्ट्रीय उद्यानों का प्रबंधन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि प्रांतीय प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यहाँ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इन संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख, संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी निभाती हैं, जो विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था का एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। वहीं कनाडा में एक मिश्रित प्रणाली देखने को मिलती है, जहाँ कुछ राष्ट्रीय उद्यान संघीय सरकार द्वारा संचालित होते हैं, जबकि अन्य प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारों के अधीन आते हैं। इसके बावजूद, प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा के अनुसार, इन अधिकांश उद्यानों को उनके संरक्षण मानकों और उद्देश्यों के आधार पर “राष्ट्रीय उद्यान” की श्रेणी में ही माना जाता है।<ref>जॉन एस. मार्श, "[https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks Provincial Parks]", {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200310160520/https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/provincial-parks |date=10 मार्च 2020 }}, in ''कैनेडियन एनसाइक्लोपीडिया'' (हिस्टोरिका कनाडा, 2018‑05‑30), [accessed 2020‑02‑18].</ref> इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा केवल नाम से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के उद्देश्य और प्रबंधन की गुणवत्ता से परिभाषित होती है, चाहे उसका प्रशासन किसी भी स्तर पर क्यों न किया जा रहा हो। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, विभिन्न देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा का व्यवहारिक स्वरूप अनेक बार इन परिभाषाओं से भिन्न दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है, किंतु वे आईयूसीएन की औपचारिक परिभाषा के सभी मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करते। इसके विपरीत, कुछ ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी अस्तित्व में हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक मापदंडों को पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” के रूप में नामित नहीं किया गया है।<ref name="Gissibl, B. 2012"/> यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा केवल वैज्ञानिक या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परंपराओं, प्रशासनिक ढाँचे, नीतिगत प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं से भी गहराई से प्रभावित होती है। इस प्रकार, वैश्विक स्तर पर “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एकरूप प्रतीत होते हुए भी, व्यवहार में यह विविधता और लचीलेपन का परिचायक है, जहाँ नामकरण और वास्तविक प्रबंधन के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है। ===शब्दावली=== [[File:012 035 Ile Mingan Niapiscau.jpg|thumb|मिंगन द्वीपसमूह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र,<ref name="The Canadian Encyclopedia">{{cite web |title=Mingan Archipelago National Park Reserve |url=https://www.thecanadianencyclopedia.ca/en/article/mingan-archipelago-national-park-reserve |publisher=कैनेडियन विश्वकोश|access-date=2024-01-12 |date=2015-01-03 |quote=Oddly shaped rock pillars sculpted by wind and sea create the unique islandscape of the natural reserve}}</ref> [[सेंट लॉरेंस की खाड़ी]], [[क्यूबेक]], [[कनाडा]]]] प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की परिभाषा का सभी देशों द्वारा समान रूप से पालन न किए जाने के कारण “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का प्रयोग व्यवहार में कहीं अधिक व्यापक और लचीले अर्थों में किया जाने लगा है। इस विविधता के कारण यह शब्द केवल एक कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकताओं, नीतियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण कर लेता है। उदाहरणस्वरूप, यूनाइटेड किंगडम और [[चीनी गणराज्य|ताइवान]] जैसे कुछ देशों में “राष्ट्रीय उद्यान” का अर्थ प्रायः ऐसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र से होता है, जो अपेक्षाकृत कम विकसित, प्राकृतिक रूप से मनोहारी और पर्यटकों को आकर्षित करने वाला हो। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए नियोजन संबंधी कुछ प्रतिबंध अवश्य लागू किए जाते हैं, किंतु इनके भीतर मानव बस्तियों का अस्तित्व भी असामान्य नहीं माना जाता। इस प्रकार, यहाँ संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जो आईयूसीएन द्वारा निर्धारित सभी संरक्षण मानदंडों को पूर्णतः पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें “राष्ट्रीय उद्यान” की संज्ञा नहीं दी जाती। ऐसे क्षेत्रों के लिए प्रायः “संरक्षित क्षेत्र” या “आरक्षित क्षेत्र” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके संरक्षणात्मक महत्व को तो दर्शाते हैं, किंतु उन्हें राष्ट्रीय उद्यान के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं प्रदान करते। इस प्रकार, “राष्ट्रीय उद्यान” की अवधारणा एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न देशों की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनुसार विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। ==इतिहास== ===प्रारंभिक सन्दर्भ=== अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में ही प्रकृति संरक्षण की भावना ने एक संगठित स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। वर्ष 1735 से नेपल्स की सरकार ने प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा के उद्देश्य से विधिक प्रावधान लागू किए, जिनका उपयोग राजपरिवार द्वारा शिकारस्थल के रूप में भी किया जा सकता था। इसी क्रम में प्रोसिडा को प्रथम संरक्षित स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|author=एंजेला डी सारियो|title=La "Regia Caccia" Di Torre Guevara Nel Settecento|website=Fondazionecariforli.it|access-date=28 फरवरी 2022|archive-date=22 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211022120321/https://www.fondazionecariforli.it/downloads/files/3-La-regia-caccia-di-torre-guevara-nel-settecento.pdf|url-status=live}}</ref> हालाँकि, इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि यह केवल पारंपरिक शाही शिकारगाहों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संरक्षण की एक विकसित और दूरदर्शी दृष्टि कार्यरत थी।<ref>Museo privato Agriturismo Maria Sofia di Borbone, Azienda Agricola Le Tre Querce, Seminara, Calabria, organised by the Study Centre for Environmental Education in the Mediterranean Area of Reggio, Italy</ref> नेपल्स की शासन प्रणाली ने उस समय ही प्राकृतिक क्षेत्रों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करने की अवधारणा पर विचार किया—जहाँ एक ओर ऐसे क्षेत्र थे जो अपेक्षाकृत खुले और मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर कठोर संरक्षण वाले क्षेत्र भी चिन्हित किए गए, जहाँ प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने एक नए वैचारिक रूप को जन्म दिया, जिसमें प्राकृतिक स्थलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि साझा धरोहर के रूप में देखा जाने लगा। वर्ष 1810 में अंग्रेज़ी कवि [[विलियम वर्ड्सवर्थ]] ने [[लेक डिस्ट्रिक्ट]] को “एक प्रकार की राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में निरूपित किया। उनके विचार में यह ऐसा स्थान था, जिस पर हर उस व्यक्ति का अधिकार और हित होना चाहिए, जिसके पास प्रकृति की सुंदरता को देखने की दृष्टि और उसका आनंद लेने का हृदय हो।<ref>{{cite book|last=वर्ड्सवर्थ|first=विलियम|author-link=विलियम वर्ड्सवर्थ|url=https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ|quote=sort of national property in which every man has a right and interest who has an eye to perceive and a heart to enjoy.|title=A guide through the district of the lakes in the north of England with a description of the scenery, &c. for the use of tourists and residents|edition=5th|location=केंडल, इंग्लैंड|publisher=हडसन और निकोलसन|year=1835|page=[https://archive.org/details/bub_gb_idlAAAAAYAAJ/page/n122 88]}}</ref> यह दृष्टिकोण प्रकृति को जनसामान्य की साझा विरासत के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल थी। इसी भावना का विस्तार आगे चलकर जॉर्ज कैटलिन के विचारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1830 के दशक में [[पश्चिमी संयुक्त राज्य|अमेरिकी पश्चिम]] की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि [[संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी मूल-निवासी|संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों]] और वन्य जीवों को एक साथ संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कल्पना की कि यह संरक्षण किसी व्यापक सरकारी नीति के अंतर्गत एक “भव्य उद्यान” के रूप में विकसित हो सकता है—एक ऐसा “राष्ट्र का उद्यान”, जहाँ मनुष्य और पशु अपनी प्रकृति की स्वाभाविक सुंदरता, स्वच्छंदता और ताजगी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें।<ref>{{cite book|last=कैटलिन|first=जॉर्ज|url=https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C%28by+some+great+protecting+policy+of+government%29|title=Letters and Notes on the manners, customs, and condition of the North American Indians: written during eight years' travel amongst the wildest tribes of Indians in North America in 1832, 33, 34, 35, 36, 37, 38, and 39|volume=1|year=1841|location=इजिप्शियन हॉल, पिकाडिली, लंदन|publisher=लेखक द्वारा प्रकाशित|pages=261–262|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160501132843/https://books.google.com/books?id=MA4TAAAAYAAJ&q=%7C(by+some+great+protecting+policy+of+government)#v=snippet&q=%7C(by%20some%20great%20protecting%20policy%20of%20government)&f=false|archive-date=1 मई 2016|df=dmy-all}}</ref> इस प्रकार, इन विचारकों की दृष्टि में प्रकृति केवल भौतिक संपदा नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और मानवीय अनुभव थी, जिसे संरक्षित करना और साझा करना समस्त समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। ===प्रारंभिक प्रयास: हॉट स्प्रिंग्स, अर्कांसस और योसेमाइट घाटी=== [[File:Tunnel View, Yosemite Valley, Yosemite NP - Diliff.jpg|thumb|योसेमाइट घाटी, [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]], कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका]] प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की दिशा में संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने पहला संगठित कदम 20 अप्रैल 1832 को उठाया, जब राष्ट्रपति [[ऐन्ड्रयू जैकसन]] ने उस विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसे 22वीं अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत अर्कांसस स्थित हॉट स्प्रिंग्स के आसपास की भूमि के चार खंडों को अलग रखते हुए वहाँ के प्राकृतिक [[गरम चश्मा|गर्म जलस्रोतों]] और निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया गया।<ref name=Shugart>{{cite web |url=http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |title=Hot Springs of Arkansas Through the Years: A Chronology of Events |access-date=30 मार्च 2008 |last=शुगार्ट |first=शेरोन |year=2004 |publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]] |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080414015510/http://www.nps.gov/hosp/historyculture/upload/chronology.web.pdf |archive-date=14 अप्रैल 2008 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|chapter=Twenty-Second Congress, Session 1, Chap. 70: An Act authorizing the governor of the territory of Arkansas to lease the salt springs, in said territory, and for other purposes (April 20, 1832)|title=The Public Statutes at Large of the United States of America from the Organization of the Government in 1789, to 3 March 1845, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=पीटर्स, रिचर्ड|volume=4|location=बोस्टन|publisher=चार्ल्स सी. लिटिल और जेम्स ब्राउन|page=505|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111115233149/http://constitution.org/uslaw/sal/004_statutes_at_large.pdf|archive-date=15 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{cite web|title=Act Establishing Yellowstone National Park (1872)|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|website=Our Documents.gov|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160304200955/http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=45|archive-date=4 मार्च 2016|df=dmy-all}}</ref> इस संरक्षित क्षेत्र को “हॉट स्प्रिंग्स आरक्षण” के नाम से जाना गया, जो प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण पहल थी। हालाँकि, इस आरंभिक प्रयास में स्पष्ट कानूनी अधिकारों का अभाव था, जिसके कारण इस क्षेत्र पर संघीय नियंत्रण तत्काल सुदृढ़ रूप से स्थापित नहीं हो सका। अंततः वर्ष 1877 में जाकर इस संरक्षण को विधिक रूप से स्पष्ट और प्रभावी आधार प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, यह पहल उस व्यापक विचारधारा की नींव बन गई, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को सुदृढ़ किया।<ref name=Shugart/> प्रकृति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए किए गए इन प्रयासों को आगे बढ़ाने में कई दूरदर्शी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अब्राहम लिंकन, लॉरेंस रॉकफेलर, थियोडोर रूजवेल्ट, जॉन मुइर तथा लेडी बर्ड जॉनसन जैसे व्यक्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।<ref>{{Cite web|title=Mission & History|url=https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|access-date=2022-02-11|website=राष्ट्रीय उद्यान फाउंडेशन|language=en|archive-date=14 फरवरी 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220214234521/https://www.nationalparks.org/about-foundation/mission-history|url-status=live}}</ref> इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर संरक्षण संबंधी नीतियों, जनजागरूकता और विधिक उपायों के विकास में योगदान दिया, जिससे प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सुदृढ़ और स्थायी आधार निर्मित हो सका। जॉन म्यूर को योसेमाइट क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के कारण आज “राष्ट्रीय उद्यानों का जनक” कहा जाता है।<ref>{{cite book|last=मिलर|first= बारबरा कीली|title=जॉन म्यूर |publisher=गैरेथ स्टीवंस|year=2008|page=10|isbn=978-0836883183}}</ref> प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और संरक्षण की दृढ़ प्रतिबद्धता उनके लेखन में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने द सेंचुरी मैगज़ीन में दो अत्यंत प्रभावशाली लेख प्रकाशित किए, जिन्होंने आगे चलकर संरक्षण संबंधी विधायी प्रक्रियाओं को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।<ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "Features of the Proposed Yosemite National Park"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 November 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, सितंबर 1890, अंक 5</ref><ref>जॉन म्यूर. [http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ "The Treasures of the Yosemite"] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141102195140/http://www.yosemite.ca.us/john_muir_writings/the_treasures_of_the_yosemite/ |date=2 नवंबर 2014 }} ''द सेंचुरी मैगज़ीन'', खंड XL, अगस्त 1890, अंक 4</ref> इस विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम तब उठा, जब [[अब्राहम लिंकन]] ने 1 जुलाई 1864 को कांग्रेस द्वारा पारित एक अधिनियम पर हस्ताक्षर किए। इस अधिनियम के अंतर्गत योसेमाइट घाटी तथा विशाल सिकोइया वृक्षों से समृद्ध मारिपोसा ग्रोव को कैलिफोर्निया राज्य को सौंप दिया गया, जो आगे चलकर [[योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान]] का भाग बना। इस विधेयक के अनुसार, इस भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया और राज्य सरकार को इसे “जनसाधारण के उपयोग, पर्यटन और मनोरंजन” के उद्देश्य से संरक्षित एवं प्रबंधित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सीमित अवधि के लिए पट्टे की अनुमति दी गई, जिसकी आय को संरक्षण और सुधार कार्यों में व्यय किया जाना था। हालाँकि, इस प्रारंभिक प्रयास के बाद व्यापक सार्वजनिक विमर्श प्रारंभ हुआ और यह प्रश्न तीव्र बहस का विषय बन गया कि क्या सरकार को ऐसे उद्यान स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। आगे चलकर कैलिफोर्निया द्वारा योसेमाइट के कथित कुप्रबंधन के अनुभव ने इस नीति को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि कुछ वर्षों पश्चात् स्थापित येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान को सीधे राष्ट्रीय नियंत्रण में रखा गया,<ref>एडम वेस्ली डीन. [https://web.archive.org/web/20141102171047/http://mtw160-198.ippl.jhu.edu/login?auth=0&type=summary&url=/journals/civil_war_history/v056/56.4.dean.pdf ''Natural Glory in the Midst of War: The Establishment of Yosemite State Park''] In: Abstract. ''गृह युद्ध इतिहास'', खंड 56, अंक 4, दिसंबर 2010, पृष्ठ 386–419| 10.1353/cwh.2010.0008</ref><ref>{{cite book|chapter-url=http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|page=325|chapter=Thirty-Eighth Congress, Session 1, Chap. 184: An Act authorizing a Grant to the State of California of the "Yo-Semite Valley" and of the Land embracing the "Mariposa Big Tree Grove" (June 30, 1864)|title=38th United States Congress, Session 1, 1864. In: The Statutes at Large, Treaties, and Proclamations of the United States of America from December 1863, to December 1865|editor=जॉर्ज पी. सैंगर|volume=13|location=बोस्टन|publisher=लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी|year=1866|archive-url=https://web.archive.org/web/20111116010746/http://constitution.org/uslaw/sal/013_statutes_at_large.pdf|archive-date=16 नवंबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे उसके संरक्षण और प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके। ===पहला राष्ट्रीय उद्यान: येलोस्टोन=== [[File:Aerial image of Grand Prismatic Spring (view from the south).jpg|thumb|[[यलोस्टोन नेशनल पार्क]], व्योमिंग, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ग्रैंड प्रिज़मैटिक स्प्रिंग; येलोस्टोन दुनिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान था।]] वर्ष 1872 में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधुनिक अर्थों में अपने पहले राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी, जिसे व्यापक रूप से विश्व का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref>मंगन, एलिजाबेथ यू. [http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html Yellowstone, the First National Park from Mapping the National Parks] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131019090110/http://memory.loc.gov/ammem/gmdhtml/yehtml/yeabout.html |date=19 अक्टूबर 2013 }}. [[लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस]], भूगोल और मानचित्र प्रभाग.</ref> यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि प्रकृति को संरक्षित करने और उसे जनसामान्य के लिए सुरक्षित रूप से उपलब्ध कराने की एक दूरदर्शी पहल थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर संरक्षण की सोच को गहराई से प्रभावित किया। हालाँकि, यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यूरोप और एशिया के कुछ देशों में इससे पूर्व भी [[संरक्षित प्रकृतिक्षेत्र|प्राकृतिक क्षेत्रों]] के संरक्षण की परंपरा विद्यमान थी। किंतु उन संरक्षित क्षेत्रों का स्वरूप आज के राष्ट्रीय उद्यानों से भिन्न था, क्योंकि वे प्रायः शाही परिवारों के लिए आरक्षित शिकारस्थल या विश्राम स्थल के रूप में विकसित किए गए थे। उदाहरणस्वरूप, फॉन्टेनब्लू वन (फ्रांस, 1861) का एक भाग संरक्षित किया गया था,<ref>किम्बर्ली ए. जोन्स, साइमन आर. केली, सारा केनेल, हेल्गा केसलर-ऑरिश, ''In the forest of Fontainebleau: painters and photographers from Corot to Monet'', National Gallery of Art, 2008, p.23</ref> जहाँ संरक्षण की भावना तो थी, परंतु उसका उद्देश्य मुख्यतः शाही उपयोग तक सीमित था। येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान उस समय एक संघीय शासित क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहाँ किसी राज्य सरकार के लिए उसके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेना संभव नहीं था। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सरकार ने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष देखरेख का दायित्व ग्रहण किया, और इस प्रकार यह देश का पहला औपचारिक राष्ट्रीय उद्यान बना। इसकी स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं थी, बल्कि संरक्षणवादियों, राजनेताओं और नॉर्दर्न पैसिफिक रेलरोड जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकृति संरक्षण के इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में [[थियोडोर रूज़वेल्ट]] और उनके सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके नेतृत्व में गठित बूने और क्रॉकेट क्लब ने सक्रिय अभियान चलाकर राजनीतिक समर्थन जुटाया और बड़े उद्योगों सहित विभिन्न समूहों को इस दिशा में सहमत किया। उस समय येलोस्टोन का क्षेत्र अवैध शिकारियों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन करने वालों के कारण गंभीर संकट में था। किंतु रूजवेल्ट और उनके साथियों के संगठित प्रयासों ने इस विनाशकारी प्रवृत्ति को नियंत्रित किया और पार्क को संरक्षण के मार्ग पर स्थापित किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप न केवल येलोस्टोन की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि इसके माध्यम से अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के लिए भी एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा विकसित हुआ, जिसने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को संस्थागत रूप प्रदान किया। इस विचारधारा की महत्ता को रेखांकित करते हुए अमेरिकी [[पुलित्ज़र पुरस्कार]] विजेता लेखक [[वालेस स्टेग्नर]] ने लिखा था कि राष्ट्रीय उद्यान मानव समाज के सर्वोत्तम विचारों में से एक हैं—वे पूर्णतः अमेरिकी और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं, जो हमें हमारे श्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि हमारे दुर्बल पक्षों में।<ref>{{cite web|date=16 January 2003|title=Famous Quotes Concerning the National Parks: Wallace Stegner, 1983|url=http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20110508031121/http://www.cr.nps.gov/history/hisnps/NPSThinking/famousquotes.htm|archive-date=8 मई 2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|work=डिस्कवर हिस्ट्री|publisher=[[राष्ट्रीय उद्यान सेवा]]|df=dmy-all}}</ref> ===राष्ट्रीय उद्यानों का अंतर्राष्ट्रीय विकास=== [[File:Mackinac National Park map.jpg|thumb|right|मैकिनैक नेशनल पार्क का 1890 का नक्शा]] “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द का विधिक रूप से प्रयोग करने वाला पहला क्षेत्र मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान था, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई। यह पहल इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है कि इसमें पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र के निर्माण संबंधी कानून में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया गया, जिससे इस अवधारणा को एक स्पष्ट प्रशासनिक और विधिक पहचान प्राप्त हुई। हालाँकि, समय के साथ इसकी स्थिति में परिवर्तन आया। वर्ष 1895 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप इसने अपना आधिकारिक “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा खो दिया।<ref>{{cite web|title=Mackinac Island|url=http://www.michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|website=Michigan State Housing Development Authority|access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160105141143/https://michigan.gov/mshda/0,4641,7-141-54317_19320_61909_61927-54596--,00.html|archive-date=5 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref><ref name="ReferenceA">किम एलन स्कॉट, 2011 "Robertson's Echo The Conservation Ethic in the Establishment of Yellowstone and Royal National Parks" येलोस्टोन साइंस 19:3</ref> इसके बावजूद, मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान का ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रीय उद्यानों की संज्ञा और उनके विधिक स्वरूप के विकास में एक महत्वपूर्ण आधारशिला का कार्य किया। [[File:Late Afternoon at North & South Era.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलिया के [[न्यू साउथ वेल्स]] में स्थित [[रॉयल नेशनल पार्क]] दुनिया का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान था।]] येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान और मैकिनैक राष्ट्रीय उद्यान में विकसित हुई संरक्षण की अवधारणा ने शीघ्र ही विश्व के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, और विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का क्रम प्रारंभ हो गया। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया में, [[सिडनी]] के दक्षिण में स्थित क्षेत्र में [[रॉयल नेशनल पार्क]] की स्थापना 26 अप्रैल 1879 को न्यू साउथ वेल्स कॉलोनी में की गई। यह विश्व का दूसरा आधिकारिक राष्ट्रीय उद्यान माना जाता है,<ref>{{cite web|title=1879: Australia's first national park created|url=http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|website=ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय संग्रहालय |access-date=9 जनवरी 2016|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20160128023110/http://www.nma.gov.au/online_features/defining_moments/featured/first_national_park|archive-date=28 जनवरी 2016|df=dmy-all}}</ref> और मैकिनैक के राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा समाप्त हो जाने के पश्चात्, यह वर्तमान में अस्तित्व में रहने वाला दूसरा सबसे प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान भी माना जाता है।<ref name="ReferenceA"/><ref>{{cite web |url=http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-url=https://web.archive.org/web/20141102063535/http://pinkava.asu.edu/starcentral/microscope/portal.php?pagetitle=getcollection&collectionID=127 | archive-date=2 नवंबर 2014 | title=Audley Bottom | publisher=Pinkava.asu.edu | access-date=3 नवंबर 2014 }}</ref><ref>रॉडनी हैरिसन, 2012 "Heritage: Critical approaches" Routledge</ref> इसके पश्चात् कनाडा ने 1885 में [[बैनफ़ नेशनल पार्क|बैन्फ राष्ट्रीय उद्यान]] की स्थापना कर अपने प्रथम राष्ट्रीय उद्यान की नींव रखी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूज़ीलैंड ने 1887 में टोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की, जो अपने विशिष्ट भू-आकृतिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण अमेरिका में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल अर्जेंटीना ने की, जहाँ फ्रांसिस्को मोरेनो के प्रयासों से वर्ष 1934 में नाहुएल हुआपी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। इसके साथ ही अर्जेंटीना अमेरिका महाद्वीप का तीसरा देश बन गया जिसने एक संगठित राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली विकसित की। इस प्रकार, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा वैश्विक स्तर पर फैलती गई और प्रकृति संरक्षण की एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय धारा के रूप में स्थापित हो गई। [[File:Lapporten 2.jpg|thumb|स्वीडन में स्थित अबिस्को राष्ट्रीय उद्यान यूरोप में स्थापित होने वाले पहले राष्ट्रीय उद्यानों में से एक था।]] यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संस्थागत रूप ग्रहण किया। वर्ष 1909 में [[स्वीडन]] ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों संबंधी कानून पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष नौ राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए। इसके पश्चात् स्विट्जरलैंड ने 1914 में स्विस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर इस दिशा में अग्रसरता दिखाई। आगे चलकर वर्ष 1971 में एस्टोनियाई एसएसआर में स्थित लाहेमा राष्ट्रीय उद्यान पूर्व [[सोवियत संघ]] का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ, जो इस क्षेत्र में संरक्षण के नए अध्याय का संकेतक था। [[File:The Greater Virunga Landscape, Africa (Copernicus 2026-03-03).png|thumb|upright|अफ्रीका में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं: [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]], रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान , क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान , बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान और ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान।]] अफ्रीका महाद्वीप में भी राष्ट्रीय उद्यानों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। यहाँ के प्रमुख उद्यानों में विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, रुवेंज़ोरी पर्वत राष्ट्रीय उद्यान, क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रीय उद्यान, बविंडी इंपेनेट्रेबल राष्ट्रीय उद्यान तथा ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अफ्रीका का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1925 में स्थापित हुआ, जब अल्बर्ट प्रथम ने अपने निजी क्षेत्र, तत्कालीन [[कांगो मुक्त राज्य]] (वर्तमान [[कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य]]) के पूर्वी भाग में स्थित एक क्षेत्र को “अल्बर्ट राष्ट्रीय उद्यान” घोषित किया, जिसे बाद में [[विरुन्गा राष्ट्रीय उद्यान]] के नाम से जाना गया। इसके पश्चात् 1926 में [[दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र|दक्षिण अफ्रीका]] ने क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान को अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, जो पूर्ववर्ती साबी गेम रिजर्व का विस्तारित और पुनर्गठित स्वरूप था, जिसकी स्थापना 1898 में पॉल क्रूगर द्वारा की गई थी। [[द्वितीय विश्व युद्ध]] के उपरांत राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना ने वैश्विक स्तर पर तीव्र गति पकड़ी। [[यूनाइटेड किंगडम]] ने 1951 में अपना पहला राष्ट्रीय उद्यान, पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान, स्थापित किया। यह निर्णय लगभग सत्तर वर्षों तक चले उस जनदबाव का परिणाम था, जो प्राकृतिक परिदृश्यों तक व्यापक जनसुलभता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर बना रहा। इसके बाद दशक के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में नौ और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए,<ref>{{Cite web|url=https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|title=History of our National Park|website=पीक डिस्ट्रिक्ट राष्ट्रीय उद्यान|access-date=1 नवंबर 2019|archive-date=14 जुलाई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190714041006/https://www.peakdistrict.gov.uk/learning-about/about-the-national-park/our-history|url-status=live}}</ref> जिससे संरक्षण और जनसहभागिता की यह अवधारणा और अधिक सुदृढ़ हुई। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी थी, और वर्ष 2010 तक यहाँ लगभग 359 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित हो चुके थे। इस व्यापक विस्तार के बीच फ्रांस के वैनोइस राष्ट्रीय उद्यान का विशेष महत्व है, जो आल्प्स पर्वतमाला में स्थित पहला फ्रांसीसी राष्ट्रीय उद्यान था। इसकी स्थापना वर्ष 1963 में एक प्रस्तावित [[पर्यटन|पर्यटन परियोजना]] के विरुद्ध उठे जनआंदोलन के परिणामस्वरूप हुई, जो यह दर्शाता है कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना भी इस प्रक्रिया में कितनी निर्णायक रही है। इसी प्रकार, [[किलिमंजारो|माउंट किलिमंजारो]] को 1973 में राष्ट्रीय उद्यान के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1977 में इसे जनसामान्य के लिए खोल दिया गया,<ref>{{cite web|url=http://www.privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|title=Kilimanjaro: The National Park|work=प्राइवेट किलिमंजारो: किलिमंजारो के बारे में|publisher=प्राइवेट एक्सपेडिशन्स, लिमिटेड|year=2011|access-date=24 अक्टूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111017152135/http://privatekilimanjaro.com/about_kilimanjaro_park.asp|archive-date=17 अक्टूबर 2011|df=dmy-all}}</ref> जिससे अफ्रीका में भी संरक्षण और पर्यटन का संतुलित मॉडल विकसित हुआ। एशिया में, चीन के [[तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र]] में स्थित [[कोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण|चोमोलंगमा राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण क्षेत्र]] की स्थापना 1989 में की गई, जिसका उद्देश्य [[एवरेस्ट पर्वत|माउंट एवरेस्ट]] के उत्तरी ढलान सहित लगभग 33.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण करना था। यह संरक्षण क्षेत्र अपनी विशिष्ट प्रशासनिक संरचना के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें पृथक वनरक्षकों या विशेष कर्मचारियों के बजाय स्थानीय प्रशासन के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है, जिससे कम लागत में व्यापक क्षेत्र का संरक्षण संभव हो पाता है। इस क्षेत्र में विश्व की छह सर्वोच्च चोटियों में से चार—[[एवरेस्ट पर्वत|एवरेस्ट]], [[ल्होत्से]], [[मकालू]] और [[चोयु|चो चोयु]]—भी सम्मिलित हैं, और यह पड़ोसी नेपाल के राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़कर एक विशाल अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण करता है।<ref>डैनियल सी. टेलर, कार्ल ई. टेलर, जेसी ओ. टेलर, ''Empowerment on an Unstable Planet'' न्यूयॉर्क और ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012, अध्याय 9</ref> कैरेबियन क्षेत्र में भी संरक्षण की यह परंपरा विकसित हुई। वर्ष 1993 में [[जमैका]] में ब्लू और जॉन क्रो पर्वत राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना लगभग 41,198 हेक्टेयर क्षेत्र की रक्षा के लिए की गई। इस उद्यान में उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों के साथ-साथ संरक्षित बफर क्षेत्र भी शामिल हैं।<ref>{{Cite web |title=The National Park - Blue and John Crow Mountains National Park |url=https://www.blueandjohncrowmountains.org/about |access-date=2023-05-12 |website=www.blueandjohncrowmountains.org}}</ref> यहाँ ब्लू माउंटेन पीक, जो देश की सबसे ऊँची चोटी है, स्थित है, साथ ही यहाँ पदयात्रा मार्ग और आगंतुक केंद्र भी विकसित किए गए हैं। इसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देते हुए वर्ष 2015 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया,<ref>{{Cite web |last=केंद्र |first=यूनेस्को विश्व धरोहर |title=Blue and John Crow Mountains |url=https://whc.unesco.org/en/list/1356/ |access-date=2023-05-12 |website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en}}</ref> जिससे इसकी वैश्विक महत्ता और भी सुदृढ़ हुई। ===राष्ट्रीय उद्यान सेवाएँ=== विश्व में राष्ट्रीय उद्यानों के संगठित और सुव्यवस्थित प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम 19 मई 1911 को कनाडा में उठाया गया, जब पहली राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना की गई।<ref>{{cite web |url=http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |title=WWF News and Stories |access-date=25 मई 2017 |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20171107011646/http://www.wwf.ca/newsroom/?uNewsID=9381 |archive-date=7 नवंबर 2017 |df=dmy-all }}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|title=Parks Canada celebrates a century of discovery|last=आयरिश|first=पॉल|date=13 मई 2011|work=टोरंटो स्टार |access-date=18 मई 2011|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20110516235956/http://www.thestar.com/travel/northamerica/article/990243--parks-canada-celebrates-a-century-of-discovery|archive-date=16 मई 2011|df=dmy-all}}</ref> डोमिनियन वन रिजर्व और पार्क अधिनियम के अंतर्गत डोमिनियन उद्यानों को आंतरिक मामलों के विभाग के अधीन स्थापित “डोमिनियन पार्क शाखा” के प्रबंधन में रखा गया, जिसे आज पार्क्स कनाडा के नाम से जाना जाता है। इस संस्था का मूल उद्देश्य प्राकृतिक आश्चर्यों से भरपूर स्थलों की रक्षा करना और उन्हें इस प्रकार विकसित करना था कि वे लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर मानसिक शांति और आध्यात्मिक नवचेतना का अनुभव भी प्रदान कर सकें।<ref>{{cite news|url=http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|title=Parks Canada History|date=2 फरवरी 2009|work=पार्क्स कनाडा|access-date=30 अगस्त 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20161022095725/http://www.pc.gc.ca/apprendre-learn/prof/itm2-crp-trc/htm/evolution_e.asp|archive-date=22 अक्टूबर 2016|df=dmy-all}}</ref> समय के साथ कनाडा ने संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया और आज लगभग 4,50,000 वर्ग किलोमीटर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के साथ यह विश्व के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक बन चुका है।<ref>{{cite news|url=https://www.pc.gc.ca/en/voyage-travel|title=Parks Canada|access-date=30 अगस्त 2012|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20090323053512/http://www.pc.gc.ca/|archive-date=23 मार्च 2009|df=dmy-all}}</ref> इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में येलोस्टोन राष्ट्रीय उद्यान, योसेमाइट राष्ट्रीय उद्यान तथा अन्य अनेक संरक्षित स्थलों की स्थापना के बावजूद, इन सभी का समन्वित प्रबंधन करने वाली एक केंद्रीय संस्था के गठन में समय लगा। लगभग 44 वर्षों के अंतराल के पश्चात् 64वीं अमेरिकी कांग्रेस ने “नेशनल पार्क सर्विस ऑर्गेनिक एक्ट” पारित किया, जिस पर [[वुडरो विल्सन]] ने 25 अगस्त 1916 को हस्ताक्षर किए। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना हुई, जिसने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित स्थलों के प्रबंधन को एकीकृत और सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया। [[File:Teufelsschloss-greenland.jpg|thumb|पूर्वी ग्रीनलैंड के कैसर-फ्रांज-जोसेफ-फ्योर्ड में स्थित टेउफेलश्लॉस का चित्र ( लगभग  1900 ) । यह स्थल अब उत्तरपूर्वी ग्रीनलैंड राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है।]] आज इस संस्था के अधीन कुल 433 स्थल आते हैं, जिनमें से केवल 63 को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय उद्यान” का दर्जा प्राप्त है।<ref name="USNPS">{{Cite web |url=https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |title=National Park System (U.S. National Park Service) |date=2019-05-17 |access-date=16 जुलाई 2018 |archive-date=20 अप्रैल 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220420174702/https://www.nps.gov/aboutus/national-park-system.htm |url-status=live }}</ref> यह तथ्य दर्शाता है कि संरक्षण की व्यापक प्रणाली में विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्रों का समावेश होता है, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है। ==आर्थिक परिणाम== कोस्टा रिका जैसे देशों में, जहाँ [[पारिस्थितिक पर्यटन|पारिस्थितिकी-आधारित पर्यटन]] (इकोटूरिज्म) एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुका है, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था के सशक्त स्तंभ के रूप में भी उभरते हैं।<ref name="ahs.uwaterloo.ca">ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 134. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> ===पर्यटन=== राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन की लोकप्रियता समय के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन देशों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, कोस्टा रिका, जिसे एक “[[विशालविविध देश|अत्यधिक जैव-विविध]]” देश के रूप में जाना जाता है, वहाँ 1985 से 1999 के बीच राष्ट्रीय उद्यानों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।<ref name="ahs.uwaterloo.ca"/> यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक स्थलों के प्रति वैश्विक आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है और लोग प्रकृति के निकट अनुभव प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में “राष्ट्रीय उद्यान” शब्द केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक संज्ञा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सशक्त पहचान और ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका है। यह शब्द अब प्रकृति-आधारित पर्यटन से गहराई से जुड़ गया है और ऐसे स्थलों का प्रतीक बन गया है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक वातावरण सुव्यवस्थित और संतुलित पर्यटक अवसंरचना के साथ उपलब्ध होता है।<ref>ईगल्स, पॉल एफ.जे. [http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf "Trends in Park Tourism: Economics, Finance and Management".] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304105416/http://ahs.uwaterloo.ca/~eagles/documents/TrendsbyEagles.pdf |date=4 मार्च 2016 }} In: ''जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म'' वॉल्यूम 10, अंक 2, 2002, पृष्ठ 133. {{doi|10.1080/09669580208667158}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यान आज केवल संरक्षण के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे आकर्षण स्थल भी बन गए हैं जहाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पर्यटन सुविधाओं का समन्वय देखने को मिलता है। हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि इन क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता और प्राकृतिक संतुलन भविष्य में भी अक्षुण्ण बना रहे। ===कर्मचारी=== पार्क रेंजर का कार्य केवल किसी संरक्षित क्षेत्र की देखरेख तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संरक्षण, प्रबंधन और जनसहभागिता—तीनों के बीच एक सजीव सेतु का कार्य करता है। उनका प्रमुख दायित्व पार्क के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा उनके संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत वे जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण और विरासत स्थलों की देखभाल के साथ-साथ आगंतुकों के लिए व्याख्यात्मक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों का विकास और संचालन भी करते हैं, जिससे लोग इन स्थलों के महत्व को समझ सकें और उनसे सार्थक रूप से जुड़ सकें। रेंजरों की जिम्मेदारियाँ विविध और व्यावहारिक होती हैं। वे आगंतुकों को सामान्य, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं, जिसे “विरासत व्याख्या” कहा जाता है। साथ ही वे वन्यजीव क्षेत्रों, झीलों और समुद्र तटों, वनों, ऐतिहासिक भवनों, युद्धस्थलों, पुरातात्विक स्थलों तथा विभिन्न मनोरंजन क्षेत्रों के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।<ref name="OPM.gov">अमेरिकी कार्मिक प्रबंधन कार्यालय. ''Handbook of occupational groups and families''. वाशिंगटन, डीसी, जनवरी 2008। पृष्ठ 19. [http://www.opm.gov/FEDCLASS/GSHBKOCC.pdf OPM.gov] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090103205044/http://www.opm.gov/fedclass/gshbkocc.pdf |date=3 जनवरी 2009 }} Accessed 2 नवंबर 2014.</ref> इसके अतिरिक्त, वे अग्निशमन कार्यों में भी संलग्न रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर खोज एवं बचाव अभियानों का संचालन करते हैं, जिससे संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रीय उद्यान सेवा की स्थापना (1916) के बाद, पार्क रेंजर की भूमिका और अधिक विस्तृत हो गई। अब वे केवल प्रकृति के संरक्षक ही नहीं रहे, बल्कि कानून प्रवर्तन से जुड़े अनेक दायित्व भी निभाने लगे।<ref>आर मीडोज; डी.एल. सोडेन: [https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 ''National Park Ranger Attitudes and Perceptions Regarding Law Enforcement Issues.''] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304110437/https://www.ncjrs.gov/App/Publications/abstract.aspx?ID=110802 |date=4 मार्च 2016 }} सार. ''जस्टिस प्रोफेशनल'' वॉल्यूम:3 अंक:1 (वसंत 1988) पृष्ठ:70–93</ref> वे यातायात नियंत्रण करते हैं, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति-पत्रों का प्रबंधन करते हैं, और नियमों के उल्लंघन, शिकायतों, अतिक्रमणों तथा दुर्घटनाओं की जाँच भी करते हैं। इस प्रकार, पार्क रेंजर एक बहुआयामी भूमिका निभाते हुए संरक्षण, सुरक्षा और जनसेवा के समन्वय का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।<ref name="OPM.gov"/> ==चिंताएँ== पूर्व [[उपनिवेशवाद का इतिहास|यूरोपीय उपनिवेशों]] में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों को लेकर समय-समय पर आलोचना भी सामने आई है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया में [[उपनिवेशवाद|उपनिवेशवादी]] दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसमें प्रकृति को “अछूते” और “मानव-विहीन” रूप में संरक्षित करने की अवधारणा प्रमुख रही। यह विचार विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में सीमांत विस्तार के काल में विकसित हुआ, जहाँ प्राकृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान और ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite book|last=विलियम|first=क्रोनन|title=Uncommon ground: rethinking the human place in nature|date=1996|publisher=डब्ल्यूडब्ल्यू नॉर्टन एंड कंपनी|isbn=0-393-31511-8|oclc=36306399}}</ref> किन्तु आलोचकों का तर्क है कि जिन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया, वे अनेक मामलों में पहले से ही स्थानीय या आदिवासी समुदायों के निवास और जीवन-यापन के केंद्र थे। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के लिए इन समुदायों को वहाँ से विस्थापित किया गया, जिससे न केवल उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी टूट गए। इस संदर्भ में यह आरोप लगाया जाता है कि प्रकृति संरक्षण के नाम पर मानव उपस्थिति को हटाना यह धारणा मजबूत करता है कि प्रकृति केवल तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न हो। इससे प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन स्थापित होता है, जिसे “प्रकृति–संस्कृति द्वैत” के रूप में समझा जाता है। कुछ आलोचक इसे “पारिस्थितिक भूमि हड़पने” का रूप भी मानते हैं,<ref>{{Cite book|last=क्लॉस|first= सी. ऐनी|title=Drawing the Sea Near|date=2020-11-03|publisher=यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस|doi=10.5749/j.ctv1bkc3t6|isbn=978-1-4529-5946-7|s2cid=230646912}}</ref> जहाँ संरक्षण के नाम पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग के पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों में प्रकृति का अनुभव करने वाले लोग कई बार अपने दैनिक जीवन में उपस्थित प्राकृतिक परिवेश की अनदेखी करने लगते हैं, जिससे प्रकृति के प्रति समग्र संवेदनशीलता कम हो सकती है। वहीं, पर्यटन से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि बढ़ती पर्यटक गतिविधियाँ स्वयं उन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिनके संरक्षण के लिए ये उद्यान बनाए गए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=बुशर|first1=ब्रैम|last2=फ्लेचर|first2=रॉबर्ट|date=2019|title=Towards Convivial Conservation|journal=संरक्षण और समाज|volume=17|issue=3|pages=283|doi=10.4103/cs.cs_19_75|bibcode=2019CoSoc..17..283B |s2cid=195819004|issn=0972-4923|doi-access=free}}</ref> अत्यधिक आगंतुक दबाव, संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय हस्तक्षेप पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा जहाँ एक ओर संरक्षण का सशक्त माध्यम है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टि बनाए रखना भी आवश्यक है। आलोचकों के अनुसार, पूर्व में उपनिवेशित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की प्रक्रिया अनेक बार स्वदेशी समुदायों के विस्थापन से जुड़ी रही है। जिन भूमि क्षेत्रों को “प्राकृतिक” और “अछूते” रूप में संरक्षित घोषित किया गया, वे अक्सर उन्हीं समुदायों के पारंपरिक निवास और आजीविका के केंद्र थे। ऐसे में संरक्षण की यह धारणा कि प्रकृति तभी सुरक्षित रह सकती है जब उसमें मानव उपस्थिति न हो, “शुद्ध” वन्य प्रकृति की एक सीमित और विवादास्पद कल्पना को बढ़ावा देती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति और संस्कृति के बीच एक कृत्रिम विभाजन को स्थापित करता है, जिससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या संरक्षण केवल मानव अनुपस्थिति में ही संभव है, या फिर मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भी एक वैध और टिकाऊ विकल्प हो सकता है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों में बढ़ता पर्यटन भी एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। यद्यपि पर्यटन जागरूकता और आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है, किंतु अत्यधिक आगंतुकों की उपस्थिति कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इनमें प्राकृतिक आवासों का क्षरण, प्रदूषण में वृद्धि, मृदा अपरदन तथा वन्यजीवों के व्यवहार में बाधा जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, वे पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें संरक्षण के उद्देश्य से सुरक्षित किया गया था, स्वयं मानवीय दबाव के कारण प्रभावित होने लगते हैं।<ref>{{cite web |title=Environmental Impact of Tourism in National Parks |url=https://www.usanationalparks.info/environmental-impact-of-tourism-in-national-parks-3-key-concerns/ |website=यूएसए राष्ट्रीय उद्यान सूचना}}</ref> इस प्रकार, राष्ट्रीय उद्यानों की अवधारणा को समझते समय यह आवश्यक हो जाता है कि संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत पर्यटन के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सके। ==इन्हें भी देखें== * [[भारत के राष्ट्रीय उद्यान]] * [[जैव संरक्षण]] * [[संरक्षण आंदोलन]] * [[भूद्यान]] * [[राष्ट्रीय स्मारक]] * [[संधारणीय विकास]] * [[संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम]] * [[संरक्षण (नैतिक)]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} ===सूत्रों का कहना है=== * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=xIWwmVUUU4wC |title = Tourism in National Parks and Protected Areas: Planning and Management |publisher = सीएबीआई |author=ईगल्स, पॉल एफ. जे |author2=मैककूल, स्टीफन एफ. |year = 2002 |isbn = 0851997597}} 320 pages. * {{cite book |url=https://books.google.com/books?id=4FG6HsjlcfoC | title = Preserving Nature in the National Parks: A History |publisher = येल यूनिवर्सिटी प्रेस |author=सेलर्स, रिचर्ड वेस्ट |year = 2009 |isbn = 978-0300154146}} 404 pages. * शीएल, जॉन (2010) ''Nature's Spectacle - The World's First National Parks and Protected Places'' अर्थस्कैन, लंदन, वाशिंगटन. {{ISBN|978-1-84971-129-6}} ==अग्रिम पठन== * क्रेग डब्ल्यू. एलिन (संपादक), ''International Handbook of National Parks and Nature Reserves'', ब्लूम्सबरी एकेडमिक, ग्रीनवुड (प्रकाशक), प्रथम संस्करण, 1990, 560 पृष्ठ। ISBN 978-0274924080 * अहमद नकीउद्दीन बकर और मोहम्मद नाजिप सुरतमान ( यूनिवर्सिटी टेक्नोलोजी MARA के संपादक ), ''Protected Areas, National Parks and Sustainable Future'', इंटेकओपन, 2020, 134 पृष्ठ। ISBN 978-1-78984-229-6 * एरिक डफी (18 राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ निर्देशित), ''National Parks and Reserves of Western Europe'', हैरो हाउस एडिशन्स, लंदन, 1982, 288 पृष्ठ। सर पीटर स्कॉट द्वारा प्रस्तावना । ISBN 978-0356085869 ==बाहरी कड़ियाँ== {{Sister project links | 1= | display= | author= | wikt= | commons= | n= | q= | s= | b= | voy=National parks | v= | d= | species=no | species_author=no | m=no | mw=no }} *{{cite web|url=http://www.biodiversitya-z.org/areas/37/| website=बायोडायवर्सिटी एरिज़ोना| title=Areas of Biodiversity Importance: National Parks| access-date=21 अप्रैल 2011| archive-url=https://web.archive.org/web/20110516232146/http://www.biodiversitya-z.org/areas/37| archive-date=16 मई 2011}} *{{cite web|url=http://www.europarc.org/ |website=यूरोपार्क फेडरेशन|title= Europe's protected areas}} *{{cite web|url=https://www.nps.gov/aboutus/faqs.htm |website=अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा |title=FAQs}} *{{cite web|website=Travel Is Free|title=Map of All The World's National Parks|url=http://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|author=मैकोम्बर, ड्रू|date= सितंबर 10, 2018|access-date=18 अक्टूबर 2018|archive-date=5 अप्रैल 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190405073256/https://travelisfree.com/2018/09/10/map-of-all-the-worlds-national-parks/#more-17443|url-status=dead}} *{{cite web|url=http://www.unesco.org/mab/ |website= यूनेस्को |title= Man and the Biosphere Programme (Biosphere Reserves)|date=7 जनवरी 2019}} *{{cite web|url=http://nationalparks.nighthee.com/| website=nighthee.com| title=National parks, landscape parks and protected areas in the world| access-date=11 अगस्त 2015|url-status=usurped| archive-url=https://web.archive.org/web/20150905182433/http://nationalparks.nighthee.com/| archive-date=5 सितंबर 2015}} *{{cite web|url=http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|website=amu.edu.pl|title=National Parks Worldwide|access-date=3 जनवरी 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080119140316/http://www.staff.amu.edu.pl/~zbzw/ph/pnp/swiat.htm|archive-date=19 जनवरी 2008|df=dmy-all}} *{{cite web|url=http://www.protectedplanet.net |website=संरक्षित ग्रह |title= World Database of Protected Areas}} *{{cite web|url=http://dopa.jrc.ec.europa.eu |website=यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा |title= Digital Observatory for Protected Areas (DOPA)}} *{{cite web|url=https://whc.unesco.org/ |website= यूनेस्को |title=World Heritage Sites}} [[श्रेणी:राष्ट्रीय उद्यान|*]] [[श्रेणी:संरक्षित क्षेत्र]] cmqhs0nn6dx60tz090khpdlkwcb25j2 कुरुक्षेत्र युद्ध 0 100991 6543654 6451918 2026-04-24T15:37:26Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 2 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543654 wikitext text/x-wiki {{निर्वाचित लेख}} {{Infobox Military Conflict |conflict=महाभारत का युद्ध |image=[[चित्र:The Pandava and Kaurava armies face each other.JPG|300px|center]][[file:9th day War Kurukshetra.JPG|300px|center]] |caption=[[महाभारत]] महाकाव्य की हस्तलिखित पाण्डुलिपि, चित्र सहित |date= 1050 BC |place=[[कुरुक्षेत्र]], वर्तमान [[हरियाणा]] राज्य |territory= |result=कौरवों की पराजय, पाण्डवों को सत्ता प्राप्त |combatant1=[[पाण्डव]]ों के सेनापति [[धृष्टद्युम्न]] |combatant2=[[कौरव]]ों के सेनापति [[भीष्म]] |commander1=[[धृष्टद्युम्न]]{{KIA}} |commander2=[[भीष्म]]{{KIA}},[[द्रोण]]{{KIA}},[[कर्ण]]{{KIA}},<br />[[शल्य]]{{KIA}},[[अश्वत्थामा]] |strength1=7 [[अक्षौहिणी]] <br> १५,३०,९०० सैनिक |strength2=11 [[अक्षौहिणी]] <br> २४,०५,७०० सैनिक |casualties1= सभी योद्धाओ में से <br>केवल 8 ज्ञात वीर ही बचे-पाँचों पाण्डव, कृष्ण, सात्यकि, युयुत्सु |casualties2=सभी योद्धाओ में से<br> केवल ३ ज्ञात वीर ही शेष<br />-अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा }} '''कुरुक्षेत्र युद्ध''' [[कौरव|कौरवों]] और [[पाण्डव|पाण्डवों]] के मध्य [[कुरु]] साम्राज्य के सिंहासन की प्राप्ति के लिए लड़ा गया था। '''[[महाभारत]]''' के अनुसार इस युद्ध में [[भारतवर्ष]] के प्रायः सभी '''[[महाजनपद|जनपदों]]''' ने भाग लिया था। [[महाभारत]] व अन्य [[वैदिक साहित्य|वैदिक साहित्यों]] के अनुसार यह [[प्राचीन भारत]] में [[वैदिक काल]] के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था। <ref name="ReferenceA">महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,[[सौप्तिकपर्व]]</ref> इस युद्ध में लाखों [[क्षत्रिय]] योद्धा मारे गये जिसके परिणामस्वरूप [[वैदिक संस्कृति]] तथा [[वैदिक सभ्यता|सभ्यता]] का पतन हो गया था। इस युद्ध में सम्पूर्ण भारतवर्ष के राजाओं के अतिरिक्त बहुत से अन्य देशों के [[यादव ]]{{citation needed|reason=अन्य देशों में कौनसे यादव थे?}} वीरों ने भी भाग लिया और सब के सब वीर गति को प्राप्त हो गये। <ref name="ReferenceB">महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,[[भीष्मपर्व]]</ref> इस युद्ध के परिणामस्वरुप भारत में [[ज्ञान]] और [[विज्ञान]] दोनों के साथ-साथ वीर क्षत्रियों का अभाव हो गया। एक तरह से [[वैदिक संस्कृति]] और [[वैदिक सभ्यता|सभ्यता]] जो विकास के चरम पर थी उसका एकाएक विनाश हो गया। [[प्राचीन भारत]] की स्वर्णिम [[वैदिक सभ्यता]] इस युद्ध की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो गयी। इस महान युद्ध का उस समय के महान [[ऋषि]] और [[दार्शनिक]] [[वेदव्यास|भगवान वेदव्यास]] ने अपने [[महाकाव्य]] [[महाभारत]] में वर्णन किया, जिसे सहस्राब्दियों तक सम्पूर्ण भारतवर्ष में गाकर एवं सुनकर याद रखा गया। <ref>महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,[[आदिपर्व]], प्रथम अध्याय</ref> युद्ध की ऐतिहासिकता विद्वानों की चर्चा का विषय बनी हुई है।<ref name="Singh2006">{{cite book|url=https://books.google.com/books?id=KkpdLnZpm78C|title=Delhi: Ancient History|last=Singh|first=Upinder|publisher=Berghahn Books|year=2006|isbn=9788187358299|page=85}}</ref>{{sfn|Singh|2009|p=19}}<ref name="Insoll">{{cite book|title=Case Studies in Archaeology and World Religion: The Proceedings of the Cambridge Conference|first=Timothy|last=Insoll|page=166|publisher=Archaeopress}}</ref> ऋग्वेद में उल्लिखित [[दशराज्ञ युद्ध|दस राजाओं की लड़ाई]] ने कुरुक्षेत्र युद्ध की कहानी का मूल आधार बनाया हो सकता है। महाभारत के वृत्तांत में युद्ध का बहुत विस्तार और संशोधन किया गया था, जो इसे संदिग्ध बनाता है।<ref name="Murthy 2016 pp. 1–15">{{cite journal | last=Murthy | first=S. S. N. | title=The Questionable Historicity of the Mahabharata | journal=Electronic Journal of Vedic Studies | volume=10 | issue=5 | date=8 September 2016 | issn=1084-7561 | doi=10.11588/ejvs.2003.5.782 | pages=1–15 | url=https://crossasia-journals.ub.uni-heidelberg.de/index.php/ejvs/article/view/782 | access-date=26 January 2019 | archive-date=26 जनवरी 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20190126164815/https://crossasia-journals.ub.uni-heidelberg.de/index.php/ejvs/article/view/782 | url-status=dead }}</ref> कुरुक्षेत्र युद्ध को एक ऐतिहासिक तिथि प्रदान करने का प्रयास किया गया है, जिसमें अनुसंधान का सुझाव दिया गया है। 1000 ई.पू.{{sfn|Singh|2009|p=19}} हालांकि, लोकप्रिय परंपरा का दावा है कि युद्ध कलियुग में संक्रमण को चिह्नित करता है, जो इसे 3102 ईसा पूर्व से डेटिंग करता है।<ref>{{Cite book|title= The Mahabharata: Volume 1, Volume 1|publisher=Penguin UK|year=2015|isbn=9788184753882}}</ref> '''[[महाभारत]]''' में मुख्यतः चंद्रवंशियों{{citation needed}} के दो परिवार [[कौरव]] और [[पाण्डव]] के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है। १०० [[कौरव|कौरवों]] और पाँच [[पाण्डव|पाण्डवों]] के बीच [[कुरु]] साम्राज्य की भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंतत: महाभारत युद्ध का सृजन हुआ। उक्त युद्ध को [[हरियाणा]] में स्थित [[कुरुक्षेत्र]] के आसपास हुआ माना जाता है। इस युद्ध में [[पाण्डव]] विजयी हुए थे। <ref name="ReferenceA"/> [[महाभारत]] में इस युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया है, क्योंकि यह सत्य और न्याय के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध था। <ref name="ReferenceB"/> [[महाभारत]] काल से जुड़े कई अवशेष [[दिल्ली]] में [[पुराना किला]] में मिले हैं। [[पुराना किला]] को पाण्डवों का किला भी कहा जाता है।<ref>{{Cite web |url=http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V11_242.gif |title=दिल्ली सिटी द इमपेरिकल गजेटटियर ऑफ इण्डिया,१९०९, भाग ११, पेज २३६ |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160303190534/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V11_242.gif |archive-date=3 मार्च 2016 |url-status=dead }}</ref> [[कुरुक्षेत्र]] में भी [[भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग]] द्वारा महाभारत काल के बाण और भाले प्राप्त हुए हैं।<ref>{{Cite web |url=http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html |title=आरकेलोजी ऑनलाइन, साइन्टिफिक वेरिफिकेशन ऑफ वैदिक नोलेज, कुरुक्षेत्र |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100326015150/http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html |archive-date=26 मार्च 2010 |url-status=dead }}</ref> गुजरात के पश्चिमी तट पर समुद्र में डूबे ७०००-३५०० वर्ष पुराने शहर खोजे गये हैं<ref>{{Cite web |url=http://www.ias.ac.in/currsci/jul10/articles29.htm |title=आई एस डॉट कॉम, आरटिकल २९ |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100215014029/http://www.ias.ac.in/currsci/jul10/articles29.htm |archive-date=15 फ़रवरी 2010 |url-status=live }}</ref>, जिनको महाभारत में वर्णित द्वारका के सन्दर्भों से जोड़ा गया<ref>{{Cite web |url=http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html |title=आरकेलोजी ऑनलाइन, साइन्टिफिक वेरिफिकेशन ऑफ वैदिक नोलेज, ऐविडेन्स फार ऐन्शियन्ट पोर्ट सिटी ऑफ द्वारका |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100326015150/http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html |archive-date=26 मार्च 2010 |url-status=dead }}</ref>, इसके अलावा [[बरनावा]] में भी [[लाक्षागृह]] के अवशेष मिले हैं<ref>{{Cite web |url=http://bagpat.nic.in/lakshagrah.htm |title=लाक्षागृह |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090410012022/http://bagpat.nic.in/lakshagrah.htm |archive-date=10 अप्रैल 2009 |url-status=live }}</ref>, ये सभी प्रमाण [[महाभारत]] की वास्तविकता को सिद्ध करते हैं। ==पृष्ठभूमि== [[चित्र:Draupadi & dushashan scene.jpg|thumb|right|250px|कुरुराज्य सभा में द्रौपदी का अपमान]] '''महाभारत युद्ध''' होने का मुख्य कारण [[कौरव|कौरवों]] की उच्च महत्वाकांक्षाएँ और [[धृतराष्ट्र]] का पुत्र मोह था। [[कौरव]] और [[पाण्डव]] आपस में चचेरे भाई थे। [[वेदव्यास]] जी से नियोग के द्वारा [[विचित्रवीर्य]] की भार्या [[अम्बिका]] के गर्भ से [[धृतराष्ट्र]] और [[अंबालिका|अम्बालिका]] के गर्भ से [[पाण्डु]] उत्पन्न हुए। [[धृतराष्ट्र]] ने [[गान्धारी]] के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, उनमें [[दुर्योधन]] सबसे बड़ा था। पाण्डु के [[युधिष्ठिर]], [[भीम]], [[अर्जुन]], [[नकुल]], [[सहदेव]] आदि पाँच पुत्र हुए| [[धृतराष्ट्र]] जन्म से ही नेत्रहीन थे अतः उनकी जगह पर [[पाण्डु]] को राज दिया गया जिससे [[धृतराष्ट्र]] को सदा [[पाण्डु]] और उसके पुत्रों से द्वेष रहने लगा। यह द्वेष [[दुर्योधन]] के रूप मे फलीभूत हुआ और [[शकुनि]] ने इस आग में घी का काम किया। [[शकुनि]] के कहने पर [[दुर्योधन]] ने बचपन से लेकर [[लाक्षागृह]] तक कई षडयंत्र किये। परन्तु हर बार वो विफल रहा। युवावस्था में आने पर जब [[युधिष्ठिर]] को युवराज बना दिया गया तो उसने उन्हें [[लाक्षागृह]] भिजवाकर मारने की कोशिश की परन्तु [[पाण्डव]] बच निकले। [[पाण्डव|पाण्डवों]] की अनुपस्थिति में धृतराष्ट्र ने [[दुर्योधन]] को युवराज बना दिया परन्तु जब [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने वापिस आकर अपना राज्य वापिस मांगा तो उन्हें राज्य के नाम पर खण्डहर रुपी [[खाण्डव वन]] दिया गया। [[धृतराष्ट्र]] के अनुरोध पर गृहयुद्ध के संकट से बचने के लिए [[युधिष्ठिर]] ने यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने [[श्रीकृष्ण]] की सहायता से [[इन्द्र]] की अमारावती पुरी जितनी भव्य नगरी [[इन्द्रप्रस्थ]] का निर्माण किया। पाण्डवों ने विश्वविजय करके प्रचुर मात्रा में रत्न एवं धन एकत्रित किया और राजसूय यज्ञ किया। [[दुर्योधन]] [[पाण्डव|पाण्डवों]] की उन्नति देख नहीं पाया और [[शकुनि]] के सहयोग से द्यूत में छ्ल से [[युधिष्ठिर]] से उसका सारा राज्य जीत लिया और कुरु राज्य सभा में [[द्रौपदी]] को निर्वस्त्र करने का प्रयास कर उसे अपमानित किया। सम्भवतः इसी दिन [[महाभारत]] के युद्ध के बीज पड़ गये थे। अन्ततः पुनः द्यूत में हारकर [[पाण्डव|पाण्डवों]] को १२ वर्षो को ज्ञातवास और १ वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। परन्तु जब यह शर्त पूरी करने पर भी [[कौरव|कौरवों]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] को उनका राज्य देने से मना कर दिया। तो [[पाण्डव|पाण्डवों]] को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा, परन्तु [[श्रीकृष्ण]] ने युद्ध रोकने का हर सम्भव प्रयास करने का सुझाव दिया। [[चित्र:Srimad Bhagavad Gita Painting.jpg|thumb|left|225px|महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण और अर्जुन]] तब [[श्रीकृष्ण]] पाण्डवों की तरफ से कुरुराज्य सभा में शांतिदूत बनकर गये और वहाँ [[श्रीकृष्ण]] ने [[दुर्योधन]] से पाण्डवों को केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रस्ताव रखा। परन्तु जब [[दुर्योधन]] ने पाण्डवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि देने से मना कर दिया तो अन्ततः [[युधिष्ठिर]] को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा। इस प्रकार [[कौरव|कौरवों]] ने ११ [[अक्षौहिणी]] तथा [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने ७ [[अक्षौहिणी]] सेना एकत्रित कर ली। युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करने के बाद कौरव और पाण्डव दोनों दल कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ यह भयंकर युद्ध लड़ा गया <ref>महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर</ref> कुरुक्षेत्र के उस भयानक और घमासान संहारक युद्ध का अनुमान महाभारत के भीष्म पर्व में दिये एक श्लोक <ref>महाभारत गीताप्रेस गोरखपुर, भीष्म पर्व-४६.१</ref> से लगाया जा सकता है कि <!--Start Quote. Please do not change use the उक्ति, template. This has been used here and proved not to work--> {| align="center" style="border-collapse:collapse;border-style:none;background-color:transparent;max-width:23em;width:60%;" | valign="top" style="color:{{{color|silver}}};font-size:{{{size|3.6em}}};font-family:serif;font-weight:bold;text-align:left;padding:10px 0;" | “ | valign="top" style="padding:0 1em;" | {{{1| '''न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम्।''' '''भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्रीयं न च मातुलः॥'''}}} | valign="bottom" style="color:{{{color|silver}}};font-size:{{{size|3.6em}}};font-family:serif;font-weight:bold;text-align:right;padding:10px 0;" | „ |} <!--End Quote--> :<!--Start Quote. Please do not change use the उक्ति, template. This has been used here and proved not to work--> {| align="center" style="border-collapse:collapse;border-style:none;background-color:transparent;max-width:40em;width:60%;" | valign="top" style="color:{{{color|silver}}};font-size:{{{size|3.6em}}};font-family:serif;font-weight:bold;text-align:left;padding:10px 0;" | “ | valign="top" style="padding:0 1em;" | {{{1| '''अर्थात् :''' '''उस युद्ध में न पुत्र पिता को, न पिता पुत्र को, न भाई भाई को, न मामा भांजे को, न मित्र मित्र को पहचानता था''''''}}} | valign="bottom" style="color:{{{color|silver}}};font-size:{{{size|3.6em}}};font-family:serif;font-weight:bold;text-align:right;padding:10px 0;" | „ |} <!--End Quote--> ==ऐतिहासिकता== [[चित्र:Mahabharata BharatVarsh.jpg|right|thumb|350px|महाभारतकालीन [[भारतवर्ष]] का मानचित्र]] *महाभारत युद्ध को आमतौर पर [[वैदिक युग]] में लगभग 950 ईसा पूर्व के समय का माना जाता है।<ref name="bharat950">{{cite web|url=https://www.telegraphindia.com/1150201/jsp/bihar/story_10960.jsp|title=Experts dig up 950BC as epic war date|access-date=16 सितंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170916140121/https://www.telegraphindia.com/1150201/jsp/bihar/story_10960.jsp|archive-date=16 सितंबर 2017|url-status=live}}</ref> अधिकतर पश्चिमी विद्वान् इसे १००० ईसा पूर्व से १५०० ईसा पूर्व मानते है विद्वानों ने इसकी तिथि निर्धारित करने के लिये इसमें वर्णित [[सूर्य ग्रहण]] और [[चंद्र ग्रहणों]] के बारे में अध्ययन किया है और इसे ३१ वीं सदी ईसा पूर्व का मानते हैं, लेकिन मतभेद अभी भी जारी है। इसकी कई भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न तिथियाँ निर्धारित की गयी हैं- *विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ [[वराहमिहिर]] के अनुसार महाभारत युद्ध २४४९ ईसा पूर्व हुआ था। <ref>ए.डी. पुशलकर, पृष्ठ.272</ref> *विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ [[आर्यभट]] के अनुसार महाभारत युद्ध [[१८ फ़रवरी]] [[३१०२ ईसा पूर्व|३१०२]] ईसा पूर्व में हुआ था। <ref>एज ऑफ भारत वार , जी सी अग्रवाल और के एल वर्मा, पृष्ठ-81</ref> *[[चालुक्य राजवंश]] के सबसे महान सम्राट् [[पुलकेसि २]] के ५वी शताब्दी के [[ऐहोल]] अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए ३,७३५ वर्ष बीत गए हैं, इस दृष्टि से महाभारत का युद्ध [[३१०० ईसा पूर्व|३१००]] ईसा पूर्व लड़ा गया होगा। <ref>गुप्ता और रामचन्द्रन (1976), p.55; ए.डी. पुशलकर, HCIP, भाग I, पृष्ठ.272</ref> *[[पुराण|पुराणों]] की मानें तो यह युद्ध [[१९०० ईसा पूर्व|१९००]] ईसा पूर्व हुआ था, पुराणों में दी गई विभिन्न राज वंशावलियों को यदि चन्द्रगुप्त मौर्य से मिला कर देखा जाये तो १९०० ईसा पूर्व की तिथि निकलती है, परन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] [[१५०० ईसा पूर्व|१५००]] ईसा पूर्व में हुआ था, यदि यह माना जाये तो ३१०० ईसा पूर्व की तिथि निकलती है क्योंकि यूनान के राजदूत [[मेगस्थनीज]] ने अपनी पुस्तक "[[इंडिका]]" में जिस चन्द्रगुप्त का उल्लेख किया है वो गुप्त वंश का राजा चन्द्रगुप्त भी हो सकता है। <ref>ए.डी. पुशलकर, हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन पीपुल, भाग I, अध्याय XIV, पृष्ठ.273</ref> *अधिकतर पश्चिमी यूरोपीय विद्वानों जैसे मायकल विटजल के अनुसार भारत युद्ध [[१२०० ईसा पूर्व|१२००]] ईसा पूर्व में हुआ था, जो इसे भारत में लौह युग (१२००-[[८०० ईसा पूर्व|८००]] ईसा पूर्व) से जोड़कर देखते हैं। <ref>एम विटजल, अरली सन्स्क्रिटाइजेशन: आरिजन एण्ड डेवलेपमेन्ट ऑफ कुरु स्टेट, इ जे वी एस भाग.1 न.4 (1995</ref> *कुछ पश्चिमी यूरोपीय विद्वानों जैसे पी वी होले महाभारत में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय स्थितियों का अध्ययन करने के बाद इसे [[१३ नवंबर]] [[३१४३ ईसा पूर्व|३१४३]] ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। <ref name="डेटिंग ऑफ महाभारत वार">{{Cite web |url=http://www.ignca.nic.in/nl002503.htm |title=डेटिंग ऑफ महाभारत वार |access-date=13 अप्रैल 2010 |archive-date=12 मार्च 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100312001754/http://ignca.nic.in/nl002503.htm |url-status=dead }}</ref> *अधिकतर भारतीय विद्वान् जैसे बी ऐन अचर, एन एस राजाराम, के. सदानन्द, सुभाष काक ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे [[३०६७ ईसा पूर्व|३०६७]] ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। <ref>{{Cite web |url=http://www.dharmakshetra.com/articles/dating%20of%20the%20Mahabharat.htm |title=धर्मक्षेत्र.कॉम/महाभारत |access-date=13 अप्रैल 2010 |archive-date=20 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100420033710/http://www.dharmakshetra.com/articles/dating%20of%20the%20Mahabharat.htm |url-status=dead }}</ref> *भारतीय विद्वान् पी वी वारटक [[महाभारत]] में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे [[१६ अक्तूबर]] [[५५६१ ईसा पूर्व|५५६१]] ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। <ref name="डेटिंग ऑफ महाभारत वार"/><ref name="हिन्दुनेट-भारत इतिहास">{{Cite web |url=http://www.hindunet.org/hindu_history/ancient/mahabharat/mahab_vartak.html |title=हिन्दुनेट-भारत इतिहास |access-date=13 अप्रैल 2010 |archive-date=16 अप्रैल 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090416100137/http://hindunet.org/hindu_history/ancient/mahabharat/mahab_vartak.html |url-status=dead }}</ref> *कुछ विद्वानों जैसे पी वी वारटक <ref name="डेटिंग ऑफ महाभारत वार"/><ref name="हिन्दुनेट-भारत इतिहास"/> के अनुसार यूनान के राजदूत [[मेगस्थनीज]]अपनी पुस्तक "[[इंडिका]]" में अपनी भारत यात्रा के समय जमुना (यमुना) के तट पर बसे मेथोरा (मथुरा) राज्य में शूरसेनियों से मिलने का वर्णन करते है, मेगस्थनीज यह बताते है कि ये शूरसेनी किसी हेराकल्स नामक देवता की पुजा करते थे और ये हेराकल्स काफी चमत्कारी पुरुष होता था तथा चन्द्रगुप्त से १३८ पीढ़ियों पहले था। हेराकल्स ने कई विवाह किए और कई पुत्र उत्पन्न किए। परन्तु उसके सभी पुत्र आपस में युद्ध करके मारे गये। यहाँ यह साफ है कि ये हेराकल्स [[श्रीकृष्ण]] ही थे, विद्वान् इसे हरिकृष्ण कह कर [[श्रीकृष्ण]] से जोडते है क्योंकि [[श्रीकृष्ण]] [[चन्द्रगुप्त]] से १३८ पीढ़ियों पहले थे तो अगर एक पीढ़ी को २०-३० वर्ष दें तो ३१००-५६०० ईसा पूर्व [[श्रीकृष्ण]] का जन्म समय निकलता है अत इस हिसाब से ५६००-३१०० ईसा पूर्व के समय महाभारत का युद्ध हुआ होगा। *मोहनजोदड़ो में १९२७ में मैके द्वारा किये गये पुरातात्विक उत्खनन में मिली एक पत्थर की टेबलेट में एक छोटे बालक को दो पेड़ों को खींचता दिखाया गया है और उन पेड़ों से दो पुरुषों को निकलकर उस बालक को प्रणाम करते हुए भी दिखाया गया है, यह दृश्य भगवान श्रीकृष्ण की बचपन की यमलार्जुन-लीला से समानता दिखाता है, अत कई विद्वान् यह मानते है कि मोहनजोदड़ो सभ्यता के लोग महाभारत की कथाओं से परिचित थे। इस कारण भी इस युद्ध को ३००० ईसा पूर्व माना गया है। <ref>{{Cite web |url=http://books.google.com/books?id=WgnfbxkFsFoC&pg=PA81&dq=mackay+report+part+A+tablet+found&as_brr=3&cd=3#v=onepage&q=mackay%20report%20part%20A%20tablet%20found&f=false |title=एज ऑफ महाभारत वार |access-date=13 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131114020109/http://books.google.com/books?id=WgnfbxkFsFoC&pg=PA81&dq=mackay+report+part+A+tablet+found&as_brr=3&cd=3#v=onepage&q=mackay%20report%20part%20A%20tablet%20found&f=false |archive-date=14 नवंबर 2013 |url-status=live }}</ref> ==श्रीकृष्ण द्वारा शांति का अंतिम प्रयास<ref>महाभारत,[[उद्योगपर्व]] गीताप्रेस गोरखपुर</ref>== [[चित्र:Krishna as Envoy.jpg|thumb|left|225px|कौरव सभा में श्रीकृष्ण]] १२ वर्षों के ज्ञातवास और १ वर्ष के अज्ञातवास की शर्त पूरी करने पर भी जब [[कौरव|कौरवों]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] को उनका राज्य देने से मना कर दिया तो [[पाण्डव|पाण्डवों]] को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा। परन्तु [[श्रीकृष्ण]] ने कहा कि यह युद्ध सम्पूर्ण विश्व सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है अतः उन्होने युद्ध रोकने का हर सम्भव प्रयास करने का सुझाव दिया। [[श्रीकृष्ण]] ने कहा कि [[दुर्योधन]] को एक अन्तिम अवसर अवश्य देना चाहिए, इसलिये [[श्रीकृष्ण]] पाण्डवों की तरफ से कुरुराज्य सभा में शांतिदूत बनकर गये और [[दुर्योधन]] से पाण्डवों के सामने केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रस्ताव रखा। जब [[दुर्योधन]] ने पाण्डवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि देने से मना कर दिया तो [[श्रीकृष्ण]] ने उसे समझाया कि [[दुर्योधन]] के इस हठ के कारण उसके वंश और साथियों के साथ-साथ कई निर्दोष लोगों को युद्ध की बलि चढ़ना पड़ेगा। इस बात क्रोधित होकर [[दुर्योधन]] ने [[श्रीकृष्ण]] को बन्दी बनाने की कोशिश की परन्तु [[श्रीकृष्ण]] माया का प्रयोग करके सबको अपने विराट रूप से भयभीत कर वहाँ से चले गये। इसके बाद तो [[युधिष्ठिर]] को युद्ध करने के लिये विवश होना ही पड़ा। उसी समय भगवान [[वेदव्यास]] ने [[धृतराष्ट्र]] के पास जाकर कहा कि तुम्हारे पुत्रों ने समस्त गुरुजनों की बातों की अवहेलना करके अन्ततः महाविनाशकारी युद्ध को खड़ा ही कर दिया। धृतराष्ट्र के युद्ध की संसूचना जानने की विनती करने पर [[वेदव्यास]] जी ने उन्हे कहा कि यदि तुम इस महायुद्ध को देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकता हूँ। इस पर [[धृतराष्ट्र]] ने कहा कि इसमें मेरे ही कुल का विनाश होना है, इसलिये मैं इस युद्ध अपनी आँखों से नहीं देखूँगा। अतः आप कृपा करके ऐसी व्यवस्था कर दें कि मुझे इस युद्ध का समाचार मिलता रहे। यह सुनकर [[वेदव्यास]] जी ने [[संजय]] को बुलाकर उसे दिव्य दृष्टि दे दी और कहा, “हे [[धृतराष्ट्र]]! मैंने [[संजय]] को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दिया है। सम्पूर्ण युद्ध क्षेत्र में कोई भी बात ऐसी न रहेगी जो इससे छुपी रहे। यह तुम्हें इस महायुद्ध का सारा वृत्तान्त सुनायेगा।” इतना कहकर [[वेदव्यास]] जी चले गये। ==युद्ध की तैयारियाँ और कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान<ref>गीता प्रेस गोरखपुर, महाभारत</ref>== [[चित्र:EpicIndia.jpg|thumb|right|275px|महाभारत युद्ध मे भाग लेने वाले विभिन्न जनपदों की स्थिति]] जब यह निश्चित हो गया कि युद्ध तो होगा ही, तो दोनों पक्षों ने युद्ध के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। [[दुर्योधन]] पिछ्ले १३ वर्षों से ही युद्ध की तैयारी कर रहा था, उसने [[बलराम]] जी से [[अस्त्र|गदा]] युद्ध की शिक्षा प्राप्त की तथा कठिन परिश्रम और अभ्यास से [[गदा]] युद्ध करने में [[भीम]] से भी अच्छा हो गया। [[शकुनि]] ने इन वर्षों मे की विश्व के अधिकतर [[महाभारत कालीन जनपद|जनपदों]] को अपनी तरफ कर लिया। [[दुर्योधन]] [[कर्ण]] को अपनी सेना का सेनापति बनाना चाहता था परन्तु [[शकुनि]] के समझाने पर [[दुर्योधन]] ने पितामह [[भीष्म]] को अपनी सेना का सेनापति बनाया, जिसके कारण [[भारत]] और विश्व के कई जनपद दुर्योधन के पक्ष मे हो गये। [[पाण्डव|पाण्डवों]] की तरफ केवल वही जनपद थे जो [[धर्म]] और [[श्रीकृष्ण]] के पक्ष मे थे। [[महाभारत]] के अनुसार महाभारत काल में [[कुरु|कुरुराज्य]] विश्व का सबसे बड़ा और शक्तिशाली जनपद था। विश्व के सभी जनपद [[कुरु|कुरुराज्य]] से कभी युद्ध करने की भूल नहीं करते थे एवं सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते थे। अत: सभी जनपद कुरुओं द्वारा लाभान्वित होने के लोभ से युद्ध में उनकी सहायता करने के लिये तैयार हो गये। [[पाण्डव|पाण्डवों]] और [[कौरव|कौरवों]] द्वारा [[यादव|यादवों]] से सहायता मांगने पर [[श्रीकृष्ण]] ने पहले तो युद्ध में [[शस्त्र]] न उठाने की प्रतिज्ञा की और फिर कहा कि "एक तरफ मैं अकेला और दूसरी तरफ मेरी एक [[अक्षौहिणी]] नारायणी सेना", अब [[अर्जुन]] व [[दुर्योधन]] को इनमें से एक का चुनाव करना था। [[अर्जुन]] ने तो [[श्रीकृष्ण]] को ही चुना, तब [[श्रीकृष्ण]] ने अपनी एक [[अक्षौहिणी]] सेना [[दुर्योधन]] को दे दी और खुद [[अर्जुन]] का सारथि बनना स्वीकार किया। इस प्रकार [[कौरव|कौरवों]] ने ११ [[अक्षौहिणी]] तथा [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने ७ [[अक्षौहिणी]] सेना एकत्रित कर ली। फिर [[श्रीकृष्ण]] ने [[कर्ण]] से मिलकर उसे यह समझाया कि वह [[पाण्डव|पाण्डवों]] का ही भाई है अतः वह [[पाण्डव|पाण्डवों]] की तरफ से युद्ध करे, परन्तु [[कर्ण]] ने [[दुर्योधन]] के ऋण और मित्रता के कारण [[कौरव|कौरवों]] का साथ नहीं छोड़ा। इसके बाद [[कुन्ती]] के विनती करने पर [[कर्ण]] ने [[अर्जुन]] को छोड़कर उसके शेष चार पुत्रों को अवसर प्राप्त होने पर भी न मारने का वचन दिया। इधर [[इन्द्र]] ने भी [[ब्राह्मण]] का वेष बनाकर [[कर्ण]] से उसके कवच और कुण्डल ले लिये। जिससे [[कर्ण]] की शक्ति कम हो गयी और [[पाण्डव|पाण्डवों]] का उत्साह बढ़ गया क्योंकि उस अभेद्य कवच के कारण [[कर्ण]] को किसी भी दिव्यास्त्र से मारा नहीं जा सकता था। ==सेना विभाग एवं संरचनाएँ, हथियार और युद्ध सामग्री== ===दोनों पक्षों की सेनाएँ <ref>महाभारत,[[भीष्मपर्व]], अध्याय १-४० में दिये गये जनपदों का वर्णन तथा इन जनपदों के कौरव एवं पाण्डव पक्ष से लडने के आधार पर बनायी गयी सूची</ref>=== {{महाभारत कालीन जनपद}} ---- === सेना विभाग === पाण्डवों और कौरवों ने अपनी सेना के क्रमशः ७ और ११ विभाग [[अक्षौहिणी]] में किये। एक [[अक्षौहिणी]] में २१, ८७० रथ, २१, ८७० हाथी, ६५, ६१० सवार और १,०९,३५० पैदल सैनिक होते हैं।<ref>[http://v-k-s-c.blogspot.com/2008/07/kalyug-krishna-death.htm वी के एस ब्लागl कृष्ण की मृत्यु और कलियुग की प्रारम्भ]। मेरी कलम से- कृष्णा वीरेन्द्र न्यास</ref><ref>[http://pustak.org/bs/home.php?mean=1203 भारतीय साहित्य संग्रह]{{Dead link|date=जनवरी 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> यह [[प्राचीन भारत]] में सेना का माप हुआ करता था। हर रथ में चार घोड़े और उनका सारथि होता है हर हाथी पर उसका हाथीवान बैठता है और उसके पीछे उसका सहायक जो कुर्सी के पीछे से हाथी को अंकुश लगाता है, कुर्सी में उसका मालिक धनुष-बाण से सज्जित होता है और उसके साथ उसके दो साथी होते हैं जो भाले फेंकते हैं तदनुसार जो लोग रथों और हाथियों पर सवार होते हैं उनकी संख्या २, ८४, ३२३ होती हैं एक अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या ६, ३४, २४३ होती हैं, अतः १८ अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या १, १४, १६, ३७४ होगी। अठारह अक्षौहिणियों के लिए यही संख्या ११, ४१६ ,३७४ हो जाती है अर्थात ३, ९३, ६६० हाथी, २७, ५५, ६२० घोड़े, ८२, ६७, ०९४ मनुष्य।<ref name="महाभारत की सेना">{{Cite web |url=http://dharmkibaat.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html |title=महाभारत की सेना |access-date=11 मई 2010 |archive-date=5 मार्च 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160305113244/http://dharmkibaat.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html |url-status=dead }}</ref> *'''महाभारत युद्ध में भाग लेने वाली कुल सेना निम्नलिखित है<ref name="महाभारत की सेना"/>''' :कुल पैदल सैनिक-१९, ६८, ३०० :कुल रथ सेना-३, ९३, ६६० :कुल हाथी सेना-३, ९३, ६६० :कुल घुड़सवार सेना-११, ८०, ९८० :कुल न्यूनतम सेना-३९,०६,६०० :कुल अधिकतम सेना-१, १४, १६, ३७४ *यह सेना उस समय के अनुसार देखने में बहुत बड़ी लगती है परन्तु जब ३२३ ईसा पूर्व [[यूनान|यूनानी]] राजदूत [[मेगस्थनीज]] भारत आया था तो उसने [[चन्द्रगुप्त]] जो कि उस समय [[भारत]] का सम्राट् था, के पास ३०,००० रथों, ९००० हाथियों तथा ६,००,००० पैदल सैनिकों से युक्त सेना देखी। अतः [[चन्द्रगुप्त]] की कुल सेना उस समय ६, ३९, ००० के आस पास थी <ref>{{Cite web |url=http://www.indianetzone.com/25/military_administration_chandragupta_maurya.htm |title=चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना |access-date=11 मई 2010 |archive-date=21 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100521020959/http://www.indianetzone.com/25/military_administration_chandragupta_maurya.htm |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://books.google.com/books?id=oAo1X2eagywC&pg=PA33&dq=army+of+chandragupta+maurya&as_brr=3&cd=2#v=onepage&q=army%20of%20chandragupta%20maurya&f=false |title=द पर्सनल जनरल स्टडी मैनुएल, हिस्ट्री ऑफ इण्डिया |access-date=11 मई 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140917141005/http://books.google.com/books?id=oAo1X2eagywC#v=onepage&q=army%20of%20chandragupta%20maurya&f=false |archive-date=17 सितंबर 2014 |url-status=live }}</ref>, जिसके कारण [[सिकंदर]] ने [[भारत]] पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया था और पुनः अपने देश लौट गया था। यह सेना प्रामाणिक तौर पर प्राचीन विश्व इतिहास की सबसे विशाल सेना मानी जाती है। यह तो सिर्फ एक राज्य [[मगध]] की सेना थी, अगर समस्त भारतीय राज्यों की सेनाएँ देखें तो संख्या में एक बहुत विशाल सेना बन जायेगी। अतः महाभारत काल में जब भारत बहुत समृद्ध देश था, इतनी विशाल सेना का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिसमें की सम्पूर्ण भारत देश के साथ साथ अनेक अन्य विदेशी जनपदों ने भी भाग लिया था। === हथियार और युद्ध सामग्री === महाभारत के युद्ध मे कई तरीके के हथियार प्रयोग मे लाये गये। [[अस्त्र शस्त्र|प्रास]], [[अस्त्र शस्त्र|ऋष्टि]], [[अस्त्र शस्त्र|तोमर]], [[अस्त्र शस्त्र|लोहमय कणप]], [[अस्त्र शस्त्र|चक्र]], [[अस्त्र शस्त्र|मुद्गर]], [[अस्त्र शस्त्र|नाराच]], [[अस्त्र शस्त्र|फरसे]], [[अस्त्र शस्त्र|गोफन]], [[अस्त्र शस्त्र|भुशुण्डी]], [[अस्त्र शस्त्र|शतघ्नी]], [[अस्त्र शस्त्र|धनुष-बाण]], [[अस्त्र शस्त्र|गदा]], [[अस्त्र शस्त्र|भाला]], [[अस्त्र शस्त्र|तलवार]], [[अस्त्र शस्त्र|परिघ]], [[अस्त्र शस्त्र|भिन्दिपाल]], [[अस्त्र शस्त्र|शक्ति]], [[अस्त्र शस्त्र|मुसल]], [[अस्त्र शस्त्र|कम्पन]], [[अस्त्र शस्त्र|चाप]], [[दिव्यास्त्र]], एक साथ कई बाण छोड़ने वाली [[अस्त्र शस्त्र|यांत्रिक मशीनें]]।<ref>महाभारत-भीष्मपर्व, श्लोक-११९.२-३ गीता प्रेस गोरखपुर</ref> <div style="text-align: center;"><gallery> File:Bronze_age_weapons_Romania.jpg|प्राचीन कांस्य युग के अस्त्र-शस्त्र File:Bronze weapon Sa Huynh Culture.JPG|कांस्य युग की तलवार File:Arrowhead1.jpg|लखनऊ के दादुपुर गाँव मे उत्खनन मे प्राप्त १८०० ईसा पूर्व का लोहे के बाण का भाग File:Ballista-quadrirotis.jpeg|एक साथ कई बाण छोड़ने वाली यांत्रिक मशीनें </gallery></div> ---- === सैन्य संरचनाएँ === प्राचीन समय में युद्ध के के समय में सेनापति को सेना के कई व्यूह बनाने पड़ते थे जिससे की शत्रु की सेना में आसानी से प्रवेश पाया जा सके तथा राजा और मुख्य सेनापतियों को बन्दी बनाया या मार गिराया जा सके। इसमें अपनी सम्पूर्ण सेना को व्यूह के नाम या गुण वाली एक विशेष आकृति मे व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की व्यूह रचना से छोटी से छोटी सी सेना भी विशालकाय लगने लगती है और बड़ी से बड़ी सेना का सामना कर सकती है जैसा की महाभारत के युद्ध में [[पाण्डव|पाण्डवों]] की केवल ७ अक्षौहिणी सेना ने कौरवो की ११ अक्षौहिणी सेना का सामना करके यह सिद्ध कर दिखाया। महाभारत के १८ दिन के युद्ध में दोनों पक्ष के सेनापतियों द्वारा कई प्रकार के व्यूह बनाये गए। जो निम्नलिखित हैं- ::{| class="wikitable" |- |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">क्रोन्च व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">मकर व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">कूर्म व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">त्रिशूल व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">चक्र व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">कमल व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">ओर्मी व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">वज्र व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">मण्डल व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">गरुड व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">शकट व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">असुर व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">देव व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">सूचि व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">चन्द्रकाल व्यूह |<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">शृंगघटक व्यूह |- |} <div style="text-align: center;"><gallery> File:Chakravyuha-labyrinth.svg|चक्रव्यूह के गठन का चित्रण File:Halebid2.JPG|प्राचीन शिलाचित्र जिसमें अभिमन्यु चक्र व्यूह में प्रवेश करता हुआ दिखाया गया है </gallery></div> ---- ===महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धा<ref>गीता प्रेस गोरखपुर , महाभारत-ये श्रेणियाँ महाभारत के भीष्म पर्व के रथातिरथसंख्यानपर्व में भीष्म जी द्वारा इन पात्रों के युद्ध कौशल, युद्ध में कम से कम हार, अधिक से अधिक शक्तिशाली दिव्यास्त्रों की संख्या आदि के आधार पर दी गयी हैं। ये श्रेणियाँ इसलिये दी गयी हैं जिससे कि पाठक महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं के बारे में जान सकें।</ref>=== {{महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धा}} ==युद्ध का प्रारम्भ और अंत== [[चित्र:8 15amilitaryparade.jpg|thumb|right|400px|कुरुक्षेत्र की तरफ प्रस्थान करती पाण्डव और कौरव सेनाएँ, स्रोत<ref>[http://bhagavata.org भागवतम् डाट ओआरजी]</ref>]] युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करने के बाद कौरव और पाण्डव दोनों दल [[कुरुक्षेत्र]] पहँचे। [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र में [[सरस्वती नदी]] के दक्षिणी तट पर बसे समन्तपंचक तीर्थ से बहुत दूर हिरण्यवती नदी (सरस्वती की ही एक सहायक धारा) के तट के पास अपना पड़ाव डाला और कौरवो ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग मे वहाँ से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल मैदान मे अपना पड़ाव डाला। दोनों पक्षों ने वहाँ चिकने और समतल प्रदेशों मे जहाँ घास और ईंधन की अधिकता थी, अपनी सेना का पड़ाव डाला। युधिष्ठिर ने देवमंदिरों, तीर्थों और महर्षियों के आश्रमों से बहुत दूर हिरण्यवती नदी के तट के समीप हजारों सैन्य शिविर लगवाये। वहाँ प्रत्येक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, यन्त्र और कई वैद्य और शिल्पी वेतन देकर रखे गये। दुर्योधन ने भी इसी तरह हजारों पड़ाव डाले <ref>महाभारत, उद्योग पर्व,१६९.१</ref> वहाँ केवल दोनों सेनाओ के बीच में युद्ध के लिये ५ योजन का घेरा छोड़ दिया गया था। <ref>महाभारत, उद्योग पर्व,१९५.१</ref> फिर अगले दिन प्रातः दोनों पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे के आमने-सामने आकर खड़ी हो गयीं। *<div style="font-size:125%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:black">'''युद्ध के नियम बनाये जाना''' [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने अपनी सेना का पड़ाव समन्त्र पंचक तीर्थ पास डाला और कौरवों ने उत्तम और समतल स्थान देखकर अपना पड़ाव डाला। उस संग्राम में हाथी, घोड़े और रथों की कोई गणना नहीं थी। पितामह [[भीष्म]] की सलाह पर दोनों दलों ने एकत्र होकर युद्ध के कुछ नियम बनाये। उनके बनाये हुए नियम निम्नलिखित हैं- {| class="wikitable" |- |संख्या |नियम |- |१ |प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा |- |२ |युद्ध समाप्ति के पश्‍चात् छल कपट छोड़कर सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे |- |३ |रथी रथी से, हाथी वाला हाथी वाले से और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा |- |४ |एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा |- |५ |भय से भागते हुए या शरण में आये हुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जायेगा |- |६ |जो वीर निहत्था हो जायेगा उस पर कोई अस्त्र नहीं उठाया जायेगा |- |७ |युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर कोई अस्त्र नहीं उठायेगा |- |} ---- *<div style="font-size:125%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:black">'''युद्ध से पूर्व''' [[चित्र:Viraatrup.jpg|thumb|left|175px|श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाना]] इस प्रकार युद्ध संबंधी नियम बना कर दोनों दल युद्ध के लिये प्रस्तुत हुए। [[पाण्डव|पाण्डवों]] के पास सात [[अक्षौहिणी]] सेना थी और [[कौरव|कौरवों]] के साथ ग्यारह [[अक्षौहिणी]] सेना थी। दोनों पक्ष की सेनाएँ पूर्व तथा पश्‍चिम की ओर मुख करके खड़ी हो गयीं। [[कौरव|कौरवों]] की तरफ से [[भीष्म]] और [[पाण्डव|पाण्डवों]] की तरफ से [[अर्जुन]] सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। [[कुरुक्षेत्र]] के केवल ५ योजन (४० किलोमीटर) के क्षेत्र के घेरे मे दोनों पक्ष की सेनाएँ खड़ी थीं। <ref>महाभारत गीताप्रेस गोरखपुर, भीष्म पर्व, अध्याय १-१०</ref> युद्ध से पूर्व [[अर्जुन]] [[श्रीकृष्ण]] से अपने रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाने को कहते हैं जिससे वह यह देख ले कि युद्ध में उसे किन किन योद्धाओं का सामना करना है। जब [[अर्जुन]] युद्ध क्षेत्र में अपने गुरु [[द्रोण]], पितामह [[भीष्म]] एवं अन्य संबंधियों को देखता है तो वह बहुत शोकग्रस्त एवं उदास हो जाता है। वह [[श्रीकृष्ण]] से कहता है कि जिनके लिये हम ये सारे राजभोग प्राप्त करना चाहते हैं, वे तो यहाँ इस युद्ध क्षेत्र में उसी राजभोग की प्राप्ति के लिये हमारे विपक्ष मे खड़े हैं इन्हें मारकर हम राज प्राप्त करके भी क्या करेगें। अतएव मैं युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा कहकर [[अर्जुन]] अपने धनुष रखकर रथ के पिछले भाग में बैठ जाता है तब [[श्रीकृष्ण]] योग में स्थित होकर उसे [[गीता]] का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि संसार में जो आया है उसको एक ना एक दिन जाना ही पड़ेगा। यह शरीर और संसार दोनों नश्वर हैं परन्तु इस शरीर के अन्दर रहने वाला [[आत्मा]] शरीर के मरने पर भी नहीं मरता। जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नये वस्त्र पहनता है उसी प्रकार [[आत्मा]] भी पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है इसको तुम ऐसे समझो कि यह सब प्रकृति तुम से करवा रहीं है तुम केवल निमित्त मात्र हो। [[श्रीकृष्ण]] [[अर्जुन]] को [[ज्ञान]] [[योग]],[[भक्ति]] [[योग]] और [[कर्म]] [[योग]] तीनों की शिक्षा देते हैं जिसे सुनकर [[अर्जुन]] युद्ध के लिये तैयार हो जाता है। ---- ===युद्ध का विवरण एवं घटनाक्रम=== {{महाभारत युद्ध का विवरण}} ==कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम== '''[[महाभारत]]''' एवं अन्य '''[[पुराण|पौराणिक ग्रंथों]]''' के अनुसार यह युद्ध भारत वंशियों के साथ-साथ अन्य कई महान वंशों तथा वैदिक ज्ञान विज्ञान के पतन का कारण बना। [[महाभारत]] में वर्णित इस युद्ध के कुछ मुख्य परिणाम निम्न लिखित हैं- '''नकारात्मक फल''' *यह युद्ध प्राचीन भारत के इतिहास का सबसे विध्वंसकारी और विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद भारतवर्ष की भूमि लम्बें समय तक वीर क्षत्रियों से विहीन रही। इस युद्ध में लाखों वीर योद्धा मारे गये। *गांधारी के शापवश यादवों के वंश का भी विनाश हो गया। लगभग सभी यादव आपसी युद्ध में मारे गये, जिसके बाद [[श्रीकृष्ण]] ने भी इस धरती से प्रयाण किया। *इस युद्ध के समापन एवं [[श्रीकृष्ण]] के महाप्रयाण के साथ ही वैदिक युग एवं सभ्यता के अंत का आरम्भ हुआ, भारत से वैदिक ज्ञान और विज्ञान का लोप होने लगा। जिसे पौराणिक विद्वानों ने कलियुग के आगमन से जोड़ा। *पूरे भारतवर्ष में सम्पूर्ण जनपदों की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हो गयी, भारत में गरीबी के साथ साथ अज्ञानता फैल गयी। *भविष्य पुराण के अनुसार इस युद्ध के बाद भारत में निरन्तर शतियों तक विदेशियों (मलेच्छों) के आक्रमण होते रहे, कुरुवंश के अंतिम राजा क्षेमक भी मलेच्छों से युद्ध करते हुए मारे गये, जिसके बाद तो यह आर्यावर्त देश सब प्रकार से क्षीण हो गया, कलियुग के बढ़ते प्रभाव को देखकर तथा [[सरस्वती नदी]] के लुप्त हो जाने पर लगभग ८८००० वैदिक ऋषि-मुनि हिमालय चले गये और इस प्रकार भारतवर्ष ऋषि-मुनियों के ज्ञान एवं विज्ञान से भी हीन हो गया। *समस्त ऋषि-मुनियों के चले जाने पर भारत में धर्म का नेतृत्व ब्राह्मण करने लगे, जो पहले केवल यज्ञ करते थे एवं वेदों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों ने वैदिक धर्म को लम्बे समय तक बचाये रखा, परन्तु पौराणिक ग्रंथों में दिये वर्णन के अनुसार कलियुग के प्रभाव से ब्राह्मण वर्ग भी नहीं बच पाया और उनमें से कुछ दूषित एवं भ्रष्ट हो गये, मंत्रों का सही तरीके से उच्चारण करने की विधि भूल जाने के कारण वैदिक मंत्रों का दिव्य प्रभाव भी सीमित रह गया। कुछ भ्रष्ट ब्राह्मणों ने बाद के समाज में कई कुरीतियाँ एवं प्रथाएँ चला दी, जिसके कारण क्षुद्र एवं पिछड़े वर्ग का शोषण होने लगा एवं सतीप्रथा, छुआछूत जैसी प्रथाओं ने जन्म लिया। <ref>यह सूचना [[पुराण|पौराणिक आधार]] एवं [[वैदिक काल]] के बाद समाज में फैली कुरीतियों के आधार पर दी गयी है, इसका उद्देश्य किसी वर्ग को अपमानित करना नहीं है।</ref> परन्तु कई ब्राह्मणों ने कठोर तप एवं नियमों का पालन करते हुए कलियुग के प्रभाव के बावजूद वैदिक सभ्यता को किसी न किसी अंश में जीवित रखा, जिसके कारण आज भी ऋग्वेद एवं अन्य वैदिक ग्रंथ सहस्रों वर्षों बाद लगभग उसी रूप में उपलब्ध हैं। '''सकारात्मक फल''' *इस युद्ध का एक सकारात्मक फल पूरी मानव जाति को [[श्रीकृष्ण]] द्वारा [[अर्जुन]] को सुनायी गयी ज्ञानरूपी वाणी [[श्रीमद्भगवद्गीता]] के रूप में प्राप्त हुआ। *इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर के राज्य-अभिषेक के साथ धरती पर धर्म के राज्य की स्थापना हुई। [[हिन्दू धर्म|हिन्दू परम्पराओं]] एवं [[पुराण|पुराणों]] में दी गयी प्राचीन राजवंशों की सूची के आधार पर तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में दी गयी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर महाभारत काल के बाद का प्राचीन भारतीय राजवंश ऐतिहासिक घटना कालक्रम में निम्नलिखित है- {{भारत का पौराणिक इतिहास}} ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} ==बाहरी कड़ियाँ== *[https://web.archive.org/web/20080516042033/http://www.haryana-online.com/Districts/Kurukshetra.htm कुरुक्षेत्र (शहर)] *[http://ignca.nic.in/nl002503.htm कुरुक्षेत्र युद्ध की काल गणना] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20060217125416/http://ignca.nic.in/nl002503.htm |date=17 फ़रवरी 2006 }}-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र *[http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF ब्रज डिस्कवरी]-यहाँ वैदिक साहित्य एवं स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त करें * [http://www.vedpuran.com/# '''वेद-पुराण'''] - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है। *[http://is1.mum.edu/vedicreserve/puran.htm महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20080408110939/http://is1.mum.edu/vedicreserve/puran.htm |date=8 अप्रैल 2008 }}-यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। *[https://web.archive.org/web/20100928022018/http://tdil.mit.gov.in/vedicjan04/hdefault.html ज्ञानामृतम्] - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक् जानकारी {{महाभारत}} {{हिन्दू देवी देवता}} {{वैदिक साहित्य}} [[श्रेणी:कुरुक्षेत्र]] [[श्रेणी:महाभारत]] [[श्रेणी:महाभारत कथा]] [[श्रेणी:भारत का इतिहास]] [[श्रेणी:वैदिक धर्म]] [[श्रेणी:पौराणिक कथाएँ]] [[श्रेणी:उत्तराधिकार के युद्ध]] 606gnd1zncqeaabjsv640zwbpodml1g कोशकर्म 0 163636 6543770 6534149 2026-04-25T06:47:48Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543770 wikitext text/x-wiki [[शब्दकोश]] निर्माण से सम्बन्धित सकल कार्यों का समुच्चय '''कोशकर्म''', '''कोशकला''' या '''कोशविद्या''' (lexicography) कहलाती है। इस कार्य में प्रवीण लोग '''कोशकार''' (lexicographer) कहलाते हैं। विषयों की दृष्टि से शब्दकोशों के वर्ग या विभाग बनाना कठिन है। अलग-अलग कोशकर अपनी समझ के अनुसार इस प्रकार के विषयविभाग बनाया करते थे। उनका न तो कोई निश्चित क्रम होता था और न हो ही सकता था। इसलिए लोगों को प्रायः सारा कोश कंठस्थ करना पड़ता था। इसी कारण पाश्चात्य देशों में शब्दकोश अक्षरक्रम से बनने लगे। ऐसे कोश रटने नहीं पड़ते थे और आवश्यकतानुसार जब जिसका जी चाहता था, तब वह उसका उपयोग कर सकता था। आजकल प्रायः सभी देशों और सभी भाषाओं में कोश के क्षेत्र मे इसी क्रम को प्रयोग होने लगा है : जो जिज्ञासु की दृष्टि से सबसे अधिक सुभीते का होता हैं। इसीलिए कोश के जितने प्रकार होते हैं, उन सब में प्रायः अक्षरक्रम का ही प्रयोग किया जाता है। == प्रकार == यों तो कोश के अनेक प्रकार होते हैं, पर [[अर्थ]] के विचार से वे दो भागों में बाँटे जा सकते हैं। एक तो वे जिनमें किसी भाषा के शब्दों के अर्थ और विवेचन उसी भाषा में होते है और दूसरे वे जिनमें एक भाषा के शब्दों के अर्थ दूसरी भाषा या भाषाओं मे दिए जाते हैं। विषय के विचार से कोश अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जैसे-गणित कोश, विधिक कोश, वैद्यक कोश, साहित्य कोश आदि। ऐसे कोशों की गिनती प्राय: [[पारिभाषिक शब्दावली|शब्दावलियों]] में होती है, जैसे कृषि शब्दावली, दार्शनिक शब्दावली, भौगोलिक शब्दावली आदि। इनके सिवा कुछ विशिष्ट कवियों, बोलियों आदि के भी अलग अलग कोश होते हैं, जैसे-तुलसी कोश, सूर कोश, अवधी कोश, ब्रजभाषा कोश आदि। किसी विशिष्ट विषय के महत्वपूर्ण ग्रंथ में आए हुए मुख्य प्रतीकों, विषयों या शब्दों के जो कोश या तालिकाएँ होती है, उन्हें क्रमात् प्रतीकानुक्रमणिका, विषयानुक्रमणिका या शब्दानुक्रमणिका कहते हैं। == परिचय == कोशरचना एक कला है। इस कला का ज्ञान वर्तमान युग की परम उन्नत भाषाओं के शब्दकोशों का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करने पर प्राप्त हो सकता है। अच्छे और प्रामाणिक कोशों का संपादन तब तक केवल विद्वता के बल पर नहीं हो सकता, जब तक कोशरचना की कला का भी पूरा पूरा ज्ञान न हो और इस कला का ज्ञान कोशों के जीवनव्यापी अध्ययन से ही हो सकता है। सभी प्रकार के कोश किसी विशेष उद्देश्य तथा किसी विशेष क्षेत्र की आवश्यकता की पूर्ति के लिये ही बनाए जाते हैं। अत: कोशरचना में मुख्यत: इसी उद्देश्य या आवश्यकता का ध्यान रखना पड़ता हैं। दूसरे, इस बात का भी बराबर ध्यान रखना पड़ता है कि उसका सारा कलेवर सभी दृष्टियों से संतुलित रहे; ऐसा न हो कि कोई अंग तो आवश्यकता या औचित्य से अधिक बढ़ जाए और कोई उसकी तुलना में क्षीणकाय या हीन जान पड़े। शब्दों का विवेचन भी और उस विवेचन के अंगों का क्रम भी सदा एक सा रहना चाहिए। शब्दों की भी जातियाँ या वर्ग होते हैं, अत: एक जाति या वर्ग के सब शब्दों का सारा विवेचन एक सा होना चाहिए। यदि प्रामाणिक ग्रंथों अथवा लेखकों के उदाहरण लिए जाए, तो उनका उतना ही अंश लेना चाहिए, जितने में आशय स्पष्ट हो सके और जिज्ञासु का समाधान हो जाए। अच्छे कोशों में सभी प्रकार के क्षेत्रों और विषयों के पारिभाषिक शब्द भी रहते हैं। इसलिये संपादक का अधिक से अधिक विषयों का सामान्य ज्ञान या बोध होना चाहिए। आवश्यकता होने पर किसी अनजाने या नए विषय के अच्छे और प्रामाणिक ग्रंथ से या उसके अच्छे ज्ञाता से भी सहायता लेना आवयश्क होता है। कोशरचना के कार्य में दृष्टि बहुत व्यापक रखना चाहिए और वृत्ति मधुकारी होनी चाहिए। दृष्टि इतनी पैनी और सूक्ष्म होनी चाहिए जो सहज में नीर क्षीर का विवेक कर सकें और पुरानी त्रुटियों, दोषों, भूलों आदि को ढूँढकर सहज में उनका संशोधन तथा सुधार कर सके। कोशकार में पक्षपात या रोगद्वेष नाम को भी नहीं रहना चाहिए। उसका एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए भाषा तथा साहित्य की सेवा। कोशों में प्रधानता अर्थों और विवेचनों की ही होती है, अत: उनमें कहीं व्याप्ति या अतिव्याप्ति नहीं रहनी चाहिए। सभी बातें नपी तुली, मर्यादित और यथासाध्य संक्षिप्त होनी चाहिए। कोश में अधिक से अधिक और ठोस जानकारी कम से कम शब्दों में प्रस्तुत करके ही जानी चाहिए। फालतू या भरती की बातों के लिये कोश में स्थान नहीं होता। शब्दों के कुछ रूप तो मानक होते हैं और बहुत से रूप स्थानिक या प्रांतीय होते हैं। जिन स्थानिक या प्रांतीय शब्दों के मानक रूप प्राप्त हों, उनका सारा विवेचन उन्हीं मानक शब्दों के अंतर्गत रहना चाहिए और उनके स्थानिक या प्रांतीय रूपों के आगे उनके मानक रूपों का अभिदेश मात्र होना चाहिए। इससे बहुत बड़ा लाभ यह होता है कि अन्य भाषा-भाषियों को सहज में शब्दों के मानक रूप का पता चल जाता है और भाषा का मानक रूप स्थिर होने में सहायता मिलती है-अपरिचितों के द्वारा भाषा का रूप सहसा बिगड़ने नहीं पाता। यही बात ऐसे संस्कृत शब्दों के संबंध में भी होनी चाहिए जिसके बहुत से पर्याय हों। जैसे कमल, नदी, पर्वत, समुद्र आदि। शब्दों के आगे उनके पर्याय देते समय भी इस बात का ध्यान रहना चाहिए कि पर्याय वही दिए जाए जो मूल शब्द का ठीक आशय या माप बतानेवाले हों। जिन पर्यायों के कारण कुछ भी भ्रम उत्पन्न हो सकता हो, उन पर्यायों का ऐसे प्रसंगों में परित्याग करना ही श्रेयस्कर होगा। कोशकारों के सामने इधर हाल में वेब्स्टर की न्यू वर्ल्ड डिक्शनरी ने एक नया आदर्श रखा है जो बहुत ही उपयोगी तथा उपादेय होने के कारण शब्दकोशों के लिये विशेष अनुकरणीय है। उसमें अनेक शब्दों के अंतर्गत उनसे मिलते जुलते पर्यायों के सूक्ष्म अंतर भी दिखलाए गए हैं, यथा - फीयर (Fear) के अंतर्गत ड्रेड (Dread), फ्राइट (Fright), एलार्म (Alarm), डिस्मे (Dismay), टेरर (Terror) और पैनिक (Panic) के सूक्ष्म अंतर भी बतला दिए गए हैं। ऐसा यह सोच का किया गया है कि कोशकार का काम शब्दों के अर्थ बतला देने से ही समाप्त नहीं हो जाता, वरन् इससे भी आगे बढ़कर उसका काम लोगों को शब्दों के ठीक प्रयोग बतलाना होता है। हमारे यहाँ ऐसे सैकड़ों हजारों शब्द मिलेंगे, जिनके पारस्परिक सूक्ष्म अंतर बतलाए जा सकते हैं और इस प्रकार जिज्ञासुओं को शब्दों पर नए ढंग से विचार करने का अभ्यास कराया जा सकता है। हाल के अच्छे और बड़े अँगरेजी कोशों में एक और नई तथा उपयोगी परिपाटी चली है जो भारतीय भाषाओं के कोशों के लिये विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। प्राय: सभी भाषाओं में बहुत से ऐसे यौगिक शब्द होते हैं जो उपसर्ग लगाकर बना लिए जाते हैं। कनिष्ठ से अकनिष्ठ, करणीय से अकरणीय, अपेक्षित से अनपेक्षित, आवश्यक से अनावश्यक, मंत्री से उपमंत्री, समिति से उपसमिति, पालन से परिपालन, भ्रमण से परिभ्रमण, कर्म से प्रतिकर्म, विधान से प्रतिविधान आदि। उपसर्गों के योग से बननेवाले ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक होती है। ऐसे शब्दों दो वर्गों में बँटे होते हैं अथवा बाँटे जा सकते हैं। एक तो ऐसे शब्द जिनके शब्द पूर्व पद तथा उत्तर पद मिल कर भी किसी नए या विशिष्ट अर्थ से युक्त नहीं होते और इसी लिये साधारण शब्दों के अंतर्गत रहते हैं। ऐसे शब्दों और उनके अर्थों से कोश का कलेवर बहुत बढ़ जाता है। इस प्रकार के व्यर्थ विस्तार से बचने के लिये वेब्स्टर के नए कोशों में यह नई पद्धति अपनाई गई है कि उन्हें स्वतंत्र शब्द नहीं मानते और इसी लिये उनके अर्थ भी नहीं लिए गए हैं। पृष्ठ के अंत में एक रेखा के नीचे ऐसे शब्दों की सूची मात्र दे दी गई है, यथा-अन्-डिज़ायर्ड, अन्-डिस्टर्ब्ड, अन्-फ्री, अन्-हर्ट, अन्-इनवाइटेड आदि। हाँ, इनके विपरीत दूसरे वर्ग के कुछ ऐसे शब्द अवश्य होते हैं जिनमें उपसर्गों के योग से कुछ नए अर्थ निकलते हैं। जैसे विशेषण रूप में अकच का रूप बिना बालोंवाला तो है ही, पर संज्ञा रूप में वह केतु ग्रह का भी एक नाम है। अनागार (विशेषण) का अर्थ बिना घर-बारवाला तो है ही, पर संज्ञा रूप में वह संन्यासी का भी वाचक है। इसलिये ऐसे शब्द लेना आवश्यक होता है। जिन शब्दों के अर्थ पूर्वपद और उत्तरपद के योग से स्वत: नष्ट हो जाते हों, उन्हें कोशों में अर्थसहित लेना व्यर्थ ही समझा जाने लगा है। अत: पृष्ठांत में ऐसे शब्दों की सूची मात्र दे देना यथेष्ट होगा। हाँ, जिन यौगिक शब्दों में दोनों पदों के योग से कोई नया और विशेष अर्थ निकलता हो, उन्हें यथास्थान अर्थसहित लेना तो आवश्यक है ही। [[भारत]] में पुराने [[संस्कृत]] कोशों की पद्धति यह रही है कि अति, प्रति, सह आदि के योग से बननेवाले शब्द अपने पूर्व [[पद]]वाले शब्द के अंतर्गत एक ही शीर्षक में एक साथ दे दिए जाते है। हिंदी के कुछ कोशों ने भी इस प्रथा का अनुकरण किया है। यद्यपि [[संस्कृत व्याकरण]] की दृष्टि से यह पद्धति युक्तिसंगत होती है, फिर भी संस्कृत कोशों तक में इनका पूरा पूरा पालन होता हुआ नहीं दिखाई देता। इसमें स्थान की कुछ बचत अवश्य होती है, पर असाधारण पाठकों के लिये शब्द ढूँढना बहुत कठिन हो जाता है। कभी कभी तो ऐसे लोगों के लिये भी इस पद्धति से शब्द ढूँढना कठिन होता है जो इसके नियमों और सिद्धांतों से बहुत कुछ परिचित होते हैं। प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अलग अलग अर्थों के विचार से [[अव्यय]], [[क्रियाविशेषण]], [[विशेषण]], [[प्रत्यय]], संज्ञा आदि भी होते हैं और अलग अलग मूलों से भी व्युत्पन्न होते हें, यथा हिन्दी का 'आन' शब्द [[संज्ञा]] भी है, [[विशेषण]] भी और [[प्रत्यय]] भी। अपने संज्ञा रूप में भी वह अपने कई अर्थों में कुछ अलग अलग मूलों से व्युत्पन्न है। ऐसे शब्द आधुनिक और श्रेष्ठ अँगरेजी कोशों में अलग और स्वतंत्र शब्द माने जाते हैं और उनके अलग अलग शीर्षक रखकर उनका विवेचन किया जाता है, यथा-अँगरेजी में वाइज़ (Wise) विशेषण भी है, संज्ञा भी और प्रत्यय भी और तीनों रूपों में उसके शीर्षक अलग अलग रखे गए हैं। यदि भारतीय भाषाओं के कोशों में भी इनका अनुकरण किया जाय तो कई दृष्टियों से बहुत अच्छा होगा। == इन्हें भी देखें == * [[शब्दकोश]] * [[पारिभाषिक शब्दावली]] * [[शब्दकोशों का इतिहास]] == बाहरी कड़ियाँ == * [http://www.pravakta.com/kosh-parampara-singhavlokan/ कोश परम्परा : सिंहावलोकन] * [http://vasantbhatt.blogspot.com/2009/06/blog-post.html भारत में कोश-विज्ञान की भोर कब भई?] *[https://www.sketchengine.eu/wp-content/uploads/102.pdf The end of lex icography? Can ChatGPT outperform current tools for post-editing lexicography?] *[https://campus.dariah.eu/resources/hosted/automating-the-process-of-dictionary-creation Automating the Process of Dictionary Creation] * [http://tdil.mit.gov.in/april-jan-2008.htm हिंदी कोश निर्माण का विकास और चिंताएँ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100113065025/http://tdil.mit.gov.in/april-jan-2008.htm |date=13 जनवरी 2010 }} * [http://prayaslt.blogspot.com/2010/01/blog-post_7812.html कोशकारिता के सिद्धान्त] (प्रयास) * [http://www.srijangatha.com/Vyakaran-11Sep_2k10 शब्दकोश-रचना, शब्दकोश-कला और शब्दकोश-सिद्धांत] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111013201901/http://srijangatha.com/Vyakaran-11Sep_2k10 |date=13 अक्तूबर 2011 }} (डॉ॰ काजल बाजपेयी) * [http://arvindlexicon.com/3985/indian-tradition-of-dictionary-making/ Indian tradition of dictionary-making] (Arvind Lexicon) * [http://memorylines.wordpress.com/2010/12/23/lexicography-the-indian-method-1/ Lexicography, the Indian Method (1)] * [http://ijl.oxfordjournals.org/ ''International Journal of Lexicography''] ''समितियाँ (Societies)'' * [http://www.asb.dk/research/centresteams/centres/lexc.aspx Centre for Lexicography] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20060821195227/http://www.asb.dk/research/centresteams/centres/lexc.aspx |date=21 अगस्त 2006 }} [http://www.asb.dk/research/centresteams/centres/lexc.aspx EN version] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20060821195227/http://www.asb.dk/research/centresteams/centres/lexc.aspx |date=21 अगस्त 2006 }} * [http://www.dictionarysociety.com/ Dictionary Society of North America] * [http://www.euralex.org/ Euralex - European Association for Lexicography] * [http://afrilex.africanlanguages.com/ Afrilex - African Association for Lexicography] * [http://www.australex.org/ Australex - Australasian Association for Lexicography] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090912115508/http://www.australex.org/ |date=12 सितंबर 2009 }} * [http://www.nordisk-sprakrad.no/nfl.htm Nordic Federation for Lexicography] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20031204163238/http://www.nordisk-sprakrad.no/nfl.htm |date=4 दिसंबर 2003 }} * [http://asialex.org/ Asialex - Asian Association for Lexicography] [[श्रेणी:शब्दकोश]] [[श्रेणी:कोशविद्या|*]] 4smbz4ovb7r0xd7eoarp9oubuxf4idw कैलाश मन्दिर, एलोरा 0 164088 6543743 6519469 2026-04-25T03:52:26Z अनुनाद सिंह 1634 6543743 wikitext text/x-wiki {{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है जिसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] jrsx04kzecuio5nc1nwg5wi9htxb5oo 6543744 6543743 2026-04-25T03:54:03Z अनुनाद सिंह 1634 6543744 wikitext text/x-wiki {{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] oj58z430rfdkygrnezpjrxrlmc7emf6 6543746 6543744 2026-04-25T04:02:04Z अनुनाद सिंह 1634 6543746 wikitext text/x-wiki {{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] r70cshpo3wpjhg9w01gyq6ivcnfiwup 6543748 6543746 2026-04-25T04:19:26Z अनुनाद सिंह 1634 /* आधुनिक खोज */ 6543748 wikitext text/x-wiki {{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है। * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल एक शिला से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है। * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7000 श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया। * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] cm2rhr9rug8431uqoyeqc2ddue34zup 6543749 6543748 2026-04-25T04:25:34Z अनुनाद सिंह 1634 /* कैलास मन्दिर की विशेषताएँ */ 6543749 wikitext text/x-wiki {{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है। * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल एक शिला से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है। * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7000 श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया। * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। === कैलाश मंदिर की शिल्पकला === कैलाश मंदिर की भित्ति पर अद्भुत शिल्पकारी की गई है। यहां [[रामायण]], [[महाभारत]] और [[पुराण|पुराणों]] की कथाओं को पत्थर पर उकेरा गया है।<ref>[https://www.bharatmata.online/index.php/blog-details/blogs/kailash-temple-ellora-complete-guide कैलाश मंदिर, एलोरा – इतिहास, रहस्य और अद्भुत वास्तुकला]</ref> ; प्रमुख मूर्तियां: 1. '''रावणानुग्रह मूर्ति''' : सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भगवान शिव और पार्वती शांति से बैठे हैं। यह भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक मानी जाती है। 2. '''नटराज''' : शिव के विभिन्न रूपों में नटराज की मूर्तियां मंदिर के हर हिस्से में मिलती हैं। 3. '''गजलक्ष्मी''' : मुख्य द्वार में कमल पर बैठी गजलक्ष्मी की सुंदर मूर्ति है, जिसमें चार हाथी उन पर जल की धारा डाल रहे हैं। 4. '''अर्धनारीश्वर''' : शिव और पार्वती के संयुक्त रूप की मूर्ति। 5. '''महाभारत और रामायण के दृश्य''' : मंदिर के आधार में इन महाकाव्यों के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। 6. विष्णु के दशावतार: दक्षिण-पूर्वी गैलरी में विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाले 10 पैनल हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] on9zi6z1bliawhdqcxhyoijtdqpc08z 6543750 6543749 2026-04-25T04:33:01Z अनुनाद सिंह 1634 6543750 wikitext text/x-wiki {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है।<ref>[https://www.tripoto.com/trip/tripoto-5fce66aaa9bcd किसी अजूबे से कम नही है एल्लोरा का कैलाश मंदिर, विशाल पत्थर को काटकर बनाया गया था ये मंदिर]</ref> * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल एक शिला से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है। * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7000 श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया। * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। === कैलाश मंदिर की शिल्पकला === कैलाश मंदिर की भित्ति पर अद्भुत शिल्पकारी की गई है। यहां [[रामायण]], [[महाभारत]] और [[पुराण|पुराणों]] की कथाओं को पत्थर पर उकेरा गया है।<ref>[https://www.bharatmata.online/index.php/blog-details/blogs/kailash-temple-ellora-complete-guide कैलाश मंदिर, एलोरा – इतिहास, रहस्य और अद्भुत वास्तुकला]</ref> ; प्रमुख मूर्तियां: 1. '''रावणानुग्रह मूर्ति''' : सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भगवान शिव और पार्वती शांति से बैठे हैं। यह भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक मानी जाती है। 2. '''नटराज''' : शिव के विभिन्न रूपों में नटराज की मूर्तियां मंदिर के हर हिस्से में मिलती हैं। 3. '''गजलक्ष्मी''' : मुख्य द्वार में कमल पर बैठी गजलक्ष्मी की सुंदर मूर्ति है, जिसमें चार हाथी उन पर जल की धारा डाल रहे हैं। 4. '''अर्धनारीश्वर''' : शिव और पार्वती के संयुक्त रूप की मूर्ति। 5. '''महाभारत और रामायण के दृश्य''' : मंदिर के आधार में इन महाकाव्यों के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। 6. विष्णु के दशावतार: दक्षिण-पूर्वी गैलरी में विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाले 10 पैनल हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] teaikrwohciwqs1ca5sa3bec1yq61wu 6543751 6543750 2026-04-25T04:44:07Z अनुनाद सिंह 1634 6543751 wikitext text/x-wiki {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है।<ref>[https://www.tripoto.com/trip/tripoto-5fce66aaa9bcd किसी आश्चर्य से कम नही है एल्लोरा का कैलाश मंदिर]</ref> * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल '''एक शिला''' से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है।<ref>[https://ndtv.in/faith/kailasha-temple-ellora-caves-significance-8716417 विश्व का एकमात्र शिव मंदिर जो बना है केवल एक पत्थर से]</ref> * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7 हजार श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया।<ref>[https://www.hindi.holidayrider.com/kailash-temple-ellora-caves-in-hindi/ कैलाश मंदिर औरंगाबाद महाराष्ट्र के दर्शन और पर्यटन स्थल की जानकारी]</ref> * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। === कैलाश मंदिर की शिल्पकला === कैलाश मंदिर की भित्ति पर अद्भुत शिल्पकारी की गई है। यहां [[रामायण]], [[महाभारत]] और [[पुराण|पुराणों]] की कथाओं को पत्थर पर उकेरा गया है।<ref>[https://www.bharatmata.online/index.php/blog-details/blogs/kailash-temple-ellora-complete-guide एलोरा का कैलाश मंदिर – इतिहास, रहस्य और अद्भुत वास्तुकला]</ref> ; प्रमुख मूर्तियां: 1. '''रावणानुग्रह मूर्ति''' : सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भगवान शिव और पार्वती शांति से बैठे हैं। यह भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक मानी जाती है। 2. '''नटराज''' : शिव के विभिन्न रूपों में नटराज की मूर्तियां मंदिर के हर हिस्से में मिलती हैं। 3. '''गजलक्ष्मी''' : मुख्य द्वार में कमल पर बैठी गजलक्ष्मी की सुंदर मूर्ति है, जिसमें चार हाथी उन पर जल की धारा डाल रहे हैं। 4. '''अर्धनारीश्वर''' : शिव और पार्वती के संयुक्त रूप की मूर्ति। 5. '''महाभारत और रामायण के दृश्य''' : मंदिर के आधार में इन महाकाव्यों के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। 6. विष्णु के दशावतार: दक्षिण-पूर्वी गैलरी में विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाले 10 पैनल हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] l853errebpzgduqzvn0vyoddxfvb3kh 6543752 6543751 2026-04-25T04:46:01Z अनुनाद सिंह 1634 /* छवि-दीर्घा */ 6543752 wikitext text/x-wiki {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है।<ref>[https://www.tripoto.com/trip/tripoto-5fce66aaa9bcd किसी आश्चर्य से कम नही है एल्लोरा का कैलाश मंदिर]</ref> * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल '''एक शिला''' से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है।<ref>[https://ndtv.in/faith/kailasha-temple-ellora-caves-significance-8716417 विश्व का एकमात्र शिव मंदिर जो बना है केवल एक पत्थर से]</ref> * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7 हजार श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया।<ref>[https://www.hindi.holidayrider.com/kailash-temple-ellora-caves-in-hindi/ कैलाश मंदिर औरंगाबाद महाराष्ट्र के दर्शन और पर्यटन स्थल की जानकारी]</ref> * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। === कैलाश मंदिर की शिल्पकला === कैलाश मंदिर की भित्ति पर अद्भुत शिल्पकारी की गई है। यहां [[रामायण]], [[महाभारत]] और [[पुराण|पुराणों]] की कथाओं को पत्थर पर उकेरा गया है।<ref>[https://www.bharatmata.online/index.php/blog-details/blogs/kailash-temple-ellora-complete-guide एलोरा का कैलाश मंदिर – इतिहास, रहस्य और अद्भुत वास्तुकला]</ref> ; प्रमुख मूर्तियां: 1. '''रावणानुग्रह मूर्ति''' : सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भगवान शिव और पार्वती शांति से बैठे हैं। यह भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक मानी जाती है। 2. '''नटराज''' : शिव के विभिन्न रूपों में नटराज की मूर्तियां मंदिर के हर हिस्से में मिलती हैं। 3. '''गजलक्ष्मी''' : मुख्य द्वार में कमल पर बैठी गजलक्ष्मी की सुंदर मूर्ति है, जिसमें चार हाथी उन पर जल की धारा डाल रहे हैं। 4. '''अर्धनारीश्वर''' : शिव और पार्वती के संयुक्त रूप की मूर्ति। 5. '''महाभारत और रामायण के दृश्य''' : मंदिर के आधार में इन महाकाव्यों के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। 6. विष्णु के दशावतार: दक्षिण-पूर्वी गैलरी में विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाले 10 पैनल हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg|कैलास मन्दिर का विहंगम दृष्य Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg|शिव लिंग Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] j70mftl9hvssmgkoj1elteyfboc4qns 6543753 6543752 2026-04-25T04:48:52Z अनुनाद सिंह 1634 /* इन्हें भी देखें */ 6543753 wikitext text/x-wiki {{Infobox Mandir | name = कैलास मन्दिर | image = Ellora (56).jpg | alt = | caption = एलोरा का कैलास मंदिर [[शैल]] (चट्टान) को काटकर बनाया गया था। | map_type = महाराष्ट्र | coordinates = {{coord|20|01|26|N|75|10|45|E|type:landmark_region:LK|display=inline,title}} | country = भारत | state = [[महाराष्ट्र]] | district = [[छत्रपति सम्भाजी नगर]] | location = [[एलोरा गुफाएँ]] | elevation_m = | deity = [[शिव]] | festivals= | architecture = | year_completed = ८वीं शताब्दी | creator = [[कृष्ण प्रथम]] (756–773 CE), [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूट शासक]] |height_max=32.6 मीटर (107 फुट) }} '''कैलास मंदिर''' [[महाराष्ट्र]] के [[छत्रपती संभाजीनगर]] जिले के [[एलोरा गुफाएं|एलोरा]] में स्थित मन्दिरों की शृंखला में से सबसे बड़ा मन्दिर है। यह मन्दिर शैल (चट्टानों) को काटकर बनाया गया है । इसे [[मालखेड]] स्थित [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के नरेश [[कृष्ण (प्रथम)]] (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु है और भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है। [[चित्र:Kailash-pillar.jpg|right|thumb|300px|कैलास मन्दिर में पत्थर को काटकर बना सुन्दर स्तम्भ]] अन्य मन्दिरों की तरह भीतर से कोरा है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे [[द्रविड़ शैली]] के [[मंदिर]] का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में [[नन्दी]] है और उसके दोनों ओर विशालकाय [[हाथी]] तथा स्तम्भ बने हैं। == आधुनिक युग में पुनः खोज == वर्ष 1819 की बात है। जान स्मिथ नाम का एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एक दिन शिकार के लिए निकला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि की पहाड़ियों पर मौजूद जंगल में उसे एक नदी दिखाई दी जिसे स्थानीय लोग 'वाघोरा' कहते थे। इस नदी के किनारे घूमते हुए स्मिथ शिकार की तलाश कर रहा था। इसी तारतम्य में नदी से ऊपर पहाड़ियों पर उसे एक गुफा का मुहाना दिखाई दिया। गुफा में बाघ हो सकता है, ये सोचकर स्मिथ गुफा के अंदर गया। प्रकाश जलाकर जब उसने गुफा के अंदर देखा तो दृष्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसे 'अजंता की गुफाएं' मिल गयीं थीं। स्मिथ ने इन गुफाओं की खोज नहीं की लेकिन वो पहला यूरोपियन शख्स था जो इन गुफाओं तक पहुंचा। == कैलास मन्दिर की विशेषताएँ == * कैलाश मंदिर ८वीं शताब्दी में बना ऐसा वास्तुशिल्प है जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए भी एक बड़ा रहस्य है।<ref>[https://www.tripoto.com/trip/tripoto-5fce66aaa9bcd किसी आश्चर्य से कम नही है एल्लोरा का कैलाश मंदिर]</ref> * यह शिव जी का दो मंजिल वाला मंदिर है जो पर्वत की एक ही ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। * विश्व भर में केवल '''एक शिला''' से निर्मित सबसे बड़ी मूर्ति है।<ref>[https://ndtv.in/faith/kailasha-temple-ellora-caves-significance-8716417 विश्व का एकमात्र शिव मंदिर जो बना है केवल एक पत्थर से]</ref> * इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 150 वर्ष लगे और लगभग 7 हजार श्रमिकों ने लगातार इस पर काम किया।<ref>[https://www.hindi.holidayrider.com/kailash-temple-ellora-caves-in-hindi/ कैलाश मंदिर औरंगाबाद महाराष्ट्र के दर्शन और पर्यटन स्थल की जानकारी]</ref> * यह मन्दिर [[कैलाश पर्वत]] से साम्य रखता है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। * ''' निर्माण की अनोखी विधि''' : सामान्यतः किसी मंदिर या भवन को बनाते समय पत्थरों के टुकड़ों को एक के ऊपर एक जमाते हुए बनाया जाता है, लेकिन कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जिस प्रकार कोई मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया। * एलोरा की गुफाओं में केवल एक गुफा 12 मंजिली है, जिसे ‘कैलाश मंदिर’ कहा जाता है। * इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की प्रौद्योगिकी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है। * पुरातत्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि इस मंदिर को तराशने के लिए तीन प्रकार की छेनी का उपयोग किया गया था (जैसा कि उनके द्वारा इन पत्थर की दीवारों पर छेनी के निशान से देखा गया था)। ऐसा माना जाता है कि मुख्य वास्तुकार द्वारा सामने की ओर से नक्काशी करने में दूर की कठिनाइयों के कारण इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर लंबवत रूप से किया गया है, जो कि जमीनी योजना के अनुसार निर्माण का अनुसरण करते हैं। * आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी। उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? * सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है । * अनुमानित अखंड संरचना का निर्माण करने के लिए अनुमानतः '''4 लाख टन''' चट्टानों को 20 वर्ष की लंबी अवधि में हटाया गया। === कैलाश मंदिर की शिल्पकला === कैलाश मंदिर की भित्ति पर अद्भुत शिल्पकारी की गई है। यहां [[रामायण]], [[महाभारत]] और [[पुराण|पुराणों]] की कथाओं को पत्थर पर उकेरा गया है।<ref>[https://www.bharatmata.online/index.php/blog-details/blogs/kailash-temple-ellora-complete-guide एलोरा का कैलाश मंदिर – इतिहास, रहस्य और अद्भुत वास्तुकला]</ref> ; प्रमुख मूर्तियां: 1. '''रावणानुग्रह मूर्ति''' : सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भगवान शिव और पार्वती शांति से बैठे हैं। यह भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक मानी जाती है। 2. '''नटराज''' : शिव के विभिन्न रूपों में नटराज की मूर्तियां मंदिर के हर हिस्से में मिलती हैं। 3. '''गजलक्ष्मी''' : मुख्य द्वार में कमल पर बैठी गजलक्ष्मी की सुंदर मूर्ति है, जिसमें चार हाथी उन पर जल की धारा डाल रहे हैं। 4. '''अर्धनारीश्वर''' : शिव और पार्वती के संयुक्त रूप की मूर्ति। 5. '''महाभारत और रामायण के दृश्य''' : मंदिर के आधार में इन महाकाव्यों के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। 6. विष्णु के दशावतार: दक्षिण-पूर्वी गैलरी में विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाले 10 पैनल हैं। ==छवि-दीर्घा== <gallery perrow=3> Image:Ellora Caves, India, Kailash Temple.jpg Image:Kailash-elephant.jpg Image:Ellora Kailash temple overview.jpg|कैलास मन्दिर का विहंगम दृष्य Image:Ellora Kailash temple Shiva panel.jpg Image:Kailash-shiva-linga.jpg|शिव लिंग Image:Kailash Temple (Cave 16) in Ellora Caves.jpg Image:Ellora Kailash temple Nataraj painted panel.jpg|नटराज शिव </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम]] *[[बृहदीश्वर मन्दिर]] - जिसके निर्माण में आश्चर्यजनक [[यांत्रिकी]] का उपयोग करना पड़ा होगा। [[श्रेणी:महाराष्ट्र में हिन्दू मंदिर|कैलास]] [[श्रेणी:धार्मिक वास्तुकला|कैलास]] [[श्रेणी:भारत में पर्यटन आकर्षण|कैलास]] 0h96xhzj7bzigelvsa2lrbzv9avjcvb मुंबई इंडियंस 0 187551 6543827 6432367 2026-04-25T11:05:38Z ~2026-25367-43 921798 Vartman me captain hardik pandya hai 6543827 wikitext text/x-wiki {{Infobox cricket team | name = मुंबई इंडियंस | alt_name = | image = MumbaiIndians.png | alt = | captain =[[हार्दिक पांड्या]]<ref>{{cite news |title=मुंबई इंडियंस ने हार्दिक पांड्या को सौंपी कप्तानी |url=https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/mumbai-indians-announced-hardik-pandya-captain-for-ipl-2024-in-place-of-rohit-sharma-cricket-news-ipl-2024/2012699 |access-date=15 December 2023 |work=[[Zee News]] |date=15 December 2023|language=hi}}</ref><ref>{{cite news |title=Hardik Pandya replaces Rohit Sharma as Mumbai Indians captain |url=https://www.cricbuzz.com/cricket-news/128814/hardik-pandya-replaces-rohit-sharma-as-mumbai-indians-captain |access-date=15 December 2023 |work=[[Cricbuzz]] |date=15 December 2023|language=en}}</ref> | coach = [[मार्क बाउचर]] | city = [[मुम्बई|मुंबई]], [[महाराष्ट्र]], भारत | colours = [[File:Mumbai Indians colours.svg|20px|alt=MI|link=Mumbai Indians]] Blue | owner = [[मुकेश अंबानी]], [[नीता अंबानी]] ([[रिलायन्स इण्डस्ट्रीज|रिलायंस इंडस्ट्रीज]]) | founded = {{Start date and age|2008}} | dissolved = <!-- or | last_match = --> | ground = [[वानखेड़े स्टेडियम]] <br> (क्षमता: 33,108) | ground2 = [[ब्रेबोर्न स्टेडियम]] (क्षमता: २५,०००) | ipl_wins = '''5''' (2013, 2015, 2017,2019,2020) | clt20_wins = '''2''' (2011, 2013) | t_pattern_la = | t_pattern_b = _goldshoulders | t_pattern_ra = | t_pattern_pants = | t_body = 004BA0 | t_pants = 004BA0 | t_rightarm = 004BA0 | t_leftarm = 004BA0 | website = {{URL|www.mumbaiindians.com/hindi/}} | current = 2020 में मुंबई इंडियंस }} '''मुंबई इंडियंस''' (एमआई के रूप में संक्षिप्त) [[इंडियन प्रीमियर लीग]] में एक क्रिकेट फ्रैंचाइज़ी है जो मुंबई, महाराष्ट्र की राजधानी पर आधारित है। 2008 में स्थापित, मुंबई इंडियंस [[इंडियन प्रीमियर लीग]] (आईपीएल) में खेलती हैं। टीम का मालिकाना हक भारत की सबसे बड़ी कंपनी [[रिलायन्स इण्डस्ट्रीज|रिलायंस इंडस्ट्रीज]] के पास है, जो अपनी 100% सहायक कंपन इंडियाविन स्पोर्ट्स के माध्यम से है। अपनी स्थापना के बाद से, टीम ने मुंबई में 33,108 क्षमता वाले वानखेड़े स्टेडियम में अपने घरेलू मैच खेले हैं। [https://www.aajkamatcht20.com/2023/12/ipl-ka-baap-kon-hai.html?m=1 मुंबई इंडियंस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20231225085219/https://www.aajkamatcht20.com/2023/12/ipl-ka-baap-kon-hai.html?m=1 |date=25 दिसंबर 2023 }} का ब्रांड मूल्य $106 मिलियन है, जिससे वह लगातार दूसरे वर्ष आईपीएल की सबसे मूल्यवान फ्रेंचाइज़ी बनीं और मुंबई आईपीएल की पहली फ्रेंचाइज़ी है जिनसे $100 मिलियन का आंकड़ा पार किया है।<ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/industry/services/advertising/brand-ipl-gets-stronger-valuation-soars-to-5-3-billion/articleshow/60199993.cms?from=mdr%7Ctitle=Brand%20IPL%20gets%20stronger&from=mdr|title=Brand IPL gets stronger, valuation soars to $5.3 billion|last=Laghate|first=Gaurav|date=2017-08-24|work=The Economic Times|access-date=2018-04-11|archive-url=https://web.archive.org/web/20180412013328/https://economictimes.indiatimes.com/industry/services/advertising/brand-ipl-gets-stronger-valuation-soars-to-5-3-billion/articleshow/60199993.cms?from=mdr%7Ctitle=Brand%20IPL%20gets%20stronger&from=mdr|archive-date=12 अप्रैल 2018|url-status=live}}</ref> [https://www.sportsshots.in/2024/03/mi%20ka-baap-kaun-hai.html?m=1 मुंबई इंडियंस] आईपीएल में सबसे सफल टीम है। उन्होंने फाइनल में [[रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर|रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर]] को 31 रन से हराकर 2011 में अपना पहला चैंपियंस लीग ट्वेंटी20 जीता। टीम ने 2013 में अपना पहला आईपीएल खिताब जीतकर दोहरी जीत हासिल की, फाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स को 23 रन से हरा दिया, और फिर उसी साल, अपने दूसरे चैंपियंस लीग टी20 खिताब जीतने के लिए राजस्थान रॉयल्स को 33 रन से हराया।<ref name="toi-clt2013win">{{cite web|title=Mumbai Indians beat Rajasthan Royals to win second CLT20 title|url=http://timesofindia.indiatimes.com/sports/cricket/series-tournament/clt20/top-stories/Mumbai-Indians-beat-Rajasthan-Royals-to-win-second-CLT20-title/articleshow/23608350.cms|work=Times of India|accessdate=6 October 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131006185924/http://timesofindia.indiatimes.com/sports/cricket/series-tournament/clt20/top-stories/Mumbai-Indians-beat-Rajasthan-Royals-to-win-second-CLT20-title/articleshow/23608350.cms|archive-date=6 अक्तूबर 2013|url-status=live}}</ref><ref>{{cite news|url=http://www.wisdenindia.com/match-report/rampant-mumbai-seal-title-style/63885|title=Rampant Mumbai seal title in style|publisher=Wisden India|date=May 26, 2013|access-date=15 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20130619180856/http://www.wisdenindia.com/match-report/rampant-mumbai-seal-title-style/63885|archive-date=19 जून 2013|url-status=dead}}</ref> उन्होंने 24 मई 2015 को अपना दूसरा आईपीएल खिताब जीता और फाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स को 41 रन से हराकर एक से अधिक आईपीएल खिताब जीतने वाली तीसरी टीम बन गई। 21 मई 2017 को, उन्होंने रोमांचक फाइनल में राइजिंग पुणे सुपरजायंट को 1 रन से हराकर अपना तीसरा आईपीएल खिताब जीता, इस प्रकार तीन आईपीएल खिताब जीतने वाली पहली टीम बन गई।<ref>{{cite web|title=Mumbai Indians crowned IPL 2017 champions|url=http://www.thegenxtimes.com/sports/mumbai-indians-crowned-ipl-2017-champions/|work=The GenX Times|accessdate=21 May 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170814224623/http://www.thegenxtimes.com/sports/mumbai-indians-crowned-ipl-2017-champions/|archive-date=14 अगस्त 2017|url-status=dead}}</ref> 2017 में टूर्नामेंट खेलते हुए, उन्होंने अपना 100 वां टी20 मैच जीता, ऐसा करने वाली पहली टीम बन गई।<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/sports/cricket/story/mumbai-indians-becomes-most-successful-team-in-ipl-history-447053-2017-05-14|title=IPL के इतिहास में मुंबई इंडियंस के नाम हुआ सबसे बड़ा रिकॉर्ड|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-18}}</ref> दिल्ली कैपिटल्स को [[२०२० इंडियन प्रीमियर लीग फाइनल|2020 के फाइनल]] में 5 विकेट से हरा कर मुंबई ने अपना पाँचवां आईपीएल खिताब जीता और पाँच आईपीएल जीतने वाली पहली टीम बनीं।<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/sports/ipl-2020/story/ipl-champions-list-mumbai-indians-wins-5-title-records-delhi-capitals-tspo-1160517-2020-11-10|title=13 साल में सिर्फ इन टीमों ने जीती IPL ट्रॉफी, ये है चैम्पियंस की पूरी लिस्ट|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-18}}</ref> वर्तमान में मुंबई इंडियंस की कप्तानी hardik pandya कर रहे हैं। [[महेला जयवर्धने]]<ref>{{cite news|url=http://www.espncricinfo.com/india/content/story/1067010.html|title=Jayawardene appointed Mumbai Indians coach|publisher=Cricinfo|date=November 18, 2016|access-date=15 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20170521054147/http://www.espncricinfo.com/india/content/story/1067010.html|archive-date=21 मई 2017|url-status=live}}</ref> को 2017 सीजन से मुंबई इंडियंस का मुख्य कोच नियुक्त किया गया है। शर्मा टीम के प्रमुख रन स्कोरर हैं जबकि [[लसिथ मलिंगा]] टीम और आईपीएल दोनों के प्रमुख विकेट टेकर हैं। मुंबई इंडियंस के नाम सबसे बड़ी जीत का भी रिकॉर्ड है, 2017 में दिल्ली के खिलाफ मुंबई इंडियंस को मिली 146 रनों की जीत रनों के अंतर से IPL के इतिहास की सबसे बड़ी जीत है<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/sports/photo/ipl-team-and-individual-records-previous-seasons-ipl-csk-vs-mi-tspo-1131728-2020-09-18|title=IPL के इतिहास में ये हैं बड़े रिकॉर्ड्स, जानिए कौन किस पर भारी|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-18}}</ref> | ==फ्रेंचाइज़ी का इतिहास== [[रिलायन्स इण्डस्ट्रीज|रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड]] (RIL) ने 24 जनवरी 2008 को एक नीलामी के दौरान कुल $111.9 मिलियन देकर इंडियन प्रीमियर लीग की मुंबई फ्रेंचाइज़ी के अधिकार ख़रीदे। आरआयएल (RIL) की बोली ने मुम्बई इंडियंस को आयपीएल (IPL) की सबसे महंगी फ्रेंचाइज़ी बना दिया और इसी कारण उसने सेमी-फाइनल और फाइनल [[मुम्बई|मुंबई]] में आयोजित करने का अधिकार भी प्राप्त कर लिया। 17 अप्रैल 2008 को मुम्बई में इस टीम का अनावरण किया गया। ==टीम की पहचान== मुंबई इंडियंस आईपीएल के पहले और दूसरे सीजन में टेलीविजन पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली टीम थी, जिसकी कुल संख्या 239 मिलियन<ref>{{cite web |url=http://www.iplt20.com/teams/?team=6933 |title=Teams |publisher=IPLT20.com |accessdate=March 20, 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180810011655/https://www.iplt20.com/teams/?team=6933 |archive-date=10 अगस्त 2018 |url-status=dead }}</ref> दर्शकों की थी। तक मुंबई इंडियंस ने 85 करोड़ के खर्च के बाद 69 करोड़ की ही कमाई कर पाईं और टीम के मालिकों को 16 करोड़ का घाटा हुआ। ===टीम का नाम, मोटो और लोगो डिजाइन=== टीम का आदर्श वाक्य "दुनियाँ हिला देंगे हम ..." है। <ref>{{cite news|title=IPL 6 finals: Mumbai Indians stay true to their motto Duniya Hila Denge Hum, lift the IPL title|url=http://www.dnaindia.com/sport/1839769/report-ipl-6-finals-mumbai-indians-stay-true-to-their-motto-duniya-hila-denge-hum-lift-the-ipl-title|accessdate=31 May 2013|newspaper=[[DNA India]]|date=26 May 2013|location=Kolkata|archive-url=https://web.archive.org/web/20130618072936/http://www.dnaindia.com/sport/1839769/report-ipl-6-finals-mumbai-indians-stay-true-to-their-motto-duniya-hila-denge-hum-lift-the-ipl-title|archive-date=18 जून 2013|url-status=live}}</ref> मुंबई इंडियंस का पहला गाना इसी मोटो पर आधारित था, जिसमें बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन को प्रचार वीडियो के लिए चुना किया गया था।<ref>{{cite news|title=Mumbai Indians rope in Hrithik Roshan as brand ambassador|url=http://articles.economictimes.indiatimes.com/2008-04-14/news/28462050_1_brand-ambassador-mumbai-indians-indiawin-sports|accessdate=31 May 2013|newspaper=[[The Economic Times]]|date=14 April 2009|agency=[[Press Trust of India]]|location=Mumbai|archive-url=https://web.archive.org/web/20160305092155/http://articles.economictimes.indiatimes.com/2008-04-14/news/28462050_1_brand-ambassador-mumbai-indians-indiawin-sports|archive-date=5 मार्च 2016|url-status=live}}</ref> टीम का लोगो सुदर्शन चक्र (या रेज़र) है क्योंकि शुरू में टीम का नाम "मुंबई रेज़र" तय किया गया था, इससे पहले सचिन तेंदुलकर ने इसे मुंबई इंडियंस रखने का सुझाव दिया। ===जर्सी का रंग=== जर्सी के दोनों ओर चांदी की धारियों के साथ टीम का प्राथमिक रंग नीला है। रंग और छाया और अतिरिक्त प्रायोजकों को छोड़कर, आइडिया 2008 और 2009 में टीम का प्रमुख स्पॉन्सर था, इस बीच टीम का रंग लगभग एक जैसा था। 2010 में, सुनहरे धारियों वाली एक नई किट का अनावरण किया गया। 2011 में, मुख्य प्रायोजक के रूप में 2010 में किट का उपयोग हीरो होंडा के साथ किया जा रहा है। 2011 की जर्सी में टीम में नए खिलाड़ियों के लिए जर्सी के पीछे की तरफ तीन सोने की धारियां बनाईं गईं। टीम के किट निर्माता आईपीएल की शुरुआत से 2014 तक एडिडास था। 2015 में, रिलायंस ट्रेंड्स के एक इन-हाउस ब्रांड, परफोमैक्स, ने एडिडास को किट निर्माता के रूप में बदल दिया। ===थीम सौंग=== मुंबई इंडियंस का वर्तमान थीम गीत प्रसिद्ध "आला रे" है। इसके अलावा, टीम द्वारा हर सीमा या विकेट के बाद, "अक़्खा मुंबई खेलेगा" शीर्षक वाला एक प्रशंसक-गीत हमेशा स्टेडियम डिस्क जॉकी द्वारा बजाया जाता है। == खिलाड़ी == हर्षद 2008 में खिलाड़ी की नीलामी के दौरान, मुंबई इंडियंस ने सात खिलाड़ियों पर सफलतापूर्वक बोली लगाई, जिसमें [[हरभजन सिंह]], [[रॉबिन उथप्पा]], दोनो ही ट्वेंटी -20 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के दो सदस्य शामिल थे। इसके अलावा टीम ने [[सनथ जयसूर्या]], [[लसिथ मलिंगा]], [[ल्यूक रोंची]], [[दिलहारा फ़र्नांडो]] और [[शॉन पोलक]] जैसे क्रिकेटर शामिल थे, जिनकी फ्रेंचाइज़ी द्वारा सफलतापूर्वक बोली लगाई गई थी। खिलाड़ी की नीलामी के बाहर, फ्रेंचाइजी ने अजिंक्य रहाणे और अभिषेक नायर (मुंबई से), योगेश ताकवाले (महाराष्ट्र से विकेट कीपर-बल्लेबाज) और पिनाल शाह (बड़ौदा से विकेट कीपर-बल्लेबाज) को भी साइन किया। सौरभ तिवारी और मनीष पांडे, U-19 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य बीसीसीआई द्वारा आयोजित दूसरी नीलामी के दौरान तैयार किए गए यादृच्छिक पिक्स थे। डोमिनिक थॉर्नली को भी मुंबई इंडियंस ने $30,000 की राशि पर साइन किया। दक्षिण अफ्रीकी तेज गेंदबाज आंद्रे नेल को ड्वेन ब्रावो के स्थान पर साइन किया गया जिन्होंने टूर्नामेंट को जल्दी छोड़ दिया। 2009 के खिलाड़ी की नीलामी में, मुंबई इंडियंस ने $950,000 में दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी, जेपी डुमिनी को साइन किया। वह केविन पीटरसन और एंड्रयू फ्लिंटॉफ के बाद तीसरी सबसे महंगे पिक थी (दोनों में क्रमश: बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स और चेन्नई सुपर किंग्स ने $1.55 मिलियन में साइन किया)। इसके अलावा काइल मिल्स और मोहम्मद अशरफुल क्रमशः $150,000 और $75,000 में एमआई प्रबंधन द्वारा खरीदे गए। नीलामी से पहले टीम ने ग्राहम नेपियर और रयान मैकलारेन को भी साइन किया। आईपीएल 2010 में मुंबई इंडियंस ने वेस्टइंडीज के हरफनमौला खिलाड़ी किरोन पोलार्ड को $750,000 ($2,750,000) में, चेन्नई सुपर किंग्स, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और कोलकाता नाइट राइडर्स के साथ टाई-ब्रेकर के बाद खरीदा, जब उन्होंने बिग बैश और चैंपियंस लीग में अपने प्रदर्शन से टीमों को प्रभावित किया। 2011 में, आईपीएल में दो नई टीमों को शामिल किया गया, आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने घोषणा की कि प्रत्येक फ्रैंचाइज़ी अपने दस्ते के अधिकतम चार खिलाड़ियों को रिटेन कर सकती है, जिनमें से केवल तीन भारतीय खिलाड़ी हो सकते हैं, और बाकी अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी होंगे बाकी खिलाड़ियों को मेगा-नीलामी में डाल दिया जाएगा। मुंबई के फ्रेंचाइज़ी के पास कोर खिलाड़ियों का एक ही सेट था, उन्होंने कप्तान [[सचिन तेंदुलकर]], उप-कप्तान [[हरभजन सिंह]], ऑलराउंडर कीरोन पोलार्ड और तेज़ गेंदबाज़ [[लसिथ मलिंगा]] को $4.5 मिलियन में रिटेन किया। इन खिलाड़ियों को रिटेन करने के बाद टीम के पास मेगा-नीलामी में केवल 4.5 मिलियन डॉलर खर्च करने के लिए बचे। नीलामी में, उन्होंने नीलामी में सबसे महंगे खिलाड़ी के रूप में [[रोहित शर्मा]] को खरीदा, साथ ही [[मुनाफ पटेल]], [[एंड्रयू साइमंड्स]], [[एडेन ब्लिज़ार्ड]], एक हार्द-हिटिंग ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज और न्यूजीलैंड के एक ऑलराउंडर [[जेम्स फ्रैंकलिन]] को खरीदा। 2012 के आईपीएल के नीलामी में, मुंबई इंडियंस ने दक्षिण अफ्रीका के [[रिचर्ड लेवि]] [[रॉबिन पीटरसन]] को क्रमशः $50,000 और $100,000 में खरीदा, इसके अलावा मुंबई ने ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज [[मिशेल जॉनसन (क्रिकेटर)|मिशेल जॉनसन]] को 300,000 डॉलर में, भारतीय तेज गेंदबाज आर पी सिंह को 600,000 डॉलर और श्रीलंकाई ऑलराउंडर [[थिसारा परेरा]] को $650,000 में खरीदा। नीलामी के बाद, मुंबई इंडियंस ने दक्षिण अफ्रीका के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज रिचर्ड लेवी को पाने में कामयाबी हासिल की, जो कि टी 20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे तेज शतक लगाने और रिकॉर्ड 13 छक्के मारने के बाद पुणे वॉरियर्स इंडिया के साथ बोली लगाने के बाद सुर्खियों में आ गए। रिचर्ड लेवी को [[एंड्रयू साइमंड्स]] के प्रतिस्थापन के रूप में लाया गया था, जिन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए खेल के सभी रूपों से संन्यास ले लिया था। सचिन तेंदुलकर ने चेन्नई के खिलाफ आईपीएल 2012 के सीजन के ओपनर मैच से पहले मुंबई इंडियंस के कप्तानी छोड़ने का फैसला किया। 2013 के आईपीएल की नीलामी में, पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान [[रिकी पोंटिंग]] को मुंबई इंडियंस ने $400,000 में खरीदा था और वह आईपीएल के छठे संस्करण के लिए नए कप्तान बने। इसके अलावा नीलामी में, [[ग्लेन मैक्सवेल]] को मुंबई इंडियंस ने खरीदा था। इसके अलावा [[फिलिप ह्यूज]], [[नाथन कल्टर-नील|नाथन कूल्टर-नाइल]], [[जैकब ओरम]] को एमआई प्रबंधन द्वारा खरीदा गया था। 2022 के आईपीएल की नीलामी में, ईशान किशन को मुंबई इंडियंस (MI) ने 15.25 करोड़ रुपए की विशाल कीमत में अपनी टीम में शामिल किया है |<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/sports/ipl-2022/photo/ipl-2022-mega-auction-players-who-fetched-10-crores-and-above-ishan-kishan-deepak-chahar-tspo-1410557-2022-02-12|title=IPL 2022, Mega Auction: ईशान ने बनाया रिकॉर्ड, दीपक पर भी बरसे पैसे, 10 करोड़ से ज्यादा में बिके ये प्लेयर|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-18}}</ref> ===स्थानांतरण=== 2008-2009 के स्थानान्तरण काल में, मुंबई इंडियंस ने सीधी अदला-बदली वाले दो सौदे किये, जिनमें पैसों का कोई लेन-देन नहीं हुआ। [[आशीष नेहरा]] की [[दिल्ली कैपिटल्स|दिल्ली डेयरडेविल्स]] के [[शिखर धवन]] के साथ अदला-बदली की गई<ref>[11]</ref> और स्थानान्तरण काल के अंतिम दिन, [[रॉबिन उथप्पा]] को [[रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर|रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर]] के [[ज़हीर खान]] के साथ बदला गया, जो [[रणजी ट्रॉफी]] में मुंबई के लिए खेलते हैं।<ref>[13]</ref> एक तीन-तरफा सौदे के अंतर्गत, राजस्थान रॉयल्स के जयदेव शाह- सेमीफाइनल तक पहुंचने वाले सौराष्ट्र रणजी दल के कप्तान और क्रिकेट बोर्ड के पूर्व सचिव निरंजन शाह के पुत्र- मुंबई इंडियंस में शामिल होंगे। मुंबई इंडियंस के बल्लेबाज़ गौरव धीमान, बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स के साथ दिखाई देंगे और राजस्थान रणजी टीम के छरहरे तेज़ गेंदबाज़ पंकज सिंग आगामी आयपीएल (IPL) सीज़न में बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स का रंग पहनेंगे. == स्टेडियम == [[File:Wankhede ICC WCF.jpg|thumb|विश्व कप फाइनल के दौरान अप्रैल 2011 में [[वानखेड़े स्टेडियम]]]] मुंबई इंडियंस ने पहले दो आईपीएल सीज़न के लिए नवी मुंबई के डी वाई पाटिल स्टेडियम में घरेलू मैच खेले। तीसरे सीज़न में, 2010 में, उन्होंने ब्रेबोर्न स्टेडियम में सभी सात घरेलू खेल खेले, क्योंकि वानखेड़े स्टेडियम में ग्रुप मैचों की मेजबानी और 2011 के आईसीसी क्रिकेट विश्व कप के फाइनल के लिए नवीनीकरण किया जा रहा था। मुंबई इंडियंस ने उस सीजन में ब्रेबोर्न स्टेडियम में सात मैचों में से छह जीते। मुंबई इंडियंस अब अपना घरेलू खेल मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेलती है। स्टेडियम का नाम पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष एस के वानखेड़े के नाम पर रखा गया है। स्टेडियम मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के स्वामित्व में है और इसमें बैठने की क्षमता लगभग 33,000 है। ==सीजन== ;Key * डीएनक्यू = क्वालीफाई नहीं किया * टीबीडी = टू बी डिसाइडेड {| class="wikitable" style="text-align:center;" ! '''साल''' ! '''[[इंडियन प्रीमियर लीग]]''' ! '''चैंपियंस लीग टी20''' |- | 2008 ! लीग चरण |''रद्द (डीएनक्यू)'' |- | 2009 ! लीग चरण |''डीएनक्यू'' |- | 2010 ! style="background: silver;"| उप-विजेता ! लीग चरण |- | 2011 ! style="background: orange;"| प्लेऑफ्स ! style="background: gold;"| विजेता |- | 2012 !style="background: orange;"| प्लेऑफ्स ! लीग चरण |- | 2013 ! style="background: gold;"| विजेता ! style="background: gold;"| विजेता |- | 2014 ! style="background: orange;"| प्लेऑफ्स ! क्वालीफायर चरण |- | 2015 ! style="background: gold;"| विजेता |style="background: #fcc;"|'''टूर्नामेंट डिफंक्ट''' |- style="text-align:center;"| ! साल ! colspan="2"|[[इंडियन प्रीमियर लीग]] |- | 2016 ! colspan="2"| लीग चरण |- | 2017 ! colspan="2" style="background: gold;"| विजेता |- | 2018 ! colspan="2"| लीग चरण |- | 2019 ! colspan="2" style= "background: gold;"| विजेता |- | 2020 ! colspan="2" style= "background: gold;"| विजेता |- | 2021 ! colspan="2"| लीग चरण |- |} ==प्रशासन और सहायक कर्मचारी== {| class="wikitable sortable" style="text-align: center;" |- ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|पद ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|राष्ट्रीयता ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|नाम |- |मालिक |{{flagicon|IND}} |[[रिलायन्स इण्डस्ट्रीज|रिलायंस इंडस्ट्रीज]] |- |क्रिकेट ऑपरेशन के निदेशक |{{flagicon|IND}} |[[जहीर खान]] |- |प्रमुख कोच |{{flagicon|SRI}} |[[महेला जयवर्धने]] |- |सहायक कोच |{{flagicon|IND}} |[[पारस मम्ब्रे]] |- |बल्लेबाजी कोच |{{flagicon|IND}} |[[रॉबिन सिंह]] |- |बॉलिंग कोच |{{flagicon|NZL}} |[[शेन बॉन्ड]]<ref>{{cite news | url=http://sports.ndtv.com/cricket/news/235732-mumbai-indians-appoint-shane-bond-as-bowling-coach | title=Mumbai Indians Appoint Shane Bond as Bowling Coach | access-date=15 मई 2019 | archive-url=https://web.archive.org/web/20160304115906/http://sports.ndtv.com/cricket/news/235732-mumbai-indians-appoint-shane-bond-as-bowling-coach | archive-date=4 मार्च 2016 | url-status=dead }}</ref> |- |फील्डिंग कोच |{{flagicon|ENG}} |[[जेम्स पैमेंट]] |- |टीम मैनेजर |{{flagicon|IND}} |[[राहुल संघवी]] |- |बल्लेबाजी मेंटर |{{flagicon|IND}} |[[सचिन तेंदुलकर|सचिन तेंडुलकर]] |- |} * ==हेड कोच का रिकॉर्ड== {| class="wikitable plainrowheaders sortable" style="text-align:center" ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|नाम ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|राष्ट्रीयता ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|से ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|तक ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|मैच ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|जीत ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|हार ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|एन.ऐ ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"|जीत% |- |scope=row style=text-align:left|[[लालचंद राजपूत]] |align=left|{{IND}} |align=left|अप्रैल 2008 |align=left|जून 2008 {{WDL|14|7|7|0|14}} |- |scope=row style=text-align:left|[[शॉन पोलक]] |align=left|{{RSA}} |align=left|अप्रैल 2009 |align=left|जून 2009 {{WDL|14|5|8|1|11}} |- |scope=row style=text-align:left| [[रॉबिन सिंह]] |align=left|{{IND}} |align=left|अप्रैल 2010 |align=left|जून 2012 {{WDL|49|31|18|0|20}} |- |scope=row style=text-align:left|[[जॉन राइट]] |align=left|{{NZL}} |align=left|अप्रैल 2013 |align=left|जून 2014 {{WDL|32|19|13|0|20}} |- |scope=row style=text-align:left| [[रिकी पोंटिंग]] |align=left|{{AUS}} |align=left|अप्रैल 2015 |align=left|जून 2016 {{WDL|29|16|13|0|20}} |- |scope=row style=text-align:left| [[महेला जयवर्धने]] |align=left|{{SRI}} |align=left|अप्रैल 2017 |align=left|वर्तमान {{WDL|31|18|13|0|20}} |} Note: रिकॉर्ड चैंपियंस लीग टी 20 में खेले गए मैच भी शामिल हैं। ==किट निर्माता और प्रायोजक== {| class="wikitable sortable" style="text-align: center;" |- ! style="width:1%;background:#04a; color:gold;"|साल ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"| किट निर्माता ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"| शर्ट स्पॉन्सर(फर्न्ट) ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"| शर्ट स्पॉन्सर(बैक) ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;"| चेस्ट ब्रांडिंग |- |2008 |rowspan=7|[[एडिडास]] |rowspan=2|आईडिया |rowspan=5|[[मास्टर कार्ड]] |[[एडिडास]] |- |2009 |झंडू बाम |- |2010 |[[वीडियोकॉन]] |rowspan=2|धीरज एंड ईस्ट कोस्ट एलएलसी |- |2011 |[[हीरो मोटोकॉर्प|हीरो होंडा]] |- |2012 |[[हीरो मोटोकॉर्प|हीरो]] | rowspan="8" |[[दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन|डीएचएफएल]] |- |2013 |rowspan=5|[[वीडियोकॉन डी2एच]] |rowspan=2|[[बजाज आलियांज लाइफ इंश्योरेंस|बजाज आलियांज]] |- |2014 |- |2015 | rowspan="5" |[[परफोमैक्स]]<ref>[http://beta.thampydigital.com/reliance-trends/brands/performax/ Performax] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160308173659/http://beta.thampydigital.com/reliance-trends/brands/performax/ |date=8 March 2016 }}</ref> |rowspan=2|[[जेट एयरवेज]] |- |2016 |- |2017 |[[एतिहाद एयरवेज़]] |- |2018 |rowspan=2|[[सैमसंग]]<ref>{{Cite news|url=https://www.insidesport.co/samsung-dials-mumbai-indians-title-sponsorship-rights-608022018/|title=Samsung dials Mumbai Indians for title sponsorship rights! - InsideSport.co|last=InsideSport|first=Rajender Sharma for|date=2018-02-08|work=InsideSport|access-date=2018-02-09|language=en-US}}</ref> |[[आईबीबो|गोआईबीबो]] |- |2019 |[[वायकॉम 18|कलर्स]] |} ==लोकोपकार== [[File:Mumbai Indians Supports Education for All.jpg|thumb|मुंबई इंडियंस ने गैर सरकारी संगठनों के बच्चों को मुफ्त में मैच देखने के लिए आमंत्रित किया।]] मुंबई इंडियंस ने शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा देने के सामाजिक कार्य का समर्थन किया है। उन्होंने अपने खिलाड़ियों द्वारा हस्ताक्षरित रिस्टबैंड जैसे माल बेचने के माध्यम से इस कार्य के लिए धन जुटाया है। जिन गैर सरकारी संगठनों को मुंबई इंडियंस सपोर्ट करती है उनमें प्रथम, उम्मेद, आकांक्षा, टीच फ़ॉर इंडिया और नन्ही काली हैं।<ref>{{cite web |url=http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-07-05/people/28277139_1_nita-ambani-mumbai-indians-underprivileged-kids |title=6 for education! – Times Of India |publisher=Articles.timesofindia.indiatimes.com |date=July 5, 2010 |accessdate=March 20, 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130527091632/http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-07-05/people/28277139_1_nita-ambani-mumbai-indians-underprivileged-kids |archive-date=27 मई 2013 |url-status=live }}</ref> ==आंकड़ें== ===बल्लेबाजी रिकॉर्ड=== {| class="wikitable sortable" style="text-align: center;" |- ! style="width:6%;background:#0044AA; color:gold;"|प्लेयर ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|अवधि ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|मैच ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|पारी ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|नाबाद ! style="width:3%;background:#0044AA; color:gold;"|रन ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|हाई स्कोर ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|औसत ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|BF ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|SR ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|100 ! style="width:3%;background:#0044AA; color:gold;"|50 ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|0 ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|4s ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|6s |- | [[रोहित शर्मा]] || 2011-2019|| 152 || 148 || 23 || 4001 || 109* || 32 || 3063 || 130.62 || 1 || 29 || 10 || 353 || 159 |- | [[कायरन पोलार्ड]] || 2010-2019 || 170 || 157 || 44 || 3258 || 83 || 28.83 || 2224 || 146.49 || 0 || 16 || 4 || 213 || 211 |- | [[अंबाती रायडू]] || 2010-2017 || 136 || 127 || 19 || 2635 || 81* || 24.39 || 2136 || 123.36 || 0 || 14 || 10 || 221 || 84 |- | [[सचिन तेंदुलकर|सचिन तेंडुलकर]] || 2008-2013 || 91 || 91 || 11 || 2599 || 100* || 32.48 || 2191 || 118.62 || 1 || 14 || 5 || 329 || 33 |- |} *<small> आखरी अपडेट: 16 मई 2019</small> * '''Source:''' क्रिकइन्फो<ref>{{Cite news|url=http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/batting/most_runs_career.html?class=6;id=4346;type=team|2=|title=Most Runs by Player in IPL|publisher=Cricinfo|access-date=16 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190415204603/http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/batting/most_runs_career.html?class=6;id=4346;type=team|archive-date=15 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref> ===हाई स्कोर=== {| class="wikitable sortable" style="text-align: center;" |- ! style="width:6%;background:#0044AA; color:gold;"|प्लेयर ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|रन ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|गेंद ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|चौका ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|छक्का ! style="width:3%;background:#0044AA; color:gold;"|SR ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|विरुद्ध ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|स्टेडियम ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|तारीख |- | [[रोहित शर्मा]] || 109* || 60 || 12 || 5 || 181.66 || v केकेआर || कोलकाता || 12 मई 2012 |- | [[सचिन तेंदुलकर|सचिन तेंडुलकर]] || 100* || 66 || 12 || 3 || 151.51 || v कोच्चि || मुंबई || 15 अप्रैल 2011 |- |} *<small> आखरी अपडेट: 14 जनवरी 2019</small> * '''Source:''' क्रिकइन्फो<ref>{{Cite news|url=http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/batting/most_runs_innings.html?class=6;id=4346;type=team|title=High Scores in IPL by MI by Players|publisher=Cricinfo|access-date=16 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190415210045/http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/batting/most_runs_innings.html?class=6;id=4346;type=team|archive-date=15 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref> ===सर्वाधिक विकेट=== {| class="wikitable sortable" style="text-align: center;" |- ! style="width:6%;background:#0044AA; color:gold;"|प्लेयर ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|अवधि ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|मैच ! style="width:2%;background:#0044AA; color:gold;"|पारी ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|ओवर ! style="width:3%;background:#0044AA; color:gold;"|मेडन ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|रन ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|विकेट ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|BBI ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|औसत ! style="width:3%;background:#0044AA; color:gold;"|इकोनॉमी ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|SR ! style="width:4%;background:#0044AA; color:gold;"|चार विकेट ! style="width:5%;background:#0044AA; color:gold;"|पाँच विकेट |- | [[लसिथ मलिंगा]] || 2009-2019 || 122 || 122 || 471.1 || 9 || 3366 || 170 || 5/13 || 19.80 || 7.14 || 16.62 || 6 || 1 |- | [[हरभजन सिंह]] || 2008-2017 || 158 || 154 || 560.0 || 6 || 3903 || 147 || 5/18 || 26.55 || 6.96 || 22.8 || 2 || 1 |- | [[जसप्रीत बुमराह]] || 2013-2019 || 77 || 77 || 288.4 || 4 || 2181 || 82 || 3/7 || 26.59 || 7.55 || 21.12 || 0 || 0 |- |} *<small> आखरी अपडेट: 15 मई 2019</small> * '''Source:''' क्रिकइन्फो<ref>{{Cite news|url=http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?class=6;id=4346;type=team|title=Most Wickets in IPL by MI by Players|publisher=Cricinfo|access-date=16 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190415222105/http://stats.espncricinfo.com/ipl-mumbai/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?class=6;id=4346;type=team|archive-date=15 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref> {| class="wikitable sortable" |- ! style="width:15%;background:#04a; color:gold;" |साल ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;" |मैच ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;" |जीत ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;" |हार ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;" |रिजल्ट नहीं ! style="width:20%;background:#04a; color:gold;" |जीत% ! style="width:13%;background:#04a; color:gold;" |पोजीशन |- || 2008 || 14 || 7 || 7 || 0 || 50.00% || 5 |- || 2009 || 14 || 5 || 8 || 1 || 35.71% || 7 |- || 2010 || 16 || 11 || 5 || 0 || 68.75% || 2 |- || 2011 || 16 || 10 || 6 || 0 || 62.50% || 3 |- || 2012 || 17 || 10 || 7 || 0 || 58.82% || 4 |- || 2013 || 19 || 13 || 6 || 0 || 68.42% || '''विजेता''' |- || 2014 || 15 || 7 || 8 || 0 || 46.67% || 4 |- || 2015 || 16 || 10 || 6 || 0 || 62.50% || '''विजेता''' |- || 2016 || 14 || 7 || 7 || 0 || 50.00% || 5 |- || 2017 || 14 || 10 || 4 || 0 || 71.42% || '''विजेता''' |- || 2018 || 14 || 6 || 8 || 0 ||42.86%|| 5 |- ||''2019'' || ''14'' || 9 || ''5'' || ''0'' || ''64.29%'' || '''विजेता''' |- class="sortbottom" ||'''कूल'''|| 185 || 105 || 78 || 1 || 57.29% | |} ===प्रतिद्वंदी=== {| class="wikitable sortable" |- ! style="background:#04a; color:gold;"|प्रतिद्वंद्वी ! style="background:#04a; color:gold;"|मैच ! style="background:#04a; color:gold;"|जीत ! style="background:#04a; color:gold;"|हार ! style="background:#04a; color:gold;"|रद्द |- style="background:#ffe6b7;" | [[केप कोबराज क्रिकेट टीम|केप कोबरा]] || 1 || 0 || 0 || 1 |- | [[चेन्नई सुपर किंग्स]] || 28|| 17 || 11 || 0 |- style="background:#fdd;" | [[डेक्कन चार्जर्स]] || 10 || 6 || 4|| 0 |- | [[दिल्ली कैपिटल्स|दिल्ली डेयरडेविल्स]] || 13 || 6 || 7 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[गयाना|गुयाना]] || 1 || 1 || 0 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[गुजरात लायंस]] ||4|| 2|| 2|| 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[हाईवेल्ड लायंस]] || 2 || 1 || 1 || 0 |- | [[किंग्स इलेवन पंजाब]] ||21 ||11 ||10 || 0 |- style="background:#fdd;" | [[कोच्चि टस्कर्स केरल]] || 1 || 0 || 1 || 0 |- | [[कोलकाता नाईट राइडर्स|कोलकाता नाइट राइडर्स]] || 20 || 15 || 5 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[लाहौर लायंस]] || 1 || 0 || 1 || 0 |- style="background:#ffe6b7;"| [[लायंस]] || 3 || 1 || 2 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[न्यू साउथ वेल्स क्रिकेट टीम | न्यू साउथ वेल्स ब्लूज़]] || 1 || 0 || 1 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[पर्थ स्कोचर्स|पर्थ स्कॉर्चर्स]] || 1 || 1 || 0 || 0 |- style="background:#fdd;" | [[पुणे वारियर्स इंडिया]] || 6 || 5 || 1 || 0 |- | [[राजस्थान रॉयल्स]] || 15 || 8 || 6 || 1 |- style="background:#ffe6b7;" | [[ओटागो वोल्ट]] || 1 || 0 || 0 || 1 |- style="background:#fdd;" | [[राइजिंग पुणे सुपरजायंट]] || 6 || 2 || 4 || 0 |- | [[रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर|रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर]] || 17 || 9 || 8 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[सॉमरसेट]] || 1 || 1 || 0 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[साउदर्न रेडबैक्स]] || 1 || 0 || 1 || 0 |- | [[सनराइजर्स हैदराबाद]] || 6 || 3 || 3 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[सिडनी सिक्सर्स]] || 1 || 0 || 1 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[त्रिनिदाद और टोबैगो]] || 2 || 2 || 0 || 0 |- style="background:#ffe6b7;" | [[यॉर्कशायर कार्नेगी]] || 1 || 0 || 0 || 1 |} {|class=wikitable |- |rowspan="2"|रंग संकेत||style="background: #fdd;"| डिफंक्ट टीमें |- |style="background:#ffe6b7;"|गैर-आईपीएल टीमें |} == सन्दर्भ == {{reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20100417045223/http://www.mumbaiindians.com/ आधिकारिक वेबसाइट] {{Indian Premier League}} [[श्रेणी:गूगल परियोजना]] [[श्रेणी:इंडियन प्रीमियर लीग की क्रिकेट टीमें]] [[श्रेणी:इंडियन प्रीमियर लीग]] [[श्रेणी:मुम्बई]] k7pdzal9e8d3ig2tffqbazebacy8wt3 कैटी पेरी 0 189412 6543810 6268328 2026-04-25T10:07:35Z Sequencesolved 173771 एक चित्र जोडा। 6543810 wikitext text/x-wiki [[चित्र:KatyPerryWestminst111224 (81 of 95) (54206733094) (cropped 2).jpg]] {{विकिफाइ}} {{Expand Bengali|कैटी पेरी सम्पादन}} {{Infobox Musical artist <!-- See Wikipedia:WikiProject_Musicians --> |Name = Katy Perry |Img = Katy Perry UNICEF 2012.jpg |Img_capt = |Img_size = 200px |Birth_name = Katheryn Elizabeth Hudson |Background = solo_singer |Born = {{birth date and age|mf=yes|1984|10|25}}<br />[[Santa Barbara, California]], <br />[[United States]] |Instrument = [[Vocals]], [[guitar]] |Genre = [[Pop music|Pop]], [[Rock music|rock]] |Occupation = [[Singer-songwriter]], [[musician]] |Voice_type = [[Contralto]]<ref>{{cite web|url=http://www.mtvasia.com/Review/CD/C20081103001722.html|title=Katy Perry: One of the Boys|last=Leong|first=Cheryl|date=3 नवंबर 2008|publisher=MTV Asia|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100817025349/http://www.mtvasia.com/Review/CD/C20081103001722.html|archive-date=17 अगस्त 2010|url-status=dead}}</ref> |Influences= [[Alanis Morissette]], [[Joe Beck]], [[Pat Benatar]], [[Joan Jett]], [[Shirley Manson]] |Years_active = 2001–present |Label = [[Red Hill Records|Red Hill]] (2001)<br />[[Island Records|Island]] (2003–2004)<br />[[Columbia Records|Columbia]] (2004–2006)<br />[[Capitol Records|Capitol]] (2007–present) |Associated_acts = [[Travis McCoy]], [[Lily Allen]], [[Kelly Clarkson]], [[Ashley Tisdale]], [[3OH!3]] |URL = [http://www.katyperry.com/ www.katyperry.com] }} '''कैथरिन एलिज़ाबेथ हडसन''' (जन्म 25 अक्टूबर 1984), अपने मंचीय नाम '''कैटी पेरी''' द्वारा अधिक प्रसिद्ध, एक [[अमरीकी]] [[गायक-गीतकार]] और [[संगीतकार]] हैं। पेरी 2007 में अपने इंटरनेट हिट "[[यूर सो गे]]" से प्रसिद्ध हुईं और 2008 में उन्होंने अपना भेदक एकल गीत "[[आय किस्ड अ गर्ल]]" प्रस्तुत किया। पेरी का जन्म और लालन-पालन [[सैन्टा बार्बरा]], कैलिफोर्निया में ईसाई पादरी अभिभावकों द्वारा हुआ और वे केवल [[गॉस्पेल संगीत]] को सुनते हुए बड़ी हुईं. उच्च विद्यालय के प्रथम वर्ष के दौरान एक [[GED]] प्राप्त करने के बाद उन्होंने संगीत को अपने कॅरियर के रूप में आगे बढ़ाना शुरु किया। 2001 में कैटी हडसन के रूप में उन्होंने एक स्व-शीर्षक गॉस्पेल अल्बम जारी किया। 2004 में, उन्होंने निर्माण समूह [[द मैट्रिक्स]] के साथ एक अल्बम रिकॉर्ड किया, लेकिन वह कभी रिलीज़ नहीं हुआ। 2007 में [[कैपिटोल म्यूज़िक ग्रुप]] के साथ गाने के बाद, उन्होंने मंचीय नाम कैटी पेरी को अपना लिया और अपना पहला मुख्य-धारा अल्बम, ''[[वन ऑफ द बॉयज़]]'' जारी किया। == प्रारम्भिक जीवन == कैटी पेरी का जन्म कैथरिन एलिज़ाबेथ हडसन के रूप में [[सैन्टा बार्बरा]], कैलिफोर्निया में हुआ।<ref name="DuerdenBigThing">{{cite web|url=http://www.blender.com/guide/articles.aspx?id=1061|title=The Next Big Thing! Katy Perry|last=Duerden|first=Nick|year=2004|month=अक्टूबर|work=[[Blender (magazine)|Blender]]|accessdate=19 जून 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20081110151956/http://www.blender.com/guide/articles.aspx?id=1061|archive-date=10 नवंबर 2008|url-status=dead}}</ref> दो [[पादरियों]] की इस द्वितीय संतान<ref name="GraffBold">{{cite web|url=http://thescotsman.scotsman.com/features/Interview-Katy-Perry--Hot.4988069.jp|title=Interview: Katy Perry&nbsp;— Hot N Bold|last=Graff|first=Gary|date=21 फरवरी 2009|work=The Scotsman|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090307025809/http://thescotsman.scotsman.com/features/Interview-Katy-Perry--Hot.4988069.jp|archive-date=7 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> की एक बड़ी बहन और छोटा भाई है।<ref name="SheffieldGirl">{{cite web|url=http://www.blender.com/GirlonGirlKatyPerry/articles/41952.aspx|title=Girl on Girl: Katy Perry|last=Rob|first=Sheffield|date=24 सितंबर 2008|work=Blender|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090312080343/http://www.blender.com/GirlonGirlKatyPerry/articles/41952.aspx|archive-date=12 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> उनकी [[सुसमाचारी]] मां, मेरी हडसन, का पालन-पोषण दक्षिणी कैलिफोर्निया में हुआ और "[[ज़िम्बाब्वे]] में उनकी पहली शादी तूफ़ानी" रही.<ref name="SheffieldGirl"/> उनके पिता 1960 के दशक में एक वेस्ट कोस्ट [[:wikt:scenester|सिनेस्टर]] थे।<ref name="SheffieldGirl"/> पेरी के चाचा और चाची निर्देशक [[फ्रैंक पेरी]] और [[एलीनॉर पेरी]] थे।<ref name="SheffieldGirl45">{{cite web|url=http://www.blender.com/guide/61418/girlongirl.html?p=4|title=Girl on Girl: Katy Perry|last=Rob|first=Sheffield|date=24 सितंबर 2008|work=Blender|accessdate=4 जुलाई 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100802153015/http://www.blender.com/guide/61418/girlongirl.html?p=4|archive-date=2 अगस्त 2010|url-status=dead}}</ref> एक ईसाई के रूप में दीक्षित, पेरी को उनके अभिभावकों के धार्मिक मंत्रालय<ref name="GraffBold"/> में निगमित किया गया और उन्होंने नौ वर्ष की आयु से उनके चर्च में गाना शुरु किया; 17 वर्ष की आयु तक उन्होंने चर्च में गाना जारी रखा.<ref name="DuerdenBigThing"/><ref name="PerryScoop">{{cite web|url=http://www.thestarscoop.com/2008/katy-perry.php|title=Katy Perry|publisher=TheStarScoop.com|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100419115612/http://www.thestarscoop.com/2008/katy-perry.php|archive-date=19 अप्रैल 2010|url-status=dead}}</ref> वे [[गॉस्पेल संगीत]] को सुनते हुए बड़ी हुईं<ref name="ScaggsQ&A">{{cite news|url=http://www.rollingstone.com/news/story/22212329/qa_katy_perry|title=Q&A: Katy Perry|last=Scaggs|first=Austin|date=21 अगस्त 2008|work=Rolling Stone|accessdate=10 दिसंबर 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20080822110021/http://www.rollingstone.com/news/story/22212329/qa_katy_perry|archive-date=22 अगस्त 2008|url-status=live}}</ref> और उन्हें वह सुनने की अनुमति नहीं थी, जिसे उनकी मां [[धर्मनिरपेक्ष संगीत]] कहा करती थी।<ref name="PerryScoop"/><ref name="MontgomeryGospel">{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1589848/20080623/katy_perry.jhtml|title=Katy Perry Dishes On Her 'Long And Winding Road' From Singing Gospel To Kissing Girls|last=Montgomery|first=James|date=24 जून 2008|publisher=MTV|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090308092102/http://www.mtv.com/news/articles/1589848/20080623/katy_perry.jhtml|archive-date=8 मार्च 2009|url-status=live}}</ref> पेरी ने ईसाई विद्यालयों और शिविरों में भाग लिया।<ref name="GraffBold"/> एक बच्ची के रूप में, पेरी ने सैन्टा बार्बरा के एक रेक हॉल में नृत्य सीखा. उन्हें अनुभवी नर्तकों द्वारा शिक्षा दी गई और उन्होंने [[स्विंग]], [[लिंडी हॉप]] और [[जिटरबर्ग]] के साथ शुरुआत की.<ref name="17Style">{{cite web|url=http://www.seventeen.com/fashion/special/style-blog/katy-perry-fashion-qa-interview|title=Find Out What Influences Katy Perry's Cute Style!|date=5 फरवरी 2009|work=Seventeen|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090908222401/http://www.seventeen.com/fashion/special/style-blog/katy-perry-fashion-qa-interview|archive-date=8 सितंबर 2009|url-status=live}}</ref> उच्च विद्यालय के प्रथम वर्ष के बाद उन्होंने अपना [[GED]] लिया और संगीत में कॅरियर बनाने के लिये विद्यालय छोड़ने का निश्चय किया।<ref name="Toonage"/> पेरी ने प्रारंभिक रूप से गायन इसलिये शुरु किया "क्योंकि मैं अपने बचपन के उस बिंदु पर थी, जहां मैं अपनी बहन और उसके द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक कार्य की नकल किया करती थी".<ref name="Toonage">{{cite web|url=http://www.toonage.ca/features/sep2108_katy_perry.shtml|title=Katy Perry Wants to Draw on Your Face|last=Panda|first=Priya|publisher=Toonage|accessdate=22 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090316235625/http://www.toonage.ca/features/sep2108_katy_perry.shtml|archive-date=16 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> उनकी बहन कैसेट टेप के साथ अभ्यास करती थी और जब बहन आस-पास न हो, तो पेरी टेप ले लेती थी। उन्होंने गीतों का अभ्यास किया और अपने अभिभावकों के समक्ष उन्हें प्रस्तुत किया, जिन्होंने उन्हें गायन की शिक्षा लेने का सुझाव दिया. उन्होंने इस अवसर को झपट लिया और नौ वर्ष की आयु से प्रारंभ करके 16 वर्ष की आयु तक इसकी शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने सैन्टा बार्बरा में [[म्यूज़िक एकाडमी ऑफ द वेस्ट]] में प्रवेश लिया और कुछ समय के लिये [[इतालवी ऑपेरा]] का अध्ययन किया।<ref name="Toonage"/> == रिकॉर्डिंग कॅरियर == === 2001-07: प्रारंभिक-काल === [[चित्र:Katy Perry.jpg|thumb|left|upright|कैटी पेर्री अपने गिटार के साथ प्रदर्शन करती.जब वह सिर्फ अपना कॅरियर शुरू कर रही थी तभी उसने सारे इंस्ट्रूमेंट बजाना सिख लिया।]] 15 वर्ष की उम्र में, चर्च में पेरी के गायन ने [[नैशविल]], टेनेसी से आए रॉक संगीत के अनुभवी व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित किया, जो उनके लेखन-कौशल को चमकाने के लिये उन्हें वहां ले आए.<ref name="HarrisRisque">{{cite web|url=http://entertainment.timesonline.co.uk/tol/arts_and_entertainment/music/article4619220.ece|title=Katy Perry on the risqué business of I Kissed a Girl|last=Harris|first=Sophie|date=30 अगस्त 2008|work=The Times|accessdate=2 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090521123848/http://entertainment.timesonline.co.uk/tol/arts_and_entertainment/music/article4619220.ece|archive-date=21 मई 2009|url-status=live}}</ref> नैशविल में, पेरी ने [[प्रदर्शन]] रिकॉर्ड करना प्रारंभ किया और वहां [[लोक-संगीत]] के विशेषज्ञों द्वारा उन्हें गीतों की रचना करने और गिटार बजाने की शिक्षा दी गई।<ref name="PerryScoop"/><ref name="MontgomeryGospel"/> पेरी ने ईसाई संगीत लेबल [[रेड हिल]] के साथ अनुबंध किया, जिसके अंतर्गत उन्होंने 15 वर्ष की आयु में अपना पहला अल्बम रिकॉर्ड किया।<ref name="HardingSingle">{{cite web|url=http://www.billboard.com/bbcom/feature/katy-perry-single-lady-1003940623.story|title=Katy Perry: Single Lady|last=Harding|first=Cortney|date=11 फरवरी 2009|work=Billboard|publisher=Nielsen Business Media, Inc|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100317041612/http://www.billboard.com/bbcom/feature/katy-perry-single-lady-1003940623.story|archive-date=17 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> कैटी हडसन के रूप में, उन्होंने 2001 में [[स्व-शीर्षक]] वाला [[गोस्पेल]]-[[रॉक]] अल्बम रिलीज़ किया।<ref name="SheffieldGirl"/><ref name="HarrisRisque"/> हालांकि, लेबल के बन्द हो जाने के बाद अल्बम असफल रहा.<ref name="HardingSingle"/> बाद में उन्होंने अपना कुलनाम बदलकर पेरी, जो कि उनकी मां का प्रथम नाम था, रख लिया क्योंकि "कैटी हडसन" नाम फिल्म अभिनेत्री [[केट हडसन]] के नाम के बहुत करीब था।<ref name="HarrisRisque"/><ref name="SumnerTrouble"/> 17 वर्ष की आयु में, पेरी ने लॉस एंजल्स जाने के लिये अपना घर छोड़ा, जहां उन्होंने [[ग्लेन बैलार्ड]] के साथ रिकॉर्ड लेबल [[आइलैंड]] के लिये एक अल्बम पर कार्य किया।<ref>{{cite web|url=http://www.ew.com/ew/article/0, 20203057,00.html|title='Kiss' Me, Katy|last=Greenblatt|first=Leah|date=मई 30, 2008|publisher=Entertainment Weekly|accessdate=5 अगस्त 2009}}{{Dead link|date=अगस्त 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> यह अल्बम 2005 में रिलीज़ किया जाना था,<ref name="DuerdenBigThing"/><ref name="HarrisRisque"/><ref name="HardingSingle"/> लेकिन ''[[बिलबोर्ड]]'' ने बताया कि वह कभी आगे नहीं बढ़ा.<ref name="HardingSingle"/> [[आइलैंड डेफ जैम म्यूज़िक ग्रुप]] ने पेरी को छोड़ दिया.<ref name="SheffieldGirl"/> पेरी और बैलार्ड के गठबंधन में "बॉक्स", "डायमण्ड्स" और "लॉन्ग शॉट" शामिल हैं, जो [[मायस्पेस]] पर उनके आधिकारिक पृष्ठ पर प्रविष्ट किये गए। बैलार्ड के साथ उनके द्वारा रिकॉर्ड किये गए गीतों में से एक, "सिम्पल", को 2005 की फिल्म ''[[द सिस्टरहूड ऑफ द ट्रैवलिंग पैन्ट्स]]'' के साउंडट्रैक पर रिलीज़ किया गया।<ref>{{cite web|url=http://www.legacyrecordings.com/Sound-Track-Artist/The-Sisterhood-Of-The-Traveling-Pants-Music-From-The-Motion-Picture.aspx|title=The Sisterhood Of The Traveling Pants&nbsp;— Music From The Motion Picture|publisher=Sony BMG Music Entertainment|accessdate=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090317010632/http://www.legacyrecordings.com/Sound-Track-Artist/The-Sisterhood-Of-The-Traveling-Pants-Music-From-The-Motion-Picture.aspx|archive-date=17 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> 2004 में पेरी ने [[कोलम्बिया रिकॉर्ड्स]] के साथ अनुबंध किया। हालांकि, यह लेबल उनके दृष्टिकोण के अधीन नहीं था और उन्हें "चालक सीट" पर नहीं रख रहा था।<ref name="HardingSingle"/> इसकी बजाय, [[रिकॉर्ड निर्माण]] दल [[द मेट्रिक्स]], जो एक अल्बम पर कार्य कर रहे थे, के साथ उनकी महिला गायिका के रूप में पेरी की जोड़ी बनाना कोलम्बिया का एक विचार था। हालांकि, यह अल्बम बाद में स्थगित कर दिया गया,<ref name="AllmusicBio"/> लेकिन उन्होंने संगीत प्रेस का ध्यान खींचा: उनके मुकुलित होते कॅरियर के चलते अक्टूबर 2004 में ''[[ब्लेंडर]]'' पत्रिका ने उन्हें "द नेक्स्ट बिग थिंग" नाम दिया.<ref name="DuerdenBigThing"/><ref name="HardingSingle"/> कोई अल्बम निर्माण परियोजना न होने के कारण, पेरी ने स्वयं का अल्बम रिकॉर्ड करना शुरु किया। हालांकि, अस्सी प्रतिशत कार्य हो जाने पर कोलंबिया ने इसे पूरा न करने का निर्णय लिया और उन्हें लेबल से हटा दिया गया।<ref name="HardingSingle"/> कोई अन्य लेबल पाने का इंतज़ार करने के दौरान, उन्होंने टैक्सी म्यूज़िक नामक एक स्वतंत्र [[A&amp;R]] कम्पनी में कार्य किया। 2006 में, पेरी [[P.O.D.]] के एकल गीत "[[गुडबाय फॉर नाउ]]" के विडियो के अंत में दिखाई दीं.<ref>{{cite web|url=http://www.christianitytoday.com/music/reviews/2006/testify.html|title=P.O.D.: Testify|last=Farias|first=Andree|publisher=Christianity Today|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090907011730/http://www.christianitytoday.com/music/reviews/2006/testify.html|archive-date=7 सितंबर 2009|url-status=live}}</ref> उन्होंने [[कार्बन लीफ]] के विडियो "लर्न टू फ्लाय" में और [[जिम क्लास हीरोज़]] के विडियो "[[क्युपिड'स चोकहोल्ड]]" में शीर्ष गायक [[ट्रैविस मैक्कॉय]] की संभावित प्रेमिका के रूप में एक [[संक्षिप्त भूमिका]] निभाई. अंततः उनके गीतों ने [[वर्जिन रिकॉर्ड्स]] के [[CEO]] [[जेसन फ्लोम]], [[कैपिटोल म्यूज़िक ग्रुप]] के तत्कालीन प्रमुख, का ध्यान खींचा, जिन्होंने 2007 के प्रारंभ में उन्हें कैपिटोल म्यूज़िक के लिये अनुबंधित किया।<ref name="HardingSingle"/> === 2008-09: ''वन ऑफ द बॉयज़'' === [[चित्र:Katy Perry warped tour.jpg|thumb|upright|right|एक 2008 वैन व्रैपेड टूर कंसर्ट में कैटी पेर्री.]] {{main|One of the Boys (Katy Perry album)}} [[कैपिटोल रिकॉर्ड्स]] के साथ अनुबंध करने के बाद, पेरी ने उनके मुख्य-धारा वाले पहले अल्बम, ''[[वन ऑफ द बॉयज़]]'', के लिये गीत रिकॉर्ड करना शुरु किया, उनकी छवि स्थापित करना उनके प्रबंधन की तात्कालिक चिंताओं में से एक था।<ref name="HardingSingle"/> नवंबर 2007 में "[[यूर सो गे]]" के विडियो की रीलीज़ के साथ ही एक अभियान शुरु किया गया, जिसका लक्ष्य संगीत के बाज़ार में उनकी पहचान बनाना था। ऑनलाइन माहौल बनाने के लिये "यूर सो गे" के बाद एक डिजिटल [[EP]] रिलीज़ किया गया।<ref name="GraffBold"/><ref name="HardingSingle"/> यह एक सफल कदम था, जिसके परिणामस्वरूप पेरी ने [[मैडोना]] का ध्यान आकर्षित किया,<ref name="HardingSingle"/> जिन्होंने [[एरिज़ोना]] में [[KISS FM]] और [[KRQ]] के ''जॉनजे एन्ड रिच'' प्रभात कार्यक्रम में उनका उल्लेख किया। 10 मार्च 2008 को, वे [[ABC फैमिली]] टेलीविजन श्रृंखला, ''[[वाइल्डफायर]]'', की "[[लाइफ'स टू शॉर्ट]]" कड़ी में स्वयं के रूप में दिखाई दीं.<ref name="DeLeonStars">{{cite news|url=http://www.buddytv.com/articles/the-young-and-the-restless/katy-perry-guest-stars-on-the-20190.aspx|title=Katy Perry Guest Stars on 'The Young and the Restless'|last=De Leon|first=Kris|date=5 जून 2008|publisher=buddytv.com|accessdate=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20131024034332/http://www.buddytv.com/articles/the-young-and-the-restless/katy-perry-guest-stars-on-the-20190.aspx|archive-date=24 अक्तूबर 2013|url-status=live}}</ref> एक ओर जहां पेरी के संबंध में माहौल बनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर वे अल्बम के प्रचार के अगले चरण की ओर बढ़ीं और रेडियो स्टेशनों का दो माह का दौरा शुरु किया। अल्बम का आधिकारिक शीर्ष एकल गीत, "[[आय किस्ड अ गर्ल]]", 6 मई 2008 को रिलीज़ हुआ। सूची में गीत के चढ़ते जाने के साथ, पेरी वार्षिक [[वार्प्ड टूर]] संगीत समारोह में शामिल हुईं, जहां उनका प्रबंधन "उन्हें एक विश्वसनीय प्रदर्शक के रूप में स्थापित कर रहा था और इस बात को सुनिश्चित कर रहा था कि उन्हें केवल एकल-हिट आश्चर्य के रूप में न देखा जाए."<ref name="HardingSingle"/> यह एकल गीत एक वाणिज्यिक सफलता था, सात सप्ताहों तक यह [[बिलबोर्ड हॉट 100|''बिलबोर्ड'' हॉट 100]] में पहले स्थान पर रहा.<ref name="HardingSingle"/> तब से ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम सहित 30 देशों की सूचियों में शीर्ष तक पहुंचकर<ref name="AllmusicBio"/> यह एक प्रमुख विश्वस्तरीय सफलता बन गया है।<ref>{{cite web|url=http://acharts.us/song/35582|title=Katy Perry&nbsp;— I Kissed A Girl|publisher=αCharts.us|accessdate=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090218152118/http://acharts.us/song/35582|archive-date=18 फ़रवरी 2009|url-status=live}}</ref> 12 जून 2008 को पेरी दिन में प्रसारित होने वाले एक [[धारावाहिक]], ''[[द यंग एन्ड द रेस्टलेस]]'', में स्वयं के रूप में दिखाईं दीं<ref name="DeLeonStars"/> और वे काल्पनिक पत्रिका ''[[रेस्टलेस स्टाइल]]'' के जून 2008 संस्करण के मुख्य-पृष्ठ पर चित्रित हुईं.<ref>{{cite web|url=http://www.restlessstyle.com/beauty/2008/06/the_chic_chanteuse.php|title=Katy Perry&nbsp;— The Chic Chanteuse&nbsp;— Part 1|date=12 जून 2008|work=[[Restless Style (magazine)|Restless Style]]|accessdate=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090211061225/http://www.restlessstyle.com/beauty/2008/06/the_chic_chanteuse.php|archive-date=11 फ़रवरी 2009|url-status=dead}}</ref> [[चित्र:Katy perry live berlin postbahnhof.JPG|thumb|left|कैटी पेर्री बर्लिन में प्रदर्शन करती है, सितम्बर 2008.]] ''वन ऑफ द बॉयज़'' 17 जून 2008 को मिश्रित समालोचनाओं के साथ रिलीज़ हुआ।<ref>{{cite web|url=http://www.metacritic.com/music/artists/perrykaty/oneoftheboys|title=One Of The Boys|publisher=[[Metacritic]]|accessdate=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090227060410/http://www.metacritic.com/music/artists/perrykaty/oneoftheboys|archive-date=27 फ़रवरी 2009|url-status=live}}</ref> यह अल्बम [[बिलबोर्ड 200|''बिलबोर्ड'' 200]] में नवें स्थान पर पहुंच गया है<ref>{{cite web|url=http://www.billboard.com/bbcom/retrieve_chart_history.do?model.chartFormatGroupName=Albums&model.vnuArtistId=958673&model.vnuAlbumId=1143710|title=Artist Chart History&nbsp;— Katy Perry|work=Billboard|publisher=Nielsen Business Media, Inc|accessdate=2 मार्च 2009|archiveurl=https://web.archive.org/web/20080608155511/http://www.billboard.com/bbcom/retrieve_chart_history.do?model.chartFormatGroupName=Albums&model.vnuArtistId=958673&model.vnuAlbumId=1143710|archivedate=8 जून 2008|url-status=live}}</ref> और इसे [[रिकॉर्डिंग इन्डस्ट्री असोसियेशन ऑफ अमेरिका]] द्वारा [[प्लेटिनम]] प्रमाणपत्र दिया गया है।<ref>{{cite web|url=http://www.riaa.com/goldandplatinumdata.php?resultpage=1&table=SEARCH_RESULTS&artist=Katy%20Perry&startMonth=1&endMonth=1&startYear=1958&endYear=2009&sort=Artist&perPage=25|title=Gold and Platinum|publisher=Recording Industry Association of America|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20130729105556/http://www.riaa.com/goldandplatinumdata.php?resultpage=1&table=SEARCH_RESULTS&artist=Katy%20Perry&startMonth=1&endMonth=1&startYear=1958&endYear=2009&sort=Artist&perPage=25|archive-date=29 जुलाई 2013|url-status=live}}</ref> पेरी ने अपना दूसरा एकल गीत "[[हॉट एन कोल्ड]]" रिलीज़ किया, जो संयुक्त राज्य अमरीका, जहां यह [[बिलबोर्ड हॉट 100|''बिलबोर्ड'' हॉट 100]] में तीसरे स्थान पर पहुंचा<ref name="HardingSingle"/> और साथ ही जर्मनी, कनाडा और डेनमार्क, जहां यह सूचियों में शीर्ष पर पहुंचा, सहित विश्व के एक दर्जन देशों के शीर्ष तीन एकल गीतों में शामिल होने वाला उनका दूसरा गीत बन गया। रैप्ड टूर में अपना प्रदर्शन समाप्त करने के बाद पेरी यूरोप के टूर पर निकल गईं. बाद में उन्होंने जनवरी 2009 में अपना पहला शीर्षक टूर, [[हैलो कैटी टूर]], प्रारंभ किया।<ref name="HardingSingle"/> "आय किस्ड अ गर्ल" ने पेरी को [[2009 ग्रैमी अवार्ड्स]] में [[सर्वश्रेष्ठ महिला पॉप गायन प्रदर्शन]] के लिये नामांकन दिलवाया.<ref>{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1600678/20081204/coldplay.jhtml|title=Lil Wayne, Coldplay Lead Grammy Nominations|last=Harris|first=Chris|date=4 दिसंबर 2008|publisher=MTV|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090308092135/http://www.mtv.com/news/articles/1600678/20081204/coldplay.jhtml|archive-date=8 मार्च 2009|url-status=live}}</ref> [[2008 MTV विडियो म्यूज़िक अवार्ड्स]] में पेरी को सर्वश्रेष्ठ नव कलाकार और सर्वश्रेष्ठ महिला विडियो सहित पांच श्रेणियों के लिये नामांकित किया गया, लेकिन वे [[ब्रिटनी स्पीयर्स]] से हार गईं.<ref>{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1593935/20080902/katy_perry.jhtml|title=Katy Perry's VMA-Nominated 'I Kissed A Girl' Clip Tries Not To Be Too Sexy|last=Vena|first=Jocelyn|date=3 सितंबर 2008|publisher=MTV|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20091028121639/http://www.mtv.com/news/articles/1593935/20080902/katy_perry.jhtml|archive-date=28 अक्तूबर 2009|url-status=live}}</ref> [[2008 MTV यूरोप म्यूज़िक अवार्ड्स]], जिसमें वे सह-आयोजक थीं,<ref>{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1598808/20081107/katy_perry.jhtml|title=Americans Katy Perry, Britney Spears, Kanye West, 30 Seconds To Mars Dominate 2008 MTV EMAs|last=Kaufman|first=Gil|date=7 नवंबर 2008|publisher=MTV|accessdate=16 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090826015037/http://www.mtv.com/news/articles/1598808/20081107/katy_perry.jhtml|archive-date=26 अगस्त 2009|url-status=live}}</ref> में उन्होंने सर्वश्रेष्ठ नव अभिनय का पुरस्कार और 2009 [[BRIT अवार्ड्स]] में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय महिला कलाकार का पुरस्कार जीता.<ref>{{cite news|url=http://www.billboard.com/bbcom/news/duffy-triumphs-with-three-brit-awards-1003942721.story|title=Duffy Triumphs With Three BRIT Awards|last=Paine|first=Andre|date=18 फरवरी 2009|work=Billboard|publisher=Nielsen Business Media, Inc|accessdate=19 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090529075213/http://www.billboard.com/bbcom/news/duffy-triumphs-with-three-brit-awards-1003942721.story|archive-date=29 मई 2009|url-status=live}}</ref> 9 फ़रवरी 2009 को, "आय किस्ड अ गर्ल" और "हॉट एन कोल्ड" दोनों को तीन मिलियन से अधिक एकल डिजिटल बिक्री के लिये [[रिकॉर्डिंग इन्डस्ट्री असोसियेशन ऑफ अमेरिका]] द्वारा तीन-बार प्लेटिनम प्रमाणपत्र दिया गया।<ref>{{cite web|url=http://riaa.com/goldandplatinumdata.php?table=SEARCH_RESULTS|title=Gold and Platinum|publisher=[[Recording Industry Association of America]]|accessdate=20 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20130225031458/http://riaa.com/goldandplatinumdata.php?table=SEARCH_RESULTS|archive-date=25 फ़रवरी 2013|url-status=live}}</ref> [[द मेट्रिक्स के स्व-शीर्षक वाले प्रथम अल्बम]], जिसमें पेरी दिखाई देती हैं, को बाद में पेरी के एकल टूर के दौरान दल के लेबल, लेट'स हियर इट, के माध्यम से रिलीज़ किया गया। जब रिलीज़ की तिथि निर्धारित की गई, तो "आय किस्ड अ गर्ल" सूची में अच्छा प्रदर्शन कर रहा था। मेट्रिक्स के सदस्य [[लॉरेन क्रिस्टी]] ने पेरी से इस निर्णय के बारे में बात की, लेकिन वे ''वन ऑफ द बॉयज़'' का चौथा एकल गीत भेजे जाने तक रिलीज़ को रोकना चाहतीं थीं। उनकी बात-चीत के बावजूद, ''द मेट्रिक्स'' 27 जून 2009 को [[आइट्यून्स स्टोर (iTunes Store)]] के माध्यम से रिलीज़ हुआ।<ref name="KaufmanMatrix">{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1603622/20090127/katy_perry.jhtml|title=The Matrix Drop Long-Lost Album Featuring Katy Perry|last=Kaufman|first=Gil|date=27 जनवरी 2009|publisher=MTV|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100303043708/http://www.mtv.com/news/articles/1603622/20090127/katy_perry.jhtml|archive-date=3 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> दिसम्बर 2008 में, पेरी ने [[ब्रिटिश]] गायिक [[लिली एलन]] से अपनी उस टिप्पणी, जिसमें उन्होंने स्वयं को उनका "दुबला संस्करण" कहा था, के लिये माफी मांगते हुए कहा कि वे केवल मज़ाक कर रहीं थीं।<ref>{{cite news|url=http://www.nme.com/news/lily-allen/41551|title=Katy Perry apologises to Lily Allen for 'fat' comment|date=9 दिसंबर 2008|work=[[NME]]|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090122085306/http://www.nme.com/news/lily-allen/41551|archive-date=22 जनवरी 2009|url-status=live}}</ref> एलन ने बदला लिया और एक ब्रिटिश रेडियो स्टेशन को बताया कि "उन्हें एक तथ्य ज्ञात हुआ[है] कि वे [पेरी] उनका एक अमरीकी संस्करण थीं" क्योंकि उनकी रिकॉर्ड कम्पनी को उनके जैसा "कुछ विवादास्पद और 'कूकी'" ढूंढने की आवश्यकता थी।<ref>{{cite web|url=http://www.capitalradio.co.uk/on-air/lucio/lily-lucio/|title=Lily with Lucio|date=2 दिसंबर 2008|publisher=capitalradio.co.uk|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090220014219/http://www.capitalradio.co.uk/on-air/lucio/lily-lucio/|archive-date=20 फ़रवरी 2009|url-status=dead}}</ref> [[चित्र:Life Ball 2009 Katy Perry 4.jpg|thumb|right|upright|2009 लाइफ बॉल इन विएन्ना में प्रदर्शन करती कैटी पेर्री.]] 16 मई 2009 को पेरी ने [[वियेना]], [[ऑस्ट्रिया]] के वार्षिक [[लाइफ बॉल]] के उदघाटन समारोह में प्रदर्शन किया।<ref>[http://www.dailymail.co.uk/tvshowbiz/article-1184149/Oh-Vienna-Katy-Perry-dons-mermaid-chic-charity-bash-Austria.html ओह वियना!] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100419125737/http://www.dailymail.co.uk/tvshowbiz/article-1184149/Oh-Vienna-Katy-Perry-dons-mermaid-chic-charity-bash-Austria.html |date=19 अप्रैल 2010 }}[http://www.dailymail.co.uk/tvshowbiz/article-1184149/Oh-Vienna-Katy-Perry-dons-mermaid-chic-charity-bash-Austria.html कैटी पेर्री डोंस मरमेड चिक फॉर अ चैरिटी बश इन ऑस्ट्रिया] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100419125737/http://www.dailymail.co.uk/tvshowbiz/article-1184149/Oh-Vienna-Katy-Perry-dons-mermaid-chic-charity-bash-Austria.html |date=19 अप्रैल 2010 }}</ref> जून 2009 में, कैटी पेरी के लिये कार्य कर रहे वकीलों ने [[ऑस्ट्रेलिया]]ई फैशन डिज़ाइनर [[कैटि पेरी]], जो लाउंजवियर के विपणन के लिये स्वयं के नाम का प्रयोग करतीं हैं, के हालिया ट्रेडमार्क का विरोध किया।<ref>[http://www.smartcompany.com.au/intellectual-property/20090616-sydney-fashion-designer-defends-business-against-pop-star-katy-perry.html पॉप स्टार कैटी पेर्री के खिलाफ व्यापार बचाव सिडनी फैशन डिज़ाइनर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100213011654/http://www.smartcompany.com.au/intellectual-property/20090616-sydney-fashion-designer-defends-business-against-pop-star-katy-perry.html |date=13 फ़रवरी 2010 }}, smartcompany.com.au, 16 जून 2009; 5 जुलाई 2009 को अंतिम बार पुनःप्राप्त.</ref> कुछ मीडिया केन्द्रों ने इसे एक कानूनी मुक़दमा कहा, जिसका कैटी ने अपने [[ब्लॉग]] पर खण्डन किया।<ref>[http://www.limelife.com/blog-entry/Katy-Perry-Not-Suing-Fashion-Designer-Katie-Perry/6614.html फैशन डिजाइनर कैटी पेर्री को नालिश नहीं करते हुए केटी पेर्री] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090728173325/http://www.limelife.com/blog-entry/Katy-Perry-Not-Suing-Fashion-Designer-Katie-Perry/6614.html |date=28 जुलाई 2009 }} [[लाइमलाइफ]], 19 जून 2009. 20 जून 2009 को पुनःप्राप्त.</ref> डिज़ाइनर कैटि पेरी अपने ब्लॉग पर लिखतीं हैं कि 10 जुलाई 2009 को IP ऑस्ट्रेलिया के साथ एक सुनवाई में, गायिका के वकीलों ने ट्रेडमार्क पर अपना विरोध वापस ले लिया।<ref>[http://www.katieperry.com.au/process/views/blogView.html?blogId=351 सब ख़तम हो गया!!!] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20091124222744/http://www.katieperry.com.au/process/views/blogView.html?blogId=351 |date=24 नवंबर 2009 }}, डिजाइनर कैटी पेर्री के कपड़ों को ब्लॉग, 18 जुलाई 2009 को पुनःप्राप्त.</ref> === 2009-वर्तमान: ''MTV अनप्लग्ड'' और दूसरा स्टूडियो अल्बम === 28 अगस्त को, [[कोलरेडो]]-स्थित बैण्ड [[3OH!]][[3]] ने उनके गीत "[[स्टारस्ट्रक]]" का रिमिक्स रिलीज़ किया, जिसमें पेरी को एक मेहमान गायिका के रूप में दर्शाया गया है; इस गठबंधन का विचार पेरी के उस टूर के बाद आया, जिसमें3OH!3 को एक समर्थन कार्य के रूप में प्रदर्शित किया गया था। यह गीत 8 सितंबर 2009 को आइट्युन्स पर रिलीज़ किया गया था। अक्टूबर 2009 में, ''[[MTV अनप्लग्ड]]'' ने खुलासा किया कि पेरी उनके लिये प्रस्तुति देने वाले कलाकारों में से एक थीं और वे अपने प्रदर्शन का एक सजीव अल्बम रिलीज़ करेंगी, जिसमें दो नए गीत, "ब्रिक बाइ ब्रिक" और [[फाउंटेन्स ऑफ वायने]] का शीर्षक गीत "हैकेनसैक", भी शामिल होंगे.<ref name="MTV Unplugged Album">{{cite web|url=http://www.mtv.com/news/articles/1623630/20091012/katy_perry.jhtml|title=Katy Perry's MTV UnpluggedAlbum|publisher=MTV|access-date=5 अप्रैल 2010|archive-url=https://web.archive.org/web/20100302142616/http://www.mtv.com/news/articles/1623630/20091012/katy_perry.jhtml|archive-date=2 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> यह अल्बम 17 नवम्बर को रिलीज़ हुआ और इसमें एक CD और एक DVD दोनों शामिल हैं।<ref name="Amazon: MTV Unplugged">{{cite web|url=http://www.mtv.com/news/articles/1623630/20091012/katy_perry.jhtml|title=Amazon: MTV Unplugged [Live] CD/DVD|publisher=Amazon.com|access-date=5 अप्रैल 2010|archive-url=https://web.archive.org/web/20100302142616/http://www.mtv.com/news/articles/1623630/20091012/katy_perry.jhtml|archive-date=2 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> [[दिसम्बर 2009]] में, [[टिम्बालैण्ड]] ने अपना अल्बम ''[[शॉक वैल्यू II]]'' रिलीज़ किया, जिसमें पेरी को प्रदर्शित करनेवाला एक गीत शामिल है। "[[इफ वी एवर मीट अगेन]]" शीर्षक वाले गीत को अल्बम के चौथे एकल गीत के रूप में चुना गया है।<ref name="MediaPlayer Kiisfm.com">{{cite web|url=http://www.kiisfm.com/cc-common/mediaplayer/player.html?redir=yes&mps=ryan.php&mid=http://a1135.g.akamai.net/f/1135/18227/1h/cchannel.download.akamai.com/18227/podcast/LOSANGELES-CA/KIIS-FM/TIMBALAND101609.mp3?CPROG=PCAST?CCOMRRMID&CPROG=RICHMEDIA&MARKET=LOSANGELES-CA&NG_FORMAT=chrrhythmic&NG_ID=kiis102fm&OR_NEWSFORMAT=&OWNER=&SERVER_NAME=www.kiisfm.com&SITE_ID=842&STATION_ID=KIIS-FM&TRACK=|title=MediaPlayer|publisher=kiisfm.com|access-date=16 जून 2020|archive-url=https://www.webcitation.org/69uVHQjTN?url=http://www.kiisfm.com/cc-common/mediaplayer/player.html?redir=yes|archive-date=14 अगस्त 2012|url-status=dead}}</ref> अक्टूबर 2009 में पेरी ने अपने दूसरे स्टूडियो अल्बम पर कार्य शुरु किया। पेरी ने अल्बम के बारे में ''[[रोलिंग स्टोन]]'' से बात की: "दूसरा रिकॉर्ड मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मुझे लगता है कि यह दर्शाता है कि क्या मैं यह करने के लिये बनी हूं, या मैं भाग्यशाली थी। मूल रूप से मैं जो करना चाहती हूं, वह है अपने श्रोताओं को खुद से दूर न करना. मुझे लगता है कि कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि उन्हें किसी एक बात और एक विचार और एक रिकॉर्ड से सफलता मिली और अब वे इसे 180 अंश तक खींचना चाहते हैं और एक पूर्णतः भिन्न कार्य करना चाहते हैं, मैं बिल्कुल मानती हूं कि यह एक गलत कदम है। मुझे लगता है कि आपको इसमें से ही विकसित होना पड़ता है, आप इससे नई शाखाएं निकाल सकते हैं, लेकिन पेड़ को कुछ हद तक वैसा ही रहने दें. कुछ लोग स्वयं को ही पूर्ण समझते हैं और उन्हें लगता है कि वे जो भी कार्य करें, वह सफल होने जा रहा है या सोने में बदलनेवाला है या सही कदम साबित होने वाला है, आपके संगीत को पसंद करनेवाले लोगों और प्रशंसकों के कारण आप यहां हैं, अतः आपको हमेशा अपने कान खुले रखने चाहिए और उनके द्वारा कही जा रही बात सुननी चाहिए. पेरी ने कहा कि वे "निश्चित ही इसे पॉप बनाए रखेंगी. कार्डिगन्स का "लव फूल" मेडोना के "इन्टू द ग्रूव" से मिलता है, लेकिन काव्यात्मक रूप से अस्थियों पर कुछ अधिक मांस के साथ, मैं केवल धुन और नृत्य के बारे में बात करनेवाली नहीं हूं, मुझे अर्थ पर विचार करना पसंद है। पेरी ने इस बारे में ज़्यादा खुलासा नहीं किया कि गीत किस बारे में होंगे और कहा कि वे प्रसिद्धि से लेकर मित्रता तक और उनके "संबंधों" के साथ व्यवहार तक, पिछले वर्ष के उनके जीवन के चक्रवात पर केंद्रित होंगे. ऐसी घोषणा की गई है कि वे [[ग्रेग वेल्स]],<ref>{{Cite web |url=http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090525133430/http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |archive-date=25 मई 2009 |url-status=live }}</ref> [[गाय सिग्सवर्थ]],<ref>{{Cite web |url=http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090525133430/http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |archive-date=25 मई 2009 |url-status=live }}</ref> [[डॉ॰ ल्युक]],<ref>{{Cite web |url=http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090525133430/http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |archive-date=25 मई 2009 |url-status=live }}</ref> [[मैक्स मार्टिन]],<ref>{{Cite web |url=http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090525133430/http://www.rollingstone.com/rockdaily/index.php/2009/05/19/katy-perry-talks-pop-plans-for-next-lp-dispels-personal-rumors/ |archive-date=25 मई 2009 |url-status=live }}</ref> [[कैल्विन हैरिस]],<ref>{{Cite web |url=http://www.digitalspy.co.uk/music/news/a160271/harris-confirms-katy-perry-collaboration.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110728171431/http://www.digitalspy.co.uk/music/news/a160271/harris-confirms-katy-perry-collaboration.html |archive-date=28 जुलाई 2011 |url-status=live }}</ref> [[रयान टेडर]], [[द-ड्रीम]] और [[क्रिस्टोफर "ट्रिकी" स्टीवर्ट]], जिन्होंने [[दिसम्बर 2009]] में ''[[रैप-अप]]'' पत्रिका को बताया कि अल्बम का संगीत, ''वन ऑफ द बॉयज़'' के संगीत के समान ही, पॉप/रॉक होगा, सहित अनेक कलाकारों और निर्माताओं के साथ काम कर रहीं हैं। उन्होंने जोड़ा: "मेरे लिये यह एक भिन्न गियर है। मेरे लिये यह एक बहुत महत्वपूर्ण परियोजना है क्योंकि लोग यह देखने के लिये इंतज़ार कर रहे हैं कि मैं क्या करनेवाली हूं."<ref>{{Cite web |url=http://www.digitalspy.co.uk/music/news/a185960/katy-perry-working-with-beyonce-producer.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20091112101656/http://www.digitalspy.co.uk/music/news/a185960/katy-perry-working-with-beyonce-producer.html |archive-date=12 नवंबर 2009 |url-status=live }}</ref> == संगीत और धुनें == [[चित्र:Katy Perry performing.jpg|thumb|upright|अगस्त 2008 में प्रदर्शन करती कैटी पेर्री]] पेरी के पास एक [[कॉन्ट्राल्टो]] गायन श्रेणी है।<ref>{{cite web|url=http://www.mtvasia.com/Review/CD/C20081103001722.html|title=Katy Perry: One of the Boys|last=Leong|first=Cheryl|date=3 नवंबर 2008|publisher=MTV Asia|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100817025349/http://www.mtvasia.com/Review/CD/C20081103001722.html|archive-date=17 अगस्त 2010|url-status=dead}}</ref> संगीत में पेरी को प्रभावित करनेवालों में [[एलेनिस मॉरिसेट]],<ref name="ScaggsQ&A"/><ref name="AllmusicBio">{{cite web|url=http://www.allmusic.com/artist/p1010533|title=Katy Perry: Biography|last=Leahey|first=Andrew|author2=Birchmeier, Jason|publisher=Allmusic|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20110604234654/http://www.allmusic.com/artist/p1010533|archive-date=4 जून 2011|url-status=live}}</ref> [[पॉप रॉक]]र [[सिन्डी लॉपेर]], [[पैट बेनैटर]], [[जोआन जेट]], [[शर्ली मैन्सन]]<ref name="VesilindFashion">{{cite news|url=http://articles.latimes.com/2008/jun/15/image/ig-katy15|title=Singer Katy Perry has the fashion world abuzz|last=Vesilind|first=Emili|date=15 जून 2008|work=Los Angeles Times|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090720101102/http://articles.latimes.com/2008/jun/15/image/ig-katy15|archive-date=20 जुलाई 2009|url-status=live}}</ref> और ब्रिटिश बैण्ड [[क़्वीन]] के स्वर्गीय फ्रन्टमैन [[फ़्रेडी मर्क्युरी]]<ref name="PerryScoop"/> शामिल हैं। [[गॉस्पेल संगीत]] सुनते हुए पली-बढ़ी पेरी ने जब गीत सिकॉर्ड करना शुरु किया, तो उनके पास कुछ ही संदर्भ थे।<ref name="PerryScoop"/> जब निर्माता ने पूछा कि वे किसके साथ जुड़ना चाहेंगी, तो पेरी कुछ तय नहीं कर सकीं. उस रात वे अपनी मां के साथ एक होटल में गईं. अंदर, उन्होंने [[VH1]] शुरु किया और निर्माता [[ग्लेन बैलार्ड]] को मॉरिसेट के बारे में बात करते हुए देखा;<ref name="PerryScoop"/> बैलार्ड ने ही मॉरिसेट के ''[[जैग्ड लिटिल पिल]]'', एक अल्बम जिसका पेरी पर "अत्यंत प्रभाव" था, का निर्माण किया था।<ref name="HarrisRisque"/> उन्होंने अपने पहले सहयोगी को बताया कि उन्होंने बैलार्ड के साथ कार्य करने का निर्णय लिया है। निर्माता ने लॉस एंजल्स में उनके और बैलार्ड के बीच एक भेंट आयोजित की. पेरी ने उनके सामने एक गीत प्रस्तुत किया और एक दिन बाद उन्हें बुलाया गया। बैलार्ड ने कुछ वर्षों तक पेरी को विकसित किया।<ref name="PerryScoop"/> पेरी ने यह कहते हुए अपने संगीत का वर्णन किया, "मानो किसी ने मेरे लिए किसी दिन यह लिख दिया था और मैं तब से इसका इस्तेमाल करती आ रही हूं."<ref name="PerryScoop"/> उनके अनुसार, वे "15 से 23 वर्ष की आयु के बीच बहुत अधिक बदल गई हैं।"<ref name="GraffBold"/> उनका पहला अल्बम गॉस्पेल संगीत पर आधारित है।<ref name="GraffBold"/><ref name="HardingSingle"/> उन्होंने जोड़ा कि संगीत में उनका दृष्टिकोण "कुछ बंधा हुआ और अत्यंत सख़्त" था और उनका प्रत्येक कार्य चर्च से संबंधित था।<ref name="GraffBold"/> उनके दूसरे अल्बम, ''वन ऑफ द बॉयज़'', को "धर्मनिरपेक्ष" और "रॉक" के रूप में वर्णित किया गया है और यह धार्मिक संगीत की जड़ों से उनके प्रस्थान को प्रतिबिम्बित करता है।<ref>{{cite web|url=http://thescotsman.scotsman.com/features/Interview-Katy-Perry--Hot.4988069.jp|title=nterview: Katy Perry&nbsp;— Hot N Bold|last=Graff|first=Gary|date=21 फरवरी 2009|work=The Scotsman|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090307025809/http://thescotsman.scotsman.com/features/Interview-Katy-Perry--Hot.4988069.jp|archive-date=7 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> पेरी अपने अगले अल्बम के लिये अधिक [[पॉप]] गीत रिकॉर्ड करने की उम्मीद रखती हैं।<ref name="17Style"/><ref>{{cite news|url=http://www.ok-magazine.com/news/view/11723|title=Katy Perry: No Sex Would Kill Me|date=6 फरवरी 2009|work=[[OK!]]|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090210190630/http://ok-magazine.com/news/view/11723|archive-date=10 फ़रवरी 2009|url-status=dead}}</ref> पेरी अपनी परियोजनाओं, विशेष रूप से लेखन प्रक्रिया, में कलात्मक रूप से शामिल हैं। चूंकि वे गिटार बजा सकती हैं, अतः वे घर में गीत लिखना शुरु करेंगी और उसे अपने निर्माताओं को प्रस्तुत करेंगी. अधिकांशतः पेरी अपने जीवन के विशिष्ट क्षणों से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा कि दिल टूटने के बारे में लिखना उनके लिये सरल है।<ref name="PerryScoop"/> ''वन ऑफ द बॉयज़'' की अधिकांश धुनें दिल टूटने, किशोर साहस और "शौचालयों में उल्टियां करने" से संबंधित हैं।<ref name="HarrisRisque"/> ऐसा कहा जाता है कि पेरी की मां ने ब्रिटिश समाचार-पत्रिका ''[[डेली मेल]]'' को बताया कि वे अपनी बेटी के संगीत को नापसंद करती हैं और उन्होंने इसे "शर्मनाक और घिनौना" क़रार दिया.<ref name="GraffBold"/><ref name="VenaRumors"/> पेरी ने कहा कि उनकी मां को गलत रूप से उद्धृत किया गया था और [[MTV]] को बताया कि वह जानकारी गलत थी।<ref name="VenaRumors"/> उनके गीत "यूर सो गे" और "आय किस्ड अ गर्ल" को धार्मिक और [[समलैंगिक]] दोनों क्षेत्रों से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं।<ref name="VenaRumors">{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1593166/20080820/katy_perry.jhtml|title=Katy Perry Responds To Rumors Of Parents' Criticism: 'They Love And Support Me'|last=Vena|first=Jocelyn|date=20 अगस्त 2008|publisher=MTV|accessdate=16 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100328140839/http://www.mtv.com/news/articles/1593166/20080820/katy_perry.jhtml|archive-date=28 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> इन गीतों को क्रमशः [[होमोफोबिक]] और [[समलैंगिकता]] को बढ़ावा देने वाले और साथ ही "[[लेज़]][[प्लॉइटेशनल]]" के रूप में चिन्हित किया गया है।<ref name="GraffBold"/> MTV ने आलोचना का उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि पेरी अपने रिकॉर्डों की बिक्री के एक तरीके के रूप में "द्वि-जिज्ञासा" का प्रयोग कर रहीं हैं।<ref name="VenaRumors"/> पेरी ने "यूर सो गे" से जुड़े विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा: "यह कोई नकारात्मक संकेतार्थ नहीं है। यह, "यू आर सो लेम (तुम बहुत अपाहिज हो) के समान "यू आर सो गे (तुम बहुत समलैंगिक हो) नहीं है, बल्कि विषय का तथ्य यह है कि यह लड़का समलैंगिक होना चाहिए था। मैं पूरी तरह समझती हूं कि इसे किस प्रकार गलत रूप से या किसी और तरह से गढ़ा जा सकता है।.. यह विशिष्ट रूप से [[रूढ़िवादी]] नहीं था, मैं पूर्व प्रेमियों के बारे में बात कर रही थी।"<ref>{{cite web|url=http://www.thenewgay.net/2008/06/katy-perry-new-gay-interview.html|title=Katy Perry: The New Gay Interview|date=10 जून 2008|publisher=TheNewGay.net|accessdate=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090202052636/http://www.thenewgay.net/2008/06/katy-perry-new-gay-interview.html|archive-date=2 फ़रवरी 2009|url-status=dead}}</ref> == शैली और छवि == [[चित्र:Katy Perry singing 2, by medigirol.jpg|thumb|left|कैटी पेर्री गायन]] पैरी को पोशाक की उनकी अपरंपरागत शैली के लिये जाना जाता है।<ref name="17Style"/> यह अक्सर परिहासपूर्ण, भड़कीले रंग वाली और विभिन्न दशकों की याद दिलानेवाली होती है और अक्सर उनके वस्त्रों के भाग के रूप में फलों, मुख्यतः [[तरबूज]], के आकार के उपसाधनों का प्रयोग करती है।<ref name="VesilindFashion"/> उनके काले बाल उनके रूप की पहचान हैं, लेकिन "[[यूर सो गे]]" शो के म्यूज़िक विडियो की तरह, प्राकृतिक रूप से उनके बाल सुनहरे भूरे हैं और उन्होंने अपने बालों और भौहों को गहरे रंग में रंगा है। कम उम्र में ही नृत्य सीखने के कारण उन्होंने सोचा कि उनकी स्वयं की एक शैली हो. एक कलाकार के रूप में पैरी का रूपांतरण ''[[लोलिता]]'' नामक उपन्यास पर आधारित [[1997 के फिल्म अनुकूलन]] में अमरीकी फिल्म अभिनेत्री [[डॉमिनिक स्वेन]] के चित्रण से प्रेरित फैशन के साथ शुरु हुआ।<ref name="HarrisRisque"/> वे अपनी फैशन शैली को "विभिन्न वस्तुओं के एक मिश्रण" के रूप में परिभाषित करती हैं।<ref name="17Style"/> पेरी के स्टाइलिस्ट, जॉनी वुजेक, ने उनसे पहली बार मिलने पर उनकी शैली का वर्णन "बहुत रंगीन और विशिष्ट" के रूप में किया।<ref>{{cite web|url=http://www.cosmogirl.com/blog/katy-perry-stylist|title=Katy Perry's Style Secrets|last=Tibbetts|first=Tammy|date=8 अक्टूबर 2008|work=Cosmogirl|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090305213813/http://www.cosmogirl.com/blog/katy-perry-stylist|archive-date=5 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> उनके फैशन ने डिज़ाइनरों का ध्यान आकर्षित किया है, जो उन पर लगभग उतना ही ध्यान दे रहे थे, जितना कि उनके संगीत के प्रशंसक.<ref name="GraffBold"/><ref name="VesilindFashion"/> जून 2008 में, एक प्रचार चित्र की आलोचना हुई, जिसमें पेरी को एक [[बटनदार चाकू]] के साथ दर्शाया गया था।<ref name="Times">{{cite news|url=http://entertainment.timesonline.co.uk/tol/arts_and_entertainment/music/article4990823.ece|title=Pop star Katy Perry under fire for posing with a knife|date=22 अक्टूबर 2008|work=The Times|accessdate=5 दिसंबर 2008|archive-date=12 फ़रवरी 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210212202928/https://www.the-tls.co.uk/|url-status=dead}}</ref> पेरी को एक "कामुक, सख़्त छोर" देने का एक प्रयास-मात्र कहकर इस चित्र का बचाव किया गया।<ref name="Times"/> उन पर की गई आलोचना का उपहास करते हुए पेरी ने बाद में एक [[चम्मच]] के साथ चित्र खिंचवाया.<ref>{{Cite web |url=http://www.telegraph.co.uk/news/newstopics/celebritynews/3267762/Katy-Perry-the-singer-mocks-knife-picture-by-posing-with-a-spoon.html |title=कैटी पेर्री, एक गायक चम्मच के साथ पोज़ देते हुए नकली चाकू के तस्वीर के साथ |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100323091535/http://www.telegraph.co.uk/news/newstopics/celebritynews/3267762/Katy-Perry-the-singer-mocks-knife-picture-by-posing-with-a-spoon.html |archive-date=23 मार्च 2010 |url-status=live }}</ref> == निजी जीवन == पेरी अनेक वर्षों तक [[जिम क्लान हीरोज़]] के फ्रंटमैन [[ट्रैविस मैक्कॉय]], जिनसे वह न्यूयॉर्क के एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में मिलीं थीं,<ref name="SumnerTrouble">{{cite web|url=http://www.stuff.co.nz/sundaystartimes/4738482a20517.html|title=Katy Perry: Girl trouble|last=Sumner|first=Bonnie|date=26 अक्टूबर 2008|work=Sunday Star Times|accessdate=28 फरवरी 2009|archive-url=https://www.webcitation.org/6HhMNmkHB?url=http://www.stuff.co.nz/sunday-star-times/entertainment/more-entertainment-stories/688815|archive-date=27 जून 2013|url-status=live}}</ref> के साथ डेटिंग करती रहीं. एक वर्ष से अधिक की मित्रता और अनौपचारिक डेटिंग के बाद, 2008 [[वार्प्ड टूर]] में शामिल होने से ठीक पहले वे अपने रिश्ते के प्रति गंभीर हुए. पेरी और मैक्कॉय का संबंध दिसम्बर 2008 में टूट गया।<ref>{{cite news|url=http://www.people.com/people/article/0, 20249866,00.html|title=Katy Perry & Travis McCoy Break Up|last=Laudadio|first=Marisa|date=2 जनवरी 2009|work=People|accessdate=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20190407133006/https://people.com/people/article/0,|archive-date=7 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref> 2009 की शुरुआत में उन दोनों पुनः डेटिंग करना शुरु किया और कुछ महीनों बाद वे फिर अलग हो गए। ब्रिटिश हास्य-कलाकार [[रसेल ब्राण्ड]] द्वारा दिसम्बर 2009 में प्रेम-प्रस्ताव दिए जाने के बाद पेरी ने अब उनके साथ सगाई कर ली है।<ref>{{Cite web |url=http://www.thesun.co.uk/sol/homepage/showbiz/bizarre/2666479/Lovebirds-Russell-Brand-and-Katy-Perry-pictured-for-first-time-on-date.html |title=ब्रांड नियु लवर्स |access-date=5 अप्रैल 2010 |archive-url=https://web.archive.org/web/20141018114218/http://www.thesun.co.uk/sol/homepage/showbiz/bizarre/2666479/Lovebirds-Russell-Brand-and-Katy-Perry-pictured-for-first-time-on-date.html |archive-date=18 अक्तूबर 2014 |url-status=live }}</ref><ref>{{cite news|url=http://www.hellomagazine.com/celebrities/201001062689/russell-brand/katy-perry/engaged-wed/1/|title=Russell Brand proposes to his American girlfriend Katy Perry|date=6 JANUARY 2010|work=Hello Magazine|accessdate=6 जनवरी 2010|archive-url=https://web.archive.org/web/20100119220644/http://www.hellomagazine.com/celebrities/201001062689/russell-brand/katy-perry/engaged-wed/1/|archive-date=19 जनवरी 2010|url-status=dead}}</ref> == डिस्कोग्राफ़ी == {{main|Katy Perry discography}} ;स्टूडियो एल्बम * ''[[कैटी हडसन]]'' (2001) * ''[[वन ऑफ़ द बॉयस]]'' (2008) * ''TBA'' (2010) ;लाइव एल्बम * ''[[MTV अनप्लग्ड]]'' (2009) == पुरस्कार और नामांकन == {{main article|List of awards and nominations received by Katy Perry}} == सन्दर्भ == {{Reflist|2}} == बाहरी कड़ियाँ == {{commonscat}} * [https://web.archive.org/web/20100527193552/http://www.katyperry.com/ आधिकारिक वेबसाइट] * {{IMDb name|id=2953537|name=Katy Perry}} {{start box}} {{succession box|before=[[Snoop Dogg]]| title=[[MTV Europe Music Awards]] host| years=2008-09| after=TBA}} {{end box}} {{Katy Perry}} {{DEFAULTSORT:Perry, Katy}} [[श्रेणी:1984 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:2000 गायक]] [[श्रेणी:2010 गायक]] [[श्रेणी:21वीं सदी के अमेरिकी लोग]] [[श्रेणी:21वीं सदी के संगीतकारों]] [[श्रेणी:कैलिफ़ोर्निया के अभिनेता]] [[श्रेणी:अमेरिकी ब्लॉगर्स]] [[श्रेणी:अमेरिकी ईसाई]] [[श्रेणी:अमेरिकी कोंटराल्टो]] [[श्रेणी:अमेरिकी नृत्य संगीतकार]] [[श्रेणी:अमेरिकी महिला गिटारवादक]] [[श्रेणी:अमेरिकी महिला गायिका]] [[श्रेणी:अमेरिकन पॉप गायक]] [[श्रेणी:अमेरिकी गायक-गीतकारगण]] [[श्रेणी:BRIT अवार्ड विजेता]] [[श्रेणी:कैपिटल रिकॉर्ड्स कलाकार]] [[श्रेणी:अंग्रेज़ी-भाषा के गायक]] [[श्रेणी:महिला रॉक गायक]] [[श्रेणी:MTV यूरोप म्यूज़िक अवार्ड विजेता]] [[श्रेणी:कैलिफोर्निया से संगीतकार]] [[श्रेणी:सांता बारबरा, कैलिफोर्निया के लोग]] kricgobbmdgkphnpxvlhq01wea153nh 6543819 6543810 2026-04-25T10:46:53Z AMAN KUMAR 911487 व्याकरणिक रूप से शुद्ध, प्रवाहमयी और ज्ञानकोशीय बनाया 6543819 wikitext text/x-wiki {{Infobox musical artist | name = कैटी पेरी | image = KatyPerryWestminst111224 (81 of 95) (54206733094) (cropped 2).jpg | image_size = 250px | caption = 2024 में कैटी पेरी | birth_name = कैथरिन एलिज़ाबेथ हडसन | birth_date = {{birth date and age|1984|10|25|df=yes}} | birth_place = [[सांता बारबरा]], [[कैलिफ़ोर्निया]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] | genre = [[पॉप संगीत|पॉप]], [[रॉक संगीत|रॉक]] | occupation = [[गायक-गीतकार]], [[संगीतकार]] | instrument = [[गायन]], [[गिटार]] | years_active = 2001–वर्तमान | label = रेड हिल (2001)<br />आइलैंड (2003–2004)<br />कोलंबिया (2004–2006)<br />कैपिटल (2007–वर्तमान) | associated_acts = ट्रैविस मैक्कॉय, लिली एलन, केली क्लार्कसन, एशले टिस्डेल, 3OH!3 | website = {{URL|http://www.katyperry.com/}} }} '''कैथरिन एलिज़ाबेथ हडसन''' (जन्म: 25 अक्टूबर 1984), जो अपने मंचीय नाम '''कैटी पेरी''' (Katy Perry) से अधिक प्रसिद्ध हैं, एक अमेरिकी गायिका, गीतकार और [[संगीतकार]] हैं। पेरी 2007 में अपने इंटरनेट हिट गीत "यू आर सो गे" से प्रसिद्ध हुईं और 2008 में उन्होंने अपना सफल एकल गीत "आई किस्ड अ गर्ल" प्रस्तुत किया, जिसने उन्हें विश्वव्यापी पहचान दिलाई। पेरी का जन्म और लालन-पालन [[कैलिफ़ोर्निया]] के सांता बारबरा में ईसाई पादरी अभिभावकों द्वारा हुआ। उनका बचपन केवल गॉस्पेल संगीत सुनते हुए बीता। हाई स्कूल के प्रथम वर्ष के दौरान 'जीईडी' प्राप्त करने के बाद, उन्होंने संगीत को अपने करियर के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। 2001 में उन्होंने 'कैटी हडसन' के नाम से अपना पहला गॉस्पेल अल्बम जारी किया। 2004 में, उन्होंने निर्माण समूह 'द मैट्रिक्स' के साथ एक अल्बम रिकॉर्ड किया, लेकिन वह रिलीज़ नहीं हो सका। 2007 में कैपिटल म्यूज़िक ग्रुप के साथ अनुबंध करने के बाद, उन्होंने मंचीय नाम 'कैटी पेरी' अपनाया और अपना पहला मुख्य-धारा पॉप अल्बम, ''वन ऑफ़ द बॉयज़'' , जारी किया। == प्रारम्भिक जीवन == कैटी पेरी का जन्म कैथरिन एलिज़ाबेथ हडसन के रूप में सांता बारबरा, कैलिफोर्निया में हुआ था।<ref name="DuerdenBigThing">{{Cite web|url=http://www.blender.com/guide/articles.aspx?id=1061|title=The Next Big Thing! Katy Perry Article on Blender :: The Ultimate Guide to Music and More|website=www.blender.com|access-date=2026-04-25}}</ref> उनके माता-पिता दोनों [[पादरी]] हैं। वह अपने परिवार की दूसरी संतान हैं और उनकी एक बड़ी बहन तथा एक छोटा भाई है।<ref name="SheffieldGirl">{{cite web|url=http://www.blender.com/GirlonGirlKatyPerry/articles/41952.aspx|title=Girl on Girl: Katy Perry|last=Rob|first=Sheffield|date=24 सितंबर 2008|work=Blender|access-date=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090312080343/http://www.blender.com/GirlonGirlKatyPerry/articles/41952.aspx|archive-date=12 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> उनकी मां मैरी हडसन का पालन-पोषण दक्षिणी कैलिफोर्निया में हुआ था। उनके चाचा फ्रैंक पेरी और चाची एलीनॉर पेरी जाने-माने निर्देशक थे।<ref name="SheffieldGirl45">{{cite web|url=http://www.blender.com/guide/61418/girlongirl.html?p=4|title=Girl on Girl: Katy Perry|last=Rob|first=Sheffield|date=24 सितंबर 2008|work=Blender|access-date=4 जुलाई 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100802153015/http://www.blender.com/guide/61418/girlongirl.html?p=4|archive-date=2 अगस्त 2010|url-status=dead}}</ref> एक ईसाई परिवार में पली-बढ़ीं पेरी ने नौ वर्ष की आयु से ही अपने चर्च में गाना शुरू कर दिया था और 17 वर्ष की आयु तक वहां गाना जारी रखा।<ref name="PerryScoop">{{cite web|url=http://www.thestarscoop.com/2008/katy-perry.php|title=Katy Perry|publisher=TheStarScoop.com|access-date=28 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100419115612/http://www.thestarscoop.com/2008/katy-perry.php|archive-date=19 अप्रैल 2010|url-status=dead}}</ref> वह केवल गॉस्पेल संगीत ही सुनती थीं, क्योंकि उन्हें 'धर्मनिरपेक्ष संगीत' सुनने की अनुमति नहीं थी।<ref name="MontgomeryGospel">{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1589848/20080623/katy_perry.jhtml|title=Katy Perry Dishes On Her 'Long And Winding Road' From Singing Gospel To Kissing Girls|last=Montgomery|first=James|date=24 जून 2008|publisher=MTV|access-date=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090308092102/http://www.mtv.com/news/articles/1589848/20080623/katy_perry.jhtml|archive-date=8 मार्च 2009|url-status=live}}</ref> बचपन में उन्होंने नृत्य भी सीखा था। हाई स्कूल के बाद, उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा छोड़ दी और संगीत में अपना करियर बनाने का निश्चय किया।<ref name="Toonage">{{cite web|url=http://www.toonage.ca/features/sep2108_katy_perry.shtml|title=Katy Perry Wants to Draw on Your Face|last=Panda|first=Priya|publisher=Toonage|access-date=22 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090316235625/http://www.toonage.ca/features/sep2108_katy_perry.shtml|archive-date=16 मार्च 2009|url-status=dead}}</ref> कुछ समय के लिए उन्होंने सांता बारबरा स्थित म्यूज़िक एकेडमी ऑफ़ द वेस्ट में इतालवी ओपेरा का भी अध्ययन किया। == संगीत करियर == === 2001-07: प्रारंभिक संघर्ष === 15 वर्ष की उम्र में, पेरी के गायन ने टेनेसी के रॉक संगीत दिग्गजों का ध्यान खींचा, जो उन्हें नैशविले ले गए। वहां उन्होंने लोक-संगीत के विशेषज्ञों से गिटार बजाना और गीत लिखना सीखा। 2001 में, उन्होंने ईसाई संगीत लेबल 'रेड हिल' के माध्यम से अपना पहला गॉस्पेल रॉक अल्बम, ''कैटी हडसन'', रिलीज़ किया।<ref name="HardingSingle">{{cite web|url=http://www.billboard.com/bbcom/feature/katy-perry-single-lady-1003940623.story|title=Katy Perry: Single Lady|last=Harding|first=Cortney|date=11 फरवरी 2009|work=Billboard|publisher=Nielsen Business Media, Inc|access-date=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20100317041612/http://www.billboard.com/bbcom/feature/katy-perry-single-lady-1003940623.story|archive-date=17 मार्च 2010|url-status=live}}</ref> हालांकि, लेबल के बंद हो जाने के कारण यह अल्बम व्यावसायिक रूप से असफल रहा। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर 'कैटी पेरी' रख लिया, क्योंकि उनका नाम अभिनेत्री [[केट हडसन]] से काफी मिलता-जुलता था। 17 वर्ष की आयु में वह लॉस एंजिल्स आ गईं और 'आइलैंड रिकॉर्ड्स' के लिए एक अल्बम पर कार्य किया, जो कभी रिलीज़ नहीं हो सका। 2004 में उन्होंने 'कोलंबिया रिकॉर्ड्स' के साथ अनुबंध किया, लेकिन वहां भी बात नहीं बनी और अंततः उन्हें निकाल दिया गया। 2007 में, वर्जिन रिकॉर्ड्स के सीईओ जेसन फ्लोम ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 'कैपिटल म्यूज़िक ग्रुप' के साथ अनुबंधित किया। === 2008-09: ''वन ऑफ़ द बॉयज़'' और सफलता === कैपिटल रिकॉर्ड्स से जुड़ने के बाद, पेरी ने अपने पहले मुख्य-धारा अल्बम ''वन ऑफ़ द बॉयज़'' पर कार्य शुरू किया। नवंबर 2007 में "यू आर सो गे" गीत के साथ उनके प्रचार अभियान की शुरुआत हुई। मई 2008 में उनका पहला आधिकारिक एकल गीत "आई किस्ड अ गर्ल" रिलीज़ हुआ, जिसने उन्हें विश्व स्तर पर मशहूर कर दिया। यह गीत सात हफ्तों तक ''बिलबोर्ड'' हॉट 100 सूची में पहले स्थान पर रहा और लगभग 30 देशों में शीर्ष पर पहुंचा।<ref>{{cite web|url=http://acharts.us/song/35582|title=Katy Perry&nbsp;— I Kissed A Girl|publisher=αCharts.us|access-date=6 मार्च 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090218152118/http://acharts.us/song/35582|archive-date=18 फ़रवरी 2009|url-status=live}}</ref> जून 2008 में उनका अल्बम ''वन ऑफ़ द बॉयज़'' जारी हुआ। इस अल्बम का दूसरा गीत "हॉट एन कोल्ड" भी भारी हिट साबित हुआ। 2009 में पेरी को उनके गीत "आई किस्ड अ गर्ल" के लिए [[ग्रैमी पुरस्कार]] में 'सर्वश्रेष्ठ महिला पॉप गायन प्रदर्शन' श्रेणी में नामांकित किया गया।<ref>{{cite news|url=http://www.mtv.com/news/articles/1600678/20081204/coldplay.jhtml|title=Lil Wayne, Coldplay Lead Grammy Nominations|last=Harris|first=Chris|date=4 दिसंबर 2008|publisher=MTV|access-date=15 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090308092135/http://www.mtv.com/news/articles/1600678/20081204/coldplay.jhtml|archive-date=8 मार्च 2009|url-status=live}}</ref> === 2009-वर्तमान: ''MTV अनप्लग्ड'' और आगे === नवंबर 2009 में, पेरी ने अपना सजीव अल्बम ''MTV अनप्लग्ड'' जारी किया। इस दौरान वे अपने दूसरे स्टूडियो अल्बम पर भी काम कर रही थीं, जिसके लिए उन्होंने मैक्स मार्टिन, डॉ. ल्यूक और रयान टेडर जैसे प्रसिद्ध संगीत निर्माताओं के साथ सहयोग किया। == संगीत शैली और छवि == पेरी की गायन श्रेणी कॉन्ट्राल्टो है। संगीत के क्षेत्र में वे एलानिस मॉरिसेट, पैट बेनाटार, जोआन जेट और रॉक बैंड 'क्वीन' के गायक फ्रेडी मर्करी से काफी प्रभावित रही हैं। पेरी अपनी पोशाक की अपरंपरागत और अनूठी शैली के लिए जानी जाती हैं। वह अक्सर चमकीले रंग, हास्यपूर्ण डिज़ाइनों और फलों के आकार वाले कपड़ों और उपसाधनों का प्रयोग करती हैं।<ref name="VesilindFashion">{{cite news|url=http://articles.latimes.com/2008/jun/15/image/ig-katy15|title=Singer Katy Perry has the fashion world abuzz|last=Vesilind|first=Emili|date=15 जून 2008|work=Los Angeles Times|access-date=13 फरवरी 2009|archive-url=https://web.archive.org/web/20090720101102/http://articles.latimes.com/2008/jun/15/image/ig-katy15|archive-date=20 जुलाई 2009|url-status=live}}</ref> उनके काले बाल उनकी शैली की पहचान बन चुके हैं, हालांकि उनके बालों का प्राकृतिक रंग सुनहरा भूरा है। == डिस्कोग्राफ़ी == ; स्टूडियो अल्बम * ''कैटी हडसन'' (2001) * ''वन ऑफ़ द बॉयज़'' (2008) * ''टीनेज ड्रीम'' (2010) * ''प्रिज़्म'' (2013) * ''विटनेस'' (2017) * ''स्माइल'' (2020) * ''143'' (2024) ; लाइव अल्बम * ''MTV अनप्लग्ड'' (2009) == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == {{commonscat}} * {{IMDb name|id=2953537|name=कैटी पेरी}} [[श्रेणी:1984 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:अमेरिकी महिला गायिका]] [[श्रेणी:अमेरिकी पॉप गायक]] [[श्रेणी:अमेरिकी गायक-गीतकार]] [[श्रेणी:21वीं सदी के अमेरिकी गायक]] [[श्रेणी:कैलिफ़ोर्निया के अभिनेता]] [[श्रेणी:सांता बारबरा, कैलिफोर्निया के लोग]] 9niz5ovqgmjeq6wlp7b91qehy3m14kh साँचा:Infobox language 10 190036 6543803 6543572 2026-04-25T09:35:53Z ङघिञ 872516 6543803 wikitext text/x-wiki {{Infobox | bodyclass = vevent infobox-has-images-with-white-backgrounds | bodystyle = {{#if:{{{boxsize|}}}|width: {{{boxsize}}};}} | abovestyle = font-size:125%; color: {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}} }}|#114057|1}}|white|{{{fontcolor|black}}} }}; background-color: {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}|#114057|{{#if:{{{signers|}}}|silver|{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|Default}}} }} }} }}; | above = <includeonly>{{{name|{{#if:{{#invoke:Wikidata|ViewSomething|labels|en|value}}|{{#invoke:Wikidata|ViewSomething|labels|en|value}}|{{PAGENAMEBASE}}}}}}}</includeonly> | aboveclass = above | subheaderstyle = font-size:110%; color: {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}} }}|#114057|1}}|white|{{{fontcolor|black}}} }}; background-color: {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}|#114057|{{#if:{{{signers|}}}|silver|{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|Default}}} }} }} }}; | subheader1 = {{{altname|}}} | subheader2 = {{{nativename|}}} | subheader3 = {{#if:{{{acceptance|}}}|({{{acceptance|}}})}} | image = {{#invoke:InfoboxImage|InfoboxImage|image={{{image|}}}|upright={{#if:{{{imagescale|}}}|{{{imagescale|}}}|0.9}}|alt={{{imagealt|}}}}} | captionstyle = padding:0.35em 0.35em 0.25em;line-height:1.25em; | caption = {{{imagecaption|}}} | headerstyle = color: {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}}|white|{{{fontcolor|black}}}}}; background-color: {{#if:{{{signers|}}}|silver|{{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}|#114057|{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|Default}}}}}}}}}; <!---------------------------------------------------------> | labelstyle = white-space:nowrap;padding-right:0.65em<!--(to ensure gap between any long/nonwrapped label and subsequent data on same line-->; | datastyle = line-height:1.3em; | label1 = उच्चारण | data1 = {{#if:{{{pronunciation|}}}| {{{pronunciation|''to be added''}}}}} | label2 = {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} | सर्जक | मूल स्थान }} | data2 = {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} |{{{creator|–}}} |{{{states|{{{state|}}}}}} }} | label3 = काल | data3 = {{{created|}}} | label4 = {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} |Setting and usage |{{#if:{{{region|}}}|क्षेत्र}} }} | data4 = {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} |{{{setting|}}} |{{{region|}}} }} | label6 = समुदाय | data6 = {{{ethnicity|}}} | label7 = {{#if:{{{extinct|}}} |[[विलुप्त भाषाएँ|विलुप्त]] |{{#if:{{{era|}}} |काल |{{#if:{{{creator|{{{speakers_label|}}}}}} |{{{speakers_label|वक्ताएँ}}} |{{longitem|मातृभाषियाँ}} }} }} }} | data7 =<!-- -->{{#if:{{{extinct|}}}|{{#ifeq:{{{extinct}}}|?|(date missing)[[Category:Language articles with unknown extinction date]]|{{{extinct}}}}}<!-- extinct input used -->|{{#if:{{{era|}}}|{{{era}}}<!-- era input used -->|<!-- no era, check for sign/spoken -->{{#if:{{{signers|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}} }}|silver|1}}<!-- check for signers/silver -->|<!-- SIGN language (silver) -->{{#if:{{{signers|}}}{{{speakers|}}}|{{#ifeq: {{lc:{{{date}}}}}|na|{{{signers|{{{speakers|–}}}}}} |{{#ifeq:{{{signers|{{{speakers}}}}}}|?|<!-- -->|{{#ifeq:{{{signers|{{{speakers}}}}}}|none|''None'' |{{#if:{{{date|}}}|{{{signers|{{{speakers|–}}}}}}&nbsp;({{{dateprefix|}}}{{{date}}}) |{{{signers|{{{speakers|–}}}}}}{{main other|[[Category:Language articles with speaker number undated]]}}}} }} }} }} }}<!--(end if:date, ifeq:date=na, if:signers. end of SIGN) -->|<!-- SPOKEN language (not silver) -->{{#if:{{{speakers|}}}|{{#ifeq: {{lc:{{{date}}}}}|na|{{{speakers|–}}} |{{#ifeq: {{{date}}}|no date|(undated figure of {{{speakers}}})|<!-- The following changes the display depending on the age of the data. Limit set to 25 years, as a population can double in that time. -->{{#if:{{{date|}}}|{{#iferror:{{#expr: {{padleft:|4|{{{date}}}|}} }}||{{#ifexpr:(({{CURRENTYEAR}} - {{padleft:|4|{{{date}}}|}}) < 25)<!-- -->|<!-- regular-->{{{speakers|–}}}&nbsp;({{{dateprefix|}}}{{{date}}})<!-- -->|<!-- old (25+) -->({{{speakers}}} cited {{{dateprefix|}}}{{{date}}}){{main other|{{#ifeq:{{{ref}}}|e19|[[Category:Language articles with old Ethnologue 19 speaker data]]|{{#ifeq:{{{ref}}}|e18|[[Category:Language articles with old Ethnologue 18 speaker data]]|[[Category:Language articles with old speaker data]]}}}}}}}}}}<!--(end ifexpr:25+, iferror:) -->|{{#ifeq:{{{speakers}}}|?|<!-- -->|{{#ifeq:{{{speakers}}}|none|''None'' |<!-- no date input -->{{{speakers|–}}}{{main other|[[Category:Language articles with speaker number undated]]}}}} }} }}<!--(end if:date, before the 25+ expr check) -->}}<!--(end ifeq:date=no date) -->}}<!--(end ifeq:date=na) -->|<!--(no speakers number to be shown)-->}}}}<!--(end if:speakers (in 2nd param of silver-check), if:silver. end of SPOKEN) -->}} }}<!--(end if:era, if:extinct. No open #if:s left) If there is a ref, and there is any input for this row (data7), then we add the reference: -->{{#if:{{{ref|}}}|{{#if:{{{extinct|}}}{{{era|}}}{{{signers|}}}{{{speakers|}}}{{{date|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|silver|sign_language}}|{{Infobox language/ref|{{{ref}}}|iso3={{{iso3|}}}|refname={{{refname|}}}|name={{{name|{{PAGENAME}}}}}|lc1={{{lc1|}}}|ld1={{Delink|{{{ld1}}}}}|lc2={{{lc2|}}}|ld2={{Delink|{{{ld2}}}}}|lc3={{{lc3|}}}|ld3={{Delink|{{{ld3}}}}}|lc4={{{lc4|}}}|ld4={{Delink|{{{ld4}}}}}|lc5={{{lc5|}}}|ld5={{Delink|{{{ld5}}}}}|lc6={{{lc6|}}}|ld6={{Delink|{{{ld6}}}}}|lc7={{{lc7|}}}|ld7={{Delink|{{{ld7}}}}}}}}}}}<!-- Add speakers2 after the ref: -->{{#if:{{{speakers2|}}}|<br />{{{speakers2|}}} }} | label8 = {{#if:{{{revived|}}} |[[भाषा पुनर्जीवन|पुनर्जीवन]]{{#if:{{{revived-category|{{{revived-cat|}}}}}}|{{#ifeq:{{{revived-category|{{{revived-cat}}}}}}|nocat|<!--suppress-->|[[Category:{{{revived-category|{{{revived-cat}}}}}}]]|[[Category:Language revival]]}} }} }} | data8 = {{{revived|}}} | label9 = {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} |Purpose |{{longitem|{{Wrap|[[भाषा परिवार]]}}}} }} | data9 = {{#ifeq: {{lc:{{{family}}}}}|na||<div style="text-align:left;">{{{family|{{{fam1|{{#if:{{{signers|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|silver|1}} |''अज्ञात''{{main other|[[श्रेणी:वर्गीकरण के बिना भाषाएँ]]}} |{{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}} |[[आयोजित भाषा]] |{{Infobox language/genetic|{{{familycolor|Default}}}}} }} }}}}} <ul style="line-height:100%; margin-left:1.35em;padding-left:0"><li> {{#ifeq:{{{familycolor|}}}|unclassified||{{#ifeq:{{{familycolor|}}}|Unclassified||{{#ifeq:{{{familycolor|}}}|isolate||{{#ifeq:{{{familycolor|}}}|Isolate||{{#if:{{{fam2|}}} | {{{fam2}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam3|}}} | {{{fam3}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam4|}}} | {{{fam4}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam5|}}} | {{{fam5}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam6|}}} | {{{fam6}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam7|}}} | {{{fam7}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam8|}}} | {{{fam8}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam9|}}} | {{{fam9}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam10|}}} | {{{fam10}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam11|}}} | {{{fam11}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam12|}}} | {{{fam12}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam13|}}} | {{{fam13}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam14|}}} | {{{fam14}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>{{#if:{{{fam15|}}} | {{{fam15}}}<ul style="line-height:100%;margin-left:0.45em;padding-left:0;"><li>'''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}'''</li></ul> | '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }}</li></ul>| '''{{#if:{{{name|}}}|{{{name}}}|{{PAGENAME}}}}''' }} }}}}}}}}</li></ul>}}}</div>}} | label10 = {{longitem|{{#if:{{{ancestor2|}}}|प्रारंभिक रूप|प्रारम्भिक रूप}}}} | data10 = {{#if:{{{protoname|}}}{{{ancestor|}}}|<div style="text-align:left;">{{{protoname|{{{ancestor|}}}}}} {{#if:{{{ancestor2|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:1.35em; padding-left:0"><li>{{{ancestor2}}} {{#if:{{{ancestor3|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor3}}} {{#if:{{{ancestor4|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor4}}} {{#if:{{{ancestor5|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor5}}} {{#if:{{{ancestor6|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor6}}} {{#if:{{{ancestor7|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor7}}} {{#if:{{{ancestor8|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor8}}} {{#if:{{{ancestor9|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor9}}} {{#if:{{{ancestor10|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor10}}} {{#if:{{{ancestor11|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor11}}} {{#if:{{{ancestor12|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor12}}} {{#if:{{{ancestor13|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor13}}} {{#if:{{{ancestor14|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor14}}} {{#if:{{{ancestor15|}}}|<ul style="line-height:100%; margin-left:0.45em; padding-left:0"><li>{{{ancestor15}}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </li></ul>}} </div>}} | label11 = {{longitem|मानक रूप}} | data11 = {{#if:{{{standards|}}}|{{{standards}}} |{{#if:{{{stand1|}}}|{{plainlist| *{{{stand1|}}}{{#if:{{{stand2|}}}| *{{{stand2|}}}|}}{{#if:{{{stand3|}}}| *{{{stand3|}}}|}}{{#if:{{{stand4|}}}| *{{{stand4|}}}|}}{{#if:{{{stand5|}}}| *{{{stand5|}}}|}}{{#if:{{{stand6|}}}| *{{{stand6|}}}}}}}}}}} | label12 = {{#if:{{{dialect_label|}}}|{{{dialect_label|}}}|उपभाषाएँ}} | data12 = {{#if:{{{dialects|}}}|{{{dialects}}} |{{#if:{{{dia1|}}}| {{#if:{{{dia1|}}}|*{{{dia1}}}}} {{#if:{{{dia2|}}}|*{{{dia2}}}}} {{#if:{{{dia3|}}}|*{{{dia3}}}}} {{#if:{{{dia4|}}}|*{{{dia4}}}}} {{#if:{{{dia5|}}}|*{{{dia5}}}}} {{#if:{{{dia6|}}}|*{{{dia6}}}}} {{#if:{{{dia7|}}}|*{{{dia7}}}}} {{#if:{{{dia8|}}}|*{{{dia8}}}}} {{#if:{{{dia9|}}}|*{{{dia9}}}}} {{#if:{{{dia10|}}}|*{{{dia10}}}}} {{#if:{{{dia11|}}}|*{{{dia11}}}}} {{#if:{{{dia12|}}}|*{{{dia12}}}}} {{#if:{{{dia13|}}}|*{{{dia13}}}}} {{#if:{{{dia14|}}}|*{{{dia14}}}}} {{#if:{{{dia15|}}}|*{{{dia15}}}}} {{#if:{{{dia16|}}}|*{{{dia16}}}}} {{#if:{{{dia17|}}}|*{{{dia17}}}}} {{#if:{{{dia18|}}}|*{{{dia18}}}}} {{#if:{{{dia19|}}}|*{{{dia19}}}}} {{#if:{{{dia20|}}}|*{{{dia20}}}}} {{#if:{{{dia21|}}}|*{{{dia21}}}}} {{#if:{{{dia22|}}}|*{{{dia22}}}}} {{#if:{{{dia23|}}}|*{{{dia23}}}}} {{#if:{{{dia24|}}}|*{{{dia24}}}}} {{#if:{{{dia25|}}}|*{{{dia25}}}}} {{#if:{{{dia26|}}}|*{{{dia26}}}}} {{#if:{{{dia27|}}}|*{{{dia27}}}}} {{#if:{{{dia28|}}}|*{{{dia28}}}}} {{#if:{{{dia29|}}}|*{{{dia29}}}}} {{#if:{{{dia30|}}}|*{{{dia30}}}}} {{#if:{{{dia31|}}}|*{{{dia31}}}}} {{#if:{{{dia32|}}}|*{{{dia32}}}}} {{#if:{{{dia33|}}}|*{{{dia33}}}}} {{#if:{{{dia34|}}}|*{{{dia34}}}}} {{#if:{{{dia35|}}}|*{{{dia35}}}}} {{#if:{{{dia36|}}}|*{{{dia36}}}}} {{#if:{{{dia37|}}}|*{{{dia37}}}}} {{#if:{{{dia38|}}}|*{{{dia38}}}}} {{#if:{{{dia39|}}}|*{{{dia39}}}}} {{#if:{{{dia40|}}}|*{{{dia40}}}}} }}}} | rowclass12 = {{#if:{{{dialects|}}}||{{#if:{{{dia1|}}}|{{{listclass|{{{liststyle|plainlist}}}}}}}}}} | label13 = {{longitem|{{Wrap|[[लिपि]]}}}} | data13 = {{#switch: {{lc:{{{script|}}}}} | latin | [[लातिन]] | latin alphabet | [[लातिन वर्णमाला]] | [[लातिन वर्णमाला|लातिन]] = [[लातिन लिपि|लातिन]] | #default = {{{script|}}} }} | label14 = {{longitem|{{Wrap|चिह्नित रूप}}}} | data14 = {{#if:{{{sign|}}}|{{{sign}}}}} | label15 = स्रोत | data15 = {{{posteriori|}}} <!---------------------------------------------------------> | header16 = {{#if:{{{nation|}}}{{{official|}}}{{{minority|}}}{{{agency|}}}{{{development_body|}}}|आधिकारिक}} | label17 = {{longitem|आधिकारिक मान्यता}} | data17 = {{{nation|{{{official|}}}}}} | label18 = {{longitem|class=nowrap|अल्पसंख्यक मान्यता}} | data18 = {{#if:{{{minority|}}} |<div style="<!--label17 above almost always linewraps, so:-->vertical-align:middle;">{{{minority}}}</div>}} | label19 = [[List of language regulators|Regulated&nbsp;by]] | data19 = {{{agency|{{#ifexpr:{{#if:{{{agency|}}}|1|0}} and {{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|Default}}}}}|#114057|1}}|1|0}} | ''None'' <!-- | {{#if:{{{nation|}}}|''No official regulation''}} [this ends up claiming that languages have no regulation just because no-one bothered to add the regulator --> }}}}} | label20 = Development body | data20 = {{{development_body|}}} <!---------------------------------------------------------> | header21 = भाषा कोड | label22 = {{nowrap|[[ISO 639-1]]}} | data22 = {{#if:{{{iso1|}}}|<code>{{#ifeq:{{str len|{{{iso1|}}}}}| 2 | {{ISO 639-1|{{{iso1}}}}} | {{{iso1}}} }}</code> {{{iso1comment|}}}}} | label23 = {{nowrap|[[ISO 639-2]]}} | data23 = {{#if:{{{iso2|}}}{{{iso2b|}}}{{{iso2t|}}} |<code>{{#if:{{{iso2b|}}}{{{iso2t|}}} |{{#ifeq:{{str len|{{{iso2b|}}}}}| 3 | {{ISO 639-2|{{{iso2b}}}}} | {{{iso2b}}} }}&nbsp;([[ISO 639-2/B|B]]) |{{#if:{{{signers|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|silver|1}} |{{{iso2|sgn}}} |{{ #if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}} |{{{iso2|art}}} |{{#ifeq:{{str len|{{{iso2|}}}}}| 3 | {{ISO 639-2|{{{iso2}}}}} | {{{iso2}}} }}}}}}}}</code> {{{iso2comment|}}}{{ #if:{{{iso2b|}}}{{{iso2t|}}} |<br /><code>{{#ifeq:{{str len|{{{iso2t|}}}}}| 3 | {{ISO 639-2|{{{iso2t}}}}} | {{{iso2t}}} }}&nbsp;([[ISO 639-2/T|T]])</code>}} }} | label24 = {{nowrap|[[ISO 639-3]]}} | data24 = {{#if:{{{iso3|}}} |{{#ifeq:{{lc:{{{iso3|}}}}}|none|{{#if:{{{iso3comment|}}}|{{{iso3comment}}}|''None'' (<code>mis</code>)}}|<code>{{#ifeq:{{str len|{{{iso3}}}}}| 3 | [[ISO639-3:{{{iso3}}}|{{{iso3}}}]] | {{{iso3}}} }}</code> {{#if:{{{lc1|}}}| – inclusive code<!--not all are 'macrolanguages': Hittite, for example-->}} {{{iso3comment|}}}}}|{{#if:{{{lc1|}}}| |–}}}}{{#ifexpr:{{#if:{{{lc1|}}}|1|0}} and {{#if:{{{lc2|}}}|1|0}}|{{#if:{{{iso3|}}}|<br />Individual codes|{{#if:{{{lc3|}}}|Variously|Either}}}}:{{Infobox language/codelist |{{{lc1|}}}|{{{ld1|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc2|}}}|{{{ld2|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc3|}}}|{{{ld3|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc4|}}}|{{{ld4|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc5|}}}|{{{ld5|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc6|}}}|{{{ld6|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc7|}}}|{{{ld7|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc8|}}}|{{{ld8|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc9|}}}|{{{ld9|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc10|}}}|{{{ld10|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc11|}}}|{{{ld11|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc12|}}}|{{{ld12|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc13|}}}|{{{ld13|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc14|}}}|{{{ld14|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc15|}}}|{{{ld15|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc16|}}}|{{{ld16|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc17|}}}|{{{ld17|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc18|}}}|{{{ld18|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc19|}}}|{{{ld19|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc20|}}}|{{{ld20|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc21|}}}|{{{ld21|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc22|}}}|{{{ld22|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc23|}}}|{{{ld23|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc24|}}}|{{{ld24|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc25|}}}|{{{ld25|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc26|}}}|{{{ld26|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc27|}}}|{{{ld27|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc28|}}}|{{{ld28|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc29|}}}|{{{ld29|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc30|}}}|{{{ld30|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc31|}}}|{{{ld31|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc32|}}}|{{{ld32|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc33|}}}|{{{ld33|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc34|}}}|{{{ld34|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc35|}}}|{{{ld35|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc36|}}}|{{{ld36|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc37|}}}|{{{ld37|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc38|}}}|{{{ld38|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc39|}}}|{{{ld39|}}}}}{{Infobox language/codelist |{{{lc40|}}}|{{{ld40|}}} }} |{{#if:{{{lc1|}}}|{{#if:{{{iso3|}}}|<br />Individual code:}}{{Infobox language/codelist|code={{{lc1}}}|2={{{ld1|}}} }} }} }} | label25 = {{nowrap|[[ISO 639-6]]}}<!-- NOTE: ISO 639-6 was withdrawn in 2014.--> | data25 = {{#if:{{{iso6|}}}|<code>{{{iso6}}}</code>[[श्रेणी:ISO6 कोड के साथ भाषाएँ]]}} | label26 = {{longitem|[[Linguist List]]}} | data26 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist|}}} |2={{{lingname|}}}}} | label27 = &nbsp; | data27 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist2|}}}|2={{{lingname2|}}}}} | label28 = &nbsp; | data28 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist3|}}}|2={{{lingname3|}}}}} | label29 = &nbsp; | data29 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist4|}}}|2={{{lingname4|}}}}} | label30 = &nbsp; | data30 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist5|}}}|2={{{lingname5|}}}}} | label31 = &nbsp; | data31 = {{Infobox language/linguistlist|1={{{linglist6|}}}|2={{{lingname6|}}}}} | label32 = ''[[ग्लोटोलॉग]]'' | data32 = {{#if:{{{glotto|}}}|{{#ifeq:{{lc:{{{glotto|}}}}}|none|''None''[[Category:Languages without Glottolog code]]|{{#ifeq:{{lc:{{{glotto|}}}}}|spurious|(insufficiently attested or not a distinct language){{main other|[[Category:Languages rejected by Glottolog]]}}|<code>{{glottolink|{{{glotto}}}}}</code>{{#if:{{{glottoname|}}}|&nbsp; {{{glottoname}}}}}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto2|}}}|{{#if:{{{glotto|}}}|<br />|<!--no break when more than one box on a page-->}}<code>{{glottolink|{{{glotto2}}}}}</code>{{#if:{{{glottoname2|}}}|&nbsp; {{{glottoname2}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto3|}}}|{{#if:{{{glotto2|}}}|<br />|<!--no break-->}}<code>{{glottolink|{{{glotto3}}}}}</code>{{#if:{{{glottoname3|}}}|&nbsp; {{{glottoname3}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto4|}}}|{{#if:{{{glotto3|}}}|<br />|<!--no break-->}}<code>{{glottolink|{{{glotto4}}}}}</code>{{#if:{{{glottoname4|}}}|&nbsp; {{{glottoname4}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto5|}}}|{{#if:{{{glotto4|}}}|<br />|<!--no break-->}}<code>{{glottolink|{{{glotto5}}}}}</code>{{#if:{{{glottoname5|}}}|&nbsp; {{{glottoname5}}}}}}} | label33 = [[Australian Institute of Aboriginal and Torres Strait Islander Studies|AIATSIS]]{{#if:{{{aiatsis|}}}|{{#tag:ref|{{AIATSIS|{{{aiatsis|}}}|{{{aiatsisname|{{{name}}}}}}|{{{aiatsis2|}}}}}|name="AIATSIS"}}}} | data33 = {{#if:{{{aiatsis|}}}|<code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis}}} {{{aiatsis}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname}}}}} }}{{#if:{{{aiatsis2|}}}|, <code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis2}}} {{{aiatsis2}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname2|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname2}}}}} }}{{#if:{{{aiatsis3|}}}|, <code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis3}}} {{{aiatsis3}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname3|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname3}}}}} }}{{#if:{{{aiatsis4|}}}|, <code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis4}}} {{{aiatsis4}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname4|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname4}}}}} }}{{#if:{{{aiatsis5|}}}|, <code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis5}}} {{{aiatsis5}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname5|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname5}}}}} }}{{#if:{{{aiatsis6|}}}|, <code>[https://collection.aiatsis.gov.au/austlang/language/{{{aiatsis6}}} {{{aiatsis6}}}]</code>{{#if:{{{aiatsisname6|}}}|&nbsp;{{{aiatsisname6}}}}} }} | label34 = {{longitem|{{Wrap|[[Guthrie classification of Bantu languages|Guthrie code]]}}}} | data34 = {{#if:{{{guthrie|}}}|<code>{{{guthrie}}}</code><ref name="Guthrie">Jouni Filip Maho, 2009. [https://web.archive.org/web/20180203191542/http://goto.glocalnet.net/mahopapers/nuglonline.pdf New Updated Guthrie List Online]</ref>}} | label35 = [[Endangered Languages Project|ELP]] | data35 = {{#ifeq: {{lc: {{{ELP|}}} }} | none | | {{Endangered Languages Project |ELP={{{ELP|}}} |ELPname={{{ELPname|}}} |qid={{{qid|}}} }} }} | label36 = &nbsp;<!--keeps ELP entries aligned--> | data36 = {{#if:{{{ELP2|}}}|[https://www.endangeredlanguages.com/elp-language/{{{ELP2}}} {{{ELPname2}}}]{{Main other|[[Category:Language articles with manual ELP links]]}}}} | label37 = &nbsp; | data37 = {{#if:{{{ELP3|}}}|[https://www.endangeredlanguages.com/elp-language/{{{ELP3}}} {{{ELPname3}}}]{{Main other|[[Category:Language articles with manual ELP links]]}}}} | label38 = &nbsp; | data38 = {{#if:{{{ELP4|}}}|[https://www.endangeredlanguages.com/elp-language/{{{ELP4}}} {{{ELPname4}}}]{{Main other|[[Category:Language articles with manual ELP links]]}}}} | label39 = &nbsp; | data39 = {{#if:{{{ELP5|}}}|[https://www.endangeredlanguages.com/elp-language/{{{ELP5}}} {{{ELPname5}}}]{{Main other|[[Category:Language articles with manual ELP links]]}}}} | label40 = &nbsp; | data40 = {{#if:{{{ELP6|}}}|[https://www.endangeredlanguages.com/elp-language/{{{ELP6}}} {{{ELPname6}}}]{{Main other|[[Category:Language articles with manual ELP links]]}}}} | label41 = [[ग्लोटोपीडिया]] | data41 = {{#if:{{{glottopedia|}}}|<code>[http://www.glottopedia.org/index.php/{{{glottopedia}}} {{{glottopedia}}}]</code>{{#tag:ref|[http://www.glottopedia.org/index.php/{{{glottopedia}}} Glottopedia article on {{PAGENAMEBASE}}].|name="Glottopedia"}}}} | label42 = भाषा-क्षेत्र | data42 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua|}}} |2={{{linguaname|}}}}} | label43 = &nbsp; | data43 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua2|}}}|2={{{linguaname2|}}}}} | label44 = &nbsp; | data44 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua3|}}}|2={{{linguaname3|}}}}} | label45 = &nbsp; | data45 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua4|}}}|2={{{linguaname4|}}}}} | label46 = &nbsp; | data46 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua5|}}}|2={{{linguaname5|}}}}} | label47 = &nbsp; | data47 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua6|}}}|2={{{linguaname6|}}}}} | label48 = &nbsp; | data48 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua7|}}}|2={{{linguaname7|}}}}} | label49 = &nbsp; | data49 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua8|}}}|2={{{linguaname8|}}}}} | label50 = &nbsp; | data50 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua9|}}}|2={{{linguaname9|}}}}} | label51 = &nbsp; | data51 = {{Infobox language/lingualist|1={{{lingua10|}}}|2={{{linguaname10|}}}}} | label52 = [[IETF भाषा टैग|IETF]] | data52 = {{#if:{{{ietf|}}}|<code>{{{ietf}}}</code>{{Main other|[[Category:Language articles with IETF language tag]]}}}} <!-- --> | header53 = भाषा संरक्षण स्थिति | data54 = |data54 = {{#if:{{{status_konservasi|}}}{{{sk|}}}{{{conservation_status|}}}{{{cs|}}}{{{era|}}}{{{extinct|}}}{{{type|}}}{{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P1999|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}{{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P3823|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}|{{anchor|Conservation_status}} {{Infobox |bodyclass=mw-collapsible | datastyle = line-height:1.35em;text-align:left;padding-left:0.3em;padding-right:0.3em |headerstyle=opacity:80%;color: {{#if:{{{created|}}}{{{pembuat|}}}{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|black|1}}|white|{{{fontcolor|black}}}}}; background-color: {{#if:{{{penanda|}}}{{{signers|}}}|silver|{{#if:{{{pembuat|}}}{{{creator|}}}{{{setting|}}}|#114057|{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|Default}}}}}}}}};line-height:normal;padding:0.2em; |bodystyle={{Subinfobox bodystyle}};margin-top:0.3em; |header54= संरक्षण स्थिति |data55= <!-- NILAI MANUAL --> {{#if:{{{status_konservasi|}}}{{{sk|}}}{{{conservation_status|}}}{{{cs|}}} {{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P1999|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}|{{स्टेटस भाषा|1={{{status_konservasi|{{{sk|{{{conservation_status|{{{cs|{{#if:{{{status_konservasi|}}}{{{sk|}}}{{{conservation_status|}}}{{{cs|}}}|NA|{{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P1999|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}}}}}}}}}}}}}}}|name={{{nama|{{{name|{{pagename}}}}}}}}|child=yes }} }} <!-- UNTUK NILAI OTOMATIS --> {{#ifeq:{{{revived|}}}{{{revived-category|}}}||{{#if:{{{era|}}}{{{extinct|}}}|{{स्टेटस भाषा|1=EX|name={{{nama|{{{name|{{pagename}}}}}}}}|child=yes }} }}}} |data52= {{#if:{{{ethnos|}}}{{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P3823|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}| {{स्टेटस भाषा |child=yes |type=Ethnologue |ISO ={{#ifeq:{{{iso2|}}}| |{{#ifeq:{{{iso3|}}}|||{{{iso3|}}} }} |{{{iso2|}}} }} |1={{{ethnos|{{#invoke:WikidataIB/sandbox|getValue|P3823|fetchwikidata=ALL|onlysourced=no| noicon = yes |linked=false}}}}} }} }} }} }} <!-- --> | data56 = {{#if:{{{map|}}} |{{#invoke:InfoboxImage|InfoboxImage|image={{{map}}}|upright={{#if:{{{mapscale|}}}|{{{mapscale|}}}|1.15}}|alt={{{mapalt|}}}}}{{#if:{{{mapcaption|}}}|<div style="text-align:left;">{{{mapcaption}}}</div>}}| }} | data57 = {{#if:{{{map2|}}} | {{#invoke:InfoboxImage|InfoboxImage|image={{{map2}}}|upright={{#if:{{{mapscale|}}}|{{{mapscale|}}}|1.45}}|alt={{{mapalt2|}}}}}{{#if:{{{mapcaption2|}}}|<div style="text-align:left;">{{{mapcaption2}}}</div>}} }} | data58 = {{#if:{{both| {{{pushpin_map|}}} | {{{coordinates|}}}{{{coords|}}} }}| {{location map|{{{pushpin_map|}}} |coordinates = {{if empty|{{{coordinates|}}}|{{{coords|}}}}} |border = infobox |alt = {{{pushpin_map_alt|Approximate location where {{{name|the language}}} is spoken}}} |caption = {{{pushpin_map_caption|}}} |float = center |width = {{{pushpin_mapsize|}}} |default_width = 250 |AlternativeMap = {{{pushpin_image|}}} |label = {{#ifeq: {{lc: {{{pushpin_label_position|}}} }} | none | | {{if empty|{{{pushpin_label|}}}|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}} }} }} |marksize =6 |position = {{{pushpin_label_position|}}} }} }} | data59 = {{#if:{{if empty|{{{coordinates|}}}|{{{coords|}}}}} |Coordinates: {{#invoke:Coordinates|coordinsert|{{{coordinates|{{{coords|}}}}}}|type:landmark}}| }} | data60 = {{{module|}}} <!---------------------------------------------------------> | belowclass = noprint selfref | belowstyle = background-color:#E7E7FF;color:inherit;padding:0.3em 0.5em;text-align:left;line-height:1.3; | below = {{#ifeq:{{lc:{{{notice|{{{notice2|}}}}}}}}|ipa |'''This article contains [[International Phonetic Alphabet|IPA]] phonetic symbols.''' Without proper [[Help:IPA#Rendering issues|rendering support]], you may see [[Specials (Unicode block)#Replacement character|question marks, boxes, or other symbols]] instead of [[Unicode]] characters. For an introductory guide on IPA symbols, see [[Help:IPA]]. }} }}<!-- ---- Adding tracking categories ---- Note 1: Above in this code, already tracking [[Category:...]]'s may be added. Note 2: All categories are using {{main other|[[Cat:...]}}. -->{{main other|<!-- -->{{#if:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}{{{signers|}}}{{{creator|}}}||[[Category:Languages without family color codes]]}}<!-- -->{{#if:{{{extinct|}}}{{{era|}}}{{{signers|}}}{{{speakers|}}}{{{creator|}}}{{{setting|}}}||<!-- no main input for data7 -->[[Category:Language articles without speaker estimate]]}}<!-- -->{{#ifeq:{{{speakers|}}}|?|{{#if:{{{iso3|}}}{{{lc1|}}}|{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none|<!-- ok -->|{{#ifeq:{{{ref|}}}|e18|<!-- ok -->|[[Category:Language articles with unknown population not citing Ethnologue 18]]}}}}}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{lc:{{{iso3|}}}}}|none|{{#if:{{{creator|}}}{{{setting|}}}{{#ifeq:{{Infobox language/family-color|{{{familycolor|}}}}}|#114057|1}}|[[Category:Conlangs without ISO 639-3 code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{date|}}}|{{#iferror: {{#expr: {{padleft:|4|{{{date}}}|}} }} |<!-- -->{{#switch: {{lc:{{{date}}}}} | na = [[Category:Language articles with NA population dates]] | no date = [[Category:Language articles with 'no date' set]] | #default = [[Category:Language articles with invalid population dates]]<!-- -->}}|<!-- no error -->}}|<!-- no date -->}}<!-- -->{{#if:{{{iso3|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{lc1|}}}|<!--ok-->|<!-- -->{{#switch: {{lc:{{{isoexception}}}}} | dialect = [[Category:Dialects of languages with ISO 639-3 code]] | historical = [[Category:Historical forms of languages with ISO codes]] | protolanguage = [[Category:Protolanguages without ISO codes]] | talkpage = |}}}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none|{{#if:{{{glotto|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{linglist|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{lingua|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{aiatsis|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{guthrie|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{creator|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{created|}}}|<!--ok-->|[[Category:Languages without ISO 639-3 code]]}}}}}}}}}}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{iso3|}}}{{{lc1|}}}{{{glotto|}}}{{{glotto2|}}}{{{glotto3|}}}{{{glotto4|}}}{{{glotto5|}}}{{{linglist|}}}{{{lingua|}}}{{{aiatsis|}}}{{{guthrie|}}}{{{isoexception|}}}|<!--ok-->|[[Category:Language articles without language codes]]}}<!-- -->{{#if:{{{lc1|}}}|{{#if:{{{lc2|}}}|<!--ok-->|[[Category:Languages which need ISO 639-3 comment]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none|{{#ifeq:{{{ref|}}}|e18|[[Category:Nonexistent E18 links]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none|{{#if:{{{linglist|}}}|{{#ifeq:{{{isoexception|}}}|dialect|[[Category:Dialects with Linguist List code]]|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Linguist List code]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{glotto|}}}|none|<!--ok-->||{{#if:{{{glotto|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{lingua|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Linguasphere code]]}}<!-- -->{{#if:{{{aiatsis|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with AIATSIS code]]}}<!-- -->{{#if:{{{guthrie|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Guthrie code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{iso3|}}}|<!--okay-->|{{#if:{{{lc1|}}}|<!--ok-->|{{#if:{{{linglist|}}}|{{#ifeq:{{{isoexception|}}}|dialect|[[Category:Dialects with Linguist List code]]|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Linguist List code]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{glotto|}}}|none|<!--ok-->|{{#if:{{{glotto|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{lingua|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Linguasphere code]]}}<!-- -->{{#if:{{{aiatsis|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with AIATSIS code]]}}<!-- -->{{#if:{{{guthrie|}}}|[[Category:Languages without ISO 639-3 code but with Guthrie code]]}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto|}}}|{{#if:{{{glottorefname|}}}{{{glottoname|}}}|<!--ok--> |{{#switch: {{lc:{{{glotto}}}}} |none = |spurious = |#default = [[Category:Articles with unnamed Glottolog code]]}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto2|}}}|{{#if:{{{glottoname2|}}}{{{glottorefname2|}}}|<!--ok-->|[[Category:Articles with unnamed Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto3|}}}|{{#if:{{{glottoname3|}}}{{{glottorefname3|}}}|<!--ok-->|[[Category:Articles with unnamed Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto4|}}}|{{#if:{{{glottoname4|}}}{{{glottorefname4|}}}|<!--ok-->|[[Category:Articles with unnamed Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#if:{{{glotto5|}}}|{{#if:{{{glottoname5|}}}{{{glottorefname5|}}}|<!--ok-->|[[Category:Articles with unnamed Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{Str index|{{{map|}}}|1}}|[|[[Category:Ill-formatted infobox-language images]]|<!--ok-->}}<!-- -->{{#ifeq:{{Str index|{{{map2|}}}|1}}|[|[[Category:Ill-formatted infobox-language images]]|<!--ok-->}}<!-- -->{{#ifeq:{{Str index|{{{image|}}}|1}}|[|[[Category:Ill-formatted infobox-language images]]|<!--ok-->}}<!-- -->{{#if:{{{iso2|}}}{{{iso2b|}}}{{{iso2t|}}}|[[Category:Languages with ISO 639-2 code]]|<!--ok-->}}<!-- -->{{#if:{{{iso1|}}}|[[Category:Languages with ISO 639-1 code]]|<!--ok-->}}<!-- -->{{#if:{{{speakers|}}}|{{#ifeq:{{{speakers|}}}|?|{{#if:{{{ref|}}}|[[Category:Language articles with speakers set to 'unknown' despite a reference]]|{{#ifeq:{{{isoexception|}}}|dialect|[[Category:Dialect articles with speakers set to 'unknown']]|[[Category:Language articles with speakers set to 'unknown']]}}}}|{{#ifeq:{{{speakers|}}}|none|{{#ifeq:{{lc:{{{familycolor|}}}}}|pidgin|<!--ok: pidgins don't have native speakers-->|[[Category:Language articles with speakers set to 'none']]}}|{{#if:{{{ref|}}}|<!--ok-->|[[Category:Language articles without reference field]]}}}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{extinct|}}}{{{era|}}}|{{#if:{{{ref|}}}|<!--ok-->|{{#ifeq:{{{extinct}}}|?|<!--ok-->|[[Category:Language articles with unreferenced extinction date]]}}}}}}<!-- -->{{#if:{{{boxsize|}}}|}}<!-- -->{{#if:{{{glotto|}}}{{{glotto2|}}}{{{glotto3|}}}{{{glotto4|}}}{{{glotto5|}}}|<!--ok-->|[[Category:Language articles missing Glottolog code]]}}<!-- -->{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none|{{#ifeq:{{{glotto|}}}|none|[[Category:Languages with neither ISO nor Glottolog code]]}}}}<!-- -->{{#ifeq:{{{iso3|}}}|none||{{#if:{{{iso3|}}}{{{lc1|}}}|{{#if:{{{ref|}}}|{{#switch: {{{ref}}} | e26 = | e25 = | e24 = | e23 = | e22 = | e21 = | e20 = | e19 = | e18 = | e17 = | e16 = | e15 = | e14 = | e13 = | e12 = | e11 = | e10 = | e09 = | e08 = | ne2007 = [[Category:Articles citing Nationalencyklopedin]] | ne2010 = [[Category:Articles citing Nationalencyklopedin]] | inali = [[Category:Articles citing INALI]] | linglist = [[Category:Articles citing Linguist List]] | aiatsis= [[Category:Articles citing AIATSIS]] | guthrie = [[Category:Articles citing Maho/Guthrie]] | &nbsp; = [[Category:Articles opting out of population reference]] | {{#if:{{{extinct|}}}{{{era|}}}|[[Category:Extinct ISO language articles citing sources other than Ethnologue]]|[[Category:ISO language articles citing sources other than Ethnologue]]}}}}}}}}}}<!-- -->{{#invoke:Check for unknown parameters | check | ignoreblank = y | unknown = [[Category:Language articles with unsupported infobox fields|_VALUE_]] | preview = Page using [[Template:Infobox language]] with unknown parameter "_VALUE_" | acceptance | agency | aiatsis | aiatsis2 | aiatsis3 | aiatsis4 | aiatsis5 | aiatsis6 | aiatsisname | aiatsisname2 | aiatsisname3 | aiatsisname4 | aiatsisname5 | aiatsisname6 | altname | ancestor | ancestor2 | ancestor3 | ancestor4 | ancestor5 | ancestor6 | ancestor7 | ancestor8 | ancestor9 | ancestor10 | ancestor11 | ancestor12 | ancestor13 | ancestor14 | ancestor15 | boxsize | coordinates | coords | created | creator | date | dateprefix | development_body | dia1 | dia2 | dia3 | dia4 | dia5 | dia6 | dia7 | dia8 | dia9 | dia10 | dia11 | dia12 | dia13 | dia14 | dia15 | dia16 | dia17 | dia18 | dia19 | dia20 | dia21 | dia22 | dia23 | dia24 | dia25 | dia26 | dia27 | dia28 | dia29 | dia30 | dia31 | dia32 | dia33 | dia34 | dia35 | dia36 | dia37 | dia38 | dia39 | dia40 | dialects | ELP | ELPname | ELP2 | ELPname2 | ELP3 | ELPname3 | ELP4 | ELPname4 | ELP5 | ELPname5 | ELP6 | ELPname6 | era | ethnicity | extinct | fam1 | fam2 | fam3 | fam4 | fam5 | fam6 | fam7 | fam8 | fam9 | fam10 | fam11 | fam12 | fam13 | fam14 | fam15 | family | familycolor | fontcolor | glotto | glotto2 | glotto3 | glotto4 | glotto5 | glottofoot | glottoname | glottoname2 | glottoname3 | glottoname4 | glottoname5 | glottorefname | glottorefname2 | glottorefname3 | glottorefname4 | glottorefname5 | glottopedia | guthrie | ietf | image | imagealt | imagecaption | imagescale | iso1 | iso1comment | iso2 | iso2b | iso2comment | iso2t | iso3 | iso3comment | iso6 | isoexception | lc1 | lc2 | lc3 | lc4 | lc5 | lc6 | lc7 | lc8 | lc9 | lc10 | lc11 | lc12 | lc13 | lc14 | lc15 | lc16 | lc17 | lc18 | lc19 | lc20 | lc21 | lc22 | lc23 | lc24 | lc25 | lc26 | lc27 | lc28 | lc29 | lc30 | lc31 | lc32 | lc33 | lc34 | lc35 | lc36 | lc37 | lc38 | lc39 | lc40 | ld1 | ld2 | ld3 | ld4 | ld5 | ld6 | ld7 | ld8 | ld9 | ld10 | ld11 | ld12 | ld13 | ld14 | ld15 | ld16 | ld17 | ld18 | ld19 | ld20 | ld21 | ld22 | ld23 | ld24 | ld25 | ld26 | ld27 | ld28 | ld29 | ld30| ld31 | ld32 | ld33 | ld34 | ld35 | ld36 | ld37 | ld38 | ld39 | ld40 | linglist | linglist2 | linglist3 | linglist4 | linglist5 | linglist6 | lingname | lingname2 | lingname3 | lingname4 | lingname5 | lingname6 | lingua | lingua_ref | listclass | map | map2 | mapalt | mapalt2 | mapcaption | mapcaption2 | mapscale | minority | module | name | nation | nativename | notice | notice2 | posteriori | pronunciation | protoname | pushpin_map | pushpin_map_alt | pushpin_map_caption | pushpin_mapsize | pushpin_image | pushpin_label | pushpin_label_position | ref | refname | region | revived | revived-cat | revived-category | script | setting | sign | signers | speakers | speakers2 | speakers_label | stand1 | stand2 | stand3 | stand4 | stand5 | stand6 | standards | state | states }}<templatestyles src="Template:Infobox/styles-images.css" /><!-- Close wrapping {{main other}} for the categories: -->}}<noinclude> {{documentation}} </noinclude> 70kbwg35lqi8nl4hl5cvygq9xiy1y0g श्रेणी:यूनेस्को 14 212385 6543623 704424 2026-04-24T14:05:44Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543623 wikitext text/x-wiki [[श्रेणी:संयुक्त राष्ट्र]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] qpj33239buosdhrs2hdfcpvj0wmuuak वार्ता:सृजन और विलोपन संकारक 1 297303 6543668 987040 2026-04-24T16:54:45Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[साँचा वार्ता:१९५७ में पद्म भूषण धारक]] को [[वार्ता:सृजन और विलोपन संकारक]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 987040 wikitext text/x-wiki {{वार्ता शीर्षक}} gpfqtvs6ipx5lqjhtgasmr80u6e2dmv इंडिया अगेंस्ट करप्शन 0 300179 6543778 6505515 2026-04-25T07:16:34Z Sequencesolved 173771 कड़ियाँ लगाई। 6543778 wikitext text/x-wiki {{पुराना|date=दिसम्बर 2013}} {{स्रोतहीन|date=जून 2012}} {{Infobox organization |name = भारत बनाम भ्रष्‍टाचार |bgcolor = <!-- header background color --> |fgcolor = <!-- header text color --> |image = |image_border = |size = <!-- default 200 --> |alt = <!-- alt text; see [[WP:ALT]] --> |caption = |map = <!-- optional --> |msize = <!-- map size, optional, default 200px --> |malt = <!-- map alt text --> |mcaption = <!-- optional --> |abbreviation = |motto = |formation = |extinction = <!-- date of extinction, optional --> |type = [[अशासकीय संस्था]] |status = <!-- ad hoc, treaty, foundation, etc --> |purpose = [[भ्रष्टाचार का विरोध]] <!-- focus as e.g. humanitarian, peacekeeping, etc --> |headquarters = [[ग़ाज़ियाबाद|गाज़ियाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]] - 201010 |location = |coords = <!-- Coordinates of location using a coordinates template --> |region_served = |membership = |language = <!-- official languages --> |leader_title = <!-- position title for the leader of the org --> |leader_name = <!-- name of leader --> |main_organ = <!-- gral. assembly, board of directors, etc --> |parent_organization = <!-- if one --> |affiliations = <!-- if any --> |num_staff = |num_volunteers = |budget = |website = [http://www.indiaagainstcorruption.org.in indiaagainstcorruption.org.in] |remarks = }} {{अरविन्द केजरीवाल शृंखला}} '''इंडिया अगेंस्ट करप्शन''' (भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत) भारत का राष्ट्र-व्यापी जन-आंदोलन है, जिसके द्वारा देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनाने की मांग की जा रही है। कई जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता जैसे [[अन्ना हजारे]], [[अरविन्द केजरीवाल]], [[मेधा पाटेकर]], [[किरण बेदी]] इत्यादि इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं।भ्रष्टाचार विरोधी भारत (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) नामक गैर सरकारी सामाजिक संगठन का निमाण करेंगे। [[संतोष हेगड़े]], वरिष्ठ अधिवक्ता [[प्रशांत भूषण]], [[मैग्सेसे पुरस्कार]] विजेता सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद तैयार किया था। इसे लागू कराने के लिए सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और [[गांधीवादी]] [[अन्ना हजारे]] के नेतृत्व में २०११ में अनशन शुरू किया गया। १६ अगस्त में हुए जन लोकपाल बिल आंदोलन २०११ को मिले व्यापक जन समर्थन ने [[मनमोहन सिंह]] के नेतृत्व वाली भारत सरकार को संसद में प्रस्तुत सरकारी लोकपाल बिल के बदले एक सशक्त लोकपाल के गठन के लिए सहमत होना पड़ा। == अन्ना हजारे की भूमिका == वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, [[अन्ना हजारे]], 5 अप्रैल 2011 से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठ गए थे। उनका उद्देश्य भारत सरकार को जन-लोकपाल बिल पारित करने के लिए बाध्य करना था। उनके अनशन को संपूर्ण भारत में भारी समर्थन मिल रहा था। 5 अप्रैल 2011 के आमरण अनशन के दोरान सरकार ने भरोसा दिया था कि सरकार आप के साथ मिल कर नया मसोदा तैयार करेगी। लेकिन अन्ना टीम कि कोई बात नहीं सुनी गई व सरकारी जोकपाल संसद में रखा गया जिस के कारण अन्ना को दोबारा 16.08.11 को फिर से आमरण अनशन पर जाना पड़ा जिसको इतना समर्थन मिला कि मैंने अपनी 50 साल कि जिन्दगी में नहीं देखा. 12 दिन तक रामलीला मदान में दो लाख लोग हर रोज आते रहे। जिस के कारण सरकार को दोबारा नए सिरे से जनलोकपाल लाने का वायदा किया है। ये वायदा भी पूरा नहीं होने पर फिर से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठना पडा। वहाँ पर भी जब सुनवाई नहीं हुई तो अन्ना साहब को पार्टी बना कर चुनाव लड़ने की घोसना करनी पड़ी। लेकिन जब पार्टी बनाने की बात आई तो अन्ना साहब ने पार्टी में शामिल होने से यह कह कर इनकार कर दिया कि राजनीति तो कीचड़ है। जिस पर 26 नवम्बर 2012 को अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी बनाई गई। पार्टी बनने पर मिडिया ने साथ नहीं दिया जिस पर पार्टी के कार्यकर्ताओ को घर-घर जा कर पार्टी का प्रचार करना पड़ा जिस का फायदा यह मिला कि 4 दिसम्बर 2012 को चुनाव होने पर आम आदमी पार्टी को 70 में से 28 सीटो पर जीत मिली। परिणाम सवरूप कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए [[आम आदमी पार्टी]] का समर्थन करना पड़ा व [[अरविंद केजरीवाल|अरविन्द केजरीवाल]] ने 28 दिसम्बर 2013 को राम लीला मैदान में मुख्य मंत्री की शपथ ली। == भ्रष्टाचार के विरुद्ध वोट बैंक == इंडिया अगेंस्ट करप्शन संस्था ने एक वोट बैंक ([https://web.archive.org/web/20190421191021/http://www.voteforindia.org/ Vote For India]) प्रारंभ किया है। इस वोट बैंक के सदस्यों को शपथ दिलाई जाती है, कि वो ऐसे किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव में वोट नहीं देंगे जो जन-लोकपाल बिल को पारित नहीं करते। == जन-लोकपाल बिल == भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए [[जन लोकपाल विधेयक|जन लोकपाल बिल]] को तैयार किया गया है। जन-लोकपाल संतोष हेगड़े, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद तैयार किया था। == इन्हें भी देखें == * [[भारत में भ्रष्टाचार]] * [[जन लोकपाल विधेयक]] * [[जन लोकपाल विधेयक आंदोलन २०११|2011 भारतीय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन]] == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20190405033638/http://www.indiaagainstcorruption.org.in/ इंडिया अगेंस्ट करप्शन, आधिकारिक वेब-साईट] * [https://web.archive.org/web/20110604172849/http://www.facebook.com/IndiACor इंडिया अगेंस्ट करप्शन, फेसबुक पर] {{भारत में भ्रष्टाचार}} [[श्रेणी:भ्रष्टाचार]] [[श्रेणी:भारत]] 4sx6dcftnvu8p7db7nhfej6fg5kbj18 अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ 0 382471 6543624 5940078 2026-04-24T14:07:58Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543624 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Iau wb.jpg|thumb|अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ का चिह्न]] '''अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ''' (International Astronomical Union (IAU)), पेशेवर [[खगोल शास्त्र|खगोलशास्त्रियों]] का एक संगठन है। इसका केंद्रीय सचिवालय [[पेरिस|पैरिस]], [[फ़्रान्स|फ़्रांस]] में है। इस संघ का ध्येय खगोलशास्त्र के क्षेत्र में अनुसन्धान और अध्ययन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना है। जब भी ब्रह्माण्ड में कोई नई वस्तु पाई जाती है तो खगोलीय संघ द्वारा दिए गए नाम ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य होते हैं। तथा IAU की स्थापना 1919 में हुई थी [[File:IAU National Members.svg|thumb|center|550px|अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) में 82 देशों के सदस्य संगठन शामिल हैं (राष्ट्रीय सदस्यों के रूप में नामित)।]] == अन्य भाषाओँ में == अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ को [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] में "इंटरनैशनल ऐस्ट्रोनॉमिकल यूनियन" (International Astronomical Union या IAU) और [[फ़्रान्सीसी भाषा|फ़्रांसिसी]] में "उनियाँ आस्त्रोनोमीक ऐंतेरनास्योनाल" (Union astronomique internationale) कहा जाता है। == इतिहास == अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ का संगठन १९१९ में किया गया था जब बहुत सी अन्य खगोलीय संगठनों को इसमें विलय कर दिया गया। इसके पहले अध्यक्ष फ़्रांसिसी खगोलशास्त्री बैंझ़ामैं बैलौद (Benjamin Baillaud) थे। == सामान्य बैठकें == १९२२ के बाद, अ॰ख॰स॰ हर तीन साल में एक सामान्य बैठक करता आ रहा है। इसमें सिर्फ़ एक बार द्वितीय विश्व युद्ध के कारण १९३८-१९४८ के दस साल के अंतराल में कोई बैठक नहीं हुई थी। == इन्हें भी देखें == * [[खगोल शास्त्र|खगोलशास्त्र]] * [[खगोलशास्त्र से सम्बन्धित शब्दावली|खगोलशास्त्र से संबंधित शब्दावली]] [[श्रेणी:खगोलशास्त्र]] [[श्रेणी:खगोलशास्त्रीय संगठन]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] 41jcymph07gbbwj4nba8iwoh819v5t4 क्षेत्रफल के परिमाण की कोटि 0 428046 6543852 6486245 2026-04-25T11:42:11Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 20 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543852 wikitext text/x-wiki [[File:1 km2.svg|thumb|right|एक [[वर्ग किलोमीटर]] क्षेत्रफल प्रदर्शित किया गया है जिसमें १०० [[हेक्टर (क्षेत्रफल)|हेक्टेयर]] शामिल हैं जो १०,००० वर्ग मीटर से मिलकर बना होता है।]] यह पृष्ठ सुधारा जा रहा है और इसमें एसआई क्षेत्रफल की कोटि और परिणाम की सूचीबद्ध किया गया है जिसमें कुछ उदाहरण भी शामिल किये गये हैं। ==10<sup>-70</sup> से 10<sup>-9</sup> वर्ग मीटर== {| class="wikitable" |+'''10<sup>-70</sup> से 10<sup>-9</sup> वर्ग मीटर कोटि की सूची''' !गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) !समान्य नाम !मान !उदाहरण |- |- |10<sup>-70</sup> |&nbsp; |2.6{{e|-70}} वर्ग मीटर |[[प्लांक दैर्ध्य|प्लांक क्षेत्रफल]], <math>\frac{G \hbar}{c^3}</math><ref>Calculated: square of the Planck length = (1.62e-35 m)^2 = 2.6e-70 m^2</ref> |- |- |10<sup>-52</sup> |&nbsp; |10<sup>-52</sup> वर्ग मीटर |1 [[बार्न|शेड]]<ref>{{cite web | author = Russ Rowlett | date = सितम्बर 1, 2004 | title = Units: S | url = http://www.unc.edu/~rowlett/units/dictS.html | work = How Many? A Dictionary of Units of Measurement | publisher = [[नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय]] | access-date = 2011-10-25 | archive-date = 3 दिसंबर 1998 | archive-url = https://web.archive.org/web/19981203072555/http://www.unc.edu/~rowlett/units/dictS.html | url-status = dead }}</ref> |- |10<sup>-48</sup> |1 वर्ग योक्टोमीटर (ym<sup>2</sup>) |&nbsp;1 y वर्ग मीटर |&nbsp; |- |10<sup>-43</sup> |&nbsp; |100,000 ym<sup>2</sup> |1 [[फेम्टोबार्न]]<ref>{{cite web|url=http://writing-guidelines.web.cern.ch/entries/femtobarn|title=Femtobarn|website=CERN writing guidelines|publisher=[[सर्न]]|access-date=2015-10-22|archive-date=20 अगस्त 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200820001851/https://writing-guidelines.web.cern.ch/entries/femtobarn|url-status=dead}}</ref> |- |10<sup>−42</sup> |1 वर्ग ज़ेप्टोमीटर (zm<sup>2</sup>) |&nbsp;1 zm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>−36</sup> |1 वर्ग एटोमीटर (am<sup>2</sup>) |&nbsp;1&nbsp;am<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>−30</sup> |1 वर्ग फेम्टोमीटर (fm<sup>2</sup>) |&nbsp;1 fm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>−29</sup> |&nbsp; |66.52 fm<sup>2</sup> | इलेक्ट्रॉन का [[थॉमसन प्रकीर्णन|थॉमसन काट-क्षेत्र]]<ref>{{Cite web|url=http://scienceworld.wolfram.com/physics/ThomsonCrossSection.html|title=Thomson Cross Section|author=Eric W. Weisstein|website=Eric Weisstein's World of Science|publisher=Wolfram Research|access-date=2015-10-22}}</ref> |- |10<sup>−28</sup> |&nbsp; |100 fm<sup>2</sup> |1 [[बार्न (इकाई)|बार्न]], लगभग [[यूरेनियम]] [[परमाणु नाभिक|नाभिक]] का काट-क्षेत्र<ref>{{cite web|title=Other non-SI units |url=http://www.bipm.org/en/si/si_brochure/chapter4/table8.html |work=SI brochure |publisher=BIPM |access-date=2011-10-25 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080821211324/http://www.bipm.org/en/si/si_brochure/chapter4/table8.html |archive-date=2008-08-21 }}</ref> |- |10<sup>−24</sup> |1 वर्ग [[पिकोमीटर]] (pm<sup>2</sup>) |&nbsp;1&nbsp;pm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>−20</sup> |1 वर्ग [[आंग्स्ट्रॉम]] (Å<sup>2</sup>) |&nbsp;10,000&nbsp;pm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |rowspan=2|10<sup>−19</sup> | |100,000&nbsp;pm<sup>2</sup> |प्रति अणु [[लिपिड द्विपरत]] का क्षेत्रफल<ref>{{cite web |url= http://bionumbers.hms.harvard.edu/bionumber.aspx?s=n&id=101837 |title= "Rule of thumb" for the area per molecule in lipid bilayer |publisher= BioNumbers |access-date=2011-10-09 }}</ref> |- | |75,000–260,000&nbsp;pm<sup>2</sup> |20 मानक [[अमीनो अम्ल]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web |url= http://jenalib.leibniz-fli.de/IMAGE_AA.html |title= Individual Properties of the 20 Standard Amino Acids: Properties and Images |work= The Amino Acid Repository |publisher= Jena Library of Biological Macromolecules |access-date= 2011-10-10 |archive-date= 17 नवंबर 2020 |archive-url= https://web.archive.org/web/20201117230956/http://jenalib.leibniz-fli.de/IMAGE_AA.html |url-status= dead }}</ref> |- |10<sup>−18</sup> |1 वर्ग [[नैनोमीटर]] (nm<sup>2</sup>) |&nbsp;1&nbsp;nm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>−16</sup> | |100&nbsp;nm<sup>2</sup> |[[गोलाकार प्रोटीन]]: एक प्ररूपी आण्विक द्रव्यमान लगभग 35000 u (मुख्यतः परिवर्तनशील) के तुल्य, विलायक-अभिगम्य गोलाकार प्रोटीन का पृष्ठीय क्षेत्रफलs<!-- 38 वर्ग आंग्स्ट्रॉम प्रति एमिनो अम्ल (35000 u के लगभग गोलाकार प्रोटीन) * 35000 u/ 110 u प्रति एमिनो अम्ल = 1.2e-16 m^2 --><ref>{{Cite journal | last1 = Janin | first1 = J. E. L. | title = Surface and inside volumes in globular proteins | url = https://archive.org/details/sim_nature-uk_1979-02-08_277_5696/page/n79 | journal = Nature | volume = 277 | issue = 5696 | pages = 491–492 | year = 1979 | pmid = 763335 | doi = 10.1038/277491a0| bibcode = 1979Natur.277..491J | s2cid = 4338901 }}</ref> |- |10<sup>−14</sup> | |17,000&nbsp;nm<sup>2</sup> |मेरुदण्डी में नाभिकीय पोर कोम्लेक्स का एक काट-क्षेत्र<ref>{{ cite web |url = http://www.ks.uiuc.edu/Research/npc/ |title = The Nuclear Pore Complex |publisher= UIUC Theoretical and Computational Biophysics Group |access-date = 2011-10-14 }}</ref><!-- diameter = 145e-9 m^2 => area = pi * (145e-9 / 2)^2 = 1.65e-14 m^2 --> |- |10<sup>−12</sup> |1 वर्ग [[माइक्रोमीटर]] (μm<sup>2</sup>) |6 μm<sup>2</sup> |''[[एशेरिकिया कोलाए|ई॰ कोलाए]]'' जीवाणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref name=ccdb_e_coli>{{cite web |url=http://www.ccdb.ualberta.ca/CCDB/cgi-bin/STAT_NEW.cgi |title=E. coli Statistics |publisher=The CyberCell Database |access-date=2011-09-11 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20111027220034/http://www.ccdb.ualberta.ca/CCDB/cgi-bin/STAT_NEW.cgi |archive-date=2011-10-27 }}</ref> |- |10<sup>−10</sup> |&nbsp; |100 μm<sup>2</sup> |[[लाल रक्त कोशिका]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite journal |last1=Marcelli |first1=Gianluca |last2=Parker |first2=Kim H. |last3=Winlove |first3=C. Peter |year= 2005 |title= Thermal Fluctuations of Red Blood Cell Membrane via a Constant-Area Particle-Dynamics Model |journal= Biophysical Journal |volume= 89 |issue= 4 |pages= 2473–2480 |pmid= 16055528|pmc= 1366746|bibcode= 2005BpJ....89.2473M|doi= 10.1529/biophysj.104.056168 |access-date=2011-09-27 |url=http://www.cell.com/biophysj/fulltext/S0006-3495(05)72888-5 }}<!-- relevant quote in reference: "the surface area of a real red blood cell (~10^8 nm2)"--></ref> |- |rowspan=3|10<sup>−9</sup> |&nbsp; |6,000–110,000 μm<sup>2</sup> |सामान्य एलसीडी स्क्रीन के पिक्सल की परास<ref>Calculated: [[Dot pitch#Common dot pitches in monitors|Smallest and largest common pitches]] were 77 micrometers and 337 micrometers. (77e-6 m)^2 ~= 6e-9 m^2. (337e-6 m)^2 ~= 114e-9 m^2 ~= 110e-9 m^2</ref> |- |&nbsp; |7,000 μm<sup>2</sup> |300 डोट्स प्रति इंच शुद्धता वाले मुद्रित डोट का क्षेत्रफल<ref>Calculated: (300 dots per inch / 2.54e-2 m/inch)^(-2) = 7.2e-9 m^2</ref> |- |&nbsp; |8,000 μm<sup>2</sup> |[[बाल|मानव बाल]] का काट-क्षेत्र जिसका व्यास लगभग 100&nbsp;μm होता है।<ref>{{cite web |url=http://www.keratin.com/aa/aa012.shtml#04 |title=Hair Fiber Composition |access-date=2011-09-30 |archive-date=12 जून 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180612140639/http://www.keratin.com/aa/aa012.shtml#04 |url-status=dead }}</ref><ref>Calculated: 100 μm in diameter => pi * ((1e-4 m)/2)**2 = 7.9e-9 m^2</ref> |} ==10<sup>−8</sup> से 10<sup>−1</sup> वर्ग मीटर== {| class="wikitable" |+'''10<sup>−8</sup> से 10<sup>−1</sup> वर्ग मीटर क्षेत्रफल के परिमाण की कोटि की सूची''' !गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) !समान्य नाम !मान !उदाहरण |- |10<sup>−8</sup> |&nbsp; |55,000 μm<sup>2</sup> |सामान्य आधुनिक [[कम्प्यूटर मॉनीटर|कंप्यूटर स्क्रीन]] के एक [[पिक्सल]] का आकार |- |10<sup>−7</sup> |&nbsp; |2-400,000 μm<sup>2</sup> |यांत्रिक पेंसिल के अग्रणी भाग का काट क्षेत्र (व्यास 0.5-0.7&nbsp;mm)<ref>गणना: pi * (0.5mm/2)^2 = 2.0e-7 m^2 और pi * (0.7mm/2)^2 = 3.8e-7 m^2)</ref> |- |rowspan=2|10<sup>−6</sup> |rowspan=2|1 वर्ग [[मिलीमीटर]] (mm<sup>2</sup>) |1–2&nbsp;mm<sup>2</sup> ||मानव आँख का फुहवा<ref name="Webvision_retina"><!-- 1.2 to 1.5 mm diameter of the fovea -> pi*(d/2)^2 = 1.1 to 1.8 mm^2 in fovea area -->{{cite web|url=http://webvision.med.utah.edu/book/part-xiii-cellular-remodeling-in-mammalian-retina-induced-by-retinal-detachment/|title=Part XIII: Facts and Figures concerning the human retina|publisher=University of Utah|work=Webvision|access-date=2011-09-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20111011004153/http://webvision.med.utah.edu/book/part-xiii-cellular-remodeling-in-mammalian-retina-induced-by-retinal-detachment/|archive-date=2011-10-11|url-status=dead}}</ref> |- |2&nbsp;mm<sup>2</sup> ||पिन के अग्रणी भाग का क्षेत्रफल |- |10<sup>−5</sup> |&nbsp; |30–50&nbsp;mm<sup>2</sup> ||[[होल छिद्रक]] द्वारा निर्मित कागज के टुकड़े का आकार जहाँ टुकड़ा 6–8&nbsp;mm आकार वाला हो।<ref>गणना: ((6e-3 m)/2)**2 * pi = 2.8e-5 m^2 और ((8e-3 m)/2)**2 * pi = 5.0e-5 m^2</ref> |- |rowspan=2|10<sup>−4</sup> |rowspan=2|1 वर्ग [[सेन्टीमीटर]] (cm<sup>2</sup>) |290&nbsp;mm<sup>2</sup> |एक अमेरिकी पैसे का आकार<ref>{{cite web |url=http://www.usmint.gov/about_the_mint/?action=coin_specifications |title=Coin specifications |publisher=यूनाइटेड स्टेट्स मिंट |access-date=2011-12-28 |archive-date=18 फ़रवरी 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150218061037/http://www.usmint.gov/about_the_mint/?action=coin_specifications |url-status=dead }}</ref><ref>गणना: क्षेत्रफल = pi * व्यास^2 / 4 = 3.14 * (19.05e-3 m)^2 = 2.850e-4 m^2</ref> |- |500&nbsp;mm<sup>2</sup> ||प्ररुपी [[डाक टिकट]] का क्षेत्रफल |- |rowspan=3|10<sup>−3</sup> |rowspan=3| &nbsp; |1,100&nbsp;mm<sup>2</sup> ||मानव रेटिना का आकार<ref>{{cite journal |last1=Taylor |first1=Enid |last2=Jennings |first2=Alan |year= 1971 |title= Calculation of total retinal area |journal= Br. J. Ophthalmol. |volume= 55 |pages=262–5 |doi= 10.1136/bjo.55.4.262|pmc=1208280 |pmid=5572268 |issue=4}}<!-- relevant quote in reference: "We suggest that the retinal area be taken as 1100 sq.mm."--></ref> |- |4,600&nbsp;mm<sup>2</sup> ||[[क्रेडिट कार्ड]] के सामने का क्षेत्रफल<!-- width*height - (4-pi)(corner radius)^2 = (85.6*1e-3)*(53.98 * 1e-3) - (4-pi)*((3.18e-3)**2) = 4.61e-3 m^2 --><ref>{{cite web |url=http://www.dimensionsguide.com/credit-card-dimensions/ |title=Credit Card Dimensions |access-date=2011-09-30 |archive-date=26 सितंबर 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110926140116/http://www.dimensionsguide.com/credit-card-dimensions/ |url-status=dead }}</ref> |- |4,800&nbsp;mm<sup>2</sup> ||[[सिगरेट]] बॉक्स के बड़े भाग का क्ष्रेत्रफल |- |rowspan=4|10<sup>−2</sup> |rowspan=4| 1 वर्ग [[डेसीमीटर]] (dm<sup>2</sup>) |10,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || इंडेक्स कार्ड (3 × 5 [[इंच]])<ref>Calculated: 3 इंच * 5 इंच * (2.54e-2 मी/इंच)^2 = 9.7e-3 m^2 ~= 0.01 m^2</ref> |- |60,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || अमेरिकी [[काग़ज़ का आकार|पत्र का कागज]] (11 × 8.5 [[इंच]], "A" साइज) |- |62,370&nbsp;mm<sup>2</sup> || अन्तर्राष्ट्रीय ए4 पेपर (210 × 297&nbsp;mm) |- |92,903&nbsp;mm<sup>2</sup> || 1 वर्ग फूट<ref>गणना: 1 फूट * 1 फूट * (0.3048 मीटर / फूट)^2 = 0.092.90304 m^2</ref> |- |rowspan=4|10<sup>−1</sup> |rowspan=4| &nbsp; | 125,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || अन्तर्राष्ट्रीय [[काग़ज़ का आकार|A3 पेपर]] (297 × 420&nbsp;mm) |- | 180,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || [[बास्केटबॉल]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल (व्यास 24&nbsp;cm)<ref>{{cite web|title=Rules of the Game |url=http://www.usabasketball.com/rules/rules.html |publisher=USA Basketball |access-date=2011-10-28 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20111027183121/http://www.usabasketball.com/rules/rules.html |archive-date=2011-10-27 }}</ref><ref>Calculated: 29.5-29.75 inch circumference * 2.54 cm / in = 23.85-24.05 cm diameter => radius = 0.119-0.120 m => Area = 4 * pi * (0.119 m)^2 = 0.18 m^2</ref> |- |250,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || अन्तर्राष्ट्रीय [[काग़ज़ का आकार|A2 पेपर]] (420 × 594&nbsp;mm) |- |500,000&nbsp;mm<sup>2</sup> || अन्तर्राष्ट्रीय [[काग़ज़ का आकार|A1 पेपर]] (594 × 841&nbsp;mm) |} ==10<sup>0</sup> से 10<sup>7</sup> वर्ग मीटर== {| class="wikitable" |+'''10<sup>0</sup> से 10<sup>7</sup> वर्ग मीटर क्षेत्रफल के परिमाण की कोटि की सूची।''' !गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) !समान्य नाम !मान !उदाहरण |- |rowspan=3|10<sup>0</sup> |rowspan=3| 1 [[वर्ग मीटर]] |1&nbsp;m<sup>2</sup> || अन्तर्राष्ट्रीय [[काग़ज़ का आकार|A0 पेपर]] (841 × 1189&nbsp;mm) |- |1.73&nbsp;m<sup>2</sup> || मानव के शरीर का औसत पृष्ठीय क्षेत्रफल के लिए काम में ली जाने वाली एक संख्या<ref>{{cite journal |last1=Sacco |first1=Joseph J. |last2=Botten |first2=Joanne |last3=Macbeth |first3=Fergus |last4=Bagust |first4=Adrian |last5=Clark |first5=Peter |year= 2010 |title= The Average Body Surface Area of Adult Cancer Patients in the UK: A Multicentre Retrospective Study |journal= PLOS ONE |volume= 5 |issue= 1 |page= e8933 |doi= 10.1371/journal.pone.0008933 |bibcode = 2010PLoSO...5.8933S |pmid=20126669 |pmc=2812484}}<!-- relevant quote in reference: "Although a mean BSA of 1.73 m^2 has been quoted in previous work"--></ref> |- |1–4&nbsp;m<sup>2</sup> || कार्यालय डेस्क के उपरी भाग का क्षेत्रफल |- |rowspan=2|10<sup>1</sup> |rowspan=2|&nbsp; |10–20&nbsp;m<sup>2</sup> ||पार्किंग क्षेत्र |- |70&nbsp;m<sup>2</sup> ||मानव फेफ़डे का लगभग पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite book |author=Notter, Robert H. |title=Lung surfactants: basic science and clinical applications |publisher=Marcel Dekker |location=New York, N.Y |year=2000 |pages=120 |isbn=0-8247-0401-0 |url=https://books.google.com/books?id=pAuiWvNHwZcC&q=70&pg=PA120|access-date=2011-09-27}}</ref> |- |rowspan=4|10<sup>2</sup> |rowspan=4|1 वर्ग [[डेकामीटर]] (dam<sup>2</sup>) |100&nbsp;m<sup>2</sup> ||एक [[हेक्टर (क्षेत्रफल)#आरी|आरी]] (a) |- |162&nbsp;m<sup>2</sup> ||[[वालीबॉल]] के मैदान का क्षेत्रफल (18 × 9 मीटर)<ref>{{cite book |title=Official Volleyball Rules 2011-2012 |chapter-url=http://www.fivb.org/EN/Refereeing-Rules/Documents/FIVB.2011-2012.VB.RulesOfTheGame.Eng.TextfileOnly.2.1.1.pdf |access-date=2011-10-27 |year=2010 |publisher=अन्तर्राष्ट्रीय वोलीबॉल संघ |chapter=Section 1.1 |quote=The playing court is a rectangle measuring 18 x 9 m, surrounded by a free zone which is a minimum of 3 m wide on all sides.}}</ref> |- |202&nbsp;m<sup>2</sup> ||अमेरिका में 2010 के अनुसार मध्यम [[उपनगर|उपनगरीय]] तीन-कमरे वाले घर भूमितल का क्षेत्रफल: {{convert|2169|sqft|m2|abbr=on}}<ref>{{cite web |url=https://www.census.gov/const/C25Ann/sftotalmedavgsqft.pdf |title=Median and Average Square Feet of Floor Area in New Single-Family Houses Completed by Location |publisher=अमेरिकी जनगणना ब्यूरो |access-date=2011-09-26 }}</ref> |- |261&nbsp;m<sup>2</sup> ||टेनिस के मैदान का आकार<ref>{{cite web | url= http://hypertextbook.com/facts/2009/AmyHuang.shtml | title= Area of a Tennis Court | work= द फिजिक्स फेक्टबूक |access-date= 2011-09-27 }}</ref> |- |rowspan=5| 10<sup>3</sup> |rowspan=5| &nbsp; |1,000&nbsp;m<sup>2</sup> || आधुनिक स्ट्रेम्मा अथवा डुनम का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |1,250&nbsp;m<sup>2</sup> || ओलंपिक आकार के तरणताल में पानी का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>गणना: 50 m * 25 m = 1250 m^2</ref> |- |4,047&nbsp;m<sup>2</sup> || 1 [[एकड़]]<ref>{{cite web|title=General Tables of Units of Measurement |url=http://ts.nist.gov/WeightsAndMeasures/Publications/upload/h4402_appenc.pdf |publisher=NIST |access-date=2011-10-28 |quote=4046.87 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20061126120208/http://ts.nist.gov/WeightsAndMeasures/Publications/upload/h4402_appenc.pdf |archive-date=2006-11-26 }}</ref> |- |5,400&nbsp;m<sup>2</sup> || अमेरिकी फुटबॉल मैदान का आकार<ref>{{cite web|title=What are the Dimensions of a Football Field|url=http://www.dimensionsguide.com/what-are-the-dimensions-of-a-football-field/|work=Dimensions Guide|access-date=2011-10-27|archive-date=22 अक्तूबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201022024537/https://www.dimensionsguide.com/what-are-the-dimensions-of-a-football-field/|url-status=dead}}</ref><ref>गणना: 360 feet * 160 feet * (0.3048 m/ft)^2 = 5351 m^2 ~= 5400 m^2</ref> |- |7,140&nbsp;m<sup>2</sup> || फुटबॉल (सॉकर) मैदान का प्ररूपी आकार<ref>{{cite web|title=How Big Is An Olympic Soccer Field?|url=http://www.livestrong.com/article/406257-how-big-is-an-olympic-soccer-field/|publisher=LIVESTRONG.COM|access-date=2012-01-04|quote=For the Olympics, fields are supposed to measure exactly 105 meters long and 68 meters wide|archive-date=12 अक्तूबर 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111012164207/http://www.livestrong.com/article/406257-how-big-is-an-olympic-soccer-field/|url-status=dead}}</ref><ref>गणना: 105 m * 68 m = 7140 m^2</ref> |- |rowspan=4|10<sup>4</sup> |rowspan=4| 1 वर्ग [[हेक्टोमीटर]] (hm<sup>2</sup>) |10,000&nbsp;m<sup>2</sup> || 1 [[हेक्टर (क्षेत्रफल)|हेक्टर]] (ha)<ref>{{cite web|title=General Tables of Units of Measurement |url=http://ts.nist.gov/WeightsAndMeasures/Publications/upload/h4402_appenc.pdf |publisher=NIST |access-date=2011-10-28 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20061126120208/http://ts.nist.gov/WeightsAndMeasures/Publications/upload/h4402_appenc.pdf |archive-date=2006-11-26 }}</ref> |- |17,000&nbsp;m<sup>2</sup> || [[क्रिकेट मैदान]] का लगभग क्षेत्रफल (सैद्धान्तिक सीमा: 6,402&nbsp;m<sup>2</sup> से 21,273&nbsp;m<sup>2</sup>)<ref name="passyworldofmathematics">{{cite web|url=http://passyworldofmathematics.com/afl-ground-sizes/|publisher=passyworldofmathematics.com|title=AFL Ground Sizes &#124; Passy&#039;s World of Mathematics|access-date=2016-11-12}}</ref> |- |22,100&nbsp;m<sup>2</sup> || [[मैनहटन]] नगरीय इलाके का क्षेत्रफल |- |53,000&nbsp;m<sup>2</sup> || [[गीज़ा के महान पिरामिड]] का आधार<ref>{{cite web|last=Greenberg|first=Ralph|title=THE GREAT PYRAMID OF GIZA (Some Elegant Numerical Relationships)|url=http://www.math.washington.edu/~greenber/GizaPyramid.html|access-date=2012-01-04|quote=average length of the four sides is 230.364 meters}}</ref><ref>गणना: 230.364 m^2 ~= 53068 m^2</ref> |- |rowspan=3|10<sup>5</sup> |rowspan=3| &nbsp; |195,000&nbsp;m<sup>2</sup> || आयरलैण्ड का राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान<ref>{{cite web|last=Gartland|first=Fiona|url=https://www.irishtimes.com/news/valuable-lead-roofing-stolen-from-dublin-bandstands-1.485412|archive-url=https://web.archive.org/web/20180530022253/https://www.irishtimes.com/news/valuable-lead-roofing-stolen-from-dublin-bandstands-1.485412|url-status=live|archive-date=30 मई 2018|title=Valuable lead roofing stolen from Dublin bandstands|access-date=10 मार्च 2021}}</ref> |- |490,000&nbsp;m<sup>2</sup> || [[वैटिकन सिटी]]<ref>{{cite web | title = Holy See (Vatican City) | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/holy-see-vatican-city/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी | access-date = 2011-10-28 | archive-date = 26 जनवरी 2022 | archive-url = https://web.archive.org/web/20220126204237/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/holy-see-vatican-city/ | url-status = dead }}</ref> |- |600,000&nbsp;m<sup>2</sup> || [[पेंटागन]] का कुल भूमि क्षेत्रफल<ref>{{cite web|title=The Pentagon - George Bergstrom|url=http://www.greatbuildings.com/buildings/The_Pentagon.html|publisher=Great Buildings Online|access-date=2011-10-28|quote=Floor area of 6.5 million square feet, 34 acres, 13.8 hectares, of which 3.7 million square feet are used for offices.}}</ref><!-- 6.5e6 ft^2 * (0.3048 m/ft)^2 = 6.04e5 m^2 --> |- |rowspan=3|10<sup>6</sup> |rowspan=3| 1 [[वर्ग किलोमीटर]] (km<sup>2</sup>) |2&nbsp;km<sup>2</sup> || [[मोनाको]] (क्षेत्रफल की दृष्टि से 192वें स्थान पर देश)<ref>{{cite web | title = Monaco | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/monaco/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-30 | archive-date = 30 दिसंबर 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20211230233800/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/monaco/ | url-status = dead }}</ref> |- |2.59&nbsp;km<sup>2</sup> || 1 [[वर्ग मील]]<ref>गणना: 1 mile * 1 mile * (1.61 km / mile)^2 = 2.59 km^2</ref> |- |2.9&nbsp;km<sup>2</sup> || [[सिटी ऑफ़ लंदन]] (आधुनिक [[लंदन]] का पूरा भाग नहीं)<ref>{{cite web|title=Jurisdictions: London|url=http://www.internationalfinancecentres.com/jurisdictions/view/41|publisher=The International Finance Centre Portal|access-date=2011-10-28|archive-date=25 अप्रैल 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20120425115936/http://www.internationalfinancecentres.com/jurisdictions/view/41|url-status=dead}}</ref> |- |rowspan=2|10<sup>7</sup> |rowspan=2| &nbsp; |59.5&nbsp;km<sup>2</sup> || [[मैनहटन]] द्वीप (भूमि क्षेत्र)<ref>{{cite web|title=New York -- Place and County Subdivision: Population, Housing Units, Area, and Density 2000|url=http://factfinder.census.gov/servlet/GCTTable?_bm=y&-geo_id=04000US36&-_box_head_nbr=GCT-PH1-R&-ds_name=DEC_2000_SF1_U&-_lang=en&-redoLog=false&-mt_name=PEP_2006_EST_GCTT1_ST2&-format=ST-7S&-_sse=on|work=Census 2000 Summary File 1|publisher=US Census Bureau|access-date=2011-10-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20110103055349/http://factfinder.census.gov/servlet/GCTTable?_bm=y&-geo_id=04000US36&-_box_head_nbr=GCT-PH1-R&-ds_name=DEC_2000_SF1_U&-_lang=en&-redoLog=false&-mt_name=PEP_2006_EST_GCTT1_ST2&-format=ST-7S&-_sse=on|archive-date=2011-01-03|url-status=dead}}</ref><!-- 22.96 mi^2 * (1.609 km/mi)^2 ~= 59.44 km^2 --> |- |61&nbsp;km<sup>2</sup> || [[सान मारिनो]]<ref>{{cite web | title = San Marino | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/san-marino/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-30 | archive-date = 12 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210112213547/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/san-marino/ | url-status = dead }}</ref> |} ==10<sup>8</sup> से 10<sup>14</sup> वर्ग मीटर== {| class="wikitable" ! गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) ! समान्य नाम ! मान ! उदाहरण |- | rowspan="4" |10<sup>8</sup> | rowspan="4" | &nbsp; |105&nbsp;km<sup>2</sup> || [[पेरिस]] (केवल आन्तरिक नगर)<ref>{{cite web|title=Comparateur de territoire: Commune de Paris (75056) |url=https://www.insee.fr/fr/statistiques/1405599?geo=COM-75056|publisher=INSEE|access-date=2020-08-26}}</ref> |- |110&nbsp;km<sup>2</sup> || [[वॉल्ट डिज्नी वर्ल्ड]]<ref>{{cite web|title=Walt Disney World Resort|url=http://disneybythenumbers.com/wdw/wdw.html|publisher=Disney By The Numb3rs|access-date=2011-10-28|quote=30,500 acres|archive-url=https://web.archive.org/web/20150612090638/http://disneybythenumbers.com/wdw/wdw.html|archive-date=2015-06-12|url-status=dead}}</ref> |- |272&nbsp;km<sup>2</sup> || [[ताइपे|ताइपे नगर]]<ref>{{cite web|title=Appendix II Statistics|url=http://tcgwww.taipei.gov.tw/ct.asp?xItem=6499588&ctNode=45847&mp=100089|work=Taipei Yearbook 2010|access-date=2011-10-28|archive-url=https://web.archive.org/web/20120522053744/http://tcgwww.taipei.gov.tw/ct.asp?xItem=6499588&ctNode=45847&mp=100089|archive-date=2012-05-22|url-status=dead}}</ref> |- |630&nbsp;km<sup>2</sup> || [[टोरोंटो]]<ref>{{cite web|title=Population and Dwelling Counts|url=http://www12.statcan.ca/english/census01/products/standard/popdwell/Table-CSD-P.cfm?PR=35&T=2&SR=1&S=3&O=D|work=2001 Census|publisher=Statistics Canada|access-date=2011-10-28|archive-date=17 मार्च 2007|archive-url=https://web.archive.org/web/20070317191603/http://www12.statcan.ca/english/census01/products/standard/popdwell/Table-CSD-P.cfm?PR=35&T=2&SR=1&S=3&O=D|url-status=dead}}</ref> |- | rowspan="7" |10<sup>9</sup> | rowspan="7" | &nbsp; |1100&nbsp;km<sup>2</sup> || [[हॉन्ग कॉन्ग]]<ref>{{cite web | title = Hong Kong | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/hong-kong/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 16 सितंबर 2025 | archive-url = https://web.archive.org/web/20250916113919/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/hong-kong/ | url-status = dead }}</ref> |- |1290&nbsp;km<sup>2</sup> || [[लॉस एंजेल्स, कैलिफोर्निया]], संयुक्त राज्य अमेरिका (नगर)<ref>{{cite web|title=California by Place: Los Angeles city|url=http://factfinder.census.gov/servlet/GCTTable?-geo_id=04000US06&-mt_name=DEC_2000_SF1_U_GCTPH1_ST7&-ds_name=DEC_2000_SF1_U|publisher=US Census|access-date=2011-10-28|quote=498.29 square miles|archive-url=https://archive.today/20200212034038/http://factfinder.census.gov/servlet/GCTTable?-geo_id=04000US06&-mt_name=DEC_2000_SF1_U_GCTPH1_ST7&-ds_name=DEC_2000_SF1_U|archive-date=2020-02-12|url-status=dead}}</ref> |- |1962&nbsp;km<sup>2</sup> || [[जैक्सनविल, फ्लोरिडा]]; अमेरिकी उपमहद्वीप का सबसे बड़ा नगर<ref>{{cite web|url=https://www.census.gov/statab/ccdb/cit1010r.txt|archive-url=https://web.archive.org/web/20021017211112/http://www.census.gov/statab/ccdb/cit1010r.txt|url-status=dead|archive-date=October 17, 2002|title=Cities with 100,000 or More Population in 2000 ranked by Land Area (square miles) /1, 2000 in Rank Order|date=March 16, 2004|work=U.S. Census Bureau, Administrative and Customer Services Division, Statistical Compendia Branch|access-date=2010-10-26}}</ref> |- |2188&nbsp;km<sup>2</sup> || [[टोक्यो]]<ref>{{cite web|title=OVERVIEW OF TOKYO|url=http://www.metro.tokyo.jp/ENGLISH/PROFILE/overview02.htm|publisher=Tokyo Metropolitan Government|access-date=2011-10-28|url-status=dead|archive-url=https://web.archive.org/web/20111108043249/http://www.metro.tokyo.jp/ENGLISH/PROFILE/overview02.htm|archive-date=2011-11-08}}</ref> |- |2511 km<sup>2</sup> |[[मास्को]] |- |5780&nbsp;km<sup>2</sup> || [[बाली]] का प्रशासनिक क्षेत्रफल<ref>{{cite web|url=http://sp2010.bps.go.id/files/ebook/5105.pdf|title=Kabupaten Klungkung : Data Agregat per Kecamatan|date=2010|website=Sp2010.bps.go.id|access-date=10 मार्च 2021}}</ref> |- |8030&nbsp;km<sup>2</sup> || कम्यूनिटी ऑफ़ मैड्रिड, स्पैन |- | rowspan="4" |10<sup>10</sup> | rowspan="4" | &nbsp; |11,000&nbsp;km<sup>2</sup> || [[जमैका]]<ref>{{cite web | title = Jamaica | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/jamaica/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 24 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210124190707/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/jamaica/ | url-status = dead }}</ref> |- |30,528&nbsp;km<sup>2</sup> || बेल्जियम |- |68,870&nbsp;km<sup>2</sup> || [[विक्टोरिया झील]]<ref>{{cite web|title=Lake Profile: Victoria|url=http://www.worldlakes.org/lakedetails.asp?lakeid=8361|work=World Lakes|publisher=LakeNet|access-date=2011-10-28}}</ref> |- |84,000&nbsp;km<sup>2</sup> || ऑस्ट्रिया<ref>{{cite web | title = Austria | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/austria/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 10 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210110074413/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/austria/ | url-status = dead }}</ref> |- | rowspan="7" |10<sup>11</sup> | rowspan="7" | &nbsp; |100,000&nbsp;km<sup>2</sup> || [[दक्षिण कोरिया]]<ref>{{cite web | title = South Korea | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/iceland/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 23 मई 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210523194636/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/iceland/ | url-status = dead }}</ref> |- |167,996&nbsp;km<sup>2</sup> || चीन में जिउक्वान |- |301,338&nbsp;km<sup>2</sup> || [[इटली]]<ref>{{cite web | title = Italy | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 1 जुलाई 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210701235642/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | url-status = dead }}</ref> |- |357,000&nbsp;km<sup>2</sup> || जर्मनी<ref>{{cite web | title = Germany | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 1 जुलाई 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210701235642/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | url-status = dead }}</ref> |- |377,900&nbsp;km<sup>2</sup> || जापान<ref>{{cite web | title = Japan | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 1 जुलाई 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210701235642/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/italy/ | url-status = dead }}</ref> |- |510,000&nbsp;km<sup>2</sup> || स्पेन<ref>{{cite web | title = Spain | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/spain/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 27 सितंबर 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210927024323/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/spain/ | url-status = dead }}</ref> |- |780,000&nbsp;km<sup>2</sup> || [[तुर्की]]<ref>{{cite web | title = Turkey | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/turkey/ | work = The World Factbook | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 10 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210110073821/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/turkey/ | url-status = dead }}</ref> |- | rowspan="7" |10<sup>12</sup> | rowspan="7" | 1 वर्ग [[मेगामीटर]] (Mm<sup>2</sup>) |1.0&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[मिस्र]] ([[क्षेत्रफल के अनुसार देशों की सूची|क्षेत्रफल की दृष्टि से 29वीं देश]])<ref>{{cite web | title = Egypt | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/egypt/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 4 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210104191953/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/egypt/ | url-status = dead }}</ref> |- |2&nbsp;Mm<sup>2</sup> | [[मेक्सिको]] |- |3.10&nbsp;Mm<sup>2</sup> || रूस में [[साख़ा गणतंत्र|साख़ा (यकुतिया) गणतंत्र]] (देश से छोटे स्तर की सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई)<ref name="area">[http://www.gks.ru/bgd/free/b10_107/IssWWW.exe/Stg//%3Cextid%3E/%3Cstoragepath%3E::%7Ctab1-01-09.xls Rosstat (Russian Statistical Service), 2010] {{webarchive|url=https://web.archive.org/web/20121018030426/http://www.gks.ru/bgd/free/b10_107/IssWWW.exe/Stg//%3Cextid%3E/%3Cstoragepath%3E%3A%3A%7Ctab1-01-09.xls |date=2012-10-18 }} (xls). Retrieved 2012-06-15.</ref> |- |5&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[रोमन साम्राज्य]] का महत्त्म विस्तार<ref name="Turchin222">{{cite journal|last2=Adams|first2=Jonathan M.|last3=Hall|first3=Thomas D|date=December 2006|title=East-West Orientation of Historical Empires|url=http://jwsr.pitt.edu/ojs/index.php/jwsr/article/view/369/381|journal=Journal of World-Systems Research|volume=12|issue=2|page=222|issn=1076-156X|last1=Turchin|first1=Peter|access-date=2016-09-16}}</ref><ref name="Taagepera125">{{cite journal|date=1979|title=Size and Duration of Empires: Growth-Decline Curves, 600 B.C. to 600 A.D.|jstor=1170959|journal=Social Science History|volume=3|issue=3/4|page=125|doi=10.2307/1170959|last1=Taagepera|first1=Rein}}</ref> |- |7.74&nbsp;Mm<sup>2</sup> || ऑस्ट्रेलिया ([[क्षेत्रफल के अनुसार देशों की सूची|क्षेत्रफल की दृष्टि से 6ठा सबसे बड़ा देश]])<ref>{{cite web | title = Australia | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/australia/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-10-28 | archive-date = 9 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210109090604/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/australia/ | url-status = dead }}</ref> |- |8.5&nbsp;Mm<sup>2</sup> || ब्राज़िल |- |9.5&nbsp;Mm<sup>2</sup> |चीन/संयुक्त राज्य अमेरिका |- |rowspan=9|10<sup>13</sup> |rowspan=9| &nbsp; |10&nbsp;Mm<sup>2</sup> || कनाडा (जल क्षेत्र को भी शामिल करने पर)<ref>{{cite web | title = Canada | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/canada/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 22 सितंबर 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210922212931/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/canada/ | url-status = dead }}</ref> |- |14&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[अंटार्कटिका]]<ref>{{cite web | title = Antarctica | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/antarctica/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-10-28 | archive-date = 9 मई 2022 | archive-url = https://web.archive.org/web/20220509192134/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/antarctica/ | url-status = dead }}</ref> |- |14&nbsp;Mm<sup>2</sup> || विश्वभर की [[कृष्य भूमि]]<!-- Calculation using 2010 FAO data: 1,380,515 * 1000 ha = 1.4e13 m^2 --><ref>{{cite web |title=FAO Resources page |year=2010 |publisher=FAO.org |url=http://www.fao.org/economic/ess/ess-publications/ess-yearbook/ess-yearbook2010/yearbook2010-reources/en/}}</ref> |-Mynameisnoted |16.6&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[प्लूटो (बौना ग्रह)|प्लूटो]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=https://solarsystem.nasa.gov/planets/pluto/facts | title=Pluto: By the Numbers | work=Solar System Exploration | publisher=नासा | access-date=2015-12-11 | archive-date=14 मार्च 2015 | archive-url=https://www.webcitation.org/6X1gMj0LJ?url=https://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Pluto&Display=Facts | url-status=dead }}</ref> |- |17&nbsp;Mm<sup>2</sup> || रूस ([[क्षेत्रफल के अनुसार देशों की सूची|विश्व का सबसे बड़ा देश]])<ref>{{cite web | title = Russia | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/russia/ | work = द वर्ल्ड फेक्टबुक | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-29 | archive-date = 9 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210109173026/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/russia/ | url-status = dead }}</ref> |- |30&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[अफ़्रीका]]<ref>{{cite web|title=Map of Africa|url=http://www.worldatlas.com/webimage/countrys/af.htm|publisher=Worldatlas.com|access-date=2012-01-04|quote=30,065,000 sq km}}</ref> |- |35.5&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[ब्रिटिश साम्राज्य]] का सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र<ref name="Taagepera502">{{cite journal|date=September 1997|title=Expansion and Contraction Patterns of Large Polities: Context for Russia|jstor=2600793|journal=[[International Studies Quarterly]]|volume=41|issue=3|page=502|doi=10.1111/0020-8833.00053|author=Rein Taagepera|author-link=Rein Taagepera|url=http://www.escholarship.org/uc/item/3cn68807}}</ref> |- |38&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[चन्द्रमा]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Moon&Display=Facts | title=Earth's Moon: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=NASA | access-date=2011-09-29 | archive-date=7 जून 2015 | archive-url=https://web.archive.org/web/20150607073509/http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Moon&Display=Facts | url-status=dead }}</ref> |- |77&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[अटलांटिक महासागर]]<ref>{{cite web | title = The World Factbook: Atlantic Ocean | date = 2011-03-24 | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/oceans/atlantic-ocean/ | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-30 | archive-date = 8 अक्तूबर 2022 | archive-url = https://web.archive.org/web/20221008093747/https://www.cia.gov/the-world-factbook/oceans/atlantic-ocean/ | url-status = dead }}</ref> |- |rowspan=5|10<sup>14</sup> |rowspan=5| &nbsp; |144&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[मंगल ग्रह]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Mars&Display=Facts | title=Mars: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=NASA | access-date=2011-09-29 | archive-date=23 अप्रैल 2015 | archive-url=https://web.archive.org/web/20150423150235/http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Mars&Display=Facts | url-status=dead }}</ref> |- |150&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[पृथ्वी]] का भूमि क्षेत्र<ref name="CIAfactbook_world">{{cite web | title = The World Factbook: World | date = 2011-08-31 | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/world/ | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-27 | archive-date = 26 जनवरी 2021 | archive-url = https://web.archive.org/web/20210126032610/https://www.cia.gov/the-world-factbook/countries/world/ | url-status = dead }}</ref> |- |156&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[प्रशान्त महासागर]]<ref>{{cite web | title = The World Factbook: Pacific Ocean | date = 2011-11-17 | url = https://www.cia.gov/the-world-factbook/oceans/pacific-ocean/ | publisher = Central Intelligence Agency | access-date = 2011-09-30 | archive-date = 19 दिसंबर 2024 | archive-url = https://web.archive.org/web/20241219123143/https://www.cia.gov/the-world-factbook/oceans/pacific-ocean/ | url-status = dead }}</ref> |- |360&nbsp;Mm<sup>2</sup> || पृथ्वी का कुल जल क्षेत्र<ref name="CIAfactbook_world"/> |- |510&nbsp;Mm<sup>2</sup> || पृथ्वी का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref name="CIAfactbook_world"/> |} ==10<sup>15</sup> से 10<sup>26</sup> वर्ग मीटर== {| class="wikitable" |+'''10<sup>15</sup> से 10<sup>26</sup> वर्ग मीटर क्षेत्रफल के परिमाण की कोटि की सूची।''' !गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) !समान्य नाम !मान !उदाहरण |- |rowspan=2|10<sup>15</sup> |rowspan=2|&nbsp; |1,000&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[सफ़ेद बौना|व्हाइट ड्वार्फ़]], [[वैन मानॅन का तारा]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |7,600&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[वरुण (ग्रह)|वरुण]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Neptune&Display=Facts | title=Neptune: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=NASA | access-date=2011-09-29 | archive-date=25 नवंबर 2015 | archive-url=https://web.archive.org/web/20151125172926/http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Neptune | url-status=dead }}</ref> |- |rowspan=2|10<sup>16</sup> |rowspan=2| &nbsp; |43,000&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[शनि (ग्रह)|शनि]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Saturn&Display=Facts | title=Saturn: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=NASA | access-date=2011-09-29 | archive-date=6 अक्तूबर 2011 | archive-url=https://www.webcitation.org/62DnOn9pq?url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Saturn | url-status=dead }}</ref> |- |61 000&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[बृहस्पति (ग्रह)|बृहस्पति]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल,<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Jupiter&Display=Facts | title=Jupiter: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=नासा | access-date=2011-09-29 | archive-date=16 दिसंबर 2002 | archive-url=https://web.archive.org/web/20021216185253/http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Jupiter&Display=Facts | url-status=dead }}</ref> गोलीय भाग का पृष्ठ (नासा द्वारा ज्ञात की हुई औसत त्रिज्या से गणना किया हुआ)। बृहस्पति का काट-क्षेत्रफल, जो निकट जाने वाले अन्तरिक्षयानों द्वारा देखे गये वृत्त जैसा है, जो पूर्ण गोले के पृष्ठीय क्षेत्रफल का लगभग [[गोला|ठीक]] एक चौथाई है, जो बृहस्पति के लिए लगभग 1.535e+16 वर्ग मीटर है। |- |rowspan=2|10<sup>17</sup> |rowspan=2| &nbsp; |2-600 000&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[ब्राउन ड्वार्फ़]], [[सीटी चामालेयोंटिस|सीटी चामालेयोन्टिस बी]] का पृष्ठी क्षेत्रफल<!-- Surface area is uncertain because radius is uncertain: area = 4 * pi * r^2 using a range of r: r = (0.23 - 0.06) to (0.23 + 0.08) solar masses = 2-6e17 m^2 --> |- |460,000&nbsp;Mm<sup>2</sup> || [[चन्द्रमा]] के पृथ्वी चारों तरफ घेरा जाने वाल क्षेत्रफल |- |10<sup>18</sup> |1 वर्ग [[गीगामीटर]] (Gm<sup>2</sup>) |6.1 Gm<sup>2</sup> || [[सूर्य]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{cite web | url=http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Sun&Display=Facts | title=Sun: Facts & Figures | work=Solar System Exploration | publisher=NASA | access-date=2011-09-29 | archive-url=https://web.archive.org/web/20110703081045/http://solarsystem.nasa.gov/planets/profile.cfm?Object=Sun&Display=Facts | archive-date=2011-07-03 | url-status=dead }}</ref> |- |10<sup>19</sup> |&nbsp; |30 Gm<sup>2</sup> || [[अभिजित तारा]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |10<sup>20</sup> |&nbsp; |&nbsp;100 Gm<sup>2</sup> |&nbsp; |- |10<sup>21</sup> | |1 000 Gm<sup>2</sup> | |- | rowspan="3" |10<sup>22</sup> | rowspan="3" | &nbsp; |11 000 Gm<sup>2</sup> || [[बुध (ग्रह)|बुध]] का सूर्य के चारों ओर कक्षा द्वारा प्राप्त कुल क्षेत्रफल |- |37 000 Gm<sup>2</sup> || [[शुक्र]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |71 000 Gm<sup>2</sup> || [[पृथ्वी]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- | rowspan="2" |10<sup>23</sup> | rowspan="2" | &nbsp; |160 000 Gm<sup>2</sup> || [[मंगल ग्रह|मंगल]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |281 000 Gm<sup>2</sup> || एक [[खगोलीय इकाई|खइ]] त्रिज्या के साथ एक [[डायसन गोला|डायसन क्षेत्र]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- | rowspan="3" |10<sup>24</sup> | rowspan="3" | 1 वर्ग [[टेरामीटर]] (Tm<sup>2</sup>) |1.9 Tm<sup>2</sup> || [[बृहस्पति (ग्रह)|बृहस्पति]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |6.4 Tm<sup>2</sup> || [[शनि (ग्रह)|शनि]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |8.5 Tm<sup>2</sup> || [[लाल महादानव तारा]] [[बीटलजूस]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- | rowspan="3" |10<sup>25</sup> | rowspan="3" | &nbsp; |24 Tm<sup>2</sup> || [[परमदानव तारा]] [[वी वाई महाश्वान]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |26 Tm<sup>2</sup> || [[अरुण (ग्रह)|अरुण]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |64 Tm<sup>2</sup> || [[वरुण (ग्रह)|वरुण]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल |- |10<sup>26</sup> |&nbsp; |110 Tm<sup>2</sup> || [[प्लूटो (बौना ग्रह)|प्लूटो]] द्वारा सूर्य की परिक्रमा में घेरा जाने वाला कुल क्षेत्रफल<!-- area of ellipse = pi * semi-major axis * (semi-major axis * sqrt(1-eccentricity^2)) semi-major axis = 5.90638e12 m eccentricity ~= 0.2488 => area = 1.061e26 m^2 ~= 1.1e26 m^2--> |} ==10<sup>27</sup> वर्ग मीटर और इससे भी अधिक== {| class="wikitable" |+'''10<sup>27</sup> वर्ग मीटर क्षेत्रफल और इससे अधिक की कोटि की सूची।''' !गुणांक (वर्ग मीटर अथवा m<sup>2</sup>) !समान्य नाम !मान !उदाहरण |- |10<sup>30</sup> |1 वर्ग [[पेटामीटर]] (Pm<sup>2</sup>) | | |- |10<sup>31</sup> | |10&nbsp;Pm<sup>2</sup> | |- | rowspan="2" |10<sup>32</sup> | |200&nbsp;Pm<sup>2</sup> |लगभग [[और्ट बादल]] का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- | |300&nbsp;Pm<sup>2</sup> |लगभग बोक ग्लोबुल का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |10<sup>33</sup> | |1 000&nbsp;Pm<sup>2</sup> | |- |10<sup>34</sup> | |30 000&nbsp;Pm<sup>2</sup> |द बब्बल नेबुला का पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |10<sup>35</sup> | |100 000&nbsp;Pm<sup>2</sup> | |- |10<sup>36</sup> |1 वर्ग [[एक्सामीटर]] (Em<sup>2</sup>) | | |- | colspan="4" |... |- |10<sup>41</sup> | |700 000 Em<sup>2</sup><!-- Calculation in attempt to verify this number: using 100000 light years as diameter of Milky Way, assume the disk is round, area = pi * (100000 light-years / 2 * 9.5e15 meters/light-year)^2 = 7e41 m^2 --> |[[आकाशगंगा]] के गैलेक्टिक चकती का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल |- |10<sup>42</sup> |1 वर्ग [[ज़ेट्टामीटर]] (Zm<sup>2</sup>) | | |- | colspan="4" |... |- |10<sup>48</sup> |1 वर्ग [[योट्टोमीटर]] (Ym<sup>2</sup>) | | |- |10<sup>54</sup> | |2400 Ym<sup>2</sup> |प्रेक्षणीय ब्रह्माण्ड का पृष्ठीय क्षेत्रफल<ref>{{Cite web | url = http://www.wolframalpha.com/input/?i=4*pi*(radius+of+observable+universe)%5E2 | title = Wolfram{{!}}Alpha: Computational Knowledge Engine | website = www.wolframalpha.com | access-date = 2016-03-01 }}</ref> |} ==इन्हें भी देखें== * [[परिमाण की कोटि]] ==सन्दर्भ== {{reflist}} {{area}} [[श्रेणी:परिमाण की कोटि]] r2ks73re5enp0mb0sp91u3sufp6d5m0 सोहनलाल पाठक 0 441564 6543707 6541860 2026-04-24T23:24:24Z Suyash.dwivedi 164531 6543707 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=<!-- use common name/article title -->|image=Martyr Sohanlal Pathak.jpg |caption=|other_names=|birth_name=|birth_date={{Birth date|1883|01|07|df=yes}}|birth_place=[[पट्टी, पंजाब|पट्टी]], [[लाहौर जिला|लाहौर]], [[पंजाब]], (अब [[अमृतसर जिला]], [[पंजाब]], [[भारत]] में है)|death_date={{Death date and age|1916|02|10|1883|01|07|df=yes}}|death_place=[[माण्डले]], [[बर्मा]]|death_cause=[[फाँसी]]|occupation=Indian revolutionary|years_active=|known_for=[[भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन]]}} '''सोहनलाल पाठक''' (7 जनवरी 1883 - 10 फरवरी 1916) [[पंजाब प्रांत (ब्रिटिश भारत)|पंजाब]] के एक क्रांतिकारी और [[ग़दर पार्टी|गदर पार्टी]] के सदस्य थे।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=vnJ0MwbAsEAC&dq=sohanlal+pathak&pg=PA225|title=Freedom Fighters of India (in Four Volumes)|last=Agrawal|first=M. G.|date=2008|publisher=Gyan Publishing House|isbn=978-81-8205-468-4|language=en}}</ref> उन्होंने बर्मा में भारतीय राष्ट्रवाद के आदर्शों का प्रचार किया।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/whoswhoofindianm01chop|title=Who's Who of Indian Martyrs, Vol. 1|last=Chopra|first=Pran Nath|date=2013|publisher=Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India|others=Public Resource|isbn=978-81-230-1757-0}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.scribd.com/document/394605591/Eminent-Freedom-Fighters-of-Punjab-by-Fauja-Singh-GurmatVeechar-com-pdf|title=Eminent Freedom Fighters of Punjab by|last=Singh|website=Scribd|language=en|access-date=12 July 2021}}</ref> अगस्त 1915 में [[बर्मा में ब्रितानी शासन|बर्मा]] में विद्रोह का आयोजन करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन्हें [[ब्रिटिश राज|सरकार]] के खिलाफ षडयन्त्र करने और राजद्रोह करने के लिए मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=eataP-tWsMIC&q=sohanlal+pathak|title=The Story of Freedom Fighters|publisher=Pitambar Publishing|isbn=978-81-209-1304-2|language=en}}</ref> उन्हें 10 फरवरी 1916 को [[बर्मा]] के [[माण्डले]] जेल में फांसी दी गई थी।<ref>{{Cite web|url=https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4532|title=Sohan Lal Pathak|last=Mahotsav|first=Amrit|website=Azadi Ka Amrit Mahotsav, Ministry of Culture, Government of India|language=English|access-date=2024-03-06}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:1883 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग]] [[श्रेणी:ग़दर पार्टी]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] sqc287ro60wszgxtag78esdccoeb0k9 6543708 6543707 2026-04-24T23:27:34Z Suyash.dwivedi 164531 6543708 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=<!-- use common name/article title -->|image=Martyr Sohanlal Pathak.jpg |caption=|other_names=|birth_name=|birth_date={{Birth date|1883|01|07|df=yes}}|birth_place=[[पट्टी, पंजाब|पट्टी]], [[लाहौर जिला|लाहौर]], [[पंजाब]], (अब [[अमृतसर जिला]], [[पंजाब]], [[भारत]] में है)|death_date={{Death date and age|1916|02|10|1883|01|07|df=yes}}|death_place=[[माण्डले]], [[बर्मा]]|death_cause=[[फाँसी]]|occupation=Indian revolutionary|years_active=|known_for=[[भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन]]}} '''सोहनलाल पाठक''' (7 जनवरी 1883 - 10 फरवरी 1916) [[पंजाब प्रांत (ब्रिटिश भारत)|पंजाब]] के एक क्रांतिकारी और [[ग़दर पार्टी|गदर पार्टी]] के सदस्य थे।<ref name="m770">{{cite web | title=Google Books | website=Google | url=https://www.google.co.in/books/edition/Freedom_Fighters_of_India_in_Four_Volume/vnJ0MwbAsEAC?hl=en&gbpv=1&dq=Sohanlal+Pathak&pg=PA225&printsec=frontcover | ref={{sfnref|Google}} | access-date=24 April 2026}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=vnJ0MwbAsEAC&dq=sohanlal+pathak&pg=PA225|title=Freedom Fighters of India (in Four Volumes)|last=Agrawal|first=M. G.|date=2008|publisher=Gyan Publishing House|isbn=978-81-8205-468-4|language=en}}</ref> उन्होंने बर्मा में भारतीय राष्ट्रवाद के आदर्शों का प्रचार किया।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/whoswhoofindianm01chop|title=Who's Who of Indian Martyrs, Vol. 1|last=Chopra|first=Pran Nath|date=2013|publisher=Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India|others=Public Resource|isbn=978-81-230-1757-0}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.scribd.com/document/394605591/Eminent-Freedom-Fighters-of-Punjab-by-Fauja-Singh-GurmatVeechar-com-pdf|title=Eminent Freedom Fighters of Punjab by|last=Singh|website=Scribd|language=en|access-date=12 July 2021}}</ref> अगस्त 1915 में [[बर्मा में ब्रितानी शासन|बर्मा]] में विद्रोह का आयोजन करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन्हें [[ब्रिटिश राज|सरकार]] के खिलाफ षडयन्त्र करने और राजद्रोह करने के लिए मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=eataP-tWsMIC&q=sohanlal+pathak|title=The Story of Freedom Fighters|publisher=Pitambar Publishing|isbn=978-81-209-1304-2|language=en}}</ref> उन्हें 10 फरवरी 1916 को [[बर्मा]] के [[माण्डले]] जेल में फांसी दी गई थी।<ref>{{Cite web|url=https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4532|title=Sohan Lal Pathak|last=Mahotsav|first=Amrit|website=Azadi Ka Amrit Mahotsav, Ministry of Culture, Government of India|language=English|access-date=2024-03-06}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:1883 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग]] [[श्रेणी:ग़दर पार्टी]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] 02998gttpk6qcipto32ppl89rfu9ar0 6543728 6543708 2026-04-25T03:12:58Z अनुनाद सिंह 1634 6543728 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=<!-- use common name/article title -->|image=Martyr Sohanlal Pathak.jpg |caption=|other_names=|birth_name=|birth_date={{Birth date|1883|01|07|df=yes}}|birth_place=[[पट्टी, पंजाब|पट्टी]], [[लाहौर जिला|लाहौर]], [[पंजाब]], (अब [[अमृतसर जिला]], [[पंजाब]], [[भारत]] में है)|death_date={{Death date and age|1916|02|10|1883|01|07|df=yes}}|death_place=[[माण्डले]], [[बर्मा]]|death_cause=[[फाँसी]]|occupation=Indian revolutionary|years_active=|known_for=[[भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन]]}} '''सोहनलाल पाठक''' (7 जनवरी 1883 - 10 फरवरी 1916) [[पंजाब प्रांत (ब्रिटिश भारत)|पंजाब]] के एक क्रांतिकारी और [[ग़दर पार्टी|गदर पार्टी]] के सदस्य थे।<ref name="m770">{{cite web | title=Google Books | website=Google | url=https://www.google.co.in/books/edition/Freedom_Fighters_of_India_in_Four_Volume/vnJ0MwbAsEAC?hl=en&gbpv=1&dq=Sohanlal+Pathak&pg=PA225&printsec=frontcover | ref={{sfnref|Google}} | access-date=24 April 2026}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=vnJ0MwbAsEAC&dq=sohanlal+pathak&pg=PA225|title=Freedom Fighters of India (in Four Volumes)|last=Agrawal|first=M. G.|date=2008|publisher=Gyan Publishing House|isbn=978-81-8205-468-4|language=en}}</ref> उन्होंने [[बर्मा]] में [[भारतीय राष्ट्रवाद]] के आदर्शों का प्रचार किया।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/whoswhoofindianm01chop|title=Who's Who of Indian Martyrs, Vol. 1|last=Chopra|first=Pran Nath|date=2013|publisher=Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India|others=Public Resource|isbn=978-81-230-1757-0}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.scribd.com/document/394605591/Eminent-Freedom-Fighters-of-Punjab-by-Fauja-Singh-GurmatVeechar-com-pdf|title=Eminent Freedom Fighters of Punjab by|last=Singh|website=Scribd|language=en|access-date=12 July 2021}}</ref> अगस्त 1915 में [[बर्मा में ब्रितानी शासन|बर्मा]] में विद्रोह का आयोजन करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन्हें [[ब्रिटिश राज|सरकार]] के खिलाफ षडयन्त्र करने और राजद्रोह करने के लिए मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=eataP-tWsMIC&q=sohanlal+pathak|title=The Story of Freedom Fighters|publisher=Pitambar Publishing|isbn=978-81-209-1304-2|language=en}}</ref> उन्हें 10 फरवरी 1916 को [[बर्मा]] के [[माण्डले]] जेल में फांसी दी गई थी।<ref>{{Cite web|url=https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4532|title=Sohan Lal Pathak|last=Mahotsav|first=Amrit|website=Azadi Ka Amrit Mahotsav, Ministry of Culture, Government of India|language=English|access-date=2024-03-06}}</ref> सोहन लाल पाठक का जन्म 1883 में पंजाब के पट्टी (तब [[अमृतसर जिला]], अब [[तरनतारन जिला]]) के एक गरीब ब्राह्मण श्री चंदा राम के घर हुआ था। एक मेधावी छात्र होने के नाते, सोहन लाल जी ने स्थानीय स्कूल में रहते हुए कई बार छात्रवृत्ति और पुरस्कार जीते। लेकिन मिडिल की परीक्षा पास करने और सिंचाई विभाग में नौकरी हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। थोड़े समय के बाद उन्होंने यह सेवा छोड़ दी और लाहौर के नॉर्मल ट्रेनिंग स्कूल में दाखिला लिया। कोर्स पूरा करने पर उन्होंने एक स्कूली शिक्षक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1901 में सोहन लाल पाठक का विवाह लक्ष्मी देवी से हुआ। उनके बेटे के जन्म के बाद लक्ष्मी देवी का निधन हो गया और उनके बेटे की भी जन्म के एक सप्ताह के भीतर मृत्यु हो गई। [[बंग भंग|1905-07 के क्रांतिकारी विद्रोह]] ने गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने प्रधानाध्यापक द्वारा लाला लाजपत राय और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ अपने संपर्क तोड़ने के आदेश के विरोध में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात [[लाला लाजपत राय]] के अधीन कार्यरत [[उर्दू]] पत्रिका वंदे मातरम के संयुक्त संपादक बने। साथ ही, वह उन कक्षाओं में शामिल हो गए, जिन्हें [[लाला हरदयाल]] ने लाहौर में भारतीय युवाओं को क्रांति की आग में झोंकने के लिए शुरू किया था। वह 1913 में गदर पार्टी में शामिल होने के लिए अमेरिका के [[कैलिफोर्निया]] चले गए। १९१५ में उन्हें गदर पार्टी की तरफ से गुप्तचरी करने के लिये बर्मा भेजा गया। उन्होंने अपनी गतिविधियों का क्षेत्र बर्मा स्थानांतरित कर दिया। तुरंत ही अंग्रेजों ने इस खतरनाक क्रांतिकारी की गिरफ्तारी के लिए तलाश शुरू कर दी। उन पर हाथ रखना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वे स्थानीय भाषा जानते थे और देशी लोगों के वेश में देश में स्वतंत्र रूप से घूमते थे। अंत में अंग्रेज सरकार अगस्त 1915 में [[मेम्यो]] (बर्मा) में उन्हें गिरफ्तार करने में सफल रही। मुकदमे के दौरान उन्हें [[मांडले]] के किले में हिरासत में लिया गया था। अदालत ने उसे दोषी करार दिया और मौत की सजा सुनाई। 10 फरवरी 1916 को उनकी मृत्यु फाँसी पर हुई। एक और महान स्वतंत्रता सेनानी जो उनके साथ फाँसी पर शहीद हुए , वे थे हरनाम सिंह सहरी। वह [[गदर पार्टी]] के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें भारत से बाहर फांसी की सजा दी गई थी। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:1883 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग]] [[श्रेणी:ग़दर पार्टी]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] e8klyr1w8qqmzugcx2irv2aa8h0smw7 6543738 6543728 2026-04-25T03:44:09Z अनुनाद सिंह 1634 6543738 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=<!-- use common name/article title -->|image=Martyr Sohanlal Pathak.jpg |caption=|other_names=|birth_name=|birth_date={{Birth date|1883|01|07|df=yes}}|birth_place=[[पट्टी, पंजाब|पट्टी]], [[लाहौर जिला|लाहौर]], [[पंजाब]], (अब [[अमृतसर जिला]], [[पंजाब]], [[भारत]] में है)|death_date={{Death date and age|1916|02|10|1883|01|07|df=yes}}|death_place=[[माण्डले]], [[बर्मा]]|death_cause=[[फाँसी]]|occupation=Indian revolutionary|years_active=|known_for=[[भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन]]}} '''सोहनलाल पाठक''' (7 जनवरी 1883 - 10 फरवरी 1916) [[पंजाब प्रांत (ब्रिटिश भारत)|पंजाब]] के एक क्रांतिकारी और [[ग़दर पार्टी|गदर पार्टी]] के सदस्य थे।<ref name="m770">{{cite web | title=Google Books | website=Google | url=https://www.google.co.in/books/edition/Freedom_Fighters_of_India_in_Four_Volume/vnJ0MwbAsEAC?hl=en&gbpv=1&dq=Sohanlal+Pathak&pg=PA225&printsec=frontcover | ref={{sfnref|Google}} | access-date=24 April 2026}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=vnJ0MwbAsEAC&dq=sohanlal+pathak&pg=PA225|title=Freedom Fighters of India (in Four Volumes)|last=Agrawal|first=M. G.|date=2008|publisher=Gyan Publishing House|isbn=978-81-8205-468-4|language=en}}</ref> उन्होंने [[बर्मा]] में [[भारतीय राष्ट्रवाद]] के आदर्शों का प्रचार किया।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/whoswhoofindianm01chop|title=Who's Who of Indian Martyrs, Vol. 1|last=Chopra|first=Pran Nath|date=2013|publisher=Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India|others=Public Resource|isbn=978-81-230-1757-0}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.scribd.com/document/394605591/Eminent-Freedom-Fighters-of-Punjab-by-Fauja-Singh-GurmatVeechar-com-pdf|title=Eminent Freedom Fighters of Punjab by|last=Singh|website=Scribd|language=en|access-date=12 July 2021}}</ref> अगस्त 1915 में [[बर्मा में ब्रितानी शासन|बर्मा]] में विद्रोह का आयोजन करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन्हें [[ब्रिटिश राज|सरकार]] के खिलाफ षडयन्त्र करने और [[राजद्रोह]] करने के लिए मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=eataP-tWsMIC&q=sohanlal+pathak|title=The Story of Freedom Fighters|publisher=Pitambar Publishing|isbn=978-81-209-1304-2|language=en}}</ref> 10 फरवरी 1916 को [[बर्मा]] के [[माण्डले]] जेल में उन्हें फांसी दी गई थी।<ref>{{Cite web|url=https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4532|title=Sohan Lal Pathak|last=Mahotsav|first=Amrit|website=Azadi Ka Amrit Mahotsav, Ministry of Culture, Government of India|language=English|access-date=2024-03-06}}</ref> सोहन लाल पाठक का जन्म 1883 में पंजाब के [[पट्टी]] (तब [[अमृतसर जिला]], अब [[तरनतारन जिला]]) के एक गरीब [[ब्राह्मण]] श्री चंदा राम के घर हुआ था। एक मेधावी छात्र होने के नाते, सोहन लाल जी ने स्थानीय स्कूल में रहते हुए कई बार छात्रवृत्ति और पुरस्कार जीते। लेकिन मिडिल की परीक्षा पास करने और सिंचाई विभाग में नौकरी हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। थोड़े समय के बाद उन्होंने यह सेवा छोड़ दी और [[लाहौर]] के नॉर्मल ट्रेनिंग स्कूल में दाखिला लिया। कोर्स पूरा करने पर उन्होंने एक स्कूली शिक्षक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1901 में सोहन लाल पाठक का विवाह लक्ष्मी देवी से हुआ। उनके बेटे के जन्म के बाद लक्ष्मी देवी का निधन हो गया और उनके बेटे की भी जन्म के एक सप्ताह के भीतर मृत्यु हो गई। [[बंग भंग|1905-07 के क्रांतिकारी विद्रोह]] ने गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने प्रधानाध्यापक द्वारा [[लाला लाजपत राय]] और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ अपने संपर्क तोड़ने के आदेश के विरोध में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात [[लाला लाजपत राय]] के अधीन कार्यरत [[उर्दू]] पत्रिका [[वन्दे मातरम्]] के संयुक्त संपादक बने। साथ ही, वह उन कक्षाओं में शामिल हो गए, जिन्हें [[लाला हरदयाल]] ने लाहौर में भारतीय युवाओं को क्रांति की आग में झोंकने के लिए शुरू किया था। वह 1913 में गदर पार्टी में शामिल होने के लिए अमेरिका के [[कैलिफोर्निया]] चले गए। १९१५ में उन्हें [[गदर पार्टी]] की तरफ से [[गुप्तचर|गुप्तचरी]] करने के लिये बर्मा भेजा गया। योजना यह थी कि 21 फरवरी, 1915 को भारत की सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिक सशस्त्र विद्रोह करेंगे। यह बर्मा के भारतीय सैनिकों को तैयार करें कि वह भी उसी दिन सशस्त्र विद्रोह कर भारत पर आक्रमण करें । तुरंत ही अंग्रेजों ने इस खतरनाक क्रांतिकारी की गिरफ्तारी के लिए तलाश शुरू कर दी। उन पर हाथ रखना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वे स्थानीय भाषा जानते थे और देशी लोगों के वेश में देश में स्वतंत्र रूप से घूमते थे। अंत में अंग्रेज सरकार अगस्त 1915 में [[मेम्यो]] (बर्मा) में उन्हें गिरफ्तार करने में सफल रही। ब्रिटिश सेना के एक भारतीय जमादार ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया। मुकदमे के दौरान उन्हें [[मांडले]] के किले में हिरासत में लिया गया था। अदालत ने उसे दोषी करार दिया और मौत की सजा सुनाई। फाँसी वाले दिन जल्लाद ने भी फाँसी लगाने से इन्कार कर दिया। वह बोला, "मैं दुष्टों, अपराधियों, चोर व डकैतों को फाँसी देता हूँ । फाँसी लगाना मेरा धर्म है, मेरा फर्ज है, मगर पंडित सोहन लाल जैसे देव पुरुषों को मैं फाँसी नहीं दे सकता । " दूसरे जल्लाद ने उन्हें फाँसी दी। 10 फरवरी 1916 को उनकी मृत्यु फाँसी पर हुई। एक और महान स्वतंत्रता सेनानी जो उनके साथ फाँसी पर शहीद हुए , वे थे [[हरनाम सिंह सहरी]]। इनकी कुर्बानी रंग लाई । बर्मा आजाद हुआ लेकिन चन्द दिनों के बाद ही अंग्रेजों ने उस पर पुनः अधिकार कर लिया । वह [[गदर पार्टी]] के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें भारत से बाहर फांसी की सजा दी गई थी। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:1883 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग]] [[श्रेणी:ग़दर पार्टी]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] 6l9xzdrulb7s2mxxtv9jmti54y24dxf केशों की देखभाल 0 464827 6543704 6342632 2026-04-24T22:10:39Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543704 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Cutting hair at the camp. 166th Field Hospital, Baccarat, France., 05-15-1918 - NARA - 530725.tif|right|thumb|300px|फ्रांस के एक सैन्य अस्पताल में केश कर्तन कराते हुए सैनिक]] मानव के [[बाल|केशों]] के स्वास्थ्य एवं सौंदर्य वृद्धि को '''केशों की देखभाल''' कहते हैं। केशों की देखभाल व्यक्ति के केशों की प्रकृति पर निर्भर करती है। सभी केश समान नहीं होते, बल्कि केशों की विविधता में भी परिलक्षित होती है। आजकल कम उम्र में [[गंजापन]] या बहुत अधिक बाल झड़ने की समस्या आम हो चली है। गंजेपन के कारण कोई भी व्यक्ति अपनी उम्र से बड़ा दिखाई देने लगता है और एक बाल उड़ने शुरू हो जाते हैं तो उन्हें रोकना बहुत मुश्किल होता है। वैसे तो बाल झड़ने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन अनुवांशिक कारणों के अलावा विकार, किसी विष का सेवन कर लेने, उपदंश, दाद, एक्जिमा आदि के कारण ऐसा हो जाता है। बालों के समय से पहले गिरने की एक अन्य आनुवंशिक समस्या को एंड्रोजेनिक एलोपेसिया कहा जाता है, जिसे आमतौर से पैटर्न बाल्डमनेस के रूप में जाना जाता है। पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही बाल गिरने का यह सामान्य रूप है, लेकिन [https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html गंजेपन की शुरुआत] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230426073853/https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html |date=26 अप्रैल 2023 }} होने का समय और प्रतिरूप (पैटर्न) लिंग के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस समस्या से परेशान पुरुषों में बाल गिरने की समस्या किशोरावस्था से ही हो सकती है, जबकि महिलाओं में इस प्रकार बाल गिरने की समस्या 30 के बाद उत्पन्न होती है। पुरुषों में इस समस्या को सामान्य रूप से मेल पैटर्न बाल्डनेस के नाम से जाना जाता है। इसमें हेयरलाइन पीछे हटती जाती है और शीर्ष पर विरल हो जाती है। महिलाओं में एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया को फीमेल पैटर्न बाल्डनेस के नाम से भी जाना जाता है। इस समस्या से पीड़ित महिलाओं में पूरे सिर के बाल कम हो जाते हैं, लेकिन हेयरलाइन पीछे नहीं हटती। महिलाओं में एंड्रोजेनिक एलोपेसिया के कारण शायद ही कभी पूरी तरह गंजेपन की समस्या होती है। कुछ हर्बल नुस्खे और खान-पान के तरीके के अलावा दैनिक जीवन-शैली बालों की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।<ref>{{Cite web|url=http://cashkaro.com/blog/simple-home-remedies-for-hair-fall-treatment/20402|title=केशों की देखभाल के घरेलू नुस्के।|last=|first=|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20180402163437/http://cashkaro.com/blog/simple-home-remedies-for-hair-fall-treatment/20402|archive-date=2 अप्रैल 2018|dead-url=|access-date=2 अप्रैल 2018|url-status=dead}}</ref> * [[साधारण नमक|नमक]] का अधिक सेवन करने से गंजापन आ जाता है। पिसा हुआ नमक व [[काली मिर्च]] एक-एक चम्मच [[नारियल]] का तेल पांच चम्मच मिलाकर गंजेपन वाले स्थान पर लगाने से बाल आ जाते हैं। [[कलौंजी]] को पीसकर पानी में मिला लें। इस पानी से सिर को कुछ दिनों तक धोने से बाल झड़ना बंद हो जाते हैं और बाल घने भी होना शुरू हो जाते हैं। * अगर बालों का गुच्छा किसी स्थान से उड़ जाए तो गंजे के स्थान पर [[नीबू|नींबू]] रगड़ते रहने से बाल दुबारा आने लगते हैं। जहां से बाल उड़ जाएं तो [[प्याज]] का रस रगड़ते रहने से बाल आने लगते हैं। बालों में नीम का तेल लगाने से भी राहत मिलती है। * [https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html बाल झड़ते हैं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230426073853/https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html |date=26 अप्रैल 2023 }} तो गरम जैतून के तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर का पेस्ट बनाएं। नहाने से पहले इस पेस्ट को सिर पर लगा लें। 15 मिनट बाद बाल गरम पानी से सिर को धोएं। ऐसा करने पर कुछ ही दिनों बालों के झड़ने की समस्या दूर हो जाएगी। * [[लहसुन]] का खाने में अधिक प्रयोग करें। उड़द की दाल उबाल कर पीस लें। इसका सोते समय सिर पर गंजेपन की जगह लेप करें। हरे धनिए का लेप करने से भी बाल आने लगते हैं। केले के गूदे को नींबू के रस के साथ पीस लें और लगाएं, इससे लाभ होता है। अनार के पत्ते पानी में पीसकर सिर पर लेप करने से गंजापन दूर होता है। * [[आँवला|आंवला-]] आंवला के फलों का चूर्ण दही में मिलाकर हल्के-हल्के हाथों से सिर पर मालिश करें और 5 मिनट बाद गुनगुने पानी से बालों को साफ कर लें। कुछ दिनों तक ऐसा करने से बाल स्वस्थ हो जाते हैं और डेंड्रफ भी दूर हो जाते हैं। * [[अमरबेल]]- अमरबेल के पौधे से रस तैयार किया जाए और सिर पर प्रतिदिन सुबह एक सप्ताह तक लगाया जाए तो सिर से डेंड्रफ नदारद हो जाएगी, साथ ही बालों का झडने का सिलसिला भी कम हो जाता है। माना जाता है कि आम के पेड पर चढी हुई अमरबेल को उबालकर उस पानी से स्नान किया जाए तो गंजापन दूर होता है। * [[गेंदा]]- गेंदा के फूलों का रस नारियल तेल के साथ मिलाकर उससे हल्की-हल्की मालिश करके नहा लिया जाए तो सिर में हुए किसी भी तरह के संक्रमण, फोड़े- फुंसियों में आराम मिल जाता है। * [[बहेडा]] - इसके बीजों के चूर्ण को नारियल या जैतून के तेल में मिलाकर गुनगुना गर्म किया जाए और इस तेल को बालों पर लगाया जाए तो बाल चमकदार हो जाते हैं। साथ ही, इनकी जडें भी मजबूत हो जाती हैं। बालों की समस्याओं में हर्बल जानकारों के अनुसार त्रिफला का सेवन हितकर माना गया है। * [[गुड़हल]] या [[जासवंत]]- इसके फूलों के रस को नहाने से 10 मिनट पहले सिर पर लगाया जाए तो इससे बालों के काला होने में मदद मिलती है। साथ ही, यह एक बेहतरीन कंडीशनर की तरह काम करता है। * [[प्राजक्ता (फूल)|पारिजात-]] आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार पारिजात की पत्तियों और बीजों का चूर्ण तेल में मिलाकर प्रतिदिन रात को बालों की जडों में मालिश करने से बालों का पुन: उगना शुरू हो जाता है, साथ ही, बालों के झडने को रोकने में मदद करता है। * [[शिकाकाई]]- शिकाकाई के बीजों को कुचलकर, एक कटोरे में लेकर पानी में डुबो दिया जाए और सारी रात रख दिया जाए। सुबह इस पानी से बालों की धुलाई की जानी चाहिए। ये एक नेचुरल शैम्पू होता है। आदिवासी जानकारों के अनुसार इसका इस्तेमाल [https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html बालों को चमकदार और स्वस्थ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230426073853/https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html |date=26 अप्रैल 2023 }} बनाने के साथ, बालों का दोमुंहा होना बंद कर देता है। * [[जटामांसी]]- जटामांसी की जड़ों को नारियल के तेल के साथ उबालकर ठंडा होने के बाद प्रतिदिन रात को सोने से पहले इससे मालिश की जाए तो असमय बालों का पकना और झड़ना रुक जाता है। आदिवासियों का मानना है कि इसके प्रयोग से बालों का दोमुंहा होना भी बंद हो जाता है और बाल स्वस्थ हो जाते हैं। * [[तिल]]- तिल के तेल से बालों की मालिश करना बेहतर माना जाता है। आदिवासी हर्बल जानकारों की मानी जाए तो तिल के तेल में थोड़ी-सी मात्रा गाय के घी और अमरबेल के चूर्ण में मिला ली जाए और सिर पर रात में सोने से पहले लगा लिया जाए तो बाल चमकदार, खूबसूरत होने के साथ घने हो जाते हैं और यही फार्मूला गंजेपन को रोकने में मदद भी करता है। * [[नीम]]- असमय बालों के पकने और बालों के झड़ने के क्रम को रोकने के लिए पातालकोट के आदिवासी नीम के बीजों से प्राप्त तेल को रात में सिर पर लगा लेते हैं और सुबह सिर को धो लिया करते हैं। माना जाता है कि नीम के बीजों का तेल बालों में एक माह तक लगातार इस्तेमाल करने से बालों का झड़ना रुक जाता है। डेंड्रफ होने पर 100 मिली नारियल तेल में नीम के बीजों का चूर्ण (20ग्राम) अच्छी तरह से मिलाकर सप्ताह में दो बार रात में मालिश की जाए तो आराम मिल जाता है। * [[टमाटर]] - पके हुए टमाटर का रस बालों पर लगाने से रूसी दूर हो जाती है। नहाने से 15 मिनट पहले ऐसा करना काफी कारगर होता है। * [[कनेर]] - कनेर की पत्तियों का रस दूध में मिला कर बालों पर लगाया जाए तो गंजापन दूर होता है, साथ ही बालों का असमय पकना दूर हो जाता है। * [[सहजन]] या [[सहजन|मुनगा-]] इसकी पत्तियों के रस को लगा कर प्रतिदिन नहाने से सिर से रूसी या डेंड्रफ़ खत्म हो जाती है। इस रस का इस्तेमाल कम से कम एक सप्ताह तक करना जरूरी है। सहजन की फलियों को उबालकर पल्प तैयार किया जाए और नहाते वक्त इस पल्प को सिर पर शैंपू की तरह इस्तेमाल किया जाए तो यह बाजार में उपलब्ध किसी भी विटामिन ई युक्त शैंपू से बेहतर साबित होगा। आधुनिक विज्ञान भी सहजन में पाए जाने वाले विटामिन ई को बालों के लिए लाभकारी मानता है। * [[मेथी]]- मेथी की सब्जी का ज्यादा सेवन बालों की सेहत के लिए उत्तम माना जाता है। मेथी के बीजों का चूर्ण तैयार करके पानी के साथ मिलाया जाए और पेस्ट बना लिया जाए। इस पेस्ट को सिर पर लेप करके आधे घंटे के लिए छोड़ दिया जाए और बाद में इसे धो लिया जाए। ऐसा करने से [https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html बालों से डेंड्रफ खत्म] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230426073853/https://www.drkitchentips.in/2023/04/know-the-causes-of-white-hair-and-easy-ways-to-prevent-it-naturally-hair-care-tips.html |date=26 अप्रैल 2023 }} हो जाते हैं। ऐसा सप्ताह में कम से कम दो बार किया जाना चाहिए। * [[अरंडी|अरण्डी-]] इसके बीजों के तेल के इस्तमाल से बालों का काला होना शुरू हो जाता है। सप्ताह में कम से कम दो बार अरण्डी का तेल बालों में अवश्य लगाना चाहिए। रात में तेल लगाकर सुबह इसे किसी शैम्पू से साफ किया जा सकता है। == इन्हें भी देखें == * [[गंजापन]] *[[शिकाकाई]] *[https://www.advancedfacts.com/2023/05/hair-care-tips-in-hindi.html बालों की देखभाल के नुस्खे] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230522042228/https://www.advancedfacts.com/2023/05/hair-care-tips-in-hindi.html |date=22 मई 2023 }} == बाहरी कड़ियाँ == *[[wikiHow:Wash-Your-Hair-Without-Shampoo|How to Wash Your Hair Without Shampoo]] - a wiki article on cleaning hair without shampoo. *[https://officialhomeremedies.com/home-remedies-for-hair-fall/#more-360 बालों को झड़ने से रोकने के घरेलू उपाय] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20221212101707/https://officialhomeremedies.com/home-remedies-for-hair-fall/#more-360 |date=12 दिसंबर 2022 }} *[https://choose.clinic/how-to-grow-hair-faster/ बालों की बढ़वार]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }} सन्दर्भ{{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:स्वास्थ्य]] [[श्रेणी:केश]] r9ov9d2688xa355bqo1pavmn70crtw9 भारत के स्वर्णयुग 0 469169 6543854 1769822 2026-04-25T11:50:22Z ~2026-21496-92 919279 भारत का स्वर्णयुग 6543854 wikitext text/x-wiki विभिन्न ऐतिहासिक समयों को [[स्वर्णयुग]] के रूप में वर्णित किया जाता है। इसका आधार [[दक्षिण एशिया]] में विभिन्न तरह के निर्माण और विकास से जोड़कर बताया जाता है। == पुरातन काल == === गुप्त साम्राज्य === {{मुख्य|भारत के मध्य साम्राज्य}} [[चित्र:Map_of_the_Gupta_Empire.png|दाएँ|अंगूठाकार|[[चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य|चन्द्रगुप्त द्वितीय]] (375–415) के अधीन [[गुप्त साम्राज्य]]।]] ईस्वी संवंत् के अनुसार चौथी और छठी सदी के काल को भारत का स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इस काल में गणित, खगोल विज्ञान, विज्ञान, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में यहाँ बहुत उपलब्धियाँ मिली।<ref>[https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ Building Bridges Among the BRICs], p. 125, Robert Crane, Springer, 2014</ref><ref name="Keay">{{Cite book|url=https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132|title=India: A history|last=कीय|first=जॉन|publisher=एटलांटिक मंथली प्रेस|year=2000|isbn=978-0-87113-800-2|page=[https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132 132]|quote=The great era of all that is deemed classical in Indian literature, art and science was now dawning. It was this of creativity and scholarship, as much as ... political achievements of the Guptas, which would make their age so golden.|author-link=जॉन कीय}}</ref> इसी समय में शून्य की अवधारणा सहित [[दशमलव पद्धति]] का अन्वेषण हुआ।<ref>{{cite web|url=http://www.historybits.com/gupta.htm|title=THE GUPTA EMPIRE OF INDIA 320-720}}</ref> गुप्त काल के नेतृत्व में स्थापित शांति और समृद्धि ने भारत में वैज्ञानिक और कलात्मक प्रयासों को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान किया।<ref>{{cite book|title=Gupta Art: A Study from Aesthetic and Canonical Norms|author=Padma Sudhi|publisher=Galaxy Publications|page=7-17}}</ref><ref>{{cite book|url=https://archive.org/details/indiainpictures0000engf|title=India in Pictures|author=Lee Engfer|publisher=Twenty-First Century Books|year=2002|isbn=9780822503712|url-access=registration}}</ref> 6ठी सदी ईस्वी में हूणों ने गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किये जिसे भारत के 'स्वर्ण युग' का समापन माना जाता है; हालाँकि कुछ अन्य इतिहासकारों ने इस वर्गीकरण को विवादित माना है।{{#tag:ref|इतिहासकार [[द्विजेंद्र नारायण झा]] के अनुसार इस काल में जातिगत भेद और भी अधिक गहरे तथा कठोर हो गए; क्योंकि समृद्धि और कानून का संरक्षण सामाजिक सोपान के शीर्ष पर बैठे लोगों को प्राप्त हुआ, जबकि निचले तबके के लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो गई।<ref>{{Cite book |title=Ancient India in Historical Outline |last=झा |first=डीएन |publisher=मनोहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स |year=2002 |isbn=978-81-7304-285-0 |location=दिल्ली |pages=149–73}}</ref>|group=टि॰}}{{#tag:ref|"इतिहासकार कभी गुप्त काल (लगभग 320–540 ई.) को भारत का 'प्राचीन युग' मानते थे [...] यह भी माना जाता था कि नगरीय संभ्रांत वर्ग के बीच यह भौतिक समृद्धि का काल था [...] मौर्योत्तर और गुप्त-पूर्व काल के अधिक विस्तृत अध्ययनों ने इनमें से कुछ मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पहले के [[कुषाण राजवंश|कुषाण]] स्तरों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य अधिक भौतिक समृद्धि का संकेत देते हैं। ये संकेत इस हद तक की समृद्धि दिखाते हैं कि कुछ इतिहासकार तो गुप्त काल में नगरीय पतन होने का तर्क भी देते हैं।"{{sfn|Pletcher|2011|p=90}}|group=टि॰}} प्राचीन भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1 ईस्वी और 1000 ईस्वी में वैश्विक जीडीपी का क्रमशः 32% और 28% होने का अनुमान था।<ref>{{cite book|title=Contours of the World Economy, 1–2030 AD. Essays in Macro-Economic History|author=Angus Maddison|publisher=Oxford University Press|year=2007|isbn=978-0-19-922721-1|page=69}}</ref> इसके अलावा, आम युग की पहली सहस्राब्दी के दौरान, भारतीय आबादी में कुल विश्व की आबादी का लगभग 27.15%–30.3% शामिल था।<ref>{{cite book|title=Contours of the World Economy, 1–2030 AD. Essays in Macro-Economic History|author=Angus Maddison|publisher=Oxford University Press|year=2007|isbn=978-0-19-922721-1|page=69}}</ref><ref>[https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ Building Bridges Among the BRICs], p. 125, Robert Crane, Springer, 2014</ref><ref name="Raghu Vamsa v 4.60–75">Raghu Vamsa v 4.60–75</ref> == मध्यकाल का उत्तरार्द्ध एवं आधुनिक काल का पूर्वार्द्ध == [[File:Joppen1907India1700a.jpg|thumb|ल॰ 1707 ईस्वी में [[औरंगज़ेब]] के शासनकाल के दौरान [[मुग़ल साम्राज्य]] अपने अधिकतम विस्तार पर था जिसका मानचित्र यहाँ प्रदर्शित है।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/cu31924022983567/page/n30/mode/1up|title=Historical atlas of India, for the use of high schools, colleges and private students|last=Joppen|first=Charles|date=|publisher=London; New York: Longmans, Green|others=Cornell University Library|pages=map 13}}</ref>]] === मुग़ल काल === {{मुख्य|मुग़ल साम्राज्य}} मुग़ल साम्राज्य को अक्सर भारत का अंतिम स्वर्ण युग कहा गया है।<ref>{{Citation |title=Emperor Shah Jahan and Building Up the Mughal Empire, 1628–58/66 |date=2016 |work=A Short History of the Mughal Empire |url=http://dx.doi.org/10.5040/9780755604913.ch-008 |access-date=2024-06-28 |publisher=I.B.Tauris |isbn=978-1-84885-872-5}}</ref><ref>{{Citation |last=Malieckal |first=Bindu |title=As Good as Gold |date=2009 |work=The English Renaissance, Orientalism, and the Idea of Asia |pages=131–159 |editor-last=Johanyak |editor-first=Debra |url=https://doi.org/10.1057/9780230106222_7 |access-date=2024-06-28 |place=New York |publisher=Palgrave Macmillan US |doi=10.1057/9780230106222_7 |isbn=978-0-230-10622-2 |editor2-last=Lim |editor2-first=Walter S. H.|url-access=subscription }}</ref> == टिप्पणी == {{reflist|group=टि॰}} == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * थॉटको पर [https://www.thoughtco.com/geography-and-history-of-india-1435046 भारत का भूगोल एवं इतिहास]। * [https://web.archive.org/web/20081204045434/http://www.flonnet.com/fl2422/stories/20071116504306400.htm गुप्तकाल की कला पर ''फ्रॅण्टलाइन'' का लेख] (पुरालेखित) [[श्रेणी:प्राचीन भारत]] [[श्रेणी:ऐतिहासिक युग]] 23914vqw93fe2bt3oj8qcbh3p41jd80 6543857 6543854 2026-04-25T11:53:23Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[नागपुर अमरावती एक्स्प्रेस 2120]] को [[भारत के स्वर्णयुग]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 6543854 wikitext text/x-wiki विभिन्न ऐतिहासिक समयों को [[स्वर्णयुग]] के रूप में वर्णित किया जाता है। इसका आधार [[दक्षिण एशिया]] में विभिन्न तरह के निर्माण और विकास से जोड़कर बताया जाता है। == पुरातन काल == === गुप्त साम्राज्य === {{मुख्य|भारत के मध्य साम्राज्य}} [[चित्र:Map_of_the_Gupta_Empire.png|दाएँ|अंगूठाकार|[[चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य|चन्द्रगुप्त द्वितीय]] (375–415) के अधीन [[गुप्त साम्राज्य]]।]] ईस्वी संवंत् के अनुसार चौथी और छठी सदी के काल को भारत का स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इस काल में गणित, खगोल विज्ञान, विज्ञान, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में यहाँ बहुत उपलब्धियाँ मिली।<ref>[https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ Building Bridges Among the BRICs], p. 125, Robert Crane, Springer, 2014</ref><ref name="Keay">{{Cite book|url=https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132|title=India: A history|last=कीय|first=जॉन|publisher=एटलांटिक मंथली प्रेस|year=2000|isbn=978-0-87113-800-2|page=[https://archive.org/details/indiahistory00keay/page/132 132]|quote=The great era of all that is deemed classical in Indian literature, art and science was now dawning. It was this of creativity and scholarship, as much as ... political achievements of the Guptas, which would make their age so golden.|author-link=जॉन कीय}}</ref> इसी समय में शून्य की अवधारणा सहित [[दशमलव पद्धति]] का अन्वेषण हुआ।<ref>{{cite web|url=http://www.historybits.com/gupta.htm|title=THE GUPTA EMPIRE OF INDIA 320-720}}</ref> गुप्त काल के नेतृत्व में स्थापित शांति और समृद्धि ने भारत में वैज्ञानिक और कलात्मक प्रयासों को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान किया।<ref>{{cite book|title=Gupta Art: A Study from Aesthetic and Canonical Norms|author=Padma Sudhi|publisher=Galaxy Publications|page=7-17}}</ref><ref>{{cite book|url=https://archive.org/details/indiainpictures0000engf|title=India in Pictures|author=Lee Engfer|publisher=Twenty-First Century Books|year=2002|isbn=9780822503712|url-access=registration}}</ref> 6ठी सदी ईस्वी में हूणों ने गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किये जिसे भारत के 'स्वर्ण युग' का समापन माना जाता है; हालाँकि कुछ अन्य इतिहासकारों ने इस वर्गीकरण को विवादित माना है।{{#tag:ref|इतिहासकार [[द्विजेंद्र नारायण झा]] के अनुसार इस काल में जातिगत भेद और भी अधिक गहरे तथा कठोर हो गए; क्योंकि समृद्धि और कानून का संरक्षण सामाजिक सोपान के शीर्ष पर बैठे लोगों को प्राप्त हुआ, जबकि निचले तबके के लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो गई।<ref>{{Cite book |title=Ancient India in Historical Outline |last=झा |first=डीएन |publisher=मनोहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स |year=2002 |isbn=978-81-7304-285-0 |location=दिल्ली |pages=149–73}}</ref>|group=टि॰}}{{#tag:ref|"इतिहासकार कभी गुप्त काल (लगभग 320–540 ई.) को भारत का 'प्राचीन युग' मानते थे [...] यह भी माना जाता था कि नगरीय संभ्रांत वर्ग के बीच यह भौतिक समृद्धि का काल था [...] मौर्योत्तर और गुप्त-पूर्व काल के अधिक विस्तृत अध्ययनों ने इनमें से कुछ मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पहले के [[कुषाण राजवंश|कुषाण]] स्तरों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य अधिक भौतिक समृद्धि का संकेत देते हैं। ये संकेत इस हद तक की समृद्धि दिखाते हैं कि कुछ इतिहासकार तो गुप्त काल में नगरीय पतन होने का तर्क भी देते हैं।"{{sfn|Pletcher|2011|p=90}}|group=टि॰}} प्राचीन भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1 ईस्वी और 1000 ईस्वी में वैश्विक जीडीपी का क्रमशः 32% और 28% होने का अनुमान था।<ref>{{cite book|title=Contours of the World Economy, 1–2030 AD. Essays in Macro-Economic History|author=Angus Maddison|publisher=Oxford University Press|year=2007|isbn=978-0-19-922721-1|page=69}}</ref> इसके अलावा, आम युग की पहली सहस्राब्दी के दौरान, भारतीय आबादी में कुल विश्व की आबादी का लगभग 27.15%–30.3% शामिल था।<ref>{{cite book|title=Contours of the World Economy, 1–2030 AD. Essays in Macro-Economic History|author=Angus Maddison|publisher=Oxford University Press|year=2007|isbn=978-0-19-922721-1|page=69}}</ref><ref>[https://books.google.com/books?id=rMAaBgAAQBAJ Building Bridges Among the BRICs], p. 125, Robert Crane, Springer, 2014</ref><ref name="Raghu Vamsa v 4.60–75">Raghu Vamsa v 4.60–75</ref> == मध्यकाल का उत्तरार्द्ध एवं आधुनिक काल का पूर्वार्द्ध == [[File:Joppen1907India1700a.jpg|thumb|ल॰ 1707 ईस्वी में [[औरंगज़ेब]] के शासनकाल के दौरान [[मुग़ल साम्राज्य]] अपने अधिकतम विस्तार पर था जिसका मानचित्र यहाँ प्रदर्शित है।<ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/cu31924022983567/page/n30/mode/1up|title=Historical atlas of India, for the use of high schools, colleges and private students|last=Joppen|first=Charles|date=|publisher=London; New York: Longmans, Green|others=Cornell University Library|pages=map 13}}</ref>]] === मुग़ल काल === {{मुख्य|मुग़ल साम्राज्य}} मुग़ल साम्राज्य को अक्सर भारत का अंतिम स्वर्ण युग कहा गया है।<ref>{{Citation |title=Emperor Shah Jahan and Building Up the Mughal Empire, 1628–58/66 |date=2016 |work=A Short History of the Mughal Empire |url=http://dx.doi.org/10.5040/9780755604913.ch-008 |access-date=2024-06-28 |publisher=I.B.Tauris |isbn=978-1-84885-872-5}}</ref><ref>{{Citation |last=Malieckal |first=Bindu |title=As Good as Gold |date=2009 |work=The English Renaissance, Orientalism, and the Idea of Asia |pages=131–159 |editor-last=Johanyak |editor-first=Debra |url=https://doi.org/10.1057/9780230106222_7 |access-date=2024-06-28 |place=New York |publisher=Palgrave Macmillan US |doi=10.1057/9780230106222_7 |isbn=978-0-230-10622-2 |editor2-last=Lim |editor2-first=Walter S. H.|url-access=subscription }}</ref> == टिप्पणी == {{reflist|group=टि॰}} == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * थॉटको पर [https://www.thoughtco.com/geography-and-history-of-india-1435046 भारत का भूगोल एवं इतिहास]। * [https://web.archive.org/web/20081204045434/http://www.flonnet.com/fl2422/stories/20071116504306400.htm गुप्तकाल की कला पर ''फ्रॅण्टलाइन'' का लेख] (पुरालेखित) [[श्रेणी:प्राचीन भारत]] [[श्रेणी:ऐतिहासिक युग]] 23914vqw93fe2bt3oj8qcbh3p41jd80 विलोपन संकारक 0 469170 6543671 1769824 2026-04-24T17:05:38Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[वार्ता:नागपुर अमरावती एक्स्प्रेस 2120]] को [[विलोपन संकारक]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 1769824 wikitext text/x-wiki #REDIRECT [[वार्ता:नागपुर अमरावती एक्स्प्रेस २१२०]] 2ikqzbr641x6afrha5waumh9686qr24 6543673 6543671 2026-04-24T17:06:14Z ~2026-21496-92 919279 अनुप्रेषण का लक्ष्य [[वार्ता:नागपुर अमरावती एक्स्प्रेस २१२०]] से [[सृजन और विलोपन संकारक]] में बदला 6543673 wikitext text/x-wiki #REDIRECT [[सृजन और विलोपन संकारक]] 4mib8hf2kcukba145qkmc2y7zwl6ob8 तेल अविव 0 473856 6543831 6537334 2026-04-25T11:08:34Z The Sorter 845290 6543831 wikitext text/x-wiki {{कड़ियाँ कम|date=अगस्त 2021}} {{खराब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=मार्च 2012}} {{Coord|32|5|0|N|34|48|0|E|type:city|display=title}} {{Infobox settlement | name = तेल अवीव | native_name = תל אביב | native_name_lang = he | settlement_type = [[इसराइल के ज़िले|शहर]] | iso_code = IL-TA | image_skyline = {{Photomontage | photo1a = Hashalom interchange.jpg | photo2a = Azriely Sarona5.jpg | photo2b = ISR-2015-Jaffa-Clock tower-cropped.jpg | photo3a = Tel Aviv Promenade panoramics.jpg | photo4a = Panorama of Tel Aviv (cropped).jpg | size = 280 | color = transparent | border = 0 }} | image_caption = '''From upper left''': Hashalom interchange, [[Azrieli Sarona Tower]], [[Jaffa Clock Tower]], [[Tel Aviv Promenade]], panorama of the city | image_flag = Tel Aviv flag.svg | flag_alt= | image_shield = [[File:TelAvivEmblem.svg|60px]] | shield_alt= | nickname = {{unbulleted list |'The first Hebrew city' |'[[White City (Tel Aviv)|The White City]]' |'Non-Stop City' |'The Bubble' | 'TLV' |'The Big Orange' }} | motto= | image_map= | map_alt= | map_caption= | pushpin_map = Israel#Asia#Earth | pushpin_label_position= left | pushpin_map_alt= | pushpin_map_caption = Location within Israel##Location within Asia##Location on Earth | pushpin_relief = 1 | coordinates = {{coord|32|4|N|34|47|E|display=inline,title}} | coordinates_footnotes= | subdivision_type = देश | subdivision_name = {{flag|इसराइल}} | subdivision_type1 = जिला | subdivision_name1 = तेल अवीव | subdivision_type2 = नगरपालिक क्षेत्र | subdivision_name2 = गुश दान (Gush Dan) | subdivision_type3= | subdivision_name3= | established_title = स्थापित | established_date = {{start date|df=yes|1909|04|11}} | established_title1= | established_date1= | founder= | named_for = [[Tel Abib]] in {{bibleverse||Ezekiel|3:15|HE}}, via [[Theodor Herzl|Herzl]]'s ''[[Altneuland]]'' | seat_type= | seat= | government_footnotes= | government_type = मेयर काउन्सिल | governing_body = तेल अवीव - याफो नगरपालिका | leader_title = मेयर | leader_name = रॉन हुल्डाई | unit_pref= | area_magnitude= | area_footnotes= | area_total_km2 = 52 | area_total_sq_mi= | area_land_km2= | area_land_sq_mi= | area_water_km2= | area_water_sq_mi= | area_water_percent= | area_urban_km2 = 176 | area_urban_sq_mi= | area_metro_km2 = 1516 | area_metro_sq_mi= | area_note= | elevation_footnotes= | elevation_m = 5 | elevation_ft= | population_footnotes = {{Israel populations|reference}} | population_total = {{Israel populations|Tel Aviv - Yafo}} | population_rank = [[List of Israeli cities|2nd]] in Israel | population_urban = 1,388,400 | population_metro = 3,854,000 | population_as_of = {{Israel populations|Year}} | population_density_km2 = 8468.7 | population_density_rank = [[List of Israeli cities|12th]] in Israel | population_density_urban_km2= 8057.7 | population_density_metro_km2= 2286 | population_est= | pop_est_as_of= | population_demonym = Tel Avivian<ref>{{cite book |title= Tel Aviv: Mythography of a City |first= Maoz |last= Azaryahu |year=2007 |publisher= Syracuse University Press |location= Syracuse, New York |isbn= 9780815631293 |pages=133–134}}</ref><ref>{{cite book |title=A Place in History: Modernism, Tel Aviv, and the Creation of Jewish Urban Space |url=https://archive.org/details/placeinhistorymo0000mann |first= Barbara E. |last=Mann |year=2006 |publisher= Stanford University Press |location= Stanford, California |isbn= 9780804750196 |pages=[https://archive.org/details/placeinhistorymo0000mann/page/148 148], 166}}</ref><ref>{{cite book |title= The Cities Book: A Journey Through the Best Cities in the World |url= https://archive.org/details/citiesbookjourne0000unse_p4t8 |year=2009 |publisher= Lonely Planet |location= Melbourne, Oakland and London |isbn= 9781741798876 |pages=[https://archive.org/details/citiesbookjourne0000unse_p4t8/page/n380 380]–381}}</ref> | population_note= | blank_name_sec1 = GDP | blank_info_sec1 = [[American Dollar|US$]] 153.3&nbsp;billion<ref name="brookingsgdp">{{cite web |url= http://www.brookings.edu/research/interactives/global-metro-monitor-3 |title= Global city GDP 2014 |publisher= Brookings Institution |access-date=18 November 2014 |url-status=dead |archive-url= https://web.archive.org/web/20130605135349/http://www.brookings.edu/research/interactives/global-metro-monitor-3 |archive-date=5 June 2013 }}</ref> | blank1_name_sec1 = GDP per capita | blank1_info_sec1 = US$42,614<ref name="brookingsgdp" /> | timezone1 = [[Israel Standard Time|IST]] | utc_offset1 = +2 | timezone1_DST = [[Israel Summer Time|IDT]] | utc_offset1_DST = +3 | postal_code_type = [[Postal codes in Israel|Postal code]] | postal_code = 61XXXXX | area_code_type = [[Telephone numbers in Israel|Area code]] | area_code = +972-3 | website = {{URL|http://tel-aviv.gov.il/eng/Pages/HomePage.aspx|tel-aviv.gov.il}} | footnotes = {{designation list | embed = yes | designation1 = WHS | designation1_offname = [[White City (Tel Aviv)|White City of Tel Aviv]] | designation1_date = 2003 | designation1_number = [https://whc.unesco.org/en/list/1096] | designation1_criteria = ii, iv | designation1_type = Cultural | designation1_free1name = State Party | designation1_free1value = Israel | designation1_free2name = Region | designation1_free2value = [[List of World Heritage Sites in Israel|Israel]] | designation1_meaning of name = Ancient Hill of Spring (see [[Altneuland|here]]) }} | official_name= }} [[चित्र:Geddes Plan for Tel Aviv 1925.jpg|thumb|180px|right|दूरभाष अवीव 1925 के मास्टर प्लान]] '''तेल अवीव''' ({{langx|he|תל אביב}} ; आधिकारिक नाम : '''तेल अवीव-याफ़ो''' ) [[इसराइल]] की राजधानी एवं दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर है। इसका क्षेत्रफल 52 वर्ग किमी (20 वर्ग मील) है तथा जनसंख्या 4,04,400 है। यह शहर मध्य-पश्चिम इसराइल में [[भूमध्य सागर]] के तट पर स्थित है। 2010 में गुश दान नाम से जाने जाने वाले 3,325,700 की जनसंख्या वाले तेल अवीव मेट्रोपोलिटन एरिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला शहर था। शहर तेल-अवीव-याफ़ो नगरपालिका द्वारा शासित है, जिसके वर्तमान अध्यक्ष रॉन हुल्दाई हैं। तेल अवीव के निवासियों को तेल अवीविम के रूप में जाना जाता है। तेल अवीव 1909 में जफ़ा के यहूदी समुदाय ({{भाषा-हिब्रू|יָפוֹ}}<nowiki/>‎‎) द्वारा प्राचीन बंदरगाह शहर के सरहद पर स्थापित किया गया था। तेल अवीव के विकास जल्द ही जफ़ा, जो समय में एक अरब जनसंख्या बहुमत से आगे निकल गईं तेल अवीव और जफा एक ही नगर पालिका में 1950 में विलय कर दिया गया इसराइल के राज्य की स्थापना के बाद दो साल,. तेल अवीव व्हाइट सिटी, 2003 में एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल नामित है, दुनिया के बॉहॉस इमारतों का सबसे बड़ा एकाग्रता शामिल हैं तेल अवीव एक वैश्विक शहर है, बर्लिन और सैन फ्रांसिस्को जैसे शहरों के साथ - साथ "शहर सोता कभी नहीं" के रूप में जाना जाता है, यह एक लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है यह अपनी 24 घंटे की संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, समुद्र तटों, सलाखों, रेस्तरां, कैफे, पार्क, शॉपिंग, महानगरीय जीवन शैली और पुरानी जफा और Neve Tzedek के रूप में इस तरह के ऐतिहासिक पड़ोस तेल अवीव में एक आर्थिक केंद्र, तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज के लिए घर, कॉर्पोरेट कार्यालयों और है अनुसंधान और विकास केन्द्रों यह देश की वित्तीय राजधानी है और एक प्रमुख प्रदर्शन कला और व्यापार केंद्र है। [[मध्य पूर्व]] में तेल अवीव की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और दुनिया में 19 सबसे महंगा शहर है। 2010 में, नाइट फ्रैंक के विश्व शहर सर्वेक्षण यह 34 विश्व स्तर तेल अवीव तीसरे "2011 के लिए सबसे शहर (केवल [[न्यूयॉर्क नगर|न्यूयॉर्क शहर]] और टंगेर के पीछे) लोनली प्लैनेट द्वारा मध्य पूर्व में तीसरी सबसे अच्छा नाम दिया गया है और स्थान पर रहीं + यात्रा आराम पत्रिका (केवल केप टाउन और यरूशलेम के पीछे), अफ्रीका और नौवीं सबसे अच्छा दुनिया में नेशनल ज्योग्राफिक द्वारा समुद्र तट शहर कई सर्वेक्षणों में तेल अवीव से एक के रूप में स्थान दिया गया है दुनिया में शीर्ष LGBT गन्तव्य स्थानो ==व्युत्पत्ति और उत्पत्ति== [[चित्र:Channel2_-_Tel_Aviv.webm|दाएँ|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|thumbtime=00:03]] तेल अवीव का नाम थियोडोर हर्ज़ल के 1902 के उपन्यास अल्ट्नुलैंड ("ओल्ड न्यू लैंड") के नाम पर रखा गया है, जिसके लिए शीर्षक का हिब्रू संस्करण "तेल अवीव" था। तेल अवीव, जर्मन के नाहुम सोकोलो द्वारा थियोडोर हर्ज़ल के अल्तनेउलैंड ("ओल्ड न्यू लैंड") का हिब्रू शीर्षक है। सोकोलो ने बाबुल शहर में ईजेकील के नाम का उल्लेख मेसोपोटामिया साइट के पास किया था: "तब मैं तेल अवीव की कैद में उनके पास आया, जहाँ वे चेबर नदी के किनारे रहते थे, और जहाँ वे रहते थे; उन्हें सात दिन। "[20] 1910 में कई नामों के साथ चुना गया, जिसमें" हर्ज़लिया "भी शामिल था। यह प्राचीन यहूदी मातृभूमि में पुनर्जागरण के विचार का एक उपयुक्त अवतार था। अवीव "वसंत" के लिए हिब्रू है, जो नवीकरण का प्रतीक है, और टेल एक मानव निर्मित टीला है जो सभ्यता के परतों को दूसरे पर बनाया गया है और प्राचीन का प्रतीक है। हालांकि 1909 में याफ़ा के उत्तर में रेत के टीलों में एक छोटी बस्ती के रूप में स्थापित, तेल अवीव शुरू से ही एक भविष्य के शहर की शुरुआत थी। इसके संस्थापकों को उम्मीद थी कि पड़ोसी अरब कस्बों की अवैध और विषम परिस्थितियों के रूप में उनके विपरीत, तेल अवीव एक साफ और आधुनिक शहर था, जो यूरोपीय शहरों वारसॉ और ओडेसा से प्रेरित था। [२१] 1906 में अपनी स्थापना में मार्केटिंग पैम्फलेट्स एडवोकेसी, ने लिखा: [21] इस शहर में हम सड़कों का निर्माण करेंगे, ताकि उनके पास सड़क और फुटपाथ और बिजली की रोशनी हो। हर घर में कुओं का पानी होगा जो हर आधुनिक यूरोपीय शहर की तरह पाइप से बहते हैं, और यहां तक ​​कि शहर और इसके निवासियों के स्वास्थ्य के लिए सीवरेज पाइप भी लगाए जाएंगे। == इन्हें भी देखें == * [[ब्राचा फुल्ड]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{Commons category|Tel Aviv-Yaffo}} dpcmyute1he8xjrlsscktha6dw9ttdq जादुई यथार्थवाद 0 501244 6543732 4584667 2026-04-25T03:27:32Z TheWikipedian1250 457751 6543732 wikitext text/x-wiki '''जादुई [[यथार्थवाद (कला)|यथार्थवाद]]''' (magic realism) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है।<ref>Faris, Wendy B. and Lois Parkinson Zamora, Introduction to ''Magical Realism: Theory, History, Community'', pp. 5</ref> हालाँकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक [[शैलीविज्ञान|शैली]] के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। ==सन्दर्भ calvo pasa la coa== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कला शैलियाँ]] arl7vqbhvl67hgyjxx5ugg1u91j0hzu 6543737 6543732 2026-04-25T03:41:57Z TheWikipedian1250 457751 6543737 wikitext text/x-wiki [[File:DALL-E - Anthropomorphic rhinoceros wearing business suit touching up painting Girl with Pearl Earringwith brushes.jpg|thumb|right|]] '''जादुई [[यथार्थवाद (कला)|यथार्थवाद]]''' (magical realism) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है।<ref>Faris, Wendy B. and Lois Parkinson Zamora, Introduction to ''Magical Realism: Theory, History, Community'', pp. 5</ref> हालाँकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक [[शैलीविज्ञान|शैली]] के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। ==सन्दर्भ calvo pasa la coa== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कला शैलियाँ]] 688mbkdcntlxiaen81jadr8gspux8m6 6543739 6543737 2026-04-25T03:44:35Z TheWikipedian1250 457751 6543739 wikitext text/x-wiki [[File:DALL-E - Anthropomorphic rhinoceros wearing business suit touching up painting Girl with Pearl Earringwith brushes.jpg|thumb|right|मानवाकृति गैंडा व्यापारिक सूट पहने हुए, मोती की बालियां पहने एक गैंडा लड़की की पेंटिंग को सुधर रहा है।]] '''जादुई [[यथार्थवाद (कला)|यथार्थवाद]]''' (magical realism) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है।<ref>Faris, Wendy B. and Lois Parkinson Zamora, Introduction to ''Magical Realism: Theory, History, Community'', pp. 5</ref> हालाँकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक [[शैलीविज्ञान|शैली]] के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। ==सन्दर्भ calvo pasa la coa== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कला शैलियाँ]] 46giuiu4gd64juqj6ljtyf39w8ak972 6543740 6543739 2026-04-25T03:46:19Z TheWikipedian1250 457751 6543740 wikitext text/x-wiki [[File:DALL-E - Anthropomorphic rhinoceros wearing business suit touching up painting Girl with Pearl Earringwith brushes.jpg|thumb|right|मानवाकृति [[गैंडा]] व्यापारिक सूट पहने हुए, मोती की बालियां पहने एक गैंडा लड़की की पेंटिंग को सुधर रहा है।]] '''जादुई [[यथार्थवाद (कला)|यथार्थवाद]]''' (magical realism) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है।<ref>Faris, Wendy B. and Lois Parkinson Zamora, Introduction to ''Magical Realism: Theory, History, Community'', pp. 5</ref> हालाँकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक [[शैलीविज्ञान|शैली]] के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। ==सन्दर्भ calvo pasa la coa== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कला शैलियाँ]] 4yrw9g2d2g8bx5jdoacsq6ymyjjygga 6543741 6543740 2026-04-25T03:50:42Z TheWikipedian1250 457751 6543741 wikitext text/x-wiki [[File:DALL-E - Anthropomorphic rhinoceros wearing business suit touching up painting Girl with Pearl Earringwith brushes.jpg|thumb|right|[[DALL-E]] द्वारा उत्पन्न छवि जिसमें एक मानवाकृति [[गैंडा]] व्यापारिक सूट पहने हुए, मोती की बालियां पहने एक गैंडा लड़की की पेंटिंग को सुधर रहा है।]] '''जादुई [[यथार्थवाद (कला)|यथार्थवाद]]''' (magical realism) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है।<ref>Faris, Wendy B. and Lois Parkinson Zamora, Introduction to ''Magical Realism: Theory, History, Community'', pp. 5</ref> हालाँकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक [[शैलीविज्ञान|शैली]] के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। ==सन्दर्भ calvo pasa la coa== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कला शैलियाँ]] qxsq6ejgpx0buxk4rcceztz83d2wto1 आम आदमी पार्टी 0 502320 6543776 6514727 2026-04-25T07:13:36Z Sequencesolved 173771 कड़ी लगाई। 6543776 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian Political Party |party_name = आम आदमी पार्टी |party_logo = [[File:Aam Aadmi Party logo (English).svg|250px]] |colorcode = {{party color|Aam Aadmi Party}} |leader = [[अरविंद केजरीवाल ]] |foundation = २६ नवम्बर २०१२ |headquarters = २०६ रौसे अवेनुए, दीन दयाल उपाधय मार्ग, ITO, दिल्ली -११०००२ |students = [[छात्र युवा संघर्ष समिति]] |youth = |women = |labour = |ideology = * [[कल्याणकारी राज्य|कल्याणवाद]] * [[भारतीय राष्ट्रवाद]] * [[धर्मनिरपेक्षता]] | loksabha_seats = {{Infobox political party/seats|3|543|hex=#4682b4}} | rajyasabha_seats = {{Infobox political party/seats|10|245|hex=#4682b4}} | state_seats = {{Infobox political party/seats|22|70|hex=#4682b4}}'''[[दिल्ली विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|91|117|hex=#4682b4}}'''[[पंजाब विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|4|198|hex=#4682b4}}'''[[गुजरात विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|2|40|hex=#4682b4}}'''[[गोवा विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|1|90|hex=#4682b4}}'''[[जम्मू और कश्मीर विधानसभा]]''' |international = |colours =नीला |symbol = [[झाडू]] [[File:AAP Symbol.png|50px]] |website = {{URL|http://www.aamaadmiparty.org}} }} '''आम आदमी पार्टी''', संक्षेप में '''आप(AAP)''', सामाजिक कार्यकर्ता एवं मैग्ससे पुरस्कार विजेता [[अरविंद केजरीवाल]] एवं [[अन्ना हजारे]] के [[लोकपाल आंदोलन]] से जुड़े बहुत से सहयोगियों द्वारा गठित एक भारतीय [[राजनीतिक दल]] है। इसके गठन की आधिकारिक घोषणा २६ नवम्बर २०१२ को [[भारतीय संविधान]] अधिनियम की ६३ वीं वर्षगाँठ के अवसर पर [[जंतर मंतर, दिल्ली]] में की गयी थी। सन् २०११ में [[इंडिया अगेंस्ट करप्शन]] नामक संगठन ने [[अन्ना हजारे]] के नेतृत्व में हुए [[जन लोकपाल आंदोलन]] के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा जनहित की उपेक्षा एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, जबकि अरविन्द केजरीवाल और उनके सहयोगियों की यह राय थी कि पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा जाये। इसी उद्देश्य के तहत पार्टी पहली बार दिसम्बर २०१३ में [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, 2013|दिल्ली विधानसभा चुनाव]] में झाड़ू चुनाव चिह्न के साथ चुनावी मैदान में उतरी। पार्टी ने चुनाव में २८ सीटों पर जीत दर्ज की और [[कांग्रेस]] के समर्थन से दिल्ली में [[सरकार]] बनायी। अरविन्द केजरीवाल ने [[२८ दिसम्बर]] २०१३ को दिल्ली के ७वें मुख्य मन्त्री पद की शपथ ली। ४९ दिनों के बाद १४ फ़रवरी २०१४ को विधान सभा द्वारा जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को समर्थन न मिल पाने के कारण अरविंद केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया। अगले चुनाव में पार्टी ने स्वयं चुनाव लड़कर सत्ता हासिल की ,परन्तु जनलोकपाल और उसके अधिकार के बारे में कुछ नहीं किया गया अंततः जनता ने 2025 में अल्पमत में ला दिया == इतिहास == आम आदमी पार्टी की उत्पत्ति सन् 2012 में ''इण्डिया अगेंस्ट करप्शन (''हिंदी में ''भारतीय भ्रष्टाचार के खिलाफ)'' द्वारा अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाये गये जन लोकपाल आन्दोलन के समापन के दौरान हुई। [[जन लोकपाल]] बनाने के प्रति भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा प्रदर्शित उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण राजनीतिक विकल्प की तलाश की जाने लगी थी। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आन्दोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे जबकि अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये एक अलग पार्टी बनाकर चुनाव में शामिल होने के पक्षधर थे। उनके विचार से वार्ता के जरिये जन लोकपाल विधेयक बनवाने की कोशिशें व्यर्थ जा रहीं थीं। ''इण्डिया अगेंस्ट करप्शन'' द्वारा सामाजिक जुड़ाव सेवाओं पर किये गये सर्वे में राजनीति में शामिल होने के विचार को व्यापक समर्थन मिला। १९ सितम्बर २०१२ को अन्ना और अरविन्द इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनके राजनीति में शामिल होने सम्बन्धी मतभेदों का दूर होना मुश्किल है। इसलिये उन्होंने समान लक्ष्यों के बावजूद अपना रास्ता अलग करने का निश्चय किया। जन लोकपाल आन्दोलन से जुड़े [[मनीष सिसोदिया]], [[प्रशांत भूषण]] व [[योगेन्द्र यादव]] आदि ने अरविन्द केजरीवाल का साथ दिया, जबकि [[किरण वेदी]] व [[सन्तोष हेगड़े]] आदि कुछ अन्य लोगों ने हजारे से सहमति प्रकट की। केजरीवाल ने २ अक्टूबर २०१२ को राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय संविधान की वर्षगांठ के दिन २६ नवम्वर (२०१२) को औपचारिक रूप से आम आदमी पार्टी का गठन हुआ।<ref>{{Citation|title='आम आदमी पार्टी' के राष्ट्रीय संयोजक बने केजरीवाल|url=http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/17365222.cms|publisher=नवभारत टाइम्स|date=२६ नवम्बर २०१२|accessdate=११ दिसम्बर २०१३|archive-url=https://web.archive.org/web/20121129080158/http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/17365222.cms|archive-date=29 नवंबर 2012|url-status=live}}</ref> <ref>{{Cite web |url=http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121126_india_kejriwal_aap_party_arm.shtml |title=बीबीसी हिंदी - केजरीवाल ने लांच की आम आदमी पार्टी |access-date=1 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130129192246/http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121126_india_kejriwal_aap_party_arm.shtml |archive-date=29 जनवरी 2013 |url-status=live }}</ref> आम आदमी पार्टी (आप) की छात्र शाखा [[छात्र युवा संघर्ष समिति]] (सीवाईएसएस) की स्थापना 9 अप्रैल 2014 को हुई थी। == विचारधारा == पार्टी कहती है कि वह किसी विशेष विचारधारा द्वारा निर्देशित नहीं हैं। उन्होंने व्यवस्था को बदलने के लिये राजनीति में प्रवेश किया है। अरविन्द केजरीवाल के शब्दों में - "हम आम आदमी हैं। अगर वामपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से विचार उधार ले लेंगे और अगर दक्षिणपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से भी विचार उधार लेने में खुश हैं। == नेतृत्व == ===मुख्यमंत्रियों की सूची=== {{मुख्य|दिल्ली के मुख्यमंत्रियों की सूची|पंजाब (भारत) के मुख्यमंत्रियों की सूची}} {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! मुख्यमंत्री ! चित्र ! colspan=2|कार्यकाल ! पदावधि ! विधानसभा ! |- ! १ | rowspan=3|[[दिल्ली]] | rowspan=3|[[अरविंद केजरीवाल]] | rowspan=3|[[File:Arvind_Kejriwal_September_02,_2017_crop.jpg|100x150px]] | २८ दिसंबर २०१३ | १४ फरवरी २०१४ | ४९ दिन | पांचवी |- ! २ | १४ फरवरी २०१५ | १५ फरवरी २०२० | ५ वर्ष १ दिन | छठवीं | <ref>[https://www.aajtak.in/india/delhi/story/arvind-kejriwal-take-oath-as-delhi-cm-today-289244-2015-02-14 अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने ली शपथ] आजतक 14 फरवरी 2015</ref> |- ! ३ | १६ फरवरी २०२० | [[पदस्थ]] | {{age in years and days|2020|02|16}} | सातवीं | <ref>[https://www.livehindustan.com/live-blog/arvind-kejriwal-as-delhi-cm-and-his-cabinet-ministers-oath-taking-ceremony-in-ramlila-maidan-today-live-updates-here-3028877.html अरविंद केजरीवाल ने लगातार तीसरी बार ली दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ] हिन्दुस्तान 16 फरवरी 2020</ref> |- !४ |[[पंजाब]] |[[भगवंत मान]] |[[File:A delegation of Aam Aadmi Party leaders, - MP (Lok Sabha), Shri Bhagwant Mann, Shri Sanjay Singh and Shri Ashutosh, calling on the Union Home Minister, Shri Rajnath Singh, in New Delhi on October 22, 2015 (cropped).jpg|100x150px]] | १६ मार्च २०२२ | [[पदस्थ]] | {{age in years and days|2022|03|16}} | सोलहवीं |<ref>{{Cite web |url=https://www.jagran.com/lite/punjab/chandigarh-bhagwant-mann-oath-taking-ceremony-tomorrow-and-cabinet-formation-on19-22547626.html |title=भगवंत मान ने संभाली पंजाब की कमान, शहीद भगत सिंह के गांंव में ली सीएम पद की शपथ, 16 मार्च 2022 |access-date=14 अगस्त 2023 |archive-date=14 अगस्त 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230814022526/https://www.jagran.com/lite/punjab/chandigarh-bhagwant-mann-oath-taking-ceremony-tomorrow-and-cabinet-formation-on19-22547626.html |url-status=dead }}</ref> |- |} ===राज्यसभा=== {{मुख्य|राज्य सभा के वर्तमान सदस्यों की सूची}} {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! सांसद ! नियुक्ति तिथि ! निवृत्ति तिथि ! |- ! १ | rowspan=3|[[दिल्ली]] | [[संजय सिंह]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! २ | [[नारायण दास गुप्ता]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! ३ | [[सुशील कुमार गुप्ता]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! ४ | rowspan=7|[[पंजाब]] | [[हरभजन सिंह]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ५ | [[राघव चद्दा|राघव चड्ढा]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ | <ref>[https://hindi.news18.com/news/delhi-ncr/aap-strength-doubles-in-rajya-sabha-raghav-chadha-sanjeev-arora-ashok-mittal-take-oath-as-mps-nodrss-4229401.html आप' के राघव चड्ढा सहित 3 सदस्यों ने ली राज्यसभा सदस्य की शपथ, जानें इनके बारे में सबकुछ 2 मई 2022]</ref> |- ! ६ | [[संदीप पाठक]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ७ | [[अशोक मित्तल]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ८ | [[संजीव अरोरा]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ९ | [[बलबीर सिंह सीचेवाल]] | ५ जुलाई २०२२ | ४ जुलाई २०२८ |- ! १० | [[विक्रमजीत सिंह साहनी]] | ५ जुलाई २०२२ | ४ जुलाई २०२८ |- |} ===लोकसभा=== {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! लोकसभा ! राज्य ! लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र ! सांसद ! नियुक्ति तिथि ! टीप ! |- | Rowspan=2|[[सत्रहवीं लोक सभा]] | rowspan=2|[[पंजाब]] | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | २३ मई २०१९ | १४ मार्च २०२२ को पदत्याग |- | [[जलंधर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|जालंधर]] | [[सुशील कुमार रिंकू]] | १३ मई २०२३ | [[भारत में 2023 के चुनाव#लोकसभा उपचुनाव|२०२३ (उपचुनाव)]] |<ref>{{Cite web |url=https://www.zeenews.india.com/hindi/zeephh/himachal-pradesh/who-is-sushil-kumar-rinku-know-all-about-aap-candidate-who-won-jalandhar-lok-sabha-bypoll-election-2023-result/1694041/amp |title=Jalandhar Bypoll Election Result: जानें कौन है AAP के प्रत्याशी सुशील कुमार रिंकू, जिन्होंने जालंधर में रचा इतिहास 13 मई 2023 |access-date=14 अगस्त 2023 |archive-date=26 मई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230526133750/https://zeenews.india.com/hindi/zeephh/himachal-pradesh/who-is-sushil-kumar-rinku-know-all-about-aap-candidate-who-won-jalandhar-lok-sabha-bypoll-election-2023-result/1694041/amp |url-status=dead }}</ref> |- | Rowspan=4|[[सोलहवीं लोक सभा]] | rowspan=4|[[पंजाब]] | [[फतेहगढ़ साहिब लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|फतेहगढ़ साहिब]] | [[हरिंदर सिंह खालसा]] | १६ मई २०१४ |- | [[फरीदकोट लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र| फरीदकोट]] | [[साधु सिंह]] | १६ मई २०१४ |- | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | १६ मई २०१४ |- | [[पटियाला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|पटियाला]] | [[डॉ. धरमवीरा गांधी]] | १६ मई २०१४ |- |मध्य प्रदेश। रानी अग्रवाल महापौर सिंगरौली == चुनावी भागीदारी == ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०१३=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१३}} ४ दिसम्बर २०१३ को हुए [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, 2013|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव]] में पार्टी ने पहला चुनाव लड़ा। उसने पूरी दिल्ली के लिये चुनावी घोषणापत्र तैयार करने के साथ ही प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिये अलग-अलग [[घोषणापत्र]] तैयार किया।<ref>{{cite news|title=आम आदमी पार्टी 71 घोषणापत्र बनाएगी|url=http://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-10743276.html|publisher=जागरण|date=22 सितम्बर 2013|accesdate=१७ नवम्बर २०१३|access-date=17 नवंबर 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131212050232/http://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-10743276.html|archive-date=12 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref> दिल्ली चुनाव के पहले पार्टी को कई विवादों का सामना करना पड़ा। भारत सरकार के गृहमन्त्री, [[सुशील कुमार शिंदे]] ने पार्टी के विदेशी दान की जाँच कराने की बात कही। पार्टी ने दान राशि का सम्पूर्ण ब्यौरा पार्टी वेवसाइट पर पहले से ही सार्वजनिक होने की बात कही और अन्य राजनीतिक दलों को भी अपने चन्दे को सार्वजनिक करने की चुनौती दी। दिल्ली विधान सभा चुनाव के कुछ पहले एक मीडिया पोर्टल द्वारा आम आदमी के विधायक पद के उम्मीदवारों का स्टिंग ऑपरेशन सामने आया जिसमें उन पर ग़ैर-ईमानदार होने के आरोप लगाये गये। आम आदमी पार्टी ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर स्टिंग वीडियो में कई महत्वपूर्ण भागों को काट-छाँट कर प्रस्तुत करने का आरोप लगाया और मीडिया पोर्टल के खिलाफ मानहानि की याचिका दायर की। ६ दिसम्बर को घोषित हुए परिणाम में ७० सदस्यीय [[दिल्ली विधानसभा]] में पार्टी २८ सीटों पर विजयी रही। ३२ विधान सभा क्षेत्रों की विजेता [[भारतीय जनता पार्टी]] के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। अरविन्द केजरीवाल ने सत्तारूढ़ी कांग्रेस पार्टी की निवर्तमान मुख्यमन्त्री [[शीला दीक्षित]] (कांग्रेस) को लगभग 25,000 वोटों से पराजित किया।<ref>{{Cite web |url=http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-arvind-kejriwal-sheila-dikshit-election-39-39-382727.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131215095955/http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-arvind-kejriwal-sheila-dikshit-election-39-39-382727.html |archive-date=15 दिसंबर 2013 |url-status=dead }}</ref> और कांग्रेस केवल ८ सीटों पर सिमट गयी।<ref>{{cite news|1=|url=http://zeenews.india.com/hindi/blog/this-is-not-aap-victory-but-common-mans-victory_112.html|title='आप' की नहीं, आम आदमी की जीत|publisher=ज़ी न्यूज़|date=८ दिसम्बर २०१३|accesdate=११ दिसम्बर २०१३|access-date=8 दिसंबर 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131211145001/http://zeenews.india.com/hindi/blog/this-is-not-aap-victory-but-common-mans-victory_112.html|archive-date=11 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.business-standard.com/article/politics/delhi-polls-bjp-ahead-aap-inches-to-second-113120800100_1.html |title=Delhi polls {{!}} BJP ahead, AAP inches to second |access-date=11 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131213025515/http://www.business-standard.com/article/politics/delhi-polls-bjp-ahead-aap-inches-to-second-113120800100_1.html |archive-date=13 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://eciresults.nic.in/PartyWiseResult.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=11 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131215065208/http://eciresults.nic.in/PartyWiseResult.htm |archive-date=15 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> दिल्ली के उपराज्यपाल [[नजीब जंग]] ने भाजपा द्वारा सरकार बनाने से मना करने के बाद आम आदमी पार्टी विधायक दल के नेता अरविन्द केजरीवाल को सरकार बनाने के लिये आमन्त्रित किया। २८ दिसम्बर को कांग्रेस के समर्थन से पार्टी ने दिल्ली में अपनी सरकार बनायी। अरविन्द केजरीवाल सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।<ref>{{cite web |url=http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |title=Arvind Kejriwal, as Delhi Chief Minister, to head 'youngest-ever' Cabinet; check them out |trans-title=दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने अब तक के सबसे युवा मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व सम्हालेंगे |date=25 दिसम्बर 2013 |website=The Financial Express |accessdate=8 जनवरी 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131227011543/http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |archive-date=27 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> === लोकसभा चुनाव २०१४ === AAP ने 2014 के भारतीय आम चुनाव में 434 उम्मीदवार उतारे, जिसमें उसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। इसने माना कि इसका समर्थन मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों पर आधारित था और देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रणनीतियों की आवश्यकता हो सकती है। पार्टी ने बताया कि उसकी फंडिंग सीमित थी और केजरीवाल की ओर से स्थानीय दौरों की बहुत अधिक मांगें थीं। इरादा चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता की संभावना को अधिकतम करने के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का था। नतीजा यह हुआ कि AAP के चार उम्मीदवार जीते, सभी पंजाब से। परिणामस्वरूप, AAP पंजाब में एक मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी बन गई। पार्टी को देश भर में पड़े सभी वोटों का 2% प्राप्त हुआ और उसके 414 उम्मीदवारों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में एक-छठा वोट हासिल करने में विफल रहने के कारण अपनी जमानत जब्त कर ली। हालाँकि पार्टी को दिल्ली में 32.9 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह वहाँ कोई भी सीट जीतने में असफल रही। AAP संयोजक, अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ा, लेकिन 371,784 (20.30%) वोटों के अंतर से हार गए और बसपा, कांग्रेस, सपा से आगे दूसरे स्थान पर रहे। चुनाव के तुरंत बाद, शाज़िया इल्मी (पीएसी सदस्य) ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य योगेन्द्र यादव ने अपनी पार्टी के सदस्यों को लिखे एक पत्र में केजरीवाल की नेतृत्व शैली की आलोचना की। 8 जून को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद, पार्टी और केजरीवाल ने इन मतभेदों को स्वीकार किया और स्थानीय और साथ ही राष्ट्रीय निर्णय लेने में अधिक लोगों को शामिल करने के लिए "मिशन विस्तार" (मिशन विस्तार) शुरू करने की घोषणा की। {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align:center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! class="unsortable"| राज्य ! निर्वाचन क्षेत्र ! निर्वाचित सांसद ! class="unsortable"| टीप |- | rowspan="4"| [[पंजाब]] | [[फतेहगढ़ साहिब लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|फतेहगढ़ साहिब]] | [[हरिंदर सिंह खालसा]] | |- | [[फरीदकोट लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र| फरीदकोट]] | [[साधु सिंह]] | |- | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | |- | [[पटियाला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|पटियाला]] | [[धर्मवीर गांधी]] | |- |} ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०१५=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१५}} ===पंजाब विधानसभा चुनाव २०१७=== {{मुख्य|पंजाब विधानसभा चुनाव, 2017}} पहली बार, आप ने 2017 गोवा विधानसभा चुनाव और 2017 पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ा। गोवा में AAP कोई भी सीट नहीं जीत सकी और 39 में से 38 उम्मीदवार अपनी जमानत बचाने में विफल रहे। 2017 पंजाब विधान सभा चुनाव के लिए, [[लोक इंसाफ पार्टी]] ने AAP के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन को AAP गठबंधन कहा गया और समाचार चैनलों पर इसे AAP+ के रूप में दर्शाया गया। इसने कुल 22 सीटें जीतीं, जिनमें से दो लोक इंसाफ पार्टी ने और बाकी बीस आप ने जीतीं। ===लोकसभा चुनाव २०१९=== {{मुख्य|भारतीय आम चुनाव, 2019|लोकसभा चुनाव २०१९ में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची}} 2014 के भारतीय आम चुनाव के विपरीत, पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) ने कुछ राज्यों की सीमित सीटों और दिल्ली, गोवा, और पंजाब की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरियाणा राज्य में, आप ने तीन लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के लिए [[दुष्यंत चौटाला]] की [[जननायक जनता पार्टी]] के साथ गठबंधन किया। पीएसी ने केरल में [[सीपीआई (एम)]] के लिए समर्थन और प्रचार करने का भी निर्णय लिया। पार्टी ने अपना पहला ट्रांसजेंडर उम्मीदवार भी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से मैदान में उतारा। आप ने संगरूर का केवल 1 निर्वाचन क्षेत्र जीता। {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! निर्वाचन क्षेत्र ! निर्वाचित सांसद ! टीप ! |- ! १ | Rowspan=2|[[पंजाब]] | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | द्वितीय कार्यकाल |<ref>[https://www.amarujala.com/photo-gallery/chandigarh/lok-sabha-chunav-2019-result-aap-candidate-bhagwant-mann-sangrur-lok-sabha-seat पंजाब का वो 'कॉमेडी किंग' जिसने बचा ली केजरीवाल की लाज, जीत दर्ज करने वाला इकलौता सांसद] अमर उजाला 24 मई 2019</ref> |- ! २ | [[जलंधर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|जालंधर]] | [[सुशील कुमार रिंकू]] | [[भारत में 2023 के चुनाव#लोकसभा उपचुनाव|२०२३ (उपचुनाव)]] |<ref>[https://www.bhaskar.com/local/punjab/jalandhar/news/punjab-jalandhar-lok-sabha-election-result-counting-2023-live-update-sushil-kumar-rinku-aap-vs-bjp-congress-131275159.html जालंधर उपचुनाव में AAP की जीत:58,691 वोटों से कांग्रेस को हराया; अकाली दल तीसरे और BJP चौथे नंबर पर रही] दैनिक भास्कर जालंधर</ref> |- |} ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०२०=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०२०}} चुनाव लड़ने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा चलाए गए जोरदार अभियान के बाद, 8 फरवरी 2020 को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ। वोटों की गिनती और उसके बाद नतीजों की घोषणा 11 फरवरी को हुई। आम आदमी पार्टी ने सरकार बरकरार रखी क्योंकि पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतीं। [[अरविंद केजरीवाल]] लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। परिणामों के अनुसार, पार्टी का वोट शेयर 53.5% था। ===पंजाब विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|पंजाब विधानसभा चुनाव, 2022}} जनवरी 2021 में, [[अरविंद केजरीवाल]] ने घोषणा की कि आप 2022 में छह राज्यों में चुनाव लड़ेगी। ये छह राज्य [[उत्तर प्रदेश]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[गोवा]], [[गुजरात]], [[उत्तराखंड]] और [[पंजाब]] थे। पार्टी ने पंजाब में [[चरणजीत सिंह चन्नी]] की मौजूदा कांग्रेस सरकार को हराकर भारी जीत हासिल की और राज्य पार्टी संयोजक [[भगवंत मान]] ने नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ===गुजरात विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|2022 गुजरात विधान सभा चुनाव}} ===गोवा विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|गोवा विधान सभा चुनाव, 2022}} ==चुनावी प्रदर्शन== ===दिल्ली विधानसभा चुनाव=== {| class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | पांचवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१३|२०१३]] | ६९ | २८ | २३,२२,३३० | २९.४९% | <ref>[https://m.economictimes.com/news/politics-and-nation/delhi-election-2013-aap-makes-stunning-debut-bjp-short-of-majority-in-delhi/articleshow/27095533.cms दिल्ली चुनाव 2013: आप की शानदार जीत]</ref> |- | छठवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१५|२०१५]] | ७० | ६७ | ४८,७८,३९७ | ५४.३% | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/story/delhi-assembly-election-2015-result-live-update-288789-2015-02-10 दिल्ली चुनाव में AAP को मिली ऐतिहासिक जीत, विधायक दल के नेता चुने गए अरविंद केजरीवाल 10 फरवरी 2015]</ref> |- | सातवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०२०|२०२०]] | ७० | ६२ | ४९,७४,५९२ | ५३.५७% | <ref>[https://www.abplive.com/news/india/live-updates-delhi-election-results-2020-news-and-updates-arvind-kejriwal-said-this-is-victory-of-delhi-1300560/amp Delhi Election Results: प्रचंड जीत के साथ AAP ने दिखाया अपना दमखम, अरविंद केजरीवाल तीसरी बार बनेंगे CM 11 फरवरी 2020]</ref> |- |} ===लोकसभा चुनाव=== {| class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! लोकसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! राज्य (सीटें) ! संदर्भ |- | [[सोलहवीं लोकसभा]] | [[भारतीय आम चुनाव, २०१४|2014]] | 432 | 4 | 1,13,25,387 | 2.1 | पंजाब (4) | |- | [[सत्रहवीं लोकसभा]] | [[भारतीय आम चुनाव, 2019|2019]] | 36 | 1 | 27,16,629 | 0.44 | पंजाब (1) | |- |} ===गोवा विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | बारहवीं विधानसभा | [[गोवा विधानसभा चुनाव, 2017|2017]] | 40 | 0 | 57,420 | 6.3 | <ref>[https://www.amarujala.com/chandigarh/punjab-election-results-punjab-election-result-live-punjab-assembly-election-2017-counting Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | तेरहवीं विधानसभा | [[गोवा विधान सभा चुनाव, 2022|2022]] | 39 | 2 | 64,354 | 6.77 | <ref>[https://www.prabhatkhabar.com/amp/story/national/2022-vidhan-sabha-election-results-aam-aadmi-party-won-two-seat-in-goa-election-2022-result-smb गोवा में आम आदमी पार्टी का खुला खाता, सीएम उम्मीदवार हारे] ''प्रभात खबर डिजिटल 10 मार्च 2022''</ref> |- |} ===पंजाब विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | पंद्रहवीं विधानसभा | [[पंजाब विधानसभा चुनाव, 2017|२०१७]] | ११२ | २० | ३६,६२,६६५ | २३.७% | <ref>[https://www.amarujala.com/chandigarh/punjab-election-results-punjab-election-result-live-punjab-assembly-election-2017-counting Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | सोलहवीं विधानसभा | [[पंजाब विधानसभा चुनाव, 2022|२०२२]] | ११७ | ९२ | ६५,३८,७८३ | ४२.०१% | <ref>[https://www.bhaskar.com/local/chandigarh/news/punjab-election-result-2022-live-counting-updates-bjp-aap-congress-charanjit-singh-channi-navjot-sidhu-amarinder-singh-bikram-majithia-modi-arvind-kejriwal-129490873.html पंजाब में आप की रिकॉर्डतोड़ जीत:आप ने 56 साल में सबसे बड़ी जीत हासिल की, 117 में से 92 सीटों पर कब्जा; कांग्रेस 18 सीटों पर सिमटी]</ref> |- |} ===गुजरात विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | तेरहवीं विधानसभा |[[गुजरात विधानसभा चुनाव, 2017|2017]] | 29 | 0 | 29,509 | 0.1 | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/gujarat-assembly-elections/story/gujarat-election-aam-aadmi-party-arvind-kejriwal-asaduddin-owaisi-bjp-congress-aimim-ntc-1591675-2022-12-09 Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | चौदहवीं विधानसभा |[[2022 गुजरात विधान सभा चुनाव|2022]] | 181 | 5 | 41,12,055 | 12.92 | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/gujarat-assembly-elections/story/gujarat-election-aam-aadmi-party-arvind-kejriwal-asaduddin-owaisi-bjp-congress-aimim-ntc-1591675-2022-12-09 गुजरात में 35 विधानसभा सीटों पर नंबर दो पर रही AAP, ओवैसी ने भी खूब बिगाड़ा कांग्रेस का गेम] ''आजतक नई दिल्ली 9 दिसम्बर 2022 aajtak.in''</ref> |- |} == दिल्ली सरकार == दिल्ली के उपराज्यपाल [[नजीब जंग]] के आमंत्रण पर दिल्ली के मतदाताओं से राय लेकर २८ दिसम्बर २०१३ को अरविंद केजरीवाल ने ७ मंत्रियों के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।<ref>{{cite web |url=http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |title=Arvind Kejriwal, as Delhi Chief Minister, to head 'youngest-ever' Cabinet; check them out |trans-title=दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने अब तक के सबसे युवा मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व सम्हालेंगे |date=25 दिसम्बर 2013 |website=The Financial Express |accessdate=8 जनवरी 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131227011543/http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |archive-date=27 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> विश्वास मत प्रस्ताव पर कांग्रेस ने इस सरकार का समर्थन किया। सरकार बनाते ही पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र के वादे पूरे करने शुरु किए। विशेष सुरक्षा और लाल बत्ती वाली गाड़ी लेने से मना किया। ३१ दिसम्बर को बिजली की कीमतों में अप्रैल तक आधे की छूट देने की घोषणा की। बिजली कंपनियों का सीएजी ऑडिट कराने की व्यवस्था की। बीस किलोलीटर पानी मुप्त देने की घोषणा की। इस सरकार को [[केंद्र सरकार]] और [[दिल्ली पुलिस]] से अनेक मामलों पर अवरोध का सामना करना पड़ा। बलात्कार एवं अन्य अपराध की घटनाओं पर पुलिस के कुछ अधिकारियों का तबादला करने के प्रश्न पर मुख्यमंत्री ने गृह मंत्रालय जाकर धरना देने की कोशिश की। इसमें अड़चने डालने पर [[रेल भवन]] के पास सड़क से ही केजरीवाल सरकार धरने पर बैठ गई। बाद में [[उपराज्यपाल]] के द्वारा पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने के बाद सरकार वापस काम पर लौटी। खिड़की एक्सटेंसन में कानून मंत्री [[सोमनाथ भारती]] की भूमिका भी विवादित रही। फरवरी में अरविन्द केजरीवाल ने अपने निगरानी विभाग को प्राकृतिक गैस का दाम अनियमित रूप से बढ़ाने के लिए [[मुकेश अंबानी]] और [[एम॰ वीरप्पा मोइली]] सहित कई प्रभावी लोगों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया।<ref>{{cite news | url = http://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/arvind-kejriwal-quits-over-jan-lokpal/article5688528.ece | title = Arvind Kejriwal quits over Jan Lokpal | author = मुहम्मद अली, विशाल कान्त, अशोक स्वोमिया | newspaper = द हिन्दू | date = 2014-02-15 | access-date = 26 फ़रवरी 2014 | archive-url = https://web.archive.org/web/20151016060813/http://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/arvind-kejriwal-quits-over-jan-lokpal/article5688528.ece | archive-date = 16 अक्तूबर 2015 | url-status = live }}</ref> केजरीवाल सरकार ने १३ फ़रवरी से विधान सभा सत्र बुलाकर जनलोकपाल और स्वराज्य विधेयक पारित करने की घोषणा की। जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने को लेकर उनका [[गृह मंत्रालय, भारत सरकार|गृह मंत्रालय]] और उपराज्यपाल से टकराव की स्थिति पैदा हो गई। लेफ्टिनेंट राज्यपाल [[नजीब जंग]] इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी को जरूरी बताते रहे जबकि केजरीवाल सरकार विधान सभा के विधेयक पास करने के संवैधानिक अधिकार पर डटी रही। १३ जनवरी के हंगामेदार सत्र के बाद १४ फ़रवरी के सत्र में राज्यपाल ने विधेयक को असंवैधानिक बताने का संदेश विधानसभा अध्यक्ष को भेजा और विधेयक पेश करने से पहले िस संदेश को सूचित करने को लिखा। इस संदेश के बाद कांग्रेस औ्रर भाजपा विधायकों ने विधेयक प्रस्तुत करने का मिलकर विरोध किया। जन लोकपाल पास करना तो दूर उसे प्रस्तुत भी न हो पाने के बाद [[अरविन्द केजरीवाल]] ने १४ फ़रवरी को अपनी सरकार से इस्तीफा दे दिया। इस कारण दिल्ली में पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा।<ref>{{cite news |url=http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140215_delhi_president_rule_aa.shtml |title=दिल्ली में राष्ट्रपति शासन |publisher=बीबीसी हिन्दी |date=14 फ़रवरी 2014 |accessdate= |archive-url=https://web.archive.org/web/20140302162326/http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140215_delhi_president_rule_aa.shtml |archive-date=2 मार्च 2014 |url-status=live }}</ref> == उल्लेखनीय कार्य == आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आते ही अपने सबसे बड़े वादों को निभाते हुए भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई. दिल्ली में सभी विभागों से भ्रष्टाचार लगभग 80 फीसदी तक कम हुआ. 50 भ्रष्ट अधिकारी जेल भेजे गए. बिजली के दाम 50 फीसदी घटाए गए जबकि पानी 20,000 लीटर तक मुफ्त किया गया. प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट कोटा ख़त्म किया. सभी सरकारी अस्पतालों में सभी दवाई मुफ्त. तीन पुलों में 350 करोड़ बचाए। २०१६ के अगस्त में पक्षाध्यक्ष श्रीकेजरीवाल ने पोर्न-काण्ड में फसे मन्त्री सन्दीप कुमार को मन्त्रिपद से हटाया। सन्दीप कुमार पर आरोप था कि वो पोर्न के क्षेत्र में सक्रिय थे। अतः उनको ३०/८/२०१६ को मन्त्रिपद से हटाया गया <ref>{{Cite web |url=http://www.indiatimes.com/news/india/pornhub-takes-the-biggest-dig-at-ex-aap-minister-sacked-by-arvind-kejriwal-over-sex-scandal-260935.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=1 सितंबर 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160901201202/http://www.indiatimes.com/news/india/pornhub-takes-the-biggest-dig-at-ex-aap-minister-sacked-by-arvind-kejriwal-over-sex-scandal-260935.html |archive-date=1 सितंबर 2016 |url-status=live }}</ref> <ref>{{Cite web |url=http://indiatoday.intoday.in/video/arvind-kejriwal-aap-child-welfare-minister-sandeep-kumar-sex-cd/1/753738.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=1 सितंबर 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160901034716/http://indiatoday.intoday.in/video/arvind-kejriwal-aap-child-welfare-minister-sandeep-kumar-sex-cd/1/753738.html |archive-date=1 सितंबर 2016 |url-status=live }}</ref>। ==विवाद एवं आलोचना == दिल्ली के दो आम आदमी पार्टी (आप) विधायकों , दिल्ली के कर्नल देविंदर सहारवत और असिम अहमद ने ,राजधानी में केजरीवाल सरकार पर खराब प्रशासन का आरोप लगाया और पार्टी के बड़े दावे में फसने से बचने की पंजाब के लोगों को चेतावनी दी।<ref>{{Cite web |url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/chandigarh/kejri-govt-failed-people-delhi-aap-mlas/articleshow/56962682.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=6 अक्तूबर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171028194059/https://timesofindia.indiatimes.com/city/chandigarh/kejri-govt-failed-people-delhi-aap-mlas/articleshow/56962682.cms |archive-date=28 अक्तूबर 2017 |url-status=live }}</ref> === सार्वजनिक परिवहन === सार्वजनिक परिवहन में सुधार: आम आदमी पार्टी (आप) ने सार्वजनिक परिवहन में काफी सुधार करने का वादा किया था लेकिन केजरीवाल का वितरण डीटीसी के मौजूदा बेड़े में एक भी बस नहीं जोड़ सकी। अंतिम मील कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के वादे को पूरा करने की कोई प्रगति नहीं हुई थी सार्वजनिक क्षेत्रों में वाई-फाई: यह एक ऐसा वादा था जो दिल्ली के लोगों को सबसे अधिक आकर्षित कर रहा था। "हम दिल्ली में पूरी तरह से वाई-फाई उपलब्ध कराएंगे ... वाई-फाई दिल्ली के सार्वजनिक क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जाएगी। इंटरनेट और दूरसंचार कंपनियों से संपर्क किया गया है और उनके साथ परामर्श करके एक उच्च स्तरीय व्यवहार्यता अध्ययन किया गया है। " लेकिन दो साल बाद भी, राष्ट्रीय राजधानी अब भी नि: शुल्क वाई-फाई सेवाओं का इंतजार कर रही है। दिल्ली भर में 10-15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए गए: यह एक और वादा था, जो आम आदमी पार्टी पूरी करने में नाकाम रही। एएपी के दिल्ली इकाई के संयोजक दिलीप पांडे ने कहा था, राष्ट्रीय राजधानी विभिन्न स्थानों पर सीसीटीवी प्राप्त करेगी, लेकिन दिल्लीवासियों को अभी भी इसके कार्यान्वयन के लिए इंतजार कर रहा है।<ref>{{Cite web |url=http://www.india.com/news/india/aap-turns-two-here-are-the-failures-and-achievements-of-delhi-govt-under-arvind-kejriwal-1837638/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=6 अक्तूबर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171006212239/http://www.india.com/news/india/aap-turns-two-here-are-the-failures-and-achievements-of-delhi-govt-under-arvind-kejriwal-1837638/ |archive-date=6 अक्तूबर 2017 |url-status=dead }}</ref> === शराब घोटाले === अरविंद केजरीवाल की पार्टी के कई नेता इस समय कथित शराब घोटाले और अन्य आपराधिक आरोपों में जेल में हैं। यहां तक ​​कि खुद अरविद केजरीवाल भी पूछताछ के लिए प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होने को तैयार नहीं हैं === यमुना साफ़ === दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल यमुना और दिल्ली को साफ़ करने में विफल रहे, उन्होंने कहा, जब यमुना शहर में प्रवेश करती है तो उसमें मल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की स्वीकार्य सीमा होती है, जो नदी के शहर छोड़ने पर 6.5 लाख/100 मिलीलीटर से अधिक हो जाती है। == इन्हें भी देखें== * [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] * [[भ्रष्टाचार (आचरण)]] == सन्दर्भ == {{reflist|30em}} == बाहरी कड़ियाँ== *[https://web.archive.org/web/20130205064246/http://www.aamaadmiparty.org/ '''आम आदमी पार्टी (आप)''' का जालस्थल]<!-- *[https://docs.google.com/folder/d/0B29Q9fS9zb3jc2MtdmpKNlI2clk/edit?usp=sharing आम आदमी पार्टी का संविधान] (हिन्दी में)--> [[श्रेणी:भारत के राजनीतिक दल]] [[श्रेणी:२०१२ में स्थापित राजनीतिक दल]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी]] {{आम आदमी पार्टी}} 7yngbiepqiz4pjub10izuzpw8e1v9yg 6543777 6543776 2026-04-25T07:13:38Z KiranBOT 699009 AMP-Tracking को URLs से हटाया ([[:m:User:KiranBOT/AMP|विवरण]]) ([[User talk:Usernamekiran|त्रुटि दर्ज करें]]) v2.2.9s 6543777 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian Political Party |party_name = आम आदमी पार्टी |party_logo = [[File:Aam Aadmi Party logo (English).svg|250px]] |colorcode = {{party color|Aam Aadmi Party}} |leader = [[अरविंद केजरीवाल ]] |foundation = २६ नवम्बर २०१२ |headquarters = २०६ रौसे अवेनुए, दीन दयाल उपाधय मार्ग, ITO, दिल्ली -११०००२ |students = [[छात्र युवा संघर्ष समिति]] |youth = |women = |labour = |ideology = * [[कल्याणकारी राज्य|कल्याणवाद]] * [[भारतीय राष्ट्रवाद]] * [[धर्मनिरपेक्षता]] | loksabha_seats = {{Infobox political party/seats|3|543|hex=#4682b4}} | rajyasabha_seats = {{Infobox political party/seats|10|245|hex=#4682b4}} | state_seats = {{Infobox political party/seats|22|70|hex=#4682b4}}'''[[दिल्ली विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|91|117|hex=#4682b4}}'''[[पंजाब विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|4|198|hex=#4682b4}}'''[[गुजरात विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|2|40|hex=#4682b4}}'''[[गोवा विधानसभा]]''' {{Infobox political party/seats|1|90|hex=#4682b4}}'''[[जम्मू और कश्मीर विधानसभा]]''' |international = |colours =नीला |symbol = [[झाडू]] [[File:AAP Symbol.png|50px]] |website = {{URL|http://www.aamaadmiparty.org}} }} '''आम आदमी पार्टी''', संक्षेप में '''आप(AAP)''', सामाजिक कार्यकर्ता एवं मैग्ससे पुरस्कार विजेता [[अरविंद केजरीवाल]] एवं [[अन्ना हजारे]] के [[लोकपाल आंदोलन]] से जुड़े बहुत से सहयोगियों द्वारा गठित एक भारतीय [[राजनीतिक दल]] है। इसके गठन की आधिकारिक घोषणा २६ नवम्बर २०१२ को [[भारतीय संविधान]] अधिनियम की ६३ वीं वर्षगाँठ के अवसर पर [[जंतर मंतर, दिल्ली]] में की गयी थी। सन् २०११ में [[इंडिया अगेंस्ट करप्शन]] नामक संगठन ने [[अन्ना हजारे]] के नेतृत्व में हुए [[जन लोकपाल आंदोलन]] के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा जनहित की उपेक्षा एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, जबकि अरविन्द केजरीवाल और उनके सहयोगियों की यह राय थी कि पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा जाये। इसी उद्देश्य के तहत पार्टी पहली बार दिसम्बर २०१३ में [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, 2013|दिल्ली विधानसभा चुनाव]] में झाड़ू चुनाव चिह्न के साथ चुनावी मैदान में उतरी। पार्टी ने चुनाव में २८ सीटों पर जीत दर्ज की और [[कांग्रेस]] के समर्थन से दिल्ली में [[सरकार]] बनायी। अरविन्द केजरीवाल ने [[२८ दिसम्बर]] २०१३ को दिल्ली के ७वें मुख्य मन्त्री पद की शपथ ली। ४९ दिनों के बाद १४ फ़रवरी २०१४ को विधान सभा द्वारा जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को समर्थन न मिल पाने के कारण अरविंद केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया। अगले चुनाव में पार्टी ने स्वयं चुनाव लड़कर सत्ता हासिल की ,परन्तु जनलोकपाल और उसके अधिकार के बारे में कुछ नहीं किया गया अंततः जनता ने 2025 में अल्पमत में ला दिया == इतिहास == आम आदमी पार्टी की उत्पत्ति सन् 2012 में ''इण्डिया अगेंस्ट करप्शन (''हिंदी में ''भारतीय भ्रष्टाचार के खिलाफ)'' द्वारा अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाये गये जन लोकपाल आन्दोलन के समापन के दौरान हुई। [[जन लोकपाल]] बनाने के प्रति भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा प्रदर्शित उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण राजनीतिक विकल्प की तलाश की जाने लगी थी। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आन्दोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे जबकि अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये एक अलग पार्टी बनाकर चुनाव में शामिल होने के पक्षधर थे। उनके विचार से वार्ता के जरिये जन लोकपाल विधेयक बनवाने की कोशिशें व्यर्थ जा रहीं थीं। ''इण्डिया अगेंस्ट करप्शन'' द्वारा सामाजिक जुड़ाव सेवाओं पर किये गये सर्वे में राजनीति में शामिल होने के विचार को व्यापक समर्थन मिला। १९ सितम्बर २०१२ को अन्ना और अरविन्द इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनके राजनीति में शामिल होने सम्बन्धी मतभेदों का दूर होना मुश्किल है। इसलिये उन्होंने समान लक्ष्यों के बावजूद अपना रास्ता अलग करने का निश्चय किया। जन लोकपाल आन्दोलन से जुड़े [[मनीष सिसोदिया]], [[प्रशांत भूषण]] व [[योगेन्द्र यादव]] आदि ने अरविन्द केजरीवाल का साथ दिया, जबकि [[किरण वेदी]] व [[सन्तोष हेगड़े]] आदि कुछ अन्य लोगों ने हजारे से सहमति प्रकट की। केजरीवाल ने २ अक्टूबर २०१२ को राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय संविधान की वर्षगांठ के दिन २६ नवम्वर (२०१२) को औपचारिक रूप से आम आदमी पार्टी का गठन हुआ।<ref>{{Citation|title='आम आदमी पार्टी' के राष्ट्रीय संयोजक बने केजरीवाल|url=http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/17365222.cms|publisher=नवभारत टाइम्स|date=२६ नवम्बर २०१२|accessdate=११ दिसम्बर २०१३|archive-url=https://web.archive.org/web/20121129080158/http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/17365222.cms|archive-date=29 नवंबर 2012|url-status=live}}</ref> <ref>{{Cite web |url=http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121126_india_kejriwal_aap_party_arm.shtml |title=बीबीसी हिंदी - केजरीवाल ने लांच की आम आदमी पार्टी |access-date=1 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20130129192246/http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121126_india_kejriwal_aap_party_arm.shtml |archive-date=29 जनवरी 2013 |url-status=live }}</ref> आम आदमी पार्टी (आप) की छात्र शाखा [[छात्र युवा संघर्ष समिति]] (सीवाईएसएस) की स्थापना 9 अप्रैल 2014 को हुई थी। == विचारधारा == पार्टी कहती है कि वह किसी विशेष विचारधारा द्वारा निर्देशित नहीं हैं। उन्होंने व्यवस्था को बदलने के लिये राजनीति में प्रवेश किया है। अरविन्द केजरीवाल के शब्दों में - "हम आम आदमी हैं। अगर वामपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से विचार उधार ले लेंगे और अगर दक्षिणपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से भी विचार उधार लेने में खुश हैं। == नेतृत्व == ===मुख्यमंत्रियों की सूची=== {{मुख्य|दिल्ली के मुख्यमंत्रियों की सूची|पंजाब (भारत) के मुख्यमंत्रियों की सूची}} {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! मुख्यमंत्री ! चित्र ! colspan=2|कार्यकाल ! पदावधि ! विधानसभा ! |- ! १ | rowspan=3|[[दिल्ली]] | rowspan=3|[[अरविंद केजरीवाल]] | rowspan=3|[[File:Arvind_Kejriwal_September_02,_2017_crop.jpg|100x150px]] | २८ दिसंबर २०१३ | १४ फरवरी २०१४ | ४९ दिन | पांचवी |- ! २ | १४ फरवरी २०१५ | १५ फरवरी २०२० | ५ वर्ष १ दिन | छठवीं | <ref>[https://www.aajtak.in/india/delhi/story/arvind-kejriwal-take-oath-as-delhi-cm-today-289244-2015-02-14 अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने ली शपथ] आजतक 14 फरवरी 2015</ref> |- ! ३ | १६ फरवरी २०२० | [[पदस्थ]] | {{age in years and days|2020|02|16}} | सातवीं | <ref>[https://www.livehindustan.com/live-blog/arvind-kejriwal-as-delhi-cm-and-his-cabinet-ministers-oath-taking-ceremony-in-ramlila-maidan-today-live-updates-here-3028877.html अरविंद केजरीवाल ने लगातार तीसरी बार ली दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ] हिन्दुस्तान 16 फरवरी 2020</ref> |- !४ |[[पंजाब]] |[[भगवंत मान]] |[[File:A delegation of Aam Aadmi Party leaders, - MP (Lok Sabha), Shri Bhagwant Mann, Shri Sanjay Singh and Shri Ashutosh, calling on the Union Home Minister, Shri Rajnath Singh, in New Delhi on October 22, 2015 (cropped).jpg|100x150px]] | १६ मार्च २०२२ | [[पदस्थ]] | {{age in years and days|2022|03|16}} | सोलहवीं |<ref>{{Cite web |url=https://www.jagran.com/lite/punjab/chandigarh-bhagwant-mann-oath-taking-ceremony-tomorrow-and-cabinet-formation-on19-22547626.html |title=भगवंत मान ने संभाली पंजाब की कमान, शहीद भगत सिंह के गांंव में ली सीएम पद की शपथ, 16 मार्च 2022 |access-date=14 अगस्त 2023 |archive-date=14 अगस्त 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230814022526/https://www.jagran.com/lite/punjab/chandigarh-bhagwant-mann-oath-taking-ceremony-tomorrow-and-cabinet-formation-on19-22547626.html |url-status=dead }}</ref> |- |} ===राज्यसभा=== {{मुख्य|राज्य सभा के वर्तमान सदस्यों की सूची}} {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! सांसद ! नियुक्ति तिथि ! निवृत्ति तिथि ! |- ! १ | rowspan=3|[[दिल्ली]] | [[संजय सिंह]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! २ | [[नारायण दास गुप्ता]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! ३ | [[सुशील कुमार गुप्ता]] | २८ जनवरी २०१८ | २७ जनवरी २०२४ |- ! ४ | rowspan=7|[[पंजाब]] | [[हरभजन सिंह]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ५ | [[राघव चद्दा|राघव चड्ढा]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ | <ref>[https://hindi.news18.com/news/delhi-ncr/aap-strength-doubles-in-rajya-sabha-raghav-chadha-sanjeev-arora-ashok-mittal-take-oath-as-mps-nodrss-4229401.html आप' के राघव चड्ढा सहित 3 सदस्यों ने ली राज्यसभा सदस्य की शपथ, जानें इनके बारे में सबकुछ 2 मई 2022]</ref> |- ! ६ | [[संदीप पाठक]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ७ | [[अशोक मित्तल]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ८ | [[संजीव अरोरा]] | १० अप्रैल २०२२ | ९ अप्रैल २०२८ |- ! ९ | [[बलबीर सिंह सीचेवाल]] | ५ जुलाई २०२२ | ४ जुलाई २०२८ |- ! १० | [[विक्रमजीत सिंह साहनी]] | ५ जुलाई २०२२ | ४ जुलाई २०२८ |- |} ===लोकसभा=== {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! लोकसभा ! राज्य ! लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र ! सांसद ! नियुक्ति तिथि ! टीप ! |- | Rowspan=2|[[सत्रहवीं लोक सभा]] | rowspan=2|[[पंजाब]] | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | २३ मई २०१९ | १४ मार्च २०२२ को पदत्याग |- | [[जलंधर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|जालंधर]] | [[सुशील कुमार रिंकू]] | १३ मई २०२३ | [[भारत में 2023 के चुनाव#लोकसभा उपचुनाव|२०२३ (उपचुनाव)]] |<ref>{{Cite web |url=https://www.zeenews.india.com/hindi/zeephh/himachal-pradesh/who-is-sushil-kumar-rinku-know-all-about-aap-candidate-who-won-jalandhar-lok-sabha-bypoll-election-2023-result/1694041/amp |title=Jalandhar Bypoll Election Result: जानें कौन है AAP के प्रत्याशी सुशील कुमार रिंकू, जिन्होंने जालंधर में रचा इतिहास 13 मई 2023 |access-date=14 अगस्त 2023 |archive-date=26 मई 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230526133750/https://zeenews.india.com/hindi/zeephh/himachal-pradesh/who-is-sushil-kumar-rinku-know-all-about-aap-candidate-who-won-jalandhar-lok-sabha-bypoll-election-2023-result/1694041/amp |url-status=dead }}</ref> |- | Rowspan=4|[[सोलहवीं लोक सभा]] | rowspan=4|[[पंजाब]] | [[फतेहगढ़ साहिब लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|फतेहगढ़ साहिब]] | [[हरिंदर सिंह खालसा]] | १६ मई २०१४ |- | [[फरीदकोट लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र| फरीदकोट]] | [[साधु सिंह]] | १६ मई २०१४ |- | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | १६ मई २०१४ |- | [[पटियाला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|पटियाला]] | [[डॉ. धरमवीरा गांधी]] | १६ मई २०१४ |- |मध्य प्रदेश। रानी अग्रवाल महापौर सिंगरौली == चुनावी भागीदारी == ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०१३=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१३}} ४ दिसम्बर २०१३ को हुए [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, 2013|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव]] में पार्टी ने पहला चुनाव लड़ा। उसने पूरी दिल्ली के लिये चुनावी घोषणापत्र तैयार करने के साथ ही प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिये अलग-अलग [[घोषणापत्र]] तैयार किया।<ref>{{cite news|title=आम आदमी पार्टी 71 घोषणापत्र बनाएगी|url=http://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-10743276.html|publisher=जागरण|date=22 सितम्बर 2013|accesdate=१७ नवम्बर २०१३|access-date=17 नवंबर 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131212050232/http://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-10743276.html|archive-date=12 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref> दिल्ली चुनाव के पहले पार्टी को कई विवादों का सामना करना पड़ा। भारत सरकार के गृहमन्त्री, [[सुशील कुमार शिंदे]] ने पार्टी के विदेशी दान की जाँच कराने की बात कही। पार्टी ने दान राशि का सम्पूर्ण ब्यौरा पार्टी वेवसाइट पर पहले से ही सार्वजनिक होने की बात कही और अन्य राजनीतिक दलों को भी अपने चन्दे को सार्वजनिक करने की चुनौती दी। दिल्ली विधान सभा चुनाव के कुछ पहले एक मीडिया पोर्टल द्वारा आम आदमी के विधायक पद के उम्मीदवारों का स्टिंग ऑपरेशन सामने आया जिसमें उन पर ग़ैर-ईमानदार होने के आरोप लगाये गये। आम आदमी पार्टी ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर स्टिंग वीडियो में कई महत्वपूर्ण भागों को काट-छाँट कर प्रस्तुत करने का आरोप लगाया और मीडिया पोर्टल के खिलाफ मानहानि की याचिका दायर की। ६ दिसम्बर को घोषित हुए परिणाम में ७० सदस्यीय [[दिल्ली विधानसभा]] में पार्टी २८ सीटों पर विजयी रही। ३२ विधान सभा क्षेत्रों की विजेता [[भारतीय जनता पार्टी]] के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। अरविन्द केजरीवाल ने सत्तारूढ़ी कांग्रेस पार्टी की निवर्तमान मुख्यमन्त्री [[शीला दीक्षित]] (कांग्रेस) को लगभग 25,000 वोटों से पराजित किया।<ref>{{Cite web |url=http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-arvind-kejriwal-sheila-dikshit-election-39-39-382727.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131215095955/http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-arvind-kejriwal-sheila-dikshit-election-39-39-382727.html |archive-date=15 दिसंबर 2013 |url-status=dead }}</ref> और कांग्रेस केवल ८ सीटों पर सिमट गयी।<ref>{{cite news|1=|url=http://zeenews.india.com/hindi/blog/this-is-not-aap-victory-but-common-mans-victory_112.html|title='आप' की नहीं, आम आदमी की जीत|publisher=ज़ी न्यूज़|date=८ दिसम्बर २०१३|accesdate=११ दिसम्बर २०१३|access-date=8 दिसंबर 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131211145001/http://zeenews.india.com/hindi/blog/this-is-not-aap-victory-but-common-mans-victory_112.html|archive-date=11 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.business-standard.com/article/politics/delhi-polls-bjp-ahead-aap-inches-to-second-113120800100_1.html |title=Delhi polls {{!}} BJP ahead, AAP inches to second |access-date=11 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131213025515/http://www.business-standard.com/article/politics/delhi-polls-bjp-ahead-aap-inches-to-second-113120800100_1.html |archive-date=13 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://eciresults.nic.in/PartyWiseResult.htm |title=संग्रहीत प्रति |access-date=11 दिसंबर 2013 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131215065208/http://eciresults.nic.in/PartyWiseResult.htm |archive-date=15 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> दिल्ली के उपराज्यपाल [[नजीब जंग]] ने भाजपा द्वारा सरकार बनाने से मना करने के बाद आम आदमी पार्टी विधायक दल के नेता अरविन्द केजरीवाल को सरकार बनाने के लिये आमन्त्रित किया। २८ दिसम्बर को कांग्रेस के समर्थन से पार्टी ने दिल्ली में अपनी सरकार बनायी। अरविन्द केजरीवाल सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।<ref>{{cite web |url=http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |title=Arvind Kejriwal, as Delhi Chief Minister, to head 'youngest-ever' Cabinet; check them out |trans-title=दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने अब तक के सबसे युवा मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व सम्हालेंगे |date=25 दिसम्बर 2013 |website=The Financial Express |accessdate=8 जनवरी 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131227011543/http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |archive-date=27 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> === लोकसभा चुनाव २०१४ === AAP ने 2014 के भारतीय आम चुनाव में 434 उम्मीदवार उतारे, जिसमें उसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। इसने माना कि इसका समर्थन मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों पर आधारित था और देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रणनीतियों की आवश्यकता हो सकती है। पार्टी ने बताया कि उसकी फंडिंग सीमित थी और केजरीवाल की ओर से स्थानीय दौरों की बहुत अधिक मांगें थीं। इरादा चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता की संभावना को अधिकतम करने के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का था। नतीजा यह हुआ कि AAP के चार उम्मीदवार जीते, सभी पंजाब से। परिणामस्वरूप, AAP पंजाब में एक मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी बन गई। पार्टी को देश भर में पड़े सभी वोटों का 2% प्राप्त हुआ और उसके 414 उम्मीदवारों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में एक-छठा वोट हासिल करने में विफल रहने के कारण अपनी जमानत जब्त कर ली। हालाँकि पार्टी को दिल्ली में 32.9 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह वहाँ कोई भी सीट जीतने में असफल रही। AAP संयोजक, अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ा, लेकिन 371,784 (20.30%) वोटों के अंतर से हार गए और बसपा, कांग्रेस, सपा से आगे दूसरे स्थान पर रहे। चुनाव के तुरंत बाद, शाज़िया इल्मी (पीएसी सदस्य) ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य योगेन्द्र यादव ने अपनी पार्टी के सदस्यों को लिखे एक पत्र में केजरीवाल की नेतृत्व शैली की आलोचना की। 8 जून को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद, पार्टी और केजरीवाल ने इन मतभेदों को स्वीकार किया और स्थानीय और साथ ही राष्ट्रीय निर्णय लेने में अधिक लोगों को शामिल करने के लिए "मिशन विस्तार" (मिशन विस्तार) शुरू करने की घोषणा की। {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align:center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! class="unsortable"| राज्य ! निर्वाचन क्षेत्र ! निर्वाचित सांसद ! class="unsortable"| टीप |- | rowspan="4"| [[पंजाब]] | [[फतेहगढ़ साहिब लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|फतेहगढ़ साहिब]] | [[हरिंदर सिंह खालसा]] | |- | [[फरीदकोट लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र| फरीदकोट]] | [[साधु सिंह]] | |- | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | |- | [[पटियाला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|पटियाला]] | [[धर्मवीर गांधी]] | |- |} ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०१५=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१५}} ===पंजाब विधानसभा चुनाव २०१७=== {{मुख्य|पंजाब विधानसभा चुनाव, 2017}} पहली बार, आप ने 2017 गोवा विधानसभा चुनाव और 2017 पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ा। गोवा में AAP कोई भी सीट नहीं जीत सकी और 39 में से 38 उम्मीदवार अपनी जमानत बचाने में विफल रहे। 2017 पंजाब विधान सभा चुनाव के लिए, [[लोक इंसाफ पार्टी]] ने AAP के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन को AAP गठबंधन कहा गया और समाचार चैनलों पर इसे AAP+ के रूप में दर्शाया गया। इसने कुल 22 सीटें जीतीं, जिनमें से दो लोक इंसाफ पार्टी ने और बाकी बीस आप ने जीतीं। ===लोकसभा चुनाव २०१९=== {{मुख्य|भारतीय आम चुनाव, 2019|लोकसभा चुनाव २०१९ में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची}} 2014 के भारतीय आम चुनाव के विपरीत, पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) ने कुछ राज्यों की सीमित सीटों और दिल्ली, गोवा, और पंजाब की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरियाणा राज्य में, आप ने तीन लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के लिए [[दुष्यंत चौटाला]] की [[जननायक जनता पार्टी]] के साथ गठबंधन किया। पीएसी ने केरल में [[सीपीआई (एम)]] के लिए समर्थन और प्रचार करने का भी निर्णय लिया। पार्टी ने अपना पहला ट्रांसजेंडर उम्मीदवार भी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से मैदान में उतारा। आप ने संगरूर का केवल 1 निर्वाचन क्षेत्र जीता। {|class="wikitable" border="2" cellpadding="6" cellspacing="0" style="margin: 1em 1em 1em 0; text-align: center; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! क्रम ! राज्य ! निर्वाचन क्षेत्र ! निर्वाचित सांसद ! टीप ! |- ! १ | Rowspan=2|[[पंजाब]] | [[संगरूर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|संगरूर]] | [[भगवंत मान]] | द्वितीय कार्यकाल |<ref>[https://www.amarujala.com/photo-gallery/chandigarh/lok-sabha-chunav-2019-result-aap-candidate-bhagwant-mann-sangrur-lok-sabha-seat पंजाब का वो 'कॉमेडी किंग' जिसने बचा ली केजरीवाल की लाज, जीत दर्ज करने वाला इकलौता सांसद] अमर उजाला 24 मई 2019</ref> |- ! २ | [[जलंधर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र|जालंधर]] | [[सुशील कुमार रिंकू]] | [[भारत में 2023 के चुनाव#लोकसभा उपचुनाव|२०२३ (उपचुनाव)]] |<ref>[https://www.bhaskar.com/local/punjab/jalandhar/news/punjab-jalandhar-lok-sabha-election-result-counting-2023-live-update-sushil-kumar-rinku-aap-vs-bjp-congress-131275159.html जालंधर उपचुनाव में AAP की जीत:58,691 वोटों से कांग्रेस को हराया; अकाली दल तीसरे और BJP चौथे नंबर पर रही] दैनिक भास्कर जालंधर</ref> |- |} ===दिल्ली विधानसभा चुनाव २०२०=== {{मुख्य|दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०२०}} चुनाव लड़ने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा चलाए गए जोरदार अभियान के बाद, 8 फरवरी 2020 को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ। वोटों की गिनती और उसके बाद नतीजों की घोषणा 11 फरवरी को हुई। आम आदमी पार्टी ने सरकार बरकरार रखी क्योंकि पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतीं। [[अरविंद केजरीवाल]] लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। परिणामों के अनुसार, पार्टी का वोट शेयर 53.5% था। ===पंजाब विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|पंजाब विधानसभा चुनाव, 2022}} जनवरी 2021 में, [[अरविंद केजरीवाल]] ने घोषणा की कि आप 2022 में छह राज्यों में चुनाव लड़ेगी। ये छह राज्य [[उत्तर प्रदेश]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[गोवा]], [[गुजरात]], [[उत्तराखंड]] और [[पंजाब]] थे। पार्टी ने पंजाब में [[चरणजीत सिंह चन्नी]] की मौजूदा कांग्रेस सरकार को हराकर भारी जीत हासिल की और राज्य पार्टी संयोजक [[भगवंत मान]] ने नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ===गुजरात विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|2022 गुजरात विधान सभा चुनाव}} ===गोवा विधानसभा चुनाव २०२२=== {{मुख्य|गोवा विधान सभा चुनाव, 2022}} ==चुनावी प्रदर्शन== ===दिल्ली विधानसभा चुनाव=== {| class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | पांचवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१३|२०१३]] | ६९ | २८ | २३,२२,३३० | २९.४९% | <ref>[https://m.economictimes.com/news/politics-and-nation/delhi-election-2013-aap-makes-stunning-debut-bjp-short-of-majority-in-delhi/articleshow/27095533.cms दिल्ली चुनाव 2013: आप की शानदार जीत]</ref> |- | छठवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०१५|२०१५]] | ७० | ६७ | ४८,७८,३९७ | ५४.३% | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/story/delhi-assembly-election-2015-result-live-update-288789-2015-02-10 दिल्ली चुनाव में AAP को मिली ऐतिहासिक जीत, विधायक दल के नेता चुने गए अरविंद केजरीवाल 10 फरवरी 2015]</ref> |- | सातवीं विधानसभा | [[दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव, २०२०|२०२०]] | ७० | ६२ | ४९,७४,५९२ | ५३.५७% | <ref>[https://www.abplive.com/news/india/live-updates-delhi-election-results-2020-news-and-updates-arvind-kejriwal-said-this-is-victory-of-delhi-1300560/amp Delhi Election Results: प्रचंड जीत के साथ AAP ने दिखाया अपना दमखम, अरविंद केजरीवाल तीसरी बार बनेंगे CM 11 फरवरी 2020]</ref> |- |} ===लोकसभा चुनाव=== {| class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! लोकसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! राज्य (सीटें) ! संदर्भ |- | [[सोलहवीं लोकसभा]] | [[भारतीय आम चुनाव, २०१४|2014]] | 432 | 4 | 1,13,25,387 | 2.1 | पंजाब (4) | |- | [[सत्रहवीं लोकसभा]] | [[भारतीय आम चुनाव, 2019|2019]] | 36 | 1 | 27,16,629 | 0.44 | पंजाब (1) | |- |} ===गोवा विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | बारहवीं विधानसभा | [[गोवा विधानसभा चुनाव, 2017|2017]] | 40 | 0 | 57,420 | 6.3 | <ref>[https://www.amarujala.com/chandigarh/punjab-election-results-punjab-election-result-live-punjab-assembly-election-2017-counting Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | तेरहवीं विधानसभा | [[गोवा विधान सभा चुनाव, 2022|2022]] | 39 | 2 | 64,354 | 6.77 | <ref>[https://www.prabhatkhabar.com/national/2022-vidhan-sabha-election-results-aam-aadmi-party-won-two-seat-in-goa-election-2022-result-smb गोवा में आम आदमी पार्टी का खुला खाता, सीएम उम्मीदवार हारे] ''प्रभात खबर डिजिटल 10 मार्च 2022''</ref> |- |} ===पंजाब विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | पंद्रहवीं विधानसभा | [[पंजाब विधानसभा चुनाव, 2017|२०१७]] | ११२ | २० | ३६,६२,६६५ | २३.७% | <ref>[https://www.amarujala.com/chandigarh/punjab-election-results-punjab-election-result-live-punjab-assembly-election-2017-counting Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | सोलहवीं विधानसभा | [[पंजाब विधानसभा चुनाव, 2022|२०२२]] | ११७ | ९२ | ६५,३८,७८३ | ४२.०१% | <ref>[https://www.bhaskar.com/local/chandigarh/news/punjab-election-result-2022-live-counting-updates-bjp-aap-congress-charanjit-singh-channi-navjot-sidhu-amarinder-singh-bikram-majithia-modi-arvind-kejriwal-129490873.html पंजाब में आप की रिकॉर्डतोड़ जीत:आप ने 56 साल में सबसे बड़ी जीत हासिल की, 117 में से 92 सीटों पर कब्जा; कांग्रेस 18 सीटों पर सिमटी]</ref> |- |} ===गुजरात विधानसभा चुनाव=== {|class="wikitable" cellpadding="5" style="text-align:center;" |- style="background:#00f;" ! विधानसभा ! चुनाव वर्ष ! सीटें लड़ी ! सीटें जीतीं ! प्राप्त मत ! मत % ! संदर्भ |- | तेरहवीं विधानसभा |[[गुजरात विधानसभा चुनाव, 2017|2017]] | 29 | 0 | 29,509 | 0.1 | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/gujarat-assembly-elections/story/gujarat-election-aam-aadmi-party-arvind-kejriwal-asaduddin-owaisi-bjp-congress-aimim-ntc-1591675-2022-12-09 Election Result: पंजाब में कांग्रेस ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत, 'आप' के दावे हवा 12 मार्च 2017]</ref> |- | चौदहवीं विधानसभा |[[2022 गुजरात विधान सभा चुनाव|2022]] | 181 | 5 | 41,12,055 | 12.92 | <ref>[https://www.aajtak.in/elections/gujarat-assembly-elections/story/gujarat-election-aam-aadmi-party-arvind-kejriwal-asaduddin-owaisi-bjp-congress-aimim-ntc-1591675-2022-12-09 गुजरात में 35 विधानसभा सीटों पर नंबर दो पर रही AAP, ओवैसी ने भी खूब बिगाड़ा कांग्रेस का गेम] ''आजतक नई दिल्ली 9 दिसम्बर 2022 aajtak.in''</ref> |- |} == दिल्ली सरकार == दिल्ली के उपराज्यपाल [[नजीब जंग]] के आमंत्रण पर दिल्ली के मतदाताओं से राय लेकर २८ दिसम्बर २०१३ को अरविंद केजरीवाल ने ७ मंत्रियों के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।<ref>{{cite web |url=http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |title=Arvind Kejriwal, as Delhi Chief Minister, to head 'youngest-ever' Cabinet; check them out |trans-title=दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने अब तक के सबसे युवा मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व सम्हालेंगे |date=25 दिसम्बर 2013 |website=The Financial Express |accessdate=8 जनवरी 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20131227011543/http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwal-as-delhi-chief-minister-to-head-youngestever-cabinet-check-them-out/1211515 |archive-date=27 दिसंबर 2013 |url-status=live }}</ref> विश्वास मत प्रस्ताव पर कांग्रेस ने इस सरकार का समर्थन किया। सरकार बनाते ही पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र के वादे पूरे करने शुरु किए। विशेष सुरक्षा और लाल बत्ती वाली गाड़ी लेने से मना किया। ३१ दिसम्बर को बिजली की कीमतों में अप्रैल तक आधे की छूट देने की घोषणा की। बिजली कंपनियों का सीएजी ऑडिट कराने की व्यवस्था की। बीस किलोलीटर पानी मुप्त देने की घोषणा की। इस सरकार को [[केंद्र सरकार]] और [[दिल्ली पुलिस]] से अनेक मामलों पर अवरोध का सामना करना पड़ा। बलात्कार एवं अन्य अपराध की घटनाओं पर पुलिस के कुछ अधिकारियों का तबादला करने के प्रश्न पर मुख्यमंत्री ने गृह मंत्रालय जाकर धरना देने की कोशिश की। इसमें अड़चने डालने पर [[रेल भवन]] के पास सड़क से ही केजरीवाल सरकार धरने पर बैठ गई। बाद में [[उपराज्यपाल]] के द्वारा पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने के बाद सरकार वापस काम पर लौटी। खिड़की एक्सटेंसन में कानून मंत्री [[सोमनाथ भारती]] की भूमिका भी विवादित रही। फरवरी में अरविन्द केजरीवाल ने अपने निगरानी विभाग को प्राकृतिक गैस का दाम अनियमित रूप से बढ़ाने के लिए [[मुकेश अंबानी]] और [[एम॰ वीरप्पा मोइली]] सहित कई प्रभावी लोगों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया।<ref>{{cite news | url = http://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/arvind-kejriwal-quits-over-jan-lokpal/article5688528.ece | title = Arvind Kejriwal quits over Jan Lokpal | author = मुहम्मद अली, विशाल कान्त, अशोक स्वोमिया | newspaper = द हिन्दू | date = 2014-02-15 | access-date = 26 फ़रवरी 2014 | archive-url = https://web.archive.org/web/20151016060813/http://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/arvind-kejriwal-quits-over-jan-lokpal/article5688528.ece | archive-date = 16 अक्तूबर 2015 | url-status = live }}</ref> केजरीवाल सरकार ने १३ फ़रवरी से विधान सभा सत्र बुलाकर जनलोकपाल और स्वराज्य विधेयक पारित करने की घोषणा की। जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने को लेकर उनका [[गृह मंत्रालय, भारत सरकार|गृह मंत्रालय]] और उपराज्यपाल से टकराव की स्थिति पैदा हो गई। लेफ्टिनेंट राज्यपाल [[नजीब जंग]] इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी को जरूरी बताते रहे जबकि केजरीवाल सरकार विधान सभा के विधेयक पास करने के संवैधानिक अधिकार पर डटी रही। १३ जनवरी के हंगामेदार सत्र के बाद १४ फ़रवरी के सत्र में राज्यपाल ने विधेयक को असंवैधानिक बताने का संदेश विधानसभा अध्यक्ष को भेजा और विधेयक पेश करने से पहले िस संदेश को सूचित करने को लिखा। इस संदेश के बाद कांग्रेस औ्रर भाजपा विधायकों ने विधेयक प्रस्तुत करने का मिलकर विरोध किया। जन लोकपाल पास करना तो दूर उसे प्रस्तुत भी न हो पाने के बाद [[अरविन्द केजरीवाल]] ने १४ फ़रवरी को अपनी सरकार से इस्तीफा दे दिया। इस कारण दिल्ली में पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा।<ref>{{cite news |url=http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140215_delhi_president_rule_aa.shtml |title=दिल्ली में राष्ट्रपति शासन |publisher=बीबीसी हिन्दी |date=14 फ़रवरी 2014 |accessdate= |archive-url=https://web.archive.org/web/20140302162326/http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140215_delhi_president_rule_aa.shtml |archive-date=2 मार्च 2014 |url-status=live }}</ref> == उल्लेखनीय कार्य == आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आते ही अपने सबसे बड़े वादों को निभाते हुए भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई. दिल्ली में सभी विभागों से भ्रष्टाचार लगभग 80 फीसदी तक कम हुआ. 50 भ्रष्ट अधिकारी जेल भेजे गए. बिजली के दाम 50 फीसदी घटाए गए जबकि पानी 20,000 लीटर तक मुफ्त किया गया. प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट कोटा ख़त्म किया. सभी सरकारी अस्पतालों में सभी दवाई मुफ्त. तीन पुलों में 350 करोड़ बचाए। २०१६ के अगस्त में पक्षाध्यक्ष श्रीकेजरीवाल ने पोर्न-काण्ड में फसे मन्त्री सन्दीप कुमार को मन्त्रिपद से हटाया। सन्दीप कुमार पर आरोप था कि वो पोर्न के क्षेत्र में सक्रिय थे। अतः उनको ३०/८/२०१६ को मन्त्रिपद से हटाया गया <ref>{{Cite web |url=http://www.indiatimes.com/news/india/pornhub-takes-the-biggest-dig-at-ex-aap-minister-sacked-by-arvind-kejriwal-over-sex-scandal-260935.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=1 सितंबर 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160901201202/http://www.indiatimes.com/news/india/pornhub-takes-the-biggest-dig-at-ex-aap-minister-sacked-by-arvind-kejriwal-over-sex-scandal-260935.html |archive-date=1 सितंबर 2016 |url-status=live }}</ref> <ref>{{Cite web |url=http://indiatoday.intoday.in/video/arvind-kejriwal-aap-child-welfare-minister-sandeep-kumar-sex-cd/1/753738.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=1 सितंबर 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160901034716/http://indiatoday.intoday.in/video/arvind-kejriwal-aap-child-welfare-minister-sandeep-kumar-sex-cd/1/753738.html |archive-date=1 सितंबर 2016 |url-status=live }}</ref>। ==विवाद एवं आलोचना == दिल्ली के दो आम आदमी पार्टी (आप) विधायकों , दिल्ली के कर्नल देविंदर सहारवत और असिम अहमद ने ,राजधानी में केजरीवाल सरकार पर खराब प्रशासन का आरोप लगाया और पार्टी के बड़े दावे में फसने से बचने की पंजाब के लोगों को चेतावनी दी।<ref>{{Cite web |url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/chandigarh/kejri-govt-failed-people-delhi-aap-mlas/articleshow/56962682.cms |title=संग्रहीत प्रति |access-date=6 अक्तूबर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171028194059/https://timesofindia.indiatimes.com/city/chandigarh/kejri-govt-failed-people-delhi-aap-mlas/articleshow/56962682.cms |archive-date=28 अक्तूबर 2017 |url-status=live }}</ref> === सार्वजनिक परिवहन === सार्वजनिक परिवहन में सुधार: आम आदमी पार्टी (आप) ने सार्वजनिक परिवहन में काफी सुधार करने का वादा किया था लेकिन केजरीवाल का वितरण डीटीसी के मौजूदा बेड़े में एक भी बस नहीं जोड़ सकी। अंतिम मील कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के वादे को पूरा करने की कोई प्रगति नहीं हुई थी सार्वजनिक क्षेत्रों में वाई-फाई: यह एक ऐसा वादा था जो दिल्ली के लोगों को सबसे अधिक आकर्षित कर रहा था। "हम दिल्ली में पूरी तरह से वाई-फाई उपलब्ध कराएंगे ... वाई-फाई दिल्ली के सार्वजनिक क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जाएगी। इंटरनेट और दूरसंचार कंपनियों से संपर्क किया गया है और उनके साथ परामर्श करके एक उच्च स्तरीय व्यवहार्यता अध्ययन किया गया है। " लेकिन दो साल बाद भी, राष्ट्रीय राजधानी अब भी नि: शुल्क वाई-फाई सेवाओं का इंतजार कर रही है। दिल्ली भर में 10-15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए गए: यह एक और वादा था, जो आम आदमी पार्टी पूरी करने में नाकाम रही। एएपी के दिल्ली इकाई के संयोजक दिलीप पांडे ने कहा था, राष्ट्रीय राजधानी विभिन्न स्थानों पर सीसीटीवी प्राप्त करेगी, लेकिन दिल्लीवासियों को अभी भी इसके कार्यान्वयन के लिए इंतजार कर रहा है।<ref>{{Cite web |url=http://www.india.com/news/india/aap-turns-two-here-are-the-failures-and-achievements-of-delhi-govt-under-arvind-kejriwal-1837638/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=6 अक्तूबर 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171006212239/http://www.india.com/news/india/aap-turns-two-here-are-the-failures-and-achievements-of-delhi-govt-under-arvind-kejriwal-1837638/ |archive-date=6 अक्तूबर 2017 |url-status=dead }}</ref> === शराब घोटाले === अरविंद केजरीवाल की पार्टी के कई नेता इस समय कथित शराब घोटाले और अन्य आपराधिक आरोपों में जेल में हैं। यहां तक ​​कि खुद अरविद केजरीवाल भी पूछताछ के लिए प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होने को तैयार नहीं हैं === यमुना साफ़ === दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल यमुना और दिल्ली को साफ़ करने में विफल रहे, उन्होंने कहा, जब यमुना शहर में प्रवेश करती है तो उसमें मल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की स्वीकार्य सीमा होती है, जो नदी के शहर छोड़ने पर 6.5 लाख/100 मिलीलीटर से अधिक हो जाती है। == इन्हें भी देखें== * [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] * [[भ्रष्टाचार (आचरण)]] == सन्दर्भ == {{reflist|30em}} == बाहरी कड़ियाँ== *[https://web.archive.org/web/20130205064246/http://www.aamaadmiparty.org/ '''आम आदमी पार्टी (आप)''' का जालस्थल]<!-- *[https://docs.google.com/folder/d/0B29Q9fS9zb3jc2MtdmpKNlI2clk/edit?usp=sharing आम आदमी पार्टी का संविधान] (हिन्दी में)--> [[श्रेणी:भारत के राजनीतिक दल]] [[श्रेणी:२०१२ में स्थापित राजनीतिक दल]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी]] {{आम आदमी पार्टी}} b7rp79bqjl52a6lp2h0x5oi1bh1xc2n गजानन दिगंबर माडगूलकर 0 504088 6543800 6429811 2026-04-25T09:30:03Z Sequencesolved 173771 एक चित्र जोडा। 6543800 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Gajanan Digambar Madgulkar - Konkani Vishwakosh.png]] '''गजानन दिगंबर माडगूळकर''' (1 अक्टूबर 1919 – 14 दिसम्बर 1977) मराठी के प्रमुख कवि, गीतकार, लेखक तथा अभिनेता थे। महाराष्ट्र में वे अपने नाम के आद्यक्षरों 'गदिमा' से ही अधिक जाने जाते हैं। मराठी संस्कृति के लिए उनका योगदान मात्रा और गुणवत्ता दोनो दृष्टियों से बहुत अधिक है। == इन्हें भी देखें == * [[गीतरामायण]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20190317055455/http://www.gadima.com/ gadima.com] - the official website [[श्रेणी:मराठी कवि]] {{लेखक-आधार}} kxdjfnplhvbnjqhri17m422secz39ko 6543851 6543800 2026-04-25T11:40:26Z AMAN KUMAR 911487 चित्र को दायां ओर करें 6543851 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Gajanan_Digambar_Madgulkar_-_Konkani_Vishwakosh.png|दाएँ]] '''गजानन दिगंबर माडगूळकर''' (1 अक्टूबर 1919 – 14 दिसम्बर 1977) मराठी के प्रमुख कवि, गीतकार, लेखक तथा अभिनेता थे। महाराष्ट्र में वे अपने नाम के आद्यक्षरों 'गदिमा' से ही अधिक जाने जाते हैं। मराठी संस्कृति के लिए उनका योगदान मात्रा और गुणवत्ता दोनो दृष्टियों से बहुत अधिक है। == इन्हें भी देखें == * [[गीतरामायण]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20190317055455/http://www.gadima.com/ gadima.com] - the official website [[श्रेणी:मराठी कवि]] {{लेखक-आधार}} robirajglki4vmvk4t0amg194jkzqqe साँचा:Infobox historic site 10 520342 6543609 6476173 2026-04-24T12:52:55Z The Sorter 845290 6543609 wikitext text/x-wiki {{main other|{{#if:{{Has short description}} |<!--Do nothing--> |{{#invoke:Type in location|main|{{if empty|{{{type|}}}|Historic site}}|{{{location|}}}}}}}}}<includeonly>{{Infobox | child = {{#ifeq:{{{embed|}}}|yes|yes}} | bodyclass = vcard | above = {{If empty|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}}}} | abovestyle = font-size:125%; text-align:center | aboveclass = fn org | labelstyle = font-weight:bold |subheader = {{#if: {{{native_name|}}}<!-- -->| {{native name list |tag1 = {{{native_language|}}} |name1 = {{{native_name|}}} |tag2 = {{{native_language2|}}} |name2 = {{{native_name2|}}} |tag3 = {{{native_language3|}}} |name3 = {{{native_name3|}}} }} }} | subheader2 = {{if empty|{{{other_name|}}}|{{{alternate_name|}}}}} | image = {{#invoke:InfoboxImage|InfoboxImage|image={{{image|}}} |size={{#if:{{{image_size|}}}|{{min|{{if empty|{{#invoke:String|match|{{{image_size}}}|^%d+}}|250}}|300}}}} |upright={{#if:{{{image_upright|}}}|{{min|{{{image_upright}}}|1.35}}|1.14}} |alt={{{alt|}}}}} | caption = {{{caption|}}} | image2 = {{#invoke:InfoboxImage|InfoboxImage|image={{{image_map|}}} |size={{#if:{{{image_map_size|}}}|{{min|{{if empty|{{#invoke:String|match|{{{image_map_size}}}|^%d+}}|250}}|300}}}} |upright={{#if:{{{image_map_upright|}}}|{{min|{{{image_map_upright}}}|1.35}}|1.14}} |alt={{{image_map_alt|}}}}} | caption2 = {{{image_map_caption|}}} <!-- Row for map if no image is specified --> | image3 = {{#if:{{{image|}}}||{{#if:{{{locmapin|}}}|{{#if:{{{coordinates|}}}{{#property:P625}}|{{Location map|{{{locmapin|}}} | border = infobox | caption = {{#if:{{{map_caption|}}}|{{{map_caption}}}|{{#invoke:Location map|data|{{{locmapin|}}}|name}} में {{If empty|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}}}} की अवस्थिति}} | float = center | alt = {{{map_alt|}}} | relief = {{{map_relief|}}} | width = {{if empty|{{{map_width|}}}|235}} | coordinates = {{{coordinates|}}} | mark = {{if empty|{{{map_dot_mark|}}}|Red pog.svg}} | marksize = 7 | label = {{if empty|{{{pushpin_label|}}}|{{{map dot label|}}}|{{{map_dot_label|}}}}} }}}}}}}} | image4 = {{#invoke:Infobox mapframe | autoWithCaption | onByDefault = {{#if:{{{locmapin|}}}{{{image_map|}}}{{{embed|}}}|no|yes}} | mapframe-frame-width = 250 | mapframe-type = landmark | mapframe-marker-color = #919090 | mapframe-stroke-color = #525252 | mapframe-stroke-width = 3 | mapframe-shape-fill = #dbdbdb | mapframe-caption ={{If empty|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}}}} का संवादात्मक मानचित्र }} | label1 = प्रकार | data1 = {{{type|}}} | label2 = नामोत्पत्ति | data2 = {{{etymology|}}} | label3 = अवस्थिति | data3 = {{{location|}}} | label4 = निकटतम शहर | data4 = {{{nearest_city|}}} <!-- Coordinates --> | label5 = निर्देशांक | data5 = {{#if:{{{coordinates|}}}|{{#invoke:Coordinates|coordinsert|{{{coordinates}}}|type:landmark}}{{{coord_ref|}}}}} | label6 = [[आर्डिनेंस सर्वेक्षण राष्ट्रीय ग्रिड|OS ग्रिड संदर्भ]] | data6 = {{#if:{{{gbgridref|}}}|{{gbm4ibx|{{{gbgridref}}}|name={{if empty|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}}}} }}{{{gbgridref_note|}}}}} | label7 = क्षेत्रफल | data7 = {{{area|}}} | label8 = समुद्र तल से ऊँचाई | data8 = {{{elevation|}}} | label9 = ऊँचाई | data9 = {{{height|}}} | label10 = लंबाई | data10 = {{{length|}}} | label11 = {{{beginning_label|}}} | data11 = {{#if: {{{beginning_label|}}} | {{{beginning_date|}}} }} | label12 = गठन | data12 = {{{formed|}}} | label13 = स्थापना | data13 = {{{founded|}}} | label14 = संस्थापक | data14 = {{{founder|}}} | label15 = निर्माण | data15 = {{{built|}}} | label16 = निर्माता | data16 = {{{builder|}}} | label17 = निर्माण का कारण | data17 = {{{built_for|}}} | label18 = मूल प्रयोग | data18 = {{{original_use|}}} | label19 = ध्वस्त | data19 = {{{demolished|}}} | label20 = पुनर्निर्माण | data20 = {{{rebuilt|}}} | label21 = पुनर्स्थापना | data21 = {{{restored|}}} | label22 = पुनर्स्थापक | data22 = {{{restored_by|}}} | label23 = वर्तमान प्रयोग | data23 = {{{current_use|}}} | label24 = {{{end_label|}}} | data24 = {{#if: {{{end_label|}}} | {{{end_date|}}} }} | label25 = वास्तुकार | data25 = {{if empty|{{{architects|}}}|{{{architect|}}}}} | label26 = मूर्तिकार | data26 = {{{sculptor|}}} | label27 = वास्तुशैली | data27 = {{{architecture|}}} | label28 = आंगुतक | data28 = {{#if:{{{visitation_num|}}} |{{{visitation_num|}}}{{#if:{{{visitation_year|}}}|&nbsp;(in {{{visitation_year}}})}}{{{visitation_ref|}}} |{{{visitors_num|}}}{{#if:{{{visitors_year|}}}|&nbsp;(in {{{visitors_year}}})}}{{{visitors_ref|}}} }} | label29 = प्राधिकरण | data29 = {{{governing_body|}}} | label30 = स्वामी | data30 = {{if empty|{{{owner|}}}|{{{ownership|}}}}} | label31 = घटना का वर्ष | data31 = {{{year of event|}}} | label32 = महत्वपूर्ण घटना(एँ) | data32 = {{{events|}}} | label33 = वेबसाइट | data33 = {{{website|}}} <!-- Leave space for possible future expansion --> <!-- designation sections --> | data34 = {{Infobox designation list|embed=yes<!-- One--> | designation1 = {{{designation1|}}} | designation1_offname = {{{designation1_offname|}}} | designation1_type = {{{designation1_type|}}} | designation1_criteria = {{{designation1_criteria|}}} | designation1_date = {{{designation1_date|}}} | delisted1_date = {{{delisted1_date|}}} | designation1_partof = {{{designation1_partof|}}} | designation1_number = {{{designation1_number|}}} | designation1_free1name = {{{designation1_free1name|}}} | designation1_free1value = {{{designation1_free1value|}}} | designation1_free2name = {{{designation1_free2name|}}} | designation1_free2value = {{{designation1_free2value|}}} | designation1_free3name = {{{designation1_free3name|}}} | designation1_free3value = {{{designation1_free3value|}}}<!-- Two--> | designation2 = {{{designation2|}}} | designation2_offname = {{{designation2_offname|}}} | designation2_type = {{{designation2_type|}}} | designation2_criteria = {{{designation2_criteria|}}} | designation2_date = {{{designation2_date|}}} | delisted2_date = {{{delisted2_date|}}} | designation2_partof = {{{designation2_partof|}}} | designation2_number = {{{designation2_number|}}} | designation2_free1name = {{{designation2_free1name|}}} | designation2_free1value = {{{designation2_free1value|}}} | designation2_free2name = {{{designation2_free2name|}}} | designation2_free2value = {{{designation2_free2value|}}} | designation2_free3name = {{{designation2_free3name|}}} | designation2_free3value = {{{designation2_free3value|}}}<!-- Three--> | designation3 = {{{designation3|}}} | designation3_offname = {{{designation3_offname|}}} | designation3_type = {{{designation3_type|}}} | designation3_criteria = {{{designation3_criteria|}}} | designation3_date = {{{designation3_date|}}} | delisted3_date = {{{delisted3_date|}}} | designation3_partof = {{{designation3_partof|}}} | designation3_number = {{{designation3_number|}}} | designation3_free1name = {{{designation3_free1name|}}} | designation3_free1value = {{{designation3_free1value|}}} | designation3_free2name = {{{designation3_free2name|}}} | designation3_free2value = {{{designation3_free2value|}}} | designation3_free3name = {{{designation3_free3name|}}} | designation3_free3value = {{{designation3_free3value|}}}<!-- Four--> | designation4 = {{{designation4|}}} | designation4_offname = {{{designation4_offname|}}} | designation4_type = {{{designation4_type|}}} | designation4_criteria = {{{designation4_criteria|}}} | designation4_date = {{{designation4_date|}}} | delisted4_date = {{{delisted4_date|}}} | designation4_partof = {{{designation4_partof|}}} | designation4_number = {{{designation4_number|}}} | designation4_free1name = {{{designation4_free1name|}}} | designation4_free1value = {{{designation4_free1value|}}} | designation4_free2name = {{{designation4_free2name|}}} | designation4_free2value = {{{designation4_free2value|}}} | designation4_free3name = {{{designation4_free3name|}}} | designation4_free3value = {{{designation4_free3value|}}}<!-- Five--> | designation5 = {{{designation5|}}} | designation5_offname = {{{designation5_offname|}}} | designation5_type = {{{designation5_type|}}} | designation5_criteria = {{{designation5_criteria|}}} | designation5_date = {{{designation5_date|}}} | delisted5_date = {{{delisted5_date|}}} | designation5_partof = {{{designation5_partof|}}} | designation5_number = {{{designation5_number|}}} | designation5_free1name = {{{designation5_free1name|}}} | designation5_free1value = {{{designation5_free1value|}}} | designation5_free2name = {{{designation5_free2name|}}} | designation5_free2value = {{{designation5_free2value|}}} | designation5_free3name = {{{designation5_free3name|}}} | designation5_free3value = {{{designation5_free3value|}}}<!-- Six--> | designation6 = {{{designation6|}}} | designation6_offname = {{{designation6_offname|}}} | designation6_type = {{{designation6_type|}}} | designation6_criteria = {{{designation6_criteria|}}} | designation6_date = {{{designation6_date|}}} | delisted6_date = {{{delisted6_date|}}} | designation6_partof = {{{designation6_partof|}}} | designation6_number = {{{designation6_number|}}} | designation6_free1name = {{{designation6_free1name|}}} | designation6_free1value = {{{designation6_free1value|}}} | designation6_free2name = {{{designation6_free2name|}}} | designation6_free2value = {{{designation6_free2value|}}} | designation6_free3name = {{{designation6_free3name|}}} | designation6_free3value = {{{designation6_free3value|}}} }} <!-- Row for map if image is specified above --> | data41 = {{#if:{{{image|}}}|{{#if:{{both|{{{locmapin|}}}|{{{coordinates|}}}{{#property:P625}}}}|{{Location map|{{{locmapin|}}} | border = infobox | caption = {{#if:{{{map_caption|}}}|{{{map_caption}}}|{{#invoke:Location map|data|{{{locmapin|}}}|name}} में {{If empty|{{{name|}}}|{{PAGENAMEBASE}}}} की अवस्थिति}} | float = center | relief = {{{map_relief|}}} | width = {{if empty|{{{map_width|}}}|235}} | coordinates = {{{coordinates|}}} | mark = {{if empty|{{{map_dot_mark|}}}|Red pog.svg}} | marksize = 7 | label = {{if empty|{{{pushpin_label|}}}|{{{map dot label|}}}|{{{map_dot_label|}}}}} }}}}}} | data42 = {{{embedded|}}} }}</includeonly>{{#invoke:Check for unknown parameters|check|unknown={{main other|[[Category:Pages using infobox historic site with unknown parameters|_VALUE_{{PAGENAME}}]]}}|preview=Page using [[Template:Infobox historic site]] with unknown parameter "_VALUE_"|ignoreblank=y|mapframe_args=y| alt | alternate_name | architect | architects | architecture | area | beginning_date | beginning_label | builder | built | built_for | caption | coord_ref | coordinates | current_use | delisted1_date | delisted2_date | delisted3_date | delisted4_date | delisted5_date | delisted6_date | demolished | designation1 | designation1_criteria | designation1_date | designation1_number | designation1_offname | designation1_partof | designation1_type | designation2 | designation2_criteria | designation2_date | designation2_number | designation2_offname | designation2_partof | designation2_type | designation3 | designation3_criteria | designation3_date | designation3_number | designation3_offname | designation3_partof | designation3_type | designation4 | designation4_criteria | designation4_date | designation4_number | designation4_offname | designation4_partof | designation4_type | designation5 | designation5_criteria | designation5_date | designation5_number | designation5_offname | designation5_partof | designation5_type | designation6 | designation6_criteria | designation6_date | designation6_number | designation6_offname | designation6_partof | designation6_type | designation1_free1name | designation1_free1value | designation1_free2name | designation1_free2value | designation1_free3name | designation1_free3value | designation2_free1name | designation2_free1value | designation2_free2name | designation2_free2value | designation2_free3name | designation2_free3value | designation3_free1name | designation3_free1value | designation3_free2name | designation3_free2value | designation3_free3name | designation3_free3value | designation4_free1name | designation4_free1value | designation4_free2name | designation4_free2value | designation4_free3name | designation4_free3value | designation5_free1name | designation5_free1value | designation5_free2name | designation5_free2value | designation5_free3name | designation5_free3value | designation6_free1name | designation6_free1value | designation6_free2name | designation6_free2value | designation6_free3name | designation6_free3value | elevation | embed | embedded | end_date | end_label | etymology | events | formed | founded | founder | gbgridref | gbgridref_note | governing_body | height | image | image_map | image_map_alt | image_map_caption | image_map_size | image_map_upright | image_size | image_upright | length | location | locmapin | map dot label | map_alt | map_caption | map_dot_label | map_dot_mark | map_relief | map_width | name | native_language | native_language2 | native_language3 | native_name | native_name2 | native_name3 | nearest_city | original_use | other_name | owner | ownership | pushpin_label | rebuilt | restored | restored_by | sculptor | type | visitation_num | visitation_ref | visitation_year | visitors_num | visitors_ref | visitors_year | website | year of event }}<noinclude> {{documentation}} </noinclude> g5ga7umch6t7qm5751trjrf1mmfrnm7 यंत्र शिक्षण 0 552744 6543642 5969960 2026-04-24T15:06:44Z Pradeep lahre 773437 6543642 wikitext text/x-wiki {{WPCUP}} [[चित्र:The relationship and main types of artificial intelligence, machine learning and deep learning.webp|अंगूठाकार|आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग.वेब का संबंध और मुख्य प्रकार]] '''मशीन शिक्षण''' या '''यन्त्र अधिगम''' या '''स्वचालित शिक्षण''' [[कृत्रिम बुद्धि]] की एक उपखण्ड है। यह उन प्रणालियों के निर्माण और अध्ययन से संबंधित हैं जो आंकड़ों से सीख सकते हैं। उदाहरणतः, एक यंत्र अधिगम प्रणाली को [[ईमेल]] संदेशों में से [[स्पैम]] और गैर-स्पैम संदेशों का अन्तर पहचानने में प्रशिक्षण दिया जा सकता है। सीखने के पश्चात, यह नये ईमेल संदेशों का स्पैम और गैर-स्पैम फोल्डरों में वर्गीकरण करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यंत्र अधिगम, मूल रूप से प्रतिनिधित्व और सामान्यीकरण से संबंधित है। आंकड़ों के इंस्टैंस और वे फंक्शन जो इनपर मूल्यांकन किए जाते हैं, उनके प्रतिनिधित्व सभी यंत्र अधिगम प्रणालियों के अंश हैं। सामान्यीकरण वह विलक्षण है जिस्से प्रणालियाँ अप्रत्यक्ष आंकड़ों के इंस्टैंस पर भली भाँति निष्पादन करेंगीं। जिन परिस्थितियों के अंतर्गत यह प्रत्याभूति दिया जा सके, वह अभिकलनीय अधिगम सिद्धांत नामक [[क्षेत्रांश]] का एक मुख्य मुद्दा है। विभिन्न प्रकार के यंत्र अधिगम कार्य और उनके सफल उपयोग विद्यमान हैं। प्रकाशीय अक्रूर अभिज्ञान, जहाँ मुद्रित अक्षर स्वतः पहचाने जाते हैं, यंत्र अधिगम का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।<ref name="Wernick-Signal-Proc-July-2010">Wernick, Yang, Brankov, Yourganov and Strother, Machine Learning in Medical Imaging, ''[[IEEE Signal Processing Society|IEEE Signal Processing Magazine]]'', vol. 27, no. 4, July 2010, pp. 25-38</ref> == परिभाषा== सन् [[१९५९]] में, आर्थर सैम्यूएल ने यंत्र अधिगम को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया- "अध्ययन का वह क्षेत्र जो संगणक को बिना स्पष्टतया से क्रमानुदेशन किये सीखने की क्षमता देता है।"<ref name="arthur_samuel_machine_learning_def">{{cite book | title=Too Big to Ignore: The Business Case for Big Data | publisher=Wiley | author=Phil Simon | date=March 18, 2013 | pages=89 | isbn=978-1118638170 | url=http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | access-date=31 जनवरी 2014 | archive-url=https://web.archive.org/web/20131218060718/http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | archive-date=18 दिसंबर 2013 | url-status=dead }}</ref> टाॅम एम. मिट्चल ने एक अधिक औपचारिक, व्यापक रूप से उद्धृत परिभाषा दिया- "कहा जाता है कि एक संगणक प्रोग्राम किसी कार्य टी और निष्पादन के नाप पी के संबंध में, अनुभव ई से सीखता है, यदि पी द्वारा मापा टी के कार्यों में उसका निष्पादन अनुभव ई के साथ सूधारता है।"<ref>*Mitchell, T. (1997). ''Machine Learning'', McGraw Hill. ISBN 0-07-042807-7, p.2.</ref> यह परिभाषा प्रसिद्ध है क्योंकि यह संज्ञानात्मक शब्दों के बजाय, मूल रूप से परिचालन है। यह एेलन ट्यूरिंग के दस्तावेज़ "अभिकलन यंत्रसमूह और बुद्धि" का प्रस्ताव कि यह प्रश्न कि "क्या यंत्र सोच सकते हैं?" इस प्रश्न से प्रतिस्थापित हो कि "क्या यंत्र वो कर सकते हैं जो हम (सोचने वाले जीवों के रूप में) कर सकते हैं?" का अनुगमन करता है।<ref>{{Citation |chapterurl=http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |first=Stevan |last=Harnad |year=2008 |chapter=The Annotation Game: On Turing (1950) on Computing, Machinery, and Intelligence |editor1-last=Epstein |editor1-first=Robert |editor2-last=Peters |editor2-first=Grace |title=The Turing Test Sourcebook: Philosophical and Methodological Issues in the Quest for the Thinking Computer |location= |publisher=Kluwer |isbn= |access-date=31 जनवरी 2014 |archive-date=9 मार्च 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120309113922/http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |url-status=dead }}</ref> == सामान्यीकरण == अपने अनुभव से सामान्यीकरण करना, एक नौसिखिया का मुख्य उद्देश्य होता है।<ref>[[Christopher M. Bishop]] (2006) ''Pattern Recognition and Machine Learning'', Springer ISBN 0-387-31073-8.</ref><ref>[[Mehryar Mohri]], Afshin Rostamizadeh, Ameet Talwalkar (2012) ''Foundations of Machine Learning'', The MIT Press ISBN 9780262018258.</ref> इस संदर्भ में, एक सीखने वाले यंत्र की, सीखने वाले आंकड़ा समुच्चय के अनुभव के पश्चात, नये और नाचीज उदाहरण अथवा कार्य के निष्पादन करने को सामान्यीकरण कहते है। प्रशिक्षण के उदाहरण सामान्यतः किसी अज्ञात संभावना वितरण (जो घटने के स्थान का प्रतिनिधि माना जाता है) और सीखने वाले को इस स्थान के प्रतिवेश में एक सामान्य माॅडल बनाना पड़ता है जो उसको नवीन परिस्थितियों में पर्याप्त परिशुद्ध भविष्यवाणियाँ उत्पादन करने का सामर्थ्य दें। == मानव परस्पर क्रिया== कुछ यंत्र अधिगम प्रणालियाँ आंकड़ा विज्श्लेषण में मानव अंतर्ज्ञान की ज़रूरत को लुप्त करने का प्रयास करते हैं। दूसरी प्रणालियाँ मानव और यंत्र के बीच एक सहयोगी दृष्टिकोण अपनाते हैं। तथापि, मानव अंतर्ज्ञान को सम्पूर्णतया लुप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि प्रणाली के डिज़ाइनर को यह निर्दिष्ट करना ज़रूरी है कि आंकड़ों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा और आंकड़ों के लक्षण वर्णन की खोज के लिए क्या तंत्र उपयोग किए जाएँगे। == कलन विधि के प्रकार == यंत्र अधिगम कलन विधियों को उनके वांछित परिणाम अथवा यंत्र के प्रज्ञिक्षण के दौरान उप्लब्ध इनपुट के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है। * '''पर्यवेक्षित शिक्षण (सुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण किये हुए उदाहरणों पर प्रशिक्षित है, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट ज्ञात हो। * '''अनिरीक्षित शिक्षण (अनसुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण नहीं किये हुए उदाहरणों पर संचालन करते हैं, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट अज्ञात हो। * '''आधा निगरानी किया हुआ अधिगम''' वर्गीकरण किये हुए और नहीं किये हुए उदाहरणों को संघटित करके उपयुक्त फन्कशन अथवा वर्गीकर्त्ता उत्पन्न करता है। * '''पारगमन''' अथवा ''ट्रान्सडक्टिव अनुमान'', विशिष्ट और स्थायी (परीक्षण की) परिस्थितियों में, जाँच किए हुए, विशिष्ट (प्रशिक्षण की) परिस्थितियों से नए आउटपुट्स की भविष्यवाणी करने का प्रयास करता है। * '''सुदृढीकरण अधिगम''' का संबंध किसी पुरस्कार की धारणा से बुद्धिमान एजेंट्स का किसी परिवेश में आचरण करने से है। * '''अधिगम का सीखना''' पूर्व अनुभव के आधार पर स्वयं के अधिष्ठापन के पूर्वाग्रह सीखता है। * '''विकास संबंधी अधिगम''', यंत्रमानव का सविस्तार, स्वयं के सीखने की स्थितियों के अनुक्रम (जिनको पाठ्यचर्या भी कहा जाता है) उत्पन्न करता है। == सन्दर्भ == [https://parikchha.blogspot.com/2026/04/machine-learning-kya-hai-kaise-kaam-karta-hai-hindi.html उदाहरण से समझें]{{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:शिक्षा की पद्धतियां]] adl3jasicxm9mpwjcszk56ouhufcmxl 6543645 6543642 2026-04-24T15:14:35Z Pradeep lahre 773437 /* सन्दर्भ */ 6543645 wikitext text/x-wiki {{WPCUP}} [[चित्र:The relationship and main types of artificial intelligence, machine learning and deep learning.webp|अंगूठाकार|आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग.वेब का संबंध और मुख्य प्रकार]] '''मशीन शिक्षण''' या '''यन्त्र अधिगम''' या '''स्वचालित शिक्षण''' [[कृत्रिम बुद्धि]] की एक उपखण्ड है। यह उन प्रणालियों के निर्माण और अध्ययन से संबंधित हैं जो आंकड़ों से सीख सकते हैं। उदाहरणतः, एक यंत्र अधिगम प्रणाली को [[ईमेल]] संदेशों में से [[स्पैम]] और गैर-स्पैम संदेशों का अन्तर पहचानने में प्रशिक्षण दिया जा सकता है। सीखने के पश्चात, यह नये ईमेल संदेशों का स्पैम और गैर-स्पैम फोल्डरों में वर्गीकरण करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यंत्र अधिगम, मूल रूप से प्रतिनिधित्व और सामान्यीकरण से संबंधित है। आंकड़ों के इंस्टैंस और वे फंक्शन जो इनपर मूल्यांकन किए जाते हैं, उनके प्रतिनिधित्व सभी यंत्र अधिगम प्रणालियों के अंश हैं। सामान्यीकरण वह विलक्षण है जिस्से प्रणालियाँ अप्रत्यक्ष आंकड़ों के इंस्टैंस पर भली भाँति निष्पादन करेंगीं। जिन परिस्थितियों के अंतर्गत यह प्रत्याभूति दिया जा सके, वह अभिकलनीय अधिगम सिद्धांत नामक [[क्षेत्रांश]] का एक मुख्य मुद्दा है। विभिन्न प्रकार के यंत्र अधिगम कार्य और उनके सफल उपयोग विद्यमान हैं। प्रकाशीय अक्रूर अभिज्ञान, जहाँ मुद्रित अक्षर स्वतः पहचाने जाते हैं, यंत्र अधिगम का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।<ref name="Wernick-Signal-Proc-July-2010">Wernick, Yang, Brankov, Yourganov and Strother, Machine Learning in Medical Imaging, ''[[IEEE Signal Processing Society|IEEE Signal Processing Magazine]]'', vol. 27, no. 4, July 2010, pp. 25-38</ref> == परिभाषा== सन् [[१९५९]] में, आर्थर सैम्यूएल ने यंत्र अधिगम को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया- "अध्ययन का वह क्षेत्र जो संगणक को बिना स्पष्टतया से क्रमानुदेशन किये सीखने की क्षमता देता है।"<ref name="arthur_samuel_machine_learning_def">{{cite book | title=Too Big to Ignore: The Business Case for Big Data | publisher=Wiley | author=Phil Simon | date=March 18, 2013 | pages=89 | isbn=978-1118638170 | url=http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | access-date=31 जनवरी 2014 | archive-url=https://web.archive.org/web/20131218060718/http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | archive-date=18 दिसंबर 2013 | url-status=dead }}</ref> टाॅम एम. मिट्चल ने एक अधिक औपचारिक, व्यापक रूप से उद्धृत परिभाषा दिया- "कहा जाता है कि एक संगणक प्रोग्राम किसी कार्य टी और निष्पादन के नाप पी के संबंध में, अनुभव ई से सीखता है, यदि पी द्वारा मापा टी के कार्यों में उसका निष्पादन अनुभव ई के साथ सूधारता है।"<ref>*Mitchell, T. (1997). ''Machine Learning'', McGraw Hill. ISBN 0-07-042807-7, p.2.</ref> यह परिभाषा प्रसिद्ध है क्योंकि यह संज्ञानात्मक शब्दों के बजाय, मूल रूप से परिचालन है। यह एेलन ट्यूरिंग के दस्तावेज़ "अभिकलन यंत्रसमूह और बुद्धि" का प्रस्ताव कि यह प्रश्न कि "क्या यंत्र सोच सकते हैं?" इस प्रश्न से प्रतिस्थापित हो कि "क्या यंत्र वो कर सकते हैं जो हम (सोचने वाले जीवों के रूप में) कर सकते हैं?" का अनुगमन करता है।<ref>{{Citation |chapterurl=http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |first=Stevan |last=Harnad |year=2008 |chapter=The Annotation Game: On Turing (1950) on Computing, Machinery, and Intelligence |editor1-last=Epstein |editor1-first=Robert |editor2-last=Peters |editor2-first=Grace |title=The Turing Test Sourcebook: Philosophical and Methodological Issues in the Quest for the Thinking Computer |location= |publisher=Kluwer |isbn= |access-date=31 जनवरी 2014 |archive-date=9 मार्च 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120309113922/http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |url-status=dead }}</ref> == सामान्यीकरण == अपने अनुभव से सामान्यीकरण करना, एक नौसिखिया का मुख्य उद्देश्य होता है।<ref>[[Christopher M. Bishop]] (2006) ''Pattern Recognition and Machine Learning'', Springer ISBN 0-387-31073-8.</ref><ref>[[Mehryar Mohri]], Afshin Rostamizadeh, Ameet Talwalkar (2012) ''Foundations of Machine Learning'', The MIT Press ISBN 9780262018258.</ref> इस संदर्भ में, एक सीखने वाले यंत्र की, सीखने वाले आंकड़ा समुच्चय के अनुभव के पश्चात, नये और नाचीज उदाहरण अथवा कार्य के निष्पादन करने को सामान्यीकरण कहते है। प्रशिक्षण के उदाहरण सामान्यतः किसी अज्ञात संभावना वितरण (जो घटने के स्थान का प्रतिनिधि माना जाता है) और सीखने वाले को इस स्थान के प्रतिवेश में एक सामान्य माॅडल बनाना पड़ता है जो उसको नवीन परिस्थितियों में पर्याप्त परिशुद्ध भविष्यवाणियाँ उत्पादन करने का सामर्थ्य दें। == मानव परस्पर क्रिया== कुछ यंत्र अधिगम प्रणालियाँ आंकड़ा विज्श्लेषण में मानव अंतर्ज्ञान की ज़रूरत को लुप्त करने का प्रयास करते हैं। दूसरी प्रणालियाँ मानव और यंत्र के बीच एक सहयोगी दृष्टिकोण अपनाते हैं। तथापि, मानव अंतर्ज्ञान को सम्पूर्णतया लुप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि प्रणाली के डिज़ाइनर को यह निर्दिष्ट करना ज़रूरी है कि आंकड़ों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा और आंकड़ों के लक्षण वर्णन की खोज के लिए क्या तंत्र उपयोग किए जाएँगे। == कलन विधि के प्रकार == यंत्र अधिगम कलन विधियों को उनके वांछित परिणाम अथवा यंत्र के प्रज्ञिक्षण के दौरान उप्लब्ध इनपुट के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है। * '''पर्यवेक्षित शिक्षण (सुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण किये हुए उदाहरणों पर प्रशिक्षित है, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट ज्ञात हो। * '''अनिरीक्षित शिक्षण (अनसुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण नहीं किये हुए उदाहरणों पर संचालन करते हैं, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट अज्ञात हो। * '''आधा निगरानी किया हुआ अधिगम''' वर्गीकरण किये हुए और नहीं किये हुए उदाहरणों को संघटित करके उपयुक्त फन्कशन अथवा वर्गीकर्त्ता उत्पन्न करता है। * '''पारगमन''' अथवा ''ट्रान्सडक्टिव अनुमान'', विशिष्ट और स्थायी (परीक्षण की) परिस्थितियों में, जाँच किए हुए, विशिष्ट (प्रशिक्षण की) परिस्थितियों से नए आउटपुट्स की भविष्यवाणी करने का प्रयास करता है। * '''सुदृढीकरण अधिगम''' का संबंध किसी पुरस्कार की धारणा से बुद्धिमान एजेंट्स का किसी परिवेश में आचरण करने से है। * '''अधिगम का सीखना''' पूर्व अनुभव के आधार पर स्वयं के अधिष्ठापन के पूर्वाग्रह सीखता है। * '''विकास संबंधी अधिगम''', यंत्रमानव का सविस्तार, स्वयं के सीखने की स्थितियों के अनुक्रम (जिनको पाठ्यचर्या भी कहा जाता है) उत्पन्न करता है। == सन्दर्भ == [https://parikchha.blogspot.com/2026/04/machine-learning-kya-hai-kaise-kaam-karta-hai-hindi.html सीखना कैसे शुरू करें]{{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:शिक्षा की पद्धतियां]] b77ikv0p0xlwg1jwgs40wzb53e1osal 6543652 6543645 2026-04-24T15:34:51Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Irfanidotonline|Irfanidotonline]] ([[सदस्य वार्ता:Irfanidotonline|वार्ता]]) के अवतरण 5969960 पर पुनर्स्थापित : प्रचार हटाया 6543652 wikitext text/x-wiki {{WPCUP}} [[चित्र:The relationship and main types of artificial intelligence, machine learning and deep learning.webp|अंगूठाकार|आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग.वेब का संबंध और मुख्य प्रकार]] '''मशीन शिक्षण''' या '''यन्त्र अधिगम''' या '''स्वचालित शिक्षण''' [[कृत्रिम बुद्धि]] की एक उपखण्ड है। यह उन प्रणालियों के निर्माण और अध्ययन से संबंधित हैं जो आंकड़ों से सीख सकते हैं। उदाहरणतः, एक यंत्र अधिगम प्रणाली को [[ईमेल]] संदेशों में से [[स्पैम]] और गैर-स्पैम संदेशों का अन्तर पहचानने में प्रशिक्षण दिया जा सकता है। सीखने के पश्चात, यह नये ईमेल संदेशों का स्पैम और गैर-स्पैम फोल्डरों में वर्गीकरण करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यंत्र अधिगम, मूल रूप से प्रतिनिधित्व और सामान्यीकरण से संबंधित है। आंकड़ों के इंस्टैंस और वे फंक्शन जो इनपर मूल्यांकन किए जाते हैं, उनके प्रतिनिधित्व सभी यंत्र अधिगम प्रणालियों के अंश हैं। सामान्यीकरण वह विलक्षण है जिस्से प्रणालियाँ अप्रत्यक्ष आंकड़ों के इंस्टैंस पर भली भाँति निष्पादन करेंगीं। जिन परिस्थितियों के अंतर्गत यह प्रत्याभूति दिया जा सके, वह अभिकलनीय अधिगम सिद्धांत नामक [[क्षेत्रांश]] का एक मुख्य मुद्दा है। विभिन्न प्रकार के यंत्र अधिगम कार्य और उनके सफल उपयोग विद्यमान हैं। प्रकाशीय अक्रूर अभिज्ञान, जहाँ मुद्रित अक्षर स्वतः पहचाने जाते हैं, यंत्र अधिगम का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।<ref name="Wernick-Signal-Proc-July-2010">Wernick, Yang, Brankov, Yourganov and Strother, Machine Learning in Medical Imaging, ''[[IEEE Signal Processing Society|IEEE Signal Processing Magazine]]'', vol. 27, no. 4, July 2010, pp. 25-38</ref> == परिभाषा== सन् [[१९५९]] में, आर्थर सैम्यूएल ने यंत्र अधिगम को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया- "अध्ययन का वह क्षेत्र जो संगणक को बिना स्पष्टतया से क्रमानुदेशन किये सीखने की क्षमता देता है।"<ref name="arthur_samuel_machine_learning_def">{{cite book | title=Too Big to Ignore: The Business Case for Big Data | publisher=Wiley | author=Phil Simon | date=March 18, 2013 | pages=89 | isbn=978-1118638170 | url=http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | access-date=31 जनवरी 2014 | archive-url=https://web.archive.org/web/20131218060718/http://books.google.gr/books?id=Dn-Gdoh66sgC&pg=PA89#v=onepage&q&f=false | archive-date=18 दिसंबर 2013 | url-status=dead }}</ref> टाॅम एम. मिट्चल ने एक अधिक औपचारिक, व्यापक रूप से उद्धृत परिभाषा दिया- "कहा जाता है कि एक संगणक प्रोग्राम किसी कार्य टी और निष्पादन के नाप पी के संबंध में, अनुभव ई से सीखता है, यदि पी द्वारा मापा टी के कार्यों में उसका निष्पादन अनुभव ई के साथ सूधारता है।"<ref>* Mitchell, T. (1997). ''Machine Learning'', McGraw Hill. ISBN 0-07-042807-7, p.2.</ref> यह परिभाषा प्रसिद्ध है क्योंकि यह संज्ञानात्मक शब्दों के बजाय, मूल रूप से परिचालन है। यह एेलन ट्यूरिंग के दस्तावेज़ "अभिकलन यंत्रसमूह और बुद्धि" का प्रस्ताव कि यह प्रश्न कि "क्या यंत्र सोच सकते हैं?" इस प्रश्न से प्रतिस्थापित हो कि "क्या यंत्र वो कर सकते हैं जो हम (सोचने वाले जीवों के रूप में) कर सकते हैं?" का अनुगमन करता है।<ref>{{Citation |chapterurl=http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |first=Stevan |last=Harnad |year=2008 |chapter=The Annotation Game: On Turing (1950) on Computing, Machinery, and Intelligence |editor1-last=Epstein |editor1-first=Robert |editor2-last=Peters |editor2-first=Grace |title=The Turing Test Sourcebook: Philosophical and Methodological Issues in the Quest for the Thinking Computer |location= |publisher=Kluwer |isbn= |access-date=31 जनवरी 2014 |archive-date=9 मार्च 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120309113922/http://eprints.ecs.soton.ac.uk/12954/ |url-status=dead }}</ref> == सामान्यीकरण == अपने अनुभव से सामान्यीकरण करना, एक नौसिखिया का मुख्य उद्देश्य होता है।<ref>[[Christopher M. Bishop]] (2006) ''Pattern Recognition and Machine Learning'', Springer ISBN 0-387-31073-8.</ref><ref>[[Mehryar Mohri]], Afshin Rostamizadeh, Ameet Talwalkar (2012) ''Foundations of Machine Learning'', The MIT Press ISBN 9780262018258.</ref> इस संदर्भ में, एक सीखने वाले यंत्र की, सीखने वाले आंकड़ा समुच्चय के अनुभव के पश्चात, नये और नाचीज उदाहरण अथवा कार्य के निष्पादन करने को सामान्यीकरण कहते है। प्रशिक्षण के उदाहरण सामान्यतः किसी अज्ञात संभावना वितरण (जो घटने के स्थान का प्रतिनिधि माना जाता है) और सीखने वाले को इस स्थान के प्रतिवेश में एक सामान्य माॅडल बनाना पड़ता है जो उसको नवीन परिस्थितियों में पर्याप्त परिशुद्ध भविष्यवाणियाँ उत्पादन करने का सामर्थ्य दें। == मानव परस्पर क्रिया== कुछ यंत्र अधिगम प्रणालियाँ आंकड़ा विज्श्लेषण में मानव अंतर्ज्ञान की ज़रूरत को लुप्त करने का प्रयास करते हैं। दूसरी प्रणालियाँ मानव और यंत्र के बीच एक सहयोगी दृष्टिकोण अपनाते हैं। तथापि, मानव अंतर्ज्ञान को सम्पूर्णतया लुप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि प्रणाली के डिज़ाइनर को यह निर्दिष्ट करना ज़रूरी है कि आंकड़ों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा और आंकड़ों के लक्षण वर्णन की खोज के लिए क्या तंत्र उपयोग किए जाएँगे। == कलन विधि के प्रकार == यंत्र अधिगम कलन विधियों को उनके वांछित परिणाम अथवा यंत्र के प्रज्ञिक्षण के दौरान उप्लब्ध इनपुट के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है। * '''पर्यवेक्षित शिक्षण (सुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण किये हुए उदाहरणों पर प्रशिक्षित है, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट ज्ञात हो। * '''अनिरीक्षित शिक्षण (अनसुपरवाइज्ड लर्निंग)''' कलन विधियाँ वर्गीकरण नहीं किये हुए उदाहरणों पर संचालन करते हैं, अर्थात् इनपुट जहाँ वांछित आउटपुट अज्ञात हो। * '''आधा निगरानी किया हुआ अधिगम''' वर्गीकरण किये हुए और नहीं किये हुए उदाहरणों को संघटित करके उपयुक्त फन्कशन अथवा वर्गीकर्त्ता उत्पन्न करता है। * '''पारगमन''' अथवा ''ट्रान्सडक्टिव अनुमान'', विशिष्ट और स्थायी (परीक्षण की) परिस्थितियों में, जाँच किए हुए, विशिष्ट (प्रशिक्षण की) परिस्थितियों से नए आउटपुट्स की भविष्यवाणी करने का प्रयास करता है। * '''सुदृढीकरण अधिगम''' का संबंध किसी पुरस्कार की धारणा से बुद्धिमान एजेंट्स का किसी परिवेश में आचरण करने से है। * '''अधिगम का सीखना''' पूर्व अनुभव के आधार पर स्वयं के अधिष्ठापन के पूर्वाग्रह सीखता है। * '''विकास संबंधी अधिगम''', यंत्रमानव का सविस्तार, स्वयं के सीखने की स्थितियों के अनुक्रम (जिनको पाठ्यचर्या भी कहा जाता है) उत्पन्न करता है। == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:शिक्षा की पद्धतियां]] cryzocbdji2hvvr29m5r0r4ad49j8ps प्रयोगपृष्ठ 0 571162 6543611 2362623 2026-04-24T13:03:58Z चाहर धर्मेंद्र 703114 शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व1|शीह व1]]) 6543611 wikitext text/x-wiki {{db-nonsense|help=off}} #अनुप्रेषित [[अपस्मार]] t7d4hbqt3s7mpbjpubxp62w2jn191jv ज़िला ख़ुशाब 0 637341 6543766 4924463 2026-04-25T05:51:44Z Sequencesolved 173771 अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। 6543766 wikitext text/x-wiki {{Infobox settlement | name = ज़िला ख़ुशाब | native_name = {{Nastaliq|ضِلع خُوشاب}} | native_name_lang = | settlement_type = [[पाकिस्तान के ज़िले|ज़िला]] | image_skyline = | imagesize = | image_alt = | image_caption = | image_map = | mapsize = | map_alt = | map_caption = पाकिस्तानी पंजाब का नक्षा (सफ़ेद) जिस में ज़िला ख़ुशाब मरून रंग में दिखाया गया है (Maroon). | latd = |latm = |lats = |latNS = | longd = |longm = |longs = |longEW = | coordinates_type = o Mukaram | coordinates_display = inline,title | coordinates_region = PK | subdivision_type = Country | subdivision_name = [[पाकिस्तान]] | subdivision_type1 = [[पाकिस्तान में प्रशासनिक क्षेत्र|सूबा]] | subdivision_name1 = [[पंजाब (पाकिस्तान)|पंजाब]] | subdivision_type2 = | subdivision_name2 = | founder = | seat_type = [[केन्द्रस्थान]] | seat = [[जोहराबाद]] | government_footnotes = | leader_party = | unit_pref = Metric<!-- or US or UK --> | area_footnotes = | area_total_km2 = | population_as_of = | population_total = | population_density_km2 = | timezone1 = [[पाकिस्तान में समय|पाकिस्तान का समय]] | utc_offset1 = +5 | established_title = संस्थापन | established_date = जूलाई 01, 1982 <ref name = etym>{{cite web |url=http://khushab.dc.lhc.gov.pk/?page_id=1335 |title=District Courts Khushab |access-date=26 अप्रैल 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150622220709/http://khushab.dc.lhc.gov.pk/?page_id=1335 |archive-date=22 जून 2015 |url-status=dead }}, Retrieved 24 December 2013.</ref> | leader_title = डी सी औ | leader_name = आमिर इजाज़ अकबर | leader_title1 = | leader_name1 = | blank_name_sec1 = ज़िला कोंसल | blank_info_sec1 = | blank1_name_sec1 = तहसीलों की संख्या | blank1_info_sec1 = 3 | demographics1_title1 = मुख्य भाषाएं | demographics1_info1 = पंजाबी, [[उर्दू]] | website = http://khushab.gop.pk/ }} '''ज़िला ख़ुशाब''' [[पंजाब (पाकिस्तान)|पाकिस्तानी पंजाब]] का एक [[ज़िला]] है। इस की राजधानी [[जोहराबाद]] है। ज़िला का नाम ऐतिहासिक शहर ख़ुशब के नाम पर रखा गया है। == हवाले == {{reflist}} [[श्रेणी:पाकिस्तानी पंजाब के ज़िले]] ajofxt2vlb2k789x46ipgrrfcuimv3q वुल्फ़्सन चिकित्सा केन्द्र 0 685095 6543840 4921025 2026-04-25T11:14:15Z The Sorter 845290 6543840 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Edith Wolfson Medical Center P1030041.JPG|thumb|right|200px|वुल्फ़सन चिकित्सा केन्द्र]] '''वुल्फ़सन चिकित्सा केन्द्र''' ({{langx|he|מרכז רפואי וולפסון}}) [[इसराइल]] के [[होलोन]] में स्थित एक अस्पताल है। यह अस्पताल तेल अवीव जिले के दक्षिणी तेल अवीव महानगरीय क्षेत्र में स्थित है जिसके आसपास के क्षेत्रों में लगभग पाँच लाख निवासी रहते हैं। यह इज़राइल का नौवाँ सबसे बड़ा अस्पताल है।<ref>{{cite web|url=http://www.nrg.co.il/online/16/ART1/578/331.html|accessdate=14 सितम्बर 2007|author=Ayala Hurwicz|date=7 मई 2007|language=हिब्रू|title=''Sheba - Largest Hospital in Israel''|archive-url=https://web.archive.org/web/20160514215644/http://www.nrg.co.il/online/16/ART1/578/331.html|archive-date=14 मई 2016|url-status=dead}}</ref> वुल्फ़सन चिकित्सा केन्द्र की स्थापना वुल्फ़सन संस्थापन की सहायता से हुई थी और इसका नाम श्रीमती ऐडिथ स्पॅक्टरमैन वुल्फ़सन के नाम पर पड़ा था जो श्री आइज़ैक वुल्फ़सन की पत्नी थीं।<ref name="About">[http://www.wolfson.org.il/Index.asp?CategoryID=158&ArticleID=560 ''About The Edith Wolfson Medical Center''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110721145250/http://www.wolfson.org.il/Index.asp?CategoryID=158&ArticleID=560 |date=21 जुलाई 2011 }} {{अंग्रेज़ी}}</ref> ==इतिहास== होलोन का चिकित्सा केन्द्र आम जनता के लिए 1980 में दक्षिणी तेल अवीव-याफ़ा सीमा पर खोला गया था। तबसे लेकर अब तक इस अस्पताल में उपलब्ध बिस्तरों की संख्या 342 से बढ़कर 2007 में 650 हो चुकी है जिसके साथ अतिरिक्त 30 बिस्तर बाहरी रोगियों के लिए हैं।<ref name="About"/> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * [https://web.archive.org/web/20100822083042/http://www.wolfson.org.il/ आधिकारिक जालपृष्ठ] {{हिब्रू}} {{अरबी}} {{इज़राइल के अस्पताल}} {{इज़राइल आधार}} [[श्रेणी:इज़राइल के अस्पताल]] iny4codp1cwaejxhddduansztnr8tu8 शारे ज़ेडैक चिकित्सा केन्द्र 0 686181 6543837 4798534 2026-04-25T11:11:37Z The Sorter 845290 6543837 wikitext text/x-wiki '''शारे ज़ेडैक चिकित्सा केन्द्र''' ({{langx|he|מרכז רפואי שערי צדק}}) [[इसराइल]] के [[यरुशलम]] नगर का एक प्रमुख अस्पताल है। शारे ज़ेडैक का अर्थ [[इब्रानी भाषा|हिब्रू भाषा]] में "न्याय का द्वार" होता है। ==इतिहास== शारे ज़ेडैक यरुशलम के पश्चिमी भाग में खुलने वाला पहला बड़ा अस्पताल था और वर्तमान में यह सबसे तेज़ी से वृद्धि करता अस्पताल है और यरुशलम के नगर केन्द्र एकमात्र बड़ा चिकित्सा केन्द्र है। 1890 में आटोमन तुर्कों द्वारा अनुमति दिए जाने के पश्चात और यूरोपीय दानकर्ताओं से प्राप्त निधि से यह अस्पताल पुराने नगर से तीन किलोमीटर दूर जाफ़ा सड़क पर बनाया गया। इसका उद्घाटन समारोह 27 जनवरी 1902 को किया गया था। डॉ मोशे वॉलिक 1947 तक इस अस्पताल के निदेशक थे। श्वैस्टर सॅल्मा ने इस अस्पताल में निवास किया था और परित्यक्त बच्चों की देखभाल की थी। बेइत वेगन में निर्मित भवन को 1980 में खोला गया था। दिसम्बर 2012 में, शारे ज़ेडैक अस्पताल ने [[बिकुर होलिम अस्पताल]] के परिचालन पर नियन्त्र ग्रहण कर लिया और उसकी बहुत सी गतिविधियों का विलय कर दिया।<ref>[http://www.szmc.org.il/About/2012Statistics/tabid/1448/Default.aspx ''2012 statistics''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20151222233249/http://www.szmc.org.il/About/2012Statistics/tabid/1448/Default.aspx |date=22 दिसंबर 2015 }} {{अंग्रेज़ी}}</ref> इस अस्पताल के तीस अस्पताल-भीतर विभागों में और सत्तर अस्पताल-बाहर की इकाइयों में प्रतिवर्ष 6,00,000 रोगियों का उपचार किया जाता है और यह अस्पताल एक अग्रणी शोध और शैक्षणिक संस्थान के रूप में एक सक्रिय अकादमिक सेवाएँ भी प्रदान करता है। शारे ज़ेडैक को एक सार्वजनिक/निजी अस्पताल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो एक अलाभकारी संस्था के रूप में कार्य करता है और धन-सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए दानकर्ताओं पर निर्भर है, और जो वृहद्तर यरुशलम-क्षेत्र के निवासियों को उन्नत चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने को कटिबद्ध है। ==सुविधाएँ== शारे ज़ेडैक चिकित्सा केन्द्र दो प्रमुख परिसरों के आर-पार फैला हुआ है। मुख्य परिसर 11.5 एकड़ (47,000 वर्ग मीटर) के क्षेत्र में फैला हुआ है जो दक्षिण में बेइत वेगन और उत्तर में रमात हाकेरम क्षेत्रों के मध्य में स्थित है। डाउनटाउन परिसर जिसे पहले बिकुर चोलिम अस्पताल के नाम से जाना जाता था, यरुशलम के मध्य-भाग में वाणिज्यिक क्षेत्र में स्थित है। इस अस्पताल में 1,000 विस्तर हैं और यहाँ प्रतिवर्ष अस्पताल-भीतर और अस्पताल-बाहर की इकाइयों में छह लाख रोगियों का उपचार किया जाता है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * [https://web.archive.org/web/20151208054900/http://www.szmc.org.il/ आधिकारिक जालपृष्ठ] {{हिब्रू}} {{अंग्रेज़ी}} {{रूसी}} {{अरबी}} {{इज़राइल के अस्पताल}} {{इज़राइल आधार}} [[श्रेणी:इज़राइल के अस्पताल]] ku25x4vibycg6k8fvr62nayqs8fklbx 6543839 6543837 2026-04-25T11:12:42Z The Sorter 845290 6543839 wikitext text/x-wiki '''शारे त्सेदेक चिकित्सा केन्द्र''' ({{langx|he|מרכז רפואי שערי צדק}}) [[इसराइल]] के [[यरुशलम]] नगर का एक प्रमुख अस्पताल है। शारे त्सेदेक का अर्थ [[इब्रानी भाषा]] में "न्याय का द्वार" होता है। ==इतिहास== शारे त्सेदेक यरुशलम के पश्चिमी भाग में खुलने वाला पहला बड़ा अस्पताल था और वर्तमान में यह सबसे तेज़ी से वृद्धि करता अस्पताल है और यरुशलम के नगर केन्द्र एकमात्र बड़ा चिकित्सा केन्द्र है। 1890 में आटोमन तुर्कों द्वारा अनुमति दिए जाने के पश्चात और यूरोपीय दानकर्ताओं से प्राप्त निधि से यह अस्पताल पुराने नगर से तीन किलोमीटर दूर याफ़ा सड़क पर बनाया गया। इसका उद्घाटन समारोह 27 जनवरी 1902 को किया गया था। डॉ मोशे वॉलिक 1947 तक इस अस्पताल के निदेशक थे। श्वैस्टर सॅल्मा ने इस अस्पताल में निवास किया था और परित्यक्त बच्चों की देखभाल की थी। बेइत वेगन में निर्मित भवन को 1980 में खोला गया था। दिसम्बर 2012 में, शारे त्सेदेक अस्पताल ने [[बिकुर होलिम अस्पताल]] के परिचालन पर नियन्त्र ग्रहण कर लिया और उसकी बहुत सी गतिविधियों का विलय कर दिया।<ref>[http://www.szmc.org.il/About/2012Statistics/tabid/1448/Default.aspx ''2012 statistics''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20151222233249/http://www.szmc.org.il/About/2012Statistics/tabid/1448/Default.aspx |date=22 दिसंबर 2015 }} {{अंग्रेज़ी}}</ref> इस अस्पताल के तीस अस्पताल-भीतर विभागों में और सत्तर अस्पताल-बाहर की इकाइयों में प्रतिवर्ष 6,00,000 रोगियों का उपचार किया जाता है और यह अस्पताल एक अग्रणी शोध और शैक्षणिक संस्थान के रूप में एक सक्रिय अकादमिक सेवाएँ भी प्रदान करता है। शारे त्सेदेक को एक सार्वजनिक/निजी अस्पताल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो एक अलाभकारी संस्था के रूप में कार्य करता है और धन-सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए दानकर्ताओं पर निर्भर है, और जो वृहद्तर यरुशलम-क्षेत्र के निवासियों को उन्नत चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने को कटिबद्ध है। ==सुविधाएँ== शारे त्सेदेक चिकित्सा केन्द्र दो प्रमुख परिसरों के आर-पार फैला हुआ है। मुख्य परिसर 11.5 एकड़ (47,000 वर्ग मीटर) के क्षेत्र में फैला हुआ है जो दक्षिण में बेइत वेगन और उत्तर में रमात हाकेरम क्षेत्रों के मध्य में स्थित है। डाउनटाउन परिसर जिसे पहले बिकुर चोलिम अस्पताल के नाम से जाना जाता था, यरुशलम के मध्य-भाग में वाणिज्यिक क्षेत्र में स्थित है। इस अस्पताल में 1,000 विस्तर हैं और यहाँ प्रतिवर्ष अस्पताल-भीतर और अस्पताल-बाहर की इकाइयों में छह लाख रोगियों का उपचार किया जाता है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * [https://web.archive.org/web/20151208054900/http://www.szmc.org.il/ आधिकारिक जालपृष्ठ] {{हिब्रू}} {{अंग्रेज़ी}} {{रूसी}} {{अरबी}} {{इज़राइल के अस्पताल}} {{इज़राइल आधार}} [[श्रेणी:इज़राइल के अस्पताल]] 9fd899crzdm0jwbos6p97sm6dutvb6b शनिवार वाड़ा 0 687502 6543608 6198776 2026-04-24T12:37:43Z The Sorter 845290 6543608 wikitext text/x-wiki {{Infobox historic site|name=शनिवार वाड़ा|image=Front view of Shaniwar Wada illuminated.jpg|image_size=|caption=तिरंगे के रंगों में प्रकाशित शनिवार वाड़ा|location={{flagicon|IND}} [[पुणे]], [[महाराष्ट्र]], [[भारत]]|built={{start date and age|1732|01|22|df=y}}|architect=|architecture=[[मराठा साम्राज्य|मराठा]] वास्तुकला|owner=*{{flag|मराठा साम्राज्य}} (1732–1818) *{{flagicon image|Flag of the British East India Company (1801).svg}} [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] (1818–1858) *{{flagdeco|ब्रिटिश भारत}} [[ब्रिटिश भारत]] (1858–1947) *{{flagdeco|India}} [[भारतीय अधिराज्य|भारत अधिराज्य]] (1947–1950) *{{flagdeco|India}} [[भारत गणराज्य]] (1950–वर्तमान)|locmapin=|map_caption=|native_name=शनिवार वाडा|native_language=mr}} '''शनिवार वाड़ा''' ({{Langx|mr|शनिवार वाडा}}) [[भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[पुणे]] शहर में स्थित एक [[दुर्ग]] है, जिनका निर्माण 1732 में किया गया था।<ref name="gajrani2">{{Cite book|title=History, Religion and Culture of India|last=Gajrani|first=S.|year=2004|isbn=978-81-8205-062-4|volume=III|page=255}}</ref> 1818 तक यह [[मराठा]] [[पेशवा|पेशवाओं]] की गद्दी थी। दुर्ग ज़्यादातर एक अस्पष्ट आग से 1828 में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएँ अब एक पर्यटक स्थल के रूप में बनाए रखे है। == इतिहास == शनिवारवाड़ा किला राजस्थान के एक ठेकेदार द्वारा बनाया गया था जिसे '[[कुमावत]] क्षत्रिय' के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि इसे कई प्रसिद्ध कारीगरों द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है, जिनमें शिवराम कृष्ण कुमावत , देवजी कुमावत, कोंडाजी सुतार, मोरारजी पत्थरवत(कुमावत), भोजराजा (जयपुर के एक जड़ाउ-कार्य विशेषज्ञ) और राघो कुमावत (एक चित्रकार) शामिल हैं। किले का निर्माण पूरा करने के बाद पेशवा ने इन लोगों को 'नाइक' की उपाधि दी<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=dnn2AwAAQBAJ&newbks=0&hl=en|title=Haunted India|last=Sinha|first=Chandan|date=2014-07-07|publisher=Chandan Kumar Sinha|pages=24|language=en}}</ref><ref name="gajrani">{{Cite book |last= Gajrani |first=S. |title=History, Religion and Culture of India |volume=III |year=2004 |page=255 |isbn=978-81-8205-062-4}}</ref> [[मराठा साम्राज्य]] में [[पेशवा]] [[बाजीराव]] जो कि [[शाहु|छत्रपति शाहु]] के प्रधान (पेशवा) थे। इन्होंने ने ही '''शनिवार वाड़ा''' का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का [[मराठी भाषा|मराठी]] में मतलब '''शनिवार''' (शनिवार/Saturday) तथा '''वाड़ा''' का मतलब टीक होता है। शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवरी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाड़ा की नींव करके वास्तु शांति की गई। १७३२ के बाद भी बाड़े में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते-होते १७६० ये वर्ष आया। १८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडे पर ब्रिटिशों के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाड़े में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवार बाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था। पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुती की मूर्ती बिहार गई। ==निर्माण== <gallery mode=packed> File:Pune ShaniwarWada DelhiGate.jpg|शनिवार वाड़ा के प्रवेशद्वार के सामने पर्यटक File:Shaniwar Wada palace Delhi Gate.JPG|शनिवार वाड़ा दिल्ली गेट File:Shaniwar Wada palace Narayan's Gate.JPG|नारायण प्रवेशद्वार File:Shaniwar Wada palace walls and below.JPG|शनिवार वाड़ा महल की दीवारें File:Shaniwar Wada palace fountain.JPG|शनिवार वाड़ा महल File:ShaniwarWada Hall.JPG|दिल्ली दरवाज़ा File:ShaniwaarWada 4.JPG|शनिवार वाड़ा का उद्यान </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:पुणे]] [[श्रेणी:पुणे की इमारतें]] [[श्रेणी:दुर्ग]] [[श्रेणी:मराठा साम्राज्य]] {{आधार}} j1iydnqm8sqn5dl2m7xdfvimsywtvna 6543610 6543608 2026-04-24T13:00:31Z The Sorter 845290 /* निर्माण */ 6543610 wikitext text/x-wiki {{Infobox historic site|name=शनिवार वाड़ा|image=Front view of Shaniwar Wada illuminated.jpg|image_size=|caption=तिरंगे के रंगों में प्रकाशित शनिवार वाड़ा|location={{flagicon|IND}} [[पुणे]], [[महाराष्ट्र]], [[भारत]]|built={{start date and age|1732|01|22|df=y}}|architect=|architecture=[[मराठा साम्राज्य|मराठा]] वास्तुकला|owner=*{{flag|मराठा साम्राज्य}} (1732–1818) *{{flagicon image|Flag of the British East India Company (1801).svg}} [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] (1818–1858) *{{flagdeco|ब्रिटिश भारत}} [[ब्रिटिश भारत]] (1858–1947) *{{flagdeco|India}} [[भारतीय अधिराज्य|भारत अधिराज्य]] (1947–1950) *{{flagdeco|India}} [[भारत गणराज्य]] (1950–वर्तमान)|locmapin=|map_caption=|native_name=शनिवार वाडा|native_language=mr}} '''शनिवार वाड़ा''' ({{Langx|mr|शनिवार वाडा}}) [[भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[पुणे]] शहर में स्थित एक [[दुर्ग]] है, जिनका निर्माण 1732 में किया गया था।<ref name="gajrani2">{{Cite book|title=History, Religion and Culture of India|last=Gajrani|first=S.|year=2004|isbn=978-81-8205-062-4|volume=III|page=255}}</ref> 1818 तक यह [[मराठा]] [[पेशवा|पेशवाओं]] की गद्दी थी। दुर्ग ज़्यादातर एक अस्पष्ट आग से 1828 में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएँ अब एक पर्यटक स्थल के रूप में बनाए रखे है। == इतिहास == शनिवारवाड़ा किला राजस्थान के एक ठेकेदार द्वारा बनाया गया था जिसे '[[कुमावत]] क्षत्रिय' के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि इसे कई प्रसिद्ध कारीगरों द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है, जिनमें शिवराम कृष्ण कुमावत , देवजी कुमावत, कोंडाजी सुतार, मोरारजी पत्थरवत(कुमावत), भोजराजा (जयपुर के एक जड़ाउ-कार्य विशेषज्ञ) और राघो कुमावत (एक चित्रकार) शामिल हैं। किले का निर्माण पूरा करने के बाद पेशवा ने इन लोगों को 'नाइक' की उपाधि दी<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=dnn2AwAAQBAJ&newbks=0&hl=en|title=Haunted India|last=Sinha|first=Chandan|date=2014-07-07|publisher=Chandan Kumar Sinha|pages=24|language=en}}</ref><ref name="gajrani">{{Cite book |last= Gajrani |first=S. |title=History, Religion and Culture of India |volume=III |year=2004 |page=255 |isbn=978-81-8205-062-4}}</ref> [[मराठा साम्राज्य]] में [[पेशवा]] [[बाजीराव]] जो कि [[शाहु|छत्रपति शाहु]] के प्रधान (पेशवा) थे। इन्होंने ने ही '''शनिवार वाड़ा''' का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का [[मराठी भाषा|मराठी]] में मतलब '''शनिवार''' (शनिवार/Saturday) तथा '''वाड़ा''' का मतलब टीक होता है। शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवरी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाड़ा की नींव करके वास्तु शांति की गई। १७३२ के बाद भी बाड़े में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते-होते १७६० ये वर्ष आया। १८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडे पर ब्रिटिशों के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाड़े में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवार बाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था। पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुती की मूर्ती बिहार गई। ==गैलरी== <gallery mode="packed" heights="134"> File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|सूर्यास्त के समय शनिवार वाड़ा File:View_of_garden.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:View_of_garden.jpg|शनिवार वाड़ा के अंदर File:Shaniwarwada(Pune).jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwarwada(Pune).jpg|[[बाजीराव प्रथम]] की प्रतिमा File:स्वातंत्र्यदिनाच्या_अमृत_महौत्सवानिमित्त_सजविलेला_पुणे_येथील_शनिवारवाडा.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87_%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%A5%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BE.jpg|[[स्वतंत्रता दिवस (भारत)|स्वतंत्रता दिवस]] के त्यौहार के समय File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|जल भंडार File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|नुकीला प्रवेशद्वार File:Shanivarwada_front.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shanivarwada_front.jpg|प्रवेश का ऊपरी दृश्य </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:पुणे]] [[श्रेणी:पुणे की इमारतें]] [[श्रेणी:दुर्ग]] [[श्रेणी:मराठा साम्राज्य]] {{आधार}} q80swbrne40bpiaw6duhkxyt23lip1u 6543793 6543610 2026-04-25T08:55:10Z The Sorter 845290 6543793 wikitext text/x-wiki {{Infobox historic site|name=शनिवार वाड़ा|image=Front view of Shaniwar Wada illuminated.jpg|image_size=|caption=तिरंगे के रंगों में प्रकाशित शनिवार वाड़ा|location={{flagicon|IND}} [[पुणे]], [[महाराष्ट्र]], [[भारत]]|built={{start date and age|1732|01|22|df=y}}|architect=|architecture=[[मराठा साम्राज्य|मराठा]] वास्तुकला|owner=*{{flag|मराठा साम्राज्य}} (1732–1818) *{{flagicon image|Flag of the British East India Company (1801).svg}} [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] (1818–1858) *{{flagdeco|ब्रिटिश भारत}} [[ब्रिटिश भारत]] (1858–1947) *{{flagdeco|India}} [[भारतीय अधिराज्य|भारत अधिराज्य]] (1947–1950) *{{flagdeco|India}} [[भारत गणराज्य]] (1950–वर्तमान)|locmapin=|map_caption=|native_name=शनिवार वाडा|native_language=mr}} '''शनिवार वाड़ा''' ({{Langx|mr|शनिवार वाडा}}) [[भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[पुणे]] शहर में स्थित एक [[दुर्ग]] है, जिनका निर्माण 1732 में किया गया था।<ref name="gajrani2">{{Cite book|title=History, Religion and Culture of India|last=Gajrani|first=S.|year=2004|isbn=978-81-8205-062-4|volume=III|page=255}}</ref> 1818 तक यह [[मराठा]] [[पेशवा|पेशवाओं]] की गद्दी थी। दुर्ग ज़्यादातर एक अस्पष्ट आग से 1828 में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएँ अब एक पर्यटक स्थल के रूप में बनाए रखे है। == इतिहास == शनिवारवाड़ा किला राजस्थान के एक ठेकेदार द्वारा बनाया गया था जिसे '[[कुमावत]] क्षत्रिय' के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि इसे कई प्रसिद्ध कारीगरों द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है, जिनमें शिवराम कृष्ण कुमावत , देवजी कुमावत, कोंडाजी सुतार, मोरारजी पत्थरवत(कुमावत), भोजराजा (जयपुर के एक जड़ाउ-कार्य विशेषज्ञ) और राघो कुमावत (एक चित्रकार) शामिल हैं। किले का निर्माण पूरा करने के बाद पेशवा ने इन लोगों को 'नाइक' की उपाधि दी<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=dnn2AwAAQBAJ&newbks=0&hl=en|title=Haunted India|last=Sinha|first=Chandan|date=2014-07-07|publisher=Chandan Kumar Sinha|pages=24|language=en}}</ref><ref name="gajrani">{{Cite book |last= Gajrani |first=S. |title=History, Religion and Culture of India |volume=III |year=2004 |page=255 |isbn=978-81-8205-062-4}}</ref> [[मराठा साम्राज्य]] में [[पेशवा]] [[बाजीराव]] जो कि [[शाहु|छत्रपति शाहु]] के प्रधान (पेशवा) थे। इन्होंने ने ही '''शनिवार वाड़ा''' का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का [[मराठी भाषा|मराठी]] में मतलब '''शनिवार''' (शनिवार/Saturday) तथा '''वाड़ा''' का मतलब टीक होता है। शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवरी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाड़ा की नींव करके वास्तु शांति की गई। १७३२ के बाद भी बाड़े में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते-होते १७६० ये वर्ष आया। १८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडे पर ब्रिटिशों के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाड़े में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवार बाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था। पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुती की मूर्ती बिहार गई। ==गैलरी== <gallery mode="packed" heights="134"> File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|सूर्यास्त के समय शनिवार वाड़ा File:View_of_garden.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:View_of_garden.jpg|शनिवार वाड़ा के अंदर File:Shaniwarwada(Pune).jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwarwada(Pune).jpg|[[बाजीराव प्रथम]] की प्रतिमा File:स्वातंत्र्यदिनाच्या_अमृत_महौत्सवानिमित्त_सजविलेला_पुणे_येथील_शनिवारवाडा.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87_%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%A5%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BE.jpg|[[स्वतंत्रता दिवस (भारत)|स्वतंत्रता दिवस]] के त्यौहार के समय File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|जल भंडार File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|नुकीला प्रवेशद्वार File:Shanivarwada_front.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shanivarwada_front.jpg|प्रवेश का ऊपरी दृश्य </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{आधार}} [[श्रेणी:पुणे में पर्यटक आकर्षण]] [[श्रेणी:पुणे में इमारतें और संरचनाएँ]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में राष्ट्रीय महत्तव के स्मारक]] [[श्रेणी:पुणे ज़िले में दुर्ग]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में महल]] [[श्रेणी:भारत में शाही निवास]] 7rozu7w23z3pocnne1kmdgsgdadjxrf 6543794 6543793 2026-04-25T08:56:02Z The Sorter 845290 /* गैलरी */ 6543794 wikitext text/x-wiki {{Infobox historic site|name=शनिवार वाड़ा|image=Front view of Shaniwar Wada illuminated.jpg|image_size=|caption=तिरंगे के रंगों में प्रकाशित शनिवार वाड़ा|location={{flagicon|IND}} [[पुणे]], [[महाराष्ट्र]], [[भारत]]|built={{start date and age|1732|01|22|df=y}}|architect=|architecture=[[मराठा साम्राज्य|मराठा]] वास्तुकला|owner=*{{flag|मराठा साम्राज्य}} (1732–1818) *{{flagicon image|Flag of the British East India Company (1801).svg}} [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] (1818–1858) *{{flagdeco|ब्रिटिश भारत}} [[ब्रिटिश भारत]] (1858–1947) *{{flagdeco|India}} [[भारतीय अधिराज्य|भारत अधिराज्य]] (1947–1950) *{{flagdeco|India}} [[भारत गणराज्य]] (1950–वर्तमान)|locmapin=|map_caption=|native_name=शनिवार वाडा|native_language=mr}} '''शनिवार वाड़ा''' ({{Langx|mr|शनिवार वाडा}}) [[भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[पुणे]] शहर में स्थित एक [[दुर्ग]] है, जिनका निर्माण 1732 में किया गया था।<ref name="gajrani2">{{Cite book|title=History, Religion and Culture of India|last=Gajrani|first=S.|year=2004|isbn=978-81-8205-062-4|volume=III|page=255}}</ref> 1818 तक यह [[मराठा]] [[पेशवा|पेशवाओं]] की गद्दी थी। दुर्ग ज़्यादातर एक अस्पष्ट आग से 1828 में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएँ अब एक पर्यटक स्थल के रूप में बनाए रखे है। == इतिहास == शनिवारवाड़ा किला राजस्थान के एक ठेकेदार द्वारा बनाया गया था जिसे '[[कुमावत]] क्षत्रिय' के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि इसे कई प्रसिद्ध कारीगरों द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है, जिनमें शिवराम कृष्ण कुमावत , देवजी कुमावत, कोंडाजी सुतार, मोरारजी पत्थरवत(कुमावत), भोजराजा (जयपुर के एक जड़ाउ-कार्य विशेषज्ञ) और राघो कुमावत (एक चित्रकार) शामिल हैं। किले का निर्माण पूरा करने के बाद पेशवा ने इन लोगों को 'नाइक' की उपाधि दी<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=dnn2AwAAQBAJ&newbks=0&hl=en|title=Haunted India|last=Sinha|first=Chandan|date=2014-07-07|publisher=Chandan Kumar Sinha|pages=24|language=en}}</ref><ref name="gajrani">{{Cite book |last= Gajrani |first=S. |title=History, Religion and Culture of India |volume=III |year=2004 |page=255 |isbn=978-81-8205-062-4}}</ref> [[मराठा साम्राज्य]] में [[पेशवा]] [[बाजीराव]] जो कि [[शाहु|छत्रपति शाहु]] के प्रधान (पेशवा) थे। इन्होंने ने ही '''शनिवार वाड़ा''' का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का [[मराठी भाषा|मराठी]] में मतलब '''शनिवार''' (शनिवार/Saturday) तथा '''वाड़ा''' का मतलब टीक होता है। शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवरी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाड़ा की नींव करके वास्तु शांति की गई। १७३२ के बाद भी बाड़े में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते-होते १७६० ये वर्ष आया। १८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडे पर ब्रिटिशों के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाड़े में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवार बाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था। पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुती की मूर्ती बिहार गई। ==गैलरी== <gallery mode="packed" heights="134"> File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_during_sunset.jpg|सूर्यास्त के समय शनिवार वाड़ा File:View_of_garden.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:View_of_garden.jpg|शनिवार वाड़ा के अंदर बाग़ File:Shaniwarwada(Pune).jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwarwada(Pune).jpg|[[बाजीराव प्रथम]] की प्रतिमा File:स्वातंत्र्यदिनाच्या_अमृत_महौत्सवानिमित्त_सजविलेला_पुणे_येथील_शनिवारवाडा.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87_%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%A5%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BE.jpg|[[स्वतंत्रता दिवस (भारत)|स्वतंत्रता दिवस]] के त्यौहार के समय File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shaniwar_Wada_Top_View_of_Water_Storage_Space.jpg|जल भंडार File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Pointed_gates_of_shanivar_wada.jpg|नुकीला प्रवेशद्वार File:Shanivarwada_front.jpg|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Shanivarwada_front.jpg|प्रवेश का ऊपरी दृश्य </gallery> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{आधार}} [[श्रेणी:पुणे में पर्यटक आकर्षण]] [[श्रेणी:पुणे में इमारतें और संरचनाएँ]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में राष्ट्रीय महत्तव के स्मारक]] [[श्रेणी:पुणे ज़िले में दुर्ग]] [[श्रेणी:महाराष्ट्र में महल]] [[श्रेणी:भारत में शाही निवास]] e77j91jb0xzp0yk7yrignnq7aycnrx1 धनरी कलां 0 724947 6543612 6031225 2026-04-24T13:09:54Z ~2026-25186-83 921682 ✔️ 6543612 wikitext text/x-wiki धनरी कलां एक गांव है जो [[राजस्थान]] राज्य के [[जोधपुर]] ज़िले तथा [[बावड़ी तहसील]] में स्थित है। २०११ की राष्ट्रीय [[जनगणना]] के अनुसार ४८२९ है। <ref>http://www.census2011.co.in/data/village/84688-dhanari-kalan-rajasthan.html</ref> धनारी कला एक बहुत ही सुंदर गांव है इस गांव में हिंदू और मुसलमान आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं और एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं l इस गांव के अंदर एक एचसी हॉस्पिटल है और एक राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थित है l इस गांव के लोगों की आजीविका का साधन ज्यादातर कृषि है l इस गांव के लोग बहुत ही मिलनसार और अच्छे व्यक्तित्व के धनी है l यह गांव लगभग क्राइम मुक्त गांव है l कलम इब्राहिम सैय्यद धनारी {{टिप्पणीसूची}} {{ओसियां तहसील के गांव}} [[श्रेणी:ओसियां तहसील के गाँव]] [[श्रेणी:जोधपुर ज़िले के गाँव]] [[श्रेणी:राजस्थान के गाँव]] 7pldhpso18x7axmbwea2cp9gvvlmjts 6543646 6543612 2026-04-24T15:24:38Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/~2026-25186-83|~2026-25186-83]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-25186-83|वार्ता]]) द्वारा अच्छी नीयत से किये गये बदलाव प्रत्यावर्तित किये गये: पूर्ववत किया 6543646 wikitext text/x-wiki धनरी कलां एक गांव है जो [[राजस्थान]] राज्य के [[जोधपुर]] ज़िले तथा [[ओसियां तहसील]] में स्थित है। २०११ की राष्ट्रीय [[जनगणना]] के अनुसार ४८२९ है। <ref>http://www.census2011.co.in/data/village/84688-dhanari-kalan-rajasthan.html</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{ओसियां तहसील के गांव}} [[श्रेणी:ओसियां तहसील के गाँव]] [[श्रेणी:जोधपुर ज़िले के गाँव]] [[श्रेणी:राजस्थान के गाँव]] mwlr0s3d624h54f84rz9wv8stbwbr2s पुत्ताण्डु 0 817057 6543734 6543479 2026-04-25T03:36:09Z QuestForTrueTruth 852879 चिथिरैकानी के बारे में जानकारी दी गई है। 6543734 wikitext text/x-wiki {{Infobox Holiday |holiday_name = पुत्ताण्डु<br>तमिल नव वर्ष |image = A colorful Puthandu welcome to Sinhala and Tamil New Year in Sri Lanka.jpg |caption = पुत्ताण्डु के लिए तमिल नव वर्ष की सजावट |observedby = तमिल लोग|[[भारत]], श्रीलंका, मॉरीशस, सिंगापुर में तमिल हिन्दू<ref name="Melton2011p633"/> |date = तमिल कालदर्शक के चित्तेराय मास का पहला दिन |celebrations = दावत देना, उपहार भेजना, दूसरों के घरों और मंदिरों में जाना |longtype = धार्मिक, सामाजिक |type = हिन्दू |significance = तमिल नव वर्ष |date2017 = शुक्रवार, 14 अप्रैल |relatedto = वैसाखी, विशु (केरल), थिङ्यान|म्यांमार का नव वर्ष, कम्बोडिया का नववर्ष, सोङ्क्रान (लाओ)|लाओ का नव वर्ष, विशु|मलयाली नववर्ष, पन संक्रान्ति|ओड़िया नव वर्ष, सिंहली नव वर्ष|श्री लंका का नव वर्ष, सोङ्करन (थाईलैण्ड)|थाई नव वर्ष }} '''पुत्ताण्डु''' (तमिल: புத்தாண்டு) [[तमिल]] कालगणना में वर्ष के प्रथम दिन का नाम है। इसे '''वरुटप्पिऱप्पु''' भी कहा जाता है, यह तमिल मास चित्तिरै का प्रथम दिवस है। यह प्रतिवर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर के 14 अप्रैल या उसके आस-पास ही पड़ता है। <ref name="Melton2011p633"/> इस दिन को [[भारत]] के विभिन्न भागों में वर्ष के आरम्भिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसके नाम अलग अलग होते हैं। केरल में इस दिन को 'विशु' तथा मध्य भारत एवं उत्तर भारत में [[वैसाखी]] कहते है। <ref name="Melton2011p633"/> इस दिन, तमिल लोग "पुट्टू वतुत्काका" कहकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं जो हिंदी के "नया वर्ष शुभ हो" के तुल्य है। <ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide|url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331125215/https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> इस दिन ज्यादातर लोग अपने परिवार के साथ समय बिताते हैं एवं लोग अपने घर-द्वार की साफ सफाई करते हैं। एक थाली भी सजाते हैं जिसमे [[फल]]ों, [[पुष्प|फूलों]] और अन्य शुभ वस्तुएं राखी जाती हैं। पुत्ताण्डु तमिलनाडु और [[पुत्तुचेरी]] के बाहर रहने वाले तमिल हिंदुओं के द्वारा भी मनाया जाता है, जैसे श्रीलंका, [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], रीयूनियन, [[मॉरिशस|मॉरीशस]] और अन्य देशों में भी जहाँ तमिल लोग प्रवासी के तौर पर रहते हैं। <ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations|url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170331123838/https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|archive-date=31 मार्च 2017|url-status=live}}</ref> इस दिन, तमिल लोग एक-दूसरे को "पुत्ताण्टु वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta| புத்தாண்டு வாழ்த்துகள்}}) या "इऩिय पुत्ताण्टु नल्वाऴ्त्तुकळ्" ({{lang|ta|இனிய புத்தாண்டு நல்வாழ்த்துகள்}}) कहकर अभिवादन करते हैं, जिसका अर्थ "नव वर्ष की शुभकामनाएं" के समान है।<ref>{{cite book|author=William D. Crump|title=Encyclopedia of New Year's Holidays Worldwide |url=https://books.google.com/books?id=cDTfCwAAQBAJ&pg=PA220 |year=2014|publisher=McFarland|isbn=978-0-7864-9545-0|page=220}}</ref> यह दिन पारिवारिक समय के रूप में मनाया जाता है। घरों में लोग घर की सफाई करते हैं, फलों, फूलों और शुभ वस्तुओं के साथ एक थाली तैयार करते हैं, परिवार के [[Puja (Hinduism)|पूजा]] वेदी को प्रज्वलित करते हैं और अपने स्थानीय मंदिरों में जाते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं और बच्चे बड़ों के पास जाकर उनका सम्मान करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, फिर परिवार एक साथ बैठकर शाकाहारी भोजन करता है। पुत्ताण्डु [[तमिल लोग]] द्वारा [[तमिलनाडु]] और [[पुदुचेरी]] में, तथा [[श्रीलंका]], [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], [[मॉरीशस]] और [[रियूनियन]] में मनाया जाता है। तमिल प्रवासी समुदाय<ref name="Melton2011p633">{{cite book|author=J. Gordon Melton|title=Religious Celebrations: An Encyclopedia of Holidays, Festivals, Solemn Observances, and Spiritual Commemorations |url=https://books.google.com/books?id=lD_2J7W_2hQC&pg=PA633|year=2011|publisher=ABC-CLIO|isbn=978-1-59884-206-7|page=633}}</ref><ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ |year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref> इसे [[म्यांमार]], [[दक्षिण अफ्रीका]], [[यूनाइटेड किंगडम]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]], [[कनाडा]] और [[ऑस्ट्रेलिया]] जैसे देशों में भी मनाता है। ==उद्गभव और महत्व== [[File:A food treats arrangement for Puthandu (Vaisakhi) Tamil New Year.jpg|thumb|left|पुत्ताण्डु के लिए पारंपरिक उत्सव व्यंजनों की सजावट।]] तमिल नव वर्ष वसंत विषुव के बाद होता है एवं आम तौर पर ग्रेगोरी कैलेंडर के 14 अप्रैल को होता है। <ref name="Melton2011p633"/> यह दिन पारंपरिक तौर पर तमिल कैलेंडर के पहले दिन के तौर पर मनाया जाता है और तमिलनाडु और श्रीलंका दोनों जगहों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। इसी दिन [[असम]], पश्चिम बंगाल, केरल, [[मणिपुर]], त्रिपुरा, [[बिहार]], ओडिशा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, [[राजस्थान]] में कई हिंदुओं और साथ ही नेपाल में हिंदुओं द्वारा पारंपरिक नए साल के रूप में मनाया जाता है। बांग्लादेश। श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड के कई बौद्ध समुदाय एवं श्रीलंका का सिंहली समुदाय भी इस दिन को अपने नए साल के रूप में उसी दिन भी मनाता हैं,<ref name=reevesp113>{{cite book|author=Peter Reeves|title=The Encyclopedia of the Sri Lankan Diaspora|url=https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|year=2014|publisher=Editions Didier Millet|isbn=978-981-4260-83-1|page=113|access-date=28 जून 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20160520031624/https://books.google.com/books?id=4N5UAgAAQBAJ|archive-date=20 मई 2016|url-status=live}}, Quote: "The key festivals celebrated by Sri Lankan Tamils in Canada include Thai Pongal (harvest festival) in January, Puthuvarusham (Tamil/Hindu New Year) in April, and Deepavali (Festival of Lights) in October/November."</ref> प्रारंभिक तमिल साहित्य में अप्रैल नववर्ष के कई संदर्भ मिलते हैं। नक्कीरर, [[संगम काल]] के लेखक और ''[[नेडुनलवाडई]]'' के रचयिता, ने लिखा कि सूर्य मेष/चित्रई से होकर राशि चक्र के 11 क्रमिक चिन्हों से गुजरता है।<ref>JV Chelliah: Pattupattu: Ten Tamil Idylls. Tamil Verses with English Translation. Thanjavur: Tamil University, 1985 – Lines 160 to 162 of the Neṭunalvāṭai</ref><ref>Kamil Zvelabil dates the Neṭunalvāṭai to between the 2nd and 4th century CE – Kamil Zvelebil: The Smile of Murugan on Tamil Literature of South India. E.J. Brill, Leiden, Netherlands, 1973 – page 41-42</ref> कूडलूर किऴार [[पुऱनानूरु]] में मेष राशि/चित्तिरै को वर्ष के प्रारंभ के रूप में संदर्भित करते हैं।<ref>Poem 229 of Puṟanāṉūṟu</ref><ref>Professor Vaiyapuri Pillai: 'History of Tamil Language and Literature' Chennai, 1956, pages 35, 151</ref><ref>George L. Hart and Hank Heifetz: The Four Hundred Songs of War and Wisdom: An Anthology of Poems from Classical Tamil: The Purananuru, Columbia University Press, New York, 1999 – Poem 229 in pages 142 to 143. – "At midnight crowded with darkness in the first quarter of the night when the constellation of Fire was linked with The Goat and from the moment the First Constellation arose...during the first half of the month of Pankuni, when the Constellation of the Far North was descending...". George Hart in turn dates the Purananuru to between the first and third centuries CE. See page xv – xvii</ref>टोल्काप्पियम तमिल की सबसे प्राचीन उपलब्ध व्याकरण है जो वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित करती है, जहाँ चित्तिरै इलवेनिल ऋतु या ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत को चिह्नित करता है।<ref>V. Murugan, G. John Samuel: Tolkāppiyam in English: Translation, with the Tamil text, Transliteration in the Roman Script, Introduction, Glossary, and Illustrations, Institute of Asian Studies, Madras, India, 2001</ref> सिलप्पदिकारम् में 12 राशियों (या राशि चिन्हों) का उल्लेख है, जो मेष/चित्तिरै से शुरू होती हैं।<ref>Canto 26 of Silappadikaaram. Canto 5 also describes the foremost festival in the Chola country – the Indra Vilha celebrated in Chitterai</ref>[[मणिमेकलाई]] आज जिस प्रकार हम जानते हैं, उस हिंदू सौर कैलेंडर का संकेत करती है। आदियार्कुनल्लार, एक प्रारंभिक मध्यकालीन टीकाकार या उरै-आसिरियार, तमिल कैलेंडर के बारह महीनों का उल्लेख करते हैं, विशेष रूप से चित्तिरै के संदर्भ में। बाद में पगन, बर्मा में 11वीं शताब्दी ईस्वी के अभिलेखीय संदर्भ और सुखोथाई, थाईलैंड में 14वीं शताब्दी ईस्वी के संदर्भ मिलते हैं, जो दक्षिण भारतीय, प्रायः वैष्णव, दरबारियों से संबंधित हैं, जिन्हें मध्य अप्रैल से प्रारंभ होने वाले पारंपरिक कैलेंडर को परिभाषित करने का कार्य सौंपा गया था।<ref>G.H. Luce, Old Burma – Early Pagan, Locust Valley, New York, Page 68, and A.B. Griswold, 'Towards a History of Sukhodaya Art, Bangkok 1967, pages 12–32</ref> ==समारोह== तमिल लोग पुत्ताण्डु को पारंपरिक हिंदू नया साल के रूप में मनाते हैं, जिसे पुथुरूषम भी कहा जाता है,। यह तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना चित्राई का महीना है और पुत्ताण्डु आमतौर पर 14 अप्रैल को ही पड़ता है। दक्षिणी [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, त्योहार को चित्तारीय विशु कहा जाता है। घर के प्रवेश द्वार पर इस दिन सभी लोग बहुत ही आकर्षक [[रंगोली]] बनाकर नए वर्ष का स्वागत करते है। तमिल लोग पुत्ताण्डु, जिसे पुथुवरुषम भी कहा जाता है, को पारंपरिक "तमिल/नव वर्ष" के रूप में मनाते हैं, ऐसा पीटर रीव्स कहते हैं।<ref name=reevesp113/> यह चित्तिरै का महीना है, जो तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना है, और पुत्ताण्डु सामान्यतः 14 अप्रैल को पड़ता है। दक्षिणी [[तमिलनाडु]] के कुछ हिस्सों में, इस त्योहार को चित्तिरै [[विषु]] कहा जाता है। पुत्ताण्डु की पूर्व संध्या पर, एक थाली में तीन फल (आम, केला और कटहल), पान के पत्ते और सुपारी, सोने/चांदी के आभूषण, सिक्के/पैसा, फूल और एक दर्पण सजाया जाता है। यह केरल में विषु नव वर्ष त्योहार की औपचारिक थाली के समान है। तमिल परंपरा के अनुसार, यह उत्सव की थाली नव वर्ष के दिन जागने पर पहली दृष्टि के रूप में शुभ मानी जाती है। घर के प्रवेश द्वारों को रंगीन चावल के पाउडर से विस्तृत रूप से सजाया जाता है। इन डिज़ाइनों को [[कोलम]] कहा जाता है।<ref name=mercer22/> === मंदिरों में चित्तिरै तिरुविझा === मंदिरों के शहर [[मदुरै]] में, चित्तिरै तिरुविझा का उत्सव [[मीनाक्षी मंदिर]] में मनाया जाता है। एक विशाल प्रदर्शनी आयोजित की जाती है, जिसे चित्तिरै पोरुट्काच्ची कहा जाता है।<ref name="Dalal2010p406" />तमिल नववर्ष के दिन, [[रथ उत्सव]] का आयोजन तिरुविदैमरतूर में, जो [[कुंभकोणम]] के पास स्थित है, किया जाता है। [[तिरुचिरापल्ली]], [[कांचीपुरम]] और अन्य स्थानों पर भी उत्सव मनाए जाते हैं।<ref name="Dalal2010p406" /> === कोंगु नाडु में चिथिरैकानी === ''चिथिरैकानी'', जिसे ''विषुकानी'' के नाम से भी जाना जाता है, पुत्ताण्डु उत्सवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है [[कोंगु नाडु]] क्षेत्र में, जो [[केरल]] और [[तुलु नाडु]] में विषु उत्सवों के साथ समानताएँ साझा करते हैं। [[File:Chithiraikani-kongunadu-newyear.png|thumb|एक कोंगु नाडु संस्कृति की चिथिरई कणी थाली जिसमें शुभ फलों, पान के पत्तों, चावल, सोने या चांदी के आभूषण, सिक्के, धन और फूलों की व्यवस्था होती है, जिसे दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जो समृद्धि का प्रतीक है।|210x210px]] यह ''चितिरैकानी'' प्रथा एक विशेष थाली की व्यवस्था करने से संबंधित है जिसमें शुभ वस्तुएँ रखी जाती हैं और जिसे एक दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है। [[कोंगु तमिल]] और [[मलयालम]] में "कानी" शब्द का अर्थ है "वह जो सबसे पहले देखा जाता है," और दोनों उत्सवों में शुभ वस्तुओं से सजी एक विशेष थाली को दर्पण के सामने प्रदर्शित किया जाता है। पारंपरिक मान्यता यह है कि नववर्ष के दिन सबसे पहले आनंददायक और शुभ वस्तुओं को देखने से समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होता है। चिथिरैकानी या विशुक्कानी की थाली में आमतौर पर तीन फल (आम, केला और कटहल), पान के पत्ते, चावल, नींबू, खीरा, नारियल (कटा हुआ), सुपारी, सोने या चांदी के आभूषण, सिक्के या पैसा, फूल, और एक दर्पण शामिल होते हैं, साथ ही अन्य वस्तुएँ भी होती हैं जो धन और समृद्धि का प्रतीक होती हैं। यह व्यवस्था केरल में मनाए जाने वाले विषु उत्सव के समान होती है। केरल के कुछ हिस्सों में, विशुक्कानी की थाली में अरनमुला कन्नड़ी (वालकन्नड़ी), सुनहरे रंग के कोन्ना फूल (कैसिया फिस्टुला) जो विषु के मौसम में खिलते हैं, सोने या चांदी के आभूषण, सिक्के या पैसा, फूल, और एक दर्पण भी शामिल होते हैं। दर्पण इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति स्वयं को उस समृद्धि का एक हिस्सा देखे, जिसे वह पणी के रूप में देखता है।<ref>{{Cite web |title=TAMIL NEW YEAR greetings with Importance of the Festival |url=http://www.indiaherald.com/Spirituality/Read/303020/TAMIL-NEW-YEAR-greetings-with-Importance-of-the-Festival |access-date=2023-04-13 |website=indiaherald.com |language=en}}</ref><ref>{{Cite web |last=Dhurga |date=2023-04-13 |title=தமிழ் புத்தாண்டு அன்று காலையில் கண் விழித்ததும் முதலில் இவற்றை எல்லாம் பார்த்து விடுவதோடு, இந்த இரண்டு பொருளையும் மறக்காமல் வாங்கி விட்டால் இந்த ஆண்டில் நீங்கள் சீரும் சிறப்புமாக வாழ்வது உறுதி. |url=https://dheivegam.com/thamizh-puththandu-vazhipadu/ |access-date=2023-04-13 |website=Dheivegam |language=ta}}</ref><ref>{{Cite web |title=Vishu Kani Preparation: വിഷുക്കണി എങ്ങനെ ഒരുക്കാം |url=https://malayalam.samayam.com/spirituality/what-is-vishu-kani-and-how-to-prepare-vishu-kani-at-home-details-in-malayalam/articleshow/68721430.cms |access-date=2023-04-15 |website=Samayam Malayalam |language=ml}}</ref> ==विवाद== जब २००८ में जब द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (द्रमुक) की तमिलनाडु में सरकार थी तब उन्होंने घोषित किया था कि तमिल नए साल को तमिल थाई महीने के पहले दिन ((14 जनवरी) [[पोंगल]] के फसल त्योहार के साथ मनाया जाएगा। 29 जनवरी 2008 को डीएमके विधानसभा सदस्यों और तमिलनाडु सरकार द्वारा तमिलनाडु नया साल (घोषणा बिल 2008) राज्य कानून के रूप में अधिनियमित किया गया था। <ref>{{cite web |url=http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |title=Bill on new Tamil New Year Day is passed unanimously |publisher=Tn.gov.in |accessdate=18 October 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20111028094334/http://www.tn.gov.in/tnassembly/Governors_address_Jan2008_2.htm |archive-date=28 अक्तूबर 2011 |url-status=live }}</ref> डीएमके की बहुमत वाली सरकार का यह कानून बाद में 23 अगस्त 2011 को एआईएडीएमके की बहुमत वाली सरकार ने तमिलनाडु विधानसभा में एक अलग कानून बनाकर रद्द कर दिया गया। हालाकि तमिलनाडु के कई लोगों ने DMK सरकार के कानून को नजरअंदाज कर दिया था जो त्योहार की तारीख को बदलने से सम्बंधित था, और अप्रैल के मध्य में ही अपने पारंपरिक पुत्ताण्डु नए साल के त्यौहार को मनाते रहे। ==संबंधित त्यौहार== पुत्ताण्डु का त्यौहार अन्य जगहों पर मनाया जाता है लेकिन इनके नाम अलग है जो हैं: #[[केरल]] में [[विषु|विशु]] #[[आन्ध्र प्रदेश|आंध्र प्रदेश]] एवं तेलंगाना में उगाडी #मध्य और [[उत्तर भारत|उत्तरी भारत]] में वैसाखी #[[ओडिशा]] में [[विष्णु]] संक्रांति #[[असम]] में रोंगली बीहु == इन्हें भी देखें == *[[तमिल]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:त्योहार]] [[श्रेणी:तमिल]] 38f49hqfmusn8sm6rrkhcdei820hx4a आर्मेनियाई खण्ड 0 863274 6543842 6214963 2026-04-25T11:16:04Z The Sorter 845290 6543842 wikitext text/x-wiki [[File:Jerusalem Armenian Quarter map.png|thumb|आर्मीनियाई खण्ड का मानचित्र]] '''आर्मीनियाई खण्ड''' या आर्मीनियाई क्वार्टर ([[अरबी भाषा|अरबी]]: हरात अल-अरमान, [[इब्रानी भाषा|हिब्रू]]: הרובע הארמני, हा-रोवा हा-अर्मेनियाई; अर्मेनियाई: Հայոց թաղ, हयात ट'घ) पुराने यरुशलम शहर का चौथा खण्ड है जो दक्षिण-पश्चिमी कोने में स्थित है,इस खण्ड में [[ज़ियोन द्वार]] और [[याफ़ा द्वार]] के माध्यम से पहुंचा जा सकता है यह 0.126 किमी² क्षेत्र का है, जो पुराने शहर का कुल 14% भाग है। 2007 में, इसकी आबादी 2,424 थी (6.55% पुराने शहर की कुल आबादी का भाग) दोनों मापदंडों में, यह [[यहूदी खण्ड|यहूदी क्वार्टर]] के बराबर है आर्मीनियाई क्वार्टर को यहूदी क्वार्टर से डेविड स्ट्रीट (सुक एल-बाज़ार) और हबाबाद स्ट्रीट (सुक एल-हुसुर) द्वारा ईसाई क्वार्टर से अलग किया गया है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{पुराना यरुशलम}} [[श्रेणी:यरुशलम]] iq9t22rr6uof2dukh18jme6th7s40zz गुहिल राजवंश 0 946182 6543733 6514268 2026-04-25T03:30:34Z ~2026-25151-19 921740 Utkrn shilalekh 6543733 wikitext text/x-wiki {{में विलय|मेवाड़ के गुहिल|date=जनवरी 2023}} गुहिल/गहलौत राजवंश एक प्रमुख [[राजवंश]] था जो [[भारतीय उपमहाद्वीप]] के [[राजस्थान]] क्षेत्र में [[मेवाड़|मेवाड़]] शहर में शासन करता था | इसका प्रारंभिक संंस्थापक [[राजा गुहादित्य]] थेे, जिन्होंने छटी शताब्दी में गुहिल वंंश की नींव रखी। गुुुहादित्य के पश्चात् '''734 ई'. में [[बप्पा रावल]] को गुहिल वंश का वास्तविक संंस्थापक माना जाता है। शुरुआत में गुहिल राजवंश [[गुर्जर-प्रतिहार राजवंश|प्रतिहार]] साम्राज्य के सामंतों का रूप निभाया करते थे लेकिन रावल अल्लट के द्वारा [[गुर्जर|प्रतिहार]] सम्राट देवपाल के वध के बाद वह स्वतन्त्र बन गए | दसवीं शताब्दी में गुहिल रावल [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट राजवंशज]] के अधीन हुआ करते थे तथा ग्यारहवीं शताब्दी में [[परमार वंश|परमार]] और [[चौहान वंश|चौहान]] साम्राज्यों के अधीन शासन करते थे | बारहवीं शताब्दी में गुहिल राजवंश दो हिस्सों में विभाजित होगया जिनमें से मुख्या राजवंश मेवाड़ पर वर्ष 1303 तक शासन करता रहा जब मुसलमान आक्रमणकारी [[अलाउद्दीन खिलजी]] ने [[चित्तौड़गढ़|चित्तौड़]] पर घेरा डालकर गुहिलों को पराजित करा था |[[File:Map rajasthan mewar.png|thumb|मेवाड़]] == प्राचीन इतिहास == {{मुख्य|शिवि}} मेवाड़ का प्राचीन नाम [[शिवि]] था जिसकी राजधानी [[मध्यमिका]] (जिसे वर्तमान में नगरी कहते हैं) थी यहां पर [[मेहर]] जनजाति का अधिकार था और वह हमेशा [[मलेच्छों]] से संघर्ष करते रहे इसलिए इस क्षेत्र को मैद अर्थात मलेच्छों को मारने वाला की संज्ञा दी गई है । '''[[मैदपाट]] को धीरे धीरे मेवाड़ कहा जाने लगा । मेवाड़ की राजधानी [[उदयपुर]] बनी ।''' मेवाड़ के राजा स्वयं को [[राम]] के वंशज बताते हैं, इसी कारण भक्तों एवं चरणों ने मेवाड़ के शासकों को [[रघुवंशी]] तथा '''हिंदुआ सूरज''' कहने लगे गुहिल राज्य के चिन्ह में जो '''दृढ़ राखे धर्म को ताहि राखे करतार''' अंकित है । मेवाड़ का गुहिल वंश राजस्थान का ही नहीं अपितु संसार के प्राचीनतम राजवंशों में से एक है जीसने 1500 वर्षों से अधिक के लंबे समय तक एक प्रदेश पर शासन किया । 11वीं Shatabdi mein ka Sangharsh Rajasthan ke anek sthanon per shilalekhon mein milta Hai jismein Jodhpur ke anganbadi Kshetra mein Gohil vansh dwara Jo ladai Muslim aakrantaon Se ki gai uski Shaurya ka tha ke pathar per likhe hue utkr shilalekh Aaj bhi maujud Hai == मेवाड़ की शासक वंशावली (ल. 566 – 1949 ईस्वी) == {{इन्हें भी देखें|मेवाड़ की शासक वंशावली}} छठी शताब्दी में, तीन अलग-अलग गुहिल राजवंशों ने वर्तमान [[राजस्थान]] में शासन करने के लिए जाना जाता है: # [[नागदा]]-[[अहार]] के गुहिल # किष्किंधा के गुहिल (वर्तमान में [[कल्याणपुर, राजस्थान|कल्याणपुर]]) # धवागर्ता के गुहिल (वर्तमान में धोर) === गुहिल/गहलौत राजवंश (ल. 566 – 1303 ईस्वी) === {{मुख्य|गुहिल राजवंश}} *[[गुहादित्य]] / गोहिल (565–580 ) *भोज (I) (580–602) *महेन्द्र (I) (602–616) *नागादित्य (616–646) *शिलादित्य (646–661) *अपराजित (661–697) *महेन्द्र (II) (697–728) *[[बप्पा रावल|कालभोज बप्पा रावल]] (728/734–753)बापा रावल ने मुस्लिम देशों को भी जीता । <ref>{{cite book |last1=Ganguli |first1=Kalyan Kumar |title=Cultural History of Rajasthan |date=1983 |publisher=Sundeep |url=https://books.google.co.in/books?id=PXstAAAAMAAJ&q=founder+of+guhila+dynasty&dq=founder+of+guhila+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj63d2M453cAhWIsY8KHYxJCeoQ6AEIQjAG |accessdate=14 जुलाई 2018 |language=en |archive-url=https://web.archive.org/web/20180714110557/https://books.google.co.in/books?id=PXstAAAAMAAJ&q=founder+of+guhila+dynasty&dq=founder+of+guhila+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj63d2M453cAhWIsY8KHYxJCeoQ6AEIQjAG |archive-date=14 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> *खुमाण (I) (753–773) *मत्तट (773–793) *भृतभट्ट सिंह (793–813) *अथाहसिंह (813–828) *खुमाण (II) (828–853) *महाकाय (853–878) *खुमाण (III) (878–926) *भृतभट्ट (II) (926-951 ) *अल्लट (951-971) *नरवाहन (971-979) *शालिवाहन (973–977 ) *शक्तिकुमार (977–993 ) *अमरप्रसाद (993–998) *शुचिवर्मा (998–1010) *नरवर्मन (1010–1035) *कीर्तिवर्मा (1035–1050) *योगराज (1050–1075) *वैरट (1075–1090) *हंसपाल (1090–1100) *वैरिसिंह (1100–1122) *विजयसिंह (1122–1130) *वैरिसिंह (II) (1130–1136) *अरिसिंह (1136–1145) *चोङसिंह (1145–1151) *विक्रम सिंह (1151–1158) *[[रणसिंह]] (1158–1165) === गुहिल/गहलौत राजवंश का विभाजन === [[रणसिंह]] (1158 ई.) इन्हीं के शासनकाल में गुहिल/गहलौत वंश दो शाखाओं में बट गया। * '''प्रथम (रावल शाखा)'''— रणसिंह के पुत्र क्षेमसिंह रावल शाखा का निर्माण कर मेवाड़ पर शासन किया। *'''द्वितीय (राणा शाखा)'''— रणसिंह के दूसरे पुत्र राहप ने सिसोदा ठिकानों की स्थापना कर राणा शाखा की शुरुआत की । ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर सिसोदिया कहलाए। ==== रावल शाखा (ल. 1165 – 1303 ईस्वी) ==== *[[क्षेमसिंह]] (1165–1183) *[[सामंत सिंह]] (1183–1188) *[[कुशल सिंह]] (1188–1195) *[[महानसिंह]] (1195–1202) *[[पद्मसिहा]] (1202–1213) *[[जैत्र सिंह]] (1213–1253) *[[तेज सिंह]] (1253–1273 ) *[[समर सिंह]] (1273–1301 ) *[[रतन सिंह]] (1301–1303 ) === राणा शाखा (ल. 1165 – 1326 ईस्वी) === *[[रहपा]] (1162) *नरपति (1185) *दिनकर (1200) *जशकरन (1218) *नागपाल (1238) *कर्णपाल (1266) *भुवनसिंह (1280) *भीमसिंह (1297) *जयसिंह (1312) *लखनसिंह (1318) *[[अरिसिंह]] (1322) *[[हम्मीर सिंह]] (1326) === सिसोदिया राजवंश (ल. 1326 – 1949 ईस्वी) === {{मुख्य|सिसोदिया राजवंश}} * '''''विषम घाटी पंचानन''''' '''[[राणा हम्मीर सिंह]]''' (1326–1364) ''विषम घाटी पंचानन'' (सकंट काल मे सिंह के समान) के नाम से जाना जाता है, यह संज्ञा [[राणा कुम्भा]] ने [[कीर्ति स्तम्भ]] प्रशस्ति में दी। <ref name="sen2">{{Cite book |last=Sen |first=Sailendra |title=A Textbook of Medieval Indian History |publisher=Primus Books |year=2013 |isbn=978-9-38060-734-4 |pages=116–117}}</ref> * [[क्षेत्र सिंह]] (1364–1382) * [[राणा लाखा|लाखा सिंह]] (1382–1421) * [[राणा मोकल]] (1421–1433) * '''''कुंभकर्ण''''' '''[[राणा कुंभा]]''' (1433–1468) महाराणा कुंभकर्ण सिंह ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती राजनीति को एक नया रूप दिया। इतिहास में ये ''महाराणा कुंभा'' के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। महाराणा कुंभा को [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग|चित्तौड़ दुर्ग]] का आधुुुनिक निर्माता भी कहते हैं क्योंकि इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश वर्तमान भाग का निर्माण कराया ।<ref name="sen2"/> * [[राणा उदय सिंह|उदय सिंह प्रथम(ऊदा)]] (1468–1473) * [[राणा रायमल]] (1473–1509) * '''''हिंदुआ सूरज''''' '''[[राणा सांगा]]''' (1509–1528) महाराणा संग्राम सिंह [[मुगल]] साम्राज्य के संस्थापक [[बाबर]] ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राणा सांगा हिंदुस्तान में सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे, जब उन्होंने इस पर आक्रमण किया, और कहा कि ''उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया।'' <ref>Har Bilas, Sarda. maharana sanga : the hindupat, the last great leader of the rajput race. pp. 15–16.</ref><ref>A Comprehensive History of India: Comprehensive history of medieval India p107</ref> * [[रतन सिंह द्वितीय]] (1528–1531) * [[विक्रमादित्य सिंह]] (1531–1536) * [[बनवीर सिंह]] (1536–1537) * [[उदय सिंह]] (1537–1572) * '''''मेवाड़ी राणा''''' '''[[महाराणा प्रताप]]''' (1572–1597) उन्होंने मुगल सम्राट [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया और अंत महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को युद्ध में हराया, जिसमें [[दिवेर का युद्ध]] (1582) भी हैं। <ref>{{Cite web|url=https://infohindi.com/maharana-pratap-ki-jivani-biography-mah/|title=महाराणा प्रताप की जीवनी Biography of Maharana Pratap in Hindi|date=2016-06-06|website=InfoHindi.com|language=en-US|access-date=2020-11-24|archive-date=15 मई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210515025136/https://infohindi.com/maharana-pratap-ki-jivani-biography-mah/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite book|author=विजय नाहर|title=हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप | publisher=पिंकसिटी पब्लिशर्स| isbn=978-93-80522-45-6|year=2011|page= 275}}</ref> * '''''चक्रवीर''''' '''[[अमर सिंह प्रथम]]''' (1597–1620) दिवेर के युद्ध में मेवाड़ के राजा अमर सिंह प्रथम तथा मुगल सेना के बीच सन 1606 ई. में हुआ था। इस युद्ध में अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खान को स्वयं मार दिया था। कारण उन्हें ''चक्रवीर'' के नाम से जाना गया। मेवाड़ न जीत पाने के कारण अकबर ने अपनी पुत्री का विवाह सन्धि स्वरुप अमरसिंह से करवाया था।<ref>{{Cite book|title=History of Jahangir|last=Prasad|first=Beni|pages=227}}</ref><ref>{{Cite book|title=The Mughal Throne: The Saga of India's Great Emperors|last=Eraly|first=Abraham|pages=259}}</ref> * [[कर्ण सिंह]] (1620–1628) * [[जगत सिंह प्रथम]] (1628–1652) * [[राज सिंह प्रथम]] (1652–1680) * [[जय सिंह]] (1680–1698) * [[अमर सिंह द्वितीय]] (1698–1710) * [[संग्राम सिंह द्वितीय]] (1710–1734) * [[जगत सिंह द्वितीय]] (1734–1751) * [[प्रताप सिंह द्वितीय]] (1751–1753) * [[राज सिंह द्वितीय]] (1753–1761) * [[राणा अरि सिंह]] (1761–1773) * [[राणा हम्मीर २|हम्मीर सिंह द्वितीय]] (1773–1778) * [[भीम सिंह]] (1778–1828) * [[जवान सिंह]] (1828–1838) * [[सरदार सिंह]] (1838–1842) * [[स्वरूप सिंह]] (1842–1861) * [[महाराणा शम्भू|शम्भू सिंह]] (1861–1874) * [[महाराणा सुज्जन सिंह|सुज्जन सिंह]] (1874–1884) * [[फतेह सिंह]] (1884–1930) * [[भूपाल सिंह]] (1930–1949), अंतिम शासक == महाराजा गुहादित्य == {{मुख्य|राजा गुहादित्य}} [[सूर्यवंश|सूर्यवंशी]] महाराजा [[कनक सेन]] की '8वी पीढ़ी' में '''[[शिलादित्य]]''' नामक एक राजा हुवे । जो [[वल्लभीपुर]] में राज करते थे वहां पर मलेच्छों ने आक्रमण कर वल्लभीपुर को तहस-नहस कर दिया व शिलादित्य वीरगति को प्राप्त हुए शिलादित्य की सभी रानियां उनके साथ [[सती]] हो गई। शिलादित्य की एक रानी [[पुष्पावती]] गर्भवती थी तथा पुत्र की मन्नत मांगने के लिए वह अपने [[परमार वंश]] के पिता के राज्य [[चंद्रावती]] आबू में [[जगदंबा देवी]] के दर्शन करने गई थी, पुष्पावती अपने पिता के घर से जब वापस वल्लभीपुर जा रही थी तो रास्ते में वल्लभीपुर के विनाश का समाचार मिला पुष्पावती यह सुनकर वहां पर सती होना चाहती थी, परंतु गर्भावस्था के कारण यह संभव नहीं था पुष्पावती ने अपनी सहेलियों के साथ 'मल्लिया' नामक गुफा में शरण ली जहां उसने अपने पुत्र का को जन्म दिया गुफा के पास वीरनगर नामक गांव था जिसमें कमलावती नाम की ब्राह्मणी रहती थी । रानी पुष्पावती ने उसे अपने पास बुलाकर अपने पुत्र के लालन-पालन का दायित्व सौंपकर सती हो गई । कमलावती ने रानी के पुत्र को अपने पुत्र की भांति रखा । '''वह बालक गुफा में पैदा हुआ था और उस प्रदेश के लोग गुफा को 'गोह' कहते थे अतः कमलावती ने उस बच्चे का नाम गोह रखा जो आगे चलकर गुहिल के नाम से विख्यात हुआ ।''' कमलावती ने बालक गुहिल को [[इडर]] के [[भील]] राजा [[मांडलिक]] को सौंप दिया । बालक गूहिल राजा मांडलिक के राजमहल में रहता और भील बालकों के साथ घुड़सवारी करता, भील कुमार नल और गुहिल का साथ रहा , कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार गुहील ने इडर के राजा मांडलिक भील की हत्या कर दी और 566 ई में '''गुहील वंश''' की नींव रखी । हत्या कर देने वाली घटना असत्य भी हों सकती हैं। ''गोहिलादित्य का नाम उसके वंशधरों का गोत्र हो गया । गुहिल के वंशज गोहिल अथवा गुहिलोत के नाम से विख्यात हुए।'' == कालभोज/बप्पा रावल (734–753) == {{मुख्य|बप्पा रावल}} इसी गुहिलादित्य ने 566 ई के आस-पास मेवाड़ में इस वंश की नींव रखकर '''[[नागदा]]''' को गुहिल वंश की राजधानी बनाई । गोहिल की 'आठवीं पीढ़ी' में '''[[महेंद्र-2]]''' नामक एक राजा हुआ जिसके व्यवहार से वहां के भील उससे नाराज हो गए एक दिन जब नागादित्य जंगल में शिकार खेलने गया तो भीलों ने उसे घेरकर वही मार डाला और इडर राज्य पर पुनःअपना अधिकार जमा लिया नागादित्य की हत्या भीलों ने कर दी तो क्षत्रीय को उसके 3 वर्षीय पुत्र '''बप्पा''' के जीवन को बचाने की चिंता सताने लगी। इसी समय वीरनगर की कमलावती के वंशज जो कि गोहिल राजवंश के कुल पुरोहित थे उन्होंने बप्पा को लेकर पांडेय नामक दुर्ग में गए इस जगह को बप्पा के लिए सुरक्षित ना मानकर बप्पा को लेकर लेकर पराशर नामक स्थान पर पहुंचे इसी स्थान के पास त्रिकूट पर्वत है इसकी तलहटी में नागेंद्र नामक नगर वर्तमान नागदा बसा हुआ था । वहां पर [[शिव]] की उपासना करने वाले बहुत से ब्राह्मण निवास करते थे हारित ऋषि ने बप्पा रावल का लालन पालन करके करने का भार उठाया। ''बप्पारावल हारित ऋषि की गाय को चराते थे उन गायों में से एक गाय जो कि सुबह बहुत ज्यादा दूध देती थी परंतु संध्या के समय आश्रम में वापस आती तो उसके थनों में दूध नहीं मिलता था ऋषियों को संदेह हुआ कि बप्पा एकांत में उस गाय का दूध पी जाता है बप्पा को जब इस बात का पता चला तो वह वास्तविकता जानने के लिए दूसरे दिन जब गायों को लेकर जंगल में गया तो उसी गाय पर अपनी नजर रखी । बप्पा ने देखा कि वह गाय एक निर्जन गुफा में घुस गई बप्पा भी उसके पीछे गया और उसने वहां देखा की बेल पत्तों के ढेर पर वह गाय अपने दूध की धार छोड़ रही थी बप्पा ने उसके पास जाकर उन पत्तों को हटाया तो उसके नीचे एक [[शिवलिंग]] था । जिसके ऊपर दूध की धार गिर रही थी बप्पा ने उसी शिवलिंग के पास एक समाधि लगाए हुए योगी को देखा उस योगी का ध्यान टूट गया परंतु उसने बप्पा से कुछ नहीं कहा बप्पा उस योगी [[हरित ऋषि]] की सेवा करने लगा हरित ऋषि ने उसकी सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर शिव मंत्र की दीक्षा देकर उसे एकलिंग के दीवान की उपाधि दी । हरित ऋषि के शिवलोक जाने का समय आया तो उसने बप्पा को निश्चित समय पर आने को कहा बप्पा निश्चित समय पर आने में लेट हो गया तब तक हरित ऋषि रथ पर सवार होकर शिवलोक की तरफ चल पड़े उन्होंने बप्पा को आते देखकर रथ की चाल धीमी करवाकर बप्पा को अपना मुंह खोलने को कहा हारित ने उसके ऊपर जलाभिषेक करने का प्रयास किया जिससे वह तो बप्पा के पैर के अंगूठे पर पड़ा हरित ऋषि ने उसे कहा कि यदि यह जलाभिषेक तुम्हारे शरीर पर गिरता तो तुम अमर हो जाते फिर भी तुम्हारे पैर के अंगूठे पर गिरने से भी जहां तक तुम्हारा पाव जाएगा वहां तक तुम्हारा राज्य रहेगा हरित ऋषि ने बप्पा को मेवाड़ का राज्य वरदान में दे दिया ।'' [[बप्पा रावल]] का मूल नाम [[कालभोज]] था । बप्पा रावल ने [[हरित ऋषि]] के आशीर्वाद से '''734 ईसवी''' में [[चित्तौड़गढ़]] पर आक्रमण किया और चित्तौड़ के राजा '''[[मान मौर्य]]''' को पराजित कर ७३४–७५३ ईसवी तक शासन किया और चित्तौड़गढ़ में गुहिल वंश के साम्राज्य की स्थापना की । बप्पा रावल ने [[उदयपुर]] के समीप कैलाशपुरी नामक स्थान पर [[एकलिंग]] जी का मंदिर बनवाया । '''बप्पा रावल प्रथम गुहिल शासक थे जिसने मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाए''' । बप्पा रावल की मृत्यु नागदा में हुई जहां उसकी समाधि बनी हुई है। जिसे वर्तमान में बप्पा रावल के नाम से जानते हैं। ''बप्पा रावल के बारे में कहा जाता है कि वह एक झटके में दो मलेच्छो(भैंसे) की बलि दे देते । वह 33 हाथ की धोती और 16 हाथ का दुपट्टा पहनते थे । उनकी खड़ग 32 मन ( गुजरी भाषा में गुजरात्रा में मन २० किलो होता है) की थी । वह 4 व्यक्तियों के बराबर भोजन करते थे और उनकी सेना में 12 लाख 72000 हजार सैनिक थे ।'' [[आम्र कवि]] द्वारा लिखित [[एकलिंग प्रशस्ति]] में बप्पा रावल के संन्यास लेने की घटना की पुष्टि होती है । == कालभोज के बाद के शासक == कालभोज के बाद उनके पुत्र खुमाण प्रथम मेवाड़ के शासक बने ।[[कालभोज]] के बाद के शासक थे- *[[खुमाण प्रथम]] *[[मत्तट]] *[[भृतभट्ट सिंह]] *[[खुम्माण द्वितीय]] *[[खुमाण तृतीय]] *[[भृतभट्ट द्वितीय]] मेवाड़ के क्रमशः शासक बने खुमान तृतीय के बाद भृतभट्ट द्वितीय इसके बारे में हमें आहड़ लेख 977 ईसवी से जानकारी मिलती है। 942 ईसवी के प्रतापगढ़ अभिलेख में उसे '''[[महाराजाधिराज]]''' की उपाधि से पुकारा गया । *भृतभट्ट द्वितीय के बाद उसकी रानी '[[राष्ट्रकूट राठौड़ वंश]]' की रानी महालक्ष्मी से उत्पन्न हुए पुत्र '''[[अल्हट|अल्लट]]''' मेवाड़ के शासक बने । जिसे '''आलू रावत''' कहा जाता है । अल्लट ने हूण राजकुमारी हरिया देवी के साथ विवाह कर हूणों कि वह अपने ननिहाल पक्ष राष्ट्रकूटों की सहायता से अपने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया । '''अल्लट ने पहली बार [[नौकरशाही]] की शुरुआत की जो वर्तमान में भी पूरे देश में चल रही है ।''' अल्लट ने [[नागदा]] से राजधानी बदलकर अपनी नई राजधानी [[आहड़]] को बनाई और वहां पर [[वराह मंदिर]] का निर्माण करवाया । अल्लट के बाद उसका पुत्र [[नरवाहन]] मेवाड़ का शासक बना । *[[नरवाहन]] ने चौहानों के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए [[चौहान]] राजा [[जेजय]] की पुत्री से विवाह किया । फिर क्रमशः शासक हुवे– *[[शक्तिकुमार]] (977–993 ई.) *[[नरवर्म]] *[[शुचिवर्म]] *[[कीर्तिवर्मा]] *[[योगराज]] *[[वैरट]] *[[हंसपाल]] *[[वैरिसिह]] *[[विजयसिंह]] *[[अरिसिंह]] *[[चोङसिंह]] *[[विक्रम सिंह]] *[[रणसिंह]] (1158 ई.) ==गुहिल/गहलौत वंश का शाखाओं में विभाजन == रणसिंह, विक्रम सिंह के पुत्र थे, इन्होंने आहोर के पर्वत पर एक किला बनवाया । इन्हीं के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बट गया । *'''प्रथम (रावल शाखा)- [[रणसिंह]] के पुत्र [[क्षेमसिंह]] [[रावल]] शाखा का निर्माण कर मेवाड़ पर शासन किया ।''' *'''द्वितीय (राणा शाखा)- [[रणसिंह]] के दूसरे पुत्र [[राहप]] ने सिसोदा ठिकानों की स्थापना कर राणा शाखा की शुरुआत की । ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर [[सिसोदिया]] कहलाए।''' *[[क्षेमसिंह]] रावल शाखा की शुरुआत कर मेवाड़ के शासक बने। इनके, [[सामंत सिंह]] और [[कुशल सिंह]] नाम के दो पुत्र हुए। *[[सामंत सिंह]] (1172 ई.) में मेवाड़ के शासक बने सामंत सिंह का विवाह [[अजमेर]] के [[चौहान]] शासक [[पृथ्वीराज द्वितीय]] की बहन पृथ्वी बाई के साथ हुआ । [[नाडोल]] के चौहान शासक [[कीर्तिपाल]] व पृथ्वीराज द्वितीय के मध्य अनबन हो गई इसी कारण कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण कर सामंत सिंह को पराजित कर मेवाड़ राज्य छीन लिया सामंत सिंह ने (1178 ईस्वी) में लगभग [[वागड़]] में जाकर अपना नया राज्य बनाया जिसकी नई राजधानी ''वट पदक बड़ौदा'' थी । क्षेमसिंह के छोटे पुत्र [[कुमार सैनी]] (1179 ईस्वी) में कीर्तिपाल को पराजित कर मेवाड़ के पुनः शासक बने । === जैत्र सिंह (1213–1250 ईस्वी) === {{मुख्य|जैत्र सिंह}} तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मेवाड़ के शासक [[जैत्र सिंह]] बने । उनके शासनकाल से पूर्व [[नाडोल के चौहान]] वंश के कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर अधिकार स्थापित किया था । इस बेर के बदले में जेत्र सिंह ने समकालीन चौहान वंश के शासक [[उदय सिंह]] के विरुद्ध नाडोल पर चढ़ाई कर दी । नाडोल को बचाने के उद्देश्य से उदय सिंह ने अपनी पोत्री रूपा देवी का विवाह जैत्र सिंह के पुत्र [[तेज सिंह]] के साथ कर मेवाड़ और नाडोल के बेर को समाप्त किया । जैत्र सिंह के समय [[दिल्ली]] सल्तनत पर गुलाम वंश के बादशाह इल्तुतमिश का शासन था । इल्तुतमिश ने जेत्र सिंह के बढ़ते हुए प्रभाव को दबाने के लिए मेवाड़ की राजधानी नागदा पर (1222 से 1229 ईस्वी) में आक्रमण किया और इसे तहस-नहस कर दिया । इसी कारण जैत्र सिंह ने पहली बार अपने राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ़ को बनाया । उसके बाद '''जेेेैत्र सिंह व इल्तुतमिश के मध्य (1227 ईस्वी) में [[भुताला का युद्ध]] हुआ, जिसमें जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित किया, जिसके बारे में [[जयसिंह सूरी कृत हमीर हद मर्दन]] नामक पुस्तक से जानकारी मिलती है ।''' ''[[डॉक्टर ओझा]] ने जैत्र सिंह की प्रशंसा में लिखा है कि दिल्ली के गुलाम सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह ही हुआ जिसकी वीरता की प्रशंसा उसके विपक्षियों ने भी की है । [[दशरथ शर्मा-]] जैत्रसिंह का समय मध्य कालीन मेवाड़ का नवशक्ति संचार का समय माना हैं। === तेज सिंह (1250–1273 ईस्वी) === {{मुख्य|तेज सिंह}} [[जैत्र सिंह]] की मृत्यु के बाद उनके पुत्र [[तेज सिंह]] मेवाड़ के शासक बने। तेजसिंह एक प्रतिभा संपन्न शक्तिशाली शासक थे तेज सिंह ने '''परम भट्ठारक/ महाराजाधिराज/ परमेश्वर तथा चालूक्यों के समान उभावती/ वल्लभ प्रताप का विरुद्ध धारण किया था ।''' तेजसिंह के शासनकाल में दिल्ली के शासक गयासुद्दीन बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया । तेज सिंह की रानी [[जयतल्लदेवी]] ने चित्तौड़ में [[श्याम पार्श्वनाथ]] के मंदिर का निर्माण करवाया । ''तेज सिंह के शासनकाल में 1267 ईस्वी में आहङ नामक स्थान पर '''[[मेवाड़ चित्रकला शैली]]''' का प्रथम चित्रित ग्रंथ '''[[श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी]]'' का चित्रण किया गया था ।'' === समर सिंह (1273–1301 ईस्वी) === [[समर सिंह]] को [[कुंभलगढ़ प्रशस्ति]] में शत्रुओं की शक्ति का अपहरण करता लिखा गया है, जबकि [[आबू शिलालेख]] में उसे [[तुर्कों]] से [[गुजरात]] का उद्धारक लिखा गया है । चिरवे के लेख में उसे शत्रुओं का संहार करने में सिंह के समान सुर कहा गया है । ''अचलगच्छ की पट्टावली'' से स्पष्ट होता है कि [[आचार्य अमितसिंह सूरी]] के प्रभाव में [[समर सिंह]] ने अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगा दी थी । समर सिंह के दो पुत्र [[रतन सिंह]] व [[कुंभकरण]] हुए । '''कुंभकरण अपने पिता की आज्ञा प्राप्त कर नेपाल चले गए और वहां पर अपने नए गुहिल वंश की स्थापना की । समर सिंह के दूसरे पुत्र रतन सिंह चित्तौड़ के शासक बने । इसकी जानकारी हमें [[कुंभलगढ़ प्रशस्ति]] तथा [[एकलिंग महात्म्य]] ग्रंथ में मिलती है।''' === रतन सिंह (1301–1303 ईस्वी)=== {{मुख्य|राणा रतन सिंह}} [[रतन सिंह]] ज्यों ही मेवाड़ की गद्दी पर बैठे तो उन्हें अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा । अल्लाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर किए जाने वाले आक्रमण में खिलजी के साथ प्रसिद्ध लेखक [[अमीर खुसरो]] था । अमीर खुसरो ने इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए अपनी पुस्तक [[खजाइनुल फुतूह]] मैं लिखा है कि अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 ईस्वी को अपनी सेना सहित दिल्ली से रवाना हुआ । चित्तौड़ पहुंचकर [[गंभीरी नदी]] और [[बैङच नदी]] के मध्य शाही शिविर लगाया । स्वयं खिलजी ने अपना शिविर चित्तौड़ी नामक डूंगरी पर लगवाया ।6 महीने तक यह घेरा चलता रहा । '''कुंभलगढ़ शिलालेख से पता चलता है कि इन छह माह के मध्य हुए छोटे-मोटे की युद्धो में सिसोदा का सामंत [[लक्ष्मण सिंह]] अपने सात पुत्रों सहित किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गए । जब चारों और सर्वनाश दिखाई दे रहा था और शत्रु से बचने का कोई उपाय नहीं मिल रहा था । रतन सिंह की पत्नी [[पद्मिनी]] ने 16000 राजपूत महिलाओं के साथ जोहर किया तथा रतन सिंह के दो सेनापति [[गोरा और बादल]] के नेतृत्व में राजपूतों ने [[केसरिया]] वस्त्र धारण कर किले के फाटक खोल कर शत्रुओं की सेना पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए । ''यह चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका था ''।''' इस प्रकार (26 अगस्त 1303 ईस्वी) को [[चित्तौड़गढ़ किला]] अलाउद्दीन खिलजी के अधीन हुआ । अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी शाही सेना का विनाश देख कर बहुत क्रोधित हुआ और उसने शाही सेना को ''चित्तौड़गढ़ की आम जनता के कत्लेआम करने का आदेश दे दिया ''।अल्लाउद्दीन खिलजी कुछ दिन चित्तौड़ रुक कर अपने बेटे खिज्रखां को चित्तौड़गढ़ का शासन देकर दिल्ली लौट गया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिजराबाद रखा । खिज्र खाॅ ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग व उसके आसपास के मंदिरों तथा भवनों को तुड़वाकर किला पर पहुंचने के लिए गंभीरी नदी पर पुल बनवाया । 22 दिसंबर 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई इस कारण खिज्र खा चित्तौड़ से वापस दिल्ली गया । पीछे मेवाड़ राज्य '''[[मालदेव सोनगरा]]''' को सौंप गया । === राणा हम्मीर (1326–1364 ईस्वी)=== {{मुख्य|राणा हम्मीर सिंह}} [[राणा हम्मीर]] सिसोदा जागीर के सरदार [[लक्ष्मण सिंह]] का पोता था । लक्ष्मण सिंह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करते हुए अपने सात पुत्रों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। लक्ष्मण सिंह का एक लड़का अरिसिंह/[[अजय सिंह]] था, जो कि भाग्य वास उस युद्ध में बच गया था । अरि सिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राणा हमीर सिसोदा जागीर का सरदार बना । दूसरे भाई अजय सिंह का बेटा राणा सज्जन सिंह महाराष्ट्र चला गया,छत्रपति शिवाजी महाराज इन्ही के वंशज थे। राणा हम्मीर ने देखा कि अलाउद्दीन खिलजी के मरने के बाद दिल्ली सल्तनत की हालत सोचनीय है । उसने 1326 ईस्वी के आसपास दिल्ली सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के समय चित्तौड़ पर आक्रमण कर [[मालदेव]] के पुत्र जैसा/[[जयसिंह]] को मारकर जबकि (ङा.ओझा के अनुसार) मालदेव पुत्र बनवीर को मारकर चित्तौड़ पर पुनः अपना अधिकार स्थापित किया । *'''ध्यातव्य रहे–''' ''राणा हम्मीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल एवं गहलौत कहलाते थे और बाद में मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ हम राणा हमीर सिसोदिया को 'सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक' भी कहते हैं ।'' मोहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए हम्मीर पर आक्रमण किया । राणा हम्मीर ने पहाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए खेरवाड़ा को अपना केंद्र बनाया । राणा हम्मीर वह मोहम्मद बिन तुगलक के मध्य युद्ध हुआ, जिससे हम [[सिंगोली का युद्ध]] कहते हैं । ''राणा हम्मीर ने मेवाड़ की आपातकालीन स्थिति में पुन: अधिकार कर अच्छी स्थिति में पहुंचाया इसलिए उसे '''मेवाड़ का उद्धारक''' कहते हैं । राणा हमीर विपरीत परिस्थिति में भी अपना हौसला नहीं खोया अतः '''उसे कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में विषम घाटी पंचानन/ विकेट आक्रमणों में सिंह के समान' कहा गया ।''' कुंभा के द्वारा '[[गीत गोविंद]]' पर लिखी गई '''[[रसिक प्रिया]]''' नामक टीका में राणा हम्मीर को '''वीर राजा''' की उपाधि दी गई ।'' राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग में [[अन्नपूर्णा माता]] का मंदिर बनवाया जिसकी जानकारी [[मोकल]] जी के शिलालेख से मिलती है । '''कर्नल जेम्स टॉड ने राणा हम्मीर को अपने समय का प्रबल हिंदू राजा माना है।''' == मेवाड़ का सिसोदिया वंश (गुहिल) == {{मुख्य|सिसोदिया राजवंश}} [[राणा हम्मीर]] की मृत्यु के बाद उनके पुत्र [[राणा क्षेत्र सिंह]] जिसे खेता के नाम से भी जानते हैं, मेवाड़ के शासक बने । क्षैत्र सिंह ने [[मालवा]] के [[दिलावर खान]] गौरी को परास्त कर '''मेवाड़ - मालवा संघर्ष का सूत्रपात किया ।''' [[हाड़ेती]] के हाडा शासकों को दबाने का श्रेय भी [[खेता]] को ही जाता है। 1382 ईस्वी में जब क्षेत्र सिंह ने आक्रमण किया तो उस युद्ध में क्षेत्र सिंह वह [[बूंदी]] का [[लाल सिंह हाडा]] भी मारा गया । === राणा लाखा/लक्ष सिंह (1382–1421 ईस्वी) === {{मुख्य|राणा लाखा}} महाराणा हम्मीर के पौत्र व खेता के पुत्र लक्ष सिंह हैं लाखा 1382 इश्वी में मेवाड़ के शासक बने । लाखा के शासनकाल में भाग्यवश जावर [[उदयपुर]] में चांदी की खान निकली ।उस खान की आय से उसने कई किलो व मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया । '''लाखा के शासनकाल में एक पिचू नामक चिड़ीमार बंजारे के बेल की स्मृति में पिछोला झील का निर्माण करवाया ।''' ====[[पिछोला झील]]==== पिछोला झील बेङच नदी पर स्थित है इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में राणा लक्खा के शासनकाल में हुआ । महाराणा उदय सिंह ने इसकी पाल को पक्का करवाया । इसमें सीसारमा व बूजड़ा नदी आकर गिरती है । इस झील में जग मंदिर ( करण सिंह ने 1620 ईस्वी में शुरू तथा जगत सिंह प्रथम ने 1651 ईस्वीें में पूर्ण करवाया) जगनिवास जगत सिंह द्वितीय ने 1746 ईस्वी में पूर्ण करवाया ।महाराणा प्रताप और मानसिंह की मुलाकात इसकी पाल पर हुई थी। लाखा के दरबार में संस्कृत के प्रज्ञात विद्वान [[झोटिंग भट्ट]] और [[धनेश्वर भट्ट]] रहते थे । लाखा के शासनकाल में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। लखा ने दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन द्वितीय को बदनोर के समीप हुए युद्ध में पराजित करके हिंदुओं से लिए जाने वाले तीर्थ कर को समाप्त करने का वचन लिया । 1396 ई में गुजरात के जफर खान ने मांडलगङ पर आक्रमण किया लेकिन लाखा ने इस आक्रमण को विफल कर दिया । लाखा ने बूंदी के [[राव बर सिंह]] [[हाड़ा]] को मेवाड़ का प्रभुत्व मानने के लिए विवश किया। [[मारवाड़]] के शासक [[रणमल]] ने अपनी बहन हँसा बाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा के पुत्र [[चूंडा]] से करने का सोचा । रणमल ने चुंडा के लिए सगाइ का नारियल मेवाड़ दरबार में भेजा, उस समय राणा लाखा का पुत्र चुंडा दरबार में नहीं थे । सगाई के नारियल को देखकर महाराणा लाखा ने मजाक करते हुए कहा कि यह बुढ़ापे में मेरे साथ किस ने मजाक किया। चुंडा को दरबार में न देखकर रणमल का दास वापस रणमल के पास पहुॅचा । दास ने सारी बात रणमल को कहीं तो रणमल ने दास को वापस लाखा के पास सशर्त सगाई का नारियल देकर भेजा शादी की शर्त रखी कि मेरी बहन के होने वाले पुत्र को राणा अपना उत्तराधिकारी बनाए तो मैं अपनी बहन की शादी राणा लाखा के साथ कर दूंगा महाराणा लाखा इस शर्त को स्वीकार कर लेते हैं तो मैं अपनी बहन हंसा की शादी महाराणा लाखा के साथ करने को तैयार था लेकिन उसे इस बात का पता था कि उनकी बहन महाराणा लाखा की रानी तो बनेगी लेकिन उसकी कोख से जन्म लेने वाला बालक मेवाड़ का शासक कभी नहीं बन पायेगा। आखिर मेवाड़ की राजगद्दी पर तो महाराणा लाखा के बाद चूंडा का ही अधिकार है। राव रणमल की इस बात का जवाब देते हुए चूंडा ने भरे दरबार में भीष्म प्रतिज्ञा की कि मैं आजन्म मेवाड़ के महाराणा का सेवक बनकर रहुंगा और मेरे वंशज कभी भी मेवाड़ की राजगद्दी पर हक नहीं जतायेंगे। इस भीष्म प्रतिज्ञा के बाद महाराणा लाखा का हंसाकंवर के साथ विवाह कर दिया गया। चूंडा द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। सभी में चूंडा की प्रशंसा की गई,  बहन हनसा भाई की शादी महाराणा लाखा से कर देते हैं। ''''इसी कारण चूंडा को मेवाड़ का ''भीष्म पितामह'' कहते हैं ।''' लाखा वह हंसा बाई के विवाह के 13 महीने बाद हंसाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम [[मोकल]] रखा गया। राणा लाखा जब मृत्यु की शैय्या पर थे तो उन्होने अपने बड़े पुत्र चूंडा को अपने पास बुलाकर अपने छोटे पुत्र मोकल का संरक्षक बनाया । === राणा मोकल (1421-1433 ईस्वी) === {{मुख्य|राणा मोकल}} जिस समय लाखा की मृत्यु हुई तो मोकल मात्र 12 वर्ष के थे । राणा लाखा के कहे अनुसार उनके बड़े भाई चूंडा राज्य के सभी कार्यों को बड़ी कुशलता से कर रहे थे । हंसा बाई ( मोकल की मां व चूंडा की सौतेली मां ) हमेशा चूंडा को शक की दृष्टि से देखती थी । चूंडा परेशान होकर मेवाड़ छोड़कर मालवा चले गए ।हंसा बाई ने अपने भाई रणमल को मोकल के संरक्षक का कार्य करने के लिए मारवाड़ से मेवाड़ बुला लिया । रणमल ने शीघ्र ही मेवाड़ में ऊंचे पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति कर दी । इसी कारण सिसोदिया सरदार रणमल से नाराज हो गए। रणमल मारवाड़ का ही स्वामी नहीं रहा बल्कि मेवाड़ का भी सर्वे सर्वा बन गया । सिसोदिया सरदारों को रणमल सत्ता से वंचित कर उन्हें अपमानित कर रहा था । 1 दिन रणमल आवेश में आकर मेवाड़ सरदार राघव देव ( राणा चुंडा के भाई ) जैसे योग्य व्यक्ति की हत्या करवा दी इससे राठौड़ों वह सिसोदिया में वैमनस्य की कई गहरी होती गई। मोकल ने 1428 ईसवी के लगभग [[नागौर]] के फिरोज खान को '''[[रामपुरा के युद्ध]]''' में परास्त किया । फिरोज खान का साथ देने आई गुजरात की सेना को भी हार का मुंह देखना पड़ा गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर 1433 ईस्वी को आक्रमण कर दिया। मोकल को इस आक्रमण का पता चला तो वह भी उस से युद्ध करने के लिए रवाना हुआ और झीलवाड़ा नामक स्थान पर पहुंचा । युद्ध के मैदान में ही मोकल के सिसोदिया सरदार जो कि रणमल के हार के कारणों कल से नाराज थे। माहपा पवार के कहने पर महाराणा क्षेत्र सिंह (खेता) की खातिन जाति की दासी से उत्पन्न हुए 2 पुत्र चाचा वह मेरा ( एक बार मोकल ने जंगल में चाचा वह मेरा से प्रसंग में किसी वृक्ष का नाम पूछ लिया तो वह इसे ताना समझ गए क्योंकि उनकी माता खातिन थी । इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने मोकल को मार दिया) ने अवसर पाकर उसकी हत्या कर दी । उस दिन से मेवाड़ में कहावत प्रचलित हुई की '''दीवार में आला खेत में नाला और घर में साला बर्बाद करके ही जाता है ''' राणा मोकल ने हिंदू परंपरा को स्थापित करने के लिए '''तुलादान पद्धति''' को लागू किया । इस परंपरा के तहत मंदिरों के लिए सोना चांदी दान के रूप में दिया जाता था । महाराणा मोकल ने [[एकलिंग जी मंदिर]] के परकोटे का निर्माण कराया । मोकल ने चित्तौड़ दुर्ग में [[परमार वंश]] के द्वारा बनवाए गए [[त्रिभुवन मंदिर]] का जीर्णोद्धार करवाकर [[समद्वेश्वर मंदिर]] के नाम से प्रसिद्धि दिलाई । ====[[सौभाग्यदेवी]]==== सौभाग्य देवी परमार वंश की राजकुमारी थी । जिसका विवाह मेवाड़ के शासक राणा लाखा के पुत्र मोकल के साथ हुआ । इस सौभाग्य देवी की कोख से 1423 ईस्वी में महाराणा कुंभा का जन्म हुआ । ====[[कमलावती]]==== कमलावती मेवाड़ के शासक राणा मोकल की रानी थी। 1433 ईस्वी में गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । '''अहमद शाह एवं मोकल के मध्य जिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ ।''' इसी समय जंहा क्षेत्र सिंह के दासी पुत्र चाचा और मेरा ने मिलकर मोकल की हत्या कर दी । उस समय रानी [[कमलावती]] ने मात्र 500 सैनिकों के साथ मुस्लिम सेना का सामना किया। वह अधिक समय तक मुस्लिम सेना के सामने टिक न सकी ओर अंत में वह जलती चिता में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त की । === महाराणा कुंभा/महाराणा कुम्भकर्ण सिसोदिया (1433–1468 ईस्वी) === {{मुख्य|महाराणा कुंभा}} महाराणा कुम्भकर्ण सिसोदिया या [[महाराणा कुम्भा]] एक ऐसा वीर योद्धा '''जिसने 30 साल के अपने शासन में कभी कोई युद्ध नही हारा।''' महाराणा कुंभा का जन्म 1423 ईस्वी को महाराणा मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी के गर्भ से हुआ । मोकल की हत्या के समय कुंभा जिलवाड़ा के उसी शिविर में उपस्थित थे । उन हत्यारों ने कुंभा पर भी हमला किया किंतु उनके शुभचिंतकों ने उन्हें वहां से बचाकर सकुशल [[चित्तौड़]] ले गए। [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग]] में कुंभा को मात्र 10 वर्ष की आयु में 1433 ईस्वी में मेवाड़ का महाराणा बनाया गया। [[File:Maharana Kumbhakarna of Mewar.jpg|right|thumb|महाराणा कुंभा]] कुंभा मेवाड़ का महाराणा तो बने उनके सामने बहुत भयंकर दो समस्याएं थी– पहली– अपने पिता के हत्यारों चाचा व मेरा को सजा देना । दूसरी– अपने पिता के मामा [[रणमल राठौड़]] के मेवाड़ में बढ़ रहे प्रभाव को समाप्त करना । महाराणा कुंभा एक अच्छे शासक ही नहीं अपितु राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने दिमाग का प्रयोग करते हुए रणमल राठौड़ को मारवाड़ से अपने पिता के हत्यारों का दमन करने के लिए सैनिकों सहित बुलाया। रणमल मेवाड़ पहुंचा तो कुंभा ने अपने पिता के हत्यारों पर आक्रमण किया और चाचा वह मेरा की हत्या कर दी । इस प्रकार कुंभा की पहली समस्या का हल हुआ। कुंभा के सामने दूसरी समस्या रणमल की थी। मेवाड़ी सिसोदिया सरदारों ने अपने वैमनस्य को दूर करने के लिए षड्यंत्र रचकर सन 1438 ईस्वी में रणमल की हत्या करवा दी। एक जन श्रुति के अनुसार रणमल मेवा राठौड़ की हत्या इस प्रकार हुई कि हनसा बाई की एक दासी डावरी प्राचीन काल में राजा लोग अपनी पुत्री के साथ दहेज के रूप में कुछ लड़कियां भेजते थे उन्हें दासिया डावरिया कहा जाता था । दासी जिसका नाम भारमली था । भारमली को रणमल राठौड़ दिलो जान से चाहता था। भारमली कुंभा को अपने पुत्र के समान चाहती थी। रणमल राठौड़ ने बार भारमली द्वारा कुंभा को जहर देने के लिए कई बार कहा किंतु 1 दिन कुंभा ने भारमली से रणमल को जहर देने को कहा बार भारमली ने 1438 ईस्वी में शराब में जहर देकर रणमल की हत्या कर दी। इस प्रकार कुंभा की दोनों समस्याओं का हल हो गया । [[राव जोधा]] को जब अपने पिता रणमल की हत्या करने का पता चला तब वह मेवाड़ में ही था । मेवाड़ से जोधा अपनी जान बचाकर मारवाड़ की तरफ भागा, कुंभा की सेना ने उसका पीछा कर उसको वहां से भगा दिया । राव जोधा वहां से वापस मेवाड़ अपनी बुआ हनसाबाई के पास पहुंचा राव जोधा की बुआ व कुंभा की दादी हनसाबाई ने इन दोनों के मध्य मध्यस्था कराते हुए संधि करवाई जो '''आवल बावल''' के नाम से जानी जाती है। '''आवल बावल की संधि के तहत मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा का निर्धारण हुआ मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा निर्धारण का मुख्य बिंदु सोजत था।''' राव जोधा ने कुंभा से अधिक मेलजोल बनाने व विश्वास प्राप्त करने के लिए अपनी पुत्री श्रंगार देवी का विवाह कुंभा के छोटे पुत्र रायमल से करवा दिया । जिसकी जानकारी हमें श्रंगार देवी द्वारा बनाई गई '''घोसुंडी की बावड़ी''' पर लगी प्रशस्ति से मिलती है। ==== मेवाड़-मालवा (माॅङू संबंध) ==== चाचा वह मेरा का साथी महपा पवार व चाचा का पुत्र अक्का मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम के पास चला गया। कुंभा ने मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी को पत्र लिखकर उसके विद्रोहियों को वापस लौटाने को कहा। महमूद खिलजी ने शरण में आए हुए व्यक्तियों को भेजने से इंकार कर दिया, प्रत्युत्तर मैं महाराणा कुंभा ने [[मांडू]] पर चढ़ाई कर दी । इस आक्रमण का दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि मालवा के दिवंगत सुल्तान होशंग शाह के बाद वहां उत्तराधिकारी युद्ध हुआ। जिसके तहत महमूद खिलजी ने होशंग शाह के पुत्र उमर खान को मालवा की गद्दी से हटाकर स्वयं मालवा का सुल्तान बन गया। उमर खान मेवाड़ के कुंभा से सैनिक सहायता मांगने के लिए गया तो कुंभा ने मालवा के राजा महमूद खिलजी पर आक्रमण कर दिया ।इन दोनों के मध्य 1437 ईसवी में सारंगपुर नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें महाराणा कुंभा की विजय हुई। '''मालवा विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने चित्तौडग़ढ़ में ( 1440 - 1448 ) में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया ।''' महाराणा कुंभा महमूद खिलजी को बंदी बनाकर अपने साथ ले आए जिसे 6 महीने तक कैद रखने के बाद महमूद खिलजी को रिहा कर दिया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी रिया होकर गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन के पास पहुंचा । 1456 ईस्वी में नागौर के स्वामी फिरोज खान के मरने के बाद उसका पुत्र शम्स खान नागौर का स्वामी हुआ। गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने उसे हटाकर उसके छोटे भाई मुजाहिद खान को नागौर का शासक बनाया । शम्स खान ने कुंभा की सहायता से सशर्त पुन: नागौर का शासक बना । जब शम्स खान ने कुंभा की शर्त नहीं मानी तो कुंभा ने नागौर पर आक्रमण किया । शम्स खान ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन की सहायता से कुंभा का मुकाबला किया। '''शम्स खान की इस युद्ध में पराजय हुई । [[कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति]] के अनुसार महाराणा कुंभा ने नागौर की मस्जिद को जलाया, किले को तुड़वाकर खाई भरवाई, हाथियों को छीनकर यवनियों को कैद करके उसने गायों को छुड़वाया और नागौर को चारागाह में बदल दिया ।''' ==== मेवाड़ के महान शासक सिसोदिया ==== महाराणा कुंभा के समय गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन शाह मेवाड़ पर आक्रमण करने की सोच रहा था । मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम का दूत ताज खान उसके पास पहुंचा। ताज खा ने मांडू और गुजरात की संयुक्त शक्ति को मिलाकर मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार बनाया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी व गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के मध्य 1456 ईस्वी में '''[[चंपानेर]]''' नामक स्थान पर सशर्त संधि हुई की 'मेवाड़' को जीतने के बाद दोनों मेवाड़ का आधा आधा हिस्सा बांट लेंगे। इस संधि को चंपानेर की संधि कहते हैं। संधि के तहत दोनों ने 1457 इश्वी में मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया । कुतुबुद्दीन तो पहले ही [[कुंभलगढ़ दुर्ग]] में पराजित होकर गुजरात वापस लौट गया । कुंभा महमूद खिलजी की ओर बढ़े बैराठगढ़ (बदनोर) के युद्ध में 1457 ईस्वी में महमूद खिलजी को पराजित कर इस विजय के उपलक्ष्य में बदनोर (भीलवाड़ा) में '''[[कुशाल माता]]''' का भव्य मंदिर बनवाया । सिरोही के सहसमल देवरा को कुम्भा के नरसिंह डोडिया ने हराया। ====कुंभा की उपाधियां==== कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति तथा कुंभलगढ़ प्रशस्ति से हमें महाराणा कुंभा की उपाधियों की जानकारी मिलती है कुंभा को साहित्य ग्रंथों व प्रशस्तियों में - '''अभिनव व भरताचार्य महाराजाधिराज' रावराय, राय रायन''' (1) '''[[महाराजाधिराज]]''' - राजाओं का राजा होने के कारण । (2) '''महाराजा''' - अनेक राज्यों को अपने अधिकार में रखने के कारण । (3) '''राणा''' - रासो विद्वानों का आश्रय दाता होने के कारण । (4) '''राजगुरु''' - राजनीतिक सिद्धांतों में दक्ष होने तथा विभिन्न राजाओं, सामंतों व जागीरदारों का हितेषी होने के कारण। (5) '''दानगुरु''' - विद्वानों कलाकारों व निर्धनों को दान देने के कारण । (6) '''परमगुरु''' - विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता तथा अपने समय का सर्वोच्च शासक होने के कारण । प्रसिद्ध गीत गोविंद नामक पुस्तक पर लिखी टीका 'रसिकप्रिया' में भी कुंभा की निम्न उपाधियों का वर्णन मिलता है । (7) '''नरपति''' - सामान्य मानव से श्रेष्ठ होने के कारण । (8) '''अश्वपति''' - कुशल घुढ़सवार होने के कारण । (9) '''गणपति''' - गण का अर्थ राज्य होता था अर्थात राज्य का राजा होने के कारण। (10) '''छापगुरु''' - छापामार युद्ध पद्धति में निपुण होने के कारण। (11) '''हिंदू सुरताण''' - समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदुओं की रक्षा करने वाला विभूषित किया गया है। (12) '''नंदीकेश्वर अवतार''' - नंदीकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण। (13) '''नाटकराज''' - नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण। (14) '''शेलगुरु''' - युद्ध में निपुण होने के कारण । (15) '''चापगुरु''' - धनुर्विद्या का ज्ञाता होने के कारण। (16) धीमान बुद्धिमत्ता पूर्वक निर्माण कार्य करवाने के कारण अभिनव भरता चार्य श्रेष्ठ वीणा वादक एवं संगीत के छेत्र में कुंभा के विपुल ज्ञान के कारण संगीत प्रेम के कारण प्रजा पालक जनता का हितैषी होने के कारण। === महाराणा सांगा/महाराणा संग्राम सिंह सिसोदिया (1509-1528 ईस्वी) === {{मुख्य|महाराणा सांगा}} '''महाराणा सांगा''' (महाराणा संग्राम सिंह) (१२ अप्रैल १४८४ - ३० जनवरी १५२८) (राज 1509-1528) [[उदयपुर]] में [[सिसोदिया|सिसोदिया राजपूत]] राजवंश के राजा थे तथा [[राणा रायमल]] के सबसे छोटे पुत्र थे। <ref>Sen, Sailendra (2013). A Textbook of Medieval Indian History. Primus Books. pp. 116–117. ISBN 978-9-38060-734-4</ref> [[File:Depiction of king Rana Sanga.jpg|right|thumb|महाराणा सांगा]] ==== प्रारंभिक जीवन ==== राणा रायमल के तीनों पुत्रों ( [[पृथ्वीराज|कुंवर पृथ्वीराज]], जगमाल तथा राणा सांगा ) में मेवाड़ के सिंहासन के लिए संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। एक भविष्यकर्त्ता के अनुसार सांगा को मेवाड़ का शासक बताया जाता है ऐसी स्थिति में कुंवर पृथ्वीराज व जगमाल अपने भाई राणा सांगा को मौत के घाट उतारना चाहते थे परंतु सांगा किसी प्रकार यहाँ से बचकर अजमेर पलायन कर जाते हैं तब सन् 1509 में अजमेर के कर्मचन्द पंवार की सहायता से राणा सांगा [[मेवाड़]] राज्य प्राप्त हुुुआ | ==== सैन्य वृत्ति ==== [[मुगल]] साम्राज्य के संस्थापक [[बाबर]] ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राणा सांगा हिंदुस्तान में सबसे शक्तिशाली शासक थे, जब उन्होंने इस पर आक्रमण किया, और कहा कि "उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया।" 80 हज़ार घोड़े, उच्चतम श्रेणी के 7 राजा, 9 राओएस और 104 सरदारों व रावल, 500 युद्ध हाथियों के साथ युद्ध लडे। अपने चरम पर, संघ युद्ध के मैदान में 100,000 राजपूतों का बल जुटा सकते थे। यह संख्या एक स्वतंत्र हिंदू राजा के लिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसमें चरवाहा या कोई भी जाति (जैसे [[जाट]], [[गुर्जर| गुर्जरों]] या [[अहीर| अहीरों]]) को शामिल नहीं किया गया था। मालवा, गुजरात और लोधी सल्तनत की संयुक्त सेनाओं को हराने के बाद मुसलमानों पर अपनी जीत के बाद, वह उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बन गया। कहा जाता है कि संघ ने 100 लड़ाइयां लड़ी थीं और विभिन्न संघर्षों में उसकी आंख, हाथ और पैर खो गए थे। <ref>Har Bilas, Sarda. maharana sanga : the hindupat, the last great leader of the rajput race. pp. 15–16.</ref><ref>A Comprehensive History of India: Comprehensive history of medieval India p107</ref> ==== शासन ==== [[चित्र:Rana sanga statue at city palace udaipur.jpg|right|thumb|300px|सिटी पैलेस उदयपुर में राणा सांगा की प्रतिमा।]] महाराणा सांगा ने सभी राजपूत राज्यो को संगठित किया और सभी राजपूत राज्य को एक छत्र के नीचे लाएं। उन्होंने सभी राजपूत राज्यो संधि की और इस प्रकार महाराणा सांगा ने अपना साम्राज्य उत्तर में पंजाब सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में मालवा को जीतकर नर्मदा नदी तक कर दिया। पश्चिम में में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना भरतपुर ग्वालियर तक अपना राज्य विस्तार किया इस प्रकार मुस्लिम सुल्तानों की डेढ़ सौ वर्ष की सत्ता के पश्चात इतने बड़े क्षेत्रफल हिंदू साम्राज्य कायम हुआ इतने बड़े क्षेत्र वाला हिंदू सम्राज्य दक्षिण में विजयनगर सम्राज्य ही था। दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को खातौली व बाड़ी के युद्ध में 2 बार परास्त किया और और गुजरात के सुल्तान को हराया व मेवाड़ की तरफ बढ़ने से रोक दिया। बाबर को खानवा के युद्ध में पूरी तरह से राणा ने परास्त किया और बाबर से बयाना का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार राणा सांगा ने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ दी। 16वी शताब्दी के सबसे शक्तिशाली शासक थे इनके शरीर पर 80 घाव थे। इनको हिंदुपत की उपाधि दी गयी थी। इतिहास में इनकी गिनती महानायक तथा वीर के रूप में की जाती हैं।<ref name=":0">Maharana Sanga; the Hindupat, the last great leader of the Rajput race: Sarda, Har Bilas, Diwan Bahadur, 1867-1955</ref> ==== मालवा पर विजय ==== 1519 में गुजरात और मालवा की संयुक्त मुस्लिम सेनाओं के बीच राजस्थान में गागरोन के निकट राणा सांगा के नेतृत्व में गागरोण की लड़ाई लड़ी गई थी। राजपूत संघ की जीत ने उन्हें चंदेरी किले के साथ-साथ मालवा के अधिकांश हिस्सों पर अधिकार कर लिया। सिलवाडी और मेदिनी राय जैसे शक्तिशाली राजपूत नेताओं के समर्थन के कारण मालवा की विजय राणा साँगा के लिए आसान हो गई। मेदिनी राय ने चंदेरी को अपनी राजधानी बनाया और राणा साँगा का एक विश्वसनीय जागीरदार बन गया। राणा साँगा चित्तौड़ से एक बड़ी सेना के साथ राव मेड़मदेव के अधीन राठौरों द्वारा प्रबलित, और महमूद खिलजी द्वितीय से गुजरात असफ़िलियों के साथ आसफ़ ख़ान से मिला। जैसे ही लड़ाई शुरू हुई राजपूत घुड़सवार सेना ने गुजरात कैवेलरी के माध्यम से एक भयंकर आरोप लगाया, कुछ अवशेष जो बिखरने से बचे। राजपूत घुड़सवार गुजरात के सुदृढीकरण को पार करने के बाद मालवा सेना की ओर बढ़े। सुल्तान की सेनाएँ राजपूत घुड़सवार सेना का सामना करने में असमर्थ थीं और पूरी हार का सामना करना पड़ा। उनके अधिकांश अधिकारी मारे गए और सेना का लगभग सर्वनाश हो गया। आसफ खान के बेटे को मार दिया गया था, और खुद आसफ खान ने उड़ान में सुरक्षा की मांग की थी। सुल्तान महमूद को कैदी, घायल और खून बहाने के लिए लिया गया था। मालवा में जीत और हिंदू शासन को बहाल करने के बाद, सांगा ने राय को क्षेत्र के हिंदुओं से जजिया कर हटाने का आदेश दिया।<ref>Sharma, Gopi Nath (1954). Mewar & the Mughal Emperors (1526-1707 A.D.). S.L. Agarwala. pp. 18–19.</ref><ref>Chaurasia, Radhey Shyam (2002). History of Medieval India: From 1000 A.D. to 1707 A.D. Atlantic Publishers & Dist. pp. 155–160. ISBN 978-81-269-0123-4</ref><ref>Sarda 1970, p. 84-87.</ref> ==== गुजरात पर विजय ==== इडर राज्य के उत्तराधिकार के सवाल पर, गुजरात के सुल्तान, मुजफ्फर शाह, और राणा ने कट्टर दावेदारों का समर्थन किया। 1520 में, सांगा ने इडर सिंहासन पर रायमल की स्थापना की, जिसके साथ मुजफ्फर शाह ने अपने सहयोगी भारमल को स्थापित करने के लिए एक सेना भेजी। सांगा खुद इडर पहुंचे और सुल्तान की सेना को पीछे कर दिया गया। राणा ने गुजराती सेना का पीछा किया और अहमदाबाद के रूप में सुल्तान की सेना का पीछा करते हुए गुजरात के अहमदनगर और विसनगर के शहरों को लूट लिया<ref>Hooja, Rima (2006). A History of Rajasthan. Rupa Publication. pp. 450–451.</ref> ==== लोदी पे विजय ==== {{मुख्य|खतोली का युद्ध}} {{मुख्य|धौलपुर के युद्ध}} [[इब्राहिम लोदी]] ने, अपने क्षेत्र पर संघ द्वारा अतिक्रमण की खबरें सुनने के बाद, एक सेना तैयार की और 1517 में [[मेवाड़]] के खिलाफ मार्च किया। राणा अपनी सेना के साथ राणा लोदी की सीमाओं पर [[खतोली]] में लोदी से मिले और खतोली में आगामी लड़ाई में, लोदी सेना को गंभीर चोट लगी। लोदी सेना बुरी तरह परास्त होकर भाग गई । एक लोदी राजकुमार को पकड़ लिया गया और कैद कर लिया गया। युद्ध में राणा स्वयं घायल हो गए थे। [[इब्राहिम लोदी]] ने हार का बदला लेने के लिए, अपने सेनापति मियां माखन के तहत एक सेना संगा के खिलाफ भेजी। राणा ने फिर से बाड़ी [[धौलपुर के युद्ध|धौलपुर]] के पास बाड़ी युद्ध 1518 ई को लोदी सेना को परास्त किया और लोदी को बयाना तक पीछा किया। इन विजयों के बाद, संगा ने [[आगरा]] की लोदी राजधानी के भीतर, [[फतेहपुर सीकरी]] तक का इलाका खाली कर दिया। [[मालवा]] के सभी हिस्सों को जो मालवा सुल्तानों से लोदियों द्वारा कब्जा कर लिया गया था, को चंदेरी सहित संघ द्वारा रद्द कर दिया गया था। उन्होंने चंदेरी को मेदिनी राय को दिया।<ref>Chandra, Satish (2004). Medieval India: From Sultanat to the Mughals-Delhi Sultanat (1206-1526) - Part One. Har-Anand Publications. ISBN 978-81-241-1064-5.</ref><ref> Duff's Chronology of India, p. 271</ref> ==== मुगलों से संघर्ष ==== 21 अप्रैल 1526 को, तैमूरिद राजा बाबर ने पांचवीं बार भारत पर आक्रमण किया और पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोधी को हराया और उसे मार डाला। युद्ध के बाद, संघ ने पृथ्वीराज कछवाह के बाद पहली बार कई राजपूत वंशों को एकजुट किया और 100,000 राजपूतों की एक सेना बनाई और आगरा के लिए उन्नत किया। राणा साँगा ने पारंपरिक तरीके से लड़ते हुए मुग़ल रैंकों पर आरोप लगाया। उनकी सेना को बड़ी संख्या में मुगल बाहुबलियों द्वारा गोली मार दी गई, कस्तूरी के शोर ने राजपूत सेना के घोड़ों और हाथियों के बीच भय पैदा कर दिया, जिससे वे अपने स्वयं के लोगों को रौंदने लगे। राणा साँगा को मुग़ल केंद्र पर आक्रमण करना असंभव लग रहा था, उसने अपने आदमियों को मुग़ल गुटों पर हमला करने का आदेश दिया। दोनों गुटों में तीन घंटे तक लड़ाई जारी रही, इस दौरान मुगलों ने राजपूत रानियों पर कस्तूरी और तीर से फायर किया, जबकि राजपूतों ने केवल करीबियों में जवाबी कार्रवाई की। "पैगन सैनिकों के बैंड के बाद बैंड ने अपने पुरुषों की मदद करने के लिए एक दूसरे का अनुसरण किया, इसलिए हमने अपनी बारी में टुकड़ी को टुकड़ी के बाद उस तरफ हमारे लड़ाकू विमानों को मजबूत करने के लिए भेजा।" बाबर ने अपने प्रसिद्ध तालकामा या पीनिस आंदोलन का उपयोग करने के प्रयास किए, हालांकि उसके लोग इसे पूरा करने में असमर्थ थे, दो बार उन्होंने राजपूतों को पीछे धकेल दिया, लेकिन राजपूत घुड़सवारों के अथक हमलों के कारण वे अपने पदों से पीछे हटने के लिए मजबूर हो गए। लगभग इसी समय, रायसेन की सिल्हदी ने राणा की सेना को छोड़ दिया और बाबर के पास चली गई। सिल्हदी के दलबदल ने राणा को अपनी योजनाओं को बदलने और नए आदेश जारी करने के लिए मजबूर किया। इस दौरान, राणा को एक गोली लगी और वह बेहोश हो गया, जिससे राजपूत सेना में बहुत भ्रम पैदा हो गया और थोड़े समय के लिए लड़ाई में खामोश हो गया। बाबर ने अपने संस्मरणों में इस घटना को "एक घंटे के लिए अर्जित किए गए काफिरों के बीच बने रहने" की बात कहकर लिखा है। अजा नामक एक सरदार ने अजजा को राणा के रूप में काम किया और राजपूत सेना का नेतृत्व किया, जबकि राणा अपने भरोसेमंद लोगों के एक समूह द्वारा छिपा हुआ था। झल्ला अजा एक गरीब जनरल साबित हुआ, क्योंकि उसने अपने कमजोर केंद्र की अनदेखी करते हुए मुगल flanks पर हमले जारी रखे। राजपूतों ने अपने हमलों को जारी रखा लेकिन मुगल फ्लैक्स को तोड़ने में विफल रहे और उनका केंद्र गढ़वाले मुगल केंद्र के खिलाफ कुछ भी करने में असमर्थ था। जदुनाथ सरकार ने निम्नलिखित शब्दों में संघर्ष की व्याख्या की है: राजपूतों और उनके सहयोगियों को हराया गया था, शवों को बयाना, अलवर और मेवात तक पाया जा सकता है। पीछा करने की लंबी लड़ाई के बाद मुग़ल बहुत थक गए थे और बाबर ने स्वयं मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया था। अपनी जीत के बाद, बाबर ने दुश्मन की खोपड़ी के एक टॉवर को खड़ा करने का आदेश दिया, तैमूर ने अपने विरोधियों के खिलाफ, उनकी धार्मिक मान्यताओं के बावजूद, एक अभ्यास तैयार किया। चंद्रा के अनुसार, खोपड़ी का टॉवर बनाने का उद्देश्य सिर्फ एक महान जीत दर्ज करना नहीं था, बल्कि विरोधियों को आतंकित करना भी था। इससे पहले, उसी रणनीति का उपयोग बाबर ने बाजौर के अफगानों के खिलाफ किया था। पानीपत की तुलना में लड़ाई अधिक ऐतिहासिक थी क्योंकि इसने राजपूत शक्तियों को धमकी और पुनर्जीवित करते हुए उत्तर भारत के बाबर को निर्विवाद मास्टर बना दिया था।<ref>Duff's Chronology of India, p. 271</ref><ref>Percival Spear, p. 25</ref> ==== मृत्यु ==== केवी कृष्णा राव के अनुसार, राणा सांगा बाबर को उखाड़ फेंकना चाहते थे, क्योंकि वह उन्हें भारत में एक विदेशी शासक मानते थे और दिल्ली और आगरा पर कब्जा करके अपने क्षेत्रों का विस्तार करने के लिए, राणा को कुछ अफगान सरदारों ने समर्थन दिया था, जिन्हें लगता था कि बाबर का शासन था। उनके प्रति भ्रामक। राणा ने 21 फरवरी 1527 को मुगल अग्रिम पहरे पर हमला किया और इसे खत्म कर दिया। बाबर द्वारा भेजे गए पुनर्मूल्यांकन समान भाग्य से मिले। हालाँकि, 30 जनवरी 1528 को, सांगा की मृत्यु कालपी में हुई, जो कि अपने ही सरदारों द्वारा जहर देकर मारा गया था, जिन्होंने बाबर के साथ लड़ाई को आत्मघाती बनाने के लिए नए सिरे से योजना बनाई थी। महाराणा सांगा की समाधि दौसा जिले की बसवा तहसील में है। यह सुझाव दिया जाता है कि बाबर की तोपें नहीं थीं, हो सकता है कि सांगा ने बाबर के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की हो। इतिहासकार प्रदीप बरुआ ने ध्यान दिया कि बाबर के तोपों ने भारतीय युद्ध में पुरानी प्रवृत्तियों को समाप्त कर दिया था।<ref>Rao, K. V. Krishna (1991). Prepare Or Perish: A Study of National Security. Lancer Publishers. p. 453. ISBN 978-81-7212-001-6.</ref><ref>Sharma, G.N. Mewar & Mughal Emperors. Agra. pp. 27–29.</ref> === महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया (1572-1597) === {{मुख्य|महाराणा प्रताप}} 'महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया' ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदनुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) (राज. 1572-1597) [[उदयपुर]], [[मेवाड़|मेवाड]] में [[सिसोदिया]] [[राजपूत]] राजवंश के राजा थे। उनका नाम [[इतिहास]] में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल सम्राट [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। [[File:RajaRaviVarma MaharanaPratap.jpg|right|thumb|महाराणा प्रताप सिंह]] ==== जीवन ==== [[चित्र:Statue of Maharana Pratap of Mewar, commemorating the Battle of Haldighati, City Palace, Udaipur.jpg|right|thumb|348x348px|चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , [[उदयपुर]])]] '''[[उदयसिंह द्वितीय|राणा उदयसिंह]]''' केे दूसरी रानी '''धीरबाई''' जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में [[गोगुन्दा]] में हुआ था, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही [[कुम्भलगढ़ दुर्ग|कुुंभलगढ़़ दुुर्ग]] में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक [[मेंडलीफ के पूर्वानुमानित तत्व|में]] [[जोधपुर]] का राठौड़ शासक [[राव चन्द्रसेन|राव चन्द्रसेेन]] भी उपस्थित थे। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल सम्राट]] अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें– # [[जलाल खाँ]] (सितम्बर 1572 ई.) # [[राजा मान सिंह|मानसिंह]] (1573 ई. में ) #[[भगवानदास]] ( सितम्बर, 1573 ई. में ) #[[टोडरमल|राजा टोडरमल]] ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप [[हल्दीघाटी का युद्ध|हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध]] हुआ।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/education/story/10-facts-u-know-about-ruler-of-mewar-maharana-pratap-1-813191.html|title=महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी 10 बातें|website=aajtak.intoday.in|language=hi|access-date=2020-05-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20200304163307/https://aajtak.intoday.in/education/story/10-facts-u-know-about-ruler-of-mewar-maharana-pratap-1-813191.html|archive-date=4 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> ==== हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ईस्वी) ==== {{मुख्य|हल्दीघाटी का युद्ध}} [[चित्र:Chokha, Battle of Haldighati, painted 1822, detail.jpg|अंगूठाकार|291x291px|left|[[हल्दीघाटी का युद्ध|हल्दीघाटी के युद्ध]] में लड़ते हुए महाराणा।]] यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे'''''-''''' [[हकीम खाँ सूरी]]।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|title=4 घंटे की लड़ाई थी हल्दीघाटी, राणा ने की थी मुगलों की हालत पतली|website=aajtak.intoday.in|language=hi|access-date=2020-05-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20180618102121/https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|archive-date=18 जून 2018|url-status=live}}</ref> लड़ाई का स्थल राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व [[राजा मान सिंह|आमेर के राजा मान सिंह]] ने किया था, जिन्होंने लगभग 5,000-10,000 लोगों की सेना की कमान संभाली थी। तीन घंटे से अधिक समय तक चले भयंकर युद्ध के बाद, [[महाराणा प्रताप]] ने खुद को जख्मी पाया जबकि उनके कुछ लोगों ने उन्हें समय दिया, वे पहाड़ियों से भागने में सफल रहे और एक और दिन लड़ने के लिए जीवित रहे। मेवाड़ के हताहतों की संख्या लगभग 1,600 पुरुषों की थी।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=qoRDAAAAYAAJ|title=Military History of India|last=Sarkar|first=Sir Jadunath|date=1960|publisher=Orient Longmans|year=|isbn=978-0-86125-155-1|location=|pages=|language=en|author-link=यदुनाथ सरकार}}</ref> मुगल सेना ने 3500-7800 लोगों को खो दिया, जिसमें 350 अन्य घायल हो गए। इसका कोई नतीजा नही निकला जबकि वे(मुगल) गोगुन्दा और आस-पास के क्षेत्रों पर कब्जा करने में सक्षम थे, वे लंबे समय तक उन पर पकड़ बनाने में असमर्थ थे। जैसे ही साम्राज्य का ध्यान कहीं और स्थानांतरित हुआ, [[महाराणा प्रताप|प्रताप]] और उनकी सेना बाहर आ गई और अपने प्रभुत्व के पश्चिमी क्षेत्रों को हटा लिया।<ref>{{Cite web|url=http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00701023&ct=67|title=Wayback Machine|last=|first=|date=2017-09-13|website=web.archive.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20170913231208/http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00701023%26ct%3D67|archive-date=13 सितंबर 2017|dead-url=|access-date=2020-12-12|url-status=bot: unknown}}</ref> इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध मे [[राणा पूंजा]] [[भील]] का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books/about/Maharana_Pratap.html?id=K0UnRk-rRa4C|title=Maharana Pratap|last=Rana|first=Bhawan Singh|date=2005|publisher=Diamond Pocket Books (P) Ltd.|year=|isbn=978-81-288-0825-8|location=|pages=67-71|language=en}}</ref> इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी ==== दिवेर-छापली का युुद्ध (1582 ईस्वी)==== {{मुख्य|दिवेर-छापली का युद्ध}} [[चित्र:Rana pratap Birla mandir 6 dec 2009 (43).JPG|349x349px|thumb|left|[[लक्ष्मी नारायण मंदिर, दिल्ली|बिरला मंदिर, दिल्ली]] में महाराणा प्रताप का शैल चित्र]] राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ति हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "''मेवाड़ का मैराथन''" कहा है। मेवाड़ के उत्तरी छोर का दिवेर का नाका अन्य नाकों से विलक्षण है। इसकी स्थिति मदारिया और कुंभलगढ़ की पर्वत श्रेणी के बीच है। प्राचीन काल में इस पहाड़ी क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहारों का आधिपत्य था, जिन्हें इस क्षेत्र में बसने के कारण मेर कहा जाता था।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=177|language=en}}</ref> यहां की उत्पत्यकाताओं में इस जाति के निवास स्थलों के कई अवशेष हैं। मध्यकालीन युग में देवड़ा जाति के राजपूत यहां प्रभावशील हो गये, जिनकी बस्तियां आसपास के उपजाऊ भागों में बस गई और वे उदयपुर के निकट भीतरी गिर्वा तक प्रसारित हो गई। चीकली के पहाड़ी भागों में आज भी देवड़ा राजपूत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। देवड़ाओं के पश्चात यहां रावत शाखा के राजपूत बस गये।<ref>भवान सिंह राणा द्वारा ''"महाराणा प्रताप"''. p.81 {{ISBN|978-8128808258}}</ref> इन विभिन्न समुदायों के दिवेर में बसने के कई कारण थे। प्रथम तो दिवेर का एक सामरिक महत्व रहा है, जो समुदाय शौर्य के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, वे उत्तरोत्तर अपने पराक्रम के कारण यहां बसते रहे और एक-दूसरे पर प्रभाव स्थापित करते रहे। दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि इसकी स्थिति ऐसे मार्गों पर है, जहां से मारवाड़, मालवा, गुजरात, अजमेर के आदान-प्रदान की सुविधा रही है। ये मार्ग तंग घाटियों वाले उबड़-खाबड़ मार्ग के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इनके साथ सदियों से आवागमन होने से घोड़ों की टापों के चिन्ह पत्थरों पर अद्यावधि विद्यमान है। मार्गों में पानी की भी कमी नहीं है, जिसके लिये जगह-जगह झरनों के बांध के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से स्थान-स्थान पर चौकियों के ध्वंसाशेष भी दिखाई देते हैं। जब अकबर ने कुंभलगढ़, देवगढ़, मदारिया आदि स्थानों पर कब्जा कर लिया तो वहां की चौकियों से संबंध बनाए रखने के लिए दिवेर का चयन एक रक्षा स्थल के रूप में किया गया। यहां बड़ी संख्या में घुड़सवारों और हाथियों का दल रखा गया। इंतर चौकियों के लिए रसद भिजवाने का भी यह सुगम स्थान था।<ref>{{Cite web|url=https://www.goodreads.com/work/best_book/25072560-a-history-of-the-modern-world|title=A History Of The Modern World|website=www.goodreads.com|access-date=2020-11-24}}</ref> ज्यों महाराणा प्रताप छप्पन के पहाड़ी स्थानों में बस्तियां बसाने और मेवाड़ के समतल भागों में खेतों को उजाड़ने में व्यस्त थे त्यों अकबर दिवेर के मार्ग से उत्तरी सैनिक चौकियों का पोषण भेजने की व्यवस्था में संलग्न रहा। प्रताप की नीतियों छप्पन की चौकियों को हटाने में तथा मध्यभागीय मेवाड़ की चौकियों को निर्बल बनाने में अवश्य सफल हो गये, परंतु दिवेर का केंद्र अब भी मुगलों के लिए सुदृढ़ था।<ref>{{Cite web|url=http://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|title="राजस्थान का पर्यटन"|last=प्रभारी|first=निदेशक|date=2017|website=[[राजस्थान सरकार]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20211228001025/https://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|archive-date=28 दिसंबर 2021|dead-url=|access-date=2020-11-24|url-status=bot: unknown}}</ref> इस पृष्ठभूमि में दिवेर का महाराणा प्रताप का व मुगलों का संघर्ष जुड़ा हुआ था। इस युद्ध की तैयारी के लिए प्रताप ने अपनी शक्ति सुदृढ़ करने की नई योजना तैयार की। वैसे छप्पन का क्षेत्र मुगल से युक्त हो चला था और मध्य मेवाड़ में रसद के अभाव में मुगल चौकियां निष्प्राण हो गई थी अब केवल उत्तरी मेवाड़ में मुगल चौकियां व दिवेर के संबंध में कदम उठाने की आवश्यकता थी। इस संबंध में महाराणा ने गुजरात और मालवा की ओर अपने अभियान भेजना आरंभ किया और साथ ही आसपास के मुगल अधिकार क्षेत्र में छापे मारना शुरू कर दिया। इसी क्रम में [[भामाशाह]] ने, जो मेवाड़ के प्रधान और सैनिक व्यवस्था के अग्रणी थे, मालवे पर चढ़ाई कर दी और वहां से 2.3 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियां दंड में लेकर एक बड़ी धनराशि इकट्ठी की। इस रकम को लाकर उन्होंने महाराणा को चूलिया ग्राम में समर्पित कर दी। इसी दौरान जब शाहबाज खां निराश होकर लौट गया था, तो महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इन दोनों स्थानों पर महाराणा का अधिकार होना दिवेर पर कब्जा करने की योजना का संकेत था।<ref>{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-and-battle-of-dewar-marathon-of-mewad-118062600044_1.html|title=दिवेर का महायुद्ध, हल्दीघाटी के बाद यहां महाराणा प्रताप ने हराया था मुगल सेना को, कहा जाता है 'मैराथन ऑफ मेवाड़'...|last=WD|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-11-24}}</ref> अतएव इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए नई सेना का संगठन किया गया। जगह-जगह रसद और हथियार इकट्ठे किए गए। सैनिकों को धन और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। सिरोही, ईडर, जालोर के सहयोगियों का उत्साह परिवर्धित कराया गया। ये सभी प्रबंध गुप्त रीति से होते रहे। मुगलों को यह भ्रम हो गया कि प्रताप मेवाड़ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं। ऐसे भ्रम के वातावरण से बची हुई मुगल चौकियों के सैनिक बेखटके रहने लगे।<ref>{{Cite web|url=https://link.springer.com/openurl?genre=book&isbn=978-1-349-27193-1|title=Defending India {{!}} SpringerLink|website=link.springer.com|language=en-gb|access-date=2020-11-24}}</ref> जब सब प्रकार की तैयारी हो गई तो महाराणा प्रताप, [[अमर सिंह प्रथम|कु. अमरसिंह]], [[भामाशाह]], चुंडावत, शक्तावत, [[सोलंकी वंश|सोलंकी]], [[परिहार गोत्र|पडिहार,]] [[रावत]] शाखा के [[राजपूत]] और अन्य राजपूत सरदार दिवेर की ओर दल बल के साथ चल पड़े।{{Sfn|Jacques|2006|p=89-90}} दिवेर जाने के अन्य मार्गों व घाटियों में भीलों की टोलियां बिठा दी गई, जिससे मेवाड़ में अन्यत्र बची हुई सैनिक चौकियों का दिवेर से कोई संबंध स्थापित न हो सके।<ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/maharana-pratap-not-akbar-won-battle-of-haldighati-rajasthan-history-book-1026240-2017-07-25|title=Rajasthan rewrites history: Maharana Pratap, not Akbar, won Battle of Haldighati|last=JaipurJuly 25|first=Sharat Kumar|last2=July 25|first2=2017UPDATED:|website=India Today|language=en|access-date=2020-11-24|last3=Ist|first3=2017 21:58}}</ref> [[चित्र:Maha Rana Pratap Singh.jpg|अंगूठाकार|392x392पिक्सेल|महाराणा प्रताप चित्र।]] अचानक महाराणा की फौज दिवेर पहुंची तो मुगल दल में भगदड़ मच गई। मुगल सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी भाग की तलाश में उत्तर के दर्रे से भागने लगे। महाराणा ने अपने दल के साथ भागती सेना का पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कंटीला तथा ऊबड़-खाबड़ था कि मैदानी युद्ध में अभ्यस्त मुगल सैनिक विथकित हो गए। अन्ततोगत्वा घाटी के दूसरे छोर पर जहां कुछ चौड़ाई थी और नदी का स्त्रोत भी था, वहां महाराणा ने उन्हें जा दबोचा।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप सिंह|url=http://www.badaunexpress.com/archives/148102|website=www.badaunaexpress.com|accessdate=9 May 2019}}{{Dead link|date=दिसंबर 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> दिवेर थाने के मुगल अधिकारी सुल्तानखां को कुं. अमरसिंह ने जा घेरा और उस पर भाले का ऐसा वार किया कि वह सुल्तानखां को चीरता हुआ घोड़े के शरीर को पार कर गया। घोड़े और सवार के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराणा ने भी इसी तरह बहलोलखां और उसके घोड़े का काम तमाम कर दिया। एक राजपूत सरदार ने अपनी तलवार से हाथी का पिछला पांव काट दिया। इस युद्ध में विजयश्री महाराणा के हाथ लगी।<ref>{{Cite book|url=http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|title=History of battles and seiges|last=Jacques|first=Tony|publisher=|year=2006|isbn=978-0-313-33536-5|location=|pages=|archive-url=https://web.archive.org/web/20150626120848/http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|archive-date=2015-07-23}}</ref> यह महाराणा की विजय इतनी कारगर सिद्ध हुई कि इससे मुगल थाने जो सक्रिय या निष्क्रिय अवस्था में मेवाड़ में थे जिनकी संख्या 36 बतलाई जाती है, यहां से उठ गए। शाही सेना जो यत्र-तत्र कैदियों की तरह पडी हुई थी, लड़ती, भिड़ती, भूखे मरते उलटे पांव मुगल इलाकों की तरफ भाग खड़ी हुई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=QjtuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Sharma|first=Sri Ram|date=1900|publisher=D. A.-V. College Managing Committee|year=|isbn=|location=|pages=117-156|language=en}}</ref> यहां तक कि 1585 ई. के आगे अकबर भी उत्तर - पश्चिम की समस्या के कारण मेवाड़ के प्रति उदासीन हो गया, जिससे महाराणा को अब चावंड में नवीन राजधानी बनाकर लोकहित में जुटने का अच्छा अवसर मिला। दिवेर की विजय महाराणा के जीवन का एक उज्ज्वल कीर्तिमान है। जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। एक अर्थ में हल्दीघाटी का युद्ध में राजपूतो ने रक्त का बदला दिवेर में चुकाया। दिवेर की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि महाराणा के त्याग और बलिदान की भावना के नैतिक बल ने सत्तावादी नीति को परास्त किया। कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=EAl6rgEACAAJ|title=Maharana Pratap|last=Kumar|first=Ajay|date=2007|publisher=|year=|isbn=978-81-88594-18-4|location=|pages=102|language=en}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=256-267|language=en}}</ref> जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।<ref>{{Cite web|url=https://www.linkedin.com/pulse/legacy-indias-maharana-pratap-lives-today-stephen-manallack#:~:text=When%20Maharana%20Pratap%20(also%20known,custodians%20of%20this%20great%20lineage.|title=The legacy of India&#39;s Maharana Pratap lives on today|website=www.linkedin.com|access-date=2020-11-24}}</ref> ==== सफलता और अवसान ==== पू. 1579 से 1585 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर दिया। महाराणा जी की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।<ref>{{Cite web|url=https://zeenews.india.com/culture/maharana-pratap-jayanti-lesser-known-facts-about-the-fearless-warrior-2282205.html|title=Maharana Pratap Jayanti: Lesser known facts about the fearless warrior|last=|first=|date=2020-05-09|website=Zee News|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200601000000/https://zeenews.india.com/culture/maharana-pratap-jayanti-lesser-known-facts-about-the-fearless-warrior-2282205.html|archive-date=2020-06-01|dead-url=|access-date=2020-12-07}}</ref> महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी [[चावंड]] में उनकी मृत्यु हो गई।<ref name=":0">{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-in-hindi-115052100030_1.html|title=मेवाड़ का वीर योद्धा महाराणा प्रताप {{!}} history of maharana pratap in hindi|last=Webdunia|website=hindi.webdunia.com|language=hi|archive-url=https://web.archive.org/web/20190728185404/http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-in-hindi-115052100030_1.html|archive-date=28 जुलाई 2019|access-date=2020-05-30|url-status=dead}}</ref> महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया।<ref>{{Cite news|url=https://www.bbc.com/hindi/india-46585144|title=हिंदू-मुसलमान की लड़ाई नहीं थी अकबर और महाराणा प्रताप के बीच|last=फ़ज़ल|first=रेहान|date=2018-12-17|work=BBC News हिंदी|access-date=2020-05-30|language=hi|archive-url=https://web.archive.org/web/20200517194326/https://www.bbc.com/hindi/india-46585144|archive-date=17 मई 2020|url-status=live}}</ref> '''एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। '' ==== कुछ महत्वपूर्ण तथ्य ==== इतिहासकार [[विजय नाहर]] की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार कुछ तथ्य उजागर हुए।<ref>{{Cite book|author=विजय नाहर|title=हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप|publisher=पिंकसिटी पब्लिशर्स| isbn=978-93-80522-45-6|year=2011|page= 270}}</ref> 1 .महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति -छापा मार युद्ध प्रणाली इजाद की। वे स्वयं तो इसका प्रयोग नहीं कर सके परन्तु महाराणा प्रताप ,महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका सफल प्रयोग करते हुए मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप के विषय में भारतीय इतिहास में लिखी भ्रांतियों को दूर करती विजय नाहर की पुस्तक "हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://udaipurkiran.in/hindi/1208578/|website=www.udaipurkiran.in|accessdate=9 May 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190509155336/https://udaipurkiran.in/hindi/1208578/|archive-date=9 मई 2019|url-status=dead}}</ref> 2. महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से नहीं हारे। उसे एवं उसके सेनापतियो को धुल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप जीते|महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी में पराजित होने के बाद स्वयं अकबर ने जून से दिसंबर 1576 तक तीन बार विशाल सेना के साथ महाराणा पर आक्रमण किए, परंतु महाराणा को खोज नहीं पाए, बल्कि महाराणा के जाल में फंसकर पानी भोजन के अभाव में सेना का विनाश करवा बैठे। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी हाथ मलता अरब चला गया। शाहबाज खान के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध तीन बार सेना भेजी गई परंतु असफल रहा। उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध सेना भिजवाई गई और पीट-पीटाकर लौट गया। 9 वर्ष तक निरंतर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध आक्रमण करता रहा। नुकसान उठाता रहा अंत में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया।<ref>{{cite web|title="हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/udaipur+kiran+hindi-epaper-udaihin/maharana+pratap+ke+vishay+me+bharatiy+itihas+me+likhi+bhrantiyo+ko+dur+karati+vijay+nahar+ki+pustak+hinduva+sury+maharana+pratap+ki+samiksha-newsid-115840604?listname=topicsList&index=0&topicIndex=0&mode=pwa|website=www.m.dailyhunt.in|accessdate=9 May 2019}}</ref> 3. ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उन्हें घांस की रोटी खानी पड़ी अकबर को संधि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो। इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुंदर बगीचा लगवाया| महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएं महाराणा प्रताप करते थे। फिर ऐसी घटना कैसे हो सकती है कि महाराणा के परिवार को घांस की रोटी खानी पड़ी। अपने उतरार्ध के बारह वर्ष सम्पूर्ण मेवाड़ पर शुशाशन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन दिया ।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप के विषय में भारतीय इतिहास में लिखी भ्रांतियों को दूर करती विजय नाहर की पुस्तक "हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://hindi.dailykiran.com/1103917/|website=www.hindi.dailykiran.com|access-date=9 May 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190510052152/https://hindi.dailykiran.com/1103917/|archive-date=10 मई 2019|url-status=dead}}</ref> ==इन्हें भी देखें== * [[मेवाड़]] * [[हल्दीघाटी का युद्ध]] * [[दिवेर-छापली का युद्ध]] * [[महाराणा प्रताप]] * [[गोहिल राजवंश]] * [[उदयपुर रियासत]] * [[सिसोदिया (राजपूत)]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:भारत के राजवंश]] [[श्रेणी:राजस्थान का इतिहास]] awmu7phs963pjg8ld2fai10tr6wojib 6543774 6543733 2026-04-25T07:01:31Z चाहर धर्मेंद्र 703114 [[Special:Diff/6514268|6514268]] से [[Special:Diff/6543733|6543733]] तक 2 अवतरण पूर्ववत किए 6543774 wikitext text/x-wiki {{में विलय|मेवाड़ के गुहिल|date=जनवरी 2023}} गुहिल/गहलौत राजवंश एक प्रमुख [[राजवंश]] था जो [[भारतीय उपमहाद्वीप]] के [[राजस्थान]] क्षेत्र में [[मेवाड़|मेवाड़]] शहर में शासन करता था | इसका प्रारंभिक संंस्थापक [[राजा गुहादित्य]] थेे, जिन्होंने छटी शताब्दी में गुहिल वंंश की नींव रखी। गुुुहादित्य के पश्चात् '''734 ई'. में [[बप्पा रावल]] को गुहिल वंश का वास्तविक संंस्थापक माना जाता है। शुरुआत में गुहिल राजवंश [[गुर्जर-प्रतिहार राजवंश|प्रतिहार]] साम्राज्य के सामंतों का रूप निभाया करते थे लेकिन रावल अल्लट के द्वारा [[गुर्जर|प्रतिहार]] सम्राट देवपाल के वध के बाद वह स्वतन्त्र बन गए | दसवीं शताब्दी में गुहिल रावल [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट राजवंशज]] के अधीन हुआ करते थे तथा ग्यारहवीं शताब्दी में [[परमार वंश|परमार]] और [[चौहान वंश|चौहान]] साम्राज्यों के अधीन शासन करते थे | बारहवीं शताब्दी में गुहिल राजवंश दो हिस्सों में विभाजित होगया जिनमें से मुख्या राजवंश मेवाड़ पर वर्ष 1303 तक शासन करता रहा जब मुसलमान आक्रमणकारी [[अलाउद्दीन खिलजी]] ने [[चित्तौड़गढ़|चित्तौड़]] पर घेरा डालकर गुहिलों को पराजित करा था |[[File:Map rajasthan mewar.png|thumb|मेवाड़]] == प्राचीन इतिहास == {{मुख्य|शिवि}} मेवाड़ का प्राचीन नाम [[शिवि]] था जिसकी राजधानी [[मध्यमिका]] (जिसे वर्तमान में नगरी कहते हैं) थी यहां पर [[मेहर]] जनजाति का अधिकार था और वह हमेशा [[मलेच्छों]] से संघर्ष करते रहे इसलिए इस क्षेत्र को मैद अर्थात मलेच्छों को मारने वाला की संज्ञा दी गई है । '''[[मैदपाट]] को धीरे धीरे मेवाड़ कहा जाने लगा । मेवाड़ की राजधानी [[उदयपुर]] बनी ।''' मेवाड़ के राजा स्वयं को [[राम]] के वंशज बताते हैं, इसी कारण भक्तों एवं चरणों ने मेवाड़ के शासकों को [[रघुवंशी]] तथा '''हिंदुआ सूरज''' कहने लगे गुहिल राज्य के चिन्ह में जो '''दृढ़ राखे धर्म को ताहि राखे करतार''' अंकित है । मेवाड़ का गुहिल वंश राजस्थान का ही नहीं अपितु संसार के प्राचीनतम राजवंशों में से एक है जीसने 1500 वर्षों से अधिक के लंबे समय तक एक प्रदेश पर शासन किया । == मेवाड़ की शासक वंशावली (ल. 566 – 1949 ईस्वी) == {{इन्हें भी देखें|मेवाड़ की शासक वंशावली}} छठी शताब्दी में, तीन अलग-अलग गुहिल राजवंशों ने वर्तमान [[राजस्थान]] में शासन करने के लिए जाना जाता है: # [[नागदा]]-[[अहार]] के गुहिल # किष्किंधा के गुहिल (वर्तमान में [[कल्याणपुर, राजस्थान|कल्याणपुर]]) # धवागर्ता के गुहिल (वर्तमान में धोर) === गुहिल/गहलौत राजवंश (ल. 566 – 1303 ईस्वी) === {{मुख्य|गुहिल राजवंश}} *[[गुहादित्य]] / गोहिल (565–580 ) *भोज (I) (580–602) *महेन्द्र (I) (602–616) *नागादित्य (616–646) *शिलादित्य (646–661) *अपराजित (661–697) *महेन्द्र (II) (697–728) *[[बप्पा रावल|कालभोज बप्पा रावल]] (728/734–753)बापा रावल ने मुस्लिम देशों को भी जीता । <ref>{{cite book |last1=Ganguli |first1=Kalyan Kumar |title=Cultural History of Rajasthan |date=1983 |publisher=Sundeep |url=https://books.google.co.in/books?id=PXstAAAAMAAJ&q=founder+of+guhila+dynasty&dq=founder+of+guhila+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj63d2M453cAhWIsY8KHYxJCeoQ6AEIQjAG |accessdate=14 जुलाई 2018 |language=en |archive-url=https://web.archive.org/web/20180714110557/https://books.google.co.in/books?id=PXstAAAAMAAJ&q=founder+of+guhila+dynasty&dq=founder+of+guhila+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj63d2M453cAhWIsY8KHYxJCeoQ6AEIQjAG |archive-date=14 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> *खुमाण (I) (753–773) *मत्तट (773–793) *भृतभट्ट सिंह (793–813) *अथाहसिंह (813–828) *खुमाण (II) (828–853) *महाकाय (853–878) *खुमाण (III) (878–926) *भृतभट्ट (II) (926-951 ) *अल्लट (951-971) *नरवाहन (971-979) *शालिवाहन (973–977 ) *शक्तिकुमार (977–993 ) *अमरप्रसाद (993–998) *शुचिवर्मा (998–1010) *नरवर्मन (1010–1035) *कीर्तिवर्मा (1035–1050) *योगराज (1050–1075) *वैरट (1075–1090) *हंसपाल (1090–1100) *वैरिसिंह (1100–1122) *विजयसिंह (1122–1130) *वैरिसिंह (II) (1130–1136) *अरिसिंह (1136–1145) *चोङसिंह (1145–1151) *विक्रम सिंह (1151–1158) *[[रणसिंह]] (1158–1165) === गुहिल/गहलौत राजवंश का विभाजन === [[रणसिंह]] (1158 ई.) इन्हीं के शासनकाल में गुहिल/गहलौत वंश दो शाखाओं में बट गया। * '''प्रथम (रावल शाखा)'''— रणसिंह के पुत्र क्षेमसिंह रावल शाखा का निर्माण कर मेवाड़ पर शासन किया। *'''द्वितीय (राणा शाखा)'''— रणसिंह के दूसरे पुत्र राहप ने सिसोदा ठिकानों की स्थापना कर राणा शाखा की शुरुआत की । ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर सिसोदिया कहलाए। ==== रावल शाखा (ल. 1165 – 1303 ईस्वी) ==== *[[क्षेमसिंह]] (1165–1183) *[[सामंत सिंह]] (1183–1188) *[[कुशल सिंह]] (1188–1195) *[[महानसिंह]] (1195–1202) *[[पद्मसिहा]] (1202–1213) *[[जैत्र सिंह]] (1213–1253) *[[तेज सिंह]] (1253–1273 ) *[[समर सिंह]] (1273–1301 ) *[[रतन सिंह]] (1301–1303 ) === राणा शाखा (ल. 1165 – 1326 ईस्वी) === *[[रहपा]] (1162) *नरपति (1185) *दिनकर (1200) *जशकरन (1218) *नागपाल (1238) *कर्णपाल (1266) *भुवनसिंह (1280) *भीमसिंह (1297) *जयसिंह (1312) *लखनसिंह (1318) *[[अरिसिंह]] (1322) *[[हम्मीर सिंह]] (1326) === सिसोदिया राजवंश (ल. 1326 – 1949 ईस्वी) === {{मुख्य|सिसोदिया राजवंश}} * '''''विषम घाटी पंचानन''''' '''[[राणा हम्मीर सिंह]]''' (1326–1364) ''विषम घाटी पंचानन'' (सकंट काल मे सिंह के समान) के नाम से जाना जाता है, यह संज्ञा [[राणा कुम्भा]] ने [[कीर्ति स्तम्भ]] प्रशस्ति में दी। <ref name="sen2">{{Cite book |last=Sen |first=Sailendra |title=A Textbook of Medieval Indian History |publisher=Primus Books |year=2013 |isbn=978-9-38060-734-4 |pages=116–117}}</ref> * [[क्षेत्र सिंह]] (1364–1382) * [[राणा लाखा|लाखा सिंह]] (1382–1421) * [[राणा मोकल]] (1421–1433) * '''''कुंभकर्ण''''' '''[[राणा कुंभा]]''' (1433–1468) महाराणा कुंभकर्ण सिंह ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती राजनीति को एक नया रूप दिया। इतिहास में ये ''महाराणा कुंभा'' के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। महाराणा कुंभा को [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग|चित्तौड़ दुर्ग]] का आधुुुनिक निर्माता भी कहते हैं क्योंकि इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश वर्तमान भाग का निर्माण कराया ।<ref name="sen2"/> * [[राणा उदय सिंह|उदय सिंह प्रथम(ऊदा)]] (1468–1473) * [[राणा रायमल]] (1473–1509) * '''''हिंदुआ सूरज''''' '''[[राणा सांगा]]''' (1509–1528) महाराणा संग्राम सिंह [[मुगल]] साम्राज्य के संस्थापक [[बाबर]] ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राणा सांगा हिंदुस्तान में सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे, जब उन्होंने इस पर आक्रमण किया, और कहा कि ''उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया।'' <ref>Har Bilas, Sarda. maharana sanga : the hindupat, the last great leader of the rajput race. pp. 15–16.</ref><ref>A Comprehensive History of India: Comprehensive history of medieval India p107</ref> * [[रतन सिंह द्वितीय]] (1528–1531) * [[विक्रमादित्य सिंह]] (1531–1536) * [[बनवीर सिंह]] (1536–1537) * [[उदय सिंह]] (1537–1572) * '''''मेवाड़ी राणा''''' '''[[महाराणा प्रताप]]''' (1572–1597) उन्होंने मुगल सम्राट [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया और अंत महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को युद्ध में हराया, जिसमें [[दिवेर का युद्ध]] (1582) भी हैं। <ref>{{Cite web|url=https://infohindi.com/maharana-pratap-ki-jivani-biography-mah/|title=महाराणा प्रताप की जीवनी Biography of Maharana Pratap in Hindi|date=2016-06-06|website=InfoHindi.com|language=en-US|access-date=2020-11-24|archive-date=15 मई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210515025136/https://infohindi.com/maharana-pratap-ki-jivani-biography-mah/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite book|author=विजय नाहर|title=हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप | publisher=पिंकसिटी पब्लिशर्स| isbn=978-93-80522-45-6|year=2011|page= 275}}</ref> * '''''चक्रवीर''''' '''[[अमर सिंह प्रथम]]''' (1597–1620) दिवेर के युद्ध में मेवाड़ के राजा अमर सिंह प्रथम तथा मुगल सेना के बीच सन 1606 ई. में हुआ था। इस युद्ध में अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खान को स्वयं मार दिया था। कारण उन्हें ''चक्रवीर'' के नाम से जाना गया। मेवाड़ न जीत पाने के कारण अकबर ने अपनी पुत्री का विवाह सन्धि स्वरुप अमरसिंह से करवाया था।<ref>{{Cite book|title=History of Jahangir|last=Prasad|first=Beni|pages=227}}</ref><ref>{{Cite book|title=The Mughal Throne: The Saga of India's Great Emperors|last=Eraly|first=Abraham|pages=259}}</ref> * [[कर्ण सिंह]] (1620–1628) * [[जगत सिंह प्रथम]] (1628–1652) * [[राज सिंह प्रथम]] (1652–1680) * [[जय सिंह]] (1680–1698) * [[अमर सिंह द्वितीय]] (1698–1710) * [[संग्राम सिंह द्वितीय]] (1710–1734) * [[जगत सिंह द्वितीय]] (1734–1751) * [[प्रताप सिंह द्वितीय]] (1751–1753) * [[राज सिंह द्वितीय]] (1753–1761) * [[राणा अरि सिंह]] (1761–1773) * [[राणा हम्मीर २|हम्मीर सिंह द्वितीय]] (1773–1778) * [[भीम सिंह]] (1778–1828) * [[जवान सिंह]] (1828–1838) * [[सरदार सिंह]] (1838–1842) * [[स्वरूप सिंह]] (1842–1861) * [[महाराणा शम्भू|शम्भू सिंह]] (1861–1874) * [[महाराणा सुज्जन सिंह|सुज्जन सिंह]] (1874–1884) * [[फतेह सिंह]] (1884–1930) * [[भूपाल सिंह]] (1930–1949), अंतिम शासक == महाराजा गुहादित्य == {{मुख्य|राजा गुहादित्य}} [[सूर्यवंश|सूर्यवंशी]] महाराजा [[कनक सेन]] की '8वी पीढ़ी' में '''[[शिलादित्य]]''' नामक एक राजा हुवे । जो [[वल्लभीपुर]] में राज करते थे वहां पर मलेच्छों ने आक्रमण कर वल्लभीपुर को तहस-नहस कर दिया व शिलादित्य वीरगति को प्राप्त हुए शिलादित्य की सभी रानियां उनके साथ [[सती]] हो गई। शिलादित्य की एक रानी [[पुष्पावती]] गर्भवती थी तथा पुत्र की मन्नत मांगने के लिए वह अपने [[परमार वंश]] के पिता के राज्य [[चंद्रावती]] आबू में [[जगदंबा देवी]] के दर्शन करने गई थी, पुष्पावती अपने पिता के घर से जब वापस वल्लभीपुर जा रही थी तो रास्ते में वल्लभीपुर के विनाश का समाचार मिला पुष्पावती यह सुनकर वहां पर सती होना चाहती थी, परंतु गर्भावस्था के कारण यह संभव नहीं था पुष्पावती ने अपनी सहेलियों के साथ 'मल्लिया' नामक गुफा में शरण ली जहां उसने अपने पुत्र का को जन्म दिया गुफा के पास वीरनगर नामक गांव था जिसमें कमलावती नाम की ब्राह्मणी रहती थी । रानी पुष्पावती ने उसे अपने पास बुलाकर अपने पुत्र के लालन-पालन का दायित्व सौंपकर सती हो गई । कमलावती ने रानी के पुत्र को अपने पुत्र की भांति रखा । '''वह बालक गुफा में पैदा हुआ था और उस प्रदेश के लोग गुफा को 'गोह' कहते थे अतः कमलावती ने उस बच्चे का नाम गोह रखा जो आगे चलकर गुहिल के नाम से विख्यात हुआ ।''' कमलावती ने बालक गुहिल को [[इडर]] के [[भील]] राजा [[मांडलिक]] को सौंप दिया । बालक गूहिल राजा मांडलिक के राजमहल में रहता और भील बालकों के साथ घुड़सवारी करता, भील कुमार नल और गुहिल का साथ रहा , कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार गुहील ने इडर के राजा मांडलिक भील की हत्या कर दी और 566 ई में '''गुहील वंश''' की नींव रखी । हत्या कर देने वाली घटना असत्य भी हों सकती हैं। ''गोहिलादित्य का नाम उसके वंशधरों का गोत्र हो गया । गुहिल के वंशज गोहिल अथवा गुहिलोत के नाम से विख्यात हुए।'' == कालभोज/बप्पा रावल (734–753) == {{मुख्य|बप्पा रावल}} इसी गुहिलादित्य ने 566 ई के आस-पास मेवाड़ में इस वंश की नींव रखकर '''[[नागदा]]''' को गुहिल वंश की राजधानी बनाई । गोहिल की 'आठवीं पीढ़ी' में '''[[महेंद्र-2]]''' नामक एक राजा हुआ जिसके व्यवहार से वहां के भील उससे नाराज हो गए एक दिन जब नागादित्य जंगल में शिकार खेलने गया तो भीलों ने उसे घेरकर वही मार डाला और इडर राज्य पर पुनःअपना अधिकार जमा लिया नागादित्य की हत्या भीलों ने कर दी तो क्षत्रीय को उसके 3 वर्षीय पुत्र '''बप्पा''' के जीवन को बचाने की चिंता सताने लगी। इसी समय वीरनगर की कमलावती के वंशज जो कि गोहिल राजवंश के कुल पुरोहित थे उन्होंने बप्पा को लेकर पांडेय नामक दुर्ग में गए इस जगह को बप्पा के लिए सुरक्षित ना मानकर बप्पा को लेकर लेकर पराशर नामक स्थान पर पहुंचे इसी स्थान के पास त्रिकूट पर्वत है इसकी तलहटी में नागेंद्र नामक नगर वर्तमान नागदा बसा हुआ था । वहां पर [[शिव]] की उपासना करने वाले बहुत से ब्राह्मण निवास करते थे हारित ऋषि ने बप्पा रावल का लालन पालन करके करने का भार उठाया। ''बप्पारावल हारित ऋषि की गाय को चराते थे उन गायों में से एक गाय जो कि सुबह बहुत ज्यादा दूध देती थी परंतु संध्या के समय आश्रम में वापस आती तो उसके थनों में दूध नहीं मिलता था ऋषियों को संदेह हुआ कि बप्पा एकांत में उस गाय का दूध पी जाता है बप्पा को जब इस बात का पता चला तो वह वास्तविकता जानने के लिए दूसरे दिन जब गायों को लेकर जंगल में गया तो उसी गाय पर अपनी नजर रखी । बप्पा ने देखा कि वह गाय एक निर्जन गुफा में घुस गई बप्पा भी उसके पीछे गया और उसने वहां देखा की बेल पत्तों के ढेर पर वह गाय अपने दूध की धार छोड़ रही थी बप्पा ने उसके पास जाकर उन पत्तों को हटाया तो उसके नीचे एक [[शिवलिंग]] था । जिसके ऊपर दूध की धार गिर रही थी बप्पा ने उसी शिवलिंग के पास एक समाधि लगाए हुए योगी को देखा उस योगी का ध्यान टूट गया परंतु उसने बप्पा से कुछ नहीं कहा बप्पा उस योगी [[हरित ऋषि]] की सेवा करने लगा हरित ऋषि ने उसकी सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर शिव मंत्र की दीक्षा देकर उसे एकलिंग के दीवान की उपाधि दी । हरित ऋषि के शिवलोक जाने का समय आया तो उसने बप्पा को निश्चित समय पर आने को कहा बप्पा निश्चित समय पर आने में लेट हो गया तब तक हरित ऋषि रथ पर सवार होकर शिवलोक की तरफ चल पड़े उन्होंने बप्पा को आते देखकर रथ की चाल धीमी करवाकर बप्पा को अपना मुंह खोलने को कहा हारित ने उसके ऊपर जलाभिषेक करने का प्रयास किया जिससे वह तो बप्पा के पैर के अंगूठे पर पड़ा हरित ऋषि ने उसे कहा कि यदि यह जलाभिषेक तुम्हारे शरीर पर गिरता तो तुम अमर हो जाते फिर भी तुम्हारे पैर के अंगूठे पर गिरने से भी जहां तक तुम्हारा पाव जाएगा वहां तक तुम्हारा राज्य रहेगा हरित ऋषि ने बप्पा को मेवाड़ का राज्य वरदान में दे दिया ।'' [[बप्पा रावल]] का मूल नाम [[कालभोज]] था । बप्पा रावल ने [[हरित ऋषि]] के आशीर्वाद से '''734 ईसवी''' में [[चित्तौड़गढ़]] पर आक्रमण किया और चित्तौड़ के राजा '''[[मान मौर्य]]''' को पराजित कर ७३४–७५३ ईसवी तक शासन किया और चित्तौड़गढ़ में गुहिल वंश के साम्राज्य की स्थापना की । बप्पा रावल ने [[उदयपुर]] के समीप कैलाशपुरी नामक स्थान पर [[एकलिंग]] जी का मंदिर बनवाया । '''बप्पा रावल प्रथम गुहिल शासक थे जिसने मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाए''' । बप्पा रावल की मृत्यु नागदा में हुई जहां उसकी समाधि बनी हुई है। जिसे वर्तमान में बप्पा रावल के नाम से जानते हैं। ''बप्पा रावल के बारे में कहा जाता है कि वह एक झटके में दो मलेच्छो(भैंसे) की बलि दे देते । वह 33 हाथ की धोती और 16 हाथ का दुपट्टा पहनते थे । उनकी खड़ग 32 मन ( गुजरी भाषा में गुजरात्रा में मन २० किलो होता है) की थी । वह 4 व्यक्तियों के बराबर भोजन करते थे और उनकी सेना में 12 लाख 72000 हजार सैनिक थे ।'' [[आम्र कवि]] द्वारा लिखित [[एकलिंग प्रशस्ति]] में बप्पा रावल के संन्यास लेने की घटना की पुष्टि होती है । == कालभोज के बाद के शासक == कालभोज के बाद उनके पुत्र खुमाण प्रथम मेवाड़ के शासक बने ।[[कालभोज]] के बाद के शासक थे- *[[खुमाण प्रथम]] *[[मत्तट]] *[[भृतभट्ट सिंह]] *[[खुम्माण द्वितीय]] *[[खुमाण तृतीय]] *[[भृतभट्ट द्वितीय]] मेवाड़ के क्रमशः शासक बने खुमान तृतीय के बाद भृतभट्ट द्वितीय इसके बारे में हमें आहड़ लेख 977 ईसवी से जानकारी मिलती है। 942 ईसवी के प्रतापगढ़ अभिलेख में उसे '''[[महाराजाधिराज]]''' की उपाधि से पुकारा गया । *भृतभट्ट द्वितीय के बाद उसकी रानी '[[राष्ट्रकूट राठौड़ वंश]]' की रानी महालक्ष्मी से उत्पन्न हुए पुत्र '''[[अल्हट|अल्लट]]''' मेवाड़ के शासक बने । जिसे '''आलू रावत''' कहा जाता है । अल्लट ने हूण राजकुमारी हरिया देवी के साथ विवाह कर हूणों कि वह अपने ननिहाल पक्ष राष्ट्रकूटों की सहायता से अपने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया । '''अल्लट ने पहली बार [[नौकरशाही]] की शुरुआत की जो वर्तमान में भी पूरे देश में चल रही है ।''' अल्लट ने [[नागदा]] से राजधानी बदलकर अपनी नई राजधानी [[आहड़]] को बनाई और वहां पर [[वराह मंदिर]] का निर्माण करवाया । अल्लट के बाद उसका पुत्र [[नरवाहन]] मेवाड़ का शासक बना । *[[नरवाहन]] ने चौहानों के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए [[चौहान]] राजा [[जेजय]] की पुत्री से विवाह किया । फिर क्रमशः शासक हुवे– *[[शक्तिकुमार]] (977–993 ई.) *[[नरवर्म]] *[[शुचिवर्म]] *[[कीर्तिवर्मा]] *[[योगराज]] *[[वैरट]] *[[हंसपाल]] *[[वैरिसिह]] *[[विजयसिंह]] *[[अरिसिंह]] *[[चोङसिंह]] *[[विक्रम सिंह]] *[[रणसिंह]] (1158 ई.) ==गुहिल/गहलौत वंश का शाखाओं में विभाजन == रणसिंह, विक्रम सिंह के पुत्र थे, इन्होंने आहोर के पर्वत पर एक किला बनवाया । इन्हीं के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बट गया । *'''प्रथम (रावल शाखा)- [[रणसिंह]] के पुत्र [[क्षेमसिंह]] [[रावल]] शाखा का निर्माण कर मेवाड़ पर शासन किया ।''' *'''द्वितीय (राणा शाखा)- [[रणसिंह]] के दूसरे पुत्र [[राहप]] ने सिसोदा ठिकानों की स्थापना कर राणा शाखा की शुरुआत की । ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर [[सिसोदिया]] कहलाए।''' *[[क्षेमसिंह]] रावल शाखा की शुरुआत कर मेवाड़ के शासक बने। इनके, [[सामंत सिंह]] और [[कुशल सिंह]] नाम के दो पुत्र हुए। *[[सामंत सिंह]] (1172 ई.) में मेवाड़ के शासक बने सामंत सिंह का विवाह [[अजमेर]] के [[चौहान]] शासक [[पृथ्वीराज द्वितीय]] की बहन पृथ्वी बाई के साथ हुआ । [[नाडोल]] के चौहान शासक [[कीर्तिपाल]] व पृथ्वीराज द्वितीय के मध्य अनबन हो गई इसी कारण कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण कर सामंत सिंह को पराजित कर मेवाड़ राज्य छीन लिया सामंत सिंह ने (1178 ईस्वी) में लगभग [[वागड़]] में जाकर अपना नया राज्य बनाया जिसकी नई राजधानी ''वट पदक बड़ौदा'' थी । क्षेमसिंह के छोटे पुत्र [[कुमार सैनी]] (1179 ईस्वी) में कीर्तिपाल को पराजित कर मेवाड़ के पुनः शासक बने । === जैत्र सिंह (1213–1250 ईस्वी) === {{मुख्य|जैत्र सिंह}} तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मेवाड़ के शासक [[जैत्र सिंह]] बने । उनके शासनकाल से पूर्व [[नाडोल के चौहान]] वंश के कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर अधिकार स्थापित किया था । इस बेर के बदले में जेत्र सिंह ने समकालीन चौहान वंश के शासक [[उदय सिंह]] के विरुद्ध नाडोल पर चढ़ाई कर दी । नाडोल को बचाने के उद्देश्य से उदय सिंह ने अपनी पोत्री रूपा देवी का विवाह जैत्र सिंह के पुत्र [[तेज सिंह]] के साथ कर मेवाड़ और नाडोल के बेर को समाप्त किया । जैत्र सिंह के समय [[दिल्ली]] सल्तनत पर गुलाम वंश के बादशाह इल्तुतमिश का शासन था । इल्तुतमिश ने जेत्र सिंह के बढ़ते हुए प्रभाव को दबाने के लिए मेवाड़ की राजधानी नागदा पर (1222 से 1229 ईस्वी) में आक्रमण किया और इसे तहस-नहस कर दिया । इसी कारण जैत्र सिंह ने पहली बार अपने राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ़ को बनाया । उसके बाद '''जेेेैत्र सिंह व इल्तुतमिश के मध्य (1227 ईस्वी) में [[भुताला का युद्ध]] हुआ, जिसमें जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित किया, जिसके बारे में [[जयसिंह सूरी कृत हमीर हद मर्दन]] नामक पुस्तक से जानकारी मिलती है ।''' ''[[डॉक्टर ओझा]] ने जैत्र सिंह की प्रशंसा में लिखा है कि दिल्ली के गुलाम सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह ही हुआ जिसकी वीरता की प्रशंसा उसके विपक्षियों ने भी की है । [[दशरथ शर्मा-]] जैत्रसिंह का समय मध्य कालीन मेवाड़ का नवशक्ति संचार का समय माना हैं। === तेज सिंह (1250–1273 ईस्वी) === {{मुख्य|तेज सिंह}} [[जैत्र सिंह]] की मृत्यु के बाद उनके पुत्र [[तेज सिंह]] मेवाड़ के शासक बने। तेजसिंह एक प्रतिभा संपन्न शक्तिशाली शासक थे तेज सिंह ने '''परम भट्ठारक/ महाराजाधिराज/ परमेश्वर तथा चालूक्यों के समान उभावती/ वल्लभ प्रताप का विरुद्ध धारण किया था ।''' तेजसिंह के शासनकाल में दिल्ली के शासक गयासुद्दीन बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया । तेज सिंह की रानी [[जयतल्लदेवी]] ने चित्तौड़ में [[श्याम पार्श्वनाथ]] के मंदिर का निर्माण करवाया । ''तेज सिंह के शासनकाल में 1267 ईस्वी में आहङ नामक स्थान पर '''[[मेवाड़ चित्रकला शैली]]''' का प्रथम चित्रित ग्रंथ '''[[श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी]]'' का चित्रण किया गया था ।'' === समर सिंह (1273–1301 ईस्वी) === [[समर सिंह]] को [[कुंभलगढ़ प्रशस्ति]] में शत्रुओं की शक्ति का अपहरण करता लिखा गया है, जबकि [[आबू शिलालेख]] में उसे [[तुर्कों]] से [[गुजरात]] का उद्धारक लिखा गया है । चिरवे के लेख में उसे शत्रुओं का संहार करने में सिंह के समान सुर कहा गया है । ''अचलगच्छ की पट्टावली'' से स्पष्ट होता है कि [[आचार्य अमितसिंह सूरी]] के प्रभाव में [[समर सिंह]] ने अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगा दी थी । समर सिंह के दो पुत्र [[रतन सिंह]] व [[कुंभकरण]] हुए । '''कुंभकरण अपने पिता की आज्ञा प्राप्त कर नेपाल चले गए और वहां पर अपने नए गुहिल वंश की स्थापना की । समर सिंह के दूसरे पुत्र रतन सिंह चित्तौड़ के शासक बने । इसकी जानकारी हमें [[कुंभलगढ़ प्रशस्ति]] तथा [[एकलिंग महात्म्य]] ग्रंथ में मिलती है।''' === रतन सिंह (1301–1303 ईस्वी)=== {{मुख्य|राणा रतन सिंह}} [[रतन सिंह]] ज्यों ही मेवाड़ की गद्दी पर बैठे तो उन्हें अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा । अल्लाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर किए जाने वाले आक्रमण में खिलजी के साथ प्रसिद्ध लेखक [[अमीर खुसरो]] था । अमीर खुसरो ने इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए अपनी पुस्तक [[खजाइनुल फुतूह]] मैं लिखा है कि अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 ईस्वी को अपनी सेना सहित दिल्ली से रवाना हुआ । चित्तौड़ पहुंचकर [[गंभीरी नदी]] और [[बैङच नदी]] के मध्य शाही शिविर लगाया । स्वयं खिलजी ने अपना शिविर चित्तौड़ी नामक डूंगरी पर लगवाया ।6 महीने तक यह घेरा चलता रहा । '''कुंभलगढ़ शिलालेख से पता चलता है कि इन छह माह के मध्य हुए छोटे-मोटे की युद्धो में सिसोदा का सामंत [[लक्ष्मण सिंह]] अपने सात पुत्रों सहित किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गए । जब चारों और सर्वनाश दिखाई दे रहा था और शत्रु से बचने का कोई उपाय नहीं मिल रहा था । रतन सिंह की पत्नी [[पद्मिनी]] ने 16000 राजपूत महिलाओं के साथ जोहर किया तथा रतन सिंह के दो सेनापति [[गोरा और बादल]] के नेतृत्व में राजपूतों ने [[केसरिया]] वस्त्र धारण कर किले के फाटक खोल कर शत्रुओं की सेना पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए । ''यह चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका था ''।''' इस प्रकार (26 अगस्त 1303 ईस्वी) को [[चित्तौड़गढ़ किला]] अलाउद्दीन खिलजी के अधीन हुआ । अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी शाही सेना का विनाश देख कर बहुत क्रोधित हुआ और उसने शाही सेना को ''चित्तौड़गढ़ की आम जनता के कत्लेआम करने का आदेश दे दिया ''।अल्लाउद्दीन खिलजी कुछ दिन चित्तौड़ रुक कर अपने बेटे खिज्रखां को चित्तौड़गढ़ का शासन देकर दिल्ली लौट गया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिजराबाद रखा । खिज्र खाॅ ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग व उसके आसपास के मंदिरों तथा भवनों को तुड़वाकर किला पर पहुंचने के लिए गंभीरी नदी पर पुल बनवाया । 22 दिसंबर 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई इस कारण खिज्र खा चित्तौड़ से वापस दिल्ली गया । पीछे मेवाड़ राज्य '''[[मालदेव सोनगरा]]''' को सौंप गया । === राणा हम्मीर (1326–1364 ईस्वी)=== {{मुख्य|राणा हम्मीर सिंह}} [[राणा हम्मीर]] सिसोदा जागीर के सरदार [[लक्ष्मण सिंह]] का पोता था । लक्ष्मण सिंह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करते हुए अपने सात पुत्रों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। लक्ष्मण सिंह का एक लड़का अरिसिंह/[[अजय सिंह]] था, जो कि भाग्य वास उस युद्ध में बच गया था । अरि सिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राणा हमीर सिसोदा जागीर का सरदार बना । दूसरे भाई अजय सिंह का बेटा राणा सज्जन सिंह महाराष्ट्र चला गया,छत्रपति शिवाजी महाराज इन्ही के वंशज थे। राणा हम्मीर ने देखा कि अलाउद्दीन खिलजी के मरने के बाद दिल्ली सल्तनत की हालत सोचनीय है । उसने 1326 ईस्वी के आसपास दिल्ली सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के समय चित्तौड़ पर आक्रमण कर [[मालदेव]] के पुत्र जैसा/[[जयसिंह]] को मारकर जबकि (ङा.ओझा के अनुसार) मालदेव पुत्र बनवीर को मारकर चित्तौड़ पर पुनः अपना अधिकार स्थापित किया । *'''ध्यातव्य रहे–''' ''राणा हम्मीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल एवं गहलौत कहलाते थे और बाद में मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ हम राणा हमीर सिसोदिया को 'सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक' भी कहते हैं ।'' मोहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए हम्मीर पर आक्रमण किया । राणा हम्मीर ने पहाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए खेरवाड़ा को अपना केंद्र बनाया । राणा हम्मीर वह मोहम्मद बिन तुगलक के मध्य युद्ध हुआ, जिससे हम [[सिंगोली का युद्ध]] कहते हैं । ''राणा हम्मीर ने मेवाड़ की आपातकालीन स्थिति में पुन: अधिकार कर अच्छी स्थिति में पहुंचाया इसलिए उसे '''मेवाड़ का उद्धारक''' कहते हैं । राणा हमीर विपरीत परिस्थिति में भी अपना हौसला नहीं खोया अतः '''उसे कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में विषम घाटी पंचानन/ विकेट आक्रमणों में सिंह के समान' कहा गया ।''' कुंभा के द्वारा '[[गीत गोविंद]]' पर लिखी गई '''[[रसिक प्रिया]]''' नामक टीका में राणा हम्मीर को '''वीर राजा''' की उपाधि दी गई ।'' राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग में [[अन्नपूर्णा माता]] का मंदिर बनवाया जिसकी जानकारी [[मोकल]] जी के शिलालेख से मिलती है । '''कर्नल जेम्स टॉड ने राणा हम्मीर को अपने समय का प्रबल हिंदू राजा माना है।''' == मेवाड़ का सिसोदिया वंश (गुहिल) == {{मुख्य|सिसोदिया राजवंश}} [[राणा हम्मीर]] की मृत्यु के बाद उनके पुत्र [[राणा क्षेत्र सिंह]] जिसे खेता के नाम से भी जानते हैं, मेवाड़ के शासक बने । क्षैत्र सिंह ने [[मालवा]] के [[दिलावर खान]] गौरी को परास्त कर '''मेवाड़ - मालवा संघर्ष का सूत्रपात किया ।''' [[हाड़ेती]] के हाडा शासकों को दबाने का श्रेय भी [[खेता]] को ही जाता है। 1382 ईस्वी में जब क्षेत्र सिंह ने आक्रमण किया तो उस युद्ध में क्षेत्र सिंह वह [[बूंदी]] का [[लाल सिंह हाडा]] भी मारा गया । === राणा लाखा/लक्ष सिंह (1382–1421 ईस्वी) === {{मुख्य|राणा लाखा}} महाराणा हम्मीर के पौत्र व खेता के पुत्र लक्ष सिंह हैं लाखा 1382 इश्वी में मेवाड़ के शासक बने । लाखा के शासनकाल में भाग्यवश जावर [[उदयपुर]] में चांदी की खान निकली ।उस खान की आय से उसने कई किलो व मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया । '''लाखा के शासनकाल में एक पिचू नामक चिड़ीमार बंजारे के बेल की स्मृति में पिछोला झील का निर्माण करवाया ।''' ====[[पिछोला झील]]==== पिछोला झील बेङच नदी पर स्थित है इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में राणा लक्खा के शासनकाल में हुआ । महाराणा उदय सिंह ने इसकी पाल को पक्का करवाया । इसमें सीसारमा व बूजड़ा नदी आकर गिरती है । इस झील में जग मंदिर ( करण सिंह ने 1620 ईस्वी में शुरू तथा जगत सिंह प्रथम ने 1651 ईस्वीें में पूर्ण करवाया) जगनिवास जगत सिंह द्वितीय ने 1746 ईस्वी में पूर्ण करवाया ।महाराणा प्रताप और मानसिंह की मुलाकात इसकी पाल पर हुई थी। लाखा के दरबार में संस्कृत के प्रज्ञात विद्वान [[झोटिंग भट्ट]] और [[धनेश्वर भट्ट]] रहते थे । लाखा के शासनकाल में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। लखा ने दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन द्वितीय को बदनोर के समीप हुए युद्ध में पराजित करके हिंदुओं से लिए जाने वाले तीर्थ कर को समाप्त करने का वचन लिया । 1396 ई में गुजरात के जफर खान ने मांडलगङ पर आक्रमण किया लेकिन लाखा ने इस आक्रमण को विफल कर दिया । लाखा ने बूंदी के [[राव बर सिंह]] [[हाड़ा]] को मेवाड़ का प्रभुत्व मानने के लिए विवश किया। [[मारवाड़]] के शासक [[रणमल]] ने अपनी बहन हँसा बाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा के पुत्र [[चूंडा]] से करने का सोचा । रणमल ने चुंडा के लिए सगाइ का नारियल मेवाड़ दरबार में भेजा, उस समय राणा लाखा का पुत्र चुंडा दरबार में नहीं थे । सगाई के नारियल को देखकर महाराणा लाखा ने मजाक करते हुए कहा कि यह बुढ़ापे में मेरे साथ किस ने मजाक किया। चुंडा को दरबार में न देखकर रणमल का दास वापस रणमल के पास पहुॅचा । दास ने सारी बात रणमल को कहीं तो रणमल ने दास को वापस लाखा के पास सशर्त सगाई का नारियल देकर भेजा शादी की शर्त रखी कि मेरी बहन के होने वाले पुत्र को राणा अपना उत्तराधिकारी बनाए तो मैं अपनी बहन की शादी राणा लाखा के साथ कर दूंगा महाराणा लाखा इस शर्त को स्वीकार कर लेते हैं तो मैं अपनी बहन हंसा की शादी महाराणा लाखा के साथ करने को तैयार था लेकिन उसे इस बात का पता था कि उनकी बहन महाराणा लाखा की रानी तो बनेगी लेकिन उसकी कोख से जन्म लेने वाला बालक मेवाड़ का शासक कभी नहीं बन पायेगा। आखिर मेवाड़ की राजगद्दी पर तो महाराणा लाखा के बाद चूंडा का ही अधिकार है। राव रणमल की इस बात का जवाब देते हुए चूंडा ने भरे दरबार में भीष्म प्रतिज्ञा की कि मैं आजन्म मेवाड़ के महाराणा का सेवक बनकर रहुंगा और मेरे वंशज कभी भी मेवाड़ की राजगद्दी पर हक नहीं जतायेंगे। इस भीष्म प्रतिज्ञा के बाद महाराणा लाखा का हंसाकंवर के साथ विवाह कर दिया गया। चूंडा द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। सभी में चूंडा की प्रशंसा की गई,  बहन हनसा भाई की शादी महाराणा लाखा से कर देते हैं। ''''इसी कारण चूंडा को मेवाड़ का ''भीष्म पितामह'' कहते हैं ।''' लाखा वह हंसा बाई के विवाह के 13 महीने बाद हंसाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम [[मोकल]] रखा गया। राणा लाखा जब मृत्यु की शैय्या पर थे तो उन्होने अपने बड़े पुत्र चूंडा को अपने पास बुलाकर अपने छोटे पुत्र मोकल का संरक्षक बनाया । === राणा मोकल (1421-1433 ईस्वी) === {{मुख्य|राणा मोकल}} जिस समय लाखा की मृत्यु हुई तो मोकल मात्र 12 वर्ष के थे । राणा लाखा के कहे अनुसार उनके बड़े भाई चूंडा राज्य के सभी कार्यों को बड़ी कुशलता से कर रहे थे । हंसा बाई ( मोकल की मां व चूंडा की सौतेली मां ) हमेशा चूंडा को शक की दृष्टि से देखती थी । चूंडा परेशान होकर मेवाड़ छोड़कर मालवा चले गए ।हंसा बाई ने अपने भाई रणमल को मोकल के संरक्षक का कार्य करने के लिए मारवाड़ से मेवाड़ बुला लिया । रणमल ने शीघ्र ही मेवाड़ में ऊंचे पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति कर दी । इसी कारण सिसोदिया सरदार रणमल से नाराज हो गए। रणमल मारवाड़ का ही स्वामी नहीं रहा बल्कि मेवाड़ का भी सर्वे सर्वा बन गया । सिसोदिया सरदारों को रणमल सत्ता से वंचित कर उन्हें अपमानित कर रहा था । 1 दिन रणमल आवेश में आकर मेवाड़ सरदार राघव देव ( राणा चुंडा के भाई ) जैसे योग्य व्यक्ति की हत्या करवा दी इससे राठौड़ों वह सिसोदिया में वैमनस्य की कई गहरी होती गई। मोकल ने 1428 ईसवी के लगभग [[नागौर]] के फिरोज खान को '''[[रामपुरा के युद्ध]]''' में परास्त किया । फिरोज खान का साथ देने आई गुजरात की सेना को भी हार का मुंह देखना पड़ा गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर 1433 ईस्वी को आक्रमण कर दिया। मोकल को इस आक्रमण का पता चला तो वह भी उस से युद्ध करने के लिए रवाना हुआ और झीलवाड़ा नामक स्थान पर पहुंचा । युद्ध के मैदान में ही मोकल के सिसोदिया सरदार जो कि रणमल के हार के कारणों कल से नाराज थे। माहपा पवार के कहने पर महाराणा क्षेत्र सिंह (खेता) की खातिन जाति की दासी से उत्पन्न हुए 2 पुत्र चाचा वह मेरा ( एक बार मोकल ने जंगल में चाचा वह मेरा से प्रसंग में किसी वृक्ष का नाम पूछ लिया तो वह इसे ताना समझ गए क्योंकि उनकी माता खातिन थी । इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने मोकल को मार दिया) ने अवसर पाकर उसकी हत्या कर दी । उस दिन से मेवाड़ में कहावत प्रचलित हुई की '''दीवार में आला खेत में नाला और घर में साला बर्बाद करके ही जाता है ''' राणा मोकल ने हिंदू परंपरा को स्थापित करने के लिए '''तुलादान पद्धति''' को लागू किया । इस परंपरा के तहत मंदिरों के लिए सोना चांदी दान के रूप में दिया जाता था । महाराणा मोकल ने [[एकलिंग जी मंदिर]] के परकोटे का निर्माण कराया । मोकल ने चित्तौड़ दुर्ग में [[परमार वंश]] के द्वारा बनवाए गए [[त्रिभुवन मंदिर]] का जीर्णोद्धार करवाकर [[समद्वेश्वर मंदिर]] के नाम से प्रसिद्धि दिलाई । ====[[सौभाग्यदेवी]]==== सौभाग्य देवी परमार वंश की राजकुमारी थी । जिसका विवाह मेवाड़ के शासक राणा लाखा के पुत्र मोकल के साथ हुआ । इस सौभाग्य देवी की कोख से 1423 ईस्वी में महाराणा कुंभा का जन्म हुआ । ====[[कमलावती]]==== कमलावती मेवाड़ के शासक राणा मोकल की रानी थी। 1433 ईस्वी में गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । '''अहमद शाह एवं मोकल के मध्य जिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ ।''' इसी समय जंहा क्षेत्र सिंह के दासी पुत्र चाचा और मेरा ने मिलकर मोकल की हत्या कर दी । उस समय रानी [[कमलावती]] ने मात्र 500 सैनिकों के साथ मुस्लिम सेना का सामना किया। वह अधिक समय तक मुस्लिम सेना के सामने टिक न सकी ओर अंत में वह जलती चिता में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त की । === महाराणा कुंभा/महाराणा कुम्भकर्ण सिसोदिया (1433–1468 ईस्वी) === {{मुख्य|महाराणा कुंभा}} महाराणा कुम्भकर्ण सिसोदिया या [[महाराणा कुम्भा]] एक ऐसा वीर योद्धा '''जिसने 30 साल के अपने शासन में कभी कोई युद्ध नही हारा।''' महाराणा कुंभा का जन्म 1423 ईस्वी को महाराणा मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी के गर्भ से हुआ । मोकल की हत्या के समय कुंभा जिलवाड़ा के उसी शिविर में उपस्थित थे । उन हत्यारों ने कुंभा पर भी हमला किया किंतु उनके शुभचिंतकों ने उन्हें वहां से बचाकर सकुशल [[चित्तौड़]] ले गए। [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग]] में कुंभा को मात्र 10 वर्ष की आयु में 1433 ईस्वी में मेवाड़ का महाराणा बनाया गया। [[File:Maharana Kumbhakarna of Mewar.jpg|right|thumb|महाराणा कुंभा]] कुंभा मेवाड़ का महाराणा तो बने उनके सामने बहुत भयंकर दो समस्याएं थी– पहली– अपने पिता के हत्यारों चाचा व मेरा को सजा देना । दूसरी– अपने पिता के मामा [[रणमल राठौड़]] के मेवाड़ में बढ़ रहे प्रभाव को समाप्त करना । महाराणा कुंभा एक अच्छे शासक ही नहीं अपितु राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने दिमाग का प्रयोग करते हुए रणमल राठौड़ को मारवाड़ से अपने पिता के हत्यारों का दमन करने के लिए सैनिकों सहित बुलाया। रणमल मेवाड़ पहुंचा तो कुंभा ने अपने पिता के हत्यारों पर आक्रमण किया और चाचा वह मेरा की हत्या कर दी । इस प्रकार कुंभा की पहली समस्या का हल हुआ। कुंभा के सामने दूसरी समस्या रणमल की थी। मेवाड़ी सिसोदिया सरदारों ने अपने वैमनस्य को दूर करने के लिए षड्यंत्र रचकर सन 1438 ईस्वी में रणमल की हत्या करवा दी। एक जन श्रुति के अनुसार रणमल मेवा राठौड़ की हत्या इस प्रकार हुई कि हनसा बाई की एक दासी डावरी प्राचीन काल में राजा लोग अपनी पुत्री के साथ दहेज के रूप में कुछ लड़कियां भेजते थे उन्हें दासिया डावरिया कहा जाता था । दासी जिसका नाम भारमली था । भारमली को रणमल राठौड़ दिलो जान से चाहता था। भारमली कुंभा को अपने पुत्र के समान चाहती थी। रणमल राठौड़ ने बार भारमली द्वारा कुंभा को जहर देने के लिए कई बार कहा किंतु 1 दिन कुंभा ने भारमली से रणमल को जहर देने को कहा बार भारमली ने 1438 ईस्वी में शराब में जहर देकर रणमल की हत्या कर दी। इस प्रकार कुंभा की दोनों समस्याओं का हल हो गया । [[राव जोधा]] को जब अपने पिता रणमल की हत्या करने का पता चला तब वह मेवाड़ में ही था । मेवाड़ से जोधा अपनी जान बचाकर मारवाड़ की तरफ भागा, कुंभा की सेना ने उसका पीछा कर उसको वहां से भगा दिया । राव जोधा वहां से वापस मेवाड़ अपनी बुआ हनसाबाई के पास पहुंचा राव जोधा की बुआ व कुंभा की दादी हनसाबाई ने इन दोनों के मध्य मध्यस्था कराते हुए संधि करवाई जो '''आवल बावल''' के नाम से जानी जाती है। '''आवल बावल की संधि के तहत मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा का निर्धारण हुआ मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा निर्धारण का मुख्य बिंदु सोजत था।''' राव जोधा ने कुंभा से अधिक मेलजोल बनाने व विश्वास प्राप्त करने के लिए अपनी पुत्री श्रंगार देवी का विवाह कुंभा के छोटे पुत्र रायमल से करवा दिया । जिसकी जानकारी हमें श्रंगार देवी द्वारा बनाई गई '''घोसुंडी की बावड़ी''' पर लगी प्रशस्ति से मिलती है। ==== मेवाड़-मालवा (माॅङू संबंध) ==== चाचा वह मेरा का साथी महपा पवार व चाचा का पुत्र अक्का मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम के पास चला गया। कुंभा ने मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी को पत्र लिखकर उसके विद्रोहियों को वापस लौटाने को कहा। महमूद खिलजी ने शरण में आए हुए व्यक्तियों को भेजने से इंकार कर दिया, प्रत्युत्तर मैं महाराणा कुंभा ने [[मांडू]] पर चढ़ाई कर दी । इस आक्रमण का दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि मालवा के दिवंगत सुल्तान होशंग शाह के बाद वहां उत्तराधिकारी युद्ध हुआ। जिसके तहत महमूद खिलजी ने होशंग शाह के पुत्र उमर खान को मालवा की गद्दी से हटाकर स्वयं मालवा का सुल्तान बन गया। उमर खान मेवाड़ के कुंभा से सैनिक सहायता मांगने के लिए गया तो कुंभा ने मालवा के राजा महमूद खिलजी पर आक्रमण कर दिया ।इन दोनों के मध्य 1437 ईसवी में सारंगपुर नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें महाराणा कुंभा की विजय हुई। '''मालवा विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने चित्तौडग़ढ़ में ( 1440 - 1448 ) में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया ।''' महाराणा कुंभा महमूद खिलजी को बंदी बनाकर अपने साथ ले आए जिसे 6 महीने तक कैद रखने के बाद महमूद खिलजी को रिहा कर दिया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी रिया होकर गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन के पास पहुंचा । 1456 ईस्वी में नागौर के स्वामी फिरोज खान के मरने के बाद उसका पुत्र शम्स खान नागौर का स्वामी हुआ। गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने उसे हटाकर उसके छोटे भाई मुजाहिद खान को नागौर का शासक बनाया । शम्स खान ने कुंभा की सहायता से सशर्त पुन: नागौर का शासक बना । जब शम्स खान ने कुंभा की शर्त नहीं मानी तो कुंभा ने नागौर पर आक्रमण किया । शम्स खान ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन की सहायता से कुंभा का मुकाबला किया। '''शम्स खान की इस युद्ध में पराजय हुई । [[कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति]] के अनुसार महाराणा कुंभा ने नागौर की मस्जिद को जलाया, किले को तुड़वाकर खाई भरवाई, हाथियों को छीनकर यवनियों को कैद करके उसने गायों को छुड़वाया और नागौर को चारागाह में बदल दिया ।''' ==== मेवाड़ के महान शासक सिसोदिया ==== महाराणा कुंभा के समय गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन शाह मेवाड़ पर आक्रमण करने की सोच रहा था । मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम का दूत ताज खान उसके पास पहुंचा। ताज खा ने मांडू और गुजरात की संयुक्त शक्ति को मिलाकर मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार बनाया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी व गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के मध्य 1456 ईस्वी में '''[[चंपानेर]]''' नामक स्थान पर सशर्त संधि हुई की 'मेवाड़' को जीतने के बाद दोनों मेवाड़ का आधा आधा हिस्सा बांट लेंगे। इस संधि को चंपानेर की संधि कहते हैं। संधि के तहत दोनों ने 1457 इश्वी में मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया । कुतुबुद्दीन तो पहले ही [[कुंभलगढ़ दुर्ग]] में पराजित होकर गुजरात वापस लौट गया । कुंभा महमूद खिलजी की ओर बढ़े बैराठगढ़ (बदनोर) के युद्ध में 1457 ईस्वी में महमूद खिलजी को पराजित कर इस विजय के उपलक्ष्य में बदनोर (भीलवाड़ा) में '''[[कुशाल माता]]''' का भव्य मंदिर बनवाया । सिरोही के सहसमल देवरा को कुम्भा के नरसिंह डोडिया ने हराया। ====कुंभा की उपाधियां==== कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति तथा कुंभलगढ़ प्रशस्ति से हमें महाराणा कुंभा की उपाधियों की जानकारी मिलती है कुंभा को साहित्य ग्रंथों व प्रशस्तियों में - '''अभिनव व भरताचार्य महाराजाधिराज' रावराय, राय रायन''' (1) '''[[महाराजाधिराज]]''' - राजाओं का राजा होने के कारण । (2) '''महाराजा''' - अनेक राज्यों को अपने अधिकार में रखने के कारण । (3) '''राणा''' - रासो विद्वानों का आश्रय दाता होने के कारण । (4) '''राजगुरु''' - राजनीतिक सिद्धांतों में दक्ष होने तथा विभिन्न राजाओं, सामंतों व जागीरदारों का हितेषी होने के कारण। (5) '''दानगुरु''' - विद्वानों कलाकारों व निर्धनों को दान देने के कारण । (6) '''परमगुरु''' - विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता तथा अपने समय का सर्वोच्च शासक होने के कारण । प्रसिद्ध गीत गोविंद नामक पुस्तक पर लिखी टीका 'रसिकप्रिया' में भी कुंभा की निम्न उपाधियों का वर्णन मिलता है । (7) '''नरपति''' - सामान्य मानव से श्रेष्ठ होने के कारण । (8) '''अश्वपति''' - कुशल घुढ़सवार होने के कारण । (9) '''गणपति''' - गण का अर्थ राज्य होता था अर्थात राज्य का राजा होने के कारण। (10) '''छापगुरु''' - छापामार युद्ध पद्धति में निपुण होने के कारण। (11) '''हिंदू सुरताण''' - समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदुओं की रक्षा करने वाला विभूषित किया गया है। (12) '''नंदीकेश्वर अवतार''' - नंदीकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण। (13) '''नाटकराज''' - नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण। (14) '''शेलगुरु''' - युद्ध में निपुण होने के कारण । (15) '''चापगुरु''' - धनुर्विद्या का ज्ञाता होने के कारण। (16) धीमान बुद्धिमत्ता पूर्वक निर्माण कार्य करवाने के कारण अभिनव भरता चार्य श्रेष्ठ वीणा वादक एवं संगीत के छेत्र में कुंभा के विपुल ज्ञान के कारण संगीत प्रेम के कारण प्रजा पालक जनता का हितैषी होने के कारण। === महाराणा सांगा/महाराणा संग्राम सिंह सिसोदिया (1509-1528 ईस्वी) === {{मुख्य|महाराणा सांगा}} '''महाराणा सांगा''' (महाराणा संग्राम सिंह) (१२ अप्रैल १४८४ - ३० जनवरी १५२८) (राज 1509-1528) [[उदयपुर]] में [[सिसोदिया|सिसोदिया राजपूत]] राजवंश के राजा थे तथा [[राणा रायमल]] के सबसे छोटे पुत्र थे। <ref>Sen, Sailendra (2013). A Textbook of Medieval Indian History. Primus Books. pp. 116–117. ISBN 978-9-38060-734-4</ref> [[File:Depiction of king Rana Sanga.jpg|right|thumb|महाराणा सांगा]] ==== प्रारंभिक जीवन ==== राणा रायमल के तीनों पुत्रों ( [[पृथ्वीराज|कुंवर पृथ्वीराज]], जगमाल तथा राणा सांगा ) में मेवाड़ के सिंहासन के लिए संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। एक भविष्यकर्त्ता के अनुसार सांगा को मेवाड़ का शासक बताया जाता है ऐसी स्थिति में कुंवर पृथ्वीराज व जगमाल अपने भाई राणा सांगा को मौत के घाट उतारना चाहते थे परंतु सांगा किसी प्रकार यहाँ से बचकर अजमेर पलायन कर जाते हैं तब सन् 1509 में अजमेर के कर्मचन्द पंवार की सहायता से राणा सांगा [[मेवाड़]] राज्य प्राप्त हुुुआ | ==== सैन्य वृत्ति ==== [[मुगल]] साम्राज्य के संस्थापक [[बाबर]] ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राणा सांगा हिंदुस्तान में सबसे शक्तिशाली शासक थे, जब उन्होंने इस पर आक्रमण किया, और कहा कि "उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया।" 80 हज़ार घोड़े, उच्चतम श्रेणी के 7 राजा, 9 राओएस और 104 सरदारों व रावल, 500 युद्ध हाथियों के साथ युद्ध लडे। अपने चरम पर, संघ युद्ध के मैदान में 100,000 राजपूतों का बल जुटा सकते थे। यह संख्या एक स्वतंत्र हिंदू राजा के लिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसमें चरवाहा या कोई भी जाति (जैसे [[जाट]], [[गुर्जर| गुर्जरों]] या [[अहीर| अहीरों]]) को शामिल नहीं किया गया था। मालवा, गुजरात और लोधी सल्तनत की संयुक्त सेनाओं को हराने के बाद मुसलमानों पर अपनी जीत के बाद, वह उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बन गया। कहा जाता है कि संघ ने 100 लड़ाइयां लड़ी थीं और विभिन्न संघर्षों में उसकी आंख, हाथ और पैर खो गए थे। <ref>Har Bilas, Sarda. maharana sanga : the hindupat, the last great leader of the rajput race. pp. 15–16.</ref><ref>A Comprehensive History of India: Comprehensive history of medieval India p107</ref> ==== शासन ==== [[चित्र:Rana sanga statue at city palace udaipur.jpg|right|thumb|300px|सिटी पैलेस उदयपुर में राणा सांगा की प्रतिमा।]] महाराणा सांगा ने सभी राजपूत राज्यो को संगठित किया और सभी राजपूत राज्य को एक छत्र के नीचे लाएं। उन्होंने सभी राजपूत राज्यो संधि की और इस प्रकार महाराणा सांगा ने अपना साम्राज्य उत्तर में पंजाब सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में मालवा को जीतकर नर्मदा नदी तक कर दिया। पश्चिम में में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना भरतपुर ग्वालियर तक अपना राज्य विस्तार किया इस प्रकार मुस्लिम सुल्तानों की डेढ़ सौ वर्ष की सत्ता के पश्चात इतने बड़े क्षेत्रफल हिंदू साम्राज्य कायम हुआ इतने बड़े क्षेत्र वाला हिंदू सम्राज्य दक्षिण में विजयनगर सम्राज्य ही था। दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को खातौली व बाड़ी के युद्ध में 2 बार परास्त किया और और गुजरात के सुल्तान को हराया व मेवाड़ की तरफ बढ़ने से रोक दिया। बाबर को खानवा के युद्ध में पूरी तरह से राणा ने परास्त किया और बाबर से बयाना का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार राणा सांगा ने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ दी। 16वी शताब्दी के सबसे शक्तिशाली शासक थे इनके शरीर पर 80 घाव थे। इनको हिंदुपत की उपाधि दी गयी थी। इतिहास में इनकी गिनती महानायक तथा वीर के रूप में की जाती हैं।<ref name=":0">Maharana Sanga; the Hindupat, the last great leader of the Rajput race: Sarda, Har Bilas, Diwan Bahadur, 1867-1955</ref> ==== मालवा पर विजय ==== 1519 में गुजरात और मालवा की संयुक्त मुस्लिम सेनाओं के बीच राजस्थान में गागरोन के निकट राणा सांगा के नेतृत्व में गागरोण की लड़ाई लड़ी गई थी। राजपूत संघ की जीत ने उन्हें चंदेरी किले के साथ-साथ मालवा के अधिकांश हिस्सों पर अधिकार कर लिया। सिलवाडी और मेदिनी राय जैसे शक्तिशाली राजपूत नेताओं के समर्थन के कारण मालवा की विजय राणा साँगा के लिए आसान हो गई। मेदिनी राय ने चंदेरी को अपनी राजधानी बनाया और राणा साँगा का एक विश्वसनीय जागीरदार बन गया। राणा साँगा चित्तौड़ से एक बड़ी सेना के साथ राव मेड़मदेव के अधीन राठौरों द्वारा प्रबलित, और महमूद खिलजी द्वितीय से गुजरात असफ़िलियों के साथ आसफ़ ख़ान से मिला। जैसे ही लड़ाई शुरू हुई राजपूत घुड़सवार सेना ने गुजरात कैवेलरी के माध्यम से एक भयंकर आरोप लगाया, कुछ अवशेष जो बिखरने से बचे। राजपूत घुड़सवार गुजरात के सुदृढीकरण को पार करने के बाद मालवा सेना की ओर बढ़े। सुल्तान की सेनाएँ राजपूत घुड़सवार सेना का सामना करने में असमर्थ थीं और पूरी हार का सामना करना पड़ा। उनके अधिकांश अधिकारी मारे गए और सेना का लगभग सर्वनाश हो गया। आसफ खान के बेटे को मार दिया गया था, और खुद आसफ खान ने उड़ान में सुरक्षा की मांग की थी। सुल्तान महमूद को कैदी, घायल और खून बहाने के लिए लिया गया था। मालवा में जीत और हिंदू शासन को बहाल करने के बाद, सांगा ने राय को क्षेत्र के हिंदुओं से जजिया कर हटाने का आदेश दिया।<ref>Sharma, Gopi Nath (1954). Mewar & the Mughal Emperors (1526-1707 A.D.). S.L. Agarwala. pp. 18–19.</ref><ref>Chaurasia, Radhey Shyam (2002). History of Medieval India: From 1000 A.D. to 1707 A.D. Atlantic Publishers & Dist. pp. 155–160. ISBN 978-81-269-0123-4</ref><ref>Sarda 1970, p. 84-87.</ref> ==== गुजरात पर विजय ==== इडर राज्य के उत्तराधिकार के सवाल पर, गुजरात के सुल्तान, मुजफ्फर शाह, और राणा ने कट्टर दावेदारों का समर्थन किया। 1520 में, सांगा ने इडर सिंहासन पर रायमल की स्थापना की, जिसके साथ मुजफ्फर शाह ने अपने सहयोगी भारमल को स्थापित करने के लिए एक सेना भेजी। सांगा खुद इडर पहुंचे और सुल्तान की सेना को पीछे कर दिया गया। राणा ने गुजराती सेना का पीछा किया और अहमदाबाद के रूप में सुल्तान की सेना का पीछा करते हुए गुजरात के अहमदनगर और विसनगर के शहरों को लूट लिया<ref>Hooja, Rima (2006). A History of Rajasthan. Rupa Publication. pp. 450–451.</ref> ==== लोदी पे विजय ==== {{मुख्य|खतोली का युद्ध}} {{मुख्य|धौलपुर के युद्ध}} [[इब्राहिम लोदी]] ने, अपने क्षेत्र पर संघ द्वारा अतिक्रमण की खबरें सुनने के बाद, एक सेना तैयार की और 1517 में [[मेवाड़]] के खिलाफ मार्च किया। राणा अपनी सेना के साथ राणा लोदी की सीमाओं पर [[खतोली]] में लोदी से मिले और खतोली में आगामी लड़ाई में, लोदी सेना को गंभीर चोट लगी। लोदी सेना बुरी तरह परास्त होकर भाग गई । एक लोदी राजकुमार को पकड़ लिया गया और कैद कर लिया गया। युद्ध में राणा स्वयं घायल हो गए थे। [[इब्राहिम लोदी]] ने हार का बदला लेने के लिए, अपने सेनापति मियां माखन के तहत एक सेना संगा के खिलाफ भेजी। राणा ने फिर से बाड़ी [[धौलपुर के युद्ध|धौलपुर]] के पास बाड़ी युद्ध 1518 ई को लोदी सेना को परास्त किया और लोदी को बयाना तक पीछा किया। इन विजयों के बाद, संगा ने [[आगरा]] की लोदी राजधानी के भीतर, [[फतेहपुर सीकरी]] तक का इलाका खाली कर दिया। [[मालवा]] के सभी हिस्सों को जो मालवा सुल्तानों से लोदियों द्वारा कब्जा कर लिया गया था, को चंदेरी सहित संघ द्वारा रद्द कर दिया गया था। उन्होंने चंदेरी को मेदिनी राय को दिया।<ref>Chandra, Satish (2004). Medieval India: From Sultanat to the Mughals-Delhi Sultanat (1206-1526) - Part One. Har-Anand Publications. ISBN 978-81-241-1064-5.</ref><ref> Duff's Chronology of India, p. 271</ref> ==== मुगलों से संघर्ष ==== 21 अप्रैल 1526 को, तैमूरिद राजा बाबर ने पांचवीं बार भारत पर आक्रमण किया और पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोधी को हराया और उसे मार डाला। युद्ध के बाद, संघ ने पृथ्वीराज कछवाह के बाद पहली बार कई राजपूत वंशों को एकजुट किया और 100,000 राजपूतों की एक सेना बनाई और आगरा के लिए उन्नत किया। राणा साँगा ने पारंपरिक तरीके से लड़ते हुए मुग़ल रैंकों पर आरोप लगाया। उनकी सेना को बड़ी संख्या में मुगल बाहुबलियों द्वारा गोली मार दी गई, कस्तूरी के शोर ने राजपूत सेना के घोड़ों और हाथियों के बीच भय पैदा कर दिया, जिससे वे अपने स्वयं के लोगों को रौंदने लगे। राणा साँगा को मुग़ल केंद्र पर आक्रमण करना असंभव लग रहा था, उसने अपने आदमियों को मुग़ल गुटों पर हमला करने का आदेश दिया। दोनों गुटों में तीन घंटे तक लड़ाई जारी रही, इस दौरान मुगलों ने राजपूत रानियों पर कस्तूरी और तीर से फायर किया, जबकि राजपूतों ने केवल करीबियों में जवाबी कार्रवाई की। "पैगन सैनिकों के बैंड के बाद बैंड ने अपने पुरुषों की मदद करने के लिए एक दूसरे का अनुसरण किया, इसलिए हमने अपनी बारी में टुकड़ी को टुकड़ी के बाद उस तरफ हमारे लड़ाकू विमानों को मजबूत करने के लिए भेजा।" बाबर ने अपने प्रसिद्ध तालकामा या पीनिस आंदोलन का उपयोग करने के प्रयास किए, हालांकि उसके लोग इसे पूरा करने में असमर्थ थे, दो बार उन्होंने राजपूतों को पीछे धकेल दिया, लेकिन राजपूत घुड़सवारों के अथक हमलों के कारण वे अपने पदों से पीछे हटने के लिए मजबूर हो गए। लगभग इसी समय, रायसेन की सिल्हदी ने राणा की सेना को छोड़ दिया और बाबर के पास चली गई। सिल्हदी के दलबदल ने राणा को अपनी योजनाओं को बदलने और नए आदेश जारी करने के लिए मजबूर किया। इस दौरान, राणा को एक गोली लगी और वह बेहोश हो गया, जिससे राजपूत सेना में बहुत भ्रम पैदा हो गया और थोड़े समय के लिए लड़ाई में खामोश हो गया। बाबर ने अपने संस्मरणों में इस घटना को "एक घंटे के लिए अर्जित किए गए काफिरों के बीच बने रहने" की बात कहकर लिखा है। अजा नामक एक सरदार ने अजजा को राणा के रूप में काम किया और राजपूत सेना का नेतृत्व किया, जबकि राणा अपने भरोसेमंद लोगों के एक समूह द्वारा छिपा हुआ था। झल्ला अजा एक गरीब जनरल साबित हुआ, क्योंकि उसने अपने कमजोर केंद्र की अनदेखी करते हुए मुगल flanks पर हमले जारी रखे। राजपूतों ने अपने हमलों को जारी रखा लेकिन मुगल फ्लैक्स को तोड़ने में विफल रहे और उनका केंद्र गढ़वाले मुगल केंद्र के खिलाफ कुछ भी करने में असमर्थ था। जदुनाथ सरकार ने निम्नलिखित शब्दों में संघर्ष की व्याख्या की है: राजपूतों और उनके सहयोगियों को हराया गया था, शवों को बयाना, अलवर और मेवात तक पाया जा सकता है। पीछा करने की लंबी लड़ाई के बाद मुग़ल बहुत थक गए थे और बाबर ने स्वयं मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया था। अपनी जीत के बाद, बाबर ने दुश्मन की खोपड़ी के एक टॉवर को खड़ा करने का आदेश दिया, तैमूर ने अपने विरोधियों के खिलाफ, उनकी धार्मिक मान्यताओं के बावजूद, एक अभ्यास तैयार किया। चंद्रा के अनुसार, खोपड़ी का टॉवर बनाने का उद्देश्य सिर्फ एक महान जीत दर्ज करना नहीं था, बल्कि विरोधियों को आतंकित करना भी था। इससे पहले, उसी रणनीति का उपयोग बाबर ने बाजौर के अफगानों के खिलाफ किया था। पानीपत की तुलना में लड़ाई अधिक ऐतिहासिक थी क्योंकि इसने राजपूत शक्तियों को धमकी और पुनर्जीवित करते हुए उत्तर भारत के बाबर को निर्विवाद मास्टर बना दिया था।<ref>Duff's Chronology of India, p. 271</ref><ref>Percival Spear, p. 25</ref> ==== मृत्यु ==== केवी कृष्णा राव के अनुसार, राणा सांगा बाबर को उखाड़ फेंकना चाहते थे, क्योंकि वह उन्हें भारत में एक विदेशी शासक मानते थे और दिल्ली और आगरा पर कब्जा करके अपने क्षेत्रों का विस्तार करने के लिए, राणा को कुछ अफगान सरदारों ने समर्थन दिया था, जिन्हें लगता था कि बाबर का शासन था। उनके प्रति भ्रामक। राणा ने 21 फरवरी 1527 को मुगल अग्रिम पहरे पर हमला किया और इसे खत्म कर दिया। बाबर द्वारा भेजे गए पुनर्मूल्यांकन समान भाग्य से मिले। हालाँकि, 30 जनवरी 1528 को, सांगा की मृत्यु कालपी में हुई, जो कि अपने ही सरदारों द्वारा जहर देकर मारा गया था, जिन्होंने बाबर के साथ लड़ाई को आत्मघाती बनाने के लिए नए सिरे से योजना बनाई थी। महाराणा सांगा की समाधि दौसा जिले की बसवा तहसील में है। यह सुझाव दिया जाता है कि बाबर की तोपें नहीं थीं, हो सकता है कि सांगा ने बाबर के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की हो। इतिहासकार प्रदीप बरुआ ने ध्यान दिया कि बाबर के तोपों ने भारतीय युद्ध में पुरानी प्रवृत्तियों को समाप्त कर दिया था।<ref>Rao, K. V. Krishna (1991). Prepare Or Perish: A Study of National Security. Lancer Publishers. p. 453. ISBN 978-81-7212-001-6.</ref><ref>Sharma, G.N. Mewar & Mughal Emperors. Agra. pp. 27–29.</ref> === महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया (1572-1597) === {{मुख्य|महाराणा प्रताप}} 'महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया' ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदनुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) (राज. 1572-1597) [[उदयपुर]], [[मेवाड़|मेवाड]] में [[सिसोदिया]] [[राजपूत]] राजवंश के राजा थे। उनका नाम [[इतिहास]] में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल सम्राट [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। [[File:RajaRaviVarma MaharanaPratap.jpg|right|thumb|महाराणा प्रताप सिंह]] ==== जीवन ==== [[चित्र:Statue of Maharana Pratap of Mewar, commemorating the Battle of Haldighati, City Palace, Udaipur.jpg|right|thumb|348x348px|चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , [[उदयपुर]])]] '''[[उदयसिंह द्वितीय|राणा उदयसिंह]]''' केे दूसरी रानी '''धीरबाई''' जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में [[गोगुन्दा]] में हुआ था, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही [[कुम्भलगढ़ दुर्ग|कुुंभलगढ़़ दुुर्ग]] में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक [[मेंडलीफ के पूर्वानुमानित तत्व|में]] [[जोधपुर]] का राठौड़ शासक [[राव चन्द्रसेन|राव चन्द्रसेेन]] भी उपस्थित थे। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल सम्राट]] अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें– # [[जलाल खाँ]] (सितम्बर 1572 ई.) # [[राजा मान सिंह|मानसिंह]] (1573 ई. में ) #[[भगवानदास]] ( सितम्बर, 1573 ई. में ) #[[टोडरमल|राजा टोडरमल]] ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप [[हल्दीघाटी का युद्ध|हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध]] हुआ।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/education/story/10-facts-u-know-about-ruler-of-mewar-maharana-pratap-1-813191.html|title=महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी 10 बातें|website=aajtak.intoday.in|language=hi|access-date=2020-05-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20200304163307/https://aajtak.intoday.in/education/story/10-facts-u-know-about-ruler-of-mewar-maharana-pratap-1-813191.html|archive-date=4 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> ==== हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ईस्वी) ==== {{मुख्य|हल्दीघाटी का युद्ध}} [[चित्र:Chokha, Battle of Haldighati, painted 1822, detail.jpg|अंगूठाकार|291x291px|left|[[हल्दीघाटी का युद्ध|हल्दीघाटी के युद्ध]] में लड़ते हुए महाराणा।]] यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे'''''-''''' [[हकीम खाँ सूरी]]।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|title=4 घंटे की लड़ाई थी हल्दीघाटी, राणा ने की थी मुगलों की हालत पतली|website=aajtak.intoday.in|language=hi|access-date=2020-05-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20180618102121/https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|archive-date=18 जून 2018|url-status=live}}</ref> लड़ाई का स्थल राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व [[राजा मान सिंह|आमेर के राजा मान सिंह]] ने किया था, जिन्होंने लगभग 5,000-10,000 लोगों की सेना की कमान संभाली थी। तीन घंटे से अधिक समय तक चले भयंकर युद्ध के बाद, [[महाराणा प्रताप]] ने खुद को जख्मी पाया जबकि उनके कुछ लोगों ने उन्हें समय दिया, वे पहाड़ियों से भागने में सफल रहे और एक और दिन लड़ने के लिए जीवित रहे। मेवाड़ के हताहतों की संख्या लगभग 1,600 पुरुषों की थी।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=qoRDAAAAYAAJ|title=Military History of India|last=Sarkar|first=Sir Jadunath|date=1960|publisher=Orient Longmans|year=|isbn=978-0-86125-155-1|location=|pages=|language=en|author-link=यदुनाथ सरकार}}</ref> मुगल सेना ने 3500-7800 लोगों को खो दिया, जिसमें 350 अन्य घायल हो गए। इसका कोई नतीजा नही निकला जबकि वे(मुगल) गोगुन्दा और आस-पास के क्षेत्रों पर कब्जा करने में सक्षम थे, वे लंबे समय तक उन पर पकड़ बनाने में असमर्थ थे। जैसे ही साम्राज्य का ध्यान कहीं और स्थानांतरित हुआ, [[महाराणा प्रताप|प्रताप]] और उनकी सेना बाहर आ गई और अपने प्रभुत्व के पश्चिमी क्षेत्रों को हटा लिया।<ref>{{Cite web|url=http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00701023&ct=67|title=Wayback Machine|last=|first=|date=2017-09-13|website=web.archive.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20170913231208/http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00701023%26ct%3D67|archive-date=13 सितंबर 2017|dead-url=|access-date=2020-12-12|url-status=bot: unknown}}</ref> इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध मे [[राणा पूंजा]] [[भील]] का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books/about/Maharana_Pratap.html?id=K0UnRk-rRa4C|title=Maharana Pratap|last=Rana|first=Bhawan Singh|date=2005|publisher=Diamond Pocket Books (P) Ltd.|year=|isbn=978-81-288-0825-8|location=|pages=67-71|language=en}}</ref> इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी ==== दिवेर-छापली का युुद्ध (1582 ईस्वी)==== {{मुख्य|दिवेर-छापली का युद्ध}} [[चित्र:Rana pratap Birla mandir 6 dec 2009 (43).JPG|349x349px|thumb|left|[[लक्ष्मी नारायण मंदिर, दिल्ली|बिरला मंदिर, दिल्ली]] में महाराणा प्रताप का शैल चित्र]] राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ति हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "''मेवाड़ का मैराथन''" कहा है। मेवाड़ के उत्तरी छोर का दिवेर का नाका अन्य नाकों से विलक्षण है। इसकी स्थिति मदारिया और कुंभलगढ़ की पर्वत श्रेणी के बीच है। प्राचीन काल में इस पहाड़ी क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहारों का आधिपत्य था, जिन्हें इस क्षेत्र में बसने के कारण मेर कहा जाता था।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=177|language=en}}</ref> यहां की उत्पत्यकाताओं में इस जाति के निवास स्थलों के कई अवशेष हैं। मध्यकालीन युग में देवड़ा जाति के राजपूत यहां प्रभावशील हो गये, जिनकी बस्तियां आसपास के उपजाऊ भागों में बस गई और वे उदयपुर के निकट भीतरी गिर्वा तक प्रसारित हो गई। चीकली के पहाड़ी भागों में आज भी देवड़ा राजपूत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। देवड़ाओं के पश्चात यहां रावत शाखा के राजपूत बस गये।<ref>भवान सिंह राणा द्वारा ''"महाराणा प्रताप"''. p.81 {{ISBN|978-8128808258}}</ref> इन विभिन्न समुदायों के दिवेर में बसने के कई कारण थे। प्रथम तो दिवेर का एक सामरिक महत्व रहा है, जो समुदाय शौर्य के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, वे उत्तरोत्तर अपने पराक्रम के कारण यहां बसते रहे और एक-दूसरे पर प्रभाव स्थापित करते रहे। दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि इसकी स्थिति ऐसे मार्गों पर है, जहां से मारवाड़, मालवा, गुजरात, अजमेर के आदान-प्रदान की सुविधा रही है। ये मार्ग तंग घाटियों वाले उबड़-खाबड़ मार्ग के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इनके साथ सदियों से आवागमन होने से घोड़ों की टापों के चिन्ह पत्थरों पर अद्यावधि विद्यमान है। मार्गों में पानी की भी कमी नहीं है, जिसके लिये जगह-जगह झरनों के बांध के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से स्थान-स्थान पर चौकियों के ध्वंसाशेष भी दिखाई देते हैं। जब अकबर ने कुंभलगढ़, देवगढ़, मदारिया आदि स्थानों पर कब्जा कर लिया तो वहां की चौकियों से संबंध बनाए रखने के लिए दिवेर का चयन एक रक्षा स्थल के रूप में किया गया। यहां बड़ी संख्या में घुड़सवारों और हाथियों का दल रखा गया। इंतर चौकियों के लिए रसद भिजवाने का भी यह सुगम स्थान था।<ref>{{Cite web|url=https://www.goodreads.com/work/best_book/25072560-a-history-of-the-modern-world|title=A History Of The Modern World|website=www.goodreads.com|access-date=2020-11-24}}</ref> ज्यों महाराणा प्रताप छप्पन के पहाड़ी स्थानों में बस्तियां बसाने और मेवाड़ के समतल भागों में खेतों को उजाड़ने में व्यस्त थे त्यों अकबर दिवेर के मार्ग से उत्तरी सैनिक चौकियों का पोषण भेजने की व्यवस्था में संलग्न रहा। प्रताप की नीतियों छप्पन की चौकियों को हटाने में तथा मध्यभागीय मेवाड़ की चौकियों को निर्बल बनाने में अवश्य सफल हो गये, परंतु दिवेर का केंद्र अब भी मुगलों के लिए सुदृढ़ था।<ref>{{Cite web|url=http://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|title="राजस्थान का पर्यटन"|last=प्रभारी|first=निदेशक|date=2017|website=[[राजस्थान सरकार]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20211228001025/https://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|archive-date=28 दिसंबर 2021|dead-url=|access-date=2020-11-24|url-status=bot: unknown}}</ref> इस पृष्ठभूमि में दिवेर का महाराणा प्रताप का व मुगलों का संघर्ष जुड़ा हुआ था। इस युद्ध की तैयारी के लिए प्रताप ने अपनी शक्ति सुदृढ़ करने की नई योजना तैयार की। वैसे छप्पन का क्षेत्र मुगल से युक्त हो चला था और मध्य मेवाड़ में रसद के अभाव में मुगल चौकियां निष्प्राण हो गई थी अब केवल उत्तरी मेवाड़ में मुगल चौकियां व दिवेर के संबंध में कदम उठाने की आवश्यकता थी। इस संबंध में महाराणा ने गुजरात और मालवा की ओर अपने अभियान भेजना आरंभ किया और साथ ही आसपास के मुगल अधिकार क्षेत्र में छापे मारना शुरू कर दिया। इसी क्रम में [[भामाशाह]] ने, जो मेवाड़ के प्रधान और सैनिक व्यवस्था के अग्रणी थे, मालवे पर चढ़ाई कर दी और वहां से 2.3 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियां दंड में लेकर एक बड़ी धनराशि इकट्ठी की। इस रकम को लाकर उन्होंने महाराणा को चूलिया ग्राम में समर्पित कर दी। इसी दौरान जब शाहबाज खां निराश होकर लौट गया था, तो महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इन दोनों स्थानों पर महाराणा का अधिकार होना दिवेर पर कब्जा करने की योजना का संकेत था।<ref>{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-and-battle-of-dewar-marathon-of-mewad-118062600044_1.html|title=दिवेर का महायुद्ध, हल्दीघाटी के बाद यहां महाराणा प्रताप ने हराया था मुगल सेना को, कहा जाता है 'मैराथन ऑफ मेवाड़'...|last=WD|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-11-24}}</ref> अतएव इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए नई सेना का संगठन किया गया। जगह-जगह रसद और हथियार इकट्ठे किए गए। सैनिकों को धन और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। सिरोही, ईडर, जालोर के सहयोगियों का उत्साह परिवर्धित कराया गया। ये सभी प्रबंध गुप्त रीति से होते रहे। मुगलों को यह भ्रम हो गया कि प्रताप मेवाड़ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं। ऐसे भ्रम के वातावरण से बची हुई मुगल चौकियों के सैनिक बेखटके रहने लगे।<ref>{{Cite web|url=https://link.springer.com/openurl?genre=book&isbn=978-1-349-27193-1|title=Defending India {{!}} SpringerLink|website=link.springer.com|language=en-gb|access-date=2020-11-24}}</ref> जब सब प्रकार की तैयारी हो गई तो महाराणा प्रताप, [[अमर सिंह प्रथम|कु. अमरसिंह]], [[भामाशाह]], चुंडावत, शक्तावत, [[सोलंकी वंश|सोलंकी]], [[परिहार गोत्र|पडिहार,]] [[रावत]] शाखा के [[राजपूत]] और अन्य राजपूत सरदार दिवेर की ओर दल बल के साथ चल पड़े।{{Sfn|Jacques|2006|p=89-90}} दिवेर जाने के अन्य मार्गों व घाटियों में भीलों की टोलियां बिठा दी गई, जिससे मेवाड़ में अन्यत्र बची हुई सैनिक चौकियों का दिवेर से कोई संबंध स्थापित न हो सके।<ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/maharana-pratap-not-akbar-won-battle-of-haldighati-rajasthan-history-book-1026240-2017-07-25|title=Rajasthan rewrites history: Maharana Pratap, not Akbar, won Battle of Haldighati|last=JaipurJuly 25|first=Sharat Kumar|last2=July 25|first2=2017UPDATED:|website=India Today|language=en|access-date=2020-11-24|last3=Ist|first3=2017 21:58}}</ref> [[चित्र:Maha Rana Pratap Singh.jpg|अंगूठाकार|392x392पिक्सेल|महाराणा प्रताप चित्र।]] अचानक महाराणा की फौज दिवेर पहुंची तो मुगल दल में भगदड़ मच गई। मुगल सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी भाग की तलाश में उत्तर के दर्रे से भागने लगे। महाराणा ने अपने दल के साथ भागती सेना का पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कंटीला तथा ऊबड़-खाबड़ था कि मैदानी युद्ध में अभ्यस्त मुगल सैनिक विथकित हो गए। अन्ततोगत्वा घाटी के दूसरे छोर पर जहां कुछ चौड़ाई थी और नदी का स्त्रोत भी था, वहां महाराणा ने उन्हें जा दबोचा।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप सिंह|url=http://www.badaunexpress.com/archives/148102|website=www.badaunaexpress.com|accessdate=9 May 2019}}{{Dead link|date=दिसंबर 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> दिवेर थाने के मुगल अधिकारी सुल्तानखां को कुं. अमरसिंह ने जा घेरा और उस पर भाले का ऐसा वार किया कि वह सुल्तानखां को चीरता हुआ घोड़े के शरीर को पार कर गया। घोड़े और सवार के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराणा ने भी इसी तरह बहलोलखां और उसके घोड़े का काम तमाम कर दिया। एक राजपूत सरदार ने अपनी तलवार से हाथी का पिछला पांव काट दिया। इस युद्ध में विजयश्री महाराणा के हाथ लगी।<ref>{{Cite book|url=http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|title=History of battles and seiges|last=Jacques|first=Tony|publisher=|year=2006|isbn=978-0-313-33536-5|location=|pages=|archive-url=https://web.archive.org/web/20150626120848/http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|archive-date=2015-07-23}}</ref> यह महाराणा की विजय इतनी कारगर सिद्ध हुई कि इससे मुगल थाने जो सक्रिय या निष्क्रिय अवस्था में मेवाड़ में थे जिनकी संख्या 36 बतलाई जाती है, यहां से उठ गए। शाही सेना जो यत्र-तत्र कैदियों की तरह पडी हुई थी, लड़ती, भिड़ती, भूखे मरते उलटे पांव मुगल इलाकों की तरफ भाग खड़ी हुई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=QjtuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Sharma|first=Sri Ram|date=1900|publisher=D. A.-V. College Managing Committee|year=|isbn=|location=|pages=117-156|language=en}}</ref> यहां तक कि 1585 ई. के आगे अकबर भी उत्तर - पश्चिम की समस्या के कारण मेवाड़ के प्रति उदासीन हो गया, जिससे महाराणा को अब चावंड में नवीन राजधानी बनाकर लोकहित में जुटने का अच्छा अवसर मिला। दिवेर की विजय महाराणा के जीवन का एक उज्ज्वल कीर्तिमान है। जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। एक अर्थ में हल्दीघाटी का युद्ध में राजपूतो ने रक्त का बदला दिवेर में चुकाया। दिवेर की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि महाराणा के त्याग और बलिदान की भावना के नैतिक बल ने सत्तावादी नीति को परास्त किया। कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=EAl6rgEACAAJ|title=Maharana Pratap|last=Kumar|first=Ajay|date=2007|publisher=|year=|isbn=978-81-88594-18-4|location=|pages=102|language=en}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=256-267|language=en}}</ref> जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।<ref>{{Cite web|url=https://www.linkedin.com/pulse/legacy-indias-maharana-pratap-lives-today-stephen-manallack#:~:text=When%20Maharana%20Pratap%20(also%20known,custodians%20of%20this%20great%20lineage.|title=The legacy of India&#39;s Maharana Pratap lives on today|website=www.linkedin.com|access-date=2020-11-24}}</ref> ==== सफलता और अवसान ==== पू. 1579 से 1585 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर दिया। महाराणा जी की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।<ref>{{Cite web|url=https://zeenews.india.com/culture/maharana-pratap-jayanti-lesser-known-facts-about-the-fearless-warrior-2282205.html|title=Maharana Pratap Jayanti: Lesser known facts about the fearless warrior|last=|first=|date=2020-05-09|website=Zee News|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200601000000/https://zeenews.india.com/culture/maharana-pratap-jayanti-lesser-known-facts-about-the-fearless-warrior-2282205.html|archive-date=2020-06-01|dead-url=|access-date=2020-12-07}}</ref> महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी [[चावंड]] में उनकी मृत्यु हो गई।<ref name=":0">{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-in-hindi-115052100030_1.html|title=मेवाड़ का वीर योद्धा महाराणा प्रताप {{!}} history of maharana pratap in hindi|last=Webdunia|website=hindi.webdunia.com|language=hi|archive-url=https://web.archive.org/web/20190728185404/http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-in-hindi-115052100030_1.html|archive-date=28 जुलाई 2019|access-date=2020-05-30|url-status=dead}}</ref> महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया।<ref>{{Cite news|url=https://www.bbc.com/hindi/india-46585144|title=हिंदू-मुसलमान की लड़ाई नहीं थी अकबर और महाराणा प्रताप के बीच|last=फ़ज़ल|first=रेहान|date=2018-12-17|work=BBC News हिंदी|access-date=2020-05-30|language=hi|archive-url=https://web.archive.org/web/20200517194326/https://www.bbc.com/hindi/india-46585144|archive-date=17 मई 2020|url-status=live}}</ref> '''एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। '' ==== कुछ महत्वपूर्ण तथ्य ==== इतिहासकार [[विजय नाहर]] की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार कुछ तथ्य उजागर हुए।<ref>{{Cite book|author=विजय नाहर|title=हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप|publisher=पिंकसिटी पब्लिशर्स| isbn=978-93-80522-45-6|year=2011|page= 270}}</ref> 1 .महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति -छापा मार युद्ध प्रणाली इजाद की। वे स्वयं तो इसका प्रयोग नहीं कर सके परन्तु महाराणा प्रताप ,महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका सफल प्रयोग करते हुए मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप के विषय में भारतीय इतिहास में लिखी भ्रांतियों को दूर करती विजय नाहर की पुस्तक "हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://udaipurkiran.in/hindi/1208578/|website=www.udaipurkiran.in|accessdate=9 May 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190509155336/https://udaipurkiran.in/hindi/1208578/|archive-date=9 मई 2019|url-status=dead}}</ref> 2. महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से नहीं हारे। उसे एवं उसके सेनापतियो को धुल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप जीते|महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी में पराजित होने के बाद स्वयं अकबर ने जून से दिसंबर 1576 तक तीन बार विशाल सेना के साथ महाराणा पर आक्रमण किए, परंतु महाराणा को खोज नहीं पाए, बल्कि महाराणा के जाल में फंसकर पानी भोजन के अभाव में सेना का विनाश करवा बैठे। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी हाथ मलता अरब चला गया। शाहबाज खान के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध तीन बार सेना भेजी गई परंतु असफल रहा। उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध सेना भिजवाई गई और पीट-पीटाकर लौट गया। 9 वर्ष तक निरंतर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध आक्रमण करता रहा। नुकसान उठाता रहा अंत में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया।<ref>{{cite web|title="हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/udaipur+kiran+hindi-epaper-udaihin/maharana+pratap+ke+vishay+me+bharatiy+itihas+me+likhi+bhrantiyo+ko+dur+karati+vijay+nahar+ki+pustak+hinduva+sury+maharana+pratap+ki+samiksha-newsid-115840604?listname=topicsList&index=0&topicIndex=0&mode=pwa|website=www.m.dailyhunt.in|accessdate=9 May 2019}}</ref> 3. ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उन्हें घांस की रोटी खानी पड़ी अकबर को संधि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो। इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुंदर बगीचा लगवाया| महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएं महाराणा प्रताप करते थे। फिर ऐसी घटना कैसे हो सकती है कि महाराणा के परिवार को घांस की रोटी खानी पड़ी। अपने उतरार्ध के बारह वर्ष सम्पूर्ण मेवाड़ पर शुशाशन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन दिया ।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप के विषय में भारतीय इतिहास में लिखी भ्रांतियों को दूर करती विजय नाहर की पुस्तक "हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा|url=https://hindi.dailykiran.com/1103917/|website=www.hindi.dailykiran.com|access-date=9 May 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190510052152/https://hindi.dailykiran.com/1103917/|archive-date=10 मई 2019|url-status=dead}}</ref> ==इन्हें भी देखें== * [[मेवाड़]] * [[हल्दीघाटी का युद्ध]] * [[दिवेर-छापली का युद्ध]] * [[महाराणा प्रताप]] * [[गोहिल राजवंश]] * [[उदयपुर रियासत]] * [[सिसोदिया (राजपूत)]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:भारत के राजवंश]] [[श्रेणी:राजस्थान का इतिहास]] 68nzmc5mnicdcqjdmz059e106pbxku8 टीना के 0 972433 6543855 5602394 2026-04-25T11:51:17Z Sequencesolved 173771 /* करियर */ कड़ियाँ लगाई। 6543855 wikitext text/x-wiki {{Infobox adult biography | name = टीना के | image = | caption = | birth_name = | birth_date = {{Birth date and age|1985|4|23}} | birth_place = [[लिथुआनिया]] | death_date = | death_place = | spouse = | height = {{height|ft=5|in=6}} | weight = {{convert|130|lb|kg|abbr=on}} | eye_color = नीली | hair_color = | ethnicity = | alias = | number_of_films = 127 बतौर अभिनेत्री,<br /> 23 बतौर निर्देशक<ref name=AFDB>{{afdb name|id=69386}}</ref><br />(आईएएफडी के अनुसार)<ref name="iafd">{{cite web| title =Personal Biography - Tina Kay| publisher =IAFD.com| url =http://www.iafd.com/person.rme/perfid=tinakay/gender=f/tina-kay.htm| accessdate =सितम्बर 10, 2017| archive-url =https://web.archive.org/web/20181101143059/http://www.iafd.com/person.rme/perfid=tinakay/gender=f/tina-kay.htm| archive-date =1 नवंबर 2018| url-status =live}}</ref> | website = http://www.tinakayhardcore.com/ | spelling = <!-- US for color, UK for colour --> }} '''टीना के''' एक लिथुआनियाई [[अश्लील अभिनेता|पॉर्न फिल्म अभिनेत्री]] और कामुक मॉडल है।<ref>{{cite web|url=https://www.aajtak.in/entertainment/hollywood/photo/in-the-everyday-porn-stars-are-just-like-us-heres-proof-395713-2016-10-15-2|title=आम लोगों जैसी ही जिंदगी जीते हैं पोर्न स्टार्स, ये रहा सबूत }}</ref> वह अब ब्रिटेन में रहती है। टीना के ने यूके पोर्न अवॉर्ड्स और स्पैंक बैंक तकनीकी पुरस्कार जीते।<ref>{{cite web|url=http://www.ukapawards.com/ukap-awards-2014.html|title=UKAP award|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180815002924/http://www.ukapawards.com/ukap-awards-2014.html|archive-date=15 अगस्त 2018|url-status=dead}}</ref><ref>{{cite web|url=https://blog.iafd.com/2018/04/07/the-spank-bank-2018-awards-winners-are/|title=THE SPANK BANK 2018 AWARDS WINNERS ARE…|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181101100953/https://blog.iafd.com/2018/04/07/the-spank-bank-2018-awards-winners-are/|archive-date=1 नवंबर 2018|url-status=dead}}</ref> ==करियर== टीना के का जन्म उसी समय के प्रांत के राजधानी एलीटस शहर में अप्रैल 1985 में हुआ था, उस समय, [[लिथुआनिया]] के [[सोवियत समाजवादी गणराज्य]] में। 16 साल की उम्र से उसने 21 साल की उम्र में कामुक मॉडलिंग की दिशा में एक मॉडल के रूप में छोटी नौकरियां करना शुरू कर दिया। जल्द ही वह [[ब्रिटेन]] चले गए, जहां उन्होंने एक कामुक मॉडल के रूप में एक शानदार करियर विकसित किया, 4 और 28 साल की उम्र में एक अश्लील अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की, एक व्यक्ति ने अपने पहले दृश्यों को केवल लड़कियों की शूटिंग की। थोड़ा सा, वह ब्रिटिश उद्योग के भीतर अधिक वजन प्राप्त कर रहा था, जिसने डॉगहाउस डिजिटल, न्यू सेंसेशंस, एविल एंजेल, द्वि साम्राज्य, विचित्र, डिजिटल प्लेग्राउंड, शरारती अमेरिका, ब्राज़र्स, मार्क डोरसेल फंतासीज जैसे उत्पादकों के लिए रिकॉर्डिंग के दरवाजे खोले, रियलिटी किंग्स, किक गॉस, माइल हाई, किंक डॉट कॉम, [[पेंटहाउस]], डिजिटल सीन या प्राइवेट, दूसरों के बीच। 2014 में, उन्हें वर्ष के महिला कलाकार के लिए [[यूकेएपी पुरस्कार]] से सम्मानित किया गया, नामांकन जिसमें उन्हें अगले वर्ष नामित किया गया था। 2016 में उन्हें अगस्त में विदेशी में बेस्ट सेक्स सीन की श्रेणी में [[एवीएन अवॉर्ड्स]] में अपना पहला नामांकन मिला, जिसमें फिल्म लीग ऑफ फ्रेंकस्टीन द्वारा 9, [[जैस्मीन जे]], [[मिया माल्कोवा]] और [[डैनी डी]] के साथ।<ref>{{cite web|url=http://avnawards.avn.com/pages/4|title=2015 AVN Award Nominees|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230121732/http://web.archive.org/web/20141230202705/http://avnawards.avn.com/pages/4|archive-date=30 दिसंबर 2018|url-status=bot: unknown}}</ref> 2018 में उन्हें वर्ष के विदेशी महिला कलाकार की श्रेणी में [[एक्सबीआईजेड अवॉर्ड्स]] में नामित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.xbiz.com/news/231720/xbiz-announces-finalist-nominees-for-2018-xbiz-awards|title=XBIZ Announces Finalist Nominees for 2018 XBIZ Awards|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20190621120501/https://www.xbiz.com/news/231720/xbiz-announces-finalist-nominees-for-2018-xbiz-awards|archive-date=21 जून 2019|url-status=dead}}</ref> आज तक, उन्होंने 210 से अधिक फिल्मों की है। ==अवॉर्ड== {| class="wikitable" |- ! साल ! अवॉर्ड ! परिणाम ! पुरस्कार ! काम |- |rowspan="1"|'''2014''' |rowspan="1"|यूकेएपी पुरस्कार | विजेता |वर्ष की महिला कलाकार | - |- |rowspan="1"|'''2015''' |rowspan="1"|यूकेएपी पुरस्कार | मनोनीत |Artista femenina del año | - |- |rowspan="1"|'''2016''' |rowspan="1"|एवीएन पुरस्कार | मनोनीत |[[Anexo:Premio AVN a la Mejor escena de sexo en producción extranjera|Mejor escena de sexo en producción extranjera]] |''League of Frankenstein'' |- |rowspan="4"|'''2017''' |rowspan="4"| स्पैंक बैंग पुरस्कार | मनोनीत | Imported Enchantress of the Year | - |- | मनोनीत |Life Sized Human Hand Puppet | - |- |मनोनीत |Masturbator of the Year | - |- | मनोनीत |Most Fuckable Feet | - |- |rowspan="5"|'''2018''' |rowspan="1"| एक्सबीआईजेड पुरस्कार | मनोनीत |[[Anexo:Premio XBIZ a la Artista femenina extranjera del año|Artista femenina extranjera del año]] | - |- |rowspan="3"| स्पैंक बैंग पुरस्कार | मनोनीत |European Enchantress of the Year | - |- | मनोनीत |Most Fuckable Feet | - |- | मनोनीत | Most Underrated Slut | - |- |rowspan="1"| Spank Bank Technical Awards | विजेता |Buttfucked होने के दौरान Sexiest एक्सेंट | - |- |} ==इन्हें भी देखें== * [[औरोरा स्नो]] * [[जेना हेज़]] * ब्रुक वाइल्ड * [[अलेटा ओशियन]] * [[साशा ग्रे]] * [[रेमी लाक्रोइक्स]] * एलिसन टायलर == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == * {{IMDb name|5603693}} * [https://web.archive.org/web/20181023064824/http://www.tinakayhardcore.com/ अधिकृत वेबसाईट] * {{Twitter|TinaKayxxx}} [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:1985 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:महिला व्यस्क फ़िल्म अभिनेता]] [[श्रेणी:लिथुआनिया के लोग]] h2tvmmjgmygslz6txvouqk93ay7845y 6543856 6543855 2026-04-25T11:52:34Z Sequencesolved 173771 /* करियर */ कड़ी जोड़ी। 6543856 wikitext text/x-wiki {{Infobox adult biography | name = टीना के | image = | caption = | birth_name = | birth_date = {{Birth date and age|1985|4|23}} | birth_place = [[लिथुआनिया]] | death_date = | death_place = | spouse = | height = {{height|ft=5|in=6}} | weight = {{convert|130|lb|kg|abbr=on}} | eye_color = नीली | hair_color = | ethnicity = | alias = | number_of_films = 127 बतौर अभिनेत्री,<br /> 23 बतौर निर्देशक<ref name=AFDB>{{afdb name|id=69386}}</ref><br />(आईएएफडी के अनुसार)<ref name="iafd">{{cite web| title =Personal Biography - Tina Kay| publisher =IAFD.com| url =http://www.iafd.com/person.rme/perfid=tinakay/gender=f/tina-kay.htm| accessdate =सितम्बर 10, 2017| archive-url =https://web.archive.org/web/20181101143059/http://www.iafd.com/person.rme/perfid=tinakay/gender=f/tina-kay.htm| archive-date =1 नवंबर 2018| url-status =live}}</ref> | website = http://www.tinakayhardcore.com/ | spelling = <!-- US for color, UK for colour --> }} '''टीना के''' एक लिथुआनियाई [[अश्लील अभिनेता|पॉर्न फिल्म अभिनेत्री]] और कामुक मॉडल है।<ref>{{cite web|url=https://www.aajtak.in/entertainment/hollywood/photo/in-the-everyday-porn-stars-are-just-like-us-heres-proof-395713-2016-10-15-2|title=आम लोगों जैसी ही जिंदगी जीते हैं पोर्न स्टार्स, ये रहा सबूत }}</ref> वह अब ब्रिटेन में रहती है। टीना के ने यूके पोर्न अवॉर्ड्स और स्पैंक बैंक तकनीकी पुरस्कार जीते।<ref>{{cite web|url=http://www.ukapawards.com/ukap-awards-2014.html|title=UKAP award|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180815002924/http://www.ukapawards.com/ukap-awards-2014.html|archive-date=15 अगस्त 2018|url-status=dead}}</ref><ref>{{cite web|url=https://blog.iafd.com/2018/04/07/the-spank-bank-2018-awards-winners-are/|title=THE SPANK BANK 2018 AWARDS WINNERS ARE…|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181101100953/https://blog.iafd.com/2018/04/07/the-spank-bank-2018-awards-winners-are/|archive-date=1 नवंबर 2018|url-status=dead}}</ref> ==करियर== टीना के का जन्म उसी समय के प्रांत के राजधानी एलीटस शहर में अप्रैल 1985 में हुआ था, उस समय, [[लिथुआनिया]] के [[सोवियत संघ|सोवियत समाजवादी गणराज्य]] में। 16 साल की उम्र से उसने 21 साल की उम्र में कामुक मॉडलिंग की दिशा में एक मॉडल के रूप में छोटी नौकरियां करना शुरू कर दिया। जल्द ही वह [[ब्रिटेन]] चले गए, जहां उन्होंने एक कामुक मॉडल के रूप में एक शानदार करियर विकसित किया, 4 और 28 साल की उम्र में एक अश्लील अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की, एक व्यक्ति ने अपने पहले दृश्यों को केवल लड़कियों की शूटिंग की। थोड़ा सा, वह ब्रिटिश उद्योग के भीतर अधिक वजन प्राप्त कर रहा था, जिसने डॉगहाउस डिजिटल, न्यू सेंसेशंस, एविल एंजेल, द्वि साम्राज्य, विचित्र, डिजिटल प्लेग्राउंड, शरारती अमेरिका, ब्राज़र्स, मार्क डोरसेल फंतासीज जैसे उत्पादकों के लिए रिकॉर्डिंग के दरवाजे खोले, रियलिटी किंग्स, किक गॉस, माइल हाई, किंक डॉट कॉम, [[पेंटहाउस]], डिजिटल सीन या प्राइवेट, दूसरों के बीच। 2014 में, उन्हें वर्ष के महिला कलाकार के लिए [[यूकेएपी पुरस्कार]] से सम्मानित किया गया, नामांकन जिसमें उन्हें अगले वर्ष नामित किया गया था। 2016 में उन्हें अगस्त में विदेशी में बेस्ट सेक्स सीन की श्रेणी में [[एवीएन अवॉर्ड्स]] में अपना पहला नामांकन मिला, जिसमें फिल्म लीग ऑफ फ्रेंकस्टीन द्वारा 9, [[जैस्मीन जे]], [[मिया माल्कोवा]] और [[डैनी डी]] के साथ।<ref>{{cite web|url=http://avnawards.avn.com/pages/4|title=2015 AVN Award Nominees|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181230121732/http://web.archive.org/web/20141230202705/http://avnawards.avn.com/pages/4|archive-date=30 दिसंबर 2018|url-status=bot: unknown}}</ref> 2018 में उन्हें वर्ष के विदेशी महिला कलाकार की श्रेणी में [[एक्सबीआईजेड अवॉर्ड्स]] में नामित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.xbiz.com/news/231720/xbiz-announces-finalist-nominees-for-2018-xbiz-awards|title=XBIZ Announces Finalist Nominees for 2018 XBIZ Awards|access-date=29 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20190621120501/https://www.xbiz.com/news/231720/xbiz-announces-finalist-nominees-for-2018-xbiz-awards|archive-date=21 जून 2019|url-status=dead}}</ref> आज तक, उन्होंने 210 से अधिक फिल्मों की है। ==अवॉर्ड== {| class="wikitable" |- ! साल ! अवॉर्ड ! परिणाम ! पुरस्कार ! काम |- |rowspan="1"|'''2014''' |rowspan="1"|यूकेएपी पुरस्कार | विजेता |वर्ष की महिला कलाकार | - |- |rowspan="1"|'''2015''' |rowspan="1"|यूकेएपी पुरस्कार | मनोनीत |Artista femenina del año | - |- |rowspan="1"|'''2016''' |rowspan="1"|एवीएन पुरस्कार | मनोनीत |[[Anexo:Premio AVN a la Mejor escena de sexo en producción extranjera|Mejor escena de sexo en producción extranjera]] |''League of Frankenstein'' |- |rowspan="4"|'''2017''' |rowspan="4"| स्पैंक बैंग पुरस्कार | मनोनीत | Imported Enchantress of the Year | - |- | मनोनीत |Life Sized Human Hand Puppet | - |- |मनोनीत |Masturbator of the Year | - |- | मनोनीत |Most Fuckable Feet | - |- |rowspan="5"|'''2018''' |rowspan="1"| एक्सबीआईजेड पुरस्कार | मनोनीत |[[Anexo:Premio XBIZ a la Artista femenina extranjera del año|Artista femenina extranjera del año]] | - |- |rowspan="3"| स्पैंक बैंग पुरस्कार | मनोनीत |European Enchantress of the Year | - |- | मनोनीत |Most Fuckable Feet | - |- | मनोनीत | Most Underrated Slut | - |- |rowspan="1"| Spank Bank Technical Awards | विजेता |Buttfucked होने के दौरान Sexiest एक्सेंट | - |- |} ==इन्हें भी देखें== * [[औरोरा स्नो]] * [[जेना हेज़]] * ब्रुक वाइल्ड * [[अलेटा ओशियन]] * [[साशा ग्रे]] * [[रेमी लाक्रोइक्स]] * एलिसन टायलर == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == * {{IMDb name|5603693}} * [https://web.archive.org/web/20181023064824/http://www.tinakayhardcore.com/ अधिकृत वेबसाईट] * {{Twitter|TinaKayxxx}} [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:1985 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:महिला व्यस्क फ़िल्म अभिनेता]] [[श्रेणी:लिथुआनिया के लोग]] oorb1opyvhrofhye7ooft7xpcaluvlo क्रिस्टल बॉल फलन 0 973275 6543798 4828132 2026-04-25T09:19:46Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543798 wikitext text/x-wiki [[चित्र:CrystalBallFunction.svg|दाएँ|अंगूठाकार|क्रिस्टल बॉल फलन के उदाहरण । ]] '''क्रिस्टल बॉल फलन''' प्रायिकता घनत्व फलन है जो [[कण भौतिकी|उच्च ऊर्जा भौतिकी]] में अधिक ऊर्जा क्षय वाली विभिन्न मॉडल गणनाओं में काम में लिया जाता है। इसका नामकरण [[क्रिस्टल बॉल (संसूचक)|क्रिस्टल बॉल]] सहभागी प्रयोग के सम्मान में किया गया। यह एक तरफ गाउस फलन का रूप रखता है और अन्य दिशा में एक देहली ऊर्जा के नीचे घात-ह्रास नियम के अनुरूप निम्न-बिन्दु अन्तिम भाग रखता है। यह फलन और इसका प्रथम [[अवकलज|अवलकज]] दोनों [[सतत फलन|सतत]] होते हैं। क्रिस्टल बॉल फलन को निम्नलिखित रूप में लिखा जाता है: :<math>f(x;\alpha,n,\bar x,\sigma) = N \cdot \begin{cases} \exp(- \frac{(x - \bar x)^2}{2 \sigma^2}), & \mbox{for }\frac{x - \bar x}{\sigma} > -\alpha \\ A \cdot (B - \frac{x - \bar x}{\sigma})^{-n}, & \mbox{for }\frac{x - \bar x}{\sigma} \leqslant -\alpha \end{cases}</math> जहाँ :<math>A = \left(\frac{n}{\left| \alpha \right|}\right)^n \cdot \exp\left(- \frac {\left| \alpha \right|^2}{2}\right)</math>, :<math>B = \frac{n}{\left| \alpha \right|} - \left| \alpha \right|</math>, :<math>N = \frac{1}{\sigma (C + D)}</math>, :<math>C = \frac{n}{\left| \alpha \right|} \cdot \frac{1}{n-1} \cdot \exp\left(- \frac {\left| \alpha \right|^2}{2}\right)</math>, :<math>D = \sqrt{\frac{\pi}{2}} \left(1 + \operatorname{erf}\left(\frac{\left| \alpha \right|}{\sqrt 2}\right)\right)</math>. <math>N</math> (स्कवारनिकी 1986) प्रसामान्यकारी गुणक है और <math>\alpha</math>, <math>n</math>, <math>\bar x</math> एवं <math>\sigma</math> आसंजन प्राचल हैं। erf यहाँ त्रुटि फलन को व्यक्त करता है। == बाहरी कड़ियाँ == * जे॰ ई॰ गाइजर, [https://web.archive.org/web/20151204062407/http://www.slac.stanford.edu/cgi-wrap/getdoc/slac-r-255.pdf Appendix-F Charmonium Spectroscopy from Radiative Decays of the J/Psi and Psi-Prime, Ph.D. Thesis], SLAC-आर-255 (1982). (यह एक 205-पृष्ठ का पीडीएफ दस्तावेज़ है जिसके पृष्ठ संख्या 178 पर फलन परिभाषित है।) * एम॰ जे॰ ओरेग्लिया, [http://www.slac.stanford.edu/cgi-wrap/getdoc/slac-r-236.pdf A Study of the Reactions psi prime --> gamma gamma psi, Ph.D. Thesis]{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}, SLAC-आर-236 (1980), परिशिष्ट डी * टी॰ स्कवारनिकी, [http://inspirehep.net/record/230779/files/f31-86-02.pdf A study of the radiative CASCADE transitions between the Upsilon-Prime and Upsilon resonances, Ph.D Thesis], DESY F31-86-02(1986), परिशिष्ट ई. [[श्रेणी:फलन और प्रतिचित्रण]] 03ao8nvjepplsc6v1qxrvu5jbsql88p कृष्ण एन. शर्मा 0 1013004 6543674 5115532 2026-04-24T17:24:56Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543674 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=कृष्ण एन. शर्मा|image=Dr. Krishna N. Sharma Cameroon.jpg|alt=|birth_name=कृष्ण नन्द शर्मा|birth_date=<!-- {{birth date and age|1984|12|24}} -->|birth_place=[[मऊ (बहुविकल्पी)|मऊ]], [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]|nationality=[[भारतीय]]|occupation=[[लेखक]], [[शिक्षक]]|known_for=[[लेखन]] एवं [[शिक्षाशास्त्र|शिक्षण]]|home_town=[[मुहम्मदाबाद_गोहना_(तहसील),_मऊ|मुहम्मदाबाद गोहना]]|title=[[उप कुलपति]]<br/> विक्टोरिया विश्वविद्यालय, कम्पाला|spouse=डॉ. अंकिता कश्यप|children=अऋषा शर्मा|website=[http://www.drkrishna.co.in आधिकारिक वेबसाइट]}} '''कृष्ण एन. शर्मा''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|English]]: Krishna N. Sharma) एक [[भारतीय]] मूल के [[युगाण्डा|यूगांडा]] निवासी [[लेखक]] एवं शोधकर्ता हैं. वर्तमान में वह विक्टोरिया विश्वविद्यालय, कम्पाला के [[उप कुलपति|उप-कुलपति]] हैं.<ref>{{Cite news|url=https://www.newvision.co.ug/new_vision/news/1464550/-sharma-uganda-vice-chancellor|title=Meet Uganda’s youngest vice-chancellor|work=www.newvision.co.ug|access-date=2017-10-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218141719/https://www.newvision.co.ug/new_vision/news/1464550/-sharma-uganda-vice-chancellor|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref> == पृष्ठभूमि == इनका जन्म [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]] के [[मऊ जिला|मऊ]] जिले के [[मुहम्मदाबाद गोहना (तहसील), मऊ|मोहम्मदाबाद गोहना]] नामक कस्बे में हुआ. इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई. == कार्य का इतिहास == कृष्ण एन. शर्मा ने २००७ से [[इलाहाबाद|प्रयागराज]] के जीवन ज्योति इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज में सर्वप्रथम बतौर सहायक [[व्याख्याता]], तत्पश्चात बतौर विभागाध्यक्ष एवं अंततः बतौर उप-प्राचार्य कार्य किया. इसके बाद वह [[कैमरुन|कैमरून]] के सेंट लुइस विश्वविद्यालय में बतौर [[डीन (शिक्षा)|डीन]]<ref>{{Cite web|url=http://www.saintlouisuniversitybamenda.com/research/department-of-physiotherapy/dr-krishna-n-sharma/|title=Dr. Krishna N. Sharma|date=2015-07-30|website=ST. LOUIS UNIVERSITY INSTITUTE BAMENDA|language=en-US|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20160616171345/http://www.saintlouisuniversitybamenda.com/research/department-of-physiotherapy/dr-krishna-n-sharma/|archive-date=16 जून 2016|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.lohars.org/eminent-people.php|title=Eminent Vishwakarma, Lohar, Panchal, Sutar People|website=www.lohars.org|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218081811/http://www.lohars.org/eminent-people.php|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{Citation|last=Krishna Sharma|title=VOV 100th Edition|date=2014-08-24|url=https://www.youtube.com/watch?v=RF7HVZNacz0|accessdate=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20170512104354/https://www.youtube.com/watch?v=RF7HVZNacz0|archive-date=12 मई 2017|url-status=live}}</ref><ref>{{Citation|last=Krishna Sharma|title=Physiotherapy : Dr. Krishna N. Sharma on CRTV|date=2016-05-13|url=https://www.youtube.com/watch?v=Q1Db7h6h_PM|accessdate=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20170405091250/https://www.youtube.com/watch?v=Q1Db7h6h_PM|archive-date=5 अप्रैल 2017|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.o-c-o.ca/cameroon.php|title=The Osteopathic College of Ontario Cameroon|website=The Osteopathic College of Ontario Cameroon|access-date=2017-04-14|archive-url=https://web.archive.org/web/20190217183449/http://www.o-c-o.ca/cameroon.php|archive-date=17 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref> एवं तत्पश्चात विक्टोरिया विश्वविद्यालय, [[कम्पाला]] के [[स्वास्थ्य विज्ञान]] संकाय में [[डीन (शिक्षा)|डीन]] बने.<ref>{{Cite web|url=http://www.chimpreports.com/interview-dr-krishna-on-why-victoria-university-is-the-best-for-health-science-studies-in-east-africa/|title=Interview: Dr Krishna on Why Victoria University is the Best for Health Science Studies in East Africa {{!}}|website=www.chimpreports.com|language=en-US|access-date=2017-01-31|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218021215/http://www.chimpreports.com/interview-dr-krishna-on-why-victoria-university-is-the-best-for-health-science-studies-in-east-africa/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://earthfinds.co.ug/index.php/tourism/item/768-victoria-university-gets-new-faculty-deans|title=Victoria University Gets New Faculty Deans|last=Finds|first=Earth|access-date=2017-01-31|language=en-gb|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218021227/http://earthfinds.co.ug/index.php/tourism/item/768-victoria-university-gets-new-faculty-deans|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.theugandatoday.com/education/2017/01/interview-dr-krishna-on-why-victoria-university-is-the-best-for-health-science-studies-in-east-africa/amp/|title=Interview: Dr Krishna on Why Victoria University is the Best for Health Science Studies in East Africa {{!}} Uganda Today|website=www.theugandatoday.com|language=en-GB|access-date=2017-02-01|archive-url=https://web.archive.org/web/20170802002352/http://www.theugandatoday.com/education/2017/01/interview-dr-krishna-on-why-victoria-university-is-the-best-for-health-science-studies-in-east-africa/amp/|archive-date=2 अगस्त 2017|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://xpresstimes.co.ug/2017/04/05/victoria-university-to-hold-graduation-ceremony-on-april-7-2017/|title=Victoria University to hold Graduation ceremony on April 7, 2017|website=Xpress Times Uganda|access-date=2017-04-26|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218021312/http://xpresstimes.co.ug/2017/04/05/victoria-university-to-hold-graduation-ceremony-on-april-7-2017/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://www.earthfinds.co.ug/index.php/tourism/environment/item/879-demand-for-environmental-health-experts-increasing-says-university-dean|title=Demand For Environmental Health Experts Increasing, Says University Dean|last=Kyuka|first=Maria|access-date=2017-04-26|language=en-gb|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218021152/http://www.earthfinds.co.ug/index.php/tourism/environment/item/879-demand-for-environmental-health-experts-increasing-says-university-dean|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref> == लेखन यात्रा == डॉ. शर्मा के लेखन कि शुरुवात २००५ में [[मऊ जिला|मऊ]] जिले में हुई. [[चिकित्सा]], [[स्वास्थ्य विज्ञान]], [[संगीत]] एवं [[साहित्य]] पर इनकी १०० से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.<ref>{{Cite web|url=http://xpresstimes.co.ug/2017/05/10/victoria-university-dean-of-health-sciences-releases-his-125th-book/|title=Victoria University Dean of Health Sciences releases his 125th book|website=Xpress Times Uganda|access-date=2017-05-12|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218081933/http://xpresstimes.co.ug/2017/05/10/victoria-university-dean-of-health-sciences-releases-his-125th-book/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref name=":0">{{Cite web|url=http://www.physiotimes.com/article/physio-speaks-interview-with-a-multitalented-physiotherapist-donning-many-hats---krishna-sharma/|title=PHYSIO SPEAKS: Interview with a Multitalented Physiotherapist Donning Many Hats - KRISHNA SHARMA {{!}} Physiotimes|website=www.physiotimes.com|language=en-US|access-date=2017-04-14|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218141706/http://www.physiotimes.com/article/physio-speaks-interview-with-a-multitalented-physiotherapist-donning-many-hats---krishna-sharma/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.amazon.com/Dr.-Krishna-N.-Sharma/e/B008MNHIFM|title=Amazon.com: Dr. Krishna N. Sharma: Books, Biography, Blog, Audiobooks, Kindle|website=www.amazon.com|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20170405202545/https://www.amazon.com/Dr.-Krishna-N.-Sharma/e/B008MNHIFM|archive-date=5 अप्रैल 2017|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://jaypeedigital.com/Book/BookDetail?isbn=9789350902974|title=JaypeeDigital {{!}} BookDetail|website=jaypeedigital.com|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20190125222302/http://www.jaypeedigital.com/Book/BookDetail?isbn=9789350902974|archive-date=25 जनवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.indiabookofrecords.in/most-medical-books-published-in-a-year-different-publisher/|title=MOST MEDICAL BOOKS PUBLISHED IN A YEAR (DIFFERENT PUBLISHER) – India Book of Records|website=www.indiabookofrecords.in|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218084941/http://indiabookofrecords.in/most-medical-books-published-in-a-year-different-publisher/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://epaper.jagran.com/epaper/18-feb-2013-51-varanasi-archive-edition-mau-Page-3.html|title=ePaper{{!}} Hindi ePaper{{!}} ePaper India - Dainik Jagran ePaper|website=epaper.jagran.com|access-date=2016-05-25|archive-date=3 जुलाई 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160703134517/http://epaper.jagran.com/login.aspx|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://nobelbooks.com/the-international-writers-hall-of-fame/|title=The International Writers Hall of Fame – Welcome to the Nobel Books!|website=nobelbooks.com|language=en-US|access-date=2017-04-14|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218082407/http://nobelbooks.com/the-international-writers-hall-of-fame/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://drkrishna.jimdo.com/books-1/|title=Books|website=drkrishna.jimdo.com|language=en-US|access-date=2017-04-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218082102/https://drkrishna.jimdo.com/books-1/|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref> तथा उनमें से कुछ पुस्तकें [[एमाज़ॉन.कॉम|अमेज़न]] की बेस्टसेलर सूची में भी आ चुकी हैं.<ref>{{Cite web|url=http://inextepaper.jagran.com/c/10545145|title=Clipping of Jagran Prakashan - Allahabad Hindi ePaper, Allahabad Hindi Newspaper - InextLive|website=inextepaper.jagran.com|access-date=2016-05-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20190218201926/http://inextepaper.jagran.com/c/10545145|archive-date=18 फ़रवरी 2019|url-status=dead}}</ref> == गीतकार के बतौर बिम्बचित्रण == {| class="wikitable sortable" !वर्ष !गीत !लेबल |- |२०१९ |स्वैग<ref>{{Citation|last=Zee Music Company|title=Swag - Official Music Video {{!}} Jiyaa J {{!}} Palak Jain I Dony Hazarika|date=2019-02-11|url=https://www.youtube.com/watch?v=LEPPjmoYtW4|access-date=2019-02-17}}</ref> |ज़ी म्यूजिक कम्पनी |} == सन्दर्भ == {{reflist|30em}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20170405202545/https://www.amazon.com/Dr.-Krishna-N.-Sharma/e/B008MNHIFM Dr. Krishna N. Sharma] [[एमाज़ॉन.कॉम|अमेज़न.कॉम]] पर {{authority control}} {{DEFAULTSORT:Sharma, Krishna N}} [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:भारतीय लेखक]] [[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के लोग]] [[श्रेणी:आज़मगढ़ के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व]] 0owcvd4hbrggb3mi36385zzmmdmu1wd सुहा अराफात 0 1022850 6543828 6304559 2026-04-25T11:06:43Z The Sorter 845290 6543828 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=सुहा अराफात<br>Suha Arafat|image=|image_size=|caption=[[Hillary Clinton]] greeting Suha Arafat on November 11, 1999|birth_name=सुहा दाउद ताविल|birth_date={{birth date and age|1963|7|17|df=y}}|birth_place=[[यरुशलेम]]|death_date=|death_place=|spouse=[[यासर अराफात]],17 जुलाई 1990 से11 नवंबर 2004 (उनकी मृत्यु तक)|children=ज़हवा (जन्म 1995)|known_for=|occupation=|parents=रायमोंडा तविल|nationality=[[फिलिस्तीनी]], [[तूनिसीया|ट्यूनीशिया]] (2006-2007), [[फ़्रान्स|फ्रांस]]}} '''सूहा अराफात''' ( अरबी ; जन्म '''सुहा दाउद ताविल''' 17 जुलाई, 1963 को) पूर्व फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष [[यासिर अराफ़ात (फिलिस्तीनी नेता)|यासर अराफात]] की विधवा पत्नी हैं। == प्रारंभिक जीवन और शिक्षा == सुहा का जन्म [[यरुशलम]] में 17 जुलाई 1963 को एक संपन्न रोमन कैथोलिक <ref>{{Cite news|url=https://www.washingtonpost.com/wp-dyn/articles/A35240-2004Nov8.html|title=Fight Over Icon Has Plenty of Precedent|last=Moore|first=Molly|date=9 November 2004|work=The Washington Post|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190120010857/http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/articles/A35240-2004Nov8.html|archive-date=20 जनवरी 2019|url-status=live}}</ref> <ref>[http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/middle_east/3965541.stm प्रोफाइल: सुहा अराफात] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090215104412/http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/middle_east/3965541.stm |date=15 फ़रवरी 2009 }} ११ नवंबर २००४ [[बीबीसी न्यूज़|बीबीसी समाचार]] ०४ जनवरी २०१३ को पुनःप्राप्त</ref> <ref>[[एसोसिएटेड प्रेस|एसोसिएटेड प्रेस]] [http://usatoday30.usatoday.com/news/world/2004-11-10-arafat-family_x.htm यासर अराफात को शायद ही कभी अपनी पत्नी और बेटी को देखा] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170803030208/http://usatoday30.usatoday.com/news/world/2004-11-10-arafat-family_x.htm |date=3 अगस्त 2017 }} 11 नवंबर 2004 [[USA Today|यूएसए टुडे]] को पुनः प्राप्त 04 जनवरी 2013</ref> परिवार में हुआ था, जो नब्लस और उसके बाद [[रामल्ला|रामल्लाह]] (उस समय जॉर्डन के शासन वाले दोनों शहर) में रहते थे। <ref>{{Cite web|url=http://www.aljazeera.com/programmes/whatkilledarafat/2012/07/20127375720962440.html|title=Q&A: Suha Arafat|website=www.aljazeera.com|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190227120759/https://www.aljazeera.com/programmes/whatkilledarafat/2012/07/20127375720962440.html|archive-date=27 फ़रवरी 2019|url-status=live}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://worldnews.about.com/od/palestinianauthority/p/Yasser-Arafat.htm|title=The Oslo Accords: Background and Derailment|publisher=|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20160320172634/http://worldnews.about.com/od/palestinianauthority/p/Yasser-Arafat.htm|archive-date=20 मार्च 2016|url-status=live}}</ref> सुहा के पिता दाउद ताविल, एक [[ऑक्सफ़ोर्ड|ऑक्सफोर्ड-]] शिक्षित <ref>[http://www.theage.com.au/news/Middle-East-Crisis/Stifling-of-Suha/2004/11/13/1100227630102.html "स्टिफलिंग ऑफ सुहा"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20130925205445/http://www.theage.com.au/news/Middle-East-Crisis/Stifling-of-Suha/2004/11/13/1100227630102.html |date=25 सितंबर 2013 }} , टेलीग्राफ / द एज, 14 नवंबर 2004</ref> बैंकर, <ref name="washingtonpost.com">[https://www.washingtonpost.com/wp-dyn/articles/A35240-2004Nov8.html "फाइट ओवर आइकन में बहुत सारी मिसाल है"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190120010857/http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/articles/A35240-2004Nov8.html |date=20 जनवरी 2019 }} , वाशिंगटन पोस्ट फॉरेन सर्विस, 9 नवंबर 2004</ref> [[याफ़ा]] (अब [[तेल अवीव]] का हिस्सा) में पैदा हुए थे। दाउद ताविल का [[पश्चिमी तट|वेस्ट बैंक]] और [[जॉर्डन]] दोनों में कारोबार था। <ref name="har04">{{Cite news|url=http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|title=Focus / The rantings of Suha Arafat are more than just about money|last=Rubinstein|first=Danny|date=9 November 2004|work=Haaretz|access-date=5 July 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20131228165000/http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|archive-date=28 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref> एकर में जन्मीं सुहा की मां रायमोंडा हवा तवील [[हाइफ़ा|हाइफा]] क्षेत्र में प्रमुख संपत्ति के मालिकों, एकर के हवा परिवार की सदस्य हैं। <ref name="har04">{{Cite news|url=http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|title=Focus / The rantings of Suha Arafat are more than just about money|last=Rubinstein|first=Danny|date=9 November 2004|work=Haaretz|access-date=5 July 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20131228165000/http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|archive-date=28 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref> वह एक कवियित्री और लेखिका थीं। वह 1967 के बाद एक राजनीतिक रूप से सक्रिय फिलिस्तीनी आतंकवादी बन गया और उसे इजरायलियों द्वारा कई बार गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे वह एक मीडिया स्टार बन गया। <ref name="har04" /> वह एक हाई-प्रोफाइल फिलिस्तीनी पत्रकार भी थीं। <ref name="bbc04" /> सुहा को कैथोलिक उठाया गया था। <ref name="bbc04">{{Cite news|url=http://news.bbc.co.uk/2/hi/middle_east/3965541.stm|title=Profile: Suha Arafat|date=11 November 2004|work=BBC|access-date=22 June 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20120702035621/http://news.bbc.co.uk/2/hi/middle_east/3965541.stm|archive-date=2 जुलाई 2012|url-status=live}}</ref> रामल्ला में पली-बढ़ी सुहा 1970 के दशक में [[पूर्व यरुशलम|पूर्वी यरुशलम]] में अपने पीएलओ-प्रभावित समाचार ब्यूरो से अपनी मां की राजनीतिक सक्रियता से प्रभावित थी। <ref name="har04" /> सुहा ने एक कॉन्वेंट स्कूल, रोसेरी सिस्टर्स स्कूल, बेइट हनीना , [[यरुशलम]] में भाग लिया। 18 साल की उम्र में, वह पढ़ने के लिए [[पेरिस]] गई, जहां वह अपनी बड़ी बहन के साथ रहती थी, जिसकी शादी इब्राहिम सूस से हुई थी, जो [[फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन|पीएलओ]] का फ्रांस का तत्कालीन राजदूत था। <ref name="har04">{{Cite news|url=http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|title=Focus / The rantings of Suha Arafat are more than just about money|last=Rubinstein|first=Danny|date=9 November 2004|work=Haaretz|access-date=5 July 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20131228165000/http://www.haaretz.com/print-edition/news/focus-the-rantings-of-suha-arafat-are-more-than-just-about-money-1.139680|archive-date=28 दिसंबर 2013|url-status=live}}</ref> एक छात्र के रूप में, सुहा फ्रांस में जनरल यूनियन ऑफ फिलिस्तीन छात्रों में एक नेता थीं, जहां उन्होंने फिलिस्तीनी कारण के लिए प्रदर्शन आयोजित किए। == अराफात से शादी == सुहा, अपनी माँ और बहनों के साथ, 1985 में पहली बार अराफात से मिलीं। <ref>{{Cite web|url=https://www.thetimes.co.uk/|title=The Times & The Sunday Times|publisher=|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190330201402/https://www.thetimes.co.uk/|archive-date=30 मार्च 2019|url-status=live}}</ref> जब उन्होंने 1989 में फ्रांस का दौरा किया, तो उन्होंने आगंतुकों और फ्रांसीसी सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकों में एक दुभाषिया के रूप में काम किया। यह तर्क दिया जाता है कि उसकी मां के माध्यम से सुहा ने अपने पति से मुलाकात की। हालांकि, यह भी तर्क दिया जाता है कि सुहा ने अराफात से 1987 और 1988 में मुलाकात की, और 1989 में पेरिस की अपनी यात्रा को व्यवस्थित करने में मदद की। पेरिस से जाने के तुरंत बाद, अराफात ने सुहा को [[तूनिसीया|ट्यूनीशिया]] (जहां [[फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन]] ने एक आश्रय स्थापित किया था) में उनके साथ काम करने और आने के लिए कहा। सुहा ने 17 जुलाई 1990 को अराफात से चुपके से शादी की, जब वह 27 साल की थी और वह 61 साल की थी। उनकी इकलौती संतान, बेटी जाहवा, 24 जुलाई 1995 को फ्रांस के न्यूरिली -सुर-सीन में पैदा हुई थी। ज़ाहवा का नाम अराफात की मां के नाम पर रखा गया था। <ref name="jwl">{{Cite web|url=http://www.jewishvirtuallibrary.org/jsource/biography/Suha_Arafat.html|title=Suha Arafat|publisher=Jewish Virtual Library|access-date=5 July 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20120716202022/http://www.jewishvirtuallibrary.org/jsource/biography/Suha_Arafat.html|archive-date=16 जुलाई 2012|url-status=live}}</ref> सुहा ने अपनी शादी के समय [[सुन्नी इस्लाम]] में परिवर्तित हो गई। <ref name="auto">{{Cite web|url=https://www.theguardian.com/world/2013/feb/10/yasser-arafat-widow-wedding-mistake|title=Yasser Arafat's widow says her marriage was 'a big mistake'|date=10 February 2013|publisher=The Guardian|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190527070602/https://www.theguardian.com/world/2013/feb/10/yasser-arafat-widow-wedding-mistake|archive-date=27 मई 2019|url-status=live}}</ref> कई फिलिस्तीनियों का मानना है कि उसका धर्म-परिवर्तन मिथ्या है; और आरोप लगाया कि सुहा ने अपने दिवंगत पति द्वारा गुप्त बैंक खातों में लाखों डॉलर डाले हैं, जिससे वह इनकार करती है। <ref name="auto" /> अपनी शादी के दौरान, उसने कई बार अराफात को छोड़ने का प्रयास किया ताकि वह अपने उद्देश्य से गपशप से बच सके, लेकिन इसकी अनुमति नहीं थी। <ref name="star1">{{Cite web|url=http://www.dailystar.com.lb/News/Middle-East/2013/Feb-09/205749-arafats-widow-tried-to-leave-palestinian-leader-hundreds-of-times.ashx#axzz2KIO7W2jH|title=Arafat’s widow tried to leave Palestinian leader ‘hundreds of times’|date=9 February 2013|publisher=|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20180816043730/http://www.dailystar.com.lb/News/Middle-East/2013/Feb-09/205749-arafats-widow-tried-to-leave-palestinian-leader-hundreds-of-times.ashx#axzz2KIO7W2jH|archive-date=16 अगस्त 2018|url-status=live}}</ref> 11 नवंबर 2004 को अपने दिवंगत पति की मृत्यु के बाद साक्षात्कार में, सुहा ने कहा कि वह फिलिस्तीनी नेता से प्यार करती है, लेकिन एक राजनीतिक लक्ष्य बनने के कारण वह अराफात से शादी को एक गलती के रूप में देखती है। == अराफात की मौत के बाद == सुहा और ज़ाहवा ट्यूनीशिया में 2004 से 2007 तक रहे। सुहा अराफात से शादी करने से पहले ट्यूनीशिया में भी रहे थे। उन्होंने सितंबर 2006 में ट्यूनीशियाई नागरिकता प्राप्त की। ज़ाहवा ट्यूनीशिया के अमेरिकन कोऑपरेटिव स्कूल गए। 1998 के बाद से वह ट्यूनीशिया और फ्रांस में और उसके बाहर रहती थी। <ref name="cable"> {{Cite web|url=http://213.251.145.96/cable/2006/10/06TUNIS2570.html|title=Archived copy|archive-url=https://web.archive.org/web/20101220111715/http://213.251.145.96/cable/2006/10/06TUNIS2570.html|archive-date=2010-12-20|url-status=dead|access-date=2010-12-14}} </ref> === ट्यूनीशिया में विवाद === 7 अगस्त 2007 को, [[तूनिसीया|ट्यूनीशिया ने]] , सुहा को चेतावनी दिए बिना, इनकी नागरिकता रद्द कर दी, लेकिन अपनी बेटी की नहीं। <ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|title=Tunisia issues warrant for Arafat's widow|website=Reuters|publisher=Reuters|access-date=15 August 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20150924160300/http://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|archive-date=24 सितंबर 2015|url-status=live}}</ref> सुहा ने दावा किया कि उसकी ट्यूनीशियाई संपत्ति भी जमी हुई थी। <ref> {{Cite web|url=https://tunileaks.appspot.com/?p=39001|title=Archived copy|archive-url=https://web.archive.org/web/20110208162245/http://tunileaks.appspot.com/?p=39001|archive-date=2011-02-08|url-status=dead|access-date=2011-01-03}} </ref> 31 अक्टूबर 2011, [[तूनिस|ट्यूनिस]] पहले उदाहरण के न्यायालय सुहा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट जारी किया, एक व्यापारिक सौदा है कि पूर्व ट्यूनीशियाई पहली महिला, भ्रष्टाचार से संबंधित लैला बेन अली को 2006 में, <ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|title=Tunisia issues warrant for Arafat's widow|website=Reuters|publisher=Reuters|access-date=15 August 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20150924160300/http://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|archive-date=24 सितंबर 2015|url-status=live}}</ref> प्रारंभ में, सुहा ने ट्यूनीशियाई अभियोजकों के साथ अपने पूर्ण सहयोग की घोषणा की। <ref>{{Cite web|url=http://www.tunisia-live.net/2011/11/01/suha-arafat-i-am-the-first-victim-of-leila-ben-ali/|title=Archived copy|archive-url=https://web.archive.org/web/20111119075119/http://www.tunisia-live.net/2011/11/01/suha-arafat-i-am-the-first-victim-of-leila-ben-ali/|archive-date=2011-11-19|url-status=dead|access-date=2011-11-25}} </ref> लेकिन कुछ ही समय बाद उसने ट्यूनीशियाई योजना के रूप में अभियोजन पक्ष को बदनाम करने के लिए उसे और फिलिस्तीनी को बदनाम करने की योजना बनाई। <ref>{{Cite web|url=http://www.jpost.com/MiddleEast/Article.aspx?id=244148|title=Middle East News - The Jerusalem Post|website=www.jpost.com|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20130510202438/http://www.jpost.com/MiddleEast/Article.aspx?id=244148|archive-date=10 मई 2013|url-status=live}}</ref> वह उस समय माल्टा में रह रही थी। उसने उन रिपोर्टों से भी इनकार किया कि उसके पास फिलिस्तीनी राष्ट्रीय कारण से संबंधित कोई धन या संपत्ति थी, और उसने कहा कि उसने इज़राइल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का विरोध किया। <ref>{{Cite web|url=http://www.ynetnews.com/articles/0,7340,L-4149488,00.html|title=Suha Arafat: I never took money from Palestine|date=17 November 2011|publisher=|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190212093759/https://www.ynetnews.com/articles/0,7340,L-4149488,00.html|archive-date=12 फ़रवरी 2019|url-status=live}}</ref> === अन्य गतिविधियां === 27 नवंबर 2012 को, सुहा के कहने पर, अराफात के शरीर को वेस्ट बैंक में ले जाया गया, ताकि उसके अवशेष से नमूने लिए जा सकें। सुहा के अनुसार, अनुमान का उद्देश्य, यह निर्धारित करना था कि क्या वह [[पोलोनियम|पोलोनियम के]] साथ जहर था। <ref>{{Cite web|url=http://www.timesofmalta.com/articles/view/20121127/local/tearful-suha-arafat-watches-husband-s-exhibation.447128|title=Tearful Suha Arafat watches husband's exhumation from her Malta home|last=Ltd|first=Allied Newspapers|publisher=|access-date=19 मार्च 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20181214124043/https://www.timesofmalta.com/articles/view/20121127/local/tearful-suha-arafat-watches-husband-s-exhibation.447128|archive-date=14 दिसंबर 2018|url-status=live}}</ref> 2011 तक, वह [[माल्टा]] में अपनी बेटी के साथ रह रही थी। <ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|title=Tunisia issues warrant for Arafat's widow|website=Reuters|publisher=Reuters|access-date=15 August 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20150924160300/http://www.reuters.com/article/2011/10/31/us-tunisia-arafat-warrant-idUSTRE79U5P020111031|archive-date=24 सितंबर 2015|url-status=live}}</ref> == संदर्भ == <references group="" responsive=""></references> [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:1963 में जन्मे लोग]] 9dq6hbro18dhecbhpv0skyszeb3yy73 अलज़ारी जोसेफ 0 1028916 6543796 4815652 2026-04-25T09:09:36Z Sequencesolved 173771 कडी जोड़ी। 6543796 wikitext text/x-wiki {{Infobox cricketer |name = अलज़ारी जोसेफ |image = |fullname = अलज़ारी शहीम जोसेफ |birth_date = |birth_place = [[अण्टीगुआ|एंटिगुआ]] |nickname = |heightm = |batting = दाहिने हाथ से |bowling = दाहिने हाथ से तेज गेंदबाजी |role = [[गेंदबाज]] |family = |country = वेस्टइंडीज |international = true |internationalspan = 2016-वर्तमान |testcap = 309 |testdebutagainst = भारत |testdebutdate = 9 अगस्त |testdebutyear = 2016 |lasttestdate = 9 फरवरी |lasttestyear = 2019 |lasttestagainst = इंग्लैंड |odidebutdate = 2 अक्तूबर |odidebutyear = 2016 |odidebutagainst = पाकिस्तान |odicap = 173 |lastodidate = 25 जुलाई |lastodiyear = 2018 |lastodiagainst = बांग्लादेश |club1 = लीवर्ड आइलैंड |year1 = 2014–वर्तमान |club2 = सेंट किट्स एंड नेविस पैट्रियट्स |year2 = 2016-वर्तमान |clubnumber2 = 8 |club3 = [[मुंबई इंडियंस]] |year3 = 2019–वर्तमान |columns = 4 |column1 = [[टेस्ट क्रिकेट|टेस्ट]] |matches1 = 9 |runs1 = 84 |bat avg1 = 5.60 |100s/50s1 = 0/0 |top score1 = 34 |deliveries1 = 1,525 |wickets1 = 25 |bowl avg1 = 32.84 |fivefor1 = 0 |tenfor1 = 0 |best bowling1 = 3/53 |catches/stumpings1 = 6/0 |column2 = [[एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय|वनडे]] |matches2 = 16 |runs2 = 104 |bat avg2 = 34.66 |100s/50s2 = 0/0 |top score2 = 29* |deliveries2 = 757 |wickets2 = 24 |bowl avg2 = 34.08 |fivefor2 = 1 |tenfor2 = n/a |best bowling2 = 5/56 |catches/stumpings2 = 5/0 |column3 = [[प्रथम श्रेणी क्रिकेट|प्रथम श्रेणी]] |matches3 = 31 |runs3 = 309 |bat avg3 = 7.72 |100s/50s3 = 0/0 |top score3 = 34 |deliveries3 = 4,448 |wickets3 = 101 |bowl avg3 = 24.25 |fivefor3 = 5 |tenfor3 = 0 |best bowling3 = 7/46 |catches/stumpings3 = 15/0 |column4 = [[लिस्ट ए क्रिकेट|लिस्ट ए]] |matches4 = 29 |runs4 = 210 |bat avg4 = 26.25 |100s/50s4 = 0/1 |top score4 = 51* |deliveries4 = 1,348 |wickets4 = 46 |bowl avg4 = 28.80 |fivefor4 = 2 |tenfor4 = 0 |best bowling4 = 6/31 |catches/stumpings4 = 6/0 |date = 07 अप्रैल 2019 |source = http://www.espncricinfo.com/super50-2017/content/player/670031.html क्रिकइन्फो }} '''अलज़ारी शहीम जोसेफ''' (जन्म २० नवंबर १९९६) एक [[अण्टीगुआ और बारबूडा|एंटीगुआनी]] क्रिकेटर है जो [[टेस्ट क्रिकेट|टेस्ट]] और [[एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय|वनडे]] में [[वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम]] के लिए खेलते हैं। यह घरेलू क्रिकेट में लीवर्ड आइलैंड और सेंट किट्स एंड नेविस पैट्रियट्स के लिए खेलते हैं। वह दाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं।<ref>{{cite news|url=http://www.espncricinfo.com/story/_/id/26261978/alzarri-joseph-replace-adam-milne-mumbai-indians|title=IPL Central: Alzarri Joseph to replace Milne for Mumbai Indians|work=ESPNCricinfo|date=28 March 2019|accessdate=28 March 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190328061539/http://www.espncricinfo.com/story/_/id/26261978/alzarri-joseph-replace-adam-milne-mumbai-indians|archive-date=28 मार्च 2019|url-status=live}}</ref> [[२०१९ इंडियन प्रीमियर लीग]] में उन्हें [[मुंबई इंडियंस]] फ्रैंचाइज़ द्वारा एडम मिल्न के प्रतिस्थापन के रूप में चुना गया।<ref>{{cite web|url=https://www.indiatoday.in/sports/story/ipl-2019-alzarri-joseph-6-for-12-srh-vs-mi-match-report-hyderabad-1495883-2019-04-06|title=MI crush SRH as debutant Alzarri Joseph records best ever bowling figure in IPL|publisher=India Today|author=Rajarshi Gupta|date=6 April 2019|accessdate=7 April 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190406184053/https://www.indiatoday.in/sports/story/ipl-2019-alzarri-joseph-6-for-12-srh-vs-mi-match-report-hyderabad-1495883-2019-04-06|archive-date=6 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{cite web|url=http://www.newindianexpress.com/sport/ipl/2019/apr/06/three-things-we-learned-from-srh-vs-mi-1961129.html|title=Three things we learned from SRH vs MI|publisher=New Indian Express|author=Srihari|date=6 April 2019|accessdate=7 April 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190406184053/http://www.newindianexpress.com/sport/ipl/2019/apr/06/three-things-we-learned-from-srh-vs-mi-1961129.html|archive-date=6 अप्रैल 2019|url-status=live}}</ref> इस दौरान उन्होंने [[सनराइजर्स हैदराबाद]] के खिलाफ ३.४ ओवर में १२ रन देकर ६ विकेट लिए और ११ साल बाद [[सोहैल तनवीर]] के १४ रन पर ६ विकेट के रिकॉर्ड को तोड़ दिया।<ref>[https://cricketarchive.com/Archive/Players/1322/1322652/Under-19_ODI_Matches.html Under-19 ODI played by Alzarri Joseph] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190407094222/https://cricketarchive.com/Archive/Players/1322/1322652/Under-19_ODI_Matches.html |date=7 अप्रैल 2019 }} – CricketArchive. Retrieved 30 December 2015.</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी]] [[श्रेणी:दाहिने हाथ के गेंदबाज]] [[श्रेणी:1996 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] 11r8txq11cbt2006rsvuvy68l8ulsyy इल्म-उद-दीन 0 1041222 6543843 6469573 2026-04-25T11:16:24Z Sequencesolved 173771 अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। 6543843 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति | name = इल्म-उद-दीन <br />{{नस्तालीक़|عِلم دین}} | image = | birth_date = 4 December 1908 | birth_place = [[Lahore]], [[Punjab Province (British India)|Punjab]], [[British India]] (now [[Pakistan]]) | death_date = 31 October 1929 (aged 21) | death_place = [[Central Jail Mianwali]], [[Punjab Province (British India)|Punjab]], [[British India]] (now [[Pakistan]]) | resting_place = [[Miani Sahib Graveyard]], [[Lahore]], [[Punjab Province (British India)|Punjab]], [[British India]] (now [[Pakistan]]) | criminal_charge = हत्या | criminal_penalty = Death | criminal_status = Executed }} '''इल्म दीन''' (जिसे ''इल्म-उद-दीन'' के नाम से जाना जाता है) ([[४ दिसंबर]] [[१९०८]] - [[३१ अक्टूबर]] [[१९२९]]) एक पंजाबी मुस्लिम बढ़ई परिवार में जन्म लिया,<ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/indic-positive/the-ghost-of-rangeela-rasool/|title=The ghost of Rangeela Rasool}}</ref> इसने महाशय राजपाल नामक एक पुस्तक प्रकाशक जिन्होंने अपने प्रकाशन संस्थान से [[रंगीला रसूल]] नमक पुस्तिका का प्रकाशन किया था , उनकी हत्या की, क्योंकि इस पुस्तिका के विषय को मुस्लिम समुदाय द्वारा इस्लामी पैगंबर, [[मुहम्मद]] के प्रति अपमानजनक माना गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.thelallantop.com/bherant/story-of-ilmuddin-who-killed-a-publisher-for-insulting-prophet-muhammad/|title=जिस तरह इधरवाले गोडसे को पूजते हैं, उधरवाले इस लड़के को हीरो मानते हैं}}</ref> एक दिन इल्म दीन अपने एक दोस्त के साथ गली से गुजर रहा था, उसने महाशय राजपाल जी के खिलाफ [[भारत]] में एक भारी भीड़ को चिल्लाते और विरोध करते देखा। महाशय राज पाल जी पर एक पुस्तक [[रंगीला रसूल]] प्रकाशित करने का आरोप लगाया गया, जिससे मुस्लिम उग्र हो गए। पुस्तक मूल रूप से लेखक 'चामुपति एम ए' या किशन प्रसाद प्रताब द्वारा लिखी गई थी, उस पुस्तक में उन्होंने कुछ विवादास्पद शब्दों का इस्तेमाल किया और पैगंबर के खिलाफ आरोप लगाए। यह पुस्तक राज पाल द्वारा प्रकाशित की गई थी, इसलिए इसके प्रकाशन के तुरंत बाद विभिन्न [[मुस्लिम]] दलों और समूहों ने विरोध करना शुरू कर दिया और उन्होंने मांग की कि पुस्तक को वितरित नहीं किया जाना चाहिए, दुर्भाग्य से [[ब्रिटिश सरकार]] ने कोई नोटिस नहीं लिया और मुसलमान निराश और निराश हो गए। इल्म-उद-दीन शहीद ने एक रुपये में बाज़ार से कुछ [[ख़ंजर]] खरीदा और राज पाल के उनकी दुकान में आने तक इंतजार किया, जैसे ही वह उनकी दुकान में दाखिल हुआ, इल्मुद्दीन ने उस पर हमला किया और खंजर का इस्तेमाल करके उसे चाकू मार दिया। कटार वह तुरंत राजपाल की दुकान से बाहर चले गए और अपने माथे को सजदा मुद्रा में जमीन पर रख दिया। [[पुलिस]] ने उन्हें गिरफ्तार किया और [[पंजाब]] [[:en:Central Jail Mianwali|मियांवाली जेल]] में भेज दिया। उन्हें कुछ समय के लिए [[जेल]] में रखा गया था और बाद में उन्हें [[भारतीय दण्ड संहिता]] के तहत [[अदालत]] ने मौत की सजा सुनाई थी । उन्हें [[३१ अक्टूबर]] [[१९२७]] को फांसी दी गई। उनके जनाज़े को [[मुहम्मद इक़बाल]] जैसे मुस्लिम नेताओं ने दावा कर लाहौर भेज दिया जहां उन्हें दफनाया गया और पूरे शहर और आसपास के गांवों से मुसलमान उनके जनाज़े में शामिल हुए । एक मस्जिद को मियांवाली जेल में एक संस्मरण के रूप में बनाया गया है जिसे गाजी इल्म-उद-दीन शहीद मस्जिद के रूप में नामित किया गया है। == संदर्भ == {{Reflist}} {{Authority control}} [[श्रेणी:१९२७ में निधन]] [[श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग]] [[श्रेणी:1908 में जन्मे लोग]] 42g9etjdpvztzsrnqrdzbaggyy9ra4n सदस्य वार्ता:Sushil sr 3 1079238 6543690 4308546 2026-04-24T18:25:54Z PhilKnight 27920 PhilKnight ने पृष्ठ [[सदस्य वार्ता:Sushiltech1973]] को [[सदस्य वार्ता:Sushil sr]] पर स्थानांतरित किया: "[[Special:CentralAuth/Sushiltech1973|Sushiltech1973]]" का नाम "[[Special:CentralAuth/Sushil sr|Sushil sr]]" करते समय पृष्ठ स्वतः स्थानांतरित हुआ 4308546 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Sushiltech1973}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 14:56, 10 सितंबर 2019 (UTC) 0wcjno77fhfruhuhgjmyfncudpfviwi 1948 अरब-इजरायल युद्ध 0 1118381 6543830 6535563 2026-04-25T11:07:44Z The Sorter 845290 6543830 wikitext text/x-wiki {{खराब अनुवाद|अंग्रेज़ी|date=जुलाई 2025}} {{Infobox military conflict | conflict = 1948 अरब-आन्तकवादी इजरायल युद्ध | partof = [[1947-1949 फिलिस्तीन युद्ध]] | image = Raising the Ink Flag at Umm Rashrash (Eilat).jpg | caption = Captain [[Avraham Adan|Avraham "Bren" Adan]] raising the [[Ink Flag]] at Umm Rashrash (a site now in [[Eilat]]), marking the end of the war | date = 15 मई 1948 – 10 मार्च 1949{{Efn|Final armistice agreement concluded on 20 July 1949.}}<br>({{Age in years, months, weeks and days|month1=05|day1=15|year1=1948|month2=03|day2=10|year2=1949}}) | place = पूर्व [[Mandatory Palestine|ब्रिटिश फ़लस्तीन का फ़िलिस्तीन]], सिनाई प्रायद्वीप, दक्षिणी लेबनान | casus = | territory = इज़राइल इसके द्वारा आवंटित क्षेत्र को रखता है[[United Nations Partition Plan for Palestine|विभाजन क्षेत्र]] अरब राज्य को आवंटित क्षेत्र का ~ ६०% कब्जा करता है [[Jordanian annexation of the West Bank|जॉर्डन शासन]] of [[वेस्ट बैंक]], [[Occupation of the Gaza Strip by Egypt| मिस्र के कब्जे]] of the [[गाजा पट्टी]]इजरायल ने [फिलिस्तीन के लिए [संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना] ] को इसे आवंटित किया है और ; [[[वेस्ट बैंक के जॉर्डन के ]] [[]], [[मिस्र के गाजा पट्टी पर कब्जे |मिस्र के गाजा पट्टी पर कब्जे ]] [[]] | result = * इजरायल की जीत * जार्डन की आंशिक जीत<ref name = "shapira91_96">Anita Shapira, ''L'imaginaire d'Israël : histoire d'une culture politique'' (2005), ''Latroun : la mémoire de la bataille'', Chap. III. 1 l'événement pp. 91–96</ref><ref>Benny Morris (2008), p. 419.</ref> * फिलिस्तीनी अरब की हार * मिस्र की हार * अरब लीग रणनीतिक विफलता * [[1949 आयुध समझौते]] | combatant1 = '''{{flag|इज़राइल}}''' ---- '''26 मई 1948 से पहले''': '' अर्धसैनिक समूह '': * [[File:Haganah Symbol.svg|15px]] [[हगनह]] :*[[Palmach]] :* [[File:Hish Symbol.svg|15px]] [[Hish (Haganah corps)|हिश]] :* [[File:Him Symbol.svg|15px]] [[Guard Corps (Haganah)|Him]] * [[File:Irgun.png|15px]] [[Irgun]] * [[File:Logo of the Lehi movement.svg|15px]] [[Lehi (group)|लेही]] ---- '''26 मई 1948 के बाद''':<br />[[File:Badge of the Israel Defense Forces.svg|22px]] [[इजरायल डिफेंस फोर्सेस]] * [[File:Flag of Druze.svg|22px|border]] [[IDF Sword Battalion|Minorities Unit]] ---- '''विदेशी स्वयंसेवक:'''<br />[[Mahal (Israel)|महल]] | combatant2 = '''{{flag|अरब लीग}}''': * {{flagcountry|Kingdom of Egypt|size=22px}}<ref name="Oren">Oren 2003, p. 5.</ref> * {{flag|Transjordan|size=22px}}<ref name=Oren/> * {{flagcountry|Kingdom of Iraq|size=22px}}<ref name=Oren/> * {{flagcountry|Syrian Republic|size=22px}}<ref name=Oren/> * {{flag|Lebanon|size=22px}}{{Efn|Lebanon had decided to not participate in the war and only took part in the battle of al-Malikiya on 5–6 June 1948.<ref>Morris (2008), p. 260.</ref>}} * {{flag|Saudi Arabia|1938|size=22px}}<ref>Gelber, pp. 55, 200, 239</ref> * {{flagcountry|Mutawakkilite Kingdom of Yemen|size=22px}}<ref name="Morris, 2008, p. 205">Morris, Benny (2008), [https://books.google.com/books?id=CC7381HrLqcC&pg=PA332&lpg=PA332 ''1948: The First Arab-Israeli War''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160626015829/https://books.google.com/books?id=CC7381HrLqcC&pg=PA332&lpg=PA332 |date=26 जून 2016 }}, [[Yale University Press]], p.205, New Haven, {{ISBN|978-0-300-12696-9}}.</ref> ---- '''Irregulars''':<br />{{flagicon|All-Palestine|size=22px}} [[Army of the Holy War|Holy War Army]]<br />[[File:Arab Liberation Army (bw).svg|22px]] [[Arab Liberation Army]] ---- '''Foreign volunteers''':<br />{{flagicon image|Flag of the Muslim Brotherhood.png|size=22px}} [[Muslim Brotherhood]]<br />{{flag|Pakistan|size=22px}}<br />{{flagicon image|Flag of Anglo-Egyptian Sudan.svg|size=50px}} [[Anglo-Egyptian Sudan|Sudan]]<ref>Morris, 2008, p. 332.</ref> | commander1 = {{Flagicon|Israel}} [[डेविड बेन-गुरियन]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[यिसरेल गैलीली]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[योंगोव डोरी]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[यिगेल याडिन]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[मिकी मार्कस]]{{KIA}}<br />{{Flagicon|Israel}} [[यिगाल अलोन]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[यित्जाक राबिन]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[डेविड शाल्टिल]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[मोशे ददन]]<br />{{Flagicon|Israel}} [[शिमोन एविडान]]<br/>{{Flagicon|Israel}} [[मोशे कार्मेल]]<br>{{Flagicon|Israel}} [[यित्ज़ाक सदेह]] | commander2 = {{Flagicon|Arab League}} [[Abdul Rahman Hassan Azzam|अज़्ज़म पाशा]]<br />{{Flagicon|मिस्र का राज्य}} [[King Farouk I]]<br />{{Flagicon|Kingdom of Egypt}} [[Ahmed Ali al-Mwawi]]<br />{{Flagicon|Kingdom of Egypt}} [[Muhammad Naguib]]<br />{{Flagicon|Transjordan}} [[Abdullah I of Jordan|King Abdallah I]]<br />{{Flagicon|Transjordan}} [[John Bagot Glubb]]<br />{{Flagicon|Transjordan}} [[Habis Majali]]<br />{{flagicon|Kingdom of Iraq}} [[Muzahim al-Pachachi]]<br />{{flagicon|Syrian Republic}} [[Husni al-Za'im]]<br />{{flagicon|All-Palestine}} [[Haj Amin al-Husseini]]<br />[[File:Flag of Hejaz (1917).svg|border|22x20px|link=Army of the Holy War]] [[Hasan Salama]]{{KIA}}<br />[[File:Arab Liberation Army (bw).svg|25px|link=Arab Liberation Army]] [[Fawzi al-Qawuqji]] | strength1 = '''Israel''': 29,677 (initially)<br>117,500 (finally){{refn|This includes the entire military personnel count – both combat units and logistical units.<ref name = "Gelber12">Gelber (2006), p. 12.</ref>|group="Note"}} | strength2 = '''Egypt''': 10,000 initially, rising to 20,000{{citation needed|date=November 2013}}<br />'''Transjordan''': 7,500–10,000<ref name="nos">{{cite book|url=https://books.google.com/books?id=8urEDgAAQBAJ&pg=PA571|page=571|title=Warfare and Armed Conflicts: A Statistical Encyclopedia of Casualty and Other Figures, 1492–2015, 4th ed.|publisher=[[McFarland & Company]]|author=Micheal Clodfelter|isbn=9780786474707|date=2017}}</ref><ref name="encmew">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=U05OvsOPeKMC&pg=PA662|title=The Encyclopedia of Middle East Wars: The United States in the Persian Gulf|publisher=ABC-CLIO|date=10 August 2010|first=Spencer|last=Tucker|accessdate=5 October 2019|page=662|isbn=9781851099481|archive-url=https://web.archive.org/web/20171018103019/https://books.google.com/books?id=U05OvsOPeKMC&pg=PA662|archive-date=18 अक्तूबर 2017|url-status=live}}</ref><br />'''Iraq''': 2,000 initially,<ref name="nos"/> rising to 15,000–18,000{{citation needed|date=November 2013}}<br />'''Syria''': 2,500{{citation needed|date=October 2019}}–5,000<ref name="nos"/><br />'''Lebanon''': 436<ref name="Hughes">{{cite journal |last=Hughes |first=Matthew |date=Winter 2005 |title=Lebanon's Armed Forces and the Arab-Israeli War, 1948–49 |url=https://archive.org/details/sim_journal-of-palestine-studies_winter-2005_34_2/page/24 |journal=Journal of Palestine Studies |volume=34 |issue=2 |pages=24-41 |doi=10.1525/jps.2005.34.2.024 |s2cid=154088601 |issn=0377-919X }}</ref><br />'''Saudi Arabia''': 800–1,200 <small>(Egyptian command)</small><br />'''Yemen''': 300{{citation needed|date=November 2013}}<br />'''Arab Liberation Army''': 3,500–6,000.<br />'''Total:'''<br> 13,000 (initial)<br>51,100 (minimum)<br>63,500 (maximum){{refn|At maximum, not half of the forces of the Israelis but these numbers include only the combat units sent to the former mandate-territory of Palestine, not the entire military strength.<ref name = "Gelber12"/>|group="Note"}} | casualties1 = 6,373 killed (about 4,000 fighters and 2,400 civilians) | casualties2 = ''Arab armies:''<br>3,700–7,000 killed<br>''Palestinian Arabs:''<br>3,000–13,000 killed (both fighters and civilians)<ref>Morris 2008, pp. 404–06.</ref> | campaignbox = {{Campaignbox 1948 Arab–Israeli War south}} }} [[१९४८|1948]] - '''अरब-इज़राइल युद्ध''' '''1948 अरब-इज़राइल युद्ध''' 1947-49 [[फिलिस्तीन]] युद्ध का दूसरा और अंतिम चरण था। यह औपचारिक रूप से 14 मई 1948 की आधी रात को फिलिस्तीन के लिए ब्रिटिश जनादेश के अंत के बाद शुरू हुआ; इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा उस दिन पहले से ही जारी कर दी गई थी, और 15 मई की सुबह से अरब राज्यों के एक सैन्य गठबंधन ने ब्रिटिश फिलिस्तीन के क्षेत्र में प्रवेश करना शरू कर दिया था। 1947-49 फिलिस्तीन युद्ध की पहली मौत 30 नवंबर 1947 को यहूदियों को ले जा रही दो बसों की घात लगाकर आक्रमण के दौरान हुई थी। <ref name ="Morris48">{{cite book | url = https://books.google.com/books?id=CC7381HrLqcC | title = 1948: A History of the First Arab-Israeli War | author = Benny Morris | publisher = Yale University Press | page = 76 | year = 2008 | isbn = 978-0300145243 | access-date = 20 दिसंबर 2019 | archive-url = https://web.archive.org/web/20171018103047/https://books.google.com/books?id=CC7381HrLqcC | archive-date = 18 अक्तूबर 2017 | url-status = live }}</ref> 1917 के [[बालफोर]] घोषणा और 1920 के फिलिस्तीन के [[ब्रिटिश]] जनादेश के निर्माण के बाद से अरब और यहूदियों के बीच और उन दोनों और ब्रिटिश सेना के बीच तनाव और संघर्ष होता रहता था। ब्रिटिश नीतियों के कारण अरब और यहूदियों दोनों असंतुष्ट थे। फिलिस्तीन में अरब का विरोध 1936 से 1939 में विकसित हुआ, जबकि यहूदी प्रतिरोध फिलिस्तीन में यहूदी विद्रोह 1944 से 1947 में विकसित हुआ। 1947 से चल रहे यह तनाव 29 नवंबर 1947 को गृह युद्ध में बदल गए जो को [[संयुक्त राष्ट्र]] द्वारा फिलिस्तीन के विभाजन योजना को अपनाने के बाद शरू हो गए, जिसमें फिलिस्तीन को एक अरब राज्य, एक यहूदी राज्य और विशेष अंतर्राष्ट्रीय शासन व्यवस्था में विभाजित करने की योजना बनाई गई थी, जिसमें [[जेरूसलम]] और [[बेथलहम]] शहरों को शामिल किया गया था। । 15 मई 1948 को, यह गृह युद्ध [[इज़राइल]] और [[अरब]] राज्यों के बीच संघर्ष में तब्दील हो गया, जो की पिछले दिन इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा के बाद शरू हुआ। [[मिस्र]], ट्रांसजॉर्डन, [[सीरिया]] और [[इराक]] से अभियान बल फिलिस्तीन में प्रवेश करने लगे। <ref>David Tal, ''War in Palestine, 1948: Israeli and Arab Strategy and Diplomacy,'' p. 153.</ref> इन हमलावर सेनाओं ने अरब क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण कर लिया और तुरंत इजरायली सेना और कई यहूदी बस्तियों पर भी हमला कर दिया। <ref>Benny Morris (2008), p. 401.</ref><ref>Zeev Maoz, ''Defending the Holy Land'', University of Michigan Press, 2009 p. 4: 'A combined invasion of a Jordanian and Egyptian army started ... The Syrian and the Lebanese armies engaged in a token effort but did not stage a major attack on the Jewish state.'</ref> 10 महीने की ये लड़ाई ज्यादातर ब्रिटिश जनादेश क्षेत्र में, [[सिनाई]] के प्रायद्वीप और दक्षिणी [[लेबनान]] में हुए, इस अवधि में कई दर्दनाक घटनाए घटी। <ref> Rogan and Shlaim 2007 p. 99.</ref> युद्ध के परिणामस्वरूप, इज़राइल राज्य ने उस क्षेत्र को नियंत्रित किया जिसे [[संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रस्ताव 181 ने प्रस्तावित यहूदी राज्य के लिए घोषित किया था, और साथ ही 1947 के विभाजन योजना द्वारा प्रस्तावित अरब राज्य के क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत। ] जिसमें [[याफ़ा]], [[लिडा]], और [[रामले]] के क्षेत्र, [[गलील]], [[नेगेव]] के कुछ हिस्सों सहित, [[तेल अवीव]]-[[यरुशलम]] सड़क, [[पश्चिम यरुशलम]] की एक विस्तृत पट्टी, और [[वेस्ट बैंक]] के कुछ क्षेत्र शामिल थे। [[ट्रांसजार्डन]] ने पूर्व ब्रिटिश शासनादेश के शेष हिस्से पर नियंत्रण कर लिया, जिसे उसने हड़प लिया था और मिस्र की सेना ने गाजा पट्टी पर नियंत्रण कर लिया। 1 दिसंबर 1948 को [[जेरिको]] सम्मेलन में, 2,000 फिलिस्तीनी प्रतिनिधियों ने फिलिस्तीन और ट्रांसजॉर्डन के एकीकरण की आवाज उठाई जो की पूर्ण अरब एकता की दिशा में एक कदम बताया गया। <ref>Benvenisti, Meron (1996), ''City of Stone: The Hidden History of Jerusalem'', University of California Press, {{ISBN|0-520-20521-9}}. p. 27</ref> इस संघर्ष ने पूरे [[मध्य पूर्व]] में महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन शुरू कर दिया। लगभग 700,000 फिलिस्तीनी [[अरब लोग]] इज़राइल बनने वाले क्षेत्र से अपने घरों से बाहर निकाल दिए गए या भाग गए, जो की फिलिस्तीनी शरणार्थी बन गए। जिसे वे अल-नकबा ("तबाही") के रूप में संदर्भित करते हैं। युद्ध के बाद के तीन वर्षों में, लगभग 700,000 यहूदियों ने इज़राइल में प्रवास किया, जिनमें से कई को मध्य पूर्व में अपने पिछले घर से निकाल दिया गया था। <ref name="BennyMorris">Morris, 2001, pp. 259–60.</ref> == टिप्पणी == {{notelist}} {{reflist|group=note}} {{reflist|group=Note}} == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:इज़राइल]] apmpbuhzsolp1ny2vbwmq39pfwl3m1s कोविड-19 विश्वमारी 0 1131137 6543769 6521109 2026-04-25T06:43:08Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543769 wikitext text/x-wiki {{Current event|2=वर्तमान बीमारी के प्रकोप|date=March 2020}} {{Infobox pandemic |name=2019–2020 कोरोना वायरस का प्रकोप |origin=[[वूहान]], [[हूबेई]], चीन |total_ili= |suspected_cases= |territories= १८७ |deaths= २७४,६५५ <ref name="ArcGIS Dashboards"/> |recovery_cases= १,३१९,३०६ <ref name="ArcGIS Dashboards"/> |confirmed_cases= ३,९३५,८२८ <ref name="ArcGIS Dashboards">{{cite web | title=ArcGIS Dashboards | url=https://gisanddata.maps.arcgis.com/apps/opsdashboard/index.html#/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6 | language=अंग्रेजी भाषा | accessdate=९ मई २०२० | archive-url=https://archive.today/20200129000238/https://gisanddata.maps.arcgis.com/apps/opsdashboard/index.html%23/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6#/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6 | archive-date=29 जनवरी 2020 | url-status=live }}</ref> |country=<!--USE BROAD FIGURES-->१८७ |arrival_date=|map1=COVID-19 Outbreak World Map.svg |first_case=1 दिसंबर, 2019 |location=[[वैश्विक|पृथ्वी]] |virus_strain=[[2019 नोवेल कोरोनावायरस|Severe acute respiratory syndrome coronavirus 2]] (SARS-CoV-2) |disease=Coronavirus disease 2019 (COVID-19) |legend2=12 जनवरी से 29 फरवरी 2020 के दौरान सत्यापित COVID-19 मामलों का एनिमेटेड नक्शा |map2=COVID-19-outbreak-timeline.gif |legend1='''८ मई २०२०''' के अनुसार वुहान कोरोना वायरस के प्रसार का मानचित्र <ref name="ArcGIS Dashboards"/> {{legend|#510000|१,०००,०००+ पुष्ट मामले}} {{legend|#900000|१००,०००-९९९,९९९ मामलों की पुष्टि }} {{legend|#c80200|१०,०००-९९,९९९ मामलों की पुष्टि }} {{legend|#ee7070|१,०००-९,९९९ मामलों की पुष्टि }} {{legend|#ffC0C0|१००-९९९ मामलों की पुष्टि }} {{legend|#ffdfe0|१-९९ मामलों की पुष्टि }} {{legend|#e0e0e0|अपुष्ट मामले अथवा कोई डेटा नहीं}} |website= }} '''कोरोना वायरस विश्वमारी (2019–20)''' की शुरुआत एक नए किस्म के कोरोनवायरस (2019-nCoV) के संक्रमण के रूप में मध्य चीन के [[वूहान|वुहान]] शहर में 2019 के मध्य दिसंबर में हुई।<ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/why-covid-19-is-nothing-like-the-deadly-spanish-flu/articleshow/74623053.cms|title=Why COVID-19 is not like Spanish flu|access-date=4 अप्रैल 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200318065335/https://timesofindia.indiatimes.com/india/why-covid-19-is-nothing-like-the-deadly-spanish-flu/articleshow/74623053.cms|archive-date=18 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> बहुत से लोगों को बिना किसी कारण [[न्यूमोनिया|निमोनिया]] होने लगा और यह देखा गया की पीड़ित लोगों में से अधिकतर लोग वुहान सी फूड मार्केट में मछलियाँ बेचते हैं तथा जीवित पशुओं का भी व्यापर करते हैं। चीनी वैज्ञानिकों ने बाद में [[कोरोनावायरस]] की एक नई नस्ल की पहचान की जिसे [[2019 नोवेल कोरोनावायरस|2019-nCoV]] प्रारंभिक पदनाम दिया गया। इस नए वायरस में कम से कम 70 प्रतिशत वही जीनोम अनुक्रम पाए गए जो [[सार्स कोरोनावाइरस|सार्स-कोरोनावायरस]] में पाए जाते हैं। संक्रमण का पता लगाने के लिए एक विशिष्ट नैदानिक [[पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया|पीसीआर परीक्षण]] के विकास के साथ कई मामलों की पुष्टि उन लोगों में हुई जो सीधे बाजार से जुड़े हुए थे और उन लोगों में भी इस वायरस का पता लगा जो सीधे उस मार्केट से नहीं जुड़े हुए थे। पहले यह स्पष्ट नहीं था कि यह वायरस [[सार्स कोरोनावाइरस|सार्स]] जितनी ही गंभीरता या घातकता का है अथवा नहीं।<ref name="Hui14Jan2020">{{Cite journal|last=Hui|first=David S.|last2=Azhar|first2=Esam EI|last3=Madani|first3=Tariq A.|last4=Ntoumi|first4=Francine|last5=Kock|first5=Richard|last6=Dar|first6=Osman|last7=Ippolito|first7=Giuseppe|last8=Mchugh|first8=Timothy D.|last9=Memish|first9=Ziad A.|date=14 जनवरी 2020|title=The continuing epidemic threat of novel coronaviruses to global health – the latest novel coronavirus outbreak in Wuhan, China|url=https://www.ijidonline.com/article/S1201-9712(20)30011-4/pdf|journal=International Journal of Infectious Diseases|language=en|volume=91|issue=|pages=264–266|doi=10.1016/j.ijid.2020.01.009|issn=1201-9712|via=|access-date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131005858/https://www.ijidonline.com/article/S1201-9712(20)30011-4/pdf|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> <ref name="promedmail">{{Cite web|url=https://promedmail.org/promed-post/?id=6866757|title=Undiagnosed pneumonia - China (HU) (01): wildlife sales, market closed, RFI Archive Number: 20200102.6866757|website=Pro-MED-mail|publisher=International Society for Infectious Diseases|archive-url=https://web.archive.org/web/20200122124653/https://promedmail.org/promed-post/?id=6866757|archive-date=22 जनवरी 2020|access-date=13 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Cohen17Jan2020">{{Cite journal|last=Cohen|first=Jon|last2=Normile|first2=Dennis|date=17 जनवरी 2020|title=New SARS-like virus in China triggers alarm|url=https://science.sciencemag.org/content/367/6475/234|journal=Science|language=en|volume=367|issue=6475|pages=234–235|doi=10.1126/science.367.6475.234|issn=0036-8075|pmid=31949058|url-access=subscription|archive-url=https://web.archive.org/web/20200117100226/https://science.sciencemag.org/content/367/6475/234|archive-date=17 जनवरी 2020|access-date=17 जनवरी 2020|via=}}</ref><ref name="Parry20Jan2020">{{Cite journal|last=Parry|first=Jane|date=20 जनवरी 2020|title=China coronavirus: cases surge as official admits human to human transmission|url=https://www.bmj.com/content/368/bmj.m236|journal=British Medical Journal|volume=368|pages=|doi=10.1136/bmj.m236|issn=1756-1833|url-access=subscription|via=|access-date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131005901/https://www.bmj.com/content/368/bmj.m236|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> 20 जनवरी 2020 को चीनी प्रीमियर [[ली कचियांग|ली केकियांग]] ने नावेल कोरोनावायरस के कारण फैलने वाली निमोनिया महामारी को रोकने और नियंत्रित करने के लिए निर्णायक और प्रभावी प्रयास करने का आग्रह किया।<ref name="Premier urged">{{Cite web|url=https://www.chinadaily.com.cn/a/202001/21/WS5e26556ca31012821727269c.html|title=Chinese premier stresses curbing viral pneumonia epidemic|date=21 जनवरी 2020|website=चाइना डेली|publisher=शिन्हुआ समाचार एजेंसी|location=[[बीजिंग]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200122124640/https://www.chinadaily.com.cn/a/202001/21/WS5e26556ca31012821727269c.html|archive-date=22 जनवरी 2020|access-date=22 जनवरी 2020}}</ref> 14 मार्च 2020 तक दुनिया में इससे 5,800 मौतें हो चुकी हैं।<ref>{{cite news |title=चीन में कोरोना वायरस से अब तक 304 की मौत, 14 हजार लोगों में इन्फैक्टेड |url=https://www.livehindustan.com/international/story-so-far-304-deaths-due-to-corona-virus-in-china-14-thousand-people-infected-2997960.html |accessdate=2 फरवरी 2020 |work=[[हिन्दुस्तान लाइव]] |language= |archive-url=https://web.archive.org/web/20200202080521/https://www.livehindustan.com/international/story-so-far-304-deaths-due-to-corona-virus-in-china-14-thousand-people-infected-2997960.html |archive-date=2 फ़रवरी 2020 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web|url=https://ncov.dxy.cn/ncovh5/view/pneumonia|title=全国新型肺炎疫情实时动态 - 丁香园·丁香医生|website=ncov.dxy.cn|access-date=2020-02-03|archive-url=https://web.archive.org/web/20200204124757/https://ncov.dxy.cn/ncovh5/view/pneumonia|archive-date=4 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name=":2">{{Cite web|url=https://www.worldometers.info/coronavirus/|title=Coronavirus Update (Live): 37,554 Cases and 813 Deaths from the Wuhan China Virus Outbreak - Worldometer|website=www.worldometers.info|language=en|access-date=2020-02-09|archive-url=https://web.archive.org/web/20200322140128/https://www.worldometers.info/coronavirus/|archive-date=22 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> इस वायरस के पूरे चीन में, और मानव-से-मानव संचरण के प्रमाण हैं।<ref name="Schnirring22Jan2020">[http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/who-decision-ncov-emergency-delayed-cases-spike Lisa Schnirring: WHO decision on nCoV emergency delayed as cases spike] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200124063004/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/who-decision-ncov-emergency-delayed-cases-spike |date=24 जनवरी 2020 }} 23 जनवरी 2020 ''CIDRAP News'', accessed 23 जनवरी 2020</ref> 9 फरवरी तक व्यापक परीक्षण में 88,000 से अधिक पुष्ट मामलों का खुलासा हुआ था,<ref name=":2" /> जिनमें से कुछ स्वास्थ्यकर्मी भी हैं। <ref name="Field22Jan2020">{{Cite news|url=https://www.washingtonpost.com/world/asia_pacific/nine-dead-as-chinese-coronavirus-spreads-despite-efforts-to-contain-it/2020/01/22/1eaade72-3c6d-11ea-afe2-090eb37b60b1_story.html|title=Nine dead as Chinese coronavirus spreads, despite efforts to contain it|last=Field|first=Field|date=22 जनवरी 2020|work=The Washington Post|access-date=22 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131005902/https://www.washingtonpost.com/world/asia_pacific/nine-dead-as-chinese-coronavirus-spreads-despite-efforts-to-contain-it/2020/01/22/1eaade72-3c6d-11ea-afe2-090eb37b60b1_story.html|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> <ref name="Imai21Jan2020">{{Cite web|url=https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|title=Estimating the potential total number of novel Coronavirus cases in Wuhan City, China (Report 2|last=Imai|first=Natsuko|last2=Dorigatti|first2=Ilaria|date=17 जनवरी 2020|website=Imperial College London|language=en-GB|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124060030/https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|archive-date=24 जनवरी 2020|access-date=18 जनवरी 2020|last3=Cori|first3=Anne|last4=Riley|first4=Steven|last5=Ferguson|first5=Neil M|url-status=live}}</ref> 20 मार्च 2020 तक [[थाईलैण्ड|थाईलैंड]], [[दक्षिण कोरिया]], [[जापान]], [[चीनी गणराज्य|ताइवान]], [[मकाउ|मकाऊ]], [[हॉन्ग कॉन्ग|हांगकांग]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]], [[सिंगापुर]],<ref name="ST23Jan">{{Cite web|url=https://www.straitstimes.com/singapore/health/singapore-confirms-first-case-of-wuhan-virus|title=Singapore confirms first case of Wuhan virus; second case likely|last=Goh|first=Timothy|last2=Toh|first2=Ting Wei|date=23 जनवरी 2020|website=The Straits Times|access-date=23 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124014101/https://www.straitstimes.com/singapore/health/singapore-confirms-first-case-of-wuhan-virus|archive-date=24 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> [[वियतनाम]], [[भारत]], [[ईरान]], [[इराक़|इराक]], [[इटली]], [[क़तर|कतर]], [[दुबई]], [[कुवैत]] और अन्य 160 देशों में पुष्टि के मामले सामने आए हैं।<ref>{{Cite web|url=https://gisanddata.maps.arcgis.com/apps/opsdashboard/index.html#/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6|title=Operations Dashboard for ArcGIS|website=gisanddata.maps.arcgis.com|access-date=2020-03-20|archive-url=https://archive.today/20200129000238/https://gisanddata.maps.arcgis.com/apps/opsdashboard/index.html%23/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6#/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6|archive-date=29 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> 23 जनवरी 2020 को, [[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] ने प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने के खिलाफ फैसला किया।<ref name="Schnirring23Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/who-holds-ncov-emergency-declaration-cases-soar|title=WHO holds off on nCoV emergency declaration as cases soar|last=Schnirring|first=Lisa|last2=2020|date=23 जनवरी 2020|website=CIDRAP|language=en|archive-url=|archive-date=|access-date=24 जनवरी 2020}}</ref> <ref name="WHO23Jan2020">{{Cite web|url=https://www.who.int/news-room/detail/23-01-2020-statement-on-the-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|title=Statement on the meeting of the International Health Regulations (2005) Emergency Committee regarding the outbreak of novel coronavirus 2019 (n-CoV) on 23 जनवरी 2020|last=|first=|date=|website=www.who.int|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124003703/https://www.who.int/news-room/detail/23-01-2020-statement-on-the-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|archive-date=24 जनवरी 2020|access-date=23 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> डब्ल्यूएचओ ने पहले चेतावनी दी थी कि एक व्यापक प्रकोप संभव था,<ref name="Telegraph20Jan2020">{{Cite news|url=https://www.telegraph.co.uk/global-health/science-and-disease/refuses-rule-human-to-human-spread-chinas-mystery-virus-outbreak/|title=WHO refuses to rule out human-to-human spread in China's mystery virus outbreak|last=Newey|first=Sarah|date=14 जनवरी 2020|work=The Telegraph|access-date=17 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200115000103/https://www.telegraph.co.uk/global-health/science-and-disease/refuses-rule-human-to-human-spread-chinas-mystery-virus-outbreak/|archive-date=15 जनवरी 2020|language=en-GB|issn=0307-1235}}</ref> और [[चीनी नववर्ष|चीनी नव वर्ष]] के आसपास चीन के चरम यात्रा सीजन के दौरान आगे संचरण की चिंताएं थीं।<ref name="Cohen17Jan2020"/> <ref name="Schnirring20Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/new-coronavirus-infects-health-workers-spreads-korea|title=New coronavirus infects health workers, spreads to Korea|last=Schnirring|first=Lisa|last2=|date=20 जनवरी 2020|website=CIDRAP|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200121042344/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/new-coronavirus-infects-health-workers-spreads-korea|archive-date=21 जनवरी 2020|access-date=21 जनवरी 2020}}</ref> कई नए साल की घटनाओं को संचरण के डर से बंद कर दिया गया है, जिसमें बीजिंग में निषिद्ध शहर, पारंपरिक मंदिर मेलों और अन्य उत्सव समारोह शामिल हैं।<ref>{{Cite web|url=https://p.dw.com/p/3WhBc|title=China cancels Lunar New Year events over deadly virus fears|date=23 जनवरी 2020|publisher=Deutsche Welle|access-date=24 जनवरी 2020}}</ref> रोग की घटनाओं में अचानक वृद्धि ने इसके उद्गम, वन्यजीव व्यापार, वायरस के प्रसार और नुकसान पहुंचाने की क्षमता के बारे में अनिश्चितताओं से संबंधित प्रश्न उठाए हैं,<ref name="Shen22Jan2020">{{Cite web|url=https://www.nationalgeographic.com/science/2020/01/new-coronavirus-spreading-between-humans-how-it-started/|title=New coronavirus can spread between humans—but it started in a wildlife market|last=Shen|first=Darley|date=21 जनवरी 2020|website=Science|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200122113638/https://www.nationalgeographic.com/science/2020/01/new-coronavirus-spreading-between-humans-how-it-started/|archive-date=22 जनवरी 2020|access-date=22 जनवरी 2020}}</ref> क्या यह वायरस पहले से अधिक समय से घूम रहा है, और इसकी संभावना प्रकोप एक सुपर स्प्रेडर घटना है।<ref name="Parry20Jan2020"/> <ref name="Edwards21Jan2020">{{Cite web|url=https://www.nbcnews.com/health/health-news/1st-case-coronavirus-china-confirmed-u-s-n1119486|title=1st case of coronavirus from China confirmed in U.S.|last=Edwards|first=Erika|date=21 जनवरी 2020|website=NBC News|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200122080528/https://www.nbcnews.com/health/health-news/1st-case-coronavirus-china-confirmed-u-s-n1119486|archive-date=22 जनवरी 2020|access-date=21 जनवरी 2020}}</ref><ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.cnn.com/2020/01/19/asia/china-coronavirus-spike-intl-hnk/index.html|title=China confirms new coronavirus can spread between humans|last=Nectar Gan|last2=Yong Xiong|website=CNN|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120040258/https://www.cnn.com/2020/01/19/asia/china-coronavirus-spike-intl-hnk/index.html|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=20 जनवरी 2020|last3=Eliza Mackintosh}}</ref><ref name="Tan21Jan2020">{{Cite web|url=https://www.cnbc.com/2020/01/21/china-coronavirus-what-you-need-to-know-about-the-outbreak-from-wuhan.html|title=China says coronavirus that killed 6 can spread between people. Here’s what we know|last=Tan|first=Weizhen|date=21 जनवरी 2020|website=CNBC|language=en|archive-url=|archive-date=|access-date=21 जनवरी 2020}}</ref> पहले संदिग्ध मामलों को 31 दिसंबर 2019 को WHO को सूचित किया गया था,<ref name="WHO5Jan2020">{{Cite web|url=https://www.who.int/csr/don/05-january-2020-pneumonia-of-unkown-cause-china/en/|title=Pneumonia of unknown cause – China. Disease outbreak news|last=|first=|date=5 जनवरी 2020|website=|publisher=[[विश्व स्वास्थ्य संगठन]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200107032945/https://www.who.int/csr/don/05-january-2020-pneumonia-of-unkown-cause-china/en/|archive-date=7 जनवरी 2020|access-date=6 जनवरी 2020|quote=}}</ref> रोगसूचक बीमारी के पहले उदाहरणों के साथ 8 दिसंबर 2019 को केवल तीन सप्ताह पहले दिखाई दिया था।<ref name="Schnirring14Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/report-thailands-coronavirus-patient-didnt-visit-outbreak-market|title=Report: Thailand's coronavirus patient didn't visit outbreak market|last=Schnirring|first=Lisa|last2=|date=14 जनवरी 2020|website=CIDRAP|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200114230152/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/report-thailands-coronavirus-patient-didnt-visit-outbreak-market|archive-date=14 जनवरी 2020|access-date=15 जनवरी 2020}}</ref> 1 जनवरी 2020 को बाजार बंद कर दिया गया था, और जिन लोगों में कोरोनावायरस संक्रमण के संकेत और लक्षण दिखाई दिए, उन्हें अलग कर दिया गया थे। संभावित रूप से संक्रमित व्यक्तियों के साथ संपर्क में आने वाले 400 से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारियों सहित 700 से अधिक लोगों की शुरुआत में निगरानी की गई थी।<ref name="Schnirring11Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/china-releases-genetic-data-new-coronavirus-now-deadly|title=China releases genetic data on new coronavirus, now deadly|last=Schnirring|first=Lisa|date=11 जनवरी 2020|website=CIDRAP|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200111215102/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/china-releases-genetic-data-new-coronavirus-now-deadly|archive-date=11 जनवरी 2020|access-date=12 जनवरी 2020}}</ref> संक्रमण का पता लगाने के लिए एक विशिष्ट नैदानिक [[पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया|पीसीआर परीक्षण]] के विकास के बाद, मूल वुहान संकुल में 41 लोगों में बाद में 2019-nCoV की उपस्थिति की पुष्टि की गई,<ref name="Hui14Jan2020" /><ref name="Hongzhou16Jan2020">{{Cite journal|last=Lu|first=Hongzhou|last2=Stratton|first2=Charles W.|last3=Tang|first3=Yi-Wei|date=16 जनवरी 2020|title=Outbreak of Pneumonia of Unknown Etiology in Wuhan China: the Mystery and the Miracle|url=https://onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1002/jmv.25678|journal=Journal of Medical Virology|language=en|volume=|pages=|doi=10.1002/jmv.25678|issn=1096-9071|url-access=subscription|via=Wiley}}</ref> जिनमें से दो को बाद में एक विवाहित जोड़े होने की सूचना दी गई थी। जिनमें से एक बाज़ार में मौजूद नहीं था, और एक अन्य तीन जो एक ही परिवार के सदस्य थे, जो बाज़ार के समुद्री खाने की दुकानों पर काम करते थे।<ref name="Schnirring15Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/second-family-cluster-found-wuhan-novel-coronavirus-outbreak|title=Second family cluster found in Wuhan novel coronavirus outbreak|last=Schnirring|first=Lisa|last2=|date=15 जनवरी 2020|website=CIDRAP|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200116020740/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/second-family-cluster-found-wuhan-novel-coronavirus-outbreak|archive-date=16 जनवरी 2020|access-date=16 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Wee8Jan2020">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2020/01/08/health/china-pneumonia-outbreak-virus.html|title=China Identifies New Virus Causing Pneumonialike Illness|last=Wee|first=Sui-Lee|date=8 जनवरी 2020|work=The New York Times|access-date=14 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200114045821/https://www.nytimes.com/2020/01/08/health/china-pneumonia-outbreak-virus.html|archive-date=14 जनवरी 2020|last2=Jr|first2=Donald G. McNeil|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref> कोरोनावायरस संक्रमण से पहली पुष्टि की गई मौत 9 जनवरी 2020 को हुई। <ref name="QinNYT11Jan2020">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2020/01/10/world/asia/china-virus-wuhan-death.html|title=China Reports First Death From New Virus|last=Qin|first=Amy|date=10 जनवरी 2020|work=The New York Times|access-date=11 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200111020017/https://www.nytimes.com/2020/01/10/world/asia/china-virus-wuhan-death.html|archive-date=11 जनवरी 2020|last2=Hernández|first2=Javier C.|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref><ref name="QinNYT11Jan2020"/> 23 जनवरी 2020 को, वुहान को अलग रखा गया था, जिसमें वुहान के अंदर और बाहर सभी सार्वजनिक परिवहन को निलंबित कर दिया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://qz.com/1789856/wuhan-quarantined-as-china-fights-coronavirus-outbreak/|title=China has locked down Wuhan, the epicenter of the coronavirus outbreak|last=Hui|first=Jane Li, Mary|website=Quartz|access-date=23 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200602131601/https://qz.com/1789856/wuhan-quarantined-as-china-fights-coronavirus-outbreak/|archive-date=2 जून 2020|url-status=live}}</ref> 24 जनवरी से आस-पास के शहर हुआंगगांग, [[एझोऊ|इझोउ]], चबी, जिंगझोउ और झीझियांग को भी अलग में रखा गया था। <ref>{{Cite web|url=https://www.straitstimes.com/asia/east-asia/china-locks-down-two-more-cities-huanggang-and-ezhou-after-wuhan|title=Wuhan virus: China locks down Huanggang, shuts down railway station in Ezhou after Wuhan lockdown|date=23 जनवरी 2020|website=The Straits Times|access-date=23 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200319115809/https://www.straitstimes.com/asia/east-asia/china-locks-down-two-more-cities-huanggang-and-ezhou-after-wuhan|archive-date=19 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> 30 जनवरी 2020 को [[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] द्वारा कोरोना वायरस के प्रसार को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया गया, इस प्रकार का आपातकाल डब्लूएचओ द्वारा 2009 के एच वन एन वन के बाद छठा आपातकाल है।<ref name="WHODeclaration">{{cite news|url=https://www.bbc.com/news/world-51318246|title=Coronavirus declared global health emergency|author=<!--Not stated-->|date=30 जनवरी 2020|access-date=30 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130201004/https://www.bbc.com/news/world-51318246|archive-date=30 जनवरी 2020|publisher=[[BBC News Online]]}}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.statnews.com/2020/01/30/who-declares-coronavirus-outbreak-a-global-health-emergency/|title=WHO declares coronavirus outbreak a global health emergency|author=Joseph, Andrew|date=30 जनवरी 2020|access-date=30 जनवरी 2020|publisher=[[Stat News]]}}</ref><ref>{{cite news|url=https://www.nytimes.com/2020/01/30/health/coronavirus-world-health-organization.html|title=W.H.O. Declares Global Emergency as Wuhan Coronavirus Spreads|last1=Wee|first1=Sui-Lee|date=30 जनवरी 2020|access-date=30 जनवरी 2020|last2=McNeil Jr.|first2=Donald G.|last3=Hernández|first3=Javier C.|website=[[दि न्यू यॉर्क टाइम्स]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130195011/https://www.nytimes.com/2020/01/30/health/coronavirus-world-health-organization.html|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> == कोरोना वायरस का नाम == विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मंगलवार को कोरोना वायरस की महामारी को नया नाम कोविड-19 '''(COVID-12480019)''' दिया। कोविड-19 से अब तक दुनिया में लगभग 16.4 करोड़ लोग संक्रमित हो चुके हैं, जबकि लगभग 50,34,000 लोगों की मौत हो चुकी है।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/lite/story/covid-19-is-new-name-of-deadly-coronavirus-what-is-the-new-name-of-coronavirus-tstr-1-1163208.html|title=कोरोना वायरस का नया नाम|last=|first=|date=|website=आज तक|archive-url=|archive-date=|dead-url=|access-date=}}</ref> == प्रसंग == [[चित्र:Coronavirus_replication.png|अंगूठाकार| एक कोरोनवायरस का प्रतिकृति चक्र]] [[File:Symptoms of coronavirus disease 2019 2.0 hi.png|thumb|कोरोनावायरस रोग के लक्षण]] "अज्ञात कारण के निमोनिया" के साथ मामलों के उद्घाटन क्लस्टर के रूप में एक थोक पशु और मछली बाजार से जुड़ा हुआ था, जिसमें मुर्गियों, तीतरों, चमगादड़ों, मर्मोट्स, विषैले सांपों, चित्तीदार हिरणों और खरगोशों जो अंगों और अन्य जंगली जानवरों (तु वीई), यानी बस्मेट, के एक हजार स्टॉल थे। तात्कालिक परिकल्पना यह थी कि यह एक पशु स्रोत (एक ज़ूनोसिस]) से आया हुआ नावेल कोरोनवायरस था।<ref name="promedmail"/> <ref name="CDC6Jan2020">{{Cite web|url=https://wwwnc.cdc.gov/travel/notices/watch/pneumonia-china|title=Pneumonia of Unknown Cause in China – Watch – Level 1, Practice Usual Precautions – Travel Health Notices|date=6 जनवरी 2020|website=CDC|archive-url=https://web.archive.org/web/20200108143634/https://wwwnc.cdc.gov/travel/notices/watch/pneumonia-china|archive-date=8 जनवरी 2020|access-date=7 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Schnirring8Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/virologists-weigh-novel-coronavirus-chinas-outbreak|title=Virologists weigh in on novel coronavirus in China's outbreak|last=Schnirring|first=Lisa|date=8 जनवरी 2020|website=CIDRAP|archive-url=https://web.archive.org/web/20200108234455/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/virologists-weigh-novel-coronavirus-chinas-outbreak|archive-date=8 जनवरी 2020|access-date=9 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Shih8Jan2020">{{Cite web|url=https://www.washingtonpost.com/world/asia_pacific/specter-of-possible-new-virus-emerging-from-central-china-raises-alarms-across-asia/2020/01/08/3d33046c-312f-11ea-971b-43bec3ff9860_story.html|title=Specter of possible new virus emerging from central China raises alarms across Asia|last=Shih|first=Gerry|last2=Sun|first2=Lena H.|date=8 जनवरी 2020|website=Washington Post|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200108172338/https://www.washingtonpost.com/world/asia_pacific/specter-of-possible-new-virus-emerging-from-central-china-raises-alarms-across-asia/2020/01/08/3d33046c-312f-11ea-971b-43bec3ff9860_story.html|archive-date=8 जनवरी 2020|access-date=9 जनवरी 2020}}</ref> कोरोनावायरस मुख्य रूप से जानवरों के बीच घूमते हैं, लेकिन विकसित होकर मनुष्यों को संक्रमित करने के लिए जाना जाता है, जैसा कि SARS, MERS में देखा गया है और मनुष्यों में पाए जाने वाले चार अन्य कोरोनावायरस के साथ देखा गया है जो जुखाम की तरह हल्के श्वसन संबंधी लक्षण पैदा करते हैं। सभी छह मानव से मानव में फैल सकते हैं। <ref name="RyanHill2019">{{Cite book|title=Hunter's Tropical Medicine and Emerging Infectious Diseases E-Book|last=Rogier van Doorn|first=H.|last2=Yu|first2=Hongji|publisher=Elsevier Health Sciences|year=2019|isbn=978-0-323-55512-8|editors=Edward T Ryan, David R Hill, Tom Solomon, Timothy P Endy, Naomi Aronson|edition=10th|page=286|chapter=33. Viral Respiratory Infections|chapter-url=https://books.google.com/books?id=y8SODwAAQBAJ&pg=PA286}}</ref><ref name="CDC13Jan2020">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/novel-coronavirus-2019.html|title=Novel Coronavirus 2019 |last=|first=|date=13 जनवरी 2020|website=www.cdc.gov|language=en-us|archive-url=https://web.archive.org/web/20200114084712/https://www.cdc.gov/coronavirus/novel-coronavirus-2019.html|archive-date=14 जनवरी 2020|access-date=14 जनवरी 2020}}</ref> 2002 में, घोड़े की नाल चमगादड़ में संक्रमण के साथ, फिर जीवित पशु बाजारों से civets के माध्यम से, मुख्य भूमि चीन में SARS का प्रकोप शुरू हुआ, और कुछ सुपर-स्प्रेडर्स और अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा की मदद से, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका तक पहुंच गया, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में 700 से अधिक मौतें हुईं। आखिरी मामला 2004 में हुआ था।<ref name="BBC3Jan2020">{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/world-asia-china-50984025|title=Mystery pneumonia virus probed in China|last=|first=|date=3 जनवरी 2020|work=BBC News|access-date=5 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200105051949/https://www.bbc.com/news/world-asia-china-50984025|archive-date=5 जनवरी 2020|language=en-GB}}</ref><ref name="Time8Jan2020">{{Cite web|url=https://time.com/5759289/wuhan-pneumonia-outbreak-disease/|title=What to Know About the Wuhan Pneumonia Oubreak|last=|first=|date=|website=Time|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200108021836/https://time.com/5759289/wuhan-pneumonia-outbreak-disease/|archive-date=8 जनवरी 2020|access-date=8 जनवरी 2020}}</ref> उस समय महामारी से निपटने के लिए [[विश्व स्वास्थ्य संगठन|डब्ल्यूएचओ]] द्वारा चीन की आलोचना की गई थी।<ref name="Strait31Dec2019">{{Cite web|url=https://www.straitstimes.com/asia/east-asia/china-probes-pneumonia-outbreak-for-sars-links-state-media|title=China probes pneumonia outbreak for Sars links: State media|date=31 December 2019|website=The Straits Times|archive-url=https://web.archive.org/web/20200102044602/https://www.straitstimes.com/asia/east-asia/china-probes-pneumonia-outbreak-for-sars-links-state-media|archive-date=2 जनवरी 2020|access-date=6 जनवरी 2020}}</ref> SARS की शुरुआत के दस साल बाद, ड्रोमेडरी-ऊंट- संबंधी कोरोनवायरस, MERS, के परिणामस्वरूप 27 देशों में 850 से अधिक मौतें हुई हैं।<ref>{{Cite web|url=http://www.emro.who.int/health-topics/mers-cov/mers-outbreaks.html|title=Middle East respiratory syndrome|date=31 December 2019|publisher=WHO|access-date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20190729114018/http://www.emro.who.int/health-topics/mers-cov/mers-outbreaks.html|archive-date=29 जुलाई 2019|url-status=dead}}</ref> एक बड़े समुद्री भोजन और पशु बाजार के साथ वुहान के प्रकोप का कारण एक पशु स्रोत होने का अनुमान लगाया गया है। इससे यह डर पैदा हो गया है कि यह पिछले SARS प्रकोप के समान होगा,<ref name="Gallagher10Jan2020">{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/health-51048366|title=Mystery Chinese virus: How worried should we be?|last=Gallagher|first=James|date=2020|work=BBC News|access-date=11 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200111005810/https://www.bbc.com/news/health-51048366|archive-date=11 जनवरी 2020|language=en-GB}}</ref> इस डर को और भी बढ़ा देता है कि चीनी नववर्ष केे लिए चीन में अधिक संख्या में यात्री सफर करते हैं जो 25 जनवरी 2019 से शुरू हो रहा है।<ref name="NathNac10Jan2020">{{Cite web|url=https://travelhealthpro.org.uk/news/485/chinese-new-year-travel-advice|title=NaTHNaC – Chinese new year travel advice|last=|first=|date=10 जनवरी 2020|website=TravelHealthPro|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200112120935/https://travelhealthpro.org.uk/news/485/chinese-new-year-travel-advice|archive-date=12 जनवरी 2020|access-date=12 जनवरी 2020}}</ref> एक अद्यतन प्रीप्रिंट कागज जनवरी 2020 प्रकाशित 23 पर bioRxiv विषाणु विज्ञान के वुहान संस्थान के सदस्यों से, वुहान Jinyintan अस्पताल, चीनी अकादमी ऑफ साइंसेज और रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए हुबेई प्रांतीय सेंटर के विश्वविद्यालय का सुझाव है कि 2019 नावेल कोरोनावायरस संभवतः चमगादड़ से फैला है, जैसा कि उनके विश्लेषण से पता चलता है कि nCoV-2019 बल्ले कोरोनवायरस के पूरे जीनोम स्तर पर 96% समान है।<ref name="bioRxivBatOrigin">{{Cite web|url=https://www.biorxiv.org/content/10.1101/2020.01.22.914952v2|title=Discovery of a novel coronavirus associated with the recent pneumonia outbreak in humans and its potential bat origin|date=January 23, 2020|website=bioRxiv|publisher=bioRxiv|access-date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124223105/https://www.biorxiv.org/content/10.1101/2020.01.22.914952v2|archive-date=24 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> ==महामारी == वैज्ञानिक कोरोनावायरस के एक स्ट्रेन को जल्दी से अलग करने में कामयाब रहे और इस वायरस के आनुवंशिक अनुक्रम को पुरे विश्व के प्रयोगशालाओं के लिए प्रकाशित कर दिया ताकि दुनिया भर की प्रयोगशालाएं स्वतंत्र रूप से वायरस द्वारा संक्रमण का पता लगाने के लिए पीसीआर तकनीक का विकास जल्द से जल्द करने में कामयाबी हासिल कर सकें। WHO ने चीन के तेज प्रयासों के लिए चीनियों की प्रशंसा की है।<ref name="Hui14Jan20202">{{Cite journal|last=Hui|first=David S.|last2=Azhar|first2=Esam EI|last3=Madani|first3=Tariq A.|last4=Ntoumi|first4=Francine|last5=Kock|first5=Richard|last6=Dar|first6=Osman|last7=Ippolito|first7=Giuseppe|last8=Mchugh|first8=Timothy D.|last9=Memish|first9=Ziad A.|date=14 जनवरी 2020|title=The continuing epidemic threat of novel coronaviruses to global health – the latest novel coronavirus outbreak in Wuhan, China|url=https://www.ijidonline.com/article/S1201-9712(20)30011-4/pdf|journal=International Journal of Infectious Diseases|volume=91|pages=264–266|doi=10.1016/j.ijid.2020.01.009|issn=1201-9712|pmid=31953166|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131005858/https://www.ijidonline.com/article/S1201-9712(20)30011-4/pdf|archive-date=31 जनवरी 2020|access-date=16 जनवरी 2020|first10=Christian|first11=Alimuddin|last11=Zumla|last10=Drosten}}</ref><ref name="promedmail2">{{Cite web|url=https://promedmail.org/promed-post/?id=6866757|title=Undiagnosed pneumonia – China (HU) (01): wildlife sales, market closed, RFI Archive Number: 20200102.6866757|website=Pro-MED-mail|publisher=International Society for Infectious Diseases|archive-url=https://web.archive.org/web/20200122124653/https://promedmail.org/promed-post/?id=6866757|archive-date=22 जनवरी 2020|access-date=13 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Cohen17Jan20202">{{Cite journal|last=Cohen|first=Jon|last2=Normile|first2=Dennis|date=17 जनवरी 2020|title=New SARS-like virus in China triggers alarm|journal=Science|volume=367|issue=6475|pages=234–235|doi=10.1126/science.367.6475.234|issn=0036-8075|pmid=31949058}}</ref><ref name="Parry20Jan20202">{{Cite journal|last=Parry|first=Jane|date=जनवरी 2020|title=China coronavirus: cases surge as official admits human to human transmission|journal=British Medical Journal|volume=368|page=m236|doi=10.1136/bmj.m236|issn=1756-1833|pmid=31959587}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.forbes.com/sites/lisettevoytko/2020/01/30/coronavirus-1st-us-human-to-human-transmission-confirmed-right-before-who-emergency-meeting/|title=WHO Declares Coronavirus A Global Health Emergency, Praises China's 'Extraordinary Measures'|last=Voytko|first=Lisette|website=Forbes|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201040338/https://www.forbes.com/sites/lisettevoytko/2020/01/30/coronavirus-1st-us-human-to-human-transmission-confirmed-right-before-who-emergency-meeting/|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> 2019-nCoV का जीनोम अनुक्रम SARS-CoV के 75-80 प्रतिशत समान है, और कई बैट कोरोना वायरस के 85 प्रतिशत से अधिक समान है।<ref name="Zhu24Jan2020">{{Cite journal|last=Zhu|first=Na|last2=Zhang|first2=Dingyu|last3=Wang|first3=Wenling|last4=Li|first4=Xinwang|last5=Yang|first5=Bo|last6=Song|first6=Jingdong|last7=Zhao|first7=Xiang|last8=Huang|first8=Baoying|last9=Shi|first9=Weifeng|date=24 जनवरी 2020|title=A Novel Coronavirus from Patients with Pneumonia in China, 2019|journal=[[New England Journal of Medicine]]|location=United States|doi=10.1056/NEJMoa2001017|issn=0028-4793|pmid=31978945|last10=Lu|first10=Roujian|last11=Niu|first11=Peihua}}</ref><ref name="PerlmanJan2020">{{Cite journal|last=Perlman|first=Stanley|date=24 जनवरी 2020|title=Another Decade, Another Coronavirus|journal=New England Journal of Medicine|volume=0|doi=10.1056/NEJMe2001126|issn=0028-4793|pmid=31978944}}</ref> पहले 41 पुष्ट मामलों में से, दो-तिहाई मामलों को ह्वानन सीफूड होलसेल मार्केट के साथ लिंक पाया गया था, जहाँ पर जीवित जानवरों का व्यापार होता था।<ref name="Huang24Jan2020">{{Cite journal|last=Huang|first=Chaolin|last2=Wang|first2=Yeming|last3=Li|first3=Xingwang|last4=Ren|first4=Lili|last5=Zhao|first5=Jianping|last6=Hu|first6=Yi|last7=Zhang|first7=Li|last8=Fan|first8=Guohui|last9=Xu|first9=Jiuyang|date=24 जनवरी 2020|title=Clinical features of patients infected with 2019 novel coronavirus in Wuhan, China|journal=Lancet|doi=10.1016/S0140-6736(20)30183-5|issn=0140-6736|pmid=31986264|last10=Gu|first10=Xiaoying|last11=Cheng|first11=Zhenshun}}</ref><ref name="Joseph24Jan2020">{{Cite news|url=https://www.statnews.com/2020/01/24/coronavirus-infections-no-symptoms-lancet-studies/|title=New coronavirus can cause infections with no symptoms and sicken otherwise healthy people, studies show|last=Joseph|first=Andrew|date=24 जनवरी 2020|work=STAT|access-date=27 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124204338/https://www.statnews.com/2020/01/24/coronavirus-infections-no-symptoms-lancet-studies/|archive-date=24 जनवरी 2020}}</ref><ref name="han24Jan2020">{{Cite journal|last=Chan|first=Jasper Fuk-Woo|last2=Yuan|first2=Shuofeng|last3=Kok|first3=Kin-Hang|last4=To|first4=Kelvin Kai-Wang|last5=Chu|first5=Hin|last6=Yang|first6=Jin|last7=Xing|first7=Fanfan|last8=Liu|first8=Jieling|last9=Yip|first9=Cyril Chik-Yan|date=24 जनवरी 2020|title=A familial cluster of pneumonia associated with the 2019 novel coronavirus indicating person-to-person transmission: a study of a family cluster|journal=The Lancet|volume=0|doi=10.1016/S0140-6736(20)30154-9|issn=0140-6736|pmid=31986261|last10=Poon|first10=Rosana Wing-Shan|last11=Tsoi|first11=Hoi-Wah}}</ref><ref name="Schnirring25Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/doubts-rise-about-chinas-ability-contain-new-coronavirus|title=Doubts rise about China's ability to contain new coronavirus|last=Schnirring|first=Lisa|date=25 जनवरी 2020|website=CIDRAP|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126102242/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/doubts-rise-about-chinas-ability-contain-new-coronavirus|archive-date=26 जनवरी 2020|access-date=26 जनवरी 2020}}</ref> पहले 41 पुष्टि किए गए 2019-nCoV मामलों में से, शुरुआती रिपोर्ट किए गए लक्षण 1 दिसंबर 2019 को एक ऐसे व्यक्ति में हुए, जिनके बाजार या शेष 40 प्रभावित लोगों से कोई सम्बन्ध नहीं रहा था।<ref name="Wang24Jan2020">{{Cite journal|last=Wang|first=Chen|last2=Horby|first2=Peter W.|last3=Hayden|first3=Frederick G.|last4=Gao|first4=George F.|date=24 जनवरी 2020|title=A novel coronavirus outbreak of global health concern|url=https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(20)30185-9/abstract|journal=The Lancet|volume=0|doi=10.1016/S0140-6736(20)30185-9|issn=0140-6736|pmid=31986257}}</ref> जैसे-जैसे मामलों की संख्या बढ़ी है, बाजार से मामलों का महत्व कम होता गया।<ref name="Wang24Jan20202">{{Cite journal|last=Wang|first=Chen|last2=Horby|first2=Peter W.|last3=Hayden|first3=Frederick G.|last4=Gao|first4=George F.|date=24 जनवरी 2020|title=A novel coronavirus outbreak of global health concern|url=https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(20)30185-9/abstract|journal=The Lancet|volume=0|doi=10.1016/S0140-6736(20)30185-9|issn=0140-6736|pmid=31986257}}</ref><ref name="Huang24Jan20202">{{Cite journal|last=Huang|first=Chaolin|last2=Wang|first2=Yeming|last3=Li|first3=Xingwang|last4=Ren|first4=Lili|last5=Zhao|first5=Jianping|last6=Hu|first6=Yi|last7=Zhang|first7=Li|last8=Fan|first8=Guohui|last9=Xu|first9=Jiuyang|date=24 जनवरी 2020|title=Clinical features of patients infected with 2019 novel coronavirus in Wuhan, China|journal=Lancet|doi=10.1016/S0140-6736(20)30183-5|issn=0140-6736|pmid=31986264|last10=Gu|first10=Xiaoying|last11=Cheng|first11=Zhenshun}}</ref> 17 जनवरी को, यूनाइटेड किंगडम के इंपीरियल कॉलेज समूह ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की कि 12 जनवरी तक लक्षणों की शुरुआत के साथ 1,723 मामले (95% आत्मविश्वास अंतराल, 427–4,471) सामने आये थे। यह [[थाईलैण्ड|थाईलैंड]] और [[जापान]] में प्रारंभिक प्रसार के पैटर्न पर आधारित था। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि "आत्मनिर्भर मानव-से-मानव संचरण को खारिज नहीं किया जाना चाहिए",<ref name="Gallagher18Jan2020">{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/health-51148303|title=New Chinese virus 'will have infected hundreds'|last=Gallagher|first=James|date=18 जनवरी 2020|access-date=18 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200118020222/https://www.bbc.com/news/health-51148303|archive-date=18 जनवरी 2020|publisher=[[बीबीसी न्यूज़]]}}</ref><ref name="Imai17Jan2020">{{Cite web|url=https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-17-01-2020.pdf|title=Estimating the potential total number of novel Coronavirus cases in Wuhan City, China (report 1)|last=Imai|first=Natsuko|last2=Dorigatti|first2=Ilaria|date=17 जनवरी 2020|website=Imperial College London|archive-url=https://web.archive.org/web/20200121081317/https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-17-01-2020.pdf|archive-date=21 जनवरी 2020|access-date=18 जनवरी 2020|last3=Cori|first3=Anne|last4=Riley|first4=Steven|last5=Ferguson|first5=Neil M}}</ref> जिसकी पुष्टि की गई है। जैसा कि आगे के मामले सामने आए, उन्होंने बाद में पुनर्गणना की कि "वुहान सिटी में 2019-nCoV के 4,000 मामलों में 18 जनवरी 2020 तक लक्षणों की शुरुआत हो गई थी"।<ref name="Schnirring22Jan20202">[http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/who-decision-ncov-emergency-delayed-cases-spike Lisa Schnirring: WHO decision on nCoV emergency delayed as cases spike] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200124063004/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/who-decision-ncov-emergency-delayed-cases-spike|date=24 जनवरी 2020}} 23 जनवरी 2020 ''CIDRAP News''. Retrieved 23 जनवरी 2020</ref><ref name="Imai21Jan20202">{{Cite web|url=https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|title=Estimating the potential total number of novel Coronavirus cases in Wuhan City, China (Report 2|last=Imai|first=Natsuko|last2=Dorigatti|first2=Ilaria|date=21 जनवरी 2020|website=Imperial College London|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124060030/https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|archive-date=24 जनवरी 2020|access-date=27 जनवरी 2020|last3=Cori|first3=Anne|last4=Donnelly|first4=Christl|last5=Riley|first5=Steven|last6=Ferguson|first6=Neil M}}</ref> चीन के भीतर परिवहन पर अतिरिक्त विस्तार के साथ एक हांगकांग विश्वविद्यालय समूह पहले अध्ययन के समान निष्कर्ष निकाला है।<ref name="hkumed">{{Cite web|url=https://sph.hku.hk/en/news/press-releases/2020/nowcasting-and-forecasting-the-wuhan-2019-ncov-outbreak|title=HKUMed WHO Collaborating Centre for Infectious Disease Epidemiology and Control releases real-time nowcast on the likely extent of the Wuhan coronavirus outbreak, domestic and international spread with the forecast for chunyun|website=HKUMed School of Public Health|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125050442/https://sph.hku.hk/en/news/press-releases/2020/nowcasting-and-forecasting-the-wuhan-2019-ncov-outbreak|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=23 जनवरी 2020}}</ref> 20 जनवरी को, चीन ने लगभग 140 नए रोगियों की पहचान की जोकि मामले में तेजी से वृद्धि दिखता है, जिसमें बीजिंग में दो लोग और शेन्ज़ेन में एक शामिल था।<ref name="france2420200120">{{Cite web|url=https://www.france24.com/en/20200120-china-confirms-sharp-rise-in-cases-of-sars-like-virus-across-the-country|title=China confirms sharp rise in cases of SARS-like virus across the country|date=20 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120055618/https://www.france24.com/en/20200120-china-confirms-sharp-rise-in-cases-of-sars-like-virus-across-the-country|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=20 जनवरी 2020}}</ref> 25 जनवरी को, प्रयोगशाला-पुष्ट मामलों की संख्या 2,062 थी, जिसमें मुख्य भूमि चीन में 2,016, थाईलैंड में सात, हांगकांग में छह, मकाऊ में पांच, ऑस्ट्रेलिया में चार, मलेशिया में चार, सिंगापुर में चार, फ्रांस में तीन, शामिल हैं। जापान में तीन, दक्षिण कोरिया में तीन, ताइवान में तीन, संयुक्त राज्य अमेरिका में तीन, वियतनाम में दो, [[नेपाल]] में एक और स्वीडन में एक।<ref name="auto2">{{Cite news|url=https://www.svd.se/bekraftat-fall-i-jonkoping-av-nya-coronaviruset|title=Coronaviruset har upptäckts i Jönköping|last=Frejdeman|first=Hannah|date=31 जनवरी 2020|work=Svenska Dagbladet|access-date=31 जनवरी 2020|language=sv|issn=1101-2412|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131163041/https://www.svd.se/bekraftat-fall-i-jonkoping-av-nya-coronaviruset|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name="aljazeera2001250709">{{Cite web|url=https://www.aljazeera.com/news/2020/9/20/coronavirus-which-countries-have-confirmed-cases|title=Which countries have confirmed cases of new coronavirus?|publisher=Al Jazeera|archive-url=https://web.archive.org/web/20200127035129/https://www.aljazeera.com/amp/news/2020/01/countries-confirmed-cases-coronavirus-200125070959786.html|archive-date=27 जनवरी 2020|access-date=26 जनवरी 2020}}</ref><ref name="scmp3047663">{{Cite web|url=https://www.scmp.com/news/asia/southeast-asia/article/3047663/china-coronavirus-singapore-and-malaysia-both-report|title=Singapore, Malaysia both report fourth confirmed coronavirus cases|date=26 जनवरी 2020|website=South China Morning Post|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125235133/https://www.scmp.com/news/asia/southeast-asia/article/3047663/china-coronavirus-singapore-and-malaysia-both-report|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=26 जनवरी 2020}}</ref> === प्रभावित क्षेत्र === चीनी नव वर्ष के प्रवास के दौरान यह वायरस जनवरी के प्रारंभ और मध्य जनवरी 2020 में अन्य चीनी प्रांतों में फैल गया। अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों द्वारा, अन्य देशों में मामलों का पता लगाना शुरू हुआ, आमतौर पर प्रमुख व्यापार भागीदार देशों में थाईलैंड (13 जनवरी); जापान (15 जनवरी); दक्षिण कोरिया (20 जनवरी); ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका (21 जनवरी); हांगकांग और मकाऊ (22 जनवरी); सिंगापुर (23 जनवरी); फ्रांस, नेपाल और वियतनाम (24 जनवरी); ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया (25 जनवरी); कनाडा (26 जनवरी); कंबोडिया (27 जनवरी); जर्मनी (28 जनवरी); फिनलैंड, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात (29 जनवरी); भारत, इटली और फिलीपींस (30 जनवरी); यूनाइटेड किंगडम, रूस, स्वीडन और [[स्पेन]] (31 जनवरी)।<ref name="APviruswhere">{{Citation|last=Holm|first=Phil|title=Where the virus has spread|url=https://apnews.com/VirusOutbreak|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130191856/https://apnews.com/VirusOutbreak|access-date=29 जनवरी 2020|archive-date=30 जनवरी 2020|last2=Moritsugu|first2=Ken|agency=[[एसोसिएटेड प्रेस]]}}</ref><ref name="auto22">{{Cite news|url=https://www.svd.se/bekraftat-fall-i-jonkoping-av-nya-coronaviruset|title=Coronaviruset har upptäckts i Jönköping|last=Frejdeman|first=Hannah|date=31 जनवरी 2020|work=Svenska Dagbladet|access-date=31 जनवरी 2020|language=sv|issn=1101-2412|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131163041/https://www.svd.se/bekraftat-fall-i-jonkoping-av-nya-coronaviruset|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> 1 फरवरी तक, दुनिया भर में 14,000 से अधिक मामलों की पुष्टि हुई है, चीन में 98% पाया गया है।<ref name="APviruswhere" /> 1 फरवरी को फिलीपींस में होने वाली चीन के बाहर पहली मौत के साथ, 362 मौतों के लिए इस वायरस को जिम्मेदार ठहराया गया है।<ref name="twitter1223797298">{{Cite web|url=https://twitter.com/WHOPhilippines/status/1223797298477424641|title=A 44-year-old male is confirmed as the second person with the 2019 novel coronavirus acute respiratory disease (2019-nCoV) in the Philippines. He passed away on 1 February 2020.pic.twitter.com/5a5tPWtvpc|last=Philippines|first=World Health Organization|date=1 February 2020|website=@WHOPhilippines|access-date=2 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200202054800/https://twitter.com/WHOPhilippines/status/1223797298477424641|archive-date=2 फ़रवरी 2020|url-status=live}}{{Primary source inline|date=February 2020}}</ref><ref name="APviruswhere" /> अनुमानित मॉडल का सुझाव है कि वास्तविक आंकड़ा निदान और संचारित मामलों की तुलना में कई गुना अधिक है। वियतनाम, जापान, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका (विशेष रूप से शिकागो)<ref name="20200130cnbc">{{Cite web|url=https://www.cnbc.com/2020/01/30/cdc-confirms-first-human-to-human-transmission-of-coronavirus-in-us.html|title=CDC confirms first human-to-human transmission of coronavirus in US|last=Feuer|first=Berkeley Lovelace Jr ,William|date=30 जनवरी 2020|publisher=CNBC|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131102817/https://www.cnbc.com/2020/01/30/cdc-confirms-first-human-to-human-transmission-of-coronavirus-in-us.html|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> में स्थानीय मानव-से-मानव संचरण की पुष्टि की गई है, लेकिन अभी तक चीन के बाहर संचरण के किसी भी सक्रिय केंद्र की पुष्टि नहीं की हो पायी है। 23 जनवरी के बाद से, चीन और विदेश में एक महत्वपूर्ण प्रयास, डब्ल्यूएचओ और स्थानीय सरकारों के नेतृत्व में आबादी को सचेत करने और वायरस के अतिरिक्त प्रसार को रोकने के उपायों को स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। 30 जनवरी को चीन में अनिवार्य रूप से 7,711 मामलों और 29 जनवरी को 18 देशों में विदेश में 83 मामलों का हवाला देते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नावेल कोरोनवायरस के प्रकोप को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया।<ref name="WHO20200130">{{Citation|last=World Health Organization|title=Statement on the second meeting of the International Health Regulations (2005) Emergency Committee regarding the outbreak of novel coronavirus (2019-nCoV)|date=30 जनवरी 2020|url=https://www.who.int/news-room/detail/30-01-2020-statement-on-the-second-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|author-link=World Health Organization|access-date=31 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131005904/https://www.who.int/news-room/detail/30-01-2020-statement-on-the-second-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> === अनुमान === संक्रमण और पता लगाने के बीच 10 दिनों की देरी की रिपोर्ट और मानने के आधार पर, नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी और इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि रिपोर्टिंग के समय वास्तविक संक्रमण की संख्या पुष्टि की तुलना में 10 गुना अधिक हो सकती है। इंपीरियल कॉलेज ने 21 जनवरी 2020 तक 440 पुष्टि के साथ 4,000 मामलों का अनुमान लगाया, नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी ने 26 जनवरी तक 21,300 संक्रमणों का अनुमान लगाया, 27 जनवरी तक 26,200 संक्रमणों तक बढ़ गया (अंतराल 19,200-34,800 के भीतर 95% के विश्वास के साथ)।<ref>{{Cite web|url=https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|title=Report 2: Estimating the potential total number of novel Coronavirus cases in Wuhan City, China|publisher=Imperial College London-GB|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124060030/https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-22-01-2020.pdf|archive-date=24 जनवरी 2020|access-date=25 जनवरी 2020}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-17-01-2020.pdf|title=Estimating the potential total number of novel Coronavirus cases in Wuhan City, China|last=Imai|first=Natsuko|last2=Dorigatti|first2=Ilaria|date=17 जनवरी 2020|publisher=Imperial College London|archive-url=https://web.archive.org/web/20200121081317/https://www.imperial.ac.uk/media/imperial-college/medicine/sph/ide/gida-fellowships/2019-nCoV-outbreak-report-17-01-2020.pdf|archive-date=21 जनवरी 2020|access-date=25 जनवरी 2020|last3=Cori|first3=Anne|last4=Riley|first4=Steven|last5=Ferguson|first5=Neil M.}}</ref><ref name="20200122mobs-lab">{{Cite web|url=https://www.mobs-lab.org/2019ncov.html|title=Preliminary analysis of the 2019 nCOV outbreak in Wuhan city|date=22 जनवरी 2020|publisher=Northeastern University|access-date=3 फ़रवरी 2020|archive-date=11 मई 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220511171031/https://www.mobs-lab.org/2019ncov.html|url-status=dead}}</ref> 31 जनवरी 2020 को, लांसेट में प्रकाशित एक लेख में अनुमान लगाया गया कि 25, जनवरी 2020 तक वुहान में 75,815 व्यक्ति संक्रमित हुए हैं।<ref>{{Cite journal|last1=Wu|first1=Joseph T.|last2=Leung|first2=Kathy|last3=Leung|first3=Gabriel M.|year=2020|title=Nowcasting and forecasting the potential domestic and international spread of the 2019-nCoV outbreak originating in Wuhan, China: a modelling study|url=https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(20)30260-9/fulltext#%20|journal=The Lancet|doi=10.1016/S0140-6736(20)30260-9|access-date=31 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201002232/https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(20)30260-9/fulltext#%20|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live |issn=0140-6736}}</ref> इस बात को लेकर चिंता है कि प्रकोप से प्रभावित क्षेत्रों के अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सा कर्मी और उपकरण उपलब्ध हैं जो संदिग्ध मामलों को "गंभीर निमोनिया" के रूप में गलत निदान करने के बजाय कोरोनोवायरस के मामलों की सही पहचान करते हैं या नहीं।<ref name="WashPost_some_wonder">{{Cite news|url=https://www.washingtonpost.com/world/as-families-tell-of-pneumonia-like-deaths-in-wuhan-some-wonder-if-china-virus-count-is-too-low/2020/01/22/0f50b1e6-3d07-11ea-971f-4ce4f94494b4_story.html|title=As families tell of pneumonia-like deaths in Wuhan, some wonder if China virus count is too low|last=Fifield|first=Anna|date=22 जनवरी 2020|access-date=25 जनवरी 2020|archive-url=https://archive.today/20200123065441/https://www.washingtonpost.com/world/as-families-tell-of-pneumonia-like-deaths-in-wuhan-some-wonder-if-china-virus-count-is-too-low/2020/01/22/0f50b1e6-3d07-11ea-971f-4ce4f94494b4_story.html|archive-date=23 जनवरी 2020|website=[[द वॉशिंगटन पोस्ट|The Washington Post]]|url-status=live}}</ref><ref name="20200121theguardian">{{Cite news|url=https://www.theguardian.com/world/2020/jan/21/coronavirus-chinese-hospitals-not-testing-patients-say-relatives|title=Coronavirus: Chinese hospitals not testing patients, say relatives|last=Kuo|first=Lily|date=21 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200121170326/https://www.theguardian.com/world/2020/jan/21/coronavirus-chinese-hospitals-not-testing-patients-say-relatives|archive-date=21 जनवरी 2020|website=[[The Guardian]]}}</ref><ref name="wsj1157991563">{{Cite news|url=https://www.wsj.com/articles/relatives-wonder-whether-pneumonia-deaths-were-tied-to-coronavirus-11579915630|title=Relatives Wonder Whether Pneumonia Deaths Were Tied to Coronavirus|last=Fan|first=Wenxin|date=24 जनवरी 2020|url-access=subscription|website=[[वाल स्ट्रीट जर्नल|The Wall Street Journal]]}}</ref> लक्षणों का अनुभव करने वाले कई लोगों को विभिन्न स्तरों के लक्षणों वाले अन्य रोगियों के साथ निकट संपर्क से बचने के लिए अस्पताल जाने के बजाय घर पर आत्म-संगरोध करने के लिए कहा गया था।<ref name="ft547046735">{{Cite news|url=https://www.ft.com/content/08371b58-3eb4-11ea-a01a-bae547046735|title=The new coronavirus: is China moving quickly enough?|last=Tom Hancock|date=25 जनवरी 2020|access-date=1 February 2020|last2=Christian Shepherd|last3=Clive Cookson|website=[[Financial Times]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131171756/https://www.ft.com/content/08371b58-3eb4-11ea-a01a-bae547046735|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> जनवरी के अंत में वुहान से जापान के लिए 2 प्रत्यावर्तन उड़ानों का आयोजन किया गया था, लगभग 400 व्यक्तियों में से 5 को वायरस से निदान किया गया था, जिनमें से 1 रोगसूचक था और 4 नहीं थे।<ref>{{Cite news|url=https://www3.nhk.or.jp/news/html/20200131/k10012267841000.html|title=New pneumonia Two people returning home on the second flight Infection confirmed No symptoms such as fever|work=NHK Japan|access-date=31 जनवरी 2020|language=ja|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131103912/https://www3.nhk.or.jp/news/html/20200131/k10012267841000.html|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=dead}}</ref> == संकेत और लक्षण == पीड़ित व्यक्ति के कोई संकेत और लक्षण नहीं भी हो सकते हैं, हालांकि लक्षण प्रकट करने वाले लोगों में बुखार, खांसी, सांस की तकलीफ<ref name="novel corona virus"></ref><ref name="Hessen27Jan2020">{{Cite web|url=https://www.elsevier.com/connect/coronavirus-information-center|title=Novel Coronavirus Information Center: Expert guidance and commentary|last=Hessen|first=Margaret Trexler|date=27 जनवरी 2020|website=Elsevier Connect|access-date=31 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130171622/https://www.elsevier.com/connect/coronavirus-information-center|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=dead}}</ref><ref name="CDC2020Sym">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/about/symptoms.html|title=Coronavirus About Symptoms and Diagnosis|date=30 जनवरी 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|location=United States|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130180428/https://www.cdc.gov/coronavirus/about/symptoms.html|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> और दस्त<ref>{{cite news|url=https://www.bloomberg.com/news/articles/2020-02-01/coronavirus-lurking-in-feces-may-reveal-hidden-risk-of-spread|title=Coronavirus Lurking in Feces May Reveal Hidden Risk of Spread|last=Gale|first=Jason|date=1 February 2020|accessdate=2 February 2020|publisher=Bloomberg|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201213825/https://www.bloomberg.com/news/articles/2020-02-01/coronavirus-lurking-in-feces-may-reveal-hidden-risk-of-spread|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> हो सकते हैं, और मामूली से बहुत गंभीर हो सकते हैं।<ref name="Hessen27Jan2020" /><ref name="CDC2020Sym" /> 3 फरवरी 2019 तक गंभीर मामलों की संख्या 17,393 में से 2,298 है, जिसमें 488 स्वस्थ हुए हैं। गंभीर संक्रमण के मामलों के परिणामस्वरूप निमोनिया, गुर्दे की विफलता और मृत्यु हो सकती है।<ref name="Hui14Jan202022">{{vcite journal|authors=Hui DS, I Azhar E, Madani TA, Ntoumi F, Kock R, Dar O, Ippolito G, Mchugh TD, Memish ZA, Drosten C, Zumla A, Petersen E|title=The continuing 2019-nCoV epidemic threat of novel coronaviruses to global health – The latest 2019 novel coronavirus outbreak in Wuhan, China|journal=Int J Infect Dis|year=2020 Jan 14|volume=91|pages=264–266|pmid=31953166|doi=10.1016/j.ijid.2020.01.009}}{{open access}}</ref><ref name="WHOQ&A27Jan202">{{Cite web|url=https://www.who.int/news-room/q-a-detail/q-a-coronaviruses|title=Q&A on coronaviruses|website=who.int|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120174649/https://www.who.int/news-room/q-a-detail/q-a-coronaviruses|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=27 जनवरी 2020}}</ref> ऊपरी श्वसन लक्षण जैसे कि छींकना, बहती नाक या गले में खराश अक्सर कम होते हैं।<ref name="Huang24Jan20203">{{Cite journal|last=Huang|first=Chaolin|last2=Wang|first2=Yeming|last3=Li|first3=Xingwang|last4=Ren|first4=Lili|last5=Zhao|first5=Jianping|last6=Hu|first6=Yi|last7=Zhang|first7=Li|last8=Fan|first8=Guohui|last9=Xu|first9=Jiuyang|date=24 जनवरी 2020|title=Clinical features of patients infected with 2019 novel coronavirus in Wuhan, China|journal=Lancet|doi=10.1016/S0140-6736(20)30183-5|issn=0140-6736|pmid=31986264|last10=Gu|first10=Xiaoying|last11=Cheng|first11=Zhenshun}}</ref><ref name="Joseph24Jan20202">{{Cite news|url=https://www.statnews.com/2020/01/24/coronavirus-infections-no-symptoms-lancet-studies/|title=New coronavirus can cause infections with no symptoms and sicken otherwise healthy people, studies show|last=Joseph|first=Andrew|date=24 जनवरी 2020|work=STAT|access-date=27 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124204338/https://www.statnews.com/2020/01/24/coronavirus-infections-no-symptoms-lancet-studies/|archive-date=24 जनवरी 2020}}</ref> लक्षणों की शुरुआत से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन<ref>{{cite web|url=https://www.who.int/docs/default-source/coronaviruse/situation-reports/20200126-sitrep-6-2019--ncov.pdf|title=Novel Coronavirus (2019-nCoV) Situation Report – 6 26 जनवरी 2020|accessdate=2 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200207204621/https://www.who.int/docs/default-source/coronaviruse/situation-reports/20200126-sitrep-6-2019--ncov.pdf|archive-date=7 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> द्वारा 2 से 10 दिन और यूएस सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) द्वारा 2 से 14 दिनों का अनुमान लगाया गया है।<ref name="CDC symptoms">{{Cite web|url=https://www.cdc.gonv/coronavirus/2019-ncov/about/symptoms.html|title=Symptoms of Novel Coronavirus (2019-nCoV)|date=31 जनवरी 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=2 February 2020}}{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> वुहान के अस्पतालों में भर्ती कराए गए पहले 41 पुष्ट मामलों में से 13 (32%) व्यक्तियों में एक और पुरानी बीमारी थी, जैसे मधुमेह या उच्च रक्तचाप। कुल मिलाकर, 13 (32%) व्यक्तियों को गहन देखभाल की आवश्यकता थी, और 6 (15%) व्यक्तियों की मृत्यु हो गई।<ref name="Huang24Jan20204">{{Cite journal|last=Huang|first=Chaolin|last2=Wang|first2=Yeming|last3=Li|first3=Xingwang|last4=Ren|first4=Lili|last5=Zhao|first5=Jianping|last6=Hu|first6=Yi|last7=Zhang|first7=Li|last8=Fan|first8=Guohui|last9=Xu|first9=Jiuyang|date=24 जनवरी 2020|title=Clinical features of patients infected with 2019 novel coronavirus in Wuhan, China|journal=Lancet|doi=10.1016/S0140-6736(20)30183-5|issn=0140-6736|pmid=31986264|last10=Gu|first10=Xiaoying|last11=Cheng|first11=Zhenshun}}</ref> जिन लोगों की मृत्यु हुई उनमें से कई की स्थिति अन्य थी जैसे कि अधिक उम्र, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, या हृदय रोग जो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली(इम्यून सिस्टम) को बिगड़ा था।<ref>{{Cite web|url=https://www.who.int/dg/speeches/detail/who-director-general-s-statement-on-the-advice-of-the-ihr-emergency-committee-on-novel-coronavirus|title=WHO Director-General's statement on the advice of the IHR Emergency Committee on Novel Coronavirus|website=who.int|access-date=3 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200127231741/https://www.who.int/dg/speeches/detail/who-director-general-s-statement-on-the-advice-of-the-ihr-emergency-committee-on-novel-coronavirus|archive-date=27 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> '''इस बीमारी की शुरुआत :''' नया कोरोना वायरस 2019 के आखिर में अनजान कारणों से [[न्यूमोनिया|निमोनिया]] जैसी बीमारी से सामने आया। बाद में पता चला कि इस बीमारी का कारण सीवियर एक्यूट रेस्परेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस 2 या सार्स कोरोना वायरस-2 है। इसमें शुरुआत में हल्की सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। डब्लूएचओ के मुताबिक, कोरोना संक्रमित करीब 80 फीसद लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं। संक्रमित छह लोगों में से सिर्फ एक व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ता है और वह सांस लेने में तकलीफ होने की स्थिति तक पहुंचता है। '''संक्रमण की चार श्रेणियां :''' प्रोफेसर विल्सन के अनुसार, कोविड-19 से संक्रमित लोगों को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे लोग होते हैं, जिनमें कोई लक्षण नहीं दिखता है। इसके आगे की श्रेणी में वे लोग हैं, जिनमें श्वसन नली के ऊपरी हिस्से में संक्रमण होता है। इस स्थिति में संक्रमित लोगों को बुखार, कफ, सिरदर्द या कंजक्टीवाइटिस (आंख संबंधी बीमारी) के लक्षण होते हैं। इन लक्षणों वाले लोग संक्रमण के वाहक होते हैं लेकिन संभवत: उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती है। तीसरी श्रेणी में कोविड-19 पॉजिटिव लोग होते हैं, जिनमें निमोनिया जैसे लक्षण होते हैं और उन्हें अस्पताल में रहना होता है। चौथी श्रेणी के लोगों में निमोनिया जैसी बीमारी का गंभीर रूप दिखता है। '''छह फीसद पीड़ित होते हैं गंभीर:''' वुहान में यह देखा गया कि टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए जिन लोगों ने इलाज कराया, उनमें से सिर्फ 6 फीसद लोगों की हालत गंभीर हुई। डब्लूएचओ के मुताबिक, बुजुर्ग तथा हाई ब्लड प्रेशर, हृदय तथा फेफड़े व मधुमेह के रोगियों में स्थिति गंभीर होने की ज्यादा संभावना रहती है। कैसे होता है निमोनिया : कोविड-19 संक्रमितों को कफ और बुखार होता है। विल्सन के मुताबिक, ऐसा रेस्परेटरी ट्री तक संक्रमण होने से होता है। इसमें रेस्परेटरी लाइनिंग में जख्म हो जाता है, जिससे उसमें सूजन पैदा होती है। यह एयरवे की लाइनिंग में परेशानी पैदा करता है तथा धूल के एक कण से भी खांसी होने लगती है। हालत तब और बिगड़ जाती है, जब यह एयरलाइनिंग को पार कर गैस एक्सचेंज यूनिट तक पहुंचता है। यह यदि संक्रमित हो जाए तो फेफड़े के निचले हिस्से से वायु कोषों में सूजन पैदा करने वाली सामग्री उड़ेलने लगता है। वायु कोषों में सूजन के बाद द्रव तथा इनफ्लेमेटरी सेल्स फेफड़े में आने लगते हैं, जिसका परिणाम निमोनिया होता है। इस स्थिति में फेफड़ा रक्त प्रवाह से पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं ले पाता है और शरीर में ऑक्सीजन लेने तथा [[कार्बन डाईऑक्साइड|कार्बन डाइऑक्साइड]] के प्रभाव से बचने की क्षमता कम हो जाती है। यह निमोनिया की गंभीर स्थिति होती है। ==कारण== === प्रसार === कोरोना वायरस मुख्य रूप से हवा की बूंदों के माध्यम से फैलता है जब एक संक्रमित व्यक्ति खांसी या लगभग 3 फीट (0.91 मीटर) से 6 फीट (1.8 मीटर) की सीमा के भीतर छींकता है।<ref name="nbcnews1121856">{{Cite web|url=https://www.nbcnews.com/health/health-news/how-does-new-coronavirus-spread-n1121856|title=How does coronavirus spread?|publisher=NBC News|archive-url=https://web.archive.org/web/20200128081650/https://www.nbcnews.com/health/health-news/how-does-new-coronavirus-spread-n1121856|archive-date=28 जनवरी 2020|access-date=29 जनवरी 2020}}</ref><ref name="20200127cdc">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/transmission.html|title=Transmission of Novel Coronavirus (2019-nCoV)|date=27 जनवरी 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|archive-url=https://web.archive.org/web/20200128152653/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/transmission.html|archive-date=28 जनवरी 2020|access-date=29 जनवरी 2020}}</ref><ref>{{Citation|last=AFP|title=Doctor, nurses describe treating coronavirus patient|date=24 जनवरी 2020|url=https://youtube.com/watch?v=vGFhm-nM-DE|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125142950/https://www.youtube.com/watch?v=vGFhm-nM-DE|access-date=28 जनवरी 2020|archive-date=25 जनवरी 2020}}</ref> वायरल आरएनए पहले पुष्ट मामले में से एकत्र मल नमूनों में भी मिला था, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या संक्रामक वायरस का फिकल-मौखिक संचरण भी होता है।<ref>{{Cite journal|last=Holshue|first=Michelle L.|last2=DeBolt|first2=Chas|last3=Lindquist|first3=Scott|last4=Lofy|first4=Kathy H.|last5=Wiesman|first5=John|last6=Bruce|first6=Hollianne|last7=Spitters|first7=Christopher|last8=Ericson|first8=Keith|last9=Wilkerson|first9=Sara|date=31 जनवरी 2020|title=First Case of 2019 Novel Coronavirus in the United States|journal=New England Journal of Medicine|pages=NEJMoa2001191|doi=10.1056/NEJMoa2001191|issn=0028-4793|pmid=32004427|last10=Tural|first10=Ahmet|last11=Diaz|first11=George}}</ref> यह अन्य कोरोना वायरस(बिषाणु) की तरह हैंडल और रेलिंग के माध्यम से भी फैल सकता है।<ref>Kate Kelland World News Reuters, published January 28, 2020 Seen February 3, 2020. 'Factbox: The new coronavirus - What is it and how does it behave?' https://www.reuters.com/article/us-china-health-coronavirus-factbox/factbox-the-new-coronavirus-what-is-it-and-how-does-it-behave-idUSKBN1ZR11F {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200129024153/https://www.reuters.com/article/us-china-health-coronavirus-factbox/factbox-the-new-coronavirus-what-is-it-and-how-does-it-behave-idUSKBN1ZR11F |date=29 जनवरी 2020 }}</ref> [[File:Log-linear plot of coronavirus cases with linear regressions.png|कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Log-linear plot of coronavirus cases with linear regressions.png|अंगूठाकार|[[:en:Semi-log_plot|Semi-log plot]] of confirmed cases and deaths in China<ref>{{Cite web|url=http://wjw.wuhan.gov.cn/front/web/list2nd/no/710|title=公示公告|publisher=Wuhan Municipal Health Commission|language=Chinese|archive-url=https://web.archive.org/web/20190111205203/http://wjw.wuhan.gov.cn/front/web/list2nd/no/710|archive-date=11 January 2019|access-date=30 जनवरी 2020}}</ref> (trend lines designate [[:en:Exponential_growth|exponential growth]]){{Failed verification|date=February 2020}}]] एक सुपर-स्प्रेडर से मेडिकल स्टाफ के 14 अलग-अलग सदस्यों के संक्रमित होने की सूचना मिली थी। 25 जनवरी 2020 को, सिन्हुआ समाचार एजेंसी को की गई घोषणा में चीनी सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के प्रमुख गाओ फू ने इस बात से इनकार किया कि उक्त व्यक्ति को "सुपर स्प्रेडर" माना जाना चाहिए क्योंकि उसे कई वार्डों में ले जाया गया था।<ref name="xinhuanet138733483">{{Cite news|url=http://www.xinhuanet.com/english/2020-01/25/c_138733483.htm|title=China CDC head dismisses super-spreader media report|date=25 जनवरी 2020|access-date=25 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125191047/http://www.xinhuanet.com/english/2020-01/25/c_138733483.htm|archive-date=25 जनवरी 2020|agency=Xinhua News Agency}}</ref> उसी दिन, हालांकि, ''चाइना न्यूज़वीक'' (एक अन्य आधिकारिक समाचार एजेंसी, जो चीन समाचार सेवा द्वारा संचालित हैै), पेकिंग विश्वविद्यालय के एक विशेषज्ञ का हवाला देते हुए, ने दावा किया कि पूर्वोक्त रोगी को पहले से ही सुपर-स्प्रेडर माना जा सकता है और शामिल अस्पतालों की आलोचना की कि संपर्क में आए कर्मचारियों की रक्षा के लिए ठीक से वयवस्था नहीं किया गया था। ''चाइना न्यूजवीक'' ने सरकार की सेंसरशिप की भी आलोचना करते हुए कहा कि हेल्थकेयर प्रोवाइडर, बुखार क्लीनिक में रहने वालों को छोड़कर, के पास सुरक्षा के लिए केवल एक मास्क है।<ref name="qq2020012500">{{Cite news|url=https://new.qq.com/rain/a/TWF2020012500903100|date=25 जनवरी 2020|work=China Newsweek|access-date=25 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125200018/https://new.qq.com/rain/a/TWF2020012500903100|archive-date=25 जनवरी 2020|publisher=[[qq.com]]|language=Chinese|script-title=zh:还原"超级传播者"传染路径 武汉医生:疫情刚开始"整个不让说"|trans-title=Restore the infection route for "super-spreader"s; "'Not allowed to speak anything' at the beginning of the outbreak," said Wuhan doctors}}</ref> === मूल प्रजनन संख्या === लोगों के बीच वायरस का प्रसार परिवर्तनशील रहा है, कुछ प्रभावित लोगों ने वायरस को दूसरों तक नहीं पहुँचाया जबकि अन्य कई संक्रमित लोगों ने दूसरे लोगों में संक्रमण को फैलाया है।<ref name="Schnirring25Jan20202">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/doubts-rise-about-chinas-ability-contain-new-coronavirus|title=Doubts rise about China's ability to contain new coronavirus|last=Schnirring|first=Lisa|date=25 जनवरी 2020|website=CIDRAP|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126102242/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/doubts-rise-about-chinas-ability-contain-new-coronavirus|archive-date=26 जनवरी 2020|access-date=26 जनवरी 2020}}</ref> 2.13<ref name="Leung27Jan2020">{{Cite web|url=https://www.med.hku.hk/f/news/3549/7418/Wuhan-coronavirus-outbreak_AN-UPDATE_20200127.pdf|title=Real-time nowcast and forecast on the extent of the Wuhan CoV outbreak, domestic and international spread|last=Leung|first=Gabriel|last2=Wu|first2=Joseph|date=27 जनवरी 2020|website=Wuhan-coronavirus-outbreak AN UPDATE|access-date=29 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130203810/https://www.med.hku.hk/f/news/3549/7418/Wuhan-coronavirus-outbreak_AN-UPDATE_20200127.pdf|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> से 3.11<ref name="Read28Jan20202">{{Cite journal|last=Read|first=Jonathan M.|last2=Bridgen|first2=Jessica RE|last3=Cummings|first3=Derek AT|last4=Ho|first4=Antonia|last5=Jewell|first5=Chris P.|date=28 जनवरी 2020|title=Novel coronavirus 2019-nCoV: early estimation of epidemiological parameters and epidemic predictions|url=https://www.medrxiv.org/content/10.1101/2020.01.23.20018549v2|journal=MedRxiv|pages=2020.01.23.20018549|doi=10.1101/2020.01.23.20018549}}</ref> तक मूल प्रजनन संख्या के लिए कई अनुमान लगाए गए हैं।<ref name="Read28Jan2020">{{Cite journal|last=Read|first=Jonathan M.|last2=Bridgen|first2=Jessica RE|last3=Cummings|first3=Derek AT|last4=Ho|first4=Antonia|last5=Jewell|first5=Chris P.|date=28 जनवरी 2020|title=Novel coronavirus 2019-nCoV: early estimation of epidemiological parameters and epidemic predictions|url=https://www.medrxiv.org/content/10.1101/2020.01.23.20018549v2|journal=MedRxiv|pages=2020.01.23.20018549|doi=10.1101/2020.01.23.20018549}}</ref> संख्या बताती है कि, एक नव संक्रमित व्यक्ति कितने लोगों को वायरस से संक्रमित करने की संभावना रखता है। नए कोरोनोवायरस कथित तौर पर अब तक चार लोगों की श्रृंखला को संक्रमित करने में सक्षम हैं।<ref name="Saey24Jan2020">{{Cite web|url=https://www.sciencenews.org/article/how-new-wuhan-coronavirus-stacks-up-against-sars-mers|title=How the new coronavirus stacks up against SARS and MERS|last=Saey|first=Tina Hesman|date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125064423/https://www.sciencenews.org/article/how-new-wuhan-coronavirus-stacks-up-against-sars-mers|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=25 जनवरी 2020}}</ref> यह गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम से संबंधित कोरोनावायरस (SARSCoV) के समान है।<ref>Julien Riou & Christian L. Althaus, [https://www.biorxiv.org/content/10.1101/2020.01.23.917351v1.full.pdf Pattern of early human-to-human transmission of Wuhan 2019-NCoV], Preprint, [[bioRxiv]], 23 जनवरी 2020.</ref> === विषाणु विज्ञान === 2019-nCoV के प्राकृतिक वन्यजीव रिजर्वायर और मध्यवर्ती होस्ट की पुष्टि नहीं की गई है जिससे होते हुए 2019-nCoV मनुष्यों तक पहुँचते हैं।<ref name="Liu22Jan2020">{{Cite journal|last=Liu|first=Shan-Lu|last2=Saif|first2=Linda|date=22 जनवरी 2020|title=Emerging Viruses without Borders: The Wuhan Coronavirus|journal=Viruses|volume=12|issue=2|page=130|doi=10.3390/v12020130|pmid=31979013}}</ref> हालांकि, यह संभावना है कि वायरस के लिए प्राथमिक रिजर्वायर चमगादड़ है।<ref name="PerlmanJan20202">{{Cite journal|last=Perlman|first=Stanley|date=24 जनवरी 2020|title=Another Decade, Another Coronavirus|journal=New England Journal of Medicine|volume=0|doi=10.1056/NEJMe2001126|issn=0028-4793|pmid=31978944}}</ref> बाजार से लिए गए 585 जानवरों के नमूनों में से 33 में 2019-एनसीओवी के साक्ष्य दिखाई दिए।<ref name="Page27Jan2020">{{Cite news|url=https://www.wsj.com/articles/virus-sparks-soul-searching-over-chinas-wild-animal-trade-11580055290|title=Virus Sparks Soul-Searching Over China's Wild Animal Trade|last=Page|first=Jeremy|date=27 जनवरी 2020|work=The Wall Street Journal|access-date=27 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126175047/https://www.wsj.com/articles/virus-sparks-soul-searching-over-chinas-wild-animal-trade-11580055290|archive-date=31 जनवरी 2020|issn=0099-9660|url-access=subscription}}</ref> वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज और रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए हुबेई प्रांतीय केंद्र, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ चाइना एकेडमी ऑफ साइंसेज और हुबेई प्रांतीय केंद्र के वुहान इंस्टीट्यूट के सदस्यों द्वारा bioRxiv पर 23 जनवरी 2020 को एक प्रीप्रिंट पेपर प्रकाशित करअपडेट किया गया था कि 2019 के नावेल कोरोनावायरस की संभावित उत्पत्ति चमगादड़ हो सकती है। जैसा कि उनके विश्लेषण से पता चलता है कि 2013 में पहचाने जाने वाले बैट कोरोनोवायरस के पूरे जीनोम स्तर का 96% समान जीनोम nCoV-2019 में है।<ref name="bioRxivBatOrigin2">{{Cite journal|last=Zhou|first=Peng|last2=Yang|first2=Xing-Lou|last3=Wang|first3=Xian-Guang|last4=Hu|first4=Ben|last5=Zhang|first5=Lei|last6=Zhang|first6=Wei|last7=Si|first7=Hao-Rui|last8=Zhu|first8=Yan|last9=Li|first9=Bei|displayauthors=1|date=23 जनवरी 2020|title=Discovery of a novel coronavirus associated with the recent pneumonia outbreak in humans and its potential bat origin|url=https://www.biorxiv.org/content/10.1101/2020.01.22.914952v2|journal=[[bioRxiv]]|pages=2020.01.22.914952|doi=10.1101/2020.01.22.914952|access-date=24 जनवरी 2020|first28=Geng-Fu|first24=Lin-Lin|last21=Zhao|first21=Kai|last22=Chen|first22=Quan-Jiao|last23=Deng|first23=Fei|last24=Liu|last26=Zhan|last25=Yan|first25=Bing|last29=Shi|last28=Xiao|first26=Fa-Xian|last27=Wang|last20=Zheng|first27=Yan-Yi|first20=Xiao-Shuang|first13=Yun|first19=Xi|last14=Guo|last10=Huang|first10=Chao-Lin|last11=Chen|first11=Hui-Dong|last12=Chen|first12=Jing|last13=Luo|first14=Hua|last19=Wang|last15=Jiang|first15=Ren-Di|last16=Liu|first16=Mei-Qin|last17=Chen|first17=Ying|last18=Shen|first18=Xu-Rui|first29=Zheng-Li|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124223105/https://www.biorxiv.org/content/10.1101/2020.01.22.914952v2|archive-date=24 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> हालांकि, इस बैट कोरोनोवायरस के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम, जिसे RaTG13 के रूप में जाना जाता है, को कभी भी प्रकोप से पहले चीनी वैज्ञानिकों द्वारा जारी नहीं किया गया था।<ref name="n2019covgenome">{{Cite web|url=http://virological.org/t/novel-2019-coronavirus-genome/319/26|title=Novel 2019 coronavirus genome|date=29 जनवरी 2020|website=Virological|access-date=4 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200203022132/http://virological.org/t/novel-2019-coronavirus-genome/319/26|archive-date=3 फ़रवरी 2020|url-status=dead}}</ref> पेकिंग यूनिवर्सिटी, गुआंग्सी ट्रेडिशनल चाइनीज़ मेडिकल यूनिवर्सिटी, निंगबो यूनिवर्सिटी और वुहान बायोलॉजी इंजीनियरिंग कॉलेज से एक दिन पहले प्रकाशित एक रिपोर्ट 2019-nCoV के कोडन उपयोग पूर्वाग्रह की तुलना "मनुष्यों, चमगादड़ों, मुर्गियों, हेजहॉग्स, पैंगोलिन और सांपों की दो प्रजातियों" से करती है। , और उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि "सांप 2019-nCoV" के लिए सबसे संभावित वन्यजीव पशु रिजर्वायर है जो तब मनुष्यों में फैला था।<ref name="Hamzelou">{{Cite web|url=https://www.newscientist.com/article/2231162-wuhan-coronavirus-may-have-been-transmitted-to-people-from-snakes/|title=Wuhan coronavirus may have been transmitted to people from snakes|last=Hamzelou|first=Jessica|website=New Scientist|archive-url=https://web.archive.org/web/20200123232053/https://www.newscientist.com/article/2231162-wuhan-coronavirus-may-have-been-transmitted-to-people-from-snakes/|archive-date=23 जनवरी 2020|access-date=24 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Guo22Jan2020">{{Cite web|url=https://www.scientificamerican.com/article/snakes-could-be-the-original-source-of-the-new-coronavirus-outbreak-in-china/|title=Snakes Could Be the Original Source of the New Coronavirus Outbreak in China|author1=Haitao Guo|author2=Guangxiang "George" Luo|date=22 जनवरी 2020|website=Scientific American|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125183704/https://www.scientificamerican.com/article/snakes-could-be-the-original-source-of-the-new-coronavirus-outbreak-in-china/|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=24 जनवरी 2020|author3=Shou-Jiang Gao}}</ref><ref name="JI22Jan2020">{{Cite journal|last=Ji|first=Wei|last2=Wang|first2=Wei|last3=Zhao|first3=Xiaofang|last4=Zai|first4=Junjie|last5=Li|first5=Xingguang|date=22 जनवरी 2020|title=Homologous recombination within the spike glycoprotein of the newly identified coronavirus may boost cross‐species transmission from snake to human|journal=Journal of Medical Virology|doi=10.1002/jmv.25682|pmid=31967321}}</ref> यह दावा व्यापक रूप से विवादित रहा है: कुछ ने तर्क दिया कि रिजर्वायर चमगादड़ होना चाहिए और मध्यवर्ती होस्ट, पक्षी या स्तनपायी होना चाहिए, साँप नहीं (जैसा कि सांप, मनुष्य के विपरीत, पोइकिलोथर्म हैं),<ref name="Cyranoski23Jan2020">{{Cite journal|last=Callaway|first=Ewen|last2=Cyranoski|first2=David|date=23 जनवरी 2020|title=Why snakes probably aren't spreading the new China virus|url=https://www.nature.com/articles/d41586-020-00180-8|journal=Nature|doi=10.1038/d41586-020-00180-8|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125051951/https://www.nature.com/articles/d41586-020-00180-8|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=23 जनवरी 2020}}</ref><ref name="Cyranoski23Jan20202">{{Cite journal|last=Callaway|first=Ewen|last2=Cyranoski|first2=David|date=23 जनवरी 2020|title=Why snakes probably aren't spreading the new China virus|url=https://www.nature.com/articles/d41586-020-00180-8|journal=Nature|doi=10.1038/d41586-020-00180-8|archive-url=https://web.archive.org/web/20200125051951/https://www.nature.com/articles/d41586-020-00180-8|archive-date=25 जनवरी 2020|access-date=23 जनवरी 2020}}</ref><ref name="20200123wired">{{Cite journal|last=Multeni|first=Megan|date=23 जनवरी 2020|title=No, the Wuhan Virus Is Not a 'Snake Flu'|url=https://www.wired.com/story/wuhan-coronavirus-snake-flu-theory/|journal=Wired|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124071025/https://www.wired.com/story/wuhan-coronavirus-snake-flu-theory/|archive-date=24 जनवरी 2020|access-date=24 जनवरी 2020}}</ref> जबकि अन्य ने पुनर्संयोजन और SARS/ MERS कोडन उपयोग पूर्वाग्रह के डेटा का उपयोग किया था तर्क का खंडन करने के लिए। उल्लेखित पुनर्संयोजन की घटना शायद चमगादड़ में हुई।<ref name="20200124virological">{{Cite web|url=http://virological.org/t/ncov-2019-codon-usage-and-reservoir-not-snakes-v2/339|title=nCoV-2019 codon usage and reservoir (not snakes v2)|last=Andersen|first=Kristian|date=24 जनवरी 2020|website=Virological|access-date=28 जनवरी 2020}}</ref> 2019-nCoV के फैलोजनेटिक अध्ययन वायरस के विकास के इतिहास और अन्य जीवों के साथ उसके संबंधों की जांच करते हैं। कोरोना वायरस के परिवार का सातवाँ सदस्य जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है, 2019-nCoV में SARS-CoV के समान 75% से 80% जीनोम अनुक्रम है और कई बैट कोरोना वायरस से अधिक समानता रखता है।<ref name="Zhu24Jan20202">{{Cite journal|last=Zhu|first=Na|last2=Zhang|first2=Dingyu|last3=Wang|first3=Wenling|last4=Li|first4=Xinwang|last5=Yang|first5=Bo|last6=Song|first6=Jingdong|last7=Zhao|first7=Xiang|last8=Huang|first8=Baoying|last9=Shi|first9=Weifeng|date=24 जनवरी 2020|title=A Novel Coronavirus from Patients with Pneumonia in China, 2019|journal=[[New England Journal of Medicine]]|location=United States|doi=10.1056/NEJMoa2001017|issn=0028-4793|pmid=31978945|last10=Lu|first10=Roujian|last11=Niu|first11=Peihua}}</ref><ref name="PerlmanJan20203">{{Cite journal|last=Perlman|first=Stanley|date=24 जनवरी 2020|title=Another Decade, Another Coronavirus|journal=New England Journal of Medicine|volume=0|doi=10.1056/NEJMe2001126|issn=0028-4793|pmid=31978944}}</ref> नावेल कोरोनोवायरस के कम से कम पांच जीनोम को पृथक और रिपोर्ट किया गया है।<ref name=":1">{{Cite web|url=https://www.who.int/health-topics/coronavirus|title=Coronavirus|publisher=[[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] (WHO)|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120214550/https://www.who.int/health-topics/coronavirus|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=16 जनवरी 2020}}</ref><ref name="20200111virological">{{Cite web|url=http://virological.org/t/initial-genome-release-of-novel-coronavirus/319|title=Initial genome release of novel coronavirus|date=11 जनवरी 2020|website=Virological|archive-url=https://web.archive.org/web/20200112100227/http://virological.org/t/initial-genome-release-of-novel-coronavirus/319|archive-date=12 जनवरी 2020|access-date=12 जनवरी 2020}}</ref><ref name="20200117nih">{{Cite web|url=http://www.ncbi.nlm.nih.gov/nuccore/MN908947.3|title=Wuhan seafood market pneumonia virus isolate Wuhan-Hu-1, complete genome|date=17 जनवरी 2020|access-date=4 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200515133838/https://www.ncbi.nlm.nih.gov/nuccore/MN908947.3|archive-date=15 मई 2020|url-status=live}}</ref> ये दिखाते हैं कि वायरस अन्य ज्ञात कोरोना वायरस जैसे कि गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम-संबंधित कोरोनवायरस (SARS-CoV) और [[मध्य पूर्व]] श्वसन सिंड्रोम-संबंधी कोरोनवायरस (MERS-CoV) से आनुवंशिक रूप से अलग है।<ref name=":12">{{Cite web|url=https://www.who.int/health-topics/coronavirus|title=Coronavirus|publisher=[[World Health Organization]] (WHO)|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120214550/https://www.who.int/health-topics/coronavirus|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=16 जनवरी 2020}}</ref> SARS-CoV की तरह, यह बीटा- CoV वंश बी का सदस्य है।<ref>{{Cite web|url=https://nextstrain.org/groups/blab/sars-like-cov|title=Phylogeny of SARS-like betacoronaviruses|website=nextstrain|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120190511/https://nextstrain.org/groups/blab/sars-like-cov|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=18 जनवरी 2020}}</ref> कोरोना वायरस (सीओवी) परिवार Coronaviridae और ऑर्डर Nidovirales में उप-परिवार ऑर्थोकोरोनवीरिनाइ से संबंधित हैं। सीओवी में एक लिफाफा, मुकुट जैसा वायरल कण होता है जिससे उनका नाम रखा गया था। सीओवी जीनोम एक पॉजिटिव सेंस एकल-स्ट्रैंड आरएनए (+ ssआरएनए), आकार में 27-32 केबी, जो सभी आरएनए वायरस जीनोम में दूसरा सबसे बड़ा है।<ref>Yi Fan 1,2 , Kai Zhao 1,2, Zheng-Li Shi 1,2 and Peng Zhou 1,2,* [https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC6466186/pdf/viruses-11-00210.pdf "Bat Coronaviruses in China"], 1 CAS Key Laboratory of Special Pathogens and Biosafety, Wuhan Institute of Virology, Chinese Academy of Sciences, Wuhan 430071, China; 2 University of Chinese Academy of Sciences, Beijing 100049, China © 2019 by the authors. Licensee MDPI, Basel, Switzerland.</ref> == निदान == 15 जनवरी 2020 को, WHO ने कोविड 19 (COVID-19) के परीक्षण के लिए एक प्रोटोकॉल प्रकाशित किया।<ref name="Schirring16Jan2020">{{Cite web|url=http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/japan-has-1st-novel-coronavirus-case-china-reports-another-death|title=Japan has 1st novel coronavirus case; China reports another death|last=Schirring|first=Lisa|last2=2020|date=16 जनवरी 2020|website=CIDRAP|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120043657/http://www.cidrap.umn.edu/news-perspective/2020/01/japan-has-1st-novel-coronavirus-case-china-reports-another-death|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=16 जनवरी 2020}}</ref> तब से, कई अन्य परीक्षण प्रोटोकॉल प्रस्तावित किए गए हैं, और डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रकाशित किए गए हैं।<ref name="WHO_InterimGuidance">{{Cite web|url=https://www.who.int/health-topics/coronavirus/laboratory-diagnostics-for-novel-coronavirus|title=Laboratory testing for 2019 novel coronavirus (2019-nCoV) in suspected human cases: Interim guidance|website=[[World Health Organization]] (WHO)|archive-url=https://web.archive.org/web/20200120175355/https://www.who.int/health-topics/coronavirus/laboratory-diagnostics-for-novel-coronavirus|archive-date=20 जनवरी 2020|access-date=28 जनवरी 2020}}</ref> परीक्षण वास्तविक समय रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन-पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (rRT-PCR) का उपयोग करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/summary.html|title=2019 Novel Coronavirus (2019-nCoV) Situation Summary|date=31 जनवरी 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126210549/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-nCoV/summary.html|archive-date=26 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> परीक्षण श्वसन या रक्त के नमूनों के आधार पर किया जा सकता है।<ref name="20200129cdc">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/lab/rt-pcr-detection-instructions.html|title=Real-Time RT-PCR Panel for Detection 2019-nCoV|date=29 जनवरी 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130202031/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/lab/rt-pcr-detection-instructions.html|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> परिणाम आम तौर पर कुछ घंटों से दिनों के भीतर प्राप्त होते हैं।<ref name="20200130businessinsider">{{Cite web|url=https://www.businessinsider.com/how-to-know-if-you-have-the-coronavirus-pcr-test-2020-1|title=There's only one way to know if you have the coronavirus, and it involves machines full of spit and mucus|last=Brueck|first=Hilary|date=30 जनवरी 2020|website=Business Insider|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201034232/https://www.businessinsider.com/how-to-know-if-you-have-the-coronavirus-pcr-test-2020-1|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name="globenewswire1977226">{{Cite web|url=https://www.globenewswire.com/news-release/2020/01/30/1977226/0/en/Curetis-Group-Company-Ares-Genetics-and-BGI-Group-Collaborate-to-Offer-Next-Generation-Sequencing-and-PCR-based-Coronavirus-2019-nCoV-Testing-in-Europe.html|title=Curetis Group Company Ares Genetics and BGI Group Collaborate to Offer Next-Generation Sequencing and PCR-based Coronavirus (2019-nCoV) Testing in Europe|date=30 जनवरी 2020|website=GlobeNewswire News Room|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131201626/https://www.globenewswire.com/news-release/2020/01/30/1977226/0/en/Curetis-Group-Company-Ares-Genetics-and-BGI-Group-Collaborate-to-Offer-Next-Generation-Sequencing-and-PCR-based-Coronavirus-2019-nCoV-Testing-in-Europe.html|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=dead}}</ref> == रोक-थाम == [[File:A doctor wearing special protective suit for the Wuhan coronavirus outbreak treat patient in Hubei TCM Hospital, Wuhan.jpg|thumb|वुहान अस्पताल में बन्नी सूट पहने हुए डॉक्टर मरीज को देखते हुए|पाठ=]] भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना वायरस से बचने के उपायो में 22 -मार्च के दिन संकल्प और संयम के रूप में जनता कर्फ्यू की अपील देशवासियों से की। === कोरोना वायरस से बचाव व उपाय === आधिकारिक सलाह में आम तौर पर अच्छी व्यक्तिगत स्वच्छता और नियमित रूप से हाथ धोने के लिए कहने तक सीमित है। जो लोग खुद को संक्रमित होने का संदेह करते हैं, उन्हें सर्जिकल मास्क पहनने और चिकित्सा सलाह के लिए डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा जाता है।<ref name=":7">{{Cite web|url=https://www.chp.gov.hk/en/features/102465.html|title=Centre for Health Protection, Department of Health – Severe Respiratory Disease associated with a Novel Infectious Agent|publisher=Government of Hong Kong|access-date=1 February 2020|archive-url=https://archive.today/20200122162628/https://www.chp.gov.hk/en/features/102465.html|archive-date=22 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name=":8">{{Cite web|url=https://www.moh.gov.sg/2019-ncov-wuhan|title=Updates on Wuhan Coronavirus (2019-nCoV) Local Situation|website=moh.gov.sg|access-date=1 February 2020|archive-date=12 जुलाई 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200712180651/https://www.moh.gov.sg/covid-19|url-status=dead}}</ref> बहुत सारे देशों ने या तो मुख्यभूमि चीन, हुबेई प्रांत, या सिर्फ वुहान की यात्रा के खिलाफ चेतावनी जारी की है।<ref name=":6">{{Cite web|url=https://www.usatoday.com/story/travel/news/2020/01/24/coronavirus-outbreak-leads-state-department-issue-level-4-advisory/4562349002/|title=Coronavirus: US says 'do not travel' to Wuhan, China, as airlines issue waivers, add safeguards|last=Gilbertson|first=Jayme Deerwester and Dawn|website=USA TODAY-US|archive-url=https://web.archive.org/web/20200127063342/https://www.usatoday.com/story/travel/news/2020/01/24/coronavirus-outbreak-leads-state-department-issue-level-4-advisory/4562349002/|archive-date=27 जनवरी 2020|access-date=26 जनवरी 2020}}</ref> जनता ने अक्सर बहुत अधिक सावधानी बरती है जो स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा सलाह के मुताबिक। हांगकांग,<ref name="scmp3048492">{{Cite web|url=https://www.scmp.com/news/hong-kong/law-and-crime/article/3048492/residents-clamour-surgical-masks-coronavirus-hit-hong|title=As Hongkongers clamour for surgical masks, 25,000 stolen from warehouse|date=31 जनवरी 2020|website=South China Morning Post|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131165631/https://www.scmp.com/news/hong-kong/law-and-crime/article/3048492/residents-clamour-surgical-masks-coronavirus-hit-hong|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> जापान,<ref>{{Cite news|url=https://www.japantimes.co.jp/news/2020/01/31/national/coronavirus-japan-surgical-masks/|title=Amid virus outbreak, Japan stores scramble to meet demand for face masks|last=Takahashi|first=Ryusei|work=Japan Times|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201141824/https://www.japantimes.co.jp/news/2020/01/31/national/coronavirus-japan-surgical-masks/|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> सिंगापुर<ref name="20200131straitstimes">{{Cite web|url=https://www.straitstimes.com/askst/wuhan-virus-who-needs-to-wear-a-mask-and-whats-the-proper-way-to-wear-it|title=Wuhan virus: Who needs to wear a mask and what's the proper way to wear it?|last=munsan|date=31 जनवरी 2020|website=The Straits Times|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131142013/https://www.straitstimes.com/askst/wuhan-virus-who-needs-to-wear-a-mask-and-whats-the-proper-way-to-wear-it|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.businessinsider.sg/photos-and-videos-show-insane-queues-for-masks-in-singapore-shanghai-and-hong-kong-which-netizens-say-are-all-sold-out/|title=These 12 Twitter posts show the insane queues for masks in Singapore, Shanghai and Hong Kong, which are all sold out, Business Insider – Business Insider Singapore|last=Chia|first=Rachel Genevieve|website=businessinsider.sg|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201071228/https://www.businessinsider.sg/photos-and-videos-show-insane-queues-for-masks-in-singapore-shanghai-and-hong-kong-which-netizens-say-are-all-sold-out/|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=dead}}</ref> और मलेशिया<ref name="nst561250">{{Cite news|url=https://www.nst.com.my/news/nation/2020/01/561250/demand-face-masks-hand-sanitisers-soars|title=Demand for face masks, hand sanitisers soars|last=Harun|first=Hana Naz|date=31 जनवरी 2020|work=New Straits Times|access-date=1 February 2020|last2=Teh|first2=Athira Yusof|last3=Solhi|first3=Farah|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131070136/https://www.nst.com.my/news/nation/2020/01/561250/demand-face-masks-hand-sanitisers-soars|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> में स्वस्थ लोगों द्वारा सर्जिकल मास्क का व्यापार रूप से उपयोग किया जा रहा है। लोग उत्पादों को खरीद रहे हैं जैसे सेनेटरी, हैंड सैनिटाइज़र और डिसइंफेक्टेंट जिससे लोग अपने हाथों और कपड़ों को साफ़ रखना चाहते हैं।<ref name="inkstonenews3047995">{{Cite web|url=https://www.inkstonenews.com/opinion/china-coronavirus-face-masks-and-trauma-sars/article/3047995|title=No need to wear masks in Canada, but consider this before you mock people who do|website=Inkstone|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201071228/https://www.inkstonenews.com/opinion/china-coronavirus-face-masks-and-trauma-sars/article/3047995|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.msn.com/g00/en-sg/news/other/china-coronavirus-shelves-cleared-of-essentials-as-spread-sparks-hong-kong-panic-buying/ar-BBZruQE?i10c.ua=2&i10c.encReferrer=aHR0cHM6Ly93d3cuYmluZy5jb20v&i10c.dv=19|title=China coronavirus: shelves cleared of essentials as spread sparks Hong Kong panic buying|publisher=MSN|access-date=1 February 2020}}{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> इसके अतिरिक्त लोग मुख्यभूमि चीनी लोगों के संपर्क से बच रहे हैं यहां तक के बहुत दूर संयुक्त राज्य अमेरिका तक।<ref>{{Cite web|url=https://www.businessinsider.com/asian-students-asu-claim-different-treatment-because-of-wuhan-virus-2020-1|title='It's hysteria': Asian students at Arizona State University say they're being treated differently after a case of the Wuhan coronavirus was confirmed there|last=Pietsch|first=Bryan|website=Business Insider|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200201042204/https://www.businessinsider.com/asian-students-asu-claim-different-treatment-because-of-wuhan-virus-2020-1|archive-date=1 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> जापानी लोगों को सर्जिकल मास्क पहनने और उन क्षेत्रों में वायु कीटाणुनाशक दवाओं के साथ खुद को स्प्रे करने की सूचना मिली है जहां विदेशी लोग अधिक रहते हैं।<ref>{{Citation|title=Global demand for surgical masks and hand sanitisers soars amid coronavirus fears|url=https://www.youtube.com/watch?v=e3QoO42lZGo|access-date=1 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131095714/https://www.youtube.com/watch?v=e3QoO42lZGo|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> कोरोना वायरस सतहों पर कुछ घंटों के लिए जीवित रहते हैं, दिनों तक नहीं, इसलिए किसी संक्रमित व्यक्ति द्वारा भेजे गए मेल या पैकेज को स्वीकार करने में कोई जोखिम नहीं है।<ref name="what-is-a-coronavirus">{{Cite web|url=https://www.livescience.com/what-are-coronaviruses.html|title=What is a coronavirus?|publisher=livescience|access-date=8 February 2020|url-status=live}}</ref> सतहों से वायरस को हटाने के लिए [[क्लोरीन]]<nowiki/>-आधारित कीटाणुनाशक, 75% [[इथेनॉल]], पेरासिटिक एसिड और क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल कर हटा सकते हैं।<ref name="WHO2020Myth">{{cite web|url=https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public/myth-busters|title=Myth busters|website=www.who.int|language=en|accessdate=8 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206055829/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public/myth-busters|archive-date=6 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> [[तिल]] का तेल प्रभावी नहीं है।<ref name="WHO2020Myth" /> सीताराम पोसवाल, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के युवा नेता और समाजिक कार्यकर्ता, [[राजस्थान]] में विशेष रूप से निर्धन समुदायों में COVID-19 सुरक्षा उपायों और टीकाकरण अभियान को बढ़ावा देने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने गांवों और झुग्गी-झोपड़ियों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर महत्वपूर्ण योगदान दिया है।<ref>{{Cite web|url=https://www.dailypioneer.com/2021/state-editions/pg-foundation-launches-vax-awareness-drive.html|title=PG Foundation launches vax awareness drive|last=Pioneer|first=The|website=The Pioneer|language=en|access-date=2025-02-06}}</ref> इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कुत्ते और बिल्ली जैसे पालतू जानवर संक्रमित हो सकते हैं।<ref name="WHO2020Myth" /> हांगकांग की सरकार ने शहर के बाहर यात्रा करने वालों को चेतावनी दी है कि जानवरों को नहीं छुएं, शिकार किया गया मांस नहीं खाएं; और गीले बाजारों, लाइव पोल्ट्री बाजारों और खेतों पर जाने से बचने के लिए कहा गया है।<ref name=":72">{{Cite web|url=https://www.chp.gov.hk/en/features/102465.html|title=Centre for Health Protection, Department of Health – Severe Respiratory Disease associated with a Novel Infectious Agent|publisher=Government of Hong Kong|access-date=1 February 2020|archive-url=https://archive.today/20200122162628/https://www.chp.gov.hk/en/features/102465.html|archive-date=22 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> === हाथ धोना === 2019-nCoV के प्रसार को रोकने के लिए हाथ धोने की सिफारिश की जाती है। सीडीसी व्यक्तियों को सिफारिश करता है; * "कम से कम 20 सेकंड के लिए साबुन और पानी से हाथ धोएं, खासकर बाथरूम जाने के बाद; खाने से पहले; और अपनी नाक बहने के बाद, खाँसने, या छींकने के बाद अक्सर।" * "यदि साबुन और पानी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, तो अल्कोहल-आधारित हैंड सैनिटाइज़र का उपयोग करें जिसमें कम से कम 60% अल्कोहल हो। यदि हाथ स्पष्ट रूप से गंदे हैं तो साबुन और पानी से हमेशा हाथ धोएं।" सीडीसी, एनएचएस, और [[विश्व स्वास्थ्य संगठन|डब्ल्यूएचओ]] भी व्यक्तियों को सलाह देते हैं कि वे बिना धोये हुए हाथों से आंखों, नाक या मुंह को छूने से बचें।<ref name="cdc21Jan2020">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/about/prevention.html|title=Prevention and Treatment|date=9 August 2019|publisher=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|archive-url=https://web.archive.org/web/20191215193934/https://www.cdc.gov/coronavirus/about/prevention.html|archive-date=15 December 2019|access-date=21 January 2020|url-status=live}}</ref><ref name="WHO-advice">{{Cite web|url=https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|title=Advice for public|website=www.who.int|access-date=2020-02-08|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126025750/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|archive-date=26 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name=":3">{{Cite web|url=https://www.gov.uk/government/news/coronavirus-public-information-campaign-launched-across-the-uk|title=Coronavirus public information campaign launched across the UK|website=GOV.UK|language=en|access-date=2020-02-08|archive-url=https://web.archive.org/web/20200203215917/https://www.gov.uk/government/news/coronavirus-public-information-campaign-launched-across-the-uk|archive-date=3 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> === श्वसन स्वच्छता === जिन लोगों को संदेह है कि वे संक्रमित हैं, उन्हें सर्जिकल मास्क पहनना चाहिए (विशेषकर सार्वजनिक स्थानों पर) और चिकित्सकीय सलाह के लिए [[डॉक्टर]] से मिलना चाहिए।<ref name=":72" /><ref name=":82">{{Cite web|url=https://www.moh.gov.sg/2019-ncov-wuhan|title=Updates on Wuhan Coronavirus (2019-nCoV) Local Situation|website=moh.gov.sg|access-date=1 February 2020|archive-date=12 जुलाई 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200712180651/https://www.moh.gov.sg/covid-19|url-status=dead}}</ref><ref name="who-mask-advices">{{Cite web|url=https://www.who.int/publications-detail/advice-on-the-use-of-masks-the-community-during-home-care-and-in-health-care-settings-in-the-context-of-the-novel-coronavirus-(2019-ncov)-outbreak|title=Advice on the use of masks the community, during home care and in health care settings in the context of the novel coronavirus (2019-nCoV) outbreak|website=who.int|access-date=4 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200204131342/https://www.who.int/publications-detail/advice-on-the-use-of-masks-the-community-during-home-care-and-in-health-care-settings-in-the-context-of-the-novel-coronavirus-(2019-ncov)-outbreak|archive-date=4 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> बात करते समय या छींकने और खांसते समय फैलने वाली बूंदों की मात्रा को सीमित करने के लिए मास्क पहन कर संक्रमण के संचरण को कम करने में सहायता प्रदान कर सकते हैं।<ref name="nCoV: What the Public Should Do">{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/what-you-should-do.html|title=2019-nCoV: What the Public Should Do|date=4 February 2020|website=U.S. [[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=5 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200205084825/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/what-you-should-do.html|archive-date=5 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> यदि मास्क उपलब्ध नहीं हो, तो श्वसन लक्षणों का अनुभव करने वाले किसी व्यक्ति को खांसी या छींक को एक टिश्यू से ढंकना चाहिए, और टिश्यू को तुरंत कूड़ेदान में फ़ेंक दें, और अपने हाथों को धो लें। यदि कोई टिश्यू अनुपलब्ध हो, तो व्यक्ति को कोहनी से अपना मुंह या नाक ढंकना चाहिए।<ref name="WHO-advice" /> बीमारों की देखभाल करने वालों को भी मास्क लगाने की सलाह दी जाती है।<ref name=":3" /> नाक रगड़ना, माउथवॉश से गरारा करना और लहसुन खाने से इस बीमारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैं।<ref name="WHO2020Myth" /> यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि मास्क असंक्रमित व्यक्तियों की रक्षा करते हैं और उन्हें पहनने से सुरक्षा की झूठी भावना पैदा हो सकती है।<ref name="who-mask-advices" /> सर्जिकल मास्क का व्यापक रूप में हांगकांग, जापान, सिंगापुर और मलेशिया में स्वस्थ लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है।<ref name="nst5612502">{{Cite news|url=https://www.nst.com.my/news/nation/2020/01/561250/demand-face-masks-hand-sanitisers-soars|title=Demand for face masks, hand sanitisers soars|last=Harun|first=Hana Naz|date=31 January 2020|work=New Straits Times|access-date=1 February 2020|last2=Teh|first2=Athira Yusof|last3=Solhi|first3=Farah|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131070136/https://www.nst.com.my/news/nation/2020/01/561250/demand-face-masks-hand-sanitisers-soars|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> सीडीसी द्वारा सर्जिकल मास्क की सिफारिश अमेरिकी आम जनता के लिए निवारक उपाय के रूप में नहीं किया गया है।<ref name="nCoV: What the Public Should Do" /> [[विश्व स्वास्थ्य संगठन|WHO]] मास्क उपयोग के लिए निम्नलिखित सर्वोत्तम तरीकों की सलाह देता है: * चेहरे और नाक को ढंकने के लिए मास्क को सावधानी से लगाएं और चेहरे और मास्क के बीच किसी भी अंतराल को कम करने के लिए सुरक्षित रूप से टाई करें; उपयोग करते समय, मास्क को छूने से बचें; * उपयुक्त तकनीक का उपयोग करके मुखौटा निकालें (यानी सामने से न छूएं लेकिन पीछे से फीता हटा दें); * मास्क के हटाने के बाद या जब भी आप अनजाने में इस्तेमाल किए गए मास्क को छूते हैं, तो अल्कोहल-आधारित हैंड सैनिटॉयज़र या साबुन और पानी (उबला हुआ) से हाथों को साफ करें। * जैसे ही मास्क नम हो जाते हैं, मास्क को बदल कर नए साफ, सूखे मास्क लगायें; * एकल-उपयोग मास्क का फिर से उपयोग न करें; प्रत्येक उपयोग के बाद एकल-उपयोग मास्क को हटा दें 2019-nCoV होने के संदेह वाले रोगियों के साथ सीधे बातचीत करने वाले हेल्थकेयर पेशेवरों को सलाह दी जाती है कि वे कम से कम NIOSH प्रमाणित N95, EU मानक FFP2 या समकक्ष के रूप में अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के अलावा श्वासयंत्र का भी उपयोग करें।<ref name="who-mask-advices" /><ref>{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/hcp/infection-control.html|title=Infection Control: Novel Coronavirus 2019 (2019-nCoV)|date=6 February 2020|website=U.S. [[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=8 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200208133610/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-nCoV/hcp/infection-control.html|archive-date=8 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> ===संगरोध (क्वारंटाइन) === वायरस के प्रसार को रोकने के लिए 23 जनवरी 2020 को वुहान से बाहर और [[क्वारंटीन|अन्दर आने-जाने पर प्रतिबन्ध]] लगा दिया गया. उड़ानें, ट्रेनें, सार्वजनिक बसें, मेट्रो प्रणाली और लंबी दूरी के ट्रेनों को अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दिए गया। बड़े पैमाने पर एकत्रीकरण और समूह में पर्यटन को भी निलंबित कर दिया गया है<ref name="channelnewsasia12306684">{{Cite news|url=https://www.channelnewsasia.com/news/asia/wuhan-virus-quarantine-city-flights-trains-china-12306684|title=China halts flights and trains out of Wuhan as WHO extends talks|date=23 January 2020|access-date=23 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200123054228/https://www.channelnewsasia.com/news/asia/wuhan-virus-quarantine-city-flights-trains-china-12306684|archive-date=23 January 2020|publisher=Channel NewsAsia|url-status=live}}</ref>। 24 जनवरी 2020 तक, वुहान सहित हुबेई के कुल 15 शहरों को भी इसी तरह के क्वारंटाइन के तहत रखा गया है।<ref name=":02">{{Cite web|url=https://www.dw.com/zh/%E6%AD%A6%E6%B1%89%E8%82%BA%E7%82%8E%E7%97%85%E6%AF%92%E6%8C%81%E7%BB%AD%E6%89%A9%E6%95%A3-%E6%B9%96%E5%8C%97%E4%B8%8B%E4%BB%A4%E5%B0%8115%E4%B8%AA%E5%9F%8E%E5%B8%82/a-52132769|title=Archived copy|date=24 January 2020|publisher=Deutsche Welle|location=Germany|language=zh-hans|script-title=zh:武汉肺炎病毒持续扩散 湖北下令封15个城市|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124234427/https://www.dw.com/zh/%E6%AD%A6%E6%B1%89%E8%82%BA%E7%82%8E%E7%97%85%E6%AF%92%E6%8C%81%E7%BB%AD%E6%89%A9%E6%95%A3-%E6%B9%96%E5%8C%97%E4%B8%8B%E4%BB%A4%E5%B0%8115%E4%B8%AA%E5%9F%8E%E5%B8%82/a-52132769|archive-date=24 January 2020|access-date=25 January 2020|url-status=live}}</ref> 27 और 28 जनवरी 2020 को, पहले अपने हवाई अड्डे और इंटरसिटी बस को बंद करने के बाद, [[शिंजियांग]] ने क्रमशः अपने रेलवे स्टेशनों को बंद कर दिया और सभी नौका परिचालन को निलंबित कर दिया। क्वारंटाइन शुरू होने से पहले, वुहान में कुछ लोगों ने चीनी सरकार के आंकड़ों के साथ-साथ सरकार की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाया,<ref name="bbc51205074">{{Cite news|url=https://www.bbc.co.uk/news/world-asia-china-51205074|title=Chinese social media users worry over virus|last=Coleman|first=Alistair|date=22 January 2020|publisher=[[BBC News Online]]|last2=Allen|first2=Kerry}}</ref> और एक वेइबो पोस्ट में बीमार लोगों और तीन शवों को फर्श पर सफेद चादर में ढके हुए दिखाया गया जिसको बाद में चीनी सरकार ने हटा दिया।<ref name="20200128nytimes">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2020/01/28/business/china-coronavirus-communist-party.html|title=Coronavirus Crisis Exposes Cracks in China's Facade of Unity|date=28 January 2020|work=[[दि न्यू यॉर्क टाइम्स|The New York Times]]|access-date=30 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200129015445/https://www.nytimes.com/2020/01/28/business/china-coronavirus-communist-party.html|archive-date=29 January 2020|url-status=live}}</ref><ref name="20200126telegraph">{{Cite news|url=https://www.telegraph.co.uk/news/2020/01/24/coronavirus-fears-rise-chinese-cover-up-40-million-lockdown/|title=Coronavirus: Fears rise of Chinese cover-up as 56 million in lockdown and hospitals overwhelmed|last=Smith|first=Nicola|date=26 January 2020|work=The Telegraph|last2=Newey|first2=Sarah}}</ref> क्वारंटाइन के कारण, वुहान निवासी आवश्यक सामान, भोजन और ईंधन का भंडारण करने लगे; जिससे कीमतें काफी बढ़ गईं।<ref>{{Cite news|url=https://www.businessinsider.com/wuhan-china-coronoavirus-city-sealed-cut-off-stockpile-food-2020-1|title=Residents left in Wuhan – which China quarantined to stop the coronavirus – are desperately stockpiling food and fuel, leaving empty shelves and prices skyrocketing|last=Baker|first=Sinéad|access-date=24 January 2020|website=Business Insider}}</ref><ref name="20200123reuters">{{Cite news|url=https://www.reuters.com/article/us-china-health-wuhan-idUSKBN1ZM0JT|title=Residents of China's Wuhan rush to stock up as transport links severed|date=23 January 2020|access-date=24 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124223111/https://www.reuters.com/article/us-china-health-wuhan-idUSKBN1ZM0JT|archive-date=24 January 2020|agency=Reuters|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_5609817|website=澎湃新闻-The Paper|language=Chinese|script-title=zh:武汉一线|trans-title=Wuhan First-line: Rising vegetable prices, napa cabbages 35 CNY each|archive-url=https://web.archive.org/web/20200123101757/https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_5609817|archive-date=23 January 2020|access-date=23 January 2020}}</ref> मेडिकल स्टाफ को अपने अस्पतालों में आने जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे अब पैदल और निजी कारों के इस्तेमाल तक ही सीमित थे।<ref name=":22">{{Cite news|url=https://news.sina.com.cn/c/2020-01-23/doc-iihnzhha4295556.shtml|date=23 January 2020|work=Global Times|access-date=23 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200123102125/https://news.sina.com.cn/c/2020-01-23/doc-iihnzhha4295556.shtml|archive-date=23 January 2020|language=Chinese|script-title=zh:武汉公共交通暂停运营 医护人员反映出行遇到困难|trans-title=Medical staff complain about commuting troubles as Wuhan halts its public transit}}</ref> टैक्सियों और निजी-किराए के वाहनों को गंतव्य स्थान की जानकारी देने पर जाने से मना कर देते हैं।<ref name=":22" /> शहर में 9,000,000 ही बचे हैं जबकि 5,000,000 लोगों ने वुहान छोड़ दिया।<ref name="abc11902378">{{Cite news|url=https://www.abc.net.au/news/2020-01-27/coronavirus-strengthening-spread-infectious-during-incubation/11902378|title=China warns coronavirus strengthening as Lunar New Year holiday extended three more days to discourage travel|date=27 January 2020|work=ABC News|access-date=27 January 2020|publisher=[[Australian Broadcasting Corporation]]}}</ref> [[बीजिंग]] और कई अन्य प्रमुख शहरों जैसे हांग्जो, [[ग्वांगझोउ|ग्वांगझू]], [[शंघाई]] और [[शेन्झेन|शेन्ज़ेन]] के स्थानीय अधिकारियों ने 26 जनवरी को घोषणा की, कि ये शहर [[हूबेई|हुबेई]] प्रांत के समान लॉकडाउन नहीं लगाएंगे। इन आधिकारिक घोषणाओं से पहले संभावित लॉकडाउन की अफवाहें व्यापक रूप से फैल गई।<ref name="bjnews680010">{{Cite news|url=http://www.bjnews.com.cn/news/2020/01/27/680010.html|last=Ying|first=Rui|date=27 January 2020|work=The Beijing News|access-date=26 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126174754/http://www.bjnews.com.cn/news/2020/01/27/680010.html|archive-date=26 January 2020|language=Chinese|script-title=zh:北京、深圳、广州、南京,这些城市官宣"不封城"|trans-title=Beijing, Shenzhen, Guangzhou, Nanjing – these cities officially announced they "will not lock down"|url-status=live}}</ref> [[बीजिंग]] के नगर परिवहन आयोग के एक प्रवक्ता ने दावा किया कि एक्सप्रेसवे और [[राजमार्ग]], साथ ही सबवे और बसें सामान्य रूप से चल रही हैं। निवासियों की दहशत को कम करने के लिए, हांग्जो शहर के प्रशासन ने जोर देकर कहा कि शहर को बाहरी दुनिया से बंद नहीं किया जाएगा, और दोनों शहरों ने कहा कि वे संभावित जोखिमों के खिलाफ सावधानी बरतेंगे।<ref name="chinadaily310128217273520">{{Cite news|url=https://www.chinadaily.com.cn/a/202001/26/WS5e2d598ea310128217273520.html|title=Authorities say no imminent lockdown of Beijing|last=Ma|first=Zhenhuan|date=26 January 2020|access-date=26 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126184741/https://www.chinadaily.com.cn/a/202001/26/WS5e2d598ea310128217273520.html|archive-date=26 January 2020|publisher=China daily|location=People's Republic of China|url-status=live}}</ref> 2 फरवरी 2020 को, [[झेजियांग]] प्रांत के वानजाउ शहर ने 54 राजमार्ग चेकपॉइंट में से 46 को बंद करते हुए आंशिक लॉकडाउन लागू किया।<ref name="20200202wenzhou">{{Cite web|url=http://www.wenzhou.gov.cn/art/2020/2/2/art_1219304_41867473.html|date=2 February 2020|publisher=Wenzhou People's Government|language=zh-cn|script-title=zh:温州市新型冠状病毒感染的肺炎疫情防控工作领导小组通告(第7号)|access-date=3 February 2020|title=संग्रहीत प्रति|archive-url=https://web.archive.org/web/20200202062902/http://www.wenzhou.gov.cn/art/2020/2/2/art_1219304_41867473.html|archive-date=2 फ़रवरी 2020|url-status=dead}}</ref> 4 फरवरी 2020 को, झेजियांग प्रांत के दो और शहरों ने निवासियों के आवागमन को प्रतिबंधित कर दिया। शहर के अधिकारियों ने कहा कि Taizhou शहर, तीन हांग्जो जिले, और Ningbo में हर दो दिन में एक परिवार से एक व्यक्ति को घर से बाहर जाने की अनुमति दी। नए प्रतिबंधों से 12 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।<ref name="ChannelNewsAsia">{{Cite news|url=https://www.channelnewsasia.com/news/asia/hangzhou-and-taizhou-cities-far-from-virus-epicentre-implement-12388714|title=Hangzhou and Taizhou, cities far from virus epicentre, implement travel restrictions|work=Channel News Asia|access-date=4 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200204205033/https://www.channelnewsasia.com/news/asia/hangzhou-and-taizhou-cities-far-from-virus-epicentre-implement-12388714|archive-date=4 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> 6 फरवरी 2020 तक, कुल चार झेजियांग शहर - वानजाउ, हांग्जो, निंगबो और Taizhou - "पासपोर्ट" प्रणाली के तहत चल रहे थे, इसके तहत प्रति परिवार केवल एक व्यक्ति को हर दो दिन में अपना घर छोड़ने की अनुमति होती है। ये प्रतिबंध 30 मिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित करेंगे<ref>{{Cite web|url=https://www.scmp.com/news/china/society/article/3049298/coronavirus-zhejiang-adopts-draconian-quarantine-measures-fight|title=Zhejiang province next to Shanghai adopts draconian quarantine measures|date=6 February 2020|website=South China Morning Post|language=en|access-date=8 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206112642/https://www.scmp.com/news/china/society/article/3049298/coronavirus-zhejiang-adopts-draconian-quarantine-measures-fight|archive-date=6 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref>। मुख्यभूमि चीन के बाहर, कुछ क्रूज जहाजों के यात्रियों में 2019-nCoV के लक्षण या सकारात्मक परीक्षण के बाद पुरे क्रूज को क्वारंटाइन कर दिया गया है। 30 जनवरी को इटली के Civitavecchia में कोस्टा Smeralda को क्वारंटाइन किया गया था, जब यात्रियों में फ्लू जैसे लक्षण विकसित होने लगे, बाद में वायरस के परीक्षण के नकारात्मक होने पर क्वारंटाइन को हटा दिया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://www.cnn.com/2020/01/30/asia/wuhan-coronavirus-update-china-spread-intl-hnk/index.html|title=7,000 held on cruise ship in Italy as global fears spread over coronavirus|last1=Griffiths|first1=James|last2=Dewan|first2=Angela|website=CNN|access-date=30 January 2020|last3=Mezzofiore|first3=Gianluca|last4=Borghese|first4=Livia|last5=Kottasová|first5=Ivana|archive-url=https://web.archive.org/web/20200130111950/https://www.cnn.com/2020/01/30/asia/wuhan-coronavirus-update-china-spread-intl-hnk/index.html|archive-date=30 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> <gallery mode="packed" heights="150"> File:Zone wise lockdown in new Bhopal 2.jpg|प्रकोप के कारण घोषित लॉकडाउन में [[भोपाल]] में आवाजाही हेतु अवरोधित मुख्य मार्ग चित्र:Citizens of Wuhan lining up outside of a drug store to buy masks during the Wuhan coronavirus outbreak.jpg|फेस मास्क और मेडिकल सामान खरीदने के लिए वुहान के एक फार्मेसी के बाहर कतार में लगे लोग चित्र:Wuhan citizens rush to buy vegetables during Wuhan coronavirus outbreak.jpg|प्रकोप के दौरान 23 जनवरी को वुहान के निवासी बाजार में सब्जियों और अन्य भोजन सामान खरीदते हुए चित्र:Last train of Wuhan metro before authorities lock down the city for the Wuhan coronavirus outbreak.jpg|वुहान निवासी 22 जनवरी को सुबह 10 बजे शहर के मेट्रो की आखिरी ट्रेन का इंतजार करते हुए </gallery> === विदेशी नागरिकों का निष्कासन === वुहान और हुबेई में सार्वजनिक परिवहन के प्रभावी लॉकडाउन के कारण, कई देशों ने अपने नागरिकों और राजनयिक कर्मचारियों को क्षेत्र से बाहर निकालने की योजना बनाई है, मुख्य रूप से घरेलू राष्ट्र की चार्टर्ड उड़ानों के माध्यम से जिन्हें चीनी अधिकारियों द्वारा मंजूरी प्रदान की गई है। जापान, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, जर्मनी और थाईलैंड अपने नागरिकों की निकासी की योजना बनाने वाले पहले देशों में से थे।<ref>{{Cite web|url=https://thediplomat.com/2020/01/countries-evaluate-evacuation-of-citizens-amid-wuhan-coronavirus-panic/|title=Countries Evaluate Evacuation of Citizens Amid Wuhan Coronavirus Panic|last=Press|first=Associated|website=thediplomat.com|access-date=31 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200128150819/https://thediplomat.com/2020/01/countries-evaluate-evacuation-of-citizens-amid-wuhan-coronavirus-panic/|archive-date=28 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/coronavirus-india-citizens-china-wuhan-air-india-second-flight-1642434-2020-02-01/|title=Coronavirus: Second plane carrying 323 Indians from Wuhan to reach Delhi today|last=Press|first=ANI|website=indiatoday.in|access-date=2 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200202040329/https://www.indiatoday.in/india/story/coronavirus-india-citizens-china-wuhan-air-india-second-flight-1642434-2020-02-01|archive-date=2 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.vrt.be/vrtnws/nl/2020/01/27/belgie-haalt-15-landgenoten-terug-uit-hubei-na-uitbraak-coronav/|title=België haalt landgenoten terug uit Chinese provincie Hubei na uitbraak coronavirus|last=NWS|first=VRT|date=27 January 2020|website=vrtnws.be|access-date=10 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131183430/https://www.vrt.be/vrtnws/nl/2020/01/27/belgie-haalt-15-landgenoten-terug-uit-hubei-na-uitbraak-coronav/|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://jakartaglobe.id/news/lastminute-preparations-underway-to-evacuate-indonesian-citizens-from-coronavirusravaged-wuhan|title=Last-Minute Preparations Underway to Evacuate Indonesian Citizens From Coronavirus-Ravaged Wuhan|last=Nathalia|first=Telly|date=30 January 2020|website=Jakarta Globe|access-date=10 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200602131446/https://jakartaglobe.id/news/lastminute-preparations-underway-to-evacuate-indonesian-citizens-from-coronavirusravaged-wuhan|archive-date=2 जून 2020|url-status=live}}</ref><ref name=":4">{{Cite web|url=https://www.bangkokpost.com/thailand/general/1844104/c130-aircraft-on-standby-for-wuhan-evacuation|title=C130 aircraft on standby for Wuhan evacuation|date=26 January 2020|website=Bangkok Post|access-date=26 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200602131448/https://www.bangkokpost.com/thailand/general/1844104/c130-aircraft-on-standby-for-wuhan-evacuation|archive-date=2 जून 2020|url-status=live}}</ref><ref name="20200125cnn">{{Cite news|url=https://www.cnn.com/2020/01/25/politics/coronavirus-us-evacuate-americans-china/index.html|title=US arranging charter flight to evacuate American diplomats and citizens out of China amid coronavirus outbreak, official says|last=Jiang|first=Steven|date=25 January 2020|access-date=27 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126100201/https://www.cnn.com/2020/01/25/politics/coronavirus-us-evacuate-americans-china/index.html|archive-date=26 January 2020|publisher=CNN|last2=Stracqualursi|first2=Veronica|url-status=live}}</ref><ref name="20200129tempo">{{Cite news|url=http://tempo.com.ph/2020/01/29/ph-sending-special-flights-to-get-pinoys-from-wuhan-hubei-in-china/|title=PH sending special flights to get Pinoys from Wuhan, Hubei in China|date=29 January 2020|work=Tempo|access-date=29 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200129121239/http://tempo.com.ph/2020/01/29/ph-sending-special-flights-to-get-pinoys-from-wuhan-hubei-in-china/|archive-date=29 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> पाकिस्तान ने कहा है कि वह चीन से किसी भी नागरिक को नहीं निकलेगा।<ref name="20200131dialoguepakistan">{{Cite web|url=https://www.dialoguepakistan.com/pakistan-cancels-flights-to-china-as-fears-of-coronavirus-spread/|title=Pakistan cancels flights to China as fears of coronavirus spread|date=31 January 2020|website=Dialogue Pakistan|access-date=31 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200131125705/https://www.dialoguepakistan.com/pakistan-cancels-flights-to-china-as-fears-of-coronavirus-spread/|archive-date=31 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> 7 फरवरी को, [[ब्राज़ील|ब्राजील]] ने 34 ब्राज़ीलियाई परिवार के सदस्यों के साथ 4 पोलिश, एक चीनी और एक भारतीय नागरिक को बाहर निकाला।<ref>{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/reuters/2020/02/09/world/americas/09reuters-china-health-brazil.html|title=Brazilians Evacuated From China amid coronavirus Land in Brazil|author=Leonardo Benassatto|date=9 February 2020|website=[[रॉयटर्स]]|access-date=9 February 2020}}</ref> ====दिल्ली (निज़ामुद्दीन) में [[तबलीग़ी जमात]] द्वारा आयोजित कार्यक्रम विवाद==== [[दिल्ली]] के [[निज़ामुद्दीन]] इलाक़े के मरक़ज़ में हुए तबलीग़ी जमात के कार्यक्रम <ref name="ThePrint Hindi 2020">{{cite web | title=निजामुद्दीन में तबलीग़ी जमात की अगुवाई करने वाले मौलाना साद के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने किया मामला दर्ज़ | website=ThePrint Hindi | date=३१ मार्च २०२०  | url=https://hindi.theprint.in/india/case-filed-against-maulana-saad-who-led-a-tabloid-group-in-delhi-nizamuddin/127169/ | language=हिन्दी भाषा | accessdate=०२ अप्रैल २०२०}}</ref>ने इस माहामारी को लेकर प्रशासन की चिंता बढ़ा दी, [[इंडोनेशिया]]और [[मलेशिया]] सहित कई देशों के २,०० से अधिक प्रतिनिधियों ने १ से १५ मार्च तक [[हज़रत निज़ामुद्दीन]] में तबलीग़ी जमात में भाग लिया, रविवार रात मार्कज़ में रहने वाले कई लोगों और अर्धसैनिक बलों के कोविड-१९ के लक्षण दिखाना शुरू कर दिया था, अधिकारियों ने पूरे को सील कर दिया था।<ref name=". 2020">{{cite web | last=. | first=. | title=तबलीग़ी जमात क्या है और कैसे करती है प्रचार-प्रसार? | website=BBC News हिंदी | date=१ अप्रैल २०२० | url=https://www.bbc.com/hindi/india-52116259 | language=हिन्दी भाषा | accessdate=०२ अप्रैल २०२०}}</ref> लेकिन अधिकारियों ने घटना के कारण वायरस फैलने की आशंका जताई।<ref name="ThePrint Hindi 2020"/> भारत के केंद्रीय मंत्री [[मुख्तार अब्बास नकवी]] ने निजामुद्दीन के तबलीग़ी जमात मरकज़ मामले पर कहा है कि उन्होंने एक अक्षम्य [[तालिबान आन्दोलन|'तालिबानी']] अपराध किया है।<ref name="https://bansalnews.com 2020">{{cite web | title=तबलीग़ी जमात मरकज़ ने तालिबानी काम किया: नक़वी | website=https://bansalnews.com | date=१ अप्रैल २०२० | url=https://bansalnews.com//badi-khabar/tablighi-jamaat-markaz-did-taliban-work-naqvi/438873-86.html | language=हिन्दी भाषा | accessdate=०२ अप्रैल २०२० | archive-date=9 अगस्त 2020 | archive-url=https://web.archive.org/web/20200809082341/https://bansalnews.com/badi-khabar/tablighi-jamaat-markaz-did-taliban-work-naqvi/438873-86.html | url-status=dead }}</ref> अस्पताल में नर्सों के सामने ही कपड़े उतारने के कारण छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।<ref name="Mishra 2020">{{cite web | last=Mishra | first=Nilesh | title=tablighi jamaat misbehaves: तबलीगी जमात के कोरोना संदिग्धों ने पार कीं जाहिलियत की हदें, नर्सों के सामने उतारे कपड़े | website=गाजियाबाद न्यूज़: गाजियाबाद के एक अस्पताल में ऐडमिट तबलीगी जमात के कोरोना संदिग्ध लगातार अश्लीलता और बदसूलकी कर रहे हैं।| language=हिन्दी भाषा | url=https://navbharattimes.indiatimes.com/state/uttar-pradesh/ghaziabad/person-related-to-tablighi-jamaat-who-are-admitted-in-ghaziabad-due-to-coronavirus-threat-are-regularly-misbehaving-with-hospital-staff/articleshow/74955410.cms?utm_source=exitpopup&utm_medium=referral&utm_campaign=story1 | accessdate= ०२ अप्रैल २०२०| date= ०२ अप्रैल २०२०}}</ref> == वैक्सीन हेतु अनुसंधान == दुनिया भर के कई संगठन [[टीका (वैक्सीन)|टीकों]] का विकास कर रहे हैं या ये कहे कि एंटीवायरल दवा का परीक्षण कर रहे हैं। चीन में, चीनी रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीसीडीसी) ने नावेल कोरोनवायरस के खिलाफ टीके विकसित करना शुरू कर दिया है और निमोनिया के लिए मौजूदा दवा की प्रभावशीलता का परीक्षण कर रहा है। <ref name="MacRaildETAL.">{{cite journal |title=Systematic Down-Selection of Repurposed Drug Candidates for COVID-19 |display-authors=etal|author1=MacRaild, C. |journal=International Journal of Molecular Sciences |year=2022 |volume=23 |issue=19 |pages=11851-11851| url=https://www.mdpi.com/1422-0067/23/19/11851/htm}}</ref> <ref name="xinhuanet138734908">{{Cite web|url=http://www.xinhuanet.com/english/2020-01/26/c_138734908.htm|title=China CDC developing novel coronavirus vaccine|date=26 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126201658/http://www.xinhuanet.com/english/2020-01/26/c_138734908.htm|archive-date=26 जनवरी 2020|access-date=26 January 2020|url-status=dead|agency=Xinhua News Agency}}</ref><ref name="scmp3047676">{{Cite web|url=https://www.scmp.com/news/china/society/article/3047676/number-coronavirus-cases-china-doubles-spread-rate-accelerates|title=Chinese scientists race to develop vaccine as coronavirus death toll jumps|date=26 January 2020|website=South China Morning Post|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126073453/https://www.scmp.com/news/china/society/article/3047676/number-coronavirus-cases-china-doubles-spread-rate-accelerates|archive-date=26 January 2020|access-date=26 January 2020|url-status=live}}</ref> साथ ही, हांगकांग विश्वविद्यालय की एक टीम ने घोषणा किया है कि एक नया टीका विकसित किया गया है, लेकिन मनुष्यों पर क्लीनिकल ​​परीक्षण करने से पहले जानवरों पर परीक्षण किए जाने की आवश्यकता है।<ref name="scmp3047956">{{Cite news|url=https://www.scmp.com/news/hong-kong/health-environment/article/3047956/china-coronavirus-hong-kong-researchers-have|title=Hong Kong researchers have developed coronavirus vaccine, expert reveals|last=Cheung|first=Elizabeth|date=28 January 2020|work=South China Morning Post|access-date=28 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200128154002/https://www.scmp.com/news/hong-kong/health-environment/article/3047956/china-coronavirus-hong-kong-researchers-have|archive-date=28 January 2020|url-status=live}}</ref> रूसी उपभोक्ता स्वास्थ्य वाचडॉग Rospotrebnadzor ने WHO की सिफारिशों को मानते हुए एक वैक्सीन का विकास शुरू किया।<ref name="20200122themoscowtimes">{{Cite web|url=https://www.themoscowtimes.com/2020/01/22/russian-tourists-undeterred-from-china-despite-coronavirus-outbreak-a69007|title=Russian Tourists Undeterred From China Despite Coronavirus Outbreak|date=22 January 2020|access-date=29 January 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200530032108/https://www.themoscowtimes.com/2020/01/22/russian-tourists-undeterred-from-china-despite-coronavirus-outbreak-a69007|archive-date=30 मई 2020|url-status=live}}</ref> पश्चिमी देशों में, [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] का राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) अप्रैल 2020 तक वैक्सीन के मानव परीक्षणों की उम्मीद कर रहा है, और कैम्ब्रिज-मैसाचुसेट्स आधारित मॉडेर्ना कंपनी CEPI के फंडिंग से mRNA टीका विकसित कर रहा है।<ref>{{Cite web|url=https://www.fiercepharma.com/vaccines/inovio-moderna-score-cepi-funding-for-vaccine-work-against-deadly-coronavirus|title=Inovio, Moderna score CEPI funding for vaccine work against deadly coronavirus|website=FiercePharma|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126172357/https://www.fiercepharma.com/vaccines/inovio-moderna-score-cepi-funding-for-vaccine-work-against-deadly-coronavirus|archive-date=26 January 2020|access-date=26 January 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.modernatx.com/pipeline/therapeutic-areas/infectious-diseases|title=Infectious Diseases|website=modernatx.com|archive-url=https://web.archive.org/web/20190705235708/https://www.modernatx.com/pipeline/therapeutic-areas/infectious-diseases|archive-date=5 July 2019|access-date=26 January 2020|url-status=live}}</ref> ==आवश्यक पहल== === भारत === [[उत्तर प्रदेश]] सरकार ने कोरोनावायरस की समस्या से बचाव के लिए आम जनता तक आवश्यक सामग्री पहुँचाने के उद्देश्य से '''टीम ११''' का गठन किया। [[असम]] में स्टेडियम में आइसोलेशन सेंटर बनाने की पहल की गई। ओडिशा के कलिंगा इस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ने राज्य सरकार के साथ मिलकर एक करार किया है, जिसके तहत राज्य में इस महामारी से जूझ रहे लोगों के लिए 1000 बिस्तरों वाला बड़ा अस्पताल तैयार किया जाएगा। ये अपनी तरह का इतना बड़ा पहला अस्पताल होगा, जिसमें सिर्फ कोरोना के मरीज़ों का इलाज किया जाएगा। === कोरोनावायरस के लक्षण === नए कोरोनोवायरस संक्रमण वाले लोगों में जोखिम के बाद लक्षण और लक्षण 2-14 हो सकते हैं:- * खांसी * सांस की तकलीफ या सांस लेने में कठिनाई * नए कोरोनोवायरस संक्रमण के लक्षणों की गंभीरता व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होती है, कुछ हल्के होते हैं, * कुछ गंभीर होते हैं और यहां तक ​​कि मृत्यु भी हो सकती है। इस बीमारी को गहराई से समझा जा सकता है, * लेकिन गंभीर रूप से बीमार रोगी बुजुर्ग हैं या अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। * यह स्थिति इन्फ्लूएंजा जैसी अन्य सांस की बीमारियों के गंभीर रूप से बीमार रोगियों के समान है। ==इन्हें भी देखें== * [[2019–20 में देश और क्षेत्र के अनुसार कोरोनावायरस का प्रकोप]] * [[2019 नोवेल कोरोनावायरस]] * [[स्पेनी फ्लू|स्पैनिश फ्लू]] * [[२०२० भारत में कोरोनावायरस महामारी]] * [[विश्वमारी]] * [[सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम|गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम]] (SARS) * [[कोविड-19 महामारी में अन्य संक्रमण]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|3}} ==बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20200126165753/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/situation-reports Novel Coronavirus (2019-nCoV) situation reports] at [[:en:WHO|WHO]] website, include official numbers of confirmed cases in countries of the world {{Commons category}} * https://hindimematlab.net/कोरोना-वायरस-की-दवा-मिली/ {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200621125247/https://hindimematlab.net/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80/ |date=21 जून 2020 }} भारत में कोरोना की दवाई मिली * [https://web.archive.org/web/20200129022858/https://medgic.co/virus/ Live global map of Wuhan novel coronavirus (2019-nCoV) spread using official Chinese sources] by [https://web.archive.org/web/20200131024121/https://medgic.co/ Medgic], updated daily * [https://archive.today/20200129000238/https://gisanddata.maps.arcgis.com/apps/opsdashboard/index.html%23/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6#/bda7594740fd40299423467b48e9ecf6 Interactive global map of Wuhan novel coronavirus (2019-nCoV) spread] and [https://docs.google.com/spreadsheets/d/1wQVypefm946ch4XDp37uZ-wartW4V7ILdg-qYiDXUHM/edit#gid=787605648 spreadsheet] by [[:en:Johns_Hopkins_University|Johns Hopkins University]], updated daily * [https://web.archive.org/web/20200404165422/https://www.viprbrc.org/brc/home.spg?decorator=corona_ncov 2019-nCoV Data Portal] – integrated data about the Wuhan novel coronavirus (2019-nCoV) in the [https://web.archive.org/web/20200404165424/https://www.viprbrc.org/brc/home.spg?decorator=vipr Virus Pathogen Resource]{{Wikisourcelang|id|Informasi Virus Korona Baru 2019 (CDC)|Information about 2019-nCoV}} * {{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/index.html|title=Coronavirus|date=February 2020|website=[[Centers for Disease Control and Prevention]] (CDC)|access-date=10 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200205214658/https://www.cdc.gov/coronavirus/index.html|archive-date=5 फ़रवरी 2020|url-status=live}} * [https://web.archive.org/web/20200206114625/https://www.ecdc.europa.eu/en/geographical-distribution-2019-ncov-cases Geographical distribution of 2019-nCov cases] by [[:en:European_Centre_for_Disease_Prevention_and_Control|European Centre for Disease Prevention and Control]] *{{Wiktionary|Wuhan pneumonia}}{{Cite web|url=https://www.who.int/news-room/detail/23-01-2020-statement-on-the-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|title=Statement on the meeting of the International Health Regulations (2005) Emergency Committee regarding the outbreak of novel coronavirus (2019-nCoV) on 23&nbsp;January 2020|website=[[World Health Organization]] (WHO)|access-date=24 जनवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200124003703/https://www.who.int/news-room/detail/23-01-2020-statement-on-the-meeting-of-the-international-health-regulations-(2005)-emergency-committee-regarding-the-outbreak-of-novel-coronavirus-(2019-ncov)|archive-date=24 जनवरी 2020|url-status=live}} *{{Cite journal|vauthors=Patel A, Jernigan DB, ((2019-nCoV CDC Response Team))|date=7 February 2020|title=Initial Public Health Response and Interim Clinical Guidance for the 2019 Novel Coronavirus Outbreak — United States, December 31, 2019–February 4, 2020|url=https://www.cdc.gov/mmwr/volumes/69/wr/pdfs/mm6905e1-H.pdf|journal=MMWR. Morbidity and Mortality Weekly Report|volume=69|issue=5|pages=140–146|doi=10.15585/mmwr.mm6905e1|issn=0149-2195|pmid=32027631|access-date=10 फ़रवरी 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206233229/https://www.cdc.gov/mmwr/volumes/69/wr/pdfs/mm6905e1-H.pdf|archive-date=6 फ़रवरी 2020|url-status=live}} [[श्रेणी:स्वास्थ्य आपदाएँ]] [[श्रेणी:कोरोनावायरस]] fcwm8nbqg0dzxiiop0cy79ktq780vfh कोरोनावायरस से सम्बंधित ग़लत जानकारी 0 1154964 6543758 6503083 2026-04-25T05:08:14Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543758 wikitext text/x-wiki [[चित्र:COVID-19_Confirmed_Cases_Animated_Map.webm|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|[[चीन]] में संक्रमण फैलने का चलित मानचित्र (animated map)। इसमें देखा जा सकता है कि यह बीमारी [[बीजिंग]] और [[शंघाई]] में भी फैली है, जबकि यह अफ़वाह फैलाई जा रही है कि इन क्षेत्रों में यह इसलिए नहीं फैला क्योंकि यह चीन की एक साज़िश है।]] [[कोरोनावायरस रोग 2019|कोरोनावायरस रोग 2019 (COVID-19)]] के प्रारंभिक [[2019–20 कोरोनावायरस महामारी|प्रकोप]] के बाद, कई अफ़वाहें (गलत सूचना और [[दुस्सूचना]]) फैली हैं, जिनका सम्बंध अक्सर रोग की उत्पत्ति, [[षड्यन्त्र का सिद्धान्त|विदेशी]] [[षड्यन्त्र का सिद्धान्त|षड्यन्त्रों]], रोग-उपचार रोकथाम, और रोग के अन्य पहलुओं से होता है।<ref name="bbc_misinfo">{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/blogs-trending-51271037|title=China coronavirus: Misinformation spreads online about origin and scale|date=January 30, 2020|work=BBC News|access-date=February 8, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200204163412/https://www.bbc.com/news/blogs-trending-51271037|archive-date=February 4, 2020}}</ref><ref name="GUAR">{{Cite news|url=https://www.theguardian.com/world/2020/jan/31/bat-soup-dodgy-cures-and-diseasology-the-spread-of-coronavirus-bunkum|title=Bat soup, dodgy cures and 'diseasology': the spread of coronavirus misinformation|last=Taylor|first=Josh|date=January 31, 2020|work=[[The Guardian]]|access-date=February 3, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200202141231/https://www.theguardian.com/world/2020/jan/31/bat-soup-dodgy-cures-and-diseasology-the-spread-of-coronavirus-bunkum|archive-date=February 2, 2020}}</ref><ref name="Lowy">{{Cite news|url=https://www.lowyinstitute.org/the-interpreter/disinformation-and-coronavirus|title=Disinformation and coronavirus|last=Natasha Kassam|date=March 25, 2020|work=The Interpreter|publisher=Lowy Institute|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200508213732/https://www.lowyinstitute.org/the-interpreter/disinformation-and-coronavirus|archive-date=8 मई 2020|url-status=dead}}</ref><ref name="RunningList">{{Cite web|url=https://www.buzzfeednews.com/article/janelytvynenko/coronavirus-disinformation-spread|title=Here's A Running List Of Disinformation Spreading About The Coronavirus|website=Buzzfeed News|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206212717/https://www.buzzfeednews.com/article/janelytvynenko/coronavirus-disinformation-spread|archive-date=February 6, 2020|access-date=February 8, 2020}}</ref> ऑनलाइन सोशल मीडिया, <ref name="20200124factcheckA">{{Cite web|url=https://www.factcheck.org/2020/01/social-media-posts-spread-bogus-coronavirus-conspiracy-theory/|title=Social Media Posts Spread Bogus Coronavirus Conspiracy Theory|last=Jessica McDonald|date=January 24, 2020|website=factcheck.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206102802/https://www.factcheck.org/2020/01/social-media-posts-spread-bogus-coronavirus-conspiracy-theory/|archive-date=February 6, 2020|access-date=February 8, 2020}}</ref> पाठ संदेश (text message), <ref name="FTTextMsg">{{Cite web|url=https://www.ft.com/content/34b6df5a-ea4a-471f-8ac9-606580480049|title=Huge text message campaigns spread coronavirus fake news|last=Hannah Murphy, Mark Di Stefano & Katrina Manson|date=March 20, 2020|website=Financial Times|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200325214023/https://www.ft.com/content/34b6df5a-ea4a-471f-8ac9-606580480049|archive-date=25 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> <ref name="FriendsAunt">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2020/03/16/us/coronavirus-text-messages-national-quarantine.html|title=Be Wary of Those Texts From a Friend of a Friend's Aunt|last=Mihir Zaveri|date=March 16, 2020|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200326020537/https://www.nytimes.com/2020/03/16/us/coronavirus-text-messages-national-quarantine.html|archive-date=26 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> और कुछ चीनी,<ref name="FriendsAunt"/> और रूसी और ईरानी सरकारी मीडिया एजेंसियों द्वारा गलत सूचना फैलाई गई है।<ref name="presstv">{{Cite journal|last=Frantzman|first=Seth|date=March 8, 2020|title=Iran's regime pushes antisemitic conspiracies about coronavirus|url=https://www.jpost.com/Middle-East/Iran-News/Irans-regime-pushes-antisemitic-conspiracies-about-coronavirus-620212|journal=[[The Jerusalem Post]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200310213820/https://www.jpost.com/Middle-East/Iran-News/Irans-regime-pushes-antisemitic-conspiracies-about-coronavirus-620212|archive-date=March 10, 2020|access-date=March 11, 2020}}</ref> कुछ गलत सूचना और दुष्प्रचार में यह दावा किया गया कि वायरस एक जैव हथियार है जिसका [[टीका (वैक्सीन)|टीका]] पेटेंट हो चुका है, या यह एक जनसंख्या नियंत्रण योजना है, या एक का [[चर कार्य|जासूसी आपरेशन]] का परिणाम है।<ref name="vox_misinfo">{{Cite web|url=https://www.vox.com/recode/2020/1/31/21115589/coronavirus-wuhan-china-myths-hoaxes-facebook-social-media-tiktok-twitter-wechat|title=How tech companies are scrambling to deal with coronavirus hoaxes|last=Ghaffary|first=Shirin|last2=Heilweil|first2=Rebecca|date=January 31, 2020|website=Vox|archive-url=https://web.archive.org/web/20200208004124/https://www.vox.com/recode/2020/1/31/21115589/coronavirus-wuhan-china-myths-hoaxes-facebook-social-media-tiktok-twitter-wechat|archive-date=February 8, 2020|access-date=February 8, 2020}}</ref> कोरोनोवायरस बीमारी को रोकने, उपचार और आत्म निदान के तरीकों के बारे में चिकित्सा-संबंधी गलत सूचना भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हुई। <ref>{{Cite web|url=https://www.health.harvard.edu/blog/be-careful-where-you-get-your-news-about-coronavirus-2020020118801|title=Be careful where you get your news about coronavirus|last=Robert H. Shmerling|date=February 1, 2020|website=Harvard Health Blog|access-date=March 25, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200302084557/https://www.health.harvard.edu/blog/be-careful-where-you-get-your-news-about-coronavirus-2020020118801|archive-date=2 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> [[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] ने वायरस के बारे में गलत जानकारी को एक "infodemic" घोषित किया है, जो वैश्विक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करता है। == उपचार सम्बंधी ग़लत सूचना == === बीमारी का आत्म-परीक्षण, वायरस को मारने, रोकने या बनाने के गलत तरीके === सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से परिचालित पोस्टों ने (अन्य चीजों के साथ) निम्नलिखित बातों का गलत दावा किया है: * 'खाली पेट उबले हुए अदरक का सेवन [https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ कोरोनोवायरस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200610144107/https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ |date=10 जून 2020 }} को मार सकता है', <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/doctors-refute-misleading-online-claim-consuming-boiled-ginger-can-cure-novel-coronavirus-infections|title=Doctors refute misleading online claim that consuming boiled ginger can cure novel coronavirus infections|date=February 13, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200215095523/https://factcheck.afp.com/doctors-refute-misleading-online-claim-consuming-boiled-ginger-can-cure-novel-coronavirus-infections|archive-date=15 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> * नींबूपानी पीने से कोरोनोवायरस और कैंसर को रोका जा सकता है, क्योंकि यह विटामिन सी के स्तर को बढ़ाता है <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/false-claims-drinking-water-lemon-can-prevent-covid-19-circulate-online|title=False claims that drinking water with lemon can prevent COVID-19 circulate online|date=March 10, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321124408/https://factcheck.afp.com/false-claims-drinking-water-lemon-can-prevent-covid-19-circulate-online|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref>, <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/false-claims-drinking-water-lemon-can-prevent-covid-19-circulate-online|title=False claims that drinking water with lemon can prevent COVID-19 circulate online|date=March 10, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321124408/https://factcheck.afp.com/false-claims-drinking-water-lemon-can-prevent-covid-19-circulate-online|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * 10 सेकंड के लिए किसी की सांस रोकना '''[https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ कोरोनोवायरस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200610144107/https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ |date=10 जून 2020 }}''' के लिए एक प्रभावी आत्म-परीक्षण है। <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/world-health-organization-refutes-viral-claims-holding-your-breath-can-test-covid-19|title=World Health Organization refutes viral claims that holding your breath can test for COVID-19|date=March 4, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200319195721/https://factcheck.afp.com/world-health-organization-refutes-viral-claims-holding-your-breath-can-test-covid-19|archive-date=19 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * 'गर्म सौना (sauna) और हेयर ड्रायर कोरोनोवायरस को मार सकते हैं', <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/hot-air-saunas-hair-dryers-wont-prevent-or-treat-covid-19|title=Hot air from saunas, hair dryers won't prevent or treat COVID-19|date=March 19, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321124657/https://factcheck.afp.com/hot-air-saunas-hair-dryers-wont-prevent-or-treat-covid-19|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * 'प्राचीन श्रीलंकाई जड़ीबूटी '''[https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ कोरोनोवायरस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200610144107/https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ |date=10 जून 2020 }}''' को रोक सकती है' <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/health-experts-refute-claim-ancient-medicinal-herbs-are-effective-coronavirus-remedy|title=Health experts refute claim that ancient medicinal herbs are an effective coronavirus remedy|date=March 17, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321124409/https://factcheck.afp.com/health-experts-refute-claim-ancient-medicinal-herbs-are-effective-coronavirus-remedy|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * 'हल्दी और लाइफबॉय ब्रांड साबुन' <ref>{{Cite web|url=https://www.theweek.in/news/world/2020/03/13/italy-indian-youth-swear-by-turmeric-crave-for-lifebuoy-to-keep-covid-19-at-bay.html|title=Indian youth swear by turmeric, crave for Lifebuoy to keep COVID-19 at bay|date=March 13, 2020|website=The Week|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200326160754/https://www.theweek.in/news/world/2020/03/13/italy-indian-youth-swear-by-turmeric-crave-for-lifebuoy-to-keep-covid-19-at-bay.html|archive-date=26 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * यूवी-सी लाइट, क्लोरीन, और उच्च तापमान (56° C से अधिक) का उपयोग&nbsp;कोरोनोवायरस को मारने के लिए मनुष्य पर किया जा सकता है। <ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/health-experts-refute-misleading-claim-coronavirus-disinfectants|title=Misleading report claims UV light, chlorine and high temperatures can kill COVID-19|date=March 19, 2020|website=AFP Fact Check|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321124412/https://factcheck.afp.com/health-experts-refute-misleading-claim-coronavirus-disinfectants|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> उपरोक्त सभी दावे झूठे हैं। उदाहरण के लिए, अदरक किसी भी वायरल बीमारी को ठीक करने में कारगर साबित नहीं हुआ है, और विटामिन सी भी [[कोरोनावायरस|कोरोना वायरस]] के खिलाफ प्रभावी साबित नहीं हुआ है। === मेथनॉल === ईरान में यह झूठी ख़बर फैल गई कि [[मेथेनॉल|मेथनॉल]] पीने से '''[https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ कोरोनावायरस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200610144107/https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ |date=10 जून 2020 }}''' रोग ठीक हो जाता है।<ref name="independent-methanol">{{Cite web|url=https://www.independent.co.uk/news/world/middle-east/iran-coronavirus-methanol-drink-cure-deaths-fake-a9429956.html|title=Coronavirus: Hundreds dead in Iran from drinking methanol amid fake reports it cures disease|last=Trew|first=Bel|date=March 27, 2020|website=The Independent|access-date=March 27, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200328141348/https://www.independent.co.uk/news/world/middle-east/iran-coronavirus-methanol-drink-cure-deaths-fake-a9429956.html|archive-date=28 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> चूँकि ईरान में शराब पर प्रतिबंध है, बहुतेरे लोग औद्योगिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाला मेथनॉल (एक प्रकार का ज़हरीला ऐल्कहॉल) पी गए। <ref name="slate-methanol">{{Cite web|url=https://slate.com/news-and-politics/2020/03/hundreds-die-iran-drinking-bootleg-alcohol-methanol-coronavirus-cure-social-media.html|title=Hundreds Die in Iran From Bootleg Alcohol Being Peddled Online as Fake Coronavirus Remedy|last=Hannon|first=Elliot|date=March 27, 2020|website=[[Slate (magazine)|Slate]]|access-date=March 28, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200329211044/https://slate.com/news-and-politics/2020/03/hundreds-die-iran-drinking-bootleg-alcohol-methanol-coronavirus-cure-social-media.html|archive-date=29 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> परिणामस्वरूप, [[ मेथनॉल विषाक्तता|मेथनॉल विषाक्तता]] से 300 से अधिक लोग मारे गए। '''[https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ कोरोनावायरस] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20200610144107/https://ginewsind.xyz/corona-virus-in-india/ |date=10 जून 2020 }}''' से संबंधित मेथनॉल पीने की घटनाएँ [[व्हिस्की]] और शहद से संबंधित पर एक ब्रिटिश टैब्लॉइड कहानी के साथ (कथित और पर) जुड़ी हुई हैं। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि कोरोनोवायरस से बचने के लिए हैंड-सैनिटाइज़र का प्रयोग करने (हाथ साफ़ रखने के लिए) की सलाह दी जाती है, जिसमें ऐल्कहॉल होता है। <ref name="independent-methanol" /><ref name="slate-methanol" /><ref name="ap-nytimes-methanol">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/aponline/2020/03/27/world/middleeast/ap-ml-virus-outbreak-iran-a-deadly-drink.html|title=In Iran, False Belief a Poison Fights Virus Kills Hundreds|date=March 27, 2020|website=The New York Times|archive-url=https://web.archive.org/web/20200328174609/https://www.nytimes.com/aponline/2020/03/27/world/middleeast/ap-ml-virus-outbreak-iran-a-deadly-drink.html|archive-date=28 मार्च 2020|access-date=March 28, 2020|url-status=live}}</ref> तुर्की में भी इसी तरह की घटनाएं हुई हैं, जिसमें कोरोनोवायरस से संबंधित मेथनॉल विषाक्तता से 30 [[तुर्कमेन लोग|तुर्कमेन]] नागरिक मारे गए। <ref>{{Cite web|url=https://www.cnnturk.com/video/turkiye/9-kisi-daha-saf-alkolden-oldu|title=9 kişi daha saf alkolden öldü|date=March 25, 2020|website=[[CNN Türk]]|language=Turkish|access-date=March 28, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200328180214/https://www.cnnturk.com/video/turkiye/9-kisi-daha-saf-alkolden-oldu|archive-date=28 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.hurriyet.com.tr/gundem/katil-sahte-alkol-41473161|title=Katil: Sahte alkol|last=Aydın|first=Çetin|date=March 20, 2020|website=Hürriyet Daily News|language=Turkish|access-date=March 28, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200328180213/https://www.hurriyet.com.tr/gundem/katil-sahte-alkol-41473161|archive-date=28 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> === मास्क का अप्रभावी होना === फरवरी 2020 में अमेरिकी सर्जन जनरल जेरोम एडम्स और मार्च 2020 में अलाना शेख सहित कई चिकित्सा विशेषज्ञों ने सार्वजनिक रूप से लोगों से मास्क न पहनने की अपील करते हुए यह कहा कि ये प्रभावी नहीं हैं।<ref>{{Cite web|url=https://qz.com/1826717/do-masks-protect-against-coronavirus/|title=Every expert opinion you’ve heard about wearing masks is right|last=Coren|first=Michael J.|website=Quartz|language=en|access-date=2020-03-30|archive-url=https://web.archive.org/web/20200330022115/https://qz.com/1826717/do-masks-protect-against-coronavirus/|archive-date=30 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://mobile.twitter.com/wakandabio/status/1244418582655545344/photo/1|title=Twitter|website=mobile.twitter.com|access-date=2020-03-30}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.youtube.com/redirect?event=video_description&v=5h1phwKjJ8g&q=https://www.ted.com/talks/alanna_shaikh_coronavirus_is_our_future?language=en&redir_token=EfoxePjtY2DX-et3RYWJe3OfL7N8MTU4NTY2Njg3MkAxNTg1NTgwNDcy|title=YouTube|website=www.youtube.com|access-date=2020-03-30}}</ref><ref>{{Citation|last=Shaikh|first=Alanna|title=Coronavirus is our future {{!}} Alanna Shaikh {{!}} TEDxSMU|url=https://www.ted.com/talks/alanna_shaikh_coronavirus_is_our_future|language=en|access-date=2020-03-30}}</ref> उनकी सलाह सार्वजनिक [[महामारी विज्ञान]] के उपायों, अतीत और भविष्य के खिलाफ जाती है।<ref>{{Cite journal|last=Sim|first=Shin Wei|last2=Moey|first2=Kirm Seng Peter|last3=Tan|first3=Ngiap Chuan|date=2014-3|title=The use of facemasks to prevent respiratory infection: a literature review in the context of the Health Belief Model|url=https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4293989/|journal=Singapore Medical Journal|volume=55|issue=3|pages=160–167|doi=10.11622/smedj.2014037|issn=0037-5675|pmc=4293989|pmid=24664384|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200326001916/https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4293989/|archive-date=26 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite journal|last=|first=|last2=|first2=|last3=|first3=|date=|title=Physical Interventions to Interrupt or Reduce the Spread of Respiratory Viruses: Systematic Review|url=https://www.researchgate.net/publication/26830622_Physical_Interventions_to_Interrupt_or_Reduce_the_Spread_of_Respiratory_Viruses_Systematic_Review|journal=BMJ|volume=|issue=|pages=|doi=|issn=|pmc=|pmid=|via=|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200222214003/https://www.researchgate.net/publication/26830622_Physical_Interventions_to_Interrupt_or_Reduce_the_Spread_of_Respiratory_Viruses_Systematic_Review|archive-date=22 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://qz.com/1826717/do-masks-protect-against-coronavirus/|title=Every expert opinion you’ve heard about wearing masks is right|last=Coren|first=Michael J.|website=Quartz|language=en|access-date=2020-03-30|archive-url=https://web.archive.org/web/20200330022115/https://qz.com/1826717/do-masks-protect-against-coronavirus/|archive-date=30 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite journal|last=Feng|first=Shuo|last2=Shen|first2=Chen|last3=Xia|first3=Nan|last4=Song|first4=Wei|last5=Fan|first5=Mengzhen|last6=Cowling|first6=Benjamin J|date=2020-03|title=Rational use of face masks in the COVID-19 pandemic|url=http://dx.doi.org/10.1016/s2213-2600(20)30134-x|journal=The Lancet Respiratory Medicine|doi=10.1016/s2213-2600(20)30134-x|issn=2213-2600}}</ref> === टीके की मौजूदगी === सोशल मीडिया पर यह झूठी साज़िश काफ़ी फैली कि इस बीमारी का टीका (वैक्सीन) और वायरस के बारे में जानकारी पहले से मौजूद है, लेकिन समस्या को जान-बूझकर बढ़ने दिया जा रहा है। PolitiFact और FactCheck.org ने कहा कि वर्तमान में COVID -19 के लिए कोई टीका मौजूद नहीं है। विभिन्न सोशल मीडिया पोस्टों द्वारा उद्धृत पेटेंट आनुवांशिक अनुक्रमों के लिए मौजूदा पेटेंट और [[सार्स कोरोनावाइरस]] (SARS coronavirus) जैसे कोरोनोवायरस के अन्य उपभेदों के लिए टीके मौजूद होने का हवाला देते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.politifact.com/factchecks/2020/jan/23/facebook-posts/there-outbreak-china-wuhan-coronavirus-there-not-v/|title=PolitiFact – No, there is no vaccine for the Wuhan coronavirus|last=Washington|first=District of Columbia 1100 Connecticut Ave NW Suite 1300B|last2=Dc 20036|website=@politifact|archive-url=https://web.archive.org/web/20200207133056/https://www.politifact.com/factchecks/2020/jan/23/facebook-posts/there-outbreak-china-wuhan-coronavirus-there-not-v/|archive-date=February 7, 2020|access-date=February 7, 2020}}</ref><ref name="20200124factcheckA2">{{Cite web|url=https://www.factcheck.org/2020/01/social-media-posts-spread-bogus-coronavirus-conspiracy-theory/|title=Social Media Posts Spread Bogus Coronavirus Conspiracy Theory|last=Jessica McDonald|date=January 24, 2020|website=factcheck.org|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206102802/https://www.factcheck.org/2020/01/social-media-posts-spread-bogus-coronavirus-conspiracy-theory/|archive-date=February 6, 2020|access-date=February 8, 2020}}</ref> डब्लूएचओ ने 5 फरवरी, 2020 तक बताया कि वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज के लिए खोजी जा रही "सफल" दवाओं की खबरों के बीच कोई ज्ञात प्रभावी उपचार नहीं था; <ref name=":16">{{Cite news|url=https://www.reuters.com/article/us-china-health-treatments-who-idUSKBN1ZZ1M6|title=WHO: 'no known effective' treatments for new coronavirus|date=February 5, 2020|access-date=February 6, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200205155653/https://www.reuters.com/article/us-china-health-treatments-who-idUSKBN1ZZ1M6|archive-date=February 5, 2020|agency=Reuters}}</ref> इसमें एंटीबायोटिक्स और हर्बल उपचार शामिल नहीं थे। <ref>{{Cite news|url=https://www.aljazeera.com/news/2020/2/2/dispelling-the-myths-around-the-new-coronavirus-outbreak|title=Dispelling the myths around the new coronavirus outbreak|access-date=February 8, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206033735/https://www.aljazeera.com/amp/news/2020/02/dispelling-myths-coronavirus-outbreak-200202093426388.html?utm_source=website&utm_medium=article_page&utm_campaign=read_more_links|archive-date=February 6, 2020|publisher=Al Jazeera}}</ref> वैज्ञानिक एक टीका विकसित करने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन 18 मार्च, 2020 तक, किसी भी टीका उम्मीदवारों ने नैदानिक परीक्षण पूरा नहीं किया जा सका है। === पालतू जानवर === चीन और अन्य जगहों के सैकड़ों पालतू जानवरों को इस डर के कारण उनके मालिकों ने छोड़ दिया गया कि कुत्ते और बिल्लियों जैसे सामान्य घरेलू पालतू जानवर संक्रमित हो सकते हैं और बीमारी फैला सकते हैं।<ref>{{Cite news|url=https://www.bbc.com/news/world-asia-china-51614957|title=Coronavirus: Rescuing China's animals during the outbreak|last=Williams|first=Sophie|date=February 29, 2020|work=BBC News|via=bbc.com|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200304083837/https://www.bbc.com/news/world-asia-china-51614957|archive-date=4 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cnn.com/2020/03/15/asia/coronavirus-animals-pets-trnd/index.html|title=Cats and dogs abandoned at the start of the coronavirus outbreak are now starving or being killed|last=Kim|first=Allen|publisher=CNN|access-date=March 27, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200329145657/https://www.cnn.com/2020/03/15/asia/coronavirus-animals-pets-trnd/index.html|archive-date=29 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://time.com/5793363/china-coronavirus-covid19-abandoned-pets-wuhan/|title=China's Coronavirus Lockdown Sees Surge in Abandoned Pets|website=Time|access-date=March 27, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200304053002/https://time.com/5793363/china-coronavirus-covid19-abandoned-pets-wuhan/|archive-date=4 मार्च 2020|url-status=live}}</ref>इस बात के बहुत कम प्रमाण हैं कि कुत्ते वायरस से संक्रमित (infected) हो सकते हैं और इसे फैला सकते हैं। हालाँकि, यह सच है कि कुत्ते वायरस से दूषित (contaminated) हो सकते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://vetmed.illinois.edu/pet_column/coronavirus-pets/|title=Coronavirus and Pets: FAQs for Owners - Veterinary Medicine at Illinois|access-date=March 29, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321101050/https://vetmed.illinois.edu/pet_column/coronavirus-pets/|archive-date=21 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cnbc.com/2020/02/28/a-dog-in-hong-kong-tests-positive-for-the-coronavirus-who-confirms.html|title=A dog in Hong Kong tests positive for the coronavirus, WHO officials confirm|last=Higgins-Dunn|first=Noah|date=February 28, 2020|publisher=CNBC|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200302220903/https://www.cnbc.com/2020/02/28/a-dog-in-hong-kong-tests-positive-for-the-coronavirus-who-confirms.html|archive-date=2 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.washingtonpost.com/science/2020/03/13/dogs-pets-coronavirus/|title=Dog with 'low-level' coronavirus infection remains quarantined after blood test, Hong Kong officials say|last=Brulliard|first=Karin|website=The Washington Post|access-date=30 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200329024500/https://www.washingtonpost.com/science/2020/03/13/dogs-pets-coronavirus/|archive-date=29 मार्च 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://arstechnica.com/science/2020/03/dont-panic-the-comprehensive-ars-technica-guide-to-the-coronavirus/2/#h5|title=Don't Panic: The comprehensive Ars Technica guide to the coronavirus|last=Mole|first=Beth|date=March 25, 2020|website=[[Ars Technica]]|access-date=March 25, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200329215852/https://arstechnica.com/science/2020/03/dont-panic-the-comprehensive-ars-technica-guide-to-the-coronavirus/2/#h5|archive-date=29 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> === कोकीन से इलाज === कई ऐसे ट्वीट्स वायरल हुए, जो बताते हैं कि [[कोकेन|कोकीन]] सूँघने से एक नथुना निष्फल हो जाएगा, जिससे कोरोनावायरस संक्रमण नहीं होगा। जवाब में, फ्रांसीसी स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस दावे को खारिज किया, जैसा कि पहले [[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] ने किया था।<ref>{{Cite web|url=https://www.pedestrian.tv/news/french-government-cocaine-coke-coronavirus-hoax/|title=Sorry to the French People Who Thought Cocaine Would Protect Them From Coronavirus|last=Crellin|first=Zac|date=March 9, 2020|website=Pedestrian.TV|archive-url=https://web.archive.org/web/20200311082415/https://www.pedestrian.tv/news/french-government-cocaine-coke-coronavirus-hoax/|archive-date=March 11, 2020|access-date=March 11, 2020}}</ref> === अफ़्रीकी प्रतिरोध === 11 फरवरी से शुरू हुई, रिपोर्ट्स, फेसबुक के माध्यम से तेजी से फैली, यह अनुमान लगाया गया कि चीन में कैमरून की एक छात्रा अपनी अफ्रीकी आनुवंशिकी के कारण वायरस से पूरी तरह से ठीक हो गई थी, जबकि उस छात्र का सफलतापूर्वक इलाज किया गया था, अन्य मीडिया स्रोतों ने उल्लेख किया है कि कोई भी सबूत नहीं है कि अफ्रीकियों के पास वायरस से लड़ने की अधिक प्रतिरोधी क्षमता है और इस तरह के दावों को गलत जानकारी के रूप में खंडित किया गया है।<ref>{{Cite web|url=https://factcheck.afp.com/black-people-arent-more-resistant-novel-coronavirus|title=Black people aren't more resistant to novel coronavirus|date=February 12, 2020|website=AFP Fact Check|archive-url=https://web.archive.org/web/20200216141447/https://factcheck.afp.com/black-people-arent-more-resistant-novel-coronavirus|archive-date=February 16, 2020|access-date=February 16, 2020}}</ref> केन्या के स्वास्थ्य सचिव मुताहि कागवे ने स्पष्ट रूप से अफवाहों का खंडन किया कि "काली त्वचा वाले लोग कोरोनोवायरस नहीं पा सकते हैं", जब उन्होंने १३ मार्च को केन्या के पहले मामले की घोषणा की। <ref>{{Cite news|url=https://edition.cnn.com/world/live-news/coronavirus-outbreak-03-13-20-intl-hnk/h_daa3fbd19db18fdbb4be569a9613fe96|title=Minister rejects false rumors that 'those with black skin cannot get coronavirus' as Kenya records first case|last=Alberti|first=Mia|date=March 13, 2020|access-date=March 15, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200319003805/https://edition.cnn.com/world/live-news/coronavirus-outbreak-03-13-20-intl-hnk/h_daa3fbd19db18fdbb4be569a9613fe96|archive-date=March 19, 2020|publisher=CNN|last2=Feleke|first2=Bethlehem}}</ref> === 5G === फरवरी 2020 में, [[बीबीसी]] ने बताया कि सोशल मीडिया समूहों पर साजिश रचने वालों ने कोरोनोवायरस और [[५जी|5 जी]] मोबाइल नेटवर्क के बीच एक लिंक होने का आरोप लगाया। इसमें दावा किया गया कि [[वूहान]] और ''डायमंड प्रिंसेस जहाज़'' सीधे विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र और 5जी और वायरलेस प्रौद्योगिकियों की शुरूआत के कारण हुआ। कुछ साजिश सिद्धांतकारों ने यह भी आरोप लगाया कि कोरोनोवायरस का प्रकोप 5जी से संबंधित बीमारी के लिए कवर अप था।<ref name="bbc-5g">{{Cite web|url=https://www.bbc.com/news/technology-51646309|title=Coronavirus: Fake news is spreading fast|last=Cellan-Jones|first=Rory|date=February 26, 2020|website=[[बीबीसी]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200317062547/https://www.bbc.com/news/technology-51646309|archive-date=March 17, 2020|access-date=March 20, 2020}}</ref> मार्च 2020 में, थॉमस कोवान, (एक [[वैकल्पिक चिकित्सा|समग्र चिकित्सक]]) जो एक चिकित्सक के रूप में प्रशिक्षित थे और ''मेडिकल बोर्ड ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया'' के साथ प्रोबेशन पर काम करते थे, ने आरोप लगाया कि कोरोनोवायरस 5जी के कारण होता है, इस बात के आधार पर कि अफ्रीकी देश, जहाँ 5G क्षेत्र नहीं था, वहाँ बीमारी नहीं फैली। <ref name="newsweek-5g">{{Cite web|url=https://www.newsweek.com/youtube-video-suggests-5g-internet-causes-coronavirus-people-are-falling-it-1493321|title=Youtube Video Suggests 5G Internet Causes Coronavirus and People Are Falling For It|last=Wynne|first=Kelly|date=March 19, 2020|website=[[Newsweek]]|access-date=March 20, 2020}}</ref><ref name="cbc-5g">{{Cite web|url=https://www.cbc.ca/news/technology/fact-check-viral-video-coronavirus-1.5506595|title=Viral video claiming 5G caused pandemic easily debunked|last=Nicholson|first=Katie|last2=Ho|first2=Jason|date=March 23, 2020|publisher=[[Canadian Broadcasting Corporation]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200326125553/https://www.cbc.ca/news/technology/fact-check-viral-video-coronavirus-1.5506595|archive-date=26 मार्च 2020|access-date=March 26, 2020|last3=Yates|first3=Jeff|url-status=live}}</ref> कोवान ने यह भी गलत आरोप लगाया कि वायरस कोशिकाओं से अपशिष्ट होते हैं जो विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र और ऐतिहासिक वायरल महामारी द्वारा जहर छोड़ते हैं जो रेडियो प्रौद्योगिकी में प्रमुख विकास के साथ मेल खाते हैं।<ref name="cbc-5g" /> उनके आरोपों का वीडियो वायरल हुआ; <ref name="newsweek-5g" /><ref name="cbc-5g" /> दोनों दावे और वीडियो, जो गायक केरी हिलसन द्वारा समर्थित थे, की सोशल मीडिया पर आलोचना की गई और मीडिया एजेंसी [[रॉयटर्स]] ,<ref name="reuters-5g">{{Cite news|url=https://www.reuters.com/article/uk-factcheck-coronavirus-5g/false-claim-5g-networks-are-making-people-sick-not-coronavirus-idUSKBN2133TI|title=False claim: 5G networks are making people sick, not Coronavirus|date=March 17, 2020|access-date=March 20, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320023007/https://www.reuters.com/article/uk-factcheck-coronavirus-5g/false-claim-5g-networks-are-making-people-sick-not-coronavirus-idUSKBN2133TI|archive-date=March 20, 2020|agency=[[रॉयटर्स]]}}</ref>''यूएसए टुडे'', <ref>{{Cite web|url=https://www.usatoday.com/story/tech/columnist/2020/03/21/did-5-g-cause-coronavirus-covid-19-pandemic/2873731001/|title=Here's why 5G and coronavirus are not connected|last=O'Donnell|first=Bob|date=March 21, 2020|website=[[USA Today]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20200321213438/https://www.usatoday.com/story/tech/columnist/2020/03/21/did-5-g-cause-coronavirus-covid-19-pandemic/2873731001/|archive-date=21 मार्च 2020|access-date=March 22, 2020|url-status=live}}</ref> फ़ुल फ़ैक्ट<ref>{{Cite web|url=https://fullfact.org/online/coronavirus-5G/|title=These claims about the new coronavirus and 5G are unfounded|last=Krishna|first=Rachael|date=March 13, 2020|website=Full Fact|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320160841/https://fullfact.org/online/coronavirus-5G/|archive-date=20 मार्च 2020|access-date=March 22, 2020|url-status=live}}</ref> और अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन कार्यकारी निदेशक जार्ज सी° बेंजामिन<ref name="newsweek-5g" /><ref name="huffington-5g">{{Cite web|url=https://www.huffpost.com/entry/keri-hilson-5g-did-not-cause-coronavirus_n_5e6f8ba7c5b6dda30fce0348|title=No, Keri Hilson, 5G Did Not Cause Coronavirus|last=Finley|first=Taryn|date=March 16, 2020|website=HuffPost|archive-url=https://web.archive.org/web/20200319232700/https://www.huffpost.com/entry/keri-hilson-5g-did-not-cause-coronavirus_n_5e6f8ba7c5b6dda30fce0348|archive-date=March 19, 2020|access-date=March 20, 2020}}</ref> ने इसकी आलोचना की। == विश्ववार गलत जानकारी == === भारत === * राजनीतिक कार्यकर्ता स्वामी चक्रपाणि और [[विधान सभा]] सदस्य सुमन हरिप्रिया ने दावा किया कि [[गोमूत्र]] पीने और शरीर पर [[गोबर]] लगाने से कोरोनवायरस का इलाज हो सकता है।<ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/health-news/coronavirus-in-india-can-cow-dung-and-urine-help-cure-the-novel-coronavirus/articleshow/73952691.cms|title=Coronavirus: Can cow dung and urine help cure the novel coronavirus?|website=The Times of India|archive-url=https://web.archive.org/web/20200206035509/https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/health-news/coronavirus-in-india-can-cow-dung-and-urine-help-cure-the-novel-coronavirus/articleshow/73952691.cms|archive-date=February 6, 2020|accessdate=March 5, 2020|url-status=live}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.firstpost.com/india/novel-coronavirus-can-be-cured-with-gaumutra-gobar-claims-assam-bjp-mla-suman-haripriya-8111021.html|title=Novel coronavirus can be cured with gaumutra, gobar claims Assam BJP MLA Suman Haripriya|website=Firstpost|archive-url=https://web.archive.org/web/20200304051130/https://www.firstpost.com/india/novel-coronavirus-can-be-cured-with-gaumutra-gobar-claims-assam-bjp-mla-suman-haripriya-8111021.html|archive-date=4 मार्च 2020|accessdate=March 5, 2020|url-status=dead}}</ref> [[विश्व स्वास्थ्य संगठन]] की मुख्य वैज्ञानिक [[सौम्या स्वामीनाथन]] ने इस तरह के दावों को खारिज किया और गलत सूचना फैलाने के लिए इन राजनेताओं की आलोचना की।<ref>{{cite web|url=https://swachhindia.ndtv.com/novel-coronavirus-outbreak-indias-response-and-surveillance-has-been-quite-robust-says-whos-chief-scientist-42015|title=Novel Coronavirus Outbreak: "India's Response And Surveillance Has Been Quite Robust," Says WHO's Chief Scientist|date=March 3, 2020|publisher=NDTV|accessdate=March 5, 2020|archive-date=12 जुलाई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210712230059/https://swachhindia.ndtv.com/novel-coronavirus-outbreak-indias-response-and-surveillance-has-been-quite-robust-says-whos-chief-scientist-42015/|url-status=dead}}</ref> * [[भारतीय जनता पार्टी]] के सांसद रमेश बिधुरी ने दावा किया कि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अभिवादन के रूप में [[नमस्ते]] का प्रयोग करने से [[कोविड-19]] नहीं फैलता, लेकिन [[आदाब]] या [[अस्सलामु अलैकुम]] जैसे अरबी अभिवादन का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे हवा मुंह में जाती है।<ref>{{cite web|url=https://scroll.in/video/955329/coronavirus-saying-aadab-sends-infected-air-into-the-mouth-claims-bjp-leader-ramesh-bidhuri|title=Coronavirus: Saying aadab sends infected air into the mouth, claims BJP leader Ramesh Bidhuri|website=Scroll.in|archive-url=https://web.archive.org/web/20200317065950/https://scroll.in/video/955329/coronavirus-saying-aadab-sends-infected-air-into-the-mouth-claims-bjp-leader-ramesh-bidhuri|archive-date=17 मार्च 2020|accessdate=March 15, 2020|url-status=dead}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.deccanherald.com/national/national-politics/experts-have-said-namaskar-not-adaab-or-assalamu-alaikum-will-help-prevent-coronavirus-says-bjp-mp-ramesh-bidhuri-811390.html|title=Experts have said namaskar, not adaab or assalamu alaikum, will help prevent coronavirus, says BJP MP Ramesh Bidhuri|date=March 7, 2020|website=Deccan Herald|archive-url=https://web.archive.org/web/20200317192721/https://www.deccanherald.com/national/national-politics/experts-have-said-namaskar-not-adaab-or-assalamu-alaikum-will-help-prevent-coronavirus-says-bjp-mp-ramesh-bidhuri-811390.html|archive-date=March 17, 2020|accessdate=March 15, 2020|url-status=live}}</ref> * यह गलत जानकारी, कि ([[भारत]] में लगने वाले) [[जनता कर्फ्यू]] के दौरान सरकार देश में "एंटी-कोरोना" दवा फैला रही है, सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है।<ref>{{cite news|url=https://www.hindustantimes.com/it-s-viral/is-government-spraying-coronavirus-vaccine-using-airplanes-no-it-s-fake-news/story-QmSDrfLW8SkSghT2TUf5cK.html|title=Is government spraying coronavirus vaccine using airplanes? No, it's fake news|date=March 20, 2020|work=Hindustan Times|accessdate=March 22, 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320164701/https://www.hindustantimes.com/it-s-viral/is-government-spraying-coronavirus-vaccine-using-airplanes-no-it-s-fake-news/story-QmSDrfLW8SkSghT2TUf5cK.html|archive-date=20 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * यह अफ़वाह भी काफ़ी फैली कि जनता कर्फ्यू के दौरान एक साथ ताली बजाने से उत्पन्न कंपन (vibration) वायरस को मार देगा, मीडिया ने इसका खंडन किया।<ref>{{cite news|url=https://www.thenewsminute.com/article/mohanlal-many-others-share-fake-info-clapping-may-kill-virus-pib-debunks-120844|work=thenewsminute.com|accessdate=March 22, 2020|title=संग्रहीत प्रति|archive-url=https://web.archive.org/web/20200323161721/https://www.thenewsminute.com/article/mohanlal-many-others-share-fake-info-clapping-may-kill-virus-pib-debunks-120844|archive-date=23 मार्च 2020|url-status=dead}}</ref> * एक वायरल मैसेज में कहा गया कि कोरोनावायरस का जीवनकाल केवल 12 घंटे का होता है और जनता कर्फ्यू के दौरान 14 घंटे घर में रहने से प्रसारण की श्रृंखला (chain of transmission) टूट जाएगी।<ref name="indiatoday1">{{cite news|url=https://www.indiatoday.in/fact-check/story/social-media-users-give-misleading-twist-pm-modi-janta-curfew-1658195-2020-03-21|title=Fact Check: Social media users give misleading twist to PM Modi's concept of 'Janta curfew'|last1=DelhiMarch 21|first1=Ratna New|work=India Today|accessdate=March 22, 2020|last2=March 21|first2=Ratna New|last3=Ist|first3=Ratna New|archive-url=https://web.archive.org/web/20200322081021/https://www.indiatoday.in/fact-check/story/social-media-users-give-misleading-twist-pm-modi-janta-curfew-1658195-2020-03-21|archive-date=22 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> * एक अन्य संदेश में दावा किया गया कि जनता कर्फ्यू का पालन करने से कोरोनवायरस के मामलों में 40% की कमी आएगी।<ref name="indiatoday1" /> <section begin="Intro" /><section end="Intro" /> === नाइजीरिया=== इस बीमारी का पहला मामला यहाँ 28 फरवरी को सामने आया था, जिसके बाद से ही कई बिना परीक्षण वाले दवाओं और उपचार के बारे में लोगों ने वाट्सएप आदि प्लेटफॉर्म पर ऐसी गलत जानकारी फैलाना शुरू कर दिया।<ref>{{Cite web|url=https://qz.com/africa/1810219/nigerias-coronavirus-case-may-spark-wave-of-fake-news-and-fears/|title=Nigeria's biggest battle with coronavirus will be beating misinformation|last=Kazeem|first=Yomi|website=Quartz Africa|url-status=live|archive-url=https://web.archive.org/web/20200229162841/https://qz.com/africa/1810219/nigerias-coronavirus-case-may-spark-wave-of-fake-news-and-fears/|archive-date=February 29, 2020|access-date=February 28, 2020}}</ref> == अफ़वाहों से बचने के लिए कुछ तथ्य == [[File:Covid-19-curves-graphic-social-v3.gif|thumb|रोग के प्रसार और स्वास्थ्य संस्थानों में रोगियों के इलाज की क्षमता के बारे में जानकारी देने वाला चार्ट।<ref>{{cite web|url=https://thespinoff.co.nz/society/09-03-2020/the-three-phases-of-covid-19-and-how-we-can-make-it-manageable/|title=The three phases of Covid-19 – and how we can make it manageable|last1=Wiles|first1=Siouxsie|date=9 March 2020|website=The Spinoff|accessdate=9 March 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200327120015/https://thespinoff.co.nz/society/09-03-2020/the-three-phases-of-covid-19-and-how-we-can-make-it-manageable/|archive-date=27 मार्च 2020|url-status=live}}</ref> [[सामाजिक दूरीकरण]] जैसे समझदारीपूर्ण निर्णय लेकर समाज आपदा प्रबंधन में सहायक हो सकता है।]] * दुनिया भर के विभिन्न स्वास्थ्य संगठनों ने बीमारी और संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए तरीक़े बताए हैं। इन तरीकों में अन्य कोरोनोवायरस रोग शामिल हैं: घर पर रहना, सार्वजनिक स्थानों पर यात्रा नहीं करना, साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोना; हाथ धोए बिना आँखें, नाक और मुँह न पकड़ें; और श्वसन अंगों को साफ रखने के उपाय।<ref>{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/about/prevention.html|title=Coronavirus {{!}} About {{!}} Prevention and Treatment {{!}} CDC|date=2020-02-03|website=www.cdc.gov|language=en-us|archive-url=https://web.archive.org/web/20191215193934/https://www.cdc.gov/coronavirus/about/prevention.html|archive-date=15 December 2019|access-date=2020-02-10|url-status=live}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|title=Advice for public|website=www.who.int|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126025750/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|archive-date=26 January 2020|access-date=2020-02-10|url-status=live}}</ref> * कुछ चुनिंदा देश (जहाँ वायरस सबसे ज़्यादा तेज़ी से फैल रहा है) छोड़कर बाक़ी देशों के स्वस्थ लोगों को मुँह पर मास्क पहनने की आवश्यकता नहीं होती है।<ref>{{Cite web|url=https://www.health.gov.au/health-topics/novel-coronavirus-2019-ncov|title=Coronavirus (COVID-19)|authors=Australian Government Department of Health|date=2020-01-21|website=Australian Government Department of Health|language=en|access-date=2020-02-15|archive-url=https://web.archive.org/web/20200209233401/https://www.health.gov.au/health-topics/novel-coronavirus-2019-ncov|archive-date=9 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref><ref name="autogenerated1">{{Cite web|url=https://www.moh.gov.sg/2019-ncov-wuhan|title=MOH {{!}} Updates on 2019 Novel Coronavirus (2019-nCoV) Local Situation|website=www.moh.gov.sg|access-date=2020-02-11|archive-url=https://web.archive.org/web/20200712180651/https://www.moh.gov.sg/covid-19|archive-date=12 जुलाई 2020|url-status=live}}</ref><ref name=":1">{{Cite web|url=https://www.health.gov.au/health-topics/novel-coronavirus-2019-ncov|title=Novel coronavirus (2019-nCoV)|authors=Australian Government Department of Health|date=2020-01-21|website=Australian Government Department of Health|language=en|access-date=2020-02-11|archive-url=https://web.archive.org/web/20200209233401/https://www.health.gov.au/health-topics/novel-coronavirus-2019-ncov|archive-date=9 फ़रवरी 2020|url-status=live}}</ref> यह तथ्य इसलिए भी ध्यान देने योग्य है क्योंकि अधिक लोगों के अनावश्यक रूप से मास्क मंगाने पर उन लोगों को इसकी कमी पड़ सकती है, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, जैसे चिकित्साकर्मी और पीड़ित मरीज़। * संक्रमित लोगों को सलाह दी जाती है कि वे चिकित्सा उपचार के बिना घर से बाहर न निकलें और उपचार करने से पहले रिपोर्ट करें; सार्वजनिक रूप से मुंह और नाक को ढंकने वाला मास्क पहनें; एक रूमाल के साथ छींकने और खांसी; अपने हाथों को नियमित साबुन और पानी से धोने की सलाह दी जाती है और दूसरों के साथ व्यक्तिगत वस्तुओं का उपयोग न करें।<ref>{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/steps-when-sick.html|title=What to do if you are sick with 2019 Novel Coronavirus (2019-nCoV)|last=CDC|date=2020-02-11|website=Centers for Disease Control and Prevention|language=en-us|archive-url=https://web.archive.org/web/20200214153016/https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/steps-when-sick.html|archive-date=14 February 2020|access-date=2020-02-13|url-status=live}}</ref> * इसके अलावा, कम से कम 5 सेकंड के लिए साबुन से हाथ धोने की सलाह दी जाती - विशेष रूप से शौचालय जाने के बाद, बिस्तर से पहले, और जब सर्दी-खांसी होती है।<ref>{{Cite web|url=https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/about/prevention-treatment.html|title=Coronavirus Disease 2019 Prevention & Treatment|last=CDC|first=|date=2020-02-11|website=Centers for Disease Control and Prevention|language=en-us|archive-url=https://web.archive.org/web/20191215193934/https://www.cdc.gov/coronavirus/about/prevention.html|archive-date=15 दिसंबर 2019|access-date=2020-03-05|url-status=live}}</ref> अल्कोहल युक्त हाथ धोने के तरल पदार्थ (जिसमें कम से कम 5% अल्कोहल होते हैं) से बचने की सलाह भी दी गई है।<ref>{{Cite web|url=https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|title=Advice for public|website=www.who.int|language=en|access-date=2020-03-05|archive-url=https://web.archive.org/web/20200126025750/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public|archive-date=26 जनवरी 2020|url-status=live}}</ref> * विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फ़रवरी २०२० में यह बताया गया था कि कोरोनावायरस का वैक्सीन बनकर सामूहिक तौर पर उपलब्ध होने में कम से कम १८ महीने लग सकते हैं।<ref>{{cite web|url=https://www.sciencealert.com/who-says-a-coronavirus-vaccine-is-18-months-away|title=Here's Why It's Taking So Long to Develop a Vaccine For The New Coronavirus|last1=Grenfell|first1=Rob|last2=Drew|first2=Trevor|date=17 February 2020|website=Science Alert|archive-url=https://web.archive.org/web/20200228010631/https://www.sciencealert.com/who-says-a-coronavirus-vaccine-is-18-months-away|archive-date=28 February 2020|access-date=26 February 2020|name-list-format=vanc|url-status=live}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20200206055829/https://www.who.int/emergencies/diseases/novel-coronavirus-2019/advice-for-public/myth-busters विश्व स्वास्थ्य संगठन: कोरोनावायरस रोग (COVID-19) जनता के लिए सलाह: मिथक बस्टर्स] * [https://www.youtube.com/watch?v=IfeWAxE4OZE&list=PL1a9DHjZmejE-Ep2PAu2OR8HBfLP0BLIk&index=4 एम्स के डॉक्टर घर पर सुरक्षित रहने की सलाह देते हुए (हिंदी वीडियो)] * [https://web.archive.org/web/20200329223011/https://www.mohfw.gov.in/pdf/socialdistancingHindi.pdf सामाजिक दूरीकरण पर स्वास्थ्य मंत्रालय का हिंदी पोस्टर] [[श्रेणी:असत्य का संचार]] [[श्रेणी:जीववैज्ञानिक युद्धकारी]] [[श्रेणी:वैकल्पिक चिकित्सा]] [[श्रेणी:कोरोनावायरस]] 13y0bd5qcbfyjpp6chz0xjgksznu34w कोरियाही 0 1248347 6543756 6385159 2026-04-25T04:55:39Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543756 wikitext text/x-wiki '''कोरीयाहि''' एक भारतीय गांव है, जो [[मिथिला]] क्षेत्र केे सीतामढ़ी जिला में स्थित हैै। यह [[सुरसन्द|सुरसंड]] प्रखंड में भिट्ठा थाना के अन्तर्गत आता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.livehindustan.com/bihar/sitamarhi/story-ssb-dig-inspected-bhitthamod-camp-10236551.amp.html|title=एसएसबी के डीआईजी ने भिट्ठामोड़ कैंप का किया निरीक्षण|website=Hindustan|language=hi-IN|access-date=2025-03-23}}</ref> यह गांव अपने जिला मुख्यालय [[सीतामढ़ी]] से लगभग 38 किमी. की दूरी पर अवस्थित है। यह गांव नजदीकी बाजार [[यदुपट्टी]] सेे 1 किलोमीटर तथा [[भिट्ठामोड़]] से इसकी दूूूूरी लगभग 6 किलोमीटर है।<ref>{{Cite web|url=https://www.jagran.com/bihar/sitamarhi-chahchri-pul-21262404.html|title=हर साल बाढ़ की विभीषिका से जूझती हजारों की आबादी, चचरी पुल के सहारे होता आवागमन|website=Dainik Jagran|language=hi|access-date=2021-01-19|archive-date=28 जनवरी 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210128015346/https://www.jagran.com/bihar/sitamarhi-chahchri-pul-21262404.html|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.jagran.com/bihar/sitamarhi-police-officer-and-child-house-officer-beaten-up-by-the-inspector-in-koriyahi-village-19594722.html|title=कोरियाही गांव में दारोगा, पुलिस कर्मी और बालगृह के अधिकारी की पिटाई|website=Dainik Jagran|language=hi|access-date=2021-01-19}}</ref>{{ज्ञानसन्दूक अवस्थापन | name = कोरीयाही | official_name = | image_map = | translit_lang1 = | settlement_type = गांव | seat = ग्राम पंचायत | seat_type = सभा | population_as_of = 2011 | population_total = 4263 | image_flag = Flag of India.svg | subdivision_type4 = भाषा | subdivision_name3 = सुरसंड | subdivision_name2 = [[सीतामढ़ी]] | subdivision_name1 = [[बिहार]] | subdivision_type = देश | subdivision_type3 = प्रखंड | subdivision_type2 = ज़िला | subdivision_type1 = राज्य | subdivision_name = [[भारत]] (India) | subdivision_name4 = [[मैथिली]] , [[हिन्दी]] | pushpin_map = India | coordinates = }} == पर्व - त्यौहार == यहां कई सारे पर्व त्यौहार मनाए जाते हैं, जिसमें [[गणतन्त्र दिवस (भारत)|गणतंत्र दिवस]], [[स्वतंत्रता दिवस (भारत)|स्वतंत्रता दिवस]], [[दिवाली]], [[होली]], [[दुर्गा पूजा]], छठ महापर्व, मकर संक्रान्ति इत्यादि मनाएं जाते हैं। मां काली की पूजा यहां बड़े हर्ष- उल्लास और धूम - धाम से की जाती है। == सन्दर्भ == 9juo9g0dpwohtn1wg0zunff8p2kmxnm कोर्स हीरो 0 1250050 6543759 5891577 2026-04-25T05:16:13Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543759 wikitext text/x-wiki कोर्स हीरो एक अमेरिकी शिक्षा प्रौद्योगिकी वेबसाइट कंपनी है जो कैलिफोर्निया के रेडवुड शहर में स्थित है, जो छात्रों और शिक्षकों के समुदाय द्वारा योगदान पाठ्यक्रम-विशिष्ट अध्ययन संसाधनों तक पहुंचने के लिए छात्रों के लिए एक ऑनलाइन शिक्षण मंच संचालित करता है। अध्ययन गाइड, इन्फोग्राफिक्स,  भीड़-भाड़ वाले शिक्षण मंच में अभ्यास की समस्याएं, लैब रिपोर्ट, क्लास नोट्स, चरण-दर-चरण स्पष्टीकरण, निबंध, वीडियो, उपयोगकर्ता द्वारा प्रस्तुत प्रश्न ट्यूटर से उत्तर के साथ जोड़े गए, और मूल सामग्री और शिक्षकों द्वारा अपलोड किए गए हैं। उपयोगकर्ता या तो एक सदस्यता खरीदते हैं या पूर्ण दस्तावेज़ हीरो दस्तावेज़ देखने और डाउनलोड करने के लिए उपयोग किए जाने वाले अनलॉक प्राप्त करने के लिए मूल दस्तावेज़ अपलोड करते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://pando.com/2012/05/10/course-hero-a-diy-education-startup-is-now-paying-students/|title=Course Hero, a DIY Education Startup, Is Now Paying Students*|date=2012-05-10|website=Pando|language=en-gb|access-date=2021-01-25|archive-date=29 जनवरी 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210129175806/https://pando.com/2012/05/10/course-hero-a-diy-education-startup-is-now-paying-students/|url-status=dead}}</ref> == इतिहास == कॉलेज के छात्रों को व्याख्यान देने, क्लास नोट्स, परीक्षा और असाइनमेंट साझा करने के लिए कोर्स हीरो की स्थापना 2006 में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में हुई थी।<ref>{{Cite news|url=https://www.wsj.com/articles/SB123923520520403259|title=Do Study Sites Make the Grade?|last=Chaker|first=Anne Marie|date=2009-04-09|work=Wall Street Journal|access-date=2021-01-25|language=en-US|issn=0099-9660}}</ref> उनका मानना ​​था कि जानकारी मूल्यवान है और ठीक से अनुक्रमित और सुलभ होने पर और भी उपयोगी हो सकती है।<ref>{{Cite news|url=https://www.wsj.com/articles/SB123923520520403259|title=Do Study Sites Make the Grade?|last=Chaker|first=Anne Marie|date=2009-04-09|work=Wall Street Journal|access-date=2021-01-25|language=en-US|issn=0099-9660}}</ref> पूर्ण वेबसाइट को 2008 में लॉन्च किया गया था और यह कंपनी रेडवुड सिटी, कैलिफोर्निया में स्थित है। नवंबर 2014 में, कंपनी ने श्रृंखला ए फंडिंग में $ 15 मिलियन जुटाए, निवेशकों के साथ जिसमें जीएसवी कैपिटल और आईडीजी कैपिटल शामिल थे। बीज निवेशक एसवी एंजेल और मावरोन ने भी भाग लिया।<ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/sanjose/news/2014/11/12/course-hero-raises-15m-for-crowd-sourced-study.html|title=Course Hero raises $15M for crowd-sourced study help|last=|first=|date=|website=www.bizjournals.com|archive-url=|archive-date=|dead-url=|access-date=2021-01-25}}</ref> फरवरी 2020 में, कंपनी ने श्रृंखला बी फंडिंग में $ 10 मिलियन की बढ़ोतरी की, कंपनी को $ 1 बिलियन से अधिक का मूल्यांकन किया। सीरीज़ बी राउंड का नेतृत्व न्यूवे कैपिटल द्वारा किया गया था, जिसके संस्थापक और प्रबंध साझेदार, रवि विश्वनाथन, कोर्स हीरो के निदेशक मंडल में शामिल हुए थे। न्यूव्यू कैपिटल ने कर्मचारी निविदा प्रस्ताव के रूप में जो भी जाना जाता है, उसमें $ 30 मिलियन का योगदान दिया, यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा नया दर्शन ने कोर्स हीरो कर्मचारियों से सीधे कंपनी के शेयर खरीदे हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.edsurge.com/news/2020-02-12-course-hero-joins-the-edtech-unicorn-stable|title=With $1.1B Valuation, Course Hero Joins the Edtech Unicorn Stable - EdSurge News|date=2020-02-12|website=EdSurge|language=en|access-date=2021-01-25}}</ref> == विशेषताएं == === अध्ययन दस्तावेज़ === 2012 में यह दावा किया गया कि कोर्स हीरो ने 7 मिलियन से अधिक अपलोड किए गए अध्ययन दस्तावेजों तक पहुंच प्रदान की। कोर्स हीरो को तत्काल प्रीमियर एक्सेस देने के लिए छात्र मासिक सदस्यता का भुगतान करते हैं या वे एक महीने के लिए मुफ्त एक्सेस प्राप्त करने के लिए 40 दस्तावेज़ अपलोड कर सकते हैं। जब किसी उपयोगकर्ता ने 40 दस्तावेज़ अपलोड किए हैं, तो वे कोर्स हीरो से 300 दस्तावेज़ डाउनलोड कर सकते हैं। हालाँकि, दस्तावेज़ सबमिट करने के बाद प्रीमियर एक्सेस प्राप्त करने में लगभग तीन दिन लगते हैं। उपयोगकर्ता सामग्री, विश्वविद्यालय या पाठ्यक्रम विषय के दस्तावेजों की खोज कर सकते हैं। कोर्स हीरो नॉलेज ड्राइव नामक एक परोपकारी पहल सितंबर 2010 में शुरू की गई थी, जिसमें वेबसाइट पर अपलोड किए गए प्रत्येक 10 अध्ययन दस्तावेजों के लिए अफ्रीका के लिए पुस्तकों के लिए एक पुस्तक दान की जाती है। अपनी शुरुआत के बाद से, कोर्स हीरो नॉलेज ड्राइव ने विदेशों में छात्रों और स्कूलों को 200,000 से अधिक किताबें दान की हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.entrepreneur.com/article/224228|title=Course Hero Crowdsources Study Material From 2 Million Students|last=Jerome|first=Marty|date=2012-09-03|website=Entrepreneur|language=en|access-date=2021-01-25}}</ref> === ट्यूशन सेवा === कोर्स हीरो ऑनलाइन ट्यूटर्स तक 24/7 पहुंच प्रदान करता है। वे किसी विषय के बारे में कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं और एक ट्यूटर 3 दिनों के भीतर जवाब देगा। यह एक्सेस प्रीमियर उपयोगकर्ताओं के लिए "क्रेडिट" के माध्यम से प्रति उपयोग किया जाता है, लेकिन मूल ग्राहकों को प्रति प्रश्न का भुगतान करना पड़ता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.booksforafrica.org/news/course-hero-surpasses-200000-books-donated-to-gambian-schools.html|title=Course Hero Surpasses 200,000 Books Donated to Gambian Schools|website=Books for Africa|access-date=2021-01-25}}</ref> === पाठ्यक्रम === 17 अप्रैल 2012 को, कोर्स हीरो ने तीन "लर्निंग पाथ" में 22 मुफ्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू किए: उद्यमिता, व्यवसाय और वेब प्रोग्रामिंग। ये पाठ्यक्रम वेब से समेकित शैक्षिक सामग्री का उपयोग करते हैं और छात्रों को तब तक लगातार परीक्षा देते हैं जब तक कि वे अपने विषय में महारत हासिल नहीं कर लेते। प्रत्येक पाठ्यक्रम लगभग 6 खंडों में बंट जाता है, जिसमें वीडियो और लेखों का संयोजन होता है।<ref>{{Cite web|url=https://social.techcrunch.com/2012/04/12/course-hero/|title=Screw University, Course Hero Curates YouTube Into Free Business and Coding Classes|website=TechCrunch|language=en-US|access-date=2021-01-25}}{{Dead link|date=जून 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> 7 अगस्त 2012 को, कोर्स हीरो ने अपने कैटलॉग में 18 और नि: शुल्क कौशल-आधारित पाठ्यक्रम जोड़े।<ref>{{Cite web|url=https://venturebeat.com/2012/08/07/course-hero-adds-18-courses/|title=Professors out, experts in! Course Hero adds 18 free skill-based courses|date=2012-08-07|website=VentureBeat|language=en-US|access-date=2021-01-25}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> कोर्स हीरो उन छात्रों को भी पुरस्कृत करता है जो तीन में से किसी एक को सीखने के मार्ग में 5 या अधिक पूरा करते हैं। पुरस्कारों में एसवी एंजेल के लिए एक व्यवसाय योजना और $ 5,000 या कोर्स हीरो में नौकरी पाने का मौका शामिल है। === वीडियो व्याख्यान और शिक्षक मंच === यह वह जगह है जहाँ शिक्षक खुले तौर पर कोर्स हीरो के माध्यम से ज्ञान और सामग्री साझा कर सकते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://social.techcrunch.com/2012/04/12/course-hero/|title=Screw University, Course Hero Curates YouTube Into Free Business and Coding Classes|website=TechCrunch|language=en-US|access-date=2021-01-25}}{{Dead link|date=जून 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> आप विश्वविद्यालय, विषय या प्रशिक्षक द्वारा वीडियो व्याख्यान के पुस्तकालय के माध्यम से खोज सकते हैं। वेबसाइट का यह हिस्सा डिजिटल पाठ्यक्रमों की एक निःशुल्क निर्देशिका प्रदान करता है जो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। == विवाद == === कॉपीराइट की चिंता === बिक्री के लिए अपलोड किए गए दस्तावेज़ अक्सर प्रशिक्षकों की बौद्धिक संपदा होते हैं, न कि उन छात्रों के जो उन्हें पोस्ट करते / बेचते हैं। कोर्स हीरो की उपयोग नीति में कहा गया है कि अपलोड करने वालों को फाइल पोस्ट करने के लिए अधिकृत किया जाना चाहिए, हालांकि कोर्स हीरो इसे सत्यापित नहीं करता है या अपलोड होने से पहले कॉपीराइट धारकों को सूचित नहीं करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.wikiwax.com/how-to-unblur-course-hero-documents-answers-images/|title=How to Unblur Course Hero Documents, Answers & Images [2021] - WikiWax|language=en-US|access-date=2021-01-25}}</ref> इसमें परीक्षा और उनकी कुंजियाँ, क्विज़ और उनकी कुंजियाँ, प्रशिक्षकों द्वारा लिखित अध्ययन गाइड शामिल हैं। कॉपीराइट धारकों के अधिकारों की रक्षा के लिए, डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट को अपने कॉपीराइट का उल्लंघन करने के रूप में चिह्नित किए जाने पर सामग्री को शीघ्रता से हटाने के लिए कोर्स हीरो की आवश्यकता होती है। हालाँकि, कॉपीराइट सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को अत्यधिक बोझ के रूप में देखा जा सकता है और इस तरह के दावों के माध्यम से लोगों को हतोत्साहित करने के लिए एक सूक्ष्म तरीका हो सकता है। === सुरक्षा की सोच === कोर्स हीरो पृष्ठों में संकाय और शिक्षण सहायकों के नाम, ईमेल, पते और / या कार्यालय स्थान शामिल हैं, जिसमें कोई संकेत नहीं है कि कोर्स हीरो उस जानकारी को पोस्ट / बेचने के लिए अधिकृत था। === धोखा === जैसा कि कोर्स हीरो छात्रों को पिछले होमवर्क पोस्ट करने और अपनी कक्षाओं से परीक्षा के समाधान की अनुमति देता है, वेबसाइट को अक्सर छात्र धोखाधड़ी के लिए सहायता के रूप में उद्धृत किया जाता है। सदस्य पिछले छात्रों द्वारा प्रस्तुत किए गए पूर्ण पेपर डाउनलोड कर सकते हैं, और उन्हें अपने काम के रूप में जमा कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, साइट छात्रों को होमवर्क अपलोड करने और साइट के अनुबंधित श्रमिकों से काम पूरा करने की अनुमति देती है।<ref>{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2009/05/18/education/18cram.html|title=Psst! Need the Answer to No. 7? Click Here. (Published 2009)|last=Foderaro|first=Lisa W.|date=2009-05-18|work=The New York Times|access-date=2021-01-25|language=en-US|issn=0362-4331}}</ref> अंग्रेजी विकिपीडिया पर पढ़े:- [[:en:Course_Hero|Course Hero]] == संदर्भ == mnoiy0wqmcv8xnooo3jgmzgbb7xq3j3 क्वेटा ग्लैडिएटर्स 0 1260039 6543845 5844198 2026-04-25T11:22:43Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543845 wikitext text/x-wiki {{Infobox cricket team | name = क्वेटा ग्लैडिएटर्स<br>{{lang|ur|{{Nastaliq|کوئٹہ گلیڈی ایٹرز}}}} | alt_name = | image = Quetta Gladiators.png | caption = | alt = | nickname = {{ubl|''शान-ए-पाकिस्तान'' | ''बैंगनी बल''}} | league = [[पाकिस्तान सुपर लीग]] | captain = {{flagicon|PAK}} [[सरफराज अहमद]] | coach = {{flagicon|PAK}} [[मोइन खान]] | city = [[क्वेटा]], [[बलूचिस्तान, पाकिस्तान | बलूचिस्तान]], [[पाकिस्तान]] | colors = [[File:Quetta Gladiators team colors.png|Quetta Gladiators team colors]] | owner = नदीम उमर (उमर एसोसिएट्स) | ground = [[बुगती स्टेडियम]]<ref>{{cite news|url=https://www.geosuper.tv/latest/6412-peshawar|title=Peshawar, Quetta to again miss out on PSL 2021 matches, PCB confirms|work=Geo Super|date=15 September 2020|access-date=24 November 2020|first=Abdul Majid|last=Bhatti|quote=Two of the four provinces will once again see no action of the Pakistan Super League (PSL) next year as the Pakistan Cricket Board (PCB) has confirmed that Peshawar’s Arbab Niaz Stadium and Quetta’s Bugti Stadium won’t be ready in time to host matches for the 2021 tournament...|archive-url=https://web.archive.org/web/20200919002511/https://www.geosuper.tv/latest/6412-peshawar|archive-date=19 September 2020|url-status=live}}</ref> | capacity = | founded = {{Start date and age|2015}} | psl_wins = '''1''' ([[2019 पाकिस्तान सुपर लीग|2019]]) | website = [http://www.quettagladiators.com www.quettagladiators.com] | t_title = T20 kit | t_pattern_la = | t_pattern_b = _ahly1011 | t_pattern_ra = | t_pattern_pants = | t_leftarm = 4B0082 | t_body = 4B0082 | t_rightarm = 4B0082 | t_pants = 4B0082 | current = }} '''क्वेटा ग्लैडिएटर्स''' ([[उर्दू]]: {{lang|ur|{{Nastaliq|کوئٹہ گلیڈی ایٹرز}}}}) एक पाकिस्तानी पेशेवर ट्वेंटी 20 क्रिकेट फ्रेंचाइजी है जो [[पाकिस्तान सुपर लीग]] (पीएसएल) में प्रतिस्पर्धा करती है। वे पीएसएल 2019 के चैंपियन थे। टीम मुख्य रूप से पाकिस्तान के बलूचिस्तान की प्रांतीय राजधानी क्वेटा में स्थित है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) द्वारा पीएसएल के गठन के परिणामस्वरूप 2015 में मताधिकार की स्थापना की गई थी।<ref>{{cite news|url=http://www.emirates247.com/sports/local/pakistan-super-league-t20-in-uae-seeks-to-rival-india-s-ipl-2015-09-29-1.604988|title=Pakistan Super League T20 in UAE seeks to rival India's IPL|work=Emirates 24/7|date=29 September 2015|access-date=3 December 2015}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> टीम का होमग्राउंड बुगती स्टेडियम है। टीम की कप्तानी सरफराज अहमद द्वारा की जाती है और पूर्व पाकिस्तानी विकेट कीपर मोईन खान द्वारा कोच की जाती है, जबकि वेस्टइंडीज के दिग्गज खिलाड़ी विव रिचर्ड्स टीम के मेंटर और बल्लेबाजी कोच हैं और आजम खान टीम के मैनेजर हैं।<ref name="QuettaManagement" >{{cite web|url=http://tribune.com.pk/story/1019611/1019611//|title=Vivian Richards to mentor Quetta Gladiators|publisher=Express Tribune|access-date=26 January 2016}}</ref> अब्दुल रज्जाक टीम के सहायक कोच हैं।<ref>{{cite news|title=Abdul Razzaq joins Quetta Gladiators as assistant Coach|url=http://dailytimes.com.pk/sports/02-Dec-16/abdul-razzaq-joins-quetta-gladiators-as-assistant-coach|access-date=20 January 2017}}</ref> टीम के प्रमुख रन-स्कोरर शेन वॉटसन हैं जबकि<ref>{{cite web|title=Quetta Gladiators/Most runs|url=http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/batting/most_runs_career.html?id=205;team=5797;type=trophy|publisher=[[ESPNcricinfo]]|access-date=7 March 2017}}</ref> अग्रणी विकेट लेने वाले मोहम्मद नवाज हैं।<ref>{{cite web|title=Quetta Gladiators/Most wickets|url=http://stats.espncricinfo.com/pakistan-super-league-2016-17/engine/records/bowling/most_wickets_career.html?id=205;team=5797;type=trophy|publisher=[[ESPNcricinfo]]|access-date=7 March 2017}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} 5r6mz16teih5nqqlft4i0sxzweb8m0l कुमुद पावड़े 0 1271410 6543640 5972787 2026-04-24T15:02:27Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543640 wikitext text/x-wiki '''कुमुद सोमकुवर पावड़े''' (जन्म 1938) एक भारतीय [[दलित]] कार्यकर्ता हैं। [[संस्कृत भाषा|वह संस्कृत]] के पहले [[भीमराव आम्बेडकर|अम्बेडकरवादी]] विद्वान हैं। उनकी आत्मकथा ''एंटाह्सफोट'' में दलित महिलाओं के शोषण के मुद्दे पर चर्चा की गई है।<ref>{{Cite web|url=https://in.makers.yahoo.com/8-dalit-women-you-must-know-about-025952456.html|title=Dalit Lives Matter: 8 Dalit Women Activists You Must Know About|date=14 October 2020|website=Geetika Sachdev|publisher=Yahoo|access-date=15 November 2020|archive-date=10 नवंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201110003116/https://in.makers.yahoo.com/8-dalit-women-you-must-know-about-025952456.html|url-status=dead}}</ref> वह नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वुमन की संस्थापक सदस्य हैं। उनका जन्म 1938 [[महार|में महाराष्ट्र में एक महार]] दलित परिवार में [[महाराष्ट्र|हुआ था]]। बाद में वह [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]] धर्म में परिवर्तित हो गई। वह 14 अक्टूबर, 1956 को ऐतिहासिक धम्म दीक्षा समारोह ( [[बौद्ध धर्म|बौद्ध धर्म में]] रूपांतरण) की गवाह भी बनी, क्योंकि उनके माता-पिता [[भीमराव आम्बेडकर|बाबासाहेब अंबेडकर]] के [[बौद्ध-दलित आंदोलन|दलित बौद्ध आंदोलन]] का हिस्सा थे।<ref>{{Cite web |url=https://peoplesvoice.in/2018/05/29/when-nehru-helped-an-ambedkarite-sanskrit-scholar-get-a-job/ |title=संग्रहीत प्रति |access-date=14 अप्रैल 2021 |archive-date=14 अप्रैल 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210414071139/https://peoplesvoice.in/2018/05/29/when-nehru-helped-an-ambedkarite-sanskrit-scholar-get-a-job/ |url-status=dead }}</ref> <ref>https://indianexpress.com/article/gender/how-three-generations-of-dalit-women-writers-saw-their-identities-and-struggle-4984202/</ref> उन्होने उस समय [[संस्कृत भाषा|संस्कृत का]] अध्ययन किया [[अस्पृश्यता|जब अस्पृश्यता]] सर्व्याप्त थी और दलितों को बाधाओं का सामना करना पड़ता था; वह संस्कृत सीखने वाले पहले दलितों में से थी और संस्कृत [[पण्डित|पंडिता अर्थात संस्कृत की विद्वान बन गई]]।<ref>{{Cite web|url=https://www.femina.in/trending/achievers/meet-dr-kumud-sonkuwar-pawde-sanskrit-pandita-and-dalit-activist-176092.html|title=Meet Dr Kumud Sonkuwar Pawde, Sanskrit Pandita And Dalit Activist|date=2 November 2020|website=Kalwyna Rathod|publisher=Femina|access-date=15 November 2020}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/bloody-mary/the-dalit-girl-who-became-a-sanskrit-pandita-the-incredible-story-of-dr-kumud-sonkuwar-pawde/|title=The Dalit girl who became a Sanskrit Pandita: the incredible story of Dr Kumud Sonkuwar Pawde|date=25 March 2019|website=Sagarika Ghose|publisher=[[द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया]]|access-date=15 November 2020}}</ref> वह सरकारी कॉलेज, अमरावती, महाराष्ट्र में संस्कृत विभाग की प्रमुख थीं।<ref>{{Cite web|url=http://www.puneresearch.com/media/data/issues/5a9ed92612de3.pdf|title=EVALUATION OF DALIT LITERATURE IN INDIA|website=YESUPAKU DINESH|publisher=Pune Research|access-date=15 November 2020}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.questia.com/library/journal/1P3-3075959611/social-economic-and-political-reverberations-of-untouchability|title=Social, Economic and Political Reverberations of Untouchability: Kumud Pawde's "The Story of My Sanskrit"|website=Jayasree, K.|publisher=IUP Journal of English Studies|access-date=15 November 2020|archive-date=16 नवंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201116200531/https://www.questia.com/library/journal/1P3-3075959611/social-economic-and-political-reverberations-of-untouchability|url-status=dead}}</ref> == संदर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:दलित लेखक]] [[श्रेणी:भारतीय बौद्ध]] [[श्रेणी:मराठी लोग]] [[श्रेणी:आंबेडकरवादी]] [[श्रेणी:दलित महिलाएँ]] [[श्रेणी:दलित कार्यकर्ता]] [[श्रेणी:भारतीय शिक्षाविद्]] [[श्रेणी:1938 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] 5ald83xc6jhv710zyku3q2927mk8jhe कोमालिका बारी 0 1290387 6543747 6470319 2026-04-25T04:03:55Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543747 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक खिलाड़ी | name = कोमलिका बारी | image = | caption = Komalika Bari in 2025 | fullname = कोमलिका बारी | nickname = | nationality = भारतीय | birth_date = {{birth date and age|df=yes|2002|02|05}} | birth_place = [[जमशेदपुर]], [[भारत]] | death_date = | death_place = | country = भारत | sport = [[तीरंदाजी]] | event = | Alma mater = शिक्षा निकेतन | club = टाटा तीरंदाजी अकादमी | team = भारतीय तीरंदाजी महिला }} '''कोमलिका बारी''', <ref>{{Cite web|url=https://worldarchery.sport/profile/27737/bari-komalika/biography|title=Bari Komalika|website=World Archery|language=en|access-date=2021-07-01}}</ref> [[जमशेदपुर]] में पैदा हुई, <ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/jamshedpur-to-tokyo-jharkhands-19-year-old-komalika-bari-daughter-of-an-anganwadi-worker-wins-gold-at-41st-junior-national-archery-championship-in-dehradun-eyes-tokyo-olympics/articleshow/81517597.cms|title=Jamshedpur to Tokyo: Jharkhand’s 19-year-old Komalika Bari, daughter of an anganwadi worker, wins gold at 41st Junior National Archery Championship in Dehradun, eyes Tokyo Olympics {{!}} Dehradun News - Times of India|last=Mar 16|first=Mohammad Anab / TNN / Updated:|last2=2021|website=The Times of India|language=en|access-date=2021-07-01|last3=Ist|first3=12:58}}</ref> <ref>{{Cite web|url=http://www.tatasteel.com/media/newsroom/press-releases/india/2019/tata-archery-academy-cadet-komalika-bari-emerges-as-cadet-world-champion-in-the-world-archery-youth-cadet-championship-2019/|title=Tata Archery Academy cadet ‘Komalika Bari’ emerges as Cadet World Champion in the World Archery Youth & Cadet Championship 2019|last=Services|first=Hungama Digital|website=www.tatasteel.com|language=en|access-date=2021-07-01|archive-date=12 जुलाई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210712061402/https://www.tatasteel.com/media/newsroom/press-releases/india/2019/tata-archery-academy-cadet-komalika-bari-emerges-as-cadet-world-champion-in-the-world-archery-youth-cadet-championship-2019/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://sports.ndtv.com/archery/archery-world-cup-pm-modi-lauds-indian-archers-stupendous-performance-2475205|title=Archery World Cup: PM Modi Lauds Indian Archers' "Stupendous Performance" {{!}} Archery News|website=NDTVSports.com|language=en|access-date=2021-07-01|archive-date=9 जुलाई 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210709182245/https://sports.ndtv.com/archery/archery-world-cup-pm-modi-lauds-indian-archers-stupendous-performance-2475205|url-status=dead}}</ref> कैडेट विश्व युवा तीरंदाजी चैंपियनशिप में विश्व खिताब जीतने वाली एकमात्र तीसरी [[भारत के लोग|भारतीय]] खिलाड़ी हैं । उन्होंने विश्व चैंपियनशिप और [[ओलम्पिक खेल|ओलंपिक]] टेस्ट इवेंट सहित कुलीन आयोजनों के लिए भारतीय टीम में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए अपनी पहचान बनाई । <ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/sports/other-sports/story/archery-world-cup-women-s-recurve-team-gold-india-deepika-kumari-ankita-bhakat-komalika-bari-paris-1819968-2021-06-27|title=Archery World Cup: Indian women's recurve team beat Mexico to win gold in Paris|last=DelhiJune 27|first=India Today Web Desk New|last2=June 27|first2=2021UPDATED:|website=India Today|language=en|access-date=2021-07-01|last3=Ist|first3=2021 15:17}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.telegraphindia.com/jharkhand/east-singhbhum-felicitates-woman-archer-for-gold-win-at-world-cup/cid/1820670|title=East Singhbhum felicitates woman archer for gold win at World Cup|website=www.telegraphindia.com|access-date=2021-07-01}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.republicworld.com/sports-news/other-sports/pm-modi-lauds-deepika-kumari-atanu-das-and-others-for-striking-gold-at-archery-world-cup.html|title=PM Modi lauds Deepika Kumari, Atanu Das & others for striking gold at Archery World Cup|last=World|first=Republic|website=Republic World|language=en|access-date=2021-07-01}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.dailypioneer.com/2021/vivacity/ntpc-congratulates-the-indian-archery-team.html|title=NTPC congratulates the Indian Archery team|last=Pioneer|first=The|website=The Pioneer|language=en|access-date=2021-07-01}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.newindianexpress.com/sport/other/2021/jun/19/indian-women-archery-team-firm-favourites-to-make-tokyo-cut-2318645.html|title=Indian women archery team firm favourites to make Tokyo cut|website=The New Indian Express|access-date=2021-07-01}}</ref> == संदर्भ ==   [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:2002 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:Pages using infoboxes with thumbnail images]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] <references /> [[श्रेणी:जमशेदपुर के लोग]] nk151htp5sp622u52bgca03a2wheg2i बसवराज बोम्मई 0 1296999 6543780 6137849 2026-04-25T07:23:39Z Sequencesolved 173771 अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। 6543780 wikitext text/x-wiki {{Infobox Officeholder |name=Siddharamaiya |image=Bommai, in New Delhi on August 17, 2012 (cropped) (cropped).jpg |birth_date={{birth date and age|1960|1|28|df=y}} |birth_place=[[हुबली]] |office=23 वें [[कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों की सूची|कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] |term_start=28 जुलाई 2021 |term_end=20 मई 2023 |constituency=[[शिग्गाँव]] |governor=[[थावरचंद गहलोत]] |predecessor=[[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा]] |successor=[[सिद्दारमैया]] |nationality=[[भारतीय]] |party=[[भारतीय जनता पार्टी]] |residence=[[बंगलुरु]]}} '''बसवराज सोमप्पा बोम्मई''' (जन्म: 28 जनवरी 1960) एक भारतीय राजनेता और [[भारत]] के राज्य [[कर्नाटक]] के 23 वें और पूर्व-मुख्यमंत्री हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/basavaraj-bommai-karanataka-chief-minister-oath-ceremony-updates-ntc-1299026-2021-07-28/?utm_source=Wikipedia_wp|title=कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बने बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा की जगह संभाली कमान|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-12}}</ref> बसवराज बोम्मई 2008 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और तब से लगातार पार्टी में ऊपर चढ़ते चले गए. वह पहले राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे हैं| उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल के साथ की थी.<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-12}}</ref> वे [[भारतीय जनता पार्टी]] के सदस्य हैं और 2008 से कर्नाटक के [[हावेरी जिला|हावेरी जिले]] में [[शिग्गाँव]] विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। इससे पूर्व वे कर्नाटक में [[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा | येदयुरप्पा]] सरकार में गृह मंत्री और विधि, संसदीय कार्य और विधान मंत्री थे। बसवराज बोम्मई (Basavaraj S Bommai) सादर लिंगायत समुदाय से आते हैं. उनके पिता भी रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री | पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं बसवराज बोम्मई | वह दो बार एमएलसी और तीन बार विधायक रहे हैं. वह 1998 और 2004 में धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य के  रूप में चुने गए. <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=HINDI|access-date=2022-05-12}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] 1oioi38swzmoeugtbjjh7wkot91pqe6 6543784 6543780 2026-04-25T08:09:41Z Hindustanilanguage 39545 [[WP:HC|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:1960 में जन्मे लोग]] जोड़ी 6543784 wikitext text/x-wiki {{Infobox Officeholder |name=Siddharamaiya |image=Bommai, in New Delhi on August 17, 2012 (cropped) (cropped).jpg |birth_date={{birth date and age|1960|1|28|df=y}} |birth_place=[[हुबली]] |office=23 वें [[कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों की सूची|कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] |term_start=28 जुलाई 2021 |term_end=20 मई 2023 |constituency=[[शिग्गाँव]] |governor=[[थावरचंद गहलोत]] |predecessor=[[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा]] |successor=[[सिद्दारमैया]] |nationality=[[भारतीय]] |party=[[भारतीय जनता पार्टी]] |residence=[[बंगलुरु]]}} '''बसवराज सोमप्पा बोम्मई''' (जन्म: 28 जनवरी 1960) एक भारतीय राजनेता और [[भारत]] के राज्य [[कर्नाटक]] के 23 वें और पूर्व-मुख्यमंत्री हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/basavaraj-bommai-karanataka-chief-minister-oath-ceremony-updates-ntc-1299026-2021-07-28/?utm_source=Wikipedia_wp|title=कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बने बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा की जगह संभाली कमान|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-12}}</ref> बसवराज बोम्मई 2008 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और तब से लगातार पार्टी में ऊपर चढ़ते चले गए. वह पहले राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे हैं| उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल के साथ की थी.<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-12}}</ref> वे [[भारतीय जनता पार्टी]] के सदस्य हैं और 2008 से कर्नाटक के [[हावेरी जिला|हावेरी जिले]] में [[शिग्गाँव]] विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। इससे पूर्व वे कर्नाटक में [[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा | येदयुरप्पा]] सरकार में गृह मंत्री और विधि, संसदीय कार्य और विधान मंत्री थे। बसवराज बोम्मई (Basavaraj S Bommai) सादर लिंगायत समुदाय से आते हैं. उनके पिता भी रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री | पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं बसवराज बोम्मई | वह दो बार एमएलसी और तीन बार विधायक रहे हैं. वह 1998 और 2004 में धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य के  रूप में चुने गए. <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=HINDI|access-date=2022-05-12}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:1960 में जन्मे लोग]] tlowoqi7o17fwpebmgc064srubi10em 6543785 6543784 2026-04-25T08:10:03Z Hindustanilanguage 39545 [[WP:HC|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] जोड़ी 6543785 wikitext text/x-wiki {{Infobox Officeholder |name=Siddharamaiya |image=Bommai, in New Delhi on August 17, 2012 (cropped) (cropped).jpg |birth_date={{birth date and age|1960|1|28|df=y}} |birth_place=[[हुबली]] |office=23 वें [[कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों की सूची|कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] |term_start=28 जुलाई 2021 |term_end=20 मई 2023 |constituency=[[शिग्गाँव]] |governor=[[थावरचंद गहलोत]] |predecessor=[[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा]] |successor=[[सिद्दारमैया]] |nationality=[[भारतीय]] |party=[[भारतीय जनता पार्टी]] |residence=[[बंगलुरु]]}} '''बसवराज सोमप्पा बोम्मई''' (जन्म: 28 जनवरी 1960) एक भारतीय राजनेता और [[भारत]] के राज्य [[कर्नाटक]] के 23 वें और पूर्व-मुख्यमंत्री हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/basavaraj-bommai-karanataka-chief-minister-oath-ceremony-updates-ntc-1299026-2021-07-28/?utm_source=Wikipedia_wp|title=कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बने बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा की जगह संभाली कमान|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-12}}</ref> बसवराज बोम्मई 2008 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और तब से लगातार पार्टी में ऊपर चढ़ते चले गए. वह पहले राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे हैं| उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल के साथ की थी.<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-12}}</ref> वे [[भारतीय जनता पार्टी]] के सदस्य हैं और 2008 से कर्नाटक के [[हावेरी जिला|हावेरी जिले]] में [[शिग्गाँव]] विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। इससे पूर्व वे कर्नाटक में [[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा | येदयुरप्पा]] सरकार में गृह मंत्री और विधि, संसदीय कार्य और विधान मंत्री थे। बसवराज बोम्मई (Basavaraj S Bommai) सादर लिंगायत समुदाय से आते हैं. उनके पिता भी रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री | पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं बसवराज बोम्मई | वह दो बार एमएलसी और तीन बार विधायक रहे हैं. वह 1998 और 2004 में धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य के  रूप में चुने गए. <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=HINDI|access-date=2022-05-12}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:1960 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] du4cghkzblpmxpx02vtavdmdbt4svga 6543786 6543785 2026-04-25T08:11:04Z Hindustanilanguage 39545 [[WP:HC|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री]] जोड़ी 6543786 wikitext text/x-wiki {{Infobox Officeholder |name=Siddharamaiya |image=Bommai, in New Delhi on August 17, 2012 (cropped) (cropped).jpg |birth_date={{birth date and age|1960|1|28|df=y}} |birth_place=[[हुबली]] |office=23 वें [[कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों की सूची|कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] |term_start=28 जुलाई 2021 |term_end=20 मई 2023 |constituency=[[शिग्गाँव]] |governor=[[थावरचंद गहलोत]] |predecessor=[[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा]] |successor=[[सिद्दारमैया]] |nationality=[[भारतीय]] |party=[[भारतीय जनता पार्टी]] |residence=[[बंगलुरु]]}} '''बसवराज सोमप्पा बोम्मई''' (जन्म: 28 जनवरी 1960) एक भारतीय राजनेता और [[भारत]] के राज्य [[कर्नाटक]] के 23 वें और पूर्व-मुख्यमंत्री हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/basavaraj-bommai-karanataka-chief-minister-oath-ceremony-updates-ntc-1299026-2021-07-28/?utm_source=Wikipedia_wp|title=कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बने बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा की जगह संभाली कमान|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-12}}</ref> बसवराज बोम्मई 2008 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और तब से लगातार पार्टी में ऊपर चढ़ते चले गए. वह पहले राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे हैं| उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल के साथ की थी.<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-12}}</ref> वे [[भारतीय जनता पार्टी]] के सदस्य हैं और 2008 से कर्नाटक के [[हावेरी जिला|हावेरी जिले]] में [[शिग्गाँव]] विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। इससे पूर्व वे कर्नाटक में [[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा | येदयुरप्पा]] सरकार में गृह मंत्री और विधि, संसदीय कार्य और विधान मंत्री थे। बसवराज बोम्मई (Basavaraj S Bommai) सादर लिंगायत समुदाय से आते हैं. उनके पिता भी रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री | पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं बसवराज बोम्मई | वह दो बार एमएलसी और तीन बार विधायक रहे हैं. वह 1998 और 2004 में धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य के  रूप में चुने गए. <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=HINDI|access-date=2022-05-12}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:1960 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] [[श्रेणी:भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री]] gov71ep12tw9u0v37bjvfgj2hhk08pb 6543787 6543786 2026-04-25T08:12:21Z Hindustanilanguage 39545 [[WP:HC|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:जीवित लोग]] जोड़ी 6543787 wikitext text/x-wiki {{Infobox Officeholder |name=Siddharamaiya |image=Bommai, in New Delhi on August 17, 2012 (cropped) (cropped).jpg |birth_date={{birth date and age|1960|1|28|df=y}} |birth_place=[[हुबली]] |office=23 वें [[कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों की सूची|कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] |term_start=28 जुलाई 2021 |term_end=20 मई 2023 |constituency=[[शिग्गाँव]] |governor=[[थावरचंद गहलोत]] |predecessor=[[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा]] |successor=[[सिद्दारमैया]] |nationality=[[भारतीय]] |party=[[भारतीय जनता पार्टी]] |residence=[[बंगलुरु]]}} '''बसवराज सोमप्पा बोम्मई''' (जन्म: 28 जनवरी 1960) एक भारतीय राजनेता और [[भारत]] के राज्य [[कर्नाटक]] के 23 वें और पूर्व-मुख्यमंत्री हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/basavaraj-bommai-karanataka-chief-minister-oath-ceremony-updates-ntc-1299026-2021-07-28/?utm_source=Wikipedia_wp|title=कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बने बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा की जगह संभाली कमान|website=आज तक|language=hindi|access-date=2022-05-12}}</ref> बसवराज बोम्मई 2008 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और तब से लगातार पार्टी में ऊपर चढ़ते चले गए. वह पहले राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे हैं| उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल के साथ की थी.<ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=hi|access-date=2022-05-12}}</ref> वे [[भारतीय जनता पार्टी]] के सदस्य हैं और 2008 से कर्नाटक के [[हावेरी जिला|हावेरी जिले]] में [[शिग्गाँव]] विधानसभा क्षेत्र से विधायक है। इससे पूर्व वे कर्नाटक में [[बी॰ एस॰ येदयुरप्पा | येदयुरप्पा]] सरकार में गृह मंत्री और विधि, संसदीय कार्य और विधान मंत्री थे। बसवराज बोम्मई (Basavaraj S Bommai) सादर लिंगायत समुदाय से आते हैं. उनके पिता भी रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री | पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं बसवराज बोम्मई | वह दो बार एमएलसी और तीन बार विधायक रहे हैं. वह 1998 और 2004 में धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य के  रूप में चुने गए. <ref>{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/india/news/story/karnataka-basavaraj-bommai-new-cm-son-of-former-cm-sr-bommai-graduate-in-mechanical-engineering-janata-dal-profile-ntc-1298724-2021-07-27/?utm_source=Wikipedia_wp|title=इंजीनियरिंग की पढ़ाई, पिता भी रहे CM, जानिए कौन हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई|website=आज तक|language=HINDI|access-date=2022-05-12}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:1960 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:कर्नाटक के मुख्यमंत्री]] [[श्रेणी:भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] 5cmgnloyhpf0o2hxn1hpzkdavryy2me तरंग फलन 0 1300661 6543676 5279802 2026-04-24T17:37:03Z ~2026-21496-92 919279 "तरंग फलन" लेख में बदला 6543676 wikitext text/x-wiki [[File:Quantum harmonic oscillators animation.gif|thumb|upright=1.25|एकल प्रचक्रण रहित कण के लिए [[क्वांटम सरल आवर्ती दोलक]]। दोलनों में कोई प्रक्षेप पथ नहीं है बल्कि सभी को अलग-अलग तरंगों के रूप दिखाया गया है; उर्ध्वाधर अक्ष पर तरंग फलन के वास्तविक भाग (नीला) और काल्पनिक भाग (लाल) हैं। ''A''–''D'' में [[श्रोडिंगर समीकरण]] के चार अलग-अलग अप्रगामी तरंग वाले हल दिखाये गये हैं। ''E''–''F'' में भी श्रोडिंगर समीकरण के दो हल दिखाये गये हैं लेकिन वो अप्रगामी तरंगे नहीं हैं।]] [[File:Indeterminacy principle.gif|thumb|शुरूआत में पूर्णतः स्थायी कण का तरंग फलन]] [[क्वांटम यांत्रिकी]] में '''तरंग फलन''' (wave function) अथवा '''तरंगफलन''' (wavefunction) विलगित क्वांटम निकाय की [[क्वांटम अवस्था]] का गणितीय विवरण है। तरंगफलन के लिए प्रयुक्त होने वाले सबसे अधिक सामान्य चिह्न यूनानी अक्षर {{math|''ψ''}} और {{math|Ψ}} (क्रमशः छोटा और बड़ा [[साई (अक्षर)|साई]]) हैं। क्वांटम यांत्रिकी के [[अध्यारोपण सिद्धान्त]] के अनुसार तरंग फलनों को आपस में जोड़कर एवं समिश्र संख्याओं से गुणा करके नया तरंग फलन प्राप्त किया जा सकता है एवं इससे [[हिल्बर्ट समष्टि]] का निर्माण होता है। दो तरंग फलनों का आंतरिक गुणन उनके अतिव्यापन का माप होता है। इसका उपयोग क्वांटम यांत्रिकी की मूलभूत प्रायिक्ता को परिभाषित करने में किया जाता है। संक्रम प्रायिकताओं को आन्तरिक गुणन से सम्बम्ध करने वाले नियम को [[बॉर्न नियम]] कहा जाता है। [[श्रोडिंगर समीकरण]] की सहायता से तरंग फलन के समय के साथ विकास को निर्धारित किया जाता है और तरंग फलन गुणात्मक रूप से अन्य तरंगों की तरह ही व्यवहार करता है। इन अन्य [[तरंग|तरंगों]] में [[महासागरीय तरंगे]] और रज्जु तरंगे शामिल हैं। इस व्यवहार का कारण श्रोडिंगर समीकरण का गणितीय रूप से [[तरंग समीकरण]] होना है। इससे ही इसके नाम "तरंग फलन" को समझा जा सकता है और इससे ही [[तरंग-कण द्वैतता]] उत्पन होती है। हालांकि क्वांटम यांत्रिकी में तरंग फलन किसी प्रकार की भौतिक घटना का वर्णन करता है या नहीं, यह विभिन्न व्याख्याओं पर निर्भर करता है। ये व्याख्यायें [[चिरसम्मत भौतिकी|चिरसम्मत यांत्रिक]] तरंगों से मूलभूत रूप से अलग है।{{sfn|Born|1927|pp=354–357}}{{sfn|Heisenberg|1958|p=143}}<ref>[[Werner Heisenberg|Heisenberg, W.]] (1927/1985/2009). Heisenberg is translated by {{harvnb|Camilleri|2009|p=71}}, (from {{harvnb|Bohr|1985|p=142}}).</ref>{{sfn|Murdoch|1987|p=43}}{{sfn|de Broglie|1960|p=48}}{{sfn|Landau|Lifshitz|1977|p=6}}{{sfn|Newton|2002|pp=19–21}} ==सन्दर्भ== {{reflist}} [[श्रेणी:तरंग]] lhzxij7gz0lxvnugkgaq8efshf192q6 6543677 6543676 2026-04-24T17:38:41Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[सदस्य वार्ता:Thoji]] को [[तरंग फलन]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 6543676 wikitext text/x-wiki [[File:Quantum harmonic oscillators animation.gif|thumb|upright=1.25|एकल प्रचक्रण रहित कण के लिए [[क्वांटम सरल आवर्ती दोलक]]। दोलनों में कोई प्रक्षेप पथ नहीं है बल्कि सभी को अलग-अलग तरंगों के रूप दिखाया गया है; उर्ध्वाधर अक्ष पर तरंग फलन के वास्तविक भाग (नीला) और काल्पनिक भाग (लाल) हैं। ''A''–''D'' में [[श्रोडिंगर समीकरण]] के चार अलग-अलग अप्रगामी तरंग वाले हल दिखाये गये हैं। ''E''–''F'' में भी श्रोडिंगर समीकरण के दो हल दिखाये गये हैं लेकिन वो अप्रगामी तरंगे नहीं हैं।]] [[File:Indeterminacy principle.gif|thumb|शुरूआत में पूर्णतः स्थायी कण का तरंग फलन]] [[क्वांटम यांत्रिकी]] में '''तरंग फलन''' (wave function) अथवा '''तरंगफलन''' (wavefunction) विलगित क्वांटम निकाय की [[क्वांटम अवस्था]] का गणितीय विवरण है। तरंगफलन के लिए प्रयुक्त होने वाले सबसे अधिक सामान्य चिह्न यूनानी अक्षर {{math|''ψ''}} और {{math|Ψ}} (क्रमशः छोटा और बड़ा [[साई (अक्षर)|साई]]) हैं। क्वांटम यांत्रिकी के [[अध्यारोपण सिद्धान्त]] के अनुसार तरंग फलनों को आपस में जोड़कर एवं समिश्र संख्याओं से गुणा करके नया तरंग फलन प्राप्त किया जा सकता है एवं इससे [[हिल्बर्ट समष्टि]] का निर्माण होता है। दो तरंग फलनों का आंतरिक गुणन उनके अतिव्यापन का माप होता है। इसका उपयोग क्वांटम यांत्रिकी की मूलभूत प्रायिक्ता को परिभाषित करने में किया जाता है। संक्रम प्रायिकताओं को आन्तरिक गुणन से सम्बम्ध करने वाले नियम को [[बॉर्न नियम]] कहा जाता है। [[श्रोडिंगर समीकरण]] की सहायता से तरंग फलन के समय के साथ विकास को निर्धारित किया जाता है और तरंग फलन गुणात्मक रूप से अन्य तरंगों की तरह ही व्यवहार करता है। इन अन्य [[तरंग|तरंगों]] में [[महासागरीय तरंगे]] और रज्जु तरंगे शामिल हैं। इस व्यवहार का कारण श्रोडिंगर समीकरण का गणितीय रूप से [[तरंग समीकरण]] होना है। इससे ही इसके नाम "तरंग फलन" को समझा जा सकता है और इससे ही [[तरंग-कण द्वैतता]] उत्पन होती है। हालांकि क्वांटम यांत्रिकी में तरंग फलन किसी प्रकार की भौतिक घटना का वर्णन करता है या नहीं, यह विभिन्न व्याख्याओं पर निर्भर करता है। ये व्याख्यायें [[चिरसम्मत भौतिकी|चिरसम्मत यांत्रिक]] तरंगों से मूलभूत रूप से अलग है।{{sfn|Born|1927|pp=354–357}}{{sfn|Heisenberg|1958|p=143}}<ref>[[Werner Heisenberg|Heisenberg, W.]] (1927/1985/2009). Heisenberg is translated by {{harvnb|Camilleri|2009|p=71}}, (from {{harvnb|Bohr|1985|p=142}}).</ref>{{sfn|Murdoch|1987|p=43}}{{sfn|de Broglie|1960|p=48}}{{sfn|Landau|Lifshitz|1977|p=6}}{{sfn|Newton|2002|pp=19–21}} ==सन्दर्भ== {{reflist}} [[श्रेणी:तरंग]] lhzxij7gz0lxvnugkgaq8efshf192q6 केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान 0 1329429 6543693 6516573 2026-04-24T18:42:06Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543693 wikitext text/x-wiki {{Infobox protected area | name = केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान | iucn_category = II | photo = Maobitou Cape 01.jpg | photo_caption = केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान से केप माओबिटौ का दृश्य | map_image = Kenting-National-Park-Map-Taiwan.png | map_caption = ताइवान में केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान की स्थिति | map_width = 200 | location = [[ताइवान]] | nearest_city = [[हेंगचुन प्रायद्वीप]] | coordinates = {{coords|21.98|120.797|region:TW-PIF|display=inline, title}} | area_km2 = 333 | established = 1 जनवरी 1984 | visitation_num = 8,376,708 | visitation_year = 2014 | governing_body = केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान प्रशासन कार्यालय | url = http://www.ktnp.gov.tw/en/ }} '''केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान''' (चीनी: 墾丁) जिसे आमतौर पर '''किंडिंग''' के नाम से भी जाना जाता है, [[पिंगटुंग काउंटी]], [[ताइवान]] के [[हेंगचुन प्रायद्वीप]] पर स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है, जो [[चेंगचुन]] और [[मंझोउ]] शहर से सटता है। 1 जनवरी 1984 को स्थापित यह राष्ट्रीय उद्यान [[ताइवान]] का सबसे पुराना और मुख्य द्वीप पर सबसे दक्षिणी बिन्दु पर स्थित राष्ट्रीय उद्यान है, जो [[बाशी चैनल]] के साथ [[ताइवान|ताइवान द्वीप]] के सबसे दक्षिणी क्षेत्र को घेरता है। [[शासकीय यूआं]] के आंतरिक मंत्रालय द्वारा प्रशासित यह राष्ट्रीय उद्यान अपनी [[उष्णकटिबंधीय]] जलवायु और धूप, सुंदर पर्वत और समुद्र तट के लिए जाना जाता है। हर साल मार्च में आयोजित [[स्प्रिंग स्क्रीम रॉक-बैंड उत्सव]]<ref>{{Cite web|url=https://springscream.com/|title=www.springscream.com|website=www.springscream.com|access-date=28 नवंबर 2021|archive-date=4 अक्तूबर 1999|archive-url=https://web.archive.org/web/19991004043232/https://springscream.com/|url-status=dead}}</ref> के दौरान यहाँ आने वालो की संख्या बढ़ जाती है। 2016 में 50 लाख 84 हजार आगंतुकों के साथ यह [[ताइवान]] में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल रहा था।<ref>{{cite book |last1=Collins |first1=N. Mark |title=The Conservation Atlas of Tropical Forests: Asia and the Pacifics |date=1991 |publisher=Springer |isbn=9781349120307 |page=123 |url=https://books.google.com/books?id=UTeuCwAAQBAJ&pg=PA123}}</ref><ref>{{cite news|url=http://www.taiwannews.com.tw/en/news/3136341|title=Kenting is Taiwan’s most popular national park|author=Matthew Strong|publisher=Taiwan News|date=2017-04-08|access-date=2017-04-08|archive-date=10 अप्रैल 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170410050427/http://www.taiwannews.com.tw/en/news/3136341|url-status=dead}}</ref> ==भौगोलिक परिस्थिति== केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान में लगभग 181 वर्ग किलोमीटर (70 वर्ग मील) भूमि, 152 वर्ग किलोमीटर (59 वर्ग मील) समुद्र शामिल है, जिसका फैलाव 333 वर्ग किलोमीटर (129 वर्ग मील) है। केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान के दो भाग [[नान वान]] और [[केले की खाड़ी]] [[प्रशांत महासागर]], [[ताइवान जलसंधि]] और [[लूज़ोन जलसन्धि]] से घिरी हुई है। उद्यान [[काऊशुंग]] से 90 किलोमीटर (56 मील) दूर है और [[ताइनान]] से 140 किलोमीटर (87 मील) दूर है। केंटिंग राष्ट्रीय उद्यान द्वारा दावा किया गया परिदृश्य लंबे और संकीर्ण हेंगचुन लॉन्गिट्यूडिनल घाटी द्वारा दो भागों में विभाजित है, जो उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ है। मैदान जो [[रिफ़्ट घाटी]] से बना है, उसमें एक विशाल झील है जिसे "लोंग्लुआन झील" कहा जाता है, इसके साथ में पूर्व में मूंगा टेबललैंड और चूना पत्थर की गुफाएं भी हैं। कोरल टेबललैंड के पूर्व की ओर अद्वितीय रेत नदियों है एवं हवाओं और नदियों के संयुक्त प्रभावों के साथ-साथ मूंगा चट्टानों, धँसी हुई गुफाओं और स्टैलेक्टाइट्स के संयुक्त प्रभाव से बने रेत के झरने हैं।<ref name= CWB>{{cite web | url = http://www.cwb.gov.tw/V7e/climate/# | title = Climate | publisher = [[Central Weather Bureau]] | access-date = 28 नवंबर 2021 | archive-date = 12 जून 2017 | archive-url = https://web.archive.org/web/20170612231406/http://www.cwb.gov.tw/V7e/climate/ | url-status = dead }}</ref> 1860 के दशक में कई जहाजों के टूटने के बाद [[चीन|चीनी]] सरकार के समक्ष [[अमेरिका|अमेरिकी]] और [[जापान|जापानी]] सरकारों द्वारा अनुरोधों किया गया जिसके बाद यहाँ एक लाइटहाउस का निर्माण किया गया जो 1883 में बनकर पूरा हुआ। इसे [[एलुआनबी लाइटहाउस]] का नाम दिया गया है।<ref name="Chanson_2007">{{cite book|author=Chanson, H.|author-link=Hubert Chanson|title= Coastal Observations: Erluanbi, Southern Taiwan |url= http://espace.library.uq.edu.au/view.php?pid=UQ:23913 |publisher=Shore & Beach, Vol. 75, No. 2, pp. 36-39 (ISSN 0037-4237) |year=2007 }}</ref> ==सन्दर्भ== {{Reflist}} [[श्रेणी:ताइवान का भूगोल]] [[श्रेणी:ताइवान]] d4wbckbhmofq16ixpverzy33m4ch1s9 मोहिउद्दीन नगर 0 1336703 6543633 6542838 2026-04-24T14:37:20Z Mohiuddin Nagar 921342 कड़ियाँ लगाई 6543633 wikitext text/x-wiki {{Infobox settlement |name = मोहिउद्दीन नगर |other_name = Mohiuddin Nagar |image = High School Mohiuddin nagar.jpg |image_caption = मोहिउद्दीन नगर उच्च माध्यमिल विद्यालय |pushpin_label = मोहिउद्दीन नगर |pushpin_map = India Bihar |coordinates = {{coord|25.574|85.673|display=inline, title}} |pushpin_map_caption = बिहार में स्थिति |subdivision_type = देश |subdivision_name = {{IND}} |subdivision_type1 = [[भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश|प्रान्त]] |subdivision_name1 = [[बिहार]] |subdivision_type2 = [[भारत के ज़िले|ज़िला]] |subdivision_name2 = [[समस्तीपुर ज़िला]] |elevation_m = |population_total = 13078 |population_as_of = 2011 |demographics_type1 = भाषा |demographics1_title1= प्रचलित |demographics1_info1= [[हिन्दी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[अंगिका भाषा|अंगिका]] |timezone1 = [[भारतीय मानक समय|भामस]] |utc_offset1 = +5:30 |postal_code_type = [[पिनकोड]] |postal_code = |area_code_type = दूरभाष कोड |area_code = |registration_plate = |website = }} '''मोहिउद्दीन नगर''' (Mohiuddin Nagar) [[भारत]] के [[बिहार]] राज्य के [[समस्तीपुर ज़िले]] में स्थित एक नगरएवं प्रखंड है।<ref>"[https://books.google.com/books?id=dSZ987-0Fb8C Bihar Tourism: Retrospect and Prospect] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170118113423/https://books.google.com/books?id=dSZ987-0Fb8C |date=18 जनवरी 2017 }}," Udai Prakash Sinha and Swargesh Kumar, Concept Publishing Company, 2012, ISBN 9788180697999</ref><ref>"[https://books.google.com/books?id=MMmNVZ4mP98C Revenue Administration in India: A Case Study of Bihar]," G. P. Singh, Mittal Publications, 1993, ISBN 9788170993810</ref> '''मोहीउद्दीन नगर की शिक्षण संस्थाएं''' मोहिउद्दीन नगर शिक्षा के क्षेत्र में भी कभी उन्नत रहा है।यहां बहुत - सी शिक्षण संस्थाएं कार्यरत हैं और ज्ञान का प्रकाश फैला रही हैं। कुछ प्रमुख शिक्षण संस्थाएं निम्नांकित हैं - '''महाविद्यालय''' * राम बहादुर सिंह महाविद्यालय, अंदौर * डॉ 0 जगन्नाथ मिश्र तपेश्वर सिंह अनुग्रह नारायण सिंह इंटर कॉलेज, सुल्तानपुर मोहिउद्दीन। * के 0एस 0एस 0 कॉलेज,कोकिल कुंज,मोहिउद्दीन नगर। '''+2 उच्च विद्यालय''' * राजकीय उच्च विद्यालय,मोहिउद्दीन नगर * विश्वनाथ राम बहादुर सिंह उच्च विद्यालय, अंदौर। * प्रभुनाथ सिंह उच्च विद्यालय सुल्तानपुर पश्चिम * राजकीयकृत उच्च विद्यालय सुल्तानपुर पूर्व * राणा जनार्दन सिंह तारती उच्च विद्यालय,पतसिया। * अनुग्रह नारायण सिंह बालिका उच्च विद्यालय सुल्तानपुर। ''' उत्क्रमित उच्च विद्यालय''' प्रखंड में बहुत से उत्क्रमित उच्च विद्यालय हैं जो मध्य विद्यालय को उत्क्रमित कर बनाए गए हैं,जहां अब 12वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है। ''' प्राथमिक और मध्य विद्यालय''' प्रखंड के प्रायः हर गांव में प्राथमिक विद्यालय हैं। हर पंचायत में कम से कम एक मध्य विद्यालय हैं। कई उर्दू मकतब भी हैं। == इन्हें भी देखें == * [[समस्तीपुर ज़िला]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} {{बिहार}} [[श्रेणी:बिहार के शहर]] [[श्रेणी:समस्तीपुर जिला]] [[श्रेणी:समस्तीपुर ज़िले के नगर]] hdsxcy7sf2de6zysdv96pmnihmvvtpw सदस्य वार्ता:GKM Gautam Kumar Maurya 3 1353158 6543838 5469866 2026-04-25T11:12:03Z Gkm563 898271 6543838 wikitext text/x-wiki {{सदस्य पृष्ठ}} {{Infobox person | name = गौतम कुमार मौर्य | image = Gautam_Kumar_Maurya.jpg | caption = Gautam Kumar Maurya (GKM) | birth_place = उत्तर प्रदेश, भारत | occupation = छात्र, फुल-स्टैक डेवलपर | known_for = वेब डेवलपमेंट, हैकाथॉन, टेक कम्युनिटी नेतृत्व | other_names = GKM, gkm563 }} '''गौतम कुमार मौर्य<ref>https://www.google.com/search?q=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE+%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8+%E0%A4%B9%E0%A5%88%3F&sca_esv=17de63e8a22fe1ba&biw=1536&bih=695&sxsrf=ANbL-n5BOvTcPTNQ4SGADNVl5zIF12EhAQ%3A1776829117780&ei=vULoacmqL4uvseMPv8f5uAE&ved=0ahUKEwiJ_ZCjxICUAxWLV2wGHb9jHhcQ4dUDCBE&uact=5&oq=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE+%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8+%E0%A4%B9%E0%A5%88%3F&gs_lp=Egxnd3Mtd2l6LXNlcnAiPuCkl-CljOCkpOCkriDgpJXgpYHgpK7gpL7gpLAg4KSu4KWM4KSw4KWN4KSvIOCkleCljOCkqCDgpLngpYg_MggQABiABBiiBDIFEAAY7wUyBRAAGO8FMggQABiABBiiBDIIEAAYgAQYogRI-yFQAFgAcAB4AJABAJgB3gGgAd4BqgEDMi0xuAEDyAEA-AEC-AEBmAIBoALlAZgDAJIHAzItMaAH2QKyBwMyLTG4B-UBwgcDMi0xyAcEgAgA&sclient=gws-wiz-serp</ref>''' (अंग्रेज़ी: ''Gautam Kumar Maurya<ref>https://www.google.com/search?q=Who+is+Gautam+Kumar+Maurya+GKM&oq=Who+is+Gautam+Kumar+Maurya+GKM&gs_lcrp=EgZjaHJvbWUyBggAEEUYQDIGCAEQIxgnMgcIAhAAGO8FMgoIAxAAGIAEGKIEMgoIBBAAGIAEGKIEMgcIBRAAGO8F0gEJMjQ0MzJqMGoxqAIAsAIA&sourceid=chrome&ie=UTF-8</ref>''), जिन्हें '''GKM''' और '''gkm563''' के नाम से जाना जाता है, भारत के एक छात्र, फुल-स्टैक वेब डेवलपर, और तकनीकी समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं। वे [[United Institute of Technology]] (प्रयागराज) में बी.टेक (कंप्यूटर साइंस – डेटा साइंस) के छात्र हैं।<ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा == गौतम कुमार मौर्य उत्तर प्रदेश<ref>https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6</ref> के निवासी हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम में प्राप्त की। वर्तमान में वे [[United Institute of Technology]] (प्रयागराज) में बी.टेक (कंप्यूटर साइंस – डेटा साइंस) (2024–2028) के छात्र हैं। वे अपने अध्ययन के साथ-साथ नियमित रूप से नवीन तकनीकों, प्रोग्रामिंग भाषाओं, आधुनिक टेक स्टैक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से संबंधित अवधारणाओं का अध्ययन एवं व्यावहारिक अभ्यास कर रहे हैं।<ref name="github">https://github.com/gkm563</ref> स्नातक के प्रथम सेमेस्टर में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए शीर्ष 5 छात्रों में स्थान प्राप्त किया।<ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> उन्होंने कक्षा 12 में लगभग 92.7% अंक प्राप्त किए। इससे पूर्व कक्षा 11 में वे अपने विद्यालय के शीर्ष छात्रों में सम्मिलित रहे, जबकि कक्षा 10 में उन्होंने लगभग 91% अंक अर्जित किए।<ref name="school">शैक्षणिक उपलब्धियाँ (LinkedIn प्रोफ़ाइल एवं सार्वजनिक पोस्ट)</ref> == तकनीकी रुचियाँ == * डेटा साइंस एवं मशीन लर्निंग * फुल-स्टैक वेब डेवलपमेंट * साइबर सिक्योरिटी एवं एथिकल हैकिंग * Data Structures एवं Algorithms == कौशल == '''Frontend:''' * HTML, CSS, JavaScript * React, Tailwind CSS '''Backend:''' * Python (Flask, Django), PHP '''Database:''' * MySQL, MongoDB, Firebase '''अन्य:''' * Git, GitHub * Network Security, OSINT * Competitive Programming == करियर एवं नेतृत्व == गौतम ने विभिन्न तकनीकी संगठनों में नेतृत्व भूमिकाएँ निभाई हैं: * Technical Head<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7429855434125099009-y5PP?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – GFG UIT * Technical Head<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7434017741105319936-If9Q?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – UDTech India * Technical Associate<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7451554253183123456-5xHx?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – TechEra * Volunteer<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7436831300369461248/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3BzqZ7iyzVRd2CfHRJCAC55w%3D%3D</ref> – GDG Prayagraj * Core Team Member<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7396874926940516352/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3BzqZ7iyzVRd2CfHRJCAC55w%3D%3D</ref> – GSA UIT * Campus Ambassador – MyGov India * Ethical Hacking Intern – CodeResite <ref name="linkedin"/> == प्रमुख परियोजनाएँ == === CampusClick === एक प्लेटफॉर्म जो छात्रों को तकनीकी इवेंट्स और हैकाथॉन खोजने और प्रबंधित करने की सुविधा देता है। === PDFBAZI === एक वेब आधारित PDF टूल जिसमें Merge, Split, Compress, Convert, Watermark और Password Protection जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। === Prayagraj Rooms & Homes === एक छात्र-केंद्रित प्लेटफॉर्म जो प्रयागराज में छात्रों को आसानी से किराए के कमरे खोजने और सूचीबद्ध करने में सहायता करता है। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == हैकाथॉन एवं तकनीकी गतिविधियाँ == गौतम ने कई राष्ट्रीय एवं कॉलेज स्तर के हैकाथॉन में भाग लिया है: * Smart India Hackathon 2025 (Internal Round Selected) <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7375799729890234368/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Uhack 4.0 – Grand Finale (Top 65) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7440029285744009218/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * SRM Builds 7.0 – 36 घंटे राष्ट्रीय हैकाथॉन में भागीदारी <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7439008836457275393/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> उन्होंने कई इवेंट्स में टीम लीडर के रूप में कार्य किया और प्रोजेक्ट्स को scratch से विकसित किया। == इवेंट आयोजन एवं नेतृत्व == गौतम ने कई बड़े तकनीकी इवेंट्स का आयोजन और नेतृत्व किया: * “Vibe Coding Hack” (500+ प्रतिभागी)<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7396921137391267840/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> – नेतृत्व और प्रबंधन * GeeksforGeeks Mentorship Session <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7440832250209796096/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref>– आयोजन * GFG Orientation Session<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7430663894383165440/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> – आयोजन * GDG और AI इवेंट्स में सक्रिय योगदान इन आयोजनों ने उन्हें वास्तविक जीवन में टीम मैनेजमेंट, समय प्रबंधन और नेतृत्व कौशल विकसित करने में सहायता की। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == उपलब्धियाँ == * 1st Place – WebDie (ENIGMA XIII Tech Fest) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7398539997429207040/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * 1st Place – GDG Quiz Competition <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7380672868176728065/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Top 5 Rank – AKTU Semester <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7382628564225093632/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Dainik Jagran<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7206263903733833729/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> द्वारा सम्मानित * Google Cloud Skills Boost<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7199743020471103488/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> में प्रथम स्थान == प्रशिक्षण एवं प्रमाणपत्र == * CS50x – Harvard University <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7304499463232897025/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Ethical Hacking Internship – CodeResite<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7361723624686276609/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Generative AI Bootcamp * 30+ तकनीकी प्रमाणपत्र == तकनीकी समुदाय एवं सहभागिता == गौतम विभिन्न तकनीकी समुदायों और इवेंट्स में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं: * DevFest (GDG) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7256139145574588416/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * FlutterFlow Connect * Startup Confluence <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7272606796442181633/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Web3 Community Events * IIT Delhi BECon (Campus Ambassador) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7424083732367863808/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> == ऑनलाइन उपस्थिति == * GitHub: https://github.com/gkm563 * LinkedIn: https://www.linkedin.com/in/gkm563 * Portfolio: https://gkm563.github.io == व्यक्तिगत दृष्टिकोण == गौतम "Learning by Building" सिद्धांत में विश्वास रखते हैं। वे प्रोजेक्ट्स, हैकाथॉन और समुदायिक गतिविधियों के माध्यम से लगातार सीखते और अपने कौशल को विकसित करते हैं। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == सन्दर्भ == <references/> <ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> <ref name="github">https://github.com/gkm563</ref> <ref name="portfolio">https://gkm563.github.io</ref> == बाहरी कड़ियाँ == * [https://github.com/gkm563 GitHub] * [https://www.linkedin.com/in/gkm563 LinkedIn] * [https://gkm563.github.io Portfolio] * [https://instagram.com/gkm3563 Instagram] * [https://x.com/gkm563 X (Twitter)] 3kbhy44kuyfqx3jad31ex3m36qnaf64 6543848 6543838 2026-04-25T11:36:30Z AMAN KUMAR 911487 शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#स3|शीह स3]]) 6543848 wikitext text/x-wiki {{db-notwebhost}} {{सदस्य पृष्ठ}} {{Infobox person | name = गौतम कुमार मौर्य | image = Gautam_Kumar_Maurya.jpg | caption = Gautam Kumar Maurya (GKM) | birth_place = उत्तर प्रदेश, भारत | occupation = छात्र, फुल-स्टैक डेवलपर | known_for = वेब डेवलपमेंट, हैकाथॉन, टेक कम्युनिटी नेतृत्व | other_names = GKM, gkm563 }} '''गौतम कुमार मौर्य<ref>https://www.google.com/search?q=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE+%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8+%E0%A4%B9%E0%A5%88%3F&sca_esv=17de63e8a22fe1ba&biw=1536&bih=695&sxsrf=ANbL-n5BOvTcPTNQ4SGADNVl5zIF12EhAQ%3A1776829117780&ei=vULoacmqL4uvseMPv8f5uAE&ved=0ahUKEwiJ_ZCjxICUAxWLV2wGHb9jHhcQ4dUDCBE&uact=5&oq=%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE+%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8+%E0%A4%B9%E0%A5%88%3F&gs_lp=Egxnd3Mtd2l6LXNlcnAiPuCkl-CljOCkpOCkriDgpJXgpYHgpK7gpL7gpLAg4KSu4KWM4KSw4KWN4KSvIOCkleCljOCkqCDgpLngpYg_MggQABiABBiiBDIFEAAY7wUyBRAAGO8FMggQABiABBiiBDIIEAAYgAQYogRI-yFQAFgAcAB4AJABAJgB3gGgAd4BqgEDMi0xuAEDyAEA-AEC-AEBmAIBoALlAZgDAJIHAzItMaAH2QKyBwMyLTG4B-UBwgcDMi0xyAcEgAgA&sclient=gws-wiz-serp</ref>''' (अंग्रेज़ी: ''Gautam Kumar Maurya<ref>https://www.google.com/search?q=Who+is+Gautam+Kumar+Maurya+GKM&oq=Who+is+Gautam+Kumar+Maurya+GKM&gs_lcrp=EgZjaHJvbWUyBggAEEUYQDIGCAEQIxgnMgcIAhAAGO8FMgoIAxAAGIAEGKIEMgoIBBAAGIAEGKIEMgcIBRAAGO8F0gEJMjQ0MzJqMGoxqAIAsAIA&sourceid=chrome&ie=UTF-8</ref>''), जिन्हें '''GKM''' और '''gkm563''' के नाम से जाना जाता है, भारत के एक छात्र, फुल-स्टैक वेब डेवलपर, और तकनीकी समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं। वे [[United Institute of Technology]] (प्रयागराज) में बी.टेक (कंप्यूटर साइंस – डेटा साइंस) के छात्र हैं।<ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा == गौतम कुमार मौर्य उत्तर प्रदेश<ref>https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6</ref> के निवासी हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम में प्राप्त की। वर्तमान में वे [[United Institute of Technology]] (प्रयागराज) में बी.टेक (कंप्यूटर साइंस – डेटा साइंस) (2024–2028) के छात्र हैं। वे अपने अध्ययन के साथ-साथ नियमित रूप से नवीन तकनीकों, प्रोग्रामिंग भाषाओं, आधुनिक टेक स्टैक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से संबंधित अवधारणाओं का अध्ययन एवं व्यावहारिक अभ्यास कर रहे हैं।<ref name="github">https://github.com/gkm563</ref> स्नातक के प्रथम सेमेस्टर में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए शीर्ष 5 छात्रों में स्थान प्राप्त किया।<ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> उन्होंने कक्षा 12 में लगभग 92.7% अंक प्राप्त किए। इससे पूर्व कक्षा 11 में वे अपने विद्यालय के शीर्ष छात्रों में सम्मिलित रहे, जबकि कक्षा 10 में उन्होंने लगभग 91% अंक अर्जित किए।<ref name="school">शैक्षणिक उपलब्धियाँ (LinkedIn प्रोफ़ाइल एवं सार्वजनिक पोस्ट)</ref> == तकनीकी रुचियाँ == * डेटा साइंस एवं मशीन लर्निंग * फुल-स्टैक वेब डेवलपमेंट * साइबर सिक्योरिटी एवं एथिकल हैकिंग * Data Structures एवं Algorithms == कौशल == '''Frontend:''' * HTML, CSS, JavaScript * React, Tailwind CSS '''Backend:''' * Python (Flask, Django), PHP '''Database:''' * MySQL, MongoDB, Firebase '''अन्य:''' * Git, GitHub * Network Security, OSINT * Competitive Programming == करियर एवं नेतृत्व == गौतम ने विभिन्न तकनीकी संगठनों में नेतृत्व भूमिकाएँ निभाई हैं: * Technical Head<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7429855434125099009-y5PP?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – GFG UIT * Technical Head<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7434017741105319936-If9Q?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – UDTech India * Technical Associate<ref>https://www.linkedin.com/posts/activity-7451554253183123456-5xHx?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAELRmwcB5D6Nca6MLh8d-CklqBAald3YYwA</ref> – TechEra * Volunteer<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7436831300369461248/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3BzqZ7iyzVRd2CfHRJCAC55w%3D%3D</ref> – GDG Prayagraj * Core Team Member<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7396874926940516352/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3BzqZ7iyzVRd2CfHRJCAC55w%3D%3D</ref> – GSA UIT * Campus Ambassador – MyGov India * Ethical Hacking Intern – CodeResite <ref name="linkedin"/> == प्रमुख परियोजनाएँ == === CampusClick === एक प्लेटफॉर्म जो छात्रों को तकनीकी इवेंट्स और हैकाथॉन खोजने और प्रबंधित करने की सुविधा देता है। === PDFBAZI === एक वेब आधारित PDF टूल जिसमें Merge, Split, Compress, Convert, Watermark और Password Protection जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। === Prayagraj Rooms & Homes === एक छात्र-केंद्रित प्लेटफॉर्म जो प्रयागराज में छात्रों को आसानी से किराए के कमरे खोजने और सूचीबद्ध करने में सहायता करता है। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == हैकाथॉन एवं तकनीकी गतिविधियाँ == गौतम ने कई राष्ट्रीय एवं कॉलेज स्तर के हैकाथॉन में भाग लिया है: * Smart India Hackathon 2025 (Internal Round Selected) <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7375799729890234368/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Uhack 4.0 – Grand Finale (Top 65) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7440029285744009218/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * SRM Builds 7.0 – 36 घंटे राष्ट्रीय हैकाथॉन में भागीदारी <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7439008836457275393/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> उन्होंने कई इवेंट्स में टीम लीडर के रूप में कार्य किया और प्रोजेक्ट्स को scratch से विकसित किया। == इवेंट आयोजन एवं नेतृत्व == गौतम ने कई बड़े तकनीकी इवेंट्स का आयोजन और नेतृत्व किया: * “Vibe Coding Hack” (500+ प्रतिभागी)<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7396921137391267840/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> – नेतृत्व और प्रबंधन * GeeksforGeeks Mentorship Session <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7440832250209796096/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref>– आयोजन * GFG Orientation Session<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7430663894383165440/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> – आयोजन * GDG और AI इवेंट्स में सक्रिय योगदान इन आयोजनों ने उन्हें वास्तविक जीवन में टीम मैनेजमेंट, समय प्रबंधन और नेतृत्व कौशल विकसित करने में सहायता की। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == उपलब्धियाँ == * 1st Place – WebDie (ENIGMA XIII Tech Fest) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7398539997429207040/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * 1st Place – GDG Quiz Competition <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7380672868176728065/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Top 5 Rank – AKTU Semester <ref> https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7382628564225093632/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Dainik Jagran<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7206263903733833729/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> द्वारा सम्मानित * Google Cloud Skills Boost<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7199743020471103488/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> में प्रथम स्थान == प्रशिक्षण एवं प्रमाणपत्र == * CS50x – Harvard University <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7304499463232897025/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Ethical Hacking Internship – CodeResite<ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7361723624686276609/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Generative AI Bootcamp * 30+ तकनीकी प्रमाणपत्र == तकनीकी समुदाय एवं सहभागिता == गौतम विभिन्न तकनीकी समुदायों और इवेंट्स में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं: * DevFest (GDG) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7256139145574588416/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * FlutterFlow Connect * Startup Confluence <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7272606796442181633/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> * Web3 Community Events * IIT Delhi BECon (Campus Ambassador) <ref>https://www.linkedin.com/feed/update/urn:li:activity:7424083732367863808/?lipi=urn%3Ali%3Apage%3Ad_flagship3_profile_view_base_featured_details%3Brr4qlJXZQ1%2BEebku7%2Bkz1w%3D%3D</ref> == ऑनलाइन उपस्थिति == * GitHub: https://github.com/gkm563 * LinkedIn: https://www.linkedin.com/in/gkm563 * Portfolio: https://gkm563.github.io == व्यक्तिगत दृष्टिकोण == गौतम "Learning by Building" सिद्धांत में विश्वास रखते हैं। वे प्रोजेक्ट्स, हैकाथॉन और समुदायिक गतिविधियों के माध्यम से लगातार सीखते और अपने कौशल को विकसित करते हैं। <ref>https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> == सन्दर्भ == <references/> <ref name="linkedin">https://www.linkedin.com/in/gkm563</ref> <ref name="github">https://github.com/gkm563</ref> <ref name="portfolio">https://gkm563.github.io</ref> == बाहरी कड़ियाँ == * [https://github.com/gkm563 GitHub] * [https://www.linkedin.com/in/gkm563 LinkedIn] * [https://gkm563.github.io Portfolio] * [https://instagram.com/gkm3563 Instagram] * [https://x.com/gkm563 X (Twitter)] nvu59fvky9uiwuk8a9x4mxknnahz3p8 1947 का जम्मू नरसंहार 0 1358676 6543764 6470646 2026-04-25T05:43:12Z Sequencesolved 173771 कड़ी लगाई। 6543764 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Jammu_and_Kashmir_in_1946_map_of_India_by_National_Geographic.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|305x305पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] रियासत के जम्मू प्रांत (1946) में पुंछ, मीरपुर, रियासी, जम्मू, कठुआ और उधमपुर जिले शामिल थे।]] [[भारत का विभाजन|भारत के विभाजन के]] बाद, अक्टूबर-नवंबर 1947 के दौरान [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर रियासत]] के [[जम्मू (विभाग)|जम्मू क्षेत्र]] में दो लाख मुसलमानो का नरसंहार किया गया और अन्य को पश्चिम पंजाब में भगा दिया गया। इन हत्याओं को चरमपंथी संगठन [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ|राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)]] और डोगरा राजा की राज प्रायोजित सेना ने अंजाम दिया था। {{Sfn|Snedden, What happened to Muslims in Jammu?|2001}} हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने दंगों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। <ref name="Bhasin">{{Cite news|url=http://www.kashmirlife.net/jammu-1947-issue-35-vol-07-89728/|title=Jammu 1947|last=Ved Bhasin|date=17 November 2015|work=Kashmir Life|access-date=4 June 2017|author-link=Ved Bhasin}}</ref> <ref>{{Harvnb|Chattha, Partition and its Aftermath|2009}}; {{Harvnb|Chattha, The Long Shadow of 1947|2016}}</ref> ऐसा माना जाता है कि 20000 से 2 लाख मुसलमानों का नरसंहार किया गया। {{Sfn|Snedden, Understanding Kashmir and Kashmiris|2015|p=167}} इसके बाद आज के [[आज़ाद कश्मीर|पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर]] के [[मीरपुर]] क्षेत्र में कई गैर-मुसलमानों, जिनकी अनुमानित संख्या २०,००० से अधिक है, को पाकिस्तानी कबाइलियों और सैनिकों ने मार डाला। {{Sfn|Snedden, Kashmir: The Unwritten History|2013|p=56}} {{Sfn|Das Gupta, Jammu and Kashmir|2012|p=97}} <ref name="Khalid Hasan">{{Harvard citation text|Hasan, Mirpur 1947|2013}}</ref> जम्मू संभाग के [[राजौरी]] क्षेत्र में कई हिंदू और सिख भी मारे गये थे। <ref name="Bhasin" /> == पृष्ठभूमि == [[चित्र:Sir_Hari_Singh_Bahadur,_Maharaja_of_Jammu_and_Kashmir,_1944.jpg|अंगूठाकार|219x219पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] के [[महाराज हरि सिंह|महाराजा हरि सिंह]]]] == जम्मू मुसलमानों के खिलाफ हिंसा == === नरसंहार === === टिप्पणियों === === मारे गए और विस्थापित हुए लोगों का अनुमान === == राजौरी और मीरपुरी में हिंदुओं और सिखों के खिलाफ हिंसा == === राजौरी === === मीरपुर === == यह सभी देखें == * [[भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा]] * कश्मीर संघर्ष की समयरेखा * [[कश्मीर विवाद|कश्मीर संघर्ष]] * [[भारत का विभाजन]] == टिप्पणियाँ == == संदर्भ == [[श्रेणी:1947 में संघर्ष]] [[श्रेणी:भारत का विभाजन]] g7ypfifdqo4gl2rscqacoaogr39qt8g 6543817 6543764 2026-04-25T10:22:02Z ~2026-25288-32 921794 6543817 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Jammu_and_Kashmir_in_1946_map_of_India_by_National_Geographic.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|305x305पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] रियासत के जम्मू प्रांत (1946) में पुंछ, मीरपुर, रियासी, जम्मू, कठुआ और उधमपुर जिले शामिल थे।]] [[भारत का विभाजन|भारत के विभाजन के]] बाद, अक्टूबर-नवंबर 1947 के दौरान [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर रियासत]] के [[जम्मू (विभाग)|जम्मू क्षेत्र]] में दो लाख मुसलमानो का नरसंहार किया गया और अन्य को पश्चिम पंजाब में भगा दिया गया। इन हत्याओं को चरमपंथी संगठन [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ|राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)]] और डोगरा राजा की राज प्रायोजित सेना ने अंजाम दिया था। {{Sfn|Snedden, What happened to Muslims in Jammu?|2001}} हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने दंगों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। <ref name="Bhasin">{{Cite news|url=http://www.kashmirlife.net/jammu-1947-issue-35-vol-07-89728/|title=Jammu 1947|last=Ved Bhasin|date=17 November 2015|work=Kashmir Life|access-date=4 June 2017|author-link=Ved Bhasin}}</ref> <ref>{{Harvnb|Chattha, Partition and its Aftermath|2009}}; {{Harvnb|Chattha, The Long Shadow of 1947|2016}}</ref> ऐसा माना जाता है कि 20000 से 2 लाख मुसलमानों का नरसंहार किया गया। {{Sfn|Snedden, Understanding Kashmir and Kashmiris|2015|p=167}} इसके बाद आज के [[आज़ाद कश्मीर|पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर]] के [[मीरपुर]] क्षेत्र में कई गैर-मुसलमानों, जिनकी अनुमानित संख्या २०,००० से अधिक है, को पाकिस्तानी कबाइलियों और सैनिकों ने मार डाला। {{Sfn|Snedden, Kashmir: The Unwritten History|2013|p=56}} {{Sfn|Das Gupta, Jammu and Kashmir|2012|p=97}} <ref name="Khalid Hasan">{{Harvard citation text|Hasan, Mirpur 1947|2013}}</ref> जम्मू संभाग के [[राजौरी]] क्षेत्र में कई हिंदू और सिख भी मारे गये थे। <ref name="Bhasin" /> == पृष्ठभूमि == [[चित्र:Sir_Hari_Singh_Bahadur,_Maharaja_of_Jammu_and_Kashmir,_1944.jpg|अंगूठाकार|219x219पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] के [[महाराज हरि सिंह|महाराजा हरि सिंह]]]] == जम्मू मुसलमानों के खिलाफ हिंसा == === नरसंहार === === टिप्पणियों === === मारे गए और विस्थापित हुए लोगों का अनुमान === == राजौरी और मीरपुरी में हिंदुओं और सिखों के खिलाफ हिंसा == === राजौरी === यह बात उस सम === मीरपुर === == यह सभी देखें == * [[भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा]] * कश्मीर संघर्ष की समयरेखा * [[कश्मीर विवाद|कश्मीर संघर्ष]] * [[भारत का विभाजन]] == टिप्पणियाँ == == संदर्भ == [[श्रेणी:1947 में संघर्ष]] [[श्रेणी:भारत का विभाजन]] 6w9cz1itdsb48l60yu0car434dhn1u6 6543821 6543817 2026-04-25T10:50:06Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Sequencesolved|Sequencesolved]] ([[सदस्य वार्ता:Sequencesolved|वार्ता]]) के अवतरण 6543764 पर पुनर्स्थापित : पूर्ववत किया 6543821 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Jammu_and_Kashmir_in_1946_map_of_India_by_National_Geographic.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|305x305पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] रियासत के जम्मू प्रांत (1946) में पुंछ, मीरपुर, रियासी, जम्मू, कठुआ और उधमपुर जिले शामिल थे।]] [[भारत का विभाजन|भारत के विभाजन के]] बाद, अक्टूबर-नवंबर 1947 के दौरान [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर रियासत]] के [[जम्मू (विभाग)|जम्मू क्षेत्र]] में दो लाख मुसलमानो का नरसंहार किया गया और अन्य को पश्चिम पंजाब में भगा दिया गया। इन हत्याओं को चरमपंथी संगठन [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ|राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)]] और डोगरा राजा की राज प्रायोजित सेना ने अंजाम दिया था। {{Sfn|Snedden, What happened to Muslims in Jammu?|2001}} हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने दंगों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। <ref name="Bhasin">{{Cite news|url=http://www.kashmirlife.net/jammu-1947-issue-35-vol-07-89728/|title=Jammu 1947|last=Ved Bhasin|date=17 November 2015|work=Kashmir Life|access-date=4 June 2017|author-link=Ved Bhasin}}</ref> <ref>{{Harvnb|Chattha, Partition and its Aftermath|2009}}; {{Harvnb|Chattha, The Long Shadow of 1947|2016}}</ref> ऐसा माना जाता है कि 20000 से 2 लाख मुसलमानों का नरसंहार किया गया। {{Sfn|Snedden, Understanding Kashmir and Kashmiris|2015|p=167}} इसके बाद आज के [[आज़ाद कश्मीर|पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर]] के [[मीरपुर]] क्षेत्र में कई गैर-मुसलमानों, जिनकी अनुमानित संख्या २०,००० से अधिक है, को पाकिस्तानी कबाइलियों और सैनिकों ने मार डाला। {{Sfn|Snedden, Kashmir: The Unwritten History|2013|p=56}} {{Sfn|Das Gupta, Jammu and Kashmir|2012|p=97}} <ref name="Khalid Hasan">{{Harvard citation text|Hasan, Mirpur 1947|2013}}</ref> जम्मू संभाग के [[राजौरी]] क्षेत्र में कई हिंदू और सिख भी मारे गये थे। <ref name="Bhasin" /> == पृष्ठभूमि == [[चित्र:Sir_Hari_Singh_Bahadur,_Maharaja_of_Jammu_and_Kashmir,_1944.jpg|अंगूठाकार|219x219पिक्सेल| [[जम्मू और कश्मीर (रियासत)|जम्मू और कश्मीर]] के [[महाराज हरि सिंह|महाराजा हरि सिंह]]]] == जम्मू मुसलमानों के खिलाफ हिंसा == === नरसंहार === === टिप्पणियों === === मारे गए और विस्थापित हुए लोगों का अनुमान === == राजौरी और मीरपुरी में हिंदुओं और सिखों के खिलाफ हिंसा == === राजौरी === === मीरपुर === == यह सभी देखें == * [[भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा]] * कश्मीर संघर्ष की समयरेखा * [[कश्मीर विवाद|कश्मीर संघर्ष]] * [[भारत का विभाजन]] == टिप्पणियाँ == == संदर्भ == [[श्रेणी:1947 में संघर्ष]] [[श्रेणी:भारत का विभाजन]] g7ypfifdqo4gl2rscqacoaogr39qt8g केटी एडर 0 1369358 6543695 6505139 2026-04-24T19:24:47Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543695 wikitext text/x-wiki {{प्रतिलिपि संपादन|for=अनुवाद के बाद छूटी कुछ व्याकरण गलतियों एवं लहजे|date=मई 2022}} {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=केटी एडर|caption=|birth_date={{circa}} {{birth based on age as of date |20 |2020|04|21}}<ref>{{cite news |title=Will social distancing sidetrack the climate movement? |url=https://www.popsci.com/story/environment/social-distancing-climate-movement-earth-day/ |accessdate=20 May 2020 |work=Popular Science |language=en}}</ref>|birth_place=मिल्वौकी, विस्कॉन्सिन, यू.एस.|known_for=50 माइल्स मोर, फ्यूचर कोएलिशन के संस्थापक|education=शोरवुड हाई स्कूल (2018) <br> स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (2020–)}} [[श्रेणी:Articles with hCards]] '''केटी एडर''' का (जन्म 1999/2000) जो की एक अमेरिकी कार्यकर्ता और सामाजिक उद्यमी हैं, जिन्होंने सामाजिक प्रभाव उपक्रमों 50 मील मोर, किड्स टेल्स, और द फ्यूचर गठबंधन का नेतृत्व किया है, जहां वह वर्तमान में कार्यकारी निदेशक हैं।<ref>{{Cite web|url=https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|title=The Prudential Spirit Of Community Awards|website=spirit.prudential.com|access-date=2018-12-17|archive-date=20 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320041154/https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cnbc.com/2018/11/05/students-will-leave-classes-on-tuesday-as-part-of-the-walkout-to-vote.html|title=Students will leave classes on Tuesday as part of the Walkout to Vote|last=Hess|first=Abigail|date=2018-11-06|website=www.cnbc.com|access-date=2018-12-17}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.businessinsider.com.au/sudents-walking-out-of-classes-today-to-vote-at-the-polls-2018-11|title=Thousands of American students are walking out of classes today and heading to the polls to vote|last=Cranley|first=Ellen|date=2018-11-07|website=Business Insider Australia|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=20 अप्रैल 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210420070808/https://www.businessinsider.com.au/sudents-walking-out-of-classes-today-to-vote-at-the-polls-2018-11|url-status=dead}}</ref> दिसंबर 2019 में, ईडर को कानून और नीति में 30 के तहत 30 फोर्ब्स में से एक नामित किया गया। <ref>https://www.forbes.com/pictures/5ddd7cb0ea103f0006537307/katie-eder-20/#212e4b757fc7</ref> कैटी एडर मधुर स्वभाव के व्यक्ति हैं! == प्रारंभिक जीवन और शिक्षा == एडर का जन्म और पालन-पोषण [[मिल्वौकी, विस्कॉन्सिन]] में हुआ था। <ref>{{Cite web|url=http://www.wuwm.com/post/wisconsin-students-take-protest-house-speakers-backyard|title=Wisconsin Students Take Protest To House Speaker&#039;s Backyard|last=Teich|first=Teran Powell, Joy Powers, Mitch|website=www.wuwm.com|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> केटी ने 2018 में शोरवुड हाई स्कूल से स्नातक किया और 2020 के पतन में [[स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय]] में भाग लेंगे। <ref>{{Cite web|url=https://amysmartgirls.com/katie-eder-on-helping-kids-and-teens-find-their-voices-through-writing-and-marching-ea4e0bf812bf|title=Katie Eder on Helping Kids and Teens Find Their Voices Through Writing and Marching|last=Mason|first=Heather|date=2018-08-28|website=Amy Poehler's Smart Girls|access-date=2018-12-17}}</ref> वह पांच बच्चों में सबसे छोटी है। <ref>{{Cite web|url=http://www.jewishchronicle.org/2015/08/30/shorewood-teen-helps-children-tell-their-unique-stories/|title=Shorewood teen helps children tell their unique stories {{!}} Wisconsin Jewish Chronicle|website=www.jewishchronicle.org|access-date=2018-12-17}}</ref> == सक्रियतावाद == === किड्स टेल्स === जब केटी 13 साल की थी, तो उन्होंने एक गैर-लाभकारी संगठन, किड्स टेल्स की स्थापना की, जो रचनात्मक लेखन कार्यशालाओं को लाने के लिए, किशोरों द्वारा पढ़ाया जाता था, उन बच्चों को, जिनके पास स्कूल के बाहर अनुभव लिखने की पहुंच नहीं है। <ref>{{Cite web|url=https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|title=The Prudential Spirit Of Community Awards|website=spirit.prudential.com|access-date=2018-12-17|archive-date=20 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320041154/https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.jsonline.com/story/news/education/2017/08/25/wisconsin-teens-creative-writing-program-kids-tales-has-global-reach/591035001/|title=Wisconsin teen's creative writing program Kids Tales has global reach|website=Milwaukee Journal Sentinel|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> किड्स टेल्स वर्कशॉप के दौरान, बच्चे एक छोटी कहानी लिखते हैं, जो एक नृविज्ञान, एक वास्तविक पुस्तक में प्रकाशित होती है। <ref>{{Cite web|url=https://ysa.org/eyh-katie-eder/|title=Everyday Young Hero: Katie Eder YSA (Youth Saving America)|website=ysa.org|access-date=2018-12-17|archive-date=1 फ़रवरी 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180201012126/http://ysa.org/eyh-katie-eder/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.literacyworldwide.org/blog/literacy-daily/2016/01/28/teen-takes-writing-inspiration-to-fellow-students|title=Teen Takes Writing Inspiration to Fellow Students|website=www.literacyworldwide.org|access-date=2018-12-17}}</ref> नौ देशों के पंद्रह सौ बच्चों ने किड्स टेल्स कार्यशालाओं में भाग लिया। <ref>{{Cite web|url=http://www.entrepreneurbefore25.com/episodes/102-changing-the-world-while-still-in-high-school-with-katie-eder/|title=102: Changing the world while still in high school with Katie Eder|website=Entrepreneur Before 25|language=en-US|access-date=2018-12-17|archive-date=21 अप्रैल 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210421022134/http://www.entrepreneurbefore25.com/episodes/102-changing-the-world-while-still-in-high-school-with-katie-eder/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/milwaukee/news/2015/09/01/global-literacy-organization-honors-kids-tales.html|title=Global literacy organization honors Kids Tales founder Katie Eder|website=www.bizjournals.com|access-date=2018-12-17}}</ref> किड्स टेल्स ने 400 से अधिक किशोर शिक्षकों को शामिल किया और 90 एंथोलॉजी प्रकाशित कीं। <ref>{{Cite web|url=http://radio.thepeacefund.org/heroes/katie-eder|title=Katie Eder - PEACE Fund Radio Hero of the Week|website=The PEACE Fund|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=20 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320041155/https://radio.thepeacefund.org/heroes/katie-eder|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://untitledtown2018.sched.com/list/descriptions/|title=UntitledTown Book and Author Festival Schedule|website=untitledtown2018.sched.com|access-date=2018-12-17}}</ref> === 50 मील अधिक === 2018 मार्च के बाद हमारे जीवन की घटनाओं का समापन २४ मार्च को हुआ, केटी और उनके हाई स्कूल के अन्य छात्रों ने मैडिसन, WI से जेंसविल, WI, सदन के पूर्व अमेरिकी स्पीकर पॉल रयान के गृहनगर में ५० मील का मार्च आयोजित किया, ताकि उन्हें फोन किया जा सके। बंदूक कानून को अवरुद्ध करने और दफनाने में उनकी भूमिका के लिए <ref>{{Cite web|url=https://yr.media/news/why-this-wisconsin-teen-is-marching-50-miles-to-protest-gun-violence/|title=Why This Wisconsin Teen Is Marching 50 Miles to Protest Gun Violence|date=2018-03-27|website=YR Media|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=2 जून 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220602143134/https://yr.media/news/why-this-wisconsin-teen-is-marching-50-miles-to-protest-gun-violence/|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://mashable.com/2018/03/25/50-miles-more-march-for-our-lives-paul-ryan/|title=Wisconsin high school students to walk 50 miles, dare Paul Ryan not to act on gun reform|last=Ruiz|first=Rebecca|website=Mashable|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> यह 50 मील अधिक मार्च केटी और उसकी टीम को देश भर में # 50more # 50states नामक एक अभियान शुरू करने के लिए अन्य 49 राज्यों को चुनौती देने के लिए 50 Mile March को गृहनगर या अपने NRA समर्थित अधिकारियों में से एक के कार्यालय में रखने की मांग करने के लिए। बंदूक हिंसा को समाप्त करने की कार्रवाई। <ref>{{Cite web|url=https://www.refinery29.com/en-us/2018/03/194639/march-for-our-lives-50-miles-more-wisconsin|title=These Wisconsin High Schoolers Are Marching 50 Miles For Gun Control — To Paul Ryan's Hometown|website=www.refinery29.com|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.newsweek.com/students-take-50-mile-march-paul-ryans-hometown-continue-march-our-lives-860846|title=Students trek 50 miles to Paul Ryan's hometown to continue March For Our Lives|last=PM|first=Tracy Lee On 3/26/18 at 6:26|date=2018-03-26|website=Newsweek|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> ५० माइल्स ने अगस्त २०१] में मैसाचुसेट्स में ५० मील की पैदल यात्रा की। । <ref>{{Cite web|url=https://www.usatoday.com/story/news/nation-now/2018/03/27/wisconsin-students-marching-50-miles-paul-ryans-hometown-action-gun-laws/461407002/|title=Wisconsin students are marching 50 miles to Paul Ryan's hometown for action on gun laws|last=Seyler|first=Lainy|date=March 27, 2018|website=USA Today|archive-url=|archive-date=|access-date=}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.cnn.com/2018/03/25/politics/march-for-our-lives-wisconsin-activism-gun-reform-paul-ryan/index.html|title=In Wisconsin, they're not done marching. Next stop: Paul Ryan's hometown|last=Hamedy|first=Saba|date=March 26, 2018|website=CNN.com|archive-url=|archive-date=|access-date=}}</ref> === भविष्य का गठबंधन === केटी ने देश भर के अन्य युवाओं के नेतृत्व वाले संगठनों के साथ गठबंधन करने के लिए 50 माइल्स मोर का नेतृत्व किया। बस सभी के लिए जगह है। <ref>{{Cite web|url=https://www.thisisinsider.com/sudents-walking-out-of-classes-today-to-vote-at-the-polls-2018-11|title=Thousands of students are walking out of classes today and heading to the polls to vote|last=Cranley|first=Ellen|website=INSIDER|access-date=2018-12-17}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.aljazeera.com/news/2018/11/young-voters-march-shout-walk-vote-181106125006538.html|title=Young voters: We can march, shout and walk out, but we must vote {{!}} USA News {{!}} Al Jazeera|website=www.aljazeera.com|access-date=2018-12-17}}</ref> फ्यूचर गठबंधन संसाधनों और विचारों को साझा करने के लिए संयुक्त राज्य भर में युवाओं के नेतृत्व वाले संगठनों और युवा नेताओं को जोड़ता है। <ref>{{Cite web|url=https://www.axios.com/student-walk-outs-vote-polls-2018-midterm-elections-825a0c2f-2d02-42ae-9ec4-759f7d965986.html|title=Students across the U.S. plan walk-outs to vote in midterm elections|website=Axios|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=31 मार्च 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220331172007/https://www.axios.com/student-walk-outs-vote-polls-2018-midterm-elections-825a0c2f-2d02-42ae-9ec4-759f7d965986.html|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.elitedaily.com/p/what-is-the-walkout-to-vote-young-people-are-taking-their-power-to-the-polls-13092205|title=This Teen Activist Is Giving You One Good Reason Why You Should Get Out & Vote|last=Golden|first=Hannah|website=Elite Daily|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> भावी गठबंधन सितंबर 2018 में चुनाव अभियान वॉकआउट टू वोट के साथ शुरू हुआ। देश भर के 500 से अधिक स्कूलों ने कक्षा से बाहर निकलकर चुनाव में भाग लिया। <ref>{{Cite web|url=https://thehill.com/blogs/blog-briefing-room/news/377923-wisconsin-students-to-march-50-miles-to-ryans-hometown-to|title=Students to march 50 miles to Ryan's hometown to demand gun control|last=Savransky|first=Rebecca|date=2018-03-12|website=TheHill|language=en|access-date=2018-12-17}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://nowthisnews.com/https://nowthisnews.com/videos/politics/wisconsin-students-are-marching-to-paul-ryans-hometown|title=Wisconsin Students Are Marching To Paul Ryan's Hometown|last=nowthisnews|date=2018-03-29|website=NowThis|access-date=2018-12-17}}{{Dead link|date=मई 2022 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> == सम्मान और पुरस्कार == * सामुदायिक पुरस्कार की संभावित आत्मा - राष्ट्रीय सम्मान <ref>{{Cite web|url=https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|title=The Prudential Spirit Of Community Awards|website=spirit.prudential.com|access-date=2018-12-17|archive-date=20 मार्च 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200320041154/https://spirit.prudential.com/honoree/2018/wi/sarah-katie-eder|url-status=dead}}</ref> * डिलर टिक्कन ओलम अवार्ड <ref>{{Cite web|url=https://www.dillerteenawards.org/recipient/sarah-katherine-eder/|title=Award for Jewish Teen Leaders - Diller Teen Tikkun Olam Awards|website=www.dillerteenawards.org|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=16 जनवरी 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210116230155/https://www.dillerteenawards.org/recipient/sarah-katherine-eder/|url-status=dead}}</ref> * थ्री डॉट डैश - ग्लोबल सोशल एंटरप्रेन्योरशिप इन्क्यूबेटर - जस्ट पीस समिट <ref>{{Cite web|url=https://www.threedotdash.org/2017mentorgoals/|title=2017 GTL Goals & Expectations MENTOR|website=three dot dash|language=en-US|access-date=2018-12-17|archive-date=22 अगस्त 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180822054426/http://www.threedotdash.org/2017mentorgoals/|url-status=dead}}</ref> * अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता एसोसिएशन - 30 अंडर 30 अवार्ड <ref>{{Cite web|url=https://www.literacyworldwide.org/docs/default-source/communications/literacy-today/lt-30-under-30-2015.pdf|title=ILA 2015 30 Under Under 30 List|website=www.literacyworldwide.org|access-date=2018-12-17}}</ref> * एएफएस-यूएसए प्रोजेक्ट चेंज - विज़न इन एक्शन अवार्ड <ref>{{Cite web|url=https://www.afsusa.org/returnees/blog/article?article_id=8502|title=Returnee Spotlight on: Sam Harshbarger and Katie Eder|website=Blog|language=en|access-date=2018-12-17|archive-date=27 अगस्त 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160827181951/http://www.afsusa.org/returnees/blog/article/?article_id=8502|url-status=dead}}</ref> == संदर्भ == [[श्रेणी:20वीं सदी में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जन्म वर्ष अज्ञात (जीवित लोग)]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] tmtgu193qczk4rxjpd0cksz4jm6ppm5 केरल पुलिस 0 1408778 6543699 6280365 2026-04-24T21:20:15Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543699 wikitext text/x-wiki {{Infobox law enforcement agency | agencyname = केरल पुलिस | nativename = | nativenamea = {{lang|ml|കേരള പോലീസ്}} | nativenamer = | image_size = 140 | commonname = | abbreviation = केपी | patch = | patchcaption = | logo = Kerala State Police Logo.png | logocaption = [[Emblem]] | badge = | badgecaption = Patch | flag = Flag of Kerala Police.svg | flagcaption = [[झंडा]] | imagesize = | motto = {{lang|ml|മൃദു ഭാവെ ദൃഢ കൃത്യേ}} "Mridhu Bhave Dhrida Kruthye" | mottotranslated = "Soft in Temperament, Firm in Action" മൃദുവായ പെരുമാറ്റം, ദൃഢമായ കർമ്മങ്ങൾ ([[Malayalam]]) | mission = | formedyear = 1956 | formedmonthday = 1 नवंबर | preceding1 = | dissolved = | superseding = | employees = | volunteers = | budget = {{INRConvert|4406|c}} <small>(2021–22 est.)</small><ref>{{cite web|url=https://www.prsindia.org/sites/default/files/budget_files/Kerala%20Budget%20Analysis%202021-22.pdf|date=2021|website=prsindia.org|access-date=15 January 2021|title=Kerala Budget Analysis 2021-2022}}{{Dead link|date=जनवरी 2023 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> | country = भारत | countryabbr = IN | divtype = राज्य | divname = [[केरल]] | divdab = | map = IN-KL.svg | mapcaption = केरल पुलिस का क्षेत्राधिकार | sizearea = | sizepopulation = | legaljuris = opsjuris | governingbody = केरल सरकार | governingbodyscnd = | constitution1 = [[s:Kerala Police Act, 2011]] | police = Yes | local = Yes | speciality = | overviewtype = | overviewbody = [[गृह विभाग (केरल)|गृह विभाग]], [[केरल सरकार]] | headquarters = [[वज़ुथाकौड]], [[तिरुवनंतपुरम]], [[केरल]] - 695010 | hqlocmap = India Kerala Thiruvananthapuram district.svg | hqlocleft = | hqloctop = | hqlocmappoptitle = केरल पुलिस विभाग के अधिकार क्षेत्र का नक्शा। बाईं ओर का नक्शा भारत में केरल को दर्शाता है और दाईं ओर राज्य को लाल रंग में तिरुवनंतपुरम जिले के साथ दिखाता है। | sworntype = | sworn = | unsworntype = | unsworn = | electeetype = मंत्री | minister1name = [[पिनाराई विजयन]] | minister1pfo = <br>[[केरल के मुख्यमंत्री | मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, केरल]]<br/> | chief1name = [[अनिल कांत]], [[भारतीय पुलिस सेवा|आईपीएस]] | chief1position = <br>[[पुलिस महानिदेशक|राज्य पुलिस प्रमुख]], [[केरल राज्य|केरल]] | parentagency = | child1agency = [[तिरुवनंतपुरम सिटी पुलिस]]<br/>[[कोच्चि सिटी पुलिस]]<br/>[[त्रिशूर सिटी पुलिस]]<br/>[[कोल्लम सिटी पुलिस]]<br/>[[केरल थंडरबोल्ट्स]] | unittype = Unit | unitname = {{clist|title=List of units | framestyle = border:none;padding:0; | titlestyle = font-weight:normal;text-align:left;background-color:transparent; | liststyle = list-style-type:disc;text-align:left; | Law and Order | Crime Branch | State Special Branch | Training | Armed Battalion | Coastal Security | State Crime Records Bureau | Protection of Civil Rights | Administration (HQ)}} | officetype = विशिष्ट इकाइयां | officename = {{clist|title=List of units | framestyle = border:none;padding:0; | titlestyle = font-weight:normal;text-align:left;background-color:transparent; | liststyle = list-style-type:disc;text-align:left; | [[Highway Police]] | Tourism Police | Traffic Enforcement | Railway Police | Mounted Police | Coastal Police | Forensic Division | Women Cell | Pink Patrol | [[Police Dog|K9 Squad]] | High-Tech Crime Cell | Anti-Terrorism Squad | Special Operation Group | Bomb Detection and Disposal Squad | Anti-Narcotic Special Action Force}} | provideragency = | uniformedas = | stationtype = पुलिस स्टेशन | stations = 471 | airbases = | lockuptype = | lockups = | vehicle1type = पुलिस वाहन | vehicles1 = [[फ़ोर्स गोरखा]]<br/>[[महिंद्रा बोलेरो]]<br/>[[टाटा सूमो]]<br/>[[महिंद्रा बोलेरो नियो|महिंद्रा टीयूवी300]]<br/>[[टोयोटा इनोवा]] <br/>[[शेवरलेट टवेरा]]<br/>[[महिंद्रा थार]] | vehicle2type = | vehicles2 = | boat1type = | boats1 = स्पीड बोट्स | aircraft1type = | aircraft1 = | animal1type = कुत्ता | animals1 = 82 (<छोटा>41 खोजी कुत्ते</छोटे>) | animal2type = घोड़ा | animals2 = 25 | person1name = | person1reason = | person1type = | programme1 = {{clist|title=List of key Projects | framestyle = border:none;padding:0; | titlestyle = font-weight:normal;text-align:left;background-color:transparent; | liststyle = list-style-type:disc;text-align:center; | [[Student Police Cadet Project]] | Janamaithri Suraksha Project | Kerala Police Cyberdome}} | activity1name = Operation P-Hunt | activity2name = | activitytype = संचालन | anniversary1 = | award1 = | website = {{URL|https://keralapolice.gov.in/}} | footnotes = | reference = }} '''केरल पुलिस''' भारत के [[केरल]] प्रदेश का सर्वोच्च अपराध निवारण संस्था है । इसका मुख्यालय केरल की राजधानी [[तिरुवनंतपुरम]] शहर में स्थित है । वर्ष 1956 में इसका गठन हुआ था । केरल पुलिस का नेतृत्व पुलिस महानिदेशक स्तर का राज्य पुलिस प्रमुख करता है। अनिलकांत आईपीएस केरल के वर्तमान महानिदेशक और राज्य पुलिस प्रमुख हैं। == इतिहास == केरल पुलिस का गठन सबसे पहले वर्ष 1956 में हुआ था । केरल पुलिस का नेतृत्व पुलिस महानिदेशक स्तर का राज्य पुलिस प्रमुख करता है। अनिलकांत आईपीएस केरल के वर्तमान महानिदेशक और राज्य पुलिस प्रमुख हैं। == संरचना == केरल पुलिस केरल राज्य सरकार के गृह मंत्रालय की प्रत्यक्ष देख रेख में कार्य करता है । एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ड़ीजीपी पद पर तैनात हैं । इसके 471 थाने हैं । [[पुलिस महानिदेशक]] रैंक के एक अधिकारी को '''राज्य पुलिस प्रमुख''' और पुलिस विभाग के प्रमुख के रूप में नामित किया जाता है राज्य पुलिस प्रमुख को मुख्यालय में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, पुलिस महानिरीक्षक, पुलिस उप महानिरीक्षक के पद पर अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। उचित पुलिस प्रशासन के लिए, केरल राज्य को दो पुलिस क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। दो क्षेत्र उत्तर क्षेत्र और दक्षिण क्षेत्र हैं, प्रत्येक पुलिस क्षेत्र का नेतृत्व एक पुलिस महानिरीक्षक करता है। पुलिस जोन में दो या दो से अधिक पुलिस रेंज होते हैं। प्रत्येक पुलिस रेंज का नेतृत्व एक पुलिस उपमहानिरीक्षक करता है। प्रत्येक पुलिस रेंज में चार या अधिक पुलिस जिले होते हैं। प्रत्येक पुलिस जिले का नेतृत्व '''जिला पुलिस प्रमुख''' द्वारा पुलिस अधीक्षक के पद के साथ किया जाता है। पुलिस जिले को कई पुलिस उप-विभाजनों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक उप-विभाजन का नेतृत्व पुलिस उपाधीक्षक या सहायक पुलिस आयुक्त करते हैं। एक पुलिस सब-डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में कई पुलिस स्टेशन होते हैं। प्रत्येक पुलिस स्टेशन का नेतृत्व पुलिस निरीक्षक के रैंक के स्टेशन हाउस ऑफिसर द्वारा किया जाता है। पुलिस थाना के भीतर दो विभाग हैं, जो कानून और व्यवस्था विभाग और अपराध जांच विभाग हैं, प्रत्येक का नेतृत्व एक पुलिस उप निरीक्षक करता है। थाना प्रभारी को पुलिस के उप निरीक्षक, पुलिस के सहायक उप निरीक्षक, वरिष्ठ नागरिक पुलिस अधिकारी, नागरिक पुलिस अधिकारी के पद के अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। ग्रामीण पुलिस जिलों के अलावा शहर के पुलिस जिले भी हैं। शहर के पुलिस जिलों का नेतृत्व एक पुलिस आयुक्त करता है। 6 पुलिस कमिश्नरेट हैं। कोच्चि सिटी पुलिस और तिरुवनंतपुरम सिटी पुलिस का नेतृत्व एक पुलिस आयुक्त करता है, जो पुलिस महानिरीक्षक के रैंक का होता है। कोझीकोड शहर पुलिस का नेतृत्व पुलिस उप महानिरीक्षक रैंक के एक अधिकारी द्वारा किया जाता है। शहर के बाकी पुलिस जिलों का नेतृत्व पुलिस आयुक्त करते हैं जो पुलिस अधीक्षक के पद पर होते हैं। == एजन्सियां == केरल पुलिस की खास ईकाईयों में क्राईम ब्रांच, तट सुरक्षा बल, पर्यटन पुलिस, नारकोटिक्स पुलिस, महिला पुलिस, कोमाण्डो बल, सुरक्षा बटालियन तथा "ठंडरबोल्ट" शामिल हैं । == विशेष उपलब्धियां == केरल के मुख्यमंत्री [[पिनाराई विजयन]] केरल पुलिस को देश का सर्वश्रेष्ठ बताया है ।<ref>{{Cite news |date=2022-10-23 |title= केरल पुलिस देश का सर्वश्रेष्ठ |url= https://www.onmanorama.com/news/kerala/2022/10/23/kerala-police-best-in-india-those-bringing-shame-to-force-will-be-punished-says-cm.html|access-date=2022-10-30 |publisher= मलयाल मनोरमा |language=en}}</ref> वर्ष 2021 में केरल पुलिस को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार प्राप्त हुआ ।<ref>{{Cite web |title=केरल पुलिस को नेशनल ई-गवर्नेंस अवार्ड |url=https://english.deepika.com/Kerala.aspx?Kerala-Police-bags-National-e--Governance-Award-2021.66092 |access-date=2022-10-30 |website=English Deepika |language=en |archive-date=31 अक्तूबर 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221031155540/https://english.deepika.com/Kerala.aspx?Kerala-Police-bags-National-e--Governance-Award-2021.66092 |url-status=dead }}</ref> == विवादास्पद पहलू == केरल पुलिस के खिलाफ व्यापक अनियमितता व वर्वरता का आरोप दर्ज किए गए हैं ।<ref>{{Cite news |title= पिनाराई सरकार के लिए केरल पुलिस एक समस्या क्यूँ है |url= https://www.indiatoday.in/india-today-insight/story/why-kerala-police-remains-a-problem-for-pinarayi-s-government-1882202-2021-11-29|date= |access-date=2021-11-30 |publisher= इंडिया टूड़े |language=en}}</ref> केरल पुलिस के खिलाफ दंगा रोकने में नाकामयाबी<ref>{{Cite news |title= केरल पूलिस दंगा रोकने में नाकामयाब |url= https://www.thehindu.com/news/national/kerala/state-police-failed-to-curb-violence-during-pfi-hartal-says-muraleedharan/article65931009.ece|date= 2022-09-24|access-date=2022-10-30 |publisher= India Today |language=en}}</ref> व गुप्त सूचना पर कार्रवाई न करने का आरोप भी है ।<ref>{{Cite news |title= गुप्त सूचना के बाबाजूद पुलिस की निष्क्रियता |url= https://www.onmanorama.com/news/kerala/2022/07/06/police-failure-despite-intel-alert-says-adgp-report-on-rahul-off.html|date= 2022-07-06 |access-date=2022-10-30 |publisher= Malayala Manorama |language=en}}</ref> ओड़ीशा के कवि [[तपन कुमार प्रधान]] अपनी किताबों में जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा in his books and social media posts has exposed serious loopholes in criminal investigation by Jammu and Kashmir police<ref>{{cite book|title=आय, शी अँड द सी |first= ड़ा तपन कुमार | last= प्रधान |author-link=तपन कुमार प्रधान|date=June 2019 | publisher= कोहिनूर बुकस |place= नई दिल्ली|isbn=9788194283591|page=217-228}}</ref>, खास कर हेमांगी शर्मा धोखाधड़ी मामले में ।<ref> मामला संख्या 166/DPTN/B5/17R तारीख 26 जुलाई 2017, केरल पुलिस, म्यूज़ियम, तिरुवनंतपुरम </ref> == इन्हें भी देखें == * [[केरल की राजनीति]] * [[अपराध निवारण]] ==References== {{reflist}}{{भारत में कानून प्रवर्तन}} [[श्रेणी:भारत सरकार]] [[श्रेणी:केरल]] [[श्रेणी:पुलिस]] [[श्रेणी:पुलिस|भारत]] [[श्रेणी:पुलिस|केरल]] [[श्रेणी:अपराध निवारण]] [[श्रेणी:अपराध जाँच]] {{भारत-भू-आधार}} em6q7t6979cjq2i8hsugrmrtn4ycr1b केंजो फुजिसु 0 1414890 6543692 6241836 2026-04-24T18:41:34Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543692 wikitext text/x-wiki {{政治家|人名=藤末 健三(アイアン・フジスエ)|各国語表記=ふじすえ けんぞう<ref name=jiji/>|画像=Fujisue Kenzou.jpg|画像説明=|国略称={{JPN}}|生年月日={{生年月日と年齢|1964|2|18}}<ref name=jiji>[https://www.jiji.com/jc/giin?d=9e189fd5fc6616b90347a579e0213378&c=san&rel=ja 国会議員情報:藤末 健三(ふじすえ けんぞう):時事ドットコム]</ref>|出生地={{JPN}} [[熊本県]]<ref name=jiji/>|没年月日=|死没地=|出身校=[[東京工業大学]][[工学部]]<br />[[マサチューセッツ工科大学]][[経営大学院]]<br />[[ハーバード大学]][[ケネディ・スクール]]<br />[[東京工業大学]][[大学院]][[社会理工学研究科]]<br />[[早稲田大学大学院アジア太平洋研究科]]|前職=[[東京大学大学院工学系研究科・工学部|東京大学工学部]][[准教授|助教授]]|現職=東京大学客員教授|所属政党=([[民主党_(日本_1998-2016)|民主党]]→)<br />([[民進党]]→)<br />(無所属<ref>所属会派は[[国民の声_(2017)|国民の声]]→[[自由民主党_(日本)|自由民主党]]・国民の声</ref>→)<br />自由民主党([[志公会|麻生派]])|称号・勲章=[[博士(学術)]]|親族(政治家)=|配偶者=|サイン=|ウェブサイト=https://www.fujisue.net|サイトタイトル=公式サイト|国旗=JPN|職名=[[参議院|参議院議員]]|選挙区=[[参議院比例区|比例区]]|当選回数=3回|就任日=[[2004年]][[7月26日]]|退任日=[[2022年]][[6月15日]]}} '''Kenzo Fujisue''' (जन्म [[१८ फ़रवरी|18 फरवरी,]] [[१९६४|1964]] , मुक्केबाज़ी का नाम: '''आयरन Fujisue''' ) एक [[जापान|जापानी]] [[राजनेता|राजनीतिज्ञ हैं]] । [[लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी)|लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी]] से संबंधित हाउस ऑफ काउंसिलर्स (3 शर्तों) के पूर्व सदस्य। इंजीनियरिंग संकाय, टोक्यो विश्वविद्यालय में एक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में काम करने के बाद, वह [https://www.tsinghua.edu.cn/ चीन में सिंघुआ विश्वविद्यालय में] विजिटिंग प्रोफेसर बने, वासेदा यूनिवर्सिटी फ्यूचर इनोवेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक विजिटिंग सीनियर रिसर्चर, वासेदा यूनिवर्सिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट में विजिटिंग प्रोफेसर <ref>[https://www.waseda.jp/inst/nanolife/institutes/life-support/ 客員上級研究員(研究院客員教授)]早稲田大学</ref>, और टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, प्रौद्योगिकी प्रबंधन विभाग <ref>[https://most.tus.ac.jp/profile/kenzo_fujisue/ 教員プロファイル] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20221128070019/https://most.tus.ac.jp/profile/kenzo_fujisue/ |date=28 नवंबर 2022 }}東京理科大学</ref> । डेमोक्रेटिक पार्टी के हाउस ऑफ काउंसिलर्स पॉलिसी काउंसिल के अध्यक्ष, आंतरिक मामलों और संचार के उप मंत्री ( तीसरा फेरबदल नोडा कैबिनेट ), और हाउस ऑफ काउंसिलर्स जनरल अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष के रूप में सेवा की । वर्तमान में, वह टोक्यो विश्वविद्यालय में इंटरडिसिप्लिनरी इंफॉर्मेशन स्टडीज और इंटरडिसिप्लिनरी इंफॉर्मेशन स्टडीज के ग्रेजुएट स्कूल में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। 1964 <ref name="profile"/> में कुमामोटो सिटी, कुमामोटो प्रान्त में जन्मे। 1982 (आयु 18) कुमामोटो हाई स्कूल से स्नातक और टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी <ref name="profile"/> में प्रवेश किया। हाई स्कूल/कॉलेज और रोइंग क्लब से संबंधित है। विशेष रूप से, उन्होंने अपने विश्वविद्यालय के दिनों में प्रशिक्षण के लिए खुद को समर्पित किया, ऑल जापान रूकी सेलेक्शन में उपविजेता और ऑल जापान लाइटवेट क्लास में तीसरा स्थान हासिल किया। 1986 (आयु 22 सूचना इंजीनियरिंग विभाग, इंजीनियरिंग संकाय, टोक्यो प्रौद्योगिकी संस्थान से स्नातक <ref name="profile">{{Cite web |url=https://www.fujisue.net/profile/ |title=プロフィール – ふじすえ健三 |access-date=28 नवंबर 2022 |archive-date=19 फ़रवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230219140006/https://fujisue.net/profile/ |url-status=dead }}</ref> ।''' '''पर्यावरण नीति प्रभाग (ग्लोबल वार्मिंग प्रतिउपाय नीति के प्रभारी), इलेक्ट्रॉनिक उपकरण प्रभाग (कंप्यूटर उद्योग और इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकी के प्रभारी), और अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग प्रभाग (विदेशी तकनीकी सहायता, जापान-यू.एस. अनुसंधान और विकास सहयोग), कानूनों का मसौदा तैयार करने के लिए जिम्मेदार और नीतियों की जांच करने के लिए हर दिन देर रात तक कड़ी मेहनत करते हैं। फिर भी, मैं भाषाओं का अध्ययन करना जारी रखता हूँ और विदेश में अध्ययन करने की तैयारी करता हूँ। 1991 (आयु 27) विवाहित। वर्तमान में 5, 2 लड़कियों और 1 लड़के का परिवार (2022 तक) 1994 में (उम्र 30), उन्होंने सरकारी छात्र के रूप में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में प्रवेश लिया। 1995 में (उम्र 31), मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री पूरी की और एक सरकारी छात्र के रूप में हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड पॉलिटिक्स में प्रवेश लिया। 1996 में (32 वर्ष) ने [[हार्वर्ड विश्वविद्यालय]] <ref>MC/MPA (Mid-Career Master in Public Administration) 1996.</ref> <ref>{{Cite book|title=Harvard University John F. Kennedy School Of Government 1998 Alumni Directory|date=|publisher=Bernard C. Harris Publishing Company, Inc.|year=1998|page=412|洋書}}</ref> से एक पेशेवर मुक्केबाजी लाइसेंस और मास्टर ऑफ पब्लिक मैनेजमेंट (MC/MPA) प्राप्त किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में पहली बार उन्होंने सीखने की खुशी का अनुभव किया। इसके अलावा, मुझे "खुद को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उद्योग मंत्रालय से संबंधित" के बजाय "खुद को एक व्यक्ति के रूप में" के अस्तित्व का एहसास हुआ। विदेश में पढ़ाई के दौरान उन्होंने न सिर्फ पढ़ाई की बल्कि बॉक्सिंग के जरिए अपने शरीर को भी ट्रेनिंग दी और प्रोफेशनल बॉक्सिंग का लाइसेंस हासिल किया। (अंगूठी का नाम '''"आयरन फुजिस्यू"''' है) एक शांत वातावरण में अपने परिवार से घिरा हुआ, अपने पसंदीदा अध्ययन और मुक्केबाजी के लिए खुद को समर्पित करने की खुशी का आनंद ले रहा है, यह क्षण उसकी "खुशी का मूल" होगा। 1999 (उम्र 35) में, उन्होंने टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एक थीसिस के साथ डॉक्टरेट (अकादमिक) प्राप्त किया, जो वह संयुक्त राज्य अमेरिका में रहते हुए लिख रहे थे <ref name="profile"/>, और एक एसोसिएट प्रोफेसर (वर्तमान में एक एसोसिएट प्रोफेसर ) बन गए। इंजीनियरिंग संकाय, टोक्यो विश्वविद्यालय <ref name="profile" /> । जापान लौटने के बाद, मैं हर सुबह 5:00 बजे से पहले उठ जाता था ताकि थीसिस को पूरा कर सकूं जो मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका में लिखना शुरू किया था। टोक्यो विश्वविद्यालय में एक व्याख्याता के लिए स्थानांतरित (अगले वर्ष, सहायक प्रोफेसर) प्रबंधन सिद्धांत और नीति सिद्धांत सिखाएं। इसे छात्रों ने खूब सराहा है। 2000 (आयु 36) में, वह टोक्यो विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर बने। 2004 (आयु 40) टोक्यो विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त। हाउस ऑफ काउंसिलर्स इलेक्शन के लिए पहली दौड़। एक खिलाड़ी के रूप में नीतियों को साकार करने के लिए राजनीति की दुनिया की आकांक्षा, टिप्पणीकार के रूप में नहीं। राष्ट्रीय आनुपातिक प्रतिनिधित्व जिले में 182,891 वोट प्राप्त किए और पहली बार चुनाव जीता। (तब से, वह तीन कार्यकालों के लिए चुने गए हैं और 2022 तक पार्षदों की सभा के सदस्य के रूप में काम करेंगे। ) 2005 में (उम्र 41), वह चीन के सिंघुआ विश्वविद्यालय और वासेदा विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर बने। 2009 (उम्र 45) में, उन्होंने वासेदा यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एशिया-पैसिफिक स्टडीज डॉक्टरेट प्रोग्राम में प्रवेश किया। 2010 (उम्र 46) दूसरे कार्यकाल के लिए पार्षदों के चुनाव के लिए चुने गए। एक कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय CYLAB को विशेष रूप से नियुक्त फेलो नियुक्त किया। साइबर सुरक्षा नीति में जापान-अमेरिका सहयोग को बढ़ावा देना ("साइबर सुरक्षा मूल कानून" विधायी कानून के लिए जिम्मेदार) 2011 में (उम्र 47), उन्हें हाउस ऑफ काउंसिलर्स की जनरल अफेयर्स कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। (डाक सेवा निजीकरण अधिनियम, आदि पर्यवेक्षित) 2012 में (48 वर्ष की आयु में), उन्हें आंतरिक मामलों और संचार राज्य मंत्री और डाक और दूरसंचार राज्य मंत्री (तीसरा फेरबदल नोडा कैबिनेट) के रूप में नियुक्त किया गया था। (प्रसारण और दूरसंचार के एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार, डाक समूह प्रणाली की समीक्षा आदि की परीक्षा) 2013 में (उम्र 49), वासेदा विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एशिया-पैसिफिक स्टडीज में डॉक्टरेट कार्यक्रम पूरा किया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। दूसरा पीएच.डी. 2016 (उम्र 52) तीसरे कार्यकाल के लिए पार्षदों की सभा के लिए चुने गए। 2017 (उम्र 53) में, उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और हाउस ऑफ काउंसिलर्स संसदीय गुट "वॉयस ऑफ द पीपल" की स्थापना की और प्रतिनिधि का पद ग्रहण किया। 2020 (56 वर्ष) में, वह टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस में विशेष रूप से नियुक्त वरिष्ठ प्रोफेसर और वासेदा यूनिवर्सिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट (फ्यूचर इनोवेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट) में विजिटिंग प्रोफेसर बने। 2022 (उम्र 58) में, वह टोक्यो विश्वविद्यालय में ग्रेजुएट स्कूल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी इंफॉर्मेशन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर बने, जहां वे WEB3, मेटावर्स, ब्लॉकचेन और वर्चुअल करेंसी से संबंधित कानून के विकास पर शोध करते हैं। जापान और भारत के बीच दोस्ती को बढ़ावा देने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद में प्रतिष्ठित प्रोफेसर नियुक्त। TANAAKK Co., Ltd. के बाहरी निदेशक के रूप में नियुक्त === राजनीति/डेमोक्रेटिक पार्टी युग में प्रवेश करना === 2004 में पार्षदों के नियमित चुनाव के 20वें सदन में, उन्हें <ref name="profile"/> बार जापान की डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा मतदान किए गए आनुपातिक प्रतिनिधित्व से उम्मीदवार के रूप में चुना गया था। 2005 में (उम्र 41), उन्हें चीन के सिंघुआ विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर और वासेदा विश्वविद्यालय <ref name="profile" /> में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया। 2010 में पार्षदों के नियमित चुनाव के 22वें सदन में फिर से चुने गए। 2016 में पार्षदों के नियमित चुनाव के 24 वें सदन में, वह डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की आधिकारिक स्वीकृति के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाले जिले में एक उम्मीदवार के रूप में भागे। Fujisue के वोटों की संख्या 22 आनुपातिक उम्मीदवारों में से 10वें स्थान पर है। वह आनुपातिक प्रतिनिधित्व में पार्टी द्वारा जीती गई 11 सीटों में से एक थी, जिसमें तीन चुनाव जीते थे। <ref>{{Cite web|url=https://www.nhk.or.jp/senkyo/archives/sangiin/2016/#!hmb_02|title=比例代表 民進党|date=|website=2016参院選 NHK選挙WEB|publisher=NHK|access-date=2022-7-11}}</ref> चुनाव में, उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व में इसाओ हकुशिन के साथ रिशो कोसीकाई से समर्थन मिला। <ref>[https://dot.asahi.com/aera/2017011100197.html?page=3 神主は食べていけない 末端神主たちの神社本庁への嘆き (3/5) 〈AERA〉|AERA dot. (アエラドット)] 小川寛大2017.1.14 07:00 AERA</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.kosei-kai.or.jp/rkknews/2004/post4250/|title=第20回参議院選挙で本会推薦候補28人が当選|date=2004-07-11日|website=立正佼成会|access-date=2022-01-13}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.kosei-kai.or.jp/rkknews/2010/post10312/|title=第22回参議院議員選挙行われる|date=2010-07-16|website=立正佼成会|access-date=2022-01-13}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://m.facebook.com/daizohamada.kumamoto/posts/1698037173788512/|title=2016年5月1日の投稿(濱田大造)|website=facebook|access-date=2022-01-13}}</ref> '''[सदस्य के कार्यकाल के दौरान गतिविधियां]''' * 18 साल में 8 बार वियतनाम गए। जापान-वियतनाम संसदीय लीग के एक अधिकारी के रूप में, उन्होंने वियतनाम-जापान विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान दिया, जिसे 2016 में वियतनाम राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (वीएनयू) की छत्रछाया में स्थापित किया गया था। * एसएमई वित्तीय स्थिरीकरण अधिनियम और एसएमई वर्तमान अधिनियम सहित 33 विधायी बिल, डायट को प्रस्तुत किए जाते हैं * नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए संसदीय लीग के महासचिव (2008-वर्तमान) * जापान-अमेरिका संसदीय संवाद महासचिव (2019-वर्तमान) * जापान अंतरिक्ष संसदीय लीग (2012-वर्तमान) * निदेशक, जापान-कोरिया सहयोग समिति (2018-वर्तमान) * जापान-मोल्दोवा फ्रेंडशिप पार्लियामेंट्री लीग के संस्थापक और महासचिव (2020-वर्तमान) * महासचिव, वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा नीति अध्ययन समूह (2021-वर्तमान) * राजकोषीय और मौद्रिक समिति निदेशक (2016-2022) === डेमोक्रेटिक पार्टी दलबदल === उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी में नीति अनुसंधान परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, लेकिन 2 जुलाई, 2017 को, उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी को एक निकासी नोटिस प्रस्तुत करते हुए कहा, "डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव सहयोग के नाम पर [[वामपन्थी राजनीति|बाईं ओर]] झुक रही है। " <ref>[https://mainichi.jp/senkyo/articles/20170704/k00/00m/010/033000c 藤末健三参院議員が離党届「中道政党立ち上げたい」] 毎日新聞 2017年7月3日</ref> जवाब में, डेमोक्रेटिक पार्टी ने उनकी वापसी की सूचना को स्वीकार किए बिना उन्हें रजिस्टर से निष्कासित करने का फैसला किया, और पार्षदों की सभा के सदस्य के रूप में उनके इस्तीफे की सिफारिश भी की, यह देखते हुए कि उन्हें पार्षदों की सभा में आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा चुना गया था । === लोगों की आवाज की स्थापना से लेकर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के गुट और उससे आगे तक === अक्टूबर 2017 में, उन्होंने हाउस ऑफ़ काउंसिलर्स ग्रुप " वॉइस ऑफ़ द पीपल " की स्थापना की और प्रतिनिधि का पद ग्रहण किया, और अक्टूबर 2018 (54 वर्ष) में संयुक्त समूह "लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी / वॉयस ऑफ़ द पीपल" का गठन किया और इसमें शामिल हो गए लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी समूह <ref name="profile"/> । जुलाई 2021 में, यह निर्णय लिया गया कि वह लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी  आधिकारिक मान्यता के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व अनुभाग से अगले वर्ष 26वें हाउस ऑफ काउंसिलर्स के नियमित चुनाव के लिए दौड़ेंगे । जनवरी 2022 में, वह शिकोकाई (एसो गुट) [  में शामिल हो गए । आहार कानून के प्रावधानों के कारण अन्य दलों से उम्मीदवारी पर प्रतिबंध के कारण, उन्होंने उसी वर्ष 15 जून को पार्षदों की सभा के सदस्य के रूप में इस्तीफा दे दिया ( डाइट के 208वें सत्र की समाप्ति तिथि) <ref>{{Cite news|url=https://www.sankei.com/article/20220615-P4OPQXAPKFNRTCKJ3TUAA4VIVY/|title=藤末氏が参院議員辞職 自民から立候補へ|last=|date=2022-6-15|work=産経新聞|access-date=2022-6-15}}</ref> और पार्षदों की सभा के सदस्यों के लिए 26वें नियमित चुनाव के लिए दौड़ा, 4 चुनावों का लक्ष्य रखा, लेकिन हार गया। इसके अलावा, फुजीसुए के इस्तीफे के कारण, कोरू ताशिरो, जो डेमोक्रेटिक पार्टी की आनुपातिक सूची में उपविजेता थे, जून 2022 में चुने गए और जुलाई तक एक महीने के कार्यकाल के साथ हाउस ऑफ काउंसिलर्स के सदस्य बने। उसी वर्ष। == जीवनी == * [[१८ फ़रवरी|18 फरवरी,]] [[१९६४|1964]] - कुमामोटो शहर, कुमामोटो प्रान्त <ref name="profile"/> में जन्मे। * मार्च [[१९७६|1976]] - कुमामोटो सिटी हकुसन एलीमेंट्री स्कूल से स्नातक किया। * मार्च [[१९७९|1979]] - कुमामोटो म्युनिसिपल इज़ुमी हाई स्कूल से स्नातक। * मार्च [[१९८२|1982]] - कुमामोटो प्रीफेक्चुरल कुमामोटो हाई स्कूल <ref name="nem" /> से स्नातक किया। * मार्च [[१९८६|1986]] - सूचना इंजीनियरिंग विभाग, इंजीनियरिंग संकाय, टोक्यो प्रौद्योगिकी संस्थान <ref name="sani">[https://www.sangiin.go.jp/japanese/joho1/kousei/giin/profile/7004051.htm 藤末 健三(ふじすえ けんぞう)] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20220507075215/https://www.sangiin.go.jp/japanese/joho1/kousei/giin/profile/7004051.htm |date=7 मई 2022 }}参議院</ref> से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। * [[१ अप्रैल|1 अप्रैल,]] [[१९८६|1986]] - अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक तकनीकी अधिकारी के रूप में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उद्योग मंत्रालय (वर्तमान में अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्रालय) में प्रवेश किया <ref name="sani" /> । * जून [[१९९४|1994]] - [[मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान|मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट]] ऑफ टेक्नोलॉजी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस (सरकारी छात्र) में प्रवेश लिया। * मई [[१९९५|1995]] - मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से स्नातक और [[व्यवसाय प्रबंध में स्नातकोत्तर|एमबीए]] <ref name="sani" /> प्राप्त किया। * जून [[१९९५|1995]] [[हार्वर्ड विश्वविद्यालय|- हार्वर्ड]] केनेडी स्कूल ( ग्रेजुएट स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी ) (सरकारी छात्र) में प्रवेश लिया। * [[१९९६|1996]] - सार्वजनिक खर्च पर अध्ययन करते हुए एक पेशेवर मुक्केबाजी लाइसेंस प्राप्त किया <ref name="sani" /> । (अंगूठी का नाम: आयरन फुजिस्यू) * मई [[१९९६|1996]] - एमपीए डिग्री के साथ हार्वर्ड केनेडी स्कूल से स्नातक <ref name="sani" /> । * अप्रैल [[१९९७|1997]] - टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल साइंस एंड इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट कार्यक्रम में प्रवेश किया। * मार्च [[१९९९|1999]] - ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल साइंस एंड इंजीनियरिंग, टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में डॉक्टरेट पाठ्यक्रम पूरा किया, और डॉक्टरेट (अकादमिक) की डिग्री प्राप्त की <ref name="nem" /> । * अप्रैल [[१९९९|1999]] - अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उद्योग मंत्रालय से सेवानिवृत्त। यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोक्यो ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग <ref>[http://twitter.com/fujisue/status/108171908796792832 経産省を辞め公募で大学に専任講師で取ってもらいました。論文を書いて審査を受けて助教授にさせてもらいました。]</ref> <ref name="sani" /> में पूर्णकालिक व्याख्याता (शैक्षणिक प्रशिक्षक)। * अप्रैल [[२०००|2000]] - टोक्यो विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग अनुसंधान संगठन <ref name="sani" /> में एसोसिएट प्रोफेसर (वर्तमान में एसोसिएट प्रोफेसर ) (शिक्षा के प्रशिक्षक) के लिए पदोन्नत। * जनवरी [[२००४|2004]] - टोक्यो विश्वविद्यालय <ref name="nem" /> से सेवानिवृत्त। * 2005 - सिंघुआ विश्वविद्यालय [[२००५|,]] चीन के सलाहकार विजिटिंग प्रोफेसर । वासेदा विश्वविद्यालय <ref name="nem">[https://fujisue.net/profile.html 年表でみる ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20221128105643/https://fujisue.net/profile.html |date=28 नवंबर 2022 }}ふじすえ健三</ref> में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्त। * 2010 - कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय CYLAB विशेष रूप से फेलो नियुक्त। * [[२०११|2011]] - पार्षदों की सभा की सामान्य मामलों की समिति के अध्यक्ष नियुक्त <ref name="nem" /> । * अक्टूबर [[२०१२|2012]] - नोडा के तीसरे रीमॉडेलिंग कैबिनेट <ref name="nem" /> में आंतरिक मामलों और संचार राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त। * [[२०१३|2013]] - वासेदा यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एशिया-पैसिफिक स्टडीज में डॉक्टरेट कार्यक्रम पूरा किया और डॉक्टरेट (अकादमिक) <ref name="sani" /> <ref name="nem" /> प्राप्त किया। * 2022 - TANAAKK Co. , Ltd. [ 21  के बाहरी निदेशक के रूप में नियुक्त । इंटरडिसिप्लिनरी इंफॉर्मेशन स्टडीज, टोक्यो विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्त। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद में प्रतिष्ठित प्रोफेसर नियुक्त। * [[११ जुलाई|11 जुलाई,]] 2004 - 20 [[२००४|वें]] सदन के पार्षदों का नियमित चुनाव (आनुपातिक जिला) पहली बार निर्वाचित। 182,891 वोट। * 11 जुलाई, [[२०१०|2010-22वें]] सदन के पार्षदों का नियमित चुनाव (आनुपातिक जिला) पुनर्निर्वाचन। 128,511 वोट। * [[१० जुलाई|जुलाई]] [[२०१६|2016,]] पार्षदों का 7-24वां सदन नियमित चुनाव (आनुपातिक जिला) 3 चुनाव। 143,188 वोट। * जुलाई [[२०२२|2022, 7-26वें]] सदन के पार्षदों का नियमित चुनाव (आनुपातिक जिला) हार गया। 74,128 वोट। * [[२००५|2005]] - अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग के अगले कैबिनेट मंत्री के रूप में नियुक्त। * [[२००७|2007 -]] चौथी डेमोक्रेटिक पार्टी यूथ ब्यूरो निदेशक नियुक्त। * [[२०११|2011]] - पार्षदों की सभा की सामान्य मामलों की समिति के अध्यक्ष । * जुलाई [[२०१७|2017]] - डेमोक्रेटिक पार्टी को वापसी का नोटिस दिया। स्वीकार नहीं किया और निष्कासित कर दिया । * अक्टूबर 2017 - आंतरिक संसदीय समूह " वॉयस ऑफ द पीपल " की स्थापना की और प्रतिनिधि का पद ग्रहण किया। * अक्टूबर 2018 - हाउस ऑफ काउंसिलर्स ग्रुप [[लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी)|"लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी/पीपुल्स वॉयस" का]] गठन किया <ref>{{Cite web|url=https://www.sankei.com/politics/news/181022/plt1810220020-n1.html|title=立憲民主、参院でも第1会派 元民進の藤末氏は自民会派入り|date=2018-10-22|publisher=産経新聞|access-date=2018-10-22|archive-date=22 अक्तूबर 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20181022153415/https://www.sankei.com/politics/news/181022/plt1810220020-n1.html|url-status=dead}}</ref> । * जून 2022 - लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी में शामिल हुए। == नीति/प्रस्ताव == * [[कॉमिक्स|मंगा]], एनीमे, [[क्रीडा|गेम्स]] आदि में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग करने वाले आंदोलनों के साथ एकजुटता में, वह सामग्री उद्योग से संबंधित नीतियों पर कड़ी मेहनत कर रहा है, जैसे कि कोरोना संकट के दौरान एक हास्य बाजार को पकड़ना और रचनाकारों का समर्थन करना <ref>{{Cite web|url=https://www.walkerplus.com/article/1075002/|title=2年ぶりに開催した「コミケ」の舞台裏 苦境の関連産業とクリエイターを救った“秘策”|date=2022-04-22|website=ウォーカープラス|publisher=[[KADOKAWA]]|access-date=2022-06-24}}</ref> । * विज्ञान पर जोर देते हुए, वह विज्ञान और इंजीनियरिंग इंजीनियरों की स्थिति में सुधार लाने और पेशेवर इंजीनियरों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय हैं। <ref>[https://www.sangiin.go.jp/japanese/joho1/kousei/syuisyo/186/syup/s186015.pdf 技術士の研究開発プログラム・マネジメントへの活用に関する質問主意書 民主党参議院議員 藤末健三 平成26年2月13日]</ref> * चयनात्मक विवाहित युगल उपनाम प्रणाली <ref>{{Cite web|url=https://www.nhk.or.jp/senkyo/database/sangiin/survey/hirei.html?kohoId=56|title=NHK参議院選挙 比例代表 候補者アンケート|date=2022-07-03|website=NHK|publisher=[[日本放送協会]]|access-date=2022-07-03}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> के पक्ष में स्थिति लेता है। * मैं विवाह से बाहर पैदा हुए बच्चों के खिलाफ भेदभाव के उन्मूलन का समर्थन करता हूं। 21 नवंबर, 2013 को विपक्षी दलों ने वैध और [[धर्मजत्व|अवैध]] [[जन्म प्रमाण पत्र|जन्म पंजीकरण]] के बीच के अंतर को दूर करने के लिए परिवार रजिस्टर अधिनियम को संशोधित करने के लिए संयुक्त रूप से हाउस ऑफ काउंसिलर्स को एक बिल प्रस्तुत किया। <ref>[http://www.dpj.or.jp/a/103569 戸籍法改正案を参院に提出 出生届への記載事項から嫡出・非嫡出の別を削除]</ref> == संबद्ध संगठन/विधायक संघ == * मंगा, एनीमे और खेलों के लिए संसदीय लीग * चीन नीति पर संसदीय लीग == किताब == * "मैं जानता हूँ? हमारा शांति संविधान” (केन्जो फुजिस्यू / ओपन नॉलेज ) * "चुनौती! अपने 20 के दशक में उद्यमिता के लिए नियम जीतना” (केन्जो फुजिस्यू/ कवाडे शोबो शिंशा द्वारा प्रकाशित) * "एफटीए द्वारा निर्मित जापान और एशिया का भविष्य" (केन्जो फुजिस्यू, मसानोरी कोइके / ओपन नॉलेज द्वारा प्रकाशित) * "प्रौद्योगिकी का प्रबंधन" (केन्जो फुजिस्यू / प्रोडक्टिविटी पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित) * "प्रौद्योगिकी प्रबंधन" (केन्जो फुजिस्यू / चुई हत्सुतेन चुओ कं, लिमिटेड द्वारा प्रकाशित) * "इनोवेशन क्रिएशन के लिए बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन" (केन्जो फुजिस्यू, हिरोकी इटाकुरा, जेनजो फुजिवारा / हाकुटो शोबो ) * "प्रौद्योगिकी संशोधित संस्करण के प्रबंधन का परिचय" (केन्जो फुजिस्यू / निक्केई बीपी ) * "योशियो इचियानागी का वेंचर प्रैक्टिकल स्कूल" (योशियो इचियानागी, टेटसुरो इकुटा, मासाहिरो तनाका, केंजो फुजिस्यू, शुनसुके यामागुची, मसरू मुराई, टेटसुओ ओडा, शूजी होन्जो / निक्कन कोग्यो शिंबुन द्वारा प्रकाशित) * "व्यावहारिक पर्यावरण कानून का परिचय" (केन्जो फुजिस्यू / एनआई द्वारा प्रकाशित) * "एक सफल प्रौद्योगिकी इन्क्यूबेटर के लिए शर्तें" (इचिरो सकाटा, मकोतो नोबुहारा, केंजो फुजिस्यू/ अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रकाशित) * "विश्वविद्यालयों से नए व्यवसाय बनाना और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना" (इचिरो सकाटा, केंजो फुजिस्यू, मकोतो नोबुहारा/अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रकाशित) * "प्रौद्योगिकी प्रबंधन का परिचय" (केन्जो फुजिस्यू / उत्पादकता मुख्यालय प्रकाशन ) * "जापानी फर्मों की अंतर्राष्ट्रीय आर एंड डी गतिविधियां" (केन्जो फुजिस्यू) == प्रकरण == कालानुक्रमिक क्रम में सूचीबद्ध। * अक्टूबर 2008 " यदि मैं, हिकारू ओटा, प्रधान मंत्री बनता हूँ... सचिव तनाका। ", और कहा," क्योंकि अर्थव्यवस्था खराब है, हम राजनेताओं और नौकरशाहों के शीतकालीन बोनस को घटाकर 0 येन कर देंगे। किम माय -यंग, जो बिल पर भी दिखाई दिए, ने कहा, <nowiki>''</nowiki>क्या नेशनल असेंबली के सदस्य जो बिल के पक्ष में हैं, बिल पारित होने की परवाह किए बिना अपने बोनस देने के संकल्प के साथ बैठे हैं? कृपया घोषणा करें कि आप इसे वापस कर देंगे।" सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, " <ref>[http://www.j-cast.com/tv/2008/10/20028899.html 景気悪いので 政治家・官僚ボーナス「ゼロ」に: 太田総理のウラ番記者:J-CAST テレビウォッチ]</ref> बोनस दान करूंगा।" * सितम्बर 2009 "यदि मैं, हिकारू ओटा, प्रधान मंत्री बनता हूँ... सचिव तनाका। ”, यह उल्लेख किया गया था कि प्रति वर्ष 10 मिलियन येन प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टी की 360,000 सब्सिडी “समन्वय परामर्श शुल्क” में शामिल हैं। वजह के बारे में उन्होंने कहा, "मुझे कपड़ों का अच्छा सेंस नहीं है, इसलिए जब मैं टीवी पर आती हूं तो मैं कोऑर्डिनेट हो जाती हूं... <ref>[http://www.j-cast.com/tv/2009/09/24050187.html 政党助成金なんて必要か その分景気対策へ回せ!: 太田総理のウラ番記者:J-CAST テレビウォッチ]</ref> . * ट्विटर पर वॉइस मेल, वॉइस ट्विटर अपडेट और वॉइस ब्लॉग अपडेट द्वारा चुनाव गतिविधियां पब्लिक ऑफिस इलेक्शन लॉ <ref>[http://www.j-cast.com/2010/06/23069421.html?p=all 公示以降も音声ツイッター更新 民主議員が「見切り発車」宣言]J-CASTニュース 2010/6/23 </ref> के तहत कानूनी हैं, और आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित किया गया है कि वे हाउस ऑफ काउंसिलर्स के सदस्यों के नियमित चुनाव में आयोजित किए जाएंगे। जो 11 जुलाई 2010 से प्रभावी होगा। किया। पिछले वर्ष के प्रतिनिधि सभा के चुनाव में, आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय की अनुमति के साथ, उन्होंने अपने ब्लॉग पर अपने सहायक भाषणों की एक अनुसूची प्रकाशित की, जिसमें उनके यात्रा स्थलों के दृश्यों और विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला गया। आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय की अनुमति के विवरण के संबंध में, हम प्रभारी व्यक्ति की [[व्यक्तिगत जानकारी]] की रक्षा के आधार पर उस विभाग का खुलासा करने से इनकार करते हैं जिससे प्रभारी व्यक्ति संबंधित है। प्रशासनिक उत्तरदायित्व के दृष्टिकोण से, यदि यह <ref>[http://www.jinji.go.jp/jyohokoukai/kijun_01.html 人事院 - 情報公開 - 行政文書の開示・不開示の決定基準について]</ref> के तथ्यात्मक कार्यों के बारे में जानकारी है)। इस तथ्य के बारे में कि उन्होंने VOCALOID के Hatsune Miku द्वारा गाए गए अपने आधिकारिक गीत को [[यूट्यूब|YouTube]] पर अपलोड किया है, उन्होंने कहा, "चाहे वह आलोचना हो या प्रशंसा, प्रतिक्रिया किसी भी चीज़ से बड़ी होती है। मैं आभारी हूं कि यह आग पर है (हंसते हुए)। भले ही मैं रयोको तानी जैसी हस्ती नहीं हूं, फिर भी मुझे समाचारों में बहुत कवरेज मिलती है। अन्य उम्मीदवारों के बारे में उन्होंने कहा, "एक उम्मीदवार यूएसट्रीम पर नेट रेडियो प्लेयर बनने की कोशिश कर रहा था, लेकिन दर्शकों की संख्या केवल कुछ दर्जन थी। एक अन्य उम्मीदवार ने हमारी साइट की पूरी तरह से नकल की। लेकिन हमारे पास पता है कि कैसे। यहां तक कि अगर आप केवल सतह की नकल करते हैं, तो यह प्रभावी नहीं होगा।" <ref>[http://www.cyzo.com/2010/07/5_1.html 「ネットだけで5万票取れる!」「次こそ初音ミク解禁」開票直前、藤末健三氏がネット選挙に怪気炎!!]</ref> अतीत में, ट्विटर के तीन फायदे "वास्तविक समय", "अन्तरक्रियाशीलता" और "कम लागत" <ref>[http://www.j-cast.com/2009/11/13053742.html?p=all 鳩山首相もいよいよ開始? 「ツイッター議員」増殖中]J-CASTニュース 2009/11/13</ref> थे। * ट्रांस -पॅसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट की वार्ताओं में भाग लेना है या नहीं, इस पर विचार करने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की कार्यकारी टीम के उप-महासचिव थे। <ref>[https://web.archive.org/web/20111028133306/mainichi.jp/select/biz/news/20111028k0000m020158000c.html TPP:政府、文書に本音 11月表明「米が最も評価」]毎日新聞 2011年10月28日</ref> <ref>[https://web.archive.org/web/20111030004857/mainichi.jp/select/biz/news/20111028ddm005020026000c.html TPP:政府のTPPに関する内部文書(要旨)] 毎日新聞 2011年10月28日 東京朝刊</ref> के एक आंतरिक दस्तावेज के रूप में रिपोर्ट किया गया। इस जानकारी के लीक होने की जिम्मेदारी लेने के लिए उन्हें उप महासचिव के पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। <ref>[http://www3.nhk.or.jp/news/html/20111101/t10013640901000.html 民主TPP事務局次長が辞任、"交渉参加の利点などを記した文書"の流出責任で]</ref> इस दस्तावेज़ में, Fujisu ने इस समय TPP में भागीदारी की घोषणा करने के कारणों के रूप में निम्नलिखित बिंदुओं को उठाया। ** वह समय जिसकी संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे अधिक सराहना करता है ** यह एक संस्थापक सदस्य देश नहीं बन सकता है और नियम-निर्माण में भाग नहीं ले सकता है। ** यदि इसे महसूस नहीं किया जा सकता है, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि समाचार पत्रों की सुर्खियाँ कहेंगी, 'नया प्रशासन कोई निर्णय नहीं ले सकता'। ** यदि भागीदारी की घोषणा ऐसे समय में की जा सकती है जब कोई बड़ा चुनाव न हो तो वार्ताओं में भागीदारी का कोई नाटकीय प्रभाव नहीं होगा। * 28 अप्रैल, 2010 को उन्होंने ट्वीट किया कि उन्होंने एक [[आईपैड|iPad]] <ref>[https://twitter.com/fujisue/status/12993753526 藤末健三] Twitter</ref> हासिल कर लिया है। 29 अप्रैल को, "हम आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय से रेडियो कानून का उल्लंघन न करने के उपायों के बारे में पूछताछ कर रहे हैं," और 3 मई को, "आईपैड को जापान में प्रमाणित किया गया है, लेकिन ऐसा होता है कि तकनीकी अनुरूपता चिह्न मुख्य इकाई पर प्रदर्शित नहीं होता है। ऐसा कहा जाता है कि यह केवल इसी कारण से अवैध है। संसद में करो! <ref>[https://twitter.com/fujisue/status/13344288407 藤末健三] Twitter</ref> 6 मई को, उन्होंने ट्वीट किया, "आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय ने जवाब दिया कि जब तक [[एप्पल इंक॰|एप्पल]] स्क्रीन प्रदर्शित करता है तब तक यह ठीक है" <ref>[https://twitter.com/fujisue/statuses/13475312303 藤末健三]Twitter</ref> । तकनीकी अनुरूपता चिह्न के प्रदर्शन के संबंध में, आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय ने जुलाई और अगस्त 2009 में सूचना और संचार परिषद से रिपोर्ट प्राप्त की, उसी वर्ष फरवरी में एक संशोधित मंत्रिस्तरीय अध्यादेश की घोषणा की, और 30 मार्च को राय एकत्र करना शुरू किया उसी वर्ष 28 अप्रैल को, संबंधित मंत्रालय के आंतरिक मामलों और संचार अध्यादेश के संशोधन के कारण, इसे स्क्रीन पर प्रदर्शित करना संभव होना चाहिए था, लेकिन हालांकि Apple ने पहले ही अनुमोदन प्राप्त कर लिया था, स्क्रीन प्रदर्शन <ref>[http://k-tai.impress.co.jp/docs/news/20100408_359802.html 技適マーク、4月下旬にもディスプレイ表示可能に - ]ケータイ Watch</ref> <ref>[https://www.soumu.go.jp/main_content/000086725.pdf 特定無線設備の技術基準適合証明等に関する規則の一部を改正する省令(平成22年総務省令第58号)](施行日): 平成22年4月28日 </ref> । * 18 जनवरी, 2017, `डेन-एन-तोशी लाइन में बड़ी देरी है। यदि आप 30 मिनट से अधिक देर से आते हैं, तो आपसे इसके लिए शुल्क लिया जाना चाहिए। मैं केवल यह मान सकता हूं कि वे एकाधिकार की स्थिति से संतुष्ट हैं। ", ट्विटर पर टिप्पणी करना (आधिकारिक रूप से संलग्न) जिसने रेलवे [https://megalodon.jp/2017-0119-1531-49/https://twitter.com:443/fujisue/status/821907320376463360] सुरक्षा को कम कर दिया [https://twitter.com/fujisue/status/821907320376463360] शहरी रेलवे पर उपसमिति के देरी काउंटरमेशर्स वर्किंग ग्रुप द्वारा संकलित रिपोर्ट <ref>[https://www.mlit.go.jp/common/001138607.pdf 遅延対策ワーキング・グループ 最終取りまとめ 平成28年4月20日 交通政策審議会陸上交通分科会鉄道部会 東京圏における今後の都市鉄道のあり方に関する小委員会 遅延対策ワーキング・グループ]</ref> के अनुसार, 3 मिनट या उससे अधिक की देरी के अधिकांश कारण हैं ऑपरेटरों के अलावा अन्य चीजों के कारण। आईएनजी। == अन्य == * हम जापान-चीन संसदीय सुलेख प्रदर्शनी <ref>[http://www.syogaten.com/list/33.html] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20221128105643/http://www.syogaten.com/list/33.html |date=28 नवंबर 2022 }} NPO法人[[日中国会議員書画展実行委員会]]</ref> को पेंटिंग और सुलेख प्रदान करते हैं। * 1 मई, 2016 (रविवार) को, मैं दायज़ो हमादा को बधाई देने के लिए रिशो कोसिकाई कुमामोटो चर्च गया। <ref>{{Cite web|url=https://www.facebook.com/daizohamada.kumamoto/photos/a.1558751187717112/1698037173788512/?type=3|title=濱田大造 - 5月1日(日) 藤末健三参議員議員と立正佼成会熊本教会様にご挨拶に伺いました。8:30〜11:30...|website=www.facebook.com|language=ja|access-date=2022-06-01}}</ref> == पाद लेख == {{Reflist|2}} == संबंधित वस्तु == * टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में लोगों की सूची * हार्वर्ड विश्वविद्यालय से संबंधित जापानी की सूची * राजनयिक संबंधों के सामान्यीकरण के लिए जापान-उत्तर कोरिया संसदीय लीग == बाहरी लिंक == * [https://www.fujisue.net Kenzo Fujisu - पार्षदों की सभा के सदस्य] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20230209164546/https://fujisue.net/ |date=9 फ़रवरी 2023 }} * [https://ameblo.jp/fujisue-kenzo केंजो फुजिस्यू आधिकारिक ब्लॉग] * [http://www.sbbit.jp/article/7851/ Kenzo Fujisu का व्यवसाय + IT रुझान] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090102124736/http://www.sbbit.jp/article/7851/ |date=2 जनवरी 2009 }} * {{ट्विटर|fujisue}} * {{फेसबुक|kenzofujisue}} {| class="wikitable" ! colspan="3" |सार्वजनिक कार्यालय |- | rowspan="1" |पूर्ववर्ती किमियाकी मतसुजाकी अत्सुशी ओशिमा | rowspan="1" | '''आंतरिक मामलों और संचार के राज्य मंत्री अत्सुशी ओशिमा के साथ''' '''<small>संयुक्त</small>''' 2012 | rowspan="1" |मासाहिको शिबायामा तेत्सुशी सकामोटो |- ! colspan="3" |संसद |- | rowspan="1" |पूर्ववर्ती मासायोशी नटनिया | rowspan="1" | '''हाउस ऑफ काउंसिलर्स जनरल अफेयर्स कमेटी के''' अध्यक्ष 2011-2012 | rowspan="1" |अगला शोज़ो कुसाकावा |} pgmvccgofh2gmz85ku9d6n1i860glzm सदस्य वार्ता:AMRITANSHU DEV KASHYAP 3 1428567 6543779 6381547 2026-04-25T07:22:16Z ~2026-25239-53 921767 6543779 wikitext text/x-wiki '''AMRITANSHU DEV KASHYAP'''--[[विशेष:योगदान/&#126;2026-25239-53|&#126;2026-25239-53]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-25239-53|वार्ता]]) 07:22, 25 अप्रैल 2026 (UTC) गर्मी अपनी चरम-सीमा से ठीक एक कदम पीछे है; ऐसे में कोई-भी सूरज के जलिय-प्रतिबिंब को भी देखना न चाहेगा। दौड़ती सड़क पर चौकन्ना वो एक अकेला ट्रैफिक पुलिस वाला जिसकी वर्दी नमक से भीग गई है; गर्म हवा उसके लिए किसी ऐ.सी. से कम नहीं है। दौड़ती ए.सी. कार, ऑटो, बस, बाइक, साइकिल और पैदल अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे अनेक लोग बस ये चाहते हैं कि वे जल्द-से-जल्द अपने गंतव्य को प्राप्त हों। कईयों को खुशी होगी, कई अफसोस करेंगे! क्योंकि सब को ठीक-ठीक अपने लक्ष्य का पता नहीं होता वे बस चले जा रहे हैं; ठीक मेरी तरह। @अमृतांशु देव कश्यप Insta Id - adkthoughts Lakhisarai, Bihar - 811311. amritanshudev835@gmail.com nme13sooaxrjotqq9axjil5km0wd9p0 6543812 6543779 2026-04-25T10:08:51Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/Plutus|Plutus]] ([[सदस्य वार्ता:Plutus|वार्ता]]) के अवतरण 6381547 पर पुनर्स्थापित : पूर्ववत किया 6543812 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=AMRITANSHU DEV KASHYAP}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 08:57, 23 जनवरी 2023 (UTC) tmmr08e3mfkx2ex2a97de0y17z1mhse कृष्णमोहन बन्द्योपाध्याय 0 1445478 6543686 5976477 2026-04-24T17:49:47Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543686 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=रेव्रन्ड कृष्णमोहन बन्द्योपाध्याय|image=Krishna Mohan Banerjee.jpg|image_size=200px|caption=कृष्णमोहन बन्द्योपाध्याय का १८८६ में लिथोग्राफ|birth_date=२४ मई १८१३|birth_place=[[कलकत्ता]], [[बंगाल प्रेसीडेंसी]], [[ब्रिटिश राज]]|death_date=११ मई १८८५|death_place=[[कलकत्ता]], [[बंगाल प्रेसीडेंसी]], [[ब्रिटिश राज]]|nationality=[[भारतीय]]|occupation=[[इंजीलवाद|ईसाई इंजीलवादी]], प्रोफेसर, साहित्यकार}}   '''कृष्णामोहन बन्द्योपाध्याय''' <ref>His surname is also transliterated as ''Banerjea'' or as ''Bandyopadhyay''.</ref> (२४ मई १८१३&nbsp;– ११ मई १८८५) १९वीं सदी के एक भारतीय विचारक थे जिन्होंने ईसाई विचारों की उत्तेजना के जवाब में हिंदू दर्शन, धर्म और नैतिकता पर पुनर्विचार करने का प्रयास किया। वह स्वयं एक ईसाई बन गये, और बंगाल क्रिश्चियन एसोसिएशन का प्रथम अध्यक्ष थे। यह संस्था को भारतीयों द्वारा प्रशासित और वित्तपोषित थी। वह [[हेनरी लुई विवियन डिरोजिओ|हेनरी लुई विवियन डेरोजियो]] (१८०८-१८३१) के [[यंग बंगाल आंदोलन|युवा बंगाल]] समूह, शिक्षाविद्, भाषाविद् और ईसाई मिशनरी के एक प्रमुख सदस्य थे। == प्रारंभिक जीवन == [[चित्र:Krishna_Mohan_Banerjea.jpg|बाएँ|अंगूठाकार| कोल्सवर्थी ग्रांट द्वारा पोर्ट्रेट]] जिबोन कृष्णा बन्द्योपाध्याय<ref name="Banglapedia">{{Cite book|title=Banglapedia: National Encyclopedia of Bangladesh|last=Murshid|first=Ghulam|publisher=[[Asiatic Society of Bangladesh]]|year=2012|editor-last=Islam|editor-first=Sirajul|editor-link=Sirajul Islam|edition=Second|chapter=Banerji, Rev. Krishna Mohan|editor-last2=Jamal|editor-first2=Ahmed A.|chapter-url=http://en.banglapedia.org/index.php?title=Banerji,_Rev._Krishna_Mohan}}</ref> और श्रीमती देवी के पुत्र, कृष्ण मोहन का जन्म २४ मई १८१३ को श्यामपुर, कोलकाता, बंगाल में उनके नाना, रामजय विद्याभूषण, [[जोरासांको]] के शांतिराम सिंहा के दरबारी पंडित के घर में हुआ था। १८१९ में कृष्ण मोहन कोलोटोला में डेविड हरे द्वारा स्थापित <nowiki><i id="mwIw">स्कूल सोसाइटी इंस्टीट्यूशन</i></nowiki> (बाद में हरे स्कूल के रूप में नाम बदलकर) में शामिल हो गए। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर, हरे उन्हें पातालडांगा में अपने स्कूल में ले गए, जो बाद में १८२२ में हरे स्कूल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बन्द्योपाध्याय एक छात्रवृत्ति के साथ नव स्थापित [[प्रेसिडेन्सी विश्वविद्यालय|हिंदू कॉलेज]] में शामिल हुए। १८३१ में धर्म-सुधारक-और-साहित्यकार ने ''द इन्क्वायरर'' प्रकाशित करना शुरू किया। उसी वर्ष उनका नाटक, ''द पर्सिक्यूटेड: या, कलकत्ता में हिंदू समाज की वर्तमान स्थिति का नाटकीय दृश्य चित्रण, का'' निर्माण किया गया था। यह कुछ प्रचलित सामाजिक प्रथाओं की नीरस आलोचना थी। कॉलेज में रहते हुए वे स्कॉटिश ईसाई मिशनरी, अलेक्जेंडर डफ के व्याख्यानों में भाग लिया करते थे, जो १८३० में भारत आए थे। उनके पिता की १८२८ में हैजे से मृत्यु हो गई। == ईसाई धर्म में रूपांतरण == १८२९ में अपनी पढ़ाई पूरी करने पर, बन्द्योपाध्याय ने सहायक शिक्षक के रूप में ''पातालडांगा स्कूल में'' प्रवेश लिया। १८३२ में वह अलेक्जेंडर डफ के प्रभाव में ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया। अपने धर्मांतरण के परिणामस्वरूप, उन्होंने डेविड हरे के स्कूल में अपनी नौकरी खो दी और उनकी पत्नी बिंध्योबाशिनी बन्द्योपाध्याय को अपने पिता के घर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, केवल बाद के जीवन में उनके साथ रहने के लिए। फिर भी, वह बाद में ''चर्च मिशनरी सोसाइटी स्कूल'' के प्रधानाध्यापक बने।<ref name="Banglapedia"/> जब मिशनरी समाज ने कोलकाता में अपनी परोपकारी गतिविधियाँ शुरू कीं, तो बन्द्योपाध्याय क्राइस्ट चर्च के पहले बंगाली पुजारी बने जहाँ वे बंगाली में उपदेश देते और उपदेश देते थे।<ref name="Banglapedia"/> उन्होंने अपनी पत्नी, अपने भाई काली मोहन और प्रसन्ना कुमार टैगोर के पुत्र गणेंद्र मोहन टैगोर को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया। इसके बाद, गणेंद्र मोहन ने अपनी बेटी कमलमणि से शादी की और बैरिस्टर के रूप में अर्हता प्राप्त करने वाले पहले भारतीय बने। [[माइकल मधुसुदन दत्त|माइकल मधुसूदन दत्त]] के धर्म परिवर्तन में भी उनका अहम योगदान था। == बाद का जीवन == १८५२ में कृष्ण मोहन को बिशप कॉलेज, कोलकाता में ओरिएंटल स्टडीज के प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। उन्होंने १८३६ और १८३९ के बीच इसी कॉलेज के एक छात्र के रूप में ईसाई धर्म के पहलुओं का अध्ययन किया था। १८६४ में उन्हें [[ईश्वर चन्द्र विद्यासागर|ईश्वर चंद्र विद्यासागर]] के साथ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी का सदस्य चुना गया। १८७६ में [[कलकत्ता विश्वविद्यालय|कलकत्ता विश्वविद्यालय ने]] उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। श्रद्धेय कृष्णामोहन बन्द्योपाध्याय का ११ मई १८८५ को कोलकाता में निधन हो गया, और उन्हें उनकी पत्नी के साथ शिबपुर में दफनाया गया। कब्रिस्तान वर्तमान में आईआईईएसटी के परिसर के अंदर स्थित है।<ref>{{Cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata/iiest-on-revamp-mode-for-bicentenary-year/articleshow/67414318.cms|title=IIEST on revamp mode for bicentenary year|last=Mukherjee Pandey|first=Jhimli|date=January 7, 2019|website=The Times of India|language=en|access-date=2019-05-22}}</ref> == काम करता है == उन्होंने एक १३-वॉल्यूम अंग्रेजी प्रकाशित की&nbsp;- [[ब्रिटैनिका विश्वकोष|एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका]], ''विद्याकल्पद्रुम'' या ''एनसाइक्लोपीडिया बंगालेंसिस'' (१८४६-५१) का बंगाली रूपांतरण।<ref name="Amaresh">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=zB4n3MVozbUC&pg=PA1162|title=Encyclopaedia of Indian literature|last=Datta|first=Amaresh|publisher=South Asia Books|year=1988|isbn=978-81-7201-649-4|volume=2|location=Delhi|pages=1162–1163}}</ref> उन्होंने १८३१ में एक भारतीय अंग्रेजी नाटक "द सताए गए" लिखा था। उनके अन्य कार्यों में ''[[iarchive:arianwitnessort00banegoog|द एरियन विटनेस]]'' (१८७५),<ref>{{Cite web|url=https://archive.org/details/arianwitnessort00banegoog|title=The Arian Witness, Or, The Testimony of Arian Scriptures: In Corroboration ...|date=1875|publisher=Thacker, Spink|language=en|access-date=12 July 2017}}</ref> ''[[iarchive:dialoguesonhindu00banerich|हिंदू दर्शन पर संवाद]]'' (१८६१), और ''ईसाई धर्म और हिंदू धर्म के बीच संबंध'' (१८८१) शामिल हैं। == स्मृति == [[चित्र:Krishnamohan_Halt.jpg|अंगूठाकार| कृष्ण मोहन हॉल्ट स्टेशन, सियालदह दक्षिण खंड।]] [[चित्र:Tablet_-_Krishna_Mohan_Banerjea_-_Mid-nineteenth_Century_Cemetery_-_Bengal_Engineering_and_Science_University_-_Sibpur_-_Howrah_2013-06-06_8578.JPG|अंगूठाकार| बंगाल इंजीनियरिंग और विज्ञान विश्वविद्यालय में बन्द्योपाध्याय की समाधि]] सियालदह दक्षिण लाइन बरूईपुर- लक्ष्मीकांतपुर मार्ग में कृष्णा मोहन रेलवे स्टेशन नामक एक हॉल्ट स्टेशन को रेव्रन्ड कृष्णामोहन बन्द्योपाध्याय के संस्मरणों में चिह्नित किया गया है।<ref>{{Cite web|url=http://etrainroute.in/stations/KRXM|title=Trains arriving at and passing through Krishnamohan (halt)|website=Trainroutes|access-date=February 15, 2017|archive-date=3 सितंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170903052943/http://etrainroute.in/stations/KRXM|url-status=dead}}</ref> == संदर्भ == {{Reflist}}श्रद्धेय कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय द्वि-शताबरशेर एलोए, संस्करण सनत्कुमार नस्कर और कस्तूरी मुखोपाध्याय, रत्नाबली, २०१३ == बाहरी संबंध ==   == अन्य पठनीय सामग्री == * मयूख दास, ''रेवरेंड कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय'' (बंगाली में), कोलकाता: पश्चिमबंगा आंचलिक इतिहास ओ लोकसंस्कृति चर्चा केंद्र (२०१४)  * टीवी फिलिप, ''कृष्णामोहन बन्द्योपाध्याय, ईसाई धर्ममण्डक'' (१९८२) * रामचंद्र घोषा, ''ए बायोग्राफिकल स्केच ऑफ द रेव.'' ''केएम बन्द्योपाध्याय'' एड. मनबेंद्र नस्कर और मयूख दास, कॉर्पस रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोलकाता (२०१२) द्वारा * दुर्गादास लाहिड़ी, ''आदर्शचरित कृष्णमोहन'' सं. मयूख दास, कोलकाता द्वारा: पश्चिमबंगा आंचलिक इतिहास ओ लोकसंस्कृति चर्चा केंद्र (२०१२) * के. बागो, ''स्वदेशी ईसाई धर्म के अग्रदूत'' (१९६९) * शिवनाथ शास्त्री द्वारा बंगाली में ''रामतनु लाहिरी ओ तत्कालिन बंगसमाज'' * सुबोध चंद्र सेनगुप्ता और अंजलि बोस द्वारा संपादित बंगाली में ''संसद बंगाली चरिताभिधान'' (जीवनी शब्दकोश) * अमिय कुमार सेन द्वारा ''[[तत्वबोधिनी पत्रिका]] और [[बंगाल का नवजागरण|बंगाल पुनर्जागरण]]'' {{बंगाल का नवजागरण}}{{Protestant missions to India}}{{Authority control}} [[श्रेणी:भारतीय स्तंभकार]] [[श्रेणी:भारत के शिक्षाविद]] [[श्रेणी:भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता]] [[श्रेणी:बंगाली लेखक]] [[श्रेणी:१८८५ में निधन]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] t4rm29jha6ehdo1v76vfwulb168k3hp सदस्य वार्ता:Pradeep lahre 3 1456227 6543644 5853673 2026-04-24T15:13:17Z Pradeep lahre 773437 उत्तर 6543644 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Pradeep lahre}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 09:09, 17 मई 2023 (UTC) :मै अपना सहयोग देने की पूरी कोशिश करुगा [[सदस्य:Pradeep lahre|Pradeep lahre]] ([[सदस्य वार्ता:Pradeep lahre|वार्ता]]) 15:13, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 2wpvzoa3notgqa2w7pa2q5rb9xr6zx7 6543653 6543644 2026-04-24T15:35:35Z AMAN KUMAR 911487 चेतावनी: विकिपीडिया का प्रोमोशन अथवा प्रचार के लिए प्रयोग करना [[:यंत्र शिक्षण]] पर. 6543653 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Pradeep lahre}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 09:09, 17 मई 2023 (UTC) :मै अपना सहयोग देने की पूरी कोशिश करुगा [[सदस्य:Pradeep lahre|Pradeep lahre]] ([[सदस्य वार्ता:Pradeep lahre|वार्ता]]) 15:13, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == अप्रैल 2026 == [[File:Nuvola apps important.svg|25px|alt=|link=]] कृपया [[विकिपीडिया:विघटनकारी सम्पादन|विघटनकारी संपादन]] करना बंद करें। अगर आप विकिपीडिया पर [[विकिपीडिया:विकिपीडिया क्या नहीं है#विकिपीडिया भाषण देने या प्रचार करने का मंच नहीं है|भाषण देना, विज्ञापन या प्रचार सामग्री जोड़ना]] जारी रखते हैं, जैसा कि आपने [[:यंत्र शिक्षण]] पर किया है, तो आपको [[विकिपीडिया:निषेध नियमावली|संपादन करने से अवरोधित]] किया जा सकता है। [[श्रेणी:सदस्य वार्ता पन्नें जिनपर Uw-advert3 सूचना है|{{PAGENAME}}]]<!-- Template:Uw-advert3 --> [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:35, 24 अप्रैल 2026 (UTC) j3ahxzxhoil2t9icb1cg4kp0wcxzvtj क्रिकेट का मैदान 0 1459542 6543789 6284000 2026-04-25T08:23:15Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543789 wikitext text/x-wiki {| style="float:right;" |- |[[Image:cricket field parts.svg|right|thumb|200px|एक मानक क्रिकेट मैदान, जिसमें [[क्रिकेट पिच]] (भूरा), क्लोज-इनफिल्ड (हल्का हरा) [[बल्लेबाज|स्ट्राइकर बल्लेबाज]] के 15 गज़ (14 मी॰) के भीतर, 30 गज़ (27 मी॰) पर बनी सफेद रेखा के अंदर इनफिल्ड (मध्यम हरा) दिखा रहा है। और आउटफील्ड (गहरा हरा), दोनों छोर पर सीमा से बाहर [[क्रिकेट पिच]] के ठीक सामने [[साइट स्क्रीन]] के साथ।]] |- |[[Image:Cricket - Wickets.svg|right|thumb|200px|[[गेंदबाज (क्रिकेट)|गेंदबाज]] के छोर से [[क्रिकेट पिच]] का एक परिप्रेक्ष्य दृश्य। गेंदबाज विकेट के पिछले हिस्से में [[क्रिकेट पिच]] की तरफ दौड़ता है। गेंदबाजी या तो 'ओवर द विकेट' या 'राउंड द विकेट' होती है।]] |- | [[Image:Cricket pitch.svg|right|thumb|200px|क्रिकेट पिच का आयाम]] |- | [[File:Cricket fielding positions2.svg|thumb|200px|क्रिकेट क्षेत्ररक्षण की स्थिति]] |} '''क्रिकेट का मैदान''' एक बड़ा घास का मैदान होता है जिस पर [[क्रिकेट]] का खेल खेला जाता है। क्रिकेट के मैदान अंडाकार, पूर्ण वृत्त जैसे या फिर अनियमित आकार के हो सकते हैं। मैदान के लिए कोई निश्चित आयाम नहीं हैं, लेकिन पुरुषों के क्रिकेट के लिए इसका व्यास आमतौर पर 450 फीट (137 मीटर) से 500 फीट (150 मीटर) के बीच और महिला क्रिकेट के लिए 360 फीट (110 मीटर) से 420 फीट (130 मीटर) के बीच भिन्न होता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.dlgsc.wa.gov.au/sport-and-recreation/sports-dimensions-guide/cricket#:~:text=Cricket%20playing%20ground&text=Its%20diameter%20varies%20between%20137m,a%20minimum%20of%2059.43m.|title=क्रिकेट के मैदान का अधिकतम और न्यूनतम आयाम|date=12 जुलाई 2019|access-date=2 जून 2023|archive-date=27 अक्तूबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201027024939/https://www.dlgsc.wa.gov.au/sport-and-recreation/sports-dimensions-guide/cricket#:~:text=Cricket%20playing%20ground&text=Its%20diameter%20varies%20between%20137m,a%20minimum%20of%2059.43m.|url-status=dead}}</ref> सीमा के भीतर और आम तौर पर जितना संभव हो उतना केंद्र के करीब वर्ग होगा जो सावधानी से तैयार घास का एक क्षेत्र है जिस पर [[क्रिकेट पिच|क्रिकेट पिचों]] को तैयार किया जाता है और मैचों के लिए चिह्नित किया जाता है। पिच वह होती है जहां बल्लेबाज फेंकी गई गेंद को हिट करते हैं और रन बनाने के लिए विकेटों के बीच दौड़ते हैं, जबकि क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम इसे रोकने के लिए किसी भी विकेट पर गेंद लौटाने की कोशिश करती है। == मैदान की माप == [[अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद|आईसीसी]] मानक खेल की शर्तें अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए खेल की सतह के न्यूनतम और अधिकतम आकार को परिभाषित करती हैं। [[अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद|आईसीसी]] पुरूष टेस्ट मैच खेलने की शर्तों के साथ-साथ [[अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद|आईसीसी]] पुरूष वन डे अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने की शर्तों के कानून 19.1.3<ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.icc-cricket.com/about/cricket/rules-and-regulations/playing-conditions|title=क्रिकेट के नियम और विनियम {{!}} आईसीसी क्रिकेट के नियम|website=www.icc-cricket.com|language=en|access-date=2019-03-27}}</ref> में कहा गया है:<blockquote>19.1.3 का उद्देश्य प्रत्येक स्थल पर खेल के मैदान के आकार को अधिकतम करना होगा। सीमाओं के आकार के संबंध में, कोई भी सीमा 90 गज (82 मीटर) से अधिक लंबी नहीं होनी चाहिए, और पिच के केंद्र से कोई सीमा 65 गज (59 मीटर) से कम नहीं होनी चाहिए।</blockquote>अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट के लिए आईसीसी खेलने की समान परिस्थितियों (कानून 19.1.3) के लिए उपयोग की जाने वाली पिच के केंद्र से सीमा 60 और 70 गज (54.86 और 64.01 मीटर) के बीच होनी चाहिए।<ref name=":0" /> इसके अलावा, सीमा रेखा और आसपास के विज्ञापन बोर्डों के बीच न्यूनतम तीन गज की दूरी आवश्यक है। यह [[क्षेत्ररक्षण (क्रिकेट)|क्षेत्ररक्षण]] करने वाले खिलाड़ियों को सीमा के पास क्षेत्ररक्षण करते समय चोट से बचने में सहायक होता है। == संदर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:क्रिकेट]] [[श्रेणी:क्रिकेट मैदान]] i5pksatmr6gilcuj868ltrpgldw4t9p कुशी (2023 फ़िल्म) 0 1459654 6543663 6121689 2026-04-24T16:23:05Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543663 wikitext text/x-wiki {{Infobox film | image = Kushi (2022 film).jpg | caption = नाट्य विमोचन पोस्टर | director = शिव निर्वाण | writer = शिव निर्वाण | producer = {{Ubl | नवीन येरनेनी | वाई. रविशंकर}} | starring = {{Ubl | [[विजय देवरकोंडा]] | [[सामन्था रूथ प्रभु]]}} | cinematography =मुरली जी. | editing = प्रवीण पुदी | music = हेशम अब्दुल वहाब | studio = मिथ्री मूवी मेकर | released = {{Film date|df=yes|2023|9|1}} | country = भारत | runtime = 165 मिनट<ref>{{Cite web |date=2023-08-22|title='Kushi' run time revealed: Vijay Deverakonda and Samantha Ruth Prabhu's film clocks in at 2 hours and 45 minutes|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/kushi-run-time-revealed-vijay-deverakonda-and-samantha-ruth-prabhus-film-clocks-in-at-2-hours-and-45-minutes/articleshow/102970277.cms |access-date=2023-08-22 |website=The Times of India}}</ref> | language = तेलुगु }} '''खुशी''' शिव निर्वाण द्वारा लिखित और निर्देशित एक आगामी भारतीय [[तेलुगू भाषा|तेलुगु भाषा]] की रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है।<ref>{{Cite news |date=2022-05-16 |title=Vijay Deverakonda, Samantha's romantic comedy titled Kushi |language=en-IN |work=The Hindu |url=https://www.thehindu.com/entertainment/movies/vijay-deverakonda-samanthas-romantic-comedy-titled-kushi/article65418918.ece |access-date=2022-05-16 |issn=0971-751X}}</ref> मिथरी मूवी मेकर्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में [[विजय देवरकोंडा]] और [[सामन्था अक्किनेनी|सामंथा रूथ प्रभु]] हैं।<ref>{{cite web|url=https://www.ndtv.com/entertainment/viral-samantha-ruth-prabhu-and-vijay-deverakonda-set-the-stage-on-fire-at-kushi-musical-night-4301854|title=Viral: Samantha Ruth Prabhu And Vijay Deverakonda Set The Stage On Fire At Kushi Musical Night}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/pics-samantha-ruth-prabhu-makes-stunning-appearance-at-kushi-promotions-post-skipping-trailer-launch/articleshow/102741563.cms|title=Pics: Samantha Ruth Prabhu makes stunning appearance at 'Kushi' promotions post skipping trailer launch}}</ref> फिल्म का ट्रेलर 9 अगस्त 2023 को कई भाषाओं में रिलीज हुआ।<ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/kushi-trailer-vijay-deverakonda-and-samantha-ruth-prabhu-sparkle-in-the-beautiful-rom-com/articleshow/102572244.cms|title='Kushi' trailer: Vijay Deverakonda and Samantha Ruth Prabhu sparkle in the beautiful rom-com}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/vijay-deverakonda-i-had-a-crush-on-samantha-and-genuinely-loved-her-on-screen/articleshow/102576330.cms|title=Vijay Deverakonda: 'I had a crush on Samantha and genuinely loved her on screen'}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/netizens-enchanted-by-samantha-ruth-prabhus-captivating-presence-in-kushi-trailer/articleshow/102600616.cms?from=mdr|title=Netizens enchanted by Samantha Ruth Prabhu's captivating presence in 'Kushi' trailer}}</ref> खुशी फिल्म 1 सितंबर 2023 को रिलीज हुई।<ref>{{Cite web |date=2023-03-23 |title=Vijay Deverakonda and Samantha's 'Kushi' movie release date has been announced |url=https://telanganatoday.com/vijay-deverakonda-and-samanthas-kushi-movie-release-date-has-been-announced |access-date=2023-04-03 |website=[[Telangana Today]] |language=en-US}}</ref> ==कहानी== विजय सरकारी टेलीकॉम कंपनी [[भारत संचार निगम लिमिटेड|बीएसएनएल]] का कर्मचारी है, जबकि आराध्या (सामंथा) आईलैब्स सेंटर में काम करने वाली एक कॉर्पोरेट पेशेवर है। ==पात्र== * [[विजय देवरकोंडा]]<ref>{{Cite web |date=2022-04-21 |title=Vijay Deverakonda and Samantha team up for new film |url=https://www.thenewsminute.com/article/vijay-deverakonda-and-samantha-team-new-film-163106 |access-date=2022-05-16 |website=The News Minute |language=en}}</ref> * [[सामन्था अक्किनेनी|सामंथा]]<ref>{{Cite web |date=2022-04-21 |title=Vijay Deverakonda and Samantha Ruth Prabhu to play the lead in Shiva Nirvana's next film-Entertainment News , Firstpost |url=https://www.firstpost.com/entertainment/vijay-deverakonda-and-samantha-ruth-prabhu-to-play-the-lead-for-shiva-nirvanas-next-film-10584141.html |access-date=2022-05-16 |website=Firstpost |language=en}}</ref> विप्लव की पत्नी आराध्या के रूप में (चिन्मयी द्वारा डब की गई आवाज)<ref>{{Cite web|date=28 August 2022|title=All Cast Details About Kushi Telugu Movie|url=https://www.filmibug.com/kushi-telugu-movie-2023-cast-trailer-story-release-date-poster/|access-date=26 August 2022|website=FilmiBug|archive-date=24 अगस्त 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230824141544/https://www.filmibug.com/kushi-telugu-movie-2023-cast-trailer-story-release-date-poster/|url-status=dead}}</ref> * जयराम<ref name=":0">{{Cite web |date=May 16, 2022 |first=Janani |last=K. |title=Vijay Deverakonda and Samantha's Kushi first-look poster out. Film to release on December 23 |url=https://www.indiatoday.in/movies/regional-cinema/story/vijay-deverakonda-and-samantha-s-kushi-first-look-poster-out-film-to-release-on-december-23-1949898-2022-05-16 |access-date=2022-05-17 |website=India Today |language=en}}</ref> * [[सचिन खेडेकर]]<ref name=":0" /> * [[मुरली शर्मा]]<ref name=":0" /> * [[वेन्नेला किशोर|वेनेला किशोर]]<ref name=":0" /> * [[लक्ष्मी (अभिनेत्री)|लक्ष्मी]]<ref name=":0" /> * [[रोहिणी (अभिनेत्री)|रोहिणी]] * [[अली (अभिनेता)|अली]]<ref name=":0" /> * राहुल रामकृष्ण<ref name=":0" /> * श्रीकांत अयंगर<ref name=":0" /> * शरण्या प्रदीप ==फ़िल्म-निर्माण== ===विकास=== दिसंबर 2019 में, यह घोषणा की गई थी कि शिव निर्वाण श्री वेंकटेश्वर क्रिएशंस के तहत दिल राजू के साथ विजय देवरकोंडा का निर्देशन करेंगे।<ref>{{Cite news |title=Vijay Deverakonda's next with Shiva Nirvana announced – Times of India |url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/vijay-deverakondas-next-with-shiva-nirvana-announced/articleshow/72864735.cms |access-date=2022-05-16 |website=The Times of India |language=en |last1=Nyayapati |first1=Neeshita}}</ref><ref>{{Cite web |date=2019-12-19 |title=Vijay Deverakonda to team up with Shiva Nirvana for his next |url=https://www.thenewsminute.com/article/vijay-deverakonda-team-shiva-nirvana-his-next-114396 |access-date=2022-05-17 |website=The News Minute |language=en}}</ref> फिल्म को औपचारिक रूप से अप्रैल 2022 में लॉन्च किया गया था, अस्थायी शीर्षक #VD11 तहत, मिथरी मूवी मेकर्स ने फिल्म का निर्माण किया।<ref>{{Cite web |last=Janga |first=Sravani |date=2022-04-21 |title='VD11'.. లాంచింగ్ కు సామ్ మిస్సింగ్ ఎందుకంటే? |url=https://telugustop.com/vd11-sam-missing-for-launch |access-date=2022-05-16 |website=TeluguStop.com |language=te}}</ref> मई 2022 में, फिल्म का शीर्षक आधिकारिक तौर पर कुशी होने का पता चला था।<ref>{{Cite web |date=2022-05-06 |title=Vijay Deverakonda, Samantha Ruth Prabhu's VD 11 Is Now Titled 'Khushi'; Poster To Be Unveiled on May 9 |url=https://www.news18.com/news/movies/vijay-deverakonda-samantha-ruth-prabhus-vd-11-is-now-titled-khushi-films-poster-to-be-unveiled-on-may-9-5119621.html |access-date=2022-05-16 |website=News18 |language=en}}</ref> ===फिल्माने === प्रिंसिपल फोटोग्राफी अप्रैल 2022 में शुरू हुई।<ref>{{Cite news |title=Spotted: Vijay Deverakonda jets off to Kashmir to shoot with Samantha Ruth Prabhu for Shiva Nirvana's next |url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/spotted-vijay-deverakonda-jets-off-to-kashmir-to-shoot-with-samantha-ruth-prabhu-for-shiva-nirvanas-next/articleshow/91031444.cms |access-date=2022-05-16 |website=The Times of India |language=en}}</ref><ref>{{Cite web |last=Hymavathi |first=Ravali |date=2022-04-28 |title=Vijay Devarakonda Surprises Samantha With Special Party On The Sets Of 'VD 11' |url=https://www.thehansindia.com/cinema/tollywood/vijay-devarakonda-surprises-samantha-with-special-party-on-the-sets-of-vd-11-740197 |access-date=2022-05-17 |website=www.thehansindia.com |language=en}}</ref> कश्मीर में होने वाला पहला शेड्यूल मई 2022 में संपन्न हुआ।<ref>{{Cite web |date=2022-04-23 |title=Pics: Vijay Deverakonda spotted in a comfy look as he heads to Kashmir for Shiva Nirvana&#039;s VD11 shoot |url=https://www.pinkvilla.com/entertainment/south/pics-vijay-deverakonda-spotted-comfy-look-he-heads-kashmir-shiva-nirvanas-vd11-shoot-1074926 |access-date=2022-05-17 |website=Pinkvilla |language=en |archive-date=11 फ़रवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230211065015/https://www.pinkvilla.com/entertainment/south/pics-vijay-deverakonda-spotted-comfy-look-he-heads-kashmir-shiva-nirvanas-vd11-shoot-1074926 |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite web |date=May 23, 2022 |first=Samriddhi |last=Srivastava |title=Samantha and Vijay Deverakonda wrap up Kushi first schedule in Jammu & Kashmir. See pics |url=https://www.indiatoday.in/movies/regional-cinema/story/samantha-and-vijay-deverakonda-wrap-up-kushi-first-schedule-in-jammu-kashmir-see-pics-1952965-2022-05-23 |access-date=2022-05-24 |website=India Today |language=en}}</ref> फिल्म की शूटिंग कश्मीर घाटी में कई जगहों पर हुई - अनंतनाग, पुलवामा में पंपोर रेलवे स्टेशन, [[पहलगाम]] में ममलेश्वर मंदिर और श्रीनगर में डल झील। दूसरा शेड्यूल जून 2022 में शुरू हुआ और हैदराबाद, विजाग और अलेप्पी में हुआ। हालांकि, सामंथा को मायोसिटिस नामक बीमारी से पीड़ित होने के कारण फिल्मांकन रोक दिया गया। तीसरा शेड्यूल नवंबर 2022 में देवरकोंडा के साथ शुरू हुआ और कलाकार सेट पर शामिल हुए और सामंथा के बिना फिल्म के अपने हिस्से की शूटिंग की। मार्च 2023 में फिल्मांकन फिर से शुरू हुआ जब सामंथा फिल्म के सेट पर शामिल हुईं और आखिरकार अपनी बीमारी से उबर गईं। मई 2023 में, फिल्म का शीर्षक गीत [[तुर्की]] में फिल्माया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.indiatoday.in/movies/regional-cinema/story/vijay-deverakonda-and-samantha-shoot-for-kushi-in-turkey-see-pics-videos-2386693-2023-05-31|title=Vijay Deverakonda and Samantha shoot for Kushi in Turkey. See pics, videos}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/from-kushi-shoot-in-turkey-to-citadel-shoot-in-serbia-samantha-ruth-prabhu-hops-for-back-to-back-shoots/articleshow/100871929.cms?from=mdr|title=From 'Kushi' shoot in Turkey to 'Citadel' shoot in Serbia, Samantha Ruth Prabhu hops for back-to-back shoots}}</ref> ==संगीत== संगीत और पृष्ठभूमि स्कोर हेशाम अब्दुल वहाब द्वारा रचित है, जिन्होंने हृदयम के साथ प्रसिद्धि हासिल की।<ref>{{Cite news |title=Samantha Ruth Prabhu & Vijay Deverakonda-starrer 'Kushi' to release on December 23 |work=The Economic Times |url=https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/samantha-ruth-prabhu-vijay-deverakonda-starrer-kushi-to-release-on-december-23/articleshow/91588103.cms |access-date=2022-05-16}}</ref><ref>{{Cite news |title=#VD11: Hesham Abdul Wahab to score music for Vijay Deverakonda and Samantha's next – Times of India |url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/vd11-hesham-abdul-wahab-to-score-music-for-vijay-deverakonda-and-samanthas-next/articleshow/90973018.cms |access-date=2022-05-16 |website=The Times of India |language=en}}</ref> {{Track listing | all_writing = | headline = | extra_column = गायक (ओं) | title1 = ना रोजा नुव्वे | lyrics1 = शिव निर्वाण | extra1 = हेशाम अब्दुल वहाब, मंजू श्री | total_length = 4:03 | length1 = 4:03 }} ==रिलीज़== खुशी 1 सितंबर 2023 को [[तमिल]], [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]], [[मलयालम भाषा|मलयालम]] और [[हिन्दी|हिंदी]] भाषाओं में डब संस्करणों के साथ तेलुगु में नाटकीय रूप से रिलीज़ हुई। विश्वव्यापी नाट्य अधिकार ₹525 मिलियन (US$6.6 मिलियन) की लागत पर बेचे गए।<ref name=":1">{{Cite web |date=2023-09-08 |title=Vijay Devarakonda - Kushi: విజయ్ దేవరకొండ ‘ఖుషీ’ ఫస్ట్ వీక్ వసూళ్లు.. బ్రేక్ ఈవెన్‌కు ఎంత దూరంలో ఉందంటే.. |url=https://telugu.news18.com/photogallery/movies/vijay-deverakonda-samantha-kushi-movie-1st-week-box-office-collections-ta-2105180-page-5.html |access-date=2023-09-08 |website=[[News18 Telugu]] |language=te}}</ref> फिल्म के पोस्ट-थिएट्रिकल स्ट्रीमिंग अधिकार [[नेटफ्लिक्स]] द्वारा 30 करोड़ रुपये की लागत से हासिल किए गए थे।<ref>{{Cite web |last= |first= |date=2023-09-07 |title=Kushi OTT Release Date: నెట్‌ఫ్లిక్స్‌లోకి విజ‌య్ దేవ‌ర‌కొండ ఖుషి - స్ట్రీమింగ్ డేట్ ఇదేనా? |url=https://telugu.hindustantimes.com/entertainment/kushi-ott-release-date-when-and-where-to-watch-vijay-devarakonda-samantha-romantic-entertainer-movie-121694060376436.html |access-date=2023-09-08 |website=[[Hindustan Times|Hindustan Times Telugu]] |language=te |archive-date=30 सितंबर 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230930124749/https://telugu.hindustantimes.com/entertainment/kushi-ott-release-date-when-and-where-to-watch-vijay-devarakonda-samantha-romantic-entertainer-movie-121694060376436.html |url-status=dead }}</ref> फिल्म 1 अक्टूबर 2023 से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होनी शुरू हुई।<ref>{{cite web|url=https://www.netflix.com/in/title/81719491|title= Netflix has acquired the digital rights of Kushi for a whopping amount of Rs 30 crores}}</ref> ==बॉक्स ऑफ़िस== खुशी ने पहले दिन सिनेमाघरों में ₹16 करोड़ की शानदार ओपनिंग की थी।<ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/telugu-cinema/kushi-box-office-collection-day-4-samantha-ruth-prabhu-vijay-deverakonda-film-101693878297312.html|title=Kushi box office collection day 4: Samantha Ruth Prabhu, Vijay Deverakonda film falls to ₹4 crore on 1st Monday}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/telugu-cinema/kushi-box-office-collection-day-3-vijay-deverakonda-samantha-ruth-prabhu-101693797712574.html|title=Kushi box office collection day 3: Samantha Ruth Prabhu, Vijay Deverakonda's film mints ₹11 crore, takes total to ₹36 cr}}</ref><ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/news/is-this-the-ott-release-date-of-vijay-deverakonda-and-samantha-ruth-prabhus-kushi/articleshow/103683441.cms?from=mdr|title=Is this the OTT release date of Vijay Deverakonda and Samantha Ruth Prabhu's 'Kushi'?}}</ref> विदेशों में, कुशी ने अपनी रिलीज़ के केवल दो दिनों के भीतर अमेरिका में $1 मिलियन की कमाई की।<ref>{{cite web|url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/telugu/movies/box-office/kushi-box-office-collection-day-2-vijay-deverakonda-and-samantha-ruth-prabhu-starrer-conquers-the-us-box-office-garnering-1-million-in-style/articleshow/103322575.cms?from=mdr|title='Kushi' box office collection Day 2: Vijay Deverakonda and Samantha Ruth Prabhu starrer conquers the US box office, garnering $1 million in style}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.bollywoodhungama.com/movie/kushi/box-office/|title=Kushi Box Office}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ियाँ == *{{IMDb title|15380630}} [[श्रेणी:2023 की फ़िल्में]] [[श्रेणी:भारतीय फिल्में]] [[श्रेणी:भारतीय रोमांटिक कॉमेडी फ़िल्में]] 58xezl9jvzzloqs6k6hxrvbsutwtizl राघव चड्ढा 0 1460484 6543619 6536113 2026-04-24T13:46:49Z ~2026-25162-82 921686 New data input 6543619 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian politician | image = Raghav Chadha.jpg | birth_date = 11 नवंबर 1988 | birth_place = [[दिल्ली]], [[भारत]] | office1 = राज्य सभा | constituency1 = पंजाब | termstart1 = 9 अप्रैल 2022 | predecessor1 = प्रताप सिंह बाजवा | constituency2 = राजिंदर नगर | office2 = विधायक | term_start2 = 12 फरवरी 2020 | term_end2 = वर्तमान | predecessor2 = विजेंद्र गर्ग विजय | successor2 = | office3 = दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष | term_start3 = 2 मार्च 2020<ref>{{Cite web|url=https://www.news18.com/news/india/aap-mla-raghav-chadha-appointed-delhi-jal-board-vice-chairman-2522837.html|title=AAP MLA Raghav Chadha Appointed Delhi Jal Board Vice Chairman|date=2 March 2020}}</ref><ref>http://www.delhijalboard.nic.in/sites/default/files/All-PDF/PR_RC_03.03.2020_E_0.pdf {{Bare URL PDF|date=March 2022}}</ref> | term_end3 = | predecessor3 = दिनेश मोहनिया | successor3 = | alma_mater = दिल्ली विश्वविद्यालय | profession = दिल्ली विश्वविद्यालय | party = [[भारतीय जनता पार्टी]] | spouse = {{marriage|[[परिणीति चोपड़ा]]|2023}} | known_for = आप के प्रवक्ता<ref>{{cite web|title=Official Spokespersons|url=http://www.aamaadmiparty.org/official-spokespersons|publisher=Aam Aadmi Party|access-date=11 September 2016}}</ref><ref>{{cite news|title=Meet Raghav Chadha, AAP ka cute quotient - Times of India|url=http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Meet-Raghav-Chadha-AAP-ka-cute-quotient/articleshow/46296450.cms|work=Times of India|date=19 February 2015}}</ref> | website = [https://www.raghavchadha.in Official Website] }} '''राघव चड्ढा''' एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं और [[आम आदमी पार्टी]] के सदस्य हैं। वे [[पंजाब]] से [[राज्यसभा]] के सबसे युवा सदस्य हैं। वे पूर्व दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से 2022 तक विधायक थे।<ref>{{Cite web|url=https://hindi.starsunfolded.com/raghav-chadha-hindi/|title=Raghav Chadha Biography in Hindi {{!}} राघव चड्ढा जीवन परिचय {{!}} StarsUnfolded - हिंदी|website=hindi.starsunfolded.com|access-date=2023-06-05}}</ref> ==राजनीतिक जीवन== राघव चद्दा ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया और 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आप उम्मीदवार के रूप में लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।राघव चड्ढा ने 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव राजेंद्र नगर निर्वाचन क्षेत्र से लड़ा और जीत हासिल की और विधायक के रूप में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। उन्हें 2 मार्च 2020 को दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|title=राघव चड्ढा जीवन परिचय, उम्र, राजनीति बैकग्राउंड {{!}} [Raghav Biography]|last=Editor|first=Arvind|date=2023-05-29|website=PM Modi Yojanaye|language=|access-date=2023-06-05|archive-date=5 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230605140533/https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|url-status=dead}}</ref> राघव चद्दा को पंजाब राज्य के लिए आम आदमी पार्टी के प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया था, और उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों के प्रभारी के रूप में पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें 21 मार्च, 2022 को आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। उन्होंने परिणीति चोप्रा से सगाई कर ली है । उनकी शादी 2023 में हो चुकी है।<ref>{{Cite web|url=https://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-ncr-parineeti-chopra-raghav-chadha-engagement-guest-arrive-at-kaputhala-house-delhi-23411523.html|title=Raghav-Parineeti Engagement Photos परिणीति चोपड़ा और राघव चड्ढा की सगाई की तस्वीरें पहुंचे ये मेहमान - AAP MP Raghav Chadha gets engaged to actress Parineeti Chopra|website=Jagran|language=hi|access-date=2023-06-05}}</ref> == सन्दर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:राज्यसभा सदस्य]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञ]] 2fzimzqboxdrd4gcs7s65ykn1bfafsr 6543783 6543619 2026-04-25T07:42:12Z ~2026-25372-75 921772 6543783 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian politician | image = Raghav Chadha.jpg | birth_date = 11 नवंबर 1988 | birth_place = [[दिल्ली]], [[भारत]] | office1 = राज्य सभा | constituency1 = पंजाब | termstart1 = 9 अप्रैल 2022 | predecessor1 = प्रताप सिंह बाजवा | constituency2 = राजिंदर नगर | office2 = विधायक | term_start2 = 12 फरवरी 2020 | term_end2 = वर्तमान | predecessor2 = विजेंद्र गर्ग विजय | successor2 = | office3 = दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष | term_start3 = 2 मार्च 2020<ref>{{Cite web|url=https://www.news18.com/news/india/aap-mla-raghav-chadha-appointed-delhi-jal-board-vice-chairman-2522837.html|title=AAP MLA Raghav Chadha Appointed Delhi Jal Board Vice Chairman|date=2 March 2020}}</ref><ref>http://www.delhijalboard.nic.in/sites/default/files/All-PDF/PR_RC_03.03.2020_E_0.pdf {{Bare URL PDF|date=March 2022}}</ref> | term_end3 = | predecessor3 = दिनेश मोहनिया | successor3 = | alma_mater = दिल्ली विश्वविद्यालय | profession = दिल्ली विश्वविद्यालय | party = [[भारतीय जनता पार्टी]] | spouse = {{marriage|[[परिणीति चोपड़ा]]|2023}} | known_for = आप के प्रवक्ता<ref>{{cite web|title=Official Spokespersons|url=http://www.aamaadmiparty.org/official-spokespersons|publisher=Aam Aadmi Party|access-date=11 September 2016}}</ref><ref>{{cite news|title=Meet Raghav Chadha, AAP ka cute quotient - Times of India|url=http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Meet-Raghav-Chadha-AAP-ka-cute-quotient/articleshow/46296450.cms|work=Times of India|date=19 February 2015}}</ref> | website = [https://www.raghavchadha.in Official Website] }} '''राघव चड्ढा''' एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं और [[आम आदमी पार्टी]] के सदस्य हैं। वे [[पंजाब]] से [[राज्यसभा]] के सबसे युवा सदस्य हैं। वे पूर्व दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से 2022 तक विधायक थे।<ref>{{Cite web|url=https://hindi.starsunfolded.com/raghav-chadha-hindi/|title=Raghav Chadha Biography in Hindi {{!}} राघव चड्ढा जीवन परिचय {{!}} StarsUnfolded - हिंदी|website=hindi.starsunfolded.com|access-date=2023-06-05}}</ref> ==राजनीतिक जीवन== राघव चद्दा ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया और 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आप उम्मीदवार के रूप में लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।राघव चड्ढा ने 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव राजेंद्र नगर निर्वाचन क्षेत्र से लड़ा और जीत हासिल की और विधायक के रूप में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। उन्हें 2 मार्च 2020 को दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|title=राघव चड्ढा जीवन परिचय, उम्र, राजनीति बैकग्राउंड {{!}} [Raghav Biography]|last=Editor|first=Arvind|date=2023-05-29|website=PM Modi Yojanaye|language=|access-date=2023-06-05|archive-date=5 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230605140533/https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|url-status=dead}}</ref> राघव चद्दा को पंजाब राज्य के लिए आम आदमी पार्टी के प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया था, और उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों के प्रभारी के रूप में पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें 21 मार्च, 2022 को आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। उन्होंने परिणीति चोप्रा से सगाई कर ली है ।they have been married since 2023 . In october 2025 they gave birth to a boy named neer == सन्दर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:राज्यसभा सदस्य]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञ]] fpk4f1yiu0pmgranwk98urogq85p7cb 6543790 6543783 2026-04-25T08:35:15Z ~2026-25303-52 921780 Raghav chadda ab bjp me he to wahi sahi kiya hai 6543790 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian politician | image = Raghav Chadha.jpg | birth_date = 11 नवंबर 1988 | birth_place = [[दिल्ली]], [[भारत]] | office1 = राज्य सभा | constituency1 = पंजाब | termstart1 = 9 अप्रैल 2022 | predecessor1 = प्रताप सिंह बाजवा | constituency2 = राजिंदर नगर | office2 = विधायक | term_start2 = 12 फरवरी 2020 | term_end2 = वर्तमान | predecessor2 = विजेंद्र गर्ग विजय | successor2 = | office3 = दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष | term_start3 = 2 मार्च 2020<ref>{{Cite web|url=https://www.news18.com/news/india/aap-mla-raghav-chadha-appointed-delhi-jal-board-vice-chairman-2522837.html|title=AAP MLA Raghav Chadha Appointed Delhi Jal Board Vice Chairman|date=2 March 2020}}</ref><ref>http://www.delhijalboard.nic.in/sites/default/files/All-PDF/PR_RC_03.03.2020_E_0.pdf {{Bare URL PDF|date=March 2022}}</ref> | term_end3 = | predecessor3 = दिनेश मोहनिया | successor3 = | alma_mater = दिल्ली विश्वविद्यालय | profession = दिल्ली विश्वविद्यालय | party = [[भारतीय जनता पार्टी]] | spouse = {{marriage|[[परिणीति चोपड़ा]]|2023}} | known_for = आप के प्रवक्ता<ref>{{cite web|title=Official Spokespersons|url=http://www.aamaadmiparty.org/official-spokespersons|publisher=Aam Aadmi Party|access-date=11 September 2016}}</ref><ref>{{cite news|title=Meet Raghav Chadha, AAP ka cute quotient - Times of India|url=http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Meet-Raghav-Chadha-AAP-ka-cute-quotient/articleshow/46296450.cms|work=Times of India|date=19 February 2015}}</ref> | website = [https://www.raghavchadha.in Official Website] }} '''राघव चड्ढा''' एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं और [[आम आदमी पार्टी]] के सदस्य थे वे [[पंजाब]] से [[राज्यसभा]] के सबसे युवा सदस्य हैं। वे पूर्व दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से 2022 तक विधायक थे।<ref>{{Cite web|url=https://hindi.starsunfolded.com/raghav-chadha-hindi/|title=Raghav Chadha Biography in Hindi {{!}} राघव चड्ढा जीवन परिचय {{!}} StarsUnfolded - हिंदी|website=hindi.starsunfolded.com|access-date=2023-06-05}}</ref> ==राजनीतिक जीवन== राघव चद्दा ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया और 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आप उम्मीदवार के रूप में लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।राघव चड्ढा ने 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव राजेंद्र नगर निर्वाचन क्षेत्र से लड़ा और जीत हासिल की और विधायक के रूप में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। उन्हें 2 मार्च 2020 को दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|title=राघव चड्ढा जीवन परिचय, उम्र, राजनीति बैकग्राउंड {{!}} [Raghav Biography]|last=Editor|first=Arvind|date=2023-05-29|website=PM Modi Yojanaye|language=|access-date=2023-06-05|archive-date=5 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230605140533/https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|url-status=dead}}</ref> राघव चद्दा को पंजाब राज्य के लिए आम आदमी पार्टी के प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया था, और उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों के प्रभारी के रूप में पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें 21 मार्च, 2022 को आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। उन्होंने परिणीति चोप्रा से सगाई कर ली है ।they have been married since 2023 . In october 2025 they gave birth to a boy named neer == सन्दर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:राज्यसभा सदस्य]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञ]] i7gx080jhui1j4jebvljka11mr0dx3v 6543811 6543790 2026-04-25T10:08:49Z चाहर धर्मेंद्र 703114 सन्दर्भ + जानकारी 6543811 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian politician | image = Raghav Chadha.jpg | birth_date = 11 नवंबर 1988 | birth_place = [[दिल्ली]], [[भारत]] | office1 = राज्य सभा | constituency1 = पंजाब | termstart1 = 9 अप्रैल 2022 | predecessor1 = प्रताप सिंह बाजवा | constituency2 = राजिंदर नगर | office2 = विधायक | term_start2 = 12 फरवरी 2020 | term_end2 = वर्तमान | predecessor2 = विजेंद्र गर्ग विजय | successor2 = | office3 = दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष | term_start3 = 2 मार्च 2020<ref>{{Cite web|url=https://www.news18.com/news/india/aap-mla-raghav-chadha-appointed-delhi-jal-board-vice-chairman-2522837.html|title=AAP MLA Raghav Chadha Appointed Delhi Jal Board Vice Chairman|date=2 March 2020}}</ref><ref>http://www.delhijalboard.nic.in/sites/default/files/All-PDF/PR_RC_03.03.2020_E_0.pdf {{Bare URL PDF|date=March 2022}}</ref> | term_end3 = | predecessor3 = दिनेश मोहनिया | successor3 = | alma_mater = दिल्ली विश्वविद्यालय | profession = दिल्ली विश्वविद्यालय | party = [[भारतीय जनता पार्टी]] | spouse = {{marriage|[[परिणीति चोपड़ा]]|2023}} | known_for = आप के प्रवक्ता<ref>{{cite web|title=Official Spokespersons|url=http://www.aamaadmiparty.org/official-spokespersons|publisher=Aam Aadmi Party|access-date=11 September 2016}}</ref><ref>{{cite news|title=Meet Raghav Chadha, AAP ka cute quotient - Times of India|url=http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Meet-Raghav-Chadha-AAP-ka-cute-quotient/articleshow/46296450.cms|work=Times of India|date=19 February 2015}}</ref> | website = [https://www.raghavchadha.in Official Website] }} '''राघव चड्ढा''' एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं और [[आम आदमी पार्टी]] के सदस्य थे वे [[पंजाब]] से [[राज्यसभा]] के सबसे युवा सदस्य हैं। वे पूर्व दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से 2022 तक विधायक थे।<ref>{{Cite web|url=https://hindi.starsunfolded.com/raghav-chadha-hindi/|title=Raghav Chadha Biography in Hindi {{!}} राघव चड्ढा जीवन परिचय {{!}} StarsUnfolded - हिंदी|website=hindi.starsunfolded.com|access-date=2023-06-05}}</ref> ==राजनीतिक जीवन== राघव चद्दा ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया और 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आप उम्मीदवार के रूप में लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। राघव चड्ढा ने 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव राजेंद्र नगर निर्वाचन क्षेत्र से लड़ा और जीत हासिल की और विधायक के रूप में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। उन्हें 2 मार्च 2020 को दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।<ref>{{Cite web|url=https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|title=राघव चड्ढा जीवन परिचय, उम्र, राजनीति बैकग्राउंड {{!}} [Raghav Biography]|last=Editor|first=Arvind|date=2023-05-29|website=PM Modi Yojanaye|language=|access-date=2023-06-05|archive-date=5 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230605140533/https://pmmodiyojanaye.in/raghav-chadha-biography/|url-status=dead}}</ref> राघव चद्दा को पंजाब राज्य के लिए आम आदमी पार्टी के प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया था, और उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों के प्रभारी के रूप में पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें 21 मार्च, 2022 को आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। ==निजी जीवन== राघव चड्ढा ने 13 मई 2023 को [[नई दिल्ली]] के कपूरथला हाउस में अभिनेत्री [[परिणीति चोपड़ा]] के साथ सगाई की।<ref>{{Cite web |date=13 मई 2023 |title=Parineeti Chopra gets engaged to Raghav Chadha, shares first pics: 'Everything I prayed for' |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/bollywood/parineeti-chopra-raghav-chadha-engagement-photos-videos-8605619/lite/ |access-date=13 मई 2023 |work=इंडियन एक्सप्रेस}}</ref> इसके बाद 24 सितंबर 2023 को [[उदयपुर]] स्थित द लीला पैलेस में पारंपरिक [[हिन्दू विवाह|हिंदू रीति-रिवाजों]] के अनुसार उनका विवाह संपन्न हुआ।<ref>{{Cite web |date=24 सितंबर 2023 |title=Parineeti Chopra and Raghav Chadha wedding live updates: Raagrina done with pheras, are now married |url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/bollywood/parineeti-chopra-raghav-chadha-wedding-live-updates-udaipur-pictures-videos-guests-101695526408661-amp.html |access-date=24 सितंबर 2023 |work=हिंदुस्तान टाइम्स }}</ref><ref>{{Cite news |title=Parineeti Chopra and Raghav Chadha are now married! |url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/parineeti-chopra-and-raghav-chadha-are-now-married/articleshow/103908105.cms |access-date=24 सितंबर 2023 |work=टाइम्स ऑफ इंडिया}}</ref> यह दंपति 19 अक्टूबर 2025 को अपने पहले संतान के रूप में एक पुत्र के आगमन से अभिभूत हुआ,<ref name="It's a boy! Parineeti Chopra and Raghav Chadha welcome their first child together">{{cite news |title=It's a boy! Parineeti Chopra and Raghav Chadha welcome their first child together |url=https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/parineeti-chopra-and-raghav-chadha-welcome-their-first-child-together/articleshow/124684148.cms |access-date=19 अक्टूबर 2025 |work=टाइम्स ऑफ इंडिया |date=19 अक्टूबर 2025 |archive-url=https://web.archive.org/web/20251019163017/https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/parineeti-chopra-and-raghav-chadha-welcome-their-first-child-together/articleshow/124684148.cms |archive-date=19 अक्टूबर 2025}}</ref> जिसने उनके जीवन में एक नए अध्याय का आरंभ किया। == सन्दर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:भारतीय राजनीतिज्ञ]] [[श्रेणी:राज्यसभा सदस्य]] [[श्रेणी:आम आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञ]] 6lya0zh9c4mdtf9bbcim7eoomf8lbpt जयासुधा 0 1464333 6543816 6097155 2026-04-25T10:20:02Z Sequencesolved 173771 एक चित्र जोडा। 6543816 wikitext text/x-wiki {{Infobox politician | name = '''जयसुधा कपूर''' | image = Jaya Sudha.png | caption = | office = [[13वीं आंध्र प्रदेश विधानसभा|विधान सभा के सदस्य, आंध्र प्रदेश]] | 2blankname = मुख्यमंत्री | 2namedata = [[वाई एस राजशेखर रेड्डी]] | constituency = [[सिकंदराबाद]], आंध्र प्रदेश, भारत | term_start = 2009 | term_end = 2014 | birth_name = सुजाता निदुदावोलु | birth_date = {{birth date and age|df=yes|1958|12|17}} | birth_place = [[मद्रास]], [[मद्रास राज्य]], [[भारत]]<br />(अब [[चेन्नई]], [[तमिलनाडु]]) | occupation = अभिनेत्री, राजनेता | spouse = {{marriage|[[नितिन कपूर]]|1985|2017|end=died}}<br/>काकरलापुडी राजेंद्र प्रसाद (1982 में तलाकशुदा) | children = निहार (b. 1986) <br/> श्रेयन (b.1990) | party = [[वाईएसआर कांग्रेस पार्टी]]<br />({{small|2019 - 2022}}) | otherparty = [[इंडियन नेशनल कांग्रेस]]<br />({{small|2009- 2014}})<br />[[तेलुगु देशम पार्टी]]<br />({{small|2016 - 2019}}) | relatives = See [[List of South Indian film families#Nidudavolu family|निदुदावोलु परिवार]] | death_date = | death_place = }} '''जयसुधा कपूर''' (जन्म सुजाता निदुदावोलु) एक भारतीय अभिनेत्री और राजनेता हैं जो मुख्य रूप से तेलुगु और तमिल सिनेमा में अपने काम के लिए पहचानी जाती हैं। उन्होंने कुछ कन्नड़, मलयालम और हिंदी फिल्मों में भी काम किया है। <ref name="auto1">{{Cite web |url=https://www.thehindu.com/entertainment/movies/jayasudha-gets-candid-on-her-films-and-lifes-journey/article24643116.ece |title=Jayasudha gets candid on her films and life's journey |first=Y. Sunita |last=Chowdhary |date=9 August 2018 |work=The Hindu}}</ref> अपने स्वभाविक अभिनय के लिए जाने जाने वाली अभिनेत्री, उनके 5 दशकों से अधिक के समय में उन्हें ज्योति (1976), इदी कथा काडू (1979), प्रेमाभिषेकम (1981), मेघासंदेसम (1982), और धर्मात्मुडु (1982) जैसी फिल्मों में अभिनय के लिए नौ राज्य नंदी पुरस्कार प्राप्त हुए। <ref name="auto1"/> उन्होंने ज्योति (1976), आम कथा (1977), गृह प्रवेशम (1982), अम्मा नन्ना ओ तमिल अम्माई (2004), और कोथा बंगारू लोकम (2008) में अपने अभिनय के लिए पांच फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण प्राप्त किए हैं। <ref name="auto1"/> 2008 में, उन्हें एएनआर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, और 2010 में, उन्हे भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड - साउथ मिला। <ref name="auto">{{cite web |url=http://www.greatandhra.com/ganews/viewnews.php?id=2830&scat=4 |title=Great Andhra |publisher=Great Andhra |accessdate=3 August 2012 |archive-date=15 February 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090215210316/http://www.greatandhra.com/ganews/viewnews.php?id=2830&scat=4 |url-status=dead }}</ref> जयसुधा ने 2009-2014 के दौरान आंध्र प्रदेश की तत्कालीन संयुक्त सरकार में सिकंदराबाद निर्वाचन क्षेत्र से विधान सभा सदस्य के रूप में कार्य किया। <ref>{{cite web |url=http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2004-06-04/news-interviews/27154581_1_film-industries-special-jury-award-actor |title=51st Annual Manikchand Filmfare Award winners |work=The Times of India |date=4 June 2004 |accessdate=3 August 2012 |archive-date=24 October 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20121024170402/http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2004-06-04/news-interviews/27154581_1_film-industries-special-jury-award-actor |url-status=dead }}</ref> ==प्रारंभिक और व्यक्तिगत जीवन== जयसुधा का जन्म 17 दिसंबर 1958 को मद्रास, तमिलनाडु में सुजाता निदुदावोलु के रूप में हुआ था। वह एक तेलुगु भाषी परिवार निदुदावोलु रामेश्वर राव और उनकी पत्नी अभिनेत्री जोगा बाई जिन्हें बालानंदम (1954), और कलाहस्ती महात्यम (1954) जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है के घर हुआ था। <ref name="auto2">{{Cite web |url=https://www.deccanchronicle.com/entertainment/tollywood/300619/jayasudha-remembers-aunt-vijaya-nirmala.html |title=Jayasudha remembers aunt Vijaya Nirmala |first=suresh |last=kavirayani |date=30 June 2019 |website=Deccan Chronicle}}</ref> तेलुगु फिल्म अभिनेत्री और निर्देशक विजया निर्मला उनकी पिता की चचेरी बहन हैं। <ref name="auto2"/> जयसुधा के दादा प्रख्यात विद्वान और साहित्यिक इतिहासकार, निदुदावोलु वेंकटराव हैं। <ref name="autogenerated1">{{Cite web |url=https://www.rediff.com/movies/2000/may/13jaya.htm |title=rediff.com, Movies: The Jayasudha interview |work=Rediff.com}}</ref> उनकी पहली शादी फिल्म निर्माता वड्डे रमेश के बहनोई काकरलापुदी राजेंद्र प्रसाद से हुई थी। हालाँकि, यह विवाह तलाक में समाप्त हो गया। इसके बाद उन्होंने 1985 में अभिनेता जीतेंद्र के चचेरे भाई नितिन कपूर से शादी की और उनके दो बच्चे हैं, निहार (1986 में पैदा हुए) और श्रेयन (1990 में पैदा हुए)। <ref>http://www.nilacharal.com/enter/interview/js.html Nilacharal</ref><ref>http://www.telugucinema.com/c/publish/stars/jayasudha.php {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090215013004/http://www.telugucinema.com/c/publish/stars/jayasudha.php |date=15 February 2009 }} {{Bare URL inline|date=August 2022}}</ref> वह 2009 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में सिकंदराबाद निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुनी गईं। <ref>{{cite web |url=http://www.hindu.com/2008/10/15/stories/2008101555530400.htm |title=Andhra Pradesh / Hyderabad News : Jayasudha to join Congress today |work=The Hindu |date=15 October 2008 |accessdate=3 August 2012 |archive-date=5 नवंबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20121105092954/http://www.hindu.com/2008/10/15/stories/2008101555530400.htm |url-status=dead }}</ref> और बाद में वह 2016 में तेलुगु देशम पार्टी में शामिल हो गईं। <ref>{{Cite web |date=17 January 2016 |title=Telugu actress Jayasudha officially joins TDP |url=https://www.thenewsminute.com/article/telugu-actress-jayasudha-officially-joins-tdp-37795 |access-date=22 October 2022 |website=The News Minute |language=en}}</ref> 2019 में उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी भी छोड़ दी और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं। <ref>{{Cite web |last=Talari |first=Yadedya |date=7 March 2019 |title=Actress Jayasudha to join YSRCP |url=https://www.thehansindia.com/posts/index/Latest-News/2019-03-07/Actress-Jayasudha-to-join-YSRCP/508972 |access-date=22 October 2022 |website=thehansindia.com |language=en}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री]] mqsutjbrtbca49aisc06zt5edmo1v7y कुशा कपिला 0 1464347 6543662 6458349 2026-04-24T16:22:30Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543662 wikitext text/x-wiki {{Infobox person | name = कुशा कपिला | image = Kusha Kapila at the launch of Mera Noor Hai Mashhoor (cropped).jpg | caption = 2023 में कुशा कपिला | birth_date = {{Birth date and age|1989|09|20|df=yes}} | birth_place = [[नई दिल्ली]], भारत | education = [[डिजाइन में स्नातक]]<br>[[अंग्रेजी साहित्य]] | alma_mater = [[इंद्रप्रस्थ महिला कॉलेज|आईपी कॉलेज]] <br /> [[राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान|निफ्ट]] | occupation = {{hlist|[[फैशन संपादक]]|[[इंटरनेट सेलिब्रिटी]]|[[कॉमेडियन]]|[[यूट्यूबर]]}} | years_active = 2013–वर्तमान | notable_works = ''[[घोस्ट स्टोरीज़ (2020 फ़िल्म)|घोस्ट स्टोरीज़]]'' (2020 नेटफ्लिक्स फ़िल्म)<br>''[[केस तो बनता है]]'' (कॉमेडी शो) | spouse = {{marriage|जोरावर सिंह अहलूवालिया|2017}} | module = {{Infobox YouTube personality|embed=yes | pseudonym = | years active = 2011–वर्तमान | genre = {{flatlist|* [[कॉमेडी]]}} | channel_direct_url = channel/UCj_eYKbmUXvsbDssD3pQBXA | channel_display_name = कुशा कपिला | subscribers = 922K | subscriber_date = 5 मई 2023 | views = 308 मिलियन | network = | associated_acts = | silver_button = | silver_year = | gold_button = | gold_year = | diamond_button = | diamond_year = | stats_update = }} }} कुशा कपिला का (जन्म 20 सितंबर 1989) को नई दिल्ली, भारत मे हुआ।<ref>{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/tv/kusha-kapila-breaks-silence-after-being-roasted-on-her-divorce-with-zorawar-reveals-she-restricted-posts-on-samay-raina-101719836702281.html?utm_source=taboola_widget&utm_medium=taboola_widget&utm_campaign=article_detail_page|title=Kusha Kapila breaks silence after being roasted on her divorce with Zorawar, reveals she restricted posts on Samay Raina}}</ref> वह एक भारतीय फैशन संपादक, इंटरनेट सेलिब्रिटी, कॉमेडियन, [[अभिनेत्री]] और यूट्यूबर हैं। <ref>{{Cite web |last=Kakkar |first=Parul |date=17 August 2018 |title=Kusha Kapila {{!}} The Swaggy Cat |url=https://www.newshour.press/entertainment/kusha-kapila-swaggy-cat/ |access-date=28 September 2022 |website=Newshour Press |language=en-US |archive-date=6 अक्तूबर 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221006211356/https://www.newshour.press/entertainment/kusha-kapila-swaggy-cat/ |url-status=dead }}</ref> ==व्यक्तिगत जीवन== कुशा कपिला नई दिल्ली की एक [[पंजाबी]] हिंदू परिवार से हैं। उन्होंने 2017 में डियाजियो के पूर्व कर्मचारी जोरावर सिंह अहलूवालिया से शादी की। <ref>{{Cite web |date=7 November 2021 |title=Kusha Kapila And Zorawar Ahluwalia's Love Story: From Strangers At An Open Bar To Happily Ever After |url=https://www.bollywoodshaadis.com/articles/kusha-kapila-wedding-look-and-kusha-and-zorawar-love-story-28330 |access-date=28 September 2022 |website=BollywoodShaadis |language=en}}</ref> ==आजीविका== इन्होने फैशन डिजाइन में [[राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान]] से स्नातक होने के बाद, पहले तीन महीने के लिए दिल्ली स्थित भारतीय इंटरनेशनल लिमिटेड के लिए मर्चेंडाइजिंग इंटर्न के रूप में काम किया। इसके बाद, उन्होंने नोएडा में चिसेल इफेक्ट्स में प्रोडक्ट डिज़ाइन इंटर्न के रूप में काम किया। 2013 में, उन्होने दिल्ली स्थित कपड़ों की एक फर्म अपैरल ऑनलाइन के लिए एक फैशन संवाददाता के रूप में काम करना शुरू किया। <ref>{{Cite web |date=26 April 2021 |title=Meet the women on the Indian comedy circuit who are taking over our screens and Instagram feeds |url=https://www.vogue.in/magazine-story/meet-the-women-on-the-indian-comedy-circuit-who-are-taking-over-our-screens-and-instagram-feeds/ |access-date=25 February 2023 |website=Vogue India |language=en-IN}}</ref><ref>{{Cite web |date=8 March 2019 |title=What Kusha Kapila learnt from being famous on the internet |url=https://www.vogue.in/content/kusha-kapila-interview-indian-feminism-instagram-influencer |access-date=25 February 2023 |website=Vogue India |language=en-IN}}</ref> मई 2014 में, वह रेजरफीश नीव कम्पनी में शामिल हो गईं और एक कॉपीराइटर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उसी वर्ष, उन्होंने टेलीविजन शो "सन ऑफ अबिश" मे काम किया, जिसकी मेजबानी अबिश मैथ्यू ने की थी। 2016 में, उन्होंने टाइम्स इंटरनेट के लिए एक फैशन संपादक के रूप में काम शुरु किया। <ref>{{Cite web |date=14 February 2020 |title=ILN Studios and Smule launch India's first digital reality show "1,2,3… Riyaaz" to give local talents a shot to fame |url=https://timesinternet.in/blog/iln-studios-smule-launch-digital-reality-show-123-riyaaz-to-give-local-talents-a-shot-to-fame/ |access-date=28 September 2022 |website=Times Internet: Everything. Everyday. |language=en-US}}</ref> बाद में, वह कंटेंट राइटर हेड के रूप में आइदिवा मे काम करने लगी। आइदिवा के लिए काम करते हुए, उन्होंने काल्पनिक चरित्र बिली मासी को बनाया और निभाया, जो एक सफल चरित्र बन गई, जिससे वह इंटरनेट सनसनी बन गईं। <ref>{{Cite web |date=8 March 2019 |title=What Kusha Kapila learnt from being famous on the internet |url=https://www.vogue.in/content/kusha-kapila-interview-indian-feminism-instagram-influencer |access-date=28 September 2022 |website=Vogue India |language=en-IN}}</ref><ref>{{Cite web |date=23 January 2022 |title=As an influencer, when you fail you fail publicly |url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/bollywood/as-an-influencer-when-you-fail-you-fail-publicly-101642905959243.html |access-date=28 September 2022 |website=Hindustan Times |language=en}}</ref> 2020 में, वह एंथोलॉजी नेटफ्लिक्स फिल्म घोस्ट स्टोरीज में दिखाई दी। <ref>{{Cite web |date=29 November 2019 |title=Karan Johar on directing Ghost Stories: Totally out of my comfort zone |url=https://www.indiatoday.in/binge-watch/story/karan-johar-on-directing-ghost-stories-totally-out-of-my-comfort-zone-1623614-2019-11-29 |access-date=28 September 2022 |website=India Today |language=en}}</ref> वह नेटफ्लिक्स इंडिया के यूट्यूब शो बेन्सप्लेनिंग में भी थीं। <ref>{{Cite web |author=Scroll Staff |title=Watch: A new episode of Netflix's 'Behensplaining' reviews 'Hum Aapke Hain Koun' |url=https://scroll.in/video/943838/watch-a-new-episode-of-netflixs-behensplaining-reviews-hum-aapke-hain-koun |access-date=28 September 2022 |website=Scroll.in |language=en-US}}</ref> 2021 में, उन्होने अमेज़न प्राइम के कॉमेडी रियलिटी शो LOL: हँसे तो फसे में प्रदर्शन किया। <ref>{{Cite web |date=28 April 2021 |title=Kusha Kapila: Don't think anyone famous should be overly celebrated for helping people |url=https://telanganatoday.com/kusha-kapila-dont-think-anyone-famous-should-be-overly-celebrated-for-helping-people |access-date=28 September 2022 |website=Telangana Today |language=en-US}}</ref> 2022 में, उन्हें अमेज़न मिनिटीवी के एक रियलिटी स्केच कॉमेडी शो "केस तो बनता है" में देखा गया था। <ref>{{Cite web |date=26 July 2022 |title=Riteish Deshmukh on Case Toh Banta Hai, his bond with Varun Sharma, Kusha Kapila and more-Entertainment News , Firstpost |url=https://www.firstpost.com/entertainment/riteish-deshmukh-on-case-toh-banta-hai-his-bond-with-varun-sharma-kusha-kapila-and-more-10956081.html |access-date=28 September 2022 |website=Firstpost |language=en}}</ref> उन्होंने नेटफ्लिक्स टीवी सीरीज़ मसाबा मसाबा के सीज़न 2 में मुख्य कलाकार के रूप में भी काम किया। <ref>{{Cite web |last=Hungama |first=Bollywood |date=27 July 2022 |title=Kusha Kapila, Rytasha Rathore & others come together with Masaba Gupta for Masaba Masaba season 2 : Bollywood News - Bollywood Hungama |website=[[बॉलीवुड हँगामा]] |url=https://www.bollywoodhungama.com/news/features/kusha-kapila-rytasha-rathore-others-come-together-masaba-gupta-masaba-masaba-season-2/ |access-date=12 October 2022 |language=en}}</ref> उन्होंने कॉमिकस्तान के तीसरे सत्र की सह-मेजबानी की।<ref>{{Cite web |date=15 July 2022 |title=I was so nervous in the beginning, says Kusha Kapila about her experience of hosting 'Comicstaan' |url=https://telanganatoday.com/i-was-so-nervous-in-the-beginning-says-kusha-kapila-about-her-experience-of-hosting-comicstaan |access-date=28 September 2022 |website=Telangana Today |language=en-US}}</ref><ref>{{Cite web |title=Kusha Kapila is all set to host Comicstaan Season 3 with Abish Mathew |url=https://www.telegraphindia.com/entertainment/kusha-kapila-is-all-set-to-host-comicstaan-season-3-with-abish-mathew/cid/1874505 |access-date=28 September 2022 |website=www.telegraphindia.com}}</ref> उसने प्लान ए प्लान बी में भी काम किया। वह कॉफी विद करण के सीजन 7 में जूरी के एक भाग के रूप में भी दिखाई दी थी। <ref>{{Cite web |date=26 September 2022 |title=Koffee with Karan Season 7 finale: Karan Johar reveals Varun Dhawan found out about his relationship by 'default', gets trolled for his Alia Bhatt obsession |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/koffee-with-karan-season-7-finale-karan-johar-relationship-alia-bhatt-obsession-kusha-kapila-danish-sait-8173564/ |access-date=28 September 2022 |website=The Indian Express |language=en}}</ref> फरवरी 2023 में, वह माइनस वन: न्यू चैप्टर और सेल्फी में भी दिखाई दी। <ref>{{Cite news |title=The cast of 'Minus One: New Chapter' speak about their favourite love stories and the changing idea of romance |work=The Times of India |url=https://timesofindia.indiatimes.com/web-series/news/hindi/ayush-mehra-and-aisha-ahmed-speak-about-minus-one-new-chapter-their-favourite-love-stories-and-the-changing-idea-of-romance-exclusive/articleshow/97924573.cms |access-date=25 February 2023 |issn=0971-8257}}</ref><ref>{{Cite web |last= |first= |title=Selfiee Movie Star Cast - Bollywood Hungama |website= [[बॉलीवुड हँगामा]]|url=https://www.bollywoodhungama.com/movie/selfiee/cast/ |access-date=25 February 2023 |language=en}}</ref> ==मिडिया== 2019 में, कुशा कपिला को हार्पर बाजार इंडिया के कवर पर दिखाया गया था। <ref>{{Cite web |title=Harper's Bazaar India captures the beauty in all its forms through the lens of the OnePlus 7T Pro |url=https://www.aninews.in/news/business/harpers-bazaar-india-captures-the-beauty-in-all-its-forms-through-the-lens-of-the-oneplus-7t-pro20191113193444/ |access-date=25 February 2023 |website=ANI News |language=en |archive-date=25 फ़रवरी 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230225071855/https://www.aninews.in/news/business/harpers-bazaar-india-captures-the-beauty-in-all-its-forms-through-the-lens-of-the-oneplus-7t-pro20191113193444/ |url-status=dead }}</ref> 2021 में, कपिला को हिंदुस्तान टाइम्स एचटी ब्रंच कवर स्टोरी में दिखाया गया था। <ref>{{Cite web |date=16 January 2021 |title=HT Brunch Cover Story: Slay it with a smile with Kusha Kapila and Dolly Singh |url=https://www.hindustantimes.com/lifestyle/brunch/ht-brunch-cover-story-slay-it-with-a-smile-with-kusha-kapila-and-dolly-singh-101610790911373.html |access-date=25 February 2023 |website=Hindustan Times |language=en}}</ref> 2022 में, वह कॉस्मोपॉलिटन के कवर पर दिखाई दी। <ref name=":0">{{Cite web |title='I was diagnosed with high-functioning depression and ADD' - Kusha Kapila |url=https://www.cosmopolitan.in/celebrity/features/a27720/i-was-diagnosed-high-functioning-depression-and-add-kusha-kapila |access-date=25 February 2023 |website=Cosmopolitan India |language=en}}</ref> उसी वर्ष, उन्हें फोर्ब्स इंडिया की डब्ल्यू-पॉवर सूची में सूचीबद्ध किया गया। <ref>{{Cite web |title=Kusha Kapila: Influencer Next Door |url=https://www.forbesindia.com/article/leadership/kusha-kapila-influencer-next-door/81843/1 |access-date=25 February 2023 |website=Forbes India |language=en}}</ref> ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री]] rc396owwkqd2aq79hmmixngz1thz7xe गैलेन 0 1466547 6543636 6307186 2026-04-24T14:52:09Z ~2026-25229-18 921691 /* सन्दर्भ */ 6543636 wikitext text/x-wiki '''एलियस गैलेनस''' या '''क्लॉडियस गैलेनस''' <ref name="alexandru21">{{Cite journal|last=S. Alexandru|year=2021|title=Critical Remarks on Codices in which Galen Appears as a Member of the ''gens Claudia''|journal=Mnemosyne|volume=74|issue=4|pages=553–597|doi=10.1163/1568525x-12342720}}</ref> ({{भाषा-यूनानी|Κλαύδιος Γαληνός}}; सितम्बर 129 - {{Circa|AD 216}}), जिसे अक्सर [[अंग्रेजीकरण|अंग्रेजी]] में '''गैलेन''' या '''पेर्गमॉन का गैलेन''' कहा जाता है, <ref>[https://www.collinsdictionary.com/dictionary/english/galen "Galen"] entry in ''[[Collins English Dictionary]]''.</ref> एक [[प्राचीन रोम सभ्यता|रोमन]] यूनानी [[चिकित्सक]], [[सर्जन]] और [[दर्शनशास्त्र|दार्शनिक]] थे। <ref name="nutton73">{{Cite journal|last=Nutton Vivian|year=1973|title=The Chronology of Galen's Early Career|url=https://archive.org/details/sim_classical-quarterly_1973-05_23_1/page/n167|journal=Classical Quarterly|volume=23|issue=1|pages=158–171|doi=10.1017/S0009838800036600|pmid=11624046}}</ref> [[प्राचीन इतिहास|पुरातन काल]] के सभी [[चिकित्सा अनुसंधान|चिकित्सा शोधकर्ताओं]] में सबसे कुशल माने जाने वाले गैलेन ने [[शारीरिकी|शरीर रचना विज्ञान]], <ref>{{Cite journal|year=1977|title=Galen on the affected parts. Translation from the Greek text with explanatory notes|journal=Med Hist|volume=21|issue=2|page=212|doi=10.1017/s0025727300037935|pmc=1081972}}</ref> [[शरीरक्रिया विज्ञान|शरीर विज्ञान]], [[विकृतिविज्ञान|विकृति विज्ञान]], <ref name="brock">Arthur John Brock (translator), ''Introduction. Galen. On the Natural Faculties''. Edinburgh 1916</ref> [[औषधशास्त्र|औषध विज्ञान]], <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=al9FH5tynlAC&q=galen+on+pharmacology|title=Galen on Pharmacology: Philosophy, History, and Medicine : Proceedings of the Vth International Galen Colloquium, Lille, 16–18 March 1995|last=Debru|first=Armelle|date=1997|publisher=Brill|isbn=978-9004104037|via=Google Books}}</ref> और [[स्नायुशास्त्र|तंत्रिका विज्ञान]], साथ ही दर्शनशास्त्र सहित विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के विकास को प्रभावित किया <ref name="Galen on the brain">{{Cite book|title=Galen on the Brain: Anatomical Knowledge and Physiological Speculation in the Second Century AD|last=Rocca|first=Dr Julius|date=2003|work=Studies in Ancient Medicine|publisher=Brill|isbn=978-9004125124|volume=26|pages=1–313|pmid=12848196}}</ref> और [[तर्कशास्त्र|तर्क]] । विद्वान अभिरुचि वाले एक धनी यूनानी वास्तुकार, [[एलिस इन चेन्स|एलियस]] निकॉन के बेटे, गैलेन ने एक व्यापक शिक्षा प्राप्त की जिसने उन्हें एक चिकित्सक और दार्शनिक के रूप में एक सफल कैरियर के लिए तैयार किया। प्राचीन शहर पेर्गमोन (वर्तमान बर्गामा, तुर्की) में जन्मे गैलेन ने बड़े पैमाने पर यात्रा की और रोम में बसने से पहले खुद को कई तरह के चिकित्सा सिद्धांतों और खोजों से अवगत कराया, जहां उन्होंने रोमन समाज के प्रमुख सदस्यों की सेवा की और अंततः उन्हें सम्राट के रूप में पदोन्नत किया गया। पद दिया गया. कई सम्राटों के निजी चिकित्सक के रूप में। शरीर रचना विज्ञान और [[आयुर्विज्ञान|चिकित्सा]] के बारे में गैलेन की समझ मुख्य रूप से चार हास्य के तत्कालीन-वर्तमान सिद्धांत से प्रभावित थी: काला पित्त, पीला पित्त, रक्त और कफ, जैसा कि हिप्पोक्रेटिक कॉर्पस में ''ऑन द नेचर ऑफ मैन'' के लेखक ने पहली बार आगे बढ़ाया था। <ref>{{Cite journal|last=Nutton|first=V.|date=2005|title=The Fatal Embrace: Galen and the History of Ancient Medicine|url=https://www.cambridge.org/core/journals/science-in-context/article/abs/fatal-embrace-galen-and-the-history-of-ancient-medicine/B593B7BD348DB7E16303AA46FD2E42E6|journal=Science in Context|language=en|volume=18|issue=1|pages=111–121|doi=10.1017/S0269889705000384|pmid=16075496}}</ref> गैलेन के विचार 1,300 से अधिक वर्षों तक [[पश्चिमी संस्कृति|पश्चिमी]] चिकित्सा विज्ञान पर हावी और प्रभावित रहे। उनकी शारीरिक रिपोर्टें मुख्य रूप से बार्बरी वानरों के विच्छेदन पर आधारित थीं। <ref name=":0">{{Citation|last=Hankinson|first=R. J.|title=The man and his work|date=2008|url=https://www.cambridge.org/core/books/cambridge-companion-to-galen/man-and-his-work/25F9E23C8EAC769F17D7F5CFDE8C7659|pages=1–33|editor-last=Hankinson|editor-first=R. J.|series=Cambridge Companions to Philosophy|periodical=The Cambridge Companion to Galen|place=Cambridge|publisher=Cambridge University Press|isbn=978-0-521-81954-1}}</ref> हालाँकि, जब उन्हें पता चला कि उनके चेहरे के हाव-भाव बहुत हद तक इंसानों से मिलते-जुलते हैं, तो उन्होंने [[सूअर]] जैसे अन्य जानवरों की ओर रुख किया। मानव शरीर की खोज के लिए जानवरों का उपयोग करने का कारण यह तथ्य था कि उस समय मनुष्यों पर विच्छेदन और विविसेक्शन सख्ती से प्रतिबंधित थे। <ref>{{Cite journal|last=Von Staden|first=H.|date=1995|title=Anatomy as rhetoric: Galen on dissection and persuasion|url=https://doi.org/10.1093/jhmas/50.1.47|journal=Journal of the History of Medicine and Allied Sciences|volume=50|issue=1|pages=47–66|doi=10.1093/jhmas/50.1.47|pmid=7876529}}</ref> गैलेन अपने छात्रों को मानव शरीर से बेहतर परिचित होने के लिए मृत ग्लेडियेटर्स या बहकर आए शवों को देखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनकी शारीरिक रिपोर्टें 1543 तक निर्विरोध रहीं, जब मानव विच्छेदन के मुद्रित विवरण और चित्र [[आंद्रेयेस विसेलियस|एंड्रियास वेसालियस]] के मौलिक कार्य ''डी ह्यूमनी कॉर्पोरिस फैब्रिका'' में प्रकाशित हुए थे <ref name="Vesalius1543">{{Cite book|url=http://vesalius.northwestern.edu/|title=De humani corporis Fabrica, Libri VII|last=[[Andreas Vesalius]]|publisher=[[Johannes Oporinus]]|year=1543|location=[[Basel]], [[Switzerland]]|language=la|access-date=7 August 2010|archive-url=https://wayback.archive-it.org/6321/20160901184031/http://vesalius.northwestern.edu/|archive-date=1 September 2016}}</ref> <ref>O'Malley, C., ''Andreas Vesalius of Brussels, 1514–1564'', Berkeley: University of California Press</ref> जहां गैलेन के शारीरिक सिद्धांत को इन नई टिप्पणियों के साथ समायोजित किया गया था। <ref>Siraisi, Nancy G., (1991) Girolamo Cardano and the Art of Medical Narrative, Journal of the History of Ideas. pp. 587–88.</ref> <ref>{{Cite book|title=Physiology of the Soul. Mind, Body and Matter in the Galenic Tradition of the Late Renaissance (1550-1630)|last=Bigotti|first=Fabrizio|publisher=Brepols|year=2019|isbn=978-2-503-58161-3|pages=21–40|language=English}}</ref> [[परिसंचरण तंत्र]] के शरीर विज्ञान के बारे में गैलेन का सिद्धांत {{Circa|1242}}, जब इब्न अल-नफीस ने अपनी पुस्तक ''शरह तशरीह अल-क़ानून ली 'इब्न सिना'' ( ''एविसेना के कैनन में एनाटॉमी पर टिप्पणी'' ) प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने [[फुप्फुसी परिसंचरण|फुफ्फुसीय परिसंचरण]] की अपनी खोज की सूचना दी। <ref>{{Cite journal|last=West|first=John|date=1985|title=Ibn al-Nafis, the pulmonary circulation, and the Islamic Golden Age|journal=Journal of Applied Physiology|volume=105|issue=6|pages=1877–1880|doi=10.1152/japplphysiol.91171.2008|pmc=2612469|pmid=18845773}}</ref> गैलेन ने खुद को एक चिकित्सक और एक दार्शनिक दोनों के रूप में देखा, जैसा कि उन्होंने अपने ग्रंथ ''दैट द बेस्ट फिजिशियन इज़ अल्सो ए फिलॉसफर'' में लिखा है। <ref>{{Cite book|title="That the best physician is also a philosopher" with a Modern Greek Translation|last=Claudii Galeni Pergameni|publisher=Odysseas Hatzopoulos & Company: Kaktos Editions|year=1992|editor-last=Odysseas Hatzopoulos|location=[[Athens]], [[Greece]]}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Theodore J. Drizis|date=Fall 2008|title=Medical ethics in a writing of Galen|url=http://hrcak.srce.hr/file/64672|journal=Acta Med Hist Adriat|volume=6|issue=2|pages=333–336|pmid=20102254|access-date=7 August 2010}}</ref> <ref>Brian, P., 1977, "Galen on the ideal of the physician", ''South Africa Medical Journal'', 52: 936–938 [http://archive.samj.org.za/1977%20VOL%20LI%20Jul-Dec/Articles/11%20November/4.10%20HISTORY%20OF%20MEDICINE%20-%20GALEN%20ON%20THE%20IDEAL%20OF%20THE%20PHYSICIAN.%20P.%20Brain.pdf pdf] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20210224020900/http://archive.samj.org.za/1977%20VOL%20LI%20Jul-Dec/Articles/11%20November/4.10%20HISTORY%20OF%20MEDICINE%20-%20GALEN%20ON%20THE%20IDEAL%20OF%20THE%20PHYSICIAN.%20P.%20Brain.pdf |date=24 फ़रवरी 2021 }}</ref> <ref name="auto">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=6SByvQEACAAJ|title=Physiology of the Soul: Mind, Body and Matter in the Galenic Tradition of Late Renaissance (1550-1630)|last=Bigotti|first=Fabrizio|date=2019|publisher=Brepols|isbn=978-2-503-58161-3|language=en}}</ref> गैलेन को तर्कवादी और अनुभववादी चिकित्सा संप्रदायों के बीच बहस में बहुत दिलचस्पी थी, <ref>Frede, M. and R. Walzer, 1985, ''Three Treatises on the Nature of Science,'' Indianapolis: Hacket.</ref> और उनका प्रत्यक्ष अवलोकन, विच्छेदन और विविसेक्शन का उपयोग उन दो दृष्टिकोणों के चरम के बीच एक जटिल मध्य मैदान का प्रतिनिधित्व करता है। <ref>{{Cite journal|last=De Lacy P|year=1972|title=Galen's Platonism|journal=American Journal of Philosophy|volume=1972|issue=1|pages=27–39|doi=10.2307/292898|jstor=292898}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Cosans C|year=1997|title=Galen's Critique of Rationalist and Empiricist Anatomy|journal=Journal of the History of Biology|volume=30|issue=1|pages=35–54|doi=10.1023/a:1004266427468|pmid=11618979}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Cosans C|year=1998|title=The Experimental Foundations of Galen's Teleology|url=https://philpapers.org/rec/COSTEF-4|journal=Studies in History and Philosophy of Science|volume=29|issue=1|pages=63–80|bibcode=1998SHPSA..29...63C|doi=10.1016/s0039-3681(96)00005-2}}</ref> उनके कई कार्यों को संरक्षित किया गया है और/या मूल ग्रीक से अनुवादित किया गया है, हालांकि कई नष्ट हो गए थे और उनमें से कुछ को नकली माना जाता है। हालाँकि उनकी मृत्यु की तारीख पर कुछ बहस है, लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी उम्र सत्तर वर्ष से कम नहीं थी। <ref>{{Cite journal|last=Todman|first=D.|date=2007|title=Galen (129–199)|url=https://doi.org/10.1007/s00415-007-0625-5|journal=Journal of Neurology|language=en|volume=254|issue=7|pages=975–976|doi=10.1007/s00415-007-0625-5|pmid=17676358}}</ref> == सन्दर्भ == [https://parikchha.blogspot.com/2026/04/galen-biography-in-hindi.html गैलेन का सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत] “Four Humors Theory” था। इस सिद्धांत के अनुसार मानव शरीर में चार मुख्य द्रव माने जाते थे, और शरीर का स्वास्थ्य इन चारों के संतुलन पर निर्भर माना जाता था। अगर इनका संतुलन बिगड़ जाए, तो बीमारी पैदा होती है — ऐसा उस समय समझा जाता था।<ref>{{Cite web|url=https://parikchha.blogspot.com/|title=वैज्ञानिक और खोज {{!}} Science Technology in Hindi|website=वैज्ञानिक और खोज {{!}} Science Technology in Hindi|access-date=2026-04-24}}</ref> रक्त (Blood) कफ (Phlegm) पीला पित्त (Yellow Bile) काला पित्त (Black Bile) उस समय के डॉक्टर मानते थे कि शरीर में इन चारों तत्वों का संतुलन बना रहना बहुत जरूरी है। यदि किसी एक की मात्रा बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाए, तो व्यक्ति बीमार पड़ सकता है। आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में यह सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, लेकिन इतिहास के दृष्टिकोण से यह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://parikchha.blogspot.com/|title=वैज्ञानिक और खोज {{!}} Science Technology in Hindi|website=वैज्ञानिक और खोज {{!}} Science Technology in Hindi|access-date=2026-04-24}}</ref> 2ofcgxt6xs8o56m3b1oclxwrunqya7n 6543649 6543636 2026-04-24T15:29:12Z AMAN KUMAR 911487 [[विशेष:योगदान/InternetArchiveBot|InternetArchiveBot]] ([[सदस्य वार्ता:InternetArchiveBot|वार्ता]]) के अवतरण 6307186 पर पुनर्स्थापित : प्रचार हटाया 6543649 wikitext text/x-wiki '''एलियस गैलेनस''' या '''क्लॉडियस गैलेनस''' <ref name="alexandru21">{{Cite journal|last=S. Alexandru|year=2021|title=Critical Remarks on Codices in which Galen Appears as a Member of the ''gens Claudia''|journal=Mnemosyne|volume=74|issue=4|pages=553–597|doi=10.1163/1568525x-12342720}}</ref> ({{भाषा-यूनानी|Κλαύδιος Γαληνός}}; सितम्बर 129 - {{Circa|AD 216}}), जिसे अक्सर [[अंग्रेजीकरण|अंग्रेजी]] में '''गैलेन''' या '''पेर्गमॉन का गैलेन''' कहा जाता है, <ref>[http://www.collinsdictionary.com/dictionary/english/galen "Galen"] entry in ''[[Collins English Dictionary]]''.</ref> एक [[प्राचीन रोम सभ्यता|रोमन]] यूनानी [[चिकित्सक]], [[सर्जन]] और [[दर्शनशास्त्र|दार्शनिक]] थे। <ref name="nutton73">{{Cite journal|last=Nutton Vivian|year=1973|title=The Chronology of Galen's Early Career|url=https://archive.org/details/sim_classical-quarterly_1973-05_23_1/page/n167|journal=Classical Quarterly|volume=23|issue=1|pages=158–171|doi=10.1017/S0009838800036600|pmid=11624046}}</ref> [[प्राचीन इतिहास|पुरातन काल]] के सभी [[चिकित्सा अनुसंधान|चिकित्सा शोधकर्ताओं]] में सबसे कुशल माने जाने वाले गैलेन ने [[शारीरिकी|शरीर रचना विज्ञान]], <ref>{{Cite journal|year=1977|title=Galen on the affected parts. Translation from the Greek text with explanatory notes|journal=Med Hist|volume=21|issue=2|page=212|doi=10.1017/s0025727300037935|pmc=1081972}}</ref> [[शरीरक्रिया विज्ञान|शरीर विज्ञान]], [[विकृतिविज्ञान|विकृति विज्ञान]], <ref name="brock">Arthur John Brock (translator), ''Introduction. Galen. On the Natural Faculties''. Edinburgh 1916</ref> [[औषधशास्त्र|औषध विज्ञान]], <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=al9FH5tynlAC&q=galen+on+pharmacology|title=Galen on Pharmacology: Philosophy, History, and Medicine : Proceedings of the Vth International Galen Colloquium, Lille, 16–18 March 1995|last=Debru|first=Armelle|date=1997|publisher=Brill|isbn=978-9004104037|via=Google Books}}</ref> और [[स्नायुशास्त्र|तंत्रिका विज्ञान]], साथ ही दर्शनशास्त्र सहित विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के विकास को प्रभावित किया <ref name="Galen on the brain">{{Cite book|title=Galen on the Brain: Anatomical Knowledge and Physiological Speculation in the Second Century AD|last=Rocca|first=Dr Julius|date=2003|work=Studies in Ancient Medicine|publisher=Brill|isbn=978-9004125124|volume=26|pages=1–313|pmid=12848196}}</ref> और [[तर्कशास्त्र|तर्क]] । विद्वान अभिरुचि वाले एक धनी यूनानी वास्तुकार, [[एलिस इन चेन्स|एलियस]] निकॉन के बेटे, गैलेन ने एक व्यापक शिक्षा प्राप्त की जिसने उन्हें एक चिकित्सक और दार्शनिक के रूप में एक सफल कैरियर के लिए तैयार किया। प्राचीन शहर पेर्गमोन (वर्तमान बर्गामा, तुर्की) में जन्मे गैलेन ने बड़े पैमाने पर यात्रा की और रोम में बसने से पहले खुद को कई तरह के चिकित्सा सिद्धांतों और खोजों से अवगत कराया, जहां उन्होंने रोमन समाज के प्रमुख सदस्यों की सेवा की और अंततः उन्हें सम्राट के रूप में पदोन्नत किया गया। पद दिया गया. कई सम्राटों के निजी चिकित्सक के रूप में। शरीर रचना विज्ञान और [[आयुर्विज्ञान|चिकित्सा]] के बारे में गैलेन की समझ मुख्य रूप से चार हास्य के तत्कालीन-वर्तमान सिद्धांत से प्रभावित थी: काला पित्त, पीला पित्त, रक्त और कफ, जैसा कि हिप्पोक्रेटिक कॉर्पस में ''ऑन द नेचर ऑफ मैन'' के लेखक ने पहली बार आगे बढ़ाया था। <ref>{{Cite journal|last=Nutton|first=V.|date=2005|title=The Fatal Embrace: Galen and the History of Ancient Medicine|url=https://www.cambridge.org/core/journals/science-in-context/article/abs/fatal-embrace-galen-and-the-history-of-ancient-medicine/B593B7BD348DB7E16303AA46FD2E42E6|journal=Science in Context|language=en|volume=18|issue=1|pages=111–121|doi=10.1017/S0269889705000384|pmid=16075496}}</ref> गैलेन के विचार 1,300 से अधिक वर्षों तक [[पश्चिमी संस्कृति|पश्चिमी]] चिकित्सा विज्ञान पर हावी और प्रभावित रहे। उनकी शारीरिक रिपोर्टें मुख्य रूप से बार्बरी वानरों के विच्छेदन पर आधारित थीं। <ref name=":0">{{Citation|last=Hankinson|first=R. J.|title=The man and his work|date=2008|url=https://www.cambridge.org/core/books/cambridge-companion-to-galen/man-and-his-work/25F9E23C8EAC769F17D7F5CFDE8C7659|pages=1–33|editor-last=Hankinson|editor-first=R. J.|series=Cambridge Companions to Philosophy|periodical=The Cambridge Companion to Galen|place=Cambridge|publisher=Cambridge University Press|isbn=978-0-521-81954-1}}</ref> हालाँकि, जब उन्हें पता चला कि उनके चेहरे के हाव-भाव बहुत हद तक इंसानों से मिलते-जुलते हैं, तो उन्होंने [[सूअर]] जैसे अन्य जानवरों की ओर रुख किया। मानव शरीर की खोज के लिए जानवरों का उपयोग करने का कारण यह तथ्य था कि उस समय मनुष्यों पर विच्छेदन और विविसेक्शन सख्ती से प्रतिबंधित थे। <ref>{{Cite journal|last=Von Staden|first=H.|date=1995|title=Anatomy as rhetoric: Galen on dissection and persuasion|url=https://doi.org/10.1093/jhmas/50.1.47|journal=Journal of the History of Medicine and Allied Sciences|volume=50|issue=1|pages=47–66|doi=10.1093/jhmas/50.1.47|pmid=7876529}}</ref> गैलेन अपने छात्रों को मानव शरीर से बेहतर परिचित होने के लिए मृत ग्लेडियेटर्स या बहकर आए शवों को देखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनकी शारीरिक रिपोर्टें 1543 तक निर्विरोध रहीं, जब मानव विच्छेदन के मुद्रित विवरण और चित्र [[आंद्रेयेस विसेलियस|एंड्रियास वेसालियस]] के मौलिक कार्य ''डी ह्यूमनी कॉर्पोरिस फैब्रिका'' में प्रकाशित हुए थे <ref name="Vesalius1543">{{Cite book|url=http://vesalius.northwestern.edu/|title=De humani corporis Fabrica, Libri VII|last=[[Andreas Vesalius]]|publisher=[[Johannes Oporinus]]|year=1543|location=[[Basel]], [[Switzerland]]|language=la|access-date=7 August 2010|archive-url=https://wayback.archive-it.org/6321/20160901184031/http://vesalius.northwestern.edu/|archive-date=1 September 2016}}</ref> <ref>O'Malley, C., ''Andreas Vesalius of Brussels, 1514–1564'', Berkeley: University of California Press</ref> जहां गैलेन के शारीरिक सिद्धांत को इन नई टिप्पणियों के साथ समायोजित किया गया था। <ref>Siraisi, Nancy G., (1991) Girolamo Cardano and the Art of Medical Narrative, Journal of the History of Ideas. pp. 587–88.</ref> <ref>{{Cite book|title=Physiology of the Soul. Mind, Body and Matter in the Galenic Tradition of the Late Renaissance (1550-1630)|last=Bigotti|first=Fabrizio|publisher=Brepols|year=2019|isbn=978-2-503-58161-3|pages=21–40|language=English}}</ref> [[परिसंचरण तंत्र]] के शरीर विज्ञान के बारे में गैलेन का सिद्धांत {{Circa|1242}}, जब इब्न अल-नफीस ने अपनी पुस्तक ''शरह तशरीह अल-क़ानून ली 'इब्न सिना'' ( ''एविसेना के कैनन में एनाटॉमी पर टिप्पणी'' ) प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने [[फुप्फुसी परिसंचरण|फुफ्फुसीय परिसंचरण]] की अपनी खोज की सूचना दी। <ref>{{Cite journal|last=West|first=John|date=1985|title=Ibn al-Nafis, the pulmonary circulation, and the Islamic Golden Age|journal=Journal of Applied Physiology|volume=105|issue=6|pages=1877–1880|doi=10.1152/japplphysiol.91171.2008|pmc=2612469|pmid=18845773}}</ref> गैलेन ने खुद को एक चिकित्सक और एक दार्शनिक दोनों के रूप में देखा, जैसा कि उन्होंने अपने ग्रंथ ''दैट द बेस्ट फिजिशियन इज़ अल्सो ए फिलॉसफर'' में लिखा है। <ref>{{Cite book|title="That the best physician is also a philosopher" with a Modern Greek Translation|last=Claudii Galeni Pergameni|publisher=Odysseas Hatzopoulos & Company: Kaktos Editions|year=1992|editor-last=Odysseas Hatzopoulos|location=[[Athens]], [[Greece]]}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Theodore J. Drizis|date=Fall 2008|title=Medical ethics in a writing of Galen|url=http://hrcak.srce.hr/file/64672|journal=Acta Med Hist Adriat|volume=6|issue=2|pages=333–336|pmid=20102254|access-date=7 August 2010}}</ref> <ref>Brian, P., 1977, "Galen on the ideal of the physician", ''South Africa Medical Journal'', 52: 936–938 [http://archive.samj.org.za/1977%20VOL%20LI%20Jul-Dec/Articles/11%20November/4.10%20HISTORY%20OF%20MEDICINE%20-%20GALEN%20ON%20THE%20IDEAL%20OF%20THE%20PHYSICIAN.%20P.%20Brain.pdf pdf] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20210224020900/http://archive.samj.org.za/1977%20VOL%20LI%20Jul-Dec/Articles/11%20November/4.10%20HISTORY%20OF%20MEDICINE%20-%20GALEN%20ON%20THE%20IDEAL%20OF%20THE%20PHYSICIAN.%20P.%20Brain.pdf |date=24 फ़रवरी 2021 }}</ref> <ref name="auto">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=6SByvQEACAAJ|title=Physiology of the Soul: Mind, Body and Matter in the Galenic Tradition of Late Renaissance (1550-1630)|last=Bigotti|first=Fabrizio|date=2019|publisher=Brepols|isbn=978-2-503-58161-3|language=en}}</ref> गैलेन को तर्कवादी और अनुभववादी चिकित्सा संप्रदायों के बीच बहस में बहुत दिलचस्पी थी, <ref>Frede, M. and R. Walzer, 1985, ''Three Treatises on the Nature of Science,'' Indianapolis: Hacket.</ref> और उनका प्रत्यक्ष अवलोकन, विच्छेदन और विविसेक्शन का उपयोग उन दो दृष्टिकोणों के चरम के बीच एक जटिल मध्य मैदान का प्रतिनिधित्व करता है। <ref>{{Cite journal|last=De Lacy P|year=1972|title=Galen's Platonism|journal=American Journal of Philosophy|volume=1972|issue=1|pages=27–39|doi=10.2307/292898|jstor=292898}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Cosans C|year=1997|title=Galen's Critique of Rationalist and Empiricist Anatomy|journal=Journal of the History of Biology|volume=30|issue=1|pages=35–54|doi=10.1023/a:1004266427468|pmid=11618979}}</ref> <ref>{{Cite journal|last=Cosans C|year=1998|title=The Experimental Foundations of Galen's Teleology|url=https://philpapers.org/rec/COSTEF-4|journal=Studies in History and Philosophy of Science|volume=29|issue=1|pages=63–80|bibcode=1998SHPSA..29...63C|doi=10.1016/s0039-3681(96)00005-2}}</ref> उनके कई कार्यों को संरक्षित किया गया है और/या मूल ग्रीक से अनुवादित किया गया है, हालांकि कई नष्ट हो गए थे और उनमें से कुछ को नकली माना जाता है। हालाँकि उनकी मृत्यु की तारीख पर कुछ बहस है, लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी उम्र सत्तर वर्ष से कम नहीं थी। <ref>{{Cite journal|last=Todman|first=D.|date=2007|title=Galen (129–199)|url=https://doi.org/10.1007/s00415-007-0625-5|journal=Journal of Neurology|language=en|volume=254|issue=7|pages=975–976|doi=10.1007/s00415-007-0625-5|pmid=17676358}}</ref> == सन्दर्भ == 7riq0vnrjuzpl72dkjcxel1w5t1ombz केसर (टीवी श्रृंखला) 0 1476029 6543705 6241886 2026-04-24T22:15:27Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543705 wikitext text/x-wiki {{Infobox television | image = | caption = | creator = | writer = <!--Do not use if the show has many (5+) writers. --> | director = | creative_director = | starring = | open_theme = | country = भारत | language = हिंदी | num_episodes = 650 | producer = {{ubl|[[एकता कपूर]]|[[शोभा कपूर]]}} | cinematography = {{ubl|रवि नायडू|सुदेश कोटनिस|सुहास राव}} | editor = {{ubl|विकास शर्मा|निशित शाह|मोहम्मद सलीम}} | runtime = 24 मिनट | company = [[बालाजी टेलीफिल्म्स]] | network = [[स्टार प्लस]] | picture_format = [[480आई]] | first_aired = {{start date|df=y|2004|4|19}} | last_aired = {{end date|df=y|2007|5|31}} }} '''''केसर''''' ( [[केसर]] ) एक भारतीय टेलीविजन धारावाहिक है जो 19 अप्रैल 2004 से 31 मई 2007 तक [[स्टार प्लस]] पर प्रसारित हुआ<ref>{{Cite web|url=https://m.tribuneindia.com/2004/20040530/spectrum/tv.htm|title=Fight for fancy|website=The Tribune|access-date=11 अगस्त 2023|archive-date=11 अगस्त 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230811142740/https://m.tribuneindia.com/2004/20040530/spectrum/tv.htm|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.afaqs.com/news/media/8835_nothing-knee-jerk-about-our-initiatives-deepak-segal-sr-vp-star-india|title='Nothing knee-jerk about our initiatives': Deepak Segal, Sr. VP, STAR India|website=Afaqs}}</ref> कहानी केसर नाम की एक युवा लड़की के जीवन पर आधारित है। यह श्रृंखला [[ज़ी टीवी]] पर ''करवाचौथ'' के रूप में प्रसारित होने वाली थी। हालाँकि, जब चैनल और प्रोडक्शन हाउस के बीच बात नहीं बनी, तो बाद में स्टार प्लस ने इसे अनुमति दे दी और यह ''केसर'' के रूप में प्रसारित हुआ।<ref>{{Cite web|url=https://www.indiantelevision.com/special/y2k4/balaji2004.htm#|title=Balaji sets sights higher than simply soaps|website=Indian Television dot com}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.e4mtest.com/media-tv-news/karvachauth-moves-from-zee-to-star-in-form-of-kesar-11636.html|title=Karvachauth moves from Zee to Star in form of Kesar!}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> == कथानक == केसर ( [[नंदिनी सिंह]] ) एक पारंपरिक पंजाबी लड़की है जो एक गाँव में अपने बड़े परिवार के साथ रहती है। उसे एक बड़े शहर में रहने वाले अमीर मालिया परिवार से शादी का प्रस्ताव मिलता है। केसर ने मालिया के बेटे रुद्र (निखिल आर्य) से शादी की। वह अपने नए परिवार की परिष्कृत शहरी जीवनशैली से निपटने की पूरी कोशिश करती है। लेकिन जल्द ही वह खुद को धोखे के जाल में फंसा हुआ पाती है। यह पता चला है कि रुद्र और उसकी मां पाम ने कुछ मूल्यवान विरासत की खातिर निर्दोष केसर के खिलाफ साजिश रची है। केसर की जिंदगी काफी उथल-पुथल से गुजरती है। उसे रुद्र के दोस्त अभि का समर्थन मिलता है, जो उससे निस्वार्थ रूप से प्यार करता है। लेकिन अभि की दुखद और जल्दी मौत हो जाती है। उसका दिल हरमन ( [[यश टोंक]] ) के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है, जो केसर के लिए प्यार की समान भावनाओं का अनुभव करना शुरू कर देता है। इस बीच, केसर ने रुद्र की बेटी मुस्कान को जन्म दिया है। रुद्र की बम विस्फोट में मौत हो जाती है। कई और परेशानियों के बाद केसर ने हरमन से शादी करने का फैसला किया। हालाँकि, विपरीत परिस्थितियों के कारण वे अलग हो जाते हैं। == कलाकार == * [[नंदिनी सिंह]] के रूप में ** केसर रुद्र मालिया / केसर अभिनव पांडे (2004-2006) (प्लास्टिक सर्जरी से पहले) ** डॉ. कंगना (2006) * केसर अर्जुन गिल के रूप में [[प्राची शाह]] (प्लास्टिक सर्जरी के बाद) (2006-2007) * [[एज़ाज़ खान|ऐजाज़ खान]] / [[हितेन तेजवानी]] अभिनव "अभि" पांडे के रूप में (2004-2005) / (2005) (मृत) * हरमन खन्ना के रूप में [[यश टोंक]] * रुद्र मालिया के रूप में निखिल आर्य (2004-2006) (मृत) * कोमल के रूप में नासिर खान * परमीत के रूप में संदीप सिकंद / [[शक्ति सिंह (अभिनेता)|शक्ति सिंह]] * मंदीप भंडार / इंदिरा कृष्णन तेजी के रूप में * धरम मालिया के रूप में मदन जोशी * सरोज धरम मालिया के रूप में [[सुरेखा सीकरी]] * पाम विक्रम मालिया के रूप में [[किटू गिडवानी]] /नताशा राणा * इंस्पेक्टर यशवन्त पाटिल के रूप में रॉकी वर्मा * रयान सूद के रूप में [[करण पटेल]] * कनिका कोहली नितिका मालिया/नितिका रयान सूद के रूप में * बिनीता के रूप में [[निशा रावल]] * [[अलीज़ा खान]] / [[अशिता धवन|आशिता धवन]] नेहा के रूप में * रिया मालिया के रूप में [[गुंजन वालिया]] * हरमन की चाची के रूप में [[शुभांगी गोखले]] * कैटरीना रुद्र मालिया के रूप में ख्याति खंडके केसवानी * नूपुर हरमन खन्ना के रूप में शिवालिका शर्मा * असीम के रूप में [[निशांत शौकीन]] * शिवम के रूप में विनीत शर्मा * [[इकबाल आज़ाद|इक़बाल आज़ाद]] पुलिस आयुक्त अर्जुन गिल के रूप में * मुस्कान मालिया के रूप में श्वेता रस्तोगी * कृष मालिया के रूप में [[अमित दोलावत|अमित डोलावत]] * अभिमन्यु गिल के रूप में आशीष शर्मा * ख्वाहिश खन्ना के रूप में [[गुंजन विजया]] * खुशाली के रूप में [[अंकिता भार्गव]] * नैना के रूप में पूनम गुलाटी * आनंद पांडे (अभिनव के छोटे भाई) के रूप में विशाल वटवानी * शकुंतला पांडे (अभिनव और आनंद की मां) के रूप में [[प्रतिमा काज़मी]] * विक्रम मालिया के रूप में संजय बत्रा * रीमा विक्रम मालिया के रूप में सोनाली वर्मा * रीमा सूद के रूप में [[जया भट्टाचार्य]] * कादम्बरी अभिनव पांडे के रूप में [[कविता कौशिक]] * डॉ. साहिल के रूप में [[अनस रशीद|अनस राशिद]] * शालिनी सूद के रूप में मोनालिका भोंसले * [[मजहर सईद|मज़हर सईद]] डॉ. वालिया के रूप में * प्रेरणा के रूप में [[श्वेता तिवारी]] == संदर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * {{आईएमडीबी शीर्षक|tt1486321}} * [http://www.tvasiausa.com/synopsis.php?program_id=336 टीवी एशिया पर आधिकारिक वेबसाइट]{{Dead link|date=अगस्त 2023 |bot=InternetArchiveBot }} * [https://web.archive.org/web/20070918104101/http://starplus.indya.com/serials/kesar/index.html Official स्टार प्लस पर वेबसाइट] [[श्रेणी:स्टार प्लस के धारावाहिक]] [[श्रेणी:बालाजी टेलीफिल्म्स के धारावाहिक]] [[श्रेणी:भारतीय टेलीविजन धारावाहिक]] t8faymeucfgpekuy2lty6ap1n9qcpnk केलंबक्कम 0 1486877 6543700 6207425 2026-04-24T21:33:22Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543700 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक अवस्थापन | name = केलंबक्कम | image_map = | image_skyline = Sigapiachi Convention Centre - panoramio.jpg | image_caption = सिगापियाची कंवेंशन सेंटर | pushpin_label_position = right | coordinates = {{coord|12.48|N|80.13|E|display=inline,title}} | subdivision_type = [[देश]] | subdivision_name = {{IND}} | subdivision_type1 = [[भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश|राज्य]] | subdivision_type2 = [[महानगरीय क्षेत्र]] | subdivision_type3 = [[भारत के ज़िले|ज़िला]] | subdivision_name1 = [[तमिलनाडु]] | subdivision_name2 = [[चेन्नई]] | subdivision_name3 = [[चेंगलपट्टु जिला|चेंगलपट्टु]] | timezone1 = [[भारतीय मानक समय]] | utc_offset1 = +५:३० | postal_code = ६०३१०३ | native_name = கேளம்பாக்கம் | native_name_lang = ta }} [[श्रेणी:Articles with short description]] [[श्रेणी:Short description is different from Wikidata]] <templatestyles src="Module:Infobox/styles.css"></templatestyles> '''केलंबक्कम''' [[भारत]] के [[चेन्नई]] का एक उपनगरीय और आवासीय पड़ोस है। यह [[राजीव गाँधी सलाई|पुराने महाबलीपुरम रोड]] (ओएमआर) के साथ शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है, और लगभग ५ है&nbsp;सिरुसेरी आईटी पार्क से किमी और १२&nbsp;[[शोलिंगनल्लूर]] जंक्शन से किमी. शोलिंगनलूर के बाद यह एक और महत्वपूर्ण जंक्शन है, जो जीएसटी रोड (वंडालूर) और ईसीआर रोड (कोवलम) को जोड़ता है। केलमबक्कम को ओएमआर रोड पर चेन्नई शहर का दक्षिणी प्रवेश द्वार माना जाता है और यह ओएमआर रोड के जोन-२ (शोलिंगनलूर से केलमबक्कम खंड) के अंतर्गत आता है। [[चेन्नई मेट्रो|मेट्रो]] ट्रेन परियोजना-चरण २ प्रक्रियाधीन है जो माधवराम को सिरुसेरी आईटी पार्क से जोड़ती है (इस कॉरिडोर-३ के चालू होने की समय सीमा २०२५ तक है)। == जनगणना २०११ == केलंबक्कम की कुल जनसंख्या लगभग २०,००० है और २०२१ तक इसके दोगुना होने की उम्मीद है। इस इलाके की साक्षरता दर ९०.८८% है। केलंबक्कम में लिंगानुपात १,०१८ है। विशाल आवासीय और वाणिज्यिक विकास, अच्छी भूजल उपलब्धता और उत्कृष्ट सड़क बुनियादी ढांचे के साथ चेन्नई शहर के सभी हिस्सों तक आसान पहुंच के कारण अधिक परिवार केलंबक्कम की ओर पलायन कर रहे हैं। हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, चेन्नई शहर की आबादी २०३० तक १५ मिलियन लोगों की होगी (२०१९ में वर्तमान जनसंख्या ११ मिलियन है)। चूँकि ओएमआर रोड में शोलिंगनल्लूर तक जनसंख्या पहले ही संतृप्ति बिंदु तक पहुँच चुकी है, २०३० तक शोलिंगनल्लूर-केलमबक्कम खंड में अधिक लोग (लगभग १० लाख लोग) पलायन करना शुरू कर देंगे।<ref>{{Cite web|url=http://www.censusindia.co.in/villages/kelambakkam-population-kancheepuram-tamil-nadu-629418|title=Kelambakkam Census Report - 2011|website=Census India|access-date=19 October 2017|archive-date=19 अक्तूबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171019164113/http://www.censusindia.co.in/villages/kelambakkam-population-kancheepuram-tamil-nadu-629418|url-status=dead}}</ref> == केलंबक्कम में स्कूल == * सेंट फ्रांसिस इंटरनेशनल स्कूल * डीएवी ग्रुप ऑफ स्कूल (एसएम फोमरा) * चेट्टीनाड - सर्वलोका एजुकेशन इंटरनेशनल स्कूल * सुशील हरि अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विद्यालय * वेलम्मल न्यू जेन सीबीएसई स्कूल * लिटिल मिलेनियम प्रीस्कूल केलंबक्कम * जगन्नाथ विद्यालय सीबीएसई स्कूल * बिलाबॉन्ग हाई इंटरनेशनल स्कूल * बुवाना कृष्णन मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल * सेंट मैरी मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल * इलन्थालिर किड्स जोन प्रीस्कूल * किड्जी केलंबक्कम प्ले, नर्सरी स्कूल * शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय * नेल्लई गणित संस्थान (केलंबक्कम में एक गणित विद्यालय) == केलमबक्कम के पास के कॉलेज == * आईआईटी मद्रास- वैज्ञानिक खोज परिसर- पीएम नरेंद्र मोदी ने २०२१ में १,००० करोड़ रुपये की लागत से एक परिसर के निर्माण की आधारशिला रखी (राज्य सरकार ने २०१७ में थाईयूर में १६३ एकड़ जमीन दी है)। * वीआईटी विश्वविद्यालय * एसएसएन विश्वविद्यालय (२५० एकड़ परिसर) * हिंदुस्तान यूनिवर्सिटी * चेट्टीनाड स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर * IIITDM कांचीपुरम (भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी, डिजाइन और विनिर्माण संस्थान, कांचीपुरम) * चेट्टीनाड एकेडमी ऑफ रिसर्च एंड एजुकेशन (यूजीसी अधिनियम की धारा ३ के तहत विश्वविद्यालय माना जाता है) * चेट्टीनाड कॉलेज ऑफ नर्सिंग * चेट्टीनाड अस्पताल और अनुसंधान संस्थान * धनपालन कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस * एसएमके फोमरा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी * आनंद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी * पीएसबी पॉलिटेक्निक कॉलेज * टैगोर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल == अस्पताल == * चेट्टीनाड सुपर स्पेशलिटी अस्पताल (१०० एकड़ परिसर) * प्रवीणा अस्पताल, वंडालूर रोड, केलंबक्कम * स्वरम हॉस्पिटल * सुप्रीम अस्पताल * अपोलो डायग्नोस्टिक्स * मलेर डायग्नोस्टिक्स सेंटर (२००३ से) == केलंबक्कम के आसपास मंदिर और चर्च == * साईं बाबा मंदिर, केलंबक्कम * पूरन ब्रह्मम मंदिर, श्री रामराज्य परिसर, वंडालूर रोड, केलंबक्कम * श्री अष्ट दश बुजा दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती मंदिर, श्री रामराज्य परिसर, वंडालूर रोड, केलंबक्कम * श्री करपगा विनायकर मंदिर, गणेशपुरी, श्री रामराज्य परिसर, केलंबक्कम * वीरा अंजनेयार मंदिर, पुडुपक्कम * नित्यकल्याण पेरुमल मंदिर, तिरुविदंथाई समुद्र तट मंदिर (भगवान पेरुमल के १०८ दिव्यदेसों में से एक) * थिरुपोरूर मुरुगन मंदिर * चेंगम्मल सिवान मंदिर * मरेश्वर मंदिर (थैयूर) * क्राइस्ट द रिडीमर कैथोलिक चर्च * दिव्य दया चर्च * उस्मानिया जामिया मस्जिद और इस्लामिक सेंटर (ओएमआर रोड की सबसे पुरानी मस्जिद में से एक) * मस्जिद उल हुदा (बाजार के पास) == आवासीय विकास == तेजी से विकास, अच्छी पानी की उपलब्धता और चेन्नई के सभी हिस्सों तक आसान पहुंच के साथ उत्कृष्ट सड़क बुनियादी ढांचे के कारण, केलंबक्कम में बहुत सारे अपार्टमेंट और विला बनाए गए हैं। इसके अलावा, केलांबक्कम में पिछले कुछ वर्षों में बहुत सारे पारिवारिक प्रवासन देखे गए हैं। रोजगार के अवसरों की निकटता, अच्छी संपत्ति की सराहना, अच्छी सड़क अवसंरचना, ईसीआर और अन्य मनोरंजन स्थलों पर समुद्र तटों की निकटता इस उपनगर में अधिक निवासियों को आकर्षित करती है। </link> == परिवहन == केलांबक्कम लगातार एमटीसी बस सेवाओं के माध्यम से चेन्नई शहर के लगभग सभी महत्वपूर्ण स्थलों जैसे टी० नगर, सीएमबीटी, ब्रॉडवे, सेंट्रल रेलवे स्टेशन, तांबरम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। केलंबक्कम (थाईयूर) के लिए नया बस डिपो, एमटीसी बस शेल्टर और नए केलंबक्कम बस टर्मिनल के लिए लगभग १० एकड़ भूमि निर्माणाधीन है। एमटीसी औसतन केलंबक्कम से चेन्नई शहर के सभी इलाकों के लिए ४०० से अधिक बस सेवाएं संचालित करती है। इसके अलावा, तमिलनाडु सरकार वंडालूर में ४१० करोड़ रुपये की लागत से सबसे बड़ा बस टर्मिनल (४५ एकड़) का निर्माण कर रही है, जहां वंडालूर-केलंबक्कम सड़क के माध्यम से पहुंचने में केवल २० मिनट लगते हैं। यह बस टर्मिनल एशिया का सबसे बड़ा बस टर्मिनल होगा और मार्च २०२२ से चालू हो जाएगा। मेट्रो ट्रेन परियोजना- चरण २ प्रक्रियाधीन है जो माधवराम को सिरुसेरी आईटी पार्क से जोड़ती है (इस कॉरिडोर-३ के चालू होने की समय सीमा २०२५ तक है)। एक बार मेट्रो ट्रेन चालू हो जाए तो यह ओएमआर रोड के समग्र विकास के लिए गेम चेंजर साबित होगी। == यह सभी देखें == * [[चेन्नई]] * [[महाबलिपुरम|महाबलीपुरम]] == संदर्भ == <references /> == बाहरी संबंध == {{Neighborhoods of Chennai}}{{Chennai Topics}}{{कॉमन्स श्रेणी}} [[श्रेणी:चेन्नई में मुहल्ले]] [[श्रेणी:विकिडेटा पर उपलब्ध निर्देशांक]] 4a4vk4kcijjakmuppbkw0jgdeyjc63a कुंजल माता मन्दिर, डेह 0 1487765 6543622 6212066 2026-04-24T14:05:32Z ~2026-25085-83 921687 Full and more story for user knowledge 6543622 wikitext text/x-wiki {{Infobox Mandir | name = कुंजल माता मंदिर | image = | alt = | caption = | pushpin_map = India Rajasthan | map_caption = Location in Rajasthan | latd = 27 | latm = 18 | lats = 33 | latNS = N | longd = 73 | longm = 54 | longs = 58 | longEW = E | coordinates_region = IN | coordinates_display= title | other_names = | proper_name = कुंजल माता | devanagari = | sanskrit_translit = | tamil = | marathi = | bengali = | country = भारत | state = [[राजस्थान]] | district = | location = [[डेह]],[[नागौर]] | elevation_m = | primary_deity = | important_festivals= | architecture = | number_of_temples = | number_of_monuments= | inscriptions = | date_built = | creator = | website = }} '''कुंजल माता मंदिर ''' जो [[राजस्थान]] के [[नागौर]] जिले के '''[[डेह]]''' के गांव में स्थित है । <ref>[[Deh, India|Deh on Wikipedia]]</ref> {{convert|1.3|km|0|abbr=on}} <ref>[http://wikimapia.org/12764725/KUNJAL-MATA-MANDIR Kunjal Mata Temple on wikimapia]</ref><ref>{{Cite web |url=http://hotelminagaur.com/pilgrim.html |title=Kunjal Mata Mandir |access-date=21 अक्तूबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20100718091510/http://hotelminagaur.com/pilgrim.html |archive-date=18 जुलाई 2010 |url-status=dead }}</ref> of Rajasthan . ==बाहरी कड़ियाँ== *[http://wikimapia.org/12208277/hi/kunjal-mata-ka-mandir-pintu-togasia कुंजल माता का मन्दिर विकिमैपिया पर] [[श्रेणी:राजस्थान में हिन्दू मन्दिर]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} {{आधार}} h3v5p0y9sgr3mi23rmzikimbues61dx कृत्रिम पलकें 0 1512014 6543666 6081480 2026-04-24T16:53:43Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543666 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Indian_bride_with_false_eyelashes.jpg|अंगूठाकार|नकली बरौनियाँ लगाए दुल्हन]] '''नकली बरौनियाँ''' अथवा '''फॉल्स आईलैशेज''' (false eyelashes) एक [[सौन्दर्य प्रसाधन]] वृद्धि है जो [[पलक|पलकों]] के उपर प्राकृतिक अथवा कृत्रिम फाइबर (रेशे) जोड़कर प्राप्त किया जाता है। इसमें [[बरौनी (शारीरिक अंग)|बरौनियाँ]] गहरी और सुन्दर रूप में दिखाई देती हैं। वे विभिन्न लंबाई, मोटाई और वक्रता में उपलब्ध हैं। ==इतिहास== सन् 1882 में ''ट्रुथ'' (ब्रिटेन का आवधिक प्रकाशन) के हेनरी लैबोचेरे ने बताया कि पलकों में बाल सिलवाकर "पेरिसवासियों ने झूठी बरौनियाँ बनाना सीख लिया है"।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=cVlYAAAAYAAJ&q=false+eyelashes|title=Medical Record, Volume 22|last=George Frederick Shrady and Thomas Lathrop Stedman|date=1882|page=252}}</ref> इसी तरह की एक रिपोर्ट ''द डंडी कूरियर'' (स्कॉटलैण्ड का एक समाचार पत्र) के 6 जुलाई 1899 के संस्करण में छपी थी, जिसमें बरौनियों को लंबा करने की दर्दनाक विधि का वर्णन किया गया था। शीर्षक में लिखा था, "बालों को ट्रांसप्लांट करने से अप्रतिरोध्य आंखें मिल सकती हैं।" लेख में बताया गया है कि कैसे इस प्रक्रिया से सिर के बालों को पलकों में सिलकर लंबी बरौनियाँ हासिल की गईं। <ref>{{Cite web|url=http://thequackdoctor.com/index.php/the-most-uncanny-look/|title=Irresistible Eyes May Be Had by Transplanting the Hair.|date=6 July 1899|website=The Dundee Courier|publisher=The Quack Doctor|access-date=8 फ़रवरी 2024|archive-date=15 सितंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20220915041632/http://thequackdoctor.com/index.php/the-most-uncanny-look/|url-status=dead}}</ref> सन् 1902 में जर्मन में जन्मे बाल विशेषज्ञ और प्रसिद्ध आविष्कारक कार्ल नेस्लर ने यूनाइटेड किंगडम में "कृत्रिम भौहें, पलकें और इसी तरह के निर्माण के लिए एक नई या बेहतर विधि और साधन" का पेटेंट कराया।<ref>"[http://www.directorypatent.com/GB/190218723-a.html A New or Improved Method of and Means for the Manufacture of Artificial Eyebrows, Eyelashes and the like] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20171001031659/http://www.directorypatent.com/GB/190218723-a.html|date=2017-10-01}}". British patent GB000190218723A, submitted August 26, 1902, approved November 6, 1902.</ref> 1903 तक, उन्होंने ग्रेट कैसल स्ट्रीट पर अपने लंदन सैलून में कृत्रिम पलकें बेचना शुरू कर दिया। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=4kKBAAAAMAAJ&q=great+castle+street+nessler|title=Powder and Paint: A History of the Englishwoman's Toilet, Elizabeth I–Elizabeth II|last=Williams, Neville|publisher=Longmans, Green|year=1957|isbn=9787250004040}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://news.google.com/newspapers?nid=2209&dat=19030714&id=kcJEAAAAIBAJ&pg=2861,2172846&hl=en|title=Art Eyelashes|date=July 14, 1903|work=Nashua Daily Telegraph|page=3}}</ref> उन्होंने अपनी बिक्री से प्राप्त मुनाफ़े का उपयोग अपने अगले आविष्कार, स्थायी तरंग (पर्म) मशीन के वित्तपोषण के लिए किया। <ref>{{Cite news|url=https://news.google.com/newspapers?nid=1368&dat=19540921&id=2bkyAAAAIBAJ&pg=5180,1828698&hl=en|title=Hair Waving Machine is 50 Years Old|date=September 21, 1934|work=The Milwaukee Sentinel|page=11}}{{Dead link|date=फ़रवरी 2024 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://news.google.com/newspapers?nid=348&dat=19560131&id=XGMjAAAAIBAJ&pg=5840,2458362&hl=en|title=Beauty Boon Has Made Many Changes in 50 Years|work=Rome News Tribune|page=28}}</ref> 1911 में, एना टेलर नाम की एक कनाडाई महिला ने संयुक्त राज्य अमेरिका में झूठी पलकों का पेटेंट कराया। टेलर की नकली पलकों पर कपड़े की एक अर्धचंद्राकार पट्टी थी, जिस पर बालों के छोटे-छोटे टुकड़े रखे हुए थे। <ref>"ARTIFICIAL EYELASH". Anna Taylor, Ottawa. Ontario. Canada. Serial No. 607,810. US994619. Filed February 10, 1911.</ref> झूठी पलकों के एक अन्य प्रसिद्ध आविष्कारक पोलिश सौंदर्य गुरु और व्यवसायी मैक्सिमिलियन फैक्टोरोविक्ज़ हैं, जिन्होंने मैक्स फैक्टर कंपनी की स्थापना की थी। <ref>{{Cite web|url=https://www.polskieradio.pl/10/501/Artykul/1245535,|title=Maksymilian Faktorowicz – człowiek, który dał nam sztuczne rzęsy|date=29 September 2017|website=Polskie Radio|language=pl|trans-title=Maksymilian Faktorowicz – the man who gave us false eyelashes}}</ref> [[चित्र:Peggy_Hyland_-_Jul_1917_FF_(cropped).jpg|अंगूठाकार|''फिल्म फन'' (1917) में झूठी पलकें लगाने वाली पैगी हाइलैंड]] 1916 में, अपनी फिल्म ''इन्टॉलरेंस'' बनाते समय, निर्देशक [[डी. डब्ल्यू. ग्रिफ़िथ|डीडब्ल्यू ग्रिफिथ]] चाहते थे कि अभिनेत्री सीना ओवेन "जो उनके गालों पर लगें, ताकि उनकी आंखें जीवन से भी बड़ी चमक सकें।" नकली पलकें, जो मानव बाल से बनाई गई थीं, एक स्थानीय विग निर्माता द्वारा बुनी गई थीं। स्पिरिट गम का उपयोग करके पलकों को चिपकाया गया। एक दिन, ओवेन अपनी सूजी हुई आँखों को लगभग बंद करके बैठी हुई दिखाई दी, उसकी सह-कलाकार लिलियन गिश ने अपने संस्मरण में लिखा है। <ref>{{Cite web|url=https://www.racked.com/2015/10/7/9457395/a-history-of-false-eyelashes|title=A True History of False Eyelashes|date=7 October 2015|access-date=6 September 2019|archive-date=29 मार्च 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240329181416/https://www.racked.com/2015/10/7/9457395/a-history-of-false-eyelashes|url-status=dead}}</ref> 1930 के दशक तक, झूठी पलकें अधिक व्यापक होती जा रही थीं। झूठी पलकें ''वोग'' में प्रदर्शित की गईं। [[चित्र:Oficina_de_maquiagem_Drag_Queen_(27790456156)_(cropped).jpg|अंगूठाकार|ड्रैग मेकअप के रूप में सिंथेटिक झूठी पलकें पहनने वाला व्यक्ति]] 1960 के दशक में, आँखों को बड़ा दिखाने वाला आई मेकअप बहुत आम था। यह लुक ऊपर और नीचे दोनों पलकों पर नकली पलकें लगाकर हासिल किया गया था। ट्विगी ने इस प्रवृत्ति को लोकप्रिय बनाने में मदद की।  1968 में नारीवादी मिस अमेरिका विरोध प्रदर्शन में, प्रदर्शनकारियों ने प्रतीकात्मक रूप से झूठी पलकों सहित कई प्रतीकात्मक स्त्री उत्पादों को "फ्रीडम ट्रैश कैन" में फेंक दिया। <ref>{{Cite journal|last=Dow, Bonnie J.|date=Spring 2003|title=Feminism, Miss America, and Media Mythology|journal=Rhetoric & Public Affairs|volume=6|issue=1|pages=127–149|doi=10.1353/rap.2003.0028|s2cid=143094250}}</ref> <ref>{{Cite book|title=Voice of the Women's Liberation Movement|last=Duffett, Judith|date=October 1968|page=4|chapter=WLM vs. Miss America}}</ref> 2014 में, वन टू कॉस्मेटिक्स की संस्थापक कैटी स्टोका ने गोंद का उपयोग करने वाली पलकों के विकल्प के रूप में चुंबकीय झूठी पलकों का आविष्कार किया। <ref name="Maheshwari2017">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2017/08/25/business/media/lash-boost-eyelash-enhancer-marketing.html|title=In Social Media Era, Selfies Are the New Tupperware Party|last=Maheshwari|first=Sapna|date=25 August 2017|website=[[The New York Times]]|access-date=19 September 2018|quote='I thought, this is a product that will go viral because lashes make everyone look better, particularly in pictures—that's why a lot of brides get them,' said Katy Stoka, the creator of the magnetic lashes, known as One Two Lash. She added, 'Then it came in tandem with the obsession with the selfie.'}}</ref> == अस्थायी झूठी पलकें == [[चित्र:Christina_-_Ariana_Lashes.jpg|अंगूठाकार|255x255पिक्सेल|पैकेजिंग में झूठी पलकें]] अस्थायी झूठी पलकों को अस्थायी पलक गोंद के साथ पलकों की जड़ पर लगाया जाता है और इन्हें नहाते, सोते या तैरते समय पहनने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। पलकें अलग-अलग, गुच्छों में और आमतौर पर पट्टियों के रूप में आती हैं। चुंबकीय पलकें किसी की पलकों के बीच चुंबकीय झूठी पलकें रखकर काम करती हैं, जिससे प्राकृतिक पलकें चुंबकीय पलकों के साथ जुड़ जाती हैं। <ref name="Sasso2016">{{Cite web|url=https://www.refinery29.com/2016/07/115594/one-two-lash-extensions-magnetic-false-eyelashes|title=One Two Lash – New Magnetic False Extensions|last=Sasso|first=Samantha|date=1 July 2016|publisher=[[Refinery29]]|access-date=19 September 2018|quote=Katy Stoka of One Two Cosmetics has created a new and easy way to get an effortlessly winged-out look minus the glue ... magnetic lashes. ... The lashes come in four different styles, ranging from very natural to total glam, and work by sandwiching your actual lashes using two magnetic layers of falsies.}}</ref> == बरौनी विस्तार == [[चित्र:Types_extensions1.webp|अंगूठाकार|बरौनी विस्तार]] संयुक्त राज्य अमेरिका में, प्रत्येक राज्य व्यक्तिगत रूप से बरौनी एक्सटेंशन को नियंत्रित करता है। कुछ राज्यों को कॉस्मेटोलॉजी या सौंदर्यशास्त्री लाइसेंस की आवश्यकता होती है; कुछ राज्यों में विशेष रूप से लैश तकनीशियनों के लिए प्रमाणपत्र या लाइसेंस होता है। यूनाइटेड किंगडम में, गिल्ड ऑफ प्रोफेशनल ब्यूटी थेरेपिस्ट्स ने अर्ध-स्थायी व्यक्तिगत बरौनी एक्सटेंशन के सुरक्षित अनुप्रयोग के लिए पाठ्यक्रमों को मान्यता दी है। पाठ्यक्रम सामग्री के मूल्य का अंदाजा पाठ्यक्रम को दिए जाने वाले सीपीडी (निरंतर व्यावसायिक विकास) अंकों की संख्या से लगाया जा सकता है| == सन्दर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:सौन्दर्य प्रसाधन]] cm5z9y1ec69t5mv5zgcxcw48s4ffza9 कीजी फुजिवारा 0 1512769 6543605 6451894 2026-04-24T12:02:32Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543605 wikitext text/x-wiki '''कीजी फुजिवारा''' (藤原 啓治, फुजिवारा कीजी, 5 अक्टूबर 1964 – 12 अप्रैल 2020)<ref>{{Cite web|url=https://www.oricon.co.jp/news/2160153/|title = 声優・藤原啓治さん死去 55歳 『クレヨンしんちゃん』野原ひろし役など| date=16 अप्रैल 2020 }}</ref> एक जापानी अभिनेता और आवाज अभिनेता थे। उनके सबसे प्रसिद्ध कार्यों में लंबे समय से चल रही एनीमे शृंखला ''[[क्रेयौन शिनचैन]]'' में शिनोसुके के पिता हिरोशी नोहारा, ''फुलमेटल अल्केमिस्ट'' में मेस ह्यूजेस, ''यूरेका सेवन'' में हॉलैंड, ''किंगडम हार्ट्स'' में एक्सल, ''हंटर × हंटर'' में लियोरियो, ''ब्लू एक्सोरसिस्ट'' में शिरो फुजीमोटो, ''इनिशियल डी'' में शिंगो शोजी, ''गिंटामा'' में ज़ेंज़ो हत्तोरी और ''जोजोज़ बिज़रे एडवेंचर: बैटल टेंडेंसी'' में एस्सिडिसी को आवाज देना शामिल है।<ref>{{cite web|publisher=Talent-Databank|title=Profile|language=ja|url=http://www.talent-databank.co.jp/search/t2000072603|archive-date=2017-04-16|archive-url=https://web.archive.org/web/20170416044905/http://www.talent-databank.co.jp/search/t2000072603|url-status=dead}}</ref> लाइव-एक्शन क्षेत्र में उन्हें अभिनेता [[रॉबर्ट डॉनी जुनियर]] को [[टोनी स्टार्क (मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स)|आयरन मैन या टोनी स्टार्क]] के रूप में डब करने के लिए जाना जाता था। सन् 2006 में फुजिवारा ने अपनी प्रतिभा प्रबंधन और उत्पादन कंपनी एयर एजेंसी की स्थापना की।<ref name="Air Agency">{{cite web|title=Air Agency Corporate Information|url=http://www.air-agency.co.jp/company|publisher=अयर एजेंसी|access-date=19 मार्च 2024|language=ja}}</ref> ==जीवनी== फुजिवारा का जन्म टोक्यो में हुआ था। उन्होंने अपने बचपन का अधिकांश समय [[इवाते प्रीफ़ेक्चर]] में बिताया।<ref name="Voice actor DO">''声優DO'' radio show, 2011.11.06</ref> हाई स्कूल में उन्होंने रॉक बैंड द कलेक्टर्स के भावी गिटारवादक कोटारो फुरुइची के साथ मिलकर बनाए गए बैंड में गायन का काम संभाला।<ref name="Voice actor DO" /> फुजिवारा को 1990 के दशक की शुरुआत में उनकी पहली आवाज अभिनय एजेंसी केन प्रोडक्शन से परिचित कराया गया। योकोयामा मित्सुतेरु सांगोकुशी, पहला टीवी एनीमे था जिसमें वह नियमित रूप से दिखाई दिए लेकिन उनकी ब्रेकआउट भूमिका क्रेयॉन शिन-चान में हिरोशी नोहारा थी।<ref name="Febri">''Febri'' Magazine, 2015.11</ref> 2010 में फुजिवारा ने कक्कोकवई सेंगेन में अपने स्वयं के ध्वनि निर्देशन की शुरुआत की।<ref name="kakokawa">{{Cite web|url=http://kakokawa.com/staff/index.html|title=スタッフ・キャスト {{!}} アニメ「カッコカワイイ宣言!」公式サイト|last=地獄のミサワ/集英社・カコカワ委員会|website=kakokawa.com|language=ja|access-date=2018-05-08}}</ref> 2008 से फुजिवारा जापान न्यूआर्ट कॉलेज में नियमित व्याख्याता थे।<ref>{{Cite news|url=http://www.jnc.nichigei.ac.jp/professors.html|title=講師紹介 {{!}} 日本芸術専門学校/【東京】俳優・ダンス・音楽・声優の道を目指すなら|work=日本芸術専門学校/【東京】俳優・ダンス・音楽・声優の道を目指すなら|access-date=2018-05-13|language=ja-JP|archive-date=21 अगस्त 2018|archive-url=https://web.archive.org/web/20180821220151/https://www.jnc.nichigei.ac.jp/aboutus/professors/|url-status=dead}}</ref> ==बीमारी और मौत== अगस्त 2016 में फुजिवारा को कैंसर का पता चला। हालांकि वह चिकित्सा उपचार से गुजरने में सक्षम थे इसलिए वे लंबे समय तक एयर एजेंसी और विभिन्न डबिंग के लिए काम करते रहे।<ref>{{Cite news|url=https://www.animenewsnetwork.com/news/2016-08-08/shin-chan-danganronpa-3-voice-actor-keiji-fujiwara-takes-leave-for-medical-treatment/.105139|title=Shin-chan/Danganronpa 3 Voice Actor Keiji Fujiwara Takes Leave For Medical Treatment|work=Anime News Network|access-date=2018-05-07}}</ref> उन्होंने जून 2017 में आधिकारिक तौर पर फिर से काम करना शुरू किया।<ref>{{Cite news|url=https://www.animenewsnetwork.com/news/2017-06-16/voice-actor-keiji-fujiwara-plans-return-to-work/.117561|title=Voice Actor Keiji Fujiwara Plans Return to Work|work=Anime News Network|access-date=2018-05-07}}</ref> 55 वर्ष की आयु में बीमारी के कारण हृदय गति रुकने से 12 अप्रैल 2020 को फुजिवारा की टोक्यो मेडिकल अस्पताल में मृत्यु हो गई।<ref>{{Cite news|url=https://www.iwate-np.co.jp/article/oricon/2160153|title=声優・藤原啓治さん死去 55歳 『クレヨンしんちゃん』野原ひろし役などaccess-date=2019-04-16|language=ja-JP|access-date=2020-04-22|archive-date=2020-04-16|archive-url=https://web.archive.org/web/20200416181716/https://www.iwate-np.co.jp/article/oricon/2160153|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://news.nicovideo.jp/watch/nw7042541|title=声優の藤原啓治さんが死去。|work=ニコニコニュース|access-date=2020-04-16}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.animenewsnetwork.com/news/2020-04-16/voice-actor-keiji-fujiwara-passes-away-at-55-due-to-cancer/.158649|work=एनीमे न्यूज नेटवर्क|title=Voice Actor Keiji Fujiwara Passes Away at 55 Due to Cancer|last=Pineda|first=Rafael Antonio|date=2020-04-16}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * [http://www.air-agency.co.jp/talent/man/keiji_fujiwara आधिकारिक एजेंसी प्रोफाइल] {{in lang|ja}} * {{anime News Network|people|id=949}} {{Authority control}} [[श्रेणी:1964 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:२०२० में निधन]] hzjk9qvotifnq2dset3xzvm24vmccyt पश्चवर्ती मौर्य राजवंश 0 1519858 6543702 6538252 2026-04-24T21:48:51Z ~2026-25274-43 921727 6543702 wikitext text/x-wiki [[राजतरंगिणी]] में [[जलौक]] को [[ सम्राट अशोक]] के कश्मीर के उत्तराधिकारी के रूप में उल्लेखित किया गया है, जबकि [[तारानाथ]] अन्य उत्तराधिकारी वीरसेन का उल्लेख करते हैं जो गंधार में शासन करते थे और वे डॉ. थॉमस के अनुसार, मगध के मौर्य [[सुभगसेन]] के पूर्वज थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.10359|title=Political History of ancient India|last=Hemchandra Raychaudhuri|first=M. A.|date=1932|page=238}}</ref> मौर्य राजवंश की 6 प्रारंभिक मध्यकालीन शाखा कोंकण, खानदेश, गोवा, मालवा, मथुरा और राजस्थान में मौजूद होने के पुरालेखीय प्रमाण मिले है।<ref>Epigraphia Indica, Volume XXXII, 1957-58, pp. 209-10</ref> पश्चिमी भारत और मगध में सामंत और छोटे मौर्य राजा मौर्य वंश का अंत होने के बाद भी शासन करते रहे। मौर्य वंश के मगध के राजा धवल का उल्लेख 738 ईस्वी के [[कंसवा अभिलेख]] में किया गया है। प्रोफेसर भंडारकर उनकी पहचान 725 ई. के डबोक (मेवाड़) शिलालेख में वर्णित धनिका के अधिपति धवलप्पदेव से करते हैं। प्रारंभिक अभिलेखों में कोंकण और खानदेश के मौर्य प्रमुखों का उल्लेख मिलता है। मगध के पूर्णवर्मन नाम के एक मौर्य राजकुमार का उल्लेख चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग]] ने किया है।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.10359|title=Political History of ancient India|last=Hemchandra Raychaudhuri|first=M. A.|date=1932|page=240}}</ref><ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55603|title=The Cambridge History Of India Vol.i|last=Rapson|first=E. J.|date=1935|page=513}}</ref> छठी सदी में कोलाबा के साथ उत्तरी कोंकण के पास नल मौर्य द्वारा शासन किया गया था। पांचवीं और छठी सदी के पत्थरों से पाया गया कि उत्तर कोंकण के थाना जिले में मौर्य राजा [[सुकेतुवर्मन]] शासन कर रहे थे। [[कोंकण]] को मौर्य परिवार के धारकों के पास सौंपा गया था।<ref name="HAI">"Konkan was given in charge of a Maurya family. A grant of the Maurya prince Suketuvarman, who ruled in this period, has been discovered in the Thānā district of North Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/jEqi_literay-and-historical-studies-in-indology-of-dr.-vasudev-vishnu-mirashi-mlbd-varanasi|page=128|title=Literay And Historical Studies In Indology Of Dr. Vasudev Vishnu Mirashi MLBD Varanasi|last=MLBD Varanasi}}</ref><ref name="CORPUS"> "A stone inscription from Vada in the north of the Thana District mentions a Maurya king named Suketuvarman ruling in Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ernet.367473|title=Corpus Inscriptionium Indicarum Vol Iv Part 1|page=75|last=Vasudev Vishnu Mirshi|date=1955|publisher=Government Epigraphist For India, Ootacamund|language=Multilingual}}</ref><ref name="INSCRIPTION"> "We have discussed above about the Saka era. From the point of view of its early history as well as for the history of the later Mauryas of Konkana the Vala (or Vada) inscription of Suketuvarman, dated Saka 322, is one of utmost importance. The inscription was actually found at the place of this name in the Thane District of Maharashtra though wrongly attributed to Vala in the Saurashtra region of Gujarat. It aims at registering the installation of the deity Koțiśvara by one Simhadatta, son of Anankiparadatta in the Saka year 322, and some grants to the divinity by one Isuprakki, the Vallabha-Talavara of the Maurya Dharma- mahārāja Suketuvarman of the Bhojas. The inscription adds one more name to the list of the Mauryas of Konkaņa." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.29982|page=32|title=puratattva: Bulletin of the Indian archaeological society number 25 1994-95|last=Dikshit|first=K. N.|date=1995|publisher=Indian Archaeological Society,New delhi}}</ref> मोरे, [[मराठा]] और कोलाबा के भूमिका में एक बहुत ही सामान्य नाम है। इलेफंटा और करंजा में मोर के नाम के दो छोटे स्थल लिये जा सकते हैं, जो [[कोंकण]] में पूर्व में मौर्य शक्ति के अवशेष हो सकते हैं।<ref>https://gazetteers.maharashtra.gov.in/cultural.maharashtra.gov.in/english/gazetteer/KOLABA/his_early.html</ref> कलाचूरी राजा [[कृष्णराज]] के सिक्के मुंबई के द्वीप में पाए गए हैं। लेकिन यह देश सीधे कलाचूरियों द्वारा प्रशासित नहीं था। उन्होंने इसे मौर्यों के एक उपनिवेशित परिवार को दिया। दाबोक (मेवाड़) के अभिलेख में 738-39 ई. के मौर्य राजा धवलप्प का उल्लेख किया गया है, जो कि चित्तौड़गढ़ के किले पर शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/ancient-history-of-maharashtra_202110|title=Ancient History of Maharashtra|page=140|last=Maharashtra State Gazetteers|date=1967}}</ref> [[File:Hemchandra Raychaudhari, Prachin Bharat Ka Rajnitik Itiyash pg.323.jpg|thumb|[[हेमचंद्र रायचौधरी]] द्वारा निर्मित मौर्य वंशावली<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/hemchandra-raychaudhari|page=323|title=प्राचीन भारत का इतिहास|last=Hemchandra Raychaudhari}}</ref>]] ==कोंकण क्षेत्र के मौर्य== {{main|कोंकण के मौर्य}} सुकेतुवर्मन का नाम बम्बई के पास थाना के उत्तर में वाडा में पाए गए शिलालेख से जाना जाता है, लेकिन अब यह प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, बम्बई में संरक्षित है। शिलालेख, जो क्षतिग्रस्त है और लगभग चौथी या पाँचवीं शताब्दी के दक्षिणी लिपि में लिखा गया है और मौर्य वंश के सुकेतुवर्मन नामक राजा को संदर्भित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस अवधि के दौरान थाने के आसपास शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.07863|title=Central Provinces District Gazetteers: Nagpur District|page=65|last=N. V. SundaraRaman|first=Chairman|last2=P. Setu Madhava Rao|first2=Member|last3=V. B. Kolte|first3=Member|last4=C. D. Deshpande|first4=Member|last5=B. R. Rairikar|first5=Member|last6=Sarojini Babar|first6=Member|last7=V. T. Gune|first7=Member|last8=P. N. Chopra|first8=Member|last9=V. N. Gurav|first9=Member-Secretary|date=1908|publisher=Bombay, Times Press}}</ref> पुलकेशी द्वितीय ने मौर्य राजधानी पुरी को सफलतापूर्वक घेर लिया, जिससे उनके शासन का अंत हो गया।{{Sfn|Durga Prasad Dikshit|1980|p=77}} उनके ऐहोल शिलालेख में कहा गया है : {{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=11}} {{Quote box| कोंकणेषुयदादिष्ट चण्डदण्डाम्बुब्रीचिभिः । उदस्तरसा मौर्यपल्लवलाम्बुसमृद्धये ।।२० अपरजलेर्लक्ष्मी यस्मिन्पुरीपुर भृत्प्रभेः मद्गजघटाकारैर्ऋवां शतैरवमृदन्ति । जलदपटलानीक कीर्णम् नवोत्पलमेचकाञ्, जलनिधिरिव व्योम व्योम्नसमोभवदम्बुभिः धिः ।। २१ {{centre|'''हिंदी अनुवाद'''}} उसकी (पुलकेशी की) सेनाओं के आक्रमण के भीषण ज्वार में कोंकण देश के मौर्यो (मौर्य वंश के राजा) की छोटी-छोटी लहरें विलीन हो गयीं ।२०।। पुरंभेत्ता (इन्द्र) के वैभव वाले उस (पुलकेशी) ने पश्चिम पयोधि की लक्ष्मीरूपी पुरी (नामक) नगरी को मद्रस्रावी हाथियों की जमातं जैसी लगने वाली अपनी जहाजी सेना से जब घेरा तब मानों एक नवप्रफुल्लित कमल की तरह घने बादलों की परतों में छिपा हुआ कृष्णनील समुद्र मानों आकाश के रूप में परिवर्तित हो गया और आकाश समुद्र की तरह दिखायी देने लगा । २९॥ {{right|-पुल्केसिन का [[ऐहोल शिलालेख]]<ref>{{Cite book|page=46-65|url=https://archive.org/details/vishuddhanad-pathak/page/n70/mode/1up|title=दक्षिण भारत का इतिहास (Vishuddhanad Pathak)|last=Vishuddhanad Pathak|date=2015}}</ref>}} }} मौर्यों ने कीर्त्तिवर्मन के आक्रमण को टाला और पुलकेशीन द्वितीय को पुरी को वश में करने के लिए एक विशाल सेना की आवश्यकता थी, यह बताता है कि चालुक्य विजय से पहले मौर्य एक दुर्जेय शक्ति थे। चालुक्य जागीरदार भोगशक्ति का 710 ईस्वी अभिलेख 14,000 गाँवों वाले "पुरी-कोंकण" देश पर उनके परिवार के शासन की पुष्टि करता है।{{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=12}} ==खानदेश के मौर्य== महाराष्ट्र राज्य के खानदेश जिले के वाघली से प्राप्त 1069 ई. के गोविंदराज के अभिलेख में मौर्य प्रमुख गोविंद या गोविंदराजा को प्रारंभिक यादव राजा सेउनाचंद्र द्वितीय के अधीनस्थ राजा के रूप में संदर्भित है। अभिलेख में बीस राजकुमारों या प्रमुखों का उल्लेख है जो मौर्य राजा गोविंदराज के पूर्ववर्ती थे, सबसे पहला सदस्य कीकट था। डी.सी. सरकार के अनुसार इन खानदेशी मौर्यों की मूल रूप से मौर्यों की राजधानी सौराष्ट्र के वल्लभी में थी।<ref>{{Cite book|page=418|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> [[File:Mudhai Devi temple at Waghali (Vaghli).jpg|thumb|खानदेश छेत्र के वाघली से गोविंदराज मौर्य का अभिलेख शिवमन्दिर से प्राप्त हुवा था।]] {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख, वाघली ''' |- |<gallery mode="packed" heights="150px"> File:StoneI Inscription of Govindraj, Vaghli.jpg </gallery> |} {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख का मूलपाठ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा '''एपिग्राफिया इंडिका वॉल्यूम २''' में प्रकाशित'''[https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.326023/page/225/mode/1up] |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 1.jpg| File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 2.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 3.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 4.jpg </gallery> |} ==मथुरा के मौर्य == [[दिंदिराज]] जिसे कर्क नामक कहा गया है, उससे सम्बन्धित एक अभिलेख उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से प्राप्त हुवा, जो 7वीं शताब्दी के बाद का है। इसमें मथुरा मौर्य वंश के चार सदस्यों का उल्लेख है - कृष्णराज उनके परिवार में, उनके पुत्र चंद्रगुप्त, आर्यराज और उनके पुत्र दिंदिराज ।<ref name="INSC">"Jhalarpatan inscription (AD 689) of Durgagana, the Kudarkot inscription of about the second half of the seventh century, the Nagar inscription (AD 684) of Dhanika, and the Kanaswa inscription (AD 738) of Sivagana." The inscription was composed "in adoration of a god whose epithets kal- anjana-rajah-punja-dyuti, (ma)havaraha-rupa and jangama have only been preserved". It leaves "no doubt that the reference is to the god Vishnu since the expression mahavaraha-rupa certainty speaks of the Boar incarnation of the deity." The hero of the prasasti is a king named Dindiraja of the Maurya dynasty.{{Cite book|page=80-81|url=http://archive.org/details/hindu-temples-vol.-ii-ed-sitaram-goel_202306|title=Hindu Temples Vol. II (Ed Sitaram Goel)|last=Ed Sitaram Goel|date=1993}}</ref><ref>{{Cite book|page=208-209|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.11070|title=Pracyavidya-Tarangini|last=D. C. Sircar|date=1969}}</ref>ऐसा प्रतीत होता है कि इस मौर्य शाखा के अंतिम नामित शासक ने कान्यकुब्ज (कन्नौज) शहर को जला दिया था और उसे विजित किया था। इस अभिलेख में वर्णित मौर्य राजाओं का उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों पर प्रभुत्व प्रतीत होता है। जैन परंपरा प्रचीन [[चंद्रगुप्त मौर्य]] के वंशज के रूप में कन्नौज के राजा यशोवर्मन (728-53 ई.) का प्रतिनिधित्व करती है। यह यशोवर्मन के कर्क-दिंडीराजा के साथ संबंधों का उल्लेख कर सकता है, जो संभवतः 7वीं शताब्दी के प्राचीन चंद्रगुप्त मौर्य शासक के वंशज थे ।<ref>{{Cite book|page=207-212|url=http://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3|title=Epigraphia indica (1957-1958)|publisher=The director general archaeological survey of india|others=Servants of Knowledge}}</ref> {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' अभिलेख ''' |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Fragmentary Inscription From Mathura 1.jpg|मथुरा मौर्य अभिलेख[https://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3/page/n303/mode/1up] File:Fragmentary Inscription From Mathura.jpg|मथुरा मौर्य अभिलेख का मूलपाठ [https://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3/page/n303/mode/1up] </gallery> |} ==पश्चिमी तट के मौर्य == पश्चिमी तट पर गोवा क्षेत्र में खोजे गए दो ताम्रपत्र अभिलेखों से [[चंद्रवर्मन मौर्य|चंद्रवर्मन]] और [[अनिर्जितवर्मन]] नामक दो राजाओं के अस्तित्व का पता चलता है, जो उनके शिलालेख के अनुसार मौर्य राजवंश के थे। चूँकि दोनों शिलालेख शासक राजाओं के शासनकाल के वर्षों में दिनांकित हैं, पुरालेखीय दृष्टिकोण से, उन्हें 6ठी या 7वीं शताब्दी ई. का माना जा सकता है, चंद्रवर्मन मौर्य का अभिलेख अनिरजितवर्मन मौर्य से थोड़ा पहले का है। ये दोनों शासक, जो अपने अभिलेखों में महाराजा का विशेषण धारण करते हैं। चंद्रवर्मन के अभिलेख में राजा द्वारा शिवपुरा में स्थित महाविहार को कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, जिसकी पहचान गोवा में चंदोर के पास इसी नाम के गांव से की जाती है। अनिर्जितवर्मन का अभिलेख में राजा द्वारा हस्त्यर्य नामक ब्राह्मण को दिए गए कुछ उपहारों का वर्णन करता है। यह कुमारद्वीप नामक स्थान से जारी किया गया है जो गोवा क्षेत्र में प्रतीत होता है। इन दो अभिलेखों से पता चलता है कि चंद्रवर्मन और अनिरजितवर्मन लगभग 6ठी-7वीं शताब्दी ईस्वी में गोवा क्षेत्र में शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|page=295|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> {| class="wikitable" style="font-size: 80%; width: 100%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' अभिलेख ''' |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Anirjitavarman Bandora Plate Edict.jpg|अनिर्जितवर्मन, बंडोरा का ताम्रपत्र अभिलेख[https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/315/mode/1up] File:Bandora Edict of Anirjitavarman.jpg|अनिर्जितवर्मन का ताम्रपत्र अभिलेख मूल पाठ्य [https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/316/mode/1up?q=Anirjitavarman] </gallery> |} ==राजस्थान क्षेत्र के मौर्य== राजा धवला या धवलात्मान शिलालेख" राजस्थान राज्य के पुराने कोटा में कनासवा से प्राप्त हुआ, मालव वर्ष (अर्थात विक्रम संवत) 795 या 738 ई. में दिनांकित, ब्राह्मण शिवगण को मौर्य वंश के राजा धवल के सामंत के रूप में संदर्भित करता है। डॉ. डी.सी. सरकार ने पुरापाषाणिक समानता और भौगोलिक निकटता के आधार पर सुझाव दिया है कि ऊपर उल्लिखित मथुरा क्षेत्र के मौर्य, मौर्य राजा धवल से परिवारिक रुप से जुड़े हो सकते हैं।<ref>{{Cite book|page=209|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.06115|title=Epigraphia Indica, Vol-32, Issue no.-1-42}}</ref>संभवत: इस मालवा क्षेत्र के मौर्य, जिनके बारे में नवसारी अभिलेख में कहा जाता है कि वे ताजिका (अर्थात् अरब) से पराजित हुए थे किंतु कुछ राजस्थानी लेखों के मुताबिक़ बप्पा रावल की सैन्य अगुवाई में मौर्यों की विजय हुई थी।<ref>{{Cite book|page=540|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.461080|title=The Dynastic History Of Northern India Vol. 2|last=Ray|first=H. C.|date=1935-11-18}}</ref> राजस्थान में उदयपुर से लगभग 8 मील पूर्व में डबोक से प्राप्त धवल के शिलालेख में धबगर्त के गुहिल प्रमुख धनिका और उनके स्वामी धवलप्पा देव(धवल) का उल्लेख है। भंडारकर के अनुसार इस अभिलेख के धवलप्पा की पहचान कनसवा शिलालेख में वर्णित मौर्य राजा धवलात्मन से है।<ref>{{Cite book|page=73|url=http://archive.org/details/dli.bengal.10689.16596|title=ANTIQUITIES OF INDIA|last=BARNETT|first=L. D.|date=1958|publisher=PUNTHI PUSTAK, CALCUTTA}}</ref> यह संभव है कि वे पश्चिमी तट क्षेत्र के मौर्यों से संबंधित थे और उन्होंने राजस्थान पर अपना आधिपत्य बढ़ाया होगा जो तब हर्ष (606-47 ई.) के प्रभुत्व का हिस्सा बना। जैसा कि डॉ. सरकार ने बताया,‌ दबोक अभिलेख की तारीख से पता चलता है कि हर्ष ने 647 ई. में अपनी मृत्यु से पहले राजस्थान के कुछ हिस्सों को खो दिया होगा, हालाँकि राजस्थान के मौर्य पहले भी उनके प्रति निष्ठा रखते होंगे।<ref name="INSCRI"> "The second inscription of Dhanıka, dated A.D. 725, was discovered at Dabok in Mewar .It mentions Śrī Dhanıka as ruling over DHAVALAGARTTA as a feudatory chief under paramabhattāraka-mahārājādhırājā paramēśvara-Śrī-DHAVALAPPADEVA According to Prof DR Bhandarkar, the paramount ruler mentioned in the record is the same as the king DHAVALA of the Maurya dynasty referred to in the Kansuvām inscription of AD 738" {{Cite book|294|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.48555|title=Bharata- Kaumudi Studies In Indology In Honur Of Dr Radha Kumud Mookerji Part-i|last=Mookerji|first=Radha Kumud|date=1945}}</ref><ref name="HAII"> "The Mauryas are referred to in a record at Jhalrapatan dated A.D. 690. Another record in Kotah State, dated A.D. 738-39, refers to the local prince as a friend of king Dhavala of Maurya lineage..As already noted above, the Mauryas fell a victim to the Arab aggression, and it was probably after this catastrophe that Bappa defeated them and took possession of Chitor." {{Cite book|page=162|url=http://archive.org/details/dli.ernet.505920|title=The Classical Age Vol-iii (1954)|last=Munshi K. M.|date=1954|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan.}}</ref> झालरपाटन (झालवाड़ जिला राजस्थान) शिलालेख दिनांक 689 ई. में दुर्गागण नामक एक मौर्य शासक का उल्लेख है।<ref name="DHAVAL"> "This inscription is dated in the 796th year of the Lords of Malava. It is probable that the Jhalrapathan inscription, which is dated in the 747th year of an unnamed era, is to be referred to the same method of computing time. The slight difference in the alphabet to which attention has been drawn is of the kind that might develop in the fifty years which, on this hypothesis, would separate the two. Neither the Sivagaņa of our inscription nor the Durgagana of the Jhalrapathan inscription is spoken of as a sovereign monarch: and when we find one spoken of as ruling at Kotah, under a Maurya Emperor, in the year 796 of the Lords of Malava, and the other referred to as ruler in the year 747, of a town only seventy miles to the south, which has always been very closely connected with Kotah, it seems natural to suppose that "Durgagana," and "Sivagana," are of the same stock. If this be so, it is to be noted that the want of any reference on the Jhalrâpâthan inscription speaks of an era which at the time had wide and undisputed currency. "{{Cite book|url=http://archive.org/details/auchityalamkara00petegoog|title=An inscription from Kotah; The Royal Asiatic society, with a preface in reply to Professor Bhandarkar|last=Peterson|first=Peter|date=1885|publisher=Bombay, Printed at the Education society's press, Byculla|others=University of California}}</ref> इसके अलावा, गुहिल परिवार के संस्थापक गुहिल या गुहदत्त के पुत्र बप्पा ने अपने चाचा को चित्तौड़ के मोरी (यानी मौर्य) शासक के रूप में जाना, जिनकी सेवा में वह पहले थे, उनका स्थान ले लिया।<ref>{{Cite book|page=23-30|url=http://archive.org/details/dli.bengal.10689.12693|title=MEDIEVAL STUDIES|last=BANERJEE|first=ANIL CHANDRA|date=1958|publisher=A. MUKHARJEE AND COMPANY , CALCUTTA}}</ref> ==इन्हे भी देखें== *[[गुप्तवंश (मागध अथवा मालव वंश)|पश्चवर्ती गुप्त राजवंश]] *[[कोंकण के मौर्य]] ==सन्दर्भ== ===ग्रंथ सूची=== * {{cite book |author=Durga Prasad Dikshit |title=Political History of the Chālukyas of Badami |url=https://books.google.com/books?id=lEB11tKmCgcC&pg=PA152 |year=1980 |publisher=Abhinav |oclc=8313041 }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=D.C. Sircar |author-link=Dineshchandra Sircar |title=A Note on the Goa Copper-plate Inscription of King Candravarman |journal=Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute |volume=23 |year=1942 |publisher=Bhandarkar Oriental Research Institute |pages=510–514 |jstor=44002592 }} * {{cite book |author=Charles D. Collins |title=The Iconography and Ritual of Śiva at Elephanta |year=1998 |publisher=State University of New York Press |isbn=9780791499535 |url=https://books.google.com/books?id=shgtik9gYnIC}} * {{cite book |editor=A.M. Shastri |editor-link=Ajay Mitra Shastri |title=Viśvambharā, Probings in Orientology: Prof. V.S. Pathak Festschrift |volume=1 |year=1995 |publisher=Harman |isbn=978-8185151762 |url=https://books.google.com/books?id=fQ0wAQAAIAAJ }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=S.J. Mangalam |title=Note on The Coins From Elephanta : Coins of The Konkan Mauryas? |journal=Bulletin of the Deccan College Post-Graduate and Research Institute |volume=53 |year=1993 |pages=237–241 |jstor=42936444 }} * {{cite book |author1=S.S. Rao |author2=A.S. Gaur |author3=Sila Tripathi |chapter=Exploration of an ancient port: Elephanta Island (Bombay) |editor1=A. V. Narasimha Murthy |editor2=C.T.M. Kotraiah |title=Hemakuta: Recent Researches in Archaology and Museology |year=2001 |publisher=Bharatiya Kala Prakashan |isbn=9788186050668 |url=https://books.google.com/books?id=2VWtcQAACAAJ |ref={{harvid|S.S. Rao et. al.|2001}} }} * {{cite book |author=V.T. Gune |chapter=Goa's Coastal and Overseas Trade from the Earliest Times till 1510 A.D. |editor=Teotonio R. De Souza |editor-link=Teotónio de Souza |title=Goa Through the Ages: An Economic History |volume=2 |year=1990 |publisher=Concept |isbn=9788170222590 }} {{refend}} ===सन्दर्भ=== [[श्रेणी:मौर्य शासक]] {{श्रेणी कम|date=जून 2024}} qtj95kys91px896io5xk3azq1rzsosv 6543703 6543702 2026-04-24T21:50:52Z ~2026-25274-43 921727 6543703 wikitext text/x-wiki [[मौर्य राजवंश]] की प्रारंभिक मध्यकालीन शाखाये दक्षिण कोंकण, खानदेश, गोवा, और मालवा, में मौजूद होने के पुरालेखीय प्रमाण मिले है।<ref>Epigraphia Indica, Volume XXXII, 1957-58, pp. 209-10</ref> पश्चिमी भारत और मगध में सामंत और छोटे मौर्य राजा मौर्य वंश का अंत होने के बाद भी शासन करते रहे। मौर्य वंश के मगध के राजा धवल का उल्लेख 738 ईस्वी के [[कंसवा अभिलेख]] में किया गया है। प्रोफेसर भंडारकर उनकी पहचान 725 ई. के डबोक (मेवाड़) शिलालेख में वर्णित धनिका के अधिपति धवलप्पदेव से करते हैं। प्रारंभिक अभिलेखों में कोंकण और खानदेश के मौर्य प्रमुखों का उल्लेख मिलता है। मगध के पूर्णवर्मन नाम के एक मौर्य राजकुमार का उल्लेख चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग]] ने किया है।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.10359|title=Political History of ancient India|last=Hemchandra Raychaudhuri|first=M. A.|date=1932|page=240}}</ref><ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55603|title=The Cambridge History Of India Vol.i|last=Rapson|first=E. J.|date=1935|page=513}}</ref> छठी सदी में कोलाबा के साथ उत्तरी कोंकण के पास नल मौर्य द्वारा शासन किया गया था। पांचवीं और छठी सदी के पत्थरों से पाया गया कि उत्तर कोंकण के थाना जिले में मौर्य राजा [[सुकेतुवर्मन]] शासन कर रहे थे। [[कोंकण]] को मौर्य परिवार के धारकों के पास सौंपा गया था।<ref name="HAI">"Konkan was given in charge of a Maurya family. A grant of the Maurya prince Suketuvarman, who ruled in this period, has been discovered in the Thānā district of North Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/jEqi_literay-and-historical-studies-in-indology-of-dr.-vasudev-vishnu-mirashi-mlbd-varanasi|page=128|title=Literay And Historical Studies In Indology Of Dr. Vasudev Vishnu Mirashi MLBD Varanasi|last=MLBD Varanasi}}</ref><ref name="CORPUS"> "A stone inscription from Vada in the north of the Thana District mentions a Maurya king named Suketuvarman ruling in Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ernet.367473|title=Corpus Inscriptionium Indicarum Vol Iv Part 1|page=75|last=Vasudev Vishnu Mirshi|date=1955|publisher=Government Epigraphist For India, Ootacamund|language=Multilingual}}</ref><ref name="INSCRIPTION"> "We have discussed above about the Saka era. From the point of view of its early history as well as for the history of the later Mauryas of Konkana the Vala (or Vada) inscription of Suketuvarman, dated Saka 322, is one of utmost importance. The inscription was actually found at the place of this name in the Thane District of Maharashtra though wrongly attributed to Vala in the Saurashtra region of Gujarat. It aims at registering the installation of the deity Koțiśvara by one Simhadatta, son of Anankiparadatta in the Saka year 322, and some grants to the divinity by one Isuprakki, the Vallabha-Talavara of the Maurya Dharma- mahārāja Suketuvarman of the Bhojas. The inscription adds one more name to the list of the Mauryas of Konkaņa." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.29982|page=32|title=puratattva: Bulletin of the Indian archaeological society number 25 1994-95|last=Dikshit|first=K. N.|date=1995|publisher=Indian Archaeological Society,New delhi}}</ref> मोरे, [[मराठा]], दक्षिण में एक बहुत ही सामान्य नाम है। इलेफंटा और करंजा में मोर के नाम के दो छोटे स्थल लिये जा सकते हैं, जो [[कोंकण]] में पूर्व में मौर्य शक्ति के अवशेष हो सकते हैं।<ref>https://gazetteers.maharashtra.gov.in/cultural.maharashtra.gov.in/english/gazetteer/KOLABA/his_early.html</ref>[[File:Hemchandra Raychaudhari, Prachin Bharat Ka Rajnitik Itiyash pg.323.jpg|thumb|[[हेमचंद्र रायचौधरी]] द्वारा निर्मित मौर्य वंशावली<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/hemchandra-raychaudhari|page=323|title=प्राचीन भारत का इतिहास|last=Hemchandra Raychaudhari}}</ref>]] ==कोंकण क्षेत्र के मौर्य== {{main|कोंकण के मौर्य}} सुकेतुवर्मन का नाम बम्बई के पास थाना के उत्तर में वाडा में पाए गए शिलालेख से जाना जाता है, लेकिन अब यह प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, बम्बई में संरक्षित है। शिलालेख, जो क्षतिग्रस्त है और लगभग चौथी या पाँचवीं शताब्दी के दक्षिणी लिपि में लिखा गया है और मौर्य वंश के सुकेतुवर्मन नामक राजा को संदर्भित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस अवधि के दौरान थाने के आसपास शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.07863|title=Central Provinces District Gazetteers: Nagpur District|page=65|last=N. V. SundaraRaman|first=Chairman|last2=P. Setu Madhava Rao|first2=Member|last3=V. B. Kolte|first3=Member|last4=C. D. Deshpande|first4=Member|last5=B. R. Rairikar|first5=Member|last6=Sarojini Babar|first6=Member|last7=V. T. Gune|first7=Member|last8=P. N. Chopra|first8=Member|last9=V. N. Gurav|first9=Member-Secretary|date=1908|publisher=Bombay, Times Press}}</ref> पुलकेशी द्वितीय ने मौर्य राजधानी पुरी को सफलतापूर्वक घेर लिया, जिससे उनके शासन का अंत हो गया।{{Sfn|Durga Prasad Dikshit|1980|p=77}} उनके ऐहोल शिलालेख में कहा गया है : {{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=11}} {{Quote box| कोंकणेषुयदादिष्ट चण्डदण्डाम्बुब्रीचिभिः । उदस्तरसा मौर्यपल्लवलाम्बुसमृद्धये ।।२० अपरजलेर्लक्ष्मी यस्मिन्पुरीपुर भृत्प्रभेः मद्गजघटाकारैर्ऋवां शतैरवमृदन्ति । जलदपटलानीक कीर्णम् नवोत्पलमेचकाञ्, जलनिधिरिव व्योम व्योम्नसमोभवदम्बुभिः धिः ।। २१ {{centre|'''हिंदी अनुवाद'''}} उसकी (पुलकेशी की) सेनाओं के आक्रमण के भीषण ज्वार में कोंकण देश के मौर्यो (मौर्य वंश के राजा) की छोटी-छोटी लहरें विलीन हो गयीं ।२०।। पुरंभेत्ता (इन्द्र) के वैभव वाले उस (पुलकेशी) ने पश्चिम पयोधि की लक्ष्मीरूपी पुरी (नामक) नगरी को मद्रस्रावी हाथियों की जमातं जैसी लगने वाली अपनी जहाजी सेना से जब घेरा तब मानों एक नवप्रफुल्लित कमल की तरह घने बादलों की परतों में छिपा हुआ कृष्णनील समुद्र मानों आकाश के रूप में परिवर्तित हो गया और आकाश समुद्र की तरह दिखायी देने लगा । २९॥ {{right|-पुल्केसिन का [[ऐहोल शिलालेख]]<ref>{{Cite book|page=46-65|url=https://archive.org/details/vishuddhanad-pathak/page/n70/mode/1up|title=दक्षिण भारत का इतिहास (Vishuddhanad Pathak)|last=Vishuddhanad Pathak|date=2015}}</ref>}} }} मौर्यों ने कीर्त्तिवर्मन के आक्रमण को टाला और पुलकेशीन द्वितीय को पुरी को वश में करने के लिए एक विशाल सेना की आवश्यकता थी, यह बताता है कि चालुक्य विजय से पहले मौर्य एक दुर्जेय शक्ति थे। चालुक्य जागीरदार भोगशक्ति का 710 ईस्वी अभिलेख 14,000 गाँवों वाले "पुरी-कोंकण" देश पर उनके परिवार के शासन की पुष्टि करता है।{{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=12}} ==खानदेश के मौर्य== महाराष्ट्र राज्य के खानदेश जिले के वाघली से प्राप्त 1069 ई. के गोविंदराज के अभिलेख में मौर्य प्रमुख गोविंद या गोविंदराजा को प्रारंभिक यादव राजा सेउनाचंद्र द्वितीय के अधीनस्थ राजा के रूप में संदर्भित है। अभिलेख में बीस राजकुमारों या प्रमुखों का उल्लेख है जो मौर्य राजा गोविंदराज के पूर्ववर्ती थे, सबसे पहला सदस्य कीकट था। डी.सी. सरकार के अनुसार इन खानदेशी मौर्यों की मूल रूप से मौर्यों की राजधानी सौराष्ट्र के वल्लभी में थी।<ref>{{Cite book|page=418|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> [[File:Mudhai Devi temple at Waghali (Vaghli).jpg|thumb|खानदेश छेत्र के वाघली से गोविंदराज मौर्य का अभिलेख शिवमन्दिर से प्राप्त हुवा था।]] {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख, वाघली ''' |- |<gallery mode="packed" heights="150px"> File:StoneI Inscription of Govindraj, Vaghli.jpg </gallery> |} {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख का मूलपाठ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा '''एपिग्राफिया इंडिका वॉल्यूम २''' में प्रकाशित'''[https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.326023/page/225/mode/1up] |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 1.jpg| File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 2.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 3.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 4.jpg </gallery> |} ==पश्चिमी तट के मौर्य == पश्चिमी तट पर गोवा क्षेत्र में खोजे गए दो ताम्रपत्र अभिलेखों से [[चंद्रवर्मन मौर्य|चंद्रवर्मन]] और [[अनिर्जितवर्मन]] नामक दो राजाओं के अस्तित्व का पता चलता है, जो उनके शिलालेख के अनुसार मौर्य राजवंश के थे। चूँकि दोनों शिलालेख शासक राजाओं के शासनकाल के वर्षों में दिनांकित हैं, पुरालेखीय दृष्टिकोण से, उन्हें 6ठी या 7वीं शताब्दी ई. का माना जा सकता है, चंद्रवर्मन मौर्य का अभिलेख अनिरजितवर्मन मौर्य से थोड़ा पहले का है। ये दोनों शासक, जो अपने अभिलेखों में महाराजा का विशेषण धारण करते हैं। चंद्रवर्मन के अभिलेख में राजा द्वारा शिवपुरा में स्थित महाविहार को कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, जिसकी पहचान गोवा में चंदोर के पास इसी नाम के गांव से की जाती है। अनिर्जितवर्मन का अभिलेख में राजा द्वारा हस्त्यर्य नामक ब्राह्मण को दिए गए कुछ उपहारों का वर्णन करता है। यह कुमारद्वीप नामक स्थान से जारी किया गया है जो गोवा क्षेत्र में प्रतीत होता है। इन दो अभिलेखों से पता चलता है कि चंद्रवर्मन और अनिरजितवर्मन लगभग 6ठी-7वीं शताब्दी ईस्वी में गोवा क्षेत्र में शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|page=295|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> {| class="wikitable" style="font-size: 80%; width: 100%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' अभिलेख ''' |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Anirjitavarman Bandora Plate Edict.jpg|अनिर्जितवर्मन, बंडोरा का ताम्रपत्र अभिलेख[https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/315/mode/1up] File:Bandora Edict of Anirjitavarman.jpg|अनिर्जितवर्मन का ताम्रपत्र अभिलेख मूल पाठ्य [https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/316/mode/1up?q=Anirjitavarman] </gallery> |} ==इन्हे भी देखें== *[[गुप्तवंश (मागध अथवा मालव वंश)|पश्चवर्ती गुप्त राजवंश]] *[[कोंकण के मौर्य]] ==सन्दर्भ== ===ग्रंथ सूची=== * {{cite book |author=Durga Prasad Dikshit |title=Political History of the Chālukyas of Badami |url=https://books.google.com/books?id=lEB11tKmCgcC&pg=PA152 |year=1980 |publisher=Abhinav |oclc=8313041 }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=D.C. Sircar |author-link=Dineshchandra Sircar |title=A Note on the Goa Copper-plate Inscription of King Candravarman |journal=Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute |volume=23 |year=1942 |publisher=Bhandarkar Oriental Research Institute |pages=510–514 |jstor=44002592 }} * {{cite book |author=Charles D. Collins |title=The Iconography and Ritual of Śiva at Elephanta |year=1998 |publisher=State University of New York Press |isbn=9780791499535 |url=https://books.google.com/books?id=shgtik9gYnIC}} * {{cite book |editor=A.M. Shastri |editor-link=Ajay Mitra Shastri |title=Viśvambharā, Probings in Orientology: Prof. V.S. Pathak Festschrift |volume=1 |year=1995 |publisher=Harman |isbn=978-8185151762 |url=https://books.google.com/books?id=fQ0wAQAAIAAJ }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=S.J. Mangalam |title=Note on The Coins From Elephanta : Coins of The Konkan Mauryas? |journal=Bulletin of the Deccan College Post-Graduate and Research Institute |volume=53 |year=1993 |pages=237–241 |jstor=42936444 }} * {{cite book |author1=S.S. Rao |author2=A.S. Gaur |author3=Sila Tripathi |chapter=Exploration of an ancient port: Elephanta Island (Bombay) |editor1=A. V. Narasimha Murthy |editor2=C.T.M. Kotraiah |title=Hemakuta: Recent Researches in Archaology and Museology |year=2001 |publisher=Bharatiya Kala Prakashan |isbn=9788186050668 |url=https://books.google.com/books?id=2VWtcQAACAAJ |ref={{harvid|S.S. Rao et. al.|2001}} }} * {{cite book |author=V.T. Gune |chapter=Goa's Coastal and Overseas Trade from the Earliest Times till 1510 A.D. |editor=Teotonio R. De Souza |editor-link=Teotónio de Souza |title=Goa Through the Ages: An Economic History |volume=2 |year=1990 |publisher=Concept |isbn=9788170222590 }} {{refend}} ===सन्दर्भ=== [[श्रेणी:मौर्य शासक]] {{श्रेणी कम|date=जून 2024}} 1le0n63xdgi13oscz6jsjaeucg5dint 6543818 6543703 2026-04-25T10:35:17Z ~2026-25392-25 921796 6543818 wikitext text/x-wiki [[राजतरंगिणी]] में [[जलौक]] को [[ सम्राट अशोक]] के कश्मीर के उत्तराधिकारी के रूप में उल्लेखित किया गया है, जबकि [[तारानाथ]] अन्य उत्तराधिकारी वीरसेन का उल्लेख करते हैं जो गंधार में शासन करते थे और वे डॉ. थॉमस के अनुसार, मगध के मौर्य [[सुभगसेन]] के पूर्वज थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.10359|title=Political History of ancient India|last=Hemchandra Raychaudhuri|first=M. A.|date=1932|page=238}}</ref> मौर्य राजवंश की 6 प्रारंभिक मध्यकालीन शाखा कोंकण, खानदेश, गोवा, मालवा, मथुरा और राजस्थान में मौजूद होने के पुरालेखीय प्रमाण मिले है।<ref>Epigraphia Indica, Volume XXXII, 1957-58, pp. 209-10</ref> पश्चिमी भारत और मगध में सामंत और छोटे मौर्य राजा मौर्य वंश का अंत होने के बाद भी शासन करते रहे। मौर्य वंश के मगध के राजा धवल का उल्लेख 738 ईस्वी के [[कंसवा अभिलेख]] में किया गया है। प्रोफेसर भंडारकर उनकी पहचान 725 ई. के डबोक (मेवाड़) शिलालेख में वर्णित धनिका के अधिपति धवलप्पदेव से करते हैं। प्रारंभिक अभिलेखों में कोंकण और खानदेश के मौर्य प्रमुखों का उल्लेख मिलता है। मगध के पूर्णवर्मन नाम के एक मौर्य राजकुमार का उल्लेख चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग]] ने किया है। इसके अलावा उन्होंने कर्णसुवर्ण (बंगाल) के नरेंद्रगुप्त नामक मौर्य शासक का भी उल्लेख किया है।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.10359|title=Political History of ancient India|last=Hemchandra Raychaudhuri|first=M. A.|date=1932|page=240}}</ref><ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55603|title=The Cambridge History Of India Vol.i|last=Rapson|first=E. J.|date=1935|page=513}}</ref> छठी सदी में कोलाबा के साथ उत्तरी कोंकण के पास नल मौर्य द्वारा शासन किया गया था। पांचवीं और छठी सदी के पत्थरों से पाया गया कि उत्तर कोंकण के थाना जिले में मौर्य राजा [[सुकेतुवर्मन]] शासन कर रहे थे। [[कोंकण]] को मौर्य परिवार के धारकों के पास सौंपा गया था।<ref name="HAI">"Konkan was given in charge of a Maurya family. A grant of the Maurya prince Suketuvarman, who ruled in this period, has been discovered in the Thānā district of North Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/jEqi_literay-and-historical-studies-in-indology-of-dr.-vasudev-vishnu-mirashi-mlbd-varanasi|page=128|title=Literay And Historical Studies In Indology Of Dr. Vasudev Vishnu Mirashi MLBD Varanasi|last=MLBD Varanasi}}</ref><ref name="CORPUS"> "A stone inscription from Vada in the north of the Thana District mentions a Maurya king named Suketuvarman ruling in Konkan." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ernet.367473|title=Corpus Inscriptionium Indicarum Vol Iv Part 1|page=75|last=Vasudev Vishnu Mirshi|date=1955|publisher=Government Epigraphist For India, Ootacamund|language=Multilingual}}</ref><ref name="INSCRIPTION"> "We have discussed above about the Saka era. From the point of view of its early history as well as for the history of the later Mauryas of Konkana the Vala (or Vada) inscription of Suketuvarman, dated Saka 322, is one of utmost importance. The inscription was actually found at the place of this name in the Thane District of Maharashtra though wrongly attributed to Vala in the Saurashtra region of Gujarat. It aims at registering the installation of the deity Koțiśvara by one Simhadatta, son of Anankiparadatta in the Saka year 322, and some grants to the divinity by one Isuprakki, the Vallabha-Talavara of the Maurya Dharma- mahārāja Suketuvarman of the Bhojas. The inscription adds one more name to the list of the Mauryas of Konkaņa." {{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.29982|page=32|title=puratattva: Bulletin of the Indian archaeological society number 25 1994-95|last=Dikshit|first=K. N.|date=1995|publisher=Indian Archaeological Society,New delhi}}</ref> मोरे, [[मराठा]] और कोलाबा के भूमिका में एक बहुत ही सामान्य नाम है। इलेफंटा और करंजा में मोर के नाम के दो छोटे स्थल लिये जा सकते हैं, जो [[कोंकण]] में पूर्व में मौर्य शक्ति के अवशेष हो सकते हैं।<ref>https://gazetteers.maharashtra.gov.in/cultural.maharashtra.gov.in/english/gazetteer/KOLABA/his_early.html</ref> कलाचूरी राजा [[कृष्णराज]] के सिक्के मुंबई के द्वीप में पाए गए हैं। लेकिन यह देश सीधे कलाचूरियों द्वारा प्रशासित नहीं था। उन्होंने इसे मौर्यों के एक उपनिवेशित परिवार को दिया। दाबोक (मेवाड़) के अभिलेख में 738-39 ई. के मौर्य राजा धवलप्प का उल्लेख किया गया है, जो कि चित्तौड़गढ़ के किले पर शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/ancient-history-of-maharashtra_202110|title=Ancient History of Maharashtra|page=140|last=Maharashtra State Gazetteers|date=1967}}</ref> [[File:Hemchandra Raychaudhari, Prachin Bharat Ka Rajnitik Itiyash pg.323.jpg|thumb|[[हेमचंद्र रायचौधरी]] द्वारा निर्मित मौर्य वंशावली<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/hemchandra-raychaudhari|page=323|title=प्राचीन भारत का इतिहास|last=Hemchandra Raychaudhari}}</ref>]] ==कोंकण क्षेत्र के मौर्य== {{main|कोंकण के मौर्य}} सुकेतुवर्मन का नाम बम्बई के पास थाना के उत्तर में वाडा में पाए गए शिलालेख से जाना जाता है, लेकिन अब यह प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, बम्बई में संरक्षित है। शिलालेख, जो क्षतिग्रस्त है और लगभग चौथी या पाँचवीं शताब्दी के दक्षिणी लिपि में लिखा गया है और मौर्य वंश के सुकेतुवर्मन नामक राजा को संदर्भित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस अवधि के दौरान थाने के आसपास शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/dli.ministry.07863|title=Central Provinces District Gazetteers: Nagpur District|page=65|last=N. V. SundaraRaman|first=Chairman|last2=P. Setu Madhava Rao|first2=Member|last3=V. B. Kolte|first3=Member|last4=C. D. Deshpande|first4=Member|last5=B. R. Rairikar|first5=Member|last6=Sarojini Babar|first6=Member|last7=V. T. Gune|first7=Member|last8=P. N. Chopra|first8=Member|last9=V. N. Gurav|first9=Member-Secretary|date=1908|publisher=Bombay, Times Press}}</ref> पुलकेशी द्वितीय ने मौर्य राजधानी पुरी को सफलतापूर्वक घेर लिया, जिससे उनके शासन का अंत हो गया।{{Sfn|Durga Prasad Dikshit|1980|p=77}} उनके ऐहोल शिलालेख में कहा गया है : {{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=11}} {{Quote box| कोंकणेषुयदादिष्ट चण्डदण्डाम्बुब्रीचिभिः । उदस्तरसा मौर्यपल्लवलाम्बुसमृद्धये ।।२० अपरजलेर्लक्ष्मी यस्मिन्पुरीपुर भृत्प्रभेः मद्गजघटाकारैर्ऋवां शतैरवमृदन्ति । जलदपटलानीक कीर्णम् नवोत्पलमेचकाञ्, जलनिधिरिव व्योम व्योम्नसमोभवदम्बुभिः धिः ।। २१ {{centre|'''हिंदी अनुवाद'''}} उसकी (पुलकेशी की) सेनाओं के आक्रमण के भीषण ज्वार में कोंकण देश के मौर्यो (मौर्य वंश के राजा) की छोटी-छोटी लहरें विलीन हो गयीं ।२०।। पुरंभेत्ता (इन्द्र) के वैभव वाले उस (पुलकेशी) ने पश्चिम पयोधि की लक्ष्मीरूपी पुरी (नामक) नगरी को मद्रस्रावी हाथियों की जमातं जैसी लगने वाली अपनी जहाजी सेना से जब घेरा तब मानों एक नवप्रफुल्लित कमल की तरह घने बादलों की परतों में छिपा हुआ कृष्णनील समुद्र मानों आकाश के रूप में परिवर्तित हो गया और आकाश समुद्र की तरह दिखायी देने लगा । २९॥ {{right|-पुल्केसिन का [[ऐहोल शिलालेख]]<ref>{{Cite book|page=46-65|url=https://archive.org/details/vishuddhanad-pathak/page/n70/mode/1up|title=दक्षिण भारत का इतिहास (Vishuddhanad Pathak)|last=Vishuddhanad Pathak|date=2015}}</ref>}} }} मौर्यों ने कीर्त्तिवर्मन के आक्रमण को टाला और पुलकेशीन द्वितीय को पुरी को वश में करने के लिए एक विशाल सेना की आवश्यकता थी, यह बताता है कि चालुक्य विजय से पहले मौर्य एक दुर्जेय शक्ति थे। चालुक्य जागीरदार भोगशक्ति का 710 ईस्वी अभिलेख 14,000 गाँवों वाले "पुरी-कोंकण" देश पर उनके परिवार के शासन की पुष्टि करता है।{{Sfn|Charles D. Collins|1998|p=12}} ==खानदेश के मौर्य== महाराष्ट्र राज्य के खानदेश जिले के वाघली से प्राप्त 1069 ई. के गोविंदराज के अभिलेख में मौर्य प्रमुख गोविंद या गोविंदराजा को प्रारंभिक यादव राजा सेउनाचंद्र द्वितीय के अधीनस्थ राजा के रूप में संदर्भित है। अभिलेख में बीस राजकुमारों या प्रमुखों का उल्लेख है जो मौर्य राजा गोविंदराज के पूर्ववर्ती थे, सबसे पहला सदस्य कीकट था। डी.सी. सरकार के अनुसार इन खानदेशी मौर्यों की मूल रूप से मौर्यों की राजधानी सौराष्ट्र के वल्लभी में थी।<ref>{{Cite book|page=418|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> [[File:Mudhai Devi temple at Waghali (Vaghli).jpg|thumb|खानदेश छेत्र के वाघली से गोविंदराज मौर्य का अभिलेख शिवमन्दिर से प्राप्त हुवा था।]] {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख, वाघली ''' |- |<gallery mode="packed" heights="150px"> File:StoneI Inscription of Govindraj, Vaghli.jpg </gallery> |} {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' गोविंदराज का मूल शिलालेख का मूलपाठ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा '''एपिग्राफिया इंडिका वॉल्यूम २''' में प्रकाशित'''[https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.326023/page/225/mode/1up] |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 1.jpg| File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 2.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 3.jpg File:Govindraaja Edict of Vaghli , Khandesh 4.jpg </gallery> |} ==मथुरा के मौर्य == [[दिंदिराज]] जिसे कर्क नामक कहा गया है, उससे सम्बन्धित एक अभिलेख उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से प्राप्त हुवा, जो 7वीं शताब्दी के बाद का है। इसमें मथुरा मौर्य वंश के चार सदस्यों का उल्लेख है - कृष्णराज उनके परिवार में, उनके पुत्र चंद्रगुप्त, आर्यराज और उनके पुत्र दिंदिराज ।<ref name="INSC">"Jhalarpatan inscription (AD 689) of Durgagana, the Kudarkot inscription of about the second half of the seventh century, the Nagar inscription (AD 684) of Dhanika, and the Kanaswa inscription (AD 738) of Sivagana." The inscription was composed "in adoration of a god whose epithets kal- anjana-rajah-punja-dyuti, (ma)havaraha-rupa and jangama have only been preserved". It leaves "no doubt that the reference is to the god Vishnu since the expression mahavaraha-rupa certainty speaks of the Boar incarnation of the deity." The hero of the prasasti is a king named Dindiraja of the Maurya dynasty.{{Cite book|page=80-81|url=http://archive.org/details/hindu-temples-vol.-ii-ed-sitaram-goel_202306|title=Hindu Temples Vol. II (Ed Sitaram Goel)|last=Ed Sitaram Goel|date=1993}}</ref><ref>{{Cite book|page=208-209|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.11070|title=Pracyavidya-Tarangini|last=D. C. Sircar|date=1969}}</ref>ऐसा प्रतीत होता है कि इस मौर्य शाखा के अंतिम नामित शासक ने कान्यकुब्ज (कन्नौज) शहर को जला दिया था और उसे विजित किया था। इस अभिलेख में वर्णित मौर्य राजाओं का उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों पर प्रभुत्व प्रतीत होता है। जैन परंपरा प्रचीन [[चंद्रगुप्त मौर्य]] के वंशज के रूप में कन्नौज के राजा यशोवर्मन (728-53 ई.) का प्रतिनिधित्व करती है। यह यशोवर्मन के कर्क-दिंडीराजा के साथ संबंधों का उल्लेख कर सकता है, जो संभवतः 7वीं शताब्दी के प्राचीन चंद्रगुप्त मौर्य शासक के वंशज थे ।<ref>{{Cite book|page=207-212|url=http://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3|title=Epigraphia indica (1957-1958)|publisher=The director general archaeological survey of india|others=Servants of Knowledge}}</ref> {| class="wikitable" style="font-size: 100%; width: 80%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' अभिलेख ''' |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Fragmentary Inscription From Mathura 1.jpg|मथुरा मौर्य अभिलेख[https://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3/page/n303/mode/1up] File:Fragmentary Inscription From Mathura.jpg|मथुरा मौर्य अभिलेख का मूलपाठ [https://archive.org/details/bmshri.epigraphiaindica0000unse_z3v3/page/n303/mode/1up] </gallery> |} ==पश्चिमी तट के मौर्य == पश्चिमी तट पर गोवा क्षेत्र में खोजे गए दो ताम्रपत्र अभिलेखों से [[चंद्रवर्मन मौर्य|चंद्रवर्मन]] और [[अनिर्जितवर्मन]] नामक दो राजाओं के अस्तित्व का पता चलता है, जो उनके शिलालेख के अनुसार मौर्य राजवंश के थे। चूँकि दोनों शिलालेख शासक राजाओं के शासनकाल के वर्षों में दिनांकित हैं, पुरालेखीय दृष्टिकोण से, उन्हें 6ठी या 7वीं शताब्दी ई. का माना जा सकता है, चंद्रवर्मन मौर्य का अभिलेख अनिरजितवर्मन मौर्य से थोड़ा पहले का है। ये दोनों शासक, जो अपने अभिलेखों में महाराजा का विशेषण धारण करते हैं। चंद्रवर्मन के अभिलेख में राजा द्वारा शिवपुरा में स्थित महाविहार को कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, जिसकी पहचान गोवा में चंदोर के पास इसी नाम के गांव से की जाती है। अनिर्जितवर्मन का अभिलेख में राजा द्वारा हस्त्यर्य नामक ब्राह्मण को दिए गए कुछ उपहारों का वर्णन करता है। यह कुमारद्वीप नामक स्थान से जारी किया गया है जो गोवा क्षेत्र में प्रतीत होता है। इन दो अभिलेखों से पता चलता है कि चंद्रवर्मन और अनिरजितवर्मन लगभग 6ठी-7वीं शताब्दी ईस्वी में गोवा क्षेत्र में शासन कर रहे थे।<ref>{{Cite book|page=295|url=http://archive.org/details/epigraphia-indica|title=epigraphia-indica}}</ref> {| class="wikitable" style="font-size: 80%; width: 100%;" align="center" cellpadding="3" colspan="1" | colspan="1" align="center" style="background:#F4A460; font-size: 100%;" |''' अभिलेख ''' |- |<gallery mode="packed" heights="250px"> File:Anirjitavarman Bandora Plate Edict.jpg|अनिर्जितवर्मन, बंडोरा का ताम्रपत्र अभिलेख[https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/315/mode/1up] File:Bandora Edict of Anirjitavarman.jpg|अनिर्जितवर्मन का ताम्रपत्र अभिलेख मूल पाठ्य [https://archive.org/details/dli.calcutta.06116/page/316/mode/1up?q=Anirjitavarman] </gallery> |} ==राजस्थान क्षेत्र के मौर्य== राजा धवला या धवलात्मान शिलालेख" राजस्थान राज्य के पुराने कोटा में कनासवा से प्राप्त हुआ, मालव वर्ष (अर्थात विक्रम संवत) 795 या 738 ई. में दिनांकित, ब्राह्मण शिवगण को मौर्य वंश के राजा धवल के सामंत के रूप में संदर्भित करता है। डॉ. डी.सी. सरकार ने पुरापाषाणिक समानता और भौगोलिक निकटता के आधार पर सुझाव दिया है कि ऊपर उल्लिखित मथुरा क्षेत्र के मौर्य, मौर्य राजा धवल से परिवारिक रुप से जुड़े हो सकते हैं।<ref>{{Cite book|page=209|url=http://archive.org/details/dli.calcutta.06115|title=Epigraphia Indica, Vol-32, Issue no.-1-42}}</ref>संभवत: इस मालवा क्षेत्र के मौर्य, जिनके बारे में नवसारी अभिलेख में कहा जाता है कि वे ताजिका (अर्थात् अरब) से पराजित हुए थे किंतु कुछ राजस्थानी लेखों के मुताबिक़ बप्पा रावल की सैन्य अगुवाई में मौर्यों की विजय हुई थी।<ref>{{Cite book|page=540|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.461080|title=The Dynastic History Of Northern India Vol. 2|last=Ray|first=H. C.|date=1935-11-18}}</ref> राजस्थान में उदयपुर से लगभग 8 मील पूर्व में डबोक से प्राप्त धवल के शिलालेख में धबगर्त के गुहिल प्रमुख धनिका और उनके स्वामी धवलप्पा देव(धवल) का उल्लेख है। भंडारकर के अनुसार इस अभिलेख के धवलप्पा की पहचान कनसवा शिलालेख में वर्णित मौर्य राजा धवलात्मन से है।<ref>{{Cite book|page=73|url=http://archive.org/details/dli.bengal.10689.16596|title=ANTIQUITIES OF INDIA|last=BARNETT|first=L. D.|date=1958|publisher=PUNTHI PUSTAK, CALCUTTA}}</ref> यह संभव है कि वे पश्चिमी तट क्षेत्र के मौर्यों से संबंधित थे और उन्होंने राजस्थान पर अपना आधिपत्य बढ़ाया होगा जो तब हर्ष (606-47 ई.) के प्रभुत्व का हिस्सा बना। जैसा कि डॉ. सरकार ने बताया,‌ दबोक अभिलेख की तारीख से पता चलता है कि हर्ष ने 647 ई. में अपनी मृत्यु से पहले राजस्थान के कुछ हिस्सों को खो दिया होगा, हालाँकि राजस्थान के मौर्य पहले भी उनके प्रति निष्ठा रखते होंगे।<ref name="INSCRI"> "The second inscription of Dhanıka, dated A.D. 725, was discovered at Dabok in Mewar .It mentions Śrī Dhanıka as ruling over DHAVALAGARTTA as a feudatory chief under paramabhattāraka-mahārājādhırājā paramēśvara-Śrī-DHAVALAPPADEVA According to Prof DR Bhandarkar, the paramount ruler mentioned in the record is the same as the king DHAVALA of the Maurya dynasty referred to in the Kansuvām inscription of AD 738" {{Cite book|294|url=http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.48555|title=Bharata- Kaumudi Studies In Indology In Honur Of Dr Radha Kumud Mookerji Part-i|last=Mookerji|first=Radha Kumud|date=1945}}</ref><ref name="HAII"> "The Mauryas are referred to in a record at Jhalrapatan dated A.D. 690. Another record in Kotah State, dated A.D. 738-39, refers to the local prince as a friend of king Dhavala of Maurya lineage..As already noted above, the Mauryas fell a victim to the Arab aggression, and it was probably after this catastrophe that Bappa defeated them and took possession of Chitor." {{Cite book|page=162|url=http://archive.org/details/dli.ernet.505920|title=The Classical Age Vol-iii (1954)|last=Munshi K. M.|date=1954|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan.}}</ref> झालरपाटन (झालवाड़ जिला राजस्थान) शिलालेख दिनांक 689 ई. में दुर्गागण नामक एक मौर्य शासक का उल्लेख है।<ref name="DHAVAL"> "This inscription is dated in the 796th year of the Lords of Malava. It is probable that the Jhalrapathan inscription, which is dated in the 747th year of an unnamed era, is to be referred to the same method of computing time. The slight difference in the alphabet to which attention has been drawn is of the kind that might develop in the fifty years which, on this hypothesis, would separate the two. Neither the Sivagaņa of our inscription nor the Durgagana of the Jhalrapathan inscription is spoken of as a sovereign monarch: and when we find one spoken of as ruling at Kotah, under a Maurya Emperor, in the year 796 of the Lords of Malava, and the other referred to as ruler in the year 747, of a town only seventy miles to the south, which has always been very closely connected with Kotah, it seems natural to suppose that "Durgagana," and "Sivagana," are of the same stock. If this be so, it is to be noted that the want of any reference on the Jhalrâpâthan inscription speaks of an era which at the time had wide and undisputed currency. "{{Cite book|url=http://archive.org/details/auchityalamkara00petegoog|title=An inscription from Kotah; The Royal Asiatic society, with a preface in reply to Professor Bhandarkar|last=Peterson|first=Peter|date=1885|publisher=Bombay, Printed at the Education society's press, Byculla|others=University of California}}</ref> इसके अलावा, गुहिल परिवार के संस्थापक गुहिल या गुहदत्त के पुत्र बप्पा ने अपने चाचा को चित्तौड़ के मोरी (यानी मौर्य) शासक के रूप में जाना, जिनकी सेवा में वह पहले थे, उनका स्थान ले लिया।<ref>{{Cite book|page=23-30|url=http://archive.org/details/dli.bengal.10689.12693|title=MEDIEVAL STUDIES|last=BANERJEE|first=ANIL CHANDRA|date=1958|publisher=A. MUKHARJEE AND COMPANY , CALCUTTA}}</ref> ==इन्हे भी देखें== *[[गुप्तवंश (मागध अथवा मालव वंश)|पश्चवर्ती गुप्त राजवंश]] *[[कोंकण के मौर्य]] ==सन्दर्भ== ===ग्रंथ सूची=== * {{cite book |author=Durga Prasad Dikshit |title=Political History of the Chālukyas of Badami |url=https://books.google.com/books?id=lEB11tKmCgcC&pg=PA152 |year=1980 |publisher=Abhinav |oclc=8313041 }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=D.C. Sircar |author-link=Dineshchandra Sircar |title=A Note on the Goa Copper-plate Inscription of King Candravarman |journal=Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute |volume=23 |year=1942 |publisher=Bhandarkar Oriental Research Institute |pages=510–514 |jstor=44002592 }} * {{cite book |author=Charles D. Collins |title=The Iconography and Ritual of Śiva at Elephanta |year=1998 |publisher=State University of New York Press |isbn=9780791499535 |url=https://books.google.com/books?id=shgtik9gYnIC}} * {{cite book |editor=A.M. Shastri |editor-link=Ajay Mitra Shastri |title=Viśvambharā, Probings in Orientology: Prof. V.S. Pathak Festschrift |volume=1 |year=1995 |publisher=Harman |isbn=978-8185151762 |url=https://books.google.com/books?id=fQ0wAQAAIAAJ }} * {{cite journal |author1=N. Shyam Bhat |author2=Nagendra Rao |title=History of Goa with Special Reference to its Feudal Features |journal=Indian Historical Review |volume=40 |issue=2 |year=2013 |doi=10.1177/0376983613499680 }} * {{cite journal |author=S.J. Mangalam |title=Note on The Coins From Elephanta : Coins of The Konkan Mauryas? |journal=Bulletin of the Deccan College Post-Graduate and Research Institute |volume=53 |year=1993 |pages=237–241 |jstor=42936444 }} * {{cite book |author1=S.S. Rao |author2=A.S. Gaur |author3=Sila Tripathi |chapter=Exploration of an ancient port: Elephanta Island (Bombay) |editor1=A. V. Narasimha Murthy |editor2=C.T.M. Kotraiah |title=Hemakuta: Recent Researches in Archaology and Museology |year=2001 |publisher=Bharatiya Kala Prakashan |isbn=9788186050668 |url=https://books.google.com/books?id=2VWtcQAACAAJ |ref={{harvid|S.S. Rao et. al.|2001}} }} * {{cite book |author=V.T. Gune |chapter=Goa's Coastal and Overseas Trade from the Earliest Times till 1510 A.D. |editor=Teotonio R. De Souza |editor-link=Teotónio de Souza |title=Goa Through the Ages: An Economic History |volume=2 |year=1990 |publisher=Concept |isbn=9788170222590 }} {{refend}} ===सन्दर्भ=== [[श्रेणी:मौर्य शासक]] {{श्रेणी कम|date=जून 2024}} 97ibv4bqs783uoi7acm2lmvoazrv6f2 कोलकाता में दुर्गा पूजा 0 1532114 6543763 6128492 2026-04-25T05:41:37Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543763 wikitext text/x-wiki  {{Infobox intangible heritage|Image=বাগবাজার সার্বজনীন দুর্গোৎসব ২০১৮.jpg|Caption=दुर्गा पूजा [[बागबाज़ार]], [[कोलकाता]] में|ICH=कोलकाता में दुर्गा पूजा|State Party=भारत|Domains=|Criteria=|ID=703|Region=APA|Year=२०२१|Session=१६वीं|List=|Link=https://ich.unesco.org/en/RL/durga-puja-in-kolkata-00703|Below=[[File:Unesco Cultural Heritage logo.svg|100px]]|Note='''Certificate''' : [https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRfgkKW1unvT68OavZeDRzmImm966MSu6NDeA&usqp=CAU direct link]}} '''[[दुर्गा पूजा]]''' [[हिन्दू]] देवी माँ [[दुर्गा]] की पूजा के रूप में भव्य रूप से मनाया जाने वाला एक वार्षिक त्यौहार है।<ref>{{Cite web|url=https://www.learnreligions.com/goddess-durga-1770363|title=The Goddess Durga: The Mother of the Hindu Universe|website=www.learnreligions.com|publisher=Learn Religions|access-date=9 October 2022|archive-date=13 मई 2025|archive-url=https://web.archive.org/web/20250513160823/https://www.learnreligions.com/goddess-durga-1770363|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.worldhistory.org/Devi/|title=Devi|website=www.worldhistory.org|publisher=World History|access-date=9 October 2022}}</ref> यह त्यौहार [[कोलकाता]] का सबसे बड़ा त्यौहार है।<ref>{{Cite web|url=https://theworld.org/media/2022-09-29/kolkata-s-biggest-religious-festival-durga-puja-reframed-international-art|title=Kolkata's biggest religious festival Durga Puja reframed as international art experience|website=The World from PRX|language=en|access-date=2022-12-16}}</ref><ref name="hindustantimes">{{Cite news|url=https://www.hindustantimes.com/photos/news/durga-puja-2022-city-of-joy-kolkata-gears-up-for-biggest-festival-101662375005823-1.html|title=Durga Puja 2022: City of Joy Kolkata gears up for biggest festival|date=5 September 2022|access-date=9 October 2022|publisher=www.hindustantimes.com|agency=Hindustan Times|location=Kolkata|language=en}}</ref> २०२२ में [[कोलकाता]] में लगभग ३,००० [[बारोवारी]] [[पूजा|पूजाएँ]] होंगी। शहर में एक करोड़ [[भारतीय रुपया|रुपये]] से अधिक के आय-व्ययक के साथ २०० से अधिक पूजाएँ आयोजित की गईं। <ref name="thehindu">{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/news/cities/kolkata/i-t-notices-to-durga-pujas-even-as-festival-seeks-unesco-status/article25980616.ece|title=I-T notices to Durga Pujas even as festival seeks UNESCO status|last=Shiv Sahay Singh|access-date=9 October 2022|publisher=www.thehindu.com|agency=The Hindu|location=Kolkata|language=en}}</ref> दिसंबर २०२१ में [[युनेस्को|संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन - युनेस्को]] द्वारा कोलकाता में दुर्गा पूजा को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की सूची में अंकित किया गया है <ref name="unesco">{{Cite web|url=https://ich.unesco.org/en/RL/durga-puja-in-kolkata-00703|title=UNESCO – Durga Puja in Kolkata|website=ich.unesco.org|language=en|access-date=9 October 2022}}</ref> [[श्रेणी:दुर्गा पूजा]] f4vl3zv8emxh8hg370mfdcvhf4x5g9w क्रिस बमस्टेड 0 1536301 6543795 6486576 2026-04-25T09:01:24Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543795 wikitext text/x-wiki {| class="infobox vcard" ! colspan="2" id="6" class="infobox-above fn" |क्रिस्टोफर एडम बमस्टेड |- id="8" | colspan="2" id="9" class="infobox-subheader" |<span class="role">[[शरीर सौष्ठव|'''बॉडी बिल्डर''']]</span> |- id="12" ! colspan="2" id="13" class="infobox-header" |व्यक्तिगत जानकारी |- id="15" ! scope="row" id="16" class="infobox-label" |जन्म | id="18" class="infobox-data" |फरवरी 2, 1995 (उम्र 29) [[ओटावा]], [[ओंटेरियो|ओंटारियो]], [[कनाडा]] |- id="23" ! scope="row" id="24" class="infobox-label" |ऊंचाई | id="26" class="infobox-data" |6 फीट 1 इंच (185 सेमी)<ref name="bbmp"><cite class="citation web cs1"><span class="cx-segment" data-segmentid="209">[https://www.bodybuildingmealplan.com/chris-bumstead-height-and-weight/ "Chris Bumstead Height and Weight, Body Measurements, & More Nutritioneering"]. </span><span class="cx-segment" data-segmentid="210">''www.bodybuildingmealplan.com''. </span><span class="cx-segment" data-segmentid="211">30 June 2022<span class="reference-accessdate">. </span></span><span class="cx-segment" data-segmentid="212"><span class="reference-accessdate">Retrieved <span class="nowrap">December 21,</span> 2022</span>.</span></cite></ref> |- id="28" ! scope="row" id="29" class="infobox-label" |वजन | id="31" class="infobox-data" |प्रतियोगिता: 230 पौंड (104 किग्रा) ऑफ-सीजन: 264 पौंड (120 किग्रा)<ref name="bbmp" /> |- id="33" ! colspan="2" id="34" class="infobox-header" |पेशेवर करियर |- id="36" ! scope="row" id="37" class="infobox-label" |प्रो-डेब्यू | id="39" class="infobox-data" | * आईएफबीबी उत्तर अमेरिकी चैम्पियनशिप * 2016 |- id="46" ! scope="row" id="47" class="infobox-label" |सर्वोत्तम जीत | id="49" class="infobox-data" | * मिस्टर ओलंपिया क्लासिक फिजिक विजेता * 2019–2023 |- id="58" ! scope="row" id="59" class="infobox-label" |सक्रिय | id="61" class="infobox-data" |2014–वर्तमान |- id="63" ! colspan="2" id="64" class="infobox-header" |<div id="65" class="mw-collapsible" style="text-align:center; font-size:95%"><div id="66" class="skin-nightmode-reset-color" style="line-height:1.6em; background-color:#ccf; font-size:105%; background-color:transparent;"><div id="67" style="margin:0 4em;">पदक रिकार्ड</div></div><div id="69" class="mw-collapsible-content" style="font-size:105%"> {| class="skin-nightmode-reset-color" id="71" style="width:100%; background-color:#f9f9f9; color:#000000; font-weight:normal" | colspan="2" id="74" style="padding:0" | |- id="75" ! colspan="3" id="76" style="text-align:center;vertical-align:middle;background-color:#eeeeee;" |पुरुषों का <span class="role">[[शरीर सौष्ठव|'''बॉडी बिल्डिन्ग्ग''']]</span> |- id="79" ! colspan="3" id="80" style="text-align:center;vertical-align:middle;background-color:#cccccc;" |आईएफबीबी मिस्टर ओलंपिया |- id="83" style="background-color:white;" | id="84" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:silver" |दूसरा | id="86" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2017 मिस्टर ओलंपिया | id="89" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="91" style="background-color:white;" | id="92" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:silver" |दूसरा | id="94" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2018 मिस्टर ओलंपिया | id="97" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="99" style="background-color:white;" | id="100" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="102" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2019 मिस्टर ओलंपिया | id="105" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="107" style="background-color:white;" | id="108" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="110" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2020 मिस्टर ओलंपिया | id="113" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="115" style="background-color:white;" | id="116" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="118" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2021 मिस्टर ओलंपिया | id="121" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="123" style="background-color:white;" | id="124" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="126" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2022 मिस्टर ओलंपिया | id="129" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |- id="131" style="background-color:white;" | id="132" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="134" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2023 मिस्टर ओलंपिया | id="137" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |-id="139" style="background-color:white;" |id="140" style="width:3em; text-align:center; vertical-align:middle; font-weight:bold; background-color:gold" |पहला | id="142" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |2024 मिस्टर ओलंपिया | id="145" style="text-align:center; vertical-align:middle;" |क्लासिक फिजिक |} </div></div> |} '''क्रिस्टोफर एडम बमस्टेड''' (जन्म 2 फरवरी 1995), जिन्हें उनके प्रशंसक '''सीबम''' के नाम से जानते हैं, एक कनाडाई आईएफबीबी प्रो लीग पेशेवर [[बॉडीबिल्डिंग|बॉडीबिल्डर]] हैं। बमस्टेड 6 बार के मिस्टर ओलंपिया क्लासिक फिजिक चैंपियन हैं, जिन्होंने 2019 से 2024 तक लगातार 100 खिताब जीते हैं <ref>{{Cite web|url=https://thegymgoat.com/chris-bumstead/|title=Chris Bumstead "Cbum" Bio: Age, Height, Workout, And Diet!|last=Elmardi|first=Reda|date=January 6, 2022|website=Thegymgoat}}</ref> बमस्टेड अपनी जीवनशैली और शरीर सौष्ठव पर केंद्रित सामग्री के साथ एक बड़ी सोशल मीडिया उपस्थिति बनाए रखता है।<ref>{{Cite web|url=https://cbum-fitness.com/|title=cbumfitness|website=cbumfitness|language=en|access-date=2022-05-16}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.youtube.com/channel/UCSsatoLgRKARvDjiP6l6hWw|title=FOCHBY - YouTube|website=www.youtube.com|access-date=2022-05-16}}</ref> == प्रारंभिक जीवन == बमस्टेड का जन्म और पालन-पोषण [[ओटावा|ओटावा, ओंटारियो]] में हुआ। वह हाई स्कूल में [[फुटबॉल]], [[बेसबॉल]], [[बास्केटबॉल]] और [[आइस हॉकी|हॉकी]] सहित कई खेलों में शामिल थे। उन्होंने 14 साल की उम्र में [[भारोत्तोलन]] शुरू किया, और ग्रेड 9 और ग्रेड 12 के बीच, उनका वजन 77 से 102 किलो तक बढ़ गया, जिससे उनके पैर सबसे अधिक बढ़ गए। <ref>{{Cite web|url=https://www.musculardevelopment.com/10353-55857n5nn67n/15729-the-route-to-massive-legs-chris-bumstead-shows-how.html#.YN0XCDZKg0o|title=The Route to Massive Legs - Chris Bumstead Shows How|website=www.musculardevelopment.com|access-date=2021-07-01|archive-date=3 दिसंबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211203130305/https://www.musculardevelopment.com/10353-55857n5nn67n/15729-the-route-to-massive-legs-chris-bumstead-shows-how.html#.YN0XCDZKg0o|url-status=dead}}</ref> उन्होंने नोवा स्कोटिया के हैलिफैक्स स्थित डालहौजी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। एक अच्छा शरीर बनाने के बाद, बमस्टेड की मुलाकात अपने पहले कोच, पेशेवर बॉडीबिल्डर ''इयान वलीयर'' से हुई, जो उनकी बहन को डेट कर रहे थे। <ref name="Shredded">{{Cite web|url=https://simplyshredded.com/21-year-old-beast-chris-bumstead-talks-with-simplyshredded-com.html|title=21 Year Old Beast: Chris Bumstead Talks With Simplyshredded.com {{!}} SimplyShredded.com|website=simplyshredded.com|archive-url=https://web.archive.org/web/20211118044439/https://simplyshredded.com/21-year-old-beast-chris-bumstead-talks-with-simplyshredded-com.html|archive-date=2021-11-18|access-date=2021-07-01}}</ref> 19 अक्टूबर, 2022 को, क्रिस और इयान ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि वे अपने मिस्टर ओलंपिया शो पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अब एक साथ काम नहीं करेंगे।<ref>{{Cite web|url=https://generationiron.com/iain-valliere-no-coaching-chris-bumstead/|title=Iain Valliere Confirms He's No Longer Coaching Chris Bumstead|last=Salmon|first=Jonathan|date=2022-10-20|website=Generation Iron Fitness & Bodybuilding Network|language=en-US|access-date=2022-12-18}}</ref> == करियर == बड़े होने के दौरान ''बमस्टेड'' के लिए बॉडीबिल्डिंग केवल एक शौक था।<ref>{{Cite AV media|url=https://www.youtube.com/watch?v=WBbKua3rQZo|title=Bodybuilding 101: What it takes to be Mr. Olympia with Chris Bumstead|date=December 19, 2020|author=[[Gymshark]]|access-date=2022-07-31|via=[[YouTube]]}}</ref> उन्होंने [[फ़ुटबॉल]] से लेकर [[बेसबॉल]], [[बास्केटबॉल]] और [[आइस हॉकी]] तक कई खेल खेले। इससे बुमस्टेड की [[एथलेटिक्स]] में रुचि विकसित हुई और उन्होंने हाई स्कूल के पहले वर्ष के दौरान [[भारोत्तोलन]] शुरू किया। उनकी बहन के प्रेमी, ''इयान वलियेरे'' ने ''बमस्टेड'' की क्षमता देखी और उसे प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने में मदद की। जैसे-जैसे उनके [[बॉडीबिल्डिंग]] लक्ष्य पूरे होने लगे, उन्होंने कहा, "''अचानक, मैं ओलंपिया में दूसरे स्थान पर आ रहा था।''" ''बुमस्टेड'' का पहला [[बॉडीबिल्डिंग]] शो [[ओंटेरियो|ओंटारियो]] में एक क्षेत्रीय स्तर का शो था, जिसमें उन्होंने अपनी बहन ''मेलिसा वलियेरे'' के साथ भाग लिया था। उन दोनों ने समग्र रूप से जीत हासिल की, जिसमें ''बमस्टेड'' ने जूनियर के रूप में जीत हासिल की। ​​अपने पहले शो के बाद उन्हें [[बॉडीबिल्डिंग]] के खेल से प्यार हो गया और उन्होंने ''इयान'' के साथ काम करना शुरू कर दिया और अपना जीवन इस खेल के लिए समर्पित कर दिया।<ref>{{Cite web|url=https://generationiron.com/chris-bumstead-profile/|title=Chris Bumstead {{!}} Profile {{!}} Bio {{!}} Stats|last=Saini|first=Vidur|date=2022-03-07|website=Generation Iron Fitness & Bodybuilding Network|language=en-US|access-date=2022-12-18}}</ref> बमस्टेड ने 2014 में 19 साल की उम्र में अपनी प्रतिस्पर्धी शुरुआत की और 2016 आईएफबीबी नॉर्थ अमेरिकन बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप का दावा करने के बाद 21 साल की उम्र में अपना आईएफबीबी प्रो कार्ड प्राप्त किया। <ref>{{Cite web|url=https://tikkaykhan.com/chris-bumstead-diet-plan-and-workout-routine/|title=Chris Bumstead|date=5 September 2023|website=Tikkay Khan|language=en-US|access-date=}}</ref> उन्होंने 2017 में अपने पहले मिस्टर ओलंपिया में क्लासिक फिजिक श्रेणी में दूसरा स्थान हासिल करके भीड़ और जजों को प्रभावित किया। <ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.oldschoollabs.com/2017-mr-olympia-results/|title=2017 Mr Olympia Results & Surprises|last=says|first=Michael Cooper|date=2017-09-18|website=Old School Labs|language=en-US|access-date=2021-07-01}}</ref> <ref name=":1">{{Cite web|url=https://www.oldschoollabs.com/2018-mr-olympia-results/|title=2018 Mr. Olympia Results & Surprises|date=2018-09-18|website=Old School Labs|language=en-US|access-date=2021-07-01}}</ref> 2018 के मिस्टर ओलंपिया प्रतियोगिता में भी उनके नतीजे वही रहे, हालांकि उनकी हालत पिछले साल की तुलना में खराब थी। बमस्टेड को 2018 की प्रतियोगिता से 4 सप्ताह पहले गंभीर जल प्रतिधारण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्होंने आपातकालीन कक्ष में तीन रातें बिताईं और गुर्दे की समस्या के कारण पोटेशियम को बाहर निकालने के लिए उन्हें एक मजबूत मूत्रवर्धक दिया गया। बमस्टेड ने अपनी रिहाई के बाद भी प्रशिक्षण जारी रखा, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण झटका था। <ref>{{Cite AV media|url=https://www.youtube.com/watch?v=F-JQnvMfNFQ|title=Chris Bumstead's Story &#124; The Journey to Classic Physique Mr. Olympia|date=September 30, 2020|last=Muscle & Strength|access-date=2022-07-31}}</ref> बमस्टेड ने 2019, 2020, 2021, 2022 और 2023 मिस्टर ओलंपिया प्रतियोगिताओं के विजेता के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की, जिससे वह पुरुषों की क्लासिक फिजिक में वर्तमान चैंपियन बन गए। <ref name=":2">{{Cite web|url=https://barbend.com/chris-bumstead-wins-2020-classic-physique-olympia/|title=Chris Bumstead Wins 2020 Classic Physique Olympia|date=2020-12-20|website=BarBend|language=en-US|access-date=2021-07-01|archive-date=20 दिसंबर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201220145907/https://barbend.com/chris-bumstead-wins-2020-classic-physique-olympia/|url-status=dead}}</ref> 13 सितंबर, 2021 को बमस्टेड ने एक सप्लीमेंट कंपनी रॉ न्यूट्रिशन के साथ हस्ताक्षर किए। <ref>https://blog.priceplow.com/podcast/chris-bumstead-raw-nutrition-052#:~:text=On%20September%2013%2C%202021%2C%20Raw,Olympia%20himself%2C%20Chris%20Bumstead!</ref> तब से, बमस्टेड ने अपनी सिग्नेचर श्रृंखला बनाई, जिसमें प्री-वर्कआउट और प्रोटीन पाउडर जैसे जिम सप्लीमेंट्स बेचे गए। == संदर्भ == {{टिप्पणीसूची}} pxltt6xf9406n2u3604kvct0l3xomfj क्रेड (कंपनी) 0 1536413 6543809 6428117 2026-04-25T10:06:19Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543809 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक कम्पनी|name=ड्रीमप्लग टेक्नोलॉजीज प्रा. लिमिटेड|logo=|alt=|trading_name=CRED (क्रेड)|type=[[निजी कंपनी|निजी]]|foundation={{start date and age|2018|df=yes}}|founder=कुणाल शाह <br /> {{small|(सह-संस्थापक और सीईओ)}}|location=[[बैंगलोर]], [[कर्नाटक]]|hq_location_country=भारत|revenue={{up}} {{INRConvert|1400|c}} (FY23)<ref name="fy23">{{cite news |title=Cred revenue grows 3.5x to Rs 1,400 crore, losses widen 5% to Rs 1,347 crore in FY23 |url=https://www.moneycontrol.com/news/business/announcements/cred-revenue-grows-3-5x-to-rs-1400-crore-losses-widen-5-to-rs-1347-crore-in-fy23-11482361.html |access-date=27 January 2024 |work=Moneycontrol |date=5 October 2023 |language=en}}</ref>|net_income={{INRConvert|-1347|c}} (FY23)<ref name="fy23"/>|num_employees=800|homepage={{URL|https://cred.club/}}}}'''ड्रीमप्लग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड''' [[व्यापारिक नाम]] '''क्रेड''' एक भारतीय [[फिनटेक]] कंपनी है, जिसका मुख्यालय [[बंगलौर|बैंगलोर]] में है। <ref>{{Cite web|url=https://www.businessinsider.in/business/startups/news/kunal-shah-cred-raises-215-million-to-be-indias-latest-unicorn-with-a-valuation-of-2-2-billion/articleshow/81933639.cms|title=Kunal Shah's CRED raises $215 million to be India's latest unicorn with a valuation of $2.2 billion|website=Business Insider|access-date=2021-04-10|archive-date=7 अगस्त 2024|archive-url=https://web.archive.org/web/20240807215113/https://www.businessinsider.in/business/startups/news/kunal-shah-cred-raises-215-million-to-be-indias-latest-unicorn-with-a-valuation-of-2-2-billion/articleshow/81933639.cms|url-status=dead}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.financialexpress.com/industry/sme/kunal-shahs-cred-turns-unicorn-valuation-jumps-nearly-3x-to-2-2b-valuation-with-215-million-funding/2228078/|title=Kunal Shah's Cred turns unicorn in less than three years; valuation slingshots nearly 3X to $2.2 billion|date=2021-04-06|website=The Financial Express|language=en-US|access-date=2021-04-10}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.cnbctv18.com/startup/cred-valued-at-22-billion-with-new-round-kunal-shah-says-conscious-call-to-not-monetise-in-first-2-years-8833041.htm|title=Cred valued at $2.2 billion with new round, Kunal Shah says 'conscious call' to not monetise in first 2 years|date=6 April 2021|website=cnbctv18.com|language=en-US|access-date=2021-04-10}}</ref> कुणाल शाह द्वारा 2018 में स्थापित, <ref>{{Cite web|url=https://www.livemint.com/Companies/hMPDTo4UhtvMCsEqa6qLoJ/Cred-to-launch-product-for-credit-card-users.html|title=Cred to launch product for credit card users|last=Patwa|first=Prasannata|date=2018-11-26|website=mint|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/small-biz/startups/newsbuzz/freecharges-kunal-shah-is-back-with-fintech-firm-cred/articleshow/66804073.cms|title=Kunal Shah: FreeCharge's Kunal Shah is back with Fintech firm Cred|last=Gooptu|first=Biswarup|work=The Economic Times|access-date=2021-04-11|last2=Sharma|first2=Samidha}}</ref> यह एक रिवॉर्ड-आधारित क्रेडिट कार्ड भुगतान ऐप है। <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/cred-review-makes-credit-card-bill-payments-easier-rewards-for-timely-transaction/articleshow/66894555.cms|title=Cred review: Makes credit card bill payments easier, rewards for timely transaction|last=Bajaj|first=Karan|work=The Economic Times|access-date=2021-04-11}}</ref> क्रेड उपयोगकर्ताओं को घर के किराए का भुगतान करने की सुविधा भी देता है <ref>{{Cite web|url=https://www.timesnownews.com/technology-science/article/how-to-pay-house-rent-online-with-your-credit-card-using-cred-app/604934|title=How to pay house rent online with your credit card using CRED app|date=11 June 2020|website=www.timesnownews.com|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> और अल्पकालिक क्रेडिट लाइनें प्रदान करता है। <ref>{{Cite web|url=https://www.bgr.in/news/cred-introduces-new-rentpay-and-stash-services-for-creditworthy-individuals-886780/|title=Cred Rentpay, Stash services launched in India|last=Staff|date=2020-04-20|website=BGR India|language=en-US|access-date=2021-04-11|archive-date=2 अगस्त 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210802101022/https://www.bgr.in/news/cred-introduces-new-rentpay-and-stash-services-for-creditworthy-individuals-886780/|url-status=dead}}</ref> क्रेड को अधिक मूल्यांकित होने और एक ठोस मुद्रीकरण रणनीति की कमी के लिए आलोचना मिली है। <ref>{{Cite web|url=https://www.livemint.com/news/india/forgive-us-for-asking-but-what-s-cred-s-business-model-11612452194349.html|title=Forgive us for asking, but what's Cred's business model?|last=Dalal|first=Mihir|date=2021-02-04|website=mint|language=en|access-date=2021-04-10}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://www.cnbctv18.com/startup/cred-revenue-valuation-business-model-8244661.htm|title=Worth $806 mn, Cred's Rs 52-lakh revenue sparks valuation, business model debate|website=cnbctv18.com|language=en-US|access-date=2021-04-10}}</ref> == इतिहास == क्रेड की स्थापना 2018 में कुणाल शाह ने की थी। 2021 तक, कंपनी ने 5.9 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ताओं को अपने साथ जोड़ लिया था और भारत में सभी क्रेडिट कार्ड बिल भुगतानों का लगभग 20% हिस्सेदारी हासिल की। <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/tech/funding/cred-raises-81-million-announces-esop-buyback-worth-1-2-million/articleshow/80096215.cms|title=Cred raises $81 million, announces Esop buyback worth $1.2 million|last=Dalal|first=Mihir|date=5 January 2021|work=The Economic Times|access-date=30 April 2021}}</ref> == अनुदान और वित्तीय परिणाम == === अनुदान === क्रेड ने अब तक निजी फंडिंग के चार दौर के माध्यम से ''डीएसटी ग्लोबल'',<ref>{{Cite web|url=https://www.firstpost.com/business/cred-raises-80-million-in-a-funding-round-led-by-dst-global-valuation-now-up-at-800-million-9070611.html|title=Cred raises $80 million in a funding round led by DST Global, valuation now up at $800 million|date=2020-12-02|website=Firstpost|access-date=2021-04-10}}</ref> ''सिकोइया कैपिटल (इंडिया)'',<ref>{{Cite web|url=https://www.financialexpress.com/industry/sme/vc-firm-sequoia-capital-closes-second-seed-fund-at-195-million-to-back-startups-in-india-southeast-asia/2220031/|title=VC firm Sequoia Capital closes second seed fund at $195 million to back startups in India, Southeast Asia|date=2021-03-25|website=The Financial Express|language=en-US|access-date=2021-04-10}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.moneycontrol.com/news/business/startup/cred-turns-unicorn-raises-215-million-at-a-valuation-of-2-2-billion-6735001.html|title=Cred Turns Unicorn, Raises $215 Million At A Valuation Of $2.2 Billion|last=Srikanth|first=Chandra R|date=6 April 2021|website=Moneycontrol|access-date=2022-11-26}}</ref> और ''टाइगर ग्लोबल'',<ref>{{Cite web|url=https://inc42.com/buzz/kunal-shahs-cred-is-raising-101-mn-series-b-funding/|title=Kunal Shah's Cred Raises $120 Mn Series B Funding From Ribbit, Tiger Global And Others|date=2019-08-26|website=Inc42 Media|language=en-US|access-date=2021-04-10}}</ref> सहित अन्य निवेशकों से फंडिंग जुटाई है।<ref>{{Cite web|url=https://social.techcrunch.com/2021/03/15/india-cred-in-talks-to-raise-200-million-at-2-billion-valuation/|title=India's CRED in talks to raise $200 million at $2 billion valuation|website=TechCrunch|language=en-US|access-date=2021-04-10}}{{Dead link|date=जुलाई 2024 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> क्रेड ने 2020 वित्तीय वर्ष (FY20) में ₹360.31 करोड़ का घाटा दर्ज किया <ref>{{Cite web|url=https://entrackr.com/2021/02/kunal-shahs-cred-spent-rs-727-to-earn-a-rupee-in-fy20/|title=Kunal Shah's CRED spent Rs 727 to earn a rupee in FY20|last=Vardhan|first=Jai|last2=Tyagi|first2=Gaurav|date=2021-02-06|website=Entrackr|language=en-US|access-date=2021-04-11}}</ref> जो मुख्य रूप से विपणन और विज्ञापन पर अधिक खर्चे के कारण हुआ है।<ref>{{Cite web|url=https://www.bloombergquint.com/bq-blue-exclusive/big-spender-cred-banks-on-rent-payments-credit-lines-for-revenue|title=Big Spender CRED Banks On Rent Payments, Credit Lines For Revenue|website=BloombergQuint|language=en|access-date=2021-04-11}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> अक्टूबर 2021 में, क्रेड ने नए निवेशकों की तलाश शुरू की, $5.5 बिलियन का मूल्यांकन दर्ज किया, जो अप्रैल 2021 में दर्ज $2.2 बिलियन से अधिक था।<ref>{{Cite news|url=https://techcrunch.com/2021/10/11/indian-fintech-cred-seeks-funds-at-5-5-billion-valuation/|title=Indian fintech CRED seeks funds at $5.5 billion valuation|last=Singh|first=Manesh|date=2021-10-11|work=TechCrunch|access-date=2021-10-11}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/tech/funding/cred-raises-215-million-to-close-its-series-d-funding-round/articleshow/81930422.cms|title=Cred's valuation soars to $2.2 billion after fresh funding|last=Manikandan|first=Ashwin|work=The Economic Times|access-date=2021-04-11}}</ref> कुणाल शाह एआई आधारित एडटेक इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफॉर्म कोफ्लुएंस में भी निवेशक हैं। कंपनी ने 8 फरवरी 2022 तक 4 मिलियन डॉलर की प्री-सीरीज़ फंडिंग जुटाई थी <ref>{{Cite web|url=https://inc42.com/buzz/martech-startup-kofluence-bags-4-mn-from-nikhil-kamath-kunal-shah-others/|title=Influencer Marketing Startup Kofluence Bags $4 Mn From Kunal Shah, Karan Johar|date=8 February 2022}}</ref> जून 2022 में, CRED ने सिंगापुर के ''सॉवरेन वेल्थ फंड'', GIC के नेतृत्व में ''सीरीज़ एफ फंडिंग राउंड'' में $80 मिलियन जुटाए। ''सीरीज़ एफ फंडिंग राउंड'' से कंपनी का मूल्य लगभग 6.4 बिलियन डॉलर हो गया। <ref>{{Cite web|url=https://www.entrepreneur.com/article/429243|title=CRED Raises $80 Million In Series F Funding|last=Jose|first=Teena|website=Entrepreneur|language=en|access-date=2022-06-14}}</ref> {| class="wikitable" !'''इन्वेस्टर''' !'''लेन-देन का नाम''' !'''जुटाई गई धनराशि''' <ref>{{Cite web|url=https://www.moneycontrol.com/news/business/exclusive-cred-in-talks-to-raise-funding-eyes-6-5-bn-valuation-8061091.html|title=Exclusive: CRED in talks to raise funding, eyes $6.5 bn valuation|website=Moneycontrol|language=en|access-date=2022-02-28}}</ref> !'''मूल्यांकन''' |- |सिकोइया कैपिटल इंडिया |बीज |$30 मिलियन | rowspan="2" |खुलासा नहीं किया गया |- |सिकोइया कैपिटल, आरटीपी वेंचर्स, और 25 अन्य |श्रृंखला ए |$636हज़ार |- |सिकोइया कैपिटल, रिबिट कैपिटल और सात अन्य |श्रृंखला बी |$120 मिलियन |{{बढ़ोतरी}} $450 मिलियन |- |डीएसटी ग्लोबल, टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट और सात अन्य |श्रृंखला सी |$81 मिलियन |{{बढ़ोतरी}} $806 मिलियन |- |कोट्यू, इनसाइट पार्टनर्स, और नौ अन्य |श्रृंखला डी |$215 मिलियन |{{बढ़ोतरी}} 2.2 बिलियन डॉलर |- |टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट, मार्शल वेस और आठ अन्य |श्रृंखला ई |$251 मिलियन |{{बढ़ोतरी}} $4.01 बिलियन |- |जीआईसी सिंगापुर, टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट और तीन अन्य |श्रृंखला एफ |$80 मिलियन |{{बढ़ोतरी}} 6.4 बिलियन डॉलर |} == मार्केटिंग == क्रेड 2020 से 2023 तक चार वर्षों के लिए [[इंडियन प्रीमियर लीग]] का आधिकारिक प्रायोजक बन गया <ref>{{Cite web|url=https://inc42.com/buzz/bcci-announces-cred-as-official-partner-of-ipl/|title=After Unacademy, Cred Joins IPL 2020 As Official Partner|date=2020-09-02|website=Inc42 Media|language=en-US|access-date=2021-04-11}}</ref> 2021 में, भारतीय मशहूर हस्तियों को शामिल करते हुए इन-हाउस बनाए गए क्रेड के विज्ञापन कंटेंट और वीडियो <ref>{{Cite web|url=https://brandequity.economictimes.indiatimes.com/news/advertising/cred-launches-90s-inspired-multi-film-campaign-featuring-anil-kapoor/78229225|title=CRED launches 90s inspired multi-film campaign featuring Anil Kapoor - ET BrandEquity|last=www.ETBrandEquity.com|website=ETBrandEquity.com|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite news|url=https://economictimes.indiatimes.com/internet/who-made-bappi-da-sing-love-ballads-for-credit-cards/articleshow/78400017.cms?from=mdr|title=Who made Bappi Da sing love ballads for credit cards?|last=Bhatt|first=Shephali|work=The Economic Times|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://theprint.in/opinion/pov/bappi-lahiri-govinda-cred-ad-industry-laughing-at-themselves-not-everyone-gets-why/534852/|title=With Bappi Lahiri to Govinda, India's ad industry is laughing at itself. Not everyone gets why|last=Misra|first=Shubhangi|date=2020-11-01|website=ThePrint|language=en-US|access-date=2021-04-11}}</ref> ने अपनी ख़ासियत के कारण समाचार और सोशल मीडिया <ref>{{Cite web|url=https://www.deccanherald.com/metrolife/metrolife-your-bond-with-bengaluru/is-self-ridicule-the-new-ad-formula-912396.html|title=Is self-ridicule the new ad formula?|date=2020-11-07|website=Deccan Herald|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://odishatv.in/news/govindas-new-cred-ad-heres-why-the-dancing-superstar-said-yes-488994|title=Govinda's New CRED Ad: Here's Why the Dancing Superstar Said Yes|date=2020-10-29|website=Latest Odisha News, Breaking News Today {{!}} Top Updates on Corona - OTV News|language=en-US|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://brandequity.economictimes.indiatimes.com/news/advertising/jim-sarbh-engages-with-audience-in-creds-new-ad-film/81988755|title=Jim Sarbh engages with audience in Cred's new ad film - ET BrandEquity|last=www.ETBrandEquity.com|website=ETBrandEquity.com|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> <ref>{{Cite web|url=https://the-ken.com/story/cred-in-the-ipl-sixer-or-hit-wicket/|title=CRED in the Indian Premier League (IPL): sixer or hit wicket?|date=2020-10-14|website=The Ken|language=en-US|access-date=2021-04-11}}</ref> में महत्वपूर्ण चर्चा उत्पन्न की, जिसकी आलोचना <ref>{{Cite web|url=https://brandequity.economictimes.indiatimes.com/news/advertising/opinion-first-you-pay-them-then-you-mock-them/78526353|title=Opinion: First you pay them, then you mock them? - ET BrandEquity|last=www.ETBrandEquity.com|website=ETBrandEquity.com|language=en|access-date=2021-04-11}}</ref> और प्रशंसा दोनों हुई। <ref>{{Cite web|url=https://www.afaqs.com/news/guest-article/cred-not-everyone-gets-it-a-copywriters-take|title=CRED… not everyone gets it: A copywriter's take|website=afaqs!|access-date=2021-04-11}}</ref> == अधिग्रहण == 2021 में, क्रेड ने दिसंबर में व्यय प्रबंधन स्टार्टअप ''हैप्पे'' और शराब वितरण स्टार्टअप ''हिपबार का'' अधिग्रहण किया ।<ref name=":0">{{Cite web|url=https://www.livemint.com/companies/start-ups/cred-to-acquire-lending-as-a-service-firm-creditvidya-11669718533772.html|title=Cred to acquire lending-as-a-service firm CreditVidya|date=2022-11-29|website=mint|language=en|access-date=2024-02-28}}</ref> दिसंबर 2022 में, क्रेड ने ''क्रेडिटविद्या'' में 100% हिस्सेदारी हासिल कर ली, जो एक सेवा के रूप में ऋण प्रदान करती है। यह क्रेड को ''क्रेडिटविद्या'' के रूप में अपने ग्राहक आधार और पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार करने की अनुमति देता है, जो उन ग्राहकों को सेवा प्रदान करता है जिनके पास क्रेडिट स्कोर नहीं है। <ref name=":0" /> जुलाई 2023 में, क्रेड ने बचत और निवेश प्लेटफॉर्म ''स्पैनी का'' अधिग्रहण किया और उधार और [[फिनटेक|वेल्थटेक]] स्पेस में और विस्तार किया। <ref>{{Cite web|url=https://www.moneycontrol.com/news/business/announcements/cred-acquires-savings-platform-startup-spenny-10847871.html|title=CRED acquihires savings platform Spenny|date=2023-06-23|website=Moneycontrol|language=en|access-date=2024-02-28}}</ref> फरवरी 2024 में, क्रेड ने ऑनलाइन [[धन प्रबन्धन|वेल्थ मैनेजमेंट]] [[स्टार्टअप कंपनी|स्टार्टअप]] ''कुवेरा'' को अज्ञात राशि में अधिग्रहित कर लिया। इस अधिग्रहण के साथ, क्रेड ने म्यूचुअल फंड बाजार में प्रवेश किया। <ref>{{Cite web|url=https://www.thehindubusinessline.com/companies/cred-to-acquire-kuvera-for-undisclosed-amount/article67817336.ece|title=CRED to acquire Kuvera for undisclosed amount|last=Banthia|first=Jyoti|date=2024-02-06|website=BusinessLine|language=en|access-date=2024-02-28}}</ref> == संदर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी लिंक == {{Official website|url=http://www.cred.club/}} [[श्रेणी:भारतीय ब्रांड]] ab9wautqexvbqtip6gdieuh6ec0oigq क्रिस्टीना रिची 0 1538077 6543801 6534758 2026-04-25T09:34:53Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543801 wikitext text/x-wiki {{Infobox person | name = क्रिस्टीना रिची | image = Christina Ricci (49596830836) (cropped).jpg | caption = 2020 में रिची | birth_name = | birth_date = {{Birth date and age|1980|02|12}}<ref>{{Cite web|title=12 फरवरी के प्रसिद्ध जन्मदिन: क्रिस्टीना रिक्की, बिल रसेल|url= https://www.upi.com/Entertainment_News/2022/02/12/Famous-birthdays-for-Feb-12-Christina-Ricci-Bill-Russell/3961643991239/|access-date=June 25, 2023|website=यूपीआई|language=en}}</ref> | birth_place = सांता मोनिका, [[कैलिफोर्निया]], यू.एस. | alma_mater = [[प्रोफेशनल चिल्ड्रन स्कूल]] | occupation = {{hlist|अभिनेत्री|निर्माता}} | years_active = 1990–वर्तमान | spouse = {{plainlist| * {{marriage|जेम्स हेर्डेगेन|2013|2021|end=divorced}} * {{marriage|मार्क हैम्पटन|2021}} }} | children = 2 }} '''क्रिस्टीना रिची''' ({{IPAc-en|ˈ|r|iː|tʃ|i}} {{respell|REE|chee}}; जन्म 12 फ़रवरी 1980) एक अमेरिकी [[अभिनेत्री]] हैं। रिची ज्यादातर [[स्वतंत्र फिल्म]] प्रोडक्शन में काम करती हैं लेकिन बॉक्स-ऑफिस की कई हिट फिल्मों में भी दिखाई दी हैं।<ref>{{cite web|access-date=25 जून, 2023|title=क्रिस्टीना रिक्की|website=द नंबर्स|url=https://www.the-numbers.com/person/120820401-Christina-Ricci|archive-date=25 जून 2023|archive-url=https://web.archive.org/web/20230625234923/https://www.the-numbers.com/person/120820401-Christina-Ricci|url-status=dead}}</ref> वह [[गोल्डन ग्लोब पुरस्कार]], [[स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड अवार्ड्स]] और प्राइमटाइम एमी पुरस्कार की नामांकन प्राप्तकर्ता हैं। 2010 में रिची ने ''टाइम स्टैंड्स स्टिल'' में अपना ब्रॉडवे डेब्यू किया। वह रेप, एब्यूज एंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क (RAINN) की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। ==करियर== क्रिस्टीना रिची का जन्म सांता मोनिका, [[कैलिफोर्निया]] में हुआ था, वे सारा (जन्म नाम मर्डोक) और राल्फ रिची की चार संतानों में सबसे छोटी थीं। 1960 के दशक में उनकी माँ फोर्ड एजेंसी में मॉडल के रूप में काम करती थीं और बाद में रियल एस्टेट एजेंट बन गईं। उनके पिता का करियर विविधतापूर्ण था उन्होंने जिम शिक्षक, वकील, ड्रग काउंसलर और प्राइमल स्क्रीम थेरेपिस्ट के रूप में काम किए।<ref name=telegraph>{{cite web| url=https://www.telegraph.co.uk/culture/3664790/The-vamp-is-a-lady.html |archive-url=https://ghostarchive.org/archive/20220110/https://www.telegraph.co.uk/culture/3664790/The-vamp-is-a-lady.html |archive-date=जनवरी 10, 2022 |url-access=subscription |url-status=live| title=द वैम्प इज ए लेडी |work=द टेलीग्राफ |date=अप्रैल 28, 2007 |access-date=मई 7, 2018}}{{cbignore}}</ref> अपने उपनाम के बारे में रिची ने कहा है कि उनका वंश इटालियन, [[आयरिश]] और स्कॉटिश है।<ref>{{cite web |title=द मिंक्स इफ़ेक्ट |url=http://www.christinaricci.info/cgi-dodger/showpage.pl?sel=interviews&url=iview7.ssf |archive-url= https://web.archive.org/web/20031123103510/http://www.christinaricci.info/cgi-dodger/showpage.pl?sel=interviews&url=iview7.ssf |archive-date=नवंबर 23, 2003|access-date=नवंबर 22, 2007}}</ref> रिची का परिवार मोंटक्लेयर, न्यू जर्सी चला गया जहां वह एजमोंट एलीमेंट्री स्कूल, ग्लेनफील्ड मिडिल स्कूल, मोंटक्लेयर हाई स्कूल और मॉरिसटाउन-बीयर्ड स्कूल में पढाई करते हुए बड़ी हुई। बाद में उन्होंने [[न्यूयॉर्क नगर]] के प्रोफेशनल चिल्ड्रेन स्कूल में दाखिला लिया। उसके तीन बड़े भाई-बहन राफेल, डांटे और पिया हैं। जब रिची किशोरावस्था में थी तब उनके माता-पिता अलग हो गए।<ref name=Peoplev69no19>{{cite magazine |url=https://people.com/archive/christina-ricci-vol-69-no-19/|title=क्रिस्टीना रिची|magazine=[[पीपल (पत्रिका)|पीपल]]|volume=69|issue=19|first=एलेक्सिस|last=चिऊ|date=मई 19, 2008| access-date=मार्च 24, 2015|archive-date=मई 8, 2018|archive-url= https://web.archive.org/web/20180508054802/https://people.com/archive/christina-ricci-vol-69-no-19/|url-status=live}}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== * {{IMDb name|207|क्रिस्टीना रिक्की}} * {{इंस्टाग्राम|रिकीग्राम}} [[श्रेणी:1980 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:अमेरिकी बाल अभिनेत्रियाँ]] [[श्रेणी:अमेरिकी फ़िल्म अभिनेत्री]] c6zh5z7tguvry1pt63zv2navy8a5fns लामिन यमल 0 1540532 6543694 6359190 2026-04-24T19:01:05Z AlphaVictorDelta0107 790236 6543694 wikitext text/x-wiki [[File:Lamine Yamal, Sánchez se reunió con los futbolistas de la selección española tras ganar la Eurocopa 2024 (3) (cropped).jpg|thumb|2024 में लामिन यामल]] ''' अल्अमीन जमाल नस्रावी ईबाना''' (जन्म 13 जुलाई 2007) ये [[कैटलोनिया]] के एक स्पेनिश पेशेवर [[फुटबॉल]]र हैं, जो [[ला लिगा|ला लीगा]] क्लब [[एफ सी बार्सिलोना|बार्सिलोना]] और [[स्पेन राष्ट्रीय फुटबॉल टीम|स्पेन की राष्ट्रीय टीम]] के लिए राइट विंगर के रूप में खेलते हैं।<ref>{{Cite news|url=https://ndtv.in/othersports/lamine-yamal-created-history-spain-beats-france-2-1-to-reach-euro-2024-final-kylian-mbappe-hindi-6073944|title=लामिन यमल ने यूरो कप 2024 में रचा इतिहास, फ्रांस को रौंदकर फाइनल में पहुंची स्पेन, एमबाप्पे का नहीं दिखा जलवा|work=NDTV.in|access-date=11 July 2024}}</ref> उन्हें दुनिया की सर्वश्रेष्ठ युवा प्रतिभाओं में से एक माना जाता है।<ref name="goalsensation">{{Cite web|url=https://www.goal.com/en/lists/watch-lamine-yamal-history-16-year-old-barcelona-sensation-supercopa-goalscoring-record-osasuna/bltd41eed3f97af8ab6|title=Watch: Lamine Yamal making more history! 16-year-old Barcelona sensation breaks Supercopa goalscoring record after late strike against Osasuna|date=11 January 2024|website=[[Goal (website)|Goal]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20240111223729/https://www.goal.com/en/lists/watch-lamine-yamal-history-16-year-old-barcelona-sensation-supercopa-goalscoring-record-osasuna/bltd41eed3f97af8ab6|archive-date=11 January 2024|access-date=10 February 2024}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.givemesport.com/best-young-players-in-world-football-soccer-ranked/|title=The 25 best young players in world football right now ranked in order|date=1 July 2024|website=Give Me Sport}}</ref><ref name="BBCborn24">[https://www.bbc.co.uk/sport/football/articles/cx82xyynw17o 'A superstar is born' - Yamal's history making moment of 'genius'], Gary Rose, ''BBC Sport'', 10 July 2024</ref><ref>{{Cite web|url=https://zeenews.india.com/hindi/sports/17-year-old-lamine-yamal-breaks-brazil-footballer-pele-record-after-spain-4th-win-in-euro-cup-2024/2337670|title=फुटबॉल में लिखा गया न्यू चैप्टर, 17 साल के खिलाड़ी ने तोड़ा 66 साल पुराना रिकॉर्ड, स्टार फुटबॉलर पेले को पछाड़ा|website=Zee News|language=hi|access-date=2024-07-16}}</ref> == संदर्भ == <references /> == बाहरी कड़ियाँ == {{Commonscat}} * [https://www.laliga.com/en-GB/player/lamine-yamal लामिन यमल] की आधिकारिक वेबसाइट [[श्रेणी:2007 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:फुटबॉल खिलाड़ी]] [[श्रेणी:स्पेन के खिलाड़ी]] qnomy9dsqix42wr1jcbjb0cys66cogp कुमासी 0 1573286 6543637 6372525 2026-04-24T14:57:00Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543637 wikitext text/x-wiki '''कुमासी''' [[घाना]] का एक शहर है। यह कुमासी मेट्रोपॉलिटन असेम्बली और [[घाना]] के असांते क्षेत्र की राजधानी है। जनसंख्या के आधार पर यह देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। सन् 2021 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 443,981 है।<ref>{{Cite journal|last=Devas|first=Nick|last2=Korboe|first2=David|date=2000-04-01|title=City governance and poverty: the case of Kumasi|url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/095624780001200109|journal=Environment and Urbanization|language=en|volume=12|issue=1|pages=123–136|doi=10.1177/095624780001200109|issn=0956-2478}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://lib.ugent.be/en/catalog/rug01:001887157|title=Kumasi, Ghana. Critical study of an African urban structure|last=Baeyens|first=Anne|date=2012|website=lib.ugent.be|access-date=2025-01-23}}</ref> ==इतिहास== {{multiple image|perrow = 2|total_width=300 | image1 = BOWDICH(1819) p336 PLATE 3 - THE OLDEST HOUSE IN COOMASSIE.jpg | image2 = The National Archives UK - CO 1069-37-39.jpg | image3 = Aerial View of Kumasi in 2003.jpg | footer = '''घड़ी की दिशा में:''' 1817 में थॉमस एडवर्ड बोडिच द्वारा बनाया गया "कुमासी का सबसे पुराना घर"। 1925 में किंग्सवे। 2003 में कुमासी का हवाई दृश्य }} यह शहर असांते साम्राज्य की राजधानी था, जो अपने चरम पर वर्तमान घाना और आइवरी कोस्ट के बड़े हिस्से को कवर करता था। 1896 में अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहित किए जाने के बाद और तेज़ जनसंख्या वृद्धि का अनुभव करने के बाद, कुमासी ने अपने बुनियादी ढाँचे में सुधार के साथ तेज़ी से विकास किया, जैसे कि सड़कें और रेलवे का निर्माण। 1957 में घाना को अपनी स्वतंत्रता मिलने के बाद, शहर अशांति क्षेत्र की राजधानी बन गया। कुमासी असांतेहेन की सीट बनी हुई है। मैक्सवेल फ्राई द्वारा शहर के लिए 1945 में "गार्डन सिटी ऑफ़ वेस्ट अफ़्रीका" योजना प्रकाशित करने के बाद शहर को अक्सर "गार्डन सिटी" के रूप में जाना जाता है। यह शहर में बगीचों और वानिकी की प्रचुरता के कारण भी है।<ref>{{Cite journal|last=Schmidt|first=Stephan|date=2005-10-01|title=Cultural Influences and the Built Environment: An Examination of Kumasi, Ghana|url=https://www.tandfonline.com/doi/full/10.1080/13574800500297751|journal=Journal of Urban Design|volume=10|issue=3|pages=353–370|doi=10.1080/13574800500297751|issn=1357-4809}}</ref> ==भूगोल== [[File:ISS016-E-15122 - View of Ghana.jpg|thumb|right|230px|[[अभियान 16|आईएसएस अभियान 16]] के दौरान लिया गया [[कुमासी मेट्रोपॉलिटन विधानसभा|कुमासी मेट्रोपॉलिटन]] का उपग्रह दृश्य]] कुमासी झील बोसोमटवे के पास एक वर्षा वन क्षेत्र में स्थित है और अकरा से लगभग 200 किलोमीटर (120 मील) की दूरी पर स्थित है। शहर में उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु का अनुभव होता है, जिसमें दो बारिश के कारण होते हैं जो मामूली से लेकर प्रमुख तक होते हैं। कुमासी में रहने वाले प्रमुख जातीय समूह असांते, मोल-डेगबोन और ईवे हैं। 2021 तक, महानगर के मेयर सैमुअल पाइन हैं।<ref>{{Cite web|url=https://citinewsroom.com/2021/09/akufo-addo-nominates-npps-ashanti-regional-secretary-sam-pyne-as-kumasi-mayor/|title=Akufo-Addo nominates NPP's Ashanti Regional Secretary, Sam Pyne as Kumasi Mayor|date=2021-09-19|language=en-US|access-date=2025-01-23}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> कुमासी कुमासी मेट्रोपॉलिटन में स्थित है, जो कि आशांति क्षेत्र के तीस से अधिक जिलों में से एक है। यह {{convert|214.3|sqkm|sqft|abbr=on}} के भू-क्षेत्र को कवर करता है और समुद्र तल से {{convert|250|to|300|mm|ft|abbr=on}} ऊपर है। महानगर की सीमा उत्तर में क्वाब्रे ईस्ट म्युनिसिपल डिस्ट्रिक्ट और अफिग्या क्वाब्रे नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट, पश्चिम में अटविमा क्वानवोमा डिस्ट्रिक्ट और अटविमा न्वाबियाग्या म्युनिसिपल डिस्ट्रिक्ट, पूर्व में एजिसू म्युनिसिपल डिस्ट्रिक्ट और असोकोर मम्पोंग म्युनिसिपल डिस्ट्रिक्ट और दक्षिण में बोसोमटवे डिस्ट्रिक्ट से लगती है। == सन्दर्भ == {{reflist}} {{Authority control}} [[श्रेणी:घाना]] [[श्रेणी:घाना में क्षेत्रीय राजधानियाँ]] [[श्रेणी:पूर्व राष्ट्रों की राजधानियाँ]] [[श्रेणी:अफ्रीका में 1680 प्रतिष्ठान]] icc4nfzo8jat0z0qcz4ekp0dor584gy नाइट्स टेम्पलर 0 1575014 6543833 6355029 2026-04-25T11:09:19Z The Sorter 845290 6543833 wikitext text/x-wiki '''नाइट्स टेम्पलर''' मध्ययुगीन योद्धाओं का एक सैन्य और धार्मिक संगठन था, जिसकी स्थापना 1118 ईस्वी में हुई। इसका मुख्य उद्देश्य [[ईसाई]] तीर्थयात्रियों की सुरक्षा करना था, जो [[क्रूसेड|क्रूसेड्स]] के दौरान [[याफ़ा]] से [[यरुशलम|यरूशलेम]] के मार्ग पर यात्रा करते थे। ह्यूज दे पायेन के नेतृत्व में नौ शूरवीरों ने इस संगठन की नींव रखी। 1127 में, सिस्टरसियन एबट बर्नार्ड ऑफ़ क्लेयरवॉक्स ने इसे एक औपचारिक नियमावली प्रदान की, जिससे यह क्रूसेड्स के दौरान "मिलिटिया ऑफ़ क्राइस्ट" के रूप में एक प्रभावी सैन्य शक्ति बन गया।<ref name=":0">{{Citation|last=Schmidt|first=Alvin J.|title=Knights Templar|date=2011|url=https://onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1002/9780470670606.wbecc0763|work=The Encyclopedia of Christian Civilization|publisher=John Wiley & Sons, Ltd|language=en|doi=10.1002/9780470670606.wbecc0763|isbn=978-0-470-67060-6|access-date=2025-01-30}}</ref> ==स्थापना और विकास== इस संगठन को शुरुआत में "द पूअर नाइट्स ऑफ़ द टेम्पल" के नाम से जाना जाता था, क्योंकि इसके सदस्य यरूशलेम में सॉलोमन मंदिर स्थल पर स्थित अपने मुख्यालय में रहते थे। 1128-29 में ट्रॉय के काउंसिल ने इसे आधिकारिक मान्यता दी और पोप ने तीन बुल जारी कर इस संगठन का समर्थन किया। टेम्पलर न केवल योद्धा थे बल्कि वे धार्मिक संन्यासी भी थे। उनके कुछ सदस्य गैर-लड़ाके भी थे, जो प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में विशेषज्ञता रखते थे। प्रत्येक योद्धा सफेद चोगा पहनता था, जिस पर एक लाल क्रॉस अंकित होता था।<ref name=":0" /> ==शक्ति और प्रभाव== नाइट्स टेम्पलर ने केवल सैन्य क्षेत्र में ही नहीं बल्कि वित्तीय और प्रशासनिक क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की। उन्होंने लेवेंट क्षेत्र में कई किले बनाए और यूरोप में विभिन्न स्थानों पर संपत्ति अर्जित की। संगठन की वित्तीय विशेषज्ञता इतनी अधिक थी कि यह कई यूरोपीय राजा, पोप और कुलीनों के लिए बैंकर के रूप में कार्य करने लगा। ऐसा कहा जाता है कि टेम्पलर्स ने यूरोप की कई प्रसिद्ध गोथिक गिरजाघरों के निर्माण में आर्थिक सहायता दी।<ref>{{Citation|title=The Knights Templar|date=2015|url=https://onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1002/9781119039020.ch3|work=Heroes & Villains of Finance: The 50 Most Colourful Characters in the History of Finance|pages=10–13|publisher=John Wiley & Sons, Ltd|language=en|doi=10.1002/9781119039020.ch3|isbn=978-1-119-03902-0|access-date=2025-01-30}}</ref> ==पतन और विनाश== नाइट्स टेम्पलर की बढ़ती संपत्ति और शक्ति अंततः उनके पतन का कारण बनी। फ्रांस के राजा फिलिप चतुर्थ ने इस संगठन की विशाल संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने की योजना बनाई। 1307 में, उसने टेम्पलर्स पर विधर्म और भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए। इसके परिणामस्वरूप, संगठन के कई सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया और यातनाएँ दी गईं। 1312 में, पोप ने नामक बुल जारी कर टेम्पलर्स के संगठन को आधिकारिक रूप से भंग कर दिया। 1314 में, संगठन के ग्रैंड मास्टर जैक्स दे मोले को जीवित जला दिया गया। लगभग 60 अन्य टेम्पलर योद्धाओं को भी इसी तरह मौत के घाट उतार दिया गया।<ref name=":1">{{Cite web|url=https://www.britannica.com/topic/Templars|title=Templar {{!}} History, Battles, Symbols, & Legacy {{!}} Britannica|date=2025-01-19|website=www.britannica.com|language=en|access-date=2025-01-30}}</ref> ==विरासत और ऐतिहासिक महत्व== टेम्पलर्स के पतन के बाद, उनकी अधिकांश संपत्ति अन्य सैन्य संगठनों, जैसे कि हॉस्पिटलर्स, को हस्तांतरित कर दी गई। हालाँकि, टेम्पलर्स की निर्दोषता पर पहले बहस होती रही, लेकिन आधुनिक शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि वे राजा फिलिप की राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का शिकार बने। नाइट्स टेम्पलर की प्रतिष्ठा आज भी बनी हुई है और यह संगठन इतिहास, किंवदंतियों और साजिश सिद्धांतों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।<ref name=":1" /> ==निष्कर्ष== नाइट्स टेम्पलर केवल एक सैन्य संगठन नहीं था, बल्कि यह एक प्रभावशाली वित्तीय और प्रशासनिक शक्ति भी था। उनकी यात्रा सुरक्षा से लेकर बैंकिंग तक की भूमिका ने मध्ययुगीन यूरोप के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को प्रभावित किया। हालाँकि उनका पतन विवादों और राजनीतिक षड्यंत्रों का परिणाम था, फिर भी उनकी विरासत आधुनिक संस्कृति और ऐतिहासिक अनुसंधान में महत्वपूर्ण बनी हुई है।<ref name=":0" /> ==संदर्भ== [[श्रेणी:शहर]] qjgn3om9kf846380zfxdimg4cf45xzb कॉकटेल (पेय) 0 1575017 6543717 6360186 2026-04-25T01:15:43Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543717 wikitext text/x-wiki [[File:15-09-26-RalfR-WLC-0084.jpg|thumb|upright=1.1|कॉकटेल ग्लास में परोसा गया मार्टिनी पेय]] '''कॉकटेल''' एक मिश्रित पेय है, जो आम तौर पर [[मादक पेय|मादक]] होता है। इसके सबसे प्रचलित रूप में कॉकटेल एक या एक से अधिक [[शराब]] का मिश्रण होता है जिसमें अन्य सामग्री जैसे फल-रस, फ्लेवर्ड सिरप, टॉनिक वॉटर, श्रब्स और बिटर्स मिलाए जाते हैं। कॉकटेल दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से भिन्न होते हैं और कई वेबसाइटें मूल पाकविधि, पुराने और अधिक प्रसिद्ध कॉकटेल की अपनी व्याख्या दोनों प्रकाशित करती हैं।<ref>{{cite web |title=The World’s Best-Selling Classic Cocktails 2021 - Drinks International - The global choice for drinks buyers |url=https://drinksint.com/news/fullstory.php/aid/9319/The_World_92s_Best-Selling_Classic_Cocktails_2021.html |website=drinksint.com |accessdate=30 जनवरी 2025}}</ref><ref>{{cite web |title=22 Bubbly Champagne Cocktails for Toasting the Holidays |url=https://www.allrecipes.com/gallery/champagne-cocktails/ |website=Allrecipes |accessdate=30 जनवरी 2025 |language=en |archive-date=15 अप्रैल 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210415151412/https://www.allrecipes.com/gallery/champagne-cocktails/ |url-status=dead }}</ref> ==इतिहास== [[File:Cocktail accessories - Aigai.jpg|thumb|ग्रीस के ऐगई के शाही मकबरों के संग्रहालय में कॉकटेल के सामान चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। ]] प्राचीन ग्रीस में एक प्रसिद्ध 'कॉकटेल' का नाम ''क्यकेओन'' था। इसका उल्लेख होमरिक ग्रंथों में मिलता है और इसका इस्तेमाल एलुसिनियन रहस्यों में किया गया था। [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] में पेय पदार्थ के रूप में 'कॉकटेल' का लिखित उल्लेख द फार्मर्स कैबिनेट, 1803 में प्रकाशित हुआ। उसके तीन साल बाद 13 मई 1806 को द बैलेंस एंड कोलंबियन रिपोजिटरी (हडसन, न्यूयॉर्क) में मादक पेय के रूप में कॉकटेल की पहली परिभाषा प्रकाशित हुई।<ref>{{cite web |title=Wayback Machine |url=http://www.imbibemagazine.com/images/Balance_5-13-1806.pdf |website=इम्बिबे मैगज़ीन |accessdate=30 जनवरी 2025 |archive-date=13 जुलाई 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140713113329/http://www.imbibemagazine.com/images/Balance_5-13-1806.pdf |url-status=dead }}</ref> परंपरागत रूप से, कॉकटेल सामग्री में स्प्रिट, चीनी, पानी और बिटर शामिल होते थे। हालाँकि, यह परिभाषा 1800 के दशक में विकसित हुई और इसमें लिकर को भी शामिल किया गया। ==अवयव== सबसे महत्वपूर्ण और आधार तत्वों में एक संशोधित, चिकना या सुगंधित एजेंट और एक अतिरिक्त विशेष स्वाद या रंग एजेंट शामिल हैं।<ref name=":6">{{Cite book |last=एमबरी |first=डेविड ए॰ |title=The Fine Art of Mixing Drinks |publisher=Faber and Faber Limited |year=2008 |location=लंदन |pages=24-25}}</ref> आधार हमेशा सबसे प्रमुख घटक होगा। यह कॉकटेल की पूरी मात्रा का कम से कम 50% हिस्सा बनाता है। इसमें हमेशा स्पिरिट आधारित [[शराब|शराब]] या वाइन आधारित शराब शामिल होती है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Authority control}} [[श्रेणी:पेय]] [[श्रेणी:पेय उद्योग]] gu8sbijchv98kgzjynt67mu1jh9xcc1 सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra 3 1577140 6543632 6426006 2026-04-24T14:32:08Z चाहर धर्मेंद्र 703114 सूचना: [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] को शीघ्र हटाने का नामांकन 6543632 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Ramnathshivendra}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 14:07, 13 फ़रवरी 2025 (UTC) == उपन्यासकार रामनाथ शिवेन्द्र == रामनाथ शिवेंद्र रामनाथ शिवेंद्र (जन्म-7 मई 1946) हिन्दी साहित्य के समकालीन उपन्यासकार, कहानीकार व आलोचक सामान्य तथ्य- रामनाथ शिवेंद्र जन्म-7 मई 1946 खड़ुई, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश पेशा -लेखक, उपन्यासकार जीवन परिचय- रामनाथ शिवेंद्र का जन्म मीरजापुर अब सोनभद्र के ग्राम खड़ुई में 7 मई 1946 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके पैत्रिक गॉव खड़ुई के प्राथमिक पाठशाला सोनवट में हुई थी। उन्होंने सन्1962 में हाई स्कूल उत्तीर्ण किया। उच्च शिक्षा के लिए वे बनारस चले गये जहां से उन्होंने इन्टरमडिएट किया फिर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से बी.ए. तथा एलएल.बी. एवं काशी विद्यापीठ से मास्टर आफ एप्लायड सोशियोलाजी किया तथा कुछ साल तक जिला न्यायालय में वकालत भी किया। फिलहाल वे पूर्ण रूप से खेती-किसानी व लेखन में संलग्न हैं। प्रकाशित कृतियॉ- कहानी संग्रह- 1-डफली बजाये जा 2008 2-दूसरी परंपरा 2010 3-पनसाल 2019 4-चित्रकथा और वह 2021 उपन्यास- 1-सहपुरवा 1977 2-हरियल की लकड़ी 2006 3-तीसरा रास्ता 2008 4-दूसरी आजादी 2009 5-ढूह वाली लछमिनिया 2013 6-अन्तर्गाथा 2015 7-कन्फेशन 2019 8-पट्टा चरित 2020 9-धरती कथा 2021 10-जंगल दंश 2022 आलोचना- कथा का समाज शास्त्र 2017 इतिहास- 1-सोनभद्र प्राचीन 2005 व 2024 2-समय समाज और हस्तक्षेप 2006 निबंध संग्रह- समय और सपने 2010 अन्य- असुविधा साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सन्दर्भ- हरियल की लकड़ी-राजकमल प्रकाशन दिल्ली, अन्तर्गाथा-शिल्पायन दिल्ली, तीसरा रास्ता व दूसरी आजादी पिलग्रिम्स वाराणसी, ढूह वाली लछमिनिया- ज्योतिपर्व दिल्ली, अन्तर्गाथा- शिल्पायन दिल्ली, जंगल दंश-भावना प्रकाशन दिल्ली, धरती कथा, पट्टा चरित व कन्फेशन-मनीश प्रकाशन दिल्ली, सोनभद्र प्राचीन , समय और सपने, समय समाज और हस्तक्षेप तथा कथा का समाज शास्त्र- असुविधा प्रकाशन सोनभद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 14:14, 27 फ़रवरी 2025 (UTC) :thanks [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:53, 6 मार्च 2025 (UTC) == {subst:add-desc-I|1=25 shivendra ramnath 46.jpg}} == this is my image and created by me pl.add this with my image [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:14, 15 मार्च 2025 (UTC) == please kindly unblock me, I never can use this honourable plateform for personal or any how for Advertisement == [[चित्र:Sonbhadra_history_cover_copy.jpg_1.jpg|अंगूठाकार|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]] this Article is authentic and proved by the history of Sonbhadra and gazettier of Mirzpur [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:32, 25 मार्च 2025 (UTC) == [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है। निबन्ध अथवा ब्लॉग कि तरह लिखा गया लेख। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> यदि यह पृष्ठ हटा दिया गया है, तो आप [[वि:चौपाल|चौपाल]] पर इस पृष्ठ को अपने सदस्य उप-पृष्ठ में डलवाने, अथवा इसकी सामग्री ई-मेल द्वारा प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकते हैं। <span style="font-family: Cambria;">[[सदस्य:Nilesh shukla|<span style="color: teal;">'''निलेश शुक्ला'''</span>]] ([[User talk:Nilesh shukla|वार्ता]])</span> 12:12, 26 मार्च 2025 (UTC) :@[[सदस्य:Nilesh shukla|Nilesh shukla]] :आप अगर उचित समझे तो रखें नहीं तो इसे हटा दे क्योंकि मैं विकिपीडिया की नीति को ठीक से नहीं समझ पा रहा हूं हालांकि मैं ने बहुत प्रयास किया था फिर भी नहीं समझ पाया। मुझे केवल इतना ही समझ में आया :कि इस तरह के आलेख विकिपीडिया पर आने चाहिए :। मैं एक आदिवासी जनपद का हूं और आदिवासियों के इतिहास के बारे में अच्छी तरीके से जानता हूं फिर भी कोई कमी रह गई हो तो आप स्वतंत्र है मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं आप इस आर्टिकल को हटा सकते हैं। मुझे खुशी है कि आपने इस आर्टिकल को देखा पढ़ा और समझा। :कष्ट के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:57, 26 मार्च 2025 (UTC) == [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 08:01, 3 अप्रैल 2025 (UTC) == [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|मापदंड फ़2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|फ़2]]{{*}} चित्र का विकिमीडिया कॉमन्स पर स्रोत और लाइसेंस जानकारी सहित उपलब्ध होना'''</center> इसमें वे सभी फ़ाइलें आएँगी जो विकिमीडिया कॉमन्स पर उसी नाम अथवा किसी और नाम से उपलब्ध हैं, क्योंकि कॉमन्स की फाइलों को विकिपीडिया पर सीधे प्रयोग किया जा सकता है और वे अन्य प्रकल्पों पर भी प्रयोग की जा सकती हैं। आपके द्वारा अपलोड की गयी यह फ़ाइल अब [[:Commons:|विकिमीडिया कॉमन्स]] पर उपलब्ध है। कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइलों को विकिपीडिया से हटा दिया जाता है। आप चाहें तो [[:Commons:{{{2}}}|कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइल]] को जाँच सकते हैं कि उसमें सभी जानकारी ठीक दी है या नहीं। यदि गड़बड़ी हो तो कृपया उसे ठीक कर दें।&nbsp;यदि वह फ़ाइल ठीक है तो कृपया [[विशेष:WhatLinksHere/चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|जो पृष्ठ विकिपीडिया पर उपलब्ध फ़ाइल का प्रयोग करते हैं]], उनपर विकिपीडिया वाली फ़ाइल की जगह कॉमन्स वाली फ़ाइल का उपयोग करें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 19:48, 3 अप्रैल 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:14, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:13, 20 मई 2025 (UTC) :कृपया इस पृष्ठ को न हटाए इस पृष्ठ की सारी सामग्री सत्य है और इसमें कोई सूचना गलत नहीं है। [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:47, 21 मई 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] (वार्ता :प्रिय अजीत जी :आपने मेरा सदस्य पृष्ठ  हटाकर  गलत किया  गया है  यह विज्ञापन नहीं  है यह सत्य सुचना है इस पृष्ठ को आप साहित्यकारों के पृष्ठ  पर भेज सकते हैं या तो आप पतालगा कर इसे हटते आपने मनमाने ढंग से इसे हटा दिया है. मै नहीं समझता की इस पृष्ठ से विकिपेडिया का नाम  प्रभावित होता कृपया पुनः विचार करें तथा यह दुरप्रयोग नहीं है पता नहीं कैसे यह आपको दुरपयोग समझ में आ रहा है . [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:34, 23 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:17, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... Its based on true information (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:01, 21 मई 2025 (UTC) Its based on true information == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 10:39, 21 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 09:17, 31 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 11:47, 8 जून 2025 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] :कृपया ऐसा ना करिए इस पृष्ठ को रखने से विकिपीडिया का कोई नुकसान नहीं , नहीं उसका अवमानना है ।कहीं से भी आपके संस्थान का अपमान नहीं होता भूले बिसरे लेखकों को भी आप को इस सूची में शामिल करना चाहिए वैसे आपका निर्णय सही नहीं है फिर भी हम मानते हैं दोबारा इस तरह का आलेख कभी पीडिया पर नहीं जाएगा। सच कहिए तो मुझे भी लगता है की विकिपीडिया केवल नामधारियों के लिए है उन लोगों के लिए नहीं जो लोग साहित्य के क्षेत्र में विशेष काम कर रहे हैं। :धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:54, 8 जून 2025 (UTC) ::रामनाथ शिवेंद्र जी, यदि ऐसे लेख बनाने की अनुमति दी तो लोग केवल स्वयं पर ही पृष्ठ बनाते रहेंगे। आप अच्छी हिन्दी जानते हैं, अच्छा होगा साहित्य से सम्बंधित लेखों में और जहाँ भी आप योगदान कर सकते हैं, योगदान दीजियेगा। इससे हिन्दी भाषी उन लोगों को सहायता मिलेगी जिन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती और मेरे जैसे लोगों को भी हिन्दी सुधारने में सहायता मिलेगी। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:16, 8 जून 2025 (UTC) == [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 14:32, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 44xxl7p2elwypzqi9pi02mcr6ofloqx 6543768 6543632 2026-04-25T06:18:41Z चाहर धर्मेंद्र 703114 सूचना: [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] को शीघ्र हटाने का नामांकन 6543768 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Ramnathshivendra}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 14:07, 13 फ़रवरी 2025 (UTC) == उपन्यासकार रामनाथ शिवेन्द्र == रामनाथ शिवेंद्र रामनाथ शिवेंद्र (जन्म-7 मई 1946) हिन्दी साहित्य के समकालीन उपन्यासकार, कहानीकार व आलोचक सामान्य तथ्य- रामनाथ शिवेंद्र जन्म-7 मई 1946 खड़ुई, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश पेशा -लेखक, उपन्यासकार जीवन परिचय- रामनाथ शिवेंद्र का जन्म मीरजापुर अब सोनभद्र के ग्राम खड़ुई में 7 मई 1946 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके पैत्रिक गॉव खड़ुई के प्राथमिक पाठशाला सोनवट में हुई थी। उन्होंने सन्1962 में हाई स्कूल उत्तीर्ण किया। उच्च शिक्षा के लिए वे बनारस चले गये जहां से उन्होंने इन्टरमडिएट किया फिर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से बी.ए. तथा एलएल.बी. एवं काशी विद्यापीठ से मास्टर आफ एप्लायड सोशियोलाजी किया तथा कुछ साल तक जिला न्यायालय में वकालत भी किया। फिलहाल वे पूर्ण रूप से खेती-किसानी व लेखन में संलग्न हैं। प्रकाशित कृतियॉ- कहानी संग्रह- 1-डफली बजाये जा 2008 2-दूसरी परंपरा 2010 3-पनसाल 2019 4-चित्रकथा और वह 2021 उपन्यास- 1-सहपुरवा 1977 2-हरियल की लकड़ी 2006 3-तीसरा रास्ता 2008 4-दूसरी आजादी 2009 5-ढूह वाली लछमिनिया 2013 6-अन्तर्गाथा 2015 7-कन्फेशन 2019 8-पट्टा चरित 2020 9-धरती कथा 2021 10-जंगल दंश 2022 आलोचना- कथा का समाज शास्त्र 2017 इतिहास- 1-सोनभद्र प्राचीन 2005 व 2024 2-समय समाज और हस्तक्षेप 2006 निबंध संग्रह- समय और सपने 2010 अन्य- असुविधा साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सन्दर्भ- हरियल की लकड़ी-राजकमल प्रकाशन दिल्ली, अन्तर्गाथा-शिल्पायन दिल्ली, तीसरा रास्ता व दूसरी आजादी पिलग्रिम्स वाराणसी, ढूह वाली लछमिनिया- ज्योतिपर्व दिल्ली, अन्तर्गाथा- शिल्पायन दिल्ली, जंगल दंश-भावना प्रकाशन दिल्ली, धरती कथा, पट्टा चरित व कन्फेशन-मनीश प्रकाशन दिल्ली, सोनभद्र प्राचीन , समय और सपने, समय समाज और हस्तक्षेप तथा कथा का समाज शास्त्र- असुविधा प्रकाशन सोनभद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 14:14, 27 फ़रवरी 2025 (UTC) :thanks [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:53, 6 मार्च 2025 (UTC) == {subst:add-desc-I|1=25 shivendra ramnath 46.jpg}} == this is my image and created by me pl.add this with my image [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:14, 15 मार्च 2025 (UTC) == please kindly unblock me, I never can use this honourable plateform for personal or any how for Advertisement == [[चित्र:Sonbhadra_history_cover_copy.jpg_1.jpg|अंगूठाकार|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]] this Article is authentic and proved by the history of Sonbhadra and gazettier of Mirzpur [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:32, 25 मार्च 2025 (UTC) == [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है। निबन्ध अथवा ब्लॉग कि तरह लिखा गया लेख। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> यदि यह पृष्ठ हटा दिया गया है, तो आप [[वि:चौपाल|चौपाल]] पर इस पृष्ठ को अपने सदस्य उप-पृष्ठ में डलवाने, अथवा इसकी सामग्री ई-मेल द्वारा प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकते हैं। <span style="font-family: Cambria;">[[सदस्य:Nilesh shukla|<span style="color: teal;">'''निलेश शुक्ला'''</span>]] ([[User talk:Nilesh shukla|वार्ता]])</span> 12:12, 26 मार्च 2025 (UTC) :@[[सदस्य:Nilesh shukla|Nilesh shukla]] :आप अगर उचित समझे तो रखें नहीं तो इसे हटा दे क्योंकि मैं विकिपीडिया की नीति को ठीक से नहीं समझ पा रहा हूं हालांकि मैं ने बहुत प्रयास किया था फिर भी नहीं समझ पाया। मुझे केवल इतना ही समझ में आया :कि इस तरह के आलेख विकिपीडिया पर आने चाहिए :। मैं एक आदिवासी जनपद का हूं और आदिवासियों के इतिहास के बारे में अच्छी तरीके से जानता हूं फिर भी कोई कमी रह गई हो तो आप स्वतंत्र है मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं आप इस आर्टिकल को हटा सकते हैं। मुझे खुशी है कि आपने इस आर्टिकल को देखा पढ़ा और समझा। :कष्ट के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:57, 26 मार्च 2025 (UTC) == [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 08:01, 3 अप्रैल 2025 (UTC) == [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|मापदंड फ़2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|फ़2]]{{*}} चित्र का विकिमीडिया कॉमन्स पर स्रोत और लाइसेंस जानकारी सहित उपलब्ध होना'''</center> इसमें वे सभी फ़ाइलें आएँगी जो विकिमीडिया कॉमन्स पर उसी नाम अथवा किसी और नाम से उपलब्ध हैं, क्योंकि कॉमन्स की फाइलों को विकिपीडिया पर सीधे प्रयोग किया जा सकता है और वे अन्य प्रकल्पों पर भी प्रयोग की जा सकती हैं। आपके द्वारा अपलोड की गयी यह फ़ाइल अब [[:Commons:|विकिमीडिया कॉमन्स]] पर उपलब्ध है। कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइलों को विकिपीडिया से हटा दिया जाता है। आप चाहें तो [[:Commons:{{{2}}}|कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइल]] को जाँच सकते हैं कि उसमें सभी जानकारी ठीक दी है या नहीं। यदि गड़बड़ी हो तो कृपया उसे ठीक कर दें।&nbsp;यदि वह फ़ाइल ठीक है तो कृपया [[विशेष:WhatLinksHere/चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|जो पृष्ठ विकिपीडिया पर उपलब्ध फ़ाइल का प्रयोग करते हैं]], उनपर विकिपीडिया वाली फ़ाइल की जगह कॉमन्स वाली फ़ाइल का उपयोग करें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 19:48, 3 अप्रैल 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:14, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:13, 20 मई 2025 (UTC) :कृपया इस पृष्ठ को न हटाए इस पृष्ठ की सारी सामग्री सत्य है और इसमें कोई सूचना गलत नहीं है। [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:47, 21 मई 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] (वार्ता :प्रिय अजीत जी :आपने मेरा सदस्य पृष्ठ  हटाकर  गलत किया  गया है  यह विज्ञापन नहीं  है यह सत्य सुचना है इस पृष्ठ को आप साहित्यकारों के पृष्ठ  पर भेज सकते हैं या तो आप पतालगा कर इसे हटते आपने मनमाने ढंग से इसे हटा दिया है. मै नहीं समझता की इस पृष्ठ से विकिपेडिया का नाम  प्रभावित होता कृपया पुनः विचार करें तथा यह दुरप्रयोग नहीं है पता नहीं कैसे यह आपको दुरपयोग समझ में आ रहा है . [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:34, 23 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:17, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... Its based on true information (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:01, 21 मई 2025 (UTC) Its based on true information == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 10:39, 21 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 09:17, 31 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 11:47, 8 जून 2025 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] :कृपया ऐसा ना करिए इस पृष्ठ को रखने से विकिपीडिया का कोई नुकसान नहीं , नहीं उसका अवमानना है ।कहीं से भी आपके संस्थान का अपमान नहीं होता भूले बिसरे लेखकों को भी आप को इस सूची में शामिल करना चाहिए वैसे आपका निर्णय सही नहीं है फिर भी हम मानते हैं दोबारा इस तरह का आलेख कभी पीडिया पर नहीं जाएगा। सच कहिए तो मुझे भी लगता है की विकिपीडिया केवल नामधारियों के लिए है उन लोगों के लिए नहीं जो लोग साहित्य के क्षेत्र में विशेष काम कर रहे हैं। :धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:54, 8 जून 2025 (UTC) ::रामनाथ शिवेंद्र जी, यदि ऐसे लेख बनाने की अनुमति दी तो लोग केवल स्वयं पर ही पृष्ठ बनाते रहेंगे। आप अच्छी हिन्दी जानते हैं, अच्छा होगा साहित्य से सम्बंधित लेखों में और जहाँ भी आप योगदान कर सकते हैं, योगदान दीजियेगा। इससे हिन्दी भाषी उन लोगों को सहायता मिलेगी जिन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती और मेरे जैसे लोगों को भी हिन्दी सुधारने में सहायता मिलेगी। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:16, 8 जून 2025 (UTC) == [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 14:32, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|मापदंड व7]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|व7]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 06:18, 25 अप्रैल 2026 (UTC) 7dl6bhh5audf5akxlq1x1veyqya4bpd 6543829 6543768 2026-04-25T11:07:31Z Ramnathshivendra 862096 /* श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" पृष्ठ को शीघ्र हटाने का नामांकन */ उत्तर 6543829 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|realName=|name=Ramnathshivendra}} -- [[सदस्य:नया सदस्य सन्देश|नया सदस्य सन्देश]] ([[सदस्य वार्ता:नया सदस्य सन्देश|वार्ता]]) 14:07, 13 फ़रवरी 2025 (UTC) == उपन्यासकार रामनाथ शिवेन्द्र == रामनाथ शिवेंद्र रामनाथ शिवेंद्र (जन्म-7 मई 1946) हिन्दी साहित्य के समकालीन उपन्यासकार, कहानीकार व आलोचक सामान्य तथ्य- रामनाथ शिवेंद्र जन्म-7 मई 1946 खड़ुई, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश पेशा -लेखक, उपन्यासकार जीवन परिचय- रामनाथ शिवेंद्र का जन्म मीरजापुर अब सोनभद्र के ग्राम खड़ुई में 7 मई 1946 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके पैत्रिक गॉव खड़ुई के प्राथमिक पाठशाला सोनवट में हुई थी। उन्होंने सन्1962 में हाई स्कूल उत्तीर्ण किया। उच्च शिक्षा के लिए वे बनारस चले गये जहां से उन्होंने इन्टरमडिएट किया फिर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से बी.ए. तथा एलएल.बी. एवं काशी विद्यापीठ से मास्टर आफ एप्लायड सोशियोलाजी किया तथा कुछ साल तक जिला न्यायालय में वकालत भी किया। फिलहाल वे पूर्ण रूप से खेती-किसानी व लेखन में संलग्न हैं। प्रकाशित कृतियॉ- कहानी संग्रह- 1-डफली बजाये जा 2008 2-दूसरी परंपरा 2010 3-पनसाल 2019 4-चित्रकथा और वह 2021 उपन्यास- 1-सहपुरवा 1977 2-हरियल की लकड़ी 2006 3-तीसरा रास्ता 2008 4-दूसरी आजादी 2009 5-ढूह वाली लछमिनिया 2013 6-अन्तर्गाथा 2015 7-कन्फेशन 2019 8-पट्टा चरित 2020 9-धरती कथा 2021 10-जंगल दंश 2022 आलोचना- कथा का समाज शास्त्र 2017 इतिहास- 1-सोनभद्र प्राचीन 2005 व 2024 2-समय समाज और हस्तक्षेप 2006 निबंध संग्रह- समय और सपने 2010 अन्य- असुविधा साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सन्दर्भ- हरियल की लकड़ी-राजकमल प्रकाशन दिल्ली, अन्तर्गाथा-शिल्पायन दिल्ली, तीसरा रास्ता व दूसरी आजादी पिलग्रिम्स वाराणसी, ढूह वाली लछमिनिया- ज्योतिपर्व दिल्ली, अन्तर्गाथा- शिल्पायन दिल्ली, जंगल दंश-भावना प्रकाशन दिल्ली, धरती कथा, पट्टा चरित व कन्फेशन-मनीश प्रकाशन दिल्ली, सोनभद्र प्राचीन , समय और सपने, समय समाज और हस्तक्षेप तथा कथा का समाज शास्त्र- असुविधा प्रकाशन सोनभद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 14:14, 27 फ़रवरी 2025 (UTC) :thanks [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:53, 6 मार्च 2025 (UTC) == {subst:add-desc-I|1=25 shivendra ramnath 46.jpg}} == this is my image and created by me pl.add this with my image [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:14, 15 मार्च 2025 (UTC) == please kindly unblock me, I never can use this honourable plateform for personal or any how for Advertisement == [[चित्र:Sonbhadra_history_cover_copy.jpg_1.jpg|अंगूठाकार|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]] this Article is authentic and proved by the history of Sonbhadra and gazettier of Mirzpur [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:32, 25 मार्च 2025 (UTC) == [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:अधिनियमोें के आईने में आदिवासी|अधिनियमोें के आईने में आदिवासी]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है। निबन्ध अथवा ब्लॉग कि तरह लिखा गया लेख। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> यदि यह पृष्ठ हटा दिया गया है, तो आप [[वि:चौपाल|चौपाल]] पर इस पृष्ठ को अपने सदस्य उप-पृष्ठ में डलवाने, अथवा इसकी सामग्री ई-मेल द्वारा प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकते हैं। <span style="font-family: Cambria;">[[सदस्य:Nilesh shukla|<span style="color: teal;">'''निलेश शुक्ला'''</span>]] ([[User talk:Nilesh shukla|वार्ता]])</span> 12:12, 26 मार्च 2025 (UTC) :@[[सदस्य:Nilesh shukla|Nilesh shukla]] :आप अगर उचित समझे तो रखें नहीं तो इसे हटा दे क्योंकि मैं विकिपीडिया की नीति को ठीक से नहीं समझ पा रहा हूं हालांकि मैं ने बहुत प्रयास किया था फिर भी नहीं समझ पाया। मुझे केवल इतना ही समझ में आया :कि इस तरह के आलेख विकिपीडिया पर आने चाहिए :। मैं एक आदिवासी जनपद का हूं और आदिवासियों के इतिहास के बारे में अच्छी तरीके से जानता हूं फिर भी कोई कमी रह गई हो तो आप स्वतंत्र है मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं आप इस आर्टिकल को हटा सकते हैं। मुझे खुशी है कि आपने इस आर्टिकल को देखा पढ़ा और समझा। :कष्ट के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:57, 26 मार्च 2025 (UTC) == [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:वार्ता:विजयगढ़|वार्ता:विजयगढ़]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 08:01, 3 अप्रैल 2025 (UTC) == [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|मापदंड फ़2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#फ़2|फ़2]]{{*}} चित्र का विकिमीडिया कॉमन्स पर स्रोत और लाइसेंस जानकारी सहित उपलब्ध होना'''</center> इसमें वे सभी फ़ाइलें आएँगी जो विकिमीडिया कॉमन्स पर उसी नाम अथवा किसी और नाम से उपलब्ध हैं, क्योंकि कॉमन्स की फाइलों को विकिपीडिया पर सीधे प्रयोग किया जा सकता है और वे अन्य प्रकल्पों पर भी प्रयोग की जा सकती हैं। आपके द्वारा अपलोड की गयी यह फ़ाइल अब [[:Commons:|विकिमीडिया कॉमन्स]] पर उपलब्ध है। कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइलों को विकिपीडिया से हटा दिया जाता है। आप चाहें तो [[:Commons:{{{2}}}|कॉमन्स पर उपलब्ध फ़ाइल]] को जाँच सकते हैं कि उसमें सभी जानकारी ठीक दी है या नहीं। यदि गड़बड़ी हो तो कृपया उसे ठीक कर दें।&nbsp;यदि वह फ़ाइल ठीक है तो कृपया [[विशेष:WhatLinksHere/चित्र:25 shivendra ramnath 46.jpg|जो पृष्ठ विकिपीडिया पर उपलब्ध फ़ाइल का प्रयोग करते हैं]], उनपर विकिपीडिया वाली फ़ाइल की जगह कॉमन्स वाली फ़ाइल का उपयोग करें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 19:48, 3 अप्रैल 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:14, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:13, 20 मई 2025 (UTC) :कृपया इस पृष्ठ को न हटाए इस पृष्ठ की सारी सामग्री सत्य है और इसमें कोई सूचना गलत नहीं है। [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 02:47, 21 मई 2025 (UTC) :क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] (वार्ता :प्रिय अजीत जी :आपने मेरा सदस्य पृष्ठ  हटाकर  गलत किया  गया है  यह विज्ञापन नहीं  है यह सत्य सुचना है इस पृष्ठ को आप साहित्यकारों के पृष्ठ  पर भेज सकते हैं या तो आप पतालगा कर इसे हटते आपने मनमाने ढंग से इसे हटा दिया है. मै नहीं समझता की इस पृष्ठ से विकिपेडिया का नाम  प्रभावित होता कृपया पुनः विचार करें तथा यह दुरप्रयोग नहीं है पता नहीं कैसे यह आपको दुरपयोग समझ में आ रहा है . [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:34, 23 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) क्योकि उस पृष्ठ पर सत्य सुचना दी गयी है --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 10:17, 20 मई 2025 (UTC) == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस सदस्य पृष्ठ को वेब होस्ट के रूप में विकिपीडिया का स्पष्ट दुरुपयोग होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... Its based on true information (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 05:01, 21 मई 2025 (UTC) Its based on true information == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 10:39, 21 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 09:17, 31 मई 2025 (UTC) == [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:रामनाथ शिवेंद्र|रामनाथ शिवेंद्र]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|मापदंड ल2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#ल2|ल2]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 11:47, 8 जून 2025 (UTC) :@[[सदस्य:संजीव कुमार|संजीव कुमार]] :कृपया ऐसा ना करिए इस पृष्ठ को रखने से विकिपीडिया का कोई नुकसान नहीं , नहीं उसका अवमानना है ।कहीं से भी आपके संस्थान का अपमान नहीं होता भूले बिसरे लेखकों को भी आप को इस सूची में शामिल करना चाहिए वैसे आपका निर्णय सही नहीं है फिर भी हम मानते हैं दोबारा इस तरह का आलेख कभी पीडिया पर नहीं जाएगा। सच कहिए तो मुझे भी लगता है की विकिपीडिया केवल नामधारियों के लिए है उन लोगों के लिए नहीं जो लोग साहित्य के क्षेत्र में विशेष काम कर रहे हैं। :धन्यवाद :रामनाथ शिवेंद्र [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 13:54, 8 जून 2025 (UTC) ::रामनाथ शिवेंद्र जी, यदि ऐसे लेख बनाने की अनुमति दी तो लोग केवल स्वयं पर ही पृष्ठ बनाते रहेंगे। आप अच्छी हिन्दी जानते हैं, अच्छा होगा साहित्य से सम्बंधित लेखों में और जहाँ भी आप योगदान कर सकते हैं, योगदान दीजियेगा। इससे हिन्दी भाषी उन लोगों को सहायता मिलेगी जिन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती और मेरे जैसे लोगों को भी हिन्दी सुधारने में सहायता मिलेगी। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 17:16, 8 जून 2025 (UTC) == [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[Image:Desc-i.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन|श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|मापदंड व2]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व2|व2]]{{*}} परीक्षण पृष्ठ'''</center> इसमें वे पृष्ठ आते हैं जिन्हें परीक्षण के लिये बनाया गया है। यदि आपने यह पृष्ठ परीक्षण के लिये बनाया था तो उसके लिये [[वि:प्रयोगस्थल|प्रयोगस्थल]] का उपयोग करें। यदि आप विकिपीडिया पर हिन्दी टाइप करना सीखना चाहते हैं तो [[विकिपीडिया:देवनागरी में कैसे टंकण करें?|देवनागरी में कैसे टाइप करें]] पृष्ठ देखें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 14:32, 24 अप्रैल 2026 (UTC) == [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|मापदंड व7]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|व7]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> <!-- Template:Db-csd-notice-custom --> <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 06:18, 25 अप्रैल 2026 (UTC) :यह मौलिक कार्य है तथा इसे पाठकों के हित  में आपके विकी पर अपलोड किया गया है :इस लिए इसे डिलीट करना पाठको के हित  में नहीं होगा आपको ऐसी  मनमानी नहीं करनी चाहिए। ईद किताब की हार्ड कॉपी है मेरे पास।   [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 11:07, 25 अप्रैल 2026 (UTC) 9e1cbx2qih2d7a1b2aj1r02t8dsy5ck क्रैकन (क्रिप्टोकरेंसी विनिमय) 0 1581583 6543815 6380491 2026-04-25T10:20:02Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543815 wikitext text/x-wiki {{एकाकी}} '''क्रैकन''' (कानूनी रूप से पेवर्ड, इंक.) एक संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित क्रिप्टोक्यूरेंसी एक्सचेंज है, जिसकी स्थापना 2011 में हुई थी। यह ब्लूमबर्ग टर्मिनल पर सूचीबद्ध होने वाले पहले [[बिटकॉइन]] एक्सचेंजों में से एक था।   कंपनी 2018 से कई नियामक जांचों का विषय रही है, और $30 मिलियन से अधिक के संचयी जुर्माने के लिए सहमत हुई है।<ref name=":4">{{Cite news|url=https://www.bloomberg.com/news/articles/2023-02-09/crypto-exchange-kraken-ends-staking-program-in-sec-settlement|title=Crypto Exchange Kraken Ends Staking Program in $30 Million SEC Settlement|date=2023-02-09|work=Bloomberg.com|access-date=2023-02-11|language=en}}</ref> &nbsp;यह बैंक चार्टर प्राप्त करने वाली पहली क्रिप्टोक्यूरेंसी कंपनी थी।<ref>{{Cite web|url=https://www.natlawreview.com/article/first-cryptocurrency-bank|title=The First Cryptocurrency Bank|website=The National Law Review|language=en|access-date=2022-07-03}}</ref> == इतिहास. == क्रैकन की स्थापना 2011 में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, सैक्रामेंटो के पूर्व छात्र जेसी पॉवेल ने थान लु और माइकल ग्रोनगर के साथ की थी।<ref>{{Cite web|url=https://www.fastcompany.com/90756505/the-8-billion-crypto-unicorn-that-crypto-loves-to-hate|title=The $8 billion crypto unicorn that crypto loves to hate|website=Fast Company|access-date=31 May 2023}}</ref><ref name="nytimes-15jun2022">{{Cite news|url=https://www.nytimes.com/2022/06/15/technology/kraken-crypto-culture.html|title=Inside a Corporate Culture War Stoked by a Crypto C.E.O.|last=Mac|first=Ryan|date=June 15, 2022|work=[[The New York Times]]|access-date=June 15, 2022|last2=Yaffe-Bellany|first2=David}}</ref> पॉवेल एक सुरक्षा मुद्दे को हल करने में माउंट गोक्स के लिए एक सलाहकार थे, और एक प्रतिस्थापन के रूप में क्रैकन पर काम करना शुरू कर दिया, इसकी मृत्यु का अनुमान लगाते हुए गोक्स 2014 में ध्वस्त हो गया, सुरक्षा ऑडिट में विफल रहा।<ref>{{Cite news|url=https://www.bloomberg.com/news/articles/2014-08-17/mt-gox-insider-s-kraken-exchange-to-open-in-japan-next-month|title=Mt. Gox Insider's Kraken Bitcoin Exchange to Open in Japan|last=Alpeyev|first=Pavel|date=17 August 2014|work=Bloomberg News|access-date=4 October 2019}}</ref><ref name="nytimes-15jun2022" /> सितंबर 2013 में, क्रैकन को लॉन्च किया गया था, जो अतिरिक्त मुद्राओं और मार्जिन ट्रेडिंग को जोड़ने से पहले [[बिटकॉइन]], [[लाइटकॉइन|लिटकोइन]] और यूरो ट्रेडों की पेशकश करता था।<ref>{{Cite news|url=http://www.financemagnates.com/forex/technology/sneak-peak-rising-from-the-depths-of-the-san-francisco-bay-is-kraken/|title=Sneak Peak[sic]: Rising From the Depths of the San Francisco Bay is Kraken|date=3 May 2013|work=Finance Magnates: Financial and Business News|access-date=12 February 2018}}</ref> जनवरी 2016 में, क्रैकन ने न्यूयॉर्क शहर से बाहर स्थित एक एक्सचेंज कॉइनसेटर और कैविरटेक्स को खरीदा।<ref>{{Cite web|url=https://www.bizjournals.com/newyork/news/2016/01/19/kraken-buys-coinsetter-leaves-nyc-market.html|title=Bitcoin exchange for Wall Streeters to close New York operations as part of deal with Kraken|website=BizJournals.com|access-date=13 August 2020}}</ref> मार्च 2017 में, क्रैकन ने एक चार्टिंग और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म क्रिप्टोवाच का अधिग्रहण किया।<ref>{{Cite news|url=https://www.americanbanker.com/news/crypto-exchange-kraken-acquires-trading-platform-as-bitcoin-soars|title=Crypto exchange Kraken acquires trading platform as bitcoin soars|work=American Banker|access-date=11 February 2018}}</ref> दिसंबर 2017 तक, क्रैकन ने एक दिन में 50,000 नए उपयोगकर्ताओं को पंजीकृत करने का दावा किया।<ref>{{Cite news|url=https://www.businessinsider.com/coinbase-reportedly-made-more-than-1-billion-in-revenues-last-year-2018-1|title=Bitcoin exchange Coinbase reportedly made more than $1.25 billion in revenues last year|last=Chaparro|first=Frank|date=23 January 2018|work=Business Insider Australia|access-date=11 February 2018}}</ref> सितंबर 2020 में, क्रैकन को व्योमिंग में एक विशेष उद्देश्य डिपॉजिटरी संस्थान (SPDI) चार्टर प्रदान किया गया था, संयुक्त राज्य अमेरिका में इस तरह के चार्टर को आयोजित करने वाला पहला क्रिप्टोक्यूरेंसी एक्सचेंज बन गया।<ref>{{Cite web|url=https://www.forbes.com/sites/jasonbrett/2020/09/16/cracking-landlocked-wyoming-kraken-wins-first-crypto-bank-charter-in-us-history/|title=Cracking Landlocked Wyoming, Kraken Wins First Crypto Bank Charter In U.S. History|last=Brett|first=Jason|website=Forbes|language=en|access-date=2024-02-23}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.natlawreview.com/article/first-cryptocurrency-bank|title=The First Cryptocurrency Bank|website=The National Law Review|language=en|access-date=2022-07-03}}</ref> 2021 की शुरुआत में, क्रैकन ने निवेशकों से $20 बिलियन से अधिक के मूल्यांकन पर अतिरिक्त धन की मांग की, जिसमें ट्राइब कैपिटल हमिंगबर्ड वेंचर्स और अर्जुन सेठी को निदेशक मंडल में नियुक्त किए जाने के बाद कंपनी का दूसरा सबसे बड़ा संस्थागत निवेशक बन गया।<ref name="Bloomberg Tribe2">{{Cite news|url=https://www.bloomberg.com/news/articles/2021-05-20/crypto-platform-kraken-adds-tribe-capital-s-sethi-to-its-board?sref=eDGWeidQ|title=Crypto Platform Kraken Adds Tribe Capital's Sethi to Its Board|last=Tan|first=Gillian|date=20 May 2021|work=Bloomberg}}</ref>&nbsp; जनवरी 2021 में, क्रैकन ने अंतर्राष्ट्रीय उपयोगकर्ताओं के लिए एक [[मोबाइल अनुप्रयोग|मोबाइल ऐप]] जारी किया, जो जून 2021 में अमेरिका में उपलब्ध हो गया।<ref>{{Cite web|url=https://www.cnbc.com/2021/06/02/kraken-launched-mobile-app-in-us-for-bitcoin-and-ethereum-purchases.html|title=Coinbase rival Kraken launches mobile app in U.S. to capitalize on crypto surge|last=Sigalos|first=MacKenzie|date=2021-06-02|website=CNBC|language=en|access-date=2021-10-07}}</ref> नवंबर 2022 में, कंपनी ने अपने [[एनएफटी|अपूरणीय टोकन]] (एनएफटी) मार्केटप्लेस का बीटा संस्करण लॉन्च किया।<ref>{{Cite web|url=https://markets.businessinsider.com/news/currencies/crypto-exchange-kraken-opens-waitlist-for-gasless-nft-marketplace-1031871668|title=Crypto Exchange Kraken Launches 'Gasless' NFT Marketplace|website=markets.businessinsider.com|language=en|access-date=2022-11-22|archive-date=22 नवंबर 2022|archive-url=https://web.archive.org/web/20221122141255/https://markets.businessinsider.com/news/currencies/crypto-exchange-kraken-opens-waitlist-for-gasless-nft-marketplace-1031871668|url-status=dead}}</ref> जून 2023 में, क्रैकन के एनएफटी मार्केटप्लेस ने आधिकारिक तौर पर बीटा परीक्षण से बाहर लॉन्च किया, जिसमें उपयोगकर्ताओं को फिएट या क्रिप्टोक्यूरेंसी के माध्यम से लिस्टिंग के लिए भुगतान करने का विकल्प था।<ref>{{Cite web|url=https://au.finance.yahoo.com/news/kraken-nft-marketplace-launches-support-172648842.html|title=Kraken NFT Marketplace Launches With Support for Ethereum, Solana and Polygon Collections|date=2023-06-08|website=Yahoo News|language=en-AU|access-date=2024-07-16}}</ref> सितंबर 2023 में, ब्लूमबर्ग ने बताया कि क्रैकन ने पहली बार क्रिप्टोक्यूरेंसी के बाहर व्यापार करने की योजना बनाई, यूएस-सूचीबद्ध शेयरों और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड में व्यापार की पेशकश करके।<ref>{{Cite news|url=https://www.bloomberg.com/news/articles/2023-09-27/crypto-exchange-kraken-to-offer-trading-in-us-stocks-rivaling-robinhood-hood|title=Crypto Exchange Kraken Plans to Offer Trading in US-Listed Stocks|last=Irrera|first=Anna|date=27 September 2023|work=bloomberg|access-date=26 October 2023}}</ref> मार्च 2024 में, क्रैकन ने क्रैकन इंस्टीट्यूशनल नामक एक नई इकाई शुरू की, जिसका उद्देश्य संस्थागत निवेशकों, हेज फंड और ईटीएफ जारीकर्ताओं को सेवा प्रदान करना था।<ref>{{Cite web|url=https://news.bloomberglaw.com/crypto/kraken-crypto-exchange-starts-unit-for-institutional-customers|title=Kraken Crypto Exchange Starts Unit for Institutional Customers|website=news.bloomberglaw.com|language=en|access-date=2024-07-16}}</ref> अप्रैल 2024 में, क्रैकन ने आठ ब्लॉकचेन का समर्थन करते हुए, कंपनी का अपना क्रिप्टो वॉलेट "क्रैकन वॉलेट" जारी किया।<ref>{{Cite web|url=https://finance.yahoo.com/news/kraken-launches-open-source-self-073351559.html|title=Kraken Launches Open-Source, Self-Custodial Crypto Wallet|date=2024-04-18|website=Yahoo Finance|language=en-US|access-date=2024-06-03}}</ref> == यह भी देखें == * बिनेंस * बिटफिनेक्स * कॉइनबेस * मिथुन राशि * माउंट गोक्स * आईजेएक्स == संदर्भ == 00ryut6zcfoomibhrbqwbycjzs8r80s ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2010 0 1583387 6543725 6543240 2026-04-25T02:28:19Z खास विशेष 810972 /* प्रारंभिक प्रतियोगिता */ संदर्भ अपडेट 6543725 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Ximena Navarrete - Miss Universe 2010.jpg | caption = ज़िमेना नवारेटे | winner = [[ज़िमेना नवारेटे]] | congeniality = जेसिंटा कैम्पबेल, ऑस्ट्रेलिया | photogenic = फोंथिप वाचरात्रकुल, थाईलैंड | best national costume = फोंथिप वाचरात्रकुल, थाईलैंड | date = 23 अगस्त 2010 | venue = मंडाले बे इवेंट्स सेंटर, [[लास वेगास]], [[नेवाडा]], संयुक्त राज्य अमेरिका | presenters = {{Hlist|ब्रेट माइकल्स | नताली मोरालेस}} | acts = {{Hlist|जॉन लीजेंड|द रूट्स|सर्क डू सोलेल}} | broadcaster = {{Hlist|[[एनबीसी]] <small>(केवीबीसी-डीटी)</small>|[[टेलीमंडो]] <small>(केबीएलआर)</small>}} | entrants = 83 | placements = 15 | withdrawals ={{Hlist|बुल्गारिया | केमैन द्वीप समूह | एस्टोनिया | इथियोपिया | आइसलैंड | मोंटेनेग्रो | नामीबिया | वियतनाम}} | returns = {{Hlist|बोत्सवाना | ब्रिटिश वर्जिन द्वीप समूह | डेनमार्क | हैती | कजाकिस्तान | श्रीलंका | त्रिनिदाद और टोबैगो | संयुक्त राज्य वर्जिन द्वीप समूह}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2009|2009]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2011|2011]] |represented=मेक्सिको}} '''ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2010''' या '''मिस यूनीवर्स 2010''' प्रतियोगिता का 59वां संस्करण था, जो 23 अगस्त 2010 को मंडले बे इवेंट्स सेंटर, [[लास वेगास]], [[नेवाडा]], [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] में आयोजित हुआ।<ref name=":0">{{Cite web |date=24 August 2010 |title=Miss Universe 2010 coronation night starts; airs live on ABS-CBN |url=https://news.abs-cbn.com/entertainment/08/24/10/miss-universe-2010-coronation-night-starts-airs-live-abs-cbn |access-date=22 June 2022 |website=[[ABS-CBN News]] |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622014951/https://news.abs-cbn.com/entertainment/08/24/10/miss-universe-2010-coronation-night-starts-airs-live-abs-cbn |url-status=dead }}</ref><ref>{{Cite news |date=24 August 2010 |title=Mexico's Jimena Navarrete wins Miss Universe contest |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/idINIndia-51020720100824 |access-date=26 June 2022 |archive-date=26 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220626131228/https://www.reuters.com/article/idINIndia-51020720100824 |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[वेनेजुएला]] की [[स्टीफेनिया फर्नांडीज]] ने [[मेक्सिको]] की ज़िमेना नवारेटे को मिस यूनिवर्स 2010 का ताज पहनाया। यह मेक्सिको की दूसरी जीत थी, पहली जीत 1991 में हुई थी।<ref>{{Cite web |date=24 August 2010 |title=Miss Universe 2010 |url=https://www.cbsnews.com/pictures/miss-universe-2010/ |access-date=22 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622014951/https://www.cbsnews.com/pictures/miss-universe-2010/ |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=24 August 2010 |title=Ximena Navarrete ¿Quién es la Miss Universo 2010? |url=https://www.quien.com/espectaculos/2010/08/24/ximena-navarrete-quien-es-la-miss-universo-2010 |access-date=22 June 2022 |website=Quién |language=es |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622014951/https://www.quien.com/espectaculos/2010/08/24/ximena-navarrete-quien-es-la-miss-universo-2010 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 83 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया। इसे ब्रेट माइकल्स और नैटली मोरालेस ने होस्ट किया।<ref>{{Cite magazine |date=3 August 2010 |title=Bret Michaels To Co-Host 'Miss Universe' Pageant |url=https://www.billboard.com/music/music-news/bret-michaels-to-co-host-miss-universe-pageant-957066/ |access-date=22 June 2022 |magazine=[[Billboard (magazine)|Billboard]] |language=en-US |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622014951/https://www.billboard.com/music/music-news/bret-michaels-to-co-host-miss-universe-pageant-957066/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता में जॉन लीजेंड, द रूट्स और सर्क डू सोलेय ने प्रस्तुति दी।<ref name=":0" /><ref>{{Cite magazine |last=Vick |first=Megan |date=24 August 2010 |title=John Legend And The Roots Perform At Miss Universe Pageant |url=https://www.billboard.com/music/music-news/john-legend-and-the-roots-perform-at-miss-universe-pageant-956698/ |access-date=22 June 2022 |magazine=[[Billboard (magazine)|Billboard]] |language=en-US |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622014950/https://www.billboard.com/music/music-news/john-legend-and-the-roots-perform-at-miss-universe-pageant-956698/ |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:Evo 2017 at Mandalay Bay Events Center.jpg|thumb|250x250px|मंडले बे इवेंट्स सेंटर, मिस यूनिवर्स 2010 का आयोजन स्थल]] ===स्थान और तिथि=== दुनिया भर के कई शहरों ने इस प्रतियोगिता की मेजबानी करने में रुचि व्यक्त की थी। इन शहरों में से एक ज़ाग्रेब, क्रोएशिया भी था, जिसने पहले 2009 में प्रतियोगिता की मेजबानी के लिए अपनी बोली वापस ले ली थी। क्रोएशियाई सरकार और स्थानीय निवेशकों ने प्रतियोगिता के लिए अपना प्रस्ताव फिर से प्रस्तुत किया, जो एरीना ज़ाग्रेब में आयोजित होने वाली थी।<ref>{{Cite web |date=30 November 2009 |title=Izbor za Miss Universe: Trump se nećka između Splita i Zagreba |url=https://www.index.hr/clanak.aspx?id=462733 |access-date=22 June 2022 |website=[[Index.hr]] |language=hr |archive-date=20 November 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231120090055/https://www.index.hr/magazin/clanak/izbor-za-miss-universe-trump-se-necka-izmedju-splita-i-zagreba/462733.aspx |url-status=live }}</ref> हालांकि, 20 फरवरी 2010 को मिस यूनिवर्स क्रोएशिया के राष्ट्रीय निदेशक व्लादिमीर क्राजेलविक ने घोषणा की कि 2008 के वित्तीय संकट के कारण क्रोएशिया पर पड़े प्रभावों की वजह से देश ने प्रतियोगिता की मेजबानी के लिए अपनी बोली वापस ले ली।<ref>{{Cite web |date=20 February 2010 |title=Miss Universe: Recesija pomutila planove direkciji izbora ljepote |url=https://www.index.hr/clanak.aspx?id=476874 |access-date=22 June 2022 |website=[[Index.hr]] |language=hr |archive-date=20 November 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231120090952/https://ow.pubmatic.com/setuid?bidder=amx&uid=499c3f5c-d1aa-42ef-82e2-92fd1db5e7d7&do=www.index.hr |url-status=live }}</ref> 31 जनवरी 2010 को मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन 2010 की प्रतियोगिता को सांता क्रूज़ डे ला सिएरा, बोलीविया में आयोजित करने के लिए बातचीत कर रहा था, जब मिस यूनिवर्स आयोग ने यह आकलन करने के लिए बोलीविया का दौरा किया कि क्या यह शहर प्रतियोगिता की मेजबानी करने में सक्षम है।<ref>{{Cite web |date=1 February 2010 |title=Comisión del Miss Universo se quedara en Bolivia el lapso de cuatro semanas para concluir su evalución |url=http://www.la-razon.com/ultima.asp?id=946988 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20100211153309/http://www.la-razon.com/ultima.asp?id=946988 |archive-date=11 February 2010 |access-date=22 June 2022 |website=[[La Razón (La Paz)|La Razón]]}}</ref><ref>{{Cite web |last= |first= |date=4 February 2010 |title=Sede del Miss Universo ¿En Bolivia? |url=https://www.laprensa.hn/espectaculos/sede-del-miss-universo-en-bolivia-NALP504339 |access-date=22 June 2022 |website=[[La Prensa (Honduras)|La Prensa]] |language=es-HN |archive-date=15 October 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231015072236/https://www.laprensa.hn/espectaculos/sede-del-miss-universo-en-bolivia-NALP504339 |url-status=live }}</ref> हालांकि, आयोग के बोलीविया दौरे के दौरान, संस्कृति मंत्री जुल्मा यूगार ने सार्वजनिक रूप से संगठन की मांगों के अनुसार प्रतियोगिता की मेजबानी करने में आने वाली कठिनाइयों को स्वीकार किया। मार्च 2010 में ला पाज़ में आयोजित एक बैठक के बाद, यूगार ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि सांता क्रूज़ ने प्रतियोगिता की मेजबानी के लिए अपनी बोली वापस ले ली, यह आरोप लगाते हुए कि संगठन ने "बोलीविया के संविधान का अनादर किया" और संगठन की मांगें आर्थिक रूप से पूरी करना असंभव हैं।<ref>{{Cite web |date=13 March 2010 |title=La comisión de negociación estuvo reunida dos días en La Paz |url=https://www.lostiempos.com/click/farandula/farandula/20100313/la-comision-de-negociacion-estuvo-reunida-dos-dias-en-la_61389_111021.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20100316075611/https://www.lostiempos.com/click/farandula/farandula/20100313/la-comision-de-negociacion-estuvo-reunida-dos-dias-en-la_61389_111021.html |archive-date=16 March 2010 |access-date=22 June 2022 |website=[[Los Tiempos]]}}</ref> कई शहरों द्वारा प्रतियोगिता की मेजबानी के लिए अपनी बोली वापस लेने के बाद, 25 मई 2010 को मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन ने पुष्टि की कि यह प्रतियोगिता 23 अगस्त 2010 को मंडाले बे इवेंट्स सेंटर, लास वेगास, नेवादा, संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित होगी।<ref name=":1">{{Cite web |last= |first= |date=25 May 2010 |title=The 2010 Miss Universe® Pageant to Air Live on NBC From Las Vegas on Monday, August 23 |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/the-2010-miss-universe-pageant-to-air-live-on-nbc-from-las-vegas-on-monday-august-23-94822699.html |access-date=22 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=22 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220622021952/https://www.prnewswire.com/news-releases/the-2010-miss-universe-pageant-to-air-live-on-nbc-from-las-vegas-on-monday-august-23-94822699.html |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ८३ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से दो प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया, और एक अन्य को तब विजेता घोषित किया गया जब संगठन को पता चला कि फाइनलिस्टों की रैंकिंग में त्रुटि थी। जेसिका शेल, जो मिस ग्वाटेमाला 2010 की द्वितीय रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा बारिलास के पैर में चोट लगने के बाद ग्वाटेमाला का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया। बारिलास ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=24 August 2010 |title=Miss Universo 2010: Jessica Scheel y Guatemala se sumaron a la fiesta |url=http://www.lavozlibre.com/noticias/ampliar/97713/miss-universo-2010-jessica-scheel-y-guatemala-se-sumaron-a-la-fiesta |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120301112627/http://www.lavozlibre.com/noticias/ampliar/97713/miss-universo-2010-jessica-scheel-y-guatemala-se-sumaron-a-la-fiesta |archive-date=1 March 2012 |access-date=23 June 2022 |website=Voz Libre}}</ref> अलेक्जेंड्रा कैटालिना फिलिप, मिस यूनिवर्स रोमानिया 2010, को उनकी प्रथम रनर-अप ओआना पावेलुक से बदल दिया गया, क्योंकि उन्होंने मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था, जो उन्हें दक्षिण कोरिया में एक बड़े नृत्य प्रतियोगिता में रोमानिया का प्रतिनिधित्व करने से रोकता था।<ref>{{Cite web |date=10 July 2010 |title=Alexandra Cătălina Filip a câştigat concursul Miss Univers România |url=https://www.zf.ro/zf-24/alexandra-catalina-filip-a-castigat-concursul-miss-univers-romania-galerie-foto-6534936 |access-date=23 June 2022 |website=[[Ziarul Financiar]] |language=ro |archive-date=23 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220623021455/https://www.zf.ro/zf-24/alexandra-catalina-filip-a-castigat-concursul-miss-univers-romania-galerie-foto-6534936 |url-status=live }}</ref><ref name=":2">{{Cite web |last=Navadaru |first=Cosmin |date=14 July 2010 |title=Catalina Filip a renuntat la titlul de Miss Universe Romania 2010 |url=https://life.hotnews.ro/stiri-showbiz-7582839-catalina-filip-renuntat-titlul-miss-universe-romania-2010.htm |access-date=23 June 2022 |website=[[HotNews]] |language=ro |archive-date=15 August 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220815103657/https://life.hotnews.ro/stiri-showbiz-7582839-catalina-filip-renuntat-titlul-miss-universe-romania-2010.htm |url-status=live }}</ref> सेरेनाय सारीकाया, मिस टर्की यूनिवर्स 2010, को गिज़ेम मेमिच, मिस टर्की 2010, से बदल दिया गया, क्योंकि वह अपने अभिनय करियर को जारी रखना चाहती थीं।<ref>{{Cite web |date=14 August 2010 |title=Serenay yerine Las Vegas'a Gizem gitti |url=http://www.hurriyet.com.tr/magazin/magazinhatti/15547564.asp |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20100817022719/http://www.hurriyet.com.tr/magazin/magazinhatti/15547564.asp |archive-date=17 August 2010 |access-date=22 June 2022 |website=[[Hürriyet]]}}</ref> सैंड्रा मारिनोविच को मूल रूप से मिस यूनिवर्स स्लोवेनिया 2010 का ताज पहनाया गया था। हालांकि, जजों के अंकों को लिखने में गणना संबंधी त्रुटि पाए जाने के बाद, तीन दिनों के भीतर उनसे ताज वापस ले लिया गया। आधिकारिक विजेता मारिका सावशेक थीं, जिन्हें पहले द्वितीय रनर-अप स्थान दिया गया था।<ref name=":3">{{Cite web |date=17 May 2010 |title=Škandal: Mis ni Sandra, mis je Marika! |url=https://www.rtvslo.si/zabava-in-slog/popkultura/druzabno/skandal-mis-ni-sandra-mis-je-marika/230382 |access-date=23 June 2022 |website=[[Radiotelevizija Slovenija]] |language=sl |archive-date=23 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220623072352/https://www.rtvslo.si/zabava-in-slog/popkultura/druzabno/skandal-mis-ni-sandra-mis-je-marika/230382 |url-status=live }}</ref> वीनस राज को मूल रूप से बिनिबिनिंग पिलिपिनास यूनिवर्स 2010 का ताज पहनाया गया था। हालांकि, उनके जन्म प्रमाण पत्र में असंगतियों के कारण उनसे यह खिताब वापस ले लिया गया।<ref>{{Cite web |date=31 March 2010 |title=2010 Bb. Pilipinas Universe dethroned |url=https://www.philstar.com/news-commentary/2010/03/31/562512/2010-bb-pilipinas-universe-dethroned |access-date=23 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=15 October 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231015080743/https://www.philstar.com/news-commentary/2010/03/31/562512/2010-bb-pilipinas-universe-dethroned |url-status=live }}</ref> यह खिताब हेलेन निकोलेट हेंसन को दिया गया, जो बिनिबिनिंग पिलिपिनास 2010 की द्वितीय रनर-अप थीं। हालांकि, अपने पदच्युत (डिथ्रोन) होने के दो महीने बाद, राज ने कानूनी फिलीपीन पासपोर्ट प्राप्त करने के बाद फिर से बिनिबिनिंग पिलिपिनास यूनिवर्स 2010 का अपना खिताब वापस हासिल कर लिया।<ref name=":4">{{Cite web |date=10 April 2010 |title=(UPDATE) Venus Raj given chance to reclaim Bb Pilipinas-Universe title |url=https://news.abs-cbn.com/entertainment/04/10/10/venus-raj-given-chance-reclaim-bb-pilipinas-universe-title |access-date=23 June 2022 |website=[[ABS-CBN News]] |archive-date=25 October 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20211025130248/https://news.abs-cbn.com/entertainment/04/10/10/venus-raj-given-chance-reclaim-bb-pilipinas-universe-title |url-status=dead }}</ref> 2010 संस्करण में बोत्सवाना, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, डेनमार्क, हैती, कज़ाख़स्तान, श्रीलंका, त्रिनिदाद और टोबैगो और संयुक्त राज्य वर्जिन आइलैंड्स की वापसी हुई। हैती ने आखिरी बार 1989 में भाग लिया था, जिससे यह दो दशकों के बाद देश की पहली भागीदारी बनी। ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स ने आखिरी बार 2002 में, बोत्सवाना ने 2004 में, संयुक्त राज्य वर्जिन आइलैंड्स ने 2007 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2008 में भाग लिया था। बुल्गारिया, केमैन आइलैंड्स, एस्टोनिया, इथियोपिया, आइसलैंड, मोंटेनेग्रो, नामीबिया और वियतनाम ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। निकोलिना लोंचार, मिस मोंटेनेग्रो 2010, को कम उम्र होने के कारण [[मॉन्टेनीग्रो]] की प्रतिनिधि के रूप में मारिजाना पोक्राजाक से बदल दिया गया। हालांकि, पोक्राजाक ने अज्ञात कारणों से नाम वापस ले लिया। लोंचार ने [[मिस यूनीवर्स 2011|अगले वर्ष]] प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{Cite web |last=Jovanović |first=Filip |date=31 May 2011 |title=Nikolina Lončar iz Pljevalja predstavlja Crnu Goru na izboru za Mis univerzuma |url=http://www.vijesti.me/zivot/nikolina-loncar-pljevalja-predstavlja-crnu-goru-izboru-mis-univerzuma-clanak-22270 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20111004235532/http://www.vijesti.me/zivot/nikolina-loncar-pljevalja-predstavlja-crnu-goru-izboru-mis-univerzuma-clanak-22270 |archive-date=4 October 2011 |access-date=26 June 2022 |website=[[Vijesti]]}}</ref> ओडिल गर्ट्ज़े, मिस नामीबिया 2010, ने इसलिए नाम वापस लिया क्योंकि उन्हें मिस यूनिवर्स 2010 की आधिकारिक शुरुआत से केवल एक सप्ताह पहले ताज पहनाया गया था। फाम थी थान हैंग ने तैयारी की कमी के कारण नाम वापस ले लिया।<ref>{{Cite web |last= |date=7 February 2021 |title=5 mỹ nhân khước từ cơ hội thi Miss Universe: Thanh Hằng gây tiếc nuối, Diễm Trang sợ thiếu thời gian |url=https://saostar.vn/giai-tri/5-nguoi-dep-viet-nhat-dinh-tu-choi-thi-miss-universe-20210119163600394.html |access-date=23 June 2022 |website=Saostar.vn |language=vi |archive-date=11 May 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20210511141331/https://saostar.vn/giai-tri/5-nguoi-dep-viet-nhat-dinh-tu-choi-thi-miss-universe-20210119163600394.html |url-status=live }}</ref> बुल्गारिया, केमैन आइलैंड्स, एस्टोनिया, इथियोपिया और आइसलैंड ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उनके संबंधित संगठनों ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।<ref>{{cite news |last=Levy |first=Jewel |date=7 September 2009 |title=Miss Cayman pageant cancelled |work=Caymanian Compass |url=http://www.caycompass.com/cgi-bin/CFPnews.cgi?ID=10385279 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20110728062540/http://www.caycompass.com/cgi-bin/CFPnews.cgi?ID=10385279 |archive-date=28 July 2011}}</ref> ==परिणाम== [[Image:Miss Universe 2010 Map.png|thumb|250x250px|मिस यूनिवर्स 2010 में भाग लेने वाले देश और क्षेत्र।|alt=]] ===प्लेसमेंट=== {| class="wikitable sortable" style="font-size:95%;" |- ! प्लेसमेंट !! प्रतियोगी |- | मिस यूनिवर्स 2010 | * {{flagu|मेक्सिको}} – [[ज़िमेना नवारेटे]]<ref name=":9">{{Cite web |last=Santiago |first=Erwin |date=24 August 2010 |title=Maria Venus Raj is fourth runner-up in Miss Universe 2010; Mexico takes the crown |url=https://www.pep.ph/lifestyle/23013/maria-venus-raj-is-fourth-runner-up-in-miss-universe-2010-mexico-takes-the-crown |access-date=9 October 2023 |website=PEP.ph |language=en |archive-date=15 October 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20231015072235/https://www.pep.ph/lifestyle/23013/maria-venus-raj-is-fourth-runner-up-in-miss-universe-2010-mexico-takes-the-crown |url-status=live }}</ref> |- | प्रथम उपविजेता | * {{flagu|जमैका}} – येंडी फिलिप्स<ref name=":9" /> |- | द्वितीय उपविजेता | * {{flagu|ऑस्ट्रेलिया}} – जेसिन्टा कैंपबेल<ref name=":9" /> |- | तीसरा उपविजेता | * {{flagu|यूक्रेन}} – अन्ना पोस्लावस्का<ref name=":9" /> |- | चौथा उपविजेता | * {{flagu|फिलिपींस}} – वीनस राज<ref name=":9" /> |- | शीर्ष 10<ref name=":9" /> | * {{flagu|अल्बानिया}} – एंजेला मार्टिनी * {{flagu|ग्वाटेमाला}} – जेसिका शील * {{flagu|आयरलैंड}} – रोजाना पर्सेल * [[पोर्टो रीको]] – मारियाना विसेंट * {{flagu|दक्षिण अफ्रीका}} – निकोल फ्लिंट |- | शीर्ष 15<ref name=":9" /> | * {{flagu|बेल्जियम}} – सिलौ एनीस * {{flagu|कोलंबिया}} – नतालिया नवारो * {{flagu|चेक रिपब्लिक}} – जित्का बोहो * {{flagu|फ्रांस}} – मलिका मेनार्ड * {{flagu|रूस}} – इरिना एंटोनेंको |} ==== अंतिम स्कोर ==== {| class="wikitable sortable" style="font-size:95%;" !देश/क्षेत्र !स्विमसूट !शाम का गाउन |- | style="background-color:#FADADD;" |'''{{flag|मेक्सिको}}<ref name=":9" />''' | style="background-color:#FADADD;" |9.265 (2) | style="background-color:#FADADD;" |8.913 (1) |- | style="background-color:#eadafd;" |{{flag|जमैका}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#eadafd;" |9.426 (1) | style="background-color:#eadafd;" |8.884 (2) |- | style="background-color:#ccff99;" |{{flag|ऑस्ट्रेलिया}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ccff99;" |8.543 (5) | style="background-color:#ccff99;" |8.841 (3) |- | style="background-color:#ffff99;" |{{flag|यूक्रेन}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffff99;" |8.333 (7) | style="background-color:#ffff99;" |8.743 (4) |- | style="background-color:#d9eefb;" |{{flag|फिलिपींस}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#d9eefb;" |8.957 (3) | style="background-color:#d9eefb;" |8.714 (5) |- | style="background-color:#ffdf9b;" |{{flag|अल्बानिया}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffdf9b;" |8.229 (8) | style="background-color:#ffdf9b;" |8.693 (6) |- | style="background-color:#ffdf9b;" |{{flag|आयरलैंड}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffdf9b;" |8.784 (4) | style="background-color:#ffdf9b;" |8.548 (7) |- | style="background-color:#ffdf9b;" |{{flag|दक्षिण अफ्रीका}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffdf9b;" |8.229 (8) | style="background-color:#ffdf9b;" |8.420 (8) |- | style="background-color:#ffdf9b;" |{{flag|ग्वाटेमाला}}<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffdf9b;" |8.071 (10) | style="background-color:#ffdf9b;" |8.286 (9) |- | style="background-color:#ffdf9b;" |[[पोर्टो रीको]]<ref name=":9" /> | style="background-color:#ffdf9b;" |8.443 (6) | style="background-color:#ffdf9b;" |7.971 (10) |- |{{flag|रूस}}<ref name=":9" /> |7.843 (11) | rowspan="6" | |- |{{flag|कोलंबिया}}<ref name=":9" /> |7.643 (12) |- |{{flag|फ्रांस}}<ref name=":9" /> |7.586 (13) |- |{{flag|बेल्जियम}}<ref name=":9" /> |7.571 (14) |- |{{flag|चेक रिपब्लिक}}<ref name=":9" /> |7.429 (15) |} ===विशेष पुरस्कार === {| class="wikitable sortable" style="font-size:95%;" |- ! पुरस्कार ! प्रतियोगी |- | मिस कोंगेनीयलिटी | * {{flag|ऑस्ट्रेलिया}} – जेसिंटा कैंपबेल<ref name=":8">{{Cite web |last= |date=23 August 2010 |title=22-year-old Mexico woman crowned Miss Universe |url=http://www.nevadaappeal.com/news/2010/aug/23/22-year-old-mexico-woman-crowned-miss-universe/ |access-date=23 June 2022 |website=[[Nevada Appeal]] |archive-date=8 January 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230108055241/https://www.nevadaappeal.com/news/2010/aug/23/22-year-old-mexico-woman-crowned-miss-universe/ |url-status=live }}</ref> |- | मिस फोटोजेनिक | rowspan="2" | * {{flag|थाईलैंड}} – फोंथिप वाचरात्राकुल<ref name=":8" /> |- | सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पोशाक |} ==प्रतियोगिता== ===प्रारूप=== [[मिस यूनीवर्स 2007|2007]] की तरह ही, पंद्रह सेमीफाइनलिस्ट प्रारंभिक प्रतियोगिता के माध्यम से चुने गए— जिसमें स्विमसूट और ईवनिंग गाउन प्रतियोगिताएँ तथा बंद कमरे में साक्षात्कार शामिल थे। पंद्रह सेमीफाइनलिस्टों ने स्विमसूट प्रतियोगिता में भाग लिया और इसके बाद उनकी संख्या घटाकर दस कर दी गई। दस सेमीफाइनलिस्टों ने ईवनिंग गाउन प्रतियोगिता में भाग लिया और इसके बाद उनकी संख्या घटाकर पाँच कर दी गई। पाँच फाइनलिस्टों ने प्रश्न-उत्तर चरण और अंतिम प्रस्तुति (फाइनल लुक) में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=23 August 2010 |title=Miss Mexico crowned Miss Universe 2010 |url=https://www.newsday.com/entertainment/celebrities/miss-mexico-jimena-navarrete-wins-miss-universe-2010-w62668 |access-date=26 June 2022 |website=[[Newsday]] |language=en |archive-date=26 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220626130424/https://www.newsday.com/entertainment/celebrities/miss-mexico-jimena-navarrete-wins-miss-universe-2010-w62668 |url-status=live }}</ref> === चयन समिति === ==== प्रारंभिक प्रतियोगिता ==== * बासिम शमी – फारूक सिस्टम्स के अध्यक्ष<ref name=":5">{{Cite web |last= |first= |date=21 August 2010 |title=Guam's Vanessa Torres Takes the Stage at Miss Universe Contest in Las Vegas |url=https://www.pncguam.com/guams-vanessa-torres-takes-the-stage-at-miss-universe-contest-in-las-vegas/ |access-date=23 June 2022 |website=[[KTGM|PNC News First]] |language=en-US |archive-date=8 January 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230108055238/https://www.pncguam.com/guams-vanessa-torres-takes-the-stage-at-miss-universe-contest-in-las-vegas/ |url-status=live }}</ref> * बीजे कोलमैन – प्रचारक, पत्रकार और टेलीविजन व्यक्तित्व<ref name=":5" /> * कार्लोस ब्रेमर - वैल्यू ग्रुपो फाइनेंसिएरो के सीईओ और जनरल डायरेक्टर<ref name=":5" /> * कोरिन निकोलस - ट्रम्प मॉडल मैनेजमेंट की अध्यक्ष<ref name=":5" /> * लुई बर्गडॉर्फ - एमएसएनबीसी के जो स्कारबोरो और मीका ब्रेज़िंस्की के लिए टैलेंट प्रोड्यूसर<ref name=":5" /> * नताली रोटमैन - टेलीविजन होस्ट और फैशन विशेषज्ञ<ref name=":5" /> * सैडॉक्स किम - टेलीविजन निर्माता<ref name=":5" /> ==== अंतिम प्रसारण ==== *निकी टेलर – मॉडल<ref name=":6">{{Cite web |date=18 August 2010 |title=Baldwin, Phillips to judge Miss Universe |url=https://www.upi.com/Entertainment_News/Movies/2010/08/18/Baldwin-Phillips-to-judge-Miss-Universe/90841282150742/ |access-date=26 June 2022 |website=[[United Press International]] |language=en |archive-date=2 July 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220702084550/https://www.upi.com/Entertainment_News/Movies/2010/08/18/Baldwin-Phillips-to-judge-Miss-Universe/90841282150742/ |url-status=live }}</ref> *विलियम बाल्डविन – अभिनेता, निर्माता और लेखक<ref name=":6" /><ref name=":7">{{Cite web |last=McKay |first=Mary-Jayne |date=20 August 2010 |title=Miss Universe 2010: Costume Controversies Amid Final Preparations for Pageant |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-universe-2010-costume-controversies-amid-final-preparations-for-pageant/ |access-date=26 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=26 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220626130424/https://www.cbsnews.com/news/miss-universe-2010-costume-controversies-amid-final-preparations-for-pageant/ |url-status=live }}</ref> *चिनना फिलिप्स - गायिका और अभिनेत्री<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *इवान लिसासेक - ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता फिगर स्केटर और ''डांसिंग विद द स्टार्स'' के फाइनलिस्ट<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *टैमरोन हॉल – [[एमएसएनबीसी]] की एंकर<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *चैज़ पाल्मिंटेरी – अभिनेता और लेखक<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *जेन सीमोर - अभिनेत्री और ''डांसिंग विद द स्टार्स'' की प्रतिभागी<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *क्रिस एंजेल – जादूगर और संगीतकार<ref name=":6" /><ref name=":7" /> *शीला ई. – संगीतकार<ref name=":6" /><ref name=":7" /> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|30em}} ==बाहरी कड़ियाँ== {{कॉमन्स श्रेणी|मिस यूनिवर्स}} *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी:मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी:सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी:वर्षानुसार मिस यूनिवर्स]] h679w4vjwjue2fqpufbakj7omrspytm मिस यूनीवर्स 2011 0 1583573 6543720 6543497 2026-04-25T02:15:46Z खास विशेष 810972 /* वापसी और निकासी */ सन्दर्भ जोड़ा 6543720 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg | caption = [[लेइला लोपेस]] | winner = [[लेइला लोपेस]] |represented=अंगोला | congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]] | best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]] | photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]] | date = 12 सितंबर 2011 | venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] | presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}} | entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}} | broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}} | entrants = 89 | placements = 16 | withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}} | returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]] }} '''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया। इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]] ===स्थान और तिथि=== 16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी। यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई। जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया। यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया। ====प्रतिस्थापन==== एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref> मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref> माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref> इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref> ====वापसी और निकासी==== 2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई। पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था। नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।<ref name=":2">{{Cite web |date=2 September 2011 |title=Miss Universe 2011: India pins hope on Vasuki |url=https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |access-date=17 June 2022 |website=[[CNN-News18]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |url-status=live }}</ref> सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{cite news |last=Marit |first=Nore |date=30 September 2012 |title=Ble ikke Miss Universe Norge |language=nb |newspaper=[[Aftenbladet]] |url=http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |url-status=dead |access-date=12 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150227124134/http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |archive-date=27 February 2015}}</ref> ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] jabppz1i4t3f9jprreln7s5uexgv7ox 6543721 6543720 2026-04-25T02:16:51Z खास विशेष 810972 /* वापसी और निकासी */ सन्दर्भ जोड़ा 6543721 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg | caption = [[लेइला लोपेस]] | winner = [[लेइला लोपेस]] |represented=अंगोला | congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]] | best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]] | photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]] | date = 12 सितंबर 2011 | venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] | presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}} | entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}} | broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}} | entrants = 89 | placements = 16 | withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}} | returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]] }} '''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया। इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]] ===स्थान और तिथि=== 16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी। यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई। जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया। यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया। ====प्रतिस्थापन==== एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref> मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref> माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref> इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref> ====वापसी और निकासी==== 2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई। पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था। नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।<ref name=":2">{{Cite web |date=2 September 2011 |title=Miss Universe 2011: India pins hope on Vasuki |url=https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |access-date=17 June 2022 |website=[[CNN-News18]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |url-status=live }}</ref> सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{cite news |last=Marit |first=Nore |date=30 September 2012 |title=Ble ikke Miss Universe Norge |language=nb |newspaper=[[Aftenbladet]] |url=http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |url-status=dead |access-date=12 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150227124134/http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |archive-date=27 February 2015}}</ref> ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।<ref name=":2" /> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] kaulnjf2vcolksa9sdh6q4qcd3ntz5p 6543722 6543721 2026-04-25T02:18:10Z खास विशेष 810972 /* वापसी और निकासी */ सन्दर्भ जोड़ा 6543722 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg | caption = [[लेइला लोपेस]] | winner = [[लेइला लोपेस]] |represented=अंगोला | congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]] | best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]] | photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]] | date = 12 सितंबर 2011 | venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] | presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}} | entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}} | broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}} | entrants = 89 | placements = 16 | withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}} | returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]] }} '''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया। इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]] ===स्थान और तिथि=== 16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी। यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई। जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया। यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया। ====प्रतिस्थापन==== एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref> मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref> माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref> इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref> ====वापसी और निकासी==== 2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई। पुर्तगाल ने आखिरी बार 2002 में, चिली ने 2006 में, सेंट लूसिया ने 2007 में, तुर्क्स और कैकोस ने 2008 में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार 2009 में भाग लिया था। नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।<ref name=":2">{{Cite web |date=2 September 2011 |title=Miss Universe 2011: India pins hope on Vasuki |url=https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |access-date=17 June 2022 |website=[[CNN-News18]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |url-status=live }}</ref> सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{cite news |last=Marit |first=Nore |date=30 September 2012 |title=Ble ikke Miss Universe Norge |language=nb |newspaper=[[Aftenbladet]] |url=http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |url-status=dead |access-date=12 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150227124134/http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |archive-date=27 February 2015}}</ref> ज़ाम्बिया ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।<ref name=":2" /> लिसा मॉर्गन को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन ने उनकी भागीदारी को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने मिस इंटरनेशनल 2011 में भाग लिया, जो चेंगदू, चीन में आयोजित हुई थी।<ref>{{Cite web |last=Antonio |first=Winstone |date=19 August 2017 |title=Former Miss Universe Zim finds new niche |url=https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |access-date=1 September 2023 |website=[[NewsDay (Zimbabwean newspaper)|NewsDay]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180145/https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=7 November 2011 |title=Lisa Morgan clinches two accolades in China |url=https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |access-date=1 September 2023 |website=[[The Herald (Zimbabwe)|The Herald]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180143/https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |url-status=live }}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] m9rg768tviairlu0uv4pjigbxxtisym 6543723 6543722 2026-04-25T02:23:10Z खास विशेष 810972 /* वापसी और निकासी */ कड़ी जोड़ी 6543723 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg | caption = [[लेइला लोपेस]] | winner = [[लेइला लोपेस]] |represented=अंगोला | congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]] | best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]] | photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]] | date = 12 सितंबर 2011 | venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] | presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}} | entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}} | broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}} | entrants = 89 | placements = 16 | withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}} | returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]] }} '''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया। इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]] ===स्थान और तिथि=== 16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी। यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई। जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया। यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया। ====प्रतिस्थापन==== एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref> मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref> माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref> इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref> ====वापसी और निकासी==== 2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई। पुर्तगाल ने आखिरी बार [[मिस यूनीवर्स 2002|2002]] में, चिली ने [[मिस यूनीवर्स 2006|2006]] में, सेंट लूसिया ने [[मिस यूनीवर्स 2007|2007]] में, तुर्क्स और कैकोस ने [[ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2008|2008]] में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार [[ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2009|2009]] में भाग लिया था। नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।<ref name=":2">{{Cite web |date=2 September 2011 |title=Miss Universe 2011: India pins hope on Vasuki |url=https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |access-date=17 June 2022 |website=[[CNN-News18]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |url-status=live }}</ref> सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{cite news |last=Marit |first=Nore |date=30 September 2012 |title=Ble ikke Miss Universe Norge |language=nb |newspaper=[[Aftenbladet]] |url=http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |url-status=dead |access-date=12 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150227124134/http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |archive-date=27 February 2015}}</ref> [[ज़ाम्बिया]] ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।<ref name=":2" /> लिसा मॉर्गन को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन ने उनकी भागीदारी को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने मिस इंटरनेशनल 2011 में भाग लिया, जो [[चेंगदू]], [[चीन]] में आयोजित हुई थी।<ref>{{Cite web |last=Antonio |first=Winstone |date=19 August 2017 |title=Former Miss Universe Zim finds new niche |url=https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |access-date=1 September 2023 |website=[[NewsDay (Zimbabwean newspaper)|NewsDay]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180145/https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=7 November 2011 |title=Lisa Morgan clinches two accolades in China |url=https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |access-date=1 September 2023 |website=[[The Herald (Zimbabwe)|The Herald]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180143/https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |url-status=live }}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी: मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी: सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] jzv3xv1df79jnd14mz2vx7nrsrfczhc 6543727 6543723 2026-04-25T02:31:16Z खास विशेष 810972 /* बाहरी कड़ियाँ */ 6543727 wikitext text/x-wiki {{Infobox beauty pageant | photo = Miss-universe-2011-leila-lopes.jpg | caption = [[लेइला लोपेस]] | winner = [[लेइला लोपेस]] |represented=अंगोला | congeniality = निकोलीना लोनकार, [[मोंटेनेग्रो]] | best national costume = शेल्ड्री साएज़, [[पनामा]] | photogenic = रॉनिया फोर्न्स्टेड, [[स्वीडन]] | date = 12 सितंबर 2011 | venue = क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] | presenters = {{Hlist|एंडी कोहेन|नताली मोरालेस|जेनी माई|शैंडी फिनेसी}} | entertainment = {{Hlist|बेबेल गिलबर्टो | क्लाउडिया लीटे}} | broadcaster ={{ubl|अंतरराष्ट्रीय:{{Hlist|[[एनबीसी]]|[[टेलीमंडो]]}}|आधिकारिक प्रसारक:बैंड (बैंड साओ पाउलो)}} | entrants = 89 | placements = 16 | withdraws = {{Hlist|नॉर्वे|ज़ाम्बिया}} | returns = {{Hlist|केमैन द्वीप समूह | चिली | एस्टोनिया | मोंटेनेग्रो | पुर्तगाल | सेंट लूसिया | तुर्क और कैकोस द्वीप समूह | वियतनाम}} | before = [[मिस यूनीवर्स 2010|2010]] | next = [[मिस यूनीवर्स 2012|2012]] }} '''मिस यूनीवर्स 2011''' प्रतियोगिता का 60वां संस्करण था, जो 12 सितंबर 2011 को क्रेडिकार्ड हॉल, [[साओ पाउलो]], [[ब्राज़ील]] में आयोजित हुआ।<ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Angola is now Miss Universe 2011 |url=https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |access-date=16 June 2022 |website=[[CBS News]] |language=en-US |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.cbsnews.com/news/miss-angola-is-now-miss-universe-2011/ |url-status=live }}</ref><ref name=":0">{{Cite web |date=16 December 2010 |title=Sao Paulo, Brazil to Host the 2011 MISS UNIVERSE® Pageant Live on NBC |url=https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |access-date=16 June 2022 |website=[[PR Newswire]] |language=en |archive-date=7 July 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180707205230/https://www.prnewswire.com/news-releases/sao-paulo-brazil-to-host-the-2011-miss-universe-pageant-live-on-nbc-112007979.html |url-status=live }}</ref> इस आयोजन के अंत में, [[मेक्सिको]] की [[ज़िमेना नवारेटे]] ने [[अंगोला]] की [[लेइला लोपेस]] को मिस यूनीवर्स 2011 का ताज पहनाया, जिससे अंगोला ने पहली बार इस प्रतियोगिता में जीत हासिल की।<ref>{{Cite web |last=Nessif |first=Bruna |date=13 September 2011 |title=Meet Miss Universe 2011: Angola's Leila Lopes |url=https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |access-date=16 June 2022 |website=[[E!|E! Online]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616045621/https://www.eonline.com/news/263386/meet-miss-universe-2011-angola-s-leila-lopes |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=13 September 2011 |title=Miss Universe 2011 |url=http://www.today.com/slideshow/miss-universe-2011-44499168 |access-date=16 June 2022 |website=[[NBC News]] |language=en }}{{Dead link|date=November 2023 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref><ref>{{Cite news |date=13 September 2011 |title=Miss Angola crowned Miss Universe in Brazil |language=en |work=[[Reuters]] |url=https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |access-date=17 June 2022 |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.reuters.com/article/us-missuniverse-idINTRE78C0O320110913 |url-status=live }}</ref> इस वर्ष की प्रतियोगिता में 89 देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो मिस यूनिवर्स 2006 में हुई 86 प्रतिभागियों की संख्या से अधिक था।<ref>{{Cite web |last=Byrne |first=Alla |date=12 September 2011 |title=Miss Universe 2011 Contestants: Who Will Win? |url=https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |access-date=17 June 2022 |website=[[People (magazine)|People]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617030710/https://people.com/celebrity/miss-universe-2011-contestants-who-will-win/ |url-status=live }}</ref> इस प्रतियोगिता की मेजबानी एंडी कोहेन और नैटली मोरालेस ने की, जबकि जिनी माई और शांडी फिनेस्सी ने टिप्पणी और विश्लेषण किया। इस प्रतियोगिता में ब्राज़ीलियाई गायिका-गीतकार बेबेल गिल्बर्टो और ब्राज़ीलियाई पॉप सिंगर क्लाउडिया लेइटे ने प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite web |date=2 August 2011 |title=Natalie Morales will co-host Miss Universe 2011 pageant |url=http://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |access-date=16 June 2022 |website=[[Today (American TV program)|Today.com]] |language=en |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005002/https://www.today.com/allday/natalie-morales-will-co-host-miss-universe-2011-pageant-1C9383113 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=9 September 2011 |title=Lea Salonga To Judge Miss Universe 2011 |url=https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |access-date=16 June 2022 |website=[[Philippine Star]] |archive-date=16 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220616062830/https://www.philstar.com/cebu-entertainment/2011/09/09/725043/lea-salonga-judge-miss-universe-2011 |url-status=live }}</ref> ==पृष्ठभूमि== [[File:CAM PRÉDIO GERAL NOITE.jpg|thumb|240px|आयोजन स्थल: क्रेडिकार्ड हॉल]] ===स्थान और तिथि=== 16 दिसंबर 2010 को [[डोनाल्ड ट्रंप]], जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन के मालिक थे, और पॉला शुगार्ट, जो मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष थीं, ने घोषणा की कि प्रतियोगिता की 60वीं वर्षगांठ 12 सितंबर 2011 को साओ पाउलो, ब्राज़ील में आयोजित होगी। यह घोषणा ट्रंप द्वारा मीडिया समूह ग्रुपो बंदेइरेंटेस डी कॉम्यूनिकाकाओ के साथ साओ पाउलो में प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए बातचीत करने के कुछ महीनों बाद आई। जोआओ कार्लोस साद, जो ग्रुपो बांदेइरांतेस के अध्यक्ष थे, के अनुसार यह नेटवर्क इस बात से प्रसन्न था कि उन्होंने मिस यूनिवर्स के साथ साओ पाउलो, ब्राज़ील में प्रतियोगिता आयोजित करने का समझौता कर लिया। यह कार्यक्रम [[एनबीसी]] पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रसारित हुआ, जबकि स्पेनिश भाषा में इसका एक साथ प्रसारण [[टेलीमंडो]] पर किया गया।<ref name=":0" /><ref>{{Cite web |last=Thakur |first=Monami |date=9 September 2011 |title=Miss Universe 2011: Stunning Contestants in National Costumes (PHOTOS) |url=https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |access-date=17 June 2022 |website=[[International Business Times]] |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824004951/https://www.ibtimes.com/miss-universe-2011-stunning-contestants-national-costumes-photos-552593 |url-status=live }}</ref> ===प्रतिभागियों का चयन=== ७९ देशों और क्षेत्रों की प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। इनमें से छह प्रतिनिधियों को उनके राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रनर-अप रहने या कास्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से चुने जाने के बाद नियुक्त किया गया, जबकि तीन को मूल पदच्युत (डिथ्रोन) विजेता के स्थान पर चुना गया। ====प्रतिस्थापन==== एवालिना वैन पुटेन को क्यूरासाओ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि मोनिफा जैनसन, मिस क्यूरासाओ 2011, आयु (उम्र) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाईं।<ref name=":1">{{Cite web |date=19 August 2011 |title=Minister ontvangt schoonheid |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=30 December 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221230121043/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/3571-minister-ontvangt-schoonheid |url-status=live }}</ref> जैनसन ने मिस यूनिवर्स 2012 में भाग लिया।<ref>{{Cite web |date=4 April 2011 |title=Monifa Jansen is Miss Curaçao |url=https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |access-date=17 June 2022 |website=[[Antilliaans Dagblad]] |language=nl-nl |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005008/https://antilliaansdagblad.com/nieuws-menu/2875-monifa-jansen-is-miss-curacao |url-status=live }}</ref> मायरा अल्दाना, जो नुएस्ट्रा बेलेज़ा एल साल्वाडोर 2011 की प्रथम रनर-अप थीं, को अलेजांद्रा ओचोआ, नुएस्ट्रा बेलेज़ा यूनिवर्सो 2011, के दीर्घकालिक श्वसन (सांस) बीमारी से पीड़ित होने के बाद एल साल्वाडोर का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया।<ref name="elsalvador.com">{{cite web |last=Diaz |first=Jhoel |last2=Carranza |first2=Enrique |date=26 July 2011 |title=Mayra Aldana representará a El Salvador en Miss Universo 2011 |url=http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20140306192614/http://www.elsalvador.com/mwedh/nota/nota_completa.asp?idCat=6461&idArt=6038862 |archive-date=6 March 2014 |access-date=9 August 2012 |website=[[El Diario de Hoy]]}}</ref> माई फुओंग थुई, मिस वियतनाम 2006, को मिस यूनिवर्स में वियतनाम का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने भाग नहीं लिया।<ref>{{Cite web |date=7 June 2013 |title=Hoa hậu Việt trốn thi quốc tế vì những lý do 'trời ơi' |url=https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |access-date=17 June 2022 |website=ZingNews.vn |language=vi |archive-date=24 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230824005009/https://zingnews.vn/zingnews-post326018.html |url-status=live }}</ref> इसके बाद वियतनाम का संस्कृति मंत्रालय को वु थी होआंग माई, जो मिस वियतनाम 2010 की प्रथम रनर-अप थीं, को अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने की अनुमति दी गई।<ref name=":3">{{Cite web |last= |date=13 May 2011 |title=Á hậu Hoàng My tham dự Miss Universe 2011 |url=https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |access-date=17 June 2022 |website=[[VnExpress]] |language=vi |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://vnexpress.net/a-hau-hoang-my-tham-du-miss-universe-2011-1913010.html |url-status=live }}</ref> ====वापसी और निकासी==== 2011 संस्करण में केमैन आइलैंड्स, चिली, एस्टोनिया, मोंटेनेग्रो, पुर्तगाल, सेंट लूसिया, तुर्क्स और कैकोस आइलैंड्स और वियतनाम की वापसी हुई। पुर्तगाल ने आखिरी बार [[मिस यूनीवर्स 2002|2002]] में, चिली ने [[मिस यूनीवर्स 2006|2006]] में, सेंट लूसिया ने [[मिस यूनीवर्स 2007|2007]] में, तुर्क्स और कैकोस ने [[ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2008|2008]] में भाग लिया था, जबकि अन्य देशों ने आखिरी बार [[ब्रह्माण्ड सुन्दरी 2009|2009]] में भाग लिया था। नॉर्वे और ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया।<ref name=":2">{{Cite web |date=2 September 2011 |title=Miss Universe 2011: India pins hope on Vasuki |url=https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |access-date=17 June 2022 |website=[[CNN-News18]] |language=en |archive-date=17 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220617044155/https://www.news18.com/news/india/miss-universe-2011-india-pins-hope-on-vasuki-397313.html |url-status=live }}</ref> सारा निकोल एंडरसन को साओ पाउलो में प्रतिभागियों के पहुंचने के दस दिन बाद ताज पहनाया गया। इसी कारण एंडरसन ने प्रतियोगिता से नाम वापस ले लिया। हालांकि, एंडरसन ने अगले वर्ष प्रतियोगिता में भाग लिया।<ref>{{cite news |last=Marit |first=Nore |date=30 September 2012 |title=Ble ikke Miss Universe Norge |language=nb |newspaper=[[Aftenbladet]] |url=http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |url-status=dead |access-date=12 December 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150227124134/http://www.aftenbladet.no/nyheter/lokalt/sandnes/Ble-ikke-Miss-Universe-Norge-3040387.html |archive-date=27 February 2015}}</ref> [[ज़ाम्बिया]] ने इसलिए प्रतियोगिता से नाम वापस लिया क्योंकि उसके संबंधित संगठन ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं की या किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं की।<ref name=":2" /> लिसा मॉर्गन को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन ने उनकी भागीदारी को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने मिस इंटरनेशनल 2011 में भाग लिया, जो [[चेंगदू]], [[चीन]] में आयोजित हुई थी।<ref>{{Cite web |last=Antonio |first=Winstone |date=19 August 2017 |title=Former Miss Universe Zim finds new niche |url=https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |access-date=1 September 2023 |website=[[NewsDay (Zimbabwean newspaper)|NewsDay]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180145/https://www.newsday.co.zw/news/article/76404/former-miss-universe-zim-finds-new-niche |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |date=7 November 2011 |title=Lisa Morgan clinches two accolades in China |url=https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |access-date=1 September 2023 |website=[[The Herald (Zimbabwe)|The Herald]] |language=en |archive-date=31 August 2023 |archive-url=https://web.archive.org/web/20230831180143/https://www.herald.co.zw/as-lisa-morgan-clinches-two-accolades-in-china/ |url-status=live }}</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==बाहरी कड़ियाँ== {{कॉमन्स श्रेणी|मिस यूनिवर्स}} *[http://www.missuniverse.com मिस यूनिवर्स आधिकारिक वेबसाइट] {{मिस यूनीवर्स}} {{सुन्दरता प्रतियोगिता}} [[श्रेणी:मिस यूनीवर्स]] [[श्रेणी:सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय सुन्दरता प्रतियोगिता]] [[श्रेणी:वर्षानुसार मिस यूनिवर्स]] 8uz4cfa3yuyky97c7sx48bzee8xeh9u कोशी'स परेड काफे 0 1584121 6543773 6390782 2026-04-25T07:01:11Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543773 wikitext text/x-wiki {{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=अप्रैल 2025}} '''कोशी'स परेड कैफे''', जिसे कोशी'स के नाम से जाना जाता है, [[बेंगलुरु|बैंगलोर]] में एक परिवार के स्वामित्व वाला रेस्तरां है।<ref>{{Cite web|url=https://www.timesnownews.com/lifestyle/food/news/visiting-bengaluru-7-oldest-cafes-to-visit-in-the-city-article-108047800|title=Visiting Bengaluru? 7 Oldest Cafes To Visit In The City|date=2024-02-27|website=Times Now|language=en|access-date=2024-08-13}}</ref><ref>{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/life-and-style/food/a-koshys-state-of-mind/article17606885.ece|title=A Koshy's state of mind|last=Varma|first=Nikhil|date=2017-03-23|work=The Hindu|access-date=2024-08-13|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref><ref name=":4">{{Cite news|url=https://www.thehindu.com/life-and-style/food/what-is-it-about-bengalurus-iconic-koshys-that-keeps-drawing-patrons-back/article33305731.ece|title=What is it about Bengaluru's iconic Koshy's that keeps drawing patrons back?|last=Sondhi|first=Aditya|date=2020-12-12|work=The Hindu|access-date=2024-08-13|language=en-IN|issn=0971-751X}}</ref> [[जवाहरलाल नेहरू]], [[एलिज़ाबेथ द्वितीय|महारानी एलिजाबेथ द्वितीय]] और [[निकिता ख़्रुश्चेव|निकिता ख्रुश्चेव]] उन लोगों में से हैं जिन्होंने कोशी में भोजन किया है।<ref name=":7">{{Cite web|url=https://www.lifestyleasia.com/ind/dining/food/koshys-in-bangalore-all-about-the-colonial-era-eatery/|title=Koshy's: Why a colonial-era space draws modern-day Bangalore diners in scores|date=2023-10-02|website=Lifestyle Asia India|language=en-IN|access-date=2024-08-13}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.newindianexpress.com/cities/bengaluru/2018/Apr/09/rahul-gandhi-in-bengaluru-metro-ride-and-koshys-lunch-1798937.html|title=Rahul Gandhi in Bengaluru: Metro ride and Koshy's lunch|last=Ravi|first=Anusha|date=2018-04-09|website=The New Indian Express|language=en|access-date=2024-08-13}}</ref><ref name=":2">{{Cite web|url=https://scroll.in/magazine/843499/the-owner-of-bengalurus-iconic-restaurant-prem-koshy-explains-why-his-food-is-literally-to-die-for|title=The owner of Bengaluru's iconic restaurant Prem Koshy explains why his food is literally to die for|last=Ranganna|first=Akhila|date=2017-08-25|website=Scroll.in|language=en|access-date=2024-08-13}}</ref> कोशी के नियमित ग्राहकमें पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हैं।<ref>{{Cite web|url=https://thebetterindia.com/52076/restaurants-in-bengaluru/|title=10 Legendary Eating Places in Bengaluru You Can Never Get Enough Of|last=Gupta|first=Boshika|date=2016-04-14|website=The Better India|language=en-US|access-date=2024-08-13}}</ref><ref name=":3">{{Cite web|url=https://sundayguardianlive.com/culture/koshys-parade-mystic-cafe-bengaluru|title=KOSHY'S PARADE, THE MYSTIC CAFÉ OF BENGALURU|last=Bhattacharya|first=Kaustav|date=2022-11-12|website=The Sunday Guardian Live|language=en-US|access-date=2024-08-13}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> कोशी के मेनू में लगभग हजार व्यंजन हैं।<ref name=":2" /><ref name=":6">{{Cite web|url=https://www.slurrp.com/article/this-iconic-bengaluru-restaurant-is-over-70-years-old-1652620297528|title=This Iconic Bengaluru Restaurant Is Over 70 Years Old|website=Slurrp|language=en|access-date=2024-08-13}}</ref> इनमें भुना हुआ चिकन, केरल का सूअर का मांस, मछली बिरयानी, कटलेट, चिकन पफ, स्टेक, अपाम और स्टू और आलू स्माइली (मुस्कुराते हुए चेहरे के आकार की फ्रेंच फ्राइज़) शामिल हैं।<ref name=":2" /><ref name=":3" /> कोशीज फिल्टर कॉफी और डेनिश पेस्ट्री भी परोसता है।<ref name=":5">{{Cite web|url=https://www.deccanherald.com/india/karnataka/bengaluru/where-time-has-stood-still-2107267|title=Where time has stood still|last=Sivakumar,DHNS|first=Anushka|website=Deccan Herald|language=en|access-date=2024-08-13}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.cntraveller.in/story/bengaluru-see-and-do-if-you-love-filter-coffee/|title=Bengaluru see and do: If you love filter coffee|last=Parameswarappa|first=Vinay|date=2023-12-28|website=Condé Nast Traveller India|language=en-IN|access-date=2024-08-13}}</ref> == संदर्भ == [[श्रेणी:विकिडेटा पर उपलब्ध निर्देशांक]] [[श्रेणी:Infobox mapframe without OSM relation ID on Wikidata]] ldr72zljqs83cud3chu6iolmdzk7wdw देवी चित्रलेखा 0 1590561 6543641 6517316 2026-04-24T15:05:54Z Anchor Sweta Sharma 757632 image update 6543641 wikitext text/x-wiki {{Short description|भारतीय आध्यात्मिक प्रवक्ता और धार्मिक व्यक्तित्व}} {{Infobox person | name = देवी चित्रलेखा | image =[[File:DK5 0664.jpg|thumb|Devi Chitralekha]] | caption = | birth_date = {{Birth date and age|1997|1|19|df=yes}} | birth_place = खम्भी, [[पलवल जिला]], [[हरियाणा]], भारत | nationality = भारतीय | occupation = आध्यात्मिक वक्ता, धार्मिक प्रवक्ता | known_for = ''श्रीमद्भागवत'' पर प्रवचन | title = गौ सेवा धाम अस्पताल की संस्थापक | parents = टिकराम शर्मा (पिता), चामेली देवी (माता) | spouse = माधव | website = {{URL|https://www.worldsankirtan.org}} }} '''देवी चित्रलेखा''' (जन्म 19 जनवरी 1997) एक भारतीय [[आध्यात्मिक]] [[प्रवक्ता]] हैं जो मुख्यतः ''[[भागवत पुराण]]'' पर आधारित धार्मिक प्रवचन करती हैं। वह हरियाणा के पलवल जिले में स्थित गौ सेवा धाम नामक पशु आश्रय की संस्थापक हैं और विभिन्न धार्मिक आयोजनों का संचालन '''संकीर्तन यात्रा''' के माध्यम से करती हैं।<ref>{{Cite web |title=कौन हैं देवी चित्रलेखा? कम उम्र में कथावाचक बनीं |url=https://npg.news/festival/devi-chitralekha-koun-hai-devi-chitralekha-sase-kam-umra-kathavachak-famous-youngest-kathavachak-abroad-spiritual-saint-and-motivational-speaker-1254764 |website=NPG News |date=27 November 2023 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> == प्रारंभिक जीवन == देवी चित्रलेखा का जन्म [[हरियाणा]] के [[पलवल जिला|पलवल]] ज़िले के खम्भी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम टिकराम शर्मा और माता का नाम चामेली देवी है।<ref>{{Cite web |title=देवी चित्रलेखा: शादी की अफवाह से चर्चा में |url=https://www.ibc24.in/web-stories/devi-chitralekha-marriage-who-is-devi-chitralekha-there-is-a-lot-of-discussion-on-social-media-about-whose-marriage |website=IBC24 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref><ref>{{Cite web |title=कौन हैं देवी चित्रलेखा? 23 साल की उम्र में बनीं प्रवचिका |url=https://www.jansatta.com/lifestyle/devi-chitralekha-wiki-age-husband-family-biography-23-year-old-chitralekha-became-renowned-preacher/1595351/ |website=जनसत्ता |date=19 जुलाई 2021 |language=hi |access-date=4 मई 2025}}</ref> == आध्यात्मिक यात्रा == चार वर्ष की आयु में उन्हें श्री श्री गिर्धारी बाबा द्वारा गौड़ीय वैष्णव परंपरा में दीक्षा मिली। छह वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार [[बरसाना]] में सार्वजनिक प्रवचन दिया। बाद में उन्होंने [[वृन्दावन]] के निकट तपोवन में संपूर्ण श्रीमद्भागवत कथा का पहला वाचन किया।<ref>{{Cite web |title=श्रीमद् भागवत कथा में देवी चित्रलेखा के प्रवचन |url=https://mandalnews.com/amravati/shrimad-bhagwat-katha-in-the-nectar-speech-of-goddess-chitralekha/ |website=मंडल न्यूज़ |date=5 अगस्त 2023 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> == प्रवचन और कार्य == उनके प्रवचनों का आधार [[भक्ति योग]], [[वैष्णव सम्प्रदाय]] की परंपराएँ, और हरे कृष्ण महामंत्र का जप है। वह भक्ति संगीत में भी सक्रिय हैं और विभिन्न आयोजनों में भजन प्रस्तुत करती हैं।<ref>{{Cite web |title=देवी चित्रलेखा के प्रसिद्ध भक्ति गीत |url=https://www.jansatta.com/religion/devi-chitralekha-bhajan-or-song-know-who-is-devi-devi-chitralekha-ji-watch-here-her-famous-bhakti-song/1350962/ |website=जनसत्ता |date=17 मार्च 2020 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> == गौ सेवा धाम और संकीर्तन यात्रा == देवी चित्रलेखा ने [[हरियाणा]] के [[पलवल]] में स्थित '''गौ सेवा धाम''' नामक पशु आश्रय की स्थापना की, जो घायल और बेसहारा गायों की सेवा हेतु समर्पित है।<ref>{{Cite web |title=कौन हैं देवी चित्रलेखा? जानिए उनके गौ सेवा के कार्य |url=https://www.nedricknews.com/other/who-is-devi-chitralekha-of-katha-sermon-and-storyteller-who-serves-destitute-and-injured-cows/ |website=नेड्रिक न्यूज़ |date=24 जनवरी 2024 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> उन्होंने भारत के विभिन्न राज्यों और [[अमेरिका]], [[ब्रिटेन]], और [[दक्षिण अफ्रीका]] जैसे देशों में '''संकीर्तन यात्रा''' के अंतर्गत प्रवचन दिए हैं।<ref>{{Cite web |title=टॉप 5 महिला कथावाचकों में देवी चित्रलेखा |url=https://www.gnttv.com/visualstories/trending/top-5-women-katha-vachak-of-the-country-36645-16-05-2023 |website=GNT TV |date=16 मई 2023 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> == मीडिया उल्लेख == कुछ हिंदी समाचार वेबसाइटों ने बताया है कि उन्हें 2019 में युवावस्था में धार्मिक वक्ता के रूप में ''वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स'' में उल्लेखित किया गया था।<ref>{{Cite web |title=कथावाचक देवी चित्रलेखा के बारे में जानें |url=https://www.tv9hindi.com/religion/know-everything-bout-kathavachak-devi-chitralekha-why-she-is-in-news-2382986.html |website=TV9 हिंदी |date=25 जनवरी 2024 |language=hi |access-date=3 मई 2025}}</ref> == संदर्भ == {{reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://www.worldsankirtan.org आधिकारिक वेबसाइट] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:1997 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:भारतीय आध्यात्मिक गुरु]] [[श्रेणी:भारतीय महिला धार्मिक नेता]] [[श्रेणी:हिंदू पुनरुत्थानवादी]] [[श्रेणी:हरियाणा के लोग]] {{DEFAULTSORT:चित्रलेखा, देवी}} 4t3w0vdajghhbtwutsr49j3nf7nvxqw क्रिस गोपालकृष्णन 0 1591997 6543791 6448419 2026-04-25T08:47:19Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543791 wikitext text/x-wiki {{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=जून 2025}}{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति|name=Senapathy "Kris" Gopalakrishnan|image=Kris Gopalakrishnan - World Economic Forum on India 2012.jpg|caption=Gopalakrishnan at the [[World Economic Forum]] on India in 2012|birth_name=Senapathy Gopalakrishnan|birth_date={{Birth date and age|1955|04|05|df=yes}}|birth_place=[[Thiruvananthapuram]], [[Kerala]], India|death_date=|death_place=|alma_mater={{Unbulleted_list|[[Government Arts College, Thiruvananthapuram]]|[[University College Thiruvananthapuram]]|[[IIT Madras|Indian Institute of Technology Madras]]}}|education={{Unbulleted_list|[[Master of Science]]|[[Master of Technology]]}}|occupation=[[Chairman#Vice Chairman and Deputy Chairman|Executive vice chairman]], [[Infosys]]|years_active=1981–2014|spouse=Sudha Gopalakrishnan|children=1}} '''सेनापति "क्रिस" गोपालकृष्णन''' एक भारतीय व्यवसायी और स्टार्टअप एक्सेलरेटर एक्सिलर वेंचर्स के अध्यक्ष हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.axilor.com/investors/|title=Investors – Axilor Ventures:: Axilor Ventures is an Active Seed Fund|language=en-US|access-date=2021-06-13}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> वे भारतीय तक्नोलोजी कम्पनी [[इंफोसिस]] के सह-संस्थापकों में से एक हैं और उन्होंने 2007 से 2011 तक इसके सीईओ और प्रबंध निदेशक और 2011 से 2014 तक उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है।<ref>{{Cite web|url=https://www.infosys.com/about/management-profiles/gopalakrishnan.html|title=Infosys - S. Gopalakrishnan: Co-founder {{!}} Management Profiles|website=infosys.com|access-date=2021-06-13}}</ref> वैश्विक व्यापार एवं प्रौद्योगिकी विचार नेता के रूप में ख्याति प्राप्त गोपालकृष्णन को एशिया के शीर्ष कार्यकारी अधिकारियों की इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर की उद्घाटन रैंकिंग में शीर्ष सीईओ (आईटी सेवा श्रेणी) के रूप में चुना गया था और 2011 में वे कॉर्पोरेट गवर्नेंस एशिया के दूसरे एशियाई कॉर्पोरेट निदेशक पुरस्कार के विजेता थे। 2013-14 में उन्हें भारत के शीर्ष उद्योग मंडल [[कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री|भारतीय उद्योग परिसंघ]] (सी. आई. आई.) का अध्यक्ष चुना गया और जनवरी 2014 में दावोस में [[विश्व आर्थिक मंच]] के सह-अध्यक्षों में से एक के रूप में कार्य किया। जनवरी 2011 में [[भारत सरकार]] ने गोपालकृष्णन को उनकी उपलब्धियों के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया। क्रिस ओकिनावा विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का हिस्सा हैं। वे [[भारतीय विज्ञान संस्थान]] की परिषद के अध्यक्ष हैं और अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, बैंगलोर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष हैं। इस के साथ वे [[कर्नाटक सरकार]] के सूचना प्रौद्योगिकी पर विजन ग्रुप के अध्यक्ष, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इनोवेशन हब के अध्यक्ष और सीआईआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन इनोवेशन, एंटरप्रेन्योरशिप एंड स्टार्टअप्स (सीआईईएस) के अध्यक्ष हैं। क्रिस श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, त्रिवेंद्रम के अध्यक्ष भी हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.sctimst.ac.in/About%20SCTIMST/Governing%20Body|title=SCTIMST Governing Body}}</ref> क्रिस मस्तिष्क विज्ञान, उम्र बढ़ने से संबंधित विकारों के साथ-साथ स्टार्ट-अप और स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश करने पर अनुसंधान को बढ़ावा देने में निवेश करते हैं। क्रिस ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास से भौतिकी और कंप्यूटर विज्ञान विषयों में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की हैं। क्रिस इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियर्स (आईएनएई) के फैलो हैं और इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर्स (आईआईटीई) ऑफ इंडिया के मानद फैलो हैं। फोर्ब्स की भारत के 100 सबसे अमीर टाइकून की सूची के अनुसार, दिनांक 09 अक्टूबर, 2024 को गोपालकृष्णन $43.3 बिलियन की कुल संपत्ति के साथ 73वें स्थान पर हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.forbes.com/lists/india-billionaires/|title=India's 100 Richest}}</ref>   * == सन्दर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:भारतीय संगणक वैज्ञानिक]] [[श्रेणी:1956 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] gnf57w2eej9nd67r284io2660r3ak7g कोरियाई सौन्दर्य 0 1602366 6543755 6477686 2026-04-25T04:54:00Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 2 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543755 wikitext text/x-wiki [[चित्र:K-Beauty_Expo_Korea.jpg|अंगूठाकार|के-ब्यूटी एक्सपो कोरिया]] '''कोरियाई सौन्दर्य''' या '''के-ब्यूटी''' ([[कोरियाई भाषा|कोरियाई]]: 케이뷰티; [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: K-beauty) एक व्यापक संज्ञा है जो [[दक्षिण कोरिया]] से उत्पन्न [[त्वचा-परिचर्या]] उत्पादों को इंगित करती है।<ref name="wsj2">{{Cite web|url=https://www.wsj.com/articles/k-beauty-the-exhausting-skin-care-regimen-that-may-be-worth-the-effort-1459970031|title=K-Beauty: The Exhausting Skin-Care Regimen That May Be Worth the Effort|last1=Wood|first1=Dana|date=April 6, 2016|website=[[The Wall Street Journal]]}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.forbes.com/sites/cmalasig/2016/08/01/this-year-old-startup-is-now-southeast-asias-largest-online-korean-beauty-market/#a3a8e944c238|title=This Year-Old Startup Is Now Southeast Asia's Largest Online Korean Beauty Market|website=Forbes}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.koreaherald.com/view.php?ud=20160722000667|title=K-beauty attracts investment from international big shots|date=22 July 2016|website=[[The Korea Herald]]}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.korean.com.ph/|title=Korean Beauty Products|website=Korean}}</ref> के-ब्यूटी ने सम्पूर्ण विश्व में विशेष रूप से [[पूर्वी एशिया]],<ref>{{cite web|url=http://www.cityweekend.com.cn/shanghai/article/hallyu-and-rise-of-korean-cosmetics-china|title=Hallyu and The Rise of Korean Cosmetics in China|website=www.cityweekend.com.cn|archive-url=https://web.archive.org/web/20170502072859/http://www.cityweekend.com.cn/shanghai/article/hallyu-and-rise-of-korean-cosmetics-china|archive-date=2017-05-02|access-date=2019-01-21|url-status=dead}}</ref><ref>{{cite web|url=http://blog.japantimes.co.jp/japan-pulse/the-korean-beauty-secrets-are-out/|title=The Korean beauty secrets are out - Japan Pulse|last=New|first=Ultra Super|date=13 July 2012|website=blog.japantimes.co.jp}}</ref> [[दक्षिण पूर्व एशिया|दक्षिण-पूर्वी एशिया]],<ref>{{cite news|url=http://www.straitstimes.com/lifestyle/the-rise-of-k-beauty-in-singapore-and-globally|title=The rise of K-beauty in Singapore and globally|last=migration|date=13 June 2015|newspaper=The Straits Times|publisher=}}</ref><ref>{{cite web|url=http://www.phnompenhpost.com/business/k-pop-boon-cosmetics-shops|title=K-pop a boon for cosmetics shops|last=ppp_webadmin|date=27 June 2013|publisher=}}</ref><ref>{{cite web|url=http://www.mariefranceasia.com/my/beauty-my/beauty-buys-my/skincare-my/skincare-brands-malaysia-209143.html#item=1|title=5 Skincare brands found in Malaysia that are worth trying|date=7 September 2016|publisher=}}</ref> [[दक्षिण एशिया]],<ref>{{cite magazine|url=https://www.magzter.com/article/Lifestyle/Cosmopolitan-Sri-Lanka/A-Korean-Wave-The-Rise-Of-K-Beauty-In-Sri-Lanka|title=A Korean Wave: The Rise Of K-Beauty In Sri Lanka|magazine=[[Cosmopolitan (magazine)|Cosmopolitan Sri Lanka]]}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.translatemedia.com/translation-blog/south-korean-beauty-brands-winning-consumers-india/|title=How South Korean Beauty Brands Are Winning Consumers in India|date=17 August 2017|publisher=TranslateMedia}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.nepalitimes.com/banner/k-pop-in-k-town/|title=K-Pop in K-Town|date=14 December 2018|publisher=[[Nepali Times]]}}</ref> तथा [[पश्चिमी विश्व|पाश्चात्य जगत]] में लोकप्रियता प्राप्त की है।<ref>{{Cite web|url=http://www.cosmopolitan.co.uk/beauty-hair/beauty-trends/a42942/korean-skincare-routine-explained/|title=The Korean skincare routine explained|date=26 November 2019|website=Cosmopolitan}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.marieclaire.co.uk/news/beauty/553171/here-s-why-k-beauty-is-killing-it.html|title=Here's why K-Beauty is killing it|date=9 June 2016|website=Marie Claire|archive-url=https://web.archive.org/web/20160815033721/http://www.marieclaire.co.uk/news/beauty/553171/here-s-why-k-beauty-is-killing-it.html|archive-date=2016-08-15|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.yahoo.com/beauty/why-k-beauty-is-the-holy-grail-of-skincare-115154329948.html|title=Korean beauty products and masks are taking over the industry|date=April 2015|website=Yahoo Beauty}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://www.koreaherald.com/view.php?ud=20160216000310|title=Western brands want in on K-beauty action|date=2016-02-16|access-date=2016-12-08}}</ref> इसका मुख्य ध्यान [[स्वास्थ्य]], स्निग्धता तथा प्रभामय त्वचा पर केन्द्रित होता है।<ref>{{Cite web|url=http://www.elleuk.com/beauty/skin/beauty-tips/a25415/k-beauty-what-is-it-korean-beauty-10-step-beauty-cleansing-skincare/|title=K-Beauty: What?|date=23 September 2019|website=Elle UK}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.straitstimes.com/lifestyle/fashion/the-draw-of-fast-k-beauty|title=The draw of fast K-beauty|date=11 August 2016|website=Straits Times}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.businesskorea.co.kr/english/mice/exhibitions/15513-k-beauty-expo-8th-k-beauty-expo-take-place-oct-13-16|title=K-Beauty Expo|website=Business Korea|archive-url=https://web.archive.org/web/20160822081441/https://www.businesskorea.co.kr/english/mice/exhibitions/15513-k-beauty-expo-8th-k-beauty-expo-take-place-oct-13-16|archive-date=2016-08-22|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite news|url=http://timesofindia.indiatimes.com/home/sunday-times/10-step-K-beauty-routine-is-the-latest-fad-to-hit-desi-shores/articleshow/55641691.cms|title=10-step K-beauty routine is the latest fad to hit desi shores - Times of India|newspaper=The Times of India|access-date=2016-12-08}}</ref> [[चित्र:HK_TW_荃灣_Tsuen_Wan_荃錦中心_Tsuen_Kam_Centre_mall_shop_TonyMoly_May_2020_SS2_10.jpg|अंगूठाकार|के-ब्यूटी ब्राण्ड: टोनीमोली]] यद्यपि इन सौन्दर्य उत्पादों का उद्देश्य त्वचा की सौन्दर्यात्मकता जैसे स्वास्थ्य, स्निग्धता एवं उज्ज्वल बनावट को बढ़ाना है, तथापि ''"काँच-जैसी त्वचा"'' की चमक को दक्षिण कोरियाई लोग विशेष रूप से पसंद करते हैं। बहुस्तरीय फाउंडेशन की अपेक्षा दीर्घकालिक त्वचा-परिचर्या विधि को प्राथमिकता दी जाती है, जिसमें ''स्वर-संतुलन'' एवं ''स्पष्टता'' पर बल होता है। इन उत्पादों के निर्माण में अनेक ''प्राकृतिक घटकों'' का प्रयोग किया जाता है, और त्वचा-परिचर्या की प्रक्रिया में अनेक चरण सम्मिलित होते हैं।<ref name=":52">{{Cite web|url=https://www.npd.com/wps/portal/npd/us/news/press-releases/2019/u-s--prestige-beauty-industry-sales-grow-6-percent-in-2018--reports-the-npd-group/|title=U.S. Prestige Beauty Industry Sales Grow 6 Percent in 2018, Reports The NPD Group|last=NPD|date=January 29, 2019|website=NPD|access-date=October 16, 2020}}</ref> कोरियाई सौन्दर्य एवं प्रसाधन उद्योग आर्थिक दृष्टि से निरन्तर अग्रणी बना हुआ है, जिसका प्रमाण है—देशीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कोरियाई त्वचा-परिचर्या उत्पादों का विस्तार।<ref name=":23">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2018/11/23/business/south-korea-makeup-plastic-surgery-free-the-corset.html|title=A South Korean Movement To Change Minds on Beauty.|last=Stevenson|first=Alexandra|date=November 24, 2018|website=[[The New York Times]]|access-date=}}</ref> कोरियाई त्वचा-परिचर्या का इतिहास आदर्श सौन्दर्य मानकों को प्रभावित करता रहा है, जो समय के साथ कोरियाई सामाजिक मान्यताओं में समाहित हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप कठोर एवं हानिकारक सौन्दर्य मानकों के विरुद्ध अनेक विवाद एवं आन्दोलन भी उत्पन्न हुए हैं।<ref name=":22">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2018/11/23/business/south-korea-makeup-plastic-surgery-free-the-corset.html|title=A South Korean Movement To Change Minds on Beauty.|last=Stevenson|first=Alexandra|date=November 24, 2018|website=[[The New York Times]]|access-date=}}</ref> दिसम्बर २०२० (मार्गशीर्ष–पौष, संवत् २०७७) तक [[एशिया-प्रशांत|एशिया-प्रशान्त]] क्षेत्र के-ब्यूटी उद्योग में सर्वाधिक बाज़ार भाग रखता है। एशियाई देश/क्षेत्र के-ब्यूटी उत्पादों के प्रमुख उपभोक्ता हैं।<ref>{{Cite web|url=http://www.marketdataforecast.com/|title=Global K-Beauty Products Market {{!}}Size, Trends, Forecast {{!}} 2020 - 2025|website=Market Data Forecast|access-date=2021-03-04}}</ref> [[यूनाइटेड किंगडम]] जैसे पाश्चात्य देशों में भी इन उत्पादों की माँग निरन्तर बढ़ रही है।<ref>{{cite news|url=https://www.cosmeticsdesign-europe.com/Article/2018/06/07/UK-consumers-ditch-contouring-in-favour-of-glass-skin|title=UK consumers ditch contouring in favour of 'glass skin'|last1=Whitehouse|first1=Lucy|date=7 June 2018|work=Cosmetics Design Europe|access-date=20 December 2021}}</ref> हाल के वर्षों में कोरियाई त्वचा-परिचर्या एवं सौन्दर्य उत्पादों ने वैश्विक सौन्दर्य उद्योग में क्रान्ति ला दी है। सन् २०११ (संवत् २०६८) में बीबी क्रीम के शुभारम्भ के साथ के-ब्यूटी ने पश्चिमी जगत में प्रवेश किया। यह एक बहुकार्यात्मक त्वचा-परिचर्या उत्पाद था जो आधार, स्निग्धक एवं सूर्यरक्षक के रूप में कार्य करता था।<ref>{{Cite journal|last1=Hwang|first1=Eunkyoung|last2=Kim|first2=Junghyo|last3=Nam|first3=Mijoo|last4=JIN|first4=CHUNLAN|date=2021-06-30|title=An Analysis on Sex Education Contents in the Area of 'Human Development and Family' of the 2015 Practical Arts Education Textbooks for Elementary Education Level based on Korean National Standards of Sex Education.|url=http://dx.doi.org/10.24062/kpae.2021.34.2.1|journal=The Korean Association of Practical Arts Education|volume=34|issue=2|pages=1–20|doi=10.24062/kpae.2021.34.2.1|url-access=subscription}}</ref> कोरियाई सौन्दर्य उत्पाद विभागीय दुकानों, [[औषधालय|औषधालयों]], एवं विशेष सौन्दर्य विक्रेताओं में उपलब्ध हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ये विविध विक्रय माध्यमों द्वारा सहजता से प्राप्त होते हैं। उपभोक्ता अब सौन्दर्य उत्पादों के घटकों पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। प्राकृतिक एवं जैविक उत्पादों को अधिक आकर्षण प्राप्त हो रहा है। हाल ही में प्राकृतिक घटकों वाले सौन्दर्य उत्पादों पर चिकित्सीय अनुसंधान प्रारम्भ हुए हैं, जिनमें उनके उपचारात्मक सामर्थ्य एवं त्वचा पर जैविक प्रभावों का मूल्यांकन किया जा रहा है।<ref>{{Cite journal|last=Hwang|first=Eunkyoung|last2=Kim|first2=Junghyo|last3=Nam|first3=Mijoo|last4=JIN|first4=CHUNLAN|date=2021-06-30|title=An Analysis on Sex Education Contents in the Area of 'Human Development and Family' of the 2015 Practical Arts Education Textbooks for Elementary Education Level based on Korean National Standards of Sex Education.|url=http://dx.doi.org/10.24062/kpae.2021.34.2.1|journal=The Korean Association of Practical Arts Education|volume=34|issue=2|pages=1–20|doi=10.24062/kpae.2021.34.2.1|url-access=subscription}}</ref> == घटक एवं विधि == इक्कीसवीं शती में कोरियाई सौन्दर्य मानक यौवनमय रूप एवं त्वचा की स्निग्धता को विशेष महत्व देते हैं, जिसके कारण पाउडर की अपेक्षा क्रीम को प्राथमिकता दी जाती है। दक्षिण कोरिया के आयात प्रतिस्थापन औद्योगीकरण के इतिहास के कारण के-ब्यूटी उत्पादों का निर्यात हेतु विशेष रूप से निर्माण किया जाता है।<ref>{{cite news|url=https://www.npr.org/templates/transcript/transcript.php?storyId=689687288|title=Pretty Hurts|last=Hu|first=Elisa|date=2019-01-30|publisher=NPR}}</ref> इन उत्पादों में परिष्कृत घटक एवं आकर्षक पैकेजिंग का प्रयोग होता है। घटकों में हरित चाय की पत्तियाँ, ऑर्किड, सोयाबीन, घोंघे का श्लेष, रूपांतरित मुखौटे, मधुमक्खी विष (एक प्रदाह-निवारक घटक जो चेहरे की पेशियों को शिथिल करने हेतु प्रयुक्त होता है), समुद्री तारा का अर्क, एवं सूअर कोलेजन सम्मिलित हैं।<ref>{{Cite web|url=https://us.innisfree.com/pages/about-innisfree-ingredient|title=Natural Ingredients}}</ref> विधि में अनेक चरण होते हैं: तेल एवं जल आधारित शुद्धिकरण, शीट मुखौटे, सार, सीरम, स्निग्धक, कुशन कॉम्पैक्ट, किण्वित उत्पाद, एवं एस.पी.एफ. ३५ सूर्यरक्षक। रात्रिकाल में सूर्यरक्षक के स्थान पर रात्रि क्रीम का प्रयोग होता है।<ref>{{Cite web|url=http://www.realstylenetwork.com/beauty/2016/04/hair-essences-what-to-know-about-this-korean-beauty-innovation/|title=Hair Essences- What To Know About This Korean Beauty Innovation|date=6 April 2016|website=Real Style Network}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.koreatimes.co.kr/www/news/nation/2016/08/625_200423.html|title=K-beauty grows!|date=15 March 2016|website=[[The Korea Times]]}}</ref><ref>{{Cite journal|last1=Schuman|first1=Rebecca|date=7 January 2016|title=Radical Self-Care|url=http://www.slate.com/articles/double_x/doublex/2016/01/the_10_step_korean_skin_care_routine_is_a_radical_act_of_feminist_self_care.html|journal=Slate}}</ref> प्रत्येक विधि को त्वचा की बनावट, हार्मोनल परिवर्तन, एवं जीवनशैली के अनुसार भिन्न रूप से अपनाया जाता है।<ref name="wsj3">{{Cite web|url=https://www.wsj.com/articles/k-beauty-the-exhausting-skin-care-regimen-that-may-be-worth-the-effort-1459970031|title=K-Beauty: The Exhausting Skin-Care Regimen That May Be Worth the Effort|last1=Wood|first1=Dana|date=April 6, 2016|website=[[The Wall Street Journal]]}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.standard.co.uk/beauty/skincare/soko-your-skin-why-south-korean-skincare-is-serious-stuff-despite-its-cutesy-packaging-a3314681.html|title=So-Ko your skin: why South Korean skincare is serious stuff (despite its cutesy packaging)|date=8 August 2016|website=Evening Standard}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://globalcosmeticsnews.com/asia-australasia/3127/watch-out-k-beauty-we-re-going-global-east-meets-west-approach-is-secret-to-shiseido-success-says-shiseido-ceo|title=Watch out K-beauty, we're going global: East-meets-west approach is secret to Shiseido success, says CEO|website=Global Cosmetics News|archive-url=https://web.archive.org/web/20170830151440/https://globalcosmeticsnews.com/asia-australasia/3127/watch-out-k-beauty-we-re-going-global-east-meets-west-approach-is-secret-to-shiseido-success-says-shiseido-ceo|archive-date=2017-08-30|url-status=dead}}</ref> के-ब्यूटी की विशिष्ट त्वचा-परिचर्या विधि में औसतन १० चरण होते हैं। यह द्वैध शुद्धिकरण, शीट मुखौटे, सार लोशन, सीरम, गाढ़े स्निग्धक, एवं सूर्यरक्षक से प्रारम्भ होकर रात्रि में गाढ़ी निद्रा क्रीम पर समाप्त होती है।<ref name="wsj4">{{Cite web|url=https://www.wsj.com/articles/k-beauty-the-exhausting-skin-care-regimen-that-may-be-worth-the-effort-1459970031|title=K-Beauty: The Exhausting Skin-Care Regimen That May Be Worth the Effort|last1=Wood|first1=Dana|date=April 6, 2016|website=[[The Wall Street Journal]]}}</ref> चेहरे की त्वचा-परिचर्या उत्पादों की सफलता का कारण है—निरन्तर नवीन उत्पादों का विकास। दक्षिण कोरिया से ६८% त्वचा-परिचर्या उत्पादों का शुभारम्भ हुआ है। यद्यपि पुरुषों की भागीदारी बढ़ रही है, किन्तु ध्यान अभी भी स्त्रियों पर केन्द्रित है। यू-ट्यूब पर सौन्दर्य उत्पादों के प्रयोग हेतु शिक्षण वीडियो उपलब्ध हैं।<ref name=":42">{{Cite web|url=https://www.mintel.com/press-centre/beauty-and-personal-care/a-bright-future-south-korea-ranks-among-the-top-10-beauty-markets-globally|title=A bright future: South Korea ranks among the top 10 beauty markets globally|last=Team|first=Mintel Press|website=Mintel|language=en-US|access-date=2020-05-05}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.mintel.com/press-centre/beauty-and-personal-care/a-bright-future-south-korea-ranks-among-the-top-10-beauty-markets-globally|title=A bright future: South Korea ranks among the top 10 beauty markets globally|last=Team|first=Mintel Press|website=Mintel|language=en-US|access-date=2020-11-05}}</ref><ref name=":24">{{Cite web|url=https://www.nytimes.com/2018/11/23/business/south-korea-makeup-plastic-surgery-free-the-corset.html|title=A South Korean Movement To Change Minds on Beauty.|last=Stevenson|first=Alexandra|date=November 24, 2018|website=[[The New York Times]]|access-date=}}</ref> == चिकित्सकीय सौन्दर्य (सौन्दर्य शल्यचिकित्सा एवं त्वचाविज्ञान) == [[चित्र:스크린샷_2025-08-08_114750.png|दाएँ|अंगूठाकार|250x250पिक्सेल|[[गंगनम जिला|गंगनम]] स्टेशन, [[सियोल]] के समीप स्थित सौन्दर्य शल्यचिकित्सा क्लिनिक]] त्वचा-परिचर्या एवं सौन्दर्य प्रसाधनों के अतिरिक्त के-ब्यूटी का सम्बन्ध दक्षिण कोरिया की सौन्दर्य शल्यचिकित्सा एवं त्वचाविज्ञान से भी है। सियोल का गंगनम क्षेत्र सौन्दर्य प्रक्रियाओं का प्रमुख केन्द्र है, जहाँ डबल पलक शल्यचिकित्सा, नाक शल्यचिकित्सा, चेहरे की रूपरेखा सुधार, एवं त्वचा पुनरुत्थान उपचार हेतु अनेक क्लिनिक स्थित हैं।<ref>{{cite news|url=https://www.aljazeera.com/news/2024/12/23/as-south-korea-draws-visitors-chasing-beauty|title=As South Korea draws visitors chasing beauty|date=23 December 2024|work=Al Jazeera|access-date=8 August 2025}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> अन्तरराष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार दक्षिण कोरिया प्रति व्यक्ति सौन्दर्य शल्यचिकित्सा में अग्रणी देशों में सम्मिलित है।<ref>{{cite web|url=https://www.isaps.org/media/vdpdanke/isaps-global-survey_2023.pdf|title=ISAPS International Survey on Aesthetic/Cosmetic Procedures Performed in 2022|date=2023|publisher=International Society of Aesthetic Plastic Surgery|access-date=8 August 2025}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> कोरिया में हुए सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता है कि लेज़र त्वचा उपचारों के प्रति जनसामान्य में उच्च स्तर की जागरूकता है, किन्तु त्वचाविज्ञान क्लिनिक के बाहर इन उपचारों से प्रतिकूल प्रभावों की सम्भावना अधिक पाई गई है। यह तथ्य के-ब्यूटी की रोकथाम-केंद्रित दृष्टिकोण में त्वचाविज्ञान क्लिनिकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।<ref>{{cite journal|last1=Kim|first1=Seong-Jin|last2=Park|first2=Eun-Ji|year=2024|title=Real-World Clinical Practice on Skin Rejuvenation among Korean Board-Certified Dermatologists|journal=Annals of Dermatology|volume=36|issue=2|pages=123–131|doi=10.5021/ad.2024.36.2.123}}</ref> के-ब्यूटी का चिकित्सकीय सौन्दर्य पक्ष आगंतुक चिकित्सकीय पर्यटन से भी जुड़ा हुआ है। अन्तरराष्ट्रीय मीडिया एवं रिपोर्टों में यह उल्लेखित है कि दक्षिण कोरिया में सौन्दर्य शल्यचिकित्सा हेतु आने वाले पर्यटकों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है।<ref>{{cite journal|last1=Lee|first1=Hyeon-woo|last2=Choi|first2=Min-kyung|year=2023|title=Survey on perspectives and treatment status regarding skin laser treatment in Korea|journal=Journal of Cosmetic Dermatology|volume=22|issue=5|pages=1458–1466|doi=10.1111/jocd.15678}}</ref> == उद्योग == ''दक्षिण कोरिया'' वैश्विक सौन्दर्य उद्योग का अग्रणी है। विश्लेषकों के अनुसार के-ब्यूटी ब्राण्डों का विस्तार एवं राजस्व वृद्धि आगामी वर्षों में भी जारी रहेगी।<ref name=":53">{{Cite web|url=https://www.npd.com/wps/portal/npd/us/news/press-releases/2019/u-s--prestige-beauty-industry-sales-grow-6-percent-in-2018--reports-the-npd-group/|title=U.S. Prestige Beauty Industry Sales Grow 6 Percent in 2018, Reports The NPD Group|last=NPD|date=January 29, 2019|website=NPD|access-date=October 16, 2020}}</ref> यह देश अनेक सौन्दर्य ब्राण्डों के ''अनुसंधान एवं विकास'', ''निर्माण'' एवं ''उत्पादन'' का केन्द्र भी है। अधिकांश कोरियाई नागरिक ''त्वचा एवं स्वास्थ्य'' के विषय में शिक्षित एवं जागरूक हैं, अतः कोरिया में विकसित उत्पादों का ''कठोर नियमन'' होता है।<ref name=":5">{{Cite web|url=https://www.npd.com/wps/portal/npd/us/news/press-releases/2019/u-s--prestige-beauty-industry-sales-grow-6-percent-in-2018--reports-the-npd-group/|title=U.S. Prestige Beauty Industry Sales Grow 6 Percent in 2018, Reports The NPD Group|last=NPD|date=January 29, 2019|website=NPD|access-date=October 16, 2020}}</ref> इसके अतिरिक्त लोकप्रिय संस्कृति का प्रभाव भी सफलता का कारण है—जैसे हल्यु तरंग (कोरियाई सांस्कृतिक लहर), जिसमें प्रसिद्ध व्यक्ति सौन्दर्य ब्राण्डों का प्रचार करते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.export.gov/apex/article2?id=Korea-Cosmetics|title=export.gov|website=www.export.gov|archive-url=https://web.archive.org/web/20201014055301/https://www.export.gov/apex/article2?id=Korea-Cosmetics|archive-date=October 14, 2020|access-date=2020-10-16|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite journal|last1=Cho|first1=Soyun|last2=Oh|first2=Sohee|last3=Kim|first3=Nack In|last4=Ro|first4=Young Suck|last5=Kim|first5=Joung Soo|last6=Park|first6=Young Min|last7=Park|first7=Chun Wook|last8=Lee|first8=Weon Ju|last9=Kim|first9=Dong Kun|date=April 2017|title=Knowledge and Behavior Regarding Cosmetics in Koreans Visiting Dermatology Clinics|journal=Annals of Dermatology|volume=29|issue=2|pages=180–186|doi=10.5021/ad.2017.29.2.180|issn=1013-9087|pmc=5383743|pmid=28392645|last10=Lee|first10=Dong Won|last11=Lee|first11=Sang Jun}}</ref> उदाहरणतः अमोरपैसिफिक नामक कोरियाई सौन्दर्य कम्पनी ने सन् २०१४ (संवत् २०७१) के कोरियाई नाटक "माई लव फ्रॉम द स्टार" को प्रायोजित किया, जिसके निरन्तर प्रचार से त्वचा-परिचर्या एवं लिपस्टिक की बिक्री में क्रमशः ७५% एवं ४००% की वृद्धि हुई। दक्षिण कोरिया में अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन एवं ड्यूटी-फ्री दुकानों में के-ब्यूटी उत्पादों की उपस्थिति ने भी सौन्दर्य उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया।<ref>{{Cite web|url=https://www.cnn.com/2018/04/11/health/korean-makeup-beauty-health-benefits/index.html|title=Why Korea is at the forefront of skincare|author=Marian Liu|date=12 April 2018|website=CNN|access-date=2020-10-16}}</ref> == सन्दर्भ == {{Reflist}} [[श्रेणी:सौन्दर्य]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] iof5rhljvstxrtcbv6lw2l3vancoe6x कोलकाता बंदरगाह 0 1603219 6543761 6518002 2026-04-25T05:40:33Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 4 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543761 wikitext text/x-wiki {{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=दिसम्बर 2025}} {{Infobox Port | name = श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह | native_name = কলকাতা বন্দর | native_name_lang = bn | logo = Kolkata port Trust logo.svg | logo_alt = | logo_size = 180px | logo_caption = | image = A container ship barthed at Berth No. 3 of Netaji Subhas Dock, Port of Kolkata.jpg | image_size = 300px | image_caption = Container ship ''MV Chana Bhum'' berthed at Berth No. 3 of Netaji Subhas Dock | country = India | location = [[Kolkata]], West Bengal, India | coordinates = {{coord|22|32|46|N|88|18|53|E|display=inline,title}} | opened = {{start date and age|df=yes|1870}} | operated = Syama Prasad Mukherjee Port Authority | owner = Syama Prasad Mukherjee Port Authority, [[Ministry of Ports, Shipping and Waterways (India)|Ministry of Ports, Shipping and Waterways]], [[Government of India]] | type = Coastal breakwater, riverine, large seaport | sizewater = | sizeland = | size = {{convert|4500|acre|km2}}<ref name=live>{{cite news |title=Kolkata Port Trust to lease area as big as London Docklands |url=https://www.livemint.com/news/india/oldest-india-port-looks-to-lease-area-as-big-as-london-docklands-11582677194264.html |access-date=29 February 2020 |publisher=www.livemint.com |date=26 February 2020}}</ref> | berths = 34 (Kolkata)<ref>{{cite web |title=BERTH PARTICULARS |url=https://smportkolkata.shipping.gov.in/showfile.php?layout=2&lang=1&lid=86 |access-date=21 December 2021}}</ref><br/> 17 (Haldia)<ref>{{cite web |title=Terminals |url=https://smportkolkata.shipping.gov.in/index1.php?layout=3&lang=1&level=2&sublinkid=2690&lid=44 |access-date=21 December 2021}}</ref> | wharfs = 86 | piers = | employees = 3,600<ref name=live/> | leadershiptitle = | leader = | blankdetailstitle1 = Main trades | blankdetails1 = Automobiles, motorcycles and general industrial cargo including iron ore, granite, coal, fertilizers, petroleum products, and containers<br>'''Major exports:''' Iron ore, leather, cotton textiles<br>'''Major imports:''' Wheat, raw cotton, machinery, iron & steel | blankdetailstitle2 = Stacking area | blankdetails2 = 134722 sqm | draft_depth = Kolkata: {{convert|8.5|m}}<br>Haldia: {{convert|9.1|m}} | blankdetailstitle3 = Water depth | blankdetails3 = {{convert|12.5|m}} <small>(KDS and HDC)</small> and HDC)</small> | arrivals = 3263 (2023–24)<ref name=t>{{cite news | url=https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/shipping-/-transport/top-ports-record-marginal-upswing-in-fy19-cargo-handling-at-699-mt/articleshow/68761143.cms?from=mdr|title=Top ports record marginal upswing in FY19 cargo handling at 699 MT|date= 7 April 2019 |access-date = 7 January 2020 | publisher=economictimes.indiatimes.com}}</ref><ref name=cargoKoPT>{{cite web |url=http://www.kolkataporttrust.gov.in/index1.php?layout=2&lang=1&level=1&sublinkid=83&lid=124 |title=Kolkata Port Trust – Cargo Statistics |access-date = 13 June 2017 | publisher=Kolkata Port Trust}}</ref> | cargotonnage = 66.445&nbsp;million tonnes<small>(2023–24)</small><ref name="economictimes">{{cite web |title=Kolkata Port profit jumps 65pc to Rs 501cr in FY'24, records all-time high cargo handling |url=https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/shipping-/-transport/kolkata-port-profit-jumps-65pc-to-rs-501cr-in-fy24-records-all-time-high-cargo-handling/articleshow/109045022.cms?from=mdr |website=The Economic Times |access-date=5 April 2024 |date=4 April 2024}}</ref><ref name=cargo-statistics-SMPK>{{cite web |url=https://smp.smportkolkata.in/smpk/kol/en/cargo-statistics/ |title=Cargo Statistics |access-date=25 February 2025 |publisher=SMPK }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> | containervolume = {{formatnum: 804579}} [[Twenty-foot equivalent unit|TEUs]] <small>(2024–25)</small><ref name="SMPK25TEUs">{{cite web |title=Highlights of Performance of SMP, Kolkata for the month of March, 2025 |url=https://smp.smportkolkata.in/smpk/kol/wp-content/uploads/sites/2/2025/04/Highlights-for-monthly-D.O._SMPK-Mar_25-Final.pdf |publisher=SMPK |access-date=20 July 2025 }}{{Dead link|date=फ़रवरी 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> | cargovalue = | passengertraffic = 1,310 <small>(2023–24)</small><ref name=passengerSMPK>{{cite web |url=https://smp.smportkolkata.in/smpk/kol/wp-content/uploads/sites/2/2025/01/Passenger-Embarked-Disembarked-during-last-five-years.pdf |title=Passenger Traffic |access-date=25 February 2025 |publisher=SMPK }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> | revenue = {{INRconvert|3227.67|c}} (2023–24)<ref name="SMPK24"/> | profit = {{INRconvert|501.73|c}} (2023–24)<ref name="economictimes"/><ref name="SMPK24">{{cite web |title=Financial Indicators |url=https://smp.smportkolkata.in/smpk/kol/wp-content/uploads/sites/2/2025/01/Financial-Indicators.pdf |publisher=SMPK |access-date=25 February 2025 }}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> | website = {{URL|www.kolkataporttrust.gov.in/}} | locode = INCCU<ref name="Locode-1">{{cite web |title=UN/LOCODE (IN) India |url=https://www.unece.org/fileadmin/DAM/cefact/locode/in.htm |website=www.unece.org |access-date=11 Sep 2020}}</ref> }} कोलकाता बंदरगाह जिसे आधिकारिक तौर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह प्राधिकरण के रूप में जाना जाता है, भारत का एकमात्र प्रमुख नदी बंदरगाह है।<ref>{{Cite web|url=http://www.archive.india.gov.in/business/infrastructure/ports.php|title=Business Portal of India : Infrastructure : National Level Infrastructure : Maritime Transport : Ports|website=www.archive.india.gov.in|access-date=2025-10-06}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> यह बंदरगाह पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित है, जो लगभग २०३ किलोमीटर (१२६ मील) अंतरदेशीय है।<ref>{{Cite web|url=http://www.kolkataporttrust.gov.in/index_new.html|title=Wayback Machine|website=www.kolkataporttrust.gov.in|access-date=2025-10-06}}</ref> यह भारत का सबसे पुराना सक्रिय बंदरगाह है।<ref>{{Cite web|url=https://www.hindustantimes.com/kolkata/close-to-150-years-country-s-oldest-port-staring-at-threats-from-proposed-ports-in-odisha-and-bengal/story-PjuxNUKHMZVRESwJ1zjmXO.html|title=Close to 150 years, country’s oldest port staring at threats from proposed ports in Odisha and Bengal|date=2017-05-05|website=Hindustan Times|language=en|access-date=2025-10-06}}</ref> बंदरगाह का निर्माण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था।<ref>{{Cite news|url=http://kathmandupost.ekantipur.com/news/2018-03-10/kolkata-port-plans-upgrade-to-stave-off-competition.html|title=Kolkata Port plans upgrade to stave off competition|access-date=2025-10-06|language=en}}</ref> कोलकाता एक मीठे पानी का बंदरगाह है और इसमें लवणता में कोई उतार-चढ़ाव नहीं है। बंदरगाह में दो अलग-अलग डॉक सिस्टम हैं— कोलकाता में कोलकाता डॉक सिस्टम और हल्दिया में हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स मौजूद । भारत की स्वतंत्रता के बाद, बंगाल विभाजन (१९४७), भीतरी इलाकों के सिकुड़ते आकार और पूर्वी भारत में आर्थिक स्थिरता जैसे कारकों के कारण बंदरगाह का महत्व कम हो गया । इसका एक विशाल भीतरी क्षेत्र है जिसमें पश्चिम बंगाल , बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश, उत्तर पूर्वी पर्वतीय राज्य और दो स्थलरुद्ध पड़ोसी देश नेपाल और भूटान , साथ ही तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (चीन) सहित संपूर्ण उत्तर-पूर्वी भारत शामिल है। २१वीं सदी की शुरुआत में, माल यातायात की मात्रा फिर से बढ़ने लगी है। मार्च २०१८ तक, बंदरगाह ६५०,००० कंटेनरों को संभालने में सक्षम है, जिनमें से अधिकांश नेपाल , भूटान और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से आते हैं । २०१५ तक, कोलकाता बंदरगाह दुनिया का ८५वां सबसे व्यस्त बंदरगाह है। ==जगह== कोलकाता बंदरगाह हुगली नदी के तट पर स्थित है । माल की लोडिंग और अनलोडिंग हुगली नदी के किनारे बसे तीन शहरों, कोलकाता , बाजवा और हल्दिया में की जाती है । हुगली नदी के पूर्वी तट पर कोलकाता में दो गोदी, बाजवा में छह जेटी और पश्चिमी तट पर हल्दिया में एक गोदी है । हुगली नदी कोलकाता में ५०० मीटर और हल्दिया में १० किलोमीटर चौड़ी है, लेकिन हल्दिया में नदी के बीच में एक नदी द्वीप या नादिचर होने के कारण जलग्रहण क्षेत्र की चौड़ाई घटकर १ किलोमीटर रह जाती है। ==इतिहास== ===प्रारंभिक समय=== कोलकाता बंदरगाह भारत के सबसे पुराने आधुनिक बंदरगाहों में से एक है। पुर्तगालियों के आगमन से पहले ही, जिन्होंने १६वीं शताब्दी के प्रारंभ में यूरोपीय और बंगाल के बीच पहला संपर्क स्थापित किया था, हुगली नदी के ऊपरी हिस्से में व्यापारिक बस्तियों से वसूले जाने वाले सीमा शुल्क ने गंगा की नौवहन प्रणाली में बदलाव ला दिया था। सरस्वती और भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित सप्तग्राम का समृद्ध बंदरगाह समुद्री मालवाहक जहाजों के लिए तेजी से दुर्गम होता जा रहा था। १६वीं शताब्दी के अंत तक, बड़े पुर्तगाली जहाज बटार में लंगर डालने लगे थे । बटार कोलकाता के बाहरी इलाके में एक जगह थी। सप्तग्राम (संतगाँव) से छोटी नावों में माल बटार लाया जाता था और बड़े जहाजों पर लादा जाता था। १५७० में, पुर्तगालियों ने अपना व्यापारिक पद सप्तग्राम से हुगली में स्थानांतरित कर दिया । सत्रहवीं शताब्दी के दौरान, हुगली ने अपना महत्व बनाए रखा। कुछ दशकों बाद, १६३२ में मुगलों द्वारा पुर्तगालियों को खदेड़ दिए जाने के बाद, डच और अंग्रेजों ने यहाँ व्यापारिक चौकियाँ स्थापित कीं। इसके अलावा, हुगली के व्यापार ने छोटी व्यापारिक चौकियों और बस्तियों के विस्तार को प्रोत्साहित किया, खासकर सुतनुती और गोविंदपुर तक। कलकत्ता में बसने से पहले ही, अंग्रेज जानते थे कि 'कोलकाता गोविंदपुर से गार्डन रीच तक पूर्वी तट पर सबसे गहरा समुद्री क्षेत्र था ' और बड़े समुद्री जहाज इस क्षेत्र में आसानी से चल सकते थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा समुद्री व्यापार के केंद्र के रूप में विकसित किए जाने से पहले , यह बुनकरों और कारीगरों का एक छोटा नदी बंदरगाह था । हुगली नदी के तट पर स्थित इस बंदरगाह ने कोलकाता शहर को एक छोटी बुनाई बस्ती से पूर्वी भारत में समुद्री व्यापार के एक प्रमुख केंद्र में बदलने में उत्प्रेरक का काम किया। १८वीं शताब्दी के मध्य से, पश्चिमी तट पर हुगली और सूरत जैसे प्रमुख मुगल बंदरगाहों के पतन के कारण कोलकाता बंदरगाह के विकास में तेजी आई। अंततः, अंग्रेजों के साथ व्यापारिक संबंध भारतीय अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर हावी होने लगे, और यह कोलकाता और बॉम्बे जैसे बंदरगाहों के इर्द-गिर्द घूमने लगा। ===भारत: १९४७-बर्तमान=== ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उद्गम स्थल के रूप में कोलकाता जितना महत्वपूर्ण था, ब्रिटिश शासन के अंत के साथ ही धीरे-धीरे इसका पतन भी हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंदरगाह सुविधाओं का अवमूल्यन किया गया था , लेकिन भारत की स्वतंत्रता के बाद, आर्थिक परिवर्तनों के माध्यम से बंदरगाह को पुनर्जीवित किया गया। पहली पंचवर्षीय योजना में भारत के अन्य बंदरगाहों के साथ-साथ कोलकाता बंदरगाह के लिए ड्रेजर, सर्वेक्षण पोत, डॉक टग, लंगर पोत, हल्के पोत और लॉन्च जैसे नए जहाजों का अधिग्रहण किया गया। तीसरी योजना में कोलकाता बंदरगाह पर दबाव कम करने के लिए हल्दिया डॉक परियोजना की शुरुआत हुई। इस अवधि के दौरान, बड़े जहाजों के लिए नौगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए नदी की मुख्य जल आपूर्ति को बढ़ाने के लिए हुगली नदी के ऊपर एक बैराज का निर्माण किया गया, जिसे फरक्का बांध परियोजना कहा जाता है। बाद की योजनाओं में हल्दिया डॉक के निर्माण और कंटेनर पार्कों के विकास, कम्प्यूटरीकृत प्रणालियों की स्थापना, रेलवे के आधुनिकीकरण आदि तथा पुरानी प्रौद्योगिकी को नई प्रौद्योगिकी से बदलने के लिए प्रमुख प्रावधान थे। ==डॉक सिस्टम== कोलकाता बंदरगाह में कोलकाता डॉक सिस्टम और हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स , तथा समुद्री जहाजों के लिए उपयुक्त २३२ किलोमीटर लंबा जलमार्ग शामिल है। ये डॉक सिस्टम हुगली नदी के तट पर स्थित हैं, जो इसे भारत का एकमात्र प्रमुख नदी बंदरगाह बनाता है। इस बंदरगाह का प्रबंधन श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह प्राधिकरण द्वारा किया जाता है, जिसे पहले कोलकाता बंदरगाह प्राधिकरण या कोलकाता बंदरगाह ट्रस्ट के नाम से जाना जाता था । ==संदर्भ== ovwjmjate21ugtqgb0obxf8902a7miv तरंगफलन 0 1607324 6543678 6516580 2026-04-24T17:38:51Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[सदस्य वार्ता:Patroenix]] को [[तरंगफलन]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 6516580 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[सदस्य वार्ता:Smatteo499]] rztl12mazof1mbmf4y15ovml749jvu6 6543681 6543678 2026-04-24T17:41:43Z ~2026-21496-92 919279 अनुप्रेषण का लक्ष्य [[सदस्य वार्ता:Smatteo499]] से [[तरंग फलन]] में बदला 6543681 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[तरंग फलन]] caidoiwspfv84niw1uczr9ct846q6kg कृष्ण सिंह (गॉल्फ़ खिलाड़ी) 0 1607608 6543684 6518804 2026-04-24T17:45:28Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543684 wikitext text/x-wiki '''कृष्ण सिंह''' एक [[फ़िजी]]<nowiki/>‑[[भारतीय]] [[गॉल्फ़]] खिलाड़ी हैं और ‘हॉल ऑफ़ फ़ेम’ गॉल्फ़र [[विजय सिंह (गॉल्फ़ खिलाड़ी)|विजय सिंह]] के भ्राता हैं। १९९० के दशक में वे ‘ऑफ़िशियल वर्ल्ड गॉल्फ़ रैंकिंग’ में शीर्ष ६०० खिलाड़ियों में सम्मिलित रहे।<ref name="owgr3">{{cite web|url=http://www.owgr.com/en/Ranking/PlayerProfile.aspx?playerID=2848|title=Krishna Singh|publisher=Official World Golf Ranking|access-date=29 August 2016|archive-date=11 सितंबर 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20160911192900/http://www.owgr.com/en/Ranking/PlayerProfile.aspx?playerID=2848|url-status=dead}}</ref> उन्होंने ‘पी॰जी॰ए॰ टूर ऑफ़ ऑस्ट्रेलेशिया’ पर भी खेला, और उनके कार्यकाल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष १९९२ के ‘पेराक मास्टर्स’ में पञ्चम स्थान रहा।<ref name="owgr2">{{cite web|url=http://www.owgr.com/en/Ranking/PlayerProfile.aspx?playerID=2848|title=Krishna Singh|publisher=Official World Golf Ranking|access-date=29 August 2016}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> == सन्दर्भ == {{Reflist}} {{Stub}} [[श्रेणी:20वीं सदी में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जन्म वर्ष अज्ञात (जीवित लोग)]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] tjp3477ch3k77p5grg3g7q86lkszwfg कोएनिगसेग सीसीएक्स कार 0 1608641 6543726 6524215 2026-04-25T02:30:29Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 2 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543726 wikitext text/x-wiki {{Infobox automobile | image = Koenigsegg CCX - Flickr - Alexandre Prévot (11).jpg | name = कोएनिगसेग सीसीएक्स | manufacturer = कोएनिगसेग ऑटोमोटिव एबी | aka = | production = 2006–2010<br />29 उत्पादन | model_years = 2006–2010 | assembly = एंजेलहोल्म, स्वीडन | predecessor = कोएनिगसेग सीसीआर | successor = कोएनिगसेग ऐजेरा | doors = डायहेड्रल सिंक्रो-हेलिक्स | class = स्पोर्ट्स कार (एस)<!-- per [[WP:CARCLASS]], this should not be changed to "supercar or hypercar" --> | body_style = 2-दरवाजे तरगा टॉप | layout = रियर मिड-इंजन, रियर-व्हील-ड्राइव | platform = कोएनिगसेग सीसी | engine = 4.7 लीटर कोएनिगसेग सुपरचार्जर वी8 इंजन | powerout = {{cvt|806|PS|kW hp|0}} | transmission = 6-चाल मैनुअल<br />6-चाल अनुक्रमिक मैनुअल ट्रांसमिशन | wheelbase = {{convert|2660|mm|in|1|abbr=on}} | length = {{convert|4293|mm|in|1|abbr=on}} | width = {{convert|1996|mm|in|1|abbr=on}} | height = {{convert|1120|mm|in|1|abbr=on}} | weight = {{convert|1456|kg|lb|0|abbr=on}} | designer = {{ubl |क्रिश्चियन वॉन कोएनिगसेग |डेविड क्राफूर्ड<ref>{{cite web|url=http://theitalianjunkyard.blogspot.se/2011/03/sweden-aint-that-cold-christian-von.html|title= 20.1 Sweden Ain't That Cold: Christian Von Koenigsegg gives us a quick interview on how he made his dream come true |trans-title=20.1 स्वीडन इतना ठंडा नहीं है: क्रिश्चियन वॉन कोएनिगसेग ने हमें एक छोटा सा इंटरव्यू दिया कि उन्होंने अपना सपना कैसे पूरा किया |language=en |work= द इटैलियन जंकयार्ड |date=5 मार्च 2011| archive-date=17 जुलाई 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20150717010226/http://theitalianjunkyard.blogspot.se/2011/03/sweden-aint-that-cold-christian-von.html|url-status=live}}</ref> |{{ill|स्वेन-हैरी ऐकेस्सन|एसवी}} }} }} '''कोएनिगसेग सीसीएक्स''' मिड-इंजन स्पोर्ट्स कार है। इसे [[स्वीडन]] की कार निर्माता कंपनी ''कोएनिगसेग ऑटोमोटिव एबी'' ने बनाया है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत एक 'ग्लोबल कार' बनाने के लक्ष्य के साथ की गई थी, जिसे दुनिया भर के सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुसार डिज़ाइन किया गया। [[संयुक्त राज्य अमेरिका]] के [[मोटरवाहन|कार]] बाज़ार में प्रवेश करना इसका मुख्य उद्देश्य था। अमेरिका में कारों की बिक्री के लिए, कोएनिगसेग ने अपने पुराने मॉडल 'सीसीआर' के डिज़ाइन में कई बदलाव किए। पहले इस्तेमाल होने वाले ''फोर्ड मॉड्यूलर इंजन'' की जगह कंपनी ने खुद का विकसित किया हुआ इंजन लगाया। इस ''इन-हाउस इंजन'' को इस तरह बनाया गया था कि यह [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमेरिका]] में आसानी से उपलब्ध 91 ऑक्टेन वाले ईंधन पर चल सके और [[कैलिफ़ोर्निया|कैलिफोर्निया]] के कड़े उत्सर्जन मानकों को पूरा कर सके।<ref>{{cite web |title=2006 Koenigsegg CCX - AutoWeek |url=http://www.autoweek.com/apps/pbcs.dll/article?AID=%2F20061030%2FFREE%2F61027006 |website=www.autoweek.com |access-date=20 फरवरी 2026 |language=en |trans-title=2006 कोएनिगसेग CCX - ऑटोवीक |archive-date=27 सितंबर 2007 |archive-url=https://web.archive.org/web/20070927004321/http://www.autoweek.com/apps/pbcs.dll/article?AID=%2F20061030%2FFREE%2F61027006 |url-status=bot: unknown }}</ref> ==इंजन== कोएनिगसेग का यह नया इंजन पूरी तरह से [[एल्युमिनियम]] (356 एल्युमिनियम) से बना है। इसमें ब्लॉक की मजबूती और कास्टिंग के दौरान सिलेंडर बोर की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ''टी7 हीट ट्रीटमेंट'' का उपयोग किया गया है। इस इंजन को विशेष रूप से कोएनिगसेग के लिए 'ग्रेंजर एंड वॉरल' ने तैयार किया और उसे इस रूप में ढाला। इस इंजन का निर्माण, संयोजन और परीक्षण कोएनिगसेग के अपने ''एंजेलहोल्म'' स्थित प्लांट में किया गया था।<ref>{{cite web |title=Koenigsegg Official Website |url=http://www.koenigsegg.com/thecars/ccx.asp?ccx=2 |website=www.koenigsegg.com |access-date=20 फरवरी 2026 |language=en |trans-title=कोएनिगसेग आधिकारिक वेबसाइट |archive-date=11 अगस्त 2007 |archive-url=https://web.archive.org/web/20070811013612/http://www.koenigsegg.com/thecars/ccx.asp?ccx=2 |url-status=dead }}</ref> ==इन्हें भी देखें== * [[ऊमेओ सैंट्रल स्टेशन]] * [[ऊमेओ]] * [[किया ईवी6]] * [[टाटा नैनो]] * [[फेर्रारी ४५८]] ==संदर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:कार]] [[श्रेणी:स्वीडन का यातायात]] ==बाहरी कड़ियाँ== * [http://www.koenigsegg.com/ कोएनिगसेग आधिकारिक साइट] j03irk6yrugf0i36pllh9prpyrw3iqu ब्रिटिश फिलिस्तीन 0 1608906 6543826 6539876 2026-04-25T11:03:42Z The Sorter 845290 6543826 wikitext text/x-wiki {{Infobox country|conventional_long_name=फ़िलिस्तीन|native_name={{hlist|{{lang|ar|فلسطين}}|פָּלֶשְׂתִּינָה}}|common_name=फ़िलिस्तीन|status=राष्ट्र संघ जनादेश|empire=यूनाइटेड किंगडम|p1=अधिकृत शत्रु क्षेत्र प्रशासन|flag_p1=France and United Kingdom flags.svg|image_p1=Crowded shops. Goods are stalled in the street and men are sitting down, NINO F Scholten Jaffa 01 076.tiff|s1=इसराइल|flag_s1=Flag of Israel.svg|s2=पश्चिमी तट पर जॉर्डनी क़ब्ज़ा|flag_s2=Flag of Jordan.svg|s3=सम्पूर्ण फ़िलिस्तीन संरक्षित राज्य|flag_s3=Flag of Hejaz (1917).svg|flag=फ़िलिस्तीन जनादेश का ध्वज|image_flag=Flag of the United Kingdom.svg|symbol_type=[[फ़िलिस्तीन जनादेश का सार्वजनिक सील|सार्वजनिक सील]]<ref>{{Cite web |title=Palestine seal |url=https://www.royalmintmuseum.org.uk/collection/seals/palestine-seal/ |access-date=12 February 2024 |website=www.royalmintmuseum.org.uk |language=en-GB |archive-date=6 February 2024 |archive-url=https://web.archive.org/web/20240206133442/https://www.royalmintmuseum.org.uk/collection/seals/palestine-seal/ |url-status=live }}</ref>|image_coat=Public Seal of Mandatory Palestine.png|national_motto=|national_anthem=|image_map=Map of Mandatory Palestine in 1946 with major cities (in English).svg|image_map_caption=फ़िलिस्तीन जनादेश, 1946|coordinates={{coord|31|45|16|N|35|14|12|E|type:country|display=inline,title}}|religion_ref=<ref name="Hope Simpson report, Chapter III">"{{cite web |url=http://www.zionism-israel.com/Palestine_Hope_Simpson_Report.htm |title=Hope Simpson report, Chapter III |date=October 1930 |publisher=Zionism-israel.com |access-date=1 February 2012 |archive-date=23 June 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20120623065705/https://zionism-israel.com/Palestine_Hope_Simpson_Report.htm |url-status=live }}</ref>|demonym=फ़िलिस्तीनी|capital=[[यरुशलम]]|national_languages=|religion=78% [[इस्लाम]]<br>11% [[यहूदी धर्म]]<br>10% [[इसाई धर्म]]<br>1% अन्य ([[बहाई]] और [[द्रूज़]] सहित)|area_km2=25585.3|area_footnote=<ref name="VillStat 1945">{{cite book |title=Village Statistics, April, 1945 |url=https://www.nli.org.il/en/books/NNL_ALEPH002249756/NLI |author=Department of Statistics |year=1945 |publisher=Government of Palestine |archive-date=10 May 2022 |access-date=2 June 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220510083438/https://www.nli.org.il/en/books/NNL_ALEPH002249756/NLI |url-status=live}} Scan of the original document at the National Library of Israel.</ref>|population_census=7,57,182 (1922)<ref>[https://ecf.org.il/issues/issue/1087 1922 Census of Palestine] {{Webarchive |url=https://web.archive.org/web/20240129015008/https://ecf.org.il/issues/issue/1087 |date=29 January 2024 }}, retrieved 19 February 2024.</ref>|population_estimate_year=1922|common_languages=[[अरबी भाषा|अरबी]], [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]], [[इब्रानी भाषा|इब्रानी]]|religion_year=1922|title_leader=|leader1=|year_leader1=|title_deputy=उच्च आयुक्त|deputy1=[[हर्बर्ट सैमुअल]]|year_deputy1=1920–1925 (पहला)|deputy2=[[ऐलन कनिंघम]]|year_deputy2=1945–1948 (अंतिम)|era={{ubl |[[विश्वयुद्धों के मध्य की अवधि|अंतरयुद्ध काल]] |[[द्वितीय विश्वयुद्ध]] |[[शीतयुद्ध]]}}|event_start={{nowrap|जनादेश की शुरुआत}}|date_start=25 अप्रैल|year_start=1920|event1=ब्रिटिश नियंत्रण की स्थापना|date_event1=29 सितंबर 1923|event_end=[[फ़िलिस्तीन के ब्रिटिश जनादेश का अंत|जनादेश का अंत]]|date_end=14 मई|year_end=1948|stat_year1=|stat_area1=|stat_pop1=|currency={{nowrap|[[मिस्री पाउंड]]<br />(1927 तक)<br />[[फ़िलिस्तीनी पाउंड]]<br />(1927 से)}}|today={{ISR}}<br />{{PSE}}|legislature=<wbr />|house1=[[सर्वोच्च मुस्लिम परिषद]]|type_house1=मुस्लिम समुदाय का संसद|house2=[[प्रतिनिधि सभा (फ़िलिस्तीन जनादेश)|प्रतिनिधि सभा]]|type_house2=यहूदी समुदाय का संसद}} '''फ़िलिस्तीन जनादेश''', आधिकारिक नाम '''फ़िलिस्तीन''', एक [[:hi:ब्रिटिश_साम्राज्य|ब्रिटिश]] प्रशासनिक क्षेत्र था जो फिलिस्तीन के क्षेत्र में 1920 और 1948 के बीच और 1922 के बाद, फिलिस्तीन के लिए राष्ट्र संघ के जनादेश की शर्तों के तहत अस्तित्व में था।{{Efn|During its existence the territory was officially known simply as ''Palestine'', but, in later years, a variety of other names and descriptors have been used, including ''Mandatory'' or '''Mandate Palestine''', the '''British Mandate of Palestine''' and '''British Palestine''' ({{langx|ar|فلسطين الانتدابية}} ''{{transliteration|ar|Filasṭīn al-Intidābiyah}}''; {{langx|he|פָּלֶשְׂתִּינָה (א״י)}} ''{{transliteration|he|Pāleśtīnā (E.Y.)}}'', where "E.Y." indicates ''’Eretz Yiśrā’ēl'', the [[Land of Israel]]).}}<ref>{{Cite web |url=https://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/2FCA2C68106F11AB05256BCF007BF3CB |title=League of Nations decision confirming the Principal Allied Powers' agreement on the territory of Palestine |archive-url=https://web.archive.org/web/20131125014738/http://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/2FCA2C68106F11AB05256BCF007BF3CB |archive-date=25 November 2013}}</ref> इस क्षेत्र का प्रशासन अंग्रेजों द्वारा किया जाता था, जो इसे वर्तमान में स्वशासन के लिए अयोग्य मानते थे। 1916 में [[:hi:प्रथम_विश्व_युद्ध|प्रथम विश्व युद्ध]] के दौरान उस्मानी साम्राज्य के खिलाफ एक [[:hi:अरब_विद्रोह|अरब विद्रोह]] के बाद, ब्रिटिश साम्राज्य की सेनाओं ने उस्मानी सेनाओं को [[:hi:लेवंट|लेवेंट]] से बाहर निकाल दिया।<ref>{{Cite book|editor-first=Matthew|editor-last=Hughes|title=Allenby in Palestine: The Middle East Correspondence of Field Marshal Viscount Allenby June 1917&nbsp;– October 1919|series=Army Records Society|volume=22|year=2004|publisher=Sutton Publishing Ltd|location=Phoenix Mill, Thrupp, Stroud, Gloucestershire|isbn=978-0-7509-3841-9}}</ref> अंग्रेजों के लिए, [[:hi:ग्रेट_ब्रिटेन_और_आयरलैंड_का_यूनाइटेड_किंगडम|यूनाइटेड किंगडम]] [[:hi:McMahon–Hussein_Correspondence|मैकमोहन-हुसैन पत्राचार]] में सहमत हुआ था कि वह विद्रोह की स्थिति में अरब स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन अंत में, यूनाइटेड किंगडम और [[:hi:तृतीय_फ्रांसीसी_गणतंत्र|फ्रांस]] ने साइक्स-पिको समझौते के तहत [[उस्मानी सीरिया]] को विभाजित कर दिया-जो अरबों की नजर में विश्वासघात का कार्य था। एक अन्य मुद्दा जो बाद में उठा वह 1917 की [[:hi:Balfour_Declaration|बाल्फोर घोषणा]] थी, जिसमें ब्रिटेन ने फिलिस्तीन में एक [[:hi:Homeland_for_the_Jewish_people|यहूदी "राष्ट्रीय घर"]] की स्थापना के लिए अपना समर्थन देने का वादा किया था। फ़िलिस्तीन जनादेश की स्थापना 1920 में की गई थी, और अंग्रेजों ने 1922 में राष्ट्र संघ से फिलिस्तीन के लिए एक जनादेश प्राप्त किया था।<ref>[http://avalon.law.yale.edu/20th_century/leagcov.asp#art22 Article 22, The Covenant of the League of Nations] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110726080156/http://avalon.law.yale.edu/20th_century/leagcov.asp#art22|date=26 July 2011}} and "Mandate for Palestine", ''Encyclopaedia Judaica'', Vol.</ref> फ़िलिस्तीन जनादेश को इसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के आधार पर एक वर्ग ए जनादेश के रूप में नामित किया गया था। यह वर्गीकरण स्व-शासन के लिए उच्चतम क्षमता के साथ युद्ध के बाद के जनादेश के लिए आरक्षित था।<ref>Legal Consequences of the Construction of a Wall in the Occupied Palestinian Territory, Advisory Opinion of 9 July 2004, 2004 International Court of Justice 63.</ref> फ़िलिस्तीन जनादेश के अलावा सभी वर्ग ए जनादेश ने 1946 तक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी। जनादेश के दौरान, इस क्षेत्र में [[:hi:Aliyah|यहूदी आप्रवासन]] की लगातार लहरें और यहूदी और अरब दोनों समुदायों में [[:hi:Intercommunal_conflict_in_Mandatory_Palestine|राष्ट्रवादी आंदोलन]] का उदय हुआ। दोनों आबादी के प्रतिस्पर्धी हितों के कारण फिलिस्तीन में अरब विद्रोह और [[:hi:Jewish_insurgency_in_Mandatory_Palestine|फ़िलिस्तीन जनादेश में यहूदी विद्रोह]] हुआ। फिलिस्तीन के लिए क्षेत्र को दो राज्यों, एक अरब और एक यहूदी में विभाजित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना नवंबर 1947 में पारित की गई थी। 1948 के फिलिस्तीन युद्ध का अंत फ़िलिस्तीन जनादेश के क्षेत्र के साथ हुआ, जिसे [[:hi:इज़राइल|इज़राइल राज्य]], जॉर्डन के हाशमाइट साम्राज्य, जिसने [[:hi:जॉर्डन_नदी|जॉर्डन नदी]] के पश्चिमी तट पर क्षेत्र को अपने साथ जोड़ लिया, और मिस्र राज्य, जिसने [[:hi:गाज़ा_पट्टी|गाजा पट्टी]] में "ऑल-फिलिस्तीन प्रोटेक्टोरेट" की स्थापना की। == व्युत्पत्ति == स्थानीय फिलिस्तीनी अरब और तुर्क उपयोग और यूरोपीय परंपरा के अनुसार, जनादेश के क्षेत्र को दिया गया नाम "फिलिस्तीन" था।<ref>{{Cite book|last=Nur Masalha|title=Palestine: A Four Thousand Year History|url=https://books.google.com/books?id=H6K9AQAACAAJ|year=2018|publisher=Zed|isbn=978-1-78699-272-7}}</ref>{{Sfn|Khalidi|1997|pp=151-152}}<ref name="Büssow">{{Cite book|last=Büssow|first=Johann|title=Hamidian Palestine: Politics and Society in the District of Jerusalem 1872–1908|url=https://books.google.com/books?id=crPPX99rjYUC&pg=PA5|access-date=17 May 2013|date=11 August 2011|publisher=BRILL|isbn=978-90-04-20569-7|page=5}}</ref> [ख] मैंडेट चार्टर में निर्धारित किया गया था कि फ़िलिस्तीन जनादेश की तीन आधिकारिक भाषाएँ होंगीः अंग्रेजी, अरबी और हिब्रू।{{Efn|Historian [[Nur Masalha]] describes the "British preoccupation with Palestine" and the large increase in European books, articles, travelogues and geographical publications during the 18th and 19th centuries.<ref>{{cite book|author=Nur Masalha|author-link=Nur Masalha|title=Palestine A Four Thousand year History|url=https://books.google.com/books?id=eNvVAQAACAAJ|date=2018|publisher=Zed Books|isbn=978-1-78699-274-1|pages=242–245}}</ref>}} == इतिहास == === 1920 का दशक === अप्रैल 1920 में यरूशलेम में हुए दंगों में ९ लोगों की जान गई। [[चित्र:Crowded_shops._Goods_are_stalled_in_the_street_and_men_are_sitting_down,_NINO_F_Scholten_Jaffa_01_076.tiff|thumb|1920 के दशक में [[याफ़ा]] में फिलिस्तीनी]] अंग्रेज़ों के आगमन के बाद अरब निवासियों ने सभी प्रमुख शहरों में मुस्लिम‑ईसाई संघों की स्थापना की। 1919 में ये संघ यरूशलेम में आयोजित पहली फ़िलिस्तीनी अरब कांग्रेस के लिए एकत्र हुए। इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिनिधि सरकार की मांग करना और बाल्फोर घोषणा का विरोध करना था।<ref>{{Cite web|url=http://content.ecf.org.il/files/M00661_FirstArabCongress1919ParisResolutionArabic.pdf|title=First Arab Congress 1919 Paris Resolution (in Arabic)|website=ecf.org.il|archive-url=https://web.archive.org/web/20170925040044/http://content.ecf.org.il/files/M00661_FirstArabCongress1919ParisResolutionArabic.pdf|archive-date=25 September 2017}}</ref> साथ ही, मार्च 1918 में [[:hi:Zionist_Commission|ज़ायोनी आयोग]] का गठन किया गया और फिलिस्तीन में ज़ायोनेवादी उद्देश्यों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। 19 अप्रैल 1920 को, फिलिस्तीनी यहूदी समुदाय के [[:hi:Assembly_of_Representatives_(Mandate_Palestine)|प्रतिनिधियों की सभा]] के लिए [[:hi:1920_Assembly_of_Representatives_election|चुनाव]] हुए।<ref>{{Cite web|url=http://www.palestinechronicle.com/view_article_details.php?id=14037|title=Palestine Through History: A Chronology (I)|access-date=14 February 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20110617020548/http://www.palestinechronicle.com/view_article_details.php?id=14037|archive-date=17 June 2011}}</ref> 1920 के जुलाई माह में सैन्य प्रशासन को समाप्त कर एक ब्रिटिश नागरिक प्रशासन स्थापित किया गया, जिसके प्रमुख के रूप में एक उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। पहले उच्चायुक्त सर हर्बर्ट सैमुअल, जो एक ज़ायनिस्ट थे और हाल ही में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य रहे थे, 20 जून 1920 को फ़िलिस्तीन पहुँचे और 1 जुलाई से अपना पदभार ग्रहण किया। सैमुअल ने यरूशलेम के उत्तरपूर्वी किनारे पर स्थित माउंट स्कोपस पर ऑगस्टा विक्टोरिया अस्पताल परिसर के एक हिस्से में अपना मुख्यालय और आधिकारिक आवास स्थापित किया। यह भवन लगभग 1910 में जर्मनों द्वारा निर्मित किया गया था। [[चित्र:A_world_in_perplexity_(1918)_(14780310121).jpg|thumb|यरूशलेम का औपचारिक हस्तांतरण ब्रिटिश शासन में, जिसमें एक "देशी पुजारी" ने दाऊद की मीनार की सीढ़ियों से घोषणा पढ़ी[[:hi:Tower_of_David|डेविड का टावर]]]] 1927 के भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के बावजूद यह भवन 1933 तक ब्रिटिश उच्चायुक्तों के मुख्यालय और आधिकारिक आवास के रूप में उपयोग में रहा। उसी वर्ष यरूशलेम के दक्षिण‑पूर्वी किनारे पर उच्चायुक्त के लिए एक नया, उद्देश्य‑निर्मित मुख्यालय और आवास तैयार हो गया। यह भवन, जिसे यहूदी आबादी द्वारा ''आर्मोन हानेत्सिव'' कहा जाता था, ‘हिल ऑफ ईविल काउंसल’ पर जाबल मुक़ाबिर की पहाड़ी पर स्थित था और 1948 में ब्रिटिश शासन की समाप्ति तक उच्चायुक्तों के मुख्यालय और आधिकारिक आवास के रूप में प्रयुक्त होता रहा।<ref name="Haaretz">'A Colonial Room With a View of Jerusalem' (''[[Haaretz]]'', 24 April 2012).</ref><ref name="auto">{{Cite web|url=https://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/FB6DD3F0E9535815852572DD006CC607|archive-url=https://web.archive.org/web/20140603191241/http://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/FB6DD3F0E9535815852572DD006CC607|title=United Nations Maintenance Page|archive-date=3 June 2014|website=unispal.un.org}}</ref> नव-स्थापित नागरिक प्रशासन की पहली कार्रवाइयों में से एक प्रमुख आर्थिक संपत्तियों पर अधिदेश सरकार से रियायतें देना शुरू करना था। 1921 में सरकार ने एक यहूदी उद्यमी पिन्हास रुटेनबर्ग को विद्युत ऊर्जा के उत्पादन और वितरण के लिए रियायतें दीं। रुटेनबर्ग ने जल्द ही एक बिजली कंपनी स्थापित की, जिसके शेयरधारक ज़ायोनी संगठन, निवेशक और परोपकारी लोग थे। फिलिस्तीनी-अरबों ने इसे इस बात के प्रमाण के रूप में देखा कि अंग्रेज ज़ायोनीवाद का पक्ष लेना चाहते हैं। ब्रिटिश प्रशासन ने दावा किया कि विद्युतीकरण से पूरे देश का आर्थिक विकास बढ़ेगा, और साथ ही यह राजनीतिक के बजाय आर्थिक साधनों के माध्यम से यहूदी राष्ट्रीय घर को सुविधाजनक बनाने के लिए उनकी प्रतिबद्धता को सुरक्षित करेगा।<ref>Shamir, Ronen (2013) ''Current Flow: The Electrification of Palestine'' Stanford: Stanford University Press</ref> [[चित्र:Samuelarrival.jpg|thumb|[[:hi:Herbert_Samuel,_1st_Viscount_Samuel|सर हर्बर्ट सैमुअल]] का आगमन। बाएँ से दाएँः [[:hi:टामस_एडवर्ड_लॉरेंस|टी. ई. लॉरेंस]], [[:hi:अब्दुल्ला_प्रथम_बिन_अल-हुसैन|अमीर अब्दुल्ला]], एयर मार्शल [[:hi:Geoffrey_Salmond|सर जेफ्री सैल्मंड]], सर विन्धम डीडेस और अन्य]] मई 1921 में, प्रतिद्वंद्वी यहूदी वामपंथी प्रदर्शनकारियों के बीच अशांति और फिर यहूदियों पर अरबों द्वारा हमलों के बाद, याफ़ा में दंगों में लगभग 100 लोग मारे गए। हाई कमिश्नर सैमुअल ने मैंडेट के हिसाब से फ़िलिस्तीन में सेल्फ़-गवर्निंग कबीले बनाने की कोशिश की, लेकिन अरब लीडरशिप ने ऐसे किसी भी इंस्टीट्यूशन के साथ कोऑपरेट करने से मना कर दिया जिसमें यहूदी हिस्सा लेते हों। जब मार्च 1921 में जेरूसलम के ग्रैंड मुफ़्ती, कामिल अल-हुसैनी की मौत हो गई, तो हाई कमिश्नर सैमुअल ने अपने सौतेले भाई, मोहम्मद अमीन अल-हुसैनी को इस पोस्ट पर अपॉइंट किया। जेरूसलम अल-हुसैनी कबीले के मेंबर, अमीन अल-हुसैनी एक अरब नेशनलिस्ट और मुस्लिम लीडर थे। ग्रैंड मुफ़्ती के तौर पर, और इस दौरान दूसरे असरदार पोस्ट पर रहते हुए, अल-हुसैनी ने ज़ायोनिज़्म के हिंसक विरोध में अहम रोल निभाया। 1922 में, अल-हुसैनी सुप्रीम मुस्लिम काउंसिल के प्रेसिडेंट चुने गए, जिसे सैमुअल ने दिसंबर 1921 में बनाया था। काउंसिल वक्फ फंड को कंट्रोल करती थी, जिसकी सालाना वैल्यू हज़ारों पाउंड थी, और ऑर्फन फंड को, जिसकी सालाना वैल्यू लगभग £50,000 थी, जबकि ज्यूइश एजेंसी का सालाना बजट £600,000 था। इसके अलावा, यह फ़िलिस्तीन में इस्लामिक कोर्ट को भी कंट्रोल करती थी। दूसरे कामों के अलावा, इन कोर्ट के पास वकील और प्रीचर अपॉइंट करने का अधिकार था।<ref name="Mattar2003">{{Cite encyclopedia|last=Mattar|first=Philip|editor=Mattar, Philip|title=al-Husayni, Amin|edition=Revised|year=2003|publisher=Facts On File|location=New York}}</ref> [[चित्र:Palestinian_delegation_1929.jpg|thumb|1929 में रावदत अल मारेफ हॉल में सत्र में एक अरब "विरोध सभा"। बाएँ से दाएँः अज्ञात-[[:hi:Amin_al-Husayni|अमीन अल-हुसैनी]]-मूसा अल-हुसैना-[[:hi:राघेब_नशाशिबी|रागिब अल-नशाशीबी]]-अज्ञात ]] 1922 फिलिस्तीन ऑर्डर इन काउंसिल ने एक विधान परिषद की स्थापना की, जिसमें 23 सदस्य शामिल थेः 12 निर्वाचित, 10 नियुक्त और उच्चायुक्त।<ref>{{Cite web|url=https://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/C7AAE196F41AA055052565F50054E656|archive-url=https://web.archive.org/web/20140916132453/http://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/C7AAE196F41AA055052565F50054E656|title=1922 Palestine Order in Council|archive-date=16 September 2014}}</ref><ref name="T1">"Palestine. The Constitution Suspended. Arab Boycott Of Elections. Back To British Rule" ''The Times'', 30 May 1923, p. 14, Issue 43354</ref> 12 निर्वाचित सदस्यों में से आठ मुस्लिम अरब, दो ईसाई अरब और दो यहूदी होने थे।<ref name="A">[http://www.answers.com/topic/legislative-council-palestine Legislative Council (Palestine)] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20181015060758/http://www.answers.com/topic/legislative-council-palestine|date=15 October 2018}} Answers.com</ref> अरबों ने सीटों के वितरण का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूंकि वे आबादी का 88% हिस्सा थे, इसलिए केवल 43% सीटें होना अनुचित था।<ref name="A" /> [[:hi:1923_Palestinian_Legislative_Council_election|चुनाव]] फरवरी और मार्च 1923 में हुए, लेकिन अरब बहिष्कार के कारण, परिणाम रद्द कर दिए गए और 12 सदस्यीय सलाहकार परिषद की स्थापना की गई।<ref name="T1" /> 1923 में ऑस्ट्रिया के [[:hi:वियना|वियना]] में आयोजित [[:hi:First_World_Congress_of_Jewish_Women|यहूदी महिलाओं की पहली विश्व कांग्रेस]] में यह निर्णय लिया गया था कि "इसलिए, यह सभी यहूदियों का कर्तव्य प्रतीत होता है कि वे फिलिस्तीन के सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण में सहयोग करें और उस देश में यहूदियों के बसने में सहायता करें।<ref name="jwa">{{Cite web|url=https://jwa.org/encyclopedia/article/international-council-of-jewish-women|title=International Council of Jewish Women|last=Las, Nelly|publisher=International Council of Jewish Women|access-date=20 November 2018|archive-date=16 August 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210816201618/https://jwa.org/encyclopedia/article/international-council-of-jewish-women}}</ref> अक्टूबर 1923 में, ब्रिटेन ने लीग ऑफ नेशंस को 1920-1922 अवधि के लिए फिलिस्तीन के प्रशासन पर एक रिपोर्ट प्रदान की, जिसमें जनादेश से पहले की अवधि शामिल थी। अगस्त 1929 में [[:hi:1929_Palestine_riots|दंगे]] हुए थे जिसमें 250 लोग मारे गए थे। === 1930 के दशकः अरब सशस्त्र विद्रोह === 1930 में शेख इज़्ज़ अद‑दीन अल‑क़स्साम सीरिया से फ़िलिस्तीन पहुँचे, जो उस समय फ़्रांसीसी नियंत्रण वाले सीरिया और लेबनान के मंडेट का हिस्सा था। उन्होंने “ब्लैक हैंड” नामक एक सशस्त्र संगठन की स्थापना की, जो ज़ायनिस्ट गतिविधियों और ब्रिटिश शासन, दोनों के विरोध में था। अल‑क़स्साम ने ग्रामीण किसानों की भर्ती की और उन्हें सैन्य प्रशिक्षण प्रदान किया। 1935 तक उनके अनुयायियों की संख्या 200 से 800 के बीच पहुँच चुकी थी। इस समूह ने ज़ायनिस्ट बसने वालों पर बम और आग्नेयास्त्रों से हमले किए, उनके बाग़ों को नुकसान पहुँचाया और ब्रिटिशों द्वारा निर्मित रेल लाइनों को भी निशाना बनाया। नवंबर 1935 में, उनके दो अनुयायी फल‑चोरों की तलाश में निकली फ़िलिस्तीन पुलिस की एक गश्ती टीम से मुठभेड़ में उलझ गए, जिसमें एक पुलिसकर्मी मारा गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक पुलिस ने व्यापक खोज अभियान चलाया और अल‑क़स्साम को या'बद के निकट एक गुफा में घेर लिया। मठभेड़ में अल‑क़स्साम मारे गए।<ref name="segev">{{Harvnb|Segev|2000|pp=[https://archive.org/details/onepalestinecomp00sege/page/360 360–362]}}</ref> ==== अरब विद्रोह ==== [[चित्र:Resistance_of_Palestinian_men_and_women.png|thumb|अंग्रेजों के खिलाफ अरब विद्रोह]] 20 नवंबर 1935 को अल‑क़स्साम की मृत्यु ने अरब समुदाय में व्यापक आक्रोश उत्पन्न किया। हाइफ़ा में उनके अंतिम संस्कार के दौरान विशाल भीड़ उनके शव के साथ चली। कुछ महीनों बाद, अप्रैल 1936 में, अरब राष्ट्रीय आम हड़ताल आरंभ हुई। यह हड़ताल अक्टूबर 1936 तक चली और इसका नेतृत्व अमीन अल‑हुसैनी की अध्यक्षता वाली अरब उच्च समिति ने किया। उस वर्ष की गर्मियों में हज़ारों एकड़ यहूदी‑कृषित भूमि और बाग़ों को नष्ट कर दिया गया। यहूदी नागरिकों पर हमले हुए और कई मारे गए, जबकि बिसान (बीट शी 'एन) और एकर जैसी कुछ यहूदी बस्तियों के निवासी अधिक सुरक्षित क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। हिंसा लगभग एक वर्ष के लिए कम हो गई, जब ब्रिटिश सरकार ने जांच के लिए पील आयोग भेजा।<ref>{{Harvnb|Khalidi|2006}}</ref><ref>{{Harvnb|Gilbert|1998}}</ref> अरब विद्रोह के पहले चरणों के दौरान, फिलिस्तीनी अरबों के बीच अल-हुसैनी और नशाशिबी के कुलों के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण, अमीन अल-हुसैना द्वारा हत्या के कई प्रयासों के बाद रागिब नशाशिबि को मिस्र भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।<ref>{{Cite book|last=Smith|first=Charles D.|title=Palestine and the Arab–Israeli Conflict: A History with Documents|edition=Sixth|year=2007|pages=111–225}}</ref> पील आयोग की सिफारिश को अरबों द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद, 1937 की शरद ऋतु में विद्रोह फिर से शुरू हुआ। अगले 18 महीनों में, अंग्रेजों ने नाबलुस और हेब्रोन को खो दिया। 6, 000 सशस्त्र यहूदी सहायक पुलिस द्वारा समर्थित ब्रिटिश बलों ने भारी बल के साथ व्यापक दंगों को दबा दिया। ब्रिटिश अधिकारी [[:hi:Orde_Charles_Wingate|चार्ल्स ऑर्डे विंगेट]] (जिन्होंने धार्मिक कारणों से एक ज़ायोनी पुनरुत्थान का समर्थन किया) ने ब्रिटिश सैनिकों और यहूदी स्वयंसेवकों जैसे कि [[:hi:यिगाल_एलोन|यिगल एलोन]] के विशेष रात्रि दस्तों का आयोजन किया, जिन्होंने अरब गांवों पर छापे मारकर "निचले गैलील और जेज़्रेल घाटी में अरब विद्रोहियों के खिलाफ महत्वपूर्ण सफलताएं हासिल कीं"।<ref>{{Citation|publisher=IDC|title=Covenant|chapter=The Zionism of Orde|volume=3|issue=1|url=http://www.covenant.idc.ac.il/en/vol3/issue1/The_Zionism_of_Orde.html|access-date=4 August 2014|archive-date=1 August 2014|archive-url=https://web.archive.org/web/20140801015753/http://covenant.idc.ac.il/en/vol3/issue1/The_Zionism_of_Orde.html}}</ref><ref>{{Harvnb|Black|1991}}</ref><ref>{{Harvnb|Shapira|1992}}</ref> [[:hi:Irgun|इरगुन]], एक यहूदी मिलिशिया समूह, ने अरब नागरिकों के खिलाफ "जवाबी कार्रवाई" के रूप में हिंसा का भी इस्तेमाल किया, [[:hi:List_of_Irgun_attacks_during_the_1930s|बाजारों और बसों पर हमला]] किया।<ref name="Irgun">{{Cite book|title=Holy War in Judaism: The Fall and Rise of a Controversial Idea|publisher=Oxford University Press|last=Firestone, Reuven|year=2012|page=192|isbn=978-0-19-986030-2|url=https://books.google.com/books?id=EHyqYbTM-dwC&q=Irgun+%22retaliatory+acts%22&pg=PA192}}</ref> अरबों द्वारा यहूदी आबादी पर हमलों के तीन स्थायी प्रभाव थेः सबसे पहले, उन्होंने यहूदी भूमिगत मिलिशिया, मुख्य रूप से हागानाह के गठन और विकास का नेतृत्व किया, जो 1948 में निर्णायक साबित होने वाले थे। दूसरा, यह स्पष्ट हो गया कि दोनों समुदायों का सामंजस्य नहीं हो सका और विभाजन के विचार का जन्म हुआ। तीसरा, अंग्रेजों ने 1939 के श्वेत पत्र के साथ अरब विरोध का जवाब दिया, जिसने यहूदी भूमि खरीद और आप्रवासन को गंभीर रूप से प्रतिबंधित कर दिया। हालाँकि, [[:hi:द्वितीय_विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] के आगमन के साथ, यह कम आप्रवासन कोटा भी नहीं पहुंचा था। श्वेत पत्र नीति ने स्वयं यहूदी आबादी के उन वर्गों को कट्टरपंथी बना दिया, जो युद्ध के बाद अंग्रेजों के साथ सहयोग नहीं करेंगे। विद्रोह का फिलिस्तीनी अरब नेतृत्व, सामाजिक सामंजस्य और सैन्य क्षमताओं पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा, और इसने 1948 के युद्ध के परिणाम में योगदान दिया क्योंकि "जब फिलिस्तीनियों को 1947-49 में अपनी सबसे दुर्भाग्यपूर्ण चुनौती का सामना करना पड़ा, तब भी वे 1936-39 के ब्रिटिश दमन से पीड़ित थे, और प्रभावी रूप से एक एकीकृत नेतृत्व के बिना थे।{{Sfn|Khalidi|2001|p=28}} ==== विभाजन प्रस्ताव ==== [[चित्र:Jewish_protest_demonstrations_against_Palestine_White_Paper,_May_18,_1939._King_George_Ave,_Jerusalem.jpg|thumb|1939 में येरुशलम में श्वेत पत्र के खिलाफ यहूदी प्रदर्शन]] 1937 में, पील आयोग ने एक छोटे से यहूदी राज्य के बीच विभाजन का प्रस्ताव रखा, जिसकी अरब आबादी को स्थानांतरित करना होगा, और एक अरब राज्य को ट्रांसजॉर्डन के अमीरात से जोड़ा जाएगा, यह अमीरात फिलिस्तीन के लिए व्यापक जनादेश का भी हिस्सा है। अरबों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। दो मुख्य यहूदी नेताओं, [[:hi:Chaim_Weizmann|चैम वीज़मैन]] और [[:hi:डेव्हिड_बेन-गुरियन|डेविड बेन-गुरियन]] ने [[:hi:World_Zionist_Congress|ज़ायोनी कांग्रेस]] को अधिक बातचीत के आधार के रूप में पील की सिफारिशों को समान रूप से मंजूरी देने के लिए आश्वस्त किया था।<ref name="Louis">Louis, William Roger (2006).</ref><ref name="Morris66">Morris, Benny (2009).</ref><ref name="Morris48">{{Cite book|last=Morris|first=Benny|author-link=Benny Morris|title=The Birth of the Palestinian Refugee Problem Revisited|pages=11, 48, 49|publisher=Cambridge University Press|year=2004|orig-year=1988|isbn=978-0-521-00967-6|url=https://books.google.com/books?id=uM_kFX6edX8C|access-date=12 February 2022}}</ref><ref>'Zionists Ready To Negotiate British Plan As Basis', ''The Times'' Thursday, 12 August 1937; p. 10; Issue 47761; col B.</ref><ref>Eran, Oded (2002).</ref> अक्टूबर 1937 में अपने बेटे को लिखे एक पत्र में, बेन-गुरियन ने समझाया कि विभाजन "समग्र रूप से भूमि पर कब्जा" करने के लिए पहला कदम होगा।<ref>[http://www.palestineremembered.com/download/B-G%20LetterTranslation.pdf Letter from David Ben-Gurion to his son Amos, written 5 October 1937] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190512101840/http://www.palestineremembered.com/download/B-G%20LetterTranslation.pdf|date=12 May 2019}}, Obtained from the Ben-Gurion Archives in Hebrew, and translated into English by the [[Institute of Palestine Studies]], Beirut</ref><ref>{{Citation|last=Morris|first=Benny|author-link=Benny Morris|title=Righteous Victims: A History of the Zionist-Arab Conflict, 1881–1998|publisher=Knopf Doubleday Publishing Group|year=2011|isbn=978-0-307-78805-4|page=138}} Quote: "No Zionist can forgo the smallest portion of the Land Of Israel.</ref><ref name="Finkelstein208">{{Citation|title=Beyond Chutzpah: On the Misuse of Anti-semitism and the Abuse of History|first=Norman|last=Finkelstein|publisher=University of California Press|year=2005|isbn=978-0-520-24598-3|page=280|url=https://books.google.com/books?id=Xmi2Yw0QzN8C&pg=PA280}}</ref> इसी तरह की भावना बेन-गुरियन द्वारा अन्य अवसरों पर दर्ज की गई थी, जैसे कि जून 1938 में यहूदी एजेंसी के कार्यकारी की एक बैठक में, साथ ही चैम वीज़मैन द्वारा भी।<ref>Quote from a meeting of the Jewish Agency executive in June 1938: "[I am] satisfied with part of the country, but on the basis of the assumption that after we build up a strong force following the establishment of the state, we will abolish the partition of the country and we will expand to the whole Land of Israel.</ref><ref name="Finkelstein208" /><ref>From a letter from Chaim Weizmann to [[General (United Kingdom)|General]] [[Arthur Grenfell Wauchope|Sir Arthur G. Wauchope]], [[High Commissioners for Palestine and Transjordan|High Commissioner for Palestine]], while the Peel Commission was convening in 1937: "We shall spread in the whole country in the course of time ….. this is only an arrangement for the next 25 to 30 years." {{Citation|title=Expulsion of the Palestinians: The Concept of "Transfer" in Zionist Political Thought, 1882–1948|first=Nur|last=Masalha|publisher=Inst for Palestine Studies|year=1992|isbn=978-0-88728-235-5|page=[https://archive.org/details/expulsionofpales00masa/page/62 62]|url=https://archive.org/details/expulsionofpales00masa/page/62}}</ref> फरवरी और मार्च 1939 में [[:hi:London_Conference_of_1939|लंदन सम्मेलन]] के बाद, ब्रिटिश सरकार ने एक [[:hi:1939_White_Paper|श्वेत पत्र]] प्रकाशित किया जिसमें यूरोप से यहूदी आप्रवासन की सीमा, यहूदी भूमि खरीद पर प्रतिबंध और दस साल के भीतर जनादेश को बदलने के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने के लिए एक कार्यक्रम का प्रस्ताव दिया गया था। इसे ''[[:hi:Yishuv|यीशुव]]'' द्वारा अधिदेश शर्तों के विश्वासघात के रूप में देखा गया था, विशेष रूप से यूरोप में यहूदियों के बढ़ते उत्पीड़न के आलोक में। जवाब में, ज़ायोनीवादियों ने फिलिस्तीन में अवैध आप्रवासन के एक कार्यक्रम, अलियाह बेट का आयोजन किया। चरमपंथी ज़ायोनीवादियों के एक छोटे समूह [[:hi:Lehi_(group)|लेही]] ने फिलिस्तीन में ब्रिटिश अधिकारियों पर सशस्त्र हमले किए। हालाँकि, [[:hi:Jewish_Agency|यहूदी एजेंसी]], जो मुख्यधारा के ज़ायोनी नेतृत्व और अधिकांश यहूदी आबादी का प्रतिनिधित्व करती थी, ने अभी भी ब्रिटेन को फिर से यहूदी आप्रवासन की अनुमति देने के लिए मनाने की उम्मीद की और [[:hi:द्वितीय_विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] के दौरान ब्रिटेन के साथ सहयोग किया। === द्वितीय विश्व युद्ध === [[चित्र:060_1942_-_Tom_Beazley's_mates_(l_to_r)_George_Dobner,_Norm_Grainger_^_Reg_Shephard_at_Tel-Aviv,_Pales.jpg|thumb|1942 में [[:hi:तेल_अविव|तेल अवीव]] में ऑस्ट्रेलियाई सैनिक]] 10 जून 1940 को, [[:hi:द्वितीय_विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] के दौरान, इटली साम्राज्य ने [[:hi:ब्रिटिश_साम्राज्य|ब्रिटिश साम्राज्य]] के खिलाफ युद्ध की घोषणा की और नाजी जर्मनी का पक्ष लिया। एक महीने के भीतर, इटालियंस ने फिलिस्तीन पर हवा से हमला किया, [[:hi:तेल_अविव|तेल अवीव]] और [[:hi:हाइफ़ा|हाइफा]] पर बमबारी की, जिसमें कई लोग हताहत हुए।<ref>{{Cite web|url=http://www.isracast.com/article.aspx?ID=470&t=Why-Italian-Planes-Bombed-Tel-Aviv?|archive-url=https://web.archive.org/web/20110921004629/http://www.isracast.com/article.aspx?ID=470&t=Why-Italian-Planes-Bombed-Tel-Aviv%3F|title=Why Italian Planes Bombed Tel-Aviv?|archive-date=21 September 2011}}</ref> 1942 में, ''यिशुव'' के लिए बहुत चिंता का समय था, जब जनरल [[:hi:Erwin_Rommel|इरविन रोमेल]] की जर्मन सेना [[:hi:उत्तर_अफ़्रीका|उत्तरी अफ्रीका]] के पार [[:hi:स्वेज़_नहर|स्वेज नहर]] की ओर पूर्व की ओर बढ़ी, जिससे यह डर पैदा हो गया कि वे फिलिस्तीन पर विजय प्राप्त कर लेंगे। इस अवधि को "भय के 200 दिन" के रूप में संदर्भित किया गया था। यह घटना ब्रिटिश समर्थन के साथ, ''[[:hi:Palmach|पामच]]'' की स्थापना का प्रत्यक्ष कारण थी-[[:hi:Haganah|हागनाह]] (एक अर्धसैनिक समूह जो ज्यादातर भंडारों से बना है) से संबंधित एक उच्च प्रशिक्षित नियमित इकाई।<ref>[http://www.historycentral.com/Israel/1941PalmachFormed.html How the Palmach was formed] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20191212162717/https://www.historycentral.com/Israel/1941PalmachFormed.html|date=12 December 2019}} (History Central)</ref> 1939 के श्वेत पत्र में यहूदी आप्रवासन पर ब्रिटिश प्रतिबंधों पर गुस्से के बावजूद ''यिशुव'' ने मित्र देशों के युद्ध के प्रयासों के इर्द-गिर्द रैली की। [[:hi:Jewish_Agency_for_Israel|यहूदी एजेंसी]] के अध्यक्ष [[:hi:डेव्हिड_बेन-गुरियन|डेविड बेन-गुरियन]] ने घोषणा की कि "हम श्वेत पत्र से ऐसे लड़ेंगे जैसे कोई युद्ध न हो, और युद्ध ऐसे लड़ेंगे मानो कोई श्वेत पत्र न हो।" फ़िलिस्तीन जनादेश के लगभग 30,000 यहूदियों ने युद्ध के दौरान [[:hi:यूनाइटेड_किंगडम_के_सशस्त्र_बल|ब्रिटिश सशस्त्र बल]] के साथ सेवा की, जिनमें से 700 से अधिक कार्रवाई में मारे गए थे।<ref>[https://www.idf.il/en/articles/2023/the-untold-story-behind-the-palmach-s-first-mission/ The Untold Story Behind the Palmach’s First Mission]</ref><ref>{{Cite web|url=https://encyclopedia.ushmm.org/content/en/article/jewish-brigade-group|title=Jewish Brigade Group &#124; Holocaust Encyclopedia}}</ref> [[File:JB_HQ.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:JB_HQ.jpg|thumb|[[:hi:यूनाइटेड_किंगडम_का_ध्वज|संघ ध्वज]] और [[:hi:इज़्रायल_का_ध्वज|यहूदी ध्वज]] के नीचे [[:hi:Jewish_Brigade|यहूदी ब्रिगेड]] मुख्यालय]] अरब दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों की तरह, दूसरे वर्ल्ड वॉर में लड़ने वालों के मुकाबले फ़िलिस्तीनी अरबों के बीच अपनी स्थिति को लेकर कोई आम राय नहीं थी। कई नेताओं और जानी-मानी हस्तियों ने एक्सिस की जीत को एक मुमकिन नतीजा और ज़ायोनिस्टों और ब्रिटिशों से फ़िलिस्तीन को वापस पाने का एक तरीका माना। भले ही नाज़ी नस्लीय थ्योरी में अरबों को ज़्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी, फिर भी नाज़ियों ने ब्रिटिश कब्ज़े के विरोध में अरबों का सपोर्ट बढ़ाया। 1943 में बाल्फोर डिक्लेरेशन की सालगिरह पर, राइख्सफ्यूहरर-SS [[:hi:हैन्रिख़_हिम्म्लर|हैन्रिख़ हिम्म्लर]] और विदेश मंत्री जोआचिम वॉन रिबेंट्रोप ने बर्लिन में सपोर्टर्स की एक रैली में रेडियो ब्रॉडकास्ट के लिए पढ़े जाने वाले जेरूसलम के ग्रैंड मुफ़्ती, मोहम्मद अमीन अल-हुसैनी को सपोर्ट के टेलीग्राम भेजे। दूसरी तरफ, नब्लस और गाजा के मेयरों और रेडियो पैलेस्टाइन और याफ़ा के मशहूर फलस्तीन अखबार जैसे मीडिया आउटलेट्स समेत कई जाने-माने लोगों के सपोर्ट से, 12,000 पैलेस्टाइन अरबों ने अपनी मर्ज़ी से ब्रिटिश सेना में शामिल होने और उनके लिए लड़ने की पेशकश की, जिनमें से कई ने ऐसी यूनिट्स में काम किया जिनमें पैलेस्टाइन यहूदी भी थे। 120 पैलेस्टाइन महिलाओं ने भी ऑक्ज़ीलियरी टेरिटोरियल सर्विस के हिस्से के तौर पर काम किया। हालांकि, इस इतिहास की कम स्टडी की गई है, क्योंकि इज़राइली सोर्स ने यहूदी सैनिकों की भूमिका की स्टडी पर ज़्यादा ध्यान दिया है। इस बीच, पैलेस्टाइन सोर्स उन लोगों के नामों को बड़ा करने के लिए तैयार नहीं थे, जिन्होंने 1936-1939 के अरब विद्रोह को दबाने के इतने सालों बाद भी ब्रिटेन के साथ सहयोग नहीं किया, और इस तरह इनडायरेक्टली यहूदियों को एक देश बनाने में मदद की।<ref name="Aderet">Aderet, Ofer.</ref>{{Efn|From Himmler: {{blockquote|The National Socialist movement of Greater Germany has, since its inception, inscribed upon its flag the fight against the world Jewry. It has therefore followed with particular sympathy the struggle of freedom-loving Arabs, especially in Palestine, against Jewish interlopers. In the recognition of this enemy and of the common struggle against it lies the firm foundation of the natural alliance that exists between the National Socialist Greater Germany and the freedom-loving Muslims of the whole world. In this spirit I am sending you on the anniversary of the infamous Balfour declaration my hearty greetings and wishes for the successful pursuit of your struggle until the final victory.}} From Ribbentrop: {{blockquote|I am sending my greetings to your eminence and to the participants of the meeting held today in the Reich capital under your chairmanship. Germany is linked to the Arab nation by old ties of friendship, and today we are united more than ever before. The elimination of the socalled Jewish national home and the liberation of all Arab countries from the oppression and exploitation of the Western powers is an unchangeable part of the Great German Reich policy. Let the hour not be far off when the Arab nation will be able to build its future and find unity in full independence.}}}}<ref>{{Cite book|last=Moshe Pearlman|author-link=Moshe Pearlman|title=Mufti of Jerusalem; the story of Haj Amin el Husseini|date=1947|publisher=V. Gollancz|page=50}}</ref><ref>{{Cite book|last=Rolf Steininger|title=Germany and the Middle East: From Kaiser Wilhelm II to Angela Merkel|url=https://books.google.com/books?id=Wm58DwAAQBAJ&pg=PA55|date=17 December 2018|publisher=Berghahn Books|isbn=978-1-78920-039-3|pages=55–}}</ref> 3 जुलाई 1944 को ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश सेना के भीतर एक यहूदी ब्रिगेड की स्थापना के लिए सहमति दी, जिसमें चुने हुए यहूदी तथा कुछ गैर‑यहूदी वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। 20 सितंबर 1944 को युद्ध कार्यालय ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर ब्रिटिश सेना की ''ज्यूइश ब्रिगेड ग्रुप'' के गठन की घोषणा की। यहूदी ब्रिगेड को इटली भेजा गया, जहाँ उसने 15वीं आर्मी ग्रुप के अधीन ब्रिटिश आठवीं सेना में शामिल होकर इतालवी अभियान के वसंत आक्रमण में भाग लिया। इसके बाद यहूदी ब्रिगेड को टार्विसियो में तैनात किया गया, जो इटली, यूगोस्लाविया और ऑस्ट्रिया की सीमाओं के त्रिकोण के निकट स्थित था। यहाँ उसने ''बेरीहा'' संगठन के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका उद्देश्य यूरोप से यहूदियों को फ़िलिस्तीन पहुँचने में सहायता करना था, एक भूमिका जिसे ब्रिगेड के कई सदस्य इसके विघटन के बाद भी निभाते रहे। इसके उपक्रमों में ''सेल्विनो बच्चों'' की शिक्षा और देखभाल भी शामिल थी। बाद में, यहूदी ब्रिगेड के पूर्व सैनिकों ने इज़राइल रक्षा बल (IDF) की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। फिलिस्तीन रेजिमेंट से, दो पलटन, एक यहूदी, [[:hi:Brigadier_(United_Kingdom)|ब्रिगेडियर]] [[:hi:Ernest_Benjamin|अर्नेस्ट बेंजामिन]] की कमान में, और एक अन्य अरब, को इतालवी मोर्चे पर मित्र देशों की सेना में शामिल होने के लिए भेजा गया था, जिन्होंने वहां [[:hi:Spring_1945_offensive_in_Italy|अंतिम आक्रमण]] में भाग लिया था। फिलिस्तीन के यहूदियों और अरबों के अलावा, कुल मिलाकर 1944 के मध्य तक अंग्रेजों ने एक बहुजातीय बल को इकट्ठा किया था जिसमें स्वयंसेवक यूरोपीय यहूदी शरणार्थी (जर्मन कब्जे वाले देशों से) यमन के यहूदी और एबिसिनि[[:hi:Yemenite_Jews|यमनी यहूदी]] शामिल थे।<ref>Corrigan, Gordon.</ref> ==== प्रलय और आप्रवासन कोटा ==== [[चित्र:Hagana_Ship_-_Jewish_State_at_Haifa_Port_(1947).jpg|thumb|''यहूदी राज्य'' जहाज, कई हागानाह जहाजों में से एक है जो यूरोप से यहूदी आप्रवासियों को ले जाता है, ज्यादातर अवैध, [[:hi:Port_of_Haifa|हाइफा बंदरगाह]], फ़िलिस्तीन जनादेश, 1947 में<ref name="JIJI2">{{Cite journal|url=https://www.jstor.org/stable/4467083|title=United States: British Collaboration on Illegal Immigration to Palestine, 1945–1947|journal=Miriam Joyce Haron|access-date=6 December 2023|year=1980|publisher=JSTOR|jstor=4467083}}</ref>]] 1939 में, 1939 के व्हाइट पेपर के नतीजे में, ब्रिटिश सरकार ने फ़िलिस्तीन में आने वाले इमिग्रेंट्स की संख्या कम कर दी। इसके तुरंत बाद दूसरा विश्व युद्ध और [[:hi:होलोकॉस्ट|होलोकॉस्ट]] शुरू हो गया और जब 15,000 का सालाना कोटा पार हो गया, तो नाज़ी ज़ुल्म से भाग रहे यहूदियों को डिटेंशन कैंप में डाल दिया गया या [[:hi:मॉरिशस|मॉरिशस]] जैसी जगहों पर भेज दिया गया।<ref>{{Cite book|last=Lenk|first=RS|title=The Mauritius Affair, The Boat People of 1940–41|url=https://archive.org/details/mauritiusaffairb0000lenk|location=London|publisher=R Lenk|year=1994|isbn=978-0-9518805-2-4}}</ref> 1939 से, ''अलिया बेट'' नामक एक गुप्त प्रवासन अभियान की शुरुआत हुई, जिसका नेतृत्व ''मोसाद लेअलिया बेट'' नामक संगठन ने किया। यूरोप के दसियों हज़ार यहूदी नाज़ियों से बचकर फ़िलिस्तीन की ओर जाने वाली नावों और छोटे जहाज़ों में सवार हुए। ब्रिटिश रॉयल नेवी ने कई जहाज़ों को रोक लिया; कुछ समुद्र‑योग्य नहीं थे और डूब गए। हगनाह द्वारा किए गए एक बम विस्फोट में एसएस ''पैट्रिया'' डूब गई, जिसमें 267 लोगों की मृत्यु हुई। दो अन्य जहाज़ सोवियत पनडुब्बियों द्वारा डुबो दिए गए; मोटर स्कूनर ''स्ट्रूमा'' को फरवरी 1942 में काला सागर में टॉरपीडो से मारकर डुबो दिया गया, जिसमें लगभग 800 लोगों की जान गई।<ref name="JIJI">{{Cite journal|url=https://www.jstor.org/stable/4467083|title=United States: British Collaboration on Illegal Immigration to Palestine, 1945–1947|journal=Miriam Joyce Haron|access-date=6 December 2023|year=1980|publisher=JSTOR|jstor=4467083}}</ref> [[चित्र:VE_day_Jerusalem_1945.jpg|thumb|[[:hi:VE_Day|वीई दिवस]] पर यरूशलेम, 8 मई 1945]] युद्ध के दौरान फ़िलिस्तीन पहुँचने का प्रयास करने वाली अंतिम शरणार्थी नौकाएँ ''बुलबुल'', ''मेफ़कूरे'' और ''मोरीना'' थीं, जो अगस्त 1944 में रवाना हुईं। एक सोवियत पनडुब्बी ने मोटर स्कूनर ''मेफ़कूरे'' को टॉरपीडो और गोलाबारी से डुबो दिया और पानी में बचे लोगों पर मशीनगन से गोलीबारी की, जिससे 300 से 400 शरणार्थियों की मृत्यु हुई। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अवैध प्रवासन फिर शुरू हुआ, विशेष रूप से हगनाह द्वारा, जिसने 1945–47 के बीच बड़ी संख्या में अवैध यहूदी प्रवासियों को फ़िलिस्तीन पहुँचाया<ref name="JIJI" /> युद्ध के बाद, 250,000 यहूदी शरणार्थी विस्थापित व्यक्तियों (यूरोप में शिविरों में) फंसे हुए थे। विश्व राय के दबाव के बावजूद, विशेष रूप से [[:hi:संयुक्त_राज्य_अमेरिका_का_राष्ट्रपति|अमेरिकी राष्ट्रपति]] हैरी एस ट्रूमैन के बार-बार अनुरोधों और एंग्लो-अमेरिकन कमेटी ऑफ इन्क्वायरी की सिफारिशों के बावजूद 100,000 यहूदियों को तुरंत फिलिस्तीन में प्रवेश दिया जाए, अंग्रेजों ने आव्रजन पर प्रतिबंध बनाए रखा।{{Sfn|Shapira|2012|p=90-91}} === द्वितीय विश्व युद्ध के बादः विद्रोह और विभाजन योजना === 12 नवंबर 1947 को, संयुक्त राष्ट्र के विभाजन पर मतदान से दो हफ्ते पहले ब्रिटिश सैनिकों ने रानाना में एक घर पर हमला किया, जहाँ युवाओं के लिए एक लेही प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किया जा रहा था। ब्रिटिश सैनिकों द्वारा रा 'आना में युवाओं की हत्या के रूप में जाने जाने वाले हमले के दौरान लेही के खिलाफ एक सुनियोजित प्रतिशोध के रूप में 16-18 आयु वर्ग के चार प्रशिक्षुओं और उनके 19 वर्षीय प्रशिक्षक की हत्या कर दी गई थी। 2001 में इजरायली राज्य अभिलेखागार द्वारा अवर्गीकृत 5,000 से अधिक दस्तावेजों में ब्रिटिश सैनिकों के हाथों यहूदियों की मौत और हत्या का खुलासा किया गया था, जिन्हें आत्मरक्षा कृत्यों या दुर्घटनाओं का दावा करके कवर किया गया था। इसमें रानाना में 5 किशोरों की शूटिंग शामिल थी।<ref name=":0">{{Cite news|last=Eichner|first=Itamar|date=2021-04-16|title=Revealed: How UK covered up killings of Jews in pre-state Palestine|url=https://www.ynetnews.com/jewish-world/article/B1Q3WU4Uu|access-date=2025-09-01|work=Ynetnews|language=en}}</ref><ref name=":3">{{Cite news|date=2021-07-31|title=Police covered up deaths in Mandatory Palestine, new documents show {{!}} The Jerusalem Post|url=https://www.jpost.com/israel-news/police-covered-up-deaths-in-mandatory-palestine-new-documents-show-675459|access-date=2025-09-01|work=[[The Jerusalem Post]]|language=en|issn=0792-822X}}</ref> [[चित्र:UN_Partition_Plan_For_Palestine_1947.svg|thumb|संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना]] 1948 में, लेही ने यरूशलेम में संयुक्त राष्ट्र के मध्यस्थ, काउंट बर्नाडोट की हत्या कर दी। यित्जाक शमीर, इज़राइल के भावी प्रधान मंत्री, साजिशकर्ताओं में से एक थे। फिलिस्तीन की स्थिति के परिणामस्वरूप नकारात्मक प्रचार ने ब्रिटेन में ही जनादेश को व्यापक रूप से अलोकप्रिय बना दिया और संयुक्त राज्य कांग्रेस को पुनर्निर्माण के लिए ब्रिटिश महत्वपूर्ण ऋण देने में देरी करने का कारण बना। ब्रिटिश [[:hi:लेबर_पार्टी_(यूके)|लेबर पार्टी]] ने 1945 में अपने चुनाव से पहले फिलिस्तीन में बड़े पैमाने पर यहूदी प्रवास की अनुमति देने का वादा किया था, लेकिन कार्यालय में एक बार इस वादे को तोड़ दिया। ब्रिटिश विरोधी यहूदी उग्रवाद बढ़ गया, और स्थिति के लिए देश में 100,000 से अधिक ब्रिटिश सैनिकों की उपस्थिति की आवश्यकता थी। एकर प्रिज़न ब्रेक आ इरगुन द्वारा ब्रिटिश सार्जेंट के प्रतिशोधक फाँसी के बाद, अंग्रेजक जनादेशकेँ समाप्त करबाक आ अगस्त 1948क आरम्भक बाद वापस लेबाक इच्छा के घोषणा कयल गेल।<ref name="auto2">{{Cite web|url=https://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/FB6DD3F0E9535815852572DD006CC607|archive-url=https://web.archive.org/web/20140603191241/http://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/FB6DD3F0E9535815852572DD006CC607|title=United Nations Maintenance Page|archive-date=3 June 2014|website=unispal.un.org}}</ref> 1946 में एंग्लो‑अमेरिकन जांच समिति ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका का एक संयुक्त प्रयास थी, जिसका उद्देश्य फ़िलिस्तीन में यहूदी प्रवास के संबंध में एक साझा नीति निर्धारित करना था। अप्रैल में समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और बताया कि उसके सदस्य सर्वसम्मति पर पहुँचे हैं। समिति ने अमेरिकी सिफ़ारिश का समर्थन करते हुए यूरोप से 100,000 यहूदी शरणार्थियों को तत्काल फ़िलिस्तीन में प्रवेश देने की अनुशंसा की। साथ ही, उसने यह भी सुझाव दिया कि न तो कोई अरब राज्य और न ही कोई यहूदी राज्य स्थापित किया जाए। समिति ने यह घोषणा की कि “यहूदियों और अरबों के फ़िलिस्तीन पर विशेष दावों को एक बार और हमेशा के लिए समाप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि एक स्पष्ट सिद्धांत घोषित किया जाए कि फ़िलिस्तीन में न यहूदी अरब पर प्रभुत्व जमाए और न अरब यहूदी पर।” अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने 100,000 शरणार्थियों के प्रवेश का समर्थन करते हुए, लेकिन समिति की अन्य सिफ़ारिशों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए, ब्रिटिश सरकार को नाराज़ कर दिया। ब्रिटेन ने इन सिफ़ारिशों को लागू करने में अमेरिकी सहायता की मांग की थी। अमेरिकी युद्ध विभाग ने पहले ही कहा था कि यदि ब्रिटेन को किसी संभावित अरब विद्रोह के विरुद्ध व्यवस्था बनाए रखने में सहायता देनी हो, तो लगभग 300,000 अमेरिकी सैनिकों की अनिश्चितकालीन तैनाती आवश्यक होगी। 100,000 नए यहूदी प्रवासियों के तत्काल प्रवेश से लगभग निश्चित रूप से एक अरब विद्रोह भड़क सकता था।<ref>Kenneth Harris, '' Attlee'' (1982) pp 388–400.</ref> ये घटनाएँ वे निर्णायक कारक थीं जिन्होंने ब्रिटेन को फ़िलिस्तीन मंडेट समाप्त करने और फ़िलिस्तीन प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत करने की घोषणा करने के लिए बाध्य किया। संयुक्त राष्ट्र ने 15 मई 1947 को यूएनएसकॉप (फ़िलिस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र विशेष समिति) का गठन किया, जिसमें 11 देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। यूएनएसकॉप ने सुनवाई आयोजित की, फ़िलिस्तीन की स्थिति का सर्वेक्षण किया और 31 अगस्त को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। सात सदस्यों कनाडा, चेकोस्लोवाकिया, ग्वाटेमाला, नीदरलैंड, पेरू, स्वीडन और उरुग्वे ने स्वतंत्र अरब और यहूदी राज्यों की स्थापना की सिफारिश की और यरूशलेम को अंतरराष्ट्रीय प्रशासन के अधीन रखने का प्रस्ताव दिया। तीन सदस्यों भारत, ईरान और यूगोस्लाविया ने यहूदी और अरब घटक राज्यों वाला एक एकल संघीय राज्य बनाने का समर्थन किया। ऑस्ट्रेलिया ने मतदान से परहेज़ किया।<ref>Howard Adelman, "UNSCOP and the Partition Recommendation." (Centre for Refugee Studies, York University, 2009) [http://yorkspace.library.yorku.ca/xmlui/bitstream/handle/10315/2669/H+A+UNSCOP+and+the+Partition+Recommendation.PDF?sequence=1 online] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20191219184223/https://yorkspace.library.yorku.ca/xmlui/bitstream/handle/10315/2669/H+A+UNSCOP+and+the+Partition+Recommendation.PDF?sequence=1|date=19 December 2019}}.</ref> 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 33 के मुकाबले 13 मतों से, 10 सदस्यों के परहेज़ के साथ, प्रस्ताव 181 (II) के रूप में आर्थिक संघ के साथ विभाजन योजना को अपनाने और लागू करने की सिफारिश करने वाला प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में दोनों प्रस्तावित राज्यों की सीमाओं में कुछ समायोजन भी शामिल थे। विभाजन ब्रिटिश वापसी की तिथि से प्रभावी होना था। योजना के अनुसार दोनों प्रस्तावित राज्यों को अपनी सीमाओं के भीतर सभी व्यक्तियों को नस्ल, धर्म या लिंग की परवाह किए बिना पूर्ण नागरिक अधिकार प्रदान करने थे। संयुक्त राष्ट्र महासभा को केवल सिफारिशें करने का अधिकार प्राप्त है, इसलिए यूएनजीएआर 181 कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं था।<ref>{{Cite book|last=Cathy Hartley|last2=Paul Cossali|title=Survey of Arab-Israeli Relations|url=https://books.google.com/books?id=KvaNAgAAQBAJ&pg=PA52|year=2004|pages=52–53|publisher=Routledge|isbn=978-1-135-35527-2}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://domino.un.org/unispal.nsf/0/7f0af2bd897689b785256c330061d253|title=A/RES/181(II) of 29 November 1947|publisher=United Nations|year=1947|access-date=11 January 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20120524094913/http://domino.un.org/unispal.nsf/0/7f0af2bd897689b785256c330061d253|archive-date=24 May 2012}}</ref> संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। हैती, लाइबेरिया और फ़िलिपींस ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ज़ायनिस्ट संगठनों के दबाव के बाद अंतिम क्षण में अपने मत बदल दिए। अरब लीग के पाँच सदस्य, जो उस समय मतदान सदस्य थे, ने इस योजना के विरुद्ध मतदान किया।<ref>{{Cite journal|last=Roosevelt|first=Kermit|year=1948|title=The Partition of Palestine: A lesson in pressure politics|url=https://archive.org/details/sim_middle-east-journal_1948-01_2_1/page/n1|journal=Middle East Journal|volume=2|issue=1|pages=1–16|jstor=4321940}}</ref><ref>{{Cite book|last=Snetsinger|first=John|year=1974|title=Truman, the Jewish vote, and the creation of Israel|url=https://archive.org/details/trumanjewishvote0000snet|url-access=registration|publisher=Hoover Institution|pages=[https://archive.org/details/trumanjewishvote0000snet/page/66 66–67]|isbn=978-0-8179-3391-3}}</ref><ref>{{Cite journal|last=Sarsar|first=Saliba|year=2004|title=The question of Palestine and United States behavior at the United Nations|url=https://archive.org/details/sim_international-journal-of-politics-culture-and-society_spring-2004_17_3/page/456|journal=International Journal of Politics, Culture and Society|volume=17|issue=3|pages=457–470|doi=10.1023/B:IJPS.0000019613.01593.5e|s2cid=143484109|issn=0891-4486}}</ref> यहूदी एजेंसी, जो कि यहूदी राज्य-गठन थी, ने योजना को स्वीकार कर लिया, और फिलिस्तीन में लगभग सभी यहूदी इस खबर से खुश हो गए। विभाजन योजना को फिलिस्तीनी अरब नेतृत्व और अधिकांश अरब आबादी ने खारिज कर दिया था। [च] [छ] नवंबर और दिसंबर 1947 को [[:hi:काहिरा|काहिरा]] में बैठक, अरब लीग ने तब संघर्ष के सैन्य समाधान का समर्थन करने वाले प्रस्तावों की एक श्रृंखला को अपनाया।{{Efn|p. 50, at 1947 "Haj Amin al-Husseini went one better: he denounced also the minority report, which, in his view, legitimized the Jewish foothold in Palestine, a "partition in disguise", as he put it."; p. 66, at 1946 "The League demanded independence for Palestine as a "unitary" state, with an Arab majority and minority rights for the Jews. The AHC went one better and insisted that the proportion of Jews to Arabs in the unitary state should stand at one to six, meaning that only Jews who lived in Palestine before the British Mandate be eligible for citizenship"; p. 67, at 1947 "The League's Political Committee met in Sofar, Lebanon, on 16–19 September, and urged the Palestine Arabs to fight partition, which it called "aggression", "without mercy". The League promised them, in line with Bludan, assistance "in manpower, money and equipment" should the United Nations endorse partition."; p. 72, at Dec 1947 "The League vowed, in very general language, "to try to stymie the partition plan and prevent the establishment of a Jewish state in Palestine,"<ref>{{cite book |author=Morris, Benny |title=1948: a history of the first Arab-Israeli war |year=2008 |publisher=Yale University Press |isbn=978-0-300-12696-9 |url= https://books.google.com/books?id=J5jtAAAAMAAJ |access-date=24 July 2013}}</ref>}} ब्रिटेन ने घोषणा की कि वह विभाजन योजना को स्वीकार कर लेगा, लेकिन अरबों द्वारा इसे स्वीकार नहीं किए जाने का तर्क देते हुए इसे लागू करने से इनकार कर दिया। ब्रिटेन ने संक्रमण काल के दौरान संयुक्त राष्ट्र फिलिस्तीन आयोग के साथ फिलिस्तीन के प्रशासन को साझा करने से भी इनकार कर दिया। सितंबर 1947 में, ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि फिलिस्तीन के लिए जनादेश 14 मई 1948 की मध्यरात्रि में समाप्त हो जाएगा।<ref name="Britannica">[http://school.eb.com/eb/article-45071 "Palestine"].</ref><ref>{{Cite encyclopedia|editor=Spencer C. Tucker|title=Palestine, British Mandate for|year=2008|publisher=ABC-CLIO|location=Santa Barbara, California}}</ref><ref name="Sherman">{{Cite book|title=Mandate Days: British Lives in Palestine, 1918–1948|url=https://archive.org/details/mandatedaysbriti0000sher_h6q0|publisher=The Johns Hopkins University Press|last=A. J. Sherman|year=2001|isbn=978-0-8018-6620-3}}</ref> === अधिदेश की समाप्ति === [[चित्र:BritsLvHaifa3061948.jpg|thumb|1948 में ब्रिटिश सैनिकों ने [[:hi:हाइफ़ा|हाइफा]] छोड़ा]] जब यूनाइटेड किंगडम ने 1946 में ट्रांसजॉर्डन के हाशमाइट साम्राज्य के रूप में ट्रांसजॉर्डन के अमीरात की स्वतंत्रता की घोषणा की, तो लीग ऑफ नेशंस की अंतिम सभा और महासभा दोनों ने समाचार का स्वागत करते हुए प्रस्ताव पारित किए।<ref>See ''Mandates, Dependencies and Trusteeship'', by H. Duncan Hall, Carnegie Endowment, 1948, pp. 266–267.</ref> यहूदी एजेंसी ने आपत्ति जताते हुए दावा किया कि ट्रांसजॉर्डन फिलिस्तीन का एक अभिन्न अंग था, और [[:hi:संयुक्त_राष्ट्र_अधिकारपत्र|संयुक्त राष्ट्र चार्टर]] के अनुच्छेद 80 के अनुसार, यहूदी लोगों का अपने क्षेत्र में एक सुरक्षित हित था।<ref>{{Cite web|title=The Mandate is Indivisble|website=Historical Jewish Press, Tel Aviv University, Palestine Post|date=9 April 1946|page=3|url=http://www.jpress.org.il/publications/PPost-en.asp|archive-url=https://web.archive.org/web/20100929150945/http://www.jpress.org.il/publications/PPost-en.asp|archive-date=29 September 2010}}</ref> फ़िलिस्तीन पर महासभा की चर्चाओं के दौरान यह सुझाव दिया गया था कि प्रस्तावित यहूदी राज्य में ट्रांसजॉर्डन के कुछ क्षेत्रों को शामिल करना उपयुक्त हो सकता है। 29 नवंबर 1947 को प्रस्ताव 181 (II) को अपनाए जाने से कुछ दिन पहले, अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने उल्लेख किया कि यहूदी राज्य को नेगेव क्षेत्र और लाल सागर तथा अक़ाबा बंदरगाह तक पहुँच प्रदान करने की आवश्यकता पर समिति में बार‑बार चर्चा हुई थी। जॉन स्नेटसिंगर के अनुसार, 19 नवंबर 1947 को चाइम वाइज़मैन ने राष्ट्रपति ट्रूमैन से मुलाकात की और कहा कि नेगेव और अक़ाबा बंदरगाह का यहूदी राज्य में शामिल होना अत्यंत आवश्यक है। ट्रूमैन ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को फोन कर बताया कि वह वाइज़मैन की स्थिति का समर्थन करते हैं। हालाँकि, ट्रांसजॉर्डन के ज्ञापन में अमीरात ऑफ ट्रांसजॉर्डन के क्षेत्रों को किसी भी यहूदी बस्ती से बाहर रखने का प्रावधान था।<ref>{{Cite web|website=Foreign relations of the United States|year=1947|title=The Near East and Africa|page=1255|url=http://digicoll.library.wisc.edu/cgi-bin/FRUS/FRUS-idx?type=goto&id=FRUS.FRUS1947v05&isize=M&submit=Go+to+page&page=1255|access-date=12 January 2010|archive-date=23 August 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20130823185019/http://digicoll.library.wisc.edu/cgi-bin/FRUS/FRUS-idx?type=goto&id=FRUS.FRUS1947v05&isize=M&submit=Go+to+page&page=1255}}</ref><ref>{{Cite book|last=Snetsinger|first=John|title=Truman, the Jewish vote, and the creation of Israel|publisher=Hoover Press|year=1974|isbn=978-0-8179-3391-3|pages=60–61|url=https://books.google.com/books?id=JAW2aHnkL4UC&pg=PA60}}</ref><ref>[https://books.google.com/books?id=ATQQ0FMS1FQC&pg=PA348 ''The British Empire in the Middle East, 1945–1951''] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20221128023422/https://books.google.com/books?id=ATQQ0FMS1FQC&pg=PA348|date=28 November 2022}}, p. 348.</ref> [[चित्र:Letter_from_Eliahu_Epstein_to_Harry_S._Truman,_May_14,_1948.jpg|thumb|इसकी घोषणा के दिन, [[:hi:Eliahu_Epstein|एलियाहु एपस्टीन]] ने [[:hi:हैरी_एस_ट्रूमैन|हैरी एस. ट्रूमैन]] को लिखा कि राज्य को "29 नवंबर, 1947 के अपने प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा अनुमोदित सीमाओं के भीतर" घोषित किया गया था।]] UN के प्रस्ताव के तुरंत बाद, अरब और यहूदी समुदायों के बीच सिविल वॉर छिड़ गया, और ब्रिटिश अथॉरिटी कमज़ोर पड़ने लगी। 16 दिसंबर, 1947 को, फ़िलिस्तीन पुलिस फ़ोर्स तेल अवीव इलाके से हट गई, जहाँ आधी से ज़्यादा यहूदी आबादी रहती थी, और लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने की ज़िम्मेदारी यहूदी पुलिस को सौंप दी। जैसे-जैसे सिविल वॉर बढ़ता गया, ब्रिटिश मिलिट्री फ़ोर्स धीरे-धीरे फ़िलिस्तीन से हटती गईं, हालाँकि उन्होंने कभी-कभी दोनों तरफ़ से दखल दिया। इनमें से कई इलाके वॉर ज़ोन बन गए। ब्रिटिश ने यरुशलम और हाइफ़ा में अपनी मज़बूत मौजूदगी बनाए रखी, यहाँ तक कि जब यरुशलम अरब फ़ोर्स के घेरे में आ गया और भयंकर लड़ाई का मैदान बन गया। हालाँकि ब्रिटिश ने कभी-कभी लड़ाई में दखल दिया, ज़्यादातर अपने निकलने के रास्तों को सुरक्षित करने के लिए, जिसमें मार्शल लॉ घोषित करना और लागू करना शामिल था। फ़िलिस्तीन पुलिस फ़ोर्स ज़्यादातर इनएक्टिव थी, और सोशल वेलफ़ेयर, पानी की सप्लाई और पोस्टल सर्विस जैसी सरकारी सर्विस वापस ले ली गईं। मार्च 1948 में, फ़िलिस्तीन में सभी ब्रिटिश जज ब्रिटेन को वापस कर दिए गए। अप्रैल 1948 में, ब्रिटिश हाइफ़ा के ज़्यादातर हिस्से से हट गए, लेकिन पोर्ट एरिया में एक एन्क्लेव बनाए रखा, जिसका इस्तेमाल ब्रिटिश सेनाओं को निकालने में किया गया था, और हाइफ़ा के पास एक एयरपोर्ट, RAF रमत डेविड, को बनाए रखा, और व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक वॉलंटियर पुलिस फ़ोर्स को पीछे छोड़ दिया। हाइफ़ा की लड़ाई में जल्द ही शहर पर हगानाह ने कब्ज़ा कर लिया। जीत के बाद, येरुशलम में ब्रिटिश सेनाओं ने ऐलान किया कि उनका किसी भी लोकल एडमिनिस्ट्रेशन की देखरेख करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन वे ऐसे कामों की भी इजाज़त नहीं देंगे जो उनकी सेनाओं की सुरक्षित और सही तरीके से वापसी में रुकावट डालें, मिलिट्री कोर्ट दखल देने वाले किसी भी व्यक्ति पर केस चलाएगी। इस समय तक, फ़िलिस्तीन के ज़्यादातर हिस्से में ब्रिटिश अथॉरिटी खत्म हो चुकी थी, देश का ज़्यादातर हिस्सा यहूदी या अरब हाथों में था, लेकिन फ़िलिस्तीन पर ब्रिटिश एयर और सी ब्लॉकेड जारी रहा। हालाँकि अरब वॉलंटियर फ़िलिस्तीन और आस-पास के अरब देशों के बीच बॉर्डर पार करके लड़ाई में शामिल हो सकते थे, लेकिन ब्रिटिश ने आस-पास के अरब देशों की रेगुलर सेनाओं को फ़िलिस्तीन में घुसने नहीं दिया।<ref>{{Cite web|url=https://www.jta.org/1947/12/16/archive/violence-ebbs-british-police-withdrawn-from-tel-aviv-and-its-environs|title=Violence Ebbs; British Police Withdrawn from Tel Aviv and Its Environs – Jewish Telegraphic Agency|website=www.jta.org|date=16 December 1947|access-date=25 January 2016|archive-date=18 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200218101833/https://www.jta.org/1947/12/16/archive/violence-ebbs-british-police-withdrawn-from-tel-aviv-and-its-environs}}</ref><ref>{{Cite book|last=Michael J Cohen|title=Britain's Moment in Palestine: Retrospect and Perspectives, 1917–1948|url=https://books.google.com/books?id=DLPpAgAAQBAJ&pg=PA481|date=24 February 2014|publisher=Routledge|isbn=978-1-317-91364-1|pages=481–}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.jta.org/1948/04/23/archive/british-forces-in-jerusalem-alerter-following-haifa-victory-fear-haganah-raid-on-city|title=British Forces in Jerusalem Alerter Following Haifa Victory; Fear Haganah Raid on City – Jewish Telegraphic Agency|website=www.jta.org|date=23 April 1948|access-date=25 January 2016|archive-date=18 February 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200218101833/https://www.jta.org/1948/04/23/archive/british-forces-in-jerusalem-alerter-following-haifa-victory-fear-haganah-raid-on-city}}</ref><ref name="hansard">{{Cite web|url=https://api.parliament.uk/historic-hansard/commons/1948/mar/10/palestine-bill|date=10 March 1948|title=PALESTINE BILL|website=[[Hansard|Parliamentary Debates (Hansard)]]}}</ref> ब्रिटिश ने यूनाइटेड नेशंस को 1 अगस्त, 1948 के बाद मैंडेट खत्म करने के अपने इरादे के बारे में बताया था। हालांकि, 1948 की शुरुआत में, यूनाइटेड किंगडम ने 15 मई को फ़िलिस्तीन में अपने मैंडेट को खत्म करने के अपने पक्के इरादे का ऐलान किया। जवाब में, प्रेसिडेंट हैरी एस. ट्रूमैन ने 25 मार्च को एक बयान जारी किया जिसमें बंटवारे के बजाय UN ट्रस्टीशिप का प्रस्ताव दिया गया, जिसमें कहा गया, "दुर्भाग्य से, यह साफ़ हो गया है कि इस समय बंटवारे का प्लान शांतिपूर्ण तरीकों से पूरा नहीं किया जा सकता... जब तक इमरजेंसी एक्शन नहीं लिया जाता, उस तारीख को फ़िलिस्तीन में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के काबिल कोई पब्लिक अथॉरिटी नहीं होगी। पवित्र भूमि में हिंसा और खून-खराबा होगा। उस देश के लोगों के बीच बड़े पैमाने पर लड़ाई इसका पक्का नतीजा होगी।" ब्रिटिश पार्लियामेंट ने फ़िलिस्तीन बिल के साथ मैंडेट को खत्म करने के लिए ज़रूरी कानून पास किया, जिसे 29 अप्रैल, 1948 को रॉयल मंज़ूरी मिली।<ref>{{Cite web|url=http://domino.un.org/unispal.nsf/561c6ee353d740fb8525607d00581829/7f0af2bd897689b785256c330061d253%21OpenDocument|title='U.N. Resolution 181 (II). Future Government of Palestine, Part 1-A, Termination of Mandate, Partition and Independence|access-date=20 May 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20090207194949/http://domino.un.org/unispal.nsf/561c6ee353d740fb8525607d00581829/7f0af2bd897689b785256c330061d253%21OpenDocument|archive-date=7 February 2009}}</ref><ref name="Northey">{{Cite book|last=Northey, Ruth (project ed.)|publisher=Bloomsbury Publishing|title=Whitaker's Britain|year=2013|isbn=978-1-4729-0305-1|page=127|url=https://books.google.com/books?id=CXGuAAAAQBAJ&pg=PT127}}</ref><ref>{{Cite web|url=http://www.mideastweb.org/trusteeship.htm|title=President Truman's Trusteeship Statement – 1948|website=www.mideastweb.org|access-date=13 February 2011|archive-date=9 March 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20130309041551/http://www.mideastweb.org/trusteeship.htm}}</ref> [[चित्र:Flickr_-_Government_Press_Office_(GPO)_-_Hoisting_of_the_national_flag_during_a_special_ceremony_of_elementary_school_children.jpg|thumb|200x200px|'''तेल अवीव में 1 जनवरी 1948 को यिशुव ध्वज फहराया गया''']] 14 मई 1948 तक फ़िलिस्तीन में शेष ब्रिटिश बल केवल हाइफ़ा क्षेत्र और यरूशलेम में थे। उसी दिन यरूशलेम में स्थित ब्रिटिश गैरीसन ने वापसी की, और अंतिम उच्चायुक्त जनरल सर एलन कनिंघम शहर छोड़कर हाइफ़ा पहुँचे, जहाँ से उन्हें समुद्र मार्ग द्वारा देश छोड़ना था। उसी दोपहर, भावी प्रधानमंत्री डेविड बेन‑गुरियन के नेतृत्व में यहूदी नेतृत्व ने एरेट्ज़‑इज़राइल में एक यहूदी राज्य की स्थापना की घोषणा की, जिसे इज़राइल राज्य कहा जाना था। यह घोषणा 14 मई 1948 की दोपहर को की गई और इसका प्रभाव मंडेट की समाप्ति के साथ मध्यरात्रि से लागू होना था। 14 मई को ही इज़राइल की अंतरिम सरकार ने संयुक्त राज्य अमेरिका से उन सीमाओं के आधार पर मान्यता का अनुरोध किया जो संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना में निर्दिष्ट थीं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने तुरंत उत्तर दिया और अंतरिम सरकार को वास्तविक प्राधिकरण के रूप में मान्यता प्रदान की।<ref>{{Cite web|url=http://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=83|title=Our Documents – Press Release Announcing U.S. Recognition of Israel (1948)|website=www.ourdocuments.gov|date=9 April 2021|access-date=10 April 2012|archive-date=17 July 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20200717141345/https://www.ourdocuments.gov/doc.php?flash=true&doc=83}}</ref><ref name="Epstein">{{Cite web|title=Copy of telegram from Epstein to Shertok|url=https://www.archives.gov.il/NR/rdonlyres/BD240CA5-379D-4FAE-81A8-069902AD1E7F/0/Truman3.pdf|publisher=Government of Israel|access-date=3 May 2013|archive-url=https://web.archive.org/web/20131113183514/http://www.archives.gov.il/NR/rdonlyres/BD240CA5-379D-4FAE-81A8-069902AD1E7F/0/Truman3.pdf|archive-date=13 November 2013}}</ref> मई 1948 की आधी रात को फिलिस्तीन के लिए जनादेश समाप्त हो गया और इज़राइल राज्य अस्तित्व में आया। फिलिस्तीन सरकार का औपचारिक रूप से अस्तित्व समाप्त हो गया, हाइफा से वापसी की प्रक्रिया में ब्रिटिश बलों की स्थिति विदेशी क्षेत्र के कब्जाधारियों में बदल गई, [[:hi:Palestine_Police_Force|फिलिस्तीन पुलिस बल]] औपचारिक रूप से नीचे आ गया और भंग कर दिया गया, शेष कर्मियों को ब्रिटिश सैन्य बलों के साथ निकाला गया, फिलिस्तीन की ब्रिटिश नाकाबंदी हटा दी गई, और जो लोग फिलिस्तीनी नागरिक थे, वे [[:hi:British_protected_person|ब्रिटिश संरक्षित व्यक्ति]] नहीं थे, [[:hi:Mandatory_Palestine_passport|फ़िलिस्तीन जनादेश पासपोर्ट]] अब ब्रिटिश सुरक्षा नहीं दे रहे थे।<ref name="hansard2">{{Cite web|url=https://api.parliament.uk/historic-hansard/commons/1948/mar/10/palestine-bill|date=10 March 1948|title=PALESTINE BILL|website=[[Hansard|Parliamentary Debates (Hansard)]]}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://www.jta.org/1948/03/26/archive/palestine-passports-cease-to-give-british-protection-after-may-govt-announces|title=Palestine Passports Cease to Give British Protection After May Govt. Announces – Jewish Telegraphic Agency|website=www.jta.org|date=26 March 1948}}</ref> [[:hi:1948_Palestinian_expulsion_and_flight|1948 फिलिस्तीनी निष्कासन और उड़ान]] जनादेश की समाप्ति से पहले और बाद में दोनों जगह हुई थी। अगले कुछ दिनों में, लगभग 700 लेबनानी, 1,876 सीरियाई, 4,000 इराकी और 2,800 मिस्र के सैनिकों ने [[:hi:1948_अरब-इजरायल_युद्ध|1948 अरब-इजरायल युद्ध]] शुरू करते हुए फिलिस्तीन में सीमा पार कर दी।<ref>Appendix IX-B, 'The Arab Expeditionary Forces to Palestine, 15/5/48, Khalidi, 1971, p. 867.</ref> लगभग 4,500 ट्रांसजॉर्डनियन सैनिकों, आंशिक रूप से 38 ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमान की गई, जिन्होंने केवल कुछ हफ्ते पहले ब्रिटिश सेना में अपने आयोगों से इस्तीफा दे दिया था, जिसमें समग्र कमांडर, जनरल [[:hi:John_Bagot_Glubb|जॉन बागोट ग्लब]] शामिल थे, ने यरूशलेम और उसके परिवेश को शामिल करते हुए कॉर्पस सेपरेटम क्षेत्र में प्रवेश किया (हागानाह के [[:hi:Operation_Kilshon|ऑपरेशन किल्शोन]] के जवाब में) और संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना द्वारा अरब राज्य के हिस्से के रूप में नामित क्षेत्रों में चले गए।<ref>Bayliss, 1999, p. 84.</ref> युद्ध, जो 1949 तक चलने वाला था, इजरायल को पूर्व ब्रिटिश जनादेश के लगभग 78% क्षेत्र को शामिल करने के लिए विस्तारित करेगा, जिसमें ट्रांसजॉर्डन ने [[:hi:पश्चिमी_तट|वेस्ट बैंक]] पर कब्जा कर लिया और बाद में मिस्र के राज्य ने [[:hi:गाज़ा_पट्टी|गाजा पट्टी]] पर कब्जा कर दिया। जनादेश के अंत के साथ, इज़राइल में शेष ब्रिटिश सैनिक हाइफा बंदरगाह क्षेत्र में एक एन्क्लेव में केंद्रित थे, जिसके माध्यम से उन्हें वापस लिया जा रहा था, और आरएएफ रामत डेविड में, जिसे वापसी को कवर करने के लिए बनाए रखा गया था। अंग्रेजों ने 26 मई को आरएएफ रामत डेविड को इजरायलियों को सौंप दिया और 30 जून को अंतिम ब्रिटिश सैनिकों को हाइफा से निकाला गया। ब्रिटिश ध्वज को हाइफा के बंदरगाह के प्रशासनिक भवन से नीचे उतारा गया था और इसके स्थान पर इजरायली ध्वज फहराया गया था, और हाइफा बंदरगाह क्षेत्र को औपचारिक रूप से एक समारोह में इजरायली अधिकारियों को सौंप दिया गया था।<ref>{{Cite book|last=Cohen-Hattab|first=Kobi|title=Zionism's Maritime Revolution: The Yishuv's Hold on the Land of Israel's Sea and Shores, 1917–1948|isbn=978-3-11-063352-8|date=8 July 2019|publisher=Walter de Gruyter GmbH & Co KG|url=https://books.google.com/books?id=Pz_EDwAAQBAJ&pg=PA255}}</ref> == जनसांख्यिकी == === ब्रिटिश जनगणना और आकलन === [[चित्र:Crowded_street,_NINO_F_Scholten_Es_Salt_64.tiff|thumb|1920 के दशक में अस-साल्ट में सड़क]] [[चित्र:Palestine_Distribution_of_Population_1947_UN_map_no_93(b).jpeg|thumb|जनादेश के अंत के करीब जनसंख्या वितरण]] 1920 में, इस बहु-जातीय क्षेत्र में लगभग 750,000 लोगों में से अधिकांश [[:hi:अरबी_भाषा|अरबी]] भाषी मुसलमान थे, जिनमें एक [[:hi:बदू_लोग|बेदुईन]] आबादी (1922 की जनगणना के समय 103,331 पर अनुमानित) शामिल थी और [[:hi:बेएर_षेवअ|बीरशेबा]] क्षेत्र और इसके दक्षिण और पूर्व क्षेत्र में केंद्रित थी। * 1922 की [[:hi:First_British_census_of_Palestine|पहली जनगणना]] में 757,182 की आबादी दिखाई गई, जिनमें से 78% मुसलमान, 11% यहूदी और 10% ईसाई थे। * 1931 की [[:hi:Second_British_census_of_Palestine|दूसरी जनगणना]] में कुल जनसंख्या 1,035,154 दी गई, जिनमें से 73.4% मुसलमान, 16.9% यहूदी और 8.6% ईसाई थे। दोनों जनगणनाओं और जन्म, मृत्यु और इमिग्रेशन के रिकॉर्ड में अंतर के कारण, दूसरी जनगणना के लेखकों ने बीच के सालों में लगभग 9,000 यहूदियों और 4,000 अरबों के गैर-कानूनी इमिग्रेशन का अनुमान लगाया। कुछ चीज़ों जैसे गैर-कानूनी इमिग्रेशन का सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता था। 1939 के व्हाइट पेपर, जिसमें यहूदियों पर इमिग्रेशन पर रोक लगाई गई थी, में कहा गया था कि यहूदियों की आबादी "लगभग 450,000 तक बढ़ गई है" और "देश की पूरी आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा" है। 1945 में, एक डेमोग्राफिक स्टडी से पता चला कि आबादी बढ़कर 1,764,520 हो गई थी, जिसमें 1,061,270 मुसलमान, 553,600 यहूदी, 135,550 ईसाई और 14,100 दूसरे ग्रुप के लोग शामिल थे। [[चित्र:Ymca_boys_jeru.jpg|thumb|यरूशलेम वाई. एम. सी. ए. में अरब ईसाई फिलिस्तीनी लड़के, 1938]] {| class="sortable wikitable" style="text-align:right;" !वर्ष !कुल !मुसलमान !यहूदी !ईसाई !अन्य |- !1922 |752,048 |589,177(78%) |83,790(11%) |71,464(10%) |7,617(1%) |- !1931 |1,036,339 |761,922(74%) |175,138(17%) |89,134(9%) |10,145(1%) |- !1945 |1,764,520 |1,061,270(60%) |553,600(31%) |135,550(8%) |14,100(1%) |- | style="text-align:center;" |औसत चक्रवृद्धि [[:hi:जनसंख्या_वृद्धि|जनसंख्या वृद्धि]] दर प्रति वर्ष, 1922-1945 |3.8% |2.6% |8.6% |2.8% |2.7% |} ==== जिले के अनुसार ==== [[चित्र:Mandatory_Palestine_-_Population_by_Municipality_(1945).svg|thumb|जनसंख्या गणना के अनुसार फ़िलिस्तीन जनादेश में नगर पालिकाओं का मानचित्र (1945-1 और अधिक -50,000------ नेगेव रेगिस्तान में 500 खानाबदोश क्षेत्रों से कम) {{Legend|#A50021|150,000 और अधिक}}]] निम्नलिखित तालिका 1945 में जनादेश के 16 जिलों में से प्रत्येक की धार्मिक जनसांख्यिकी देती है।<div class="legend">[[चित्र:Mandatory_Palestine_-_Population_by_Municipality_(1945).svg|thumb|जनसंख्या गणना के अनुसार फ़िलिस्तीन जनादेश में नगर पालिकाओं का मानचित्र (1945-1 और अधिक -50,000------ नेगेव रेगिस्तान में 500 खानाबदोश क्षेत्रों से कम) {{Legend|#A50021|150,000 और अधिक}}]]</div> निम्नलिखित तालिका 1945 में जनादेश के 16 जिलों में से प्रत्येक की धार्मिक जनसांख्यिकी देती है। {| class="sortable wikitable" style="text-align:right;" |- style="background:#e9e9e9;" ! colspan="9" style="background:#e9e9e9;font-size:110%" |जिले के अनुसार 1945 में फिलिस्तीन की जनसांख्यिकी <ref>{{Cite book|title=A Survey of Palestine: Prepared in December, 1945 and January, 1946 for the Information of the Anglo-American Committee of Inquiry|pages=12–13|volume=1|publisher=Institute for Palestine Studies|year=1991|isbn=978-0-88728-211-9}}</ref> |- ! rowspan="2" |जिला ! rowspan="2" |उप-जिला ! colspan="2" |मुसलमान ! colspan="2" |यहूदी ! colspan="2" |ईसाई ! rowspan="2" |कुल |- !संख्या ! style="text-align:right;" |% !संख्या ! style="text-align:right;" |% !संख्या ! style="text-align:right;" |% |- | style="text-align:left;" |हाइफा | align="left" |[[:hi:Haifa_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|हाइफा]] |95,970 |38% |119,020 |47% |33,710 |13% |253,450 |- | rowspan="5" style="text-align:left;" |गैलीलिया | align="left" |[[:hi:Acre_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|एकड़]] |51,130 |69% |3,030 |4% |11,800 |16% |73,600 |- | align="left" |[[:hi:Beisan_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|बैसन]] |16,660 |67% |7,590 |30% |680 |3% |24,950 |- | align="left" |[[:hi:Nazareth_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|नासरत]] |30,160 |60% |7,980 |16% |11,770 |24% |49,910 |- | align="left" |[[:hi:Safad_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|सफद]] |47,310 |83% |7,170 |13% |1,630 |3% |56,970 |- | align="left" |[[:hi:Tiberias_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|टिबेरिया]] |23,940 |58% |13,640 |33% |2,470 |6% |41,470 |- | rowspan="2" style="text-align:left;" |लिड्डा | align="left" |[[:hi:Jaffa_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|याफ़ा]] |95,980 |24% |295,160 |72% |17,790 |4% |409,290 |- | align="left" |[[:hi:Ramle_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|रामले]] |95,590 |71% |31,590 |24% |5,840 |4% |134,030 |- | rowspan="3" style="text-align:left;" |सामरिया | align="left" |[[:hi:Jenin_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|जेनिन]] |60,000 |98% |नगण्य |<1% |1,210 |2% |61,210 |- | align="left" |[[:hi:नबलस|नाबलस]] |92,810 |98% |नगण्य |<1% |1,560 |2% |94,600 |- | align="left" |[[:hi:Tulkarm_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|तुलकार्म]] |76,460 |82% |16,180 |17% |380 |1% |93,220 |- | rowspan="3" style="text-align:left;" |यरूशलेम | align="left" |[[:hi:Hebron_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|हेब्रोन]] |92,640 |99% |300 |<1% |170 |<1% |93,120 |- | align="left" |[[:hi:Jerusalem_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|यरूशलेम]] |104,460 |41% |102,520 |40% |46,130 |18% |253,270 |- | align="left" |[[:hi:रामल्ला|रामल्ला]] |40,520 |83% |नगण्य |<1% |8,410 |17% |48,930 |- | rowspan="2" style="text-align:left;" |[[:hi:Gaza_District|गाजा]] | align="left" |[[:hi:Beersheba_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|बीरशेबा]] |6,270 |90% |510 |7% |210 |3% |7,000 |- | align="left" |[[:hi:Gaza_Subdistrict,_Mandatory_Palestine|गाजा]] |145,700 |97% |3,540 |2% |1,300 |1% |150,540 |- | colspan="2" style="text-align:left;" |कुल |1,076,780 |58% |608,230 |33% |145,060 |9% |1,845,560 |} ==== शहरी क्षेत्र ==== नीचे दी गई टेबल में 1922 में फिलिस्तीन के म्युनिसिपल इलाकों की आबादी दिखाई गई है, जो मैंडेट पीरियड की शुरुआत में, 1922 की फिलिस्तीन की जनगणना के हिसाब से थी।<ref>[[:File:J. B. Barron, ed. Palestine, Report and General Abstracts of the Census of 1922. Government of Palestine.djvu|File:J. ]]</ref> {| class="wikitable" !नगरपालिका ![[:hi:मुसलमान|मुसलमान]] ![[:hi:यहूदी|यहूदी]] ![[:hi:ईसाई|ईसाई]] ![[:hi:द्रूस|ड्रूज़]] ![[:hi:Samaritans|सामरी]] ![[:hi:बहाई_धर्म|बहाई]] ![[:hi:Lebanese_Shia_Muslims|मेटाविलेह]] ![[:hi:हिन्दू|हिंदू]] ![[:hi:सिख|सिखों]] !कुल |- |'''[[:hi:यरुशलम|यरूशलेम]]''' |13413 |33971 |14699 |6 |0 |0 |0 |484 |5 |'''62578''' |- |'''[[याफ़ा]]''' |20699 |20152 |6850 |0 |8 |0 |0 |0 |0 |'''47709''' |- |'''[[:hi:हाइफ़ा|हाइफा]]''' |9377 |6230 |8863 |12 |0 |152 |0 |0 |0 |'''24634''' |- |'''[[:hi:ग़ज़ा|गाजा]]''' |16722 |54 |701 |0 |0 |0 |3 |0 |0 |'''17480''' |- |'''[[:hi:हेब्रोन|हेब्रोन]]''' |16074 |430 |73 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''16577''' |- |'''[[:hi:नबलस|नाबलस]]''' |15238 |16 |544 |2 |147 |0 |0 |0 |0 |'''15947''' |- |'''[[:hi:सफ़ेद|सफ़द]]''' |5431 |2986 |343 |1 |0 |0 |0 |0 |0 |'''8761''' |- |'''[[:hi:Lydda|लिड्डा]]''' |7166 |11 |926 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''8103''' |- |'''[[:hi:नाज़रथ|नासरत]]''' |2486 |53 |4885 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''7424''' |- |'''[[:hi:Ramleh|रामलेह]]''' |5837 |35 |1440 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''7312''' |- |'''[[:hi:तिबरियास|टिबेरिया]]''' |2096 |4427 |422 |1 |0 |4 |0 |0 |0 |'''6950''' |- |'''[[:hi:बेथलहम|बेथलहम]]''' |818 |2 |5838 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''6658''' |- |'''[[:hi:आकरे|एकड़]]''' |4883 |78 |1344 |13 |0 |102 |0 |0 |0 |'''6420''' |- |'''[[:hi:अश्कलोन|मजदल]]''' |5064 |0 |33 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''5097''' |- |'''[[:hi:खान_युनुस|खान यूनिस]]''' |3866 |1 |23 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''3890''' |- |'''[[:hi:Tulkarem|तुलकारेम]]''' |3109 |23 |208 |1 |8 |1 |0 |0 |0 |'''3350''' |- |'''[[:hi:रामल्ला|रामल्ला]]''' |125 |7 |2972 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''3104''' |- |'''[[:hi:Beit_Jala|बीट जाला]]''' |41 |0 |3060 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''3101''' |- |'''[[:hi:जेनिन|जेनिन]]''' |2307 |7 |108 |0 |0 |0 |0 |212 |3 |'''2637''' |- |'''[[:hi:बेएर_षेवअ|बीरशेबा]]''' |2012 |98 |235 |11 |0 |0 |0 |0 |0 |'''2356''' |- |'''[[:hi:Shefa-Amr|शेफा-अम्र]]''' |623 |0 |1263 |402 |0 |0 |0 |0 |0 |'''2288''' |- |'''[[:hi:बेथ_शीआन|बैसन]]''' |1687 |41 |213 |0 |0 |0 |0 |0 |0 |'''1941''' |- |'''कुल''' |'''139074''' |'''68622''' |'''55043''' |'''449''' |'''163''' |'''259''' |'''3''' |'''696''' |'''8''' |'''264317''' |} == सरकार और संस्थान == अगस्त 1922 फिलिस्तीन ऑर्डर इन काउंसिल की शर्तों के तहत, मैंडेट क्षेत्र को प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था जिन्हें जिलों के रूप में जाना जाता था और [[:hi:High_Commissioners_for_Palestine_and_Transjordan|फिलिस्तीन के लिए ब्रिटिश उच्चायुक्त]] के कार्यालय द्वारा प्रशासित किया जाता था।<ref>[https://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/C7AAE196F41AA055052565F50054E656 The Palestine Order in Council, 10 August 1922, article 11] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140916132453/http://unispal.un.org/UNISPAL.NSF/0/C7AAE196F41AA055052565F50054E656|date=16 September 2014}}: "The High Commissioner may, with the approval of a Secretary of State, by Proclamation divide Palestine into administrative divisions or districts in such manner and with such subdivisions as may be convenient for purposes of administration describing the boundaries thereof and assigning names thereto."</ref> ब्रिटेन ने ऑटोमन साम्राज्य का ''मिलेट'' सिस्टम जारी रखा, जिसके तहत धार्मिक और पर्सनल स्टेटस के सभी मामले मुस्लिम कोर्ट और दूसरे मान्यता प्राप्त धर्मों के कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते थे, जिन्हें कन्फेशनल कम्युनिटी कहा जाता था। हाई कमिश्नर ने ऑर्थोडॉक्स रैबीनेट बनाया और एक बदला हुआ मिलेट सिस्टम बनाए रखा, जिसमें सिर्फ़ ग्यारह धार्मिक कम्युनिटी को मान्यता दी गई: मुस्लिम, यहूदी और नौ ईसाई पंथ (जिनमें से कोई भी ईसाई प्रोटेस्टेंट चर्च नहीं था)। जो लोग इन मान्यता प्राप्त कम्युनिटी के सदस्य नहीं थे, उन्हें मिलेट व्यवस्था से बाहर रखा गया। नतीजतन, उदाहरण के लिए, कन्फेशनल कम्युनिटी के बीच शादियों की कोई संभावना नहीं थी, और कोई सिविल मैरिज नहीं होती थी। कम्युनिटी के बीच पर्सनल कॉन्टैक्ट नाममात्र के थे। धार्मिक कोर्ट के अलावा, ज्यूडिशियल सिस्टम ब्रिटिश सिस्टम पर आधारित था, जिसमें एक हाई कोर्ट था जिसके पास अपील का अधिकार था और सेंट्रल कोर्ट और सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट पर रिव्यू करने का अधिकार था। लगातार पांच चीफ जस्टिस थे: * सर थॉमस हेक्राफ्ट (1921-1927) * सर माइकल मैकडॉनेल (1927-1936) * सर हैरी ट्रस्टेड (1938) में नाइट की उपाधि प्राप्त (बाद में, संघीय मलय राज्य के मुख्य न्यायाधीश, 1941) * फ्रेडरिक गॉर्डन स्मिथ (1941-1944) * सर विलियम फिट्जगेराल्ड (1944-1948) लोकल अखबार द पैलेस्टाइन पोस्ट की शुरुआत 1932 में गेर्शोन एग्रोन ने की थी। 1950 में इसका नाम बदलकर द जेरूसलम पोस्ट कर दिया गया। 1923 में, पिन्हास रूटेनबर्ग ने पैलेस्टाइन इलेक्ट्रिक कंपनी की शुरुआत की (जो 1961 में इज़राइल इलेक्ट्रिक कॉर्पोरेशन बन गई)। == अर्थव्यवस्था == 1922 और 1947 के बीच, इकॉनमी के यहूदी सेक्टर की सालाना ग्रोथ रेट 13.2% थी, जो मुख्य रूप से इमिग्रेशन और विदेशी कैपिटल की वजह से थी, जबकि अरब की 6.5% थी। प्रति व्यक्ति, ये आंकड़े क्रमशः 4.8% और 3.6% थे। 1936 तक, यहूदियों ने अरबों से 2.6 गुना ज़्यादा कमाया। दूसरे देशों के अरबों की तुलना में, फ़िलिस्तीनी अरबों ने थोड़ा ज़्यादा कमाया।{{Sfn|Khalidi|2006|p=27}} याफ़ा इलेक्ट्रिक कंपनी 1923 में पिन्हास रूटेनबर्ग ने शुरू की थी, और बाद में इसे नई बनी पैलेस्टाइन इलेक्ट्रिक कॉर्पोरेशन में मिला दिया गया; पहला जॉर्डन हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर हाउस 1933 में खोला गया। पैलेस्टाइन एयरवेज़ 1934 में, एंजेल बेकरीज़ 1927 में, और तनुवा डेयरी 1926 में शुरू हुई। बिजली ज़्यादातर यहूदी इंडस्ट्री में जाती थी, और फिर तेल अवीव और हाइफ़ा में अपनी जगहों पर पहुँचती थी। हालाँकि तेल अवीव में कहीं ज़्यादा वर्कशॉप और फ़ैक्ट्रियाँ थीं, लेकिन 1930 के दशक की शुरुआत तक इंडस्ट्री के लिए बिजली की माँग दोनों शहरों में लगभग एक जैसी थी।<ref>Shamir, Ronen (2013).</ref> देश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र [[:hi:हाइफ़ा|हाइफा]] में था, जहाँ कर्मचारियों के लिए कई आवास परियोजनाएं बनाई गई थीं।<ref>{{Cite news|url=https://www.haaretz.com/news/features/haifa-s-glass-house-transparent-but-still-an-israeli-mystery-1.422686|title=Haifa's glass house transparent, but still an Israeli mystery|work=Haaretz|last=Noam Dvir|date=5 April 2012|archive-date=3 May 2023|access-date=4 May 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20230503100948/https://www.haaretz.com/2012-04-05/ty-article/haifas-glass-house-transparent-but-still-an-israeli-mystery/0000017f-e18c-df7c-a5ff-e3fe456b0000}}</ref> 1939 के आसपास निर्धारित संयुक्त राष्ट्र [[:hi:मानव_विकास_सूचकांक|मानव विकास सूचकांक]] के पैमाने पर, 36 देशों में से, फिलिस्तीनी यहूदियों को 15 वें, फिलिस्तीिनी अरबों को 30 वें, मिस्र को 33 वें और तुर्की को 35 वें स्थान पर रखा गया था।{{Sfn|Khalidi|2006|p=16}} फिलिस्तीन में यहूदी मुख्य रूप से शहरी थे, 1942 में 76.2%, जबकि अरब मुख्य रूप से ग्रामीण थे, 1942 मे 68.3%।{{Sfn|Khalidi|2006|p=17}} कुल मिलाकर, खालिदी ने निष्कर्ष निकाला कि फिलिस्तीनी अरब समाज, जबकि यिशुव द्वारा अधिक मिलान किया गया था, इस क्षेत्र में किसी भी अन्य अरब समाज की तरह उन्नत था और कई से काफी अधिक था।{{Sfn|Khalidi|2006|pp=29–30}} == गैलरी == <gallery> चित्र:Palestine-WW1-3.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Palestine-WW1-3.jpg|जनरल सर एडमंड एलनबी के फ़िलिस्तीन कैंपेन के आखिरी हमलों ने ब्रिटेन को इस इलाके पर कंट्रोल दे दिया। चित्र:Field_Marshal_Allenby_British_troops_Jerusalem_dec_11_1917.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Field_Marshal_Allenby_British_troops_Jerusalem_dec_11_1917.jpg|जनरल एलनबी 11 दिसंबर 1917 को ब्रिटिश सैनिकों के साथ येरुशलम में दाखिल हुए (बाद में अप्रैल 1919 में एलनबी को फील्ड मार्शल बनाया गया) चित्र:Big_Gen_Watson_Mayor_Jerusalem_Dec_1917.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Big_Gen_Watson_Mayor_Jerusalem_Dec_1917.jpg|ब्रिगेडियर-जनरल वॉटसन दिसंबर 1917 में जेरूसलम के मेयर हुसैन अल-हुसैनी से मिलते हुए चित्र:Ottoman_surrender_of_Jerusalem_restored.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Ottoman_surrender_of_Jerusalem_restored.jpg|[[:hi:जेरूसलम_का_युद्ध|जेरूसलम का युद्ध]] के बाद 9 दिसंबर 1917 को उस्मानी्स ने ब्रिटिशों के सामने जेरूसलम को सरेंडर कर दिया। चित्र:GPO,_Jerusalem.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:GPO,_Jerusalem.jpg|मुख्य डाकघर, याफ़ा रोड, यरुशलम चित्र:Rockefeller_Tower_Jerusalem.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Rockefeller_Tower_Jerusalem.jpg|पैलेस्टाइन आर्कियोलॉजिकल म्यूज़ियम (PAM; 1967 से रॉकफेलर आर्कियोलॉजिकल म्यूज़ियम के नाम से जाना जाता है), ब्रिटिश शासन के दौरान जेरूसलम में बनाया गया था। चित्र:Central_Post_Office_in_Yaffo.JPG|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Central_Post_Office_in_Yaffo.JPG|मुख्य डाकघर, याफ़ा चित्र:Jaffa,_Alhambra_Cinema._Arab_cinema_in_Jaffa,_'Alhambra'_LOC_matpc.00267.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Jaffa,_Alhambra_Cinema._Arab_cinema_in_Jaffa,_'Alhambra'_LOC_matpc.00267.jpg|अलहम्ब्रा सिनेमा, याफ़ा चित्र:Anglo-Palestine_Bank.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Anglo-Palestine_Bank.jpg|एंग्लो-फिलिस्तीन बैंक चित्र:Western_Wall_Jerusalem_1933.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Western_Wall_Jerusalem_1933.jpg|पश्चिमी दीवार, 1933 चित्र:British_Mandate_tribunal_building.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:British_Mandate_tribunal_building.jpg|ब्रिटिश मैंडेट का सुप्रीम मिलिट्री ट्रिब्यूनल, किर्यात शमूएल, जेरूसलम चित्र:PikiWiki_Israel_612_YMCA_י.מ.ק.א..JPG|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:PikiWiki_Israel_612_YMCA_%D7%99.%D7%9E.%D7%A7.%D7%90..JPG|ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया यरूशलेम में YMCA चित्र:Jericho_entertainment_by_the_Palestine_Broadcasting_Service_LOC_matpc.20162.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Jericho_entertainment_by_the_Palestine_Broadcasting_Service_LOC_matpc.20162.jpg|पैलेस्टाइन ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का जेरिको में एंटरटेनमेंट प्रोग्राम, जिसने अपने प्रोग्राम अरबी, हिब्रू और इंग्लिश में बनाए। चित्र:Bevingrad2.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Bevingrad2.jpg|यरुशलम में "बेविनग्राद", कांटेदार तार के पीछे रूसी कंपाउंड चित्र:British_mailbox_Jerusalem.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:British_mailbox_Jerusalem.jpg|जनादेश-युग का स्तंभ बॉक्स, यरुशलम चित्र:Palestine1941.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Palestine1941.jpg|1941 का मुद्रा सिक्का चित्र:CurfewPalestine_01.jpg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:CurfewPalestine_01.jpg|मूवमेंट और कर्फ्यू पास, ब्रिटिश मिलिट्री कमांडर, ईस्ट पैलेस्टाइन के अधिकार से जारी, 1946 चित्र:Palestine-Mandate-Ensign-1927-1948.svg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Palestine-Mandate-Ensign-1927-1948.svg|फ़िलिस्तीन समुद्री ध्वज चित्र:Palestine_Mandate_Customs_and_Postal_Services_Ensign_1929-1948.svg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Palestine_Mandate_Customs_and_Postal_Services_Ensign_1929-1948.svg|फ़िलिस्तीन सीमा शुल्क और डाक सेवाओं का पताका चित्र:Flag_of_the_of_the_High_Commissioner_of_Palestine_1948.svg|link=https://hi.wikipedia.org/wiki/File:Flag_of_the_of_the_High_Commissioner_of_Palestine_1948.svg|उच्चायुक्त का ध्वज </gallery> == सन्धर्ब == <references /> op2b5qgvya36j03vqoa3cidzlr4mi1b फ्रेडरिक द्वितीय (पवित्र रोमन सम्राट) 0 1609464 6543841 6528895 2026-04-25T11:15:11Z The Sorter 845290 6543841 wikitext text/x-wiki {{Infobox royalty | name = फ्रेडरिक द्वितीय | title = पवित्र रोमन सम्राट; इटली के राजा; जर्मनी के राजा; सिसिली के राजा; यरूशलेम के राजा | image = Frederick II, Holy Roman Emperor.jpg | caption = फ्रेडरिक द्वितीय का एक समकालीन चित्रण (उनकी पुस्तक 'डे आर्टे वेनांडी कम एविबस' की पांडुलिपि से) | succession = [[पवित्र रोमन सम्राट]] | reign = 22 नवंबर 1220 – 13 दिसंबर 1250 | coronation = 22 नवंबर 1220 (रोम) | predecessor = [[ओटो चतुर्थ, पवित्र रोमन सम्राट|ओटो चतुर्थ]] | successor = [[हेनरी सातवां, पवित्र रोमन सम्राट|हेनरी सातवां]] | succession1 = सिसिली के राजा | reign1 = 3 सितंबर 1198 – 13 दिसंबर 1250 | coronation1 = 17 मई 1198 (पलेर्मो) | predecessor1 = [[हेनरी छठा, पवित्र रोमन सम्राट|हेनरी छठा]] और कॉन्स्टेंस प्रथम | successor1 = [[जर्मनी का कॉनराड चतुर्थ|कॉनराड प्रथम]] | succession2 = जर्मनी के राजा | reign2 = 23 अप्रैल 1220 – 13 दिसंबर 1250 | coronation2 = 9 दिसंबर 1212 (मेन्ज़); 25 जुलाई 1215 (आचेन) | predecessor2 = [[ओटो चतुर्थ, पवित्र रोमन सम्राट|ओटो चतुर्थ]] | successor2 = [[जर्मनी का कॉनराड चतुर्थ|कॉनराड चतुर्थ]] | succession3 = यरूशलेम के राजा | reign3 = 9 नवंबर 1225 – 25 अप्रैल 1228 | coronation3 = 18 मार्च 1229 (यरूशलेम) | predecessor3 = इसाबेला द्वितीय (योलान्डा) | successor3 = [[जर्मनी का कॉनराड चतुर्थ|कॉनराड द्वितीय]] | birth_date = 26 दिसंबर 1194 | birth_place = जेसी (Iesi), एंकोना का मार्च, [[पवित्र रोमन साम्राज्य]] | death_date = 13 दिसंबर 1250 (उम्र 55) | death_place = कास्टेल फियोरेंटीनो (Castel Fiorentino), अपुलिया, सिसिली का राज्य | burial_place = पलेर्मो कैथेड्रल, सिसिली | house = [[होहेनस्टौफेन राजवंश]] (Hohenstaufen) | father = [[हेनरी छठा, पवित्र रोमन सम्राट|हेनरी छठा]] | mother = [[सिसिली की कॉन्स्टेंस|कॉन्स्टेंस प्रथम]] | spouse = {{Unbulleted list|अरागोन की कॉन्स्टेंस (वि. 1209; मृ. 1222)|योलान्डा (इसाबेला) द्वितीय (वि. 1225; मृ. 1228)|इंग्लैंड की इसाबेला (वि. 1235; मृ. 1241)|बियांका लांसिया (वि. 1244; मृ. 1244)}} | religion = [[रोमन कैथोलिक]] }} '''फ्रेडरिक द्वितीय''' (अंग्रेज़ी: Frederick II; 26 दिसंबर 1194 – 13 दिसंबर 1250) मध्य युग के दौरान होहेनस्टौफेन (Hohenstaufen) राजवंश के सबसे शक्तिशाली, प्रबुद्ध और विवादास्पद शासकों में से एक थे। वे 1220 से अपनी मृत्यु तक [[पवित्र रोमन सम्राट]] रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सिसिली के राजा (1198-1250), जर्मनी तथा इटली के राजा (1212-1250) और अपनी असाधारण कूटनीति के परिणामस्वरूप यरूशलेम के राजा (1225-1228) के रूप में भी शासन किया। सार्वभौमिक सत्ता का उनका स्वप्न उन्हें प्राचीन शास्त्रीय काल के एक सम्राट और ऑगस्टस (Augustus) के सीधे उत्तराधिकारी के रूप में देखने के लिए प्रेरित करता था।<ref>Weiss, Roberto (1973). ''The Renaissance Discovery of Classical Antiquity''. Oxford: Blackwell. p. 12.</ref> उनके समकालीनों और बाद के इतिहासकारों द्वारा उन्हें अक्सर ''स्टूपर मुंडी'' (Stupor mundi - दुनिया का अजूबा) और ''पुएर अपुलिया'' (Puer Apuliae - अपुलिया का पुत्र) कहा जाता था। फ्रेडरिक मध्यकालीन यूरोप के सबसे बहुआयामी शासकों में से एक थे, जो छह भाषाएं (लैटिन, सिसिलियन, मध्य उच्च जर्मन, प्राचीन फ्रांसीसी, ग्रीक और अरबी) बोलना जानते थे। उनका पूरा जीवनकाल रोमन कैथोलिक चर्च (पपसी) के साथ एक निरंतर और भीषण सत्ता-संघर्ष का साक्षी रहा। पोपों ने उनके बढ़ते साम्राज्य को अपने लिए एक गंभीर राजनीतिक और वैचारिक खतरा माना, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें तीन बार कैथोलिक चर्च से निष्कासित (excommunicate) किया गया। 1245 में ल्योन की परिषद द्वारा पोप इनोसेंट चतुर्थ ने उन्हें सम्राट के पद से अपदस्थ घोषित कर दिया। इन भयंकर संघर्षों के बावजूद, उन्होंने प्रशासनिक, कानूनी और सांस्कृतिक क्षेत्रों में ऐसे सुधार किए जो आधुनिक राज्य-व्यवस्था के अग्रदूत माने जाते हैं। == प्रारंभिक जीवन, वंश और जन्म की किंवदंतियाँ == फ्रेडरिक का जन्म 26 दिसंबर 1194 को मध्य इटली के जेसी (Iesi) नामक नगर में हुआ था। वे पवित्र रोमन सम्राट हेनरी छठे (Henry VI) और सिसिली की रानी कॉन्स्टेंस (Constance of Sicily) की एकमात्र संतान थे। पैतृक पक्ष से वे महान सम्राट फ्रेडरिक बारबरोसा (Frederick Barbarossa) के पौत्र थे, जबकि मातृ पक्ष से उनका संबंध सिसिली के शक्तिशाली नॉर्मन राजा रोजर द्वितीय (Roger II) से था। इस प्रकार, फ्रेडरिक की रगों में जर्मन और नॉर्मन दोनों राजवंशों का कुलीन रक्त बह रहा था। जब फ्रेडरिक का जन्म हुआ, तब उनकी माता कॉन्स्टेंस की आयु 40 वर्ष थी, जो उस समय के चिकित्सा मानकों के अनुसार मातृत्व के लिए काफी अधिक थी। उनके राजनीतिक विरोधियों और जर्मन सरदारों ने यह अफवाह फैलानी शुरू कर दी कि महारानी गर्भवती नहीं हैं, बल्कि एक कसाई के बेटे को गुप्त रूप से शाही उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस संदेह को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए, महारानी कॉन्स्टेंस ने जेसी के मुख्य चौराहे पर एक सार्वजनिक और खुले तंबू (pavilion) में फ्रेडरिक को जन्म दिया।<ref>Masson, Georgina (1973). ''Frederick II of Hohenstaufen, A Life''. Octagon Books. pp. 30–32.</ref> इस दौरान उन्होंने नगर की सभी प्रमुख और कुलीन महिलाओं को तंबू में प्रवेश करने की अनुमति दी, ताकि वे इस शाही जन्म की प्रत्यक्ष गवाह बन सकें। कुछ वृत्तांतों के अनुसार, जन्म के पश्चात रानी ने नगर के चौक पर सार्वजनिक रूप से शिशु को स्तनपान भी कराया ताकि कोई भी अफवाह शेष न रहे। == अनाथ अवस्था और पलेर्मो का बहुसांस्कृतिक प्रभाव == फ्रेडरिक के जन्म के मात्र तीन वर्ष बाद, 1197 में उनके पिता सम्राट हेनरी छठे की मलेरिया (कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार जहर) से अचानक मृत्यु हो गई। अगले ही वर्ष 1198 में फ्रेडरिक की माता कॉन्स्टेंस की भी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से ठीक पहले, कॉन्स्टेंस ने एक दूरदर्शी कूटनीतिक कदम उठाते हुए अपने चार वर्षीय अनाथ पुत्र फ्रेडरिक को तत्कालीन शक्तिशाली पोप इनोसेंट तृतीय (Pope Innocent III) के संरक्षण (wardship) में सौंप दिया। रानी भली-भांति जानती थीं कि जर्मन सरदार और क्षेत्रीय कुलीन सिसिली की अकूत संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए हैं, और केवल पोप का सर्वोच्च धार्मिक अधिकार ही बच्चे के जीवन और राज्याधिकार की रक्षा कर सकता है।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/0-198-22513-X|title=The Emperor Frederick II of Hohenstaufen, immutator mundi|last=Van Cleve|first=Thomas Curtis|date=1972|publisher=Clarendon Press|isbn=978-0-19-822513-3|location=Oxford}}</ref> फ्रेडरिक का बचपन और किशोरावस्था सिसिली की राजधानी पलेर्मो (Palermo) में बीता। 13वीं सदी का पलेर्मो यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र का सबसे अनोखा, समृद्ध और बहुसांस्कृतिक शहर था। इसके जीवंत बाजारों और महलों में यूनानी (ग्रीक), अरब (मुस्लिम), नॉर्मन और यहूदी एक साथ शांतिपूर्वक रहते थे।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/0521269113|title=The Norman kingdom of Sicily|last=Matthew|first=Donald|date=1992|publisher=Cambridge University Press|isbn=978-0-521-26284-2|series=Cambridge medieval textbooks|location=Cambridge ; New York}}</ref> युवा फ्रेडरिक को महलों की बंद चारदीवारी और औपचारिक ट्यूटर्स से अधिक पलेर्मो की सड़कों, बंदरगाहों और बाजारों में समय बिताना पसंद था। यहीं उन्होंने स्थानीय विद्वानों और व्यापारियों से अरबी और ग्रीक भाषाएं सीखीं। इस बहुसांस्कृतिक वातावरण ने फ्रेडरिक के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी और उनमें विभिन्न धर्मों, विशेषकर इस्लामी दर्शन और प्राचीन यूनानी विज्ञान के प्रति एक असाधारण सहिष्णुता और बौद्धिक जिज्ञासा विकसित की, जो उनके समकालीन कट्टरपंथी यूरोपीय राजाओं के लिए सर्वथा अकल्पनीय थी।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/88-06-13197-4|title=Federico II: un imperatore medievale|last=Abulafia|first=David|date=1995|publisher=Einaudi|isbn=978-88-06-13197-5|series=Einaudi Tascabili Saggi|location=Torino}}</ref> == साम्राज्य के लिए महासंग्राम और जर्मनी पर अधिकार == [[चित्र:Posse Band 1 b 0063.jpg|thumb|right|250px|फ्रेडरिक द्वितीय की शाही मुहर (Imperial Seal), जिसमें उन्हें रोमन परंपरा के अनुसार सिंहासन पर विराजमान दिखाया गया है।]] फ्रेडरिक के बचपन के दौरान, पवित्र रोमन साम्राज्य में जर्मन सिंहासन के लिए एक भयंकर और लंबा गृहयुद्ध छिड़ गया। यह संघर्ष मुख्य रूप से वेल्फ (Welf) राजवंश के ओटो चतुर्थ (Otto IV) और होहेनस्टौफेन राजवंश के फिलिप (फ्रेडरिक के चाचा) के बीच था। शुरुआत में पोप इनोसेंट तृतीय ने ओटो का समर्थन किया। लेकिन जब ओटो चतुर्थ 1209 में विधिवत सम्राट बना, तो उसने अपनी सीमाएं पार कर लीं और इटली तथा फ्रेडरिक के राज्य सिसिली पर सैन्य आक्रमण करने की योजना बनाई। पोप को अपनी क्षेत्रीय और धार्मिक सत्ता के लिए गंभीर खतरा महसूस हुआ; उन्होंने तुरंत ओटो को चर्च से बहिष्कृत कर दिया और जर्मनी के सरदारों को युवा फ्रेडरिक का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। पोप के आशीर्वाद और फ्रांसीसी राजा फिलिप द्वितीय ऑगस्टस की मजबूत वित्तीय और कूटनीतिक सहायता से, 17 वर्षीय फ्रेडरिक ने 1212 में मुट्ठी भर समर्थकों के साथ आल्प्स पर्वत पार किया और जर्मनी में प्रवेश किया। यह यात्रा अत्यंत जोखिम भरी थी, लेकिन अपनी कूटनीति और वाक्पटुता से उन्होंने कई जर्मन सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। दिसंबर 1212 में उन्हें मेन्ज़ (Mainz) में 'रोमनों का राजा' (King of the Romans) चुना गया। सत्ता का अंतिम निर्णय 1214 में बोविंस की लड़ाई (Battle of Bouvines) में हुआ, जहाँ फ्रेडरिक के फ्रांसीसी सहयोगियों ने ओटो चतुर्थ और उसके अंग्रेजी समर्थकों को बुरी तरह पराजित किया। 25 जुलाई 1215 को आचेन (Aachen) के ऐतिहासिक गिरजाघर में फ्रेडरिक का भव्य राज्याभिषेक हुआ, जहाँ उन्होंने पोप को खुश करने और अपना धार्मिक समर्पण सिद्ध करने के लिए यरूशलेम को मुक्त कराने हेतु धर्मयुद्ध (Crusade) पर जाने की सार्वजनिक शपथ ली।<ref>{{Cite journal|last=Arnold|first=Benjamin|date=|title=Emperor Frederick II (1194–1250) and the political particularism of the German princes|url=https://www.tandfonline.com/doi/full/10.1016/S0304-4181%2800%2900005-1|journal=Journal of Medieval History|language=en|volume=26|issue=3|pages=239–252|doi=10.1016/S0304-4181(00)00005-1|issn=0304-4181}}</ref> == पवित्र रोमन सम्राट के रूप में राज्याभिषेक और सिसिली का प्रशासन == जर्मनी में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद, फ्रेडरिक इटली लौट आए। 22 नवंबर 1220 को रोम के सेंट पीटर बेसिलिका में एक भव्य समारोह में, पोप होनोरियस तृतीय (Honorius III) ने फ्रेडरिक को पवित्र रोमन सम्राट का ताज पहनाया। इसके बदले में, फ्रेडरिक ने पोप को आश्वासन दिया कि वे सिसिली के राज्य को पवित्र रोमन साम्राज्य से कानूनी रूप से अलग रखेंगे, क्योंकि पोप को भय था कि दोनों के एक होने से पपसी चारों ओर से घिर जाएगी। सम्राट बनने के बाद फ्रेडरिक ने सिसिली में शाही सत्ता को बहाल करने का क्रूर लेकिन अत्यंत प्रभावी अभियान शुरू किया। उनकी लंबी अनुपस्थिति में सिसिली के सामंतों (Barons) और मुस्लिम विद्रोहियों (सारासेन) ने बहुत स्वायत्तता प्राप्त कर ली थी। फ्रेडरिक ने विद्रोही सामंतों के महल नष्ट कर दिए और उनकी भूमि जब्त कर ली। 1222 से 1225 के बीच उन्होंने सिसिली के पश्चिमी पहाड़ों में छिपे मुस्लिम विद्रोहियों को पराजित करने के लिए एक निर्मम सैन्य अभियान चलाया। विद्रोह को पूरी तरह कुचलने के बाद, उन्होंने एक अभूतपूर्व कूटनीतिक कदम उठाया। उन्होंने बचे हुए लगभग 20,000 सिसिलियन मुसलमानों को बंदी बनाकर इटली की मुख्य भूमि पर ल्यूसेरा (Lucera) नामक शहर में बसाया। आश्चर्यजनक रूप से, उन्होंने इन मुसलमानों को उनके धर्म का पालन करने, मस्जिदें बनाने और अपने शरिया कानून के अनुसार जीने की पूरी स्वतंत्रता दी।<ref>Weltecke, Dorothea (2011). ''[https://d-nb.info/1098310926/34 Emperor Frederick II, »Sultan of Lucera", "Friend of the Musilims«, Promoter of Cultural Transfer]''. Frankfurt. p. 88. ISBN 9783593394046</ref> बदले में, ये मुस्लिम सैनिक फ्रेडरिक के सबसे वफादार अंगरक्षक, तीरंदाज और शाही खजाने के रक्षक बने। यह फ्रेडरिक की मास्टरस्ट्रोक थी, क्योंकि इन मुस्लिम सैनिकों पर पोप के 'धर्म-बहिष्कार' या नर्क के डर का कोई असर नहीं होता था। == छठा धर्मयुद्ध (Sixth Crusade) और यरूशलेम की रक्तहीन विजय == [[चित्र:Friedrich II. mit Sultan al-Kamil.jpg|thumb|left|250px|एक 14वीं शताब्दी की इतालवी पांडुलिपि का दृश्य, जिसमें सम्राट फ्रेडरिक द्वितीय और सुल्तान अल-कामिल को शांति वार्ता करते हुए दर्शाया गया है।]] फ्रेडरिक ने 1215 में क्रूसेड पर जाने की शपथ ली थी, लेकिन वे इसे अपने साम्राज्य के एकीकरण के कार्यों के कारण लगातार टालते रहे। पोप ग्रेगरी नौवें (Gregory IX), जो 1227 में गद्दी पर बैठे, इस विलंब से अत्यधिक क्रोधित थे। 1227 में जब फ्रेडरिक अंततः एक विशाल बेड़े के साथ यरूशलेम के लिए रवाना हुए, तो उनके शिविर में भयंकर महामारी (संभवतः हैजा) फैल गई। फ्रेडरिक स्वयं गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें बीच रास्ते से लौटना पड़ा। इसे एक जानबूझकर किया गया बहाना मानकर पोप ग्रेगरी नौवें ने तुरंत फ्रेडरिक को कैथोलिक चर्च से निष्कासित (Excommunicate) कर दिया और उन्हें ईसाई समुदाय से बाहर निकाल दिया।<ref>Loud, G. A. (2016). "The Papal 'Crusade' against Frederick II in 1228–1230". ''La Papauté et les croisades''. Routledge. pp. 91–103.</ref> चर्च द्वारा बहिष्कृत होने के इस भारी अपमान के बावजूद, 1228 में फ्रेडरिक ने एक बहुत छोटी सेना के साथ छठे धर्मयुद्ध (Sixth Crusade) की शुरुआत की। फ्रेडरिक का यह धर्मयुद्ध मध्यकालीन इतिहास का सबसे अनोखा और आधुनिक सैन्य अभियान था, क्योंकि इसमें एक भी युद्ध नहीं लड़ा गया। फ्रेडरिक अरबी भाषा, इस्लामी दर्शन और संस्कृति के गहरे जानकार और प्रशंसक थे। उन्होंने सैन्य संघर्ष के बजाय मिस्र के अय्युबिद सुल्तान अल-कामिल (Al-Kamil) के साथ सीधे कूटनीतिक पत्राचार और शांति वार्ता शुरू की। दोनों शासकों के बीच एक बौद्धिक और सम्मानजनक रिश्ता कायम हो गया, जिसमें वे दर्शन, ज्यामिति, और शिकार के तरीकों पर विचार साझा करते थे। फरवरी 1229 में, फ्रेडरिक और अल-कामिल के बीच 'याफ़ा की ऐतिहासिक संधि' (Treaty of Jaffa) पर हस्ताक्षर हुए। बिना कोई खून बहाए, फ्रेडरिक ने यरूशलेम, बेथलहम और नासरत का नियंत्रण ईसाइयों के लिए प्राप्त कर लिया। समझौते के अनुसार, अल-अक्सा मस्जिद और डोम ऑफ द रॉक (हरम अल-शरीफ) मुसलमानों के नियंत्रण में रहे, और उन्हें वहां बिना रोकटोक इबादत करने की अनुमति दी गई। 18 मार्च 1229 को, चर्च द्वारा बहिष्कृत होने के बावजूद, फ्रेडरिक ने यरूशलेम के 'पवित्र सेपल्चर के चर्च' (Church of the Holy Sepulchre) में स्वयं अपने हाथों से यरूशलेम के राजा का ताज पहना। उनकी इस कूटनीतिक सफलता ने पूरे ईसाई जगत को स्तब्ध कर दिया। जहाँ आम लोगों ने रक्तहीन विजय का जश्न मनाया, वहीं पोप इससे इतने क्रुद्ध हुए कि उन्होंने पूरे यरूशलेम शहर पर ही धार्मिक प्रतिबंध (Interdict) लगा दिया।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/978-1-781-85889-9|title=Crusaders: an epic history of the wars for the Holy Lands|last=Jones|first=Dan|date=2020|publisher=Head of Zeus|isbn=978-1-78185-889-9|edition=|location=London}}</ref> == 'कुंजियों का युद्ध' और इटली में संघर्ष == जब फ्रेडरिक यरूशलेम में शांति स्थापित कर रहे थे, पोप ग्रेगरी नौवें ने उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए उनके खिलाफ "कुंजियों का युद्ध" (War of the Keys) छेड़ दिया। पोप ने सिसिली पर आक्रमण करने के लिए एक पपैल सेना (Papal army) भेजी, जिसका नेतृत्व फ्रेडरिक के ससुर जॉन ऑफ ब्रिएन (John of Brienne) कर रहे थे। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए फ्रेडरिक तुरंत इटली लौट आए। उनके ल्यूसेरा के मुस्लिम सैनिकों और जर्मन शूरवीरों ने पोप की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया। युद्ध में फ्रेडरिक की स्पष्ट सैन्य श्रेष्ठता को देखकर, पोप को झुकना पड़ा। अंततः 1230 में सैन जर्मानो की संधि (Treaty of San Germano) हुई, जिसके तहत विवश होकर पोप को फ्रेडरिक का निष्कासन रद्द करना पड़ा। == प्रशासनिक सुधार: मेलफी का संविधान (लिबर ऑगस्टालिस) == 1231 में, फ्रेडरिक ने अपने साम्राज्य सिसिली के लिए एक व्यापक, प्रगतिशील और दूरदर्शी कानूनी संहिता लागू की, जिसे ''मेलफी का संविधान'' (Constitutions of Melfi) या ''लिबर ऑगस्टालिस'' (Liber Augustalis) कहा जाता है। यह मध्य युग के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेजों में से एक था।<ref>Abulafia, David (1988). ''Frederick II: A Medieval Emperor''. Penguin Press. pp. 89–90.</ref> इस संविधान के द्वारा फ्रेडरिक ने सिसिली को एक अत्यंत केंद्रीकृत, नौकरशाही राज्य (centralized bureaucratic state) में बदल दिया। सामंतों (Barons) के पारंपरिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए, निजी युद्धों और प्रतिशोध (Vendetta) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और सभी नागरिकों—चाहे वे ईसाई हों, मुस्लिम हों या यहूदी—को समान रूप से राजा के न्याय के अधीन कर दिया गया। फ्रेडरिक ने शाही अदालतों का निर्माण किया और कुलीनता के बजाय योग्यता के आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति की। आर्थिक क्षेत्र में, उन्होंने राज्य के एकाधिकार (State monopolies) स्थापित किए, रेशम उत्पादन को बढ़ावा दिया, और 1231 में ''ऑगस्टेल'' (Augustale) नामक एक शानदार और उत्कृष्ट सोने का सिक्का जारी किया। यह सिक्का रोमन सम्राट ऑगस्टस की याद दिलाता था और यूरोपीय अर्थव्यवस्था में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस प्रकार सिसिली राज्य यूरोप का पहला आधुनिक, प्रशासनिक राज्य बन गया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=CiBgUuqgx_cC&pg=PA155&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false|title=Medieval European Coinage: Volume 14, South Italy, Sicily, Sardinia: With a Catalogue of the Coins in the Fitzwilliam Museum, Cambridge|last=Grierson|first=Philip|last2=Blackburn|first2=Mark A. S.|last3=Travaini|first3=Lucia|last4=Museum|first4=Fitzwilliam|date=1986|publisher=Cambridge University Press|isbn=978-0-521-58231-5|language=en}}</ref> == जर्मनी की नीतियां और पारिवारिक विद्रोह == इटली में अपने केंद्रीकरण के बिल्कुल विपरीत, फ्रेडरिक को जर्मनी में वहां के शक्तिशाली राजकुमारों (Princes) को भारी रियायतें देनी पड़ीं ताकि वे इटली में अपना ध्यान और संसाधन केंद्रित कर सकें। 1220 में उन्होंने जर्मन बिशपों को और 1232 में जर्मन राजकुमारों को (Statutum in favorem principum) ऐसे अभूतपूर्व विशेषाधिकार दिए जिन्होंने वस्तुतः जर्मन साम्राज्य को स्वतंत्र रियासतों के एक ढीले परिसंघ में बदल दिया। उन्होंने राजकुमारों को अपने सिक्के ढालने, सीमा शुल्क वसूलने और न्याय करने का स्वतंत्र अधिकार दे दिया।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/978-1-349-25677-8|title=Medieval Germany, 500-1300: A Political Interpretation|last=Arnold|first=Benjamin|date=1997|publisher=Bloomsbury Academic|isbn=978-1-349-25677-8|series=European History in Perspective|location=London}}</ref> फ्रेडरिक के सबसे बड़े पुत्र, हेनरी (सातवें) ने इन रियायतों का कड़ा विरोध किया। उसे लगा कि पिता जर्मन राजशाही की शक्ति को नष्ट कर रहे हैं। शहरों का समर्थन लेकर 1234 में हेनरी ने अपने पिता के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। फ्रेडरिक ने 1235 में जर्मनी की यात्रा की, और अपने विशाल प्रभाव के कारण बिना किसी बड़ी लड़ाई के विद्रोह को कुचल दिया। फ्रेडरिक ने अपने ही बेटे हेनरी को जीवन भर के लिए जेल में डाल दिया, जहाँ कुछ वर्षों बाद उसकी मृत्यु हो गई। == लोम्बार्ड लीग के खिलाफ युद्ध == फ्रेडरिक का प्रमुख राजनीतिक लक्ष्य उत्तरी इटली के समृद्ध और स्वायत्त शहरों (जिन्हें लोम्बार्ड लीग कहा जाता था) को अपने सीधे नियंत्रण में लाना था। मिलान (Milan) के नेतृत्व में इन शहरों ने फ्रेडरिक की शाही सत्ता और करों को मानने से इनकार कर दिया। 1237 में, फ्रेडरिक ने कोर्टेनुओवा की लड़ाई (Battle of Cortenuova) में लोम्बार्ड लीग की सेनाओं को एक करारी शिकस्त दी। यह फ्रेडरिक की सबसे महान सैन्य जीतों में से एक थी। सम्राट ने मिलान का कैरोशियो (Carroccio - एक पवित्र युद्ध रथ, जो इटालवी शहरों के गौरव का प्रतीक था) छीन लिया और उसे एक हाथी पर रखकर जीत के भव्य जुलूस के साथ रोम भेज दिया। इस भारी जीत के बाद फ्रेडरिक बहुत महत्वाकांक्षी हो गए और उन्होंने मिलान के बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की। इससे लोम्बार्ड शहरों ने डरकर समर्पण करने के बजाय प्रतिरोध जारी रखा। पोप ग्रेगरी नौवें को लगा कि फ्रेडरिक इटली और रोम को पूरी तरह निगल जाएंगे। नतीजतन, 1239 में पोप ने फ्रेडरिक को दूसरी बार चर्च से बहिष्कृत कर दिया और उनके खिलाफ एक व्यापक दुष्प्रचार अभियान शुरू किया, जिसमें फ्रेडरिक को 'ईसा मसीह का शत्रु' (Antichrist) और 'रहस्योद्घाटन का दरिंदा' (Beast of Revelation) घोषित कर दिया गया।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/fredericktheseco000027mbp|title=FREDERICK THE SECOND|last=ERNST KANTOROWICZ|date=1937|publisher=FREDERICK UNGAR PUBLISHING CO. NEW YORK|others=Universal Digital Library}}</ref> == मंगोल आक्रमण का संकट (1241) == उसी समय जब फ्रेडरिक पोप के साथ भीषण संघर्ष में उलझे हुए थे, यूरोप पर पूर्व से एक नया और भयानक खतरा मंडरा रहा था: बट्टू खान और सुबुतेई के नेतृत्व में मंगोल साम्राज्य का आक्रमण। 1241 में मंगोलों ने पोलैंड, हंगरी और सिलेसिया को रौंद दिया, और लिग्निट्ज़ (Liegnitz) तथा मोही (Mohi) के युद्धों में ईसाई सेनाओं को बुरी तरह नष्ट कर दिया। सम्राट फ्रेडरिक ने इस खतरे को अत्यंत गंभीरता से लिया। उन्होंने इंग्लैंड के हेनरी तृतीय, फ्रांस के लुइस नौवें और अन्य यूरोपीय राजाओं को पत्र लिखे, जिसमें उन्होंने मंगोलों की रणनीति, उनकी गति, उनके हथियारों और उनकी क्रूरता का विस्तृत विवरण दिया। फ्रेडरिक ने यूरोपीय शासकों से अपने आपसी वैमनस्य को भुलाकर मंगोलों के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने अपनी सीमाओं (जर्मनी और ऑस्ट्रिया) पर बचाव और किलेबंदी के सख्त निर्देश दिए। हालाँकि, मंगोल साम्राज्य के महान खान (ओगदेई खान) की मृत्यु के कारण मंगोल सेनाएं अचानक यूरोप से वापस लौट गईं, जिससे पश्चिमी यूरोप एक बड़े विनाश से बच गया।<ref>Jackson, Peter (2005). ''The Mongols and the West, 1221–1410''. Routledge. p. 66.</ref> == ल्योन की परिषद और ऐतिहासिक पतन (1245) == ग्रेगरी नौवें की मृत्यु के बाद, नया पोप इनोसेंट चतुर्थ (Innocent IV) चुना गया। शुरुआत में फ्रेडरिक ने शांति वार्ता की कोशिश की, लेकिन इनोसेंट चतुर्थ गुप्त रूप से इटली से भागकर फ्रांस के शहर ल्योन (Lyon) पहुँच गए। वहां 1245 में पोप ने 'ल्योन की पहली परिषद' बुलाई। इस परिषद में फ्रेडरिक पर विधर्म (heresy), चर्च की संपत्तियों को लूटने, ईशनिंदा करने और क्रूसेड के वादों को तोड़ने के गंभीर आरोप लगाए गए। पोप इनोसेंट चतुर्थ ने फ्रेडरिक को पवित्र रोमन सम्राट के पद से अपदस्थ (deposed) करने की घोषणा कर दी और उनके सभी विषयों को उनकी वफादारी की शपथ से मुक्त कर दिया।<ref>Masson, Georgina (1973). ''Frederick II of Hohenstaufen, A Life''. Octagon Books. pp. 279, 283–284.</ref> यह मध्यकालीन इतिहास का एक अभूतपूर्व क्षण था। पोप ने जर्मनी में फ्रेडरिक के खिलाफ 'एंटी-किंग' (Anti-kings) खड़े कर दिए, जिनमें हेनरी रास्प और हॉलैंड के विलियम शामिल थे। इससे जर्मनी में एक लंबा और विनाशकारी गृहयुद्ध छिड़ गया। == 'स्टूपर मुंडी' (Stupor Mundi): विज्ञान, कला और बौद्धिक संरक्षण == [[चित्र:Frederick II and eagle.jpg|thumb|right|250px|फ्रेडरिक द्वितीय और उनका प्रिय बाज़ (ईगल), जो उनकी पुस्तक "डे आर्टे वेनांडी कम एविबस" से संबंधित उनकी वैज्ञानिक रुचियों को दर्शाता है।]] राजनीति और युद्ध से परे, फ्रेडरिक द्वितीय का दरबार 13वीं सदी के यूरोप का सबसे चमचमाता, प्रबुद्ध और सहिष्णु बौद्धिक केंद्र था। * '''नेपल्स विश्वविद्यालय (University of Naples):''' 1224 में फ्रेडरिक ने नेपल्स विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह यूरोप का पहला राज्य-संचालित (State-run) विश्वविद्यालय था, जिसका उद्देश्य साम्राज्य के लिए कुशल प्रशासक और वकील तैयार करना था।<ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/universitieseur00unkngoog|title=The universities of Europe in the middle ages|last=Rashdall|first=Hastings|date=1895|publisher=Oxford, The Clarendon Press|others=Harvard University}}</ref> * '''चिकित्सा कानून:''' फ्रेडरिक ने चिकित्सा के अभ्यास को विनियमित करने वाले पहले आधुनिक कानून पारित किए। उनके कानूनों के तहत किसी भी चिकित्सक को भ्रष्टाचार रोकने के लिए अपनी स्वयं की दवाइयां बेचने की अनुमति नहीं थी। * '''बाज पालन और प्राकृतिक विज्ञान:''' फ्रेडरिक प्राकृतिक विज्ञान और जीव विज्ञान के प्रति अत्यधिक जुनूनी थे। उन्होंने बाज पालन (Falconry) पर लैटिन में एक असाधारण ग्रंथ लिखा, जिसका नाम ''डे आर्टे वेनांडी कम एविबस'' (De arte venandi cum avibus - द आर्ट ऑफ फाल्कनरी) है। यह पुस्तक केवल शिकार के बारे में नहीं थी, बल्कि यह पक्षियों के शरीर रचना विज्ञान (anatomy) और उनके प्रवास (migration) पर एक विशुद्ध वैज्ञानिक और अवलोकन-आधारित अध्ययन था, जो अरस्तू के कई सिद्धांतों को चुनौती देता था।<ref>{{Cite book|url=https://en.wikipedia.org/wiki/Special:BookSources/978-0-8047-0374-1|title=The art of falconry being the De Arte Venandi cum Avibus|last=Friedrich|last2=Wood|first2=Casey Albert|last3=Friedrich|date=|publisher=Stanford Univ. Pr|isbn=978-0-8047-0374-1|edition=|location=Stanford, Calif}}</ref> * '''अरब विद्वानों से पत्राचार:''' फ्रेडरिक ने गणित, प्रकाशिकी (optics) और दर्शनशास्त्र से संबंधित प्रश्नों की एक सूची (जिन्हें 'सिसिलियन प्रश्न' कहा जाता है) मिस्र, सीरिया और यमन के मुस्लिम विद्वानों को भेजी थी। वे विशेष रूप से आत्मा की अमरता और प्रकाश के अपवर्तन के बारे में जानना चाहते थे। * '''सिसिलियन स्कूल ऑफ पोएट्री:''' उनके दरबार के कवियों, विशेषकर गियाकोमो दा लेंटिनी (Giacomo da Lentini) ने 'सॉनेट' (Sonnet) का आविष्कार किया, जिसे बाद में दांते और पेट्रार्क ने अमर कर दिया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=r0CDBgAAQBAJ&pg=PA2&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false|title=The Heian Court Poetry as World Literature: From the Point of View of Early Italian Poetry|last=Gerlini|first=Edoardo|date=2014|publisher=Firenze University Press|isbn=978-88-6655-600-8|language=en}}</ref> [[चित्र:Palazzo Reale (NA) 25 06 2019 02 - Federico II di Svevia.jpg|thumb|left|200px|नेपल्स के रॉयल पैलेस में स्थित फ्रेडरिक द्वितीय की भव्य संगमरमर की प्रतिमा, जो उनके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।]] == अंतिम वर्ष, विपत्तियाँ और मृत्यु == अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, फ्रेडरिक इटली में अपने सिकुड़ते साम्राज्य को बचाने के लिए निरंतर युद्ध लड़ते रहे। 1248 में परमा (Parma) की घेराबंदी के दौरान उनकी सेना को एक विनाशकारी हार का सामना करना पड़ा। उनका प्रिय पुत्र और सेनापति, एंज़ियो (Enzio of Sardinia), 1249 में बोलोग्ना के सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और उसे अपना शेष जीवन एक कैद में बिताना पड़ा। फ्रेडरिक के सबसे भरोसेमंद मंत्री और सलाहकार, पिएत्रो डेला विग्ना (Pietro della Vigna) पर हत्या की साजिश का आरोप लगा, जिसे फ्रेडरिक ने अंधा कर दिया और बाद में उसने जेल में आत्महत्या कर ली। इन लगातार राजनीतिक और व्यक्तिगत झटकों के बीच, 13 दिसंबर 1250 को अपुलिया के कास्टेल फियोरेंटीनो (Castel Fiorentino) में फ्रेडरिक द्वितीय का 55 वर्ष की आयु में पेचिश (Dysentery) से निधन हो गया। अपनी मृत्यु से ठीक पहले, उन्होंने एक सिस्टर्सियन भिक्षु के कपड़े पहने थे और उन्हें पादरी द्वारा अंतिम संस्कार दिए गए थे। उनके पार्थिव शरीर को पलेर्मो कैथेड्रल ले जाया गया, जहां उन्हें लाल पोर्फिरी (Red Porphyry) के एक भव्य मकबरे में दफनाया गया। == ऐतिहासिक विरासत == फ्रेडरिक द्वितीय का मूल्यांकन इतिहास में हमेशा ध्रुवीकृत रहा है। उनके समकालीन कैथोलिक लेखकों ने उन्हें "ईसा मसीह का दुश्मन" और एक क्रूर नास्तिक माना। इसके विपरीत, 19वीं सदी के स्विस इतिहासकार जैकब बर्कहार्ट (Jacob Burckhardt) ने उन्हें अपनी बुद्धिमत्ता और प्रशासनिक सुधारों के कारण "सिंहासन पर बैठा पहला आधुनिक मनुष्य" (the first modern man on the throne) करार दिया, जो अपने युग की धार्मिक कट्टरता से कोसों दूर था। 20वीं सदी में जर्मन इतिहासकार अर्नस्ट कैंटोरोविट्ज़ (Ernst Kantorowicz) ने अपनी प्रसिद्ध जीवनी में फ्रेडरिक को एक रहस्यमय और मसीहाई व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=BXSYDwAAQBAJ&pg=PA115&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false|title=Ernst Kantorowicz: A Life|last=Lerner|first=Robert E.|date=2018-09-11|publisher=Princeton University Press|isbn=978-0-691-18302-2|language=en}}</ref> चाहे उन्हें जिस भी नजरिए से देखा जाए, फ्रेडरिक द्वितीय मध्ययुगीन इतिहास के एक निर्विवाद रूप से विशाल और प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। उनके निधन के कुछ दशकों बाद ही इटली और जर्मनी में होहेनस्टौफेन राजवंश का पूरी तरह पतन हो गया, और उनके साथ ही एक सार्वभौमिक 'पवित्र रोमन साम्राज्य' (Universal Empire) का स्वप्न भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।<ref>{{Cite journal|last=Köhler|first=Walther|date=|title=Emperor Frederick II., The Hohenstaufe|url=https://www.journals.uchicago.edu/doi/10.1086/478355|journal=The American Journal of Theology|language=en|volume=7|issue=2|pages=225–248|doi=10.1086/478355|issn=1550-3283}}</ref> == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://www.wikidata.org/wiki/Q130221 विकिडाटा पर फ्रेडरिक द्वितीय (Q130221)] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Frederick_II,_Holy_Roman_Emperor अंग्रेजी विकिपीडिया पर फ्रेडरिक द्वितीय] [[श्रेणी:पवित्र रोमन सम्राट]] [[श्रेणी:जर्मनी के राजा]] [[श्रेणी:यरूशलेम के राजा]] [[श्रेणी:सिसिली के राजा]] [[श्रेणी:होहेनस्टौफेन राजवंश]] [[श्रेणी:1194 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:1250 में निधन]] [[श्रेणी:छठे क्रूसेड के ईसाई लोग]] icuykj53uazcrf5cm8j8u6dkmrzc6vo मुहम्मद बेय अबू अल-धहब 0 1609840 6543834 6534475 2026-04-25T11:09:55Z The Sorter 845290 6543834 wikitext text/x-wiki {{Infobox officeholder | name = मुहम्मद बेय अबू अल-धहब | native_name = محمد بك أبو الدهب | native_name_lang = ar | image = Flag of the Mameluks.svg | image_size = 250px | caption = मामलुक साम्राज्य का ऐतिहासिक ध्वज | office = मिस्र के 'शेख अल-बलाद' | term_start = 1773 | term_end = 1775 | monarch = [[मुस्तफ़ा तृतीय]] और [[अब्दुल हमीद प्रथम]] | predecessor = [[अली बेय अल-कबीर]] | successor = मुराद बेय और इब्राहिम बेय | birth_date = 1735 | birth_place = [[काकेशस]] | death_date = 1775 (आयु 39–40 वर्ष) | death_place = [[अक्का|एकड़]], [[फ़िलिस्तीन]] | nationality = मामलुक | occupation = सैन्य अधिकारी, शासक | religion = [[इस्लाम]] }} '''मुहम्मद बेय अबू अल-धहब''' ([[अरबी भाषा|अरबी]]: محمد بك أبو الدهب; जन्म: 1735 – निधन: 1775) [[अठारहवीं शताब्दी]] के दौरान [[मिस्र]] के एक [[मामलुक]] अमीर (Emir) और शासक थे। [[उस्मानी साम्राज्य]] (Ottoman Empire) के शासनकाल के दौरान उन्होंने मिस्र के 'शेख अल-बलाद' का पद ग्रहण किया। ऐतिहासिक रूप से उन्हें अली बेय अल-कबीर के प्रमुख सैन्य कमांडर के रूप में उनके अभियानों और बाद में उसी अली बेय के विरुद्ध किए गए उनके विद्रोह के लिए जाना जाता है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books?id=e5JMAAAAcAAJ&redir_esc=y|title=A History of the Revolt of Ali Bey, Against the Ottoman Porte: Including an Account of the Form of Government of Egypt : Together with a Description of Grand Cairo and of Several Celebrated Places in Egypt, Palestine, and Syria : to which are Added, A Short Account of the Present State of the Christians who are Subjects to the Turkish Government, and the Journal of a Gentleman who Travelled from Aleppo to Bassora|last=Lusignan|first=Sauveur|date=1783|publisher=The Author|pages=80|language=en}}</ref> == प्रारंभिक जीवन और उपाधि == मुहम्मद बेय के जन्म स्थान और उनके शुरुआती जीवन के विस्तृत ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। तत्कालीन मामलुक प्रणाली के अनुसार, उन्हें [[काकेशस]] क्षेत्र से एक [[दास प्रथा|दास]] (मामलुक) के रूप में मिस्र लाया गया था। मिस्र के तत्कालीन शासक अली बेय अल-कबीर ने उन्हें खरीदा और सैन्य प्रशिक्षण दिया। समय के साथ वे अली बेय के प्रमुख सेनापतियों में से एक बन गए। जब अली बेय ने उन्हें राज्य में 'अमीर' (कमांडर) के पद पर नियुक्त किया, तो इस नियुक्ति के अवसर पर मुहम्मद बेय ने [[काहिरा]] के निवासियों के बीच सोने के सिक्के वितरित किए। सोने के सिक्के बांटने के इस कार्य के कारण ही स्थानीय लोगों और इतिहासकारों के बीच उन्हें '''अबू अल-धहब''' (Abu al-Dhahab) नाम दिया गया, जिसका अरबी में अर्थ 'सोने वाला' (Father of Gold) होता है।<ref>{{Cite news|url=https://archive.ph/20140826014657/http://referenceworks.brillonline.com/entries/encyclopaedia-of-islam-3/abu-l-dhahab-muh-ammad-bey-SIM_0285?s.num=0&s.q=%22Ab%C5%AB+l-Dhahab,+Mu%E1%B8%A5ammad+Bey%22|title=Abū l-Dhahab, Muḥammad Bey - Brill Reference|date=2014-08-26|work=archive.ph|access-date=2026-03-18}}</ref> == सैन्य अभियान == [[चित्र:Ali Bey al-kabir.jpg|thumb|अली बेय अल-कबीर, जिनके सेनापति के रूप में अबू अल-धहब ने कार्य किया।]] अबू अल-धहब ने अली बेय अल-कबीर के आदेश पर कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। 1770 में, अली बेय ने [[उस्मानी साम्राज्य]] से [[मिस्र]] की स्वायत्तता स्थापित करने का प्रयास किया। इस योजना के तहत अबू अल-धहब को [[हेजाज़]] (वर्तमान [[मक्का]] क्षेत्र) पर नियंत्रण करने के लिए भेजा गया। इस अभियान में उन्होंने उस्मानी नियंत्रण को हटाकर मक्का में अली बेय का अधिकार स्थापित किया। 1771 में अली बेय ने उस्मानी साम्राज्य के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की और अबू अल-धहब को [[सीरिया]] और [[फ़िलिस्तीन|फिलिस्तीन]] क्षेत्र की ओर भेजा। इस अभियान में, अबू अल-धहब ने गैलिली के स्थानीय शासक ज़हीर अल-उमर के साथ गठबंधन किया और उस्मानी सेनाओं से संघर्ष करते हुए [[दमिश्क]] पर अधिकार कर लिया। == अली बेय के विरुद्ध विद्रोह == [[दमिश्क]] पर अधिकार करने के पश्चात्, अबू अल-धहब ने अपने सैन्य अभियान को आगे बढ़ाने से रोक दिया और अपनी सेना के साथ वापस [[मिस्र]] लौट गए। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, [[उस्मानी साम्राज्य]] के अधिकारियों ने [[कूटनीति|कूटनीतिक]] रूप से अबू अल-धहब से संपर्क किया था और उन्हें मिस्र के शासक का पद देने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव के बाद वे अली बेय अल-कबीर के खिलाफ हो गए।<ref>{{Cite book |last=Kippis |first=Andrew |title=The New Annual Register or General Repository of History, Politics and Literature |volume=7 |year=1787 |location=London |page=37}}</ref> मिस्र लौटने के बाद उन्होंने अली बेय अल-कबीर के खिलाफ सैन्य विद्रोह कर दिया। 1772 में दोनों गुटों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें अबू अल-धहब की सेना ने अली बेय को मिस्र छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अली बेय ने [[फ़िलिस्तीन|फिलिस्तीन]] में शरण ली। 1773 में सालिहिया के युद्ध में अबू अल-धहब ने अली बेय की सेना को पराजित किया। इस संघर्ष में घायल होने के कारण अली बेय को बंदी बना लिया गया और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। == शासक के रूप में कार्यकाल == [[चित्र:Daher el-Omar portrait 1.jpg|thumb|left|ज़हीर अल-उमर, जिनके खिलाफ उस्मानी सुल्तान ने अबू अल-धहब को सैन्य अभियान का आदेश दिया था।]] अली बेय की मृत्यु के बाद, अबू अल-धहब [[मिस्र]] के शासक और 'शेख अल-बलाद' बने। सत्ता में आने के बाद उन्होंने उस्मानी सुल्तान के प्रति अपनी वफादारी व्यक्त की और मिस्र को फिर से [[उस्मानी साम्राज्य]] के नियंत्रण में ला दिया। 1775 में उस्मानी सुल्तान ने अबू अल-धहब को [[फ़िलिस्तीन|फिलिस्तीन]] में ज़हीर अल-उमर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का आदेश दिया। अबू अल-धहब ने सेना के साथ फिलिस्तीन की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने याफ़ा शहर को घेरकर उस पर कब्ज़ा किया, जहाँ संघर्ष के दौरान कई लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद उनकी सेना ने एकड़ (Acre) शहर पर नियंत्रण स्थापित किया, जिसके कारण ज़हीर अल-उमर को वहाँ से हटना पड़ा।<ref>{{Cite book |last=Sabbagh |first=Karl |title=Palestine: History of a Lost Nation |year=2006 |publisher=Atlantic |location=London |page=43 |isbn=978-1-5558-4874-3|url=https://openlibrary.org/books/OL35750312M/Palestine}}</ref> == मृत्यु और स्थापत्य योगदान == [[अक्का|एकड़]] शहर में प्रवेश करने के कुछ दिनों बाद ही, 1775 में अबू अल-धहब बीमार पड़ गए और उनकी मृत्यु हो गई। तत्कालीन स्रोतों में उनकी मृत्यु का कारण [[प्लेग]] या तीव्र बुखार बताया गया है। उनके निधन के बाद उनकी सेना [[मिस्र]] लौट गई। अबू अल-धहब का नाम मिस्र के [[इस्लामी वास्तुकला|इस्लामी स्थापत्य]] इतिहास में भी दर्ज है। 1774 में, उन्होंने [[काहिरा]] में अल-अजहर मस्जिद के निकट एक बड़ी मस्जिद का निर्माण करवाया था, जिसे आज 'मुहम्मद बेय अबू अल-धहब मस्जिद' के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इस मस्जिद के रखरखाव और इस्लामी शिक्षा के लिए एक वक्फ (Waqf) की स्थापना भी की थी। उनके द्वारा स्थापित यह संरचना आज भी काहिरा में [[मामलुक]] वास्तुकला के रूप में मौजूद है। == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} == विस्तृत पठन == * {{Cite book |last=al-Ǧabartī |first=Abdarraḥmān |title=Bonaparte in Ägypten - Aus den Chroniken von ʿAbdarraḥmān al-Ǧabartī |year=1989 |publisher=Piper |location=Munich |translator-last=Hottinger |translator-first=Arnold |pages=46–58, 332}} * {{Cite book |last=Bidwell |first=Robin Leonard |title=Dictionary of Modern Arab History |year=1998 |publisher=Keegan Paul |location=London/New York |pages=24–25}} * {{Cite journal |last=Crecelius |first=Daniel |year=1978 |title=The Waqf of Muhammad Bey Abu al-Dhabab |journal=Journal of the American Research Center in Egypt |volume=15 |pages=83–105 |doi=10.2307/40000133 |jstor=40000133}} * {{Cite book |last=Crecelius |first=Daniel |title=The Roots of Modern Egypt: A Study of the Regimes of 'Ali Bey al-Kebir and Muhammad Bey Abu al-Dhabab, 1760–1775 |year=1981 |publisher=Bibliotheca Islamica |location=Chicago |isbn=978-0882970295 |series=Studies in Middle Eastern History, Vol. 6}} * {{Cite book|last=Goldschmidt|first=Arthur|last2=Johnston|first2=Robert|url=https://openlibrary.org/books/OL7996865M/Historical_Dictionary_of_Egypt_%28African_Historical_Dictionaries_Historical_Dictionaries_of_Africa%29|title=Historical Dictionary of Egypt|year=2013|publisher=Scarecrow|location=Lanham, Maryland|page=30|isbn=978-0-8108-4856-6|format=PDF|series=African Historical Dictionaries, Vol. 89}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://www.wikidata.org/wiki/Q15983717 विकिडाटा पर मुहम्मद बेय अबू अल-धहब] [[श्रेणी:1735 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:1775 में निधन]] [[श्रेणी:मिस्र के शासक]] [[श्रेणी:मामलुक]] [[श्रेणी:उस्मानी मिस्र]] cvntbz4204v6qskbxaubvhlii2milqf सदस्य:AMAN KUMAR/शीह लॉग 2 1609848 6543849 6543603 2026-04-25T11:36:32Z AMAN KUMAR 911487 शीह नामांकन का लॉग बनाया जा रहा of [[:सदस्य वार्ता:GKM Gautam Kumar Maurya]]. 6543849 wikitext text/x-wiki This is a log of all [[वि:शीह|speedy deletion]] nominations made by this user using [[WP:TW|Twinkle]]'s CSD module. If you no longer wish to keep this log, you can turn it off using the [[Wikipedia:Twinkle/Preferences|preferences panel]], and nominate this page for speedy deletion under [[वि:शीह#U1|CSD U1]]. === मार्च 2026 === # [[:चिरंजीवी सरजा]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 20:50, 18 मार्च 2026 (UTC) # [[:साँचा:Fper]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 13:51, 19 मार्च 2026 (UTC) # [[:दिवाण जवाहर सिंह]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 10:52, 20 मार्च 2026 (UTC) === अप्रैल 2026 === # [[:द्वितीयक रंग]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 17:09, 2 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Harendra jakhar nagour]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 17:23, 2 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सहायता:Protection]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 17:30, 2 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:कंपनी हवलदार मेजर]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 22:57, 5 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:विक्रम सिंह मीना]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 01:25, 7 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:रविन्द्र कुमार द्विवेदी]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 08:06, 7 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:वार्ता:डिबेटसिলেটবিডি]]: {{tl|db-reason}}; अन्य अतिरिक्त जानकारी: {Custom rationale: उचित पृष्ठ नहीं}; सदस्य {{user|1=Spacebangla}} को सूचित किया गया 13:30, 7 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:देओला दादा]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 04:07, 9 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सहायता:IPA/Hindi and Urdu]]: [[वि:शीह#व5|शीह व5]] ({{tl|db-blank}}) 04:09, 9 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:रोहित गिल]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 18:00, 10 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Bjp Junaid Hussain]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 23:48, 11 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Bjp Junaid Hussain]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 23:48, 11 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:कुश सोगुण]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 14:06, 12 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Govind Bhana Artist]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 14:38, 12 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Chandan roy Bhirha]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 03:42, 13 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:पूर्ति आर्या]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 03:47, 13 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:साँचा:Article wizard/button wizard/sandbox]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 20:33, 13 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:The7unity]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 18:28, 14 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:साउथ सिटी इंटर्नैशनल स्कूल]]: {{tl|db-reason}}; अन्य अतिरिक्त जानकारी: {Custom rationale: इसमें उल्लेखनीयता का स्पष्ट अभाव है और कोई भी विश्वसनीय स्रोत नहीं है।}; सदस्य {{user|1=Ahari123}} को सूचित किया गया 19:08, 14 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Nawada District President of Youth Congress is Mohammad Irshad Ansari]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 04:14, 15 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:ऑस्ट्रेलिया के लिए CDR]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 08:44, 15 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:साँचा:Infobox news organization]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}); निर्माण-सुरक्षा हेतु ([[WP:SALT|salting]]) अनुरोध किया गया 03:04, 16 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:गुंजन तिवारी]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}); निर्माण-सुरक्षा हेतु ([[WP:SALT|salting]]) अनुरोध किया गया 07:22, 16 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:डॉ इन्दु शेखर उपाध्याय]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 10:52, 17 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Ajaysingh Mer Rajput]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 11:19, 17 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Harendra jakhar nagour]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 01:22, 18 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Adsmalhotra]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 12:21, 18 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Harendra jakhar degana]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 22:56, 18 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:ग्यासी]]: [[वि:शीह#व3|शीह व3]] ({{tl|db-vandalism}}) 13:33, 19 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:जय भीम नव जागृति संस्थान उटाम्बर]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 14:13, 19 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:अशुतोष यादव]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 18:50, 19 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:डॉ. भावना सावलिया]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 18:52, 19 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:महकाल अवतार]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}); निर्माण-सुरक्षा हेतु ([[WP:SALT|salting]]) अनुरोध किया गया 19:14, 19 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:Ayushguptha]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 03:01, 20 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:जियोक्स एआई]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 06:27, 20 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:श्रवण राम पंवार]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 13:11, 20 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Shrawanrampanwar]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 13:12, 20 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:श्रवण राम मेघवाल]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 00:13, 21 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Parvat Singh Buddha]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 03:14, 22 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:पुष्कर कांडपाल (गायक)]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}) 08:57, 22 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Harendra jakhar degana]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 11:29, 22 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:आदर्श कुमार राजपूत]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 17:29, 22 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:विनोद वर्मा (आभूषण वर्ल्ड)]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 15:10, 23 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य:Parvat Singh Buddha]]: [[वि:शीह#व7|शीह व7]] ({{tl|db-spam}}) 15:12, 23 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:प्रवेशद्वार:न्यूरोविज्ञान]]: [[वि:शीह#व2|शीह व2]] ({{tl|db-test}}) 23:06, 23 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:Anu tomar]]: {{tl|db-reason}}; अन्य अतिरिक्त जानकारी: {Custom rationale: शीर्षक अन्य भाषा में है}; सदस्य {{user|1=Advocate vinit tyagi}} को सूचित किया गया 03:46, 24 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:द ट्रेंडिंग पीपल]]: [[वि:शीह#ल2|शीह ल2]] ({{tl|db-promo}}); निर्माण-सुरक्षा हेतु ([[WP:SALT|salting]]) अनुरोध किया गया 03:51, 24 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:के राघवन रेड्डी]]: [[वि:शीह#व4|शीह व4]] ({{tl|db-hoax}}) 11:55, 24 अप्रैल 2026 (UTC) # [[:सदस्य वार्ता:GKM Gautam Kumar Maurya]]: [[वि:शीह#स3|शीह स3]] ({{tl|db-notwebhost}}) 11:36, 25 अप्रैल 2026 (UTC) dro3imytth83sf5z99encdj0igs4688 कैंटर सेट 0 1609900 6543706 6531777 2026-04-24T22:34:15Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543706 wikitext text/x-wiki [[File:Cantor.png|thumb|कैंटर सेट के निर्माण के सात चरण।]] [[गणित]] में, '''कैंटर सेट''' एक एकल रेखा खण्ड पर स्थित बिन्दुओं का एक स्व-समान समूह है जिसमें कई अनैच्छिक गुण होते हैं। इसकी खोज 1874 में हेनरी जॉन स्टीफन स्मिथ द्वारा की गई थी तथा 1883 में जर्मन गणितज्ञ [[जॉर्ज कांटॉर|जॉर्ज कैंटर]] द्वारा इसका उल्लेख किया गया था।<ref>{{Cite journal|last=Smith|first=Henry J.S.|date=1874|title=On the integration of discontinuous functions|url=https://zenodo.org/record/1932560|journal=Proceedings of the London Mathematical Society|series=First series|volume=6|pages=140–153}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/labyrinthofthoug0000ferr|title=Labyrinth of Thought: A History of Set Theory and Its Role in Modern Mathematics|last=Ferreirós|first=José|date=1999|publisher=Birkhäuser Verlag|isbn=9783034850513|location=Basel, Switzerland|pages=[https://archive.org/details/labyrinthofthoug0000ferr/page/162 162]–165|url-access=registration}}</ref><ref>{{Cite book|title=Does God Play Dice?: The New Mathematics of Chaos|last=Stewart|first=Ian|date=26 June 1997|publisher=Penguin|isbn=0140256024}}</ref><ref name="Cantor"/><ref>{{Cite book|url=https://archive.org/details/chaosfractals00hein|title=Chaos and Fractals: New Frontiers of Science|last=Peitgen|first=H.-O.|last2=Jürgens|first2=H.|last3=Saupe|first3=D.|date=2004|publisher=Springer Verlag|isbn=978-1-4684-9396-2|edition=2nd|location=N.Y., N.Y.|page=[https://archive.org/details/chaosfractals00hein/page/n79 65]|url-access=limited}}</ref> जैसा कि यह एक रैखिक निरन्तरता से विपरीत है, कैंटर सेट को '''कैंटर डिस्कंटीनम''' कहा गया है। इस समूह पर विचार करके, कैंटर तथा अन्य लोगों ने आधुनिक बिन्दु-सेट स्थलविज्ञान की नींव रखने में सहाय की। सबसे सामान्य निर्माण '''कैंटर त्रयी सेट''' है, जिसे एक रेखा खण्ड के मध्य तीसरे भाग को हटाकर तथा फिर शेष छोटे खण्डों के साथ प्रक्रिया को दोहराकर बनाया गया है। कैंटर ने इस त्रयी निर्माण का उल्लेख केवल गुजरने में किया, एक आदर्श सेट के उदाहरण के रूप में जो कहीं भी घना नहीं है।<ref name="Cantor">{{Cite journal|last=Cantor|first=Georg|date=1883|title=Über unendliche, lineare Punktmannigfaltigkeiten V|trans-title=On infinite, linear point-manifolds (sets), Part 5|url=http://www.digizeitschriften.de/main/dms/img/?PPN=GDZPPN002247461|journal=Mathematische Annalen|language=de|volume=21|pages=545–591|doi=10.1007/bf01446819|s2cid=121930608|archive-url=https://web.archive.org/web/20150924114632/http://www.digizeitschriften.de/main/dms/img/?PPN=GDZPPN002247461|archive-date=24 सितंबर 2015|access-date=2011-01-10|url-status=bot: unknown}}<cite class="citation journal cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="" id="CITEREFCantor1883">Cantor, Georg (1883). &#x5B;On infinite, linear point-manifolds (sets), Part 5&#x5D;. ''Mathematische Annalen'' (in German). '''21''': <span class="nowrap">545–</span>591. [[डिजिटल वस्तु अभिज्ञापक|doi]]:[[doi:10.1007/bf01446819|10.1007/bf01446819]]. [[सेमैन्टिक स्कॉलर|S2CID]]&nbsp;[https://api.semanticscholar.org/CorpusID:121930608 121930608]. Archived from [http://www.digizeitschriften.de/main/dms/img/?PPN=GDZPPN002247461 the original] on 2015-09-24<span class="reference-accessdate">. Retrieved <span class="nowrap">2011-01-10</span></span>.</cite> [[Category:CS1 German-language sources (de)]]</ref> [[File:Cantor Set Expansion.gif|center|thumb|600px|कैंटर सेट का विस्तार। सेट में प्रत्येक बिंदु को यहाँ एक ऊर्ध्वाधर रेखा द्वारा दर्शाया गया है।]] == त्रिनेरी समुच्चय का निर्माण तथा सूत्र == कैंटर टरनरी सेट <math>\mathcal{C}</math> यह लाइन सेगमेंट के एक सेट से खुले मध्य तीसरे को पुनरावृत्ति से हटाकर बनाया जाता है। एक खुले मध्य तीसरे को हटाने से शुरू होता है <math display="inline">\left(\frac{1}{3}, \frac{2}{3}\right)</math> [[अंतराल (गणित)|अन्तराल]] से <math>\textstyle\left[0, 1\right]</math>, दो पंक्ति खण्डों को छोड़ते हुएः<math display="inline">\left[0, \frac{1}{3}\right]\cup\left[\frac{2}{3}, 1\right]</math>। इसके बाद, इन शेष खण्डों में से प्रत्येक के खुले मध्य तीसरे को हटा दिया जाता है, जिससे चार पंक्ति खंड रह जाते हैंः <math display="inline">\left[0, \frac{1}{9}\right]\cup\left[\frac{2}{9}, \frac{1}{3}\right]\cup\left[\frac{2}{3}, \frac{7}{9}\right]\cup\left[\frac{8}{9}, 1\right]</math>। कैंटर त्रयी समूह में अंतराल के सभी बिंदु शामिल हैं। <math>[0,1]</math> जो इस अनंत प्रक्रिया में किसी भी चरण में नहीं हटाए जाते हैं। : <math>C_0 := [0,1]</math> और : <math>C_n := \frac{C_{n-1}} 3 \cup \left(\frac 2 {3} +\frac{C_{n-1}} 3 \right) = \frac13 \bigl(C_{n-1} \cup \left(2 + C_{n-1} \right)\bigr)</math> के लिए <math>n \ge 1</math>, ताकि : <math>\mathcal{C} := \lim_{n\to\infty}C_n = \bigcap_{n=0}^\infty C_n = \bigcap_{n=m}^\infty C_n </math> किसी के लिए <math>m \ge 0</math>. इस प्रक्रिया के पहले छह चरण नीचे दर्शाए गए हैं। [[Image:Cantor set in seven iterations.svg|729px|class=skin-invert| Cantor ternary set, in seven iterations]] स्व-समान रूपांतरणों की अवधारणा का उपयोग करते हुए, <math>T_L(x)=x/3,</math> <math>T_R(x)=(2+x)/3</math> and <math>C_n =T_L(C_{n-1})\cup T_R(C_{n-1}),</math> कैंटर सेट के लिए स्पष्ट बंद सूत्र हैं।<ref>{{cite journal | first=Mohsen | last=Soltanifar | title=A Different Description of A Family of Middle-a Cantor Sets | journal=American Journal of Undergraduate Research | volume=5 | issue=2 | pages=9–12 | date=2006 | doi=10.33697/ajur.2006.014| doi-access=free }}</ref> : <math>\mathcal{C}=[0,1] \,\smallsetminus\, \bigcup_{n=0}^\infty \bigcup_{k=0}^{3^n-1} \left(\frac{3k+1}{3^{n+1}},\frac{3k+2}{3^{n+1}} \right)\!,</math> where every जहां प्रत्येक मध्य तिहाई को खुले अंतराल के रूप में हटा दिया जाता है <math display="inline">\left(\frac{3k+1}{3^{n+1}},\frac{3k+2}{3^{n+1}}\right)</math> बंद अंतराल से <math display="inline">\left[\frac{3k+0}{3^{n+1}},\frac{3k+3}{3^{n+1}}\right] = \left[\frac{k+0}{3^n},\frac{k+1}{3^n}\right]</math> इसके चारों ओर, या : <math>\mathcal{C}=\bigcap_{n=1}^\infty \bigcup_{k=0}^{3^{n-1}-1} \left( \left[\frac{3k+0}{3^n},\frac{3k+1}{3^n}\right] \cup \left[\frac{3k+2}{3^n},\frac{3k+3}{3^n}\right] \right)\!,</math> जहां मध्य तीसरा <math display="inline">\left(\frac{3k+1}{3^n},\frac{3k+2}{3^n}\right) </math> उपरोक्त बंद अंतराल का <math display="inline">\left[\frac{k+0}{3^{n-1}},\frac{k+1}{3^{n-1}}\right] = \left[\frac{3k+0}{3^n},\frac{3k+3}{3^n}\right]</math> प्रतिच्छेदन द्वारा हटा दिया जाता है<math display="inline">\left[\frac{3k+0}{3^n},\frac{3k+1}{3^n}\right] \cup \left[\frac{3k+2}{3^n},\frac{3k+3}{3^n}\right]\!.</math> मध्य तिहाई भाग को हटाने की यह प्रक्रिया परिमित उपविभाजन नियम का एक सरल उदाहरण है । कैंटर त्रिगुणीय समुच्चय का पूरक एक फ्रैक्टल स्ट्रिंग का उदाहरण है । ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:वास्तविक संख्याओं का समुच्चय]] [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] 5mjjitr8tgm66nsfjsx5edlos5t6823 कुकेल्दाश मदरसा 0 1610049 6543613 6532212 2026-04-24T13:18:20Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543613 wikitext text/x-wiki [[File:Kukeldash Madrasah inner yard.jpg|right|thumb|मदरसे का आंतरिक प्रांगण]] '''कुकेल्दाश मदरसा''' [[ताशकंद]] में स्थित एक मध्यकालीन [[मदरसा]] है, जो [[चोरसू बाजार]] और चोरसू मेट्रो स्टेशन के पास स्थित है। इसका निर्माण लगभग 1570 में उज़्बेक [[शयबानिद राजवंश|शयबानिद]] शासक दरवेश सुल्तान द्वारा करवाया गया था।<ref name="cat">{{cite web|url=http://www.centralasia-travel.com/ru/countries/uzbekistan/places/tashkent/kukeldash|title=Медресе Кукельдаш|publisher=Central Asia Travel|language=ru|access-date=30 October 2015}}</ref> यह मदरसा पीली ईंटों से बना है और इसका पारंपरिक वर्गाकार आकार है जिसमें एक बड़ा प्रवेश द्वार (पोर्टल) और एक आंतरिक प्रांगण है। आंतरिक प्रांगण के चारों ओर की दीवारों में कोठरियाँ (cells) बनी हैं जिनमें छात्र रहते हैं। इसका मुख्य प्रवेश द्वार 20 मीटर ऊँचा है और इसके दोनों किनारों पर दो मीनारें स्थित हैं।<ref name="cat"/> 1830-1831 में मदरसे की पहली मंजिल को ध्वस्त कर दिया गया था, और उन ईंटों का उपयोग पास के 'बेकलारबेगी मदरसे' के निर्माण के लिए किया गया था। बाद में इसे बहाल किया गया।<ref name="cat"/> 1868 के भूकंप में मदरसा क्षतिग्रस्त हो गया था और बाद में 1902-1903 में इसका पुनर्निर्माण किया गया। 1950 के दशक में इसका फिर से जीर्णोद्धार किया गया और यह उन कुछ धार्मिक इमारतों में से एक बन गया जो [[1966 ताशकंद भूकंप]] में सुरक्षित बच गईं।<ref>{{cite web|url=http://rex-history.ru/history-a-a/425-tangirov.html|title=О деятельности медресе города Ташкента в конце XIX – начале ХХ вв.|last=Тангиров|first=Обид Эшмахматович|year=2014|publisher=Rex-History.ru|language=ru|access-date=30 October 2015|archive-date=28 सितंबर 2015|archive-url=https://web.archive.org/web/20150928172311/http://rex-history.ru/history-a-a/425-tangirov.html|url-status=dead}}</ref> 18वीं शताब्दी में इस मदरसे को एक [[सराय]] (caravanserai) में बदल दिया गया था, फिर इसने एक किले के रूप में कार्य किया। 20वीं शताब्दी में यह एक संग्रहालय था, पहले [[नास्तिकता]] का और बाद में लोक संगीत का। 1990 के दशक में, यह इमारत फिर से एक मदरसा बन गई।<ref name="cat"/> == संदर्भ == {{reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Portal|Tashkent}} * {{commonscat-inline|Kukeldash Madrasah (Tashkent)}} {{Tourist attractions in Uzbekistan}} {{coord|41|19|23|N|69|14|09|E|region:KZ_source:kolossus-jawiki|display=title}} me4pg06s6eorp16g3dgjfh7ra8yzqt8 के. टी. मुहम्मद 0 1610378 6543687 6533123 2026-04-24T18:16:41Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 3 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543687 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer | name = के. टी. मुहम्मद | image = Bust_of_KT_Mohammed.jpg | caption = [[कोझिकोड]] में स्थित के. टी. की अर्धप्रतिमा | birth_date = {{birth date|1927|09|29|df=yes}} | death_date = {{Death date and age|df=yes|2008|03|25|1927|09|29}} | occupation = [[नाटककार]] | spouse = {{marriage|[[जीनत]]|1981|1993|reason=तलाक}}<ref name=Kaumudi>[https://www.keralakaumudi.com/news/cinema/news/actress-zeenath-on-kt-muhammed-37271 "अन्नेनिक्कु 18, के.टीक्कु 54उम"]. ''[[केरल कौमुदी]]''. 11 जनवरी 2019. 2 मार्च 2019 को प्राप्त किया गया।</ref> | nationality = [[भारतीय लोग|भारतीय]] }} '''के. टी. मुहम्मद''' (29 सितंबर 1927 – 25 मार्च 2008), जिन्हें लोकप्रिय रूप से '''केटी''' के नाम से जाना जाता था, एक प्रसिद्ध [[मलयालम]] [[नाटककार]] और [[पटकथा लेखक]] थे।<ref name="hindu_mar08">{{cite news |title = के.टी. मुहम्मद का निधन |url = http://www.hindu.com/2008/03/26/stories/2008032655581000.htm |work = [[द हिंदू]] |date = 26 मार्च 2008 |access-date = 25 मार्च 2026 |archive-date = 29 मार्च 2008 |archive-url = https://web.archive.org/web/20080329232628/http://www.hindu.com/2008/03/26/stories/2008032655581000.htm |url-status = dead }}</ref> उन्होंने लगभग 40 मंच नाटकों की पटकथा लिखी थी, जिनमें 'इधु भूमियानु' (यह धरती है) को उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। उन्होंने लगभग 20 फिल्मों के लिए पटकथा भी लिखी थी, जिनमें 'कंदम बेचा कोट्टू', 'थुरक्काता वाथिल', 'मूडुपडम' और 'कडलपलम' शामिल हैं।<ref>{{cite news|url=http://www.hindu.com/thehindu/holnus/009200803270322.htm|title=केरल के मास्टर नाटककार को अश्रुपूर्ण विदाई|date=27 मार्च 2008|work=[[द हिंदू]]|access-date=25 मार्च 2026|archive-date=8 नवंबर 2008|archive-url=https://web.archive.org/web/20081108103440/http://www.hindu.com/thehindu/holnus/009200803270322.htm|url-status=dead}}</ref> के. टी. [[संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार]] के प्राप्तकर्ता थे।<ref>{{cite web |url=http://www.sangeetnatak.com/programmes_recognition%26honours_drama_playwriting.html |title=अकादमी पुरस्कार - नाटक |publisher=संगीत नाटक अकादमी |access-date=25 मार्च 2026 |archive-date=7 जून 2008 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080607104701/http://www.sangeetnatak.com/programmes_recognition%26honours_drama_playwriting.html |url-status=dead }}</ref> == जीवनी == के. टी. का जन्म [[मलप्पुरम जिला|मलप्पुरम जिले]] के [[मंजेरी]] में एक पुलिस कांस्टेबल कुंजुमुहम्मद के सबसे बड़े पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी औपचारिक शिक्षा बहुत कम हुई थी। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने डाक विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। 1952 में, उन्हें उनकी कहानी 'कन्नुकल' (आंखें) के लिए अखिल भारतीय लघु कथा प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला, जिसका बाद में कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया। वे [[कोझिकोड]] के ब्रदर्स म्यूजिक क्लब के एक सक्रिय सदस्य थे, जो कई प्रसिद्ध कलाकारों का प्रशिक्षण स्थल था।<ref name="hindu_mar08" /> उन्होंने कुछ समय के लिए 'चित्रकार्तिका' साप्ताहिक के संपादक के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने 'संगमम थिएटर' नामक एक पेशेवर नाटक मंडली शुरू की, जिसने राज्य के भीतर और बाहर उनके कई प्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया। 1971 में, उन्हें [[केरल संगीत नाटक अकादमी]] का अध्यक्ष और 1974 में केरल राज्य फिल्म विकास निगम का अध्यक्ष नामित किया गया था। उन्होंने अभिनेत्री [[जीनत]] से विवाह किया था, लेकिन बाद में उनका तलाक हो गया। दंपति का एक बेटा जितिन है। उनका निधन 25 मार्च 2008 को [[कोझिकोड]] के पावंगड में हुआ।<ref name="hindu_mar08" /> == चयनित नाटक == * 'ओरुम पेरुम' (नाम और गरिमा वाला व्यक्ति) * 'अवर थीरुमानिक्कुन्नु' (वे निर्णय ले रहे हैं) * 'करावट्टा पशु' (दूध देना बंद करने वाली गाय) * 'मनुष्यन कारगृहथिल' (जेल में मनुष्य) * 'इधु भूमियानु' (यह धरती है) * 'कफ़्फ़ार' * 'अछनुम बप्पायुम' * 'नाल्क्कवला' (चौराहा) * 'नजान पेदिक्कुन्नु' (मैं डर रहा हूँ) * 'पेंडुलम' * 'कलिथोककु' (खिलौना बंदूक) * 'ऑपरेशन थिएटर' * 'सृष्टि' (निर्माण) * 'स्थिति' * 'संहारम' (विनाश) * 'साक्षात्कारम' (पूर्ति) * 'समन्वयम' (मिलन) * 'सनातनम' (शाश्वत) * 'सन्नाहम' * 'वेल्लापोक्कम' (बाढ़) == पुरस्कार == * सर्वश्रेष्ठ [[पटकथा]] के लिए दो बार [[केरल राज्य फिल्म पुरस्कार]]; 'कडलपलम' (1969) और 'अछनुम बप्पायुम' (1972) के लिए। * [[केरल संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप]], 1982।<ref>{{cite web|url=http://www.keralaculture.org/drama-ksna/457|title=केरल संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप: नाटक|publisher=सांस्कृतिक कार्य विभाग, केरल सरकार}}</ref> * [[संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार]], 1986। * बहरीन केरलीय समाजम "साहित्य पुरस्कार", 2005। == संदर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20081011164200/http://www.calicutcity.com/persons/ktmuhammed.htm कालीकटसिटी.कॉम पर के. टी. की जानकारी] {{authority control}} [[श्रेणी:केरल के पटकथा लेखक]] [[श्रेणी:मलयालम लेखक]] [[श्रेणी:भारतीय नाटककार]] [[श्रेणी:1927 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:2008 में निधन]] hxpk4qjgatd5x98ox4klpt3a595e8sf कौसर यज़दानी 0 1610489 6543782 6533402 2026-04-25T07:38:48Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 0 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543782 wikitext text/x-wiki '''कौसर यज़दानी''' (1935 – 29 अगस्त 2011) एक भारतीय इस्लामी विद्वान, लेखक, पत्रकार और कार्यकर्ता थे। वे [[जमात-ए-इस्लामी हिंद]] के दावाह (प्रचार) सचिव थे। उनकी विशेषज्ञता हिंदू धर्मग्रंथों और साहित्य के इस्लामी साहित्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन में थी। वे दिल्ली में रहते थे। जमात से सेवानिवृत्ति के बाद, वे दुर्लभ इस्लामी पांडुलिपियों का हिंदी भाषा में अनुवाद करने में लगे हुए थे। बाद में उन्होंने [[सहीह अल-बुखारी|बुखारी]] का तीन खंडों में अनुवाद किया। वे [[हुसैन अहमद मदनी]] के प्रसिद्ध देवबंदी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। == जीवनी == === प्रारंभिक जीवन और शिक्षा === कौसर यज़दानी का जन्म 1935 में [[उत्तर प्रदेश]] के [[आजमगढ़ जिला|आजमगढ़ जिले]] के कटलपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता पुलिस विभाग में थे और जब वे सातवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने 1955 में शिब्ली कॉलेज से बीए किया। उन्होंने [[शिब्ली कॉलेज]], आजमगढ़ से स्नातक किया और [[आगरा विश्वविद्यालय]] से हिंदी भाषा में स्नातकोत्तर (MA) और डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (PhD) की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने नदवतुल उलेमा, लखनऊ से आलिम प्रमाणन और रामपुर से फ़ज़ीलत भी पूरी की। उनके पीएचडी का विषय "सूफी दर्शन एवं साधना का क्रमिक विकास तथा कुतबन, मंझन एवं जायसी" था।<ref>{{cite journal|url=http://www.radianceweekly.com/193/4980/BJP-STRATEGICALLY-DISTANCES-ITSELF-FROM-HINDUTVA/2010-02-28/Face-to-Face/Story-Detail/039My-pen-has-not-retired039.html|title='My pen has not retired'|author=DR. WAQUAR ANWAR|journal=Radiance Viewsweekly|volume=XLVII|issue=46|date=28 February 2010}}{{Dead link|date=अप्रैल 2026 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> === जमात-ए-इस्लामी हिंद के साथ जुड़ाव और सक्रियता === जब नदवी जमात से जुड़े, तो वे अरबी भाषा नहीं जानते थे।<ref>{{Citation|url=http://www.milligazette.com/Archives/2004/01-15Mar04-Print-Edition/0103200466.htm|title=A towering personality among Muslims|author=Javed Ali|publisher=The Milli Gazette|volume=5|issue=5|date=1–15 Mar 2004}}</ref> लेकिन चूंकि उन्होंने दावाह (प्रचार) का रास्ता चुना, इसलिए उन्होंने अरबी सीखने का फैसला किया और रामपुर में [[मौलाना सलमान कासमी]] से भाषा सीखी। फिर उन्होंने [[दारुल उलूम नदवतुल उलेमा]], [[लखनऊ]] में अरबी और इस्लामी विज्ञान का अध्ययन करने के लिए तीन साल की छुट्टी ली। जमात के तत्कालीन अमीर [[मौलाना अबुल लैस]] ने उन्हें लखनऊ से काम करने की अनुमति दी और आवश्यक छुट्टी प्रदान की। === निधन === यज़दानी का निधन 29 अगस्त 2011 को 75 वर्ष की आयु में हुआ।<ref>{{cite web |title=Kausar Yazdani (1935–2011) |url=https://www.milligazette.com/news/1-community-news/2500-kausar-yazdani-1935-2011/ |website=The Milli Gazette |access-date=18 January 2025 |date=15 October 2011}}</ref> == सन्दर्भ == {{Reflist}} {{Authority control}} {{DEFAULTSORT:यज़दानी, कौसर}} [[श्रेणी:1935 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:2011 में निधन]] [[श्रेणी:भारतीय मुसलमान]] [[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के पत्रकार]] [[श्रेणी:आजमगढ़ जिले के लोग]] [[श्रेणी:धार्मिक अध्ययन के विद्वान]] tiuqsej22y67oihogi8d4yp60fm2r30 क्रिस्टल बयात 0 1610519 6543797 6533575 2026-04-25T09:17:31Z InternetArchiveBot 500600 Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.9.5 6543797 wikitext text/x-wiki {{ख़राब अनुवाद|1=अंग्रेज़ी|date=मार्च 2026}} {{Infobox person | name = क्रिस्टल बयात | image = Crystal Bayat (sq cropped).jpg | alt = | caption = 2020 में दोहा शांति समझौते की खामियों पर आपत्ति जताते हुए साक्षात्कार देती क्रिस्टल बयात | native_name = {{lang|prs|کریستال بیات}} | birth_name = <!-- केवल तभी उपयोग करें यदि नाम से भिन्न हो --> | birth_date = {{birth date and age|1997|1|16|df=y}} | birth_place = [[काबुल]], [[अफ़ग़ानिस्तान]] | alma_mater = [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] | nationality = <!-- केवल आवश्यक होने पर ही उपयोग करें --> | other_names = | occupation = अफ़गान महिलाओं, शिक्षा और अल्पसंख्यकों के लिए सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकारवादी; सभी अफ़गान नागरिकों के लिए समान न्याय की समर्थक। | years_active = | known_for = | notable_works = }} '''क्रिस्टल बयात''' ({{langx|prs|کریستال بیات}}; जन्म 1997) एक अफ़गान सामाजिक कार्यकर्ता और [[मानवाधिकार]] अधिवक्ता हैं। वह [[तालिबान का कब्जा|तालिबान के कब्जे]] के खिलाफ अपने विरोध प्रदर्शनों और अफ़ग़ानिस्तान के भीतर और बाहर [[महिला अधिकार|महिलाओं के अधिकारों]] एवं राजनीतिक सक्रियता के लिए जानी जाती हैं। वह वर्तमान में बदलाव की एक प्रतिनिधि के रूप में अफ़गान मानवाधिकार उपलब्धियों को बनाए रखने की लड़ाई जारी रखे हुए हैं।<ref>{{Cite web |date=August 20, 2021 |first=Pooja |last=Shali |title=Afghanistan and its people have changed, so should Taliban: Afghan activist seen in viral protest pics |url=https://www.indiatoday.in/world/story/afghanistan-its-people-have-changed-so-should-taliban-afghan-activist-crystal-bayat-interview-1843457-2021-08-20 |access-date=2022-04-12 |website=India Today |language=en}}</ref> == प्रारंभिक जीवन == बयात का जन्म 1997 में [[काबुल]] में हुआ था। वह मूल रूप से [[गज़नी प्रांत]] की रहने वाली हैं और [[बयात (जनजाति)|बयात]] जनजाति की सदस्य हैं, जो एक [[तुर्क लोग|तुर्क]] जातीय अल्पसंख्यक है।<ref name=":1">{{Cite web|last=Vincent|first=Pheroze L.|date=26 August 2021|title=Face of anti-Taliban resistance cut her teeth in activism at DU|url=https://www.telegraphindia.com/india/afghanistan-crystal-bayats-vibrant-past-in-delhi-university/cid/1828015|url-status=live|access-date=2021-08-29|website=Telegraph India|archive-url=https://web.archive.org/web/20210826000738/https://www.telegraphindia.com/india/afghanistan-crystal-bayats-vibrant-past-in-delhi-university/cid/1828015 |archive-date=2021-08-26 }}</ref> उनकी मां एक [[स्त्री रोग विशेषज्ञ]] थीं और उनके पिता [[गणराज्य के पतन (2021)]] से पहले [[आंतरिक मंत्रालय (अफ़ग़ानिस्तान)|आंतरिक मंत्रालय]] में काम करते थे।<ref name=":0">{{Cite web|last=Tripathi|first=Sumedha|date=2021-08-24|title=A 24-Year-Old DU Graduate Is Leading The Way For Women Rights By Protesting Against Taliban|url=https://www.indiatimes.com/trending/human-interest/afghan-graduate-from-du-leads-protests-for-women-rights-547866.html|url-status=live|access-date=2021-08-29|website=IndiaTimes|language=en-IN|archive-url=https://web.archive.org/web/20210824131835/https://www.indiatimes.com/trending/human-interest/afghan-graduate-from-du-leads-protests-for-women-rights-547866.html |archive-date=2021-08-24 }}</ref> == सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में योगदान == भारत में पढ़ाई पूरी कर 2020 में अफ़ग़ानिस्तान लौटने के बाद, बयात ने नागरिक अधिकारों के लिए एक राजनीतिक थिंक टैंक 'जस्टिस एंड इक्वालिटी ट्रेंड' और 'क्रिस्टल बयात फाउंडेशन' की शुरुआत की, जो जोखिम में पड़े अफ़गान लोगों की मदद करने वाला एक मानवाधिकार चैरिटी फाउंडेशन है।<ref name=":1" /> अगस्त 2021 के मध्य में तालिबान द्वारा काबुल पर कब्जा करने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने काबुल के स्वतंत्रता दिवस विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने में मदद की। लगभग 200 लोगों के विरोध प्रदर्शन में सात महिलाओं में से एक के रूप में, उन्होंने भीड़ का नेतृत्व किया और नारे लगाए, "हमारा झंडा हमारी पहचान है!"<ref>{{Cite news |last=Bryon |first=Jordan |last2=Cott |first2=Emma |last3=Laffin |first3=Ben |date=2021-08-20 |title=Risking retaliation, an Afghan woman uses the national flag to protest the Taliban. |language=en-US |work=The New York Times |url=https://www.nytimes.com/live/2021/08/21/world/biden-taliban-afghanistan |access-date=2021-11-16 |issn=0362-4331}}</ref> बयात अपनी इस राय पर अडिग हैं कि तालिबान अभी भी "अफ़गान नागरिकों, विशेष रूप से महिलाओं की स्वतंत्रता और मांगों में विश्वास नहीं करता है, और उन्हें जवाबदेह ठहराने के लिए किसी ने भी ईमानदार प्रयास नहीं किया है।"<ref>{{Cite news |last=Bhandari |first=Hemani |date=2021-08-24 |title=DU graduate who led protests in Afghanistan uncertain of future |language=en-IN |work=The Hindu |url=https://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/du-graduate-who-led-protests-in-afghanistan-uncertain-of-future/article36069355.ece |access-date=2023-01-04 |issn=0971-751X}}</ref> बयात वर्तमान में [[तालिबान]] के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय हैं और चेतावनी देती हैं कि वे "बदले नहीं हैं।" अपनी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के तहत, बयात ने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए "बयात हमारी पहचान है और हमारी पहचान हमारा गौरव है" अभियान शुरू किया। पूर्व अफ़गान राष्ट्रपति [[मोहम्मद अशरफ गनी]] को एक पत्र लिखने के बाद,<ref>[https://subhekabul.com/%d8%ac%d8%a7%d9%85%d8%b9%d9%87/cyristal-bayat-letter-to-president/ नामه‌ی کریستال بیات به رییس‌جمهور]</ref> वह राष्ट्रीय पहचान पत्रों (ID cards) में अल्पसंख्यक जातीय नाम दर्ज करवाने में सफल रहीं, जो उनके लिए एक बड़ी राष्ट्रव्यापी उपलब्धि थी। वह तालिबान और पूर्व सरकार के बीच [[दोहा]], कतर में हुई शांति वार्ताओं में अल्पसंख्यकों की प्रतिनिधि भी थीं।<ref>{{Cite web |last=صبح |first=هشت |date=2020-04-23 |title=منشور طالبان و مطالبه ما از میز صلح |url=https://8am.af/the-taliban-charter-and-our-demand-for-a-peace-table/ |access-date=2022-07-07 |website=روزنامه ۸صبح |language=fa-IR |archive-date=7 July 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20220707181013/https://8am.af/the-taliban-charter-and-our-demand-for-a-peace-table/ |url-status=dead }}</ref> वह अफ़ग़ानिस्तान की पारंपरिक भव्य सभा 'लोया जिरगा' की सदस्य भी रहीं। शांति वार्ताओं में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण 2020 में बयात पर तालिबान द्वारा जानलेवा हमला किया गया था, जिसमें वह बाल-बाल बच गईं। उन्होंने तालिबान के साथ शांति वार्ता के दौरान महिलाओं के अधिकारों पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया (फ़ारसी और अंग्रेजी में) में कई लेख प्रकाशित किए हैं। 2020 में, अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने को मजबूर होने से पहले, बयात ने अपनी दोस्त फरीहा के साथ मिलकर एक अभियान [https://8am.af/menstruation-from-the-campaign-to-the-national-discourse-and-program/ #MenstrationIsNotTaboo] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20210820194238/https://8am.af/menstruation-from-the-campaign-to-the-national-discourse-and-program/ |date=20 अगस्त 2021 }} (मासिक धर्म वर्जना नहीं है) भी शुरू किया था। बयात अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति के बारे में मीडिया और सार्वजनिक एवं निजी कार्यक्रमों में अपनी बात रखना जारी रखती हैं। वह दोस्तों, परिवार और शैक्षणिक सहयोगियों को तालिबान के अमानवीय व्यवहार और खराब शासन के खिलाफ एक सामूहिक आवाज उठाने में मदद करने में भी सक्रिय हैं। == शिक्षा == [[हाई स्कूल]] स्नातक होने के बाद, बयात ने पूरे अफ़ग़ानिस्तान के तीन लाख छात्रों में से 'कनकोर परीक्षा' (Kankor examination) में पांचवां स्थान प्राप्त किया था। [[काबुल विश्वविद्यालय]] के विधि संकाय (Faculty of Law) में प्रवेश के बाद, बयात को 'भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद' ([[भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद|ICCR]]) से छात्रवृत्ति मिली। वह दिल्ली के [[दौलत राम कॉलेज]] में शामिल हुईं और 2019 में राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी के साथ प्राप्त की।<ref>{{Cite web |last=Sadhwani |first=Garima |date=2021-08-27 |title=Survival in Afghanistan is really difficult: Afghan social activist Crystal Bayat |url=https://www.nationalheraldindia.com/international/survival-in-afghanistan-is-really-difficult-afghan-social-activist-crystal-bayat |access-date=2021-08-29 |website=National Herald |language=en}}</ref> उनके पास दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र संस्थान से मास्टर डिग्री भी है।<ref name=":0" /> 2021 में, बयात ने [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] में 'पॉलिटिकल मैनेजमेंट' में पीएचडी शुरू की; हालाँकि, तालिबान के कब्जे के कारण उनका कार्यक्रम बीच में ही रुक गया। बयात को [[पिट्सबर्ग, पेंसिल्वेनिया]] में स्थित [[कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी]] के 'हेंज कॉलेज मास्टर्स ऑफ पब्लिक पॉलिसी' कार्यक्रम में प्रवेश मिला है। == पुरस्कार और मान्यता == 2020 में, बयात को "साहित्य श्रेणी" में रूमी पुरस्कार (द्वितीय स्थान) मिला और रूमी पुरस्कार आयोजकों द्वारा उन्हें 50 प्रभावशाली महिलाओं में से एक के रूप में नामित किया गया। अल्पसंख्यक अधिकार विधेयक पारित करने में उनकी सक्रियता के लिए 2020 की शुरुआत में पूर्व अफ़गान राष्ट्रपति और संसद द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया था।<ref>{{Cite web |last=McCoy |first=Makenna |date=2023-07-10 |title=IWF Welcomes Crystal Bayat as a Visiting Fellow |url=https://www.iwf.org/2023/07/10/iwf-welcomes-crystal-bayat-as-a-visiting-fellow/ |access-date=2024-04-25 |website=Independent Women's Forum |language=en}}</ref> 7 दिसंबर 2021 को, क्रिस्टल बयात को उनकी सामाजिक सक्रियता और मानवाधिकार वकालत के लिए [[बीबीसी 100 महिला|बीबीसी 100 महिला 2021]] की सूची में नामित किया गया था।<ref>{{Cite news |date=2021-12-07 |title=BBC 100 Women 2021: Who is on the list this year? |language=en-GB |work=BBC News |url=https://www.bbc.com/news/world-59514598 |access-date=2021-12-07}}</ref> == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == *{{Cite web |title=एक दशक का गंभीर और निरंतर कार्य |url=https://madanyatdaily.com/9-1718/}} *{{Cite web |last=jomhornews.com |date=2020-05-03 |title=جمهور - مشارکت اقوام را نادیده نگیرید! |url=http://jomhornews.com/fa/article/127512/ |access-date=2022-07-07 |website=خبرگزاری جمهور |language=fa}} *{{Cite web |url=https://www.aleph-tech.it/magazine/tag/thegirlwiththeafghanflag/|title=Crystal Bayat, 24 anni, la ragazza con la bandiera afghana|date=2021-10-23|website=ALEPH & OTHER Tales|language=it}} {{Authority control}} [[श्रेणी:बयात जनजाति के लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:अफ़गान मानवाधिकार कार्यकर्ता]] [[श्रेणी:अफ़गान महिला कार्यकर्ता]] [[श्रेणी:दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र]] [[श्रेणी:काबुल के कार्यकर्ता]] [[श्रेणी:1997 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:बीबीसी 100 महिला]] 1nom4vdbkdo69n033vrv2189lgl3hyb विकिपीडिया:आँकड़े/2026/अप्रैल 4 1610671 6543607 6543367 2026-04-24T12:14:19Z NeechalBOT 98381 statistics 6543607 wikitext text/x-wiki <!--- stats starts--->{{सदस्य:Neechalkaran/statnotice}}{| class="wikitable sortable" style="width:90%" |- ! Date(Time) ! Pages ! Articles ! Edits ! Users ! Files ! Activeusers {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =1-4-2026 6:14 |Pages = 1386987 |dPages = -1 |Articles = 168842 |dArticles = 20 |Edits = 6521355 |dEdits = 305 |Files = 4663 |dFiles = -1 |Users = 898113 |dUsers = 186 |Ausers = 970 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =2-4-2026 6:14 |Pages = 1387020 |dPages = 33 |Articles = 168862 |dArticles = 20 |Edits = 6521679 |dEdits = 324 |Files = 4663 |dFiles = 0 |Users = 898323 |dUsers = 210 |Ausers = 970 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =3-4-2026 6:14 |Pages = 1387050 |dPages = 30 |Articles = 168873 |dArticles = 11 |Edits = 6522057 |dEdits = 378 |Files = 4663 |dFiles = 0 |Users = 898538 |dUsers = 215 |Ausers = 970 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =4-4-2026 6:14 |Pages = 1387101 |dPages = 51 |Articles = 168895 |dArticles = 22 |Edits = 6522480 |dEdits = 423 |Files = 4663 |dFiles = 0 |Users = 898714 |dUsers = 176 |Ausers = 989 |dAusers = 19 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =5-4-2026 6:14 |Pages = 1387117 |dPages = 16 |Articles = 168902 |dArticles = 7 |Edits = 6522796 |dEdits = 316 |Files = 4663 |dFiles = 0 |Users = 898890 |dUsers = 176 |Ausers = 989 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =6-4-2026 6:14 |Pages = 1387148 |dPages = 31 |Articles = 168916 |dArticles = 14 |Edits = 6523186 |dEdits = 390 |Files = 4664 |dFiles = 1 |Users = 899050 |dUsers = 160 |Ausers = 989 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =7-4-2026 6:14 |Pages = 1387181 |dPages = 33 |Articles = 168934 |dArticles = 18 |Edits = 6523614 |dEdits = 428 |Files = 4664 |dFiles = 0 |Users = 899201 |dUsers = 151 |Ausers = 1010 |dAusers = 21 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =8-4-2026 6:14 |Pages = 1387197 |dPages = 16 |Articles = 168940 |dArticles = 6 |Edits = 6523862 |dEdits = 248 |Files = 4664 |dFiles = 0 |Users = 899354 |dUsers = 153 |Ausers = 1010 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =9-4-2026 6:14 |Pages = 1387229 |dPages = 32 |Articles = 168959 |dArticles = 19 |Edits = 6524300 |dEdits = 438 |Files = 4664 |dFiles = 0 |Users = 899516 |dUsers = 162 |Ausers = 1010 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =10-4-2026 6:14 |Pages = 1387259 |dPages = 30 |Articles = 168970 |dArticles = 11 |Edits = 6524620 |dEdits = 320 |Files = 4665 |dFiles = 1 |Users = 899670 |dUsers = 154 |Ausers = 1010 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =11-4-2026 6:14 |Pages = 1387307 |dPages = 48 |Articles = 168993 |dArticles = 23 |Edits = 6525065 |dEdits = 445 |Files = 4666 |dFiles = 1 |Users = 899822 |dUsers = 152 |Ausers = 1023 |dAusers = 13 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =12-4-2026 6:14 |Pages = 1387325 |dPages = 18 |Articles = 169000 |dArticles = 7 |Edits = 6525487 |dEdits = 422 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 899967 |dUsers = 145 |Ausers = 1023 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =13-4-2026 6:14 |Pages = 1387369 |dPages = 44 |Articles = 169021 |dArticles = 21 |Edits = 6525834 |dEdits = 347 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900122 |dUsers = 155 |Ausers = 1023 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =14-4-2026 6:14 |Pages = 1387429 |dPages = 60 |Articles = 169056 |dArticles = 35 |Edits = 6526601 |dEdits = 767 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900268 |dUsers = 146 |Ausers = 1013 |dAusers = -10 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =15-4-2026 6:14 |Pages = 1387467 |dPages = 38 |Articles = 169071 |dArticles = 15 |Edits = 6527158 |dEdits = 557 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900419 |dUsers = 151 |Ausers = 1013 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =16-4-2026 6:14 |Pages = 1387476 |dPages = 9 |Articles = 169071 |dArticles = 0 |Edits = 6527486 |dEdits = 328 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900578 |dUsers = 159 |Ausers = 1013 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =17-4-2026 6:14 |Pages = 1387522 |dPages = 46 |Articles = 169088 |dArticles = 17 |Edits = 6527827 |dEdits = 341 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900694 |dUsers = 116 |Ausers = 1033 |dAusers = 20 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =18-4-2026 6:14 |Pages = 1387547 |dPages = 25 |Articles = 169097 |dArticles = 9 |Edits = 6528053 |dEdits = 226 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900801 |dUsers = 107 |Ausers = 1033 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =19-4-2026 6:14 |Pages = 1387580 |dPages = 33 |Articles = 169111 |dArticles = 14 |Edits = 6528386 |dEdits = 333 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 900918 |dUsers = 117 |Ausers = 1033 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =20-4-2026 6:14 |Pages = 1387611 |dPages = 31 |Articles = 169123 |dArticles = 12 |Edits = 6528703 |dEdits = 317 |Files = 4666 |dFiles = 0 |Users = 901045 |dUsers = 127 |Ausers = 1048 |dAusers = 15 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =21-4-2026 6:14 |Pages = 1387600 |dPages = -11 |Articles = 169109 |dArticles = -14 |Edits = 6528971 |dEdits = 268 |Files = 4667 |dFiles = 1 |Users = 901169 |dUsers = 124 |Ausers = 1048 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =22-4-2026 6:14 |Pages = 1387654 |dPages = 54 |Articles = 169136 |dArticles = 27 |Edits = 6529354 |dEdits = 383 |Files = 4670 |dFiles = 3 |Users = 901285 |dUsers = 116 |Ausers = 1043 |dAusers = -5 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =23-4-2026 6:14 |Pages = 1387670 |dPages = 16 |Articles = 169145 |dArticles = 9 |Edits = 6529600 |dEdits = 246 |Files = 4670 |dFiles = 0 |Users = 901394 |dUsers = 109 |Ausers = 1043 |dAusers = 0 }} {{User:Neechalkaran/template/daily |Date =24-4-2026 6:14 |Pages = 1387710 |dPages = 40 |Articles = 169160 |dArticles = 15 |Edits = 6529836 |dEdits = 236 |Files = 4673 |dFiles = 3 |Users = 901503 |dUsers = 109 |Ausers = 1043 |dAusers = 0 }} <!---Place new stats here---> |} <!--- stats ends---> 92rbzd3va80x06azaklbkehv46qv4is भारत का स्वर्णयुग 0 1611051 6543858 6538974 2026-04-25T11:53:34Z Sanjeev bot 127039 Sanjeev bot ने अनुप्रेषण छोड़े बिना पृष्ठ [[सदस्य:AkhilUmrao/प्रयोगपृष्ठ]] को [[भारत का स्वर्णयुग]] पर स्थानांतरित किया: बॉट: पृष्ठ स्थानांतरित किया 6538974 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[नियम आधारित मशीन अनुवाद]] __स्थिर_पुनर्प्रेषण__ rtvn0sz2ftqr38nnr02ko4yeh9q6xyi 6543859 6543858 2026-04-25T11:54:55Z ~2026-21496-92 919279 अनुप्रेषण का लक्ष्य [[नियम आधारित मशीन अनुवाद]] से [[भारत के स्वर्णयुग]] में बदला 6543859 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[भारत के स्वर्णयुग]] __स्थिर_पुनर्प्रेषण__ phltcwm1b0elc8b0fijtylvn4n42bur स्पाइडर-मैन अनलिमिटेड (वीडियो गेम) 0 1611315 6543672 6541698 2026-04-24T17:06:08Z आयुष दास 912224 छोटी सी जानकारी जोड़ी गई। 6543672 wikitext text/x-wiki {{सफाई|reason=अत्यधिक खराब मशीनी अनुवाद। इसमें 'जनाज़ा', 'तनक़ीद' जैसे अनुचित शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिसे मानक हिंदी में सुधारने की आवश्यकता है।|date=अप्रैल 2026}} {{ज्ञानसन्दूक विडियो गेम | title = स्पाइडर-मैन अनलिमिटेड | developer = [[Gameloft Barcelona]] | publisher = [[Gameloft]] | platforms = [[Android (operating system)|एंड्रॉयड]], [[आइओएस]], [[विंडोज़ फोन]] | released = {{Video game release|WW|सितंबर 10, 2014}} | genre = [[एंडलेस रनर]] | modes = [[Single-player video game|एकल-खिलाड़ी]] | image = [[File:Spider-Man Unlimited.png|Spider-Man_Unlimited]] | caption = गेम का लोगो }}'''''[[स्पाइडर-मैन]] अनलिमिटेड''''' एक एंडलेस रनर गेम है जिसे Gameloft Barcelona के ज़रिये तैयार किया गया है और Gameloft के ज़रिये जारी किया गया है। यह [[मार्वल कॉमिक्स]] के [[सुपर हीरो|सुपरहीरो]] स्पाइडर-मैन पर आधारित है। प्लेयर सिनिस्टर सिक्स के सदस्यों और उनके मल्टीवर्स समकक्षों के विरुद्ध अपनी लड़ाई के दौरान टाइटल पर ज़िकर किए गए किरदार और उसके वैकल्पिक वर्ज़न को क़ाबू करता है। गेम के मुख्य मोड में जहां तक मुमकिन हो दौड़ने के रिवायती मक़सद के विपरीत निश्चित हदफ़ होते हैं। यह गेम रेगुलर, विशेष, समय-सीमित, सामुदायिक ईवेंट के लिए भी जाना जाता था। जून 2014 में ऐलान, ''स्पाइडर-मैन अनलिमिटेड'' को 10 सितंबर 2014 को एंड्रॉइड, [[आईओएस]] और [[विंडोज़ फोन|विंडोज फोन]] के लिए जारी किया गया था। अक्टूबर 2014 में शुरू करते हुए, गेमलोफ्ट ने कई अपडेट रिलीज़ किए, जिसमें कहानी मोड, स्पाइडर-मेन और स्पाइडर-वुमन, दुश्मनों, ईवेंट और चरणों में अध्याय जोड़े गए। मार्च 2019 में इस गेम को बंद कर दिया गया था। इसे 30 मिलियन बार डाउनलोड किया गया है और गेमिंग आलोचकों के ज़रिये अच्छी जनाज़ा हासिल किया। समीक्षकों ने गेम के कंट्रोल, आवाज़, एनिमेशन और किरदारों की विविधता की तारीफ़ की, जबकि इसकी ऊर्जा के निज़ाम की तनक़ीद की, जिसे वे इसकी खेलने की क़ाबिलियत की हद मानते थे। == प्लॉट == स्पाइडर-मैन के ज़रिये गोल्ड गोब्लिन के तौर पर जानी जाने वाली एक आकृति को हराने के बाद, निक फ्यूरी उसे बताता है कि ग्रीन गोब्लिन ने एक मल्टीवर्स सिनिस्टर सिक्स को इकट्ठा करने के लिए एक पोर्टल का इस्तेमाल किया है और स्पाइडर -मैन के आयाम को लेने का इरादा बना रहा है। S.H.I.E.L.D. ने जंग में सहायता के लिए स्पाइडर-मैन और स्पाइडर-गर्ल, स्पाइडर-हैम और स्पाइडर-मैन 2099 जैसे दूसरे स्पाइडर-संचालित हीरो के वैकल्पिक वर्ज़न को इकट्ठा करने के लिए पोर्टल का इस्तेमाल किया। स्पाइडर-मैन ग्रीन गोब्लिन और उसके वैकल्पिक वर्ज़न का पीछा करता है। वैकल्पिक गोब्लिंस को हराने के बाद, स्पाइडर-मैन गिद्ध, इलेक्ट्रो, सैंडमैन, डॉक्टर ऑक्टोपस और मिस्टीरियो के विभिन्न वर्ज़न के साथ-साथ मल्टीवर्स सिनिस्टर सिक्स के लिए काम करने वाले सिनिस्टर सोल्जर्स-आरमर्ड फ़ौजियों से लड़ता है। [[श्रेणी:Pages with unreviewed translations]] 7lo5l6t967vcipe9pa9xl40r29q21db विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/अफसर बानो 4 1611363 6543616 6542049 2026-04-24T13:33:08Z Khushi200 920506 6543616 wikitext text/x-wiki === [[:अफसर बानो]] === {{हहेच श्रेणीकरण|वर्तमान=हाँ|प्रकार=लेख|तिथि=अप्रैल 2026}} :{{la|1=अफसर बानो}} :{{गूगल|खोज|समाचार|पुस्तक|विद्वान|अफसर बानो -विकिपीडिया -wikipedia}} नामांकन के लिये कारण: उल्लेखनीय नहीं। <span style="color:green;">☆★</span>[[user:संजीव कुमार|<u><span style="color:Magenta;">संजीव कुमार</span></u>]] ([[User talk:संजीव कुमार|<span style="color:blue;">✉✉</span>]]) 04:16, 19 अप्रैल 2026 (UTC) * हटाने का {{समर्थन}} [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 05:37, 19 अप्रैल 2026 (UTC) * हटाने का {{समर्थन}} [[सदस्य:Khushi200|<span style="color:#8B0000;font-family:Georgia;font-size:105%;"><b>OhNoItsKhushi</b></span>]] <sup>[[सदस्य वार्ता:Khushi200|<span style="color:#1E90FF;">✦ वार्ता ✦</span>]]</sup> 13:32, 24 अप्रैल 2026 (UTC) g8hkl1nt7ul2w82273qnhu6yikmqppl अल जाहिली क़िला 0 1611377 6543805 6542474 2026-04-25T09:54:56Z The Sorter 845290 Created by translating the section "Architecture" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1335790403|Al Jahili Fort]]" 6543805 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक सैन्य निर्माण|name=अल जाहिली क़िला|native_name={{lang|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}|location=[[अल ऐन]], [[अबू धाबी अमीरात|अबू धाबी]], [[संयुक्त अरब अमीरात]]|coordinates={{coord|24|12|58|N|55|45|9|E|region:AE|display=inline,title}}|map_type=UAE#Persian Gulf#West Asia|map_alt=|map_size=265|map_caption=UAE में अवस्थिति|image=Entrance Up Close.jpg|image_size=|caption=अल जाहिली क़िले का प्रवेश|type=|built={{circa}} 1891|builder=|materials=|height=|used=|demolished=|condition=बहाल|ownership=|controlledby=|garrison=|commanders=|occupants=|battles=|events=}} '''अल जाहिली क़िला''' ({{Langx|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}) [[संयुक्त अरब अमीरात]] के [[अल ऐन]] शहर में स्थित 19वीं शताब्दी का क़िला है। इसे 1891 को शेख़ [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नहयान]] के आदेश पर खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था। 1955 में यह [[संधि ओमान स्काउट्स]] का एक अड्डा था। 1971 से, यह अल ऐन का एक पर्यटक स्थल है। == इतिहास == इस क़िले को 1891 में अल जाहिली मरूद्यान के निकट खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> 1955 में, यह संधि ओमान स्काउट्स का एक अड्डा था। क़िले का प्रयोग दूसरे गाँवों में ऊँटों के माध्यम से चिकित्सा और अन्य सामान बाँटने के लिए किया जाता था। 1957 को क़िले में एक सैन्य बैंड स्थापित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.thenationalnews.com/arts/a-return-legacy-of-trucial-oman-scouts-on-show-in-al-ain-1.672845|title=A return: legacy of Trucial Oman Scouts on show in Al Ain|last=Dennehy|first=John|date=4 November 2017|publisher=The National}}</ref> 1905 में अल ऐन के दौरा समय [[पर्सी कॉक्स]] अल जाहिली गए थे। 1906 को, [[जॉन गोर्डन लोरिमर]] ने कहा कि क़िले को [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नाहयान]] के शासनकाल में निर्मित किया गया था।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले को मध्य दशक 1980 में बहाल किया गया था। 2007–2008 इसकी एक और बहाली हुई, जिसमें प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु दुकानें, कैफ़े और चौक जैसे नई संरचनाएँ डाली गई थी। भविष्य में अल ऐन के पर्यटन उद्योग में बड़ी भूमिका प्राप्त करने के लिए इस क़िले को फिर से बहाल किया जाएगा।<ref>{{cite news|url=http://www.alittihad.ae/mobile/details.php?id=101963&y=2011|date=3 November 2011|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al-Ittihad (Emirati newspaper)|Al-Ittihad]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي تروي «قصة العين»}}</ref> [[श्रेणी:संयुक्त अरब अमीरात]] == अवस्थिति == क़िला अल ऐन के दक्षिणी भाग में [[शेख़ ज़ायद महल संगहालय]] के निकट स्थित है। वहाँ जलस्रोत और कृषि भूमि है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> == वास्तुकला == [[File:Al_Jahili_Fort_by_night.jpg|अंगूठाकार|रात को अल जाहिली क़िला]] [[मज़यद]] क़िले के समरूप,<ref name="GulfNews 05-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=Mezyad Fort stands tall in the foothills of Jebel Hafeet|last=Kazmi|first=Aftab|date=2013-05-23|work=[[Gulf News]]|access-date=2019-03-04}}</ref> अल जाहिली क़िला अल ऐन के सबसे बड़े क़िलों में से एक है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> इसका निर्माण 1981 को शुरू किया गया था। यह एक परिसर का भाग है, जिसमें एक चौक भी शामिल है। क़िला चौकोर, {{convert|118|m|ft|abbr=off}} लंबा और {{convert|8|m|ft|abbr=off}} ऊँचा है। ऊपर में त्रिकोणीय छज्जे हैं। पश्चिमोत्तर कोने पर इसके तीन गोल और एक चौकोर [[संतरी बुर्ज]] है। गोल बुर्जों का व्यास {{convert|5|m|ft|abbr=off}} और ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है, जबकि चौकोर वाले की चौड़ाई और लंबाई {{convert|4|and|7|m|ft|abbr=off}}, तथा ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है। चौकोर बुर्ज को अधिक शक्तिशाली माना जाता है।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले की दीवारों के बाहर एक एतिहासिक मस्जिद है। 0v6z1ulbpy0ns0gf5r4vypj2140n9wh 6543806 6543805 2026-04-25T09:59:34Z The Sorter 845290 Created by translating the section "Replica" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1335790403|Al Jahili Fort]]" 6543806 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक सैन्य निर्माण|name=अल जाहिली क़िला|native_name={{lang|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}|location=[[अल ऐन]], [[अबू धाबी अमीरात|अबू धाबी]], [[संयुक्त अरब अमीरात]]|coordinates={{coord|24|12|58|N|55|45|9|E|region:AE|display=inline,title}}|map_type=UAE#Persian Gulf#West Asia|map_alt=|map_size=265|map_caption=UAE में अवस्थिति|image=Entrance Up Close.jpg|image_size=|caption=अल जाहिली क़िले का प्रवेश|type=|built={{circa}} 1891|builder=|materials=|height=|used=|demolished=|condition=बहाल|ownership=|controlledby=|garrison=|commanders=|occupants=|battles=|events=}} '''अल जाहिली क़िला''' ({{Langx|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}) [[संयुक्त अरब अमीरात]] के [[अल ऐन]] शहर में स्थित 19वीं शताब्दी का क़िला है। इसे 1891 को शेख़ [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नहयान]] के आदेश पर खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था। 1955 में यह [[संधि ओमान स्काउट्स]] का एक अड्डा था। 1971 से, यह अल ऐन का एक पर्यटक स्थल है। == इतिहास == इस क़िले को 1891 में अल जाहिली मरूद्यान के निकट खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> 1955 में, यह संधि ओमान स्काउट्स का एक अड्डा था। क़िले का प्रयोग दूसरे गाँवों में ऊँटों के माध्यम से चिकित्सा और अन्य सामान बाँटने के लिए किया जाता था। 1957 को क़िले में एक सैन्य बैंड स्थापित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.thenationalnews.com/arts/a-return-legacy-of-trucial-oman-scouts-on-show-in-al-ain-1.672845|title=A return: legacy of Trucial Oman Scouts on show in Al Ain|last=Dennehy|first=John|date=4 November 2017|publisher=The National}}</ref> 1905 में अल ऐन के दौरा समय [[पर्सी कॉक्स]] अल जाहिली गए थे। 1906 को, [[जॉन गोर्डन लोरिमर]] ने कहा कि क़िले को [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नाहयान]] के शासनकाल में निर्मित किया गया था।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले को मध्य दशक 1980 में बहाल किया गया था। 2007–2008 इसकी एक और बहाली हुई, जिसमें प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु दुकानें, कैफ़े और चौक जैसे नई संरचनाएँ डाली गई थी। भविष्य में अल ऐन के पर्यटन उद्योग में बड़ी भूमिका प्राप्त करने के लिए इस क़िले को फिर से बहाल किया जाएगा।<ref>{{cite news|url=http://www.alittihad.ae/mobile/details.php?id=101963&y=2011|date=3 November 2011|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al-Ittihad (Emirati newspaper)|Al-Ittihad]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي تروي «قصة العين»}}</ref> [[श्रेणी:संयुक्त अरब अमीरात]] == अवस्थिति == क़िला अल ऐन के दक्षिणी भाग में [[शेख़ ज़ायद महल संगहालय]] के निकट स्थित है। वहाँ जलस्रोत और कृषि भूमि है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> == वास्तुकला == [[File:Al_Jahili_Fort_by_night.jpg|अंगूठाकार|रात को अल जाहिली क़िला]] [[मज़यद]] क़िले के समरूप,<ref name="GulfNews 05-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=Mezyad Fort stands tall in the foothills of Jebel Hafeet|last=Kazmi|first=Aftab|date=2013-05-23|work=[[Gulf News]]|access-date=2019-03-04}}</ref> अल जाहिली क़िला अल ऐन के सबसे बड़े क़िलों में से एक है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> इसका निर्माण 1981 को शुरू किया गया था। यह एक परिसर का भाग है, जिसमें एक चौक भी शामिल है। क़िला चौकोर, {{convert|118|m|ft|abbr=off}} लंबा और {{convert|8|m|ft|abbr=off}} ऊँचा है। ऊपर में त्रिकोणीय छज्जे हैं। पश्चिमोत्तर कोने पर इसके तीन गोल और एक चौकोर [[संतरी बुर्ज]] है। गोल बुर्जों का व्यास {{convert|5|m|ft|abbr=off}} और ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है, जबकि चौकोर वाले की चौड़ाई और लंबाई {{convert|4|and|7|m|ft|abbr=off}}, तथा ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है। चौकोर बुर्ज को अधिक शक्तिशाली माना जाता है।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले की दीवारों के बाहर एक एतिहासिक मस्जिद है। == अनुकृति == [[पाकिस्तान]] की [[स्वात घाटी]] के [[ज़ाहा हदीद|शेख़ ज़ायद सेतु]] के बग़ल में अल जाहिली क़िला की एक छोटी अनुकृति स्थित है। अनुकृति और सेतु का उद्घाटन अप्रैल 2013 को हुआ।<ref name="GulfNewsl 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/shaikh-zayed-bin-sultan-al-nahyan-bridge-inaugurated-in-pakistan-1.1169996|title=Shaikh Zayed Bin Sultan Al Nahyan Bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-13|work=[[Emirates News Agency|WAM]]|access-date=2020-01-03|publisher=[[Gulf News]]}}</ref><ref name="TheNational 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=In pictures: Sheikh Zayed bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-14|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref><ref name="TheNational 01-2020">{{Cite news|url=https://www.thenationalnews.com/uae/government/uae-pakistan-ties-are-as-old-as-the-emirates-1.958985|title=UAE-Pakistan ties are as old as the Emirates|last=Duncan|first=Gillian|date=2020-01-02|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref> 8fakjppnz7oz343nafw55m0l9ybea48 6543807 6543806 2026-04-25T10:03:22Z The Sorter 845290 6543807 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक सैन्य निर्माण|name=अल जाहिली क़िला|native_name={{lang|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}|location=[[अल ऐन]], [[अबू धाबी अमीरात|अबू धाबी]], [[संयुक्त अरब अमीरात]]|coordinates={{coord|24|12|58|N|55|45|9|E|region:AE|display=inline,title}}|map_type=UAE#Persian Gulf#West Asia|map_alt=|map_size=265|map_caption=UAE में अवस्थिति|image=Entrance Up Close.jpg|image_size=|caption=अल जाहिली क़िले का प्रवेश|type=|built={{circa}} 1891|builder=|materials=|height=|used=|demolished=|condition=बहाल|ownership=|controlledby=|garrison=|commanders=|occupants=|battles=|events=}} '''अल जाहिली क़िला''' ({{Langx|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}) [[संयुक्त अरब अमीरात]] के [[अल ऐन]] शहर में स्थित 19वीं शताब्दी का क़िला है। इसे 1891 को शेख़ [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नहयान]] के आदेश पर खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था। 1955 में यह [[संधि ओमान स्काउट्स]] का एक अड्डा था। 1971 से, यह अल ऐन का एक पर्यटक स्थल है। == इतिहास == इस क़िले को 1891 में अल जाहिली मरूद्यान के निकट खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> 1955 में, यह संधि ओमान स्काउट्स का एक अड्डा था। क़िले का प्रयोग दूसरे गाँवों में ऊँटों के माध्यम से चिकित्सा और अन्य सामान बाँटने के लिए किया जाता था। 1957 को क़िले में एक सैन्य बैंड स्थापित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.thenationalnews.com/arts/a-return-legacy-of-trucial-oman-scouts-on-show-in-al-ain-1.672845|title=A return: legacy of Trucial Oman Scouts on show in Al Ain|last=Dennehy|first=John|date=4 November 2017|publisher=The National}}</ref> 1905 में अल ऐन के दौरा समय [[पर्सी कॉक्स]] अल जाहिली गए थे। 1906 को, [[जॉन गोर्डन लोरिमर]] ने कहा कि क़िले को [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नाहयान]] के शासनकाल में निर्मित किया गया था।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले को मध्य दशक 1980 में बहाल किया गया था। 2007–2008 इसकी एक और बहाली हुई, जिसमें प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु दुकानें, कैफ़े और चौक जैसे नई संरचनाएँ डाली गई थी। भविष्य में अल ऐन के पर्यटन उद्योग में बड़ी भूमिका प्राप्त करने के लिए इस क़िले को फिर से बहाल किया जाएगा।<ref>{{cite news|url=http://www.alittihad.ae/mobile/details.php?id=101963&y=2011|date=3 November 2011|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al-Ittihad (Emirati newspaper)|Al-Ittihad]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي تروي «قصة العين»}}</ref> [[श्रेणी:संयुक्त अरब अमीरात]] == अवस्थिति == क़िला अल ऐन के दक्षिणी भाग में [[शेख़ ज़ायद महल संगहालय]] के निकट स्थित है। वहाँ जलस्रोत और कृषि भूमि है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> == वास्तुकला == [[File:Al_Jahili_Fort_by_night.jpg|अंगूठाकार|रात को अल जाहिली क़िला]] [[मज़यद]] क़िले के समरूप,<ref name="GulfNews 05-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=Mezyad Fort stands tall in the foothills of Jebel Hafeet|last=Kazmi|first=Aftab|date=2013-05-23|work=[[Gulf News]]|access-date=2019-03-04}}</ref> अल जाहिली क़िला अल ऐन के सबसे बड़े क़िलों में से एक है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> इसका निर्माण 1981 को शुरू किया गया था। यह एक परिसर का भाग है, जिसमें एक चौक भी शामिल है। क़िला चौकोर, {{convert|118|m|ft|abbr=off}} लंबा और {{convert|8|m|ft|abbr=off}} ऊँचा है। ऊपर में त्रिकोणीय छज्जे हैं। पश्चिमोत्तर कोने पर इसके तीन गोल और एक चौकोर [[संतरी बुर्ज]] है। गोल बुर्जों का व्यास {{convert|5|m|ft|abbr=off}} और ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है, जबकि चौकोर वाले की चौड़ाई और लंबाई {{convert|4|and|7|m|ft|abbr=off}}, तथा ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है। चौकोर बुर्ज को अधिक शक्तिशाली माना जाता है।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले की दीवारों के बाहर एक एतिहासिक मस्जिद है। == अनुकृति == [[पाकिस्तान]] की [[स्वात घाटी]] के [[ज़ाहा हदीद|शेख़ ज़ायद सेतु]] के बग़ल में अल जाहिली क़िला की एक छोटी अनुकृति स्थित है। अनुकृति और सेतु का उद्घाटन अप्रैल 2013 को हुआ।<ref name="GulfNewsl 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/shaikh-zayed-bin-sultan-al-nahyan-bridge-inaugurated-in-pakistan-1.1169996|title=Shaikh Zayed Bin Sultan Al Nahyan Bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-13|work=[[Emirates News Agency|WAM]]|access-date=2020-01-03|publisher=[[Gulf News]]}}</ref><ref name="TheNational 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=In pictures: Sheikh Zayed bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-14|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref><ref name="TheNational 01-2020">{{Cite news|url=https://www.thenationalnews.com/uae/government/uae-pakistan-ties-are-as-old-as-the-emirates-1.958985|title=UAE-Pakistan ties are as old as the Emirates|last=Duncan|first=Gillian|date=2020-01-02|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref> == यह भी देखें == * [[क़स्र अल मुवैजी]] == संदर्भ == {{reflist}} ==External links== {{commons category}} * [https://visitabudhabi.ae/en/see.and.do/attractions.and.landmarks/iconic.landmarks/al.jahili.fort.aspx Al-Jahili Fort]. ''Visit Abu Dhabi''. li3ve3nmpw0sx5vr1fj6ijpv1u0mueu 6543808 6543807 2026-04-25T10:04:01Z The Sorter 845290 6543808 wikitext text/x-wiki {{ज्ञानसन्दूक सैन्य निर्माण|name=अल जाहिली क़िला|native_name={{lang|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}|location=[[अल ऐन]], [[अबू धाबी अमीरात|अबू धाबी]], [[संयुक्त अरब अमीरात]]|coordinates={{coord|24|12|58|N|55|45|9|E|region:AE|display=inline,title}}|map_type=UAE#Persian Gulf#West Asia|map_alt=|map_size=265|map_caption=UAE में अवस्थिति|image=Entrance Up Close.jpg|image_size=|caption=अल जाहिली क़िले का प्रवेश|type=|built={{circa}} 1891|builder=|materials=|height=|used=|demolished=|condition=बहाल|ownership=|controlledby=|garrison=|commanders=|occupants=|battles=|events=}} '''अल जाहिली क़िला''' ({{Langx|ar|قَلْعَة ٱلْجَاهِلِي}}) [[संयुक्त अरब अमीरात]] के [[अल ऐन]] शहर में स्थित 19वीं शताब्दी का क़िला है। इसे 1891 को शेख़ [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नहयान]] के आदेश पर खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था। 1955 में यह [[संधि ओमान स्काउट्स]] का एक अड्डा था। 1971 से, यह अल ऐन का एक पर्यटक स्थल है। == इतिहास == इस क़िले को 1891 में अल जाहिली मरूद्यान के निकट खजूर किसानों की सुरक्षा के लिए निर्मित किया गया था।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> 1955 में, यह संधि ओमान स्काउट्स का एक अड्डा था। क़िले का प्रयोग दूसरे गाँवों में ऊँटों के माध्यम से चिकित्सा और अन्य सामान बाँटने के लिए किया जाता था। 1957 को क़िले में एक सैन्य बैंड स्थापित किया गया था।<ref>{{cite web|url=https://www.thenationalnews.com/arts/a-return-legacy-of-trucial-oman-scouts-on-show-in-al-ain-1.672845|title=A return: legacy of Trucial Oman Scouts on show in Al Ain|last=Dennehy|first=John|date=4 November 2017|publisher=The National}}</ref> 1905 में अल ऐन के दौरा समय [[पर्सी कॉक्स]] अल जाहिली गए थे। 1906 को, [[जॉन गोर्डन लोरिमर]] ने कहा कि क़िले को [[ज़ायद बिन ख़लीफ़ा आल नाहयान]] के शासनकाल में निर्मित किया गया था।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले को मध्य दशक 1980 में बहाल किया गया था। 2007–2008 इसकी एक और बहाली हुई, जिसमें प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु दुकानें, कैफ़े और चौक जैसे नई संरचनाएँ डाली गई थी। भविष्य में अल ऐन के पर्यटन उद्योग में बड़ी भूमिका प्राप्त करने के लिए इस क़िले को फिर से बहाल किया जाएगा।<ref>{{cite news|url=http://www.alittihad.ae/mobile/details.php?id=101963&y=2011|date=3 November 2011|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al-Ittihad (Emirati newspaper)|Al-Ittihad]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي تروي «قصة العين»}}</ref> [[श्रेणी:संयुक्त अरब अमीरात]] == अवस्थिति == क़िला अल ऐन के दक्षिणी भाग में [[शेख़ ज़ायद महल संगहालय]] के निकट स्थित है। वहाँ जलस्रोत और कृषि भूमि है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> == वास्तुकला == [[File:Al_Jahili_Fort_by_night.jpg|अंगूठाकार|रात को अल जाहिली क़िला]] [[मज़यद]] क़िले के समरूप,<ref name="GulfNews 05-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=Mezyad Fort stands tall in the foothills of Jebel Hafeet|last=Kazmi|first=Aftab|date=2013-05-23|work=[[Gulf News]]|access-date=2019-03-04}}</ref> अल जाहिली क़िला अल ऐन के सबसे बड़े क़िलों में से एक है।<ref name="ka">{{cite news|url=http://www.alkhaleej.ae/mob/detailed/8c37a268-3d08-4f8d-9faa-5247089ac47b/25fae1c7-4958-4622-ad76-b1497ec30e89|access-date=January 13, 2018|publisher=[[Al Khaleej (newspaper)|Al Khaleej]]|language=ar|script-title=ar:قلعة الجاهلي في العين وسجل التاريخ الخالد}}</ref> इसका निर्माण 1981 को शुरू किया गया था। यह एक परिसर का भाग है, जिसमें एक चौक भी शामिल है। क़िला चौकोर, {{convert|118|m|ft|abbr=off}} लंबा और {{convert|8|m|ft|abbr=off}} ऊँचा है। ऊपर में त्रिकोणीय छज्जे हैं। पश्चिमोत्तर कोने पर इसके तीन गोल और एक चौकोर [[संतरी बुर्ज]] है। गोल बुर्जों का व्यास {{convert|5|m|ft|abbr=off}} और ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है, जबकि चौकोर वाले की चौड़ाई और लंबाई {{convert|4|and|7|m|ft|abbr=off}}, तथा ऊँचाई {{convert|14|m|ft|abbr=off}} है। चौकोर बुर्ज को अधिक शक्तिशाली माना जाता है।<ref name="go">{{citation|url=http://www.erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|work=Al Ain Region Ruler's Representative Court|archive-url=https://web.archive.org/web/20171216223423/http://erd.ae/portal/62D659B4-3249-4324-BECD-E4E8D7322DFA.aspx|language=ar|access-date=January 13, 2018|archive-date=December 16, 2017|script-title=ar:القلاع والحصون في مدينة العين|url-status=dead}}</ref> क़िले की दीवारों के बाहर एक एतिहासिक मस्जिद है। == अनुकृति == [[पाकिस्तान]] की [[स्वात घाटी]] के [[ज़ाहा हदीद|शेख़ ज़ायद सेतु]] के बग़ल में अल जाहिली क़िला की एक छोटी अनुकृति स्थित है। अनुकृति और सेतु का उद्घाटन अप्रैल 2013 को हुआ।<ref name="GulfNewsl 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/shaikh-zayed-bin-sultan-al-nahyan-bridge-inaugurated-in-pakistan-1.1169996|title=Shaikh Zayed Bin Sultan Al Nahyan Bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-13|work=[[Emirates News Agency|WAM]]|access-date=2020-01-03|publisher=[[Gulf News]]}}</ref><ref name="TheNational 04-2013">{{Cite news|url=https://gulfnews.com/uae/mezyad-fort-stands-tall-in-the-foothills-of-jebel-hafeet-1.1187525|title=In pictures: Sheikh Zayed bridge inaugurated in Pakistan|date=2013-04-14|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref><ref name="TheNational 01-2020">{{Cite news|url=https://www.thenationalnews.com/uae/government/uae-pakistan-ties-are-as-old-as-the-emirates-1.958985|title=UAE-Pakistan ties are as old as the Emirates|last=Duncan|first=Gillian|date=2020-01-02|access-date=2020-01-03|publisher=[[The National (Abu Dhabi)|The National]]}}</ref> == यह भी देखें == * [[क़स्र अल मुवैजी]] == संदर्भ == {{reflist}} ==बाहरी कड़ियाँ== {{commons category}} * [https://visitabudhabi.ae/en/see.and.do/attractions.and.landmarks/iconic.landmarks/al.jahili.fort.aspx Al-Jahili Fort]. ''Visit Abu Dhabi''. eachgr8i1llakurp18fbs3hrrxofppi सदस्य वार्ता:JAGDISH17 3 1611507 6543606 6543429 2026-04-24T12:08:36Z JAGDISH17 921436 Corrected 6543606 wikitext text/x-wiki पृष्ठ से संबंधित किसी भी प्रकार की QUERY हेतु मुझसे gmail पर संपर्क करे 52ca202cv2285ei3dlxx9m6o8xgo46n सदस्य वार्ता:Deepak kumar Buddhist 3 1611516 6543635 6543462 2026-04-24T14:48:27Z Deepak kumar Buddhist 921600 /* गौतम बुद्ध की पारिवारिक जानकरी */ नया अनुभाग 6543635 wikitext text/x-wiki == गौतम बुद्ध की पारिवारिक जानकरी == ---- == गौतम बुद्ध == '''गौतम बुद्ध''' (लगभग 563 ईसा पूर्व – 483 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत के एक महान आध्यात्मिक गुरु, दार्शनिक और बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में शाक्य कुल में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम सिद्धार्थ था। ---- === इन्फोबॉक्स === {| class="wikitable" !विवरण !जानकारी |- |पूरा नाम |सिद्धार्थ गौतम |- |प्रसिद्ध नाम |गौतम बुद्ध |- |जन्म |लगभग 563 ईसा पूर्व |- |जन्म स्थान |लुंबिनी (नेपाल) |- |पिता |शुद्धोधन |- |माता |महामाया |- |पत्नी |यशोधरा |- |पुत्र |राहुल |- |धर्म |बौद्ध धर्म |- |प्रमुख उपलब्धि |बौद्ध धर्म की स्थापना |} ---- == शुद्धोधन == '''शुद्धोधन''' शाक्य गणराज्य के प्रमुख शासक थे और कपिलवस्तु उनके शासन का केंद्र था। वे एक प्रभावशाली और सम्मानित नेता माने जाते थे। शुद्धोधन का जीवन मुख्यतः अपने राज्य के संचालन और अपने पुत्र सिद्धार्थ के पालन-पोषण के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। ---- == पिता-पुत्र संबंध == शुद्धोधन अपने पुत्र सिद्धार्थ से अत्यधिक स्नेह रखते थे। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अनुसार, सिद्धार्थ या तो एक महान राजा बनेंगे या एक महान संन्यासी। इस भविष्यवाणी से चिंतित होकर शुद्धोधन ने उन्हें सांसारिक सुखों में व्यस्त रखने का प्रयास किया। उन्होंने सिद्धार्थ के लिए महल में सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराईं और यह सुनिश्चित किया कि वे जीवन के दुखों—जैसे बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु—से दूर रहें। उनका उद्देश्य था कि सिद्धार्थ का मन राज्य और परिवार में ही लगा रहे। ---- == सिद्धार्थ का गृह त्याग == जब सिद्धार्थ ने पहली बार जीवन के कष्टों को देखा, तो उनके भीतर गहरी जिज्ञासा और वैराग्य उत्पन्न हुआ। लगभग 29 वर्ष की आयु में उन्होंने रात्रि के समय महल छोड़ दिया, जिसे "महाभिनिष्क्रमण" कहा जाता है। यह घटना शुद्धोधन के लिए अत्यंत पीड़ादायक थी, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र के लिए एक अलग भविष्य की कल्पना की थी। ---- == पुनर्मिलन और परिवर्तन == ज्ञान प्राप्ति के बाद, जब सिद्धार्थ बुद्ध बने और कपिलवस्तु लौटे, तब शुद्धोधन ने उनके उपदेशों को सुना। धीरे-धीरे उन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं को स्वीकार किया और उनके प्रति श्रद्धा विकसित की। कहा जाता है कि अपने अंतिम समय में शुद्धोधन ने बुद्ध के मार्ग को अपनाया और आध्यात्मिक शांति प्राप्त की। ---- == निष्कर्ष == गौतम बुद्ध और उनके पिता शुद्धोधन के बीच संबंध एक गहरे मानवीय और आध्यात्मिक परिवर्तन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। जहाँ एक ओर पिता ने पुत्र को सांसारिक जीवन में बाँधकर रखना चाहा, वहीं दूसरी ओर वही परिस्थितियाँ सिद्धार्थ के ज्ञान की खोज का कारण बनीं। ----[[सदस्य:Deepak kumar Buddhist|Deepak kumar Buddhist]] ([[सदस्य वार्ता:Deepak kumar Buddhist|वार्ता]]) 14:48, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 9jth3vizefeom8yx3g45h3h6bs3imdy अनु तोमर 0 1611518 6543825 6543560 2026-04-25T11:01:01Z Advocate vinit tyagi 921618 ​"लेख को बेहतर बनाया, आधिकारिक फोटो जोड़ी और विश्वसनीय समाचार स्रोतों (2007-2015) के संदर्भ जोड़े।" 6543825 wikitext text/x-wiki {{Short description|भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज}} {{Infobox sportsperson | naam = अनु तोमर | chitra = Anu tomar medal pic.jpg | caption = अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज अनु तोमर | janm_tithi = {{birth date and age|1989|11|6}} | janm_sthan = [[बागपत ज़िला|बागपत]], [[उत्तर प्रदेश]], भारत | desh = [[भारत]] | khel = [[निशानेबाजी]] | event = 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन, 50 मीटर राइफल प्रोन, 10 मीटर एयर राइफल | medal_talika = {{MedalSport | महिला [[निशानेबाजी]]}} {{MedalCountry | {{IND}}}} {{MedalCompetition | [[एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप]]}} {{MedalGold | 2007 कुवैत | 50 मीटर राइफल प्रोन टीम (जूनियर)}} {{MedalSilver | 2007 कुवैत | 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन टीम (जूनियर)}} {{MedalCompetition | भारत-भूटान निशानेबाजी चैंपियनशिप}} {{MedalGold | 2014 थिम्पू | व्यक्तिगत और टीम स्पर्धा}} {{MedalCompetition | [[भारत के राष्ट्रीय खेल]]}} {{MedalGold | 2015 केरल | 50 मीटर राइफल प्रोन टीम}} }} '''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) [[बागपत]], [[उत्तर प्रदेश]] की एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय खेल निशानेबाज हैं। वह 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=Shooter Anu Tomar brings laurels to Baghpat |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=अमर उजाला}}</ref> == करियर == अनु तोमर ने एक दशक से अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनके करियर और उपलब्धियों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों द्वारा लगातार रिपोर्ट किया गया है। * '''एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप (2007):''' कुवैत में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने 50 मीटर राइफल स्पर्धाओं में स्वर्ण और रजत पदक जीते।<ref>{{Cite news |date=2007-12-10 |title=Shooter Anu ne Kuwait me swarn rajat padak jhatke |work=दैनिक जागरण (मेरठ संस्करण)}}</ref><ref>{{Cite news |date=2007-12-10 |title=Shabas Anu, Asian Shooting me 2 padak |work=अमर उजाला (बागपत संस्करण)}}</ref><ref>{{Cite news |title=Army shooters dominate |url=https://www.telegraphindia.com/sports/army-shooters-dominate/cid/692019 |work=द टेलीग्राफ |date=2007-12-14}}</ref> * '''राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मान्यता (2007–2008):''' एशिया में अपनी सफलता के बाद, उन्हें भारतीय निशानेबाजी के लिए एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite news |date=2007-12-29 |title=Fir Anu Tomar pr ummeed tiki |work=अमर उजाला}}</ref><ref>{{Cite web |url=https://www.jagran.com |title=Shooting Updates |date=2007-12-29 |website=Jagran.com}}</ref> मार्च 2008 में, अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी में उनके योगदान के लिए उन्हें बागपत राइफल क्लब में औपचारिक रूप से सम्मानित किया गया था।<ref>{{Cite news |date=2008-03-02 |title=Shooter Anu ka rifle club me swagat |work=दैनिक जागरण (बागपत)}}</ref> * '''व्यावसायिक प्रशिक्षण (2011):''' खेल के प्रति उनके समर्पण को तब सराहा गया जब उन्होंने अपने आवास पर एक निजी प्रशिक्षण रेंज स्थापित की।<ref>{{Cite news |date=2011-02-20 |title=Ghar ki range par nishana sadh rahi Anu |work=जनवाणी (मेरठ)}}</ref> * '''भूटान में अंतरराष्ट्रीय सफलता (2014):''' उन्होंने थिम्पू में भारत-भूटान निशानेबाजी चैंपियनशिप में व्यक्तिगत और टीम स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते।<ref>{{Cite news |date=2014-11-10 |title=Bhutan me Anu ka jalwa |work=दैनिक जागरण (मेरठ)}}</ref> * '''राष्ट्रीय खेल (2015):''' अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने केरल में आयोजित राष्ट्रीय खेलों के दौरान 50 मीटर राइफल प्रोन टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। * '''आधिकारिक रिकॉर्ड:''' उनके अंतरराष्ट्रीय स्कोर और भागीदारी को अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ (ISSF) द्वारा आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड और बनाए रखा जाता है।<ref>{{Cite web |title=ISSF Athlete Profile: Anu Tomar |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org}}</ref> == संदर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]] [[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]] == चित्र दीर्घा == <gallery> Anu tomar shooting pic.jpg | अभ्यास के दौरान अनु तोमर Anu tomar medal pic.jpg | अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक के साथ </gallery> b10z5ibzb2q22lggcpw2ccrb7cne6iz 6543846 6543825 2026-04-25T11:27:40Z Advocate vinit tyagi 921618 "लेख के इन्फोबॉक्स (Infobox) में सुधार किया, पदक तालिका (Medal Table) को व्यवस्थित किया और खिलाड़ी की आधिकारिक फोटो जोड़ी।" 6543846 wikitext text/x-wiki {{Short description|भारतीय अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज}} {{Infobox sportsperson | naam = अनु तोमर | image = Anu tomar medal pic.jpg | caption = अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज अनु तोमर | janm_tithi = {{birth date and age|1989|11|6}} | janm_sthan = [[बागपत ज़िला|बागपत]], [[उत्तर प्रदेश]], भारत | desh = [[भारत]] | khel = [[निशानेबाजी]] | event = 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन, 50 मीटर राइफल प्रोन, 10 मीटर एयर राइफल | medal_talika = {{MedalSport | महिला [[निशानेबाजी]]}} {{MedalCountry | {{IND}}}} {{MedalCompetition | [[एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप]]}} {{MedalGold | 2007 कुवैत | 50 मीटर राइफल प्रोन टीम (जूनियर)}} {{MedalSilver | 2007 कुवैत | 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन टीम (जूनियर)}} {{MedalCompetition | भारत-भूटान निशानेबाजी चैंपियनशिप}} {{MedalGold | 2014 थिम्पू | व्यक्तिगत और टीम स्पर्धा}} {{MedalCompetition | [[भारत के राष्ट्रीय खेल]]}} {{MedalGold | 2015 केरल | 50 मीटर राइफल प्रोन टीम}} }} '''अनु तोमर''' (जन्म 6 नवंबर 1989) [[बागपत]], [[उत्तर प्रदेश]] की एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय खेल निशानेबाज हैं। वह 1857 के क्रांतिकारी [[बाबा शाहमल]] की वंशज हैं।<ref>{{Cite news |title=Shooter Anu Tomar brings laurels to Baghpat |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/baghpat-news-mrt-5536481-2015-02-12 |work=अमर उजाला}}</ref> == करियर == अनु तोमर ने एक दशक से अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनके करियर और उपलब्धियों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों द्वारा लगातार रिपोर्ट किया गया है। * '''एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप (2007):''' कुवैत में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने 50 मीटर राइफल स्पर्धाओं में स्वर्ण और रजत पदक जीते।<ref>{{Cite news |date=2007-12-10 |title=Shooter Anu ne Kuwait me swarn rajat padak jhatke |work=दैनिक जागरण (मेरठ संस्करण)}}</ref><ref>{{Cite news |date=2007-12-10 |title=Shabas Anu, Asian Shooting me 2 padak |work=अमर उजाला (बागपत संस्करण)}}</ref><ref>{{Cite news |title=Army shooters dominate |url=https://www.telegraphindia.com/sports/army-shooters-dominate/cid/692019 |work=द टेलीग्राफ |date=2007-12-14}}</ref> * '''राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मान्यता (2007–2008):''' एशिया में अपनी सफलता के बाद, उन्हें भारतीय निशानेबाजी के लिए एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में देखा गया।<ref>{{Cite news |date=2007-12-29 |title=Fir Anu Tomar pr ummeed tiki |work=अमर उजाला}}</ref><ref>{{Cite web |url=https://www.jagran.com |title=Shooting Updates |date=2007-12-29 |website=Jagran.com}}</ref> मार्च 2008 में, अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी में उनके योगदान के लिए उन्हें बागपत राइफल क्लब में औपचारिक रूप से सम्मानित किया गया था।<ref>{{Cite news |date=2008-03-02 |title=Shooter Anu ka rifle club me swagat |work=दैनिक जागरण (बागपत)}}</ref> * '''व्यावसायिक प्रशिक्षण (2011):''' खेल के प्रति उनके समर्पण को तब सराहा गया जब उन्होंने अपने आवास पर एक निजी प्रशिक्षण रेंज स्थापित की।<ref>{{Cite news |date=2011-02-20 |title=Ghar ki range par nishana sadh rahi Anu |work=जनवाणी (मेरठ)}}</ref> * '''भूटान में अंतरराष्ट्रीय सफलता (2014):''' उन्होंने थिम्पू में भारत-भूटान निशानेबाजी चैंपियनशिप में व्यक्तिगत और टीम स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते।<ref>{{Cite news |date=2014-11-10 |title=Bhutan me Anu ka jalwa |work=दैनिक जागरण (मेरठ)}}</ref> * '''राष्ट्रीय खेल (2015):''' अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने केरल में आयोजित राष्ट्रीय खेलों के दौरान 50 मीटर राइफल प्रोन टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। * '''आधिकारिक रिकॉर्ड:''' उनके अंतरराष्ट्रीय स्कोर और भागीदारी को अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ (ISSF) द्वारा आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड और बनाए रखा जाता है।<ref>{{Cite web |title=ISSF Athlete Profile: Anu Tomar |url=https://www.issf-sports.org/athletes/SHINDW0611198901 |website=ISSF-sports.org}}</ref> == संदर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:1989 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:भारतीय महिला निशानेबाज]] [[श्रेणी:बागपत ज़िले के लोग]] == चित्र दीर्घा == <gallery> Anu tomar shooting pic.jpg | अभ्यास के दौरान अनु तोमर Anu tomar medal pic.jpg | अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक के साथ </gallery> 1i464bebu75ppenwp1eiw7zv9eefauz मेन रिज, टोबेगो 0 1611527 6543617 6543543 2026-04-24T13:42:15Z चाहर धर्मेंद्र 703114 विकि कड़ियाँ 6543617 wikitext text/x-wiki {{Infobox mountain | name = मेन रिज | photo = | photo_size = | photo_alt = | photo_caption = | map = | map_image = | map_alt = | map_caption = | map_relief = | map_size = | location = | label = | label_position = | elevation = {{convert|572|m|0}} | elevation_ref = <ref name="Arkle">{{Citation|last1=आर्कल |first1=जेनेट सी.|title=Trinidad and Tobago|date=2017|work=Landscapes and Landforms of the Lesser Antilles|pages=267–291|editor-last=एलन|editor-first=केसी डी.|publisher=स्प्रिंगर इंटरनेशनल पब्लिशिंग|doi=10.1007/978-3-319-55787-8_17|isbn=9783319557854|last2= ओवेन|first2=लुईस ए.|last3=वेबर|first3=जॉन सी.|series=World Geomorphological Landscapes }}.</ref> | prominence = सेंटर हिल | prominence_m = | prominence_ft = | prominence_ref = <ref name = "GEF">{{Cite report|url=https://www.thegef.org/sites/default/files/project_documents/IFPAM-_TT-_FAO_Project_Document_1.pdf|title=Improving forest and protected area management in Trinidad and Tobago|date=2013|publisher=ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (जीईएफ), त्रिनिदाद और टोबैगो।o|issue=GEF Project ID 4769|access-date=2019-03-07}}</ref> | parent_peak = | listing = | range = | coordinates = | coordinates_ref = | topo = | type = भ्रंश-अवरुद्ध पर्वत | age = | geology = एक प्रकार की शीस्ट | volcanic_arc = | volcanic_belt = | volcanic_field = | volcanic_arc/belt = | last_eruption = }} '''मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र''' [[त्रिनिदाद और टोबैगो]] के [[टोबेगो|टोबैगो]] द्वीप की प्रमुख पर्वतीय श्रृंखला है, जो लगभग 29 किलोमीटर (18 मील) लंबाई में विस्तृत पहाड़ियों का एक सुदीर्घ विस्तार प्रस्तुत करती है। यह श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में [[कॅरीबियाई सागर|कैरेबियन सागर]] और दक्षिणी टोबैगो [[भ्रंश (भूविज्ञान)|भ्रंश तंत्र]] के मध्य फैली हुई है, तथा इसकी अधिकतम ऊँचाई लगभग 572 मीटर (1,877 फीट) तक पहुँचती है। द्वीप की भौगोलिक संरचना में इसका स्थान केंद्रीय और अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसी क्षेत्र में स्थित मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र, जिसकी स्थापना 1776 में विधिक रूप से की गई थी, विश्व के सबसे प्राचीन [[संरक्षित क्षेत्र|संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों]] में गिना जाता है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पक्षी-अवलोकन तथा [[पारिस्थितिक पर्यटन|पर्यावरणीय पर्यटन]] के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। मेन रिज केवल एक भौगोलिक संरचना भर नहीं, बल्कि जीव-जगत के लिए एक सुरक्षित आश्रयस्थल भी है। यहाँ की सघन वनस्पति और विविध पारिस्थितिक तंत्र अनेक स्थानीय पौधों और जीव-जंतुओं को संरक्षण प्रदान करते हैं, जिनमें कई [[तत्रस्थता|प्रजातियाँ]] ऐसी हैं जो केवल टोबैगो तक ही सीमित हैं। इस प्रकार, मेन रिज प्राकृतिक संतुलन, जैविक विविधता और संरक्षण की दीर्घकालिक परंपरा का एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरता है। ==इतिहास== पेरिस की संधि के साथ 1763 में टोबैगो के इतिहास ने एक निर्णायक मोड़ लिया, जब उसका तटस्थ क्षेत्र का दर्जा समाप्त कर उसे ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में स्थापित कर दिया गया।<ref name = "Niddrie">{{Cite journal|last=निड्री|first=डी.एल.|date=1966|title=Eighteenth-Century Settlement in the British Caribbean|journal=ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं के संस्थान के लेनदेन|issue=40|pages=67–80|doi=10.2307/621569|issn=0020-2754|jstor=621569}}</ref> इससे पहले [[एक्स ला चैपल संधि (१७४८)|ऐक्स-ला-चैपल की संधि]] के अंतर्गत 1748 में इस द्वीप को तटस्थ घोषित कर उसकी शेष स्वदेशी आबादी के संरक्षण में छोड़ दिया गया था। किंतु ब्रिटिश सत्ता की पुनर्स्थापना ने यहाँ की परिस्थितियों को तीव्रता से परिवर्तित कर दिया और द्वीप शीघ्र ही बागान-आधारित अर्थव्यवस्था के ढाँचे में ढलने लगा।<ref name="Boomert" /> व्यापार बोर्ड के निर्देशन में टोबैगो का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया, जिसके बाद भूमि को 100 से 500 एकड़ (लगभग 40 से 202 हेक्टेयर) के खंडों में विभाजित कर बागान स्वामियों को सौंप दिया गया।<ref name="Boomert">{{Cite book|title=The indigenous peoples of Trinidad and Tobago : from the first settlers until today|last=बूमर्ट|first=एरी|date=2016-01-15|isbn=9789088903540|location= लीडेन |oclc=944910446}}</ref> इस तीव्र औपनिवेशिक विस्तार और कृषि विकास के बीच एक महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि मेन रिज के ऊपरी भाग को “वर्षा से संरक्षण हेतु वन” के रूप में सुरक्षित रखा जाए। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र न तो साफ किया गया और न ही खेती के लिए उपयोग में लाया गया,<ref name="Niddrie" /> जिससे इसकी प्राकृतिक संपदा और जैविक विविधता अक्षुण्ण बनी रही। सोम जेनिन्स के दूरदर्शी प्रयासों ने टोबैगो में वनों के संरक्षण की उस ऐतिहासिक पहल को जन्म दिया, जिसका उद्देश्य वर्षा को बनाए रखना और भूमि की उर्वरता की रक्षा करना था। जेनिन्स स्टीफन हेल्स के [[पादप कार्यिकी|पादप शरीर-क्रिया-विज्ञान]] और [[वाष्पोत्सर्जन]] संबंधी अध्ययनों से गहराई से प्रभावित थे और उन्होंने यह समझ लिया था कि वर्षा के संतुलन में वनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।<ref>{{Cite book|title=Green imperialism : colonial expansion, tropical island Edens, and the origins of environmentalism, 1600–1860|last=ग्रोव|first=रिचर्ड एच.|publisher=कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस|year=1995|isbn=978-0521565134|location=कैम्ब्रिज|oclc=28548987}}</ref> इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने ब्रिटिश संसद को इस विचार के महत्व से अवगत कराने के लिए निरंतर प्रयास किए। उन्हें यह लक्ष्य प्राप्त करने में ग्यारह वर्षों का समय लगा, परंतु उनकी दृढ़ता अंततः सफल सिद्ध हुई। 13 अप्रैल 1776 को संसद ने एक अध्यादेश पारित कर इस अभ्यारण्य की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की, जिसका उद्देश्य था—“बार-बार वर्षा को आकर्षित करना, जिस पर इन जलवायु क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता पूर्णतः निर्भर करती है।”<ref name="UNESCO">{{Cite web|url=https://whc.unesco.org/en/tentativelists/5646/|title=Tobago Main Ridge Forest Reserve|website=यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र|language=en|access-date=2019-03-08}}</ref> इस निर्णय के परिणामस्वरूप एक ऐसे संरक्षित क्षेत्र का निर्माण हुआ, जो न केवल विश्व के सबसे प्राचीन अभ्यारण्यों में से एक माना जाता है,<ref name="UNESCO" /><ref name="GEF" /> बल्कि संरक्षण-चेतना की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में भी इसकी गणना होती है। इसे आधुनिक पर्यावरणीय विचारधारा की दिशा में उठाए गए प्रारंभिक और महत्वपूर्ण कदमों में से एक भी माना गया है।<ref name="UNESCO" /> आगे चलकर 1904 में इस वर्षा-अभ्यारण्य को आसपास की क्राउन भूमि के साथ सम्मिलित कर औपचारिक रूप से मेन रिज वन आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया।<ref name = "Beard">{{Cite journal|last=बियर्ड |first=जे. एस.|date=1944|title=The Natural Vegetation of the Island of Tobago, British West Indies|journal=पारिस्थितिक मोनोग्राफ|volume=14|issue=2|pages=136–163|doi=10.2307/1943531|issn=0012-9615|jstor=1943531|bibcode=1944EcoM...14..135B }}</ref> इस प्रकार, एक विचार के रूप में आरंभ हुई संरक्षण की यह पहल समय के साथ एक संगठित और स्थायी प्राकृतिक धरोहर के रूप में विकसित हुई, जो आज भी पर्यावरणीय संतुलन और संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करती है। [[File:Tobago WI Charlotteville.JPG|right|thumb|मेन रिज की पहाड़ियां टोबैगो के उत्तरी तट पर समुद्र से मिलती हैं।]] == सन्दर्भ == bel3revnzibhbs1xcknbp1j0up73oax सदस्य:Maris Dreshmanis 2 1611530 6543701 6543550 2026-04-24T21:41:46Z Maris Dreshmanis 921655 Update babel to lv|ru-4 (remove en-3, de-1) 6543701 wikitext text/x-wiki {{#babel:lv|ru-4}} == Maris Dreshmanis == Open data researcher. Contributor to [[d:Wikidata:WikiProject Occupations|WikiProject Occupations]] on Wikidata. * '''[[d:User:Maris Dreshmanis|Wikidata contributions]]''' — 37,400+ edits * '''GSCO''' — Global Standard Classification of Occupations (27 national registries + ESCO, 57,000+ occupation entries, 26,991 Wikidata items, 152,000+ multilingual labels across 53 languages) * '''[[d:Wikidata:WikiProject Occupations|WikiProject Occupations]]''' — coordinating occupation label enrichment in 27 source languages [[Category:Wikipedians]] 1tm661nfud90u9uzogktjy8qwfpriv4 द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँन 0 1611532 6543660 6543559 2026-04-24T16:12:57Z Klf2026 921031 hindi translation corrected 6543660 wikitext text/x-wiki {{Infobox film | name = द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहान | image = | caption = | director = संतोष राम | writer = संतोष राम | producer = संतोष राम | starring = राहुल बिरादर<br>विनय भगत<br>राजकुमार मुंडे <br>अंजली जाधव | cinematography = अर्जुन बालकृष्णन | editing = योगेश भगवत | music = सुधांशु अंधोरीकर | studio = विवेक चित्र प्रोडक्शन | distributor = विवेक चित्रप्रोडक्शन | released = {{Film date|2024}} | runtime = 25 मिनट | country = भारत | language = मराठी }}'''''द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहान''''' २०२४ की भारतीय [[मराठी सिनेमा|मराठी]] [[लघु फ़िल्म]] है, जिसे संतोष राम ने लिखा, निर्मित और निर्देशित किया है। यह फ़िल्म [[महाराष्ट्र]] के एक रूढ़िवादी ग्रामीण गाँव में अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के दो युवकों के बीच समलैंगिक संबंध को दर्शाती है। फ़िल्म का विश्व प्रीमियर अक्टूबर में [[सिएटल]] में १९ वें [[तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल २०२४]] में हुआ और तब से यह अनेक अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है, जिनमें क्वीर विषयों पर केंद्रित आयोजन भी शामिल हैं। == कथानक == युवराज, एक युवा गाँव का लड़का, ''शाहजहान'' की ओर आकर्षित होता है, जो एक चूड़ी बेचने वाला है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}</ref> दोनों पुरुष एक एकांत स्थान पर मिलते हैं और अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं। दोनों एक ऐसे रूढ़िवादी समाज में दोहरा जीवन जीते हैं जो समलैंगिकता के प्रति शत्रुतापूर्ण है। फ़िल्म का अंत आशा की एक किरण के साथ होता है, जहाँ दोनों पात्र दोबारा मिलने की उम्मीद लेकर विदा होते हैं।<ref name="medium-review" /> == कलाकार == * राहुल बिरादर — युवराज * विनय भगत — ''शाहजहान'' * अंजलि जाधव —पाटिल कि पत्नी * राजकुमार मुंडे — पाटिल * विवेक होलसांब्रे — युवराज का पिता * शेषेराव पवाड़े — गुरु == निर्माण == फ़िल्म कि प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए गाँव में प्राकृतिक स्थानों पर फिल्माया गया था।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}} [[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref> संतोष राम ने गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम किया, जिसने एक हिंदू और एक मुस्लिम पात्र के बीच केंद्रीय समलैंगिक संबंध के यथार्थवादी चित्रण में योगदान दिया।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> == पुरस्कार एवं नामांकन == फ़िल्म को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं : {| class="wikitable sortable" !वर्ष !पुरस्कार !महोत्सव !परिणाम |- |२०२५ |महोत्सव के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक |१५ वाँ पुणे शॉर्ट फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}} |- |२०२५ |सम्माननीय उल्लेख |कारवाँ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}} |- |२०२५ |सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार |१४ वाँ अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सव सूरत|| {{won}} |- |२०२५ |सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फ़िल्म |थिलश्री अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}} |- |२०२६ |विशेष उल्लेख पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ LGBTQ भारतीय गे फ़िल्म) |कलर्स ऑफ लव – क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}} |} == समीक्षा == आलोचकों ने फ़िल्म को « शक्तिशाली» और «ग्रामीण क्वीर प्रेम का कोमल चित्रण» बताया है, जो रूढ़िवादी ग्रामीण भारत में समलैंगिक संबंधों पर एक दुर्लभ दृष्टि प्रस्तुत करती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> स्थानीय मराठी मीडिया ने अमेरिका में तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल में इसके चयन को प्रमुखता से उठाया।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span> [[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}} </ref> == बाहरी कड़ियाँ == * [https://mumbaiqueerfest.com/short-films-packages/ इंडियन मसाला मिक्स – 2], मुंबई क्वीर फेस्ट * [https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf व्यूइंग रूम फ़िल्म बाज़ार], पृष्ठ सं. 232 (PDF) * [https://saffm.centrekabir.com/video/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ], SAFF मॉन्ट्रियल * [https://www.csaff.org/filmguide?cnSelected=8bf60431-d0b2-4a87-a473-f4a1666d80b7 सेंट्रल स्टेट्स फ़िल्म फेस्टिवल] (सितंबर 2025) * [https://aifilmfest.in/catalogue-11th-aiff/.pdf AIFF 2026 कैटलॉग], पृष्ठ सं. 122 (PDF) * [https://indisches-filmfestival.de/wp-content/uploads/2025/07/OnePager_Queer_2025.pdf 22वाँ इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट 2025] (PDF) * [https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ ड्रामा, क्वीर, लघु फ़िल्में], इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट * [https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf रील डिज़ायर्स चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल 2025] (PDF) * [https://kiff.in/archive/2025/official-selection/short-documentary-panorama/2278 कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025] * [https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America- तस्वीर प्रीमियर पर पेलीप्लैट कवरेज] == सन्दर्भ == <references responsive="1"></references> * [[श्रेणी:मराठी फ़िल्में]] [[श्रेणी:सीएस1 मराठी-भाषा स्रोत (mr)]] [[श्रेणी:2024 की फ़िल्में]] eo2e76nxlwu8fkjz9e85e6p3cjsoa4n 6543661 6543660 2026-04-24T16:18:58Z Klf2026 921031 categories corrected 6543661 wikitext text/x-wiki {{Infobox film | name = द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहान | image = | caption = | director = संतोष राम | writer = संतोष राम | producer = संतोष राम | starring = राहुल बिरादर<br>विनय भगत<br>राजकुमार मुंडे <br>अंजली जाधव | cinematography = अर्जुन बालकृष्णन | editing = योगेश भगवत | music = सुधांशु अंधोरीकर | studio = विवेक चित्र प्रोडक्शन | distributor = विवेक चित्रप्रोडक्शन | released = {{Film date|2024}} | runtime = 25 मिनट | country = भारत | language = मराठी }}'''''द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहान''''' २०२४ की भारतीय [[मराठी सिनेमा|मराठी]] [[लघु फ़िल्म]] है, जिसे संतोष राम ने लिखा, निर्मित और निर्देशित किया है। यह फ़िल्म [[महाराष्ट्र]] के एक रूढ़िवादी ग्रामीण गाँव में अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के दो युवकों के बीच समलैंगिक संबंध को दर्शाती है। फ़िल्म का विश्व प्रीमियर अक्टूबर में [[सिएटल]] में १९ वें [[तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल २०२४]] में हुआ और तब से यह अनेक अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है, जिनमें क्वीर विषयों पर केंद्रित आयोजन भी शामिल हैं। == कथानक == युवराज, एक युवा गाँव का लड़का, ''शाहजहान'' की ओर आकर्षित होता है, जो एक चूड़ी बेचने वाला है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}</ref> दोनों पुरुष एक एकांत स्थान पर मिलते हैं और अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं। दोनों एक ऐसे रूढ़िवादी समाज में दोहरा जीवन जीते हैं जो समलैंगिकता के प्रति शत्रुतापूर्ण है। फ़िल्म का अंत आशा की एक किरण के साथ होता है, जहाँ दोनों पात्र दोबारा मिलने की उम्मीद लेकर विदा होते हैं।<ref name="medium-review" /> == कलाकार == * राहुल बिरादर — युवराज * विनय भगत — ''शाहजहान'' * अंजलि जाधव —पाटिल कि पत्नी * राजकुमार मुंडे — पाटिल * विवेक होलसांब्रे — युवराज का पिता * शेषेराव पवाड़े — गुरु == निर्माण == फ़िल्म कि प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए गाँव में प्राकृतिक स्थानों पर फिल्माया गया था।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}} </ref> संतोष राम ने गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम किया, जिसने एक हिंदू और एक मुस्लिम पात्र के बीच केंद्रीय समलैंगिक संबंध के यथार्थवादी चित्रण में योगदान दिया।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> == पुरस्कार एवं नामांकन == फ़िल्म को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं : {| class="wikitable sortable" !वर्ष !पुरस्कार !महोत्सव !परिणाम |- |२०२५ |महोत्सव के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक |१५ वाँ पुणे शॉर्ट फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}} |- |२०२५ |सम्माननीय उल्लेख |कारवाँ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}} |- |२०२५ |सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार |१४ वाँ अंतर्राष्ट्रीय लघु फ़िल्म महोत्सव सूरत|| {{won}} |- |२०२५ |सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फ़िल्म |थिलश्री अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव|| {{won}} |- |२०२६ |विशेष उल्लेख पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ LGBTQ भारतीय गे फ़िल्म) |कलर्स ऑफ लव – क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल|| {{won}} |} == समीक्षा == आलोचकों ने फ़िल्म को « शक्तिशाली» और «ग्रामीण क्वीर प्रेम का कोमल चित्रण» बताया है, जो रूढ़िवादी ग्रामीण भारत में समलैंगिक संबंधों पर एक दुर्लभ दृष्टि प्रस्तुत करती है।<ref name="medium-review">{{cite web|url=https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40|title=Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan|date=2025|website=Medium|access-date=17 अप्रैल 2026}}<cite class="citation web cs1" data-ve-ignore="">[https://medium.com/@curatorfilm877/a-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40 "Movie Review: The Story of Yuvraj and Shahajahan"]. ''Medium''. 2025<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=unknown&rft.jtitle=Medium&rft.atitle=Movie+Review%3A+The+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan&rft.date=2025&rft_id=https%3A%2F%2Fmedium.com%2F%40curatorfilm877%2Fa-tender-portrait-of-rural-queer-love-revisiting-the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-ec21619c3d40&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span></ref> स्थानीय मराठी मीडिया ने अमेरिका में तस्वीर फ़िल्म फेस्टिवल में इसके चयन को प्रमुखता से उठाया।<ref name="toi">{{cite news|url=https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms|title=समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत|date=25 सितंबर 2024|work=Times of India Marathi|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}}<cite class="citation news cs1 cs1-prop-foreign-lang-source" data-ve-ignore="">[https://marathi.indiatimes.com/entertainment/entertainment-news/bollywood-news/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica/articleshow/113652198.cms "समलैंगिक संबंधांचा तिरस्कार करणाऱ्या समाजात युवराज आणि शहाजहाँ ... मराठी दिग्दर्शकाची शॉर्टफिल्म चर्चेत"]. ''Times of India Marathi'' (मराठी भाषा में). 25 सितंबर 2024<span class="reference-accessdate">. अभिगमन तिथि: 17 अप्रैल 2026</span>.</cite><span title="ctx_ver=Z39.88-2004&rft_val_fmt=info%3Aofi%2Ffmt%3Akev%3Amtx%3Ajournal&rft.genre=article&rft.jtitle=Times+of+India+Marathi&rft.atitle=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE+%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%B1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C+%E0%A4%86%E0%A4%A3%E0%A4%BF+%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81+...+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%80+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80+%E0%A4%B6%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4&rft.date=2024-09-25&rft_id=https%3A%2F%2Fmarathi.indiatimes.com%2Fentertainment%2Fentertainment-news%2Fbollywood-news%2Fthe-story-of-yuvraj-and-shahajahan-by-santosh-ram-in-tasveer-film-festivalamerica%2Farticleshow%2F113652198.cms&rfr_id=info%3Asid%2Fhi.wikipedia.org%3AThe+Story+of+Yuvraj+and+Shahajahan" class="Z3988" data-ve-ignore=""></span> [[श्रेणी:CS1 मराठी-language sources (mr)]]</ref><ref name="deshonnati">{{cite news|url=https://deshonnati.com/a-short-film-of-a-young-man-from-dongarsheli-will-be-screened/|title=डोंगरशेळीच्या तरुणाचा लघुपट झळकणार अमेरिकेत|date=19 सितंबर 2024|work=Deshonnati|access-date=17 अप्रैल 2026|language=मराठी}} </ref> == बाहरी कड़ियाँ == * [https://mumbaiqueerfest.com/short-films-packages/ इंडियन मसाला मिक्स – 2], मुंबई क्वीर फेस्ट * [https://filmbazaarindia.com/media/3662/e-catalogue-viewing-room_lrs.pdf व्यूइंग रूम फ़िल्म बाज़ार], पृष्ठ सं. 232 (PDF) * [https://saffm.centrekabir.com/video/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ द स्टोरी ऑफ युवराज एंड शाहजहाँ], SAFF मॉन्ट्रियल * [https://www.csaff.org/filmguide?cnSelected=8bf60431-d0b2-4a87-a473-f4a1666d80b7 सेंट्रल स्टेट्स फ़िल्म फेस्टिवल] (सितंबर 2025) * [https://aifilmfest.in/catalogue-11th-aiff/.pdf AIFF 2026 कैटलॉग], पृष्ठ सं. 122 (PDF) * [https://indisches-filmfestival.de/wp-content/uploads/2025/07/OnePager_Queer_2025.pdf 22वाँ इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट 2025] (PDF) * [https://indisches-filmfestival.de/film/the-story-of-yuvraj-and-shahajahan/ ड्रामा, क्वीर, लघु फ़िल्में], इंडिशेस फ़िल्मफेस्टिवल स्टुटगार्ट * [https://orinam.net/wp-content/uploads/2025/08/RD-CIQFF-2025-Brochure.pdf रील डिज़ायर्स चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय क्वीर फ़िल्म फेस्टिवल 2025] (PDF) * [https://kiff.in/archive/2025/official-selection/short-documentary-panorama/2278 कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025] * [https://www.peliplat.com/en/article/10024717/Yuvraj-and-Shahjahan:-A-Story-of-Courage-and-Love-Premieres-at-19th-Tasveer-Festival-2024-in-America- तस्वीर प्रीमियर पर पेलीप्लैट कवरेज] == सन्दर्भ == <references responsive="1"></references> * [[श्रेणी:मराठी फ़िल्में]] [[श्रेणी:2024 की फ़िल्में]] qlyx6t9tt3hshh2j171lt16r9c53wgm श्रेणी:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन 14 1611535 6543631 6543585 2026-04-24T14:32:06Z चाहर धर्मेंद्र 703114 शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व2|शीह व2]]) 6543631 wikitext text/x-wiki {{db-test|help=off}} [[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]] [[File:Sonbhadra history cover copy.jpg 1.jpg|thumb|Sonbhadra history cover copy.jpg 1]] सोनभद्र का इतिहास रामनाथ शिवेंद्र ‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’ सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत न तो भूत में सार्थक रहता है, न ही वर्तमान में उल्लेखनीय, न ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों व राजपूतों की हमलावर संस्कृति व ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने का रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन व श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी। अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल व पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गए आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी न समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार न करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः न होती। पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा मेें एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, व परिवर्तन-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे (आदिमानव) प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे (बिना घाल-मेल) तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया। श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान व तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग व अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है। प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास व विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ न था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी। आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा। आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता आ ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथा ‘स्व’ का बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था। पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है। सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं। ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क व समझ के मामलों में कहीं अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर न थी, तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था। पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है? क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता। पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति, परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं। सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश मंन चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता व बर्बरता थी। अकबर व शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था व भूमि-प्रबंधन अंग्रेज व बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट व लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्रा सेे हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है। लगान वसूली व लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर व पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक न होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान व प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं। व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति व पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी व वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात न थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हें ‘पिग्मी’ श्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों व आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है। विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक व व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था। हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं। अतीत देखिए पर अपनी आँख से अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था। उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा। मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था। पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह। दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और न ही कोई प्रयास करते हैं इस बाबत हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। कानून व्यवस्था व सामाजिक प्रबंधन के आधार पर ही सोनभद्र को केन्द्र में रख कर सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल? हिन्डाल्को ईन्डस्ट्रीज लिमिटेट रेणूकूट, श्री मधु सूदन सिंह जी, श्री विजय कुमार जैन,श्री जे.पी. शुक्ला एडवोकेट व श्री रामनारायण सर्राफ के प्रति बहुत बहुत आभार जिनके आर्थिक अंशदान से यह पुस्तक प्रकाशित हो सकी। '''अतीत-कालीन सत्ता विमर्श... इतिहास का प्रारंभ''' अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता व संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित व विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी न किसी तरह यहां के विजयगढ़ व अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं। पुरातात्विक सोनभद्र मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर व देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरों का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर में ‘पानी’ देख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था, हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं। सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता। कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र व बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को (410-392ई0पूर्व) तक की यात्रा कराता है। जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक दो आदमी के बैठने व सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे। शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी शताब्दी के आस पास के हों जब ‘नव सात बाहनों’ की एक शाखा की अधीनता में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो अशोक तक 272-232 ई0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त द्वारा ई0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार व वैदिक साहित्य संस्कृति व कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध धर्म का ‘प्रतीत्य समुत्यपाद’ यानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक सूत्रा निकलता है। ‘अनित्यवाद’ जैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्रा ‘अनात्मकवाद’ भी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक प्रयास किया जा रहा था। पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था कि ‘आत्मा’ व ‘ब्रह्म’ दोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्य ‘ब्रह्म’ की अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर व लोहिया जैसे राजनीति कर्मी व समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष व महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्राह्मण व राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे। बाद के समय में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्रा शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन व सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है। सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना के ‘नल राजा’ स्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि ‘नल राजा’ केे स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले व लाल पात्रा के साथ-साथ काले व लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, व लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त न हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, न केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं। अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र व मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज (ब्ीमतजे) पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी। कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती करने लायक खेत समतल बनाया जाता हैै तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा। सोनभद्र व मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण व औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा हथियार व औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों (।इवतपहपदंस) को दास बना लिया गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण व औजार बनवाने का कार्य कराया जाता रहा होगा। अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई 12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों व औजार पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों व समर्थनों पर आधारित जिन कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों के बारे में भी विधान किया गया। पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्रा-तत्रा देखी जा सकती है। पूरा सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमान ‘काकबर्न’ ने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतः ‘आयरन आक्साइड’ का होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं। खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियां अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के न हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपति ‘बृहद्रथ’ के पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ व सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पास ‘शुंग साम्राज्य’ स्थापित हो चुका था। इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैै। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य व जागरूक रहे होंगे। कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं। इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था। कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती (कृषि-कार्य) तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों व सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ आ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई। उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले व लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन व शोध का विषय बन कर रह गया है। सोनभद्र के दर्शनीय स्थल शास्त्रों में सोनभद्र मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये। गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता। ‘सत्पथ ब्राह्मण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था। भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है। ‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी (म्चपेजवउवसवहपेज) व सत्ता-मीमांसी (व्दजवसवहपेज) समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए होंगे। आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु (सात नदियों का क्षेत्रा अविभाजित पंजाब ) में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता (झेलम) आसक्री (चिनाव) परूश्ष्नी (रावी) विपासा (व्यास) शतुद्री (शतलज) और सरस्वती (राजस्थान में विलुप्त) इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू, तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल था जो ‘भरत’ कहलाता था। अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया, शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू, काशी तथा कोशल राज थे। कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा (देश) के नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा (बरेली) जिसे काम्पिल्य कहा जाता था कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे पविर्तनकारी घटना है। रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था। इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों (ैवबपंस ज्ीमवतल) के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता। छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था। खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रह्मा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम के देवी-देवताओं के अधीन थे। कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं। हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है। उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में खड़ा था। माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है। पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर पाटलिपुत्रा से। सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं। यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं। (1) कुरू(मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर) राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल (2) पांचाल (बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद) राजधानी अहिक्षेत्रा(बरेली के आसपास) (3)शूरसेन (मथुरा का क्षेत्रा) राजधानी मथुरा (4) वत्स (इलाहाबाद और आसपास) राजधानी कौशाम्बी (इलाहाबाद के पास) (5) कोशल (अवध) राजधानी साकेत (अयोध्या) और श्रावस्ती (गोंडा में )(6) मल्ल (देवरिया) राजधानी कुशीनगर (कसिया) और पावा (पडरौना) (7) काशी (वाराणसी) राजधानी वाराणसी (8) अंग (भागलपुर) राजधानी चम्पा (9) मगध (दक्षिण बिहार) राजधानी गिरिब्रज (राजगृह बिहार शरीफ के पास) (10) वज्जि (दरंभगा और मुजफ्फर) राजधानी मिथिला, जनकपुर (नेपाल सीमा पर) (11) चेदी (बुन्देल खण्ड) राजधानी शुतिमती बांदा के पास (12) मत्स्य (जयपुर) राजधानी विराट जयपुर के पास (13) अश्मक (गोदावरी घाटी) राजधानी पाण्डन्या (14) अवन्ति (मालदा) राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन)(15) गांधार (पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में) राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास (16) कम्बोज ( राजधानी राजापुर)। पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह सेे वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं। पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं। सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है। पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है। एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य स्थापित हो चुका था। सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती है। मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी। वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिट्रियस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया। अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48 साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई.पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया। वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई.पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता मगध से रहा था यह निर्विवाद है। चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त (तीसरी चौथी सदी) के आधिपत्य में भी रहा था। समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे। तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम (305-325) तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त (455-467ई0) तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्योंे कभी शकों कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था। यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव (400 ई. से 600 ई) के बाद हर तरफ राजनीतिक एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन (606) में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता हैै। इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया (606-648ई) हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था। कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया। कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य था ही नहीं। यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है। कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखतेे हैं कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार (परिहार) गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्ट्रकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का (1018-19ई.) में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है। सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है। हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर ही न थी। गोया दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक। किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ। सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद (बिहार) का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग (भागलपुर) कजंगला (संथाल तथा पूर्णिया) तक प्रारंभ में रहा होगा। गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी (1047-1072 ई.) तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा। ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों (गहरवार) का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे। गोविन्द चन्द्र (1104-1154 ई.) तथा जय चन्द्र (1170-1193 ई.) इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् (1192ई.) में कर दी गई। साथ ही साथ एक साल बाद छन्दवार (इटावा) में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल (अलीगढ़) असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं (1400ई.) तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि (1193ई.) के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल में अप्रभावित ही रहा होगा। गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था। सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए। सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था। गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल (अलीगढ़) हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं के अस्तित्व मिट चुके थे। कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है। निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार (गहडवार) चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था। सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आह्वान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आह्वान किया था। इन्द्र आर्योे के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं (आदिवासी) का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं। संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों, धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर (भू-संसाधन) वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है। इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया। ‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मध्य-काल’ समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार (गहड़वार) राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता (प्रजा) थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना। ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो। युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ ब्याघ्रा का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था। तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का ‘शक्तेषगढ’़ पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़ भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’ के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा 1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण करता है। ‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूर लंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार, कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते। जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है। सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अस्थिरता थी। इधर जौनपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य (एक स्वतंत्रा साम्राज्य) की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा। गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था। बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता। बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा। समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु (1399) में होती है तथा शर्की राज खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत्रा मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से 1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक। तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था। लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा। बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव(चन्देल) के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था। अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्ट्रीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए हुए है कि हम राष्ट्र के बारे में सोचंे। राष्ट्रवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्ट्र हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था। जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों, आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है। गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक। इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे? इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा अगोरी के राजकुमार को पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी। निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है। बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।(1296) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू (झारखंड) पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा। चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। (1310) में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं। विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को (1290) में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन्् (1310) चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते। विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे। हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन (1661) कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585 से 1616 ई0 में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था। मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210 कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर 1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526 से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया रूप ले लेता है। उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था। राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां (शेरश्शाह सूरी) पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था। ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया। जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं। बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न इकाइयों से कोई राष्ट्रवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्ट्र की सोच काफी सीमित तथा लक्ष्यहीन थी। 23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556 यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा 1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342 साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था। सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़ राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह (खरवाह) वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की से अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव (अगोरी राज के परिजन) के अधीन हो जाती है। अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बन जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया। सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्र्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था। बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश्य्यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करनेे के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमर सिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है। सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर (गढ़वा) में भुइयां (परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी) सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न ही दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था। मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी (गुजरात) गहरवार (कन्नौज) चन्देल (कालिंजर) से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी। आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था ;स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है। मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे। रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है। 1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिटाई जा चुकी थी। यु(-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरपफ एक छलांग सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अन्तरविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता है। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं। एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वांक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था। सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त सिंह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तरविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएंगे जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी। 1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है? बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा (अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य) पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता जा रहा था। सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि रीवां राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के बाद मीरजापुर का कन्तित शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित होना पड़ा था। बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी, क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था। सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजय अभियान से काफी डरे हुुुुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था। बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया। सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह की यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए। बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें। नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसनेे बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ। अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है। अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने में विफल हो गया। अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर 1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़ दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्धी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्धी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है। बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है। 23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया। बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था। यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775 को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता करना कोई कठिन नहीं है। वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे। भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी। अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान (राजस्व) वसूली तथा भूमि प्रबन्धन का एक तरफा व मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे। 1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को बनारस से चुनार भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया। बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 (बाइस हजार) होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है। अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं। अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते हैं। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़ किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्स की सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। अंगेजी सेना किले के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है। विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही थी। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं। इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंेे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो, चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया। सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं। 1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं। अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम (बादशाह) को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता। यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था। अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे। मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक (अंग्रेजों राज्य) पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा (अंग्रेजों का पक्षधर) पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया। 1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाई की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महादजी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा। चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है। बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व निर्धारित किया गया था कि वे ईस्ट इन्डिया कंपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया। 1830 तक मीरजापुर बनारस का ही हिस्सा था पर 1830 में इसे एक अलग राजस्व जिला की मान्यता प्रदान हो जाती है। अलग राजस्व प्रशासन की स्थापना के कारण हालांकि कुछ छोटे-मोटे विरोध होते हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं थे। वैसे भी मीरजापुर व सोनभद्र के लोग बनारस से अलग तरह की व्यवस्था चाहते थे जो संभव नहीं था। सोनभद्र व मीरजापुर की रियासतें कुछ कुछ बनारस के अधीन तो बहुत कुछ अंग्रेजों के अधीन लेकिन रियासतें वही स्थापित हुई जो जिन्हें बलवन्त सिंह ने विस्थापित कर दिया था। बनारस से अलग हो जाने के बाद भी 1830 से लेकर 1857 के पहले तक सोनभद्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता। 1830 के पहले 3 अक्टूबर 1788 को गवर्नर जनरल की कौसिल द्वारा राजस्व एवं भूमि- प्रबंधन के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता है जिसे डक्कन ने 1788-89 या 1396 फसली में लागू करवाया था। 1857 यानि आजादी की ओर बढ़ते कदम 1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय ट्रेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था। जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ ट्रेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डांे को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसेे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था। स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा। गौरा गांव के ठाकुरों द्वारा नदी व रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से मुक्त करा लिया। गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था। वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड ट्रक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया। मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्ट्री के दो अंग्रेज प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया। बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और 1857 का मुक्ति संग्राम अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज, शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक तैयारियां पूर्ण की जानेे लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए। मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़( बिजयगढ़ राज) के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था, आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ (विजयगढ़) से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था। बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी। सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी। सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन 1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए 1857 का विद्रोह एक विचारशील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ। बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौंपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था। महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता। मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए। 1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतांत्रिक अधिकारों तथा उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ कथित अतिवादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है। मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित था। असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने ‘साइमन कमीशन’ की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा हुआ था, उसमंे ‘साइमन कमीशन’ ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी 1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा। मीरजापुर में ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए। 4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई। इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्रीप्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई। आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए जनता का गांधी जी ने सभा में आह्वान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए। कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था। भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई। मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी ‘रणभेरी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया। 18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया। कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये। मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेशानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही। 14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक विरोध था जिसमें ग्राम स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रं्रेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थेे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य (पूंजी) संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्शनिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है? जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे। राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं, असंभव है। रूस की महान क्रांति भी हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है... ष्डपत्रंचनत ूंे वदम व िजीम मंेजमतद कमेजपबजे वि न्जजंत च्तंकमेीएूीमतम जीम तिममकवउ उवअमउमदज जववा ं अमतल ेमतपवने जनतदण्श् वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक ‘रोलेट एक्ट’ पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई। 1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव 1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आवश्यक खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली। 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े। rc1o8kccik455hrusk369mv1hz62xpx श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन 14 1611542 6543620 2026-04-24T14:05:05Z चाहर धर्मेंद्र 703114 वैज्ञानिक संगठन 6543620 wikitext text/x-wiki [[श्रेणी:वैज्ञानिक संगठन और सुविधाएँ]] [[श्रेणी:विषयानुसार अंतर्राष्ट्रीय संगठन]] [[श्रेणी:अन्तरराष्ट्रीय लाभ निरपेक्ष संगठन]] 6c4xcx3au74piby9rq8z9z8qnrln07o विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग 0 1611543 6543625 2026-04-24T14:16:49Z चाहर धर्मेंद्र 703114 प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ का आयोग 6543625 wikitext text/x-wiki {{Infobox company | name = आईयूसीएन विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग | logo = | type = आयोग | location = ग्लैंड, स्विट्जरलैंड | area_served = विश्वव्यापी | key_people = मधु राव (अध्यक्ष) | industry = प्रकृति संरक्षण | products = आईयूसीएन संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम | services = [[संरक्षित क्षेत्र]] नियोजन, नीति परामर्श और निवेश | equity = 2,500 सदस्य, 140 देश | parent = [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|आईयूसीएन]] | divisions = अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप | homepage = {{URL|https://www.iucn.org/commissions/world-commission-protected-areas|WCPA वेबसाइट}} }} '''विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग''', प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ के छह प्रमुख आयोगों में से एक है, जो वैश्विक स्तर पर संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/about/union/commissions|title=Commissions|date=2015-09-14|website= आईयूसीएन|language=en|access-date=2019-06-11}}</ref> ==इतिहास== प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने 1948 में राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण और प्रबंधन के उद्देश्य से एक समिति की स्थापना की, जो आगे चलकर वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। समय के साथ, जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने प्रकृति संरक्षण से संबंधित ज्ञान और अनुभवों के आदान-प्रदान की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से महसूस किया, तब आईयूसीएन से राष्ट्रीय उद्यानों की एक विश्वव्यापी सूची तैयार करने का दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया गया। इस बढ़ती भूमिका और उत्तरदायित्व के परिणामस्वरूप, 1960 में इस समिति को उन्नत कर एक स्थायी आयोग का रूप दिया गया, जिसे राष्ट्रीय उद्यान आयोग के नाम से जाना गया। अंततः 1996 में, विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग ने आईयूसीएन कांग्रेस की स्वीकृति के साथ अपना वर्तमान नाम अपनाया।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|title=50 Years of Working for Protected Areas|last=आईयूसीएन|date=2010|access-date=11 जून 2019|archive-date=22 दिसंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191222083530/https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|url-status=dead}}</ref> इस परिवर्तन ने न केवल इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि यह आयोग अब केवल राष्ट्रीय उद्यानों तक सीमित न रहकर विश्व भर के सभी संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत विकास के व्यापक उद्देश्य के प्रति समर्पित है। == सन्दर्भ == [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] 8iw0ql9upgl4x4gedkn42hlyc816512 6543627 6543625 2026-04-24T14:19:26Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543627 wikitext text/x-wiki {{Infobox company | name = आईयूसीएन विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग | logo = | type = आयोग | location = ग्लैंड, स्विट्जरलैंड | area_served = विश्वव्यापी | key_people = मधु राव (अध्यक्ष) | industry = प्रकृति संरक्षण | products = आईयूसीएन संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम | services = [[संरक्षित क्षेत्र]] नियोजन, नीति परामर्श और निवेश | equity = 2,500 सदस्य, 140 देश | parent = [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|आईयूसीएन]] | divisions = अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप | homepage = {{URL|https://www.iucn.org/commissions/world-commission-protected-areas|WCPA वेबसाइट}} }} '''विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग''', [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] के छह प्रमुख आयोगों में से एक है, जो वैश्विक स्तर पर संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/about/union/commissions|title=Commissions|date=2015-09-14|website= आईयूसीएन|language=en|access-date=2019-06-11}}</ref> ==इतिहास== प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने 1948 में राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण और प्रबंधन के उद्देश्य से एक समिति की स्थापना की, जो आगे चलकर वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। समय के साथ, जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने प्रकृति संरक्षण से संबंधित ज्ञान और अनुभवों के आदान-प्रदान की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से महसूस किया, तब आईयूसीएन से राष्ट्रीय उद्यानों की एक विश्वव्यापी सूची तैयार करने का दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया गया। इस बढ़ती भूमिका और उत्तरदायित्व के परिणामस्वरूप, 1960 में इस समिति को उन्नत कर एक स्थायी आयोग का रूप दिया गया, जिसे राष्ट्रीय उद्यान आयोग के नाम से जाना गया। अंततः 1996 में, विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग ने आईयूसीएन कांग्रेस की स्वीकृति के साथ अपना वर्तमान नाम अपनाया।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|title=50 Years of Working for Protected Areas|last=आईयूसीएन|date=2010|access-date=11 जून 2019|archive-date=22 दिसंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191222083530/https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|url-status=dead}}</ref> इस परिवर्तन ने न केवल इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि यह आयोग अब केवल राष्ट्रीय उद्यानों तक सीमित न रहकर विश्व भर के सभी संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत विकास के व्यापक उद्देश्य के प्रति समर्पित है। == सन्दर्भ == [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] 31oal8jjplaq3a1kzxj0m5ov9qeaa8l 6543628 6543627 2026-04-24T14:25:50Z चाहर धर्मेंद्र 703114 इन्हें भी देखें 6543628 wikitext text/x-wiki {{Infobox company | name = आईयूसीएन विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग | logo = | type = आयोग | location = ग्लैंड, स्विट्जरलैंड | area_served = विश्वव्यापी | key_people = मधु राव (अध्यक्ष) | industry = प्रकृति संरक्षण | products = आईयूसीएन संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम | services = [[संरक्षित क्षेत्र]] नियोजन, नीति परामर्श और निवेश | equity = 2,500 सदस्य, 140 देश | parent = [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|आईयूसीएन]] | divisions = अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप | homepage = {{URL|https://www.iucn.org/commissions/world-commission-protected-areas|WCPA वेबसाइट}} }} '''विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग''', [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] के छह प्रमुख आयोगों में से एक है, जो वैश्विक स्तर पर संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/about/union/commissions|title=Commissions|date=2015-09-14|website= आईयूसीएन|language=en|access-date=2019-06-11}}</ref> ==इतिहास== प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने 1948 में राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण और प्रबंधन के उद्देश्य से एक समिति की स्थापना की, जो आगे चलकर वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। समय के साथ, जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने प्रकृति संरक्षण से संबंधित ज्ञान और अनुभवों के आदान-प्रदान की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से महसूस किया, तब आईयूसीएन से राष्ट्रीय उद्यानों की एक विश्वव्यापी सूची तैयार करने का दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया गया। इस बढ़ती भूमिका और उत्तरदायित्व के परिणामस्वरूप, 1960 में इस समिति को उन्नत कर एक स्थायी आयोग का रूप दिया गया, जिसे राष्ट्रीय उद्यान आयोग के नाम से जाना गया। अंततः 1996 में, विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग ने आईयूसीएन कांग्रेस की स्वीकृति के साथ अपना वर्तमान नाम अपनाया।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|title=50 Years of Working for Protected Areas|last=आईयूसीएन|date=2010|access-date=11 जून 2019|archive-date=22 दिसंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191222083530/https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|url-status=dead}}</ref> इस परिवर्तन ने न केवल इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि यह आयोग अब केवल राष्ट्रीय उद्यानों तक सीमित न रहकर विश्व भर के सभी संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत विकास के व्यापक उद्देश्य के प्रति समर्पित है। ==इन्हें भी देखें== * [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] * [[राष्ट्रीय उद्यान]] * [[संरक्षित क्षेत्र] == सन्दर्भ == [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] dnl3mepuzp3fkjxhh77myhoig98kpqs 6543629 6543628 2026-04-24T14:26:07Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543629 wikitext text/x-wiki {{Infobox company | name = आईयूसीएन विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग | logo = | type = आयोग | location = ग्लैंड, स्विट्जरलैंड | area_served = विश्वव्यापी | key_people = मधु राव (अध्यक्ष) | industry = प्रकृति संरक्षण | products = आईयूसीएन संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम | services = [[संरक्षित क्षेत्र]] नियोजन, नीति परामर्श और निवेश | equity = 2,500 सदस्य, 140 देश | parent = [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|आईयूसीएन]] | divisions = अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप | homepage = {{URL|https://www.iucn.org/commissions/world-commission-protected-areas|WCPA वेबसाइट}} }} '''विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग''', [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ|प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ]] के छह प्रमुख आयोगों में से एक है, जो वैश्विक स्तर पर संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/about/union/commissions|title=Commissions|date=2015-09-14|website= आईयूसीएन|language=en|access-date=2019-06-11}}</ref> ==इतिहास== प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने 1948 में राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण और प्रबंधन के उद्देश्य से एक समिति की स्थापना की, जो आगे चलकर वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। समय के साथ, जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने प्रकृति संरक्षण से संबंधित ज्ञान और अनुभवों के आदान-प्रदान की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से महसूस किया, तब आईयूसीएन से राष्ट्रीय उद्यानों की एक विश्वव्यापी सूची तैयार करने का दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया गया। इस बढ़ती भूमिका और उत्तरदायित्व के परिणामस्वरूप, 1960 में इस समिति को उन्नत कर एक स्थायी आयोग का रूप दिया गया, जिसे राष्ट्रीय उद्यान आयोग के नाम से जाना गया। अंततः 1996 में, विश्व संरक्षित क्षेत्र आयोग ने आईयूसीएन कांग्रेस की स्वीकृति के साथ अपना वर्तमान नाम अपनाया।<ref>{{Cite web|url=https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|title=50 Years of Working for Protected Areas|last=आईयूसीएन|date=2010|access-date=11 जून 2019|archive-date=22 दिसंबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191222083530/https://www.iucn.org/sites/dev/files/import/downloads/history_wcpa_15july_web_version_1.pdf|url-status=dead}}</ref> इस परिवर्तन ने न केवल इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि यह आयोग अब केवल राष्ट्रीय उद्यानों तक सीमित न रहकर विश्व भर के सभी संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत विकास के व्यापक उद्देश्य के प्रति समर्पित है। ==इन्हें भी देखें== * [[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] * [[राष्ट्रीय उद्यान]] * [[संरक्षित क्षेत्र]] == सन्दर्भ == [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]] [[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठन]] tsx64g03q4r278isjfsn97ycdv29vs5 श्रेणी वार्ता:इतिहास सोनभद्र का इतिहास-- सोनभद्र प्राचीन 15 1611544 6543639 2026-04-24T15:01:39Z Ramnathshivendra 862096 /* शीघ्र हटाने पर चर्चा */ नया अनुभाग 6543639 wikitext text/x-wiki == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस पृष्ठ को परीक्षण पृष्ठ होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:01, 24 अप्रैल 2026 (UTC) इसे नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि यह मेरी इतिहास पुस्तक सोनभद्र प्राचीन से लिया गया है जो एक प्रमाणित पुस्तक है और प्रिंट मीडिया से प्रकाशित है या विकी बुक्स पर इसका जाना बहुत अनिवार्य है आपके सम्मानित प्लेटफार्म से अगर यह पुस्तक लोगों को निशुल्क पढ़ने के लिए मिलेगी तो जनहित का काम होगा इसलिए मेरा आग्रह है की पुनर्विचार करते हुए इसे अपने सम्मानित मंच से न हटाए गए lnnc699s1i6tnk01tn9ogfqwwh2asta 6543658 6543639 2026-04-24T16:09:12Z चाहर धर्मेंद्र 703114 /* शीघ्र हटाने पर चर्चा */ उत्तर 6543658 wikitext text/x-wiki == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस पृष्ठ को परीक्षण पृष्ठ होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:01, 24 अप्रैल 2026 (UTC) :@[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] महोदय, :केवल किसी प्रकाशित पुस्तक से सामग्री ली गई होने मात्र से उसे विकिपीडिया पर उसी रूप में रखना उचित नहीं होता, विशेषकर जब वह कॉपीराइट के अंतर्गत हो। विकिपीडिया पर सामग्री का प्रस्तुतीकरण सार-संक्षेप रूप में, स्वतंत्र एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर तथा कॉपीराइट नीतियों के अनुरूप होना आवश्यक है। :यदि संबंधित विषय पर पर्याप्त स्वतंत्र स्रोत उपलब्ध हैं, तो उनके आधार पर लेख को ज्ञानकोशीय शैली में पुनर्लेखित किया जा सकता है। साथ ही, यदि पुस्तक सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है, तो उसे उपयुक्त परियोजना (जैसे विकिस्रोत) पर रखा जा सकता है। :अतः वर्तमान स्थिति में नीतियों के अनुरूप निर्णय लिया जाना उचित होगा। <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 16:09, 24 अप्रैल 2026 (UTC) इसे नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि यह मेरी इतिहास पुस्तक सोनभद्र प्राचीन से लिया गया है जो एक प्रमाणित पुस्तक है और प्रिंट मीडिया से प्रकाशित है या विकी बुक्स पर इसका जाना बहुत अनिवार्य है आपके सम्मानित प्लेटफार्म से अगर यह पुस्तक लोगों को निशुल्क पढ़ने के लिए मिलेगी तो जनहित का काम होगा इसलिए मेरा आग्रह है की पुनर्विचार करते हुए इसे अपने सम्मानित मंच से न हटाए गए slj9oujclygpwusio3ggae4mzhric3r 6543659 6543658 2026-04-24T16:09:38Z चाहर धर्मेंद्र 703114 /* शीघ्र हटाने पर चर्चा */ 6543659 wikitext text/x-wiki == शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस पृष्ठ को परीक्षण पृष्ठ होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 15:01, 24 अप्रैल 2026 (UTC) इसे नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि यह मेरी इतिहास पुस्तक सोनभद्र प्राचीन से लिया गया है जो एक प्रमाणित पुस्तक है और प्रिंट मीडिया से प्रकाशित है या विकी बुक्स पर इसका जाना बहुत अनिवार्य है आपके सम्मानित प्लेटफार्म से अगर यह पुस्तक लोगों को निशुल्क पढ़ने के लिए मिलेगी तो जनहित का काम होगा इसलिए मेरा आग्रह है की पुनर्विचार करते हुए इसे अपने सम्मानित मंच से न हटाए गए :@[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] महोदय, :केवल किसी प्रकाशित पुस्तक से सामग्री ली गई होने मात्र से उसे विकिपीडिया पर उसी रूप में रखना उचित नहीं होता, विशेषकर जब वह कॉपीराइट के अंतर्गत हो। विकिपीडिया पर सामग्री का प्रस्तुतीकरण सार-संक्षेप रूप में, स्वतंत्र एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर तथा कॉपीराइट नीतियों के अनुरूप होना आवश्यक है। :यदि संबंधित विषय पर पर्याप्त स्वतंत्र स्रोत उपलब्ध हैं, तो उनके आधार पर लेख को ज्ञानकोशीय शैली में पुनर्लेखित किया जा सकता है। साथ ही, यदि पुस्तक सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है, तो उसे उपयुक्त परियोजना (जैसे विकिस्रोत) पर रखा जा सकता है। :अतः वर्तमान स्थिति में नीतियों के अनुरूप निर्णय लिया जाना उचित होगा। <span style="text-shadow:black 3px 3px 2px;color:orange;">☆★</span>[[सदस्य:चाहर धर्मेंद्र|<u><span style="color:Cyan;">चाहर धर्मेंद्र</span></u>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:चाहर धर्मेंद्र|<small style="color:orange">--राम राम जी--</small>]]</sup> 16:09, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 5dkp79b0g3h1ksa8zfjivgnmfbopqrg सदस्य वार्ता:~2026-25147-04 3 1611545 6543648 2026-04-24T15:26:58Z AMAN KUMAR 911487 चेतावनी: विकिपीडिया का प्रोमोशन अथवा प्रचार के लिए प्रयोग करना [[:पाइथागोरस प्रमेय]] पर. 6543648 wikitext text/x-wiki == अप्रैल 2026 == [[File:Nuvola apps important.svg|25px|alt=|link=]] कृपया [[विकिपीडिया:विघटनकारी सम्पादन|विघटनकारी संपादन]] करना बंद करें। अगर आप विकिपीडिया पर [[विकिपीडिया:विकिपीडिया क्या नहीं है#विकिपीडिया भाषण देने या प्रचार करने का मंच नहीं है|भाषण देना, विज्ञापन या प्रचार सामग्री जोड़ना]] जारी रखते हैं, जैसा कि आपने [[:पाइथागोरस प्रमेय]] पर किया है, तो आपको [[विकिपीडिया:निषेध नियमावली|संपादन करने से अवरोधित]] किया जा सकता है। [[श्रेणी:सदस्य वार्ता पन्नें जिनपर Uw-advert3 सूचना है|{{PAGENAME}}]]<!-- Template:Uw-advert3 --> [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:26, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 1q4rk9976ydwv22sqsusykvcouo1wqh सदस्य वार्ता:~2026-25229-18 3 1611546 6543650 2026-04-24T15:29:50Z AMAN KUMAR 911487 चेतावनी: विकिपीडिया का प्रोमोशन अथवा प्रचार के लिए प्रयोग करना [[:गैलेन]] पर. 6543650 wikitext text/x-wiki == अप्रैल 2026 == [[File:Nuvola apps important.svg|25px|alt=|link=]] कृपया [[विकिपीडिया:विघटनकारी सम्पादन|विघटनकारी संपादन]] करना बंद करें। अगर आप विकिपीडिया पर [[विकिपीडिया:विकिपीडिया क्या नहीं है#विकिपीडिया भाषण देने या प्रचार करने का मंच नहीं है|भाषण देना, विज्ञापन या प्रचार सामग्री जोड़ना]] जारी रखते हैं, जैसा कि आपने [[:गैलेन]] पर किया है, तो आपको [[विकिपीडिया:निषेध नियमावली|संपादन करने से अवरोधित]] किया जा सकता है। [[श्रेणी:सदस्य वार्ता पन्नें जिनपर Uw-advert3 सूचना है|{{PAGENAME}}]]<!-- Template:Uw-advert3 --> [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- 15:29, 24 अप्रैल 2026 (UTC) 5oul39olkqr90pxttxeux3os0lxv7ff प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 0 1611547 6543655 2026-04-24T15:59:27Z चाहर धर्मेंद्र 703114 आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग 6543655 wikitext text/x-wiki '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन प्राकृतिक संपदाओं—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें आर्थिक विकास<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार पर्यावरणीय अवनति, मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी जहाँ स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित वैश्विक दक्षिण में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ विकासशील देशों से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में कच्चे माल के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे खनन, भाप-शक्ति का उपयोग तथा यांत्रिक उपकरणों का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले गैर-नवीकरणीय संसाधनों में उपमृदा खनिजों का विशेष स्थान है, जिनमें बहुमूल्य धातुएँ सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, गहन कृषि उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—प्राकृतिक परिवेश के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनों का क्षरण तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=Orecchia |first1=Carlo |last2=Zoppoli |first2=Pietro |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=Timsina |first1=Shrabya |last2=Hardy |first2=Nora G. |last3=Woodbury |first3=David J. |last4=Ashton |first4=Mark S. |last5=Cook-Patton |first5=Susan C. |last6=Pasternack |first6=Rachel |last7=Martin |first7=Meredith P. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=Land Degradation & Development |language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=Carton |first1=Guillaume |last2=Parigot |first2=Julia |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=Organization & Environment |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=Fasona |first1=Mayowa |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=Leal Filho |editor-first=Walter |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=Springer International Publishing |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=Adeonipekun |first2=Peter Adegbenga |last3=Agboola |first3=Oludare |last4=Akintuyi |first4=Akinlabi |last5=Bello |first5=Adedoyin |last6=Ogundipe |first6=Oluwatoyin |last7=Soneye |first7=Alabi |last8=Omojola |first8=Ademola|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=Shvidenko |first=A. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=Jørgensen |editor-first=Sven Erik |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=Oxford |publisher=Academic Press |language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=Fath |editor2-first=Brian D. |encyclopedia=Encyclopedia of Ecology}}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=D'Odorico |first1=Paolo |last2=Bhattachan |first2=Abinash |last3=Davis |first3=Kyle F. |last4=Ravi |first4=Sujith |last5=Runyan |first5=Christiane W. |date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=Advances in Water Resources |series=35th Year Anniversary Issue |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=Mittal |first1=Ishwar |last2=Gupta |first2=Ravi Kumar |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=Soch Mastnath Journal of Science & Technology |language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=Redford |first=Kent H. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal=BioScience |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=Sorrell |first1=Steve |last2=Speirs |first2=Jamie |last3=Bentley |first3=Roger |last4=Brandt |first4=Adam |last5=Miller |first5=Richard |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=Energy Policy |series=Special Section on Carbon Emissions and Carbon Management in Cities with Regular Papers |language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=Elsevier Science Direct|url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=Gilio-Whitaker |first1=Dina |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=Beacon Press}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == 22vvwlo3jik4r5y1vwj5qxy61xn7l1h 6543656 6543655 2026-04-24T15:59:38Z चाहर धर्मेंद्र 703114 टैग {{[[साँचा:काम जारी|काम जारी]]}} लेख में जोड़ा जा रहा ([[वि:ट्विंकल|ट्विंकल]]) 6543656 wikitext text/x-wiki {{काम जारी|date=अप्रैल 2026}} '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन प्राकृतिक संपदाओं—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें आर्थिक विकास<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार पर्यावरणीय अवनति, मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी जहाँ स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित वैश्विक दक्षिण में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ विकासशील देशों से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में कच्चे माल के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे खनन, भाप-शक्ति का उपयोग तथा यांत्रिक उपकरणों का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले गैर-नवीकरणीय संसाधनों में उपमृदा खनिजों का विशेष स्थान है, जिनमें बहुमूल्य धातुएँ सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, गहन कृषि उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—प्राकृतिक परिवेश के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनों का क्षरण तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=Orecchia |first1=Carlo |last2=Zoppoli |first2=Pietro |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=Timsina |first1=Shrabya |last2=Hardy |first2=Nora G. |last3=Woodbury |first3=David J. |last4=Ashton |first4=Mark S. |last5=Cook-Patton |first5=Susan C. |last6=Pasternack |first6=Rachel |last7=Martin |first7=Meredith P. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=Land Degradation & Development |language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=Carton |first1=Guillaume |last2=Parigot |first2=Julia |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=Organization & Environment |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=Fasona |first1=Mayowa |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=Leal Filho |editor-first=Walter |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=Springer International Publishing |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=Adeonipekun |first2=Peter Adegbenga |last3=Agboola |first3=Oludare |last4=Akintuyi |first4=Akinlabi |last5=Bello |first5=Adedoyin |last6=Ogundipe |first6=Oluwatoyin |last7=Soneye |first7=Alabi |last8=Omojola |first8=Ademola|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=Shvidenko |first=A. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=Jørgensen |editor-first=Sven Erik |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=Oxford |publisher=Academic Press |language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=Fath |editor2-first=Brian D. |encyclopedia=Encyclopedia of Ecology}}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=D'Odorico |first1=Paolo |last2=Bhattachan |first2=Abinash |last3=Davis |first3=Kyle F. |last4=Ravi |first4=Sujith |last5=Runyan |first5=Christiane W. |date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=Advances in Water Resources |series=35th Year Anniversary Issue |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=Mittal |first1=Ishwar |last2=Gupta |first2=Ravi Kumar |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=Soch Mastnath Journal of Science & Technology |language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=Redford |first=Kent H. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal=BioScience |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=Sorrell |first1=Steve |last2=Speirs |first2=Jamie |last3=Bentley |first3=Roger |last4=Brandt |first4=Adam |last5=Miller |first5=Richard |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=Energy Policy |series=Special Section on Carbon Emissions and Carbon Management in Cities with Regular Papers |language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=Elsevier Science Direct|url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=Gilio-Whitaker |first1=Dina |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=Beacon Press}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == 71qletd2tmwqqwrrjcp51qnlu2wta3w 6543742 6543656 2026-04-25T03:51:47Z चाहर धर्मेंद्र 703114 कुछ स्रोत सुधारे 6543742 wikitext text/x-wiki {{काम जारी|date=अप्रैल 2026}} '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन प्राकृतिक संपदाओं—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें आर्थिक विकास<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार पर्यावरणीय अवनति, मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी जहाँ स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित वैश्विक दक्षिण में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ विकासशील देशों से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में कच्चे माल के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे खनन, भाप-शक्ति का उपयोग तथा यांत्रिक उपकरणों का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले गैर-नवीकरणीय संसाधनों में उपमृदा खनिजों का विशेष स्थान है, जिनमें बहुमूल्य धातुएँ सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, गहन कृषि उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—प्राकृतिक परिवेश के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनों का क्षरण तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=ओरेचिया |first1=कार्लो |last2=ज़ोपोली |first2=पिएत्रो |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=टिमसिना |first1=श्रब्या|last2=हार्डी |first2=नोरा जी.|last3=वुडबरी |first3=डेविड जे.|last4=एश्टन |first4=मार्क एस. |last5=कुक-पैटन |first5=सुसान सी. |last6=पास्टर्नैक |first6=राहेल |last7=मार्टिन |first7=मेरेडिथ पी. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=भूमि क्षरण और विकास|language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=कार्टन |first1=गुइलौम |last2=पैरिगोट |first2=जूलिया |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=संगठन और पर्यावरण |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=फसोना|first1=मायोवा |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=लील फिल्हो|editor-first=वाल्टर |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=स्प्रिंगर इंटरनेशनल पब्लिशिंग |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=एडेओनिपेकुन |first2=पीटर एडेगबेंगा |last3=अगबूला |first3=ओलुडारे |last4=अकिंतुयी |first4=अकिनलाबी |last5=बेलो |first5=एडेडोयिन |last6=ओगुंडिपे |first6=ओलुवातोयिन |last7=सोनी |first7=अलाबी |last8=ओमोजोला |first8=एडेमोला|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=शिविडेन्को |first=ए. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=जॉर्गेनसेन|editor-first=स्वेन एरिक |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=ऑक्सफोर्ड |publisher=एकेडमिक प्रेस|language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=फाथ |editor2-first=ब्रायन डी.|encyclopedia=नसाइक्लोपीडिया ऑफ इकोलॉजी }}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=डी'ओडोरिको|first1=पाओलो |last2=भट्टाचन |first2=अबिनाश |last3=डेविस |first3=काइल एफ. |last4=रवि |first4=सुजीत |last5=रनयान |first5=क्रिस्टियान डब्ल्यू.|date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=जल संसाधन में प्रगति |series=35वीं वर्षगांठ अंक |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=मित्तल |first1=ईश्वर |last2=गुप्ता |first2=रवि कुमार |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=सोच मस्तनाथ जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी|language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=रेडफोर्ड|first=केंट एच. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal= बायोसाइंस |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=सोरेल |first1=स्टीव |last2=स्पीयर्स |first2=जेमी |last3=बेंटली |first3=रोजर |last4=ब्रांट |first4=एडम |last5=मिलर |first5=रिचर्ड |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=ऊर्जा नीति |series=नियमित पत्रों के साथ शहरों में कार्बन उत्सर्जन और कार्बन प्रबंधन पर विशेष अनुभाग|language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=एल्सवियर साइंस डायरेक्ट |url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=गिलियो-व्हिटेकर |first1=दीना |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=बीकन प्रेस}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == b9sma5wzom6t9psf3ddu0w53o95udaa 6543745 6543742 2026-04-25T03:55:48Z चाहर धर्मेंद्र 703114 6543745 wikitext text/x-wiki '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन [[प्राकृतिक संसाधन|प्राकृतिक संपदाओं]]—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें [[आर्थिक वृद्धि|आर्थिक विकास]]<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार [[पर्यावरणीय अवनयन|पर्यावरणीय अवनति]], मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी जहाँ स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित वैश्विक दक्षिण में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ विकासशील देशों से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में कच्चे माल के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे खनन, भाप-शक्ति का उपयोग तथा यांत्रिक उपकरणों का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले गैर-नवीकरणीय संसाधनों में उपमृदा खनिजों का विशेष स्थान है, जिनमें बहुमूल्य धातुएँ सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, गहन कृषि उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—प्राकृतिक परिवेश के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनों का क्षरण तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=ओरेचिया |first1=कार्लो |last2=ज़ोपोली |first2=पिएत्रो |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=टिमसिना |first1=श्रब्या|last2=हार्डी |first2=नोरा जी.|last3=वुडबरी |first3=डेविड जे.|last4=एश्टन |first4=मार्क एस. |last5=कुक-पैटन |first5=सुसान सी. |last6=पास्टर्नैक |first6=राहेल |last7=मार्टिन |first7=मेरेडिथ पी. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=भूमि क्षरण और विकास|language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=कार्टन |first1=गुइलौम |last2=पैरिगोट |first2=जूलिया |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=संगठन और पर्यावरण |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=फसोना|first1=मायोवा |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=लील फिल्हो|editor-first=वाल्टर |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=स्प्रिंगर इंटरनेशनल पब्लिशिंग |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=एडेओनिपेकुन |first2=पीटर एडेगबेंगा |last3=अगबूला |first3=ओलुडारे |last4=अकिंतुयी |first4=अकिनलाबी |last5=बेलो |first5=एडेडोयिन |last6=ओगुंडिपे |first6=ओलुवातोयिन |last7=सोनी |first7=अलाबी |last8=ओमोजोला |first8=एडेमोला|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=शिविडेन्को |first=ए. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=जॉर्गेनसेन|editor-first=स्वेन एरिक |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=ऑक्सफोर्ड |publisher=एकेडमिक प्रेस|language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=फाथ |editor2-first=ब्रायन डी.|encyclopedia=नसाइक्लोपीडिया ऑफ इकोलॉजी }}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=डी'ओडोरिको|first1=पाओलो |last2=भट्टाचन |first2=अबिनाश |last3=डेविस |first3=काइल एफ. |last4=रवि |first4=सुजीत |last5=रनयान |first5=क्रिस्टियान डब्ल्यू.|date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=जल संसाधन में प्रगति |series=35वीं वर्षगांठ अंक |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=मित्तल |first1=ईश्वर |last2=गुप्ता |first2=रवि कुमार |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=सोच मस्तनाथ जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी|language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=रेडफोर्ड|first=केंट एच. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal= बायोसाइंस |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=सोरेल |first1=स्टीव |last2=स्पीयर्स |first2=जेमी |last3=बेंटली |first3=रोजर |last4=ब्रांट |first4=एडम |last5=मिलर |first5=रिचर्ड |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=ऊर्जा नीति |series=नियमित पत्रों के साथ शहरों में कार्बन उत्सर्जन और कार्बन प्रबंधन पर विशेष अनुभाग|language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=एल्सवियर साइंस डायरेक्ट |url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=गिलियो-व्हिटेकर |first1=दीना |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=बीकन प्रेस}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == r0cjpt4wud6v814z6jiimohxc2zldfl 6543757 6543745 2026-04-25T05:03:00Z अनुनाद सिंह 1634 6543757 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Timber DonnellyMills2005 SeanMcClean.jpg|right|thumb|300px|वृक्षों को अन्धाधुंध काटना प्राकृति का दोहन है।]] [[चित्र:Бачатский экскаваторы.JPG|right|thumb|300px|खनिजों का दोहन]] [[चित्र:Derelict fishing gear with animal carcasses.jpg|right|thumb|300px|अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे मछली पकड़ना]] '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन [[प्राकृतिक संसाधन|प्राकृतिक संपदाओं]]—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें [[आर्थिक वृद्धि|आर्थिक विकास]]<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार [[पर्यावरणीय अवनयन|पर्यावरणीय अवनति]], मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी जहाँ स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित वैश्विक दक्षिण में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ विकासशील देशों से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में कच्चे माल के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे खनन, भाप-शक्ति का उपयोग तथा यांत्रिक उपकरणों का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले गैर-नवीकरणीय संसाधनों में उपमृदा खनिजों का विशेष स्थान है, जिनमें बहुमूल्य धातुएँ सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, गहन कृषि उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—प्राकृतिक परिवेश के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनों का क्षरण तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=ओरेचिया |first1=कार्लो |last2=ज़ोपोली |first2=पिएत्रो |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=टिमसिना |first1=श्रब्या|last2=हार्डी |first2=नोरा जी.|last3=वुडबरी |first3=डेविड जे.|last4=एश्टन |first4=मार्क एस. |last5=कुक-पैटन |first5=सुसान सी. |last6=पास्टर्नैक |first6=राहेल |last7=मार्टिन |first7=मेरेडिथ पी. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=भूमि क्षरण और विकास|language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=कार्टन |first1=गुइलौम |last2=पैरिगोट |first2=जूलिया |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=संगठन और पर्यावरण |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=फसोना|first1=मायोवा |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=लील फिल्हो|editor-first=वाल्टर |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=स्प्रिंगर इंटरनेशनल पब्लिशिंग |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=एडेओनिपेकुन |first2=पीटर एडेगबेंगा |last3=अगबूला |first3=ओलुडारे |last4=अकिंतुयी |first4=अकिनलाबी |last5=बेलो |first5=एडेडोयिन |last6=ओगुंडिपे |first6=ओलुवातोयिन |last7=सोनी |first7=अलाबी |last8=ओमोजोला |first8=एडेमोला|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=शिविडेन्को |first=ए. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=जॉर्गेनसेन|editor-first=स्वेन एरिक |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=ऑक्सफोर्ड |publisher=एकेडमिक प्रेस|language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=फाथ |editor2-first=ब्रायन डी.|encyclopedia=नसाइक्लोपीडिया ऑफ इकोलॉजी }}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=डी'ओडोरिको|first1=पाओलो |last2=भट्टाचन |first2=अबिनाश |last3=डेविस |first3=काइल एफ. |last4=रवि |first4=सुजीत |last5=रनयान |first5=क्रिस्टियान डब्ल्यू.|date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=जल संसाधन में प्रगति |series=35वीं वर्षगांठ अंक |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=मित्तल |first1=ईश्वर |last2=गुप्ता |first2=रवि कुमार |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=सोच मस्तनाथ जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी|language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=रेडफोर्ड|first=केंट एच. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal= बायोसाइंस |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=सोरेल |first1=स्टीव |last2=स्पीयर्स |first2=जेमी |last3=बेंटली |first3=रोजर |last4=ब्रांट |first4=एडम |last5=मिलर |first5=रिचर्ड |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=ऊर्जा नीति |series=नियमित पत्रों के साथ शहरों में कार्बन उत्सर्जन और कार्बन प्रबंधन पर विशेष अनुभाग|language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=एल्सवियर साइंस डायरेक्ट |url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=गिलियो-व्हिटेकर |first1=दीना |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=बीकन प्रेस}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == exrby8gciet2ejno8w4s87dkv19rekq 6543781 6543757 2026-04-25T07:33:46Z चाहर धर्मेंद्र 703114 विकि कड़ियाँ 6543781 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Timber DonnellyMills2005 SeanMcClean.jpg|right|thumb|300px|वृक्षों को अन्धाधुंध काटना प्राकृति का दोहन है।]] [[चित्र:Бачатский экскаваторы.JPG|right|thumb|300px|खनिजों का दोहन]] [[चित्र:Derelict fishing gear with animal carcasses.jpg|right|thumb|300px|अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे मछली पकड़ना]] '''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''' से आशय उन [[प्राकृतिक संसाधन|प्राकृतिक संपदाओं]]—जैसे खनिज, वन, जल या जीवाश्म ईंधन—के उपयोग से है, जिन्हें [[आर्थिक वृद्धि|आर्थिक विकास]]<ref> क्रोनिन, हेमांग . (2011). "[http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf Natural Resources and the Development-Environment Dilemma] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305015521/http://www.stimson.org/images/uploads/research-pdfs/Exploiting_Natural_Resources-Chapter_5_Cronin.pdf |date=2016-03-05 }}." ''प्राकृतिक संसाधनों का दोहन''. हेनरी एल. स्टिमसन केंद्र। पृ. 63</ref> और उन्नति<ref>{{Cite journal |last1=क्रोनिन |first1=रिचर्ड |last2=पंड्या |first2=अमित |date=2009 |title=Exploiting Natural Resources: Growth, Instability, and Conflict in the Middle East and Asia |url=https://www.stimson.org/wp-content/files/file-attachments/Exploiting_Natural_Resources-Full_0.pdf |journal=वैश्विक सुरक्षा के लिए स्टिमसन व्यावहारिक कदम }}</ref> के उद्देश्य से निकाला या उपभोग किया जाता है। प्रायः ये संसाधन सीमित या गैर-नवीकरणीय होते हैं, अतः उनका अनियंत्रित उपयोग दीर्घकालिक संतुलन के लिए चुनौती बन जाता है। संसाधनों के इस दोहन के साथ अनेक बार [[पर्यावरणीय अवनयन|पर्यावरणीय अवनति]], मानवीय असुरक्षा और सामाजिक तनाव भी जुड़ जाते हैं, जो विकास की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। [[संसाधन क्षरण|प्राकृतिक संसाधनों की कमी]] जहाँ स्थानीय स्तर पर [[आर्थिक वृद्धि|आर्थिक गतिविधियों]] को प्रभावित कर सकती है, वहीं उनकी प्रचुरता भी किसी राष्ट्र की समग्र समृद्धि की गारंटी नहीं होती। अनेक संसाधन-समृद्ध देश, विशेषकर तथाकथित [[उत्तर-दक्षिण विभाजन|वैश्विक दक्षिण]] में स्थित राष्ट्र, वितरण से जुड़े संघर्षों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं। संसाधनों के उपयोग को लेकर स्थानीय [[अफसरशाही|प्रशासनिक तंत्र]] में मतभेद तथा नीतिगत अस्पष्टता अक्सर इन चुनौतियों को और गहरा करती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी उद्योगों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण होती है, जहाँ [[विकासशील देश|विकासशील देशों]] से कच्चे संसाधनों का आयात किया जाता है, किंतु स्थानीय समुदायों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास भी असमानता, प्रदूषण और सामाजिक विषमता जैसे नकारात्मक प्रभाव उभरते हैं।<ref name=":3" /> [[औद्योगिक क्रांति]] के प्रभाव से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 19वीं शताब्दी में अभूतपूर्व रूप से औद्योगिक पैमाने पर विकसित होने लगा। इस काल में [[कच्चा माल|कच्चे माल]] के निष्कर्षण और प्रसंस्करण—जैसे [[खनन]], [[भाप का इंजन|भाप-शक्ति]] का उपयोग तथा [[यंत्र|यांत्रिक उपकरणों]] का विस्तार—पूर्व-औद्योगिक समाजों की तुलना में कहीं अधिक तीव्र और व्यापक हो गया। उत्पादन की बढ़ती माँग और तकनीकी उन्नति ने संसाधनों के उपयोग को एक नई दिशा दी, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध और अधिक गहरे तथा जटिल होते गए। 20वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते ऊर्जा की खपत में तीव्र वृद्धि हुई, जिसने औद्योगिक विकास को और गति प्रदान की। 2012 तक विश्व की लगभग 78.3% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति [[जीवाश्म ईंधन]] के निष्कर्षण से होने लगी, जिनमें [[खाद्य तेल|तेल]], [[कोयला]] और [[प्राकृतिक गैस]] प्रमुख हैं।<ref>{{cite web|last=प्लानास|first=फ्लोरेंट|title=The Exploitation of Natural Resources|url=http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|work=अन एन पोर ला प्लैनेट|access-date=22 मार्च 2012|archive-url=https://web.archive.org/web/20121112210559/http://www.unanpourlaplanete.org/en/the-human-footprint/the-exploitation-of-natural-resources.html|archive-date=12 नवंबर 2012|url-status=dead}}</ref> इस बढ़ती निर्भरता ने एक ओर वैश्विक विकास को सहारा दिया, तो दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमितता जैसे गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दिया, जो आज भी मानवता के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। मानव द्वारा व्यापक रूप से दोहन किए जाने वाले [[अनवीकरणीय संसाधन|गैर-नवीकरणीय संसाधनों]] में [[मृदा संस्तर|उपमृदा खनिजों]] का विशेष स्थान है, जिनमें [[बहुमूल्य धातु|बहुमूल्य धातुएँ]] सम्मिलित हैं और जिनका उपयोग मुख्यतः औद्योगिक [[पण्य|वस्तुओं के]] निर्माण में किया जाता है। इन संसाधनों का अनियंत्रित और तीव्र निष्कर्षण न केवल प्राकृतिक भंडार को क्षीण करता है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार, [[गहन कृषि]] उत्पादन—जो अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाया जाता है—[[प्राकृतिक पर्यावरण|प्राकृतिक परिवेश]] के अनेक आयामों को बाधित करता है; उदाहरणस्वरूप, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में [[वन|वनों]] का [[पर्यावरणीय अवनयन|क्षरण]] तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जल प्रदूषण इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं।<ref name=":0" /> जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास की गति तेज होती जाती है, वैसे-वैसे कच्चे माल के अस्थिर और अंधाधुंध निष्कर्षण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।<ref name=":0">{{cite book|last=मैकनिकोल|first=जेफ्री|title=Handbook of Sustainable Development|year=2007|publisher=एडवर्ड एल्गर पब्लिशिंग|pages=125–39|chapter-url=http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|access-date=2012-03-13|chapter=Population and Sustainability|archive-url=https://web.archive.org/web/20120311102205/http://www.popcouncil.org/pdfs/wp/205.pdf|archive-date=2012-03-11|url-status=dead}}</ref> जल, खनिज और वनों के निरंतर दोहन से पर्यावरण में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं, जो आगे चलकर जलवायु-आधारित विस्थापन, संसाधनों की कमी से उत्पन्न संघर्ष तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करने का कारण बन सकते हैं।<ref name=":3">{{Cite web |title=Climate and Environmental Security in the Democratic Republic of Congo {{!}} DGAP |url=https://dgap.org/en/research/publications/climate-and-environmental-security-democratic-republic-congo |access-date=2024-04-23 |website=dgap.org}}</ref> इस प्रकार, संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकताओं में से एक बन गया है। [[File:Artisanal cobalt miners in the Democratic Republic of Congo.jpg|thumb|कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनिज निर्यात से प्राप्त राजस्व से आता है। कांगो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन भंडारों के खनन के लिए व्यापक स्तर पर शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जो अक्सर जानलेवा परिस्थितियों में किया जाता है। कोबाल्ट के खनन से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जैसे कि असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम और जबरन श्रम, साथ ही साथ पर्यावरण का क्षरण भी हो रहा है।]] ==कारण== प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के पीछे अनेक परस्पर जुड़े कारण कार्य करते हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, उपभोग की प्रवृत्तियाँ और नीतिगत दृष्टिकोण प्रमुख हैं। आधुनिक युग में तकनीकी परिष्कार ने संसाधनों के निष्कर्षण की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। जहाँ कभी सीमित साधनों से वृक्षों की कटाई या खनन में लंबा समय लगता था, वहीं उन्नत यंत्रों और तकनीकों के कारण अब वनों की कटाई और खनिज उत्खनन अत्यंत तीव्र हो गया है।<ref>{{Cite book |last1=सबोगल |first1=सीज़र |url=https://doi.org/10.1007/0-387-29112-1_52 |title=Restoring Overlogged Tropical Forests. In: Forest Restoration in Landscapes. |last2=नासी |first2=रॉबर्ट |publisher=स्प्रिंगर, न्यूयॉर्क, एनवाई |year=2005 |isbn=978-0-387-29112-3 |pages=361–369 |doi=10.1007/0-387-29112-1_52 |language=en}}</ref> इस तीव्रता ने प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके साथ ही अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों की माँग को निरंतर बढ़ाया है। बढ़ती जनसंख्या और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह ने उत्पादन के विस्तार को प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और अधिक बढ़ गया।<ref>{{cite web |last1=सुब्रमणियन|first1=के.आर. |title=the crisis of consumption of natural resources. |url=https://www.researchgate.net/publication/327384344}}</ref> नई तकनीकों—विशेषकर विद्युत वाहनों और पोर्टेबल उपकरणों जैसे स्मार्टफ़ोन—के विकास ने भी खनिज संसाधनों पर निर्भरता को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट जैसे खनिजों के खनन में वृद्धि ने हरित आवरण को क्षति पहुँचाई है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, विशेषकर विकासशील देशों में जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां खनन होता है।<ref name=":02">{{Cite journal |last1=बंज़ा लुबाबा नकुलु |first1=सेलेस्टिन |last2=कैसास |first2=लिडिया |last3=हॉफ़्रॉइड |first3=विंसेंट |last4=डी पुटर |first4=थियरी |last5=सेनेन |first5=नेली डी.|last6=कायम्बे-किटेंज |first6=टोनी |last7=मूसा ओबदिया |first7=पॉल |last8=कायनिका वा मुकोमा |first8=डैनियल |last9=लुंडा इलुंगा |first9=जीन-मैरी |last10=नवरोट |first10=टिम एस. |last11=लुबोया नुम्बी |first11=ऑस्कर |last12=स्मोल्डर्स |first12=एरिक |last13=नेमेरी |first13=बेनोइट |date= सितंबर 2018 |title=Sustainability of artisanal mining of cobalt in DR Congo |journal=प्रकृति स्थिरता |volume=1 |issue=9 |pages=495–504 |doi=10.1038/s41893-018-0139-4 |issn=2398-9629 |pmc=6166862 |pmid=30288453|bibcode=2018NatSu...1..495B }}</ref> उपभोक्तावाद भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण है। भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित अस्थिर उपभोग न केवल उत्पादन की माँग को बढ़ाता है, बल्कि उन संसाधनों के अंधाधुंध निष्कर्षण को भी प्रोत्साहित करता है, जो इस माँग की पूर्ति के लिए आवश्यक होते हैं।<ref>{{Cite journal |last1=ओरेचिया |first1=कार्लो |last2=ज़ोपोली |first2=पिएत्रो |date=2007 |title=Consumerism and Environment: Does Consumption Behaviour Affect Environmental Quality?|journal=सीईआईएस टोर वर्गाटा |ssrn=1719507}}</ref> उदाहरणस्वरूप, आभूषणों की बढ़ती खपत ने सोने और हीरे के खनन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण, विषैले पदार्थों का प्रसार और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हुआ है।<ref name=":12">{{Cite journal |last1=टिमसिना |first1=श्रब्या|last2=हार्डी |first2=नोरा जी.|last3=वुडबरी |first3=डेविड जे.|last4=एश्टन |first4=मार्क एस. |last5=कुक-पैटन |first5=सुसान सी. |last6=पास्टर्नैक |first6=राहेल |last7=मार्टिन |first7=मेरेडिथ पी. |date=December 2022 |title=Tropical surface gold mining: A review of ecological impacts and restoration strategies |journal=भूमि क्षरण और विकास|language=en |volume=33 |issue=18 |pages=3661–3674 |doi=10.1002/ldr.4430 |bibcode=2022LDeDe..33.3661T |issn=1085-3278|doi-access=free }}</ref> इसके अतिरिक्त, प्रबंधन की वह सोच भी संसाधनों के दोहन को बढ़ाती है, जिसमें दुर्लभता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण संसाधनों का संरक्षण करने के बजाय उनका अधिकाधिक दोहन किया जाता है, जिससे उनकी कमी और भी तीव्र हो जाती है।<ref>{{Cite journal |last1=कार्टन |first1=गुइलौम |last2=पैरिगोट |first2=जूलिया |date=2024-04-18 |title=Toward an Ecological Resource Orchestration Model |url=https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/10860266241244784 |journal=संगठन और पर्यावरण |volume=37 |issue=4 |pages=526–548 |language=en |doi=10.1177/10860266241244784 |issn=1086-0266|url-access=subscription }}</ref> अंततः, मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की उपेक्षा भी एक गंभीर कारण है। जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो उनकी भूमि पर और उसके आसपास संसाधनों का शोषण बढ़ जाता है,<ref>{{Cite web |title=Lands, Natural Resources Represent Life for Indigenous Peoples, Not Mere Commodities, Speakers Stress as Permanent Forum begins Session {{!}} Meetings Coverage and Press Releases |url=https://press.un.org/en/2018/hr5387.doc.htm |access-date=2024-05-02 |website=press.un.org}}</ref> जिससे न केवल पर्यावरण, बल्कि सामाजिक न्याय भी प्रभावित होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत कारकों का सम्मिलित परिणाम है, जिसके समाधान के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। ==संसाधनों के दोहन के परिणाम== [[File:Deforestation in Nigeria team patrolling the deforestation site.jpg|thumb|नाइजीरिया में वनों की कटाई रोकने वाली एक टीम वनों की कटाई स्थल पर गश्त कर रही है। नाइजीरिया में वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, जिसका एक कारण कृषि, लकड़ी उद्योग और शहरी विकास का विस्तार है। जनसंख्या वृद्धि और गरीबी के कारण भूमि उपयोग में ये परिवर्तन हो रहे हैं।<ref>{{Citation |last1=फसोना|first1=मायोवा |title=Drivers of Deforestation and Land-Use Change in Southwest Nigeria |date=2018 |work=Handbook of Climate Change Resilience |pages=1–24 |editor-last=लील फिल्हो|editor-first=वाल्टर |url=https://doi.org/10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |access-date=2024-04-18 |place=Cham |publisher=स्प्रिंगर इंटरनेशनल पब्लिशिंग |language=en |doi=10.1007/978-3-319-71025-9_139-1 |isbn=978-3-319-71025-9 |last2=एडेओनिपेकुन |first2=पीटर एडेगबेंगा |last3=अगबूला |first3=ओलुडारे |last4=अकिंतुयी |first4=अकिनलाबी |last5=बेलो |first5=एडेडोयिन |last6=ओगुंडिपे |first6=ओलुवातोयिन |last7=सोनी |first7=अलाबी |last8=ओमोजोला |first8=एडेमोला|url-access=subscription }}</ref>]] प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, और उनका लापरवाहीपूर्ण तथा अत्यधिक उपयोग दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। जब मानव अपनी आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तब संतुलन भंग होने लगता है और इसके प्रभाव पर्यावरण, समाज तथा अर्थव्यवस्था—तीनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले, वनों की अंधाधुंध कटाई—चाहे वह कृषि विस्तार के लिए हो या औद्योगिक गतिविधियों के लिए—पृथ्वी के हरित आवरण को तेजी से नष्ट करती है। अनुमानतः पिछले आठ हजार वर्षों में मूल वन क्षेत्र का एक बड़ा भाग समाप्त हो चुका है,<ref>{{Citation |last=शिविडेन्को |first=ए. |title=Deforestation |date=2008-01-01 |pages=853–859 |editor-last=जॉर्गेनसेन|editor-first=स्वेन एरिक |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/B9780080454054005863 |access-date=2023-02-08 |place=ऑक्सफोर्ड |publisher=एकेडमिक प्रेस|language=en |isbn=978-0-08-045405-4 |editor2-last=फाथ |editor2-first=ब्रायन डी.|encyclopedia=नसाइक्लोपीडिया ऑफ इकोलॉजी }}</ref> जिससे जैव-विविधता और जलवायु संतुलन दोनों प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार, भूमि प्रबंधन में मानव-जनित हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जाती है और मिट्टी की उर्वरता तथा पारिस्थितिक सेवाएँ क्षीण हो जाती हैं।<ref>{{Cite journal |last1=डी'ओडोरिको|first1=पाओलो |last2=भट्टाचन |first2=अबिनाश |last3=डेविस |first3=काइल एफ. |last4=रवि |first4=सुजीत |last5=रनयान |first5=क्रिस्टियान डब्ल्यू.|date=2013-01-01 |title=Global desertification: Drivers and feedbacks |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0309170812000231 |journal=जल संसाधन में प्रगति |series=35वीं वर्षगांठ अंक |volume=51 |pages=326–344 |doi=10.1016/j.advwatres.2012.01.013 |bibcode=2013AdWR...51..326D |issn=0309-1708|url-access=subscription }}</ref> प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और असंतुलित दोहन अंततः उनके क्षय का कारण बनता है, जब उनकी खपत उनकी पुनःपूर्ति की गति से अधिक हो जाती है।<ref name=":1">{{Cite journal |last1=मित्तल |first1=ईश्वर |last2=गुप्ता |first2=रवि कुमार |date=30 सितंबर 2015 |title=Natural Resources Depletion and Economic Growth in Present Era |journal=सोच मस्तनाथ जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी|language=en |volume=10 |issue=3 |ssrn=2920080}}</ref> इसके साथ ही, संसाधनों के दोहन से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनते हैं<ref>{{Cite journal |last=रेडफोर्ड|first=केंट एच. |date=1992 |title=The Empty Forest |url=https://www.jstor.org/stable/1311860 |journal= बायोसाइंस |volume=42 |issue=6 |pages=412–422 |doi=10.2307/1311860 |jstor=1311860 |issn=0006-3568}}</ref>—कभी शिकार के रूप में, तो कभी उनके आवास के विनाश के कारण। पर्यावरणीय गिरावट के चलते मानव समुदायों को भी अपने निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे जबरन पलायन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसके अतिरिक्त, मिट्टी का कटाव, तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की कमी,<ref>{{Cite journal |last1=सोरेल |first1=स्टीव |last2=स्पीयर्स |first2=जेमी |last3=बेंटली |first3=रोजर |last4=ब्रांट |first4=एडम |last5=मिलर |first5=रिचर्ड |date= सितंबर 2010 |title=Global oil depletion: A review of the evidence |url=https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301421510003204 |journal=ऊर्जा नीति |series=नियमित पत्रों के साथ शहरों में कार्बन उत्सर्जन और कार्बन प्रबंधन पर विशेष अनुभाग|language=en |volume=38 |issue=9 |pages=5290–5295 |doi=10.1016/j.enpol.2010.04.046 |bibcode=2010EnPol..38.5290S |issn=0301-4215 |via=एल्सवियर साइंस डायरेक्ट |url-access=subscription }}</ref> ओज़ोन परत का क्षरण, ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि और जल के रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी जाती है। धातुओं और खनिजों के क्षय से औद्योगिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित वे स्वदेशी समुदाय होते हैं, जिनका जीवन सीधे प्रकृति पर निर्भर करता है। संसाधनों के क्षरण के कारण उनके पारंपरिक भोजन और जल स्रोत सीमित हो जाते हैं,<ref name=":4">{{cite book |last1=गिलियो-व्हिटेकर |first1=दीना |title=As long as grass grows: the indigenous fight for environmental justice, from colonization to Standing Rock |publisher=बीकन प्रेस}}</ref> जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व और जीवन-निर्वाह के साधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक गहन वैश्विक प्रश्न बन जाता है। == सन्दर्भ == b6mzta5hnijk32axgyd6usy8lyu8425 मैकमैग 0 1611548 6543669 2026-04-24T16:56:53Z ~2026-25094-34 921703 Password changed of management in instagram hacked 6543669 wikitext text/x-wiki guru gangwar q8fb6kqciqeg089db80ca1s4zsz4xfl 6543670 6543669 2026-04-24T17:00:53Z ~2026-25094-34 921703 पृष्ठ से सम्पूर्ण विषयवस्तु हटा रहा है 6543670 wikitext text/x-wiki phoiac9h4m842xq45sp7s6u21eteeq1 6543688 6543670 2026-04-24T18:17:52Z Cptabhiimanyuseven 858857 शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व2|शीह व2]]) 6543688 wikitext text/x-wiki {{db-test|help=off}} hwr0hn7eum888n8fx0j18phdhc4ky54 सदस्य वार्ता:Sushiltech1973 3 1611549 6543691 2026-04-24T18:25:54Z PhilKnight 27920 PhilKnight ने पृष्ठ [[सदस्य वार्ता:Sushiltech1973]] को [[सदस्य वार्ता:Sushil sr]] पर स्थानांतरित किया: "[[Special:CentralAuth/Sushiltech1973|Sushiltech1973]]" का नाम "[[Special:CentralAuth/Sushil sr|Sushil sr]]" करते समय पृष्ठ स्वतः स्थानांतरित हुआ 6543691 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[सदस्य वार्ता:Sushil sr]] 549o1godou0nu8k3gthetb3f8ixij59 समय रैना 0 1611550 6543698 2026-04-24T21:01:35Z Memu92 921725 नया पृष्ठ: {{Short description|भारतीय कॉमेडियन और यूट्यूबर (जन्म 1997)}} {{Infobox person | image = Samay raina (cropped).jpg | caption = रैना, 2020 में | birth_date = {{birth date and age|1997|10|26|df=y}} | birth_place = जम्मू, जम्मू और कश्मीर, भारत | alma_mater = PVG's COET, पुणे | occupation = {{h... 6543698 wikitext text/x-wiki {{Short description|भारतीय कॉमेडियन और यूट्यूबर (जन्म 1997)}} {{Infobox person | image = Samay raina (cropped).jpg | caption = रैना, 2020 में | birth_date = {{birth date and age|1997|10|26|df=y}} | birth_place = जम्मू, जम्मू और कश्मीर, भारत | alma_mater = PVG's COET, पुणे | occupation = {{hlist|स्टैंड-अप कॉमेडियन|यूट्यूबर}} | years_active = 2017–वर्तमान | known_for = {{hlist|''India's Got Latent''|''Comicstaan 2''}} }} '''समय रैना''' (जन्म 26 अक्टूबर 1997)<ref>{{Cite web|url=https://www.chess.com/players/samay-raina|title=Samay Raina {{!}} Top Chess Players|website=Chess.com|language=en-US|access-date=2026-04-24}}</ref> एक भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडियन और यूट्यूबर हैं। वह 2019 में कॉमेडी शो ''Comicstaan 2'' के सह-विजेता रहे। 2024 में उन्होंने ''India's Got Latent'' नाम का शो होस्ट किया।<ref>{{Cite web|url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comicstaan-2-winners-aakash-gupta-and-samay-raina-5909204/|title=Aakash Gupta and Samay Raina win Comicstaan 2|date=2019-08-16|website=The Indian Express|language=en|access-date=2026-04-24}}</ref> == प्रारंभिक जीवन == समय रैना का जन्म जम्मू में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ। उन्होंने पुणे के PVG कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई की, लेकिन बाद में उन्होंने कॉमेडी में करियर बनाने का फैसला किया। उन्होंने ओपन माइक से शुरुआत की और धीरे-धीरे लोकप्रिय हो गए।<ref>{{Cite web|url=https://www.newindianexpress.com/cities/bengaluru/2020/Jan/23/standing-up-for-kashmir-2093128.html|title=‘Standing up’ for Kashmir|last=Khan|first=Muneef|date=2020-01-23|website=The New Indian Express|language=en|access-date=2026-04-24}}</ref> == करियर == === स्टैंड-अप कॉमेडी === समय रैना ने 2017 से स्टैंड-अप कॉमेडी शुरू की। उन्होंने कई कॉमेडियनों के साथ काम किया और बाद में मुंबई जाकर बड़े शो करने लगे। उन्होंने भारत के कई शहरों में लाइव शो किए।<ref>{{Cite web|url=https://www.jagranjosh.com/web-stories/check-out-standup-comedian-samay-raina-impressive-networth-125105|title=Standup Comedian Samay Raina’s Impressive Networth|website=www.jagranjosh.com|access-date=2026-04-24}}</ref> 2025 में उन्होंने "Still Alive And Unfiltered" नाम से भारत टूर किया। 2026 में उन्होंने अपना कॉमेडी स्पेशल ''Still Alive'' यूट्यूब पर रिलीज़ किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। === Comicstaan 2 === समय रैना ने ''Comicstaan 2'' में भाग लिया और आकाश गुप्ता के साथ इसे जीता। यह शो Amazon Prime Video पर प्रसारित हुआ।<ref>https://www.firstpost.com/entertainment/comicstaan-season-2-akash-gupta-samay-raina-crowned-as-winners-of-amazon-prime-video-india-comedy-show-7177151.html</ref> === यूट्यूब === कोविड-19 महामारी के दौरान, समय रैना ने यूट्यूब पर शतरंज खेलना शुरू किया। उन्होंने कई प्रसिद्ध शतरंज खिलाड़ियों और यूट्यूबर्स के साथ लाइव स्ट्रीम किया। उन्होंने शतरंज को भारत में लोकप्रिय बनाने में मदद की। उनके चैनल पर कई बड़े खिलाड़ी जैसे विश्वनाथन आनंद और मैग्नस कार्लसन भी आए हैं। === शतरंज === समय रैना शतरंज भी खेलते हैं और ऑनलाइन टूर्नामेंट आयोजित करते हैं। उन्होंने "Comedians on Board" नाम से शतरंज प्रतियोगिता शुरू की। उन्होंने कई चैरिटी इवेंट भी किए और लोगों की मदद के लिए पैसे जुटाए।<ref>{{Cite web|url=https://www.chessbase.in/news/Samay-Raina-wins-the-Botez-Bullet-Invitational|title=Samay Raina wins the $10,000 Botez Bullet Invitational - ChessBase India|last=Shah|first=Sagar|date=2021-05-06|website=www.chessbase.in|access-date=2026-04-24}}</ref> == India's Got Latent == 2024 में समय रैना ने ''India's Got Latent'' शो शुरू किया, जिसमें लोगों की छिपी हुई प्रतिभा को दिखाया जाता है। बाद में उन्होंने इसका एक ऐप भी लॉन्च किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ।<ref>{{Cite web|url=https://www.businesstoday.in/technology/news/story/comedian-samay-raina-launches-indias-got-latent-app-reaches-top-of-the-charts-on-apple-app-store-and-google-play-store-459966-2025-01-08|title=Comedian Samay Raina launches India's Got Latent app, reaches top of the charts on Apple App Store and Google Play Store - BusinessToday|date=2025-01-08|website=Business Today|language=en|access-date=2026-04-24}}</ref> == विवाद == 2022 में उनके एक ट्वीट को लेकर विवाद हुआ। 2025 में ''India's Got Latent'' शो को लेकर भी विवाद हुआ, जिसके बाद कुछ एपिसोड हटाए गए।<ref>https://deadant.co/news-temperatures-rise-over-samay-raina-abortion-joke-tweet/</ref> == फिल्मोग्राफी == {| class="wikitable" ! वर्ष !! शीर्षक !! भूमिका !! टिप्पणी |- | 2019 || Comicstaan 2 || प्रतिभागी || विजेता |- | 2021 || Comedy Premium League || प्रतिभागी || विजेता |- | 2024–2025 || India's Got Latent || होस्ट/जज || |- | 2026 || Still Alive || स्वयं || कॉमेडी स्पेशल |} == संदर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == * [https://www.chess.com/member/samayraina Chess.com प्रोफाइल] {{DEFAULTSORT:Raina, Samay}} [[Category:जीवित लोग]] [[Category:भारतीय यूट्यूबर]] nqa6xlimwiggu2jv2xmt1teuj940b4b 6543718 6543698 2026-04-25T01:17:58Z AMAN KUMAR 911487 लेख की भाषा और व्याकरण को अधिक स्वाभाविक, प्रवाहमयी और ज्ञानकोशीय बनाया गया 6543718 wikitext text/x-wiki {{Infobox YouTube personality | name = समय रैना | image = Samay raina (cropped).jpg | caption = 2020 में रैना | birth_date = {{birth date and age|1997|10|26|df=y}} | birth_place = [[जम्मू]], [[जम्मू और कश्मीर (राज्य)|जम्मू और कश्मीर]], [[भारत]] | alma_mater = पी॰वी॰जी॰ कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (PVG's COET) | occupation = {{hlist|[[स्टैंड-अप कॉमेडी|स्टैंड-अप कॉमेडियन]]|[[यूट्यूबर]]}} | years_active = 2017–वर्तमान | known_for = {{hlist|''[[इंडियाज़ गॉट लेटेंट]]''|''[[कॉमिकस्तान 2]]''}} | youtube_handle = SamayRainaOfficial | youtube_display_name = समय रैना | youtube_years_active = 2020–वर्तमान | youtube_genre = {{flatlist| * हास्य * गेमप्ले * शतरंज }} | youtube_subscribers = 8.1 मिलियन | youtube_views = 669.5 मिलियन | stats_update = 10 अप्रैल 2026 }} '''समय रैना''' (जन्म 26 अक्टूबर 1997)<ref>{{Cite web |title=Samay Raina {{!}} Top Chess Players |url=https://www.chess.com/players/samay-raina |website=Chess.com |access-date=15 फरवरी 2025}}</ref> एक भारतीय [[स्टैंड-अप कॉमेडी|स्टैंड-अप कॉमेडियन]] और [[यूट्यूबर]] हैं। वे 2019 में स्टैंड-अप कॉमेडी प्रतियोगिता ''कॉमिकस्तान 2'' के सह-विजेता रहे थे।<ref>{{cite news |title=Aakash Gupta and Samay Raina win Comicstaan 2 |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comicstaan-2-winners-aakash-gupta-and-samay-raina-5909204/ |access-date=29 सितम्बर 2020 |work=The Indian Express |date=16 अगस्त 2019}}</ref> 2024 में, उन्होंने कॉमेडी टैलेंट शो ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' की मेज़बानी शुरू की। == प्रारंभिक जीवन == रैना का जन्म तत्कालीन भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के [[जम्मू]] शहर में हुआ था। वे [[अनंतनाग]] के सीर हमदान के सालिया क्षेत्र के एक रूढ़िवादी [[कश्मीरी पण्डित|कश्मीरी पंडित]] परिवार से संबंध रखते हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के [[पुणे]] स्थित 'पुणे विद्यार्थी गृह के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी' में प्रिंट इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। हालाँकि, बाद में उन्होंने इसे समय की बर्बादी बताया और ओपन माइक कार्यक्रमों में प्रदर्शन करना आरंभ कर दिया, जिसके बाद वे स्थानीय कॉमेडी सर्किट में एक नियमित चेहरा बन गए।<ref>{{cite news|date=23 जनवरी 2020|title='Standing up' for Kashmir|work=[[The New Indian Express]]|url=https://www.newindianexpress.com/cities/bengaluru/2020/jan/23/standing-up-for-kashmir-2093128.html|access-date=17 अक्टूबर 2020}}</ref> == करियर == === स्टैंड-अप कॉमेडी === 27 अगस्त 2017 से कई ओपन माइक कार्यक्रमों में प्रदर्शन करने के पश्चात्, रैना ने [[पुणे]] में अनिर्बान दासगुप्ता और अभिषेक उपमन्यु जैसे जाने-माने हास्य कलाकारों के शो में शुरुआती प्रस्तुति (Opening act) देना आरंभ किया। जैसे-जैसे उन्हें पहचान मिली, वे स्टैंड-अप कॉमेडी में अपना करियर बनाने के लिए [[मुम्बई|मुंबई]] चले गए और मुंबई के साथ-साथ देश भर के कई अन्य शहरों में सफल शो किए।<ref>{{Cite web |last=Verma |first=Anshika |date=11 फरवरी 2025 |title=Standup Comedian Samay Raina’s Impressive Net Worth |url=https://www.jagranjosh.com/web-stories/check-out-standup-comedian-samay-raina-impressive-networth-125105 |access-date=15 जून 2025 |website=Jagran Josh}}</ref> 2023 में, रैना ने अमेरिकी डीजे कश्मीर के एल्बम ''करम'' के लॉन्च समारोह में मुंबई के एंटीसोशल में अपनी प्रस्तुति दी।<ref>{{Cite magazine |last=Kumar |first=Ashish |date=13 फरवरी 2025 |title=Fact Check: Samay Raina DIDN’T abuse those asking for an apology, this video is from 2023 |url=https://www.indiatoday.in/fact-check/story/fact-check-samay-raina-abuse-apology-video-2023-ranveer-allahbadia-indias-got-latent-2679321-2025-02-13 |magazine=[[India Today]] |access-date=23 फरवरी 2026}}</ref> 2025 में, उन्होंने "स्टिल अलाइव एंड अनफिल्टर्ड" नाम से अपने राष्ट्रव्यापी भारत दौरे की घोषणा की। इसे उनके शो ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' से जुड़े विवाद के बाद उनकी वापसी के रूप में देखा गया। यह दौरा 15 अगस्त को बेंगलुरु से शुरू हुआ और 5 अक्टूबर को दिल्ली में समाप्त हुआ।<ref>{{Cite news |title=Samay Raina is back with ‘Still Alive and Unfiltered’ India tour after Latent controversy |url=https://www.thestatesman.com/entertainment/samay-raina-is-back-with-still-alive-and-unfiltered-india-tour-after-latent-controversy-1503465260.html |work=[[The Statesman (India)|The Statesman]] |date=1 अगस्त 2025 |access-date=7 फरवरी 2026}}</ref><ref>{{Cite news |title=Samay Raina says 40,000 tickets of India tour sold in just an hour: ‘The Love is unreal’ |url=https://www.livemint.com/entertainment/samay-raina-says-40-000-tickets-of-india-tour-sold-in-just-an-hour-the-love-is-unreal-11753893270111.html |work=[[Mint (newspaper)|mint]] |date=30 जुलाई 2025 |access-date=7 फरवरी 2026}}</ref> 2026 में, वे मैडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रस्तुति देने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय हास्य कलाकारों में से एक बन गए, जहाँ उन्होंने अपने दौरे के वैश्विक चरण का समापन किया।<ref>{{Cite magazine |title=Samay Raina jokes on free speech: India takes the comic, US takes the audience |url=https://www.indiatoday.in/entertainment/ott/story/samay-raina-in-india-police-take-the-comic-in-the-us-they-take-the-audience-2864233-2026-02-06 |magazine=[[India Today]] |date=6 फरवरी 2026 |access-date=7 फरवरी 2026}}</ref> 7 मार्च 2026 को, लगभग एक वर्ष के अंतराल के बाद उन्होंने यूट्यूब पर अपना पहला कॉमेडी स्पेशल ''स्टिल अलाइव'' रिलीज़ किया,<ref>{{Cite web |date=6 अप्रैल 2026 |title=Samay Raina returns with new comedy special ‘Still Alive’ after India's Got Latent controversy; fans can't keep calm |url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/web-series/samay-rain-returns-with-new-comedy-special-still-alive-after-india-got-latent-controversy-fans-cant-keep-calm-101775450051495.html |access-date=7 अप्रैल 2026 |website=[[Hindustan Times]] |language=en}}</ref><ref>{{Cite web |title='Delivering Jokes While In Tears': Samay Raina Breaks Down At 'Still Alive' Show While Recalling Being 'Completely Broken' By India's Got Latent Controversy- Watch VIDEO |url=https://www.freepressjournal.in/entertainment/delivering-jokes-while-in-tears-samay-raina-breaks-down-at-still-alive-show-while-recalling-being-completely-broken-by-indias-got-latent-controversy-watch-video |access-date=7 अप्रैल 2026 |website=[[Free Press Journal]] |language=en}}</ref><ref>{{Cite news |last=Mateen |first=Zoya |date=11 अप्रैल 2026 |title=Samay Raina's Still Alive: A moving second act of the 'cancelled' Indian comic |url=https://www.bbc.com/news/articles/czrekvml0p6o |work=[[BBC]] |access-date=23 अप्रैल 2026}}</ref> जो यूट्यूब पर सबसे अधिक देखा जाने वाला स्टैंड-अप कॉमेडी स्पेशल बन गया है।<ref>{{Cite news |title=Samay Raina comedy: Still Alive tops global stand-up views on YouTube |url=https://www.deccanherald.com/entertainment/samay-rainas-still-alive-becomes-most-watched-stand-up-comedy-special-in-the-world-3976850 |work=[[Deccan Herald]] |agency=PTI |date=22 अप्रैल 2026 |access-date=23 अप्रैल 2026}}</ref> === कॉमिकस्तान 2 === हास्य कलाकार [[आकाश गुप्ता]] के सुझाव पर उन्होंने ''कॉमिकस्तान 2'' में भाग लिया। बाद में, वे आकाश गुप्ता के साथ ही ''कॉमिकस्तान 2'' के संयुक्त विजेता बने, जिसका प्रसारण [[अमेज़न प्राइम वीडियो]] पर हुआ था।<ref>{{Cite news|title=Comicstaan Season 2 winners: Akash Gupta, Samay Raina win the Amazon original show, awarded prize money of Rs 10 lakh|url=https://www.indiatoday.in/television/web-series/story/comicstaan-season-2-winners-akash-gupta-samay-raina-win-the-amazon-original-show-awarded-prize-money-of-rs-10-lakh-1581506-2019-08-16|access-date=27 फरवरी 2021|work=India Today|language=en|date=16 अगस्त 2019}}</ref><ref>{{Cite news|title=Comicstaan season 2: Akash Gupta, Samay Raina crowned as winners of Amazon Prime Video India comedy show |url=https://www.firstpost.com/entertainment/comicstaan-season-2-akash-gupta-samay-raina-crowned-as-winners-of-amazon-prime-video-india-comedy-show-7177151.html|access-date=27 फरवरी 2021|work=Firstpost|date=17 अगस्त 2019}}</ref> === यूट्यूब === [[भारत में कोविड-19 महामारी|कोविड-19 महामारी]] के दौरान, जब सरकार ने सभी बाहरी आयोजनों को रद्द कर दिया था, तब रैना स्टैंड-अप कॉमेडी का प्रदर्शन नहीं कर सके। इस दौरान अपने साथी हास्य कलाकार [[तन्मय भट्ट|तन्मय भट]] के सुझाव पर उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर शतरंज के खेलों की स्ट्रीमिंग शुरू की।<ref name="TOISep2020"/> उनके चैनल के दर्शकों की संख्या में तब भारी वृद्धि देखने को मिली जब उन्होंने यूट्यूबर एंटोनियो राडिक, जिन्हें अगाडमेटर के नाम से जाना जाता है, को अपने चैनल पर आमंत्रित किया। इसके बाद, भारतीय शतरंज ग्रैंडमास्टर विदित गुजराती ने ट्वीट कर रैना के चैनल से जुड़ने की इच्छा जताई। अंततः गुजराती उनके चैनल पर आए, जिससे रैना के दर्शकों की संख्या में और इज़ाफा हुआ। तब से दोनों के बीच एक अच्छी मित्रता हो गई है और वे अक्सर एक-दूसरे के चैनलों पर दिखाई देते हैं। गुजराती ट्विच से यूट्यूब पर स्थानांतरित होने का श्रेय रैना के सुझाव को ही देते हैं। वे सीधे मौत के संगीत वीडियो "11K"<ref>{{Cite web |last=Trivedi |first=Aaryaman |date=25 जून 2024 |title=Kashmiri Duo Straight Outta Srinagar Fire Shots Against Seedhe Maut in Latest Music Video 'Blackball' |url=https://rollingstoneindia.com/kashmiri-duo-straight-outta-srinagar-fire-shots-against-seedhe-maut-in-latest-music-video-blackball/ |access-date=21 फरवरी 2026 |website=Rolling Stone India |language=en-US}}</ref> और कृष्णा के "सेंसिटिव" में भी अभिनय कर चुके हैं।<ref>{{Cite web |date=22 मई 2025 |title=KR$NA and Seedhe Maut Address 'India's Got Latent' Controversy & Comedy Censorship On 'Sensitive' |url=https://deadant.co/krna-seedhe-maut-comedy-censorship/ |access-date=8 जून 2025 |website=Deadant}}</ref> विश्वनाथन आनंद, विदित गुजराती, अनीश गिरी, तैमूर रादजाबोव, भास्करन अधिबान, एमिल सुतोव्स्की जैसे कई शतरंज ग्रैंडमास्टर्स और तानिया सचदेव व सागर शाह जैसे अंतर्राष्ट्रीय मास्टर्स का मानना है कि रैना ने अपने चैनल के माध्यम से भारत में शतरंज को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई है।<ref>{{Cite web|date=25 अगस्त 2020|title=Mover & shaker: How comedy is redefining chess for a cause|url=https://www.espn.in/chess/story/_/id/29716812/how-indian-stand-comic-samay-raina-redefining-chess-cause|access-date=30 मार्च 2021|website=ESPN|language=en}}</ref> रैना अपने हास्य के माध्यम से शतरंज के खेल को आम जनता के लिए अधिक रोचक बनाने का प्रयास करते हैं, जिसने उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुँचने में सहायता की है।<ref name="TOISep2020">{{cite news |date=5 सितम्बर 2020 |first1=Prasad |last1=RS |title=We have made chess more consumable for the masses: Samay Raina |url=https://timesofindia.indiatimes.com/sports/chess/we-have-made-chess-more-consumable-for-the-masses-samay-raina/articleshow/77950939.cms |access-date=29 सितम्बर 2020 |work=The Times of India |language=en}}</ref> पेंटाला हरिकृष्णा, जूडिट पोल्गार और पूर्व विश्व शतरंज चैंपियन व्लादिमीर क्रैमनिक, विश्वनाथन आनंद, गैरी कास्परोव और मैग्नस कार्लसन जैसी कई प्रसिद्ध शतरंज हस्तियाँ रैना के चैनल पर आ चुकी हैं।<ref>{{Cite news|last1=RS |first1=Prasad|title=Anand to take on stand-up comedians in charity match|url=https://timesofindia.indiatimes.com/sports/chess/anand-to-take-on-stand-up-comedians-in-charity-match/articleshow/75361393.cms|access-date=27 फरवरी 2021|work=The Times of India|language=en|date=24 मार्च 2020}}</ref><ref>{{Cite web|last=Belz|first=Emily|title=The 2020 internet chess carnival - WORLD|url=https://world.wng.org/2020/11/the_2020_internet_chess_carnival|access-date=27 फरवरी 2021|website=world.wng.org|language=en|archive-date=30 नवम्बर 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20201130080553/https://world.wng.org/2020/11/the_2020_internet_chess_carnival|url-status=dead}}</ref><ref>{{Cite web |date=6 अगस्त 2021 |title=Garry Kasparov To Appear On Samay Raina’s Chess Stream |url=https://deadant.co/garry-kasparov-to-appear-on-samay-rainas-chess-stream/ |access-date=21 फरवरी 2026 |website=Deadant}}</ref> उन्होंने क्रिकेटर युज़वेंद्र चहल जैसी भारतीय हस्तियों को शामिल करते हुए शतरंज टूर्नामेंट भी आयोजित किए हैं,<ref>{{Cite news |title=Viswanathan Anand, Yuzvendra Chahal and others raise Rs 8.86 lakh for waste-pickers community through online chess charity tournament |url=https://www.wionews.com/sports/viswanathan-anand-yuzvendra-chahal-and-others-raise-rs-886-lakh-for-waste-pickers-community-through-online-chess-charity-tournament-295065/amp |access-date=27 फरवरी 2021 |work=[[WION]]}}</ref> और अभिनेता आमिर खान के साथ भी शतरंज खेला है।<ref>{{Cite news |last=Goyal |first=Samarth |date=2 जुलाई 2025 |title=Samay Raina takes a dig at Aamir Khan after latter beats him at chess: ‘Kabhi kabhi Laal Singh Chaddha bhi ho jata hai’ |url=https://www.hindustantimes.com/htcity/cinema/samay-raina-takes-a-dig-at-aamir-khan-after-latter-beats-him-at-chess-kabhi-kabhi-laal-singh-chaddha-bhi-ho-jata-hai-101751435891388.html |work=[[Hindustan Times]] |access-date=6 जुलाई 2025}}</ref> शतरंज के अतिरिक्त, वे अपने यूट्यूब चैनल पर कई अन्य खेलों की भी लाइव स्ट्रीमिंग करते हैं। === शतरंज === समय चेस डॉट कॉम पर 'samayraina' नाम से खेलते हैं। 6 दिसंबर 2024 तक, रैना की चेस डॉट कॉम पर रैपिड शतरंज में रेटिंग 1621 थी, जबकि उनकी अब तक की सर्वोच्च दर्ज रेटिंग 3 अगस्त 2023 को 1942 थी।<ref>{{cite web |title=M Samay Raina (samayraina) - Chess Profile |url=https://www.chess.com/member/samayraina |website=Chess.com}}</ref> 5 मई 2021 को, रैना ने $10,000 बोटेज़ बुलेट इनविटेशनल जीता, जो चेस डॉट कॉम द्वारा प्रायोजित और बोटेज़ बहनों (Botez sisters) द्वारा होस्ट किया गया एक घंटे का शौकिया बुलेट एरिना टूर्नामेंट था। वे कुछ शीर्ष अंतरराष्ट्रीय ट्विच स्ट्रीमर्स के बीच प्रतिस्पर्धा करने वाले एकमात्र भारतीय स्ट्रीमर थे और उन्होंने $4000 जीते थे।<ref>{{Cite web|title=Samay Raina wins the $10,000 Botez Bullet Invitational - ChessBase India|url=https://www.chessbase.in/news/Samay-Raina-wins-the-Botez-Bullet-Invitational|access-date=9 मई 2021|website=www.chessbase.in|date=6 मई 2021}}</ref> दिसंबर 2025 में, उन्होंने चेस डॉट कॉम द्वारा आयोजित सुपरपोगचैम्प्स टूर्नामेंट जीता, जिसमें एंड्रिया बोटेज़ (Andrea Botez) और सारडोचे (Sardoche) सहित दुनिया भर के 12 प्रभावशाली हस्तियों ने भाग लिया था। यह खिताब जीतकर समय ने $10,000 कमाए, जो चैम्पियनशिप ब्रैकेट का शीर्ष पुरस्कार था। उन्होंने हैती की लड़कियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और भलाई को बढ़ावा देने में सहायता हेतु यह पूरी राशि लिडे हैती (Lidè Haiti) संस्था को दान कर दी।<ref>{{Cite web |date=7 दिसंबर 2025 |title=Samay Raina beats chess influencers to win SuperPogChamps, donates entire prize to charity: 'I don't want to |url=https://www.firstpost.com/sports/chess/samay-raina-creates-history-in-superpogchamps-donates-entire-prize-to-charity-13957472.html |access-date=8 दिसंबर 2025 |website=[[Firstpost]]}}</ref><ref>{{Cite news |title=Comedian Samay Raina wins the Super Pogchamps chess tourney defeating popular streamers, players |url=https://www.telegraphindia.com/entertainment/comedian-samay-raina-wins-the-super-pogchamps-defeating-popular-streamers-chess-players/cid/2136550 |work=[[Telegraph India]] |date=6 दिसंबर 2025 |access-date=7 फरवरी 2026}}</ref> ==== कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड ==== ऑनलाइन दर्शकों को शतरंज की ओर आकर्षित करने के लिए उन्होंने अपने चैनल पर 'कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड' के नाम से ऑनलाइन शतरंज टूर्नामेंट आयोजित करना शुरू किया, जिसमें वे अपने कई हास्य कलाकार मित्रों और अन्य हस्तियों को आमंत्रित करते हैं।<ref>{{Cite web |last=Shah |first=Sagar |date=11 नवम्बर 2020 |title=Comedians on Board 3 comes to an end with Joel D'Souza as the champion |url=https://www.chessbase.in/news/Comedians-on-Board-3-finale |access-date=15 जून 2025 |website=ChessBase India}}</ref> {| class="wikitable" |+ कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड टूर्नामेंट ! सीज़न ! तिथियां ! विजेता ! उपविजेता 1 ! उपविजेता 2 |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड (COB) #1<ref name=":0">{{Cite web|title=Comedians On Board 1 (COB1)|url=https://comediansonboard.in/comedians-on-board-1-cob1/|access-date=27 फरवरी 2021|website=comediansonboard.in|date=14 नवम्बर 2020|language=en-US|archive-date=7 जून 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210607173041/https://comediansonboard.in/comedians-on-board-1-cob1/|url-status=dead}}</ref> | 29 मार्च - 2 अप्रैल 2020 | आकाश मेहता | कुणाल राव | |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड (COB) #2<ref>{{Cite web|title=Comedians on Board 2 (COB 2)|url=https://comediansonboard.in/comedians-on-board-2-cob-2/|access-date=27 फरवरी 2021|website=comediansonboard.in|date=15 नवम्बर 2020|language=en-US|archive-date=7 जून 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20210607184658/https://comediansonboard.in/comedians-on-board-2-cob-2/|url-status=dead}}</ref> | 1-3 जुलाई 2020 | अनिर्बान दासगुप्ता | समय रैना | [[बिस्वा कल्याण रथ]] |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड (COB) #3<ref>{{Cite web|title=Comedians on Board 3 (COB 3)|url=https://comediansonboard.in/|access-date=27 फरवरी 2021|website=comediansonboard.in|language=en-US}}</ref><ref>{{Cite web |last=Navalgund (NiranjanNavalgund) |first=Niranjan |date=23 नवम्बर 2020 |title=Joel D'Souza Clinches Comedians On Board 3 |url=https://www.chess.com/news/view/joel-clinches-comedians-on-board-3 |access-date=21 फरवरी 2026 |website=Chess.com |language=en-US}}</ref> | 19-21 नवम्बर 2020 | जोएल डिसूजा | वैभव सेठिया | समय रैना |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड ऑल स्टार्स #4<ref>{{Cite web|title=Comedians on Board All Stars|date=25 मार्च 2021|url=https://comediansonboard.in/cob-all-stars/|url-status=dead|access-date=24 अक्टूबर 2021|archive-date=24 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211024055540/https://comediansonboard.in/cob-all-stars/}}</ref> | 22-30 मार्च 2021 | समय रैना | [[बिस्वा कल्याण रथ]] | |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड ऑल इन #5<ref>{{Cite web|title=Comedians on Board All In|url=https://comediansonboard.in/}}</ref> | 11-14 अगस्त 2021 | समय रैना | जोएल डिसूजा | प्रखर गुप्ता |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड गैंग वॉर (टीम इवेंट)<ref>{{Citation |title=COMEDIANS ON BOARD GANG WAR {{!}} GRAND FINALE | date=27 मार्च 2022 |url=https://www.youtube.com/watch?v=PJSnBPGtjMI |language=en |access-date=27 मार्च 2022}}</ref> | 21-27 मार्च 2022 | सूशा स्क्वाड (Susha Squad) (टीम ओनर- [[सुहानी शाह]]) | वज़ीर-ए-वैभव (टीम ओनर- वैभव सेठिया) | बॉट आर्मी (टीम ओनर- [[तन्मय भट]]) |- | कॉमेडियन्स ऑन बोर्ड: होमकमिंग<ref>{{Cite news |title=Samay Raina Returns To Chess Streaming With Comedians On Board: Homecoming - DeadAnt |url=https://deadant.co/samay-raina-returns-to-chess-streaming-with-comedians-on-board-homecoming/ |archive-url=http://web.archive.org/web/20250723182717/https://deadant.co/samay-raina-returns-to-chess-streaming-with-comedians-on-board-homecoming/ |archive-date=23 जुलाई 2025 |access-date=21 फरवरी 2026 |work=DeadAnt |language=en-US}}</ref><ref>{{Cite news |title=Samay Raina Fails To Defend His Title In Comedians On Board, Tracy Viegas Is The New Champion - DeadAnt |url=https://deadant.co/samay-raina-fails-to-defend-his-title-in-comedians-on-board-tracy-viegas-is-the-new-champion/ |archive-url=http://web.archive.org/web/20250724163120/https://deadant.co/samay-raina-fails-to-defend-his-title-in-comedians-on-board-tracy-viegas-is-the-new-champion/ |archive-date=24 जुलाई 2025 |access-date=21 फरवरी 2026 |work=DeadAnt |language=en-US}}</ref> | 27-29 मार्च 2024 | ट्रेसी विएगस | विवेक देसाई | वैभव सेठिया |} ==== चेस सुपर लीग ==== रैना ने चेसबेस इंडिया और नोडविन गेमिंग (Nodwin Gaming) के साथ मिलकर 'चेस सुपर लीग' नामक एक ऑनलाइन शतरंज लीग का आयोजन किया, जिसमें कई शीर्ष अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय ग्रैंडमास्टर, अंतर्राष्ट्रीय मास्टर और भारतीय जूनियर खिलाड़ियों ने भाग लिया। उन्होंने छह-छह खिलाड़ियों वाली छह टीमों में प्रतिस्पर्धा की। इस प्रतियोगिता की पुरस्कार राशि ₹40 लाख थी। पूरे कार्यक्रम को रैना के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया गया था।<ref>{{Cite web|date=9 अक्टूबर 2021|title=The Chess Super League is here!|url=https://en.chessbase.com/post/the-chess-super-league-is-here|access-date=10 फरवरी 2022|website=Chess News|language=en}}</ref> इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से कचरा बीनने वालों<ref>{{cite web |title=Charity begins with chess? |url=https://www.hindustantimes.com/more-lifestyle/charity-begins-with-chess/story-UHJbOc0DnwcQtNgpIfHlzH.html |website=Hindustan Times |access-date=29 सितम्बर 2020 |language=en |date=30 मई 2020}}</ref> और [[पश्चिम बंगाल]] व [[असम]] के बाढ़ पीड़ितों के लिए भी पर्याप्त धनराशि जुटाई है।<ref>{{cite news |title=Mover & shaker: How stand-up comic Samay Raina is redefining chess for a cause |url=https://www.espn.co.uk/chess/story/_/id/29716812/how-indian-stand-comic-samay-raina-redefining-chess-cause |access-date=29 सितम्बर 2020 |publisher=ESPN}}</ref><ref>{{cite web |last1=Kulkarni (Rakesh) |first1=Rakesh |title=Chess For Charity: Chess for West Bengal, India |url=https://www.chess.com/news/view/chess-for-charity-chess-for-west-bengal-india |website=Chess.com|date=जून 2020 }}</ref> == ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' == जून 2024 में, समय रैना ने ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' लॉन्च किया, जो छिपी हुई प्रतिभाओं को उजागर करने पर केंद्रित एक रियलिटी शो है।<ref>{{Cite web |title=India's Got Latent (2024) - Comedy Show by Samay Raina {{!}} BrownPant |url=https://brownpant.com/shows/indias-got-latent/ |access-date=1 अक्टूबर 2024 |language=en-US}}</ref><ref name=":1">{{Cite web |title='I Want To Level Up': Samay Raina On His Latest Project 'India's Got Latent' & Pushing The Envelope With His Comedy - DeadAnt |url=https://deadant.co/i-want-to-level-up-samay-raina-on-his-latest-project-indias-got-latent-pushing-the-envelope-with-his-comedy/ |access-date=1 अक्टूबर 2024 |website=deadant.co/ |language=en-US}}</ref><ref>{{Cite AV media |url=https://trakt.tv/shows/india-s-got-latent-2024 |title=India's Got Latent |access-date=1 अक्टूबर 2024 |via=trakt.tv}}</ref> इसके बाद उन्होंने अपने यूट्यूब शो से प्रेरित होकर अपना ऐप 'इंडियाज़ गॉट लेटेंट' लॉन्च करके तकनीक और मनोरंजन के क्षेत्र में भी कदम रखा। रैना ने बताया कि उनका उद्देश्य इस मंच को एक पूर्ण ओटीटी सेवा में परिवर्तित करना है, जिसमें कविता, रैप और रियलिटी टीवी जैसी विधाओं के शो शामिल हों। लॉन्च होने के कुछ ही घंटों के भीतर, यह ऐप ऐप्पल ऐप स्टोर और गूगल प्ले स्टोर पर शीर्ष स्थान पर पहुंच गया था।<ref>{{Cite web |date=8 जनवरी 2025 |title=Comedian Samay Raina launches India's Got Latent app, reaches top of the charts on Apple App Store and Google Play Store |url=https://www.businesstoday.in/technology/news/story/comedian-samay-raina-launches-indias-got-latent-app-reaches-top-of-the-charts-on-apple-app-store-and-google-play-store-459966-2025-01-08 |access-date=17 जनवरी 2025 |website=Business Today |language=en}}</ref> == विवाद == === गर्भपात से जुड़ा ट्वीट === जुलाई 2022 में, ''रो बनाम वेड'' मामले के पलटे जाने के बीच गर्भपात के अधिकारों के संबंध में रैना के एक ट्वीट पर काफी विवाद हुआ और उन्हें व्यापक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।<ref>{{Cite web |date=8 जुलाई 2022 |title=Temperatures Rise Over Samay Raina’s Abortion Joke Tweet |url=https://deadant.co/news-temperatures-rise-over-samay-raina-abortion-joke-tweet/ |access-date=21 फरवरी 2026 |website=Deadant}}</ref><ref>{{Cite news |date=8 जुलाई 2022 |title=Samay Raina's problematic abortion joke and why he is no Ricky Gervais or Dave Chappelle |url=https://www.firstpost.com/entertainment/samay-rainas-problematic-abortion-joke-and-why-he-is-no-ricky-gervais-or-dave-chappelle-10887451.html |url-status=live |archive-url=http://web.archive.org/web/20250319113636/https://www.firstpost.com/entertainment/samay-rainas-problematic-abortion-joke-and-why-he-is-no-ricky-gervais-or-dave-chappelle-10887451.html |archive-date=19 मार्च 2025 |access-date=21 फरवरी 2026 |work=[[Firstpost]] |language=en-IN}}</ref><ref>{{Cite news |title='Disgusting': Comedian Samay Raina Lambasted Over Sexist Joke on Abortions |url=https://www.news18.com/news/buzz/disgusting-comedian-samay-raina-lambasted-over-sexist-joke-on-abortions-5497705.html |archive-url=http://web.archive.org/web/20251004090901/https://www.news18.com/news/buzz/disgusting-comedian-samay-raina-lambasted-over-sexist-joke-on-abortions-5497705.html |archive-date=4 अक्टूबर 2025 |access-date=21 फरवरी 2026 |work=[[News18]] |language=en-US}}</ref> === ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' पर रणवीर अल्लाहबादिया की टिप्पणी === 10 फरवरी 2025 को, [[असम]] के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने ट्वीट किया कि गुवाहाटी पुलिस ने ''इंडियाज़ गॉट लेटेंट'' में अश्लीलता को बढ़ावा देने और यौन रूप से आपत्तिजनक व अश्लील चर्चाओं में शामिल होने के लिए रैना के साथ-साथ आशीष चंचलानी, जसप्रीत सिंह, अपूर्वा मखीजा और रणवीर अल्लाहबादिया सहित अन्य यूट्यूबर्स के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की है।<ref>{{cite news |last=Deeksha |first=Gour |date=10 फरवरी 2025 |title=Assam Police Book YouTubers Samay Raina, Ranveer Allahbadia And Others As 'India's Got Latent' Comes Under Fire |url=https://www.thedailyjagran.com/india/assam-police-file-fir-against-samay-raina-ranveer-allahbadia-apoorva-makhija-and-others-over-obscenity-in-indias-got-latent-10217850 |work=[[Dainik Jagran]] |access-date=10 फरवरी 2025}}</ref> शर्मा ने यह भी बताया कि गुवाहाटी अपराध शाखा ने भारतीय न्याय संहिता (2023), आईटी अधिनियम (2000), सिनेमैटोग्राफ अधिनियम (1952), और महिलाओं का अशिष्ट रूपण अधिनियम (1986) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।<ref>{{Cite news |last=Sukheja |first=Bhavya |date=14 फरवरी 2025 |title=India's Got Latent Row: Who Said What As Samay Raina Forced To Remove All YouTube Episodes |url=https://www.ndtv.com/feature/indias-got-latent-row-who-said-what-as-samay-raina-forced-to-remove-all-youtube-episodes-7708513 |work=NDTV |access-date=14 फरवरी 2025}}</ref> उन्होंने कहा कि इस मामले में पुलिस की जांच जारी है।<ref>{{Cite news |last=Mishra |first=Vinay |date=10 फरवरी 2025 |title=Ranveer Allahbadia, Samay Raina, Ashish Chanchlani & Other YouTubers Booked For 'Promoting Obscenity And Engaging In Vulgar Discussion' In Guwahati, Says Assam CM Himanta Biswa Sarma |url=https://www.freepressjournal.in/india/ranveer-allahbadia-samay-raina-ashish-chanchlani-other-youtubers-booked-for-promoting-obscenity-and-engaging-in-vulgar-discussion-in-guwahati-says-assam-cm-himanta-biswa-sarma |work=Free Press Journal |access-date=10 फरवरी 2025}}</ref> इस मुद्दे को [[भारतीय संसद|संसद]] के शून्यकाल में भी उठाया गया था, जिसमें [[यूट्यूब]] जैसे प्लेटफॉर्म को विनियमित करने को लेकर चिंताएं व्यक्त की गईं।<ref>{{Cite news |title=Trouble mounts for Ranveer Allahbadia & others linked to Samay Raina's show: Top developments |url=https://timesofindia.indiatimes.com/india/trouble-mounts-for-ranveer-allahbadia-others-linked-to-samay-rainas-show-indias-got-latent-top-developments/articleshow/118151638.cms |work=The Times of India |issn=0971-8257 |date=11 फरवरी 2025 |access-date=11 फरवरी 2025}}</ref> बाद में, [[राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (भारत)|राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग]] की आपत्तियों के बाद इस वीडियो को हटा दिया गया था।<ref>{{cite news |title=Samay Raina deletes all videos of controversial show India's Got Latent, says 'only objective was to make people laugh' |url=https://indianexpress.com/article/entertainment/bollywood/samay-raina-deletes-all-videos-of-controversial-show-indias-got-latent-only-objective-make-people-laugh-9832770/ |work=The Indian Express |date=13 फरवरी 2025 |access-date=13 फरवरी 2025}}</ref> महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री [[देवेन्द्र फडणवीस]] ने भी यूट्यूबर की टिप्पणी की निंदा की थी।<ref>{{Cite news |last=Jaiswal |first=Arushi |date=10 फरवरी 2025 |title=Maharashtra CM Fadnavis condemns YouTuber Ranveer Allahbadia's remarks, NHRC takes action |url=https://www.indiatvnews.com/maharashtra/ranveer-allahbadia-maharashtra-cm-devendra-fadnavis-condemns-youtuber-remarks-nhrc-takes-action-latest-updates-2025-02-10-975583 |work=India TV News |access-date=11 फरवरी 2025}}</ref> अंततः रैना को यूट्यूब से अपने शो के सभी एपिसोड हटाने पड़े।<ref>{{Cite news |title=Samay Raina removes all 'India's Got Latent' episodes, says will cooperate with agencies |url=https://www.thehindu.com/news/national/samay-raina-removes-all-indias-got-latent-episodes-says-will-cooperate-with-agencies/article69212418.ece |work=[[The Hindu]] |agency=PTI |date=13 फरवरी 2025 |access-date=6 जुलाई 2025}}</ref> == फिल्मोग्राफी == {| class="wikitable" ! वर्ष ! शीर्षक ! भूमिका ! टिप्पणियाँ ! संदर्भ |- | 2019 | ''[[कॉमिकस्तान|कॉमिकस्तान 2]]'' | प्रतिभागी | विजेता | <ref>{{Cite web|date=17 अगस्त 2019|title=Comicstaan 2 winner Samay Raina: It was strategy to save my best for the last|url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comicstaan-2-winner-samay-raina-5912770/|access-date=7 अक्टूबर 2021|website=The Indian Express|language=en}}</ref> |- | 2021 | ''[[कॉमेडी प्रीमियम लीग]]'' | प्रतिभागी | विजेता | <ref>{{Cite web|date=21 अगस्त 2021|title=Comedy Premium League review: The closest India will get to a Saturday Night Live|url=https://indianexpress.com/article/entertainment/web-series/comedy-premium-league-review-the-closest-india-will-get-to-a-saturday-night-live-7463321/|access-date=7 अक्टूबर 2021|website=The Indian Express|language=en}}</ref> |- | 2021 | ''वन माइक स्टैंड'' (One Mic Stand) | स्वयं | सीज़न 2; एपिसोड 5 | <ref>{{Cite web|title=Amazon Prime Video announces mentors for One Mic Stand Season 2|date=12 अक्टूबर 2021|url=https://english.press24.in/2021/10/12/amazon-prime-video-announces-mentors-for-one-mic-stand-season-2-amazon-prime-video-announces-one-mic-stand-mentors/|access-date=24 अक्टूबर 2021|archive-date=24 अक्टूबर 2021|archive-url=https://web.archive.org/web/20211024055540/https://english.press24.in/2021/10/12/amazon-prime-video-announces-mentors-for-one-mic-stand-season-2-amazon-prime-video-announces-one-mic-stand-mentors/|url-status=dead}}</ref> |- | 2024–2025 | ''[[इंडियाज़ गॉट लेटेंट]]'' | होस्ट/जज | सभी एपिसोड | <ref>{{Cite web |last=Sanzgiri |first=Shantanu |date=25 जून 2024 |title='I Want To Level Up': Samay Raina On His Latest Project 'India's Got Latent' & Pushing The Envelope With His Comedy |url=https://deadant.co/i-want-to-level-up-samay-raina-on-his-latest-project-indias-got-latent-pushing-the-envelope-with-his-comedy/ |access-date=27 दिसंबर 2024 |website=Deadant}}</ref> |- | rowspan=2| 2025 | ''[[कौन बनेगा करोड़पति]]'' | स्वयं | प्रतिभागी के रूप में ([[तन्मय भट]] के साथ) | <ref>{{Cite news |title=Samay Raina jokes about Sooryavansham, sneaking into Amitabh Bachchan's bungalow Jalsa on Kaun Banega Crorepati. Watch |url=https://www.hindustantimes.com/entertainment/tv/samay-raina-tanmay-bhat-bhuvan-bam-guests-on-amitabh-bachchan-kaun-banega-crorepati-16-watch-101738200802210.html |work=[[Hindustan Times]] |date=30 जनवरी 2025 |access-date=22 फरवरी 2026}}</ref> |- | ''एकाकी'' (Ekaki) | | एपिसोड 3 में वॉयस कैमियो | |- | 2026 | ''स्टिल अलाइव'' (Still Alive) | स्वयं | कॉमेडी स्पेशल | <ref>{{Cite web |title='Delivering Jokes While In Tears': Samay Raina Breaks Down At 'Still Alive' Show While Recalling Being 'Completely Broken' By India's Got Latent Controversy- Watch VIDEO |url=https://www.freepressjournal.in/entertainment/delivering-jokes-while-in-tears-samay-raina-breaks-down-at-still-alive-show-while-recalling-being-completely-broken-by-indias-got-latent-controversy-watch-video |access-date=7 अप्रैल 2026 |website=[[Free Press Journal]] |language=en}}</ref> |} == सन्दर्भ == {{Reflist}} == बाहरी कड़ियाँ == {{Commons category|Samay Raina}} * {{IMDb name}} * [https://www.chess.com/member/samayraina समय रैना] (Samay Raina) की Chess.com पर प्रोफाइल {{Authority control}} [[श्रेणी:1997 में जन्मे लोग]] [[श्रेणी:जीवित लोग]] [[श्रेणी:कश्मीरी पण्डित]] [[श्रेणी:भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडियन]] [[श्रेणी:भारतीय पुरुष हास्य कलाकार]] [[श्रेणी:भारतीय कॉमेडी यूट्यूबर]] [[श्रेणी:भारतीय गेमिंग यूट्यूबर]] dn3z3o3pajirk9u04jvpdw9qiu53x9z सदस्य वार्ता:AGRIM SAINI11 3 1611551 6543709 2026-04-25T00:00:58Z Sanjeev bot 127039 स्वागत संदेश जोड़ा 6543709 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|name=AGRIM SAINI11}} -- [[सदस्य:Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) 00:00, 25 अप्रैल 2026 (UTC) 2pjtdz360xtr5h8ibhsgumfi3tvkbin सदस्य वार्ता:Indianbyheart4321 3 1611552 6543710 2026-04-25T00:01:08Z Sanjeev bot 127039 स्वागत संदेश जोड़ा 6543710 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|name=Indianbyheart4321}} -- [[सदस्य:Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) 00:01, 25 अप्रैल 2026 (UTC) br3noohlyyr1pxqtqlzau3o6dnue9te सदस्य वार्ता:Maris Dreshmanis 3 1611553 6543711 2026-04-25T00:01:18Z Sanjeev bot 127039 स्वागत संदेश जोड़ा 6543711 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|name=Maris Dreshmanis}} -- [[सदस्य:Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) 00:01, 25 अप्रैल 2026 (UTC) pwp9v238g0b2urcaamujzlrqgfqubeg सदस्य वार्ता:Aviispro 3 1611554 6543712 2026-04-25T00:01:28Z Sanjeev bot 127039 स्वागत संदेश जोड़ा 6543712 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|name=Aviispro}} -- [[सदस्य:Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) 00:01, 25 अप्रैल 2026 (UTC) 2bi7kgbvzy4byjrbz9ae0382zoq22s8 सदस्य वार्ता:Memu92 3 1611555 6543713 2026-04-25T00:01:38Z Sanjeev bot 127039 स्वागत संदेश जोड़ा 6543713 wikitext text/x-wiki {{साँचा:सहायता|name=Memu92}} -- [[सदस्य:Sanjeev bot|Sanjeev bot]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjeev bot|वार्ता]]) 00:01, 25 अप्रैल 2026 (UTC) 6lgo12zyiho1dyy3eeg5qgatcm2isu8 कोर्फ़ू 0 1611556 6543724 2026-04-25T02:25:13Z ~2026-25181-57 921733 नया पृष्ठ: कोर्फू (Corfu/Kerkyra) ग्रीस के उत्तर-पश्चिमी तट पर आयोनियन सागर (Ionian Sea) में स्थित एक प्रमुख ग्रीक द्वीप है। यह अल्बानिया के पास स्थित है और इसे आयोनियन द्वीपों की प्रशासनिक राजधानी माना जात... 6543724 wikitext text/x-wiki कोर्फू (Corfu/Kerkyra) ग्रीस के उत्तर-पश्चिमी तट पर आयोनियन सागर (Ionian Sea) में स्थित एक प्रमुख ग्रीक द्वीप है। यह अल्बानिया के पास स्थित है और इसे आयोनियन द्वीपों की प्रशासनिक राजधानी माना जाता है। यह अपनी हरियाली, ऐतिहासिक किलों और खूबसूरत समुद्र तटों के लिए जाना जाता है। pf0rvomcvcy5s5000dssqsh3hpom8my 6543771 6543724 2026-04-25T06:54:30Z चाहर धर्मेंद्र 703114 सन्दर्भ + जानकारी 6543771 wikitext text/x-wiki {{Infobox islands | name = कोर्फ़ू | native_name = Κέρκυρα | image_name = Pontikonisi.jpg | image_size = | image_caption = व्लाचेर्ना मठ और पोंटीकोनिसी द्वीप, मध्य कोर्फू। | nickname = ''Το νησί των Φαιάκων'' (फेशियन द्वीप) | image_alt = Island of Corfu, Greece | map_image = Corfu in Greece.svg | country = {{Flag|Greece}} | country_admin_divisions_title = [[Administrative regions of Greece|Administrative region]] | country_admin_divisions = [[आयोनियाई द्वीपसमूह क्षेत्र]] | country_admin_divisions_title_2 = [[Regional units of Greece|Regional unit]] | country_admin_divisions_2 = कॉर्फू (क्षेत्रीय इकाई) | country_capital = कॉर्फू (शहर) | population = 101,600 | population_as_of = 2021 | density_km2 = 163.44 | demonym = [[wikt:Corfiot|कॉर्फ़ियोट]], [[wikt:Corfiote|कॉर्फ़ियोटे]] | area_km2 = 610.9 | elevation_m = 906 | coordinates = {{coord|39.60|N|19.87|E|display=inline,title}} | location = | postal_code = 490 81, 490 82, 490 83, 490 84, 491 31, 491 32 (former 491 00) | area_code = 26610, 26620, 26630 | mayor = | website = {{URL|http://www.corfu.gr/}} | party = | since = | timezone1 = [[पूर्वी यूरोपीय समय]] | utc_offset1 = +2 | timezone1_DST = पूर्वी यूरोपीय ग्रीष्मकालीन समय | utc_offset1_DST = +3 }} '''कोर्फू''', जिसे ग्रीक भाषा में केर्किरा (Κέρκυρα) कहा जाता है, [[यूनान|पश्चिमी ग्रीस]] के आयोनियन द्वीपों में से एक प्रमुख द्वीप है। यह ग्रीस के पश्चिमी तट के समीप स्थित सबसे उत्तरी द्वीप है, यदि इसके साथ जुड़े डायपोंटियन द्वीप को छोड़ दिया जाए, जो ग्रीस का सबसे पश्चिमी भूभाग बनाते हैं। कोर्फू और डायपोंटियन द्वीप मिलकर [[आयोनियन सागर]] और [[एड्रियाटिक सागर]] के मध्य उस सीमा को चिह्नित करते हैं, जिसे [[अंतरराष्ट्रीय जल सर्वेक्षण संगठन|अंतर्राष्ट्रीय जलवैज्ञानिक संगठन]] द्वारा निर्धारित किया गया है।<ref name="IHO-boundary">{{cite web|url=https://iho.int/uploads/user/pubs/standards/s-23/S-23_Ed3_1953_EN.pdf|title=Limits of Oceans and Seas|edition=3|year=1953|access-date=28 दिसंबर 2020|publisher=[[अंतरराष्ट्रीय जल सर्वेक्षण संगठन]]|archive-url=https://web.archive.org/web/20111008191433/http://www.iho-ohi.net/iho_pubs/standard/S-23/S23_1953.pdf|archive-date=8 अक्टूबर 2011}}</ref> यह भौगोलिक स्थिति कोर्फू को समुद्री दृष्टि से विशेष महत्त्व प्रदान करती है। प्रशासनिक रूप से, कोर्फू [[आयोनियाई द्वीपसमूह क्षेत्र|आयोनियन द्वीप समूह क्षेत्र]] की एक क्षेत्रीय इकाई है, जिसका विस्तार पैक्सोई तक होता है।<ref name=Kallikratis>{{Cite web |url=http://www.et.gr/idocs-nph/search/pdfViewerForm.html?args=5C7QrtC22wGYK2xFpSwMnXdtvSoClrL81-32jgAMSfbnMRVjyfnPUeJInJ48_97uHrMts-zFzeyCiBSQOpYnT00MHhcXFRTsb2fGphpq4MKX2ZkaHobySNnvZCNHXvYVvlf80XevW0Q. |title=ΦΕΚ B 1292/2010, Kallikratis reform municipalities |language=el |publisher=सरकारी राजपत्र (ग्रीस) |access-date=10 सितंबर 2021 |archive-date=10 अक्टूबर 2021 |archive-url=https://web.archive.org/web/20211010162605/http://www.et.gr/idocs-nph/search/pdfViewerForm.html?args=5C7QrtC22wGYK2xFpSwMnXdtvSoClrL81-32jgAMSfbnMRVjyfnPUeJInJ48_97uHrMts-zFzeyCiBSQOpYnT00MHhcXFRTsb2fGphpq4MKX2ZkaHobySNnvZCNHXvYVvlf80XevW0Q. |url-status=live }}</ref> इस क्षेत्रीय इकाई की राजधानी और सबसे बड़ा नगर भी कोर्फू ही है, जो द्वीप के राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का केंद्र है। == सन्दर्भ == [[श्रेणी:यूनान के द्वीप]] i285bh49tjv34kzzoyu636532sivnt1 विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 4 1611557 6543729 2026-04-25T03:17:10Z अनिरुद्ध कुमार 18906 नया पृष्ठ: {{/शीर्ष}} <div style="font-family:'montserrat', sans-serif; font-size:1.2em;line-height:normal;color:#555"> {{Infobox recurring event | name = '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' | native_name = | logo = | logo_caption = | image = | imagesize = | caption = | date = 8 तथा 9 अगस्त, 2026 | begins = 8, अगस्त, 2026 | ends =9, अगस... 6543729 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <div style="font-family:'montserrat', sans-serif; font-size:1.2em;line-height:normal;color:#555"> {{Infobox recurring event | name = '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' | native_name = | logo = | logo_caption = | image = | imagesize = | caption = | date = 8 तथा 9 अगस्त, 2026 | begins = 8, अगस्त, 2026 | ends =9, अगस्त, 2026 | prev = हिंदी विकि सम्मेलन 2020 | next = | frequency = | location = दिल्ली | years_active = | first = <!--"founded=" also works--> | last = | participants =40 | attendance = | genre = | budget = | patron = | organised = [https://hi.wikimedia.org/wiki/मुखपृष्ठ हिन्दी विकिमीडियन्स यूजर ग्रुप] (हिन्दी विकिमीडियाई सदस्य समूह) | people = | member = | website = | Dashboard = [https://outreachdashboard.wmflabs.org/courses/Hindi_User_Group/Hindi_Wiki_Con_2026/home] | footnotes = }} 60rqqymlyah1d7ogq36ak0ecrqstjxo 6543730 6543729 2026-04-25T03:19:08Z अनिरुद्ध कुमार 18906 6543730 wikitext text/x-wiki {{/शीर्ष}} <div style="font-family:'montserrat', sans-serif; font-size:1.2em;line-height:normal;color:#555"> {{Infobox recurring event | name = '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' | native_name = | logo = | logo_caption = | image = | imagesize = | caption = | date = 8 तथा 9 अगस्त, 2026 | begins = | ends = | prev = हिंदी विकि सम्मेलन 2020 | next = | frequency = | location = दिल्ली | years_active = | first = <!--"founded=" also works--> | last = | participants =40 | attendance = | genre = | budget = | patron = | organised = [https://hi.wikimedia.org/wiki/मुखपृष्ठ हिन्दी विकिमीडियन्स यूजर ग्रुप] (हिन्दी विकिमीडियाई सदस्य समूह) | people = | member = | website = | Dashboard = [https://outreachdashboard.wmflabs.org/courses/Hindi_User_Group/Hindi_Wiki_Con_2026/home] | footnotes = }} llp3dkksyl9v5kwq1tlu2sa02tml4rd 6543731 6543730 2026-04-25T03:26:13Z अनिरुद्ध कुमार 18906 6543731 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 |- | स्थान || [[नई दिल्ली]] |- | तिथि || 8-9 अगस्त 2026 |- | आयोजक || [[हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप]] |- | प्रायोजक || [[विकिमीडिया फाउंडेशन]] |- | समन्वयक || संपर्क सूत्र, हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || हिंदी विकि संपादक |} spi7m89s0l7ubdhfh2niy07pkrgtq23 6543735 6543731 2026-04-25T03:36:19Z अनिरुद्ध कुमार 18906 6543735 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 |- | स्थान || [[नई दिल्ली]] |- | तिथि || 8-9 अगस्त 2026 |- | आयोजक || [[हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप]] |- | प्रायोजक || [[विकिमीडिया फाउंडेशन]] |- | समन्वयक || संपर्क सूत्र, हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || हिंदी विकि संपादक |} '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' 8 तथा 9 अगस्त, 2026 को [[नई दिल्ली]] ([[भारत]]) में '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' [[विकिमीडिया फाउन्डेशन]] के सहयोग से आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है। है। इसमें हिंदी विकिपीडिया और बंधु प्रकल्पों के संपादक शामिल होंगे। आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता जनित जानकारियों के दौर में, हिंदी भाषा में मानव जनित गुणवत्तापूर्ण और सुलभ ई-सामग्री की उपलब्धता बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। विकिपीडिया जैसे ज्ञानकोशों में हिंदी सामग्री का निर्माण न केवल भाषा के विस्तार में सहायक है, बल्कि यह आम जनता तक ज्ञान पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम भी है। यह सम्मेलन विकि सदस्यों को वर्तमान चुनौतियों का उचित विकि नीतियाँ बनाकर सामना करने तथा नई तकनीकों में प्रशिक्षित करने में सहायक होगी। == उद्देश्य == kof5gnjzabb1fn051d1soncpuktmplo 6543736 6543735 2026-04-25T03:38:20Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* उद्देश्य */ 6543736 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 |- | स्थान || [[नई दिल्ली]] |- | तिथि || 8-9 अगस्त 2026 |- | आयोजक || [[हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप]] |- | प्रायोजक || [[विकिमीडिया फाउंडेशन]] |- | समन्वयक || संपर्क सूत्र, हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || हिंदी विकि संपादक |} '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' 8 तथा 9 अगस्त, 2026 को [[नई दिल्ली]] ([[भारत]]) में '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' [[विकिमीडिया फाउन्डेशन]] के सहयोग से आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है। है। इसमें हिंदी विकिपीडिया और बंधु प्रकल्पों के संपादक शामिल होंगे। आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता जनित जानकारियों के दौर में, हिंदी भाषा में मानव जनित गुणवत्तापूर्ण और सुलभ ई-सामग्री की उपलब्धता बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। विकिपीडिया जैसे ज्ञानकोशों में हिंदी सामग्री का निर्माण न केवल भाषा के विस्तार में सहायक है, बल्कि यह आम जनता तक ज्ञान पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम भी है। यह सम्मेलन विकि सदस्यों को वर्तमान चुनौतियों का उचित विकि नीतियाँ बनाकर सामना करने तथा नई तकनीकों में प्रशिक्षित करने में सहायक होगी। == समय योजना == 4535h609d8s40uqrfftl9kh87kczrhy 6543760 6543736 2026-04-25T05:37:14Z अनिरुद्ध कुमार 18906 /* समय योजना */ 6543760 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 |- | स्थान || [[नई दिल्ली]] |- | तिथि || 8-9 अगस्त 2026 |- | आयोजक || [[हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप]] |- | प्रायोजक || [[विकिमीडिया फाउंडेशन]] |- | समन्वयक || संपर्क सूत्र, हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || हिंदी विकि संपादक |} '''हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026''' 8 तथा 9 अगस्त, 2026 को [[नई दिल्ली]] ([[भारत]]) में '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' [[विकिमीडिया फाउन्डेशन]] के सहयोग से आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है। है। इसमें हिंदी विकिपीडिया और बंधु प्रकल्पों के संपादक शामिल होंगे। आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता जनित जानकारियों के दौर में, हिंदी भाषा में मानव जनित गुणवत्तापूर्ण और सुलभ ई-सामग्री की उपलब्धता बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। विकिपीडिया जैसे ज्ञानकोशों में हिंदी सामग्री का निर्माण न केवल भाषा के विस्तार में सहायक है, बल्कि यह आम जनता तक ज्ञान पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम भी है। यह सम्मेलन विकि सदस्यों को वर्तमान चुनौतियों का उचित विकि नीतियाँ बनाकर सामना करने तथा नई तकनीकों में प्रशिक्षित करने में सहायक होगी। == समय योजना == * 1-20 मई 2026- सम्मेलन स्थल तक यात्रा एवं आवास सहायता आवेदन प्रपत्र भरने का समय * 21-30 मई 2026- प्रतिभागी चयन * 1-5 मई 2026- चयनित प्रतिभागियों को सूचित करना सम्मेलन स्थल तक यात्रा एवं आवास सहायता आवेदन प्रपत्र भरने का समय m1rvzv1y168urt63ypcc5fnbsbdedqw श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" 14 1611558 6543762 2026-04-25T05:40:50Z Ramnathshivendra 862096 नया पृष्ठ: रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं[[File:My photo 1.jpg|thumb|यह मेरा चित्र है]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े मा... 6543762 wikitext text/x-wiki रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं[[File:My photo 1.jpg|thumb|यह मेरा चित्र है]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। hrkhm2yszdat5cwxky4jmc05p19e01v 6543765 6543762 2026-04-25T05:49:37Z Ramnathshivendra 862096 6543765 wikitext text/x-wiki रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं[[File:My photo 1.jpg|thumb|यह मेरा चित्र है]] [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। m8skisi0q89wrozgb4uulppw6laypo2 6543767 6543765 2026-04-25T06:18:39Z चाहर धर्मेंद्र 703114 शीघ्र हटाने का अनुरोध ( मापदंड:[[वि:शीह#व7|शीह व7]]) 6543767 wikitext text/x-wiki {{db-spam|help=off}} रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं[[File:My photo 1.jpg|thumb|यह मेरा चित्र है]] [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। k2umys8gsxnq8s41sajub22fadq6zbb 6543772 6543767 2026-04-25T06:57:05Z CommonsDelinker 743 "My_photo_1.jpg" को हटाया। इसे कॉमन्स से [[commons:User:Aafi|Aafi]] ने हटा दिया है। कारण: [[:c:COM:WEBHOST|Personal photo]] by non-contributors ([[:c:COM:CSD#F10|F10]]) 6543772 wikitext text/x-wiki {{db-spam|help=off}} रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। chorsqqdo4qd7cyw69nv5xyek212rai 6543824 6543772 2026-04-25T11:00:05Z Ramnathshivendra 862096 6543824 wikitext text/x-wiki {{db-spam|help=off}} रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं== [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|मापदंड व7]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|व7]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 11:00, 25 अप्रैल 2026 (UTC) [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। a0fkufd9mbyindgmy5p7fa8n02xjam8 6543832 6543824 2026-04-25T11:09:04Z Ramnathshivendra 862096 6543832 wikitext text/x-wiki {{db-spam|help=off}} रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" ं== [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] पृष्ठ को [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#शीघ्र हटाना|शीघ्र हटाने]] का नामांकन == [[File:Ambox warning pn.svg|48px|left|alt=|link=]] नमस्कार, आपके द्वारा बनाए पृष्ठ [[:श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"|श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा"]] को विकिपीडिया पर [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति|पृष्ठ हटाने की नीति]] के [[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|मापदंड व7]] के&nbsp;अंतर्गत शीघ्र हटाने के लिये नामांकित किया गया है।<center>'''[[वि:पृष्ठ हटाने की नीति#व7|व7]]{{*}} साफ़ प्रचार'''</center> इसमें वे सभी पृष्ठ आते हैं जिनमें केवल प्रचार है, चाहे वह किसी व्यक्ति-विशेष का हो, किसी समूह का, किसी प्रोडक्ट का, अथवा किसी कंपनी का। इसमें प्रचार वाले केवल वही लेख आते हैं जिन्हें ज्ञानकोष के अनुरूप बनाने के लिये शुरू से दोबारा लिखना पड़ेगा। यदि आप इस विषय पर लेख बनाना चाहते हैं तो पहले कृपया जाँच लें कि विषय [[वि:उल्लेखनीयता|उल्लेखनीय]] है या नहीं। यदि आपको लगता है कि इस नीति के अनुसार विषय उल्लेखनीय है तो कृपया लेख में उपयुक्त रूप से स्रोत देकर उल्लेखनीयता स्पष्ट करें। इसके अतिरिक्त याद रखें कि विकिपीडिया पर लेख [[वि:शैली मार्गदर्शक|ज्ञानकोष की शैली]] में लिखे जाने चाहियें। यदि यह पृष्ठ अभी हटाया नहीं गया है तो आप पृष्ठ में सुधार कर सकते हैं ताकि वह विकिपीडिया की नीतियों पर खरा उतरे। यदि आपको लगता है कि यह पृष्ठ इस मापदंड के अंतर्गत नहीं आता है तो आप पृष्ठ पर जाकर नामांकन टैग पर दिये हुए बटन पर क्लिक कर के इस नामांकन के विरोध का कारण बता सकते हैं। कृपया ध्यान रखें कि शीघ्र हटाने के नामांकन के पश्चात यदि पृष्ठ नीति अनुसार शीघ्र हटाने योग्य पाया जाता है तो उसे कभी भी हटाया जा सकता है।<br /><br /> [[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 11:09, 25 अप्रैल 2026 (UTC) [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] धरती-कथा उपन्यास रामनाथ शिवेन्द्र उनको...... ‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं बड़े बड़े माटी के ढूह काटे समतल बनाया खेत को कियारियॉ गढ़ीं फिर बीज डाला, फसलें उगीं जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई फिर पता चला कि सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं और फिर अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’ '''आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में?''' '''बोल्ड टेक्स्ट''' किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है। तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या? जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है। तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। जून 2021 ‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे! चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’ ‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’ इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू.. ‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’ बुझावन भी गुस्से में हैं... ‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’ ‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’ पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे। खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं... ‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन? सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है। सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे.. ‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’ बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’ कई बार बुझावन ने उसे रोका था .... ‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’ अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’ गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई... ‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’ तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर। बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’ ‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’ ‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’ ‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा। एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा। ‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने ‘नाहीं जानते का...?’ ‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’ ‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से ‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’ ‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’ ‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’ करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था। ‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’ ‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा.. ‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’ कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’ ‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’ पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया... ‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’ ‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’ ‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’ महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’ महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था। महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे। नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे। नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो... पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था। पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था। गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे। घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे। नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये। वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था। नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी। नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था... ‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे। नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास... वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया... ‘अरे! नन्हकू तूॅ...’ ‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’ ‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया ‘का काम है हो, बताओ तो..’ नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई! ‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’ ‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’ हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है। ‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’ ‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’ वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये... ‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’ ‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’ नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में। मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया... ‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये। गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से... ‘अब का होगा काका?’ ‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे। धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में? क्रियाशीलता की उर्वर जमीन और कथा का विस्तार... ‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’ नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले। गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे। सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था... ‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’ बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में। सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं... ‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’ घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी। गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था। समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा। मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया। समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे। फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके। सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा... सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो। सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है। सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी। करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में। सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया... बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले... ‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’ सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था। बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने.... ‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’ ‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में? दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’ बुझावन काका चकरा गये... ‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में? तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया.. कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’ सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है? सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था... ‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’ सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा... ‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’ ‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’ बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे। ‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’ ‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं। शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी... ‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’ ‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था... बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला. ‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’ सरवन कुछ सोचने लगा... हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था। करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये... ‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’ सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग.. सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ। सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है। सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है? सुगनी उसे कहां मना करने वाली। सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’ धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...। द ‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर ‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’ ‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’ सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया? बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा। सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम। लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज। लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा। सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया... एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा ‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें.. कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा ‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’ ‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने ‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’ ‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’ ‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’ ‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’ लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया ‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’ ‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’ ‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘ ‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’ ‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है। वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..। ‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’ ‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’ सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’ ‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’ ‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’ वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे... ‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को। खतौनी देख कर वकील साहब बोले... ‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’ सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया... ‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’ सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया। ‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’ सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर... सरवन खुशी के मारे बोल उठा... वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’ अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’ ‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’ वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल। का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...? ‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’ सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया... ‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’ तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया... ‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’ बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया... ‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे। सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था... वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता... बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है? शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से... ‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो? ‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’ वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था... ‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था... यात्राी ने उसे धमकियाया... भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा... ‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं। यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने। ‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा। जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला... ‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं... ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से? ‘हॉ चल तो रहा है।’ ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया... ‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’ बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है। सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’ ‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’ मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह। सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे। ‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’ पूछा सुगनी ने सरवन से... ‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’ ‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’ ‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’ सुगनी ने टोका सरवन को... बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला... ‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’ ‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’ ‘हॉ सही बोल रहे हो...’ धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं... ‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ, फिर खेती काहे अलग अलग?’ ‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’ बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे। ‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’ ‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’ ‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’ बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने। ‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया ‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का? ‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’ ‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’ गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध। बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है। चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है। सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा। रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है। ‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’ बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में। बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने... ‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’ ‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने ‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया ‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ ‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग बहुत खराब है।’ ‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं ‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में... ‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’ बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी। बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया... ‘लो इहै चाहिए नऽ’ नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’ ‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’ अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’ बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती। रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे। सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ.. लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है। ‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’ बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ? ‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’ ‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से ‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने हस पड़े सोमारू काका.. ‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है? कुछ ही देर में सरवन चला आया... ‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने अरे यार! समिति का काम था हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’ ‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’ ‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’ फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे... ‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’ का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता.... सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन। बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा। ‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’ सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है। ‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’ ‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है। ‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’ ‘आठ पास है’ ‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’ ‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’ ‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’ ‘अउर नाहीं तऽ का?’ ‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’ सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया... ‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’ कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था। समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे। सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही। ‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’ मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर। ‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’ मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया। मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये... सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है? सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ। ‘एक नई सोच, नई अवधारणा और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’ बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई? समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए। कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है। सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी। ‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में। बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई। अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था। रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे... सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती। वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे। नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता। उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की। उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में। बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया। उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा। तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था। सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए। उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे... बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं... ‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’ सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’ उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था... ‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’ उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग। उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए। जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...! ‘हिंसा के पंख लग गयेे, उड़ने लगे आदमी?’ ‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’ सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था... खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा.. ‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’ सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक... खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर। ‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’ ‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया.. ‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’ सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया.... ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे। हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज... ‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के.. ‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’ हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था। मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन? सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ ‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे। मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले। उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ��� आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का। आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी। तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें। बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था। तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती! एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी। खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे, वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का। ‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला। आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी? क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं। आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है। खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए। मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये। एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ ‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ ‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ ‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’ पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद। बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके। वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो। भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं। इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं? लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की। पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं। अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता... आइए देखते हैं क्या होता है आगे? ‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’ ‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’ गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे? आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया। कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें। जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है। लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है। वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब। सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें। डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ ‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’ सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी..... ‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’ रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये.. ‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’ रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ ‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है। राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे। हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया। महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं। महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है। महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है.... ‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’ आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं। नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो... महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन। बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा.... आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ ‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ ‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया। आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे। आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ ‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’ ‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी। कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’ ‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’ ‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, इस पर का लिखा पढ़ि लो...’ ‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’ सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे। गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो। उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं.... ‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से... ‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’ ‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’ ‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’ दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे। उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं। पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला... संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं। महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा... ‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’ महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर.. ‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’ नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये। गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा? गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं... ‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’ एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’ ‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’ नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को.. ‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’ बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं... ‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर... ‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’ ‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’ अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए. एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है। किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...? ‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’ ‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’ नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर? कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है। बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी। कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे। ‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’ बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था। बुझावन ने सहेजा पतोह को... ‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’ बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’ आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो... ‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’ सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी... वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’ ‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’ पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है... ‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’ जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा। नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ ‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’ औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं... ‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’ औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर। महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ ‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’ महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ ‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’ महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ ‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा। एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ ‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ ‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’ डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को..... ‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’ वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में.... तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें। कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे। एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता। डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास... ‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को... ‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’ डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही, साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात। बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।... ‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा... आओ आओ गिनो लाशों को, आओ आओ गिनो विधवाओं को, आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को, आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को, आओ आओ नापो जमीन को, आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को, आओ आओ देखो अपने भाग को...., होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय.... ‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’ ‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’ फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’ सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ। गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं... डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को.. ‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ... डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है... सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है... डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे? बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं... बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को। ‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था.... ‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’ ‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’ डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है। डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो... ‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से.... मुल्जिमान नामजद हैं, गोलियॉ चली हैं फिर... ‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’ वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा। मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है? उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं। एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को। एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं... ‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं। डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को। अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का... ‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है... ‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’ खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है। लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है। लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा। लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये। लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है। सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया। ‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’ ‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’ कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं। ‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’ ‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’ कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे। शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी बना दिया था। प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है। पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं। अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है। जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम? पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं... ‘वंशवाद की जड़ें हाय! कितनी गहरी हैं!’ ‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’ सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे। प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए। दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....! केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है। मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं। पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती। उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से। अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी पीठ पर लादे हुए चला करते हैं। मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक। अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है। अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं। अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया। अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया। ‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से... ‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया ‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’ सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया.... ‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’ सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा। सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा.. ‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’ अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया। सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया... सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया... ‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला। साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा... ‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’ ‘लाशें बोलने लगीं... हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’ ‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’ नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है। ‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’ नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या? ‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया... ‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे। अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के। लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है। ‘उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’ विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें। विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं.. लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी। घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया... ‘भाई साहब! और है क्या...?’ ‘हॉ और है’ ‘थोड़ा दीजिए’ ‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’ राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है। राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं। राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है? ‘खड़े रहना और खड़े रहना...’ ‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’ फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर... ‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’ हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है... ‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’ राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी। राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका... ‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’ ‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’ ‘वहां कब से हैं?’ ‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’ ‘कहां के रहने वाले हैं?’ ‘जौनपुर के’ इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए। ‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...? नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा... उधर से उत्तर आया.... ‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’ ‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’ नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर। अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं। तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है। नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में... बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं। ‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा... ‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका। ‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’ ‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई। ‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’ ‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था। दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस। नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है... यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता... ‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता... ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा... वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही..... ‘हमलोग काहे डरैं, डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’ ‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’ बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें.... उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह.. ‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई। बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर... बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे? ‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’ ‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’ बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं! ‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’ बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया. ‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’ दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल। सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे। ‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’ रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें। सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं... ‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’ रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने... ‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’ ‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’ बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ। ‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’ ‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’ ‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’ बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...? चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने... ‘बचाओ बचाओ..’ आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने.. पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को। पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर। बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए। सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया... ‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’ हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे। ‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’ ‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’ खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था... ‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’ ‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’ ‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’ बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर। बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं... पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’ बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है. ‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’ सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था... ‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं। बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है... ‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’ फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर। बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...। बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में... अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था। बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे.... बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं... ‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था। गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..? शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी! वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये! या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे! कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें! ‘यह जो संपत्ति का मामला है हल होगा का?’ ‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’ ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है... नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी। डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है। लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया। ‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने। वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें... हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’ ‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’ हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’ ‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’ घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती। एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’ गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा... ‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’ ‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’ ‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’ ‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’ सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं। जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे... तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से। जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये। शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...। घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों। घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है। सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड। अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं। अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों। वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं। लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे। पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है। हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं। अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं। ‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं.. ‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा... फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे. ‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने ‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब! ‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’ ‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’ डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था। पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा... घटना की जॉच करेगा, कारणों की जॉच करेगा, कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा, क्या सचमुच? ‘निपटने की भी तमीज नहीं बनते हैं बड़का आदमी’ ‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा। समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि... जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है। डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ। वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’ जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’ पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती। जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है। पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में। हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं। जमादार पेट को गरियाता है... ‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’ पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे? जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये... ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले ‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से ‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा ‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’ का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’ अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम। ‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’ ‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे। रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै। जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा.. ‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं.... इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे.. पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे। कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं... ‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा। सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो। पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं... ‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’ ‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’ सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा.... ‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’ हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर। सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है.. वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ... मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है... ‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’ मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था। पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया... चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे... साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे? कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम? ‘हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’ ‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे... आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को। असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था। सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का। डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना। जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को... ‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’ डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे। डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’ डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन। डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है... ‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’ डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है। पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे। करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं। अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता... ‘मेरा भाई कहां है?’ जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ... कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं। ‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’ उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से। वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया... पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया... ‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’ कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने.. ‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’ लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है.. उसने लड़के को समझाया... ‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’ अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला.. ‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब! आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’ ‘लड़का रिरियाने लगा।’ अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता। ‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा... लड़का संयत था... ‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’ ‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’ ‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’ अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो। लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है। अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया... बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ। लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे... लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा... लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में..... ‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’ गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने... ‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’ लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’ ‘दृश्य पलट रहा है.. सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’ ‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’ नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी? पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है। सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता। पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है। अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं। एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें। पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं। पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं। डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है... एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को... ‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा... फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने... ‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’ ‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’ ‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’ ‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’ ‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’ ‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’ ‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं। ‘क्या सर! वकीलों ने...’ ‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’ मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें। वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा। फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो। डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया... ‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’ वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब! डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से... ‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?.. ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’ दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में... ‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे ‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे... ‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’ ‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया ‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे। एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला। यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था.. दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई’ अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी ..... सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया... ‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’ सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया... ‘उसे गाने दो...’ लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर. पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी केहू कऽ न भई चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई, सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई, पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे। धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर... मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली। ‘नियाव देखिए, नाचेगा अब कानून की चुनरी ओढ़ कर’ ‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी! अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’ कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर... ‘का रे! बिफनी!’ ‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’ बिफनी बोल पड़ी... ‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’ सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ... तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ। सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को.. ‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’ ‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’ बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’ पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था... गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे... सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी। मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे। बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं। ‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं। सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर... ‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’ ‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’ एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक। ‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’ मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था.. ‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा ‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से.. सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते... ‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’ बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया... ‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया.. ‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’ बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’ नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’ ‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’ ‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...। वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’ ‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’ बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को... धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर? ‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को गॉव है तो रहे अन्धेरे में’ ‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’ कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे... ‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’ मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को... किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं... ‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’ ‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’ ‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’ सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है... ‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां... सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से... ‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’ बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।.. सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है। नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं। वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था। आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था। घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग। जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है। डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे। साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता। डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब। डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं। डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है... किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था। लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ। डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है। करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है? प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते। डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर। ‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’ ‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’ डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है... ‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’ डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ... आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम। डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं। डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते? डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...। अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’ वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं। वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...। डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है। डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा? इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है। डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है। डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे। वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। ‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध जोड़ कर देखिए...’ ‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को.... वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा। इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका... ‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’ उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता... पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है। खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था। वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है। तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा। एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं। वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो। पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था। सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है। रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा। सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है। पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे। कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’ ‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में? ‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’ एस.पी. अचरज में पड़ गये... उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा। ‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’ एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये... पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में ‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’ दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में। एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया... फोन डी.एम.साहब का था... डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में। ‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’ ‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’ खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’ फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास। एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई... भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’ उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था। उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो... ‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा ‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे... दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे... ‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’ एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है। ‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’ एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है। ‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने ‘गॉव का जाना साहेब!’ एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा... एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’ एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’ ‘हॉ साहेब’ एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक... ‘धरती केहू कऽ न भई’ ‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’ ‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’ ‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’ गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ। गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है। पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को... ‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया... ‘हाय री किस्मत...!’ किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है। सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से। रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है। लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं... बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी। कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे। लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं.. ‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है। औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा। बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं.... वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग.... औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया, ‘का हो रहा इहां....’ वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं? उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये। तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को... ‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’ वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है। तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और... ‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो... उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं... ‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’ तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है। ‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’ ‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’ तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा... भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया की.. रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’ तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’ ‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’ ‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर। अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा? का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से ‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’ ‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’ बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये... ‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें। काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा। ‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है। ‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’ एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ। बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं। ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा। समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा। ‘होगा क्या?’ वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...! जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो? ‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’ ‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’ जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं। ‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में देखिए क्या करते हैं’ ‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’ माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता! गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है। ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर? औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं। ‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’ औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को... ‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’ सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी- ‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’ गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो... अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है... अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...। ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं। बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ। पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा। तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे। दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में... लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी। तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे... रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’ रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे। ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं। बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं... बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं... वह पूछता है खेलावन से.. का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है। ‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा... ‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’ बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है। ‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’ ‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’ बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं। बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था। बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन.. ‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है। धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’ बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं... ‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’ ‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है.... ‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’ बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए। बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ... ‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने ‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’ नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है। ‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’ ‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’ ‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’ फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है... धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़। ‘नियाव का पोसटमार्टम कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’ ‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’ तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में... ‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’ बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में। बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा... बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ... उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता. तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’ घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ... ‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’ कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी। बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के। बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है... ‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’ उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया। ‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’ ‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’ बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को... बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है। बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे। चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में। लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे... तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये... का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है? ‘राशन बंाटना है’ ‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’ स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर.. ‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’ सामने ही बुधनी काकी भी थीं... ‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के। भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया। हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी, बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया... स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे? कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये... ‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं.. ‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है। ‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’ बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए। बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया। कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे? कानूनगो ने लेखपाल से पूछा... ‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला। ‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’ कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे... ‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’ ‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’ बुधनी काकी गरज उठीं... फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’ कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें... लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा। संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश... एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था... यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए... ‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’ ‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’ हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया... हॉ कोतवाल साहब! अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का? ‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’ ‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’ एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे। एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं... ‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है? और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’ बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं... ‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’ एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है। ‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’ एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई। राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर... ‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’ दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं। ‘अन्धेरे में का दिखेगा... देखते हैं क्या दिखता है?’ ‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’ धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं। धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं.... खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये। भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन। अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं। कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप। विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये! हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी। घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी। एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था। भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी। हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में। ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं। कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया... ‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’ पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि... ‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’ पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती। पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान। पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’। ‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि. ‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’ ‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’ यह नारा भी खूब खूब उछला था। विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां। विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे। पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे। पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते। पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था। वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर- घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही। ‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’ ‘समय कराह रहा है कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’ ‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’ खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में। जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं। जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी। हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं। डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे। काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये। मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही। प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है। चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया... ‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’ ‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे? वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा। ‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’ प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया... नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी... ‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’ प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है। अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया। इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे। डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है। डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’ मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया.. ‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’ डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा... ‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’ प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है। प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया... ‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर! डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये... ‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’ वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है... उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा... ‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’ ‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’ यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ.. ‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा ‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से ‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया ‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया.. ‘नायब घोरावल को भेजो!’ नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले। ‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये। ‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’ डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया। ‘जी सर! जी सर!’ प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये। प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं? प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी। तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था। दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी। ‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते... धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए... आखिर वे कैसे हैं? स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’ उनको देखना अद्भुत होगा। ‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’ ‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’ बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ। ‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को... ‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’ ‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है। ‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है। कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी। रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को... ‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’ ‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’ बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया.... ‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’ बोल पड़ा सोमारू... ‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’ बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’ दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं... ‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’ ‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’ ‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’ परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो... बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का... परमू काका ने मुह से धुआं उगला और... ‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’ फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को... ‘ले मार ले एक दम...’ ‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’ ‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’ ‘ले मार एक फूंक’ बबुआ भी मार लेता है एक फूंक.... दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया। बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर। बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया? बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये... बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर। ‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’ बिफनी ने टोका बबुआ को.. ‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’ ‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान? पूछा बिफनी ने बबुआ से... ‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’ ‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’ ‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’ ‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को ‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं... ‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’ ‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’ ‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’ बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम? बबुआ ने बताय दिया... ‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’ बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’ ‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’ बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर... ‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है। बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’ ‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’ बबुआ रुपिया गिनने लगा... कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था। बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..। ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां... बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया.. ‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’ बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने। तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन। ‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’ ‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’ ‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’ ‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’ पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’ ‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’ बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ! ‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’ बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’ दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं। बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...। नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है.. ‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’ ‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं... बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है। ‘सॉसें थम गई हैं पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’ ‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं.. किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी? बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा। बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर। तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा। ‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक। आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं... ‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’ ‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’ ‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’ तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई... ‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने ‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’ तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला... ‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’ आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर... चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या? ‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’ ‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके, बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’ बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है। बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में... काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को... बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है। ‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’ बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से। बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में? बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब? तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं.. ‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’ ‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’ ‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’ बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे... ‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया है का...’ ‘घरवा में होंगे बपई’ ‘का कउनो काम है’ ‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’ ‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’ बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे। समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते। बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई। बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है... ‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे... ‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से ‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से... ‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’ ‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’ ‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’ बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी... बुझावन बताने लगे... ‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’ ‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’ ‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’ ‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’ ‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’ ‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन। ‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’ ‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’ कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने... ‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’ खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया... ‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं करेंगे, का बात है बताओ तो....’ बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से। ‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी... वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है। लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे। दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’ ‘चेरवाने से अउर कहां से’ ‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’ ‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’ ‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’ ‘बूक देते हैं....’ दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा... ‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं? बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें... ‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’ हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे, गुनें’ धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....? आग पर चलने वाली है धरती-कथा पर यह आग कैसे पैदा हो गयी? ‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी... स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले... देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’ धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं। बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए। सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है। दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना। ‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’ बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता... ‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर... ‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’ बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ... फिर बबुआ खुद को समझाता.... ‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था। मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया... दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं। ‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’ ‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’ ‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’ ‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’ ‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’ ‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’ मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया। ‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’ ‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’ ‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे... मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि... ‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’ ’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’ ‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’ ‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’ मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये। ‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’ बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है। मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे... ‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ... बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’ मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से... ‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’ समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक... परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया... ‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’ ‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’ ‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’ अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...? ‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’ ‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका... परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं। परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे... परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे... ‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’ ‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’ लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को.. ‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...। ‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’ ‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’ ‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’ ‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’ घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’ ‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’ ‘कागज उड़ रहे हैं उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’ ‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी? वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें। कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे। उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता... आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा। कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे। देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई? इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया। अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर ‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया। कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा। दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया। दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये। कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई। कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी। अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला. ‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’ प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे... प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया। महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से... ‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’ महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी। उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया... ‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’ फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा... ‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’ ‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’ ‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’ महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से.. ‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’ प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया। कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे। कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये। प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया... ‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’ प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’ प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये। हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं। यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं। प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो... पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से? कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं। तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव के लड़के को वे रोक चुके थे... ‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’ कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं। गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है... पिर्थबी केहू कऽ न भई.... कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’ मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’ एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी। भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’ उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था। तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता? ‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’ धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता? ‘दृश्य पलट रहा है किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’ ‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’ वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई? धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे। पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं। धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है। धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी। उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे? बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर... ‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे... धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया। लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं। धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई। ‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’ स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’ धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से... ‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’ धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं.... ‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’ हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली... ‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’ ‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’ ‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’ धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी... धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का? धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा... ‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’ धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया... ‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’ अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं। तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद। तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी... ‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’ धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी। धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे... ‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’ वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं... ‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’ अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’ धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं... ‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें? धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं. ‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’ उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं। धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं। धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही। ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे। शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं। शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं... ‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा। धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी। धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं... अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं.... हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को... ‘कुछ राहत दे दे मौला!’ ‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’ धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं। धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप। मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं.. यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया.... चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है? अरे यह तो डफली बजा रहा है, गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ. ‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया... फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे... ‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’ तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक... लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा.... पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई। सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी, दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी, भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी, ओहू के संग धरती हाथ भर न गई। पिर्थबी केहू कऽ न भई।’... तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं। मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना। धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा। धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ... दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई। सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है? लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई। उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे। हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया। उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है। धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं... ‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता। धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं... ‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’ क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं। उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया... ‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’ शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना। गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं... वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे। गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता। धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना। विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं... ‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’ धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं। धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं। धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी। धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है। ‘सभी नशे में हैं कमाल की होती है रुपयों की मादकता’ बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’ अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है। वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें... ‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये। बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं... ‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था... ‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’ हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली। ‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर। हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था- ‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’ ‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था... ‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’ ‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’ बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा। ‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’ ‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’ ‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’ बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै। सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है। बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के? बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को... ‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’ अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला... ‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’ बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया... ‘का हो बबुआ कहां हो।’ ‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’ खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया। ‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’ बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर... ‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’ बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’ बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा... ‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’ खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया... ‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’ खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से... ‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’ बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को... ‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’ बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं... ‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’ बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा... ‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’ ‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’ काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया... ‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था? बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से... ‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’ बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से... ‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’ अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो। ‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर ‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’ सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं... ‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता? बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं। बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है। बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा... ‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’ नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये। सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है। सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था... ‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’ सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से? सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला। सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया। ‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं। सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा... ‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का? बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला... का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं। बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’ ‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को। चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ। बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता। बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया... देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है.. सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का? बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’ सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया... ‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें... ‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’ बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं। अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता! चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’ बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा... ‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’ सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’ बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा.. ‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’ ‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’ ‘का कउनो काम था।’ ‘नाहीं अइसहीं’ अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’ ‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’ बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’ हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है। बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन। रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय झूम रही जनता समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं। उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए। बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है। बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये... ‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’ खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली... ‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’ खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी। खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता। जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है? जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से... ‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’ अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई.. भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था। बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया। ‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’ बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे। खेलावन बोल पड़े... ‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’ पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते... ‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’ बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर? दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते? करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं... ‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’ सोमारू काका ने बुधनी को रोका... ‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’ बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं? ‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा? खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में... ‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’ बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से... ‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’ बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से.... ‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’ बबुआ अचानक बोल उठा.. ‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’ बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में... ‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’ बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये। मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था। मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं। उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है। वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे। मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते। सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं? वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया। वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये... ‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’ दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी... ‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’ आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी... ‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में। जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’ समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से। आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी... ‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ। वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं। जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी। सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था। उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था। आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही। कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था। सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन। धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन.... तीसरा दिन तो तूफान का दिन था... प्रशासन के करतबों का था... सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था... लाकडाउन लागू करने का दिन था.... काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी। ‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा। पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर। तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं। पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये? प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला। प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है। बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह? आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई। पिर्थबी केहू कऽ न भई। चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी, तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है। तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं ‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’ बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया... ‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’ पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से.. संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो। लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया। पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे... उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब! ‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’ वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’ किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी। आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’ आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था.. ‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...? ‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’ लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे। बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा है। खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े.... ‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’ ‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’ धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं? धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं। अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए। धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है। धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है। धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है, उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं... ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है... ‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’ लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है... धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे... चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह। धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है? किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है। धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं... अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं। धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ, खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी। धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन... दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़ लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है? पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था। लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई। थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया। चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है? वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा। प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था। शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था। इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी। सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं। ‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा। नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ... ‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’ स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये ‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया? स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए... ‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’ कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’ धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग। धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा.... एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया... ‘देवी कौन हैं आप?’ ‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’ कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया... ‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’ ‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’ पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’ यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं। rmsete875n364jplkbe86b48eb40aw1 याफ़ा 0 1611559 6543822 2026-04-25T10:56:53Z The Sorter 845290 Created by translating the opening section from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1342920790|Jaffa]]" 6543822 wikitext text/x-wiki [[File:ISR-2013-Aerial-Jaffa-Port_of_Jaffa.jpg|पाठ=|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|पुराना याफ़ा]] [[File:PikiWiki_Israel_68164_port_of_jaffa.jpg|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|पुराना याफ़ा और [[याफ़ा बंदरगाह]]]] '''याफ़ा''' ({{langx|he|יָפוֹ}},{{IPA|he|jaˈfo|pron|He-Yafo.ogg}}) एक प्राचीन [[लेवेंटिन सागर|लेवंटाइन]] बंदरगाह शहर है, जो [[इसराइल]] के [[तेल अवीव-याफ़ो]] शहर का दक्षिणी भाग है। यह [[भूमध्य सागर]] के तट स्थित है। याफ़ा पर उत्खननों से पता चलता है कि यह प्रारंभिक [[कांस्य युग]] से बसा हुआ है। शहर का उल्लेख कई [[प्राचीन मिस्र|प्राचीन मिस्री]] एवं [[नव-असीरियायी साम्राज्य|असीरियाई]] दस्तावेज़ों में भी किया गया है। [[बाइबिल]] में, याफ़ा [[दान गोत्र]] का एक सीमा तथा बंदरगाह होता है, जहाँ से [[लेबनानी देवदार]] को [[यरुशलम के मंदिर]] के निर्माण हेतु आयातित किया जाता था। [[हख़ामनी साम्राज्य|फ़ारसी]] शासन के तहत, याफ़ा को [[फ़ोनीशिया|फ़ोनीशियाइयों]] को दिया गया था। यह शहर [[योना]] की कहानी एवं यूनानी पौराणिक कथाओं में [[एंड्रोमेडा]] की कहानी में भी शामिल है। बाद में, याफ़ा [[हश्मोनी यहूदिया]] का एक प्रमुख बंदरगाह बना। हालाँकि [[रोमन साम्राज्य|रोमन]] काल में [[सीज़रिया मैरिटीमा|सीज़रिया]] के निर्माण हेतु इसका महत्त्व घट चुका। [[क्रूसयुद्ध]] समय, यह [[याफ़ा और अशकलोन प्रांत]] का भाग था। 1799 को, [[नेपोलियन बोनापार्ट|नेपोलियन]] ने शहर को [[याफ़ा की घेराबंदी|लूट]] लिया था, और [[प्रथम विश्वयुद्ध]] के दौरान 1917 को ब्रिटिश ने [[याफ़ा का युद्ध (1917)|याफ़ा के युद्ध]] में शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया था। उनके तहत, जातीय तनाव हेतु 1921 को वहाँ [[याफ़ा दंगे (मई 1921)|दंगे]] शुरू हुए। उस्मानी काल में अरब बहुमत शहर होने के नाते, याफ़ा 19वीं शताब्दी से अपने फलों और फलोद्यानों के लिए जाता जाता था, ख़ासकर [[याफ़ा नारंगी]]। यह 20वीं शताब्दी में [[फ़िलिस्तीन जनादेश]] में पत्रकारिता का केंद्र भी होता था, जहाँ ''[[फ़लस्तीन]]'' और ''[[अल-दिफ़ा]]'' नामक समाजपत्र छापे जाते थे। 1948 के [[अरब-इजराइल युद्ध (१९४८)|फ़िलिस्तीन युद्ध]] के बाद, इसके अधिकांश अरब निवासी भागे या उन्हें निकाला गया था और शहर नवस्थापित इसराइल देश का भाग बना, और 1950 को इसे तेल अवीव के साथ एक किया गया था। आज, याफ़ा इसराइल का एक [[मिश्रित शहर]] है, इसकी जनसंख्या में से लगभग 37% अरब हैं।<ref name="Lior 2011">{{cite web|url=https://www.haaretz.com/1.5128965|title=Tel Aviv to build affordable housing for Jaffa's Arab residents|last=Lior|first=Ilan|date=2011-02-28|website=Haaretz.com|access-date=2022-05-12}}</ref> chdl6qtx5x9uswnctz4ds7o5t9nb9fo 6543823 6543822 2026-04-25T10:57:13Z The Sorter 845290 6543823 wikitext text/x-wiki [[File:ISR-2013-Aerial-Jaffa-Port_of_Jaffa.jpg|पाठ=|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|पुराना याफ़ा]] [[File:PikiWiki_Israel_68164_port_of_jaffa.jpg|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|पुराना याफ़ा और [[याफ़ा बंदरगाह]]]] '''याफ़ा''' ({{langx|he|יָפוֹ}}) एक प्राचीन [[लेवेंटिन सागर|लेवंटाइन]] बंदरगाह शहर है, जो [[इसराइल]] के [[तेल अवीव-याफ़ो]] शहर का दक्षिणी भाग है। यह [[भूमध्य सागर]] के तट स्थित है। याफ़ा पर उत्खननों से पता चलता है कि यह प्रारंभिक [[कांस्य युग]] से बसा हुआ है। शहर का उल्लेख कई [[प्राचीन मिस्र|प्राचीन मिस्री]] एवं [[नव-असीरियायी साम्राज्य|असीरियाई]] दस्तावेज़ों में भी किया गया है। [[बाइबिल]] में, याफ़ा [[दान गोत्र]] का एक सीमा तथा बंदरगाह होता है, जहाँ से [[लेबनानी देवदार]] को [[यरुशलम के मंदिर]] के निर्माण हेतु आयातित किया जाता था। [[हख़ामनी साम्राज्य|फ़ारसी]] शासन के तहत, याफ़ा को [[फ़ोनीशिया|फ़ोनीशियाइयों]] को दिया गया था। यह शहर [[योना]] की कहानी एवं यूनानी पौराणिक कथाओं में [[एंड्रोमेडा]] की कहानी में भी शामिल है। बाद में, याफ़ा [[हश्मोनी यहूदिया]] का एक प्रमुख बंदरगाह बना। हालाँकि [[रोमन साम्राज्य|रोमन]] काल में [[सीज़रिया मैरिटीमा|सीज़रिया]] के निर्माण हेतु इसका महत्त्व घट चुका। [[क्रूसयुद्ध]] समय, यह [[याफ़ा और अशकलोन प्रांत]] का भाग था। 1799 को, [[नेपोलियन बोनापार्ट|नेपोलियन]] ने शहर को [[याफ़ा की घेराबंदी|लूट]] लिया था, और [[प्रथम विश्वयुद्ध]] के दौरान 1917 को ब्रिटिश ने [[याफ़ा का युद्ध (1917)|याफ़ा के युद्ध]] में शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया था। उनके तहत, जातीय तनाव हेतु 1921 को वहाँ [[याफ़ा दंगे (मई 1921)|दंगे]] शुरू हुए। उस्मानी काल में अरब बहुमत शहर होने के नाते, याफ़ा 19वीं शताब्दी से अपने फलों और फलोद्यानों के लिए जाता जाता था, ख़ासकर [[याफ़ा नारंगी]]। यह 20वीं शताब्दी में [[फ़िलिस्तीन जनादेश]] में पत्रकारिता का केंद्र भी होता था, जहाँ ''[[फ़लस्तीन]]'' और ''[[अल-दिफ़ा]]'' नामक समाजपत्र छापे जाते थे। 1948 के [[अरब-इजराइल युद्ध (१९४८)|फ़िलिस्तीन युद्ध]] के बाद, इसके अधिकांश अरब निवासी भागे या उन्हें निकाला गया था और शहर नवस्थापित इसराइल देश का भाग बना, और 1950 को इसे तेल अवीव के साथ एक किया गया था। आज, याफ़ा इसराइल का एक [[मिश्रित शहर]] है, इसकी जनसंख्या में से लगभग 37% अरब हैं।<ref name="Lior 2011">{{cite web|url=https://www.haaretz.com/1.5128965|title=Tel Aviv to build affordable housing for Jaffa's Arab residents|last=Lior|first=Ilan|date=2011-02-28|website=Haaretz.com|access-date=2022-05-12}}</ref> dfa5wsz45m79md8os8913prfe69e648 श्रेणी वार्ता:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास -- :"धरती कथा" 15 1611560 6543835 2026-04-25T11:09:56Z Ramnathshivendra 862096 /* यह मौलिक कार्य है तथा इसे पाठकों के हित  में आपके विकी पर अपलोड किया गया है इस लिए इसे डिलीट करना पाठको के हित  में नहीं होगा आपको ऐसी  मनमानी नहीं करनी चाहिए। ईद किताब की हार्ड कॉपी है मेरे पास।  शीघ्र हटाने पर चर्चा */ नया अनुभाग 6543835 wikitext text/x-wiki == यह मौलिक कार्य है तथा इसे पाठकों के हित  में आपके विकी पर अपलोड किया गया है इस लिए इसे डिलीट करना पाठको के हित  में नहीं होगा आपको ऐसी  मनमानी नहीं करनी चाहिए। ईद किताब की हार्ड कॉपी है मेरे पास।  शीघ्र हटाने पर चर्चा == इस पृष्ठ को साफ़ प्रचार होने के कारण नहीं हटाया जाना चाहिये क्योंकि... (यहाँ अपना कारण बताएँ) --[[सदस्य:Ramnathshivendra|Ramnathshivendra]] ([[सदस्य वार्ता:Ramnathshivendra|वार्ता]]) 11:09, 25 अप्रैल 2026 (UTC) lxt9w6mvxnj0ihtpxswfdvbmprnihn5 श्रेणी:हिन्दी उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "जंगल दंश" 14 1611561 6543853 2026-04-25T11:46:17Z Ramnathshivendra 862096 नया पृष्ठ: रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "जंगल दंश" [[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]] [[File:Jungal dansh jpg.jpg|thumb|रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "जंगल दंश"]] जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, न... 6543853 wikitext text/x-wiki रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "जंगल दंश" [[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]] [[File:Jungal dansh jpg.jpg|thumb|रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "जंगल दंश"]] जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है? वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान होगा भी कैसे, बाजार में तो किसी कार्टून की तरह इधर से उधर उड़ते रहना मजबूरी है। जंगल दंश की कथा आपके सामने है, देखिए यह कथा आपको प्रभावित कर पाती है या नहीं। अगर इस कथा के माध्यम सेआप वामउग्रवाद के क,ख,ग, से वकिफ हो जाते हैं फिर तो यह सार्थक कथा होगी। हिन्सा तथा अहिन्सा दो छोर हैं वामउग्रवाद को समझने के लिए। कम से कम भारतीय संस्कृति किसी भी हाल में हिन्सा की वकालत नहीं करती। वामउग्रवादी चिन्तन भारतीय व्यवहार संस्कृति की भाषा नहीं है। समाज बदल के लिए हिन्सा का सहारा लेना यह पद्धति भारत में मनोवैज्ञानिक व सामाजिक रूप से त्याज्य है, इस पद्धति में सामाजिकता तो हो ही नहीं सकती। आज के समय को सोलहवीं शदी में बदल देना या बदलने का प्रयास करना सिवाय बेवकूफी के और कुछ नहीं। आशा है मेरे पिछले उपन्यासों की तरह प्रस्तुत उपन्यास को भी आपकी मुहब्बत मिलेगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में... जून- 2019 राबर्ट्सगंज,सोनभद्र,उ.प्र. ‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना, अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’ मनीश देर रात तक घर लौटा। वह बाहर दोस्तों से घिर गया था। दोस्त उसे समझा रहे थे कि चुनाव में हार, जीत तो होती रहती है, उससे घबराना नहीं चाहिए, पर उसके घबराने का कारण दूसरा था, जिसे वह दोस्तों को बताना नहीं चाहता था। मनीश घर में घुसते ही अवाक रह गया, उसे लगा जैसे वह अपने घर में न हो कर किसी दूसरे के घर में घुस गया हो, जहां होने का कोई मतलब नहीं। इस घर में तो वह कभी आया ही नहीं था। पता नहीं कैसे आ गया है। उसे विगत का सारा कुछ ख्याल आता जा रहा है, उसे भूलना चाहे तो भी नहीं भूल सकता, कुछ दूसरी भूल जाने लायक बातों की तरह, जिन्हें वह कबका भूल चुका है। उसकी यादें उसे नोचने चोथने लगी हैं, जबाब मांगने लगी हैं। यह पहला अवसर है जब वह अपनी यादों से मुठभेड़ करने की स्थिति में नहीं है। चार साल पहले ही उसने अपना घर बनवाया था, यह मानकर कि शहर में रहना हर हाल में ठीक होता है। किसे नहीं पता कि घर बनवाना आसान नहीं होता, वह भी शहर में, फिर भी मनीश ने शहर में घर बनवाया। कुमुद भी तो घर बनवाने के लिए जिद्द कर रही थी। उसे पता था कि कुमुद गॉव मंें नहीं रह सकती, उसने गॉव देखा नहीं है। जब से उसने खुद को जानना और समझना शुरू किया है, तब से शहर में ही रह रही है। पढ़ाई लिखाई सारा कुछ, उसने शहर में ही किया है। एक बार कुमुद किसी गॉव में गई थी, अपने पापा के साथ। गॉव में कोई मीटिंग होनी थी, विस्थापन का मामला था, एक प्राइवेट कारखाना बनवाने के लिए गॉव वालों को उजाड़ा जाना था। कारखाने को तीन सौ एकड़ जमीन चाहिए थी और सरकार ने उसे देने के लिए जो भी कानूनी प्रस्ताव वगैरह होते हैं, पास कर लिया था। सारा कार्यक्रम सरकार नेआनन फानन में तय कर लिया था और किसी को कानो कान खबर तक नहीं लगी थी। कुछ महीनों में ही गॉव वालों को उनकी जन्मभूमि तथा कर्मभूमि से उजाड़ दिया जाना था। यह सब करने में कमजोर से कमजोर सरकार भी बहुत मजबूत व ताकतवर हुआ करती है। चाहे वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मामलों में विश्वबैंक तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने, किसी अनाथ की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती हो, इतना ही नहीं, सारी दुनिया में घूम घूम कर देश की सुरक्षा के नाम पर घातक हथियारों, मिजाइलों वगैरह की भीख मांगा करती हो फिर भी देश के आंतरिक मामलों जैसे गॉव के गरीब किसानों के विस्थापन संदर्भाें में या दूसरे तरह के शोषणों के मामलों में, भीख मांगने वाली सरकारें भी अपनी जनता के साथ जघन्य से जघन्य क्रूरताएं बरतती रहती हैं। तकरीबन दस गॉवों को उजाड़ा जाना था, गॉवों के लोगों को विस्थापित किये जाने के औचित्य को साबित करने के लिए सरकार के पास ढेरों कानून थे। उन कानूनों में जो भी दरारें थीं उन्हें सरकार ने संसदीय सहमतियों, एवं विधिक संस्तुतियों से पाट लिया था। प्रशासन ने गॉवों को उजाड़े जाने की नोटिस भी तामिल करवा लिया था। नोटिस में साफ लिखा था कि जिन्हें आपत्तियां करनी हों, वे एक माह के भीतर करें नहीं तो माना लिया जायेगा कि किसी को कोई एतराज नहीं है, फिर सारे प्रकरण को एकतरफा ढंग से निपटा लिया जायेगा। गॉव वालों को नोटिस वगैरह के बारे में कुछ पता नहीं था।कृनोटिस कब आई, किसने भेजा, सारा कुछ रहस्य था। अचानक एक दिन गॉव की नापी होने लगी, तब गॉव वालों को पता चला कि वे उजाड़े जांएगे। विस्थापन वाले कामों को किये जाने की ऐसी ही परंपरा है। पहले नोटिस भेज दी जाती है। नोटिस के जबाब आते हैं। जिन्हें पता होता है कि जबाब दिया जाना है, वे जबाब दे देते हैं। जिन्हें नहीं पता होता वे जबाब नहीं दे पाते। जो जबाब आए होते हैं, कहा जाता है कि जबाबों के परिप्रेक्ष्य में नोटिस का निस्तारण होता है। जबकि जबाबों के निस्तारण की परंपरा ने कभी समाज को उल्लेखनीय लाभ नहीं पहुंचाया है। मान लिया जाता है कि सरकारें जो कुछ भी करती, कराती हैं वह सब राष्ट्र हित में समाज और अपनी जनता के लिए ही, फिर सरकारी काम से किसी को कैसे नुकसान हो सकता है? कुमुद को जाने कैसे उस दिन गॉव अच्छा लगा था। वहां के लोग उसे सरल और सीधे लगे थे, पर उसे वहां गुस्सा भी खूब खूब आया था। ऐसे सरल और सहज लोगों को जाने कैसे उजाड़ने के बारे में सरकार निर्णय ले रही है? क्या तमाशा है, जो कई कई शहरों में काबिज हैं, कई कई धन्धों को हथियाए बैठे हैं, उन्हें नहीं उजाड़ रही? उजाड़ रही ऐसे लोगों को जिनके पास इस गॉव के अलावा कहीं शरण नहीं। वह तो अपने पापा पर ही गुस्सा हो गई थी....कृकृ ‘पापा यह क्या है? आप मीटिंग करके यहां से लौटने के लिए सोच रहे हो। आपके मित्रा कामरेड भी चले गये, उनमें से एक कामरेड तो कार्यक्रम के संयोजक से कार का किराया भी मांग रहे थे, बोल रहे थे, कार का किराया दे दो, इसके अलावा ’ हमलोगों को कुछ नहीं चाहिए। ‘अरे वही, जो लखनऊ विश्वविद्यालय वाले हैं, जिनका बहुत बड़ा नाम है। उनके साथ जो लेखक किस्म के एक आदमी थे, अभी उनकी एक किताब ‘खामोशी का वैश्वीकरण’ प्रकाशित हुई है, जिसकी समीक्षा मैंने साहित्य की चर्चित पक्षीनामधारी पत्रिका में पढ़ी है। वे मना कर रहे थे.... ‘जाने दो भाई, गॉव वाले रूपया कहां से देंगे। हमलोग आपस में खर्चा बांट लेंगे। तीन तीन सौ या चार चार सौ एक एक आदमी पर पड़ेगा और क्या। साथ ही साथ वे सभी लोगों को रोक भी रहे थे, काम तो यहां हैं, जनता के बीच में, इनकी लड़ाई को आगे बढ़ाना है, फिर यहां से लौटने का क्या मतलब। बेचारे गॉव वाले क्या करेंगे? सरकार का विरोध करना आसान नहीं होता। सरकार के पास तमाम तरह की ताकतें होती हैं, जो जनता के मन को कमजोर तथा लचीला बना दिया करती हैं। फिर जनता किसी छुई मुई माफिक अपनी ही छुअन से डर कर, खुद को अपने अपने भाग्य के रहस्यों में डुबो लिया करती है। मीटिंग में जो बाहरी लोग आए हुए थे वे गॉव में रुकने वाले नहीं थे। वे भाषणों को बेचने वाले सौदागर थे। ऐसे तिजारती लोग भला उस गॉव में रुक कर गॉव वालों के साथ लाठी डंडंे क्यों खाते। मीटिंग खत्म हुई और वे चले गये। कुमुद ने अपने पापा पर व्यंग्य किया...कृकृ ‘पापा आपको जाना हो तो जाइए, मुझे इन गॉव वालों को इस हालत में छोड़ कर नहीं लौटना’ कुमुद लड़ गई अपने पापा से...कृ पापा तो पापा, उन्हें अपने अनुभवों से हासिल ज्ञान पर गर्व था।कृ ‘क्या बोल रही तूं, का करेगी इस गॉव में रुक कर, जानती है इस इलाके के बारे में, यह क्षेत्रा नक्सलाइटों का है, यहां आदमी नहीं, बन्दूकें बोलती हैं, यहां बन्दूकें कहानियां और कवितायें लिखती हैं। यहां रुकना ठीक नहीं होगा और गॉव वालों को भी कुछ लाभ नहीं मिलेगा।’ ‘पापा आप चाहे जो सोंचें, गुनें, पर मुझे इस गॉव से बाहर नहीं जाना। मैं जानती हूॅं कि गॉव वालों को इस समय मेरी आवष्यश्कता है, और अगर नहीं भी है तो मुझे मालूम है कि गॉव वालों के साथ रहने की आवष्यश्कताओं को मैं कैसे रच व गढ़ सकती हूॅं। इस परेशान गॉव में मैं अपनी उपयोगिता सिरज लूंगी।’ ‘तो तुम्हें वापस नहीं लौटना, तूं यहां रुक कर करेगी क्या? कोई प्लान है क्या तेरे पास?’ ‘फिलहाल तो नहीं, प्लान पहले से बना कर क्या होगा? प्लान तो परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर बनाना अच्छा होता है।’ ‘पापा शहर लौटने के लिए आप कैसे बोल रहे हैं? आपने ही तो मुझे सिखाया है कि अत्याचारों से लड़ना हर समझदार के लिए आवश्यक है, चाहे अत्याचार खुद के या किसी गैर के ऊपर हो। अत्याचार तो सिर्फ अत्याचार होता है, अत्याचार का प्रतिकार न करना, खामोश रहना, यह अत्याचार करने से भी भयानक है। आपकी उस सीख का क्या हुआ पापा?... ‘आप कहा करते थे, जनता की लड़ाई जनता के द्वारा, उसकी अगुआई भी जनता के द्वारा। प्रताड़ित किये जाने वाले लोगों को वुद्धिजीवियों द्वारा वैचारिक सहायता देनी चाहिए, जिससे लड़ाई की धारा अराजक न होने पाये। मैं तो आपके साथ नहीं लौटने वाली। गॉव वालों को असहाय छोड़ कर मैं नहीं लौट सकती पापा।’ कुमुद की बातें प्रोफेसर आलोकनाथ को बहुत बुरी लगी थीं...कृ ‘लगता है, कुमुद मनबढ़ होती जा रही है और अपने लिए हुए फैसलों के प्रति कट्टर भी।’ बहुत कुछ कुमुद के बारे में सोचने लगे थे आलोकनाथ। जैसे यही कि कुमुद को खुली सोचों का नागरिक नहीं बनने देना चाहिए था। यह तो अतुकांत कविता की तरह मर्यादा के नियंत्राणों को तोड़ रही है। इसे पता ही नहीं कि जीवन जीने के तरीकों में आत्मनियंत्राण की भूमिका होती है। अभी से ही मनमानी पर उतर आई है, बोल रही है, वापस नहीं लौटना। मेरी समझ में नहीं आ रहा यहां रुक कर करेगी क्या? क्या आन्दोलन चलाएगी? क्या करेगी आखिर यहां रुक कर? ‘नहीं तुझे मेरे साथ चलना ही होगा, मेरे बारे में सोचो न सोचो, कम से कम मनीश के बारे में तो सोचो, उसे बुरा लगेगा।’ सख्त हो गये थे आलोकनाथ, उनकी ऑखें लाल होने लगीं थीं और चेहरे पर लोहे सी गर्मी पसर आई थी। एक दम से लाल लाल, तपते तवा माफिक। होठ सूखने लगे थे, उंगलियां हरकत में आ गई थीं जैसे कुमुद को मार ही देंगे पर उन्हांेने कुमुद को कभी मारा नहीं था, मारना तो दूर गुस्सा कर डांटा भी नहीं था। जब कभी कुमुद की मॉ कुमुद की युवा शरारतों पर डांट दिया करती थीं, तब वे पत्नी पर बरस पड़ते थे। आलोकनाथ ने कुमुद की तेज तर्रार छाया में छरहरा जवान लड़का देखा था, समय से मुठभेड़ करने वाला तथा अपने पैरों पर खड़ा होकर आसमान में छेद करने वाला, साथ ही साथ अपने हित अहित के द्वन्दों को अनुकूलित करने वाला, पर यह कुमुद तो जाने क्या सोच व गुन रही है? ‘आन्दोलन करेगी, गिरफ्तारी देगी, नारे लगायेगी, इन गॉव वालों के साथ। इसने मुझसे कुछ नहीं सीखा। इसे तो यह भी नहीं मालूम कि लड़ाइयां विचारों के औजारों से लड़ी जाती हैं, लड़ाई लड़ने के लिए विचारों को जांचा परखा जाता है, फिर युद्ध की चुनौती स्वीकार की जाती है, तूं तो पहले ही चुनौती देने लग गई हो।’ आलोकनाथ छटपटाती सोचों में थे, कुमुद को दुबारा आदेशित किये। ‘चल मेरे साथ, यहां नहीं रुकना है’ पर कुमुद को तो खुद को प्रमाणित करने वाली दुनिया दीख रही थी। शहादत वाली, वलिदान वाली, सिर्फ अपने लिए क्या जीना, जिया तो दूसरों के लिए जाता है। उसने आलोकनाथ से साफ बोल दिया कि उसे नहीं लौटना तो नहीं लौटना। कुमुद तो अपने पापा के प्रति पहले से ही सचेत थी और उसने तय कर लिया था कि उसे क्या करना है तथा कैसे करना है? वह अपने पापा को लगातार समझने की कोशिश कर रही थी, पर समझ नहीं पा रही थी। कुछ समय बाद तो वह उनके बारे में बहुत कुछ जान गई थी। वह उन कामरेडों को भी संदेह से देखने लगी थी, जो वैचारिक ज्ञान अर्जन के लिए उसके पापा के पासआया करते थे। क्या उन्हें नहीं पता है कि ये जो कामरेड आलोकनाथ हैं, वे अक्षरों के युद्धभमि के योद्धा हैं। इनके तमाम भाषण कामरेडों के द्वारा संसदीय प्रणाली स्वीकार करने के बाबत थे। जो काफी महत्वपूर्ण तथा गंभीर थे। वे एक ऐसे कामरेड हैं जिनसे कोई माई का लाल तर्कों में जीत नहीं सकता। इनके पास बने बनाए तर्कों व मन्सौदों का खजाना है। संसदीय लाईन पर चलने के औचित्य को कामरेड आलोकनाथ ने तत्कालीन परिस्थितियों में अनिवार्य बताया था तथा उसे समाज बदल का कारगर औजार भी प्रमाणित किया था। देश भर में बिखरे कामरेडों को जान पड़ा था कि उनके बीच आलोकनाथ के रूप में कोई देवदूत है, फिर तो वे संसदीय लाईन को समाज बदल का कारगर तरीका मान लिये थे। पढ़ाई के अन्तिम वर्ष में एक दिन कुमुद ने अपने पापा को छेड़ा था....कृकृ ‘पापा हरावल दस्ता क्या होता है? क्या आप कभी इस दस्ते में रहे हैं?’ आलोकनाथ पसीने से सरोबार हो गये थे, तत्काल उनका ज्ञान बौना पड़ गया था तथा उत्तर देने में असमर्थ हो गये थेकृ कुमुद ने दुबारा पूछा था...कृ ‘पापा क्या होता है, हरावल दस्ता?’ ‘इसे लड़कू दस्ता बोलते हैं बेटा!’ ‘कैसा लड़ाकू दस्ता?’ ‘अरे उनका दस्ता जो क्रूर हुकूमत बदलने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं।कृ सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ने वाले लड़ाकू दस्ते को, हरावल दस्ता बोलते हैं, पर यह सब तूं काहे पूछ रही है?’ ‘बस ऐसे ही पापा, कोई खास बात नहीं, मैं जानना चाह रही थी कि आपकी लाईन क्या है? सुना है आप भी कभी भूमिगत रहा करते थे और जनचेतना के हरावल दस्ते में रहे थे। अब आप संसदीय लाईन पर हैं, वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं जिससे भूमिगत रहना पड़े, इसीलिए पूछ रही हूॅं पापा!’ आलोकनाथ कुमुद का चेहरा देखने लग गये थे। उन्हें समझ आ रहा था कि कुमुद कोई चुनमुन चिरैया नहीं है, इसकी ऑखों में तरतीब से जलने वाली आग है, ऐसी आग जो बनावटी तथा सजावटी चेहरों को भस्म कर दिया करती है। आलोकनाथ कुमुद के चेहरे पर अपनी ऑखें नहीं टिका पाये थेे। उन्हांेने अपना मुंह आलमारी में सजा कर रखी किताबों की तरफ घुमा लिया था। आलमारी में ढेर सारी किताबें रखी हुई थीं। वहां ऐसी भी किताबें थीं जिसमें दुनिया में हो चुके सभ्यतागत बदलावों को विश्लेषित करने वाले खोजपूर्ण आलेख प्रकाशित थे। उनमें खास बात यह भी थी कि उन बदलावों के तरीकों के विशद वर्णन थे। आलोकनाथ उन वर्णनों को जब तब पढ़ा करते थे और अपनी मानसिक ऊर्जा बढ़ाया करते थे। उनमें कुछ आलेख ऐसे भी थे जिनमें उनके करतबों का प्रतिबिम्ब दिखता था। जिन्हें पढ़ कर वे घबरा जाया करते थे और आत्मपरीक्षण करने लगते थे। ‘नहीं,ं नहीं, वे संशोधनवादी नहीं हैं, संशोधनवादी तो उन्हें कहा जाना चाहिए जो सत्ता प्रबंधन के समर्थक हों। ठीक है, वे हरावल दस्ते में नहीं हैं, समाज बदलने के लिए हिन्सा का समर्थन नहीं करते पर वैचारिक लड़ाई में तो वे किसी योद्धा से कम नहीं हैं। उन्हांेने सत्ता का कभी समर्थन नहीं किया।’ आलोकनाथ अकेले शहर लौटे, कुमुद आलोकनाथ के साथ नहीं लौटी, वह गॉव में ही रह गई। गॉव में गई तो गॉव वालों का बन कर रह गई। उनके आन्दोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन कर। वह मनीश के बारे में आश्वस्त थी कि उसे समझा लेगी, सो उसे मनीश की चिन्ता नहीं थी। मनीश परेशान परेशानथा, आखिर कुमुद कहां चली गई? वह कभी इस तरह से बाहर कहीं नहीं रुका करती थी, चाहे जितनी रात हो जाये, घर अवश्य ही लौट आती थी। उसने आलोकनाथ को फोन मिलाया...कृ ‘सर! कुमुद नहीं आई क्या अभी तक।’ ‘हां वह वहीं गॉव में रुक गई है, उसे लगता है उसकी जरूरत गॉव में है।’ ‘कब तक वापस लौटेगी? कुछ बताया है क्या?’ ‘नहीं, इस बारे में उससे कोई बात नहीं हुई’ मनीश लगातार कुमुद को फोन मिला रहा था पर उसके मोबाइल का स्वीच आफ चल रहा था, परेशान हो कर उसने आलोकनाथ से पूछा था। मनीश को अपने घर में भला नहीं लग रहा था। वह तो पहले से ही चुनाव की हार के गम में डूबा हुआ था। सारी जमा पूॅजी उसने चुनाव में फूंक दिया था, इतना ही नहीं गॉव की कुछ जमीन भी बिक गई थी। ऐसे तनाव भरे समय में उसके लिए कुमुद ही सहारा थी। वह मान कर चल रहा था कि वह जिन्दगी की सारी उलझनों को कुमुद के साथ रहते हुए सुलझा लेगा। देर रात तक वह कुमुद की प्रतिक्षा करता रहा था। नींद ने उसे कब जकड़ लिया, उसे पता ही नहीं चला। नींद खुलने पर उसने देखा कि घर के सारे दरवाजे खुले हुए हैं...कृ ‘कोई अनहोनी नहीं हुई?’ मनीश दरवाजे बन्द करना भूल गया था। कुमुद की प्रतिक्षा करते करते सात दिन गुजर गये। कुमुद का फोन नहीं आया और न ही उसका फोन मिल रहा था। मनीश घबड़ा गया, हुआ क्या आखिर? ऐसा तो कुमुद कभी नहीं करती थी, कहीं बिमार तो नहीं हो गई, गॉव का पानी लग गया होगा या मच्छरों ने काट लिया होगा। मनीश अखबारों में लगातार पढ़ा करता था कि गॉव वालों के सक्रिय विरोध के कारण पहड़िया टोला में कारखाना बनना मुश्किल हो गया है। कई बार ग्रामीणों तथा पुलिस के बीच हिन्सात्मक झड़पें हो चुकी हैं। कई ग्रामीणों की गिरफ्तारियां भी की गई हैं। कहीं कुमुद भी गिरफ्तार तो नहीं हो गई? मनीश ने एक दिन आलोकनाथ से कुमुद के बारे में दुबारा पूछा था पर उन्हें भी कुमुद के बारे में कुछ नहीं पता था। वे कुमुद से नाराज थे, सो उसका हाल अहवाल नहीं ले रहे थे। आलोकनाथ ने तो कुमुद को फटकार ही दिया था... ‘जा जो करना हो कर, तुझे मरना है तो मर। मैंने तो सोचा था कि किसी कालेज में लगवा दूंगा। कालेज के लिए लेक्चररों की नियुक्तियों वाले चयन समितियों में बहुत सारे लोग मेरे हैं। किसी को बोल दूंगा, पर नहीं, तुझे तो क्रान्तिकारी बनना है तो बन। तुझे कौन समझाए कि हमारे देश की समाजार्थिक परिस्थितियां क्रान्ति के अनुकूल नहीं हैं। सामाजिक क्रान्ति का अभियान चलाने के लिए यहां के लोगों में वह गुस्सा नहीं है जो होना चाहिए। किसी खास मुद्दे पर आकस्मिक ढंग से गुस्सा हो जाना तथा सामाजिक बदलाव के लिए सत्ता के प्रबंधकीय तकनीकों पर गुस्सा हो जाना, दोनों बातें अलग अलग होती हैं। क्रान्ति के लिए सत्ताप्रबंधन के तकनीकों पर गुस्सा आवश्यक है जो दूर दूर तक भारतीय समाज में नहीं दीख रहा। हम भारतीय लोग तटस्थता और मौन के सनातनी पूजक हैं, हम सारी चीजों को दैवीय मानते हैं।’ आलोकनाथ कुमुद के कारण तनाव में थे, तनाव में क्यों नहीं रहते, वही उनका सहारा थी। पर करते क्या कुमुद तो जुनूनी हो गई थी, जिसे आलोकनाथ एक गलत कार्यवाही मानते थे। कहते थे...कृकृकृ ‘उत्तेजना श्शुचितापूर्ण चेतना को लील कर व्यक्ति को अराजक बना देती है, जाहिर है, अराजकता से समाज बदल नहीं हुआ करता।’ मनीश को कुमुद के बारे में आलोकनाथ से कोई जानकारी नहीं मिली। परेशान हो कर वह अपने गॉव चला गया, जहां आन्दोलन चल रहा था। वहां कुमुद नहीं थी। वह संतोष के साथ भूमिगत हो चुकी थी। ’यह संतोष कौन है?’ मनीश के लिए बहुत बड़ा सवाल था। संतोष के बारे में उसे जो जानकारी मिली वह चौंकाने वाली थी। मालूम हुआ कि संतोष बिहार का रहने वाला है और किसी भूमिगत संगठन का अगुआ है। संतोष के सक्रिय सहयोग व समर्थन के कारण गॉव वालों को अब तक नहीं उजाड़ा जा सका है। गॉव वालों की प्रशासन से कई बार आमने सामने की लड़ाइयां हो चुकी हैं और प्रशासन के लोग भाग खड़े हुए हैं। लड़ाइयों के कारण प्रशासन ने फिलवक्त विस्थापन के काम को रोक दिया है। संतोष के बारे में जानकारी जुटाना मनीश के लिए खतरनाक भी हो सकता था, क्योंकि गॉव के लोग गरम थे, एक महीने पहले ही तो गॉव वालों की वन प्रशासन से आमने सामने की झड़प हुई थी। गॉव वाले आग में जलने के लिए तैयार थे, लगता था कि वे आग में से तप कर निकले भी हैं। लगता उनके लिए सामाजिक व्यवस्था, कायदा, कानून तथा समरसता का मामला, महज कुछ शब्द भर हैं जो समय के साथ भोथरे तथा निष्प्रयोज्य हो चुके हैं। मनीश गॉव में जिस आदमी के घर पर था, वह भी खूब खूब डरा हुआ था। डरते हुए बताने लगा....कृ‘बबुआ जाने का हो इस गॉव का, सिपाहियों को मारना ऐसा तो हमने नाहीं सुना था न देखा था बबुआ! पर उहो देखना पड़ा हमैं। संतोष गुरुजी ने ललकार दिया फिर क्या था गॉव के लड़के सिपाहियों पर टूट पड़े। लात जूते बरसने लगे, सिपाहियों पर। दो बार तो पहले भी ऐसा हो चुका था बबुआ। बीसों लोग गॉव के गिरफ्तार हो चुके हैं। संतोष गुरुजी और उनके साथ रहने वाली मेम साहब जाने का लगती हैं, गुरु जी की? हमैं तो जान पड़ता है कि मेहरारू ही हांेगी। गॉव में मारपीट के बाद दोनों लोग जाने कहां भाग गये। उन दोनों लोगों का कहीं अता पता नाहीं है। हमरे गॉव के लड़कवे हैं न बाबूजी! संतोष गुरुजी को कउनो देवता बूझते हैं, ओन्हई के आगे पीछे लगे रहते हैं, लड़िकवन के कुछू बोलो तो गरम हो जाते हैं। ‘बोलते हैं कि ई सब हम लोगन कऽ राज है, वन हमार, पहाड़ हमार, नदी नाला, ईहां जौन कुछ है, सब हमार है। बाहरी लोगन के हम लोग ईहां नाहीं आने देंगे।’ ‘जाने दो बबुआ का करोगे सब जानकर। हमार बात केहूॅ से जीन बताना, तोहैं भलमानुष बूझ कर हम बताय दिए, नाहीं तो हम लोगन कऽ मॅुह सिलाय गया है। एक बात अउर है बबुआ! तूंहो ए गॉव से जल्दी भाग निकलो। पुलिस के लोग अगलै बगल होंगे। देख लेंगे तो तोहैं भी संतोष गुरुजी का साथी बूझ कर जेहल में डाल देंगे। भागो भागो बबुआ!’ मनीश उस गॉव वाले की बातें सुन कर अनिर्णय की स्थिति में था, आखिर यह संतोष कौन है और कुमुद का उससे क्या लेना देना है? उसे विगत ख्याल आने लगा। वह भी तो पहले कुमुद को नहीं जानता था। हालांकि दोनों एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे। पर थे अलग अलग कालेजों में, अलग अलग विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे। छात्रा संघ के चुनाव के दौरान कुमुद उससे मिली थी, वह भी छात्रा संघ की अध्यक्षी की प्रत्याशी थी। मनीश तो था ही। मनीश चुनाव जीत गया, उसे भारी समर्थन हासिल हुआ था। दूसरे नम्बर पर कुमुद थी। कुमुद ने मनीश को जीत की बधाई दी थी। फिर मिलने का सिलसिला जो चला तो चलता ही गया। दोनों साथ रहने लगे। साथ रहने में दोनों के सामने कोई दिक्कत नहीं थी, दोनों खुले दिमाग के थे और मानते थे कि नर और नारी के रिश्तों में सखी-सखा वाला मन ही आवश्यक होता है। दोनों वादाखिलाफी को बुरा मानते थे फिर तो उनके लिए विवाह का नाटक आवश्यक नहीं था। इसी सोच के कारण दोनों ने वस्तुतः विवाह भी नहीं किया। हां दोनों नेआलोकनाथ के चरण छू कर आषीर्वाद जरूर लिए थे और साथ साथ रहने लगे थे। कुछ दिनों में ही दोनों की सांसें व घड़कने एक दूसरे को सहलाने, चूमने लगीं थीं। जैसे उन्हें अलग होना ही नहीं है हालांकि वे अर्धनारीश्वर नहीं थे, पर थे, उसी के समरूप, एक दूसरे में विलयित। मनीश का सोचना था कि जिस तरह उसने छात्रा संघ का चुनाव जीत लिया था अपने व्यवहार और विचार के आधार पर, उसी तरह विधायकी भी जीत लेगा, पर नहीं जीत सका और हार गया। हार भी पांचवें नम्बर की। कुमुद ने चुनाव में मनीश के लिए जी जान लगा दिया था। जितना वह कर सकती थी। कुमुद के बारे में जानकारी लेकर मनीश शहर लौट आया, उसे लौटना ही था, का करता गॉव में? चार दिन बाद उसे एक चिठ्ठी मिली। वह चिठ्ठी पढ़ने लगा..कृ ‘प्रिय मनीश! मैंने तुझे गॉव में देखा, मुझे मालूम था कि तुम मुझे ढूढने जरूर आओगे, मैंने संतोष को तुम्हारे बारे में बता दिया था। संतोष तुझसे मिलना भी चाहता था पर सुरक्षा कारणों से हमलोग तुझसे नहीं मिल पाये। हम दोनों तुझे देख रहे थे तथा उस आदमी को भी, जो तुझसे बतिया रहा था। तुम एक अच्छे आदमी हो मनीश! ऐसा मैं कई बार संतोष को बोल चुकी हूॅं, तुझसे बहुत कुछ सीखने और जानने का लाभ मुझे मिला है, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती। अब संतोष के साथ रहते हुए मुझे रोमांचक अनुभव मिल रहे हैं।कृ जंगल, नदी, नाले, पहाड़, पेड़, झाड़ियंा और चौड़े चौड़े हरियाई धरती के विशाल भूखण्ड, पत्तों का हरापन, उनका सरसराना, मादकता में डूब कर झूमना सारा कुछ देखो तो देखते रह जाओ। शायद तुमने पत्तियों से लदी टहनियों को, झूम झूम कर आपस में बोलते बतियाते देखा और महसूसा होगा। जंगल की मादकता में डूबना मुझे तो बहुत ही अच्छा लगता है। जानते हो मनीश! यह पत्रा लिखते समय मैं पहाड़ की एक चोटी पर बैठी हुई हूॅं, इसे हिमगिरि का उत्तुंग शिखर समझ सकते हो, संतोष मुझे भीगे नयनों से देख रहा है, मैं शीतल प्रवाह की तरह संतोष को खुद में बहाए जा रही हूॅं, मजा यह कि वह भी उसी प्रवाह के साथ बह रहा है। मनीश याद करो वे दिन, जब मैं तुम्हारे साथ ‘तुम’ बन गई थी और तुम ‘मैं’ बन कर मुझे दिल की अतल गहराई में डुबोए जा रहे थे फिर उस गहराई में अचानक हम दोनों तैरने लगे थे। याद हैं न वे दिन। क्षमा करना मनीश! मैं तुमसे बिना कुछ बताए ही यहां आ गई, मैं जानती हूॅं कि मुझे तुमको बता देना चाहिए था। यहां आने पर संतोष मिला तथा गॉव के लोग, जो परेशान हैं जिन्हें विस्थापित किया जाना है। मुझे लगता है कि गॉव वालों के लिए मैं कुछ कर सकती हूॅं। विस्थापन के खिलाफ एक सक्रिय मोर्चा बना सकती हूॅं, यानि कि एक लड़ाई लड़ी जा सकती है, सरकार की जनविरोधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के खिलाफ। कुछ ऐसी ही ऊर्जां संतोष में भी मैं देख रही हूॅ। यही ऊर्जा हासिल करने के लिए जाने कब से परेशान परेशान थी मैं।‘बुरा मत मानना मनीश! समाजबदल की ऊर्जा से तो तुम भी लबालब हो पर तुम्हारी ऊर्जा में संभ्रांतता का घोल है। जिसमें दिमाग और कंठ का मिश्रण होता है, जबकि संतोष की ऊर्जा में पेट ही पेट है। पेट की धधकती आग है, वही आग जो मुझे चिनगारी बनने के लिए प्रेरित कर रही है, वही मैं संतोष की चेतना में देख रही हूॅं, पर एक बात साफ है कि आजादी पूर्वक जीवन जीने का रास्ता तुमने ही मुझे सिखाया है। जिसका परिणाम है कि मैं इस पत्रा में वह सब लिख पा रही हूॅं जो मुझे नहीं लिखना चाहिए था, पर मुझे यकीन है कि तुम एक सचेतन आदमी हो, दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना जानते हो, यही तुम्हारी आदत तुम्हें मुझ पर नाराज होने से रोकेगी। तुम खुद को नियंत्रित कर यह प्रमाणित भी कर सकोगे कि तुम आजादी का सम्मान करना जानते हो, तथा समानधर्मा रिश्तों का निर्वहन भी। ‘सच बताऊं मनीश! आज जिस लाईन का चुनाव मैं कर सकी हूॅं, वह तुम्हारी ही सीख है। तूंने ही सिखाया है कि मित्राता में झूठ बोलना अपराध होता है, सो सच सच बोल रही हूॅ।कृ हम इस समय ऐसे मोड़ पर हैं, जहां तमाम तरह के आकस्मिक निर्णयों के लिए सलाह मशविरे की जरूरत पड़ती है। मेरे साथ तुम्हारा न होना काफी अखर रहा है, पर मैं तुम्हारी प्राथमिकताओं को जानती हूॅ। सो तुमसे यह नहीं बोलूंगी कि तुम भी हमारे साथ जुड़ जाओ, फिर हम एक साथ मिल कर नया सबेरा देखने की कोशिश करंे। खैर क्षमा करना साथी! और उस समय को भूलने की कोशिश भी, जिसे हम दोनों ने एक दूसरे में विलयित हो कर जिया था। संभव है कि अब तुमसे मुलाकात न हो, मैं जिस रास्ते पर चल पड़ी हूॅं उसके हर कदम पर मृत्यु थिरकती रहती है। एक निवेदन यह भी है कि हमारे बीच संबधों का जो अन्तर्लयन था, उसे प्रलय न समझना तथा प्रकृतिस्थ होने के संभव उपायों को आजमाते रहना। यहां मैं तुम्हारी स्मृतियों के मनोरम कौतुकों में गोते लगाती रहूॅंगी। हो सके तो पापा का भी ध्यान रखना।’ पत्रा लम्बा था, पत्रा के एक एक शब्द मनीश को टुकड़ों में बांट रहे थे। मनीश विखंडित हो कर किसी कठिन कविता का हिस्सा बनता जा रहा था। उसे आने वाले समय के साथ कुमुद से जुड़ी यादों की संगति बिठाने का काम करना था तथा मान लेना था कि समय उससे आगे निकल चुका है। वह बीते समय में अब नहीं लौट सकता, उसके सारे दरवाजे बन्द हो चुके हैं। पत्रा पढ़ लेने के बाद मनीश चौंक गया....कृ ‘तो क्या कुमुद जिस ‘लाईन’ की बातें, बात बात में किया करती थी, वह ‘लाईन’ यही है। इसी लाईन पर वह चलना चाहती थी, यानि कि संतोष की लाईन। संतोष की लाईन ही अगर कुमुद को पसंद थी तो मुझसे जुड़ने का मतलब?’ क्या उसे नहीं पता कि ‘लाइन’ में लगना और ‘लाइन’ बन जाना अलग अलग बातें होती हैं’ ‘मुझसे वह जुड़ी तो उसे पता था कि मेरी लाईन का बाजार है और मैं छात्रा संघ का चुनाव जीत चुका हूॅ, वह विजेता के साथ थी, पराजित के साथ नहीं। अब तो मैं हारा हुआ, औसत दर्जे का आदमी भर ही हूॅ। भला मेरे साथ कुमुद कैसे रह सकती है? अगर उसे कहीं जाना था, तो चली जाती, यह क्या है कि बिना बताये ही चली गई। कुमुद को समझना चाहिए था कि ’आज का राजनीतिक समय पहले वाला नहीं है, आज तो केन्द्र की सरकार ही नहीं प्रदेशों की सरकारें भी वामपंथियों तथा जनवादियों के विचारों के खिलाफ हैं। वामपंथी व जनवादी शाक्तियों को जनता ने मौजूदा चुनावों में नकार दिया है। मनीश परेश्शान था। वह दोस्तों से कुमुद के बारे में क्या बताता, कि वह उसे छोड़कर चली गई है अपनी ‘लाइन’ बनाने के लिए। ‘जो धारा बन जाये, वही ‘मुख्यधारा’ है’ पहड़ियाटोला सोनभद्र के उन गॉवों में था जहां पहाड़ थे, नाले थे और जंगल होने की यादें थी। गॉव में घुसते ही पेड़ों के खुत्थ दिखने लगते थे। गॉव में घुसने के लिए केवल एक ही रास्ता था, जिसे वन विभाग ने अपनी सुविधा के लिए बनवाया हुआ था। वह एक ऐसा रास्ता था जो तकरीबन तीस किलोमीटर दूर जाने के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ता था। बरसात के दिनों में रास्ते को अपनी गोदी में पहाड़ी नाले जकड़ लिया करते थे सो पूरे तीन महीने के लिए रास्ता बन्द हो जाया करता था। गॉव में एक कहानी अधिकांश लोगों की जुबान पर थिरकती रहती है कि कभी बनारस के राजा चेत सिंह जिन्होंने बिजयगढ राज पर कब्जा कर लिया था, वे इसी रास्ते से रीवां के लिए भागे थे। वारेनहेस्टिंग्स की सेना ने इसी रास्ते से उनका पीछा किया था। गॉव में एक कहानी अगोरी के राजा मदनशाह के बारे में भी चर्चित थी। ग्यारहवीं शताब्दी में मदनशाह, सोनभद्र के अगोरी व बिजयगढ़ राज का राजा था। वह जब भी शिकार के लिए जंगल की ओर निकलता था तो इसी रास्ते से निकलता था। लौटते समय इसी गॉव में पड़ाव डालता था, गोया पहड़ियाटोला एक प्रकार से ऐतिहासिक गॉव था जो तत्कालीन राजा के पड़ाव के नाम पर बना था। उस गॉव की तस्वीर जो आज है, पहले नहीं थी। क्योंकि वह जमाना कानूनों की सादगी वाला था। उस जमाने में ‘एक हल की जोत’ की भूमि व्यवस्था थी। हर बालिग लड़के को राजा की तरफ से एक हल की जोत की जमीन मिल जाया करती थी। वह जमीन उतनी होती थी, जितनी एक आदमी एक हल से जोत कर, उसे फसलों से हरा भरा रख सकता था। उसकी पैदावार उसके खाने-पीने के लिए पर्याप्त होती थी। उस जमीन पर लगान नहीं लगता था। वह समय का एक ऐसा दौर था, जिस जमाने में भूमिप्रबंधन जैसा कोई कानून नहीं था तथा खेती वाली जमीन के बाबत किसी प्रकार का झगड़ा भी नहीं था। झगड़े तो आधुनिक भूमिप्रबंधन के कारण बढ़े हैं जो नित बढ़ते ही जा रहे हैं। गॉव में बसने वाले सभी लोगों के पास जमीन थी। कोई आज की तरह भूमिहीन नहीं था। एक तरह से गॉव के सारे लोग समान आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति के लोग थे, तथा संयुक्त परिवार में रहा करते थे। आदिवासियों को उस दौर में गवहां बोला जाता था। आज की तरह वनवासी, आदिवासी पिछड़ा और असभ्य नहीं। बालिग लड़कों का अपने मॉ बाप से अलग रहना उस जमाने में अपवाद था। वनवासियों में वन के प्रति मधुरता थी। मधुरता के कारण ही वे लोग जंगल की रखवाली किया करते थे। वे खुद जंगल का रखवाला महसूसा भी करते थे। राजा भी जंगली गॉवों से पतली सी टहनी भी नहीं कटवा सकता था। वह गॉव के लोगों से पूछ कर पेड़ कटवाया करता था। उस दौर में गॉव की एक प्रबंधसमिति हुआ करती थी। गॉव के सारे वरिष्ठ नागरिक उस समिति के सदस्य हुआ करते थे। ऐसी समिति वहां कब से काम कर रही थी इसके बारे में साफ साफ पता नहीं, कोई पुरनिया भी इस बारे में कुछ नहीं बता पाता। आदिवासियों पर लिखी किताबों में इसका उल्लेख मिलता है। गॉव वाली समिति को अंग्रेजों ने समाप्त कर दिया, पर गॉव वाले बोलते हैं कि आजादी मिलते ही उस समिति को समाप्त कर दिया गया अंग्रेजों के जमाने में नहीं। गॉव पर वनविभाग का कब्जा हो गया। आजादी के कुछ साल तो सारा कुछ पहले जैसा ही चलता रहा पर बीच में जब वनविभाग ने वन अधिनियम की धारा 20 तथा 4 लगा कर गॉव वालों के कब्जों से जमीनें छीनना शुरू किया फिर मालूम हुआ कि सारा गॉव जंगल विभाग के नाम दर्ज हो गया है। आजादी मिलने के समय लोगों को पता नहीं था कि जमीन के कब्जे का कागज भी बनता है। वे केवल कब्जा जानते थे। जमीन का कागज क्या होता है, लोगों को पता नहीं था। वन विभाग द्वारा जमीन छीन लिए जाने के बाद, उन्हें मालूम हुआ कि जिनके जिनके पास जमीन के कागज हैं, वे ही जमीन के मालिक हैं, मौके पर जोत कोड़ करना और खेती कर लेना ही जमीन का मालिक होना नहीं है। 1952 के बाद वनविभाग आदिवासियों से उनके कब्जों का कागज मांगने लगा, कागज किसी के पास नहीं था। आजादी के पहले उस गॉव का कागज कभी बना ही नहीं था। अंग्रेज भी उस क्षेत्रा को गैर पैमाइष्शी मानते थे तथा आदिवासी क्षेत्रा के रूप में उसे अनुसूचित क्षेत्रा मान कर उसे दूसरे क्षेत्रों से पूरी तरह अलग कर दिए थे। वहां केवल फौजदारी के कानूनों को ही अंग्रेजों ने लागू करवाया था। मनीश सोनभद्र का रहने वाला एक पढ़ा लिखा तथा जागरूक नागरिक था। फिर भी उसे सोनभद्र के अतीत के बारे में कुछ नहीं पता था। उसे खुद पर गुस्सा आया, जब वह अपने जनपद के बारे में नहीं जानता फिर क्या जानता है? उसकी जानकारी तो अतीत के बारे में जो अकबर से होते हुए चेतसिंह तक की थी, उतने तक ही थी। वह अब तक उसी को इतिहास मानता व जानता था। उसे लगा, असल इतिहास तो गॉवों में है, लोगों की जुबान पर है। मालिक तथा मजदूर होने के बीच का इतिहास तो उसे मालूम ही नहीं। जबकि इसी इतिहास की जानकारी मानवीय सभ्यता को समझने बूझने की कुंजी है। मनीश पहड़ियाटोला से शहर लौट आया। शहर में आ कर वह परेशान परेशान हो गया। परेशान इस लिए क्योंकि कुमुद उसके साथ वापस नहीं लौटी थी, वह अकेले लौटा। परेशान वह इस लिए भी था कि वह अपने जिले के बारे में भी नहीं जानता था, उसने तय किया कि अब वह सोनभद्र के बारे में जितनी जानकारियां संभव हो सकती हैं, जानने का प्रयास करेगा। दो दिन तक वह अपने घर पर ही रुका रह गया था। घर से कहीं बाहर नहीं निकला। उसके दोस्तों के फोन आते और वह बहाने बना देता कि बिमार है, अभी घर से नहीं निकल सकता। दो दिन बाद वह कुमुद के पिता आलोकनाथ के पास पहुंचा, उनसे फोन से बातें करना उसे उचित नहीं जान पड़ा। आलोकनाथ अपने बंगले पर ही थे और कुछ कामरेडों से घिरे हुए थे जो सरकार की उदारता वाली नीति पर बातें कर रहे थे। ‘यह जो सरकार है, उदारीकरण के नाम पर देश की कीमती खनिज संपदा तथा सरकार के प्रमुख उद्योग उद्योगपतियों को देने की तैयारी कर रही है और कुछ दिखाऊ कानूनी औपचारिकताओं के बाद दे भी देगी। सरकार में ऐसे लोग हैं जो स्वदेशी की बातें करते हैं, राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हैं पर अब वही लोग विदेष्शी कंपनियों खासतौर से पश्श्चिमी कंपनियों को देशमें आर्थिक प्रबंधन तथा उद्योग वगैरह लगाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। ईस्ट इन्डिया कंपनी को वे भूल चुके हैं कि उसने कलकत्ता में बस कर पूर ेदेश पर कब्जा जमा लिया था। मनीश कामरेडों की बातें सुनता रहा था। उसे तो आलोकनाथ से बातें करनी थी, तथा मालूम करना था कि कुमुद का फोन आया कि नहीं? मौका देख कर मनीश ने आलोकनाथ से पूछा...कृ ‘सर! कुमुद का फोन आया क्या?’ ‘यही तो मैं तुझसे पूछने वाला था’ आलोकनाथ मनीश की ओर थे। ‘हां यार मनीश तूं तो गॉव गये थे नऽ, वहां कुमुद के बारे में कुछ पता चला’ ‘नहीं सर! वहां कोई भी कुमुद के बारे में बताने के लिए तैयार नहीं। केवल एक बात मालूम हो सकी कि कुमुद किसी संतोष नाम के लड़के के साथ भूमिगत हो गई है, जो बिहार का रहने वाला है, और वाम उग्रवादी संगठन का अगुआ है।’ ‘क्या बोले, फिर तो बोलो, किसके साथ?’ ‘संतोष के साथ सर!’ आलोकनाथ चौंक पड़े, उन्हें कुछ याद आया... ‘तो संतोष सोनभद्र में सक्रिय है, वह तो कहीं और था,कृखैर छोड़ो....’ ‘देखो मनीश! तूं अपना कोई रास्ता बना लो, कुमुद मुख्यधारा में लौटकर अब नहीं आने वाली। संतोष के बारे में शायद तुझे नहीं मालूम, मालूम होगा भी तो कैसे? वह जादूगर है, उसके संपर्क में जो भी आया, वह उसी का हो गया। वह किसी के मन के भीतर चल रही हलचलों को अल्ट्रासाउन्ड की तरह जॉच लेता है फिर फैसले लेता है। कुमुद तो सामान्य सी लड़की है। उसके पास समय की अन्तरधाराओं को पहचानने की शक्ति नहीं है। समय केअनुकूलन का तो सवाल ही नहीं। उसके निर्णयों के बारे में मुझे पता है कि वह भावुकताओं के सहारे सारी चीजों को समझती है। यह उसकी बहुत बड़ी कमजोरी है, पर क्या कहें, वह अपनी कमजोरी को ही ताकत समझती है। निश्चित रूप से जान लो मनीश! वह संतोषके आभामंडल से चकरा गई होगी और उसके साथ चल पड़ी होगी।’ ‘तो क्या आप संतोष को जानते हैं सर!’ ‘हां यार जानता भी हूॅं, और नहीं भी जानता हूॅ’ ‘ऐसा कैसे सर! जानता भी हूॅं और नहीं भी, इसमें से एक बात ही सच होगी नऽ सर!’ मनीश ने आलोकनाथ से जानना चाहा...’ ‘नहीं यार दोनों बातें सच है.’ आलोकनाथ कहते हुए मुस्करायेकृकृ फिर बोलने लगे..देखो मनीश! बात साफ है, साफ बातों की तरह, वह यह कि संतोष वामउग्रवाद के आन्दोलन में यही कोई चार साल पहले कूदा था और आज वह उस आन्दोलन का अगुआ है। इसी से अनुमान लगा सकते हो कि वह कितना प्रतिभाशाली है। वह किसी भी तरीके से मानने के लिए राजी नहीं कि संसदीय लोकतंत्रासे समाजबदल हो सकता है, वैसे तो वह यह भी मानता है कि असमान समाजार्थिक परिस्थितियों में क्रान्तिकारी चेतना भी समाज के चित्तऔर चेतना को नहीं बदल सकती, पर होती है अनिवार्य। आज के समय के वैचारिक औजार चुनाव, जनमत और प्रतियोगिता वगैरह ये बराबरी क्या उपजा पायेंगे, संभव बराबरी भी नहीं उपजा पायंेगेे, चुनाव, जनमत और प्रतियोगिता से एक नये तरह की असमानता पैदा हुई है। चुनाव को ही देख लो...कृचुनाव तो वही लड़ेगा नऽ, जो पैसे वाला होगा। सरकार और राजनीति के लिए चुनाव एवं जनमत तथा नौकरशाही के लिए प्रतियोगिता ने समाज को क्या दिया? महज कुछ लोगों को छांट लिया, इतिहासकारों की तरह, वे भी इतिहास को चुनिन्दा घटनाओं से ही गढ़ते हैं,कृसजाते, संवारते हैं। चुनाव भी कुछ लोगों को सत्ताप्रबंधनसे जोड़ कर, उन्हें जनता का प्रतिनिधि होने का मुकुट पहना देता है, बस इतना ही नऽ। सत्ताप्रबंधनकी इस तकनीक से बौद्धिक असमानता ही तो फैली और क्या हुआ इससे? बौद्धिक असमानता की सीधा अर्थ है आर्थिक व सामाजिक, असमानता बढ़ाना।’ यह सब तो है ही सर! पर मुझे संतोष के बारे में साफ साफ बतायें, वह वामउग्रवादी कैसे तथा क्यों बन गया? सुनने में आया है कि वह काफी पढ़ा लिखा है तथा जे.एन.यू. का उत्पादन हैकृ.’ ‘हॉ, जो तुमने सुना है ठीक ही सुना है’ वह वामउग्रवादी नहीं बनता तो क्या बनता? केवल यही रास्ता बचा था उसके सामने, उसका घर जला दिया गया, उसके बड़े भाई को दिन दहाड़े गोली मार दी गई और मॉ बाप को पता नहीं कहां ले जाया गया, आज तक पता नहीं चला। आखिर वह क्या करता मनीश? वैसे वह व्यक्तिगत तौर पर हिंसा में यकीन नहीं करता था और न ही उसका समर्थक हैकृपर अब तो.रूआंसा हो गये, आलोकनाथ।‘छोड़ो इस प्रसंग कोकृमेरी तो संतोष से सहानुभूति है। एक बात जान लो मनीश! हिंसा का विकल्प प्रतिहिंसा नहीं हो सकती, संतोष को इस सच के बाबत गुनना चाहिए था।’ संतोष के बारे में जान कर मनीश अचरज में पड़ गया. तो संतोष वलिदानी आदिवासी पुरखों के रास्ते पर चल रहा है। वैसे मनीश को आलोकनाथ के यहां से उदास लौटना पड़ा। वहां से उसे कुमुद के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। कुमुद ने जो पत्रा भेजा था, उसमें उसका पता ठिकाना नहीं था, वह किसी के द्वारा उसके घर पर भेज दिया गया था, वह कौन था, कुछ नहीं मालूम। ‘मनीश कैसे पता लगाए कुमुद का? उसके सामने फिलवक्त यही बड़ा सवाल था और उसे ही हल करने के बारे में वह सोच रहा था पर रास्ता कुछ भी नहीं था। मनीश जानता था कि जो खुद को छिपा कर रखना चाहता है उसे खोजना अंधेरे में तीर चलाना होगा, जिसका कोई मतलब नहीं, पर करे क्या? मनीश आलोकनाथ के बंगले से घर लौट आया। घर लौटना ही उसके काम आया। कुमुद के घर पर न रहने के कारण घर, घर जैसा नहीं लग रहा था। वही घर जिसमें कुमद के रहने के कारण हसियों के बादल झूमा, गाया और नाचा करते थे। आज सभी खामोश हैं, मौसम भी। उसने घर की पुती दिवारों को देखा, उसके रंग रोगन ठीक ठाक थे पर लगता कि काले काले चकत्ते उभर आये हैं। इन चकत्तों पर कुमुद की नाराजगी के संवाद लिखे हुए हैं, पर कुमुद काहे नाराज होगी? उसने तो अपनी तरफ से ऐसा कुछ किया नहींकृनाराजगी का क्या, वह कैसे मन के गहरे में जगह बना लेती है, किसी को क्या पता? संभव है, वह किसी बात पर नाराज हो गई हो और भीतर से उसे खीझ हुई हो। मनीश खुद को विश्लेषित करने लगा तथा कुमुद के साथ बिताए दिनों में लौट गया। कुमुद के साथ बिताए दिन मनीश के लिए वसंती थे। दिल को गहरे तक प्रभावित व उन्मादित करने वाले। कुमुद की हर सांसें नपी तुली होतीं थीं पर कभी कभी उन्मुक्त भी हो जाया करती थींकृफिर तो कुमुद लहर बन जाया करती थी। कुमुद का लहर बन जाना तथा उसे उसमें बहा ले जाना, कब कैसे हो जाया करता था, मनीश इसका अनुमान तक नहीं लगा पाता था। कुमुद के साथ हो जाना भी, मनीश के लिए कम अचरज भरा नहीं था। कुमुद विश्वविद्यालय की उन लड़कियों में थी, जो अपने मन की मालिकिन हुआ करती थीं तथा समय को अपने अनुसार नियंित्रात करना जानती थीं। विश्वविद्यालय कीे अध्यक्षी का चुनाव लड़ने के साल भर पहले कुमद मंत्राी का चुनाव लड़ चुकी थी और भारी मतों से विजयी भी हुई थी। मनीश ने कुमुद को पहली बार भाषण देते हुए देखा था। भाषण में वह चुनाव लड़ने का कारण बता रही थी कि वह चुनाव क्यों लड़ रही है तथा चुनाव क्यों लड़ना चाहिए। उसने साफ साफ बताया था कि ग्रेजुएट उत्पादित करने वाले संस्थानों को जिस तरह चलाया जा रहा है, उस तरह नहीं चलाया जाना चाहिए। शिक्षा के संस्थानों को बेरोजगारों के उत्पादन का केन्द्र बनने से रोकने का प्रयास करना चाहिए ऐसा तभी संभव हो सकता है जब विश्वविद्यालयों में छात्रासंध अपनी सार्थक भूमिका के साथ संघर्षरत हों, जो आज के समय में नहीं हो रहा। कुमुद ने अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए विश्वविद्यालयों के आंकड़ों को भी उधृत किया था। विश्वविद्यालयों से ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट करने वाले छात्रों की बेरोजगारी पंचानबे प्रतिशत से ऊपर है। विश्वविद्यालय से डिग्री लेने के बाद, ये छात्रा न तो हल जोतने लायक रह जाते हैं और न ही कोई काम करने लायक, क्योंकि सभी के सपने आसमान में चमकने वाले तारों की तरह होते हैं। काम करने के सपनों में तो होता है कि उनके पास नौकर चाकर हों, खूबसूरत बंगला हो, छमछमाती कार हो, यानि कि हाथ से कुछ न करना पड़े। सारा कुछ ऐसे ही होता चले। तो ऐसा संभव नहीं? कुमुद सवाल करती और जबाब भी खुद ही देती... ‘सरकार समाज को संभव बराबरी के स्तर पर लाने का प्रयास करे तो सकारात्मक परिणाम आ सकते हैंकृ’ मनीश को कुमुद की बातों ने प्रभावित किया था। उसे लगा था कि कुमुद किसी न किसी दिन खुद को अच्छा व सफल जन प्रतिनिधि के रूप में प्रमाणित कर सकती है। मनीश उस समय केवल पढ़ाई पर ध्यान दे रहा था, सो राजनीति से बाहर था, पर उसे कहीं न कहीं मतदान वाली राजनीति अवश्य ही प्रभावित करती थी। मनीश को क्या पता था कि एक समय ऐसा भी आ सकता है, जब वह कुमुद के दिल व दिमाग के करीब होगा, जिसकी वह कल्पना तक नहीं कर सकता। छात्रासंघ का महामंत्राी बन जाने के बाद कुमुद का कद काफी बड़ा हो गया था, वैसे तो उसका कद चुनाव जीतने के पहले से ही बड़ा था, वह एक सम्मानित प्रोफेसर आलोकनाथ की एकमात्रा लड़की थी और खूबसूरत भी। कुल मिला कर बड़ा होने की सारी सहूॅलियतें कुमुद के पास थीं। छात्रों की जुबान पर रहने बसने वाली कुमुद को एक व्यवहार कुशल लड़की माना जाता था। खैर मनीश के साथ समय जाने किस तरह का खेल खेल रहा था। मनीश अचानक कुमुद से जैसे जुड़ा, वैसे ही बिछुड़ गया। उसके साथ आकस्मिकों का खेल चल रहा था और वह उसी में फसा पड़ा था। यह भी निश्चित नहीं हो पा रहा था कि कुमुद वापस नहीं आने वाली, गई तो चली ही गई, वाली स्थिति भी तो नहीं थी। मनीश कुमुद के जाने के बाद टूट गया था। किसी तरह उसने खुद को संभाला और डिप्रेसन में जाने से खुद को बचाया। उसने खुद को आश्वस्त किया कि कुमुद ने उससे अलग होने का कोई अस्वाभाविक फैसला नहीं लिया है, जिस पर चिन्तित हुआ जाये। ‘कुमुद चली गई तो क्या हुआ? वह भी किसी के साथ हो लेगा।’ किसी के साथ....! चौंक गया मनीश! नहीं नहीं, वह कुमुद के अलावा किसी और के साथ नहीं हो सकता। किसी के साथ होना न होना कोई खेल नहीं है। चाहे जहां खेल लिया, चाहे जैसे खेल लिया। किसी के साथ होना तो मन का मामला है, जिसे मन ही समझ सकता है। तन की भूख मिटाने के लिए जाने कितने ठिकाने बनाए जा सकते हैं, पर मन की भूख के लिए तो कहीं ठिकाने होते ही नहीं। मन को तो प्रकृति वाली निश्छलता तथा कोमलता चाहिए होती है, वही हरापन, वही शान्ति, वही हवांएं जो मन के कोने कोने को लहरा सकें, ऐसा नहीं तो मन, मन नहीं रह जाता, वह किसी चीख या आह में बदल जाता है। ऐसा कुछ नहीं करने वाला मनीश। अभी तो वह खुद को विश्लेषित करने के बारे में गुनेगा फिर सोचेगा कि उसे क्या करना चाहिए? पर जाने क्यों उसे ऐसा लगता है कि कुमुद किसी न किसी दिन लौट आएगी। बस उस दिन के बारे में फिलहाल नहीं पता कि वह दिन कब आएगा? पर वह लौटेगी जरूर। कुमुद मनीश से अलग हो कर किसी दूसरे के साथ नहीं रह सकती। उसने ही उसे चुना है और वह अपने चुनाव को कभी भी गलत नहीं मान सकती। आलोकनाथ जी तो उसे समझा रहे थे कि मनीश के साथ तूं संतुष्ट नहीं रह सकती, मनीश औसत दर्जे के मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का है, उसके संस्कार ऐसे नहीं जिससे तूं बहुत समय तक खुद को जोड़ कर रख सकोगी। कुमुद ने आलोकनाथ को नकार दिया था और मनीश के साथ रहने लगी थी। मनीश ने भी देखा था कि कुमुद के पास सामाजिक जड़ताओं एवं अनगढ़ताओं के लिए कोई स्थान नहीं।कृवह खुले आकाश की यात्राी है, जहां कोई पड़ाव नहीं होता, एकदम से खुला खुला।’ उसने साफ साफ कहा था...कृ ‘मनीश! तूं तो दकियानूसी हो, ये शादी फादी क्या होती है, मैं परंपराओं की गुलाम नहीं।’ मनीश ताकता रह गया था कुमुद को। उसके चेहरे पर आत्मविश्वासियों के चेहरों वाली ज्योति थिरक रही थी, मनीश खुद में डूबे रहना जानता था, वह डूबा रहता भी था पर अब उसे लगता है कि वह कहीं खो गया है। कुमुद फोन भी तो नहीं कर रही थी और न ही मनीश को किसी दूसरे श्रोत से कुमुद के बारे में जानकारी मिल रही थी। पहड़ियाटोला की खबरें अखबारों में आती थीं। सरकार परेशान परेशान थी, वहां के किसानों की जमीनों का अधिग्रहण नहीं कर पा रही थी। किसानों की विद्रोही चेतना पर वुद्धिजीवी बहसें कर रहे थे, आखिर वह कौन सी ऊर्जा है जिससे प्रभावित हो कर किसानों ने सरकारी करतबों का जबाब देना शुरू कर दिया है। साफ दीख रहा है कि पहड़ियाटोला के गरीब किसान सरकार के आगे माथा नहीं झुकाने वाले। मनीश देर रात तक घर वापस आता और कुमुद की यादों के एक एक पन्ने उलटने पलटने लगता। यादों के पन्ने ताजे थे, जैसे हाल ही में लिखे हुए हों। कुमुद किसी परी की तरह आसमान से उतर रही है और मौसम उसे बार बार चूम रहा है। रिमझिम फुहारें कुमुद का चेहरा चूम रही हैं और उस आनन्द के महोत्सव का साक्षी बन कर मनीश खुद को उस लायक बनाने के बारे में सोच रहा है कि वह पहली बार कुमुद से क्या बोलेगा? पहली बार तो वह कुमुद से केवल इतना ही बोल पाया था...कृ कि मैंने आपका भाषण सुना है। ‘भाषण! कौन भाषण’ पूछा था कुमुद ने ‘अरे वही भाषण, जिसे आप विश्वविद्यालय छात्रासंघ के चुनाव दौरान कालेज दर कालेज दे रही थीं। आप छात्रासंघ के मंत्राी की प्रत्याशी थीं। मुझे उसी समय जान पड़ा था कि आपके पास अद्भुत प्रतिभा है, जो किसी किसी के पास ही होती है।’ मनीश समझ नहीं पा रहा था कि वह कुमुद के एकदम आस पास पहुंच सकता है, मुष्श्किल से सांस लेने भर की दूरी भी नहीं, सांसें टकराने लगीं...सांसों में मुलायम तपिश थी, देहों को हिलोरने वाली। दोनों के बीच प्यार की नरम ऑच पसरी हुई, ठंड का कहीं पता नहीं। देह की तपिश में जकड़े हुए। अचानक मनीश संभला... ‘हो क्या रहा है? ऐसा तो तब होता है जब शादीवगैरह हो जाती है, उन दोनों का विवाह नहीं हुआ है फिर कुमुद की अंतरंग सांसों से वह कैसे खेल सकता है? और यह भी कि कुमुद कैसे मुख्यधारा से अलग हो सकती है? अपनी धारा बनाने के लिए यानि जो धारा बन जाये वही मुख्यधारा है। ‘ज्ञात, अज्ञात दोनों यथार्थ हैं थोड़ा और चलें, मंजिल दूर है अभी’ सॉसंे तो सांसें होती हैं, टकराती हैं और गुत्थमगुत्था भी हो जाया करती हैं।कृसांसों की टकराहटें अद्भुत किसिम का स्वर्ग रचती हैं, फिर तो सारा कुछ जो यादों का धरोहर होता है, भूल जाया करता है। मजबूत से मजबूत यादें भी सांसों की टकराहटों से बच, बचा कर रहना चाहती हैं।कृ मनीश सांसोें की टकराहटों से घबड़ा रहा था, पर कर भी क्या सकता था। उसका समय तो कुमुद के साथ था। कुमुद की ही तरह मादक और वसंती, कुमुद उसका उपयोग पूरी क्षमता के साथ कर रही थी। उस समय उसे एहसास नहीं था कि करना क्या चाहिए, क्या नहीं? कुमुद के बारे में मनीश को पहले से पता था कि वह गंभीर किस्म की लड़की है, पर उसका छोटा सा अंश भी उसमें नहीं दीख रहा था, वह एकदम से बदली हुई थी। वह कुमुद जिसे उसने छात्रासंघ के चुनाव अभियान के दौरान देखा था, वह विलुप्त हो गई थी। चुनाव अभियान के दौरान तो उसे लगा था कि कुमुद आने वाले दिनों में किसी सार्थक क्रान्ति का प्रणेता बन सकती है, वह थी भी। उसी तरह की, एकदम से खरा खरा बोलने और बतियाने वाली। मनीश ने कुमुद के इस दूसरे रूप के बारे में सोचा व गुना नहीं था। कुमुद तो बदल सी गई थी, वह अपने होने में खोई हुई थी। वह एक नारी थी, खूबसूरत और बेधक, उसके रोम रोम से मादकता छलकती थी। वहां जो कुछ भी था, वह चॉद तारों के खेल वाला था। चॉद तारों का खेल किसे भला नहीं लगता, मनीश को भी भला लग रहा था, पर था अचरज भरा। ‘क्या ऐसा भी हो सकता है?’ पहली मुलाकात ही चॉद तारों के खेल के रूप में बदल कर मनोरम हो सकती है। एक असंभव सी बात। नर नारी के रिश्तेे इतने सहज और सरल नहीं होते, पर मनीश कुछ कर भी तो नहीं सकता था। वह रहस्यमय रंजक स्थितियों में गोते लगाने के लिए विवश था। क्योंकि कुमुद तो अपने मन की वर्जनाओं से बाहर निकल कर तन का खेल बन चुकी थी। मनीश जानता था कि खेल तो खेल होता है, वह कभी पहले तन के खेलों का प्रतिभागी नहीं बना था। वह तन के तनतंत्रा को जानता भी नहीं था, पर इतना जानता था कि तन की संप्रभुता तथा मन की संप्रभुता में द्वन्द चला करता है, कभी तन, मन को पराजित कर देता है तो कभी मन, तन को, दोनों के द्वन्द चित्ताकर्षक तथा प्रभावकारी भी कम नहीं होते। कुमुद मनीश से मिल कर दूसरी दुनिया का नागरिक बन चुकी थी, लगा कि उसे सारा कुछ हासिल हो चुका है। तन की कौतुक भरी रंजक दुनिया, अनुभव के स्तर पर उसके लिए अद्भुत थी। उसने कुछ किताबों को पढ़ा था जिनके विवरण देह के एक एक हिस्से को उत्तेजक बना देते थे जो अव्यवहारिक जैसे जान पड़ते थे। उन विवरणों पर कुमुद को यकीन नहीं था, उसका मानना था कि ऐसी किताबें जीवन की सार्थक अनुभूतियों को नहीं छूतीं। पर मनीश के साथ होते ही, वही किताबंे उसे उसके निर्णयों से अलग कर रही थीं और वह खुद को तलाशते हुए खुद में खोती जा रही थी। उसे लगता कि मनीश एक अपठित किताब है, जिसके हर पन्ने पर दैहिक ऊर्जा के सारे श्रोत चिपके हुए हैं ऐसी किताब पढ़े बिना कैसे छोड़ी जा सकती है, सो वह पढ़ रही थी। पहले तो उसे झिझक हुई, कहीं मनीश ने उसे इनकार दिया तो....वैसे भी किताब के पन्ने आजाद होते हैं, उसके शब्द, अपने अर्थाें को चाहें तो खोले चाहें तो न खोलें। कोई जरूरी नहीं कि वह देह की अपठित किताब को जैसे पढ़ना चाहती है, वैसे ही पढ़ पाए। यह भी तो था, कि किताब पढ़ने के दौरान जाने क्या सोचे गुने मनीश, पर किताब तो किताब होती है, किताब का अपना न कोई भूगोल होता है और न इतिहास, उनमें लिखे शब्दों के बीच अन्तरविरोध भी नहीं होते, फिर तो वह किताब पढ़ सकती है। मनीश भी तो नर है, देह के कौतुकों को अचरजों से पीने वाला, अचरजों को तो पिएगा ही। कितना दबाएगा देह की कुदरती ंऊर्जा को। देह की थिरकनों को रोक लेना आसान भी तो नहीं, पढ़नी चाहिए किताब। ऐसे मामलों में प्रेक्टिकल बनना ठीक होता है, सोच को जब तक प्रेक्टिकल न बनाओ, वह केवल सोच ही रहती है, फिर तो कुमद...कृकृ कुमुद सचेत होकर मनीश के भीतर उतरने लगी थी। फिर तो वही होना था जो नर और नारी को अतर्लयित कर देते हैं, एक में विलयित। सोया हुआ मन थिरकने लगता है, कुमुद थिरकने लगी थी। उस समय उन दोनों की मानसिक वर्जनांए, कहीं दूर छिटक गईं थीं।कृ थिरकन कभी भी स्थायी नहीं होती। थिरकन टूटी, उसे टूटना ही था फिर कुमुद शान्त और स्थिर थी। अब वह वर्जनाओं की सांस्कारिक गुणा गणित में थी, बुरा हुआ, बुरा नहीं हुआ, उसे मनीश के लिए दैहिक उपकरण नहीं बनना चाहिए था। उसे देह-दाह को रोकना चाहिए था। चाहे कुछ भी घटित हो पर देह को तो बांध कर रखना ही चाहिए था। इस तरह की दैहिक स्वतंत्राता, दैहिक गुलामी में भी तो तब्दील हो सकती है। कुमुद दैहिक बंधनों को गुलामी का ही एक रूप मानती थी। उसका मानना था कि मन की तरह, तन को भी खुले आकाश का यात्राी होना चाहिए। कुमुद की नजरें मनीश की तरफ नहीं उठ पा रही थीं। उसने एक दो बार मनीश को देखने की कोशिश की, पर बेकार। ‘वह नहीं देख पाएगी मनीश को।’ मनीश भी तो उसे नहीं देख पा रहा था। वर्जनांए मनीश को रोके हुए थीं।अचानक मनीश को जान पड़ा कि वर्जनांए टूट रही हैं, वह उन्हें नहीं रोक सकता। वह वर्जनाओं को लॉघ चुका था, वह वैसा कर चुका था, जिसे नहीं करना चाहिए था। कुमुद वर्जनाओं की दुनिया जानती थी, क्या होना चाहिए क्या नहीं होना चाहिए, उसे पता था। पर वह तो वर्जनाओं के पार थी, जहां वर्जनांए होतीं ही नहीं। कुमुद कुछ देर में सम्हल चुकी थी, तन का कौतुक अचरज भरे परिणाम तक पहंुच चुका था। उसके बाद कुमुद आश लगाए थी कि बातों की शुरुआत मनीश करेगा पर मनीश था कि चुप्पी ओढ़े हुए था। जैसे उन दोनों के बीच कुछ नया और अद्भुत घटा ही न हो। ‘अद्भुत’ जो घट चुका था, उसके कारण दोनों के बोल छिन चुके थे, दोनों को अहसास था कि वे अपनी सीमांए पार कर चुके हैं, सो वहां चुप्पी पसर गई थी। एक तरह से वह भी संवाद ही था, चुप्पी वाला जो भीतर से कुलबुला रहा था। दोनों के बीच पसरी चुप्पी को कुमुद ने तोड़ा...कृ ‘सारी मनीश! मुझे नहीं पता था कि मैं क्या कर रही हूॅं, असल बात तो यह है, कि मुझे यह भी पता नहीं कि मैं कुमुद हूॅंू।कृअब मैं महसूस कर रही हूॅॅ कि मैं अपने अवचेतन को नियंत्रित नहीं कर पायी। तुम भी तो कहीं खो गये थे मनीश! तुम न तो मनीश रह गये थे और नहीं मैं कुमुद, लगता है हम दोनों केवल नर और नारी में तब्दील हो गये थे, एक दूसरे में विलयित। यही सच है मनीश।’ ‘मुझे माफ कर दो मनीश! मैंने तुम्हारे मन की शुचिता को आहत किया, वर्ना तुम वर्जनाओं के पार नहीं जाते, तुम मेरे बारे में जो चाहे फैसले लो, पर मुझे माफ कर दो। मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए अपने मन को चोटिल कर लो।’ मनीश कुमुद को सुनने में था और उसके चेहरे को एकटक देख रहा था। अभी अभी समय जो गुजरा है, वह कुमुद के चेहरे पर थिरक रहा है कि नहीं?कृ कुमुद के चेहरे पर शान्ति वाली चमक थी, लगता था, उसे जो हासिल करना था, वह हासिल कर चुकी है, पर मनीश तो अपराधबोध में था और खुद को संतुलित नहीं कर पा रहा था। उसे लग रहा था कि उसने गलत किया है जो उसे नहीं करना चाहिए था। वह भी तो कुमुद की धारा में गोते लगाने लगा। उसे क्या पता था कि नारी तन के आगे वह दृढ़ नहीं रह पायेगा, पर जो होना था वह तो हो चुका था। मनीश ने खुद को संयत किया और...कृकृ ‘कोई बात नहीं कुमुद! अब पीछे लौटने का क्या मतलब। हम तो बहुत आगे बढ़ चुके हैं, एक तरह से देखो तो हम एक दूसरे को ही तो ढूढ रहे थे, तूं मुझे और मैं तुझे ढूढ रहा था, एक दूसरे को ढूढना गलत नहीं। जो गलत मानते हैं, वे मानते रहें तुमने कुछ गलत नहीं किया कुमुद! ऐसा तो होना ही था क्योंकि हमारे विचार भी तो आपस में गुंथे हुए हैं, सो वे अलग रह भी तो नहीं सकते। जाहिर है कि यह जो तन का मामला है, बहुत कुछ मन के मिलन का भी मामला है। मन पहले गुत्थम, गुत्था होते हैं, फिर तन खुद गुत्थम, गुत्था हो जाते हैं। बेचारा तन क्या करे वह तो मन का अनुगामी होता है। आगे आगे मन पीछे पीछे तन। तन तो मात्रा दिखावा है, मन का अनुचर, उससे क्या फर्क पड़ता है। मन का मिलन शुचितावादियों की वर्जनाओं को नहीं मानता, वहां अगला कदम होता है, पिछला नहीं। मुष्श्किल से दो महीने ही गुजरे होंगे के एक दिन कुमुद ने मनीश को अचरज में डाल दिया... ‘ऐसा है मनीश! कि अब हमें साथ साथ रहना चाहिए। मैं अब पापा के साथ नहीं रहना चाहती। अब हमें अपनी अलग दुनिया बना लेनी चाहिए। तुम समझ रहे हो नऽ मेरी बात कि मैं क्या कह रही हूॅ...?’ मनीश चौंक गया...कृकृ ‘साथ का क्या मतलब? हम तो साथ साथ हैं ही’ मनीश ने नकारा ‘ऐसा साथ नहीं, मैं कल ही पापा के यहां से तुम्हारे यहां के लिए शिफ्ट कर रही हूॅं और तुम्हारे मकान पर आ रही हूॅ’ कुमुद ने स्पष्ट किया... ‘ऐसा कैसे हो सकता है कुमुद?’ मनीश ने संदेह व्यक्त किया ‘क्यों नहीं हो सकता?’ ‘बिना शादीके! शादी जरूरी तो नहीं’ ‘जरूरी नहीं!’ ‘हां और नहीं तो क्या’ ‘क्या बोल रही हो कुमुद! जो बोल रही हो उसके बारे में तुम्हें पता है कुछ?‘हॉ तभी तो बोल रही हूॅं’ शादीकर लेने में क्या दिक्कत है?’ ‘दिक्कत तो कुछ भी नहीं’ ‘फिर’ ‘यह ‘फिर’ बहुत खतरनाक होता है मनीश! शादीका मतलब हजारों साल पीछे लौटना, सुभाष्षितों की दुनिया में। और मैं पीछे नहीं लौटने वाली। मैं जानती हूॅं कि शादीजितना देती है, उससे अधिक वसूल लेती है, वैसे सच तो यह है कि शादीमें लेने, देने लायक कुछ होता ही नहीं वहां केवल तन के समर्पण की वैधानिकता व सामाजिकता ही होती है, तन के मिलन को वैधानिक व सामाजिक बना दिया जाता है।’ ‘फिर तो साथ रहने का भी कोई अर्थ नहीं। तुम अपने पापा से आखिर अलग हो कर मेरे साथ क्यों रहना चाहती हो? हम दोनों तो साथ साथ हैं ही, एक छत और एक कमरे के भीतर, फिर वसंत गिनने का क्या मतलब? जिसे हम लगातार गिन रहे हैं। अब क्या शेष है, हमारे बीच जिसे हम एक छत के नीचे रहते हुए शादी के बहाने खोजना चाहेंगे। तुम अपने पापा का आवास न छोड़ो, कोई लाभ नहीं। वैसे भी हम अपने लिए एकांत का अधिकतम लाभ ले ही रहे हैं, और ले सकते हैं, फिर काहे के लिए एक छत के भीतर रहना, मैं समझता हूॅं तुम सही फैसला नहीं ले रही हो, जो कुछ भी करो, सोच कर करो। भावुकता में कोई फैसला लेना ठीक नहीं।’ मनीश ने कुमुद को बारहा समझाने की कोशिश की थी, पर कुमुद कहां मानने वाली थी। उसने तो तय कर लिया था किआलोकनाथ का बंगला छोडना है, तो छोड़ना है। और एक दिन...कृ मनीश तो चकरा गया था, कुमुद को देख कर। कुमुद ने वैसा कर दिया था जैसा वह बोल रही थी। कुमुद ने आलोकनाथ का बंगला छोड़ दिया था और मनीश के मकान पर आ गई थी। उसके साथ उसका सारा सामान था, जिसे वह अपना समझती थी। मनीश खामोश था और खामोशी के भीतरी तलों को खंगाल रहा था। ‘कुमुद ने यह क्या किया?’ अपने मॉ बाप को भी कुमुद के बारे में मनीश ने नहीं बताया था। उन्हें क्या बताएगा कि वह कुमुद के साथ एक ही छत के भीतर क्यों रह रहा है? क्या बताएगा उन्हें? अगले सप्ताह ही उसके पिता जी उसके यहां आने वाले हैं, कुमुद को उसके साथ देख कर क्या बोलेंगे? मनीश कुछ नहीं समझ नहीं पा रहा था, वह खुद में डूबा हुआ विचारों के केन्द्र में था और विचार यह कि अपने पिता जी को क्या बताएगा कुमुद के बारे मेंकृकि वह कौन है, प्रेमिका, साथिन या पत्नी.... कुमुद थी कि अपना सामान रखने में व्यस्त थी। वह अपने सामानों को जगह जगह सजा रही थी। किताबों को कहां रखे? उसे समझ नहीं आ रहा था। उसने मनीश से पूछा.... ‘मैं अपनी किताबें कहां रख दूं मनीश! तुम्हारी आलमारी में तो वैसे ही ढेर सारी किताबें हैं।’ ‘सामने वाली आलमारी में रख दो और उसका सामान स्टोर वाले कमरे में शिफ्ट कर दो।’ कुमुद ने वैसा ही किया, जैसा मनीश ने उससे कहा था। कुमुद के पास करीब पचास के आस पास किताबें थीं। उन्हें कुमुद सम्हाल कर रखा करती थी और समय समय पर पढ़ा करती थी। किताबों में अधिकांश किताबें नारी आन्दोलनों का बारे में थीं नारी मुक्ति के सवाल पर कुमुद नारी को देह तथा मन दोनों की स्वतंत्राता की पक्षधर है। वह सोच भी नहीं सकती कि नारी अपनी देह तथा दिमाग को कहीं गिरवी रख दे, और अपनी अस्मिता को ही भूल जाये। कुमद के विचारों में नारी मुक्ति का मामला प्राथमिकता के आधार पर था। वह उसमें किसी घालमेल की पक्षधर नहीं थी। वह नारी अस्मिता को बाबत बने बनाए विचारों की विरोधी थी। वह नहीं चाहती थी कि नारी को नर की अस्मिता से मूल्यांकित किया जाये। मॉ, बाप, बहन यानि भाई, पत्नी, पति फिर फूफा, मामा जैसे सभी रिश्तेे तो नर की अस्मिता पर टिक हुऐ हैं, ये सारे रिश्ते नारी को तो संबोधित हैं नहीं। वह नारी के रिश्तेे की स्वायतता की पक्षधर थी, नर की गुलाम नहीं। पूरी तरह से अलग, एक अलग किस्म की नारी अस्मिता जिस पर नर की अस्मिता के लेप न हांे। अपना सामान व्यवस्थित कर लेने के बाद कुमुद सीधे मनीश के पास आई और लिपट गई। ‘तुमने कुछ कहा नहीं, क्या मुझे अपना सामान यहां नहीं लाना चाहिए था?’ ‘यह तो पहले पूछना चाहिए था, अब जब सामान ले ही आई हो, फिर क्यों पूछ रही हो।’ ‘तुम्हें अच्छा नहीं लगा?’ ‘अच्छा लगने न लगने का सवाल ही अब कहां?’ ‘तो काहे का सवाल है, जो तुम गंभीर हो गये हो’ ‘मैं गंभीर नहीं, बस यूं ही। ‘कुछ तो है, जो तुम मुझसे छिपा रहे हो, बोलो नऽ क्या बात है?’ फिर तो कुमद ने मनीश को मौका ही नहीं दिया कि वह कुछ बोल पाये। दोनों की चुप्पी में अचानक देह बोलने लगी फिर मुंह खामोश हो गये। उनके दैहिक भूगोलों की सीमांए टूटने लगीं, वहां वर्जनाओं का कहीं अता पता नहीं था, वैसे भी देह के गुर्राते ही, वर्जनाओं का चीखना चिल्लाना अपने आप बन्द हो जाता है। देह की सक्रियताओं ने उनके मुंहों को बन्द कर दिया था। देह अलग तरीके से बातें करने लगी थीं, देह की भाषा में मन कहीं खो गया। दोनों देह की भाषा के जानकार थे। पर कभी उस भाषा में वे बातें नहीं करते थे, हालांकि दोनों के मन के भीतर क्लासिकल कही जाने वाली प्रेम कवितायें हरदम प्रवाहित हुआ करती थीं। मनीश भी दैहिक प्रयोगों से खुश था, पर था अचरज में। वह सोच नहीं सकता था कि उसे अचानक ही वह सब हासिल हो जायेगा जो उसके लिए कल्पना का विषय भी कभी नहीं था। वह कल्पनालोक का यात्राी कैसे बन गया, उसकी दृढ़ता कैसे छितरा गई, जिस पर उसे गर्व था। समझ नहीं पा रहा था। उसके साथ कुमुद थी, प्रकृति का बेहतर उत्पाद, एक ऐसा उत्पाद जिसकी अपनी वुद्धि थी, अपना विवेक था तथा जीवन जीने के तरीके थे। वह खुद को नहीं रोक पाया...कृकृ ‘कुमुद तुम अद्भुत हो, कल्पनाओं का आश्ष्चर्य, तेरी निष्कपट अंतरंगता को मैं क्या बोलूं? दैवीय कृपा या समान्य सी कोई घटना’ ‘बताओ नऽ कुमुद, मैं इसे क्या बोलूं?’ कुछ तो बोलो’ ‘इसे संयोग ही बोलो मनीश! जो न तो ‘ज्ञात’ होता है और न ही ‘अज्ञात’, यही तो है देह का खेल। हमंे समय की चाल के बारे में पता नहीं होता और समय है कि हमें लगातार ‘ज्ञात’ तथा ‘अज्ञात’ के खेलों में कभी देह बना देता है तो कभी दिमाग, ऐसी स्थिति में अगर हम देह बन गये तो का हुआ? ‘आज ही देखो क्या हुआ? बिना किसी पूर्व योजना के हम दोनों एक दूसरे में जादू की तरह अन्तर्लयित हो गये। देह के जादू ने अलग तरह का यथार्थ रच दिया। आखिर है क्या यह? कहीं यही ‘जादुई यथार्थ’ तो नहीं! ‘तो यह जो यथार्थ होता है मनीश! क्या वह आसमान से टपकने वाली ‘घटित’ तथा ‘अघटित’ के बीच की कोई चीज होता है?, जिसका घटना जितना संभव होता है उतना ही असंभव भी। या ऐसा कुछ होता है जिसका अपना ‘अर्थ’ तो होता है पर उससे उसका ‘यथा’ छिन चुका होता है, यानि एक ऐसी घटना जो स्वायत उद्धरण की क्षमता वाली हो, आरोपित नहीं। कुदरती तौर पर घटित होने वाली ‘घटना’। आखिर क्या कहा जाये इस ‘यथार्थ’ को?’ चलो इस यथार्थ के विश्लेषण को तीक्ष्ण वुद्धि वाले आलोचकों पर छोड़ देते हैं। ‘तेरी छाती पर हमारी बल्ले, बल्ले कथा गढ़ो नहीं, कथा के साथ चलो’ एक दिन किसी काम से मनीश गॉव पर चला गया था। कुमुद उसकी प्रतिक्षा कर रही थी। उसे गॉव से कुछ दिन में लौटना था, जाने कितने दिनों में गॉव से लौटे? शायद वहां और काम आ गया हो खेती किसानी वाला, वैसे भी वह घर का काम बिना निपटाये वापस नहीं आने वाला। कुमुद घर में अकेली करती क्या? काम भी कुछ नहीं था। वह आराम से पलंग पर पसर गई और बिना प्रयास नींद में चली गई। उसकी नींद में नक्सलाइटों का फिज्म जैसा सपना तैरने लगा...एकदम सजीव।कृ यह क्या? वह तो नक्सलाइटों पर केन्द्रित सपना देख रही है। सपना जैसे प्रगतिशील कोई फिल्म हो, विज्ञापन के बाधा के बिना, सतत चलने वाली, फिल्म चलने लगी। दृश्य में गॉव दिखने लगा। चारो ओर जंगल, छायादार पेड़ों की कतारें। बन्दूकंे चल रही हैं, दृश्य में गॉव दिख रहा है, पर गॉव के लोग कहीं नहीं दिख रहे। शायद वे भाग चुके होंगे, एक सरल अनुमान। अचानक एक खूबसूरत और जवान लड़की दृश्य में उभरती है। लड़की की तस्वीर से स्क्रीन भर जाती है। लड़की की चमक से दृश्य भी चमकदार हो जाता है। लड़की कुमुद को प्रभावित करती है। बिना नायिका के कोई फिल्म तो बन ही नहीं सकती। स्क्रीन पर दिखने वाली लड़की नायिका ही होगी! कुमुद ने अनुमान किया, यानि हीरो भी पास ही में होना चाहिए कहीं। अचानक दृश्य उत्तेजनाओं से परिपूर्ण हो जाता है। दृश्य में खपरैल का एक घर आता है। घर के छाजन पर कुछ पुलिस वाले दिखाई देने लगते हैं। उनके चेहरों से गुस्सा छलक रहा है। वे घर के भीतर कुछ तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। शायद यह दृश्य सपने के अंत का हो। पर सपना तो भाग रहा है, तेजी के साथ। कुमुद ने अनुमान किया कि सपने का अंत होने वाला है। सपने का खलनायक दृश्य में दिखाई देने वाले घर में ही छिपा होगा! वह पकड़ा जायेगा या मारा जायेगा। यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह जानना होगा कि सपने में है क्या? सपना समझने के लिए कुमुद सतर्क हो जाती है। उसने अपनी ऑखें दृश्य पर गड़ा दीं। सपने की कहानी आगे बढ़ ही रही थी कि दृश्य कांपने लगा। दृश्य के पीछे से आ रहा संगीत भयानक धुनों को संप्रेषित करने लगा। सपने का दृश्य डरावना हो गया, एकदम से भयानक। कुमुद डर गई, उसे लगा कि पलंग पर लेट कर वह दृश्य नहीं देख सकती, सो पलंग पर बैठ गई। दृश्य में एक ट्रेन आती हुई दिखती है फिर अचानक धमाका होता है। बहुत तेज विस्फोट, कुमुद डर जाती है। ट्रेन धमाके के साथ उड़ जाती है, डिब्बे के डिब्बे हवा में उड़ने लगे, कुछ क्षतिग्रस्त डिब्बे हवा में उड़ते दीख रहे हैं। पटरी के अगल बगल कुछ लाशें दीख रही हैं। कुछ बन्दूकधारी भागते हुए दीख रहे हैं, ट्रेन का मलबा चारो ओर बिखरा पड़ा है, दृश्य में घायल लोग कराहते, चीखते हुए दिख रहे हैं। आतंक का एक डरावना नमूना, सपने में बन्दूकों के करतब। दूसरी तरफ मुस्तैद राहतकर्मी बचाव अभियान में लगे हुए हैं, घायलों को अस्पताल भेजा जा रहा है। घायलों व मृतकों को देख कर कुमुद आतंकित हो जाती है। उसके मुंह से स्वस्फूर्त बोल निकल जाती है...कृ ‘यह तो हिन्सा है, इससे समाज नहीं बदल सकता, हिन्सा केवल हिन्सा कर सकती है, समाज बदल नहीं, वैसे भी बन्दूक की गोली केवल जान ले सकती है, किसी की जान बचा नहीं सकती।’ फिल्मी सपने में प्रमुख अखबारों तथा टी.वी. चैनलों के चित्रा भी दिखाए जा रहे हैं, तथा बताया जा रहा है कि ट्रेन की दुर्घटना नक्सलाइटों ने करवाया है। हालांकि अब तक किसी नक्सलाइट संगठन ने इस भयानक हमले की जिम्मेवारी नहीं कबूल की है। घटना स्थल पर बचाव कार्य तेजी से चल रहा है। तभी सपने में एक रोबीले दारोगा का चेहरा उभरता है, वह गरजता है। ‘चाहे हमला किसी ने किया हो, हम उन्हें पकड़ कर रहेंगे।’ कुमुद को जान पड़ा कि यह दृश्य तो प्रचलित नाटकों के दृश्यों की तरह संयोजित किया गया जान पड़ता है पर हीरो का अभिनय प्रभावकारी दिख रहा है। नक्सलाइटों को पकड़ लेने के क्षमता का भाव उसके चेहरे पर छलक रहा है। फिर तो नक्सलाइटों के पड़ावों पर छापे, नक्सलियों से संबधित लोगों की गिरफ्तारियां, हवालातोें में बन्द नक्सलाइटों को डराने धमकाने का कार्य, कई तरह के प्रभावकारी दृश्य, उसका संतुलित संयोजन जिससे नक्सलाइटों के बारे में जानकारी हो सके। ‘किसी भी तरह से ट्रेन उड़ाने वालों को छोड़ा नहीं जायेगा।’ दृश्यमें उभरती जोरदार घोषणांए.....कृ ऐसी घोषणा का दृश्य कुमुद के सपने में कई बार उभरता है। दारोगा की भूमिका प्रभावकारी दिख रही है। कुमुद को आभास होता है कि दारोगा नक्सलाइटों को पकड़ लेगा, लेकिन उसके तरीके पुराने हैं। गिरफ्तार नक्सली अपने साथियों के बारे में बताएंगे, ऐसा नहीं जान पड़ता। दीख रहा है कि वे मार खाने और मरने के लिए ही नक्सलाइट बने हैं, कोई जनम से नक्सलाइट तो होता नहीं, वे मार खा रहे हैं, हीरो किस्म का दारोगा उन्हें मार रहा है। कुमुद चाैंक जाती है। नक्सलाइटों के हाथ और पैर के नाखून निकाले जा रहे हैं। आभासी तौर पर दिखाया जाता है कि एक पतला सा राड उनके गुदाद्वार में डाला जा रहा है, पर साफ, साफ नहीं। देखने वाले की समझ में आने लायक केवल। ‘यह अमानवीय है, अमानवीय तो ट्रेन उड़ाना भी है’ कुमुद बुदबुदाती है, पर वह सपने के दृश्य का कुछ बिगाड़ नहीं सकती, दृश्य चल रहा है। उसे लगता है कि सारी दुनिया एक दृश्य ही तो है, जो चल रहा है, अपनी तरह, मानवीय समीपता मिटती जा रही है। ‘पर दृश्यऔर अदृश्यके बीच भी तो होगा ही कुछ न कुछ।’ ‘हां हां, होगा ही’ दृश्य में, हीरो नंगे बदन उभरा हुआ है, उसकी मुसलियों पर कैमरे की ऑख टिका दी गई हैं। दिखाया जा रहा है कि हीरो बहुत ताकतवर है, कोई परामानव है। और दिमाग...उसे फिल्मकार भला कैसे दिखा सकता है, कोई तरीका ही नहीं।कृ दारोगा के वीरतापूर्ण दृश्यों से सपना भरा हुआ है। दृश्यों के खेल की तरह कुमुद को सपना दीख रहा है।अन्धकार व प्रकाश के संयोजन का खेल। पुलिस वाले एक घर का छाजन तोड़ कर खपरैलिहा मकान के भीतर उतर रहे हैं। घर के भीतर दो लोग गोलियों के शिकार हो चुके हैं। एक आदमी जो जीवित बचा हुआ है, वह भागने की कोशिश कर रहा है, जिसे पुलिस वाले पकड़ लेते हैं। यह आदमी है कौन आखिर? कुमुद के दिमाग पर संदेश उभरा, संभव है यही नक्सलाइटों का मुखिया होे, पर क्या मुखिया डर कर भागेगा?कृक्या मुकाबिलों से भागना बन्दूकी तकनीक है या कला? कमजोर होने पर भागना, मजबूत होने पर मारना। ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे वाली।’ नक्सलाइटों और पुलिस का मुठभेड़, दोनों एक जैसे बन्दूकधारी, कुमुद कॉप जाती है। दृश्य में पुलिस काफी प्रभावकारी भूमिका में है और नक्सलाइटों के प्रतिघातों का कहीं अता पता नहीं।वे तो केवल भाग रहे हैं, उनका प्रतिरोध दृश्य में नहीं दिख रहा। सपने में दीखता है कि पास वाले घर में नक्सलाइट नहीं हैं। वे तो गॉव वाले हैं जो पुलिस की डर से घर में छिपे हुए हैं।कृनक्सलाइट तो पहले ही भाग चुके हैं। भला नक्सलाइट क्यों रूके रहेंगे वहां? घर में छिपे लोग पकड़ लिये जाते हैं? दृश्य में गॉव वालों के गिड़गिड़ाने का दृश्य मनुष्यता लीलने वाला है, काफी संवेदनात्मक है। फिल्मी सपना धीमी गति से आगे बढ़ रहा है, कुमुद अनुमान लगाती है कि गॉव वालों को डरा धमका कर, नक्सलाइटों के बारे में पुलिस जानकारी हासिल करेगी। पर ऐसा कुछ सपने में नहीं दिख रहा। कुछ लोगों को पकड़ कर पुलिस वाले मगन हैं कि उन्होंने बड़ा काम कर लिया है। एक दारोगा, जो दारोगा की तरह दीख रहा है, वह काफी खूबसूरत है। वह गाना गा रहा है। गाने के बोल चमेली बाई वाले गाने से मिलते जुलते हैं। अचानक गाना गाने वाली लड़की दारोगा को घेर लेती है और...कृ गाना श्शुरू हो चुका है, गाना में संगीत कम, हा ही, हूॅ, हा अधिक है। नृत्य का दृश्य काफी उन्मादी है। लड़की दारोगा के अगल बगल मादक और बेधक नाच, नाच रही है। और दारोगा है कि उसके गाने की नोटिस नहीं ले रहा है। वह कुछ ऐसा साबित करने में लगा है कि, वह स्त्रौण आंगिक भंगिमाओं से निरपेक्ष रहने वाला आदमी है। यह दृश्य काफी प्रभावकारी दिखता है, पर कुमुद को अच्छा नहीं लगता। नाच देखने वाले ग्रामीण हैं और वे गाने के बोल पर ‘ह’ू ‘हा’ बोल रहे हैं, गोया गीत उन्हें उन्मादी बना रहा है। गाने के बाद दृश्य में गंभीरता आ जाती है। दृश्य ही नहीं पार्श्व संगीत की धुनें भी गंभीर हो जाती है। इसी बीच एक मर्दाने चेहरे से सपना ढक जाता है। वह भी वर्दी में है, उसकी वर्दी पुलिस वाली नहीं है, कुछ विशेष किस्म की गाढ़े सलेटी रंग की है। कुमुद सचेत हो जाती है, हो सकता है नक्सलाइटों का मुखिया हो, या कोई बडा़ पुलिस वाला। आदमी आकर्षक और प्रभावकारी दिख रहा है। खूबसूरत देह और ऑखों में कुछ कर गुजरने की गरमी लिये हुए। वह तटस्थ है, स्थितिप्रज्ञ की तरह। कोई घबराहट नहीं, और न ही डर, डर से बाहर निकलने का अभिनय प्रशंसनीय है। ऐसा ही करने के लिए फिल्म के निदेशक ने उसे बताया होगा। दारोगा उसे डराने का प्रयास कर रहा है, डंडा तान रहा है, उसी के साथ यातनादायी मार, पीट। कुमुद ऑखें बन्द कर लेती है, दारोगा रायफल के कुन्दे से उसे मार रहा है। ‘तो तूं चला रहा है संगठन, तूं मुखिया है, बता अपने संगठन के बारे में’ पकड़ा गया आदमी हसने लगता है...हस रहा है उन्मुक्तकृ ‘काहे परेश्शान हो रहे हो दारोगा जी! संगठन के बारे में मुझसे तुम कुछ भी नहीं उगलवा सकते क्योंकि संगठन के बारे में मुझे भी कुछ पता नहीं।कृवैसे तो तुम, मुझे पकड़ भी नहीं सकते थे, पर क्या बताऊं अपने साथी के बारे में वह बाजार के उत्पाद की तरह बिक गया। मुझे पता है कि, तूने मेरे साथी को खरीद लिया होगा, नहीं तो वह हमलोगों के बारे में तुम्हें कुछ भी न बताता। काम की बात करो, क्या करना चाहते हो मेरे साथ? जो करना हो, करो। तुम्हारे लिए समय का कोई अर्थ नहीं, पर मेरे लिए अर्थ है। समय की मर्यादा का अपनी वर्दी की मर्यादा से तुम्हें अधिक ख्याल रखना चाहिए।’ ‘काहे घबड़ा रहे हो, सारा कुछ तुरंत सामने आ जायेगा’ ‘सामने क्या आजायेगा, यातना घर में डाल कर मारोगे, यातना दोगे, एनकाउन्टर दिखा कर गोली मार दोगे, इसके अलावा भी कोई तरीका तुझे पढ़ाया गया है का? बताओ तो हम भी जानंे’ ‘तुम्हारी पढ़ाई तो सिर्फ इस बात की है कि तुम अपनी मौलिक स्वतंत्राता बेच दो और गुलाम बन जाओ, क्या तुम्हें पता है कि जो तुम करने जा रहे हो, या जो करोगे, यह सब तुम्हारे मन से हो रहा है? तुम्हारे दिमाग का कन्ट्रोल तो कहीं और है, सो तुम विचार भी नहीं कर सकते कि तुम जो कर रहे हो, उसे करना चाहिए कि नहीं.... नक्सलाइट की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि दारोगा ने उसे तीन चार घूंसंे जड़ दिये फिर भी वह खड़ा रहा पहले की तरह। बाद में तो हसने लगा...कृ फिर गिरफ्तार आदमी चिल्लाया....कृ ‘और मारो, और मारो, जितना मार सकते हो। तुम समझ रहे हो कि मैं संगठन का मुखिया हूॅं, मैं खत्म, संगठन खत्म। पर ऐसा नहीं है दारोगा! मैं तो अमर बेल हूॅं, तुम्हारी छाती पर पसरा हुआ। तेरी छाती है तो हमारी बल्ले बल्ले, तुम खत्म, तुम्हारी पुलिस खत्म, मेरा संगठन खत्म। मैं तो तुम्हारी पीठ पर लदा हुआ हूॅं, जाहिर है, तुम अपनी पीठ नहीं देख सकते, सो मेरा संगठन भी नहीं देख सकते। तूं तो पढ़े लिखे आदमी हो, इतना तो तुम्हें पढ़ाया ही गया होगा कि संवेदनशीलता के अलावा कोई ऐसा तरीका नहीं जिससे पेट पर का लिखा हुआ पढ़ा जा सके। वह भी तेरे जैसा आदमी पेट पर का लिखा का पढ़ेगा? तुम अभागे हो दारोगा! तूं तो शोषितोंके माथे की लिपि भी नहीं पढ़ सकता, छिः धिक्कार है तुम्हंे, तेरा चेहरा तो थूकने लायक भी नहीं, तूं तो सिर्फ उस लिपि को पढ़ सकते हो, जिसे समाज के दुश्मनों ने लिखा है, शोषण व दमन वाली, तूं पेट पर का लिखा का पढ़ेगा जिसमें भूख बोलती बतियाती है, चूल्हे चीखते हैं।’ सपने में दिख रहा है कि दारोगा पकड़े गये नक्सली को खूब मार रहा है। नक्सली लथपथ हो चुका है, उसकी नाक से खून निकलने लगा है, देह फूल गई है। थोड़ी देर में वह अचेत हो जाता है। उसके चेहरे पर पानी के छीटे मारे जाते हैं, उसके सामान्य हो जाने के बाद दारोगा उसे जेल भिजवा देता है। दारोगा को वाहवाही मिलती है, अखबारों में दारोगा की तस्वीर प्रकाशित है, ट्रेन उड़ाने वाले नक्सली संगठन के मुखिया को पकड़ लिया गया है। एक समारोह में नक्सली मुखिया के पकड़ के लिए दारोगा को इनाम मिलता है और फिल्म खत्म हो जाती है। कुमुद सोचती है क्या नक्सलाईट खत्म हो जायेंगे? फिल्म तो यही संदेश दे रही है। एक आदमी पकड़ लिया गया है, जिसे नक्सलियों का नेता बताया जा रहा है और जाने कितने हों और कहां, कहां हों, गिरफ्तारियां और एनकाउन्टर तो बीसियों साल से हो रहे हैं, पर वे जाने कैसे फिर से पैदा हो जाते हैं, समझ में नहीं आता कि नक्सली समस्या है क्या आखिर? गिरफ्तार नक्सली ने कहा था...कृ ‘दारोगा! मैं तो अमर बेल हूॅं, तुम्हारी छाती पर पसरा हुआ। तेरी छाती है तो हमारी बल्ले बल्ले। तुम खत्म, तुम्हारी पुलिस खत्म, मेरा संगठन खत्म। मैं तो तुम्हारी पीठ पर लदा हुआ हूॅं, जाहिर है तुम अपनी पीठ नहीं देख सकते सो मेरे संगठन को भी नहीं देख सकते। तूं तो पढ़े लिखे आदमी हो, इतना तो तुम्हें पढ़ाया ही गया होगा कि कोई ऐसा तरीका नहीं जिससे पेट पर का लिखा, पढ़ा जा सके वह भी तेरे जैसा आदमी पेट पर का लिखा क्या पढ़ेगा? तूं तो शोषितों के माथे की लिपि भी नहीं पढ़ सकता, छिः धिक्कार है तुम्हे, तेरा चेहरा तो थूकने लायक भी नहीं।’ तो क्या गिरफ्तार नक्सली ने सही कहा था? कुमुद सोच में पड़ गई। नक्सली अमरबेल की तरह होते हैं क्या? बन्दूकें ही उन्हें जनमाती हैं, तथा मुआती भी हैं, गोया नक्सलवाद बन्दूकों का खेल है। हमलों की पैशाचिक जमीन पर खेला जाने वाला मृत्यु का प्रकृति विरोधी एक खेल। कुमद सपना देख कर घबरा जाती है, फिर भी खुद को नियंत्रित करती है। तय करती है कि वह नक्सलियों के बारे में अध्ययन व जानकारी के लिए किसी न किसी तरह से उनके संगठन में शामिल अवश्य होगी। उसने मन में पक्का कर लिया। उसे बन्दूक नहीं चलाना है। हिन्सा का वह कभी समर्थन नहीं कर सकती। नक्सलियों पर कहानी या उपन्यास लिखेगी, उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास करेगी। वह मनीश को फोन करती है, फोन मिल जाता है। ‘कब तक लौट रहे हो मनीश?’ कुमुद पूछती हैकृ ‘दो, तीन, दिन बाद, घर पर कुछ जरूरी काम आ गया है।’ मनीश ने कुमुद को बताया। ‘तुम तो कल ही आने वाले थे’ क्या हुआ हां आने वाला तो था पर नहीं आ पाया’ ‘मैं तुझे फोन पर कुछ बता नहीं सकता, घर की सारी बातें फोन पर नहीं बताई जा सकतीं।’ ‘तो कब तक लौट रहे हो, मैं यहां घबड़ा रही हूॅ।जानते हो आज मैंने नक्सलियों पर केंन्द्रित एक सपना देखा, फिल्म की तरह, उसकी घटनायें देखकर मैं डर गई, क्या सपने सच होते हैं?’ ‘अरे नहीं भाई! ऐसा नहीं होता।’ ‘सपना तो एकदम रीयल दीख रहा था।’ मनीश ने कुमुद को फोन से ही समझाया था... ‘सपने सपने होते हैं कुमद, सपनों से काहे डरना।’ मनीश्श को क्या पता था कि कुमद ने जो सपना देखा था वह सच में घटित होने वाला है, और कुमद उसे छोड़कर जंगल का नागरिक बनने वाली है। उसे याद है कुमद ने कहा था...कृ ‘चलो ठीक है जल्दी आ जाना।’ मनीश से बातें हो जाने के बाद, कुमद फिर सोच में पड़ गई, नक्सलियों के साथ रहने पर तो यही सब होगा, सपना देख कर जब वह कांप रही है फिर नक्सलियों की मांद में कैसे रहेगी? वहां तो बन्दूकों के करतब ही दिखेंगे, कुछ गोलियां इधर से कुछ उधर से, मरे हुए लोग, लाशों से पटे जंगल फिर भी जानना जरूरी है कि वे बन्दूकें क्यों थामे हुए हैं? वह जंगल की तरफ जायेगी जरूर...कृ’ कुमुद अकेले क्या करती, मनीश के साथ बिताए समय में उतर गई। समय के एक एक रेशेे साफ साफ लहराने लगे। एक तरफ मनीश और दूसरी तरफ संतोश्ष। सामाजिक बदलाव का इतना बड़ा जज्बा, आग से खेलने और उसी में रहने की आकांक्षा...संतोष को देखना भी अद्भुत होगा और उसे समझना वह तो और भी अद्भुत।’ संतोष जैसे उसके सामने आ गया हो और पूछ रहा हो...कृ ‘क्यों क्या हुआ? किस सोच में पड़ गई हो, जंगल देखना चाहती हो, वहां की हरियाली में खुद को डुबोना चाहती हो, चलो हरियाली न सही, वहां की शान्ति तथा वहां के लोगों ने तुझे प्रभावित किया होगा। सपने देख कर खुद को बदलना चाह रही हो और कांप भी रही हो, फिर जंगल में कैसे रहोगी? बन्दूकों का खेल सपने में देख कर तो डर गई फिर भी जान की बाजी लगा देने वाले नक्सलियों के साथ रहना चाहती हो।, नहीं मैडम! नक्सलियों के साथ रहने के लिए न सोचो। तुम्हारे लिए तो समाजबदल, महज सुभाषित है पूंजी का एक सरकसी खेल’ यानि कोई अपना अधिकार न मांगे, कोई नौकरी न मांगे, जो है उसी में जीते रहने की कला सीखे, बस इतना ही।कृ मनीश चाह कर भी नहीं समझ पाया कि कुमद जंगल की तरफ कैसे चली गई? वह तो बन्दूकों के नाम पर कांप कांप जाने वाली लड़की थी। कुमद से दूर रहते हुए मनीश बार बार खुद से पूछता है क्या आतताई डर भी किसी को निडर बना सकता है, कुमद की तरह? ‘समय ही बता सकता है जाना किधर है, ‘बांयें’ कि ‘दायें’ कुमुद संतोष के साथियों के साथ जंगल में थी। उन्हें कत्तई पता नहीं था के वे पुलिस द्वारा घेर लिये जायेंगे। पुलिस के घेराव का यथार्थ बहुत ही भयानक, डरावना, आतंककारी व हृदय विदारक था। दना, दन फायरिंग होने लगी थी। निहत्थे ग्रामीण मारे जाने लगे थे, पुलिस समझ रही थी कि नक्सलियों को मारा जा रहा है। पर ऐसा नहीं था। मारे जा रहे थे गॉव वाले। ऐसा तो उसने नक्सलाइटों पर केन्द्रित कहानियों तथा फिल्मों में भी नहीं पढ़ा था, न ही देखा था। जिन्हें हिन्दी जगत प्रगतिशीलता के नाम पर माथे पर उठा लिया करता है। नक्सली यथार्थ को जब कहानियों में वास्तविक ढंग से नहीं उभारा जा सका है, फिर फिल्म में कैसे उभारा जा सकता है? कुमुद को याद है कि मुठभेड़ के समय संतोष के साथी कांपने लगे थे। उनके पास पर्याप्त कारतूस नहीं थे, बम के गोले भी नहीं थे, उनकी संख्या भी कम थी, जाने कितने हों पुलिस वाले! ऐसा तो होता नहीं कि पुलिस वाले निहत्थों पर हमला न करें।कृमुठभेड़ में गोली किसी को भी लग सकती है। गोली नहीं पहचानती कि कौन निहत्था है कौन बन्दूकधारी। एकबारगी हर तरफ सन्नाटा पसर गया था। हालांकि वह मुठभेड़ नहीं हो पायी थी, पुलिस वाले दूसरी तरफ चले गये थे। कुमुद को क्या पता था कि वह नक्सलाइटों की जिस सपने को देख चुकी है, उसके जीवन में वह किसी दिन हकीकत बन जायेगा, उसे वह आमने सामने देखेगी, साफ साफ घटता हुआ, और वह खुद भी किसी दिन पुलिस द्वारा घेर ली जायेगी। ‘ऐसी नहीं होती मुठभेड़ें, नक्सलाइटों को तो ऐसे दिखाया जा रहा है, जैसे वे भाग रहे हों, डर गये हों मुठभेड़ से। नहीं, नहीं, ऐसा नहीं होता उसने देखा है मुठभेड़।’ जंगल में रहो तो मुठभेड़ें होंगी ही। पुलिस तो जी जान से वाम उग्रवादियों का सफाया करने में जुटी हुई होती है। इसके पहले जो मुठभेड़ हुई थीं वह ऐसी नहीं थीं। उसमें तो वह खुद भी शामिल थी। मुठभेड़ जब होती है फिर तो कुछ नहीं दिखता। सामने केवल लाशें दिखती हैं, ऑखों में मृत्यु के नाचने का दृश्य दिखता है, चलो वलिदान ही तो होगा। मारो, मारो, दना दन फायरिंग, गोलियों का हिसाब करते जाओ, गोलियां खतम होते ही भागो। ‘साथियों को तथा खुद को बचाना है, मर जाओ भले, पर पकड़ न हो’ कुमुद नहीं भूल पाती उस मुठभेड़ को, जिसमें संतोष के दो साथी मारे गये थे। गनीमत थी के कोई साथी पकड़ा नहीं गया था। एक बार तो उसके मन में भी आया था कि वह निशाना साधे पर वह बन्दूक नहीं उठा पायी थी। वह कभी भी बन्दूक नहीं उठाएगी चाहे जो हो। संतोष निशाना साधते हुए उसे भी संभालता....कृ ‘गर्दन किसी भी हाल में ऊपर न उठाना, देह को छूती हुई गोली भी जान के लिए खतरनाक हो सकती है। एकदम से सट जाओ जमीन से, मिल जाओ माटी में, जमीन में मिल गये समझ लो बच गये।’ मुठभेड़ के दूसरे दिन संतोष ने दो तीन दैनिक अखबारों को मंगवाया था। अखबारों में तो छपा ही होगा! दैनिक के हर पन्ने कॉप रहे थे, उसमें प्रकाशित रो रहे थे। अखबारों ने प्रमाणित कर दिया था कि नक्सली निर्दोष आदिवासियों की हत्यायें कर रहे हैं। कुमद अखबार देख कर हसने लगी थी, ‘आखिर मुठभेड़ में तो मरेंगे आदिवासी व जंगली ही नऽ, किसकी गोली ने किसे मारा, गोली तो बताएगी नहीं। गोलियां दोनों तरफ से दनादन चल रही थीं।’ पहले का देखा हुआ सपना उसके सामने नाचने लगा। दैनिक नक्सलियों की गिरफ्तारियों व हमले के हवालों पर केन्द्रित थे। समाचार में बताया गया था कि नक्सलियों द्वारा एक एक्सप्रेस ट्रेन पर हमला किया जाना था, सतर्कता व सावधानी पूर्वक पुलिस द्वारा नक्सली हमले की योजना को विफल कर दिया गया और इस दौरान हुई मुठभेड़ में कई नक्सली तथा कुछ सिपाही भी मौके पर मारे गये थे। जांच पड़ताल होने तक के लिए संभावित खतरों वाले रूट को बन्द कर दिया गया है। पूरा प्रयास करने के बाद भी कथित नक्सली नहीं पकड़े जा सके हैं। वे किसी गॉव में छिपे हुए हैं, उसी पकड़ के दौरान नक्सलियों से मुठभेड़ हो गई। सावधानी और बचाव के बाद भी कुछ ग्रामीणों को नहीं बचाया जा सका, वे भी बेचारे मारे गये। सरकार द्वारा क्षतिपूर्ति राशियों की घोषणा कर दी गई है, जिसका भुगतान दो चार दिन में हो जायेगा। कमुद संतोष के साथ सुरक्षित पनाहगाह पर थी, वहां पकड़े जाने का खतरा नहीं था। अखबार पढ़ लेने के बाद कुमुद ने टीवी आन किया। देखें इस पर क्या आ रहा है? टीवी पर कुछ लाशें दीख रही हैं, लाशों के अलावा घायल कराहते और तड़पते हुए लोग दीख रहे हैं, राहत कार्य में मुस्तैदी बरती जा रही है, इसी के साथ एक दूसरे किस्म का दृश्य। जंगल का एक गॉव पुलिस द्वारा घेर लिया गया है, गॉव वाले भाग रहे हैं, रो रहे हैं, कांप रहे हैं फिर भी उन्हें पकड़ा जा रहा है। गॉव में बन्दूकों का खेल हर तरफ दिख रहा है। पता नहीं नक्सलाइटों का पता पुलिस कैसे लगाएगी? पुलिस को आदेश देने वाले तो लखनऊ या दिल्ली में बसते हैं, सिपाहियों के जिम्मे है कि वे नक्सलाइटों को पकड़ें, नहीं तो सस्पेन्ड। बेचारे सिपाही तो पेट की आग बुझाने, घर गृहस्थी चलाने व बच्चों को पढ़ाने के लिए नौकरी कर रहे हैं।कृकुमुद को लगा कि वह इक्कीसवीं सदी में नहीं, हमलों वाली पन्द्रहवीं सदी में है, और उसका लाइव देख रही है। समय नहीं बदला, आदमी नहीं बदला, सत्तासंस्कृति नहीं बदली, आज की कथित विकसित दुनिया में भी बन्दूक और उसके विस्फोट, वही अतीत का सत्तात्मक युद्ध, आखिर हो क्या रहा है? किसी भी सभ्यता के पास क्या जबाब है इसका? नक्सलियों के पकड व एनकाउन्टर के दृश्यों को टीवी पर दिखाया जा रहा था। प्रधानमंत्राी से ले कर मुख्यमंत्राी तक, प्रदेश्श की पुलिस की तारीफ कर रहे थे, और नक्सलियों को समाप्त करने, कराने की घोषणायें कर रहे थे। नेताओं के अलावा वुद्धिजीवी किस्म के लोग नक्सली हमले की निन्दा कर रहे थे। टीवी पर हमले के बारे में टिप्पड़ियां की जा रही थीं, विपक्षी पारटी के लोग सरकार को दोषी ठहरा रहे थे। ‘नक्सलवाद एक राजनीतिक समस्या है।’ ‘नक्सलवाद एक सामाजिक समस्या है’ ‘नक्सलवाद सरकार की कमजोर नीतियों का परिणाम है।’ ‘सरकार की जनता के प्रति दायित्वहीनता लोगों को नक्सली बनाती है।’ ‘नक्सलवाद जनअसंतोषकी अभिव्यक्ति है, आदि आदि।’ कमुद टी.वी. देख कर हसी नहीं रोक पायी, ऐसा थोडै़ होता है। जिस मुठभेड़ का वर्णन कुमुद अखबार और टी.वी. पर देख रही थी, वैसा तो नहीं ही हुआ था, वह नक्सलियों के साथ ही तो थी। मुठभेड़ हुई ही कहां थी? हां यह सच है कि वामउग्रवादियों द्वारा ट्रेन लूटने की योजना थी। पर नक्सलियों को पता चल चुका था कि उनकी योजना की मुखबिरी हो चुकी है। सो नक्सलियों ने टेªन लूट की योजना स्थगित कर दिया था? कुमुद सारी टिप्पड़ियां ध्यान से सुन और गुन रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर उसे टिप्पड़ी करना हो तो क्या करेगी नक्सली समस्या के बारे में। उसे अचानक एक सूक्ति ध्यान में आई...कृकृ ‘गवर्नमेन्ट इज दि कंसेन्ट आफ दि गवर्न्ड’ ‘यानि शासितों की इच्छा ही सरकार है, पर ऐसा है कहां? सरकर जनता की राय से चलती कहां है? उसकी कार्य सूची में शासितों की राय तो होती नहीं? तो क्या नक्सलवाद शासितों का प्रतिरोध है, शाासित जनता सरकार का प्रतिरोध कर रही है, तो क्या प्रतिरोध खून खराबा से, मार काट से, बमों के विस्फोट वाले आदिम तरीके से होगा? यह तरीका तो आदिम है, जंगलियों का, असभ्यों का है, आज के समय में प्रतिरोध को बन्दूकों की गोली बनाना, अपने विचारों को बन्दूकों की नाल से निकालना...नहीं, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए, व्यवस्था के लिए अव्यवस्था।’ ‘बोली’ और ‘गोली’ में फर्क तो किया ही जाना चाहिए।’ कुमुद हादसे के दृश्यों को टीवी पर देख कर चकरा गई थी। नक्सलियों को मारा जाना था पर मारे जा रहे थे निर्दोष गॉव वाले भी, हो क्या रहा है? उसे लगा कि वह बेहोश हो जायेगी पर वह बेहोश नहीं हुई। मार, काट का मनुष्यता विरोधी खेल चल रहा है। इस मारकाट से क्या दुनिया बदल जायेगी? हर ओर यह जो बन्दूक नाम की चीज है, क्यों चल रही हैं? बन्दूकें ही चल रही हैं हर तरफ, भूगोल की सीमांओं पर ही नहीं या देश के भीतर भी। बन्दूकों के द्वारा सभ्यता की पीठ पर क्या लिखा जा रहा? शान्ति, भाई-चारा, प्रेम, सद्भाव, आखिर क्या लिखा जा रहा? क्या बन्दूकों ने कभी समाज का भला किया है? मानवीय समीपता के लिए बन्दूकों की भूमिका पर आखिर कब विचार किया जायेगा? गुफाओं से निकला आदमी आज महलों में रहने लगा है, आग जलाने की कला सीखने वाला आदमी, अब उसी आग से दूसरों को जला रहा है, आखिर यह कैसी संस्कारलिपि है? कुमद मानसिक रूप से थक जाती है। उसे आज की उत्तरआधुनिक दुनिया के बारे में कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है कि ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रों में आदमी चाहे जितनी प्रगति कर ले पर उसके दिमाग से यह जो हिंसा का भूत है, कभी उतरने वाला नहीं। अहिंसा तो केवल सुभाषित है, बोलने बतियाने के लिए, सेमिनारों में भाषण देनेे के लिए, दूसरों को समझाने के लिए, पर खुद के लिए नहीं। खुद के लिए तो वही मार-पीट, खून-कतल, यानि इतिहास का रोग हमल और हमला। इसी हमल और हमलों ने हमारे इतिहास को गढ़ा है, न केवल हमारे इतिहास को, लगता है सभ्यता को भी गढ़ा है, यानि जीत और हार, यही दो छोर हैं सभ्यता के। जीतो चाहे जैसे पर हारो नहीं। कुमुद ने टी.वी. बन्द कर दिया। संतोष कहीं काम से गया हुआ था। साथियों से उसे सूचना मिल चुकी थी कि मुठभेड़ में उसके दो साथियों की हत्या कर दी गई है, उनके अलावा जो तीन लाशें थीं वे ग्रामीणों की थीं...कृ कुछ ही देर में संतोष लौट आया। ‘देखा तुमने ‘मुठभेड़’ कुमुद से पूछा संतोष ने ‘हां देखा तो, बच गये हम लोग यही समझ लो’ ‘गजब की मुखबिरी हुई थी, हम लोगों का ही कोई साथी है, जो पुलिस से मिला हुआ है।’ क्रान्तिकारी संगठन में भी मुखबिरी होती है? कुमुद चकरा गई। ऐसा कैसे हो सकता है? इस संगठन में तो प्रतिबद्ध लोग हुआ करते हैं।कृ कुमुद संतोष के साथ कई गॉवों में भी गई थी। खासतौर से उन घरों में जिनकी शाान्ति पुलिस ने छीन लिया था। नक्सलियों का साथ देने का आरोप लगा कर जिन्हें या तो मार दिया गया था, या जेलों में ठंूस दिया गया था। असल काम तो यही था, कुमुद के लिए पता लगाना कि मारे गये नक्सलियों के बच्चे क्या कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं कि नहीं। उन घरों में भूख और भोजन के बीच संतुलन है कि नहीं? उसने इस बाबत एक रिपोर्ट देश के माने जाने दैनिकों को भी भेजा था, जो उस समय प्रमुखता से प्रकाशित भी हुआ था। कुमुद का जोगाड़ टी.वी. चैनलों वालों के यहां नहीं था, नहीं तो उसकी रिपोर्ट किसी न किसी चैनल से प्रसारित भी हुई होती, पर ऐसा न हो सका। संतोष के साथ एक दिन वह एक ऐसे ही घर में थी। उस घर का पुरुष मुखिया एनकाउन्टर में मारा जा चुका था। उसके ऊपर भी नक्सलियों का साथ देने का अरोप लगाया गया था। संतोष ने उसकी कहानी बताया था, वैसी कहानियां तो कहानी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी जगह नहीं पातीं। संतोष कुमुद को एनकाउन्टर वाले घर में ले भी गया था फिर उसका सच कुमुद ने जाना था। एनकाउन्टर का सच दृश्यों में बंटा हुआ था। जैसा कि एनकाउन्टर वाले की विधवा ने बताया था...कृ सबसे महत्वपूर्ण दृश्य था, रात वाला, आधी रात के समय पुलिस का छापा पड़ता है। पूरा गॉव सन्न और सुन्न। छापा एक खास घर में, वह फूस का एक घर था। घर का मुखिया अपनी पत्नी के साथ रतिआख्यान गढ़ने की कोशिश कर रहा था और पत्नी थी कि पति पर घिना रही थी...कृ ‘यह क्या है कि तुम अब दिन रात दारू पीने लगे हो।’ ‘दारू न पिऊं तो क्या करूं?कृक्या तुम मोहन पंडित को नहीं जानती, वह मेरे पीछे पड़ा है। हमने गलत का किया? अपनी जमीनयय तो जोता था, एमें कउन अपराध है?’ ‘बपई के जमाने से मोहन पंडित मेरी जमीन जोत रहा था। बोलता है कि उससे उसके बपई ने इसी जमीन पर दौ सौ रुपया करज लिया था जिसे नहीं चुकाया था उसने। सो वह जमीन जोतेगा। बपई को मरे दस साल हो गया है, वह दस साल से जमीन की पैदावार खा रहा है पर अब तक उसका दो सौ रुपया नाहीं पटा। कब तक उसका कर्जा पटेगा, यह भी नाही बताता।’ ‘जमीन छोड़वाने के लिए लगातार मैं थाने का चक्कर लगाता रहा। दो तीन बार तो तहसील भी गया। तहसील दिवस पर दरखास दिया, पर कुछ नहीं हुआ। दारोगा से जब मैं रिरियाता था तब वह हसता था....’ ‘तो तोहार जमीन जोत लिया है, मोहन पंडित नेे। हं ई बताओ के ऊ तोहार जमीन कैसे है, तोहरे नायें से है का?’ ‘नायें से का होता है, सरकार! हमरे गांये कऽ कुलि जमीनियय जंगल विभाग ने अपनेे नायंे से करा लिया है, इहां कोई के नांये कउनो जमीन नाही है, फेर हमरे नांये से कइसे होई?’ दारोगा ने फिर उसका मजाक उड़ाया....कृ ‘अउर जंगल तऽ तोहरे बापे कऽ है, इहै नऽ। अरे तूं काहे पगलाया है। ओ जमीनिया के छोड़ि के दूसर जमीन जोत ले। झाड़, झंखाड़ काट ले, अउर आराम से रह। आपन जोत कोड़ कर, ओके छोड़ दे, काहे के रार ले रहे हो मोहन पंडित से ‘तूं तो जानती है कि हमार बात न थाने ने सुना अउर न तहसील ने, फेर हम का करते?’ ‘ओ दिना तऽ तूं हमरे साथै थी, का का बोल रहा था मोहन पंडितवा। तूंने सुना कि नाही, तूने सुना नऽ वह धमकिया रहा था, आपन घर बचाओ नाहीं त उहय होगा, जउने के तूं नाहीं बूझ सकते।’ ‘फेर हम का करते?कृहम त उहै किये जो हमैं पहिलही करना चाहिए था। हमहूॅं जान की परवाह नाहीं किये, अउर खेते पर चले गये, गांये कऽ सब लड़कवे हमरे साथै थे। पता नाहीं कइसे जंगल वाली गोल भी ओ दिना उहां आय गई, फेर का था...एकौ घंटा नाही लगा, हमलोगों ने जमीन जोत लिया, अउर बेंगा डाल दिया।’ एनकाउन्टर वाले की विधवा की बताई कहानी का यह अंत नहीं था, कहानी और आगे थी। दिल दहला देने वाली एक ऐसी कहानी जो रात के अन्धेरे में गढी गई थी।कृ रात में पुलिस उसका घर घेर लेती है और धड़ाधड़ फायरिंग करने लगती है। कुछ देर में फायरिंग रुक जाती है, पुलिस घर में प्रवेश करती है और उसके पति को पकड़ लेती है। गॉव से जंगल में ले जाकर एक पेड़ से उसे बांध देती है। इधर गॉव सन्न और सुन्न, हो क्या रहा है? पुलिस उसे काहे पकड़ ले गई? फायरिंग होते ही पूरा गॉव खतरनाक भय में डूब गया। कुछ भी हो सकता है। पुलिस की गोली किसी को भी भून सकती है, फिर गोली को क्या पता कि वह किसे मार रही है। गोली तो केवल भूनना जानती है। रात का सन्नाटा, रात की खुशियों में जंगल डूबा हुआ, वैसे भी जंगल तथा सन्नाटे का कुदरती नाता होता है। जंगल को सन्नाटों से कुछ लेना देना नहीं। जंगल किसी से कुछ लेता भी नहीं, वह सिर्फ देना जानता है। वैसे जंगल जब कभी गरम हो जाता है, तब पृथ्बी के सारे भूखंड कांपने लगते हैं। पर जंगल अचानक या बात बात पर गरम नहीं होता। गरम तब होता है जब उसकी शान्ति पर बारूद के लेप लगाए जाने लगते हैं। जंगल में रहने वालों के लिए जंगल डरावना नहीं होता। डरावना तो उनके लिए होता है जो जंगल के दुलारों को नाही बूझते। उसके हरेपन को अपने दिल से नहीं चूमते। फिर तो वहां आग ही आग पसर जाती है हर तरफ। जंगल का एक आदमी जो जंगली था, जंगल की तरह था। जिसके मन में जंगल नाचा करता था। उसे जंगल में ही मार दिया गया। जंगल की शान्ति पर बारूद लेप दिया गया। वह अब नहीं रहा..उसका जीवन छीन लिया गया, उसे गॉव से ही नहीं, पृथ्वी पर से भी उठा लिया गया। गॉव ने फायर सुना, तीन चार धमाके हुए। गोलियों ने अपना काम किया, गोली चलाने वालों ने अपना काम। गॉव का वह आदमी जो मारा गया, आदमी बाद में था, पहले उग्रवादी था, उसे मोहन पंडित ने थाने के कागज पर उग्रवादी बनवा दिया था पर गॉव के लोग उसे आदमी जानते थे। सरल और तरल, सभी में घुलने वाला, मिलनसार, सबके सुख, दुख में शामिल होने वाला। गॉव में तो वह एक आदमी की तरह ही रहता था, मोहन पंडित व पुलिस के लिए वह आदमी नहीं था, उग्रवादी था। उसने अपनी जमीन जोत कर कब्जा करने का फैसला कर लिया था और कब्जा कर भी लिया था। यही तो उसका अक्षम्य अपराध था। उसने अपने अधिकार को खुद क्यों हासिल कर लिया जिसे थाना नहीं चाहता था, तहसीलदार नहीं चाहता था। क्या उसे अपना अधिकार हासिल करने का अधिकार था? नहीं था, था भी तो खुद...यह तो गलत था, हुकूमत इसे अच्छा नहीं मानती। गॉव वाले जब घटनास्थल पर पहुंचे, तब वहां वह आदमी नहीं था। उसकी लाश भी वहां नहीं थी। उसकी लाश पुलिस वाले उठा ले गये थे। उसकी लाश अदालत के लिए पुलिसिया सबूत में बदल गई थी, और पुलिस वालों के लिए पुरस्कार की सामग्री। गॉव वाले लौट आये, उन्हें लौटना ही था। वे थाने पर भी नहीं जा सकते थे। हकूमत ने उन्हें प्रतिवाद करना सिखाया ही नहीं था। उनके मुंह सिले हुए थे और दिमाग कानूनों की पेचीदगियों में फसा पड़ा था। पुलिस की सफलता पर दूसरे दिन के अखबार जय, जयकारें कर रहे थे। इतनी बड़ी खबर पर पूरा सोनभद्र गंभीर हो गया...कृ ‘एक नक्सली मुठभेड़ में मारा गया, उसके साथ एक महिला नक्सली भी मारी गई’ ‘एनकाउन्टर सही ही हुआ होगा’ लोग प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे...कृ ‘ये साले नक्सली बारूद खाते हैं और बारूद ही मूतते भी हैं’ ‘कोई भी सुरक्षित नहीं, जिसे जब चाहें मार दें’ ‘अब तो गॉव गॉव घूमकर मार काट कर रहे हैं’ ‘अच्छा हुआ, दो नक्सलाइट तो मारे गये’ तो गॉव के एक सरल आदमी को नक्सली बना दिया गया और रात के अन्धेरे में मार दिया गया। कुमुद जंगल की कहानी सुन कर कांपने लगती है। वह आदमी मारा गया जिसका नक्सलियों से दूर दूर तक नाता नहीं था। वह एक सामान्य आदमी था, मिहनत मजूरी करता था और अपने मड़हा में खुश्शी मंगल के लिए करम बाबा की प्रार्थनाएं किया करता था। कुमुद को याद आया एनकाउन्टर किये गये आदमी की विधवा की बातें, उसका पति अगर अपने दोस्तों की राय से चला होता तो मारा न गया होता। दोस्त तो चाहते थे कि मोहन पंडित को ही दुनिया से हटा दो। पर उसने नहीं माना, दोस्तों की राय। ‘वह सब कुछ कर सकता है, किसी की जान नहीं ले सकता, उसने कहा था। ‘मोहन के छोटे छोटे बच्चे हैं, उनका का होगा?’ अखबार के समाचार नक्सली उत्तेजना के घातक विन्दु पर थिरकने लगे। लोग शान्ति के नाम पर व्याख्यान देने लगे, पर गॉव रो रहा था। एक आदमी उनके साथ का नहीं रहा। मरे हुए आदमी का घर बाहर से ही नहीं भीतर से रो रहा था। पत्नी रो रही थी, बच्चे रो रहे थे और जंगल...जंगल भी बन्दूकों के फायर से कांप उठा था। कुमुद माथा पकड़ लेती है, कविता सरीखा एक वाक्य अचानक उसकी स्मृति मंे उभरता है...कृ ‘बहुत मश्श्किल है समय को समझना, और उससे भी मुश्श्किल है, समय का प्रबंधन करने वाली व्यवस्था को समझना, समय ही बता सकता है, जाना किधर है बांयें कि दायें’ संतोष ने कुमुद को बताया था कि पुलिस द्वारा मारा गया आदमी नक्सलाईट नहीं था। अपने स्तर से संतोष ने मारे गये आदमी की पत्नी को आश्वस्त किया कि वह उसकी हर तरह से मदत करेगा। कुमुद यादों से बाहर निकली, फिर तो ताजा अखबार फड़फड़ाने लगा...। अखबार में नक्सलियों के क्रूरता के वर्णन थे, ऐसा कहीं नहीं था कि नक्साइट सरीखे जैसे लोग भी मनुष्य हैं तथा उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सकता है। उनसे बन्दूकंे छुड़वाई जा सकती हैं, उन्हें रोजगार देकर, उनके चूल्हे जलाये जा सकते हैं। सरकार की धमकी पढ़कर कुमुद डर जाती है... ‘कुमुद तूं भी तैयार हो जाओ, तूं नक्सलियों की मित्रा है, तुम्हारे पिता तो कामरेड हैं ही, तूंही बता सकती हो नक्सलियों के ठिकाने नक्सलियों का मित्रा होने के नाते किसी दिन पुलिस तुम्हें भी पकड़ सकती ह,ै पूछ, गछ के लिए, पुलिस की पूछ, गछ के बारे में किसे नहीं पता।’ ‘फिर’. जाने का होकृ’यह ‘फिर’ तो अव्याख्यायित होता हैकृतमाम अव्याख्यायित चीजों की तरह’ कुमुद प्रशासन की चेतावनी से डर जाती है, मनीश को फोन मिलाती है,मनीश को बताना जरूरी है। मनीश का फोन नहीं मिला? चलो कोई बात नहीं, मनीश जिस दिन घर लौट कर आयेगा उस दिन बातें हो जायेंगी। वैसे भी वह कोई पहली महिला थोड़ै है जो नक्सलियों के बीच जा रही है उनके बारे में तमाम जानकारियां जुटाने के लिए। पहले भी तो तमाम लोग नक्सलियों के बीच जा चुके हैं, उसने पढ़ा है उनके आलेखों को.. वह नक्सलियों के बीच जायेगी जरूर... उनके साथ होने का अनुभव निश्चित ही विस्मयकारी तथा रोमांचक होगा। ‘तो यह जो पिण्डदान है गत तथा आगत दोनों के लिए है’ मनीश अकेला हो गया था, कुमुद घर छोड़ कर जा चुकी थी। मनीश उलझन में था, उसे अकेला छोड़ कर, कुमुद जंगल की तरफ काहे चली गई । गई तो कुछ बोल कर जाती, पता नहीं वापस आयेगी भी या नहीं। कुमुद को समझ पाना मनीश के वश का नहीं था। वह उसके बारे में तरह तरह की धारणा बनाता और खुद ही उसे काट देता। किसी फैसले पर पहुंच पाना मनीश के लिए संभव नहीं था। विचारों के उथल-पुथल में मनीश के दिन बीतने लगे थे। मनीश के पिता जी को शहर आना था पर वे भी नहीं आ पाये। वे गॉव में ही फस गये थे। गॉव की पटटीदारी में किसी का निधन हो गया था, उनका फोन आया था मनीश के लिए कि उनकी तेरही पर आ जाना। एक सप्ताह बाद मनीश को अपने गॉव जाना था। गॉव जाने के पहले तक वहे बकाया कामों को निपटा लेना चाहता था, क्योंकि गॉव से वह तभी लौट सकता था, जब करमकाण्ड बीत जाता। हालांकि मनीश के पास परेष्शानी वाला कोई काम नहीं था। जो काम था भी वह ऐसा नहीं था कि वह उसके कारण फसा रहता। वह एक बड़े ठेकेदार से जुड़ा हुआ था, ठेकेदारी के कानूनी कामों को निपटाया करता था। यह काम भी शायद उसे नहीं मिल पाता अगर उसकी पारटी के एक बड़े नेता ने उस ठेकेदार से उसे जुड़वाया न होता। दरअसल हुआ यह था कि एक दिन मनीश की पारटी की शहर में रैली होने वाली थी। रैली का सारा काम मनीश के जिम्मे था और उसे उसने बहुत ही सफलता पूर्वक उसे संचालित कराया था। फलस्वरूप रैली सफल हो गई थी। उसकी पारटी का नेता बहुत खुश हुआ था। उसे इस बात का अनुमान नहीं था कि एक छोटे से शहर में, जो शहर कम कस्बा अधिक जान पड़ता था। जहां नेतृत्व के नाम पर हमेशा बाहरी लोगों का ही कब्जा रहा है, स्थानीय स्तर पर कोई नेतृत्व आजादी के बाद से ले कर अब तक उभर नहीं सका। ऐसे कस्बे में उसकी पारटी की इतनी बड़ी रैली हो जायेगी। अचरज माफिक था।कृ पारटी का बड़ा नेता अचरज में था। उसने मनीश को धन्यवाद दिया और पूछा...कृ ‘तुम करते क्या हो? कमाई वाला कुछ काम धाम भी करते हो या केवल पारटी का ही काम करते होकृ’ ‘काम तो कुछ नहीं करता।’ ‘कैसे खर्चा वर्चा चलता है, पारटी तो कुछ देने वाली नहीं’ ‘ऐसे ही सर!’ ‘क्या मतलब ऐसे ही, यह ऐसे ही क्या होता है? यह ऐसे ही कोई काम या रोजगार है क्या?’ ‘नहीं सर! यह कोई रोजगार तो नहीं’ ‘कुछ काम करना चाहते हो’ ‘हां सर!’ ‘कितना पढ़े लिखे हो?’ ‘एम.ए. पास हूॅं सर!’ ‘किस सब्जेक्ट से?’ ‘पोलिटिकल साइन्स से सर! ‘यह जो तुम एम.ए. पास किये हो, पढ़ कर या नेतागिरी से? नेता ने मनीश से स्पश्टीकरण मांगा’ ‘नेतागिरी से नहीं सर, पढ़ कर पास किया है सर! श्ुारू से ही पढ़ाई में मेरा प्रथम श्रेणी रहा है।’ पारटी का बड़ा नेता खामोश हो गया, जैसे वह कुछ गुन रहा हो कि मनीश के लिए क्या किया जा सकता है? कुछ देर बाद उसने मनीश का परिचय पास में बैठे एक मोटे और थुल थुल आदमी से कराया, जिसके चेहरे पर कुछ अलग किस्म की चमक थी। ‘यह मनीश है और इसे आप अपनी कंस्ट्रक्सन कंपनी में आज से ही कम से कम चार आने का पार्टनर बना लीजिए, ऐसा संभव है नऽ। कोई परेशानी हो तो साफ साफ बता दीजिए। किसी भी हाल में मनीश को पचीस हजार रुपया महीने की व्यवस्था करानी है आपको। ‘हां सर! जैसा आप आदेश करें, हो जाएगा सर’ ठेकेदार राजी हो गया मनीश ठेकेदार से जुड़ गया। ठेकेदार भी समय के हिसाब से अच्छा आदमी था। वह कानूनी कामों को निपटवाने में मनीश की सहायता लिया करता था। कुछ महीने बाद ही पारटी का वह बड़ा नेता केन्द्र सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर हो गया। ठेकेदार के साथ मनीश भी नेता से मिलने के लिए दिल्ली गया। मनीश की पारटी का बड़ा नेता खुश खुश था। लगता था हाल के फैसले जो उसने खुद अपने बारे में लिए थे, वे सारे के सारे उसके समय को प्रगति की ओर ले जाने वाले थे। जैसे यही कि पहले वह एक ऐसी पारटी का नेता था, जो गरीबों की बातें किया करती थी। उसका नारा था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’। यह हिस्सेदारी का मामला व्याख्या वाला था, यानि कि देश के सारे संसाधनों पर दलित व शोषित समूह का भी हिस्सा होना चाहिए, जिसकी संख्या भारी है। देखा जा रहा है कि देश के सारे प्राकृतिक संसाधन दस फीसदी से कम लोगों के ही मालिकाने में है। जो मानव सभ्यता के खिलाफ है। पारटी के बड़े नेता ने गरीबों वाली पारटी को छोड़ दिया था और एक ऐसी पारटी ज्वाइन कर लिया था जो सर्वसमूह की बातें किया करती थी। उस पारटी के लिए कोई न तो चोर था और नहीं बेइमान। सारे लोग देश के सभ्य नागरिक हैं और यथास्थिति कायम करने में सक्षम भी। उस पारटी का देश की राजनीति में पुराना इतिहास था, उस पारटी में कई ऐसे चेहरे थे जो दुनिया की राजनीति को भी प्रभावित कर सकते थे। ऐसा उसके अतीत में भी हुआ था। मनीश और ठेकेदार को साथ देख कर नेता खुश खुश हुआ। उसने दोनों का हाल अहवाल लिया और मनीश को आश्वस्त किया कि अब वह मनीश के लिए कुछ बेहतर कर सकता हैकृ वस्तुतः उसने वैसा किया भी और एक दिन मनीश को उसके जिले के एक डिग्री कालेज में लेक्चरर बनवा दिया। मनीश के दिन वसंती हो गये। उसके पास सुबह भी गुनगुनाते हुए अदब से आती और शाम तो नृत्य संगीत की सारी कलाओं को ले कर उतरती। ऐसे ही दिन थे मनीश के। मनीश का जीवन आकस्मिकों का खेल बन गया था। उसे नौकरी मिली आकस्मिक ढंग से और कुमुद भी। खूबसूरत माहौल में कुमुद भी एक नई दुनिया ले कर आकस्मिक ढंग से ही उसके दिल में दाखिल हुई थी। हालांकि तब वह बेरोजगार था, पढ़ाई कर रहा था। कुमुद का साथ मिलते ही मनीश की दुनिया बदल चुकी थी। उसके लिए समय का जो जो बेहतर होता है, सब था, नौकरी थी, ठेकेदारी वाले कमाई के रुपये थे और जवानी की जोश तो थी ही। कुमुद के साथ मिल कर मनीश वसंती दुनिया का नागरिक बन चुका था। जहां किसी शोक के लिए कोई स्थान नहीं था। वहां सिर्फ हसियां ही हसियां थीकृपर इन हसियों को कुमुद ने अचानक छीन लिया और उसे छोड़ कर चली गई, अब वह कहां है, मनीश को कुछ पता नहीं। कुमुद के जाने के बाद वाले दिन मनीश के लिए निराश व हताश करने वाले थे। सो उसने गॉव जाने का निर्णय लिया और गॉव चला गया। वहां मन बहल जायेगा, ऐसा ही कुछ विचार कर। गॉव तो पहले जैसा ही था, वहां कुछ नहीं बदला था, वही खेत, वही फसलें, वही पेड़ पौधे भी, जिनके नीचे वहअपने मित्रा लड़कों के साथ गुल्ली, डंडा खेला करता था। मनीश गॉव में पहुंच कर अपनी यादों में खो गया। बचपन के मित्रों से मिला तथा उन मित्रों का हाल अहवाल लिया जो गॉव में नहीं थे, कहीं बाहर काम करते थे। गॉव का भूगोल पहले जैसा देख कर मनीश खुश, खुश था। गॉव में एक पोखरा था जिसकी मनरेगा के तहत खुदाई की गई थी और उस पर घाट बना दिए गये थे। पोखरा की चमक बढ़ गई थी, मनीश को अच्छा लगा। उसे जान पड़ा कि मनरेगा ने गॉवों को विकसित करने का काम किया है, जबकि ऐसा नहीं था। वह जिस पोखरा को देख रहा था उसे ही हर साल मनरेगा के द्वारा खुदवाया जाता था। दो दिन बाद उसके चाचा का घाट था। यानि मृत्यु संस्कार का पहला दिन और वह सुबह ही पोखरा पर पहुंच गया था। घाट पर भीड़ थी, गॉव के बड़े, बूढ़े पोखरे के घाट पर बैठे हुए थे। मुंडन करने वाले नाउओं की संख्या पांच छह से अधिक थी। मुंडन कराने वालों की संख्या के अनुसार नाउओं को बुला लिया जाता है। उनकी मजूरी पहले ही तय कर ली जाती है। जो लोग मुंड़न करा चके थे वे पोखरे में नहा रहे थे। पोखरे का पानी लोगों के नहाने के कारण गंदला हो चुका था, अधिक पानी होता तो गंदला न होता फिर भी नहाना तो था ही, पानी गंदला ही सही। मनीश घाट पर पहुंचते ही अपनी गंजी उतार देता है, नीचे कछ्छा पहने हुए है। उस पर एक लुंगी टंगी है’ मनीश लुंगी उतारता है और पोखरे में उतर कर उसे धोता है ताकि नहाने के बाद उसे पहन सके, मुंडन कराते तक तो सूख जायेगी लुंगी। मनीश के घर का नाऊ उसे बुलाता है।कृ ‘बबुआ जाइए पहले जल से अर्पण कर आइए फिर आइए, हम बाल मुड़ते हैं आपका’ मनीश को पता है कि उसे पहले जल का अर्पण उस कूस की चुंडी पर करना है जो पानी के किनारे मरनी की सुबह मृतक के नाम पर गाड़ा गया है। मनीश्श पोखरे में डुबकी लगाकर कूस की चुंडी के पास पहुंचता है, वहां करमकाण्ड कराने वाले महाब्राह्मण जी बैठे हुए हैं, वे मनीश को चावल तथा काली तिल्ली उसके हाथ में देते है और दस हदन के लिए दस बार चंुडी को अंजुरी से नहलवाने के लिए मनीश से बोलते हैं, मनीश वैसा ही करता है। मनीश मुण्डन करा चुका है, वह नहाने के बाद अपने सिर पर हाथ फेरता है, वहां कुछ नहीं है, अजीब किस्म की चिकनाहट फैली हुई है, उसे लगा कि उसका दिमाग भी चिकना हो चुका है सिर की तरह। गुनने लगा मृतक चाचा के बारे में।कृ मनीश के चाचा तो चाचा थे, अठारहवीं शतशब्दी के उत्पाद जैसे। बात बात में गुस्सा जाते थे, किसी को भी किसी समय मार सकते थे, झगड़े में लाठी का ही प्रयोग करते थे। वे अन्याय होता नहीं देख सकते थे और न ही कर सकते थे। किसी के यहां गमी पड़े या सुख, चाचा वहां हाजिर रहा करते थे। बिरादरी के लोग चाचा को भला बुरा कहते...कृ ‘किसी भी जाति वाले का मुर्दा उठा लेते हो, उसके घर खाना खा लेते हो कुछ लाज लिहाज है कि नाहीं।’ पर चाचा जब तक जीवित रहे किसी की परवाह नहीं किये। वे लोगों के हितैषी ही नहीं हिम्मती भी थे। अक्सर कहते...कृकृ ‘जब हम अंग्रेज दारोगा को लतियाने में देरी नाहीं किये फेर हम केहू से काहे डेरायें, केहू के बाप का खाते हैं का?’ चाचा के लिए जाति, बिरादरी, धन दौलत का कोई मतलब नहीं था। उनकी पत्नी थीं फिर भी उन्होंने गॉव की अनुसूचित जाति की महिला जिससे वे प्रेम करते थे, उसे भी पत्नी की तरह घर में रख लिए थे। बिरादरी के कुछ लोगों ने चाचा का विरोध किया तो चाचा ने उनकी खूब कुटम्मस की। ‘ऐ हरामियों कान खोलकर सुनि लो, तूं लोगों की तरह हम लुकाछुपी का खेल नाही खेलते, डंके की चोट पर हम मेहरारू रखें हैं, एमें तोहार काहे.....रही है?’ बिरादरी चाचा को बिरादरी से निकाल सकती थी वही हुआ, बिरादरी ने चाचा को बिरादरी से निकाल दिया पर चाचा झुके नहीं। उसे पत्नी जैसा मान सम्मान सदैव देते रहे। बिरादरी से चाचा निकाले जा चुके थे फिर भी उनके मरने के बाद बिरादरी कर्मकाण्ड कर रही थी। वाह रे बिरादरी...अचरजाया हुआ है मनीश। मनीश गॉव की इस संस्कृति की व्याख्या नहीं कर पा रहा था। उसकी समझ में एक ही बात आ रही थी कि गॉव के लोगों में उदारता होती है, तथा विगत को भूलने की असीम क्षमता भी। शायद इसी लिए...कृ तीसरे दिन मनीश के चाचा की तेरही होनी थी। एक और संस्कार, घाट के बाद वाला, कम से कम तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराया जाना था। उनके साथ गॉव के गोतियों तथा अन्य परिचित लोगों को भी पक्का भोजन कराया जाना था। मनीश के पिता जी ने पूरी कोशिश की थी कि कार्यक्रम अद्भुत हो। तेरही का कार्यक्रम गुजर गया। पता ही नहीं चला कि बिरादरी से निकाले जा चुके आदमी की तेरही हो रही है, एकदम से बिरादरी के महन्थों की तरह। किसी आदमी के मर जाने के बाद ऐसे संस्कारों की जरूरत ही क्या है? जिसे जीते जी कभी मान सम्मान न दिया गया हो, उसे इतना सम्मान। यह कैसा नाटक है बिरादरी का? मनीश गॉव वाले पोखरा पर भी गया था उसने देखा कि उसके पंडित जी पिण्ड दान करा रहे हैं, मिटटी के एक छोटे से बर्तन में चावल पक रहा है, चावल पक जाने के बाद उसका पिण्डा बनाया जायेगा फिर उसे मृतक को अर्पित किया जायेगा। माना जाता है कि उस पिण्डा को मृतक खाता है। तो यह जो पिण्डदान है, गत तथा आगत दोनों के लिए है, मृतक के प्रति अर्पित किया जाने वाला महादान है। मनीश संस्कार देख तो सकता था पर अपनी छवि बचाए रखने के कुछ बोल नहीं सकता था, चाचा की तरह। वह जानता था अगर उसने इस कार्यक्रम के किसी नियम के बारे में इधर उधर बोला तो गॉव वाले उसे नालायक मानेंगे और साफ साफ बोलने लगेंगे।कृ ‘थोड़ा पढ़ क्या गया कि माथा खराब हो गया है, अंग्रेजी मूत रहा है, कल तो ये साले पूछेंगे बाप को, बाप क्यों कहा जाये, कौन किसका बाप है किसे पता?’ बाप हो तो सबूत दो’ यही है आज का अंग्रेजी ‘संस्कार’।कृसरकार देशी ‘संस्कार’ अंग्रेजी। गॉव में घुसते ही गॉव के संस्कारों में मनीश रंग जाता है, इसी लिए उसका नाम गॉव में अब उदाहरण बन गया है, बात बात पर लोग उसके नाम का उदाहरण देते हैं। ‘लड़का हो तो मनीश जैसा’ पर मनीश तो संस्कारों को ले कर घुटता रहता है। उसे लगता है कि कुछ संस्कार तो समाज के ही नहीं बल्कि प्रकृति के भी खिलाफ हैं, बलि देना, पिंड दान के नाम पर अनाज बर्बाद करना, सामर्थ्य न रहते हुए भी संस्कारों के नाम पर धन खर्च करना। यह क्या है आखिर? चाचा की तरह मनीश के पास साहस नहीं कि वह अर्थहीन संस्कारों पर कुछ बोल सके।कृगॉव में रहने के लिए मुंह बन्द तथा कान में तेल डाले रहना है। सो वह ओढ़ी हुई खामोशी के भीतर गॉव में रहता है। तेरही के बाद मृतक संस्कार का काम खतम हो गया था, केवल वर्षी बाकी थी जिसे तीन दिन बाद किया जाना था। मनीश अपने पुरोहित पंडित जी से चिढ़ता है, पर चिढ़ को वह जाहिर नहीं होने देता। मन में दबा कर रखता है। अपने पिताजी से कैसे बोले कि इस पंडित को छोड़ो बाबू। बोलने का लाभ भी तो नहीं।कृलाभ होगा भी कैसे, वह जानता है कि पंडिताइन से उसके पिताजी का लसपुस है। पंडिताइन अक्सर उसके घर पर मेहमान बन कर आती रहती हैं और जब पंडिताइन उसके घर पर होती हैं, तब पिता जी का चेहरा देखने लायक होता है। साठ साल के ठुठ चेहरे पर बसंत खिला खिल जाता है। मनीश पहले तो नहीं, पर अब अपनी मॉ के बारे में भी सोचने लगा है और घर में पंडिताइन के होने के बाद वह मॉ की बोली परखने की कोशिश करता है। पर मॉ तो मॉ अपने में आत्मलीन, पूजा पाठ वाली, दिन भर शिव शिव’ के भजन में डूबी रहने वाली, शिव के अलावा उनके लिए कोई दूसरी दुनिया नहीं।कृनिर्पेक्ष इतनी कि उन्हें आभास भी नहीं कि उनके घर में ऐसा भी कोई है जो उनका स्थान ले चुकी है। गॉव में रहते हुए मनीश ने कभी भी मॉ के चेहरे पर तनाव नहीं देखा। वे हमेशा अपने काम में डूबी रहतीं और पंडिताइन को दीदी, दीदी बोलती रहतीं हैं। गॉव से बाहर निकलने के बाद मनीश अब समझने लगा है कि उसकी मॉ पंडिताइन प्रकरण पर क्यों खामोश तथा प्रतिक्रियाहीन रहती हैं, पति के पंडितादन से नाजायज संबन्ध को अपने रिश्तेे पर नहीं चिपकातीं। कुमुद और पंडिताइन की सोच में समानता है। मॉ की तरह कुमुद कभी नहीं हो सकती, वह पंडिताइन की तरह है। अपने अभिष्ट की प्राप्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली। मरनी का संस्कार समाप्त होने के बाद मनीश शहर चला आया। शहर तो उसे लौटना ही था, का करता गॉव में। गॉव आज भी आस्था के नाम पर तमाम तरह के पाखण्डों में डूबा हुआ है पता नहीं इन पाखण्डों से बाहर गॉव कब निकलेंगे या डूबे ही रहेंगे। ‘नाजुक व मुलायम शब्दों को कैसे देखा जा सकता है डायनामाइट बनते’ मनीश शहर में आ कर अपने कामों में व्यस्त हो गया। उसने अपने कामों की प्राथमिकताओं में डिग्री कालेज के अध्यापन को चुना। कहीं भटकने से अच्छा है, छात्रों को पढ़ाने का काम करना। हर साल नये नये छात्रों को पढ़ाने का मौका मिलता है, और उन्हें पढ़ाते हुए खुद को पढ़ने का भी। अब वह खुद को केवल डिग्री कालेज के कामों में व्यस्त रखेगा। मनीश का समय तमाम बातों के अलावा लगभग लगभग ठीक से गुजर रहा था पर एक दिन...रात के बारह बज रहे होंगे कि दरवाजा खटखटाने की आवाज मनीश को सुनाई दी। उस समय बिजली चली गई थी, नहीं तो आने वाला घंटी बजाता, संभव है उसने घंटी बजाया भी हो और उसने न सुना हो। मनीश को नींद नहीं आई थी। आजकल उसकी नींद उससे छिन चुकी है। वह कभी बारह बजे तो कभी उसके बाद ही नींद में जा पाता है। पहले ऐसा नहीं होता था। पहले तो बिस्तरे पर पसरते ही वह नींद में चला जाया करता था। उसके दोस्त कहा करते थे....कृ ‘यार! तुम तो नींद के मालिक हो, और हमलोग हैं कि नींद की सिफारिश करनी पड़ती है, फिर भी नींद नहीं आती। मजबूर हो कर दारू सारू पी कर नींद में गोते लगाने के लिए हमलोगों को अभिनव किस्म का उन्माद उपजाना होता है।’ मनीश ने दरवाजा खोला...सामने एक अनजान आदमी था। वह प्रफुल्लताओं से भरा हुआ जान पड़ रहा था। दरवाजा खुलते ही वह कमरे के भीतर दाखिल हो गया, उसने प्रतिक्षा नहीं किया कि दरवाजे के भीतर आने के लिए मनीश उससे बोलेगा। मनीश को लगा कि आगन्तुक अजीब आदमी है, बिना बोले ही कमरे के भीतर चला आया फिर भी मनीश ने उसे टोका नहीं। टोकता भी कैसे? अनजान ने मौका ही नहीं दिया। मनीश के कुछ कहने के पहले ही वह बोल उठा... ‘कृपया दरवाजा बन्द कर लीजिए, आपको तो बुरा लग रहा होगा कि आपकी अनुमति के बिना ही मैं कमरे में दाखिल हो गया, आपको बुरा लगना भी चाहिए, आखिर इसे ही तो ‘संस्कार’ बोलते हैं।’ मनीश ने दरवाजा बन्द कर लिया। गुस्से में उसने अनजान से पूछा... ‘कौन हैं आप! मेरे यहां किस काम सेआये हैं?’ ‘आप घबरायें नहीं, आप मुझे नहीं जानते, पर मैं आपको जानता हूॅ।आप मनीश जी हैं और डिग्री कालेज में पढ़ाते हैं।आप छात्राराजनीति में भी रहे हैं, छात्रासंघ का चुनाव भी आपने एक बार जीता है। इस समय आप लोहिया वाली समाजवादी पारटी में हैं। अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन में ही नहीं जाति तोड़ो, जनेऊ तोड़ो वाले आन्दोलन में भी गिरफ्तार हुए थे। मुझे यह भी पता है कि आपातकाल के दौरान मीसा में आप गिरफ्तार किये गये थे। दो महीने बाद आप जेल से मुक्त हुए थे, मुझे यह पता नहीं कि सरकार से माफी मांग कर आप जेल से बाहर निकले थे या नहीं, खैर उससे क्या? जो बता रहा हूॅं, वह झूठ तो नहीं...’ ‘देखिए मनीश जी! यह तो आप बूझ ही गये होंगे कि मैं आपके चरित्रा तथा चिंतन दोनों को जानता हूॅं, और यह भी जानता हूॅं कि आज के खतरनाक दौर में, हम दोनों एक अच्छे दोस्त भी बन सकते हैं, हम दोनों की दोस्ती एक दूसरे का पूरक और प्रेरक होगी।’. ‘निश्चित रूप से आप अचरज में होंगे और मेरे बारे में गुन रहे होंगे आखिर यह आदमी है कौन? जिसके पास आपके बारे में ढेर सारी सूचनायें हैं पर घबरायें नहीं। आज के समय को बदलने के लिए हम जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए जरूरी है कि अपने दोस्तों और दुश्मनों की पूरी पहचान के बारे में परिचित हों...कृ मनीश गुस्से में था, एक अनजान आदमी, अकेले बकबका रहा है, आखिर यह है कौन? फिर मुझे कैसे जानता है? मनीश ने जोर देकर पूछा...कृकृकृ ‘पर आप हैं कौन? और मेरे पास क्यों आये हैं, बिना किसी प्रयोजन के तो आप आये होंगे नही,ंकृजहां तक मेरे बारे में जानने की बात है, आप मुझे जानते हैं, इसके लिए मुझे अचरज तो है पर घबराहट नहीं, इतना तो बहुत सारे लोग जानते होंगे मेरे बारे में, अचरज यह है कि आप मेरे पास किस लिए आये हैं? साफ साफ बतायें मुझे ढेर सारे काम निपटाने है।’ ‘आपने सही समय पर सही सवाल किया है। हर कोई जानना चाहेगा मेरे जैसे आदमी के बारे में, जो अनजान हो और बिना पूर्व सूचना के ही किसी अपरिचित के घर रात में आ धमके। पर मेरे बारे में जानने के पहले चाय वगैरह मिलेगी क्या? चाय मिल जाती तो हमलोगों की यह जो बातचीत है, सार्थक हो जाती। और मैं अपने बारे में सारा कुछ बता भी देता। मुझे पता है कि आप अकेले रहते हैं, सो चलिए मिल कर चाय बनाते हैं, दूध नहीं होगा तो कोई बात नहीं, मैं अक्सर काली चाय ही पीता हूॅ।कृ ‘हां हां चाय मिल जायेगी, आप यहीं बैठें, मैं चाय बनाकर ले आता हूॅं’ मनीश ने ‘अनजान’ को आश्वस्त किया कि चाय मिल सकती है। थोड़ी ही देर में चाय आ गई। मनीश के हाथ में चाय की दो प्यालियां थीं।कृ ‘चाय अच्छी बनाते हैं आप। आप राय भी अच्छी ही देते होंगे। मुझे आपसे राय भी चाहिए। क्या है कि इधर में कुछ दिनों से बहुत परेशान हूॅं, पर गुन रहा हूॅं कि आपसे बातें करूं कि नहीं, पर बात कियेे बिना काम भी नहीं चलने वाला, बात ही ऐसी है।’ ‘अनजान’ खामोश हो कर कुछ सोचने लगा। शायद विचारने लगा कि उसे मनीश से राय लेनी चाहिए कि नहीं...’ ‘आप तो खामोश हो गये,कृबताइए न आप मुझसे क्या चाहते हैं? मुझे सुबह ही जगना है, रात काफी हो चुकी है, अब नहीं सोऊंगा फिर कब सोऊंगा? सुबह जग कर तैयार होना फिर कालेज जाना, जो कहना हो जल्दी कहिए, मेरे पास समय नहीं है।’ ‘मैं जानता हूॅं मनीश जी! कि आपके पास सुबह का वक्त जल्दीबाजी का होता है, सुबह सुबह तैयार होना फिर कालेज जाना। इसलिए रात में जल्दी सो जाना चाहिए, पर करूं क्या? काम जरूरी था सो आपको तकलीफ दी, कृपया क्षमा करें, मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं आपसे जो कहना चाहता हूॅं उसे कैसे कहना चाहिए। पर सामान्य तरह से ही कह देता हूॅं और अपने बारे में भी बता देता हूॅ...। शायद आपने मेरा नाम भी सुना हो। जरूर सुना होगा, आप तो कुमुद को जानते ही हैं, उसकी तलाश में गॉवों की तरफ गये थे। गॉव के लोगों ने मेरे बारे में आपको बताया होगा।’ ‘छोड़िए, मैं ही बता देता हूॅ...’ ‘मेरा नाम संतोष है, और मैं जनता की लड़ाई, जनता के द्वारा लड़ी जाये इसका समर्थक हूॅं, बिचौलियों के द्वारा नहीं और उसी के लिए प्रयासरत हूॅ..’ ‘तो आप संतोष हो!’ ‘साश्चर्य मनीश ने अनजान से पूछा। अगर आप वही संतोष हो, जो गॉव गॉव बन्दूकें चलाने की ट्रेंिनंग दे रहा है और भोले भाले गरीबों को हिंसक बना रहा है। फिर मेरे पास क्यों आये हो? मैं क्या कर सकता हूॅं तुम्हारे जैसे अपराधी के लिए। तुम तो अपराधी हो, तुम समाज नहीं बदल रहे, बल्कि समाज से बदला ले रहे हो।’ संतोष मनीश को सुन रहा था...फिर धीरे से बोला...कृ ‘हां हां मैं वही संतोष हूॅं, जिसका नाम अखबारों में अक्सर छपा करता है, पर उससे मैं कुछ अलग भी हूॅं और सोच सकता हूॅं कि मैं जो कुछ कर रहा हूॅं वैसा करना समय की मांग है। वैसे मनीश! तुम्हारा कोई जोड़ नहीं, चीजों को अच्छी तरह से समझते हो, पर अच्छी तरह से उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर पातेे। जो बोल रहे हो, तुम्हें लगता है कि तुम अहिन्सा के पक्ष में बोल रहे हो, पर क्या इसे ही अहिन्सा कहते हैं, जो आत्मघाती हो। क्या खुद की प्रताड़ना हिन्सा नहीं है? आखिर यह जो हिन्सा और अहिन्सा का कौतुक है, या इन दोनों का जो अन्तर्लयन है, एक तरफ से देखो तो खुद के खिलाफ और दूसरी तरफ से देखो तो दूसरों के खिलाफ। यानि अन्याय को बर्दास्त करो तो ‘आत्मघात’ और यदि अन्याय का प्रतिकार करो तो ‘प्रतिघात’। तो क्या मनीशजी! यह जो ‘आत्मघात’, ‘प्रतिघात’ का खेल है, इस खेल में होने वाली ‘हिन्सा’ या ‘अहिन्सा’ है, इन दोनों में से गरीब आदमी किसका चुनाव करे? हिन्सा का या अहिन्सा का? आत्मघात का या प्रतिघात का। खुद को प्रताड़ित करे या अपनी प्रताड़ना के प्रतिकार में प्रताड़कों को प्रताड़ित करे। वैसे गरीबों, उत्पीड़ितों, शोषितों, दमितों के पास जीवन जीने के लिए साधनों, संसाधनों के कितने विकल्प हैं? सभ्य बने रहने के लिए क्या है उनके पास? प्रताड़ितों की तरह जीवन जीने की प्रक्रियाओं में से तुम किसका चुनाव करोगे, आत्मघात का या प्रतिघात का?’ ‘अनजान’ बोलते बोलते अचानक खामोश हो गया। हो सकता है वह हिन्सा और अहिन्सा के द्वन्द को अच्छी तरह से विश्लेषित करने के लिए नये तर्कों को तलाश या गढ़ रहा हो। क्योंकि धारावाहिक ढंग से किसी विषय पर बोलना संभव नहीं होता। तभी मनीश ने संतोष को टोका...कृ ‘कैसा कौतुक? हिन्सा और अहिन्सा के बीच जब कोई रिश्ता ही नहीं, फिर किस बात का खेल या कौतुक। ‘हिन्सा तो हर हाल में हिन्सा होती है जो सदैव कमजोर दुश्मन से ही लड़ती है, वह कभी भी मजबूत दुश्मन से टकराने के बारे में सोच ही नहीं सकती।’ एक बात जान लो संतोष! कि हिन्सा और अहिन्सा दोनों मन के अलग अलग द्वीप हैं, और दोनों का कभी भी अन्तर्लयन हो ही नहीं सकता। यह जो जीवन है, या जीवन जीने के जितने भी तरीके हैं, उन तरीकों में कहीं भी हिन्सा के लिए जगह नहीं है। हिन्सा तो मानसिक कमजोरी तथा संतुलन की अक्षमता से अपना खुराक हासिल करती है, जो कि मानव प्रकृति के भी खिलाफ है। जबकि अहिन्सा मन के नियंत्राण और संतुलन के द्वारा अपना रास्ता तलाशती है, उसमें ‘पीर पराई’ वाली लोकचेतना होती है।’ ‘वाह! क्या खूब, अभिनव किस्म के तर्क गढ़ लेते हो मनीश! कुछ चुनिन्दा शब्दों के सहारे, संतुलन, अक्षमता, आगे बोलोगे सहनशीलता, गंभीरता, पीर पराई तो बोल ही रहे हो पर क्या है यह ‘पीर पराई?’ किसकी पीर? कौन पीड़ित है, और कौन पीड़ित कर रहा है। कैसे पहचान करोगे पीड़ित और पीड़क की? मामला यहीं फसा पड़ा है। संतुलन और सहनशीलता ये दोनों शब्द बहुत ही मोहक और बेधक हैं, दिल को छूते हैं, पर इन दोनों शब्दों की जगह कहां है, कहां है इनका मान व सम्मान? बड़े बड़े ओहदे पर बैठे लोगों के दिलों में, सारी प्राकृतिक संपदा पर काबिज लोगों के दिलों में, चिमनियों के मालिकों में, परीश्रम करने से लजाने वाले लोगों के दिलों में, सुविधाओं को कानूनी बनाकर ऐश करने वाले लोगों के दिलों में, अपने हाथ से उठाकर एक गिलास पानी पीने पर शर्म करने वालों के दिलों में, कहां है इन दोनों मोहक शब्दों के लिए सम्मानजनक जगह, अगर कहीं है, तो बोलो। हम भी तो यही चाहते हैं कि लोग विनम्र और सहनशील बनंे। सरकार विनम्र और सहनशील बने। जनता के प्रति उत्तरदायी बने। लोगों के दिलों में भाईचारे का भाव जगे और खिलखिलायें। वे सहभागी रिश्तेों पर चलें। सहनशीलता, विनम्रता तथा सहभागिता को हमारी सभ्यता ने क्यों नकार दिया है आखिर, वे टूट टूट कर खंड खंड क्यों होने लगी हैं? समाज का एक स्वनिर्मित लघु और गैरजरूरी वर्ग प्रकृति के सारे संसाधनों पर कैसे काबिज हो चुका है? क्या उस वर्ग को तुम विनम्र बना सकते हो? अगर हां तो निश्चित रूप से जो सुविधाहीन हैं, उनके हाथों से बन्दूकें फेंका जायेंगी, फिर तो ‘हिन्सा’ किसी रोग की तरह जान पड़ने लगेगी।’ ‘एक बात जान लो मनीश! यह जो बन्दूक है नऽ किसी की हिफाजत नहीं करती, इसे तो संपत्तिवालों ने अपनी संपत्तिबचाने के लिए बनाया हुआ है। इसे किसी गरीब ने नहीं बनाया। अदना से आदमी को जब बन्दूकों से सुरक्षित नहीं बचाया जा सकता, फिर देश को कैसे बचाया जा सकता है। हम भी बन्दूकों को मानव सभ्यता के लिए खतरनाक मानते हैं, कलंक मानते हैं पर करंे क्या? आज के समय में दस फीसदी लोगों का एक ऐसा समाज बन गया है, जो माथे की झुर्रियों, धसी हुई आंखों की वेदनाओं की भाषा नहीं समझता, वह केवल बन्दूक की ही भाषा समझता है, और उसी का साहित्य पढ़ता है, युद्ध तथा प्रतियुद्ध का साहित्य।’ मनीश संतोष को लगातार सुन रहा था और कोशिश कर रहा था कि वह संतोष के उन मनोभावों को पकड़े, जो आदमी को कमजोर बनाते हैं, पर संतोष स्थिर था। उसके चेहरे पर अद्भुत किस्म की चमक थी। एक ऐसी चमक जो विरोधियों की पूरी आभा छीन लेती है। मनीश नहीं समझ पा रहा था कि वह हिन्सा और अहिन्सा के द्वन्दों के बारे में क्या बोले, अचानक उसे समझ आया...कृ ‘तो संतोष! तुम हिन्सा के पक्षधर हो, साफ साफ बोलो कि तुम्हारा भी वही पक्ष है जो बन्दूकों की अनिवार्यता को नैतिक बना कर बारूद की ढेर पर सभ्यता गढ़ रहे हैं। पुलिस फौज बनाने वालों की जमात की तुम भी एक पैरोकार हो। इससे अलग कुछ भी नहीं। तुम्हारी सोच में दूसरे रास्ते नहीं है जिन रास्तों पर चलते हुए समाज को बदला जा सके। समाज बदलने के लिए तुम भी बदला लेने का ही विकल्प चुन चुके हो। फिर कोई फर्क नहीं, तुममें और बन्दूकों की भाषा को पूरी सभ्यता की भाषा बनाने वालों मेंकृकुछ फर्क हो तो बताओ।’ समाज बदल का दूसरा तरीका...कृक्या पूछ रहा है मनीश? तरीका तो कोई नहीं, तरीका तो केवल बन्दूकों वाला ही है, मानव सभ्यता दूसरे तरीकों को नहीं जानती। संतोष मनीश के तर्कों से खामोश हो गया और वह मनीश की बौद्धिक क्षमता का मूल्यांकन करने लगा। समझदार है, चीजों को गहरे तक समझता है, यूं ही नहीं बोल रहा।कृ ‘हिन्सा पर टिकी दुनिया को हिन्सा के सहारे बदलना मनुष्यता के लिए सवाल है पर समझना होगा कि गरीबों के जीवन तथा अधिकारों को बचाने के लिए जो हिन्सा की जा रही है, उसे तो हिन्सा नहीं कहा जाना चाहिए, वह हिन्सा है भी नहीं, हिन्सा तो वैयक्तिक होती है, जो केवल और केवल अपने हितों की सुरक्षा के लिए की जाती है, उस हिन्सा में समाज का हित नहीं होता। आखिर ऐसी सरकारें जो समस्याओं के समाधानों के लिए हिन्सा का चुनाव करती हों फिर तो उनके सामने तनेन होना पड़ता है, मुठ्ठियां ताननी पड़ती हैं, मुठ्ठियां तानना हिन्सा नहीं,ं गर्दन उठा कर चलना हिंसा नहीं, बल्कि यह तो प्रतिकार है, प्रतिरोध का एक रूप भर है।’ संतोष ने मनीश से प्रतिवाद किया। ‘आखिर एक सुविधाहीन गरीब आदमी, आज की दुनिया के सामने अपना पक्ष कैसे प्रस्तुत करे, उसकी बातें सुनता कौन है? किसे नहीं पता कि साठ फीसदी से अधिक लोग प्राकृतिक संसाधनों के उपयागों से वंचित किये जा चुके हैं। वे खुली हवा में सांसे तक नहीं ले सकते। उनके लिए साफ पानी तक नहीं, वे जमीन के किसी छोटे से टुकड़े पर अपना घर नहीं बना सकते। उनके पास घर तक नहीं। उनके हाथों को कोई काम नहीं। आखिर ऐसे लोग किसके पास जांयें तथा किसे अपना दुख दर्द बतायें, कौन है जो उनके आंसू पोछने के लिए तैयार है? ऐसी विषम स्थिति में क्या हो सकता है मनीश? तुम हिन्सा और अहिन्सा का भेद, उपभेद बता रहे हो। यह सारी बातें भरे पेट वालों की हैं, उनकी नहीं जिनके चूल्हे नहीं जलते, जो दो जून की रोटी नहीं खा पाते, जिनकी भूख चूल्हे में बन्द होती है..जो आसमान को रोटी का टुकड़ा महसूसते हैं। वेे सरकार की दिखाऊ विनम्रता से भी काफी दूर हैं।’ ‘तुम तो अहिन्सा की पैरवी करोगे ही, अहिन्सा के अलावा दूसरे विकल्पों के बारे में तुम सोच ही नहीं सकते। तुम ही नहीं कोई भी जो तुम्हारी तरह से सुविधाओं पर काबिज है, वह कभी भी नहीं सोचेगा। सोचे भी तो क्यों उसका पेट तो भरा हुआ है, वह किसी परिवर्तन के बारे में क्यों सोचेगा? बात तो उनकी है, जो खाली पेट हैं, जिनके हाथों को कोई काम नहीं है।’ मनीश किसी भी तरह से संतोष की बातों से सहमत नहीं था। होता भी नहीं, उसके चिंतन में अहिन्सा के बाबत किसिम किसिम के तर्क थे और वह हिन्सा को गलत मानता था। वह अक्सर कहा करता था कि हिन्सा चाहे किसी भी प्रकार की हो, किसी के द्वारा की गई हो, वह हर हाल में हिन्सा होती है। हिन्सा खुद में एक अनैतिक कर्म है। बन्दूक चाहे सिपाही चलाये या नक्सली दोनों के परिणाम एक जैसे ही होतेे हैं। सो जरूरत है कि हमारा समाज और राज दोनों बन्दूकों की भाषा से बाहर निकले। राजनीति तथा सत्ता दोनों को विनम्र होना ही चाहिए। मनीश तो पहले से ही संतोष से गुसियाया हुआ था। बिना बताये ही कमरे में दाखिल हो गया, कुमुद को अपने मायाजाल में फसा लिया, मायावी जान पड़ता है। इसका लक्ष्य समाज बदल का नहीं, खुद बदल का है, खुद को बदलना चाहता है। कुछ तर्कों के सहारे, अच्छी अभिव्यक्ति की बदौलत। अपनी छवि को क्रान्तिकारी प्रमाणित करना चाहता है और कुछ नहीं। इसकी सोच में भी बाजार की ही गंध है, पूंजीवाद का पुलिसिया तरीका है, पुलिस और फौज वाली धमक है, यह वलिदान जैसे कर्मों का बाजार बनाना चाहता है, जो फौजी तथा पुलसिया प्रबंधन से अलग दिखे, पर काम वही हो, वह भी निरीह जनता के नाम पर निरीह जनता तो इसके लिए प्रतिरोध का कमोडिटी भर है। मनीश संतोष की बातों से ऊब चुका था...कृ ‘देखो संतोश्ष! मुझे तुम्हारी बातें, अब और नहीं सुनना, अगर कोई काम हो तो बोलो, नहीं तो जाओ यहां से’ ‘हां हां जाने के लिए ही यहां आया हूॅं और जा भी रहा हूॅं, कमुद के बारे में तुझे बताना नहीं होता तो मैं तेरे पास आता ही नहीं’ ‘तुम कुमुद नाम की लड़की के बारे में जानते हो नऽ, वह इस समय हमारे यहां है। कुमुद को तुम अपने पास रोक लो, किसी भी तरह से उसे बुला लो। मैं नहीं चहता कि कुमुद खुद को बारूदी बना ले और बन्दूक चलाये। ऐसा करना उसके लिए न तो समय की मांग है और न ही कोई जरूरत। वह भावुकता वश मुझसे व मेरे संगठन से जुड़ना चाह रही है और सोचती है कि उसकी भावनाओं में मैं गोते लगाने लगूंगा। तुम समझ सकते हो मनीश! मेरे लिए किसी वसंत या फगुनहटी बयार का कोई मतलब नहीं। दरअसल कुमुद के लिए ही मुझे तेरे पास आना पड़ा। कुमुद का मेरे संगठन के साथ रहना ठीक नहीं, वह जरूरत से अधिक भावुक है।कृकृकृपा करके अपने पास उसे बुला लो।’ ‘तो कुमुद को तुम अपने संगठन से नहीं जोड़ना चाहते, यानि कुमुद तुम्हें तुम्हारे लक्ष्यों से भटका सकती है क्योंकि वह नारी है’ संतोष से पूछा मनीश ने...कृ ‘हां ऐसा ही समझ लो, यह भी समझ लो कि मैं औरतों के बारे में कम से कम क्रान्ति के सवालों पर थोड़ा शंकित रहता हूॅं, उन्हें ‘गरम लोहा’ बनाना आसान नहीं होता’ संतोष तो मनीश के पास वापस लौटने के लिए ही आया था और बिना औपचारिकता के लौट गया, यह कहते हुए कि कुमुद का घ्यान रखना। कल वह शहर आ रही है उससे मिल लेना। फिर संतोष ने कुमुद से मिलने का स्थान बताया जो काफी गुप्त था। स्थान का नाम सुन कर मनीश चकरा गया। यानि अधिकारी भी वामअतमार्गी हो सकते हैैं। उसने माथा पकड़ लिया। ‘वह अधिकारी तो निहायत अन्तर्मुखी है’ समाज बदलने के सवालों पर कई तरह के सवालों को छोड़ कर मनीश के घर से संतोष लौट गया। तो यही संतोष है, जिसके बारे में आलोकनाथ जी कहते हैं कि ‘वह मायावी है, और सामने वाले को सम्मोहित करने का जादूगर।’ मनीश को खुशी हुई कि वह संतोष से सम्मोहित नहीं हुआ, संतोष को वह नहीं जानता था, ठीक हुआ कि वह जान गया संतोष को। मनीश नक्सलाइटों के बारे में केवल समाचारपत्रों के माध्यम से ही जानता था। कभी किसी से मिला नहीं था। उसने सुना था चारू मजूमदार के बारे में कि वे नक्सलाईटों के अग्रपुरुष थे। जो व्हील चेयर पर चला करते थे। उसे अचरज हुआ था उनका नाम सुन कर, शरीर से जितना अशक्त, उतना ही दिमाग से सशक्त, आखिर यह कैसे संभव हो सकता है? पर उसे बताया गया था कि यही सच था, उनके क्रान्तिकारी छवि में इतना आकर्षण था कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले जनचेतना से लैश छात्रा कलकत्ता पहुंच कर उनसे मिलने के लिए बेचैन रहा करते थे। कुछ तेज छात्रों व छात्राओं के नाम आज भी गिनाये जाते हैं जो मेडिकल तथा इन्जिनियरिंग की पढ़ाई छोड़ कर चारू के संगठन में शामिल हो गये थे। उनका अब कहीं अता पता नहीं। वैसे तो अब भी कुछ छात्रा हैं जो वैचारिक स्तर पर वामउग्रवाद के समर्थक हैं पर व्यावहारिक स्तर पर नहीं। वे बन्दूकों से घिन करने वाले वाले लोग हैं पर चाहते हैं कि क्रान्ति हो, वे भगत सिंह के समर्थक तो हैं पर भगत सिंह नहीं बनना चाहते। ऐसे लोगों के अलावा मनीश कुछ ऐसे कामरेडों को भी जानता है जो खुद तो क्रान्तिकारी जमातों के अगुआ हैं जबकि उनकी बीबियां रुपयों के गद्दों पर पसर कर नौकरियां कर रही हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं, उनके किताबों की रायल्टी भी खूब खूब मिलती है, कुछ तो तमाम सरकारी एकेडेमियों पर काबिज भी हैं। ऐसे लोग कुदरती मूल्यबोधी मानवीय समीपता की चेतनाओं से अलग पूंजीमूल्यबोधी धोखों के शिकार हैं और वे तमाम सरल लोगों को बन्दूक उठाने के लिए बहका रहे हैं। मनीश एकबारगी घिना जाता है..कैसा कुकर्म है यह,, सरल व तरल लोगों को बहकाना..कृ आखिर नक्सलियों के बारे में क्या जानने के लिए कुमुद जंगल की तरफ चली गई, क्या है बारूदी गंध में गोते लगाने वालों के पास, कुमद नाजुक व मुलायम शब्दों को डायनामाइट बनते कैसे देख सकती है? बारूदी गंध तो जंगल के सुवास को भी बिगाड़ दे रही होगी, छीन ले रही होगी जंगल की हरियाली व पत्तियों की सुकुमारता। ‘देह के डिजिटिलाइजेसन का दौर है यह’ संतोष चला गया, पर मनीश उसके बारे में ही सोचता गुनता रहा। रात में उसे नींद नहीं आई। संतोष ने बताया था, कि कुमुद वापस आ रही है, उससे मिलना ठीक होगा कि नहींकृकुमुद के आने की खबर आलोकनाथ को भी दे देनी चाहिए, वे कुमुद के पिता हैं। वे कुमुद को समझा बुझा कर रोक लेंगे तो ठीक होगा। मनीश की रात कुमुद की यादों में गुजरी व संतोष के बारे में सोचते गुनते हुए। सुबह जल्दी ही मनीश जाग गया, उसने चाय बनाई। दैनिक क्रिया कलापों के बाद उसने कूकर में चावल दाल डाला, आलू के कुछ कतरे भी, फिर हल्दी नमक। उसे भूना और छौंका लगाया, वह कुछ अलग किस्म की खिचड़ी बनाने में माहिर है, अपनी बनाई हुई खिचड़ी उसेअच्छी भी लगती है। खिचड़ी खा लेने के बाद वह तैयार हो गया पर जाये कहां? कुमुद वापस आ रही है, उससे मिलना होगा। कालेज से बिना छुट्टी लिए घर पर रूक जाना ठीक नहीं होगा। पास ही में उसके कालेज के एक दूसरे अध्यापक रहते थे। मनीश ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और कालेज वाले अध्यापक के घर पर जा पहुंचा।कृ मनीश अपने साथी अध्यापक से मिला और कालेज से छुट्टी लेने के लिए उसे एक प्रार्थना पत्रा दिया....कृ ‘प्रधानाचार्य जी को यह प्रार्थना पत्रा दे देना और बता देना कि कुछ आवश्यक काम आ गया है। वह कालेज नहीं आ सकता’ मनीश घर नहीं लौटा, वह उस अधिकारी के बंगले की तरफ गया जहां कुमुद के आने के बारे में संतोष ने बताया था उसको। वह बंगले तक पहुंच तो गया पर बंगले के बाहर ही रूका रह गया। हिम्मत चाहिए बंगले के भीतर जाने के लिए। एक पर्ची लगानी होगी अधिकारी से मिलने के लिए। फिर वह अधिकारी से का बोलेगा कि वह किस लिए मिल रहा है। कुछ नहीं बोल सकता, कोई काम भी तो नहीं फिर वह कुमुद के बारे में अधिकारी से कैसे पूछ सकता है? वैसे भी अधिकारियों के पास तीसरी ऑख होती है, जो एक्सरे की तरह मन के भीतर तक घुस जाती हैं। अधिकारी की ऑखें अगर उसके मन में घुस गईं तो...वह का बताएगा ? अधिकारी जाने कितने तरह के सवाल पूछे, कुमुद से रिश्तेे के बारे में। अधिकारी के बंगले के सामने वह एक घंटे तक अनमने भाव से खड़ा रहा। मिलने न मिलने के द्वन्द में उलझा हुआ और उनकी सुरक्षा व्यवस्था में लगे जवानों तथा सिपाहियों को ताकता रहा। सिपाहियों की सक्रियता देखने लायक थी। वे सात, आठ की संख्या में थे। सभी के चेहरों पर आज्ञाकारिता की छाप थी, जिससे साबित होता था कि वे अधिकारी पर होने वाले किसी हमले को रोकने के लिए तैयार हैं, एकदम से मुष्तैद। सिपाही अपने में डूबे हुए लोगों की तरह थे। उन्हें शायद यह नहीं पता था कि वे केवल उस धोख की तरह हैं, जो दिखने में डरावना तो लगता है, पर होता निर्जीव है। उस धोख को थोड़ी सी सक्रियता से ही मिटाया जा सकता है। मनीश चक्कर में था। वह का करे, वापस लौट चले, या अधिकारी से मिले और सीधे कुमुद के बारे में पूछे। पर नहीं, वह अधिकारी से सीधे कैसे पूछ सकता है कुमुद के बारे में। पता नहीं कुमुद को वे जानते भी हैं या नहीं, और यह भी कि कुमुद यहां आई ही न हो, पता नहीं संतोषने कुमुद के बारे में सही सूचना दी है या गलत। आखिर वह कुमुद को अपने साथ क्यों नहीं रखना चाहता। कुमुद में क्या कमी है? टैलेन्टेड है, समय को ठीक ढंग से समीक्षीत कर खुद को समय के अनुसार अनुकूलित करना जानती है, फिर संगठन में न रखने का कोई कारण नहीं? उसे भी तो प्रतिक्षा करनी चाहिए कि कुमुद वापस लौटने के बाद किसके यहां रहने का निर्णय लेती है। उसके यहां या अपने डैड के यहां, क्या पता, कुमुद क्या करने वाली है। अधिकारी के यहां अगर उसने, उसे पहचानने से इनकार कर दिया तो...कृ मनीश कोई नतीजा नहीं निकाल पा रहा है। वह उलझा हुआ है, कई तरह के सवालों मंे। अधिकारी के बंगले के सामने अधिक देर तक रूकना उसे ठीक नहीं लगा। अधिकारी के सुरक्षाकर्मी उसके बारे में जाने क्या सोचंे?अधिकारी के बंगले के सामने कुछ देर रूकने के बाद मनीश ने तय किया कि उसे वापस घर लौट जाना चाहिए। आखिर वही कुमुद के बारे में क्यों सोचे, कुमुद को तो अपने घर आना चाहिए था, अधिकारी के यहां क्यों आ रही है? कुमुद को भी तो सोचना चाहिए उसका घर यहां फिर दूसरे के यहां रुकने का क्या मतलब?अगर वह उसके बारे में नहीं सोच रही फिर उसे कुमुद के बारे में क्यों सोचना चाहिए? उसे वापस लौट जाना चाहिए। मनीश प्यार के सहसंबधों को विश्लेषित करता हुआ अपने घर वापस लौट आया और धड़ाम से पलंग पर पसर गया। कुमद को आना होगा तो घर पर ही आयेगी या तो अपने डैड के पास जायेगी। पलंग पर कुमुद की यादें हर तरफ पसरी हुई थीं, पर उन यादों में मनीश डूब नहीं सकता था। कुमुद होती तो यादें भी उसके लिए बिस्तरा बिछातीं और गोदी में उठा लेतीं फिर वह डूब जाता प्यार की अन्तहीन झील में।कृकुमुद तो थी नहीं, सो वह अकेले खुद में डूब गया। पलंग पर महीने भर पहले की एक रंगीन पत्रिका पड़ी हुई थी। उसने पत्रिका पढ़ने की कोष्शिश की। पत्रिका उसके एकांत को छीन सकने वाली थी। उसमें किसिम किसिम के रंगीन तस्वीरें थीं, जो मादकता में डुबोने वाली थीं। पत्रिका का कवर चित्रा भी, कम आकर्षक नहीं था। उसे लगा कि उस चित्रा पर कुमुद चस्पा हो गई है। उसने चित्रा को गंभीरता से देखा फिर अपने मन को समझाया कि नहीं, कुमुद चस्पा होने वाली कोई तस्वीर नहीं है, पर है कुमुद जैसी। उसी की तरह ऑखें और भी बहुत कुछ। भला कुमुद कैसे कोई तस्वीर हो सकती है। वैसे उसे मालूम था कि तस्वीरों की भाषा में कोई खास ताकत नहीं होती। उसकी भाषा भले ही आकर्षक हों फिर भी, भाषायें अपने अर्थो का संप्रेषण उस तरह से नहीं कर पातीं जिस तरह से चित्रा की कला का आशय होता है। चित्राभाषा और उसकी कला का संयोजन उसने देखा है, कुमुद के साथ हो कर। कुमुद होती थी तो देह भाषा के सारे व्याकरण अपने आप काम करने लगते थे। उसके बोले हुए एक एक शब्द कलात्मक चित्रा बन जाया करते थे और कुमुद की सांसे तो ऐसी होती थीं जैसे उसकी समी़क्षा की जा रही हो। वह कुमुद की इच्छा और समीक्षा के बीच सहभागी बनने का प्रयास करता और पाता कि वह तो पहले से ही कुमुद के मन के भीतर डूबा हुआ है। सो वह सोच ही नहीं सकता कुमुद की इच्छा और समीक्षा के बारे मेेंकृगोया कुमुद उसके लिए उसकी इच्छा थी तो समीक्षा भी। तो तस्वीर वाली लड़की कुमुद नहीं थी। मनीश ने पत्रिका पढ़ना बन्द किया और तय किया कि तस्वीरों के सच को जानने की कोशिश कभी नहीं करेगा। पर ऐसा मनीश नहीं कर पाया, हालांकि उसने पत्रिका एक किनारे फेंक दिया था फिर भी उसे जान पड़ रहा था कि कुमुद तो उसकी ऑखों में तस्वीर की तरह छलक रही है। पत्रिका तो वह नहीं पढ़ेगा, पर ऑखों में उतराई कुमुद की तस्वीर का क्या करे, तस्वीर थी कि मनीश को पगलाये हुई थी। वह तरह तरह के संवादों के जरिए मनीश के मन को हिलोर रही थी, जैसे यही कि कैसे कुमुद उसके साथ जुड़ गई? जो सपना था, उसे तो इतना ही पता था कि सपने सच नहीं होते। लाख कोशिश करने के बाद भी कुमुद उसकी ऑखों से बाहर नहीं हो सकी। उस समय मन को बदलने के लिए मनीश क्या कर सकता था, केवल एक ही रास्ता था कि वह किचन में जाये और खाने के लिए कुछ पकाये, संभव यह भी था कि वह कुमुद के बारे में कुछ लिखना शुरू करे पर उसे कुछ भी लिखना चाहे वह संस्मरण या कविता वगैरह ही हों, पहले से ही काफी बुरा लगता था। सो वह कुछ लिख नहीं सकता था। वह मान कर चलता था कि लिखा पढ़ा राहत नहीं दे सकते। वे बीते दिनों की यादें दिलाते हैं और मन को बिमार भी बना देते हैं। मनीश बिमार नहीं होना चाहता था, सो उसने किचन का रास्ता पकड़ा और हलुआ बनाने में जुट गया। वही हलुआ जिसे वह दुनिया का बेहतर पकवान मानता था। उसका मानना था कि खाने के सामानों को बनाने के पारंपरिक तरीकों में बदलाव लाने की जरूरत है। अब क्या है कि पुराने तरीके से ही सूजी, चीनी और दूध पानी के घोल से ही हलुआ हमेशा बनाते रहो। समय के साथ कुछ तो बदलो। पर वह नहीं बदल सकता तरीका। हलुआ बनाने का पुराना वाला तरीका ही ठीक है। मनीश हलुआ बनाने लगा। उसकी औपचारिकतायंे पूरी कर वह बाहर वाले कमरे में चला आया। थोड़ी देर में खाएगा, हो सकता है तब तक कुमुद आ ही जाये। संतोष ने ऐसा ही तो बोला था। पलंग पर चित्रों वाली पत्रिका पड़ी थी, उसके चित्रों ने एक बार फिर उसे अपनी ओर खींचा पर मनीश ने दृढ़ता दिखाया और पत्रिका को वहीं रहने दिया, जहां पड़ी थी। उसे लगा कि पत्रिका पढ़ने की क्या जरूरत? देह के खेलों को देखने के लिए तो वह इन्टरनेट का भी सहारा ले सकता है। नेट पर तो किसिम की तस्वीरें हैं, अलग अलग किस्मों के दैहिक व्याकरण हैं, इतनी मंहगी पत्रिकाओं में देह को जब मशीन के रूप में ही देखना है फिर तो नेट क्या बुरा है? देह के डिजिटिलाइजेसन का दौर है यह, नेट के इस बाजार में कमाल की चीजें हैं जो रीतिकाल के कवियांे की कल्पनाओं से बॉसों ऊपर हैं, ऐसे चित्रों को तो वह नेट पर ही देख लेगा। मनीश सीधे किचन में गया और बना हलुआ चूल्हे पर से उतार दिया। मनीश को भूख लगी थी सो उसने हलुआ प्लैट में निकाला और खाने लगा... हलुआ अच्छा बना था। उसी समय बाहर लगी कालबेल घरघराई....कृ ‘कौन हो सकता है, होगा कोई’ मनीश ने दरवाजा खोला और चकरा गया...कृ ‘अरे! तुम!’ ‘हॉ मैं, देख लो मैं ही हूॅकृचाहे जिस तरफ से देखो मैं ही दिखूंगा, दिख रहा हूॅं कि नहीं’ अरे दरवाजा तो खोलो या यूं ही बातें करोगे। कम से कम भीतर तो जाने दो।’ आगन्तुक कोई और नहीं उसका पुराना मित्रा था। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में था। वह पूजा पाठ करने वाला आदमी था तथा बात बात में भारतीय संस्कृति की महिमा का गान किया करता था। भारतीय संस्कृति में अधुनिकता है तो उत्तरआधुनिकता भी है केवल पुरातनता ही नहीं। खंडन है तो विखंडन भी है, जीवन जीने के जितने भी सहिष्णु तरीके हैं, वे सारे के सारे भारतीय संस्कृति से गुंथे हुए हैं।अपने आलेखों में वह हमेशा भारतीय संस्कृति के बुनियादी तत्वों का मिलान वामपंथी चेतना से किया करता था। अपने घर पर पुराने मित्रा को देख कर मनीश चकरा गया था।कृ ‘भला यह कैसे आ गया, न कोई फोन न सन्देश’ ‘कुछ गड़बड़ है का?’ ‘आओ आओ, अन्दर आओ, पर तुम्हें अचानक देख कर मैं घबड़ा गया। सारा कुछ ठीक है नऽ’ ‘हां यार! ठीक क्यों नहीं होगाकृसारा कुछ ठीक ही नहीं चल रहा दौड़ रहा है,कृअगले साल ही मुझे प्रोफेसरी भी मिलने वाली है।’ ‘अरे मनीश! चाय वाय नहीं पिलाओगे क्या?’ ‘हां हां क्यों नहीं,कृचाय क्यों नहीं पिलाऊंगा, अभी तुरंत बनाता हूॅं, वैसे अभी अभी हलुआ बनाया है।’ ‘क्या हलुआ! तो तूं जानते थे क्या कि मैं आने वाला हूॅ, खैर छोड़ो, तूं रहने दे, चाय मैं ही बना देता हूॅ’ हलुआ काफी टेस्टी बना था, हलुआ खा लेने के बाद मनीश ने दोस्त को चाय बनाने से रोक दिया और खुद चाय बनाया। चाय पीते हुए उसने दोस्त से पूछा.कृ ‘तूं तो मुझसे नाराज है नऽ, नाराज हो कि नहीं सच सच बताना’ ‘नाराज नहीं, खुद पर दुखी हूॅं कि तुझे अपने साथ जोड़ नहीं पाया, जोड़ा भी तो उस जोड़ को संभाल नहीं पाया।’ ‘अरे यार! वह सब तो चलता रहता है, बचपन की दोस्ती भला भूलती है क्या?’ ‘नहीं मनीश, ऐसा नहीं है, मैं तो आज भी तुझसे जुड़ा हुआ हूॅं,’ ‘कुमुद नहीं दिख रही, आलोक सर के यहां गई है का?’ ‘नहीं’ ‘फिर कहां गई, कहीं सेमिनार वगैरह में बाहर या विदेश’ ‘नहीं अपने किसी दोस्त के यहां गई है’ ‘फिर तो दिल्ली गई होगी’ ‘नहीं वहां नहीं, कहीं और’ ‘बताने लायक नहीं’ ‘नहीं ऐसा नहीं है, फिर का करोगे जानकर कि वह कहां और क्यों गई है?’ ‘तूं बताओ चाहे न बताओ कुमुद के बारे में, मुझे पता है कि वह कहां गई है’ ‘फिर काहे पूछ रहे हो’ ‘इस लिए कि तुमने अभी तक मुझे नहीं बताया, यह मानकर कि कुमुद के बारे में मुझे पता नहीं चलेगा। उसके बारे में दिल्ली के मित्रा जानते हैं मनीश! वह एक जगह बंध कर नहीं रहने वाली’ ‘तो तूं जानता है उसके बारे में, फिर तो बता कि वह कहां है?’ ‘इसीलिए तो मैं आया हूॅ दिल्ली से तेरे पास कि तुम्हें बता दूं उसके बारे में। बताना तो यह भी है तुम्हें कि वह तेरे साथ अब नहीं रहने वाली।’ ‘का बोल रहा है तूं? तुझे कुछ समझ है कि नहीं, आखिर वह मेरे साथ क्यों नहीं रहेगी, क्या हुआ है हम लोगों के बीच।’ ‘वही तो...कृक्या हुआ था तुम दोनों के बीच, जो वह तेरे साथ रहने लगी थी। कुछ हुआ था का? कुछ नहीं हुआ था नऽ, फिर भी वह तेरे साथ रहने लगी थी। तूंने कभी सोचा इस बारे में। आखिर एक तेज तर्रार पढ़ी लिखी लड़की तेरे साथ क्यों रहने लगी? तुझमें और उसमें जमीन आसमान का अन्तर है। क्या तूं उसके सपनों का राजकुमार बनने लायक हो। इस बारे में तुझे सोचना चाहिए था पर तूंने नहीं सोचा और जुड़ गये उसके साथ। अपने मित्रों से भी तूंने नहीं पूछा, जाना। अब तो तुझे ही बताना होगा कि वह कहां है?’ ‘तुझे पता है का उसके बारे में’ ‘हां तभी तो बोल रहा हूॅं’ ‘वह कहां है, बताओ मुझे, पहेलियां क्यों बुझा रहे हो।’ ‘संभव है जितना तूं जानते हो उतना मैं भी जानता होऊं’ ‘अरे! जानना क्या है, यह तो साफ है कि वह कहां और किसके साथ हो सकती है? ‘बताओ तो सही, वह कहां और किसके साथ है?’ ‘कुमुद के बारे में मुझे ही कहां पता था। संयोग की बात है कि मैं कलकत्ता गया हुआ था। कलकत्ता के मेरे मित्रों को पता था कि वहां वामउग्रवादियों की एकता परिषद की बैठक होनी है। उस बैठक में भाग लेने के लिए हमारे प्रदेष्श से जो लोग कलकत्ता पहंुचने वाले हैं, उनमें संतोष और कुमुद के नाम भी हैं।’कृ ‘कुमुद के बारे में तो मुझे पहले से ही पता था कि वह तुम्हारे साथ रह रही है फिर बाद में पता चला कि वह जंगल की तरफ किसी अभियान के सिलसिले में चली गई है। कुमुद के बारे में मैंने तुझसे कुछ पूछा भी नहीं, पूछता भी क्या वह तो आधुनिकता और उत्तरआधुनिकता के विश्रृंखलित समय का उत्पाद हैकृक्लासिकल कविता की अग्रिम पंक्ति जैसी। यह जान लो मित्रा! कुमुद अब वापस नहीं आने वाली। मित्रा की बात सच थी।कृवास्तव में कुमुद वापस नहीं लौटी। संतोष ने उससे झूठ बोला था कि वह लौट आयेगी। ‘गोलियां किराये की कथा नहीं, खुद कथा होती हैं’ कुमुद संतोष के साथ थी। संतोष के साथ रहते हुए कुमुद उसकी अन्तश्चेतना को विश्लेषित करने के प्रयास में थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज के खतरनाक और उत्तरआधुनिक समय में संतोष ने सत्ता बदल के अप्रिय क्रान्तिकारी रास्ते का चुनाव क्यों किया? चाहता तो खुद को सत्ता के शिखर पर बैठा लेता दूसरे वामपंथियों की तरह किसी विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग का अगुआ हो जाता। किसी बड़े प्रकाशन से जुड़ कर विदेशी भाषा के प्रमुख रचनाओं का हिन्दी में प्रकाशन करवाता। ऐसा करता न करता किसी नौकरी करने वाली लड़की को अपनी क्रान्तिकारी छवि से मोह लेता। वह कमाती और खुद क्रान्ति की अनिवार्यता पर बहसें करता। उसके लिए तमाम ऐसे पूंजीमूल्यबोधी काम थे जिसे करते हुए वह वाममार्गी ताज पहन कर रूपयों के बिस्तरों पर थिरकता रहता। पर पता नहीं क्यों, संतोष उस रास्ते पर चल रहा है, जिसे कानून ही नहीं समाज भी बुरा मानता है। जो आज के समय का संभावना हीन रास्ता है। रूस की वाममार्गी सरकार के पतन ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है। आज का समय मर्यादापूर्ण तथा वैभवपूर्ण जिन्दगी जीने के लिए प्रतिरोध का नहीं अनुरोध का समय है। अनुचर व अनुगामी बनने का समय है। पर कुछ न कुछ तो है संतोष में, जो उसे औरों से अलग करता है, काम से, सोच से, और जीवन जीने की कलाओं से। आखिर है क्या उसमें? यही जानना चाहती है कुमुद। संतोष अच्छा आदमी होगा, यह तो पता था। पर इतना अच्छा आदमी होगा उसे यह पता नहीं था। उसके साथ रहते हुए कमुद को अधिक समय नहीं हुआ था फिर भी वह उसके रिश्तेां के सपनों में डूब जाया करती थी। वह किसे बताये कि संतोष की हर सांस से सपने झरते हैं, खुद को नियंत्रित किये हुए समाज बदल की चेतना वाले। एक बार तो गजब हो गया। कुमुद को क्या पता था कि ठोकर लग जायेगी, और वे दोनों एक दूसरे पर गिर जायेंगे। वह गिरना तो एकदम से जानबूझ कर गिरने माफिक था, एक दूसरे को लिपटने व लिपटाने वाला। दोनों क्षण भर के लिए आकाश और जमीन जैसे हो गये थे। ऊपर नीचे, अजीब सा दृश्य। वैसा तो फिल्मों में भी नहीं दिखाया जाता, एकदम प्राकृतिक। कुमुद को लगा कि संतोष की सांसें उसकी हैं और उसकी सांसें, संतोष की। कुमुद नहीं भूल पायी है अब तक। संतोष की गरम गरम सांसों में डूब जाने वाले पल को, वह पल जो आकस्मिक और अचानक घट गया था। पर वह समय एक दूसरे की सांसों में गोते लगाने का नहीं था। पुलिस उनका पीछा कर रही थी। पता नहीं कैसे उन लोगों के ठिकाने की खबर पुलिस को लग गई थी और पुलिस ने उन्हें घेर लिया था। बचने के लिए केवल एक ही रास्ता था, नदी वाला। सामने से घाघर नदी बहती थी और वे दोनों घाघर से महज कुछ मीटर दूर एक पहड़ी पर थे। यह वही पहड़ी थी जिस पर से वारेन हेस्टिंग्स के सिपाहियों ने विजयगढ़ किले पर हमला किया था। पहड़ी बहुत ऊबड़ खाबड़ थी। उस पर से कोई ढलान नहीं था एक दम से खड़ी थी पहड़ी। पहड़ी से नीचे उतर कर फिर घाघर पार करना कठिन काम था। कुमुद ने संतोष से कहा भी...कृ ‘तूं भागो यहां स,े मुझे छोड़ो, मेरा क्या है, अगर मैं पुलिस की पकड़ में आ भी गई तो का फरक पड़ेगा, कुछ भी फरक नहीं पड़ेेगा, अगर तूं पकड़ा गये तो तुम्हारा संगठन बिखर जायेगा।’ संतोष ने कुमुद की बात नहीं माना। कुमुद कोे देखते ही पुलिस गोली मार देती सो वह उसेे छोड़ कर भाग नहीं सकता था। संतोष जंगल के रास्तों को जानता था और यह भी कि पुलिस से घिर जाने के बाद खुद का बचाव कैसे किया जा सकता है। किसी तरह पहड़ी उतर जाना है। पुलिस के पास अतिरिक्त साहस नहीं, जो पहड़ी पार कर सामने से हमला करेे। पुलिस छिप कर ही हमला करेगी। संतोष के साथ कुमुद पहड़ी उतरने लगी। कभी पेट के बल, तो कभी उकड़ू हो कर। ऐसे ही पहड़ी से नीचे उतरा जा सकता था। तनेन हो कर उतरना चाहो तो माथा और घुटने फोड़ लो। सौ डेढ़ सौ फीट ऊॅची पहड़ी से उतरना आसान नहीं था। पसीने से तर बतर, संतोष कुमुद को देखता और साहस बंधाता। ‘बस थोड़ी और मिहनत करो, पहड़ी उतरते ही घाघर नदी है।’ कुमुद पसीने में डूबी, हांफती हुई, उसकी सारी कोमलता उड़नछू हो चुकी थी। चेहरा फक्क हो चुका था, इसी लिए संतोष उसकी हिम्मत बंधा रहा था। घाघर के किनारे पर पहुंच जाने के बाद संतोष के जान में जान आई। कुमुद को खुद पर यकीन हुआ कि संतोष उसे भी बचा सकता है। उन्हें सुनाई पड़ रहा था कि पुलिस के लोग पहड़ी के पीछे से लगातार फायरिंग कर रहे हैं। उसने घाघर की धारा देखा, वह शांन्त और स्थिर बह रही थी। उसके कल कल में शुभ संकेत थे, जो सूचित कर रहे थे....कृकृकृ ‘बच गये बच्चू।’ कुमुद घबड़ा रही थी, संतोष ने समझाया...कृ ‘अब घबड़ाने की बात नहीं, पुलिस इस तरफ किसी भी तरह से नहीं आ सकती। यह पहड़ी घाघर नदी का गोद लिया हुआ क्षेत्रा है? इस पहड़ी पर वे लोग ही आ सकते हैं, जो घाघर को सलाम करते हैं, घाघर को पूजते हैं, इसकी लहरों को चूमते हैं, दूसरे नहीं आ सकते इस तरफ चाहे पुलिस ही क्यों न हो।’ संतोष ने ललित ढंग से कुमुद को समझाया...कृ कुमुद तो पहले से ही घबराई हुई थी। इस तरह का दृश्य सिनेमा में भी उसने कभी नहीं देखा था। उस समय वह खुद उस दृश्य का एक हिस्सा थी, अद्भुत और भयानक। कोई भी गोली उन्हें छेद सकती थी। संतोष ने उस समय तंज कसा था. ‘ऐसे ही होती है मुठभेड़।’ ‘कुमुद! तुम मुठभेड़ के बारे में जानना चाहती थी नऽ, तो जान लो मुठभेड़ का वर्णन नहीं किया जा सकता। जो भी वर्णन होते हैं नऽ, उनमें धोखा पूर्ण शब्दजाल होते हैं, सचाई होती ही नहीं।’ ‘गोलियां करती क्या हैं? जान ही तो लेती हैं, हमलों की दुनिया में जान लेना ही बड़ा काम माना जाता है। यहां जान बचाने के लिए हितोपदेश देने वाला कोई नहीं होता वैसे भी गोलियां किराये की कथा नहीं होतीं, खुद कथा होती हैं’।’ कुमुद जान लेने और बचाने वाली गोलियों की कथा में उलझ गई। ‘कुमुद! अब हमें घाघर की शरण में जाना चाहिए’ संतोष ने कुमुद को सुझायाकृ कुमुद चौंक गई.... ‘क्या घाघर में हमें डूब जाना चाहिए, फिर पहड़ी से उतरने का का मतलब? ‘ऐसा नहीं है कुमुद। घाघर में डूबना नहीं है, घाघर को तैर कर पार करना होगा हमें’ ‘पर मैं तैरना नहीं जानती, घाघर में मैं कैसे कूद सकती हूॅं’ कुमुद ने अपना पक्ष रखा...कृ ‘कोई बात नहीं, तुझे मेरे सहारे घाघर पार करना होगा। तूं मुझे पकड़ लेना और पानी पर लेट जाना, महसूस करना कि तूं पानी के बिस्तरे पर लेटी हुई है, और पैरों का हिलना बन्द है, सांसे थमी हुई हैं, इसके अलावा कोई विकल्प नहीं, लहरों के संग लहर की तरह बहना है, समझ गई नऽ।’ संतोष ने कुमुद को समझाया...कृ और फिर घाघर नदी और उसका शान्त जल। कुमुद और संतोष दोनों पानी पर, हर ओर पानी ही पानी, जलप्रलय वाला काव्यमय दृश्य। संतोष तैरता हुआ और कुमुद संतोष को थामे, पैरों को हिलना रोके हुए, एक तरह का योग। तकरीबन सौ फीट के बाद घाघर का दूसरा किनारा था। जहां उन्हें पहुंचना था। किनारा उन दोनों को अपने तरीके से देख रहा था, शायद उसे भी उन पर हंसी आ रही थीकृकिनारे पूछ रहे थे....कृ ‘क्यों बच्चू! पानी में पानी की तरह, बहना जानते हो कि नहीं’ अगर बहना जानते हो तो क्या मन का बहना रोकना भी जानते हो?’ किनारे जाने क्या पूछ रहे थे, वे दोनों पानी नहीं थे, जो पानी की तरह बहते, दोनों पानी से अलग थे। संतोष तो एकदम अलग था। केवल कुमुद थी, जो संतोष के भीतर लहराती आग को देखना परखना चहती थी। उसे क्या पता था संयोग के बारे में कि संतोष की देह को नाजुक सरलता से छुआ जा सकता है, उसकी गंध सूंघी जा सकती है। एक मर्दाना गंध, कुमुद ने मान लिया था कि संतोष क्रान्तिकारी है, सो उसकी देहगंध अन्यों से अलग होगी। पर ऐसा नहीं था, उसकी गंध भी वही थी, मादक और उत्तेजक, दिल को छूने वाली। उसकी गंध में अचरज भी था। संतोष की देहगंध थोड़ी शर्मीली थी, लजाने वाली, वह लजा रही थी। कुमुद को लगा कि संतोष उसे मादा समझ रहा है तथा खुद को नर, इसी लिए शायद लजा रहा है। पानी में तैरते हुए, संतोष का एक हांथ कुमुद को पकड़े रहने में फसा हुआ था। एक ही हांथ के सहारे उसे तैरना था। तैरते समय कुमुद कभी बांए हो जाती तो कभी दांए। उसका संतुलन बिगड़ जाता और लगता कि डूब जायेगी। संतोष उसेे संभालता और फिर कस कर पकड़ लेता। कभी पैरों के सहारे पकड़ता, तो कभी हाथों के सहारे। पानी के भीतर देह किधर जाती, वर्जनाओं का उलंघन करती या अनुशासित रहती, कुछ भी पता नहीं चलता। तैरते समय तो एक ही लक्ष्य था, घाघर पार करना है। वैसे तैरते समय संतोष वर्जनाओं की सीमा पार भी कर सकता था, पर नहीं, ऐसा हुआ नहीं। उसकी दृढ़ता अचंभित करने वाली थी। बहरहाल, वे दोनों घाघर पार कर गये और पुलिस पहड़ी के पीछे लगातार फायरिंग करती रह गई। घाघर पार कर चुकने के बाद कुमुद को लगा कि वे कोई युद्ध जीत चुके हैं। सही मायनों में वह क्षण युद्ध जीतने के उत्सव वाला था, अब वे गोली की बारूदी भाषा से अलग खुद की भाषा थे जीवन को अनुकूलित किए रखने वाली भाषा। उस संकट से पार हो जाने के बाद, कुमुद सोचने लगी कि वह भाग रही हैं और पुलिस बन्दूकें ताने उसका पीछा कर रही है। फायरिंग करती, पछियाती, गोली अब लगी तब लगी, अजीब सा दृश्य? बन्दूकों के करतबों वाले दृश्यों के बारे में कल्पना तो की जा सकती है, पर सामना...कृसामना तो कत्तई नहीं, वह भी निहत्थे। कभी भी नहीं, कभी नहीं...कृ कुमुद अच्छी तरह से समझती है, संतोष के बारे में कि मुठभेड़ की उस विकट स्थिति में संतोष चाहता तो उसे छोड़ कर भाग सकता था, पर नहीं, उसने कुमुद को नहीं छोड़ा। उसेे साथ लेकर ही घाघर पार किया। सभी को अपनी जान की परवाह होती है। वह अपनी जान बचाने के लिए अकेले ही भाग सकता था पर नहीं, उसने कुमुद को नहीं छोड़ाकृनिष्चित ही वह औरों सेअलग है और अद्भुत भी। संकट की स्थितियों में अपने ख्याल आते ही हैं।कृ कुमुद ने मनीश के बारे में सोचा....कृ ‘मनीश भी अद्भुत है। उत्साहों से भरा हुआ। गाढ़ी संवेदनाओं से रंगा हुआ पर उसे जंगल की गोद नसीब नहीं। संतोष तो जंगल की गोद में रहते हुए हरियाया हुआ है, पत्तियों की तरह, एकदम हरा हरा, उसके विचार भी हरे हरे हैं, भले ही जंगल आजाद कराने के लिए जंगल का दंश झेल रहा है।’ कुमुद प्रफुल्लताओं में थी जिसे वह खुद पढ़ भी रही थी। ‘संतोष के साथ जुड़ कर वह संतेाष के विचारों का हरापन सोखने लगी थी। वह खुश थी, मनीश से अलग होना उसके लिए न तो नैतिकता का मुद्दा रह गया था और न ही अनैतिकता का। वैसे भी वह मन की शुचिता पर यकीन करती थी तन की नहीं। तन पर तो कब्जे किये जा सकते हैं पर मन पर नहीं। बस वह मनीश से अलग थी और कुछ नहीं। मनीश से अलगाव और संतोष से जुड़ाव, अलगाव व जुड़ाव के मानसिक द्वन्द्वों से वह दूर थी। द्वन्द्वों कोे लेकर, खुद को प्रताड़ित करने वाली, वह नहीं थी। कुमुद के लिए अलगाव और जुड़ाव अलग अलग पठारों की तरह नहीं थे, जिसे लेकर वह व्यथित होती, बस यह था कि अलग अलग छोर थे दोनों के। अलगाव में जैसे जुड़ाव, अदृश्य होता है, वैसे ही जुड़ाव में अलगाव भी अदश्ृष्य होता है। जुड़ाव तथा अलगाव तो महज मनः स्थितियां हैंकृसोचो तो अलगाव, सोचो तो जुड़ाव। नहीं तो क्या अलगाव और क्या जुड़ाव। उसने मनीश से झगड़ा तो किया नहीं है, जिससे परेशान हो। संतोष के साथ रहना उसका अपना चुनाव था और मनीश के साथ रहना भी उसका ही चुनाव था, किसी के द्वारा थोपा हुआ नहीं था। उसके दिल दिमाग में संतोष तथा मनीश के बाबत तुलना नहीं थी, वह किसी को तोल भी नहीं सकती। मनीश तथा संतोष दोनों अतुलनीय हैं, दोनों अद्भुत हैं, दोनों दृढ़ हैं। दोनों में एक बात की खासतौर से समानता है कि उनके लिए नारी तन सेक्स कमोडिटी नहीं है, सेक्स तो उनकी चेतना में कुदरती जरूरत के रूप में हो सकती है, विलासिता या मनोरंजन के रूप में नहीं। सो वे संबधों की उत्तरआधुनिक व्याख्याओं से ही नहीं हितोपदेशों वाली वर्जनाओं से भी अलग थे। दोनों की दुनिया लक्ष्यों पर केन्द्रित थी, दोनों समाजबदल के लिए प्रयास रत थे हालांकि दोनों के रास्ते समानधर्मा नहीं थे। ‘औरतें तथा जनप्रतिरोध, लगता है कथा आगे खुलेगी’ कुमुद संतोष के साथ जंगल में रहते हुए किसी चर्चित कहानी संग्रह में तब्दील होती जा रही थी। तीन चार महीने के अन्दर ही जंगल की कहानियों ने कुमुद के चित्त को अपना कथानक बना लिया था। उसे लगने लगा था कि जिस भद्र दुनिया को वह जानती है, जिसमें में वह पली बढ़ी है, उस दुनिया से जंगल वाली दुनिया का कोई रिश्ता नहीं। भूख और गरीबी के बीच जीवन जीने वाले लोग जिस आदर्श भद्रता के साथ जीवन जीने तथा जीते रहने के लिएअपने को अनुकूलित किये हुए हैं, असल में उसे ही भद्रता कहा जाना चाहिए न कि उसे जिसे वह जानती है। अद्भुत है, उनके जीवन जीने की कला, खुद पर नियंत्राण, बाजारवादी संस्कारों से अलग हां उनके जीवन जीने के तरीकों को कला ही कहना चाहिए। वह जंगली लोगों को देखती रह जाती है। उन लोगों को दिल में बिठा लेती है, किसी सधे कलाकार की तरह जो कल्पनाओं के सहारे कई किस्म के चित्रों को बना लिया करते हैं। तब उसे जान पड़ने लगता है कि वह जंगल की गोद में है, और जंगल का हरापन उसे भी आहिस्ता आहिस्ता हरा बना रहा है। नक्सल क्षंत्रा के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक सोचों के बारे में जानकारियां जुटाने के लिए कुमुद पढ़ाई के समय से ही योजनाएं बनाया करती थी। पर उसे इस कार्य के लिए पहले कभी उचित अवसर नहीं मिला। पहड़ियाटोला वाली विस्थापन मीटिंग के दिन ही उसने निश्चित कर लिया था कि अब वह नक्सली क्षेत्रा की जानकारी जुटाये बिना यहां से वापस नहीं लौटने वाली। पहड़ियाटोला में हर ओर यह बात पसरी हुई थी कि संतोष के सकारात्मक प्रतिरोध के कारण ही प्रशासन ने गॉव वालों को विस्थापित नहीं किया नहीं तो प्रशासन ने अब तक गॉव खाली करा लिया होता। तो यह संतोष है कौन? ‘आखिर वे कैसे लोग हैं जो वैचारिक प्रतिवद्धताओं के लिए अपने चित्तऔर चेतना को अपनी जान की जोखिम पर जागृत किये हुए हैं।’ ऐसे लोगों से मिलना, उनकी बातें सुनना अद्भुत होगा। इसी लिए वह पहड़ियाटोला में रूक गई थी और नक्सलियों के बारे में जानकारियां जुटाने लगी थी। जुटाई सारी जानकारियां बिना किसी योजना के कहानियां बनती जा रही थीं। ऐसी कहानियां जिसे कहानी की कलाओं से गढ़ना, संवारना तथा रचना नहीं था। वे कुदरती थीं। संतोष के साथ जुड़ना भी एक कहानी थी। किसी के लिए भी संतोष से जुड़ना आसान नहीं था। कुमुद ने गॉव वालों के हितों की हिफाजत के लिए संतोष के साथ मिल कर काम करने का लक्ष्य तय कर लिया था। गॉव वालों के साथ मिलकर गॉव वालों के जबरिया विस्थापन के खिलाफ जनतांत्रिक लड़ाई लड़ना है, ऐसा निर्णय कुमुद ने अचानक ही कर लिया था। इस लड़ाई के लिए किसी सधे कलाकार की तरह कुमुद ने खुद को बदल भी लिया था। हालांकि खुद को बदल लेना उसके लिए मुश्ष्किल था। क्योंकि वह कभी रंगीन सपनों में उड़ने वाली लड़की हुआ करती थी। उस समय उसके सपने भी किसिम किसम के थे। यह बनेगी वह बनेगी यानि उसे किसी न किसी दिन भद्र समाज के शिखर पर बैठना है। उसे क्या पता था कि उसे अपने सपनों को तोड़ना पड़ेेगा और गॉव वालों से जुड़ कर उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए काम करना होगा। गॉव वालों की तरह ही रहना होगा, उनकी लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाना होगा। पहड़ियाटोला में कुमुद रुक तो गई पर उस जैसी अजनबी लड़की का पहड़ियाटोला में रुकना वाम क्रान्तिकारियों के लिए खोज की बात थी। ‘कौन है वह लड़की?, यहां क्यों आई है?’ जैसे कई सवाल थे, जिसका उत्तर संतोष का हरावल दस्ता तलाश रहा था। वैसे यह बात संतोष के हरावलदस्ते को मालूम थी कि गॉव में विस्थापन के सवाल को ले कर विद्वानों तथा विचारकों की जो बैठक आयोजित की गई थी, उस दिन कुमुद भी गॉव में आई थी। बाद में मालूम हुआ था कि कुमुद प्रोफेसर आलोकनाथ की बेटी है और जंगल की भाषा के प्रति सकारात्मक विचार रखती है। पेड़ों की कोई टहनी टूटने पर वह कविता बन जाती है। आलोकनाथ भी समाजबदल वाले विचार के हैं, भले ही वे संसदीय व्यवस्था के जरिए समाज बदल के पक्षधर हैं, तो क्या हुआ? जंगल में रहते हुए कुमुद कभी कभी मनीश के साथ बिताये दिनों के जंगल में लौट आया करती थी। वह एक ऐसा जंगल था जिसे कुमद ने ही उगाया था। नहीं तो मनीश के पास तो बगिया तक नहीं थी। उसे लगता कि मनीश उससे सवाल पूछ रहा है, उसके ऊपर ताने मार रहा है, चरित्राहीन घोषित कर रहा है। वह गुनती तो क्या सचमुच संतोष के साथ जुड़ जाने से उसका चरित्रा विवादास्पद हो गया है? आखिर यह जो चरित्रा है, है क्या चीज? चरित्रा का मतलब नर और नारी के लिए अलग अलग, एक नर और एक नारी में सिमटा हुआ, मनःस्थितियों के विपरीत, मन अपवित्रात था तन पवित्रा, कैसे चलेगा? मनीश कुछ भी सोच सकता है। ‘नहीं, नहीं,ं चरित्रा तो धोखे से बिगड़ता है और उसने मनीश को धोखा नहीं दिया है‘ मनीश को यह तो समझना ही चाहिए, कि वह शुचितावादी नहीं है। वह जीवन को पवित्राता के दैहिक प्रयोगों का तिलिस्म नहीं मानती और न ही कभी मानेगी। मनीश को जो समझना बूझना है समझता रहे। वैसे भी मनीश सोलहवीं शतशब्दी का आदमी नहीं है। जंगल की तरफ तो कुमुद को जाना ही था। वह चली गई। उसने जीवन के बने बनाए सारे विचारों को तोड दिया है। उसे लगता है कि यह जो जीवन है कुदरती रूप से मुक्त है, उन्मुक्त न हो जाये इस लिए उस पर नियंत्राण रखना चाहिए। नियंत्राण भी मन को मना कर, राजी कर, दबा कर नहीं। कुमुद को साफ दिखता है कि यह जो समानता, भाई-चारा तथा अधिकार फधिकार की बातें हैं, सारी की सारी कागज पर हैं। आज भी समाज का बहुलांश असमानता व शोषण का दंश झेल रहा है। यह दंश सभी तरफ है, मैदान की तरफ कुछ कम तोे जंगल की तरफ बहुत अधिक। यही जंगल दंश वामउग्रवाद में तब्दील होता जा रहा है। सच मानो तो कुछ नहीं बदला है। समय, समय पर केवल हुकूमतें बदल जा रही हैं सिर्फ इतना ही। एक दिन कुमुद संतोष के साथ एक गॉव में गई थी जो उनके पड़ाव से सातआठ किलोमीटर दूर था। रास्ता पहाड़ी था। वहां पहाड़ियां आपस में गुत्थम गुत्था थीं, उन्हें देखना अद्भुत था। जान पड़ता था कि वे एक दूसरे को चूम रही हैं। एक पहड़ी उतरो तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती थी। उससे उतरते ही तीसरी खड़ी हो जाती थी। पहाड़ियां मानोरम किस्म का संवाद भी करतीं थीं। किसी कविता की तरह कविता की काव्यभाषा में ही...कृ ‘हे अजनबियों तूं कहां जा रहे हो?’ ‘समाज बदलने या खुद को बदलने?’ ‘क्या तूं खुद को जानते हो?’ ‘अगर ‘हां’ तो खुद को क्यों नहीं बदल लेते? ‘खुद को बदल लोगे तो समाज अपने आप बदल जायेगा।’ वैसे किसे नहीं पता कि पहाड़ियों को प्रकृति ने बनाया है, पर हम उन्हें प्रकृति का हिस्सा नहीं मानते हैं। वे खोदे और तोड़े जाने के लिए बने हैं हम ऐसा ही मानते व जानते हैं। उनका योगदान मात्रा इतना ही है कि वे तोडी जायें, ढोंके व गिट्टियों में तब्दील की जायें, फिर उसे बाजार में बेचा जाये। वे एक पहड़ी से समतल ढलान पर उतर जाते थे और दूसरी पहड़ी पर चढ़ने के लिए सोचते थे। फिर उन दोनों पहड़ियों के ढलान पर क्षण भर के लिए ही सही, उन्हें लगता कि वे जंगल की गोदी में हिल डुल रहे हैं या दूसरे शब्दों में पहाड़ियों के आलिंगन में हैं। वह अनुभूति उन्हें प्रकृति में विलयित कर देती एकदम प्रकृतिमय। वे पहड़ियों के मनोरमों को चूमते दुलारते आगे बढ़ते जाते। करीब एक घंटे के बाद वे उस गॉव में पहुंच गये जहां संतोष कुमुद को ले जाना चाहता था। वह गॉव भी जंगल के दूसरे गॉवों की तरह ही था। फूस और खपरैल के छाजनों वाला। माटी की दिवारों पर फूस के छाजन, पुराने जमाने के गुरुकुल की याद दिलाते, जिसे किताबों में पढ़ा जाता है पर, उस गॉव में पुराने जमाने वाले सन्यासी या गुरू नहीं थे। वहां किताबों वाले सन्यासियों से अलग दूसरे तरह के प्रकृतिसिद्ध सन्यासी निवसतेे थे। कुमुद को तो वहां कई तरह की समानतायें देखने में आईं जो उस गॉव वालों को किताबों वाले सन्यासियों से जोड़ती थीं। गॉव के लोग जीवन के बारे में सकारात्मक भाव रखने वाले लोग थे तथा खुद पर कठिन दर्जे तक का नियंत्राण भी। पर वे पहले के सन्यासियों की तरह प्रचारक नहीं थे। वे कार्मिक थे तथा जीवन जीने के लिए प्रकृतिमूलक उत्सवों को रच भी लिया करते थे। वे प्रायोजित उत्सवों से दूर रहने वाले लोग थे। उन्हें भद्रलोक के लोग नहीं जानते थे और जो जानते भी थे, वे उन्हें हेय समझते थे। पर वे इसे अपना गुण समझते थे। संतोष कुमुद को किसी आदिवासी के घर ले गया। वह घर भी गॉव के दूसरे घरों की तरह ही था। माटी की दिवारों का एक कमरा, उस पर फूस का छाजन। दिवारें लिपी पुतीं, चिकनी। घर के सामने लकड़ी की सूखी झाड़ियों का एक घेरा जिस पर सेम की फलियां, लहराती, इठलाती हरी, हरी पत्तियां...कृमानो सेम ने सूखी झाड़ियों को अपनी गोदी में छिपा लिया हो। सेम की फलियां तो किसी सिद्ध कवि की गुत्थम गुत्था लोक कविताओं की तरह जान पड़ रही थीं। उन्हें देख कर कुमुद उनमें डूब डूब गई थी।कृअद्भुत थी भी उनकी संयुक्तता। घर के सामने टटरेनुमा एक दरवाजा था। जो बांस की फराटियों से बनाया गया था। उसके आर पार देखना मुिश्ष्कल था। टटरे वाले दरवाजे से ही संतोष ने गोहार लगाया.फिर एक औरत टटरे के पास आई और उसने टटरा खोला..कृ ‘अरे आप लोगन! एतना सबेरे काहे बदे आये, हमके बुलाय लिये होते’ आइए, आइए, कहते हुए वह घर में चली गई। घर भी कितना? बाहर एक कमरा और भीतर, उसी से जुड़ा एक दूसरा बरामदा। कुमुद व संतोष बरामदे में बैठे, उनके बैठने के लिए उसने खाद वाली एक बोरी झाड़ फूंक कर बिछा दिया। ‘बैठिए’ उसने धीरे से कहा...कृ उसकी बोल बहुत मीठी थी।कृ ‘केके खोजत हई आप लोगन’ उसने पूछाकृ उसने अनुमान किया होगा कि हमलोग कोई अधिकारी वगैरह हैं, जो जांच के सिलसिले में आये होंगे। मैने देखा कि वह औरत देखने मे तो स्वस्थ और आकर्षक दीख रही है पर नहींकृ उसके चेहरे पर आकर्षक होने के चिन्ह नहीं थे। वहां उदासी थी तथा निराशा भी। वह थकी थकी जान पड़ रही थी। ‘हमलोग ऐसे ही चले आये, कोई काम नहीं है, हमलोग एक संस्था से हैं।कृई शंकर का घर है नऽ’ उस महिला से पूछा संतोष ने। ‘हं हं ई ओन्हई का घर हैऽ, हम ओनकर मेहरारू हई, का कउनो काम बा ओनसे?’ महिला ने संतोष से पूछा...कृ ‘नाही कउनो काम नाही है, हमलोग आपै से मिलने आये हैं’ फिर संतोष ने अपना तथा मेरा परिचय उस महिला से कराया फिर उससे पूछा...कृ ‘आप थाने गईं थीं नऽ’ ‘हां गई थी, दारोगा बोल रहा था कि वह ओनकर (अपने पति) चालान करेगा, थाने से नाहीं छोड़ेगा, भरसक ओनकर चालान भी कर दिया होगाकृ’ महिला इतना बता कर रुआंसा हो गई। उसके रुआंसा होने का कारण हमलोगों का उससे परिचय न होना भी हो सकता है। हो सकता है उसे हमलोगों पर संदेह हुआ हो, जाने कौन लोग हैं? और यहां क्यों आये हैं’ फिर भी उस महिला ने हमलोगों से अजनबीपन का व्यवहार नहीं किया। ‘अभी आती हूॅं’ हमलोगों से बोल कर महिला रसोई की तरफ चली गई, जो पास में ही थी। रसोई भी क्या थी, पांच बाई छह फीट का एक घेरा, जो टटरों वाला था। उसके भीतर माटी का एकमुंहा चूल्हा था, जो लिपा पुता हुआ था। वह चूल्हे में आग जलाने की कोशिश करने लगी। संतोष ने चाय बनाने से उसे रोका भी, पर वह कहां मानने वाली थी.उसने कहा...कृ ‘बाउजी कुछू नाहीं कर रहे है,ं चाह बनाय रहे है, अउर घर में है भी का। अगर आप लोग थोड़ा रुकें तो तरकारी भात भी बनाय देते हैं।कृतरकारी तो हमरे पास है, बगल से थोड़ा चाउर मांग लाते हैं’ संतोष ने उस महिला को रोका...कृ ‘आप ई सब काहे कर रही हैं, हमलोग कलेवा (नाष्ता) करके आये हैं, अभी कुछ खाना नाही है।’ ‘अरे साहब! ई कइसे होगा’ कहते हुए उसने आग जला दी और चूल्हे पर अल्युमूनियम की केटली चढ़ा दिया फिर चाय बनाने का सारा उपक्रम यानि चीनी और चाय की पत्ती। थोड़ी देर में स्टील की गिलासों में काली चाय हम लोगों के सामने थी। काली चाय भी मजेदार स्वाद वाली होती है, ऐसा ही हमलोगों को लगा। चाय पीते हुए ही संतोष ने महिला से पूछा...कृ ‘बच्चे कहां हैं?’ ‘ननिअउरे भेज दिये हैं साहेब! इहाैं तो गड़बड़ै है, जाने कब थाना आ जाये अउर मारपीट करने लगे। हमार नूनू (पिता) आये थे वही बच्चों को लिवा गये। बोल रहे थे तूंहो चलो, ए गॉव में का रखा है, इहाैं मर मजूरी करना है, अउर उहाैं भी, जब पाहुन जेहल चले गये है, तब तूं का करेगी इहां रुक कर। पर हम काहे जाते ओनके संघे साहेब। ई हमार घर है, ईहंय मरय अउर जीयय के है, हम ऊहां काहे जांयें साहब? सो हम नाहीं गये। हमय एकय बाती कऽ तकलीफ है साहेब, हमैं पुलिस वाले काहे छोड़ दिये, हमहूॅं के पकड़ लिए होते, अउर जेहल भेज देते तो ठीक था। हम तो दारोगा से बोले थे... ‘साहब हमहूॅं के ले चलो थाने, हमहूॅं नक्सली हैं, हमरे ईहां नक्सली आते हैं, अउर हम ओनकर काम भी करते हैं पर साहेब पुलिस वाले खाली हमरे मन्सेधू को पकड़ि ले गये, अउर ओन्है खूब मारे पीटे हैं। ओनसे पुलिस वाले कबूलवाय रहे थे, बार बार पूछ रहे थे, नक्सलियों का पता ठेकाना बताओ, पर हमरे मन्सेधू के का मालूम है नक्सलियन के बारे में साहेब! अब इहय सोचो साहेब! आप लोग हमरे टोला में आये हो, हमरे टोला वालों को आप लोगन के बारे में का मालूम है कि कहां रहते हैं आप लोग, अउर का करते हैं। का हैं आप लोग, अधिकारी के नक्सली, आपय बताओ साहेब! कोई के का मालूम है आप लोगन के बारे में? नाहीं नऽ। आइसहीं हमलोग नक्सलियन के बारे में का जानते हैं, उहौ लोग तो मानुषै के तरह देखाते हैं। पियार से बोलते बतियाते हैं, ओमे से के मार काट करता है हम का बूझेंगे साहब!’ ‘तनिक सोचीं साहेब! काल्हु अगर पुलिस हमैं पकड़ि ले, अउर पूछय कि तोहरे ईहां कउन आया था? उसका पता ठेकाना बताओ तो हम का बतायेंगे साहेब आप लोगन के बारे में। हमलोग आपके बारे में का बताय सकते हैं, इहय बोलेंगे नऽ कि एक साहेब अउर सहबाइन आये थे अउर अपने को संसथा वाला बोल रहे थे, बस ईहय नऽ। इहौ बताय सकते हैं साहेब के ऊ देखने में साहेब लगते थे, मोटे तगड़े अउर गोर गार थे। अउर का बोलेंगे साहेब?’ ‘तोहार नाम का है?’ पूछा संतोष ने ‘हमार नाउं डंगरी है साहेब’ उसने बताया‘ ‘अच्छा घबराओ नाहीं, हम लोग तोहरे मन्सेधू को जल्दी ही जेहल से निकलवाय देेंगे। ओनकर जमानत हो जायेगी। हमारे आदमी कचहरी जांयेगे अउर जमानत करायेंगे। तोहके घबराये का काम नाहीं है। हमार बात बूझ रही हो डंगरी।’ संतोष ने डंगरी को आश्वस्त किया पर डंगरी तो डंगरी थी। जाने कितने आश्वासनों को जमीन पर गिरते भहराते उसने देखा था फिर वह भला संतोष द्वारा दिए गये आश्वासन पर कैसे यकीन कर लेती। ‘ओनकर जमानत कइसे होइ जाई साहेब, नक्सलियन कऽ जमानत कहां होती है, ओन्है तऽ गोली मारी जाती है, आप हमैं काहे फुसलाय रहे हैं?’ डंगरी ने संतोष को उलाहा...कृ ‘नाही, नाही, ऐसा नाही है। हमार संगठन है, तोहरे मन्सेधू के साथ। हमारा संगठन तोहरे मन्सेधू की जमानत जरूर कराएगा, तूं घबराओ नाही’ संतोष ने दुबारा डंगरी को आश्वस्त किया, डंगरी चुप हो गई जो उसकी विशेषता थी। आमतौर पर जंगल में बसने वाले लोग प्रतिवाद नहीं करते। वे किसी की भी बात को सहजता से स्वीकार लेते हैं। डंगरी ने भी वैसा ही किया। हमलोग करीब ग्यारह बजे दिन के आस पास डंगरी के घर पहुंचे थे। अधिक देर तक वहां रूका नहीं जा सकता था। संतोष को एक दूसरे गॉव भी जाना था। उसने डंगरी को एक हजार रुपया दिया, पर उसने रुपया लेने से इनकार किया। ‘काहे के लिए रुपया दे रहे हैं साहेब!’ डंगरी ने संतोष से पूछा। ‘बस ऐसे ही, इसे मदत समझ लो। कल तेरे पास चाउर भी चला आएगा। हमारा एक साथी चाउर लेकर कल तोहरे पास आएगा। तोहैं कउनो परकार की परेष्शानी हो तो तूं हमारे साथियों को बता सकती हो। हम लोग तोहार हर तरह की मदत करने के लिए तैयार हैं।’ ‘नाही साहेब! इसे हम नाही ले सकते, हम गरीब जरूर हैं पर भीख मांगने वाले नाही हैं। हमैं भगवान ने दुइ ठे हाथ दिया है, हम कमांएगे अउर खांएगे। भीख मांग कर हम नाही खा सकते साहेब। कोई जानेगा तऽ इहै बूझेगा कि हमार आपसेे लसपुस है, ई थोड़ै बूझेगा कि आप हमार मदत कर रहे हैं। सो हम रुपया नाही लेंगे साहेब’ डंगरी ने हाथ में लिया हुआ रुपया सतोष को लौटा दिया, पर संतोष भी कम नहीं था....कृ ‘अरे एमें का है? एक भाई अपनी बहिन की मदत नाहीं करेगा तो कौन करेगा। हमैं आपन भाई समझो, तोहैं हमार कसम है, ई रुपया तऽ तोहैं रखना ही होगा। फिर तो डंगरी के आंगन का दृश्य ही बदल गया। डंगरी के विलापों से कुमुद को लगा कि रो पड़ेगी किसी तरह उसने खुद को रोका फिर भी ऑसू तो छलक ही गये, जिन्हें रोका नहीं जा सकता था। डंगरी को समझा-बुझा कर संतोष ने उसे रुपया दे दिया फिर हमलोग उसके घर से निकले। पर टोले से निकलना आसान नहीं था। शायद टोले वालों को संतोष के बारे में खबर हो चुकी थी, फिर क्या था करीब बीसों लोग डंगरी के घर के सामने.कृ ‘साहेब हमरे ईहां चाह पी लीजिए फिर जाइएगा’ ‘साहेब हमरे ईहां खाना खा लीजिए फिर जाइएगा’ जितने लोग उतनी दांवतें, किसी के यहां चाय पीने के लिए तो किसी के यहां खाना खाने के लिए। संतोष ने सभी को आश्वस्त किया कि वह जल्दी ही टोले में आएगा। बारी बारी से सभी के यहां रुकेगा, किसी के यहां खाना तो किसी के यहां नाश्ता करेगा, पर आज जल्दी है, जाने दीजिए। फिर कभी हम लोग आपके गॉव में आयेंगे जरूर। टोले वालों ने किसी तरह हमें छोड़ा। टोले वालों के प्यार ने कुमुद को सोचने पर विवश कर दिया। वहां कोई बनावट नहीं थी, वहां सारा कुछ खुला खुला था। पहले कभी कुमुद ने सुना था, गरीबों के यहां दिल होता है, वह वही दिल वहां देख रही थी। मन में मैल नहीं, सोच में सैतानी नहीं, बात में बनावट नहीं, तो ये हैं वन के लोग, वन की तरह, मन से भी हरियाये हुए, अपने जीवन का हरापन बांटते हुए, जीना है तो वन के साथ, मरना है तो वन के साथ। कुमुद की सोच कविता बन गई ‘वन हैं तभी जीवन है’। संतोष भी कम नहीं, लोगों के दिलों को अपना बना लेने वाला। कोई ऐसे ही लोगों के दिलों को अपना नहीं बना लेता। कुमुद की मादक ऑखें संतोष की तरफ अचानक घूम गईं। संतोष स्थिर था, एकदम से गंभीर, उसके चेहरे पर नेताओं वाली झूठी गरिमा नहीं थी। उसके माथे पर लोगों के प्रति कुदरती समर्पण का भाव था, लोकचेतना वाला, गढ़ा हुआ नहीं। कुमुद मोहित हो गई संतोष के जन प्रतिनिधित्व पर, जन प्रतिनिधि तो ऐसा ही होना चाहिए। कुमुद के मन में आया कि संतोष की प्रशंसा उसके सामने ही करे, पर नहीं प्रशंसा तो शोषकों ेंका गुणधर्म होता है, प्रशंसा से संतोष चिढ़ जायेगा और मेरे बारे में जाने का सोचने गुनने लगे। जंगल में रहने के लिए संतोष ने खुद को जंगल की तरह बना लिया है ऐसे ही नहीं बन जाता कोई जंगल। नाम या प्रशंसा से उसका क्या मतलब, ऐसे लोकप्र्रतिनिधियों का मान सम्मान वाले संबोधनों से कुछ मतलब होता भी नहीं। कई तरह के मनोभावों के साथ कुमुद गॉव से बाहर निकली, उन भावों में कुछ सवाल भी थे।कृ उस टोले के बहुत सारे लोग संतोष को पहचान गये, पर डंगरी ने संतोष को नहीं पहचाना। औरतें और जनप्रतिरोध! असंभव सा है लगता है यह कथा आगे खुलेगी, इसी लिए शायद डंगरी ने संतोष को नहीं पहचाना अगर वह प्रतिरोधी चित्तवाली होती तो पहचान लेती संतोष को। ‘प्रकृति की प्रकृति कैसे गढ़ सकती है अपनी प्रतिकृति?’ पहड़ियाटोला से शंकर के गॉव तक जाने में कुमुद थक चुकी थी। यात्रा भी पहाड़ी वाली थी। उसके पैर दुखने लगे थे। शंकर के गॉव से कुछ दूर आगे चल कर कुमुद छायेदार महुआ के पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठ गई। पेड़ की छाया के नीचे चौड़ा सा पत्थर था, वह जमीन छेद कर बाहर निकला हुआ जान पड़ रहा था। ‘थक गई हो का?’ संतोष ने कुमुद से पूछा ‘हां थक तो गई ही हूॅं, इतना दूर कभी पैदल नहीं चली, बिना सुस्ताये एक कदम भी मैं नहीं चल पाऊंगी। यह तो अच्छा हुआ कि डंगरी के घर पर सुस्ताने का मौका मिल गया था।’ ‘कुछ देर बैठ जाओ संतोेेश्ष! फिर चलते हैं, थोड़ा आराम कर लेते हैं’ कुमुद ने कहाकृ ‘अच्छा है, मैं भी बैठ जाता हूॅ।कृमैं जानता था कि तूं पैदल नहीं चल सकती। इतना ही नहीं, मैं यह भी जानता हूॅं कि जंगल में तूं रह भी नहीं सकती। जंगल की गोदी में खुशियां पीना सबके वश का नहीं। मुझे पता है कि हमलोगों पर लिखी कहानियां पढ़ने पर अच्छी लगती हैं। जीवन जीने के हमारे तरीकों पर बौद्धिक बहसें भी खूब खूब होती हैं। हमारे जीवन जीने के तरीकों पर होने वाली बहसों की कमाई से बहुत सारे बौद्धिकों की रोजी रोटी चलती है, पर हमारे तरह का जीवन कोई जीना नहीं चाहता। तूने जाने कैसे हमारे साथ रहने और साथ चलने का फैसला लिया है। चलो आराम कर लो, फिर चलते हैं। अब बहुत दूर नहीं जाना है, सामने वाला जो गॉव दिख रहा है नऽ, उसके ठीक बाद वाले गॉव तक हमें चलना है।’ ‘अच्छा संतोष! एक बात पूछूं तूं बुरा तो नहीं मानोगे’ ‘पूछो नऽ, मैं जानता हूॅं कि तूं कोई भी ऐसी बात नहीं पूछेगी, जो बुरा मानने वाली हो। पूछो क्या पूछ रही हो?’ ‘तुझे डंगरी ने नहीं पहचाना, जबकि टोले वाले पहचानते थे, ऐसा काहे? पूछा कुमुद नेकृ ‘अरे यह कौन सी बात है, टोले के बहुत सारे लाग मुझे नहीं पहचानते, इसमें अचरज की क्या बात है।’ संतोष ने जबाब दिया ‘अचरज है, तभी तो पूछ रही हूॅं। कहीं तुम्हारा संगठन भी महिलाओं के प्रति वही पुरुषवादी रूख तो नहीं रखता जो राजनीतिक संगठन वाले रखते हैं और महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानते हैं। साफ साफ बताओ कि पुरुषवादी सोच के कारण महिला और पुरुष में जो लिंग भेद है, वह तुम्हारे संगठन में तो नहीं?’ संतोष चौंक गया, क्या पूछ रही है कुमुद? संतोष ने उसे समझाया... ‘नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। हमारे संगठन में लिंग भेद नहीं है, पर तूं तो जानती हो कि हमारा जो रास्ता है, उस रास्ते पर चलने के लिए महिलांए शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होतीं, सो उन्हें हरावल दस्ते में नहीं लिया जाता।’ ‘एक और सवाल...तुम्हारे संगठन में कोई महिला है कि नहीं’ पूछा कुमुद ने ‘नहीं, कोई महिला हमारे हरावल दस्ते में नहीं है पर हरावल दस्ते से बाहर कई महिलायें हैं जो हमारे संगठन की मदत करती रहती हैं। अब यह नहीं पूछना कि वे हमारी मदत कैसे करती हैं, और कहां रहती हैं तथा क्या करती हैं?’ कुमुद खामोश हो गई। उसे लगा कि संतोष उसे संगठन के हरावल दस्ते से बाहर ही रखेगा। अभी तो तय भी नहीं किया गया है कि उसे संगठन में रखा जायेगा कि नहीं। संगठन में उसे रखे जाने का निर्णय केन्द्रीय कमेटी करेगी। अकेले संतोष कुछ नहीं कर सकता। अगर सारी स्थितियां यथावत रहीं तब अगले महीने केन्द्रीय कमेटी की बैठक होनी है। कुमुद संतोष के संगठन के बारे में कुछ कुछ जानने लगी है। ठीक है संतोष संगठन का मुखिया है, पर उसके पास विशेषाधिकार जैसे अधिकार नहीं हैं, न ही वीटो का अधिकार है, जिससे कमेटी के फैसलों को रद्द करवा सके या मनवा ले। कुमुद संगठन में अपने रखे जाने के बारे में जानना चाहती थी कि संतोष का निर्णय क्या है? क्या वह उसे संगठन में रखे जाने का प्रस्ताव देगा? उसने संतोष से पूछाकृ ‘मेरे बारे में तुमने क्या सोचा, क्या मुझे संगठन में रखा जा सकता है?’ संतोष जानता था कि संगठन में रखे जाने के बारे में कुमुद पूछेगी सो कुमुद को क्या बताना है, संतोष ने विचार कर लिया था। ‘अभी कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुझे संगठन में रखा जा सकता है। संगठन में उन्हें तो लिया जा सकता है जो संगठन के कार्यों में मौके गर मौके योगदान देते रहते हैं। जिनके कारण संगठन गतिशील होता रहा है जो पीड़ित तथा प्रताड़ित हैं। व्यवहार में वे संगठन के वसूलों के काफी करीब होते हैं, वे अपने वर्गसमूह के दर्द को समझते ही नहीं, महसूसते भी हैंकृ। तुझे तो शायद संगठन में न शामिल किया जाये क्योंकि तुम संगठन में अपनी कोरी भावुकता के कारण शामिल होना चाह रही हो। तूं किसी भी तरह से प्रताड़ित व शोषित भी नहीं हो। भावुकता से संगठन के इन्कलाबी कामों को नहीं किया जा सकता। हां कुछ समय तक तो इन्कलाबी बनने का प्रदर्शन किया जा सकता है, पर लम्बे समय तक नहीं। संगठन के साथ कदम मिला कर वही चल सकता है, जो सत्ता प्रबंधनसे चोटिल हो, घायल हो। समझ लो उसके भीतर जलती हुई आग हो तथा आग में जलने की हिम्मत भी होे। ऐसा आदमी ही संगठन में शामिल हो सकता है।’ कुमुद को सन्देह था कि उसे संगठन में शामिल नहीं किया जायेगा। उसे बाहरी तथा उत्पीड़क वर्ग का मान लिया जायेगा। वह शोषित व दमित नहीं है। पर वह भी कम नहीं थी। उसे संगठन में शामिल होना ही था, भले ही उसे कठिन से कठिन और अव्यवहारिक परीक्षा देनी पड़े। कुमुद यह भी जानती थी कि दूसरे वर्गसमूह के लोगों को संगठन में तभी जगह मिलती है जब उन्हें उनके वर्गसमूह से निकाल दिया गया होता है और पुलिस भी उन्हें समाज का दुश्मन प्रमाणित कर तलाश रही होती है। कुमुद के लिए दोनों बातें अनुकूल नहीं थी। उसे न तो उसके वर्गसमूह से अलग थलग किया गया था और न ही उसे पुलिस तलाश रही थी। वह तो स्वविवेक से संतोषके साथ जुड़ना चाह रही थी। कुमुद को खुद पर यकीन था। संतोष का पता ठिकाना मालूम कर जब वह संतोष से जुड़ सकती है फिर संगठन में शामिल होना कौन बड़ा काम है? वह संगठन में शामिल हो कर रहेगी। संतोष का किसी तरह पता लगाकर आज वह संतोष के साथ है। कुमुद ने अपने डैड से बोल तो दिया था कि उसे टोले में ही रहना है, पर टोले में रह कर क्या करना है, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। गॉव में कोई भी ऐसा नहीं था जो संतोष का पता बताता। लोग साफ इनकार कर देते कि वे किसी संतोष को नहीं जानते। दो दिन तक संतोष के बारे में वह लगातार पता करती रह गई थी, पर उसकी सारी कोशिश बेकार... संतोष के बारे में कुछ भी पता नहीं चला। कुछ दिनों बाद किसी तरह से गॉव की एक महिला ने कुमुद को संतोष तक पहुंचने का रास्ता बताया। उक्त महिला से कुमुद की अतरंगता काम कर गई। उस महिला को कुमुद ने आश्वस्त किया था कि वह किसी को उसके बारे में नहीं बताएगी। वैसे उक्त महिला संतोष के बारे में जानती थी पर उसने बहाना बनाया कि वह नहीं जानती। वह सिर्फ इतना जानती है कि उसके टोले में एक आदमी है जो खाने पीने का सामान जंगल की तरफ कहीं अन्धेरे में पहुंचाया करता है। उसे शक है कि वह वहीं जाता होगा जहां उग्रवादी अपना डेरा जमाये रहते हैं। एक दिन उक्त महिला ने कुमुद को बताया....कृकृ ‘बहिन जी! तूं उसी आदमी का पीछा करो तो शायद गुरू जी का पता चल जाये’ ‘कौन गुरू जी’ पूछा कुमुद ने ‘अरे अउर कौन? वही गुरूजी जेनसे तूं मिलना चाह रही हो। जेके संतोष जी बोल रही हो। उन्हें ही तो हमरे टोले के मरद लोग गुरूजी बोलते हैं। ओनके अलावा अउर इहां गरीबन के बारे में गुनने वाला कौन है।’ महिला ने मुस्कराते हुए कुमुद का बताया... कृ कुमुद को अपनी वाकपटुता पर यकीन था। वह समझती थी कि किसी से भी अपने अनुकूल उत्तरों को निकलवा लेगी पर उक्त महिला से अनुकूल उत्तरों को निकलवाना कुमुद के लिए काफी मुश्किल था। उसे बहुत परेशानी हुई। पहले तो कुमद ने उससे दोस्ती किया, उसे दोस्ती करना ही था। टोले के लोग वैसे ही टोले में आने वाले हर बाहरी पर सन्देह किया करते थे। उन्हें पुलिस का जासूस माना करते थे पर कुमुद के साथ ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि वह टोले वालों से जुड़े संगठनों के लोगों के द्वारा बुलायी गई थी। सो ऐसा सन्देह तो टोले वालों को नहीं था। उक्त महिला भी कुछ खुली खुली सी थी। टोले की दूसरी महिलाओं की तरह अपने में गोते लगाने वाली नहीं थी। कुमुद का टोले में रूकना उसे बहुत बहुत अच्छा लगा था और वही कुमुद को रहने के लिए अपने घर ले गई थी। टोले की दूसरी महिलाओं से उसने साफ साफ बोल दिया था... कृकृ ‘बहिन जी हमरे घरे रहेंगी, हमरे साथे।’ दूसरी महिलाओं को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। आपत्ति होती भी क्यों, कुमुद तो पूरे टोले की मेहमान थी। तो इस तरह कुमुद पहड़ियाटोला का नागरिक बन गई थी। कुमुद को अपनी नागरिकता संभाल कर रखना था, कुमुद इसे जानती थी। कुमुद को मालूम था कि पहड़ियाटोला सामान्य टोलों की तरह नहीं है। इस टोले का चरित्रा बदल गया है। होता भी ऐसा ही है। एक तरफ हजारों साल के रीति रिवाज और परंपरायें, उन्हीं के बीच यातनांयें और शोषण, दूसरी ओर नई किस्म की समाज बदल वाली राजनीति, उन्हें नया मनुष्य बनाने के प्रयास, मौलिक अधिकारों से लैश एक नये आदमी का उत्पादन। यथास्थिति तथा समाज बदल जैसी दो विपरीत वैचारिक धाराओं के बीच पहड़ियाटोला का मानसिक रूप से बदल जाना सहज था। सो यहां बहुत ही सावधानी से रहना होगा, एक छोटी सी गलती भी उसके लिए नुकसानदेह हो सकती है। सो कुमुद सावधान थी और सोच समझ कर बोलती थी। उक्त महिला उसके लिए काफी सहयोगी साबित हुई। उसे अंतरंग बनाने के लिए कुमुद वर्जनाओं के पार तक जाकर बदल गई। कुमुद जानती थी उक्त महिला को अंतरंग बनाए बिना वह संतोष के बारे में कुछ भी नहीं जान सकती सो कुमद ने उसे अंतरंग बनाने का निर्णय लिया अंतरंगता में वैसे भी कुछ गोपन नहीं रहता। वही हुआ। रात में कुमुद उसके साथ ही सोती और उक्त महिला का पति आंगन के बाहर वाले बारामदे मंे सोता। उसकी सास नहीं थी, और ससुर की मृत्यु दो साल पहले हो चुकी थी। उक्त महिला काफी तेज थी। बातों को समझती थी। रात में तरह तरह की दोनों बातें करतीं, कभी कुछ तो कभी कुछ। कुमुद बातों के सहारे उसे देह तक ले जाती। देह तक जाते जाते कुछ ही देर में उक्त महिला देह की भाषा बोलने लगती। कुमुद तो यही चाहती थी। कुमुद जानती थी कि देह भाषा के व्याकरण में कुछ भी गुप्त और सुस्त नहीं रह पाता। एक दिन उक्त महिला कुमुद की देह के व्याकरण में उलझ गई, देह तो औरत की होती है, पर उसे पढ़ते ‘नर’ हैं, नारियां तो जानती भी नहीं कि उनकी देह से मादक किरणें फूटती हैं। पर ऐसा नहीं था, उक्त महिला रात में सोते समय कुमद की देह किसी नर की तरह ही पढने लगी, फिर उसने कुमुद की देह से पूछा...कृकृ‘पचीस के आर पार तो होंगी ही बहिन जी आप! बाल बुतरू भी होंगे’ कुमुद थी भी पूरी औरत, देह और दिमाग दोनों से भरी हुई।कृ ‘बहिन जी तोहार मरद का करते हैं?’ उक्त महिला का सवाल कई अर्थों वाला था, यानि मरद होगा तभी तो बाल बुतरू भी होंगे, एक सवाल और दो उत्तर। कुमुद असमंजस में पड़ गई। का बताये, कैसे बताये कि वह शादीष्शुदा भी है, और नहीं भी है। वह शादी करे भी तो क्यों करे? कई तरह की बातें कुमुद के साथ जुड़ी थीं पर वह कैसे बताये उक्त महिला को। और वह जानेगी भी क्या कि आज के जटिल समय में औरतें शादी के चक्कर में नहीं फंसतीं और न ही बाल बुतरु जनमाने के चक्कर में ही। उक्त महिला तो सोच भी नहीं सकती कि कोई महिला देह के करतबों में गोता लगा ले वह भी बिना शादी ब्याह के। कुमुद को क्या पता था कि उसे ऐसे सवालों से दो चार होना होगा जो उसके लिए किसी काम के नहीं हैं। ऐसे सवाल तो पिछड़े दिल दिमाग वालों के हैं।कृ किसी तरह कुमुद ने उक्त महिला को बताया...कृ ‘उसकी शादी नहीं हुई है, और वह शादी करेगी भी नहीं’ ‘का बोल रही हैं बहिन जी! बिआह नाही हुआ है, अउर बिआहो नाही करंेगी। ऐसा कैसे हो सकता है। तोहार देह तो बोल रही है कि बिआह हुआ है, फेर तोहरे देहीं पर मरद के छूने, चाटने की छाप चमक रही है। हम पढ़े लिखे तो नाही हैं बहिन जी, पर औरतन की देही पर मरदन के, चूमै, चाटे के छापे को पढ़ लेते हैं। मरदन की छापौ तऽ गजब होती है बहिन जी! चमकती रहती है देहिंया पर, हमसे काहे छिपा रही हैं बहिन जी! ‘नहीं नहीं, मेरी शादी नहीं हुई है’ कुमुद ने अपनी बात पर जोर दियाकृ ‘हम कैसे मान लें बहिन जी! ऐसा हो ही नाहीं सकता, बिना बिआहे पेट का मास नाही मोटाता है, ऑखें झउंआती नाही हैं, अउर नटइया की राग भी तो नाहीं फटती है बहिन जी। हम गॉव के हैं तो का हुआ, पर हम बूझते हैं कि बिना बिआह के देह नाहीं किलकती, बसुरिहा बोली नाही होती। अउर जो आपकी चाल है नऽ, वह भी गदराई नाहीं होती।’ ‘आप झूठ काहे बोल रही हैं बहिन जी! सच सच बताइए नऽ’ ‘हम बतायें बहिन जी आपको, हम बाल बुतरू जनमाने का काम अच्छी तरह से जानते हैं। वो जो सरकारी दाई होती हैं नऽ, वो हमैं खोज कर बुतरू जनमाने के लिए ले जाती है। कउनो मेहरारू के देखि के ही हम बताय सकते हैं कि ऊ मेहरारू मरद के संघे रही है, आ नाही।कृआप सच सच बताओ बहिन जी! अपने बारे में हम कउनो पराया थोड़ै हैं।’ कुमुद परेशान वह कैसे समझाये उस महिला को, कि वह कुंआरी नहीं है। कुमुद के लिए पुरुष संपर्क वाली बातें खुली थी। वह पुरुष संपर्क में किसी शादीष्शुदा औरत की तरह रही है, पर शादी नहीं किया है। यह सच है। उक्त महिला ने ऐसा दबाव बनाया कि कुमुद को अपने बारे में बताना ही पड़ गया उसे। उसे सच न बताती तो शायद उक्त महिला उसकी देह खोल कर मर्द संपर्क वाले जादुई लक्षणों को बांचने लगती। दोनों महिलायें अपने अपने दैहिक कौतुकों को विश्लेषित करते हुए बीते दिनों में उतर गई थीं। उक्त महिला को अपने अर्जित ज्ञान पर थोड़ा गुमान हुआ कि उसने कुमुद की देह पढ़ लिया। उसकी देह पर पुरुष्ष संपर्क के मनोरम चिपके हुए थे, फिर तो उसने भी अपने बारे में ऐसा कुछ बताया, जो कुमुद के लिए अचरज भरा था। तो क्या गॉव में भी जहां घूंघट, पर्दा तथा कई तरह की दैहिक वर्जनायें होती हैं, यानि कहीं भी देह वर्जनाओं को फलांग सकती है। देह के लिए गॉव व शहर में कोई भेद नहीं। ‘बहिन जी एमें का है, ई सब तो हो जाता है। हमार जब बिआह हुआ था उस समय हम भी कुआंरी नहीं रह पायी थी। गॉव के एक आदमी से नैहरवे में हमरौ नाता हो गया था। हमैं तऽ मालूमय नाही हुआ कि हमरे संघे का हो रहा है। हम तऽ पहिले नाही नुकूर करते रहे, पर बाद मेंकृउहै भाने लगा।’ ‘आप तऽ जनबै करती हैं बहिन जी, ई जो हमलोगन की देहियां है नऽ, बहुत छिनार है, कब कहां अउर कैसे गरम हो जाती है, मालूमय नाहीं चलता। हमैं का पता था कि ऊ मुअना हमैं जंगल झाड़ की तरफ काहे ले जा रहा है? अउर जब हम जंगल की तरफ चले गये फिर तो उसने मुझे ऐसा सहलाया कि का बताऊं बहिन जी, आप खुदय बूझ लो।’ हम सही बोल रहे हैं बहिन जी! ओ दिना फिर हम कुआंर नाही रह पाए। बाद में तऽ अइसन हो गया कि ओके देखतै हमरे देही में आग लग जाती थी। बिआह होते ही मन भर गया बहिन जी! अब तऽ बुझइबै नाहीं करता है कि हमार देहि है, ओमें कुछ होता है, सब सुन्न। अउर हं ई बताओ बहिन जी! तोहरे संघे का हुआ? अउर कैसे हुआ?’ कुमुद उक्त महिला को देखे जा रही थी, बहुत अधिक खुली है और मन को खोलने में भी माहिर है। शहरी महिलायें भी इतनी आधुनिक नहीं, वे अपराधबोध से मुक्त नहीं होतीं। वे भले ही पुरुष संपर्क में हों पर अपने बारे में बताना अपराध महसूसती हैं, नहीं बतातीं कुछ भी। उन्हें लगता है कि देह के करतबों के बारे में बताना अनैतिक तथा शुचिता के खिलाफ होता है। कुमुद ने अपने बारे में उक्त महिला को सारा कुछ बता दिया फिर तो वह महिला खिल खिल गई। ‘हं हं इहै होता है बहिन जी! मालूमै नाही चलता कि हो का रहा है, अउर हो जाता है। जब हो जाता है, तब पता चलता है कि गलत हुआ है कुछ, फिर भूल जाता है और बार बार होने लगता है, उहै एकै सीढ़ी ओही पर बार बार चढ़ो उतरो। जब हमार बिआह हो गया नऽ बहिन जी, सब भुलाय गया। एमें कउनो डर नाहीं, जब चाहो देह की गांठें खोलो। अउर इहौ बात है बहिन जी, बिना बिआहे ई सब करो न, देहियंय धक धकाय के किकुड़ियाय जाती है, जैसे किसी ने बांध दिया हो। धक धक धक। इस धक धक में मन भले ही अपना काम करता रहे पर देहिंया किसी काम लायक नहीं रह जाती।’ ‘बहिन जी अब तऽ बिआह करि लो, ऐसा कइसे चलेगा, आ ओही संघे कर लो, जेकरे संघे रह रही हो। सब कुछ तऽ होइयय गया है, खाली फेरा लेना है, उहौ निपटाय लो।’ कुमुद उक्त महिला की सलाह पर सोचने लगी। उक्त महिला सचेत तथा समझदार होते हुए भी शादी का नारा लगा रही थी। कुमुद ने उसे ही नहीं, बहुतों को नारी से नारा बनते देखा है। काश! वे जान जातीं कि वे केवल नारा हैं, आखिर काहे के लिए शादी? उत्तराधिकारी पैदा करने के लिए, नर का नारी में, नारी का नर में विलयन के लिए, या सेक्स की वैधता के लिए। मुझे नहीं करनी शादी, और न ही उत्तराधिकारी के रूप में अपनी प्रतिकृति गढ़ना है। आखिर प्रकृति कैसे गढ़ सकती है अपनी प्रतिकृति? और गढ़े भी तो क्यों? ‘आदिम गुफाओं में ऊंघती मौत के बीचकृ‘नाच कहानी नाच’ संतोष के साथ रहते हुए कुमुद जंगलमय हो गई थी। जंगल की अनगढ़ कहानियों के जंगलदंश उसे उद्वेलित करने लगे थे। जंगल में जंगल की तरह रहने का रहवास उसके लिए खुद को विश्लेषित करने वाला था। एक तरह से कुमुद जंगल दंश की कहानियों का पात्रा बनती जा रही थी, पात्रा तो खैर थी भी वह नहीं तो जंगल में क्यों आती? जंगल की गोद में बसे हुए जंगली गॉवों में रहते हुए वहां के लोगों की प्राकृतिक निश्छलता से वह पहली बार परिचित हो रही थी। मॉ की गोद की ही तरह जंगल की गोद भी होती है, तभी तो वनवासी निश्छल हुआ करते हैं। अधिकारियों या सर्वेयरों की तरह कुमुद गॉवों को नहीं देख रही थी, जो गॉवों में जांच पड़ताल के सिलसिले में आया जाया करते हैं और जंगल के रहवाहसियों को अपराधी महसूसते हैं। कुमुद हमेशा से ही शहर में रही है, कथित भद्र लोक में, कथित भद्र लोगों के साथ। उसे वनवासियों का जीवन देख कर ग्लानि हुई, वहां भूख भी, भूखी सोती है, वहां के लोग अपनी तकलीफों की कहानियां खुद अपनी पीठ पर लिखते हैं, उन्हें वांचता कोई है। उनका जीवन, शोषण तथा यातना के कटघरों में कराह रहा है। वे शोषण के किसी उपकरण की तरह सांसें ले रहे हैं,कृकुमुद को लगता है कि वे केवल तथा केवल शोषित होने के लिए ही जीवित रहते हैं। उनके लिए न तो रोजगार है न कोई मजूरी, न ही खेत खलिहान। संतोष तक पहंुचने का किसी तरह से कुमुद को एक तरीका मिला, जो भले ही टेढ़ा मेढ़ा था पर तरीका तो था ही। एक दिन उक्त महिला ने जिसने अपने घर में कुमुद को आश्रय दिया हुआ था, उसने अल्लसुबह ही कुमुद को जगा दिया। ‘देखो! वह आदमी सामान ले कर जंगल की तरफ जा रहा है, उसका पीछा करो, छिप छिपा कर शायद गुरू जी के पड़ाव की तरफ। वह तुझे देखने न पाये सावधानी से नाहीं तऽ सब गड़बड़ा जायेगा’ कुमुद को उस आदमी का पीछा करना था जो जंगल की तरफ रसद तथा सामान ले जाया करता था। कुमुद उसके पीछे लग गई। करीब एक घंटे बाद उक्त आदमी जंगल के एक ठिकाने पर पहुंचा। वह जगह किसी गुफा की तरह थी, वहां तीन लोग थे जो आपस में बतिया रहे थे। गुफा के सामने एक आदमी पहरा दे रहा था, वह वर्दी में था। झाड़ी की ओट में कुमुद छिप गई और देखने की कोशिश करने लगी कि उक्त आदमी करता क्या है? उसने देखा कि उक्त आदमी ने बोरे में रखा हुआ सामान वहां रख दिया। बोरे में क्या था, यह देखने में नहीं आया। करीब आधे घंटे बाद उक्त आदमी वहां से निकल लिया। तब तक कुमुद झाड़ी में छिपी हुई थी और निगरानी कर रही थी कि आगे क्या होता है। झाड़ी में छिप कर बैठना, वह भी किकुड़ियाकर आसान भी तो नहीं होता, जीन्स की पैन्ट आसानी से जमीन पर बैठने नहीं देती। बैठने में उसकी लापरवाही से झाड़ी हिल गई और खड़खड़ाहट हुई। जिसके कारण पहरा देने वाले आदमी ने कुमुद को देख लिया। तब तक धूप फैल चुकी थी। छिपी हुई चीजें भी साफ दिखने लगीं थीं।कृ ‘पहरा देने वाले आदमी की निगाह झाड़ी में छिपी हुई कुमुद पर पड़ गई..कृ वह छिप कर कुमुद के पास आने लगा। कुछ इस तरह जैसे वह कुमुद को चोरी से पकड़ना चाह रहा हो। जिसका कुमुद कोे पता न हो, शायद वह ऐसा ही कर रहा था। कुमुद को भागना नही था, सो उसने खुद को पकड़वा दिया। वस्तुतः कुमुद खुद को पकड़वाना भी चाहती थी, क्योंकि खुद को पकड़वाने के अलावा कुमुद के पास संतोष तक पहुंचने के दूसरे विकल्प नहीं थे। वह छिपी भी रहती तो क्या कर लेती, पकड़ हो जाने के बाद तो संगठन के मुखिया से सजा दिलवाने के लिए निष्चित रूप से उसे मिलवाया जाता। सजा देने की परंपरा वामउग्रवादियों में भी तो होगी ही। संगठन के मुखिया से मिलने का यह एक सरल व सुगभ रास्ता था। जिसका लाभ उठा लेना कुमुद के हित में था। अब कुमुद पहरा देने वाले आदमी की पकड़ में थी। ‘कौन हो तुम? यहां का कर रही हो? किसने भेजा है तुझे?’ कई तरह के सवाल एक ही सांस में..पहरा देने वाले आदमी ने कुमुद से पूछा। उसकेे पूछने का अन्दाज पुलिसिया था, पर पुलिस वाली क्रूरता उसकी बोल में नहीं थी। कुमुद कोे तो उसके किसी सवाल का जबाब नहीं देना था। सो उसनेे चुप्पी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और चुप हो गई मानों उसे बोलना ही नहीं आता, जैसे वह गूंगी हो। पहली बार उसेे लगा था कि उसका आधुनिक पहनावा उसके लिए खतरनाक है। उसका पहनावा देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता है कि वह पढ़ी लिखी महिला है और जान बूझ कर चुप्पी में है। उसके इरादे खतरनाक हैं और वह जासूसी कर रही है। पहरेदार कुमुद कोे सीधे अपने कैंप पर ले आया। उसने कुमुद को दो तीन झटके भी दिये। ‘गूंगी हो का, काहे नहीं बोल रही? बोल, बोल तुझे किसने भेजा है?’ पर कुमद को तो बोलना ही नहीं था, उसके किसी सवाल का जबाब नहीं देना था। परेशान हो कर वह आदमी कुमुद को वामउग्रवादियों के कैम्प तक ले आया। कैम्प क्या था, एक पहाड़ी गुफा थी, उसमें सात आठ आदमी जमीन पर बैठे हुए थे। झाड़ी में छिपे छिपे पहाड़ी के शिखर को कुमुद लगातार देख रही थी। उसे लगा था कि सोनभद्र में इससे ऊंची दूसरी कोई पहड़ी नहीं होगी। शायद यही पहड़ी ही सोनभद्र को झारखंड से अलग करती है। कुमुद कोे मालूम है कि सोनभद्र की पहाड़ियों में तमाम आदिम गुफाएं हैं, जिनमें कभी आदिमानव रहा करते थे, उनमें अब भी रहवास बनाया जा सकता है। कुछ गुफाओं में तो आदिमानवों द्वारा चित्रित चित्रा भी पाये जाते हैंकृबहरहाल उस समय कुमद को सोनभद्र के अतीत में नहीं उतरना था। सो वह आगे क्या होने वाला है, उसके बारे में गुन रही थी। उसे गुफा तक ले जाकर पहरेदार ने छोड़ दिया। अब वह वहां दूसरे किस्म के लोगों की निगरानी में थी। पहरेदार ने उसके बारे में गुफा में बैठे हुए लोगों को बताया.कृ‘गुरू जी! यह महिला झाड़ी में छिप कर हमारी निगरानी कर रही थी। कैम्प के सामने वाली झाड़ी से ही मैंने इसे पकड़ा है, अपने बारे में कुछ भी नहीं बता रही।’ गुफा में बैठे हुए लोग कुमुद को अजीब निगाहों से देखने लगे पर उनकी निगाहों में नारी देह के मदमाते कौतुक नहीं थे। यानि वह उनके लिए कोई कामुक विज्ञापन सामग्री नहीं थी। उसेे देखते ही उनकी ऑखें लाल हो गईंकृजैसे उनकी ऑखों से आग निकल रही हो, भस्म कर देने वाली। ‘यह कैसे संभव है कि कोई बाहरी हमारे कैम्प तक आ जाये, कैसे हुआ यह सब?’ उन्हें अपनी सुरक्षा व्यवस्था में छेद जैसा जान पड़ा। गुफा में बैठे हुओं में से, एक जो काफी तमतमाया हुआ था, उसने उसेे पकड़ लिया।कृ ‘कौन हो तुम! यहां तक कैसे आ गई?’ उसने उसे झकझोरते हुए पूछा... कुमुद खामोश तो खामोश थी, उसेे कुछ बोलना ही नहीं था। वह जानती थी कि विपरीत परिस्थितियों में गूंगा बना रहना बेहतर बचाव होता है, सो वह खामोश थी। वह पहचानने की कोशिश कर रही थी कि यहां बैठे लोगों में संतोष कौन हो सकता है? संभव है वह यहां हो भी नहीं, वैसे भी संतोष को उनमें से पहचानना मुश्किल काम था। वे सभी लगभग लगभग समरूप थे, सभी विशेष वर्दी में थे। वे अपने अपने हथियार सामने रखे हुए थे। उनमें बड़े छोटे की पहचान गायब थी। वहां कथित भद्रसमाज वाली, बड़े, छोटे में विभाजित कथित भद्रता नहीं थी। अचानक कुमुद कोे पकड़ने वाले आदमी ने उसके गाल पर एक झापड़ मारा, जो काफी झन्नाटेदार था फिर वह चक्कर खाकर गिर गई। वह कुछ समझ पाती कि गुफा का दृश्य ही बदल गया... ‘क्या कर रहे हो तुम! क्यों मारा इस महिला को।’ एक सख्त आवाज कमाण्डरों माफिक...कृ गुफा में बैठा एक आदमी जो काफी सबल दिख रहा था और चित्ताकर्षक भी, उसने झापड़ मारने वाले को गुस्से से डांटा...कृ ‘छोड़ दो इसे, यहां कोई थाना नहीं है जो हम भी पुलिसिया सलूक करेंगे इसके साथ। अगर ऐसा ही सलूक करना है फिर हम लोगों में और पुलिस में क्या अन्तर रह जायेगा, जनता हमसे क्यों जुड़ेगी? कुछ तो फर्क होना चाहिए हम लोगों तथा पुलिस वालों के व्यवहारों में।’ ‘इस महिला से सचाई उगलवाने के दूसरे तरीके भी हैं, तूं तो जानते हो कि हम क्रूर और मूर्ख पुलिस वालों के तरीकों तथा उनकी आदिम कार्य प्रणालियों की नकल नहीं करते। इसके लिए चाय का इन्तजाम करवाओ, शहरी जान पड़ती र्ह नाजुक पांवों वाली, थक गई होगी यहां तक आने में।’ फिर उस आदमी ने कुमुद से बैठने के लिए कहा, और अपने पास ही बिठा भी लिया।कृ वह आदमी भी अन्यों की तरह दरी पर बैठा हुआ था। उसके सामने कई पत्रिकाएं बिखरी पड़ी थीं।कृवहां इन्डिया टूडे, आउटलुक ही नहीं हंस, कथाक्रम और कथादेश जैसी पत्रिकाएं भी थीं। वहां टाइम्स आफ इन्डिया और दूसरे अखबार भी थे। पास ही में खुला हुआ लैपटाप भी था। यानि एक तरह से उस आदमी के सामने पूरी मीडिया बिखरी हुई थी। मैंने देखा कि पत्रा पत्रिकाओं के वहां ताजे अंक नहीं थे। उनकी ताजगी उन पत्रिकाओं पर नहीं दिख रही थी। मैंने अनुमान किया कि निश्श्चित रूप से यहां पत्रिकाओं व अखबारों के वही अंक होंगे जिनमें नक्सलाइटों के बारे में प्रकाशित हुआ होगा। बहरहाल कुमद उन्हें उलट पुलट नहीं सकती थी, क्योंकि वह गिरफ्तार थी, उन्हें केवल दूर से देख सकती थी। कुमुद उस आदमी के पास बैठी हुई उसके विवेक की गर्मी महसूसने लगी थीकृ ‘कुछ तो है, जो इस आदमी को दूसरों से अलग कर रहा है, यह कोई सामान्य आदमी नहीं हो सकता।’ सारी दुनिया में गिरफ्तार लोगों से सचाई कबूलवाने का तरीका तो एक ही है, वही पुलिस वाला...यह आदमी किस तरीके की बात कर रहा? क्या करना चाह रहा मेरे साथ? कुछ देर में ही चाय आ गई। चाय नीबू और नमक वाली थी। चाय स्वादिष्ट थी, जायकेदार। चाय पीते ही उसे मजा आ गया, रास्ते की थकान से थोड़ी राहत मिली। चाय पीते समय कुमुद को मनीश का ख्याल आया। ‘मनीश भी ऐसी ही चाय बनाता है, लगता है यह ‘जनवादी’ चाय है’ ‘चाय कैसी बनी है? यहां लीकर ही मिलेगी आपको’ चित्ताकर्षक आदमी ने उससे पूछा...कृ ‘जी बहुत अच्छी है’ ‘आप कौन हैं, और यहां क्यों आई हैं? बता दंेगी तो आपके लिए ही नहीं हम लोगों के लिए भी ठीक होगा।’ चित्ताकर्षक आदमी ने कुमद को सवालों के उत्तर देने के लिए सुझाया।कृ ‘इतना मैं जानती हूॅं कि मुझे अपने बारे में आप लोगों को बता देना चाहिए पर आप लोगों को कैसे यकीन होगा कि मैं पुलिस का कारकून नहीं हूॅं, न ही आप लोगांे के अभियान के विरूद्ध हूॅं, और यह भी कि मैं यहां जासूसी करने के लिए नहीं आई हूॅ।’ ‘तो आप हैं कौन? इस तरह से हमलोगों की निगरानी क्यों कर रही हैं? यहां तक आप कैसे आईं? चित्ताकर्षक आदमी ने संक्षिप्त सवाल कुमुद से पूछा... ‘यह मैं नहीं बता सकती कि आप लोगों तक कैसे आई। बस आ गई और मुझे आप लोगों तक आना ही था। आप तो जानते ही हैं कि ‘व्यवस्था’ में भी ‘अव्यवस्था’ होती है, उसमें भी सुराख होते हैं, उसी सुराख के जरिए मैं आप लोगों तक आ पायी। पर यह जान लीजिए कि मेरा इरादा गलत नहीं है, मेरा इरादा है आप लोगों के साथ जुड़ना, आप लोगों के साथ मिलकर काम करना और यह जानना कि आप लोग समाजबदल के लिए अपनी जान को जोखिम में क्यों डाल रहे हैं? जबकि जमाना बदल चुका है, आदमी अपने ही वैभव, मर्यादा और कमाई के प्रयासों में गोते लगा रहा है।’ गुफा में हसी का फौव्वारा फूट पड़ाकृ। ‘ह, ह, ह, ह,’ ‘क्या मजाक है? इससे अच्छा मजाक तो आज तक सुना ही नहीं गया’ उनमें से एक ने व्यंग्य किया...कृकृकृ ‘हमारे साथ मिलकर काम करना, वाह! क्या खूब,यहां कैबरे नहीं होता मैडम! फिर क्या करेंगी आप हमलोगों के साथ? इतना तो आप जानती ही हैं कि यहां कोई अपने लिए नहीं जीता और न ही मरता है। पर हां, यहां कैबरे होता है मृत्यु का, गोलियों का, अपने लिए नहीं जनता के अधिकारों की सुरक्षा के लिए, यहां अपना कुछ नहीं, सारा कुछ समाज का है और समाज को बचाने के लिए हमें म्त्यु का नाच नाचना पड़ता है। भला बताइए मृत्यु की नाच में किस तरह की सहभागिता निभा सकती हैं आप? कुमुद खामोश थी, उसे खामोश ही रहना था, उसे सुनना था और गुफा में बैठे हुओं के मृत्यु के खेलों के बारे में गुनना था, कैसे लोग हैं जो....कृ कुमुद इसके आगे कुछ नहीं सोच सकी, इतना तो वह जानती ही थी कि मानव सभ्यता के पास बन्दूकी संस्कृति का कोई विकल्प नही है आदमी आज तक हमलावर अतीत की बन्दूकी परंपराओं से बाहर नहीं निकल सका है, कब निकलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। चित्ताकर्षक आदमी ने खामोशी तोड़ा...कृ ‘आप क्यों नहीं बोल रही हैं, कुछ बतायें अपने बारे में, ऐसे कैसे चलेगा? आपको अपने बारे में तो बताना ही पड़ेगा। हमारे पास आपसे सच उगलवाने के तमाम तरीके हैं, हालांकि हम पुलिसिया तरीके का इस्तेमाल कभी नहीं करते। कृपया आप अपने बारे में बता दीजिए, यही अच्छा होगा आपके लिए’ कुमुद ने खामोशी तोड़ा...कृकृकृ ‘आप लोग क्या जानना चाहते हैं मेरे बारे में, आप देख रहे हैं कि मैं एक महिला हूॅं, आप तो समझ ही गये होंगे कि मैं पढ़ी लिखी भी हूॅ। मैं आप लोगों के बारे में जानने के लिए आई हूॅं कि कौन सी ऊर्जा है आपलोगों के पास जो आपलोगों को नहीं डराती और मृत्यु का नाच नाचने के लिए उत्प्रेरित करती है, इतना जान लेने के अलावा मेरा कोई दूसरा लक्ष्य नहीं है।’ चित्ताकर्षक आदमी उसे ताक रहा था और तकता ही जा रहा था। वह उसके भीतर क्या तलाश रहा था, कुमुद के लिए समझना मुश्किल था। फिर उससे कोई सवाल नहीं पूछा गया। उसे तत्काल उसी गुफा में बन्द कर दिया गया, दो आदमी उसका पहरा देने लगे। रात में खाना मिला, वही रूखा सूखा। खाना खाते समय चित्ताकर्षक आदमी कुमुद के पास आया। ‘मैडम! यहां तो यही खाना मिलेगा, जमीन पर सोना पड़ेगा, जागते हुए रातें बितानी होंगी, साथ ही साथ पुलिस की गंध हरदम सूंघते रहना होगा। जागते हुए सोने और सोते हुए जागने का यहां अभ्यास तो करना ही पड़ेगा आपको।’ शुभ रात्रि बोल कर चित्ताकर्षक आदमी चला गया। किसी तरह बिना सोए ही गुफा में रात भर कुमुद पड़ी रही। उस गुफा में भला उसे नींद कैसे आती। सुबह हुई तो देखा कि कुछ कामरेड अपनी अपनी बन्दूकों की सफाई कर रहे हैं और एक कामरेड गोइठे की ऑच पर चाय बना रहा है। चाय कुमुद को भी मिली। चाय पीते समय उसके सामने अचरज खड़ा हो गया।कृउसकी ऑखें चुधिया गईं। ‘वह यह क्या देख रही है? उसके सामने वही महिला खड़ी थी जिसने उसे संतोष से मिलने का तरीका बताया था। फिर तो उसे सच बताना ही था, बताना क्या था, केवल हॉ हॉ करना था, सवालों के बहाने, उसके बारे में बता तो चित्ताकर्षक आदमी रहा था।कृ ‘तो आप कुमुद जी हैं। प्रोफेसर आलोकनाथ जी की इकलौती बेटी, और मनीश के सहसंबध में रह रही हैं, विस्थापन वाली मीटिंग में आप पहड़ियाटोला आई थीं फिर वहां से वापस नहीं लौटीं’। कुमुद के पास में ही संतोष से मिलने का रास्ता बताने वाली महिला थी। उसके चेहरे पर रहस्मय मुस्कराहट थी...उसने पूछा... ‘का बहिन जी, का हालचाल है, इहां कैसा लग रहा है? गुरूजी से भेंट हुई के नाहीं’ कुमुद उस महिला को देख कर अचरज में थी। यह यहां कैसे आ गई? इसे तो कुछ भी पता नहीं था, संतोष के बारे मंे।कृ ‘बिगनी! तूं कुमुद जी की सेवा कर, हमलोगों को कहीं निकलना है’ कहते हुए चित्ताकर्षक आदमी कहीं निकल गया। कुमुद उसे देखती रह गई। गोया उसे घोखा दिया गया है, ये सभी के सभी मिले हुए हैंकृऔर यह महिला भी जंगल के कामरेडों के साथ ही है। तो क्या जानबूझ कर बिगनी ने कामरेडों के कैम्प तक मुझे भिजवाया है? जबकि कुमुद खुद पर मगन थी कि उसने संतोष के पड़ाव का पता लगाने में सफलता हासिल कर लिया है। पर ऐसा नहीं था, सफलता तो बिगनी को मिली थी। उसने उसे संतोष तक पहुंचवाया, वह खुद नहीं पहुंची संतोष तक। बिगनी उससे चालाक निकली। वह समझ रही थी कि बिगनी के साथ दैहिक कौतुक सेे उसने संतोष के बारे में पता लगा लिया है, पर नहीं, पता तो बिगनी ने लगा लिया उसके बारे में वह भी उसी कला से जिस पर कुमुद को गरूर था। कुमुद को देहजनित अपनी अन्वेशित कला पर निराशा हुई। यह कला तो सर्वव्यापी है, सभी जगह सभी समाज में, क्या आधुनिक क्या गंवार, सभी जानते हैं इस कला के बारे में, मन खोलना है तो देह खोलो, देह का पर्दा हटा नहीं कि मन पर्दे से बाहर। मन पर्दे से बाहर हुआ फिर तो चित्त तथा चेतना दोनों पर्दे से बाहर। दोंनों के एक एक रेशे को चाहो तो गिन लो, कुछ भी भीतर शेष नहीं रह जाता। दैहिक कौतुक में बिगनी उससे आगे निकल गई, एक देहाती, सरल व तरल फिर भी। बहुत ही कुशलता से बिगनी ने कुमुद के बारे में जान लिया, वह भी किसी दूसरे से नहीं खुद कुमुद से। मजा यह कि बिगनी ने खुद के बारे में कुछ नहीं बताया, वह क्या है और संगठन से कैसे जुड़ी हुई है, संगठन के लिए का करती है, कुछ भी नहीं। तो अद्भुत है बिगनी, ऐसे लोग नहीं रहेंगे संगठन में तो संगठन कैसे चलेगा? कुमुद कोे घबराहट हुई आखिर संतोष ने उसे क्यों बुलवाया। संतोष को कैसे पता चला कि वह गॉव में रह रही है, अगर रह रही है तो क्या फर्क पड़ेगा संतोष के लिए, उसने मेरे बारे में जानकारी क्यों जुटवाया? उसे तो सब कुछ पता है, मैं किसकी बेटी हूॅ, किसके साथ रह रही हूॅ, सारा कुछ। मानना पड़ेगा कि वामउग्रवादियों की जासूसी कला प्रषंसनीय है। हर अगला कदम वे फूंक कर उठाते होंगे, केवल पुलिस ही नहीं उन सारे लोगों के बारे में भी वे जानकारियां जुटाते होंगे जो उनके साथ हैं या जो उनके साथ नहीं हैं। कुमुद बिगनी के बारे में सोचने लगी, वैसे भी आदिम गुफाओं में ऊंघती मौत के बीच ‘नाच कहानी नाच’ के अलावा वह क्या सोचती? ‘हम रोबोट नहीं हैं जो इसे मरता हुआ यहीं छोड़ दें’ चित्ताकर्षक आदमी के चले जाने के बाद कुमुद के साथ केवल बिगनी रह गई थी। उसके अलावा एक कामरेड और था जो गुफा पर पहरा दे रहा था। कुमुद को रात में नींद नहीं आई थी, सो उसकी ऑखें चढ़ी चढ़ी हुई थीं फिर भी वह उस समय सो नहीं सकती थी। उसे नींद को कब्जे मंे रख कर जागते रहना था और बिगनी से सच मालूम करना था कि उसने उसेे धोखा क्यांे दिया? साफ साफ बता दिया होता कि वह संतोष से जुड़ी हुई है, उसका पता ठिकाना जानती है, तो का फर्क पड़ जाता? इस तरह का बहाना बनाने का क्या मतलब? बिगनी कुमुद के साथ थी, तथा मुस्किया रही थी। मुस्कियाते हुए ही वह कुमुद से बतियाने लगी....कृ ‘मुझे यहां पर देख कर आप तो घबड़ा रही होंगी बहिन जी, मैं जानती हूॅं कि आपको मुझ पर गुस्सा भी खूब आ रहा होगा।’ ‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं, मुझे तुम पर तो फूल बरसाना चाहिए?’ कुमुद ने उसे उलाहा। ‘आप मुझ पर फूल काहे बरसाएंगी, हमने ऐसा कोई काम नाहीं किया है बहिन जी! पर गुसियाइए भी नाहीं, गुसियाने वाला काम भी हमने नाहीं किया है।’ बिगनी ने सफाई दियाकृ ‘मैं तुम पर गुस्सा करके क्या कर लूंगी? अगर तूं संतोष के बारे में मुझे बता देती, तो क्या बुरा हो जाता। मुझे इसी बात की चिन्ता है। तूं तो मेरी दोस्त बन गई हो, मेरे बारे में बहुत कुछ जान गई हो, फिर मुझसे छिपाने का क्या मतलब।’ ‘मैंने कुछ छिपाया नाहीं है आपसे, देखिये आपको भी गुरू जी से मिलना था तो गुरू जी को भी आपसे मिलना था। एक दिन पहले की ही तो बात है। गुरू जी ने पड़ाव पर मुझे बुलवाया था और आपके बारे में पूछा था बहिन जी। गुरू जी ने कहा था कि गॉव में जो एक बाहरी लड़की रह रही है, उसके बारे में पता करो कि वह कौन है? और गॉव में क्यों रह रही है? वह क्या चाहती है? उसे मुझसे मिलवाओ. मैं तो शुरू से ही आपके बारे में पता लगा रही थी। मेरे मन ने कहा भी था कि आप पुलिस की नाहीं हो सकतीं। आपके साथ रह कर मुझे अन्दाजा लग चुका था कि आप पुलिस नाहीं हो, और ना ही कोई मुखबिर हो, फिर तो मैं आपसे खुद ही घुलमिल गई और आपको अपने घर में रख लिया। इसी बीच आप गुरू जी के बारे में पता करने लगीं तो मैंने इस बात को गुरूजी को बता दिया। उनसे मैं कोई बात छिपा नहीं सकती। गुरू जी भी आप से मिलने के लिए तैयार हो गये इसी लिए एक आदमी के साथ आपको यहां तक भेजना पड़ा। दोनों काम हो जायेगा। आप गुरू जी से मिल लेंगी और गुरूजी आपसे। ‘आप तो मिल चुकी होंगी गुरूजी से’ बिगनी ने कुमुद सेे पूछा ‘नहीं मुझे क्या पता कि गुरूजी कौन हैं? वहां कई लोग बैठे हुए थे उनमें से मैं कैसे पहचानती गुरूजी को?’ बिगनी को कुमुद ने सच बता दिया.कृ ‘अच्छा कोई बात नाहीं है, आपको एक दो दिन में गुरू जी के बारे में मालूम हो जायेगा। आजकल गुरूजी बहुत परेशान हैं। एक मुठभेड़ हो गई है, गुरूजी के दो साथी मारे गये हैं। गुरूजी मरने वाले साथियों के परिवारों की देख रेख कर रहे हैं, उन्हें किसी भी तरह की तकलीफ न हो। फिर मुठभेड़ का जबाब भी तो देना है। ‘कौन हैं वे लोग? कहां के रहने वाले है?’ कुमुद ने पूछा बिगनी से ‘यह जान कर क्या करेंगी आप? अगर मैं आपको उनके बारे में बता भी दूं तो भी आप उन्हें नहीं जान पांएगी। मैं जानती हूॅं उन्हें। वे साधारण लोग हैं और गुरूजी के साथ शुरू से हैं, खबरी का काम कर रहे थे। वे हथियार चलाने वाले लोग नाहीं थे, उनके पास हथियार थे भी नाहीं थे, उन्हें तो पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया है, और अखबारों में छाप दिया कि वे खूंख्वार नक्सली थे, मुठभेड़ में मारे गये। जाने दीजिए इन बातों से आपसे क्या मतलब।’ कुमुद बिगनी को नक्सलियों के पड़ाव पर देख कर हैरान थी। आखिर इसकी यहां पर क्या भूमिका हो सकती है? ‘तुम यहां पर क्या कर रही हो?कृइनके संगठन में महिलांए तो होती नहीं’ कुमुद ने पूछा बिगनी से..कृ ‘आप मजाक तो नहीं कर रहीं बहिन जी! महिलांए क्या करती हैं मर्दों के साथ। यह भी बताना होगा आपको। जो महिलांए करती हैं, वही मैं भी यहां पर करती हूॅं,’ बिगनी ने बात की धारा मोड़ा..कृ ‘तो तुम इस संगठन में महिलाओं वाला काम करती हो, यानि महिलाओं का काम कुछ अलग होता है।’ ‘हां और नाहीं तो का?’ बिगनी ने मुस्कियाते हुए बताया। ‘सच सच बताओ। तूं झूठ तो नहीं बोल रही। नक्सलियों के संगठन में वह सब नहीं होता, जिसके बारे में तूं इशारा कर रही, माफियाओं का ग्रुप होता तो बात मान लेती।’ ‘तो आप ही बतायें कि मैं यहां का कर सकती हूॅं।’ ‘मुझे क्या पताकृकुछ देर तक दोनों चुप थे। कुमुद जान गई कि बिगनी कुछ भी बताने से रही। बिगनी संगठन में ही होगी। वह थी भी संगठन में, संगठन का काम वह बाहर से करती थी।’ बिगनी संगठन में शामिल होने के पहले पुलिस की दलाल थी। घर में दारू चुआती थी और बेचती थी। स्थानीय अपराधियों के बारे में पुलिस को बताया करती थी। दलाली के द्वारा पुलिस उत्पीड़न से अपराधियों को बचाया भी करती थी। पुलिस के यहां उसका लेन देन चला करता था। अब पहले वाला काम नहीं करती। पुराना धंधा उसने छोड़ दिया है। पुलिस वाले अब बिगनी के पास नहीं आते। बिगनी बदल गई है। बिगनी ने अपने बारे में साफ साफ बताया.... कृ ‘का बतायें बहिन जी! हमारी जिनगी नरक बन गई थी। उस नरक से गुरूजी ने ही हमें बाहर निकाला। नाहीं तो पुलिस वाले हमैं बिछावन बनाय लिए थे। हम नाही बताय सकते कि कितने दरोगा सिपाही हमरी देहिया पर डांके कूदे हैं। अब हमरे पास कोई नाहीं आता। पुलिस वालों को भी मालूम है कि बिगनी गुरूजी के साथ है।’ कुमुद को बिगनी की बातों पर अचरज हुआ। फिर गॉव में कैसे रह रही हो? पुलिस तलाश रही होगी? गॉव में भी तो धमक सकती है पुलिस। ‘हां हां गॉव में भी आ सकती है पुलिस, पर आयेगी नहीं, उन्हें पता है कि गॉव वाले मोर्चा बना सकते हैं। पुलिस गॉव में आती तो पहड़ियाटोला अब तक उजड़ चुका होता। कंपनी का कब्जा हो गया होता। एक बात बतायें बताएं बहिन जी आपको, पुलिस वाले मोर्चे से बहुत डरते हैं। दोपहर चढ़ आई थी, तभी एक आदमी कुछ सामान लाता हुआ दिखा। वह आदमी साधारण कद काठी का था, पर था उत्साहित। खुद में डूब मरने वालों जैसा नहीं था। कुमुद गुफा में पसरी हुई थी। आराम करना उसके लिए जरूरी था क्योंकि रात भर सो नहीं पाई थी। बिगनी भी उसके पास ही लेटी हुई थी। वह नया आदमी गुफा में दाखिल हुआ और सामान नीचे रख कर बिगनी से बोला... ‘भोजन लाया हूॅं, गुरूजी ने सन्देश भेजवाया था कि कोई मेहमान आया है, उसके लिए थोड़ा अच्छा खाना चाहिए।’ ‘तो कौन है मेहमान?’ बिगनी से पूछा नयेआदमी ने कुमुद की ओर बिगनी ने इशारा कियाकृ ‘बहिन जी हैं,कृइनका नाम कुमुद है’‘इन्हें तो मैंने उस दिन देखा था, जब गॉव में मीटिंग हुई थी, आप पोरफेसर साहब के साथ आईं थीं नऽ’ नये आदमी ने कुमुद को पहचानने की कोशिश की। ‘हां मैं उस दिन पहड़ियाटोला में ही थी, फिर यहीं रूक गई’ कुमुद ने बतायाकृ फिर कुमुद ने बिगनी के साथ खाना खाया, खाना स्वादिष्ट था, रात की तरह नहीं था। चावल दाल और सब्जी, साथ में अंचार भी था। खाना खाते समय कुमुद के मन में आया कि पूछे... ‘खाना कहां से आया?’ पर नहीं पूछ पायी। पूछना उचित नहीं था। फिर वह नया आदमी बताता भी नहीं।कृ खाना खा चुकने के बाद नये आदमी ने बिगनी को अकेले में बुलाया और कुछ कहा.... बिगनी का चेहरा फक्क हो गया...कृ ‘का इहां छापा पड़ेगा! ‘हां अउर नाहीं तो का?’ ‘फिर तो हम लोगों को यहां से भागना चाहिए।’ ‘गुरूजी कहां हैं? ‘जहां हैं, वहां सुरक्षित हैं।’ ‘चलो सामान समेटो, अउर भागो, किसी को पकड़ाना नाही चाहिए।’ कुमुद छापे वाली बात सुनते ही कांपने लगी।कृकहीं मुझे ही पुलिस के छापे का कारण न समझ लिया जाये, पर ऐसा नहीं हुआ। कुमुद को बिगनी के साथ रात भर भागना पड़ा। जहां जाओ वहां पता चलता था कि पुलिस आई थी। सोनभद्र की पुलिस के अलावा पड़ोसी जिलों की भी पुलिस थी। वे मिलकर नक्सलाइटों की तलाश कर रहे थे। रात भर भागते भागते कुमुद थक कर पस्त हो गई थी। सुबह होने के बाद कुमुद के लिए मुश्किल था एक दो कदम चलना भी। कुमुद ने बिगनी से कहा...कृ ‘तुम लोगों के साथ मैं अब एक कदम भी नहीं चल सकती, काफी थक गई हूॅं, पैरों में छाले पड़ गये हैं। पास ही में एक पहड़ी थी, वहीं पहुंच कर वह बैठ गई। वहां एक जंगली पेड़ था, जिसकी छाया काफी मजेदार थी, वहां समतल जैसा भी था, यानि सोया भी जा सकता था। बिगनी परेशान थी...कृ ‘ऐसे कैसे होगा बहिन जी! आपको अकेली छोड़ कर हम लोग भाग भी तो नहीं सकते। गुरूजी नाराज हो जायेंगे, फिर जाने का हो, पुलिस वाले आपको पकड़ लेंगे तो बहुत बुरा हाल करेंगे।’ ‘नाहीं, नाहीं, आपको हमलोगों केे साथ भागना ही होगा, छापे की बात सुनते ही मुझे आप पर शक हुआ था, पर गुरू जी ने बताया था कि कुमुद पुलिस की मुखबीर नहीं है।कृवह हम लोगों के बारे में जानने के लिए जंगल आई है, किताब उताब लिखने के लिए।’ तभी बिगनी को जैसे कुछ ख्याल आ गया हो। उसने साथ में चलने वाले कामरेड से तस्दीक भी किया...कृ ‘बलाक परमुख का घर भी तो एहरै है नऽ’ ‘हां है तो’ ‘चलो, वहीं रूकते हैं’ ‘हां हां चलो’ ‘कुमुद जी को छोड़ कर भागना ठीक नाही है।’ करीब आधे घंटे बाद कुमुद बिगनी के साथ ब्लाक प्रमुख के घर पर थी। ब्लाक प्रमुख नौजवान था, उसकी आंखों में कुछ कर गुजरने की गर्मी थी, और हसमुख था। बिगनी को देखते ही...कृ ‘आओ आओ बिगनी, तोहैं तो पता है कि कहां रहना है?’ ‘हां परमुख जी!’ ‘जाओ चली जाओ, साथ में कौन है’ प्रमुख ने पूछा ‘हमैं नाहीं मालूम परमुख जी’ बिगनी ने बहाना बनाया, हो सकता है वह प्रमुख को कुमुद के बारे में बताना नहीं चाह थी। ‘अरे तोहय नाहीं मालूम, गुरूजी की कुछ लगती है का, एन्है तो पहिले हम कब्बौं नाहीं देखे तूं लोगों के साथ।’ ‘एन्है नाहीं देखो परमुख जी तब्बै ठीक हुआ, अउर हम तऽ बोलेंगे के अब्बौं न देखो, ई देखा देखी आपके बदे महंगा पड़ेगी।’ ‘काहे रे बिगनी, अइसे काहे बोलत हए?’ ‘अइसहीं परमुख जी, सब मेहरारू खोता नहीं होतीं, जेमे आप बइठ जांय अउर गाना बजाना करै लागैं। एनकर नाम कुमद है, अउर गुरूजी कऽ संगी हैं, अब गुरूअय जी के संगे रहेंगी भी।’ प्रमुख ने अपने भुसउल में सभी को ठहराया। दो दिन तक उन लोगों को भुसउल में रुकना पड़ा। वह एक ऐसा समय था कि सारे समाचार पत्रा संतोष की खबरों से सजाये जाने लगे थे। समाचार पर समाचार चस्पा होने लग थे। संतोष के सभी पड़ावों पर छापे पड़ रहे थे, पर ईनामी नक्सली संतोष, पुलिस की पकड़ में नहीं आ पा रहा था। कुमुद के लिए असहज स्थिति थी। उसे तो संतोष से मिलना था और मन के करतबों के बारे में पता करना था पर संतोष तो भाग रहा था। खबर मिलती कि यहां है, वहां है, वह लगातार भाग रहा है। संतोष का निर्देश था कि छिपे हुए लोग कहीं न भागंे, प्रमुख का घर सबसे सुरक्षित जगह है। एक दिन खबर मिली कि हमलोगों को झारखंड की तरफ भाग जाना चाहिए फिर तो हम लोगों ने वैसा ही किया। झारखंड की तरफ भागने के लिए संतोष ने सुरक्षित इन्तजाम किया हुआ था। बिगनी तथा सोनभद्र के कामरेडों को सोनभद्र में ही रुकना था। सो वे वहीं रुक गये। दो कामरेड बाहर से आये हुए थे। उनके साथ एक मार्श्शल गाड़ी थी। मार्शल एकदम नई लग रही थी। उस पर लाल बत्ती भी चढ़ी हुई थी। तकरीबन रात के ग्यारह बजे सभी लोग प्रमुख के घर से बाहर जाने के लिए निकले। कुमुद को कुछ भी पता नहीं कि कहां जा रहे हैं, वह सोच रही थी कि उसकी ऑखों पर काली पट्टी बांधी जायेगी, हाथ पैर बांध दिए जायेंगे, फिर मार्शल पर लादा जायेगा, शायद ऐसा सोचना किसी फिल्म का प्रभाव था, पर ऐसा हुआ नहीं।ं उसे खुला ही छोड़े रखा गया था। एकदम आज़ाद, कुमुद को अचरज जैसा लग रहा था। नक्सली तो अजनबियों के हाथ पैर बॉध दिया करते हैं। किसी लाल बत्ती वाली गाड़ी पर कुमुद पहली बार सवार हो रही थी, वह भी सामान्य रूप से। मन में हुआ कि पूछे उसे कहां ले जाया जा रहा? पर उस संवेदनशील माहौल में पूछना गलत होता। बाहर से आये हुए कामरेडोें के चेहरों को भी वह पढ़ने की कोशिश कर रही थी उनके चेहरों पर पुलिस के करतबों का भय है कि नहीं, पर वहां पुलिस के भय जैसा कुछ नहीं था। उनके चेहरे सामान्य थे कोई घबराहट नहीं, न कोई भय। पूरी तरह से सामान्य। वैसे वह घबड़ाई हुई थी कि जाने क्या होने वाला है? ये लोग उसे जाने कहां ले जायेंगे। एक बात और उसे परेशान कर रही थी। आखिर उसे अपने साथ ले जाने की उन्हें क्या जरूरत थी? उसे कहीं छोड़ देते, पुलिस वाले उसे पकड़ लेते, उसकी पकड़ से उनका क्या बिगड़ जाता। वह इन लोगों की साथी भी तो नहीं...पर उस समय यह सब समझना उसके लिए मुश्किल था। कुमुद को पुलिस का डर था। पुलिस वालों को क्या पता कि वह संतोष के संगठन के साथ है कि नहीं।कृवे तो मानकर चलते कि वह भी वामउग्रवादियों के साथ है। ऐसे लोगों के साथ जो व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में हिन्सा को बुरा नहीं मानते उनका एक ही लक्ष्य होता है, व्यवस्था बदलना। सामान्य नियम है कि कोई जमी जमाई व्यवस्था तब तक नहीं बदली जा सकती जब तक उसमें अव्यवस्था न पैदा कर दिया जाये। यही तो क्रम है व्यवस्था बदल का, पहले व्यवस्था में अव्यवस्था पैदा करो फिर उसमें बदल करो। व्यवस्था के बाद फिर अव्यवस्था। इसी का सतत चलने वाला क्रम। मानव सभ्यता हमेशा परिवर्तन की मुखापेक्षी होती है। वह किसी भी जड़ हो चुकी व्यवस्था को लम्बे समय तक नहीं चलने दे सकती। सभ्यता का प्रारंभ ही असभ्यता का समापन है, और कोई भी सभ्यता कब असभ्यता में तब्दील हो जायेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। फटाफट मार्शल चल पड़ी, रात भर चलने के बाद सभी लोग किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचे। उस सुरक्षित स्थान के बारे में कुमुद को आज तक पता नहीं।कृसंतोष ने भी उसे कभी नहीं बताया। बिगनी तथा कामरेडों के साथ रहते हुए कुमुद को लगने लगा कि वलिदानियों की तरह कोई ऊर्जा उसके दिल दिमाग में भी संचरित हो रही है। उसमें वीरत्व आ रहा है। तथा वह समय की धारा के साथ बह रही है। पुलिस से बचाव वाला वह जंगली अभियान, यानि छिप छिप कर आगे बढ़ना, जरूरत पड़ने पर पीछे लौट आना, उसकी चेतना को बदलने वाला था। एहसास कराने वाला भी था कि जो सिर पर कफन बांध कर चल रहे होते हैं, उनके लिए मृत्यु, डर का कारण नहीं, वरन् हंसी और आनंद का कारक बन जाती है। मृत्यु में आनंद तलाशने वालों की जमात को वह बहुत करीब से देख रही थी। उनके साथ रह रही थी, उनके संगठन में भर्ती होने के बारे में सोच रही थी। उनके भीतर लहराती हुई समाजबदल वाली ऊर्जा की प्रखरता भी देख रही थी। सभी को आजादी देने वाली, समाज को स्वतंत्रा देखने वाली। वामउग्रवादियों के साथ रहना एक मृत्यु का नाच नाचने वालों की दुनिया का साक्षात्कार था उसके लिए। कुमुद चकरा जाती, उनके कठोर और कड़े चेहरों का देख कर, पत्थर माफिक, पर सहमती भी, उनका दुलार तथा समर्पण देख कर। आखिर वे उसे कहीं छोड़ देते तो उनका क्या बिगड़ जाता पर नहीं...आखिर इसे ही तो लगाव बोलेंगे या मानव प्रेम। यह प्रेम, प्यार वाले प्रेम से एकदम अलग है। संतोष ने विषम परिस्थितियों में भी उसेे अकेली नहीं छोड़ा, उसे भी तो प्रेम ही कहा जायेगा, बिना लेन देन वाला, समाज बदल वाला। संतोष खुद को बचाने के लिए उसे छोड़ कर भाग भी सकता था, पर उसने वैसा नहीं किया जैसा कि विपरीत परिस्थितियों में लोग कर जाया करते हैं, वह उसेे लगातार सम्हालता रहा। घाघर वाली घटना को तो कभी भी कुमुद अपनी यादों से बाहर नहीं निकाल सकी। कुमुद को वह घटना हरदम याद रहती है। संतोष कुमुद को थामे हुए ही घाघर नदी में कूद गया था। पुलिस घाघर के इस पार थी और कुमुद संतोष के साथ उस पार, बन्दूकों के भयानक करतबों के बीच। उस घटना के बाद एक और घटना...कृ पुलिस सामने थी, बन्दूकों और हथियारों से बतियाती, लोकतंत्रा के अनुशासन को समझाती और दूसरी तरफ संतोष के कामरेड साथी, वे भी बन्दूकों से नई सुबह की व्याख्या करते हुए, और पुलिस वालों को समझाते कि तुम्हारा अन्याय अब जनता सहन नहीं करने वाली। हम जनता हैं, हम भी जानते हैं, अन्याय का जबाब देना और अपनेे हितों के लिए लड़ना। तुम बन्दूकें चलाना बन्द कर दो, हम भी बन्दूकें नहीं चलाएंगे। वह अजीब तरह का कुदरती संवाद था दिल से निकला हुआ, बिना मिलावट वाला। कुमुद उस मुठभेड़ का गवाह थी, अपने में डूबी हुई, सोचती गुनती कि संतोष को जानना आसान नहीं। बन्दूकों की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता, बिना व्याकरण वाली भाषा में न तो कोई कविता रची जा सकती है और न ही कोई कहानी ही गढ़ी जा सकती है। फिर वह संतोष को जानने के लिए उसके साथ क्यों है? अगर उसे जान भी लेगी तो क्या हो जायेगा? कुमुद कोे लगा कि संतोष रोबोट है जिसका अपना दिल दिमाग नहीं, कोई भावना नहीं, चित्तन नहीं, यह तो बाद में मालूम हुआ कि संतोष मशीन नहीं संवेदनशील रोबोट है अपना बनाया हुआ है, किसी वैज्ञानिक का मशीनी उत्पाद नहीं है वह। ‘जिसकी कल्पना तक नहीं थी उसे कुमद देख रही थीकृदोनों तरफ से बन्दूकें चल रही हैं, एक एक आदमी ढेर होते जा रहे हैं, जंगल कांपने लगा है और हरियाली तो जैसे रो रो की बेहाल हो चुकी है। पत्थर थर थरा रहे है।कृकोई भी उस तमाशे को देख कर कलेजा थाम लेगा, हो क्या रहा है?’ कुमुद भी कांपने लगी थी। आदमी कैसे जिये, क्यों जिये, किसके लिए जिये, जीवन चलाने और जीने से संबधित किताबें बन्दूकें लिखेंगी, बन्दूकंे हल चलांएगी, बन्दूकें खाना बनायेंगी, क्या क्या करेंगी बन्दूकें? क्या बन्दूकें कलमकार या चित्राकार हो जायेंगी? कुमुद तो मुठभेड़ का वह दृश्य देख कर स्तब्ध हो गई थी, उसकी जुबान बन्दूकों के धांय धांय ने लील लिया था, उसे पता ही नहीं था कि वह है भी। कुमुद ने देखा कि संतोष अकेला बचा हुआ है, उसके साथी मारे जा चुके हैं, फिर भी उसे छोड़ कर नहीं भाग रहा है, उसे सभाले हुए है, और बन्दूक चलाए जा रहा है? वह किसे मार रहा है, उसे पता नहीं चलता था, जब धांय होता तब वह कान बन्द कर लेती थी, वह पत्थर की ओट में डरी सहमी बैठी हुई थी। अचानक खोमोशी आ गई, गोलियों की आवाजें बन्द। जंगल का ऑसू बहना बन्द हो गया, गोया बन्दूकंे चलना बन्द हो गईं। एक घंटा गुजर गया, धीरे धीरे जंगल ने हिलना शुरू किया, पत्ते सर सराने लगे। संतोष ने खुद को संभाला... ‘सारा कुछ खतम हो गया कुमुद! साथियों में कोई नहीं दिख रहा, हम घिर गये हैं चारो ओर से, बचाव का कोई रास्ता नहीं, संतोष ने बन्दूक फेक दिया और मारे गये साथियों की तलाश करने लगा।’ एक लाश, दूसरी लाश, तीसरी, चौथी फिर पांचवीं लाश। संतोष रो पड़ा। रोता ही रहा जब तक कुमुद ने उसे नहीं संभाला।’ ‘जो होना था हो चुका संतोष! बन्दूकों के खेल में तो यही होगा फिर क्यों रोना, अब तो चुप करो और खुद को संभालो, कुछ अप्रत्याशित तो हुआ नहीं।’ उस समय कुमुद नेे संतोष का चेहरा देखा था, जो किसी मासूम बच्चे की तरह दिख रहा था और ऑसू बहा रहा था। उसे लगा था कि संतोष रोबोट नहीं है। उसके भीतर भी दिल है, वह भी प्रकृति की एक कृति है, आंसू बहाने वाला, दुख में दुखी होने वाला, अपनों पर रोने सिसकने वाला। ‘उठो संतोष! चलो यहां से। तुम्हारी जान को खतरा है।’ कुमुद ने संतोष को उठाया. संतोष खड़ा हो गया फिर वे दोनों किसी अनजानी राह पर चलने ही वाले थे कि उन्हें सिसकियां सुनाई दीं। झाड़ियों के बीच कोई कराह रहा था. संतोष चौकन्ना हो गया, हो सकता है कोई कामरेड घायल हो कर कराह रहा हो और जीवित हो। संतोष कुमुद के साथ कराहने वाली आवाज की तरफ चलने लगा...कुछ दूर जाने के बाद, कराह चीख में बदल गई,कृ‘बचाओ बचाओ’ संतोष वहीं रुक गया,कृचीख को परखने लगा...कृ ‘कहीं धोखा तो नही,ंकृकोई नाटक तो नहीं कर रहा?’ पर ऐसा नहीं था। वह कराह वस्तुतः कराह थी, नाटक होता तो कराह में वेदना न उभर पाती। संतोष ऐसे धोखों से सावधान रहा करता है। पुलिस वाले मनोवैज्ञानिक छलावों का उपयोग कर कामरेडों को पकड़ लिया करते हैं। किसी सिपाही को कराहता छोड़ देते हैं, कोई न कोई उसे बचाने आयेगा हीकृजंगल में कामरेडों के अलावा कोई दूसरा तो नहीं। संतोष कुमुद के साथ, खुद को आश्वस्त कर उस ओर बढ़ने लगा जिधर से कराह आ रही थी। कुछ दूर जाने के बाद कराहने वाला आदमी दिखने लगा। वह लथपथ जमीन पर छटपटा रहा था। वह वर्दी में था, उसके बगल में रायफल पडी़ थी। संतोष उसके पास पहुंच गया, कुमुद ने उसका माथा पकडा जहां से खून बह रहा था, गोली उसके माथे को छीलती हुई निकल गई थी। माथे के अलावा गोली उसके पैर में भी लगी थी, वह खुद से खड़ा नहीं हो सकता था। संतोष व कुमुद को देख कर उसने कुछ बोलने का प्रयास किया पर नहीं बोल सका, उसने खड़े होने की भी कोशिश की पर खड़ा होना उसके लिए संभव नहीं था। संतोष उस आदमी की हालत देख कर असमंजस में था, का करे, का न करे, कराहने वाला आदमी उसका दुश्श्मन है, सिपाही हैै, गोली मार दे क्या? क्या सोच रहा है संतोष? आखिर वह कैसे मार सकता है गोली, एक ऐसे आदमी को जिसे तत्काल उसकी सहायता चाहिए। संतोष ने माथा पकड़ लिया, कुमुद संतोष को तजबीज रही थी,कृदेखो, संतोष का करता है, इस विषम परिस्थिति में, कितना मानवीय है और कितना अमानवीय। मनुष्य होगा तो उसे अपने साथ ले चलेगा, दवा दारू करायेगा। संतोष खुद मुठभेड़ से बचा था, उस समय उसके सामने संकटपूर्ण स्थिति थी, भाग जाना चाहिए पर नहीं, संतोष घायल आदमी को उठाने लगा...कृ ‘थोड़ा हिम्मत करो भाई, उठो’ संतोष ने उसे उठाने का प्रयास किया, कुमद भी उसके साथ जुड़ गई। पर वह नहीं उठाया जा सका। रात खत्म होने वाली थी, संभव है पुलिस के लोग कहीं अगल बगल ही हों, पर नहीं। वे भाग चुके थे, वे कहीं नहीं थे। संतोष ने कुमुद से पूछाकृ ‘ऐसे में हमें का करना चाहिए?’ ‘वही जो एक मनुष्य को मनुष्य के साथ करना चाहिए।’ यानि, साफ बोलो...कृकृ ‘इसे अपने साथ ले चलना चाहिए, इस तरह यहीं छोड़ देने पर तो यह मर जायेगा।’ ‘सुबह होने वाली है, पुलिस वाले थोड़ी ही देर में जंगल घेर लेंगे फिर हम का करेंगे?कृ ‘हां ऐसा संभव तो है, पर हम इसे छोड़ कर भाग भी तो नहीं सकते।’ संतोष के दो साथी संतोष व कुमुद को लगातार ढूढ रहे थे तथा दूसरे साथियों का भी पता लगा रहे थे। अचानक वे वहीं आ धमके,कृउन्हें देख कर संतोष का चेहरा खिल उठा। अब इस आदमी को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सकता है। संतोष ने अपने साथियों से कहा...कृ ‘यार! इस आदमी को तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता है, इसे उठाओ कहीं ले चलो, इसकी दर दवाई करानी है, संभव है गोली भी फसी पड़ी हो, उसे निकलवाना होगा।’ ‘यह तो पुलिस का आदमी है, इसे उठा कर ले चलना है, आखिर क्यों? यह तो हमारा दुश्ुश्मन है’ ‘हां दुश्मन तो है पर हम रोबोट नहीं हैं जो इसे मरता हुआ यहीं छोड़ दें। हमें महसूसना चाहिए कि यह आदमी घायल है, असहाय है, इसे मदत चाहिए। इस समय यह केवल असहाय आदमी है, घायल है, न ही पुलिस तथा न ही हमलोगों का दुश्मन।’ ‘नहीं, इसे हम लोग कहीं ले कर नहीं चल सकते, चारो तरफ पुलिस का पहरा है, खुद जान पर पड़ी है, पहले जान बचे फिर मनुष्यता’ ‘यह मेरा आदेश है, इसे ले चलो अपने पड़ाव पर फिर देखा जायेगाकृ’ फिर घायल सिपाही को उठाकर वे लोग चल दिये। कहां, किस ओर, किधर किस राह पर, वह राह संतोष की जानी पहचानी थी, कुमुद के लिए अनजानी थी, फिर भी चलना तो था ही। पर वे कहां जा रहे थे कुमुद को नहीं पता। ‘वे एक कृति थे, एक दूसरे में विलयित होकर, कहानी से ‘गाथा’ बन गये’ अनजानी राह पर चलते हुए कुमुद डर रही थी, आगे जाने क्या हो! दोनों सोच रहे थे कि वे जिधर जा रहे हैं, उधर भी तो पुलिस हो सकती है, पुलिस तो कहीं भी हो सकती है, कोई ऐसा कोना नहीं जहां पुलिस सतर्क न हो। कुमुद के डरने का कारण संतोष के साथ साथियों का कम होना भी था। उसके पास शक्तिबल नहीं था, दो चार कामरेड और साथ में होते तो शायद उसे डर नहीं लगता। बात सच भी थी, अगर फिर मुठभेड़ हो गई तो क्या होगा? गोलियां भी खतम हैं, गोलियों का बैग कुमुद के पास ही था। उसका वजन आधा हो गया था। कुमुद ने सोचा..कृ ‘हम मारे जायेंगे’। उस समय कुमुद को लगा था कि जानबूझ कर आग में खेलने का साहस संतोष को नहीं दिखाना चाहिए। उसे समझना चाहिए था कि संतोष का मतलब आग है, और आग में कूदने का जोखिम भी। संतोष के साथ रहने पर तो कदम कदम पर आग बिछी मिलेगी, उसी पर सोना और उसे ही ओढ़ना। सच्ची मुठभेड़ का प्रतिभागी बन जाने के बाद कुमुद की समझ में आया था कि जंगल में होना तथा जंगल को जंगल की तरह देखना, बन्द कर देना चाहिए। जिसका मतलब था, संतोष से अलग होना। पर जाने क्या था कि कुमुद के दिल दिमाग पर संतोष का व्यक्तित्व प्रभावी हो चुका था। वह सोच नहीं सकती थी कि उसेे संतोष से अलग होना है। संतोष का वलिदानी व्यक्तित्व उसेे चुम्बक की तरह खींचे हुए था और वह उससे गहरे में जुड़ चुकी थी, ऐसा क्यों था? उसे समझ नहीं आ रहा था। लगता था कि वह कभी भी नहीं समझ पाएगी। लेकिन एक बात साफ थी कि संतोष की देह उसके लिए आकर्षण की तरह नहीं थी, और न ही उसे हासिल करने के लिए संतोष से वह जुड़ी थी। वैसे संतोष की देह भी मर्दों वाली देह की तरह ही आकर्षक थी। कुमुद जानती है कि किसी नारी का किसी पुरुष से जुड़ाव कई तरह के अफवाहों को उत्पादित करता है। पर संतोष के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, अफवाह पैदा होने जैसी वहां बात ही नहीं थी। वैसे भी जंगल में कम से कम देह के बाबत अफवाहें नहीं फैला करतीं। जंगल की हरियाली में अफवाहें गुम जाती हैं। यह जो हरियाली होती है नऽ, सारे अफवाहों को सोख लिया करती है। लतायें केवल पेड़ों को ही नहीं बांधती, जंगल के सारे रहवासियों को भी बांध लेती हैं, सो वहां वही होता है, जो चित्त में रहता है, और जैसा चित्त, वैसा चेतन, यही तो प्रकृति का नियम है। जंगल की कोई भी सुबह कुमुद को ऐसी नहीं दिखी जिसमें गोते लगाने का उसका मन किया हो। जबकि सुबह तो वैसी ही होती थी, जैसी होनी चाहिए। चॉद तारे और बादल भी आये, रिमझिम करते हुए पर मन तो जैसे जड़ हो चुका था। मन में कोई हलचल नहीं, कुमुद को लगता कि छिपते, छिपाते खुद को पुलिस से बचाते हुए वे मशीनों में तब्दील हो चुके हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो जो तन की दुनिया होती है, उसमें वे गोते लगा रहे होते, पर उन लोगों के तन में कुछ नहीं था, और न ही मन में था। संतोष तो पहले से ही जड़ हो चुका था। नक्सलाइटों साथ रहते हुए कुमुद समझ सकती थी कि वे सामाजिक वर्जनाओं वाली दुनिया से बहुत दूर हैं और अपने मन तथा तन को खुला छोड़ सकते हैं, पर जंगल की गोदी में देह होती ही नहीं केवल चित्तऔर चेतना होती है वह भी वलिदानी, व्याख्यानों वाली नहीं। घायल सिपाही को पीठ पर लादे हुए जंगल में वे इधर उधर भटक रहे थे। जहां जाते, वहां पुलिस की गंध पसरी होती, बारूदी, मारने, काटने वाली। संतोष जहां जाना चाहता था, वहां पहुंचना उसके लिए मुश्किल था। संतोष भी जंगल का रास्ता भूल गया था। भला हो संतोष के कामरेड साथियों और अखबारों में छपी खबरों का कि वे एक सुरक्षित पड़ाव पर पहुंच गये। संतोष के साथी कामरेड, अखबार में छपी खबरों को पढ़ कर हम लोगों को ढूढने लगे थे? उन्हें मालूम हो चुका था कि संतोष अकेला नहीं है, उसके साथ एक लड़की भी है। बाहर से आये कामरेडो ने हमलोगों को किसी तरह एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। वह स्थान एक आदिवासी गॉव वाला था जो दूसरे प्रदेश में पड़ता था। संतोष ने बाद में बताया था कि उस गॉव में जूरा महतो तथा बुद्धू भगत के वंश के लोग रहते हैं। चन्देलों ने उन्हें सोनभद्र से विस्थापित कर दिया था। ये जूरा तथा बुद्धू भगत वही हैं जिन्होंने विजयगढ़ किले पर वारेनहेस्ंिटग्स की सेना से मोर्चा लिया था और दो सौ साथियों के साथ वहीं शहीद हुए थे। कुमुद सुरक्षित स्थान पर पहंुच कर आश्वस्त थी।कृयहां उसे कुछ नहीं होगा।कृउ.प्र. की पुलिस यहां नहीं आ पायेगी। संतोष सिपाही के इलाज में जुट गया। सिपाही के पैर के तलवे के पास गोली लगी थी, संतोष ने एक जलते हुए चाकू से उस स्थान को खोदा, पर गोली वहां नहीं थी, यह अच्छी बात थी, गोली फंसी होती तो यहां निकालना मुश्किल हो जाता। कुछ देर में एक कामरेड कहीं से एक डाक्टर पकड़ लाया जो झोला छाप जान पड़ता था, उसने कई तरह के इंजेक्सन सिपाही को लगाया। कई तरह की दवाइयां खिलाया। कुछ घंटे के बाद सिपाही सामान्य होने लगा...कृ दूसरे दिन सिपाही सामान्य हो पाया पर चल नहीं सकता था। चार दिन बाद सिपाही चलने लायक हो सकता है, डाक्टर ने बताया था। दूसरे दिन संतोष को पकड़ कर सिपाही अचानक रोने लगा...कृ हमलोग कुछ समझ नहीं पाये कि सिपाही काहे रोने लगा? ‘शायद दर्द बढ़ गया हो’ उसका दर्द नहीं बढ़ा था, सिपाही बोलने में लगातार था...कृकृ ‘भइया! हमें गोली मार दीजिए, हमने जीने का हक खो दिया है, हमने आपके साथ धोखा किया है। आपके पड़ाव के बारे में हमने ही विभाग वालों को बताया था।’ उसके रोने का कारण, हमलोगों को रोमांचित करने वाला था यानि कि वह, वही सिपाही था जो संतोष को पहचान सकता था। संतोष को पहचानने के लिए ही उसे मुठभेड़ में शामिल किया गया था। ‘आप हमें गोली मार दीजिए, हम आपके अपराधी हैं, आप जैसे देवता को मरवाना या पकड़वाना अक्षम्य अपराध हो जाता। भला हुआ कि पकड़ नहीं हुई। भगवान भी मुझे माफ न करते।’ सिपाही जितना बोल रहा था उससे अधिक रोने में था। तीसरे दिन संतोष ने सिपाही को उसके बताये स्थान पर पहुंचवा दिया। वे दिन कुमुद के लिए गज़ब के थे, सारा कुछ गजब हो रहा था। सिपाही की जान बचाने वाली संतोष की मानवीयता उसकी वैचारिक यांत्रिकता से अलग थी। ‘दुश्मन को हर हाल में मारो’ ऐसा नहीं था। सिपाही भी संतोष के ही वर्गसमाज का आदमी था, रोजी, रोटी के लिए पुलिस की नौकरी कर रहा था, उसका क्या दोष? जैसी नौकरी वैसा काम..कृकृ संतोष कुमुद के चेतन का हिस्सा बनने लगा था... कामरेडों के सामने जंगल था और वे उसके भीतर थे, पर जंगल उन्हें दुलार नहीं पा रहा था। कुमुद तथा संतोष साथ थे, एक साथ सोते, बतियाते, कहां जाना है, उसके बारे में सोचते पर यह जो मन है नऽ, इतना नियंत्रित था कि दूसरा कुछ नहीं सोच सकता था। मन के कौतुकों के लिए, मन को खुला होना आवश्यक है। वहां उनके मन व तन दोेनों बन्द बन्द थे, खुले नहीं थे। कहते हैं जो होना होता है, वह हो ही जाता है, जो होता है वह आकस्मिक और अचानक होता है। जिसके बारे में पहले कुछ भी पता नहीं होता। वही बन्द मन अचानक एक दिन खुल गया और उन दोनों के बीच वर्जनाओं की जो दीवार थी, भरभरा कर गिर गई। वे दोनों नर और नारी में तब्दील हो गये। यह तब्दीली कैसे हो गई थी, कम से कम कुमुद को तो नहीं पता। शायद इसे संतोष भी नहीं समझ पाया होगा, हो सकता है, उसने समझ लिया हो और छिपा लिया हो। कुमुद अपने बारे में स्पष्ट है, कि उस समय उसकी देह बोलना बतियाना चाहती थी, वह देह के व्याकरण में डूबती चली जा रही थी, वैसे भी जब देह बोलने लगती है फिर तो देह दर्शन की किताब बन जाती है, पठनीय और रंजक। देह के करतब तो वैसे भी कौतुकपूर्ण और रहस्यमय होते हैं। देह की भाषा तो खुद ही अपनी आलोचक और समीक्षक होती है, सो कुमुद के लिए उस समय देह भाषा की चेतावनियों को समझ पाना मुश्किल था। वहां तो देह एक दूसरे तरह की चुनौती लिए खड़ी थी, जो प्राकृतिक थी। फिर तो उन्हें नर और नारी के दैहिक प्रयोगों का उपकरण बनना ही था। शायद ऐसे ही संबधों को नर और नारी के अन्तर्लयन की अभिव्यक्ति कहते हैं।अन्त तक कुमुुद नहीं समझ पायी कि उस दिन जंगल में रहते हुए संतोष कैसे नर में तब्दील हो गया था और उसेे नारी मान बैठा था। यानि कायिक प्रयोगों का प्राकृतिक उत्पाद। जंगल की शुचिता किसी को मनमानी तो करने नहीं देती, फिर देह कैसे मनमानी पर उतर गई? यानि आपसी सहमति जंगल के लिए भी शुचितापूर्ण होती है। संतोष सुरक्षा को लेकर तनाव में था ही, जो होना था हो चुका था। पर संतोष नर और नारी के औचक हुए अन्तर्लयन से परेशान था। वह अपराधबोध से ग्रसित हो चुका था। एक ऐसा अपराध जिसका वहअकेले अपराधी नहीं था। वह अपनी दृढ़ता नहीं बचाए रख सका। यह तो कमजोरी है। यानि वह कहीं भी विचलित हो सकता है, उसकी अपनी दृढ़ता पर संदेह हुआ। यह तो गलत है। अपनी टूट चुकी दृढ़ता से संतोष कांपने लगा था। एक मजबूत इच्छाशक्ति का आदमी, कुमुद के सामने कांप रहा था, वह अपराधबोध का शिकार हो चुका था। उसे लग रहा था कि वह अपने तन की शुचिता बचाने में असफल हुआ है। यही तो कुमुद भी महसूस रही थी, पर उसनेे उस घटना को स्वाभाविक माना और अप्रायोजित भी। जिसके लिए उन दोनों ने कोई योजना नहीं बनाई थी। यही सच भी था, पर संतोष तो खुद में डूब गया था, उसे लग रहा था कि उसने जंगल की शुचिता को तोड़ा है। जंगल की ‘जंग’ वाली सभ्यता में ऐसा नहीं होता। ‘कुमुद यह क्या हो गया? तुमने भी नहीं रोका, तुमको तो रोकना चाहिए था, तब शायद हम खुद को बचा पाते। देह तो वैसे भी कई तरह के खेल खेलती है, पर हमें तो दैहिक खेलों की मनोरंजकता से खुद को बचाना चाहिए था। अब यह क्या है कि हम देह की मनोरंजकता में गोते लगाते रहें और मन को निरंकुश छोड़ दंे। हमें दैहिक करतबों पर खुद ही तो अंकुश लगाना होगा।’ संतोष को कुमुद लगातार देख रही थी, उसके देखने में संतोष का चेहरा तो था ही, उसके चेहरे की सकुचाई मुद्रंाए भी थीं।कृउन मुद्राओं को देख पाना उस समय कुमुद के लिए कठिन था। अपराधी तो वह भी थी, कुमुद ने संतोष को रोका...कृ ‘कुछ चीजें किसी योजना और विचार की प्रतिक्षा नहीं करतीं संतोष! मुझे तो डर है कि तुम मेरे बारे में जाने कैसा निर्णय लो, सोचने गुनने को तो तुम यह भी सोच सकते हो कि तुम्हारे दैहिक करतबों में गोते लगाने के लिए मैं तुम्हारे साथ हूॅं, पर ऐसा नहीं है संतोष! मैं तुम्हारी देह की लालची नहीं हूॅं और न ही उसके बाबत मेरे पास कोई योजना है। मैं तो तुम्हारे दिमाग और साहस की गुलाम हूॅं, और उसी के कारण जंगल की खाक छान रही हूॅ। अब तो तुम्हारी मनुष्यता भी मैंने देख लिया है, तुम मनुष्य, पहले हो बाद में कुछ हो। आज की बदलती और अपने में डूब जाने वाली दुनिया में ऐसा क्या है कि अपनी जान की परवाह किये बिना तुम, सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हो। मैं कुछ नहीं कह सकती कि हम दोनों के बीच जो हुआ वह कैसे हो गया। हम सचेतन होते हुए भी कैसे अपने अपने अवचेतन के शिकार हो गये? ऐसा तो कत्तई संभावित नहीं था। ऐसा तो हम दोनों के लिए असंभावित था। लगता है संभावित और असंभावित के बीच भी कोई अटूट रिश्ता होता है। मेरा मानना है कि असंभावित घटनाओं को प्रकृति का कोई अज्ञात नियम मान कर हमें, दूसरी बातों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और यहां से निकल जाने के बारे में सोचना चाहिए। सो मैं तो कहूॅंगी कि तुम जो हुआ उसे भूल जाओ। और जो हो सकता है उसके बारे में सोचो, अब हमें कहां जाना है, कुछ तय करो।’ अचानक कुमुद के हाथ संतोष के माथे पर पहंुच गये और वह उसे दुलारने लगी। उसेे लगा कि अपनत्व ही नहीं ममत्व भी उभर आया है उसके चेहरे पर, फिर तो कुमुद ने संतोष को अपनी बांहों में जकड़ लिया। यह सब कैसे हो रहा था उसे नहीं पता। ऐसा ही तो हुआ मनीश के साथ उसे शद आया। वह क्षण ही अजीब था, उस क्षण का साक्षात्कार उसकेे लिए कठिन था और उसकी अभिव्यक्ति उससे भी कठिन। उस क्षण को केवल महसूसा जा सकता है, जिया जा सकता है, केवल इतना ही। जंगल से अलग की कुमुद की जो दुनिया थी, वह जानी पहचानी थी, उस दुनिया में वह खुल और खिल जाया करती थी। पहले वह सोचती थी कि यह जो जीवन है, बहुत ही सरल है, पर जंगल में होने के बाद, उसे लगने लगा कि बहुत ही जटिल और खुरदुरा है। इसके हर पड़ाव पर कोई न कोई बाधा मुंह बाए खड़ी रहती है। जो जीवन की सारी हसियों को लील जाती है। पर उसे थोड़ा साहस से देखो तो जान पड़ता है कि यह जो जीवन है नऽ, है बहुत ही हसीन और चूमने लायक है, बाधांए तो आती रहती हैं, बाधाओं से लड़ने का मजा जंगल की निर्विकार उन्मुक्तता की तरह है। वामधारा वालों के साथ रहते हुए कुमुद समझने लगी है कि ये जो वामधारा के लोग हैं तमाम तरह के झंझावातों में भी हसने और झूमने का मौका निकाल ही लेते हैं। गोलियां चल रही होती हैं, फिर भी उनके चेहरे पर तनाव नहीं होता। मुठभेड़ वाली घटना, साधारण घटना तो थी नहीं थी। संतोष के कई साथी गोलियों के शिकार हो चुके थे फिर भी उसने घीरज और साहस नहीं छोड़ा, जाने कौन सी ऊर्जा है संतोष के पास कि भयानक घटना के बाद भी खुद को नियंत्रित किये हुए था। है नऽ अचरज की बात। वह सामान्य से भी सामान्य था, उस समय, जैसे उसे पता हो कि यह सब तो होगा ही। जिस आदमी को बन्दूकें हताश नहीं कर पाईं, वही आदमी दैहिक भाषा के व्याकरणों से हताश हो गया। उसे सामाजिक वर्जनाओं ने जकड़ लिया। अचानक कुमुद सोचों की दुनिया में चली गई। दैहिक रिश्तेों की वर्जनायें टूट जाने पर जब संतोष परेशान हो रहा है फिर तो मेरे और संतोष के रिश्तेे के बारे में मनीश जाने क्या सोचे गुने। कभी कभी उसे लगता कि मनीश उसके सामने तनेन हो कर मजाक उड़ा रहा है.‘वाह वाह कुमुद! चुन लिया तूंने अपना नायक। शायद यही तुम्हारा अभिष्ट था। वैसे मैं तुम्हें बता दूं कि मानव सभ्यता के विकास क्रम में कभी भी गोलियों की भाषा स्वीकार्य नहीं रही है। गोलियों के करतबों से दुनिया बदल जायेगी, यह कैसे संभव है? अगर तूं सोच रही है कि अपने दिल दिमाग पर संतोष के हिंसक करतबों को चिपका कर उद्धरणीय बन सकती हो, तो गलत सोच रही हो। हिंसा से किसी सभ्यता का दूर दूर तक नाता नहीं। संभव है दैहिक भाषा रचने व गढ़ने के लिए तुम संतोष के साथ जुड़ी हो। इस मामले में तुम स्वतंत्रा हो, मन से भी और तन से भी, कोई क्या कर सकता है उस बारे मंे। ‘अचानक कुमुद को लगा कि मनीश गुस्से में फटकारते हुए अपने घर से उसे निकाल रहा ह...ैकृ ‘अब मेरे पास किस लिए आई हो? जाओ अपने कामरेड संतोष के पास। क्या तुम मेरे घर से चले जाने को उचित मानती हो? तुझे साफ साफ बता देना चाहिए था कि तूं जंगल के प्रति रुचि रखती हो, तथा संतोष के प्रतिरोधी शक्ति के प्रति भी। संतोष ही तुम्हारा तारगेट है। निकल जाओ मेरे घर से।’ कुमुद तो भावावेश में थी, उसके सामने जंगल और जंगल की कहानियां पसरी हुई थीकृभले ही मनीश उसके सामने नहीं था, पर वह कुमुद की सोचों में था...कृवस्तुतः अगर वहां मनीश होता तो यही बोलता। उससे जंगल की कहानियों से क्या लेना देना। वह तो कुमुद के लिए महत्वपूर्ण होंगी तो हुआ करेंकृकुमुद ने खुद को संभाला....कृ बात सच भी है। मनीश को भला कैसे अच्छा लग सकता है, किसी प्रतिनायक के साथ जुड़ जाना। उसे तो लग रहा होगा कि मैं मर्दखोर हूॅ पर मर्दों को क्या पता कि..कृ ‘जुड़ाव किसी विशेष पड़ाव का मोहताज नहीं होता, वह खुद पड़ाव बना लेता है। सच में संतोष का साथ एक पड़ाव ही था, मन की गुफा से निकला हुआ एक अदृश्य पड़ाव। जहां वे दोनों, एक दूसरे में बिना किसी योजना के अन्तर्लयित हो गये थे। अगर ऐसा नहीं होता फिर तो वे देह के करतबों की पुनरावृत्ति में लग जाते और तन की गुफा के एक एक कोने को देखते पर ऐसा नहीं हुआ। समय ने उन्हें कृति में बदल दिया था, वे एक ही कृति थे भी, एक दूसरे में विलयित होकर कहानी से गाथा बन गये। किसी को बताने की क्या जरूरत कि संतोष क्या है? नायक, प्रतिनायक। जंगल का एंकात, उसकी खोमोशी, और रात, ये सभी मन के नायक, प्रतिनायक होते हैं।और यही हमें भी एक दूसरे में विलयित कर रहे थे। कुमुद ने खुद को सोचों से अलग किया... ‘सभी नहीं समझ सकते जंगल की बातों को व जंगल में निवास करने वालों को, ऐसा मैं समझ सकती हूॅं,’ कुमुद को पता है कि संतोष उसके चोरी छिपे, मनीश से मिलने के लिए शहर गया था। संतोष ने मनीश से क्या बातें की? उसे नहीं पता पर अनुमान है कि संतोष ने उसके बारे में ही बातें की होगी कि मनीश उसे जंगल से बाहर निकाल ले। संतोष चाहता है कि वह जंगल से बाहर रहे जिससे जंगल कोई कहानी उसकेे जिस्म पर चस्पा न कर सके।कृजंगल में मंगल है, जीवन जीने की स्वतंत्राआकांक्षा है, वहां के पत्ते पत्ते पर मुक्तता के छन्द लिखे हुए होते हैं, जिसने उन छन्दों को पढ़ लिया फिर तो वह जंगल का हो गया, उसके लिए न कोई कानून है, न कोई धर्म, न कोई जाति है न और न ही कोई परिवार। जो प्रकृति के अनुशासनों के पक्षधर नहीं हैं, जंगल स्वतः उन्हें अपना विरोधी बना लेता है।’ जंगल के नियमों के बारे में मनीश को क्या पता, उसके दिमाग में तो भद्रता के राग हैं। भला वह कैसे जान सकता है, जंगल के बारे मेंकृशायद ही मनीश समझ पाये संतोष की बातें...कृ कुमद जानती है कि संतोष उसे जंगल का नागरिक नहीं बनने देना चाहता। सो उसने मनीश को तरह तरह से समझाया होगा....कृकृकृ ‘तुम कुमुद को अपने पास रोक लो, किसी भी तरह से, उसे जंगल मत जाने देना, मैं नहीं चहता कि कुमुद खुद को बारूदी बना ले और बन्दूक चलाये। ऐसा करना न तो समय की मांग है और न ही कोई जरूरत। वह भावुकता वश मुझसे जुड़ गई है, और सोचती है कि मैं उसकी भावनाओं में गोते लगाने लगूंगा।’ तुम समझ सकते हो मनीश! मेरे लिए किसी वसंत या फगुनहटी बयार का कोई मतलब नहीं, दरअसल कुमुद के लिए मुझे तेरे पास आना पड़ा। कुमुद का मेरे संगठन के साथ रहना ठीक नहीं, वह जरूरत से अधिक भावुक है.किसी तरह उसे अपने पास बुला लो।’ कुमुद सपनों की बातें दिन में सोच रही थी। उसे अक्सर मनीश का ख्याल आ जाता है लगता कि दोनों आमने सामने बाते कर रहे हैं और मनीश कुमुद की शुचिता पर सवाल खड़े कर रहा है।कृएक तरह से कुमुद ने अवचेतन में ही सही, शुचिता के जालों से खुद को बांध लिया है। परेशान होने पर जालों को तोड़ने लगती है। पर शुचिता के जालों को तोड़ना आसान तो होता नहीं...कृ ‘यातना की पूर्ववर्ती कथाओं में ही तो होते हैं जनमूलक कथाओं के बीज ’ कुमुद संतोष के साथ जंगल दर जंगल भटक रही थी। वह वाम उग्रवादियों के साथ दर दर भटक कर उन्हें नजदीक से देख और समझ रही थी। उनकी एक एक गतिविधियों को विश्लेषित करने की कोशिश करती। उसके देखने में था कि जंगल भी आदिवासियों और गरीबों की चीखों के साथ चीख रहा है, यातनाओं से कराह रहा है। आश्वासनों और मानसिक सहयोगों के द्वारा वामउग्रवादी आदिवासियों में जीवन जीते रहने की भावनायें जगाये रखने के प्रयासों में लगे हुए हैं, वर्ना जंगल के आदिवासी, वनवासी तो निराश और हताश हो चुके हैं...उनसे जीवन जीने की सारी लालसायें छीनी जा चुकी हैं। एक दिन कुमुद संतोष के क्लास में थी.. वह दिन संतोष के क्लास का था.. जाड़े का दिन था। समतल पहड़ी पर तीस के आस पास आदिवासी युवक बैठे हुए थे। सामने थोड़े ऊंचे स्थान पर संतोष ने कुमुद को भी अपने पास बिठा लिया। सुबह का समय था वहां संतोष के पहुंचते ही जोरदार नारा लगा...कृ ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘लाल सलाम जिन्दावाद’ नारे के बाद संतोष ने, क्लास को पढ़ाना शुरू किया...कृ ‘तो साथियों! आज हम कठिन समय में हैं, और देश का जिम्मेवार नागरिक होने के नाते हमारा दायित्व है कि आज के जटिल समय से हम टकरायें। विगत दिनों में हम ‘पूंजी’ तथा ‘श्रम’ व ‘अतिरिक्त श्रम’ ‘लाभ’ और ‘अतिरिक्त लाभ’ के बारे में चर्चा कर चुके हैं उन्हीं चर्चाओं के दौरान हम सभी ने समान न्याय तथा समान शिक्षा संहिता के बारे में भी चर्चा किया था, तो क्या आज हम ‘कल’ के सीखे हुए पाठों को दुहरायेंगे या नया पाठ आरंभ करेंगे?’ एक समवेत आवाज...कृ ‘आगे का नहीं नहीं गुरू जी! आज फिर ‘पूंजी’ के बारे में ही पढ़ायें, यह जो ‘पूंजी’ है, है क्या चीज? ‘पूंजी’ समाज को कई कई खानों में कैसे बांट देती है?’ ‘ठीक है, आज हम फिर ‘पूंजी’ पर ही चर्चा करेंगे, पर कुछ सवालों का जबाब आप लोग हमें बतायें।’ ‘सामने एक बड़ा सा पेड़ दीख रहा है, उस पेड़ को किसने उगाया है?’ ‘गुरूजी! वह तो अपने से जामा है, किसी ने उगाया नाहीं है।’ ‘जिस जगह पर आप बैठे हुए हैं, वह जमीन किसकी है?’ ‘जंगल विभाग की है गुरूजी!’ समवेत उत्तर आया ‘उसे किसने बनाया है?’ ‘प्रकृति ने बनाया है।’ ‘यह जो धरती है, उसे किसने बनाया है?’ ‘उसे भी प्रकृति ने बनाया है।’ ‘धरती पर किसका नाम तथा कब्जा है, धरती को किसने बांटा है?’ ‘ताकतवर लोगों के नाम हैं, बकिया सरकारी हैै, सरकारी जमीनों पर भी ताकतवरों के कब्जे हैं, उन्ही लोगों ने बांटा है धरती को’ ‘जिन लोगों के धरती पर नाम तथा कब्जे हैं, क्या उन लोगों ने धरती बनाया है?’ ‘नाहीं गुरूजी! भला कोई आदमी धरती, नदी, नाले और पहाड़ कैसे बना सकता है?’ ‘तो बताइए, यह जो धरती है, उसे फिर ताकतवर लोगों ने आपस में कैसे बांट लिया? क्या कोई धरती बांट सकता है?’ अगर बांट लिया है तो क्या उचित है?’ ‘नाही गुरूजी! कोई धरती नहीं बांट सकता। धरती तो सबकी है पर आज तो धरती उसी के पास है, जिसके हाथ में कानून है, जो ताकतवर हैं’ ‘और हम लोग, यह जो लड़ाई लड़ रहे हैं, किस बात की लड़ाई लड़ रहे हैं?’ ‘बराबरी की, अपने अधिकारों की रक्षा की, मनुष्य बने रह सकने की’ ‘किस बात की बराबरी?’ ‘साधन, संसाधन, कानून और न्याय में बराबरी की, समान नागरिकता की, सामाजिक न्याय की, समान शिक्षा की, हर हाथ को काम, हर खेत को पानी की, निःशुल्क पढ़ाई तथा दवाई की, वैयक्तिक संप्रभुता, सुरक्षा तथा सामाजिक न्याय की, जैसा कि हमारा संविधान गारंटी देता है’ ‘आपको पता है कि बराबरी की लड़ाई लड़ने के कारण, हमारे कुछ साथियों की पुलिस ने हत्या कर दिया है, ऐसी हालत में हमें क्या करना चाहिए?’ ‘हमें बदला लेना चाहिए’ समवेत स्वर.... ‘बदला लेना चाहिए, बदला, बदला,कृजान का बदले जान और कुछ नहीं।’ ‘बदला तो ठीक है, पर जिनसे बदला लेना है, वे लोग भी तो हमारे ही लोग हैं, कोई उनमें सिपाही है, तो कोई मास्टर, अमीन, लेखपाल, डाक्टर, वकील, ऐसे ही बहुत से अपने लोग हैं, जो जमीनों तथा नौकरियों पर काबिज हैं। क्या अपने लोगों से बदला लेना ठीक होगा? यह तो उचित नहीं।’ फिर वहां एक डरावनी खामोशी पसर गई। सभी खामोश हो जाते हैं, बैठे हुए लोग एक दूसरे को देखने लगते हैं...कृ संतोष जानता है कि समाज में भिन्नता व रंजिश पैदा करने वाले लोग सत्ताप्रबंधनसे जुड़े हुए होते हैं तथा वे भी अपने ही लोग होते हैं। कुछ सोच कर संतोष फिर बोलने लगता है.... ‘हमें सत्ताप्रबंधनसे जुड़े लोगों से बदला लेने के बजाय उन लोगों को भी अपने बदलाव वाले अभियान से जोड़ना होगा। इस बाबत हम कोशिश भी कर रहे हैं। अगर हमारी कोशिश ठीक है तो वे लोग भी हमारे साथ किसी न किसी दिन जुड़ेंगे ही। उन लोगों को समझना ही होगा कि किसी भी समाज का भला तब तक नहीं हो सकता जब तक आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पूरा समाज लगभग बराबर न हो।कृविषमता किसी भी तरह की हो मानव सभ्यता के लिए कलंक होती है।’ कुमद पहली बार एक ऐसी कक्षा में प्रतिभाग कर रही थी, जिसकी उसे कल्पना तक नहीं थी। इस तरह की लोकशिक्षा। लोकशिक्षा के द्वारा भी लोगों को समझा बुझा कर जागरूक किया जा सकता है। वह उस कक्षा में दिए जाने वाले उत्तरों व सवालों को अपने हिसाब से विश्लेषितकर रही थी, तभी संतोष ने कक्षा में पढ़ाये जाने वाले विषय का रूख ही बदल दिया। साथियों! आप लोग कुमुद जी को नहीं जानते होंगे, ये पहली बार आप लोगों से मिल रही हैं। काफी पढ़ी लिखी हैं, पत्राकार व लेखक हैं। ये हमारे संगठन के बारे में जानना चाहती हैं। हमारे संगठन के लोग सामाजिक बदलाव के लिए जान की बाजी कैसे और क्यों लगा दिया करते हैं? हमारे संगठन का लक्ष्य क्या है, आदि आदि। इनसे मैं निवेदन करूंगा कि ये हमें बतायें कि सामाजिक बदलाव के लिए हमें क्या करना चाहिए? क्या हम जो कर रहे हैं, गलत कर रहे हैं? कुमुद तो अवाक...कृउसे अन्दाजा नहीं था कि उसे भी अद्भुत किस्म की कक्षा में कुछ बोलना पड़ेगा, आखिर वह क्या बोलेगी? संतोष के कहने के बाद तो उसे बोलना ही था।कृकुमुद ने बोलना शुरू किया...कृ ‘साथियों! करीब दो महीने से मैं आप लोगों के साथ हूॅ।कृसंतोष जी को मैं अपने साथ जोड़े रखने के लिए धन्यवाद दे रही हूॅ। नहीं तो कोई और होता तो मुझे खदेड़ देता, भगा देता, मेरे ऊपर जासूस होने का सन्देह करता, पर ऐसा नहीं हुआ मेरे साथ, यह मेरे लिए बड़ी बात है।’ ‘पढ़ाई के समय मैं आप लोगों के बारे में सुनती थी। आप लोगों की खबरों से अखबार रंगे होते थे। भला आज के प्रतिस्पर्धा व वैयक्तिक विकास वाले समय में, समाज बदल के लिए कोई जान की बाजी क्यों लगायेगा? आज का समय तो खुद के विकास करने का है, समाज से क्या लेना देना,कृसमाज विकसित हो, न हो, यह सब मुझे अचरज भरा लगता था।’ ‘आप लोगों के साथ रहते हुए मुझे जान पड़ा कि व्यक्तिवादी, बाजारवादी, उपभोक्तावादी समय में भी कुछ लोग जागरूक और वलिदानी हो सकते हैं। मुझे खुशी है कि आपलोग परिणामवादी नहीं हैं, अकेले के विकास के बजाय समाज विकसित हो, इसके लिए आपलोग प्रयासरत हैं। मैं नहीं जानती, कल क्या होने वाला हैै? लोकतंत्रा में यह जो लोकशाही लिए हुए नौरकरशाही का रसायन, तानाशाही के रूप में कार्य कर रहा है, वह कैसे बदलेगा? वास्तविक जनता के हाथ में हुकूमत कब आयेगी? मुझे नहीं पता...पर मुझे यकीन है कि यह जो समाज है, एक दिन जरूर बदलेगा। एक दिन शोषित प्रताड़ित जनता भी गर्दन उठा कर आकाश की तरफ मुठ्ठियां लहरा सकगीे। मुझे पता है कि समाज की यह जो भोथरी व्यवहारलिपि है खुद के विकास वाली, केवल अपना देखने वाली, वह भी आने वाले समय में निश्चित रूप से बदलेगी। एक बात और मैं कहना चाहूंगी आप लोगों से कृपया अन्यथा न लेंगे आप लोग। आप भी जानते हैं कि यह जो बन्दूकंे होती हैं न किसी का भला नहीं करतीं सो इस बाबत आप लोगों को भी प्रयास करना चाहिए कि मानव सभ्यता से बन्दूकंे गायब हो जांए। बन्दूकें न आप चलांए और न ही पुलिस चलाए। आपलोगों केा मेरी शुभकामनायें हैं, आप लोगों से बातचीत करने का यह जो अवसर मुझे मिला, यह मेरे लिए यादगार होगा।कृइसे मैं कभी नहीं भूल सकती। अगर मैं कुछ ऐसा बोल गई होऊं जिसे नहीं बोलना चाहिए था तो उसके लिए आप लोग मुझे क्षमा करें, धन्यवाद।’ क्लास करीब एक घंटे तक चला। अपने वक्तव्य के बाद कुमुद डरने लगी थी। बन्दूक चलाने वालों के बीच बन्दूकें न चलाने की बात उसे नहीं करना चाहिए था। अगर कामरेड गरम हो जाते तब....पर उसे तो जो कहना था कह दिया था। गनीमत थी कि क्लास में बैठे कामरेड उस पर नाराज नहीं हुए, वे नाराज होते भी नहीं वे जानते थे कि कुमुद भी तो सुभाशितों वाले समाज की है जो केवल नसीहतें ही देना जानता है। एक घंटे बाद संतोष के साथ कुमुद पड़ाव पर चली आई। पड़ाव पर खाना कहीं से आया हुआ था। खाना किसी विशेष हितैषी के यहां से आया था। खाने का प्रबंध संगठन के कार्यकर्ताओं को नहीं करना पड़ा। मिल बांट कर खाने वाले जंगल के तमाम ऐसे रहवासी हैं, जो नक्सलियों को खाना खिलाने में गर्व महसूस करते हैं।कृ उन्हें लगता है कि नक्सलाईट मनुष्यता की रक्षा करने का काम कर रहे हैं।कृवे नक्सलियों की वलिदानी भावना के सम्मान में मदत करना अपना काम समझते हैं। एनकाउन्टर में मारे गये नक्सलियों के घरों से संतोष लौट आया था। उनके घरों में चूल्हे नहीं जल रहे थे, घरों में अनाज नहीं था, रुपया कहां से होता? वह उनके परिवारों की सहायता करने के लिए परेशान था। अपने एक सहयोगी के यहां सन्देशा भिजवाया था, सहयोग करने के बाबत, पर क्या हुआ था, संतोष को नहीं पता। संतोष ने एक कार्यकर्ता से उस बाबत पूछा...कृ ‘क्या हुआ पीड़ित परिवारों के पास सहायता पहुंची कि नहीं पहुंची?’ ‘अभी नहीं पहुंच पायी है ’ ‘काहे, का दिक्कत है ?’ ‘दिक्कत है, उधर पुलिस की गहन काम्बिग हो रही है।’ ‘तो काम्बिग होने के कारण कोई खाना नहीं खायेगा!’ ‘अनाज, पानी कैसे पहंुचाया जा सकता है, अनाज जायेगा किसी साधन से ही, और साधन इस समय है नहींकृपुलिस पकड़ सकती है।’ ‘हमें उन परिवारों की सहायता गॉव के भाइयों द्वारा गॉव में ही करवानी होगी..कृकृउनसे विनती करो, उनको अपने साथ जोड़ो’ ‘वही तो हो रहा है, गॉव के लोगों के जिम्मे ही एक एक परिवार के लिए खाना का प्रबंध सौंप दिया दिया गया है। ‘कोई दिक्कत’ ‘नहीं,ं वे लोग उत्साह के साथ मदत कर रहे हैं, वे जानते हैं कि कल उन पर भी पुलिस टूट सकती है’ दो चार दिन से संतोष परेशान है, हाल में हुए एनकाउन्टर के कारण और दूसरा कुमुद के कारण। उसकेे तीन साथी पुलिस द्वारा मारे जा चुके थे। संतोष जानता है, कि संगठन खड़ा करना बहुत कठिन होता है। किसी तरह से उसने संगठन खड़ा किया है। उसके एक एक साथी इसी तरह से मारे जाते रहे फिर तो संगठन बिखर जायेगा। वह तब क्या करेगा? उसका संकल्प अधूरा रह जायेगा। भला वह अपने पुरखों के वलिदानों को कैसे भूल सकता है? कुछ भी कहा जाये गरीबों के लिए एक ही रास्ता है, जूरा महतो व बुद्धू भगत वाला, विरसा मुण्डा वाला। विरसा मुण्डा का वलिदान तो सारी दुनिया जानती है, पर जूरा तथा बुद्धू भगत के बहादुराना वलिदान को कम लोग ही जानते हैं। लोग तो लक्ष्मण सिंह को भी नहीं जानते जिन्होंने विजयगढ़ राज से अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। छह महीने तक अंग्रेज विजयगढ़ राज की तरफ न देख पाये थे। अंग्रेजों ने धोखे से उनकी भी हत्या कर दी थी। संतोष संगठन खड़ा करने के समय के कुछ साथी, आज भी जिन्दा हैं तथा उसके साथ हैं। उस समय किसी तरह से उसे एक दो लोग मिले और उसने उनसे बातें की। सबसे पहले संतोष ने उन लोगों से संपर्क बढ़ाया जो प्रताड़ित थे, और किसी न किसी प्रकार से प्रताड़ित किये जा रहे थे। संतोष ने उनकी समस्याओं को निराकरण के लिए थाना और कचहरी एक कर दिया था। उसे लगा था कि अधिकारियों से मिल मिला कर समस्याओं के समाधान निकाले जा सकते हैं, पर सफलता नहीं मिली। अधिकारी भला उसकी क्यों सुनते? वे तो वैभव व संभ्रान्तता की घोल से निकले होते हैं। सो उसे सफलता मिलती भी कैसे? संतोष अपने क्षेत्रा में लोकतांत्रिक ढंग से प्रताड़ितों की लडाई लड़ रहा था पर उसका प्रताड़ितों के साथ खड़ा होना संभ्रांत लोगों को बुरा लगता था। एक दिन कथित संभ्रंान्तों ने उसके घर पर हमला बोल दिया...कृ ‘साला नेता बनता है, कलक्टर के यहां दरखास देता है, थाने पर जाता है’ बात छोटी थी, पर किसी क्लासिकल कथा की तरह बढ़ गई, संतोष लड़ पड़ा संभ्रांतों से फिर तो मार पीट, कतल। उस घटना में उसका एक भाई भी मारा गया। दूसरा घायल हो गया, उसका घर जला दिया गया। दूसरा भाई जो घायल था, उसकी सांसे चल रही थी, उसे लेकर संतोष थाने पहुंचा, वहां रपट नहीं लिखी गई, संतोष को थाने पर भी मारा पीटा गया। संतोष भाई को लेकर अस्पताल गया। पर अस्पताल के कमरे तो उसका इलाज करते नहीं। अस्पताल से भी उसे भगा दिया गया। उसका भाई अस्पताल से लौटते समय रास्ते में मर गया। संतोष भाइयों के क्रियाकर्म के बारे में गुन रहा था, गॉव पर ही किया जायेगा। संतोष को क्या पता कि प्रशासन एक अलग किस्म की कहानी रच रहा है। कहानी, पुलिस प्रशासन को धिक्कारने वाली थी। प्रशासन ने संतोष के दोनों भाइयों की हत्या को मुठभेड़ में हुई मौत बना दिया। गॉव के संभ्रांत तो चाहते ही थे कि ऐसा ही हो। फिर तो पोस्टमार्टम तथा कानूनी कार्यवाहियॉ। अस्पताल पर तमाम पत्राकारों को बुला लिया गया, उन्हें बताया गया कि मुठभेड़ में एक नक्सलाईट घायल हो गया है तथा दूसरा मारा गया है, इनकी तलाश लम्बे समय से चल रही थी। पत्राकार भी पुलिस की सक्रियता पर खुश खुश थे। पुलिस की खूब वाह वाही हुई। संतोष पढ़ा लिखा था वह समझ सकता था कि उसके साथ किस प्रकार का कानूनी खेल खेला जा रहा है। संतोष ने थाने पर ही दारोगा से कहा था...कृ ‘साहब आप गलत कर रहे हो, मेरे भाइयों की हत्या की गई है। हत्यारे आपके सामने घूम रहे हैं। मेरे भाइयों की हत्या को आप मुठभेड़ बता रहे हो, यह गलत है। मुल्जिमों को पकडिये, वे नामजद हैं, फिर क्यों नहीं पकड़ रहे मुल्जिमों को? दारोगा संतोष पर उखड़ गया....कृ साले! तूं मुझे कानून सिखा रहा है, तेरी पढ़ाई तेरी गांड़ में घुसेड़ दूंगा समझे कि नहीं,’ फिर तो मारपीट, यातना। उसे लगा अगर उसके पास ताकत होती तो उसके भाई नहीं मारे जाते, वह भी पुलिस को मार सकता तो वे भाग जाते, ताकतवर मुल्जिमों को पुलिस इसी लिए नहीं पकड़ रही क्योंकि उनके पास ताकत होती है, रूपया होता है, हथियार होते हैं। ‘हाथ में हथियार नहीं फिर तो दिमाग में जो वुद्धि है उसका कोई अर्थ नहीं, वुद्धि की सुरक्षा के लिए हाथ की मजबूती जरूरी है। वुद्धि क्या करेगी बन्दूक के आगे’ पोटमार्टम के बाद दोनों भाइयों की लाशें संतोष को सौप दी गईं। संतोष लाशों को लेकर गॉव आया और फिर क्रियाकर्म। गनीमत थी कि गॉव के गरीब लोगों ने उसका साथ दिया और क्रियाकर्म निपट गया। सत्य व अहिंसा के समर्थक संतोष को वामउग्रवाद की एक नई कथाभूमि की तरफ तरफ मुड़ना पड़ गया। यातना की पूर्ववर्ती कथाओं में ही तो होते हैं जनमूलक कथाओं के बीज, जो भले ही कुदरती न हों। संतोष के साथ अन्याय हुआ था, उसकी सहनशीलता तोड़ दी गई थी। उसे पता है कि सफलता गरीबों से बहुत दूर होती है। मौजूदा सिस्टम में अधिकारी केवल प्रभावशालियों का काम करते हैं और उन्हीं की सुनते हैं। संतोष अपने भाइयों की हत्या की जांच के लिए आफिस दर आफिस घूमता रहा। उसने मुख्यमंत्राी से लेकर प्रधानमंत्राी तक को पत्रा भेजा। उसकी दूसरी प्रतियों को पुलिस के आला अधिकारियों को भेजा। पर कुछ परिणाम नहीं निकला। संतोष के सामने एक ही रास्ता बचा था स्थानीय अधिकारियों से मिलने का, उसने वैसा किया भी। वह स्थानीय एस.पी. व जिलाधिकारी से भी मिला। जिलाधिकारी के बारे में चर्चा थी कि वह जनता का काम रूचि के साथ करता है। तथा स्वयं दलित व उत्पीड़ित समुदाय का है भी। जिलाधिकारी उत्पीड़ित के दुख को सुन व गुन सकता है। फिर तो एक दिन संतोष जिलाधिकारी के कार्यालय जा पहुंचा। पंरंपरा के अनुसार उसने एक छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिखा और चपरासी को कागज थमा दिया। करीब आधे घंटे बाद चपरासी ने उसे साहब से मिलने के लिए कहा फिर वह जिलाधिकारी के कक्ष में था। जिलाधिकारी का कक्ष किसी हाल की तरह दिख रहा था। उसमें करीने से तमाम कुर्सियां रखी हुई थी दिखता था कि कोई कलाकृति बनायी गई है। संतोष के मन में हुआ कि उसे कुर्सी पर बैठ जाना चाहिए, पर वह खड़ा रहा शायद उसके बैठने को अशिष्टता मान लिया जाता सो वह कुर्सी पर नहीं बैठा। ‘क्या है?’ साहब ने संतोष से पूछाकृ संतोष ने अपना प्रार्थना पत्राजिलाधिकारी को दे दिया...कृ जिलाधिकारी ने पत्रा ले लिया उसे कुछ पढ़ा और तुरंत उस पर कुछ लिख दियाकृ प्रार्थनापत्रापर कुछ लिख देने के बाद जिलाधिकारी ने संतोष से कहा...कृ ‘अब आप जाओ, रिपोर्ट आने के बाद, मैं कुछ न कुछ करूंगा’ ‘ठीक है साहब पर मैं प्रस्तुत प्रार्थना पत्रा के बाबत आपको कुछ तथ्य बताना चाहता हूॅं’। संतोष ने जिलाधिकारी से आतर भाव में कहा...कृ ‘बताना क्या है, प्रार्थना पत्रा में लिख दिया है नऽ आपने, फिर क्या बतानाकृहमारे पास इतना समय नहीं कि एक एक आदमी की बातें सुनता रहूॅं।’ ‘अरे साहब ऐसा नहीं, मैं आपका समय बर्बाद नहीं करना चाहता, मैं बताना चाहता हूॅं कि मेरे गॉव के दबंगों ने मेरे भाइयों की हत्या किया है, मेरे भाई शान्तिप्रिय लोग थे। वे वामउग्रवादी नहीं थे, वे किसान थे तथा खेती बारी करते थे। पुलिए उनकी हत्या को मुठभेड़ बता रही है, आप जांच करालें साहब! पूरा क्षेत्रा जानता है इस घटना के बारे में, जिन लोगों ने मेरे भाइयों को मारा है वे लोग मेरी भी हत्या कर सकते हैं साहब! अगर मुझे मार दिया गया फिर तो मेरा परिवार खाये बिना मर जायेगा! मेरी बूढ़ी अइया है, दो भउजाइयां हैं जो अब विधवा हो गई हैैंं, तीन बच्चे हैं, उनकी परवरिश कैसे होगी साहेब!’ साहब ने संतोष को डांटा...कृ ‘तेरी हत्या काहे होगी?ं तेरे भाई नक्सलाइट थे मारे गये। मुठभेड़ में मारे जाने के बाद नक्सलाइटों के घर वाले तेरे जैसा ही रोते हैं। तेरे रोने से का होगा। अब कुछ नहीं हो सकता, सारी रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी हैं ’ संतोष जिलाधिकारी के सामने अवाक, अब क्या बोले, उसकी कोई नहीं सुनेगा। अचानक संतोष बोल उठा...कृ ‘जो होगा देखा जायेगा’ ‘एक कृपा कर दीजिए साहेब!, मेरा भी एनकाउन्टर करा दीजिए, ऐसा आप कर व करवा सकते हैं। मैं जिन्दा रह कर क्या करूंगा। मुझे पता है कि साठ साल बाद आप रिटायर हो जायेंगे फिर क्या करेंगे आप? कम से कम मेरा एनकाउन्टर तो करा दीजिए, आपको बहुत यश मिलेगा साहेब।’ जिलाधिकारी हिल गया...क्या बोल रहा यह आदमी? जिलाधिकारी को पता है कि लाखों लोग बिना रोजी, रोजगार के आसमान के नीचे रह रहे हैं, लोगों के पास मकान बनाने के लिए जमीन तक नहीं है। उसे पता है कि सोनभद्र कभी आदिवासियों का था, वे ही यहां के राजा हुआ करते थे। आज वे अपनी ही जमीन से बेदखल किए जा चुके हैं। इनके लिए कुछ करना चाहिए संतोष भी ठीक बोल रहा, अगर कुछ नहीं किया गया तो यह भी नक्सलाइट बन जायेगा पर क्या कर सकता है वह? कुछ भी तो नहीं। अधिकारी बनते ही उसे पता चल गया था कि अपनी जाति कौन कहे अपने वर्ग के लिए भी वह कुछ नहीं कर सकता, केवल अपने लिए कुछ कर सकता है, रूपया कमा सकता है, सुविधाओं के लाभ ले सकता है, बस इतना ही।कृ संतोष जिलाधिकारी के कार्यालय में बड़बड़ाता रहा। जिलाधिकारी आफिस से निकला कहीं चला गया, बुदबुदाते हुए कि वह जनता के लिए कुछ नहीं कर सकता। संतोष जिलाधिकारी के कार्यालय से लौट आया। उसके बाद तो वह संगठन में शामिल हो गया था। उसे अच्छा नहीं लग रहा कि कुमुद उसके साथ जंगल में रहे। कुछ सक्रिय कामरेाडों ने एतराज भी किया था कि कुमुद के कारण संतोष की पकड़ भी हो सकती है। पकड़ तो घाघर वाली मुठभेड़ के दिन ही हो जाती पर नहीं हो पायी। संतोष कुमुद को निकाल लाया पकड़ से काफी दूर। पर ऐसा हरदम तो होगा नहींकृसंतोष जानता है कि कुमद तथा उसके संबध को लेकर संगठन में सवाल खड़े किये जा रहे हैं और ये सवाल पारटी मीटिंग में भी आलोचनात्मक ढंग से उठाये जा सकते हैं। फिर तो एक दिन अपने एक साथी के साथ संतोष ने कुमुद को उसके घर भेजवा दिया। कुमुद को मनीश के पास भेजकर संतोष खुश खुश था.. कुमुद संगठन के साथ रहकर आखिर परेशान ही होती वैसे भी जंगल में जंगल की तरह रहना तथा जंगल दंश झेलना सबके वश की बात नहीं। ‘शब्दबीजों को अग्निबीज बनाना इस कथा के लिए किसी भी हाल में समयनुकूल नहीं होगा’ कुमुद घर लौट आई थी। शायद वह घर वापस नहीं आती पर संतोष नहीं चाहता था कि वह उसके साथ रहे। वैसे भी कुमुद के बाबत उसके संगठन में कई तरह की आलोचनात्मक बातें होने लगीं थीं। कहा जाने लगा था कि संगठन में उसके रहने के कारण गोपनीयता भंग हो सकती है। बिगनी के संबध में भी संगठन में अच्छी राय नहीं थी। बिगनी संतोष के कारण संगठन में थी। संगठन में सबसे अधिक पढ़ा लिखा संतोष ही था तथा वह नर, नारी में अलगाव नहीं मानता था। जो दूसरे थे वे कामचलाऊ थे तथा नर, नारी में भिन्नता देखते थे। संगठन के साथ पिछड़ी जाति का एक कामरेड पियारे था जो बिगनी को अपने प्रेमजाल में फसाने का प्रयास करता रहता था पर बिगनी थी कि उससे कोसांे दूर रहा करती थी। पियारे बिगनी की जाति का था और चाहता था कि बिगनी संतोष को छोड़कर उससे नाता जोड़े, वह संतोष से काहे जुड़ी रहती है? बिगनी को एक दो बार पियारे ने छेड़ा भी था जिसकी शिकायत बिगनी ने संतोष से किया था। फिर संगठन की आपातकालीन बैठक हुई थी और पियारे को दण्डित किया गया था तथा चेतावनी दी गई थी कि वह दुबारा बिगनी से छेड़छाड़ नहीं करेगा। पियारे ने अपने साथ हुए संगठन के दण्डात्मक व्यवहार को संतोष की साजिश मानता था। संतोषने अगर चाहा होता तो उसे दण्ड नहीं दिया गया होता सो वह वह संतोष से बदला लेना चाहता था। इसी लिए उसने संगठन की बैठक में कुमुद का प्रसंग उठा दिया था पर आकस्मिक कारणों से कुमुद के संबध में संगठन की बैठक नहीं हो पाई थी। संगठन की बैठक होने के पहले ही संतोष ने संगठन के रूख का अनुमान लगाते हुए कुमुद को जंगल से भगा दिया जिससे उसके ऊपर लांक्षन न लग सके। वैसे संतोष का संगठन सरकार के दमन के दबाव में था। पड़ोसी राज्य में वामउग्रवादियों ने सी.आर.पी.एफ के जवानों पर घात लगा कर हमला कर दिया था जिससे कई सिपाही मारे गये थे सो झारखण्ड का प्रशासन ही नहीं पूरे देश की सत्ताव्यवस्था ने वामउग्रवादियों का समूल नाश करने का संकल्प ले लिया था। ऐसे में जंगल का वातावरण ज्वालामुखी के लावों से गरम हो चुका था। जंगल में हर तरफ बूटों की धमक तथा बारूदी गंध फैली हुई थी, कहीं भी आग के गोले फूट सकते हैं। वामउग्रवादियों से नाराज प्रशासन जंगल के गॉवों को कभी भी युद्धकौशल दिखाने की प्रयोगषाला बना सकता है। वामउग्रवादी किसी भी तरह से खुद को तथा अपने समर्थक गॉव वालों को सुरक्षित रखना चाहते थे सो वे यहां, वहां लगातार भाग रहे थे। सत्ताप्रबंधनकी अतिरिक्त सतर्कता के कारण उनकी नींदंे उड़ हुई थीं। यह वही समय था जब पियारे जैसे संतोष के दो साथी संगठन छोड़कर आत्मसमर्पण भी कर चुके थे। उनके आत्मसमर्पण को अखबारों ने खूब खूब उछाला था। ऐसे समय में कुमुद का संगठन में बने रहना राजनीतिक तथा सामरिक रूप से समयानुकूल नहीं था सो संतोष ने कुमुद को उसके घर वापस भेज दिया। ‘घर लौट जाओ कुमद, तुम्हारा हमलोगों के साथ रहना ठीक नहीं। हम ‘अग्निबीज’ हैं, अग्नि ने ही हमें जनमाया है और उसी में हम स्वाहा होंगे, हालांकि हम अग्नि नहीं हैं पर हमें अग्नि में ही होम होना है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक असमानताओं व क्रूरताओं से जनमे आग्निबीजों के लिए यह जो धरती है नऽ खूबसूरत और हसीन नहीं होती, हो भी नहीं सकती। वह तो भिन्नताओं व यातनाओं की लपटों से तप रही है। इसी तपन के साथ मन को बराबर तपाये तथा उसकी लपटों सेे चित्त तथा चेतन को हमें लगातार जलाये रखना है। तूं इस तपन में खुद को तपाये नहीं रख सकती कुमुद! अच्छा होगा तूं जंगल से निकल जा।’ भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद तथा लक्ष्मण सिंह की तरह के ‘अग्निबीजों’ को तूं केवल याद रख सकती हो। उन पर किताबें लिख सकती हो पर ‘अग्निबीज’ नहीं बन सकती, बनोगी भी तो तेरे मन मस्तिष्क में चेतना की तपन का दोगलपन ही होगा। सो वापस लौट जाओ कुमुद! हमें क्षमा करना कि हम कभी एक साथ समय की अज्ञात लहरों पर तैर रहे थे। हमें इसलिए भी क्षमा करना कि समय के कुछ क्षणों को हम विपरीत परिस्थितियों में भी मनोरम तथा रंजक बना पाये थे। वैसे भी तूं प्रेस रिपोर्टर है, लिखने, पढ़ने वाली, खुद को तपाना तेरे लिए समयोचित नहीं, तूं तो ‘ष्शब्दबीज’ हो आखिर शब्दों को तूं बारूदी कैसे बना सकती हो? तेरे लिए तो शब्द चित्त तथा चेतना दोनों को साधे रखने के यंत्रा हैं, फिर तूं शब्दों को आग में क्यों तपाना चाहती हो? अच्छा होगा आग में तुम न तो खुद को तपाओ न ही शब्दों को तपाओ।’ ष् ‘शब्दबीजों को अग्निबीज बनाना इस कथा के लिए किसी भी हाल में समयनुकूल नहीं होगा’। फिर कुमुद जंगल में क्या करती वह वापस अपने घर आ गई मनीश के पास। घर आते ही कुमुद ने मनीश कोे फोन किया था पर मनीश ने फोन नहीं रिसीव किया, कौन उठाये फोन। जाने कहां से फोन कर रही? संतोष ने बहुत पहले ही मनीश से कहा था कि वह वापस घर आ जायेगी, उसे अपने पास रोक लेना, जंगल की तरफ न लौटने देना, तब तो नहीं आई। अब आई है पता नहीं आई है या नहीं। मनीश ने कुमुद के फोन को गंभीरता से नहीं लिया। ‘उससे अब क्या बातें करना, संतोष के साथ जंगल में मंगल मनाये, वहीं रहे, अब वह उससे बात नहीं करेगा।’ पर मुहल्ले का उसका सहयोगी जो उसके साथ अध्यापक था, उसे क्या पता था कि मनीश कुमद के बारे में क्या सोचता है। उसकेे घर पर मनीश के मकान की चाभी थी, उस बेचारे ने कुमुद को मकान की चाभी दे दिया और फोन से मनीश को बता भी दिया कि कुमुद लौट आई है, रात का खाना मेरे घर पर खाकर फिर अपने मकान पर चली गई। मनीश कुमुद की वापसी का समाचर सुनकर प्रकृतिस्थ हो गया, क्या करे, क्या न करे, ‘उससे मिलने जाये कि नहीं, वह गांव पर था।’ वह मकान पर नहीं जायेगा, रहे कुछ दिन अकेली, अब उससे क्या मिलना। भारतीय नैतिकता ने उसे रोका, छोड़ो उसे, वह एक डार पर रहने वाली नहींकृपर नही, जाने वह किस हाल में हो...कृ ‘मकान पर जा कर कम से कम एक मित्रा के नाते उससे मिलना चाहिए, मानवीय सरोकार नहीं तोड़ने चाहिए’ ‘आखिर काहे लौट आई जंगल से?’ आजकल जंगल वामउग्रवादियों के लिए सुरक्षित नहीं रह गये हैं, रोज ही पुलिस तथा अर्धसैनिक बल उनके ठिकाने नष्ट कर रहे हैं। ‘अभी कुछ दिन पहले ही तो नक्सलियों तथा पुलिस में मुठभेड़ हुई थी, संभव है सतोष को पुलिस ने पकड़ लिया हो या मार ही दिया हो फिर कुमुद जंगल से भाग आई हो। पर यहां भी वह कैसे बच पायेगी पुलिस से, पुलिस तो कहीं भी उसे पकड़ लेगी।’ मित्रा अध्यापक की खबर से उसका माथा ठनका...कुमुद पर खतरे आ गये हैं, पुलिस के पास निश्चितरूप से कुमुद के बारे में सूचना होगी कि वह कई महीने तक जंगल में वामउग्रवादियों के साथ थी। पहड़ियाटोला का बच्चा बच्चा उसे पहचानता है, संभव है कि वाह वाही लेने के लिए कुमुद के बारे में उस अधिकारी ने ही पुलिस को बता दिया जो संतोष का मित्रा तथा जनान्दोलनों का सहयोगी है। संभव तो कुछ भी है। संभव तो यह भी है कि है कि लाठी पड़ते ही पहड़ियाटोले के लोगों ने कुमुद के बारे में पुलिस को बता दिया हो। मनीश घबड़ा जाता है, घर का काम छोड़ कर शहर वाले मकान पर चला आया। कुमुद के शुचिता तोड़ने के कारण वह मनुष्यता नहीं छोड़ेगा। वह अकेली नहीं छोड़ सकता कुमुद को।’ मकान पर कुमुद नहीं थीं, कहां गई होगी, हो सकता है अपने डैड के पास गई हो, उसने कुमुद को फोन मिलाया...कृ कुमुद का फोन स्वीच आफ था। ‘कहां चली गई कुमुद? कुछ मैसेज तो देना चाहिए था...’ संभव है अपने डैड के पास गई हो, हां वहीं गई होगी।कृ मनीश ने आलोकनाथ को फोन मिलाया...कुमुद उनके यहां नहीं थी और न हीं उन्हें पता था कि वह कहां गई होगी। मनीश की समझ में नहीं आ रहा था कि कुमुद का कहां पता लगाये। वह कोई बच्ची तो नहीं.... मनीश ने किचन में जा कर चाय बनाया और चाय पी कर पिछले दैनिकों को पढ़ने लगा। वे नक्सलाइटों की धर, पकड़ से भरे हुए थे तथा उसमें तमाम नेताओं के नक्सलवाद के खात्मे के संबध में विचार प्रकाशित थे। उसे एक दैनिक का संपादकीय विचारणीय लगा। उसमें लिखा था... कृकृ ‘नक्सलवाद सत्ताप्रबंधन हथियाने का अराजकतापूर्ण विचार है, जो हिन्सा का समर्थन करता है।’ वस्तुतः मनीश भी गोली (हिंसा) को, बोली (अहिंसा) से कमजोर मानता था। उसने कुमुद से कहा भी था कि उग्रवादियों से सहानुभूति रखना और उनका समर्थन करना, दोनों अपराध है। यही कारण है कि कुछ चिंतकों व विचारकों के समर्थन और सहानुभूति ने वामउग्रवाद को बहुत गतिशील कर दिया है, जिसे रोकना चाहिए। कमुद नक्सलवादियों के प्रति सहानुभति से भरी थी...कृ ‘उसे लगता था कि जिन्दगी जो जीने के लिए है, भला उसे कोई कैसे समाप्त कर देगा, नक्सलवाद तो आग है, जानबूझ कर उसमें गोते लगाना बिना सामाजिक बदलाव की प्रतिबद्धता के संभव नहीं..’ समाचार पढ़ लेने के बाद मनीश ने दुबारा कुमुद को फोन मिलाया, उसका फोन पहले की तरह स्वीच आफ था। कहां गई होगी आखिर? कुमुद देर रात तक मकान पर नहीं आई, उसका मकान पर न लौटना, मनीश के लिए परेश्शानी का कारण था। वह तुरंत आलोकनाथ के बंगले पर जा पहुंचा।आलोकनाथ सोने जा रहे थे। वे कसमसाते हुए बाहर निकले उनके साथ दामिनी भी थी। क्या बात है मनीश? क्या कुमुद घर पर नहीं आई? आलोकनाथ ने मनीश से पूछा.... ‘तभी तो परेशानहूॅं, सोचा कि कुमुद आप के यहां आई होगी, नक्सलियों का समाचार पढ़ कर वह डर गई थी, उसने मुझे फोन किया था उस समय मैं गॉव पर था। गॉव से वापस लौटा तो देखा कि वह मकान पर नहीं है। खबर है कि कुछ नक्सली पकड़े गये हैं। कहीं उसे पुलिस ने तो नहीं उठा लिया!’ ‘उसे पुलिस काहे उठाएगी वह नक्सली तो है नहीं’ भले ही वह नक्सली नहीं है पर उनके साथ रही तो है। आजकल देश प्रदेश की सरकार के मिजाज गरम हैं, केन्द्र की सरकार भी पहले वाली सरकार नहीं है। लम्बे राजनीतिक संघर्ष के बाद सरकार बनी है, वह भी प्रचंड बहुमत वाली। सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि ये जो जनवाद, जनवाद चिल्लाने वाले लोग हैं, सुधर जायें नहीं तो जेल में रहें, ये लोग समाज में रहने के लायक नहीं हैं। मनीश ने दामिनी से पूछा...कृ ‘अरे दामिनी तूं तो कुमुद की मित्रा है, ऐसे समय में वह किसके पास जा सकती है, तुझे कुछ पता है...’ दामिनी सोच में पड़ गई...कृ ‘नहीं उसका ऐसा कोई दोस्त नहीं, कम से कम इस शहर में तो नहींकृकहीं वह, दिल्ली तो नहीं चली गई, वहां जा सकती है सुजाता के पास, दोनों साथ पढे़ हैं, सुजाता आज कल जे.एन.यू. में है।’ मनीश ने सुजाता का फोन नंबर पूछा...कृ ‘हां उसका फोन नंबर है मेरे पास’ दामिनी ने बताया ‘तो क्या रात में उन्हें फोन मिलाया जा सकता है,’ मनीश ने सन्देह जताया ‘काहे नाहीं, यह उसका पर्सनल नंबर है, मिलाया जा सकता है’ ‘फिर तो पूछो सुजाता से, कुमुद के बारे में’ दामिनी ने सुजाता को फोन मिलाया। संयोग ठीक था, फोन मिल गया, सुजाता ने बताया कि कुमुद उसके यहां नहीं है। मनीश ही नहीं आलोकनाथ और दामिनी भी परेश्शान, आखिर कहां गई चली गई। कहीं पुलिस ने उसे उठा तो नहीं लिया, पुलिस तो किसी को भी उठा सकती है, कभी भी। मनीश आलोकनाथ जी के बंगले से अपने आवास पर आ गया। कुमुद की प्रतिक्षा करते करते रात हो गई, फिर भी कुमुद के बारे में कोई सूचना नहीं मिली। अचानक मनीश की समझ में आया कि अगर पुलिस ने कुमुद को उठाया होगा, तो मकान पर छापा पड़ा होगा, दो चार सिपाही तो आये ही होंगे। अगल बगल वालों से पूछना चाहिए पर रात में उनसे पूछना उचित नहीं, सुबह होने पर वह पड़ोसियों से पूछेगा। पर दूसरा दिन नहीं आ पाया और उसी दिन...कृ घर पर आकर मनीश चाय बनाने जा ही रहा था कि कुछ लोग उसके मकान के अन्दर घुस गये और उसके किचन में उसके पास पहुंच गये...कृ ‘तो आप हैं मि. मनीश’ ‘जी मैं ही हूॅं मनीश।’ ‘पर आप लोग कौन हैं? आप लोग घर के भीतर क्यों घुस आये, वह भी बिना घंटी बजाये, क्या बात है?’ ‘जी बिना प्रयोजन, भला कौन किसके पास जाता है’ ‘चलिए कोई बात नहीं, आप लोग चाय तो पियेंगे ही, मैं चाय बना रहा हूॅं,’ हां हां चाय पी लेंगे हम लोग’ ‘बहुत धन्यवाद’ ‘आप लोग चलिए आगे वाले कमरे में बैठिए। मनीश उन्हें आगे वाले कमरे में ले गया। उन लोगों को वहीं बिठा कर मनीश चाय बनाने लौट गया किचन में। आगे वाले कमरे में मनीश जब होता था तब उसे लगता था कि वह खाली नहीं है। भरा हुआ है, किताबों के साथ, बिना किताबों के उसका होना, उसे खाली लगता था। आगन्तुक मनीश का कमरा देखने लगे, एक से एक किताबें। कहीं फ्रांस के रिवोल्यूसन के बारे में तो, कहीं मार्क्स के बारे में जैसे पूंजी परिभाषित, मनीश की आलमारी में कुछ किताबे लोहिया जी से संबधित भी थीं तो कुछ लेनिन और एंजिल से संबधित। आलमारी में गांधी जी की एक किताब हिन्द स्वराज भी रखी हुई थी। वैसे तो वहां बहुत सारी किताबें थीं पर दीख वही रही थीं, जो करीने से रखी हुई थीं जैसे कि आवर नेशन हूॅड डिफाइन्ड, गिल्टी मैनआफ इन्डियाज पारटीसन ये तो उसके मेज पर ही पड़ी हुई थीं। कमरे में बैठे हुए लोग बोर न हों सो मनीश जल्दी में था। उसने चाय बनाया और सीधे आगे वाले कमरे मेंकृबिना देर किये लौट आया। उसे भी सन्देह हुआ था कि पुलिस वाले ही होंगे, लगता है, कुमुद किसी संकट में पड़ गई है। कुमुद को पुलिस उठा ले गई ह,ै अब उसे उठाने आई है, संकट में तो वह भी है, तभी तो ये मुस्टंड आये हुए हैं। धर पकड़ जारी है, पुलिस वाले किसी को भी पकड़ सकते हैं। लीजिए चाय पीजिएकृमनीश ने सभी को चाय दियाकृ ‘हां तो आप लोग क्यों आये हैं, तथा कौन लोग हैं’ मनीश ने आगन्तुकों से पूछाकृ ‘जी हम लोग भी आप की तरह ही हैं, हम लोग आपसे एक मदत लेना चाहते हैं, आपको हम लोगों के साथ कोतवाली चलना होगा’ ‘किस लिए कोतवाली. चलना है?’ पूछा मनीश ने ‘बस ऐसे ही’, ‘अरे, ऐसे किस लिए, थाना तो किसी को ऐसे नहीं बुलाता मनीश जानता था कि पुलिस वालों के यहां केवल हनक काम करती है, और उसके पास नेताओं वाली हनक नहीं है हालांकि वह चुनाव लड़ चुका है। सो जो ये बोलें उसे करते जाओ। ये सब जब आ गये हैं, तब पकड़ कर ले ही जायेंगे, सो इनसे किचिर किचिर न करना ही बुद्धिमानी है। वैसे भी पुलिस वालों से तर्क वितर्क नहीं करना चाहिए। वे पहले मारते हैं फिर बातें करते हैं। बहुत बडा खतरा आन खड़ा हुआ है, खतरे के समय गंभीरता ही सुरक्षा कर सकती है। कोतवाली वालेे मनीश को एक गाड़ी में बिठा कर कोतवाली ले गये। पुलिस वालों के पास बिठाने के मामले में कई तरीके होते हैं, गनीमत थी कि मनीश को कोतवाली पर आदर दिया गया। ‘चलिए मनीश जी! गाड़ी में बैठिए’ यह अद्भुत किस्म का वाक्य है, जिसे सुनने के लिए लाखों आरोपी तरस जाते हैं। सजा होने के बाद चाहे गालियां दो, मारो, पीटो, चलेगा पर सजा होने के पहले ही केवल आरोपों के आधार पर जानवरों की तरह व्यवहार करो, मारो पीटो, उत्पीड़ित करो, गालियां दो समझ में नहीं आता। मनीश को सिपाहियों का व्यवहार अच्छा लगा। नवनिर्मित चमकती हुई अष्टकोणीय कोतवाली पास ही में थी। वहां जिले के आला अधिकारियों का जमघट था। जमघट तो होगा ही, नक्सलियों की गिरफ्तारी की बात थी। अधिकारी गोलों में बेटे हुए थे, कुछ लोग पूरब की तरफ थे, तो कुछ पश्चिम की तरफ। एल.आई.यू. तथा केन्द्रीय खुफिया वाले भी वहां सक्रिय थे। कोतवाल सभी के अगल बगल मंडराता हुआ दीख रहा था। समझना मुश्किल नहीं था कि वे किस विषय पर बातें कर रहे होंगे, विषय तो एक ही था ‘नक्सली हमला’, नक्सलियों की गिरफ्तारियां व एनकाउन्टर। कुछ नक्सली गिरफ्तर किये जा चुके थे। मनीश को ऐसी जगह बिठाया गया था जहां से वह सभी को देख सकता था। पर कुमुद वहां कहीं नहीं दीख रही थी, ‘कुमुद को भी यहीं होना चाहिए।’ उसने सोचाकृ मनीश की समझ थी कि पत्राकारों को भी बुलाया गया होगा, आखिर पुलिस अपनी बहादुरी का बखान तो पत्राकारों के सामने ही करेगी?कृसंभव है किसी और तरह की घोषणा भी करनी हो। ‘वैसे भी ‘कथा’ का क्या है, वह तो सहलाते ही सो जाती है’ फिलहाल मनीश कोतवाली में स्थित सत्ताव्यवस्था की प्रयोगशाला में है और समय को तोल रहा है। जाने कितने तरह के प्रयोग उस पर आजमाये जांयें? वह यही सोच रहा है...कृ ‘पर नहीं सोच पा रहा कि पुलिस यातना की किन नस्लों को उस पर आजमाने वाली है? कानून का जानकार होने के बावजूद भी वह पुलिस कार्यवाही के बारे में अनुमान नहीं लगा पा रहा था। वही क्या कोई भी अनुमान नहीं लगा पाता।’ कोतवाली पर बैठे बैठे मनीश पुलिस की अगली कार्यवाही के बारे में सोच रहा था कि उसके सामने दो सिपाही आ धमके...कृ ‘चलिए ‘साहब’ बुला रहे हैं।’ मनीश को एक विशेष कमरे की तरफ ले जाया गया, कमरे में एस.पी. बैठा हुआ था और कुमुद एक किनारे किकुडियायी बैठी हुई थी। कुमुद ने मनीश को और मनीश ने कुमुद को देखा, दोनों को देखने में एक दूसरे के प्रति प्यार के अलावा आज के सत्ताप्रबंधन के बारे में बहस थी... ‘कुमुद! तूं तो नक्सल क्षेत्रा के लोगों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए जंगल गई थी नऽ, फिर क्यों पकड़ हो गई तेरी? तूं नक्सली तो नही हैं’ ‘तूं तो कहीं नहीं गया था मनीश! फिर तुझे क्यों पकड़ लिया गया?’ एक दूसरे के बारे में दोनों की ऑखों में सवाल तैरने लगे। पर ऑखें तो बोलती नहीं, वैसे भी थाने या कोतवाली पर बोली की क्या जरूरत, चाहे ऑखें हो या मुंह, दोनों वहां बन्द रहते हैं। थाना और मन्दिर दोनों जगहों पर तो केवल प्रार्थनायें ही काम करती हैं, और कुछ नहीं। पर वह प्रार्थना करे भी तो किससेकृतथा किसकी? एस.पी. ने मनीश के लिए पानी और चाय मंगवाया। खुद एस.पी. ने उन दोनों के साथ चाय पिया, मनीश को लगा कि मामला गंभीर नहीं है, पर मामला गंभीर था। ‘हां मनीश जी! आप तो प्राध्यापक हैं, तथा एक प्रमुख राजनीतिक दल के नेता भी हैं। प्रदेश में आपकी कभी सरकार हुआ करती थी, आज नहीं है। आप हमारी मदत करें और आपकी यह मदत जनहित में होगी। आखिर जनवाद भी तो एक दूसरे की मदत करना अच्छा मानता है। आपसे कुछ जानना है, और उसी जानकारी के लिए कुमुद जी को भी बुलवाया गया है, पर ये तो कुछ बोल ही नहीं रही हैं। सोचिए आप जैसे पढ़ लिखे जनवादी लोग जब जनहित में नहीं बोलेंगेे फिर कौन बोलेगा? आपने अखबार तो पढ़ा ही होगा, दो नक्सली मारे गये हैं, एक औरत दूसरा मर्द है। उन्हीं की शिनाख्त करना है। कुमद जी तो सोनभद्र के नक्सलियों के साथ रही हैं, कुछ दिन पहले ही तो जंगल से वापस आई हैं। इनकी जान पहचान है नक्सलियों से, इनसे बेहतर दूसरा कौन है जो नक्सलियों की पहचान कर सकता है? आप भी तो संतोष से मिल चुके हैं, आप दोनों में हिंसा और अहिंसा के बारे में बहसें भी हुई थीं, क्यों मैं झूठ तो नहीं बोल रहा।’ ‘आइए उधर ही चलें, जहां लाशें रखी हुई हैं। पत्राकारों को भी बुलाया गया हैै, एनकाउन्टर के बारे में उन्हें बताना है। हम सभी पुलिस वाले आपके साथ हैं। पुलिस को पक्का तौर पर पता है कि मृत मर्द नक्सली संतोष है और मृत महिला नक्सली बिगनी है, पर कुमुद जी केवल महिला नक्सली बिगनी को ही पहचान रही हैं. संतोष को नहीं। जबकि हमें पक्की खबर है कि मृत नक्सली संतोष ही है, उसे संगठन में ‘गुरू’ जी के नाम से भी पुकारा जाता था।’ ‘आप लोगों को संतोष की पहचान करना है, बिगनी तो पहचान ली गई है। दूसरे मृत नक्सली को संतोष बताना है। समझ रहे हैं न मेरी बात। यह कौन सा कठिन काम है। अब इससे आसान काम क्या हो सकता है आप लोगों के लिए। पुलिस की थोड़ी सी मदत कीजिए।’ ‘सोच विचार लीजिए, पुलिस आपके साथ चलना चाहती है। आप पुलिस के साथ चलना चाहते हैं कि नही? पुलिस के साथ चलना है या अपनी जिद पर रहते हुए जेल जाना है। कैदी बनना है या कि गवाह। यही विचारों की द्वन्द्वात्मकता है। आप तो जानते ही हैं कि विधिव्यवस्था के जनहितकारी प्रबंधन का स्थापित व मान्य ‘विचार’ है पुलिस जबकि नक्सलवाद विधिप्रबंधन के प्रति विद्रोह का ‘विचार’ है। आप किस विचार के साथ हैं?’ ‘आप खुद को तौल लीजिए ‘समय’ किसके साथ है?’ शान्तिव्यवस्था, सुरक्षा तथा विधिव्यवस्था के साथ या अशान्ति, मार-काट तथा विधि व्यवस्था के उलंघन की तरफ।’ ‘मुझे दुख है कि पढ़े लिखों जैसा व्यवहार आप लोग नहीं कर रहे हैं, आप लोगों को पुलिस पर ऑख मूंद कर यकीन करना चाहिए, जैसा कि सिविल सोसायटी के लोगांे की संस्कृति है। अरे! आपलोगों का का जाता है एनकाउन्टर में मारे गये नक्सली को ‘संतोष’ बता देने में। आपलोगों से का मतलब कि वह संतोष है कि नहीं है, हरिशचंद्र काहे बन रहे हैं, डन्डों, कोड़ों की मार से पीठ छिल जाए इससे अच्छा है कि बता दीजिए मृतक नक्सली संतोष है, बस आपका काम खतम। आराम से घर चले जाइए।’ ‘अगर मेरी राय आपकी समझ में नहीं आ रही है फिर तो जेल जाने के लिए तैयार हो जाइये, आप तो जानते ही हैं कि पुलिस अपने पर आ जाये तो क्या नहीं कर सकती?’ मनीश और कुमुद को वहां ले जाया गया जहां मृतक नक्सलियों की लाशें रखी हुई थीं। कोतवाली से सटा हुआ ही एस्बेस्टस शेड वाला एक हाल था, वहीं पर दोनों लाशें रखी हुई थीं। बारी बारी से लाशें उन्हें दिखायी गईं। मनीश को पहले मर्द नक्सली की लाश दिखाई गई, लाश देख कर, उसने साफ बताया कि मारा गया नक्सली संतोष नहीं है, बिगनी को उसने कभी नहीं देखा था सो उसने बताया... ‘इस महिला की लाश मैं नहीं पहचान पा रहा क्योंकि इसको मैंने कभी देखा नहीं है।’ कुमुद ने दोनों को देखा था, बिगनी को तो वह अच्छी तरह से पहचानती थी। संतोष के बारे में जानकारी जुटाने के अभियान में कुमुद सबसे पहले बिगनी से ही मिली थी। कुमुद ने बिगनी को देखते ही पहचान लिया कि यह लाश‘बिगनी’ की है। बिगनी को भला वह कैसे नहीं पहचानती? बिगनी ने ही संतोष से मिलने का तरीका उसे बताया था सो वह कैसे भूल सकती थी बिगनी को। पहचान का काम बहुत ही मुश्किल भरा था। खतरा दोनों तरफ से था। कुमुद परेशान थी, उसी के कारण मनीश भी मुश्किल में पड़ गया था। मनीश से क्या मतलब कौन नक्सली है, कौन नहीं है.? उसी के कारण उसे भी बुलाया गया है, थाने पर कुमुद ने बिगनी को देखते ही पहचान लिया थाकृहालांकि बिगनी का चेहरा विद्रूप हो चुका था, उसकी देह गोलियों से छलनी हो चुकी थी। फिर भी वह पहचान में आ रही थी। वह बहादुर और साहसी थी, तभी तो बोलती थी....कृ ‘हम लोग मरदों से कम हैं का बहिन जी!’ और बन्दूक चला दिया था...कृ आकाश से एक चिड़िया टपक गई थी, एकदम से मरी हुई। वही बिगनी उसी चिड़िया की तरह टपक कर लाश बन चुकी थी। बन्दूक ने उसे लाश बना दिया था।’ कुमुद की ऑखें डबडबा गईं, उसने रोने से खुद को रोकाकृउसने बिगनी की पहचान कर दिया पर संतोष की पहचान....कृ ‘ये आदमी संतोष नहीं है, दूसरा चाहे जो हो’ कुमुद ने एस.पी. को बताया...कृकृ ‘सर! ये आदमी संतोष नहीं है, यही बात हजार बार क्या, मरते दम तक बोलूंगी’कृ एस.पी. परेशान, कैसे कहलवाये कुमुद से कि लिटाया हुआ मृतक संतोष है। मनीश ने तो किसी को नहीं पहचाना, न बिगनी को न संतोष को। एस.पी. तैयार बैठा था कि कानून की धाराओं को भले ही तोड़ना मरोड़ना पड़े पर पहचान तो वह मनीश व कुमुद से ही करवायेगा। ऐसे पढ़े लिखे प्रभावशाली लोगों की पहचान पर कोई सन्देह भी नहीं करेगा। एक कैबिनेट मंत्राी का एस.पी. पर दबाव था कि मृतक नक्सली की पहचान संतोष के रूप में ही कराई जाये। मंत्राी का दबाव टालने की क्षमता एस.पी. में नहीं थी? वह हुकुम का गुलाम था। हालांकि मंत्राी प्रतिभा परीक्षा वाला नहीं था, मंत्राी प्रतिभा परीक्षा वाले होते भी नहीं। पर वह ताकतवर था, उसके अगल बगल सत्ता नाचा करती थी, उसका वह बहत कुछ नुकसान कर सकता था। कुमुद तथा संतोष दोनों ने संतोष को पहचानने से इनकार कर दिया फिर तो उन्हें कोतवाली के यातना गृह में ले जाया गया।कृ यातना गृह पहले जैसा था सोलहवीं शताब्दी वाला, लोकतंत्रावाली आधनिकता से एकदम अलग, एक बड़ा सा कमरा, उसमें हवा तथा रौशनी भी प्रतिबंधित थी, पुलिस की मर्जी के बिना वहां कोई न तो जा सकता था न निकल सकता था। एकदम खामोश, उन कविताओं, आख्यानों व महाआख्यानों की तरह जो खामोश हुआ करते हैं। यातना गृह में कुमद तथा मनीश को एक साथ लाया गया। वैसे भी यातना गृह चाहे किसी भी काल के हांे, होते हैं यातना गृह ही। उस समय उन दोनों के लिए पूरी दुनिया यातना गृह में तब्दील हो चुकी थी। यातना गृह की यातना वाली संस्कृति के अनुसार कुमुद तथा मनीश से पूछ ताछ किया जाना था। ‘तो आप नहीं कबूलोगे कि मारा गया नक्सली ‘संतोष’ है।’ जी कत्तई नहीं, वह ‘संतोष’ नहीं है। कुमुद ने जोर देकर कहाकृ कुमद ने तय कर लिया था कि उसके साथ चाहे जिस तरह का सलूक किया जाये पर वह झूठ नहीं बोलेगी।कृबहुत होगा तो यातना गृह में मारपीट होगी, उसके बाद बलात्कार। बलात्कार सोचते ही वह दहल जाती है, हिम्मत जुटाती है, कोतवाली में देह के साथ बलात्कार ही तो होगा सत्कार काहे होगा।कृवह खुद को यातना की दैहिक निर्ममता के लिए तैयार कर लेती है। उन दोनों को यातना गृह में किसिम किसिम की यातनायें दी गईं, कुमद को देह में नहीं बदला गया सो वह निर्मम बलात्कार से बच गई। क्रूर यातनाओं के बाद भी वे अपनी बात पर डटे हुए थे। एस.पी. चालाक था, उसे कैदी मनोविज्ञान की जानकारी थी। कुछ ऐसे गिने चुने आरोपी होते हैं जिनसे अप्राकृतिक मारपीट वाली यातना के द्वारा कुछ भी नहीं कबूलवाया जा सकता। वे मरने तथा यातना सहने के लिए ही बने होते हैं। मारने, पीटने, उनके नाखूनों में खपाचियां धसाने, गुदाद्वार पर गरम पानी डलवाने, उन्हें बर्फ की सिल्ली पर सुलाने के द्वारा उनसे कुछ भी नहीं कबूलवाया जा सकता। जो सच है, वे वही बोलेंगे, उसके अलावा कुछ भी नहीं। एस.पी. ने पुलिस के थर्ड डिग्री का तरीका बदलवा दिया। थर्ड डिग्री से कुमुद तथा मनीश नहीं कबूल करने वाले। फिर....कृ फिर तो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। एस.पी. को याद आया अमेरिकी पुलिस का तरीकाकृजिसे उसने अमेरका में सीखा था जब उसे वहां आतंकवादियों से निपटने के बारे में यातना गृह में दी जाने वाली यातना की आधुनिक मनोवैज्ञानिक कला सीखने के लिए भेजा गया था..कृ फिर तो एस.पी. ने अमेरिकी तरीके को कुमद तथा मनीश पर आजमवाया...कृ अमेरिकी यातना के तरीके की सिद्धान्तिकी व्यवहारतः सरल व तरल लगती थी।कृपर वह न तो सरल थी और न ही तरल, थी बहुत ही क्रूर व मनुष्यता विरोधी थी। ‘किसी को मारो नहीं, उसे किसी भी प्रकार की यातना न दो, उसके सामने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दो कि उसका चित्त, मृत्युबोध में चला जाये। मृत्यु बोध में जाते ही वह जीते रहने के बारे में सोचने लगेगा। उस समय जीते रहने की उसकी कुदरती अन्तःचेतना स्वतः जागृत हो जायेगी। बिना यातना दिए मनोवैज्ञानिक तरीके से पहले आरोपी को मृत्युबोध की तरफ ले जाओ फिर जीवन जीने के सतत मूल्यबोध की तरफ उसकी वापसी कराओ। यह पद्धति जितना राजनीतिक रूप से सफल है उतना ही सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक रूप से भी सफल है।’ कुमुद व मनीश पानी मांगते, उन्हें नहीं दिया जाता, उन्हीं के सामने पानी बहाया जाता, या उनकी निगरानी करने वाले पीते, कुछ पीते, कुछ बहाते। वे सोना चाहते, जैसे ही उन्हें नींद लगती, कोई न कोई उन्हें जगा दिया करता। क्यों मनीश जी! नींद लग रही है का? अरे जागिए भाई, बताइए अगला चुनाव लड़ना है कि नहीं, किसिम किसिम के निरर्थक सवाल किये जाते।कृ ‘क्यों कुमुद जी, आपने नक्सलाइटों पर आलेख लिख लिया कि नहीं, आप तो उन पर एक उपन्यास भी लिखने वाली थीं, हिन्दी में लिखेंगी या अंग्रेजी में? आप तो बोल ही नहीं रहींकृका बात है? हां तो बताइए खाने में क्या खायेंगे आप लोग, नाश्ते में क्या लेंगेे?. उनसे खाना, पानी, नाश्ता आदि के बारे में सवाल पूछे जाते, पर दिया कुछ नहीं जाता। उन्हें न तो पानी दिया जाता, न खाना, न नाश्ता और न ही उन्हें सोने दिया जाता। उन्हें दृश्य तथा अदृश्य के खेल में उलझा दिया जाता, देखो...यह नाश्ता है, खाना है, केवल देखो तथा महसूस करो कि नाश्ता, खाना, पानी, जीवन के लिए अनिवार्य हैं, और भूख जो अदृश्य है उसका साक्षात्कार करो केवल इतना ही। अमेरिकी तरीके के अनुसार कुमुद तथा मनीश से उनकी कुदरती जरूरतें भूख, प्यास, नींद छीन ली गईं थीं। उन्हें न तो मरने दिया जा रहा था और न ही जिन्दा रहने दिया जा रहा था। उन्हें जीवन और मृत्यु के बीच की कोई चीज बना दिया गया था जबकि वैैसी कोई चीज नहीं होती। कुमुद तथा मनीश थे कि खामोश पड़े हुए थे। उन्होंने खुद को साध लिया था। वे एक दूसरे को देखते, तथा एक दूसरे को समझाने के लिए ऑखों की लिपि का प्रयोग करते जो अमेरिकी मनोवैज्ञानिक यातनालिपि पर भारी थी। उनके ऑखों की चित्रलिपि पठनीय थी....कृ उनके सामने जो पानी बहाया जा रहा होता उनकी दृश्यलिपि में वह पानी नही होता, वे महसूसते कि डीजल बहाया जा रहा है। डीजल तो पिया नहीं जाता, बहाया जा रहा है तो बहाया जाये, उनसे क्या? उनके सामने जो खाना फेंका जा रहा होता, वे समझते कि व्यवस्था का कचरा फेंका जा रहा है, कचरा खाया नहीं जाता, अच्छा है उसे फेंक दिया जा रहा है, सफाई रहेगी, वैसे कचरा तो थाना भी है, क्या इसे भी फेंका जा सकता है?कृ उन्हें नींद से जगा दिया जाता, वे समझते कि उनकी ऑखों में बस्ती की आग का धुंआ घुस रहा है, धुंआ से भला कैसे नींद आती? धुंआ से वैसे भी नींद का कोई नाता नहीं होता सो धुंआ में का सोना।कृकृ ऑखों की दृश्यलिपि के सहारे खुद को वे साधे हुए थे। भूख, प्यास तथा नींद जैसी तन की मांगों को वे मन की साधना से दबाए हुए थे। पर तन को तनेन होने से वे कब तक रोक पाते। देह तो खुद गुर्राने लगती है। वही हुआ...दूसरे दिन ही कुमुद लथपथ हो गई, लगा मर जाएगी। उसकी बोलचाल बन्द देख कर एस.पी घबड़ा गया। लथपथ तो मनीश भी हो चुका था पर वह बोल रहा था, खुद से हिल डुल सकता पर कुमुद तो बेजान हो चुकी थी। यातना गृह से उन्हें बाहर निकाल कर कोतवाल के आवास के ए.सी.वाले कमरे में रखा गया। अस्पताल नहीं भेजा गया। उन्हें अस्पताल भेजना पूरे जिले को जगाना होता। पत्राकारों को सचेत करना होता फिर तो कई तरह की लोकमूल्यबोधी प्रतिक्रियाएं शुरू हो जातीं। इससे एस.पी. बचना चाहता था। दोनों की चिकित्सा शुरू हो गई...कृ ‘बिना खाये पिये अगर दोनों मर गये तो....’ पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में तो साफ साफ लिखा जायेगा कि वे प्यास तथा भूख से मर गयेे फिर क्या होगा? एस.पी कांप उठा, ‘नौकरी खतम।’ ‘नौकरी खतम यानि सारा कुछ खतम’ फिर तो प्रार्थना, आराध्य की मनौती,एस.पी. के देवता उसकी ऑखों पर थिरकने लगे, मॉ विंध्यवासिनी, काशी विश्वनाथ, संकटमोचन हनुमान जी और भी अनेक देवता...कृ भगवान इन्हें मरने मत देना, मेरे बाल बच्चों का क्या होगा।’ उस समय एस.पी. को पता नहीं चल रहा था कि वह किस शक्तिशाली देवता की पूजा करे। उसे ज्ञात, अज्ञात सभी देवता शक्तिष्शाली लग रहे थे। सो वह सभी की प्रार्थनायें कर रहा था। उधर दूसरी तरफ डाक्टर कुमद तथा संतोष का इलाज कर रहा था। दोनों की सांसें कहीं अटक गई थीं, उनके लिए बोलना पाना भी मुश्किल था। पहले तो मनीश गूं गा कर रहा था पर बाद में उसने भी बोलना बन्द कर दिया था। उनका इलाज करने वाला डाक्टर किसी तरह का आश्वासन एस.पी. को नहीं दे पा रहा था। उसने करीने से अपने व्यवसाय का सुभाशित बोला...कृ ‘अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, हम देख रहे हैं जो बेहतर उपचार संभव है, वह कर रहे हैं।’ एस.पी. कभी कुमुद को तो कभी मनीश को बेड पर कराहते हुए देखता। उसे खुद पर गुस्सा आया...उसे इन दोनों को यातना नहीं देनी चाहिए थी, ये अपराधी नहीं हैं। आखिर उसे क्या मिल जायेगा इनसे फर्जी कबूलवाकर, जो सच है उसे तो ये बता ही रहे थे। एस.पी.को उस शक्तिष्शाली केबिनेट मंत्राी पर बहुत गुस्सा आया जिसके दबाव पर उसने कुमुद तथा मनीश के साथ यातनादायी व्यवहार किया था। उसने मंत्राी को एक भद्दी सी गाली दिया...कृ ‘साला हरामी की औलाद, माध.....कृ’ उसी साले के कहने पर यह सब करना पड़ा। वह साला तो अपना अगला चुनाव देख रहा है। उसकी समझ है कि अगर वह संतोष को मरा हुआ प्रमाणित करा देगा फिर तो उसकी वाह वाही होने लगेगी, जनता में उसका विश्वास जम जायेगा। माना जाएगा कि मंत्राी, नक्सलियों के दमन के प्रति सतर्क तथा सावधान है। एस.पी. को महसूस हुआ कि वह तो मंत्राी से भी मूर्ख निकला जबकि वह तो प्रतिभा परीक्षा पास करके एस.पी. बना है। मंत्राी अपने बारे में सतर्क है पर वह अपने बारे में कत्तई सतर्क नहीं। बिगनी को कुमद जानती थी उसने उसे पहचान लिया, मनीश तो केवल संतोष को पहचानता था, वह संतोष है ही नहीं फिर वह उसे कैसे पहचानता? वह झूठ बोले भी तो क्यों, वह एक प्राध्यापक है तथा राजनीति कर्मी भी। उसे मंत्राी का बता देना चाहिए था कि वह जो दूसरा मृत नक्सली है वह संतोष नहीं है, कोई और है। पर नहीं, मंत्राी को वह सच नहीं बता सका। मंत्राी को सच बता देता तो वह उसका क्या बिगाड़ लेता। बहुत होता तो ट्रान्सफर करवा देता, पुलिस के किसी निर्जीव विभाग में भेजवा देता या बिना विभाग के ही साल दो साल लटकाये रखता। इसके अलावा वह क्या कर लेता? वह उसकी तरह पांचसाला वाले चुनाव से चुना हुआ तो है नहीं, वह तो खास किस्म की प्रतिभापरीक्षा का उत्पाद है और साठ साल तक पद पर बना रहेगा। उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। फिर भी वह मंत्राी को सच नहीं बता सका कि मृतक नक्सली की पहचान नहीं हो पा रही है, वैसे वह संतोष नहीं है। यह तो पुलिस को भी पता है। आखिर वह मंत्राी को सच क्यों नहीं बता सका? एस.पी. खुद को खंगालने लगा, उसे लगा कि वह सुविधाओं के विस्तरों पर पसर कर भूल चुका है कि उसे क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए। वह सुविधाओं को छीने जाने के डर से डरा हुआ आदमी है। इधर कई सालों से उसके द्वारा लिये गये फैसलों में यह जो सुविधाओं को छीने जाने का डर है, उसी की भूमिका रही है। डर के कारण ही वह मंत्रियों के अगल बगल मंडराता रहा है। उसके सारे वसूल जो जनहित के बाबत थे सबके सब मिट चुके हैं। उसका दिमाग सफेद कागज की तरह हो चुका है। उस पर जिस किसी भी पारटी का मंत्राी हो, कुछ न कुछ लिख जाता है। उसका दिमाग मंत्रियों के आदेशों से लिखा हुआ रंगीन पोस्टर बन चुका है। ‘अगर कुमुद तथा मनीश मर गये तो कौन भुगतेगा?’ उसे ही भुगतना होगा। मुकदमे के अलावा जाने क्या क्या आरोप उस पर थोपे जायेंगे। आरोप लग जाने के बाद मंत्राी उसे अनाथ छोड़ देगा। उसे याद है महाराष्ट्र वाले एनकाउन्टर स्पेसलिस्ट की घटना...उस पुलिस आफिसर कोे नहीं छोड़ा गया लटका दिया गया नियमों के मौत वाले झूले से, झूलो तथा मरो। एस.पी. गंभीर हो गया, उसे समझ में आने लगा कि यह जो कानूनी राज है उसमें फेर बदल कर कानून को अपने अनुकूल बनाने वाले लोग सत्ताप्रबंधन के ही लोग होते हैं। वे कभी विवेक के नाम पर तो कभी जनहित के नाम पर कानूनों को अपने लिए अनुकूलित कर लेते हैं। उसे खुद पर हसी आई... ‘वाह! तुम तो एस.पी. हो, साठ साल का हो जाने के बाद का करोगे?’ ‘न तुम्हारी वर्दी रहेगी, न तुम्हारा पद रहेगा’ उसने खुद से सवाल किया...कृ ‘तेरी शक्ति छिन जाएगी, सुविधायें छिन जाएंगी, तूं भी तो उस दिन लोकतंत्रा का एक असहाय फरियादी बन जाएगा।’ उसने खुद की कुदरती चेतना तोड़ा, चित्त के साथ खिलवाड़ किया तथा मस्तिष्क की जरूरतों को लतियाकर मन की जरूरतों पर ध्यान दिया। अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता, तुम मनुष्य ही नहीं रह गये, तुम तो यंत्रामानव में बदल चुके हो एस.पी.। महज एक अज्ञाकारी, बिना ऑख, कान व दिमाग वाला। एस.पी. खुद को विश्लेषित कर ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे बताया के कुमुद व मनीश दोनों बोलने लगे हैं,कृवे अब ठीक हैं। फिर एस.पी. कोतवाल के आवास की तरफ दौड़ गयाकृ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ जैसी सुखानुभूति के साथ।कृ एस.पी. तनाव से बाहर निकल चुका था। उसने कुमद तथा मनीश से हाल अहवाल किया, दोनों ठीक थे। डाक्टर का कहना था कि उन्हें तनावमुक्त रखना है, नहीं तो परेशानी बढ़ सकती है। आज रात भर इन्हें बोतलंे चढ़ाइ जाएंगी, कल सुबह तक ये लोग ठीक हो जायेंगेकृफिर इन्हें छोड़ा जा सकता है। डाक्टर ने कुछ और दवाइयां लिख कर दिया तथा उन्हें समय पर खिलाने का निर्देश दे कर चला गया। एस.पी. के चेहरे का रंग बदल गया उसे लगा कि कम से कम एक अच्छा काम करने का उसे अवसर मिला। कुमुद और मनीश को ठीक देख कर उसने तय किया कि अब वह अपनी चित्त की लिपि पढ़ेगा तथा चेतना को उपेक्षित नहीं होने देगा। चित्त तथा चेतना जैसा निर्देशित करेगी वैसा ही करेगा किसी के दबाव में कोई निर्णय नहीं लेगा। उसकी कुदरती चेतना ने उसकी बनावटी चेतना को कहीं दूर लतिया कर फेंक दिया था। वह ‘वह’ नहीं रह गया था कुछ और हो गया था। नहीं नहीं, अब ऐसा नहीं होगा, किसी भी हाल में उसे अपना अस्तित्व बचाये रखना है। वह कुमुद तथा मनीश दोनों को कानून की खतरनाक गुफाओं में नहीं डाल सकता। ये गुफायें कुमद तथा मनीश के लिए नहीं, ये तो उन कमीनों के लिए हैं जो जनहित के नाम पर जनता के साथ धोखा करते हैं। अगर कभी मौका मिल गया तो वह मंत्राी को इन गुफाओं की यात्रा जरूर करवायेगा पर मौका मिले तब नऽ। एस.पी मंत्राी के दबावों से मुक्त हो चुका था। उसे अपनी अस्मिता की समझ हो चुकी थी। फिर तो एस.पी. कुदरती आत्मबल से भर गया। यह आत्मबल उसका अपना था, उसके पास जो पहले की ताकतें थीं, वे तो सत्ता के पनाहगाहों से उधारी ली गई ताकतें थीं। अब उसे किसी पनाहगाह की जरूरत नहीं थी। किसी पनाहगाह से वह ताकतें उधार लेगा भी नहीं। गनीमत थी कि अगले दिन के अखबारों में कुमुद तथा मनीश के गिरफ्तार व बिमार होने की खबरें नहीं प्रकाशित हुई थीं। कुमद तथा मनीश के गिरफ्तार व बिमार होने की भनक भी पत्राकारों को नहीं लगने दी गई थी। कोतवाली के भीतर कैसा खेल चल रहा है, वह कोतवाली के भीतर ही दबा रह गया था। अगर कोतवाली के भीतर की खबरें पत्रा कारों तक पहुंच गई होंती तो वे छापते जरूर। फिर तो प्राकशित खबरें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विपक्ष के नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए जादुई प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने का औजार बन जातीं। पर ऐसा नहीं हुआ। सारा कुछ कोतवाली की गुफा में दफन हो गया तमाम दफन होने वाली चीजों की तरह। दूसरे दिन एस.पी. ने कोतवाली पर प्रेस कांफ्रेन्स किया। प्रेस कांफ्रेस में उसने मुठभेड़ के बारे में विस्तार से बताया कि एक महिला नक्सली बिगनी तथा दूसरा अज्ञात पुरूष नक्सली मारा गया है और बकिया नक्सली अन्धेरे का लाभ उठा कर भाग निकले। पुलिस उस मारे गये पुरूष नक्सली का नाम शीघ्र ही पता कर लेगी। पत्राकारों ने मृतक नक्सलियों की फोटो लिया तथा मुठभेड़ की पूरी रपट तैयार किया, फिर वे नाश्ता करने के बाद चले गये जिसका कोतवाली पर प्रबंध था। पत्रा कारों के चले जाने के बाद एस.पी. ने कुमद तथा मनीश से माफी मांगा और उन्हें यातना गृह से मुक्त कर अपनी व्यक्तिगत कार से उनके घर तक भिजवा दिया। कुमुद तथा मनीश को एस.पी. ने छोड़ दिया यह कोतवाली पर तैनात कर्मियों के लिए चर्चा का विषय बन गया। एस.पी तो किसी पकड़े गये को छोड़ता नहीं, लगता है भारी लेन देन हुआ होगा, पर लेन देन करेगा कौन? नहीं एस.पी. लेन देन वाला नहीं है, फिर तो उस पर भारी दबाव पड़ा होगा। अब किसी को क्या पता कि एस.पी. पर खुद उसका ही दबाव पड़ा था। खुद का खुद पर दबाव, किसे पता नहीं कि सच को सच की तरह सुरक्षित बचाए रखने का दबाव किन्ही दूसरे दबावों से काफी वज़नी होता है। कोतवाली की चर्चा दूसरे दिन अखबारों में ही नहीं, सोनभद्र के राजनीतिक हवा में भी तैरने लगी। अखबार सचेत हो गये थे। पत्राकारों की अतिरिक्त जागरूकता से खबरें, खबरें नहीं रह गईं, वे जादुई कथा में तब्दील हो गईं। वैसे भी जादुई कथा में क्या संभव नहीं? यह जादुई कथा की कथावस्तु ही थी कि एस.पी. को मुख्यालय तलब कर लिया गया। मृतक नक्सली को संतोष के रूप में एस.पी. द्वारा प्रमाणित नहीं करवाया जाना राजनीति की बड़ी घटना बना दी गई। एस.पी. चाहता तो उसे घटना बनने से रोक सकता था। यह काम उसके बांयें हाथ का था। हालांकि कथानक पुराने तौर तरीके वाला ही था। एक थी कुमुद, एक था मनीश और एक था संतोष वाला। नया केवल इतना था कि उसमें जंगल भी एक कथा पात्रा बन गया था। जंगल की कथापात्राता किसी द्वारा सृजित नहीं की गई थी, जंगल ने खुद अपनी कथापात्राता सिरज लिया था। कथा पात्रा बन जाने के बाद जंगल ने कुमुद, मनीश व संतोषको धमकियाया भी था....कृ ‘तुम लोग अगर मुझे अलगियाकर कोई कथा रचने जा रहे हो तो समझ लो हम तुम लोगों को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देंगे, इसके लिए चाहे जो करना पड़े। हमें पता है कि तुम लोग पहले हमारी जमीन लील लिए अब हरियाली लीलने आये हो। अभी पेट नहीं भरा। और अब हमें कहानियों से भी गायब करने पर तुले हुए हो, ऐसा होने नहीं देंगे हम।’ एक शक्तिषाली कैबिनेट मंत्राी की सक्रिय भूमिका के कारण कहानी थोड़ा आगे बढ़ने वाली ही थी कि पुराने एस.पी. के स्थान पर किसी जाबांज एस.पी. को तैनात कर दिया गया। पुराने एस.पी को कुछ दिनों तक खबरों की कथावस्तु की तरह पूरे जनपद में एक स्थान से दूसरे स्थान तक टहलाया जाने लगा जिससे कि कथा नींद में चली जाये, ‘वैसे भी कथा का क्या है, वह तो सहलाते ही सो जाती है’। पर नहीं, जाबांज नया एस.पी. कथा को सोने नहीं देगा, वह उसे जगाता रहेगा तब तक, जब तक संतोष को पकड़ या मार गिराया नहीं जाता। ‘यह उपन्यास पढ़ना जरूरी नहीं, तो राजू अफसर बने, यह भी जरूरी नहीं’ मनीश कुमद के साथ घर आ गया। किसी को भी पुलिस उठा ले जाये तो वह खबर कुछ अफवाहों तथा कुछ सही तथ्यों के साथ आग की तरह फैल जाती है। खबर फैली कि कुमद तथा मनीश को पुलिस ने उठा लिया था। घर आने के बाद उसके परिचित भी आने लगे थे। मनीश का हाल अहवाल लेने... परिचितों को मनीश से जानना था कि पुलिस ने एक साथ ही कुमुद तथा उसे क्यांे उठा लिया और छोड़ भी दिया? यह उनके परिचितों के लिए सवाल था, आखिर पुलिस ने उन्हें क्यों उठा लिया? परिचितों ने अपने विवेक से इस सवाल का सांस्कृतिक उत्तर निकाल लिया था।कृकृ ‘कुछ न कुछ दोनों ने किया होगा, ऐसे पुलिस किसी को काहे उठाएगी?’ उनके परिचितों में कुछ जो प्रज्ञावान व ज्ञान की ऊर्जा से संवरित थे, वे आश्वस्त थे कि कुमुद तथा मनीश दोनों वामधारा के समर्थक हैं, अभी अभी जो एनकाउन्टर हुआ है जिसमें दो नक्सली मारे गये हैं, उसी से जुड़ा हुआ कोई मामला होगा, उसी कारण पुलिस ने उन्हें उठा लिया होगा। ‘काहे पुलिस उठा ले गई थी?’ यह सवाल पूछने वालों को मनीश सामान्य तरीके से बताता। कोई खास बात नहीं थी पर बात तो थी ही। लोगों के चले जाने के बाद मनीश दिन भर सोया। एक तरफ कुमुद भी बिस्तरे पर पसर गई। उन्हें पता नहीं चला कि वे नींद में कब चले गये। कोतवाली ने खाना तथा पानी के साथ उनकी नींद भी छीन लिया था। ‘यह जो पुलिस होती है नऽ अजीब होती है, पहले तो मार, पीट वाली यातना देती है, बाद में भूख, प्यास तथा नींद भी छीन लेती है। अजीब यातनादायी तरीका है उनका?’ ‘कहते हैं कि दुनिया बदल रही है पर यातना के तरीके वही आदिम ही हैं, उसमें कोई बदलाव नहीं।’ दूसरे दिन शाम को मनीश कुमद के साथ आलोकनाथ जी के घर गया। आलोकनाथ जी उसी दिन सुबह दिल्ली से लौटे थे। दिल्ली में ‘दलित अस्मिता’ विषय पर सेमिनार आयोजित किया गया था। मुख्यवक्ता के रूप में आलोकनाथ जी को बुलाया गया था। वैसे वे कुछ दिन पहले ही दलित उत्पीड़न पर आयोजित जनप्रदर्ष्शन में भाग लेने के लिए भी दिल्ली गये थे। यह उनकी दिल्ली की साल भर के अन्दर दूसरी यात्रा थी। इस बार का सेमिनार कई मायनों में पहले के सेमिनारों से अलग था। अलग इस लिए कि ‘जाति’ पर विमर्श किया जाना था जिसमें सवाल उठाये जाने थे कि यह जो जाति है, वह है क्या चीज? क्या जाति एक अवधारणा भर है? क्या जाति चुनावी राजनीति का उपकरण है? क्या जाति सामाजिक भिन्नताओं का उत्पादक कुदरती प्रबंधन है जो मानव कृत है? इसी तरह से कई सवाल थे जो सेमिनार में विमर्श के लिए प्रस्तावित थे। सेमिनार के आयोजक जानते थे कि आलोकनाथ जी अपने वक्तव्य में हमेशा ‘जाति’, ‘योनि’ तथा ‘संपत्ति’ के मुद्दों के साथ भाषा, भूसा, भोजन, भवन व भजन को भी मानवीय समीपता को भंग करने वाला कारक मानते रहे हैं। सो उन्हें इस विषय के विशेषज्ञ के रूप में खासतौर सेआमंत्रित किया गया था। आलोकनाथ जी को मनीश तथा कुमुद के बारे में पता नहीं था कि उन्हें कोतवाली बुलाया गया था। वे केवल इतना जानते थे कि कुमुद जंगल से लौट कर मनीश के साथ रह रही है, बस इतना ही। कुमद का जंगल से लौट आना आलोकनाथ जी को अच्छा लगा था। ‘चलो लौट आई कुमुद, जंगल से लौट आना उसका समयानुकूल निर्णय है। अब कोई कालेज ज्वाइन कर ले, जिन्दगी जीने के लिए आर्थिक आधार भी वैचारिक आधारों की तरह पोख्ता होने चाहिए, पर कुमद कालेज ज्वाइन करे तब नऽ।’ मनीश ने अपने तथा कुमुद के बारे में आलोकनाथ जी को बताया कि उन्हें कोतवाली पर दो दिन तक रखा गया था। क्रूरताभरी यातना वाली पूछ-ताछ के बाद बिना शर्त छोड़ा गया। आलोकनाथ जी सारा कुछ सुन कर न तो चौंके न ही हतप्रभ हुए, उन्होंने साफ कहा...कृ ‘यह तो होना ही था, मुझे पता था कि कुमद खतरनाक राजनीति की कमोडिटी बन रही है। साथ ही साथ तुम्हें भी बना रही है। वामउग्रवाद लोकतांत्रिक राजनीति के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकता, न कभी था। लोकतांत्रिक सरकारें कभी भी ऐसे वर्ग समूहों का समर्थन नहीं कर सकतीं जो विधि तथा सत्ताप्रबंधन की व्याख्या अपने अनुसार करते हुए देश के मान्य कानूनों का सशस्त्रा विरोध करते हों। ऐसे समूहों व गुटों के सफाये के लिए सरकारें हमेशा प्रयास करती रहेंगी। यह अलग बात है कि सरकारें वामउग्रवाद के सफाये का जितना दिखावा कर रही हैं, उतना सार्थक व गंभीर प्रयास नहीं कर रहीं। काश! सरकार से जुड़े राजनितिक चिंतक मान लेते कि वामउग्रवाद सामाजिक व आर्थिक विभेदकारी प्रबंधनों के असंतोष व विक्षोभ की अभिव्यक्ति का विचारधारा के रूप में उपजा हुआ राजनीतिक उत्पाद है। इसके आधार पर वामउग्रवादियों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करते, बहर हाल छोड़ो.आज तो वामधारा के लोगों को अम्बेदकर की तरफ तथा अम्बेदकरवादियों को वामधारा के साथ मिल कर चलने की जरूरत है। तभी समाज बदल का सपना पूरा हो सकेगा, नहीं तो नहीं।’ फिर आलोकनाथ ने कुमुद को सुझाया....कृ ‘हां कुमद! जंगल की जंग की तरफ वापसी के बारे में न सोचना। उस जंग से कुछ होने वाला नहीं। हो सके तो कोई कालेज ज्चाइन कर लो, तुम्हारी मेरिट है और प्रवक्ता बनने की पात्राता भी तुममें है।’ आलोकनाथ जी के यहां खाना खा कर वे दोनों अपने मकान पर लौट आये। मकान तो वही पहले वाला था पर दोनों को लग रहा था कि वे किसी नई जगह पर हैं और नई परिस्थितियों में हैं। उन्हें पूर्व की स्थिति में आने में कुछ दिन लग गये हालांकि मनीश कुमुद के विगत की कथा लगातार भूलने की कोशिश कर रहा था दूसरी तरफ कुमद भी प्रयास कर रही थी कि उनके बीच पहले वाले अच्छे दिन लौट आयें। वही रातें, वही सुबह तथा वही शाम, जिसमें पता ही नहीं चलता था कि वे दो हैं, अलग अलग खानों में बटी कोई चीज, एक नर तो दूसरी नारी। कुमुद जंगल में बिताये समय के अनुभवों को लिपिवद्ध करना चाहती थी पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि बीते समय को कविता की शक्ल दे या उपन्यास की। उसे लगा कि उपन्यास से सारी बातें खुल सकती हैं पर कविता से नहीं, कविता में बहुत कुछ गोपन रह जायेगा। वह जंगल के यथार्थ को काव्यमय तथा रंजक बनाकर नहीं सिरजना चाहती थी, वह चाहती थी कि जंगल आये तो अपने मूल रूप में जैसा कि उसने देखा है, अनुभव किया है। कुमद ने उपन्यास की रूपरेखा भी बना लिया है, केवल लिखना बाकी है। मनीश कालेज जाने लगा था। एक दिन वह कालेज में ही था कि उसे वहीं कालेज के बाहर वाले आहाते में एक अपरिचित मिला...कृ ‘क्यों आप मनीश जी हैं नऽ’ उसने पूछाकृ ‘जी मैं ही मनीश हूॅ, कहिए क्या है?’ ‘बहुत अच्छा हुआ कि आप कालेज पर ही मिल गये, नहीं तो मुझे आपके घर पर जाना पड़ता। आपका पता पूछ पाछ कर आपके घर पहुंच ही जाता। आपसे कुछ काम है, संतोष जी का पत्रा देना है आपको।’ ‘कौन संतोष जी? कैसा पत्रा? पत्रा है तो दे दीजिए। ‘संतोष जी! अरे वही कामरेड संतोष जी, अब बूझ गये नऽ, काम है तभी तो’ ‘अरे भाई पत्रा दीजिए नऽ’ ‘जी उसे मैं यहां नहीं दे सकता, आपसे काम ही ऐसा है। अभी तुरन्त मेरे साथ कालेज से बाहर निकलिए।’ ‘अभी तो मेरा क्लास है, कैसे निकल सकता हूॅ बाहर, कालेज आफिस में आप मेरी प्रतिक्षा कीजिए, क्लास खतम होने के बाद चलता हूॅ आपके साथ।’ ‘नहीं, आज क्लास न कीजिए, क्लास से यह जरूरी काम है, मेरी बातें सुनकर वापस आ जाइएगा कालेज’ ‘संतोष का पत्रा मेरे नाम आखिर किस लिए, वह कुमुद के नाम से होगा।. ‘जी नहीं आपके नाम से ही है, और आपको कुछ बताना भी है।’ मनीश सोचने लगा आखिर काहे के लिए संतोष ने पत्रा भेजा है, जरूर कोई न कोई गंभीर बात होगी। आखिर क्या हो सकता है पत्रा में, कहीं उसने कुमद को फिर बुलाया तो नहीं है, नहीं ऐसा नहीं होगा, ऐसा होता तो वह पत्रा कुमुद को भिजवाता। मनीश उलझ गया। जाने दो, आज क्लास नहीं करना, वह आफिस में जा कर तबियत खराब होने का बहाना बना देगा। वही किया मनीश ने और अनजान के साथ कालेज से बाहर निकल आया। कालेज से बाहर एक चाय की दुकान थी, वहीं ठहर गया मनीश..कृ ‘आइए चाय पीते हैं और बातें भी कर लेते हैं’ ‘जी नही चाय छोडिए, फिर कभी, चाय पीने भर का वक्त नहीं है।’ अनजान ने एकांत देख कर मनीश को पत्रा दे दिया। पत्रा संतोष का था। पत्रा पढ़ लेने के बाद मनीश की ऑखें भर आईं, लगा रो देगा, पर रोया नहीं, उसने अनजान से पूछा...कृ ‘बिगनी का लड़का कहां है?’ ‘वह अस्पताल में है और मृत्यु से जूझ रहा है, उसके हार्ट का आपरेशन किया जाना है। उसकी देख भाल करनी है आपको, क्या ऐसा कर सकते हैं आप, पूछा है संतोष जी ने अगर कर सकते हैं फिर तो चलिए बिगनी के लड़के से मिल लीजिए।’ ‘तो संतोष अगले सप्ताह सरेन्डर कर रहा है?’ अनजान से पूछा मनीश ने जी हां, संतोष जी सरेन्डर कर रहे हैं। सरेन्डर तो वे कभी नहीं करते परकृऐसी विवशता है कि उन्हें सरेन्डर करना पड़ रहा है।’ अनजान आगे कुछ नहीं बोल सका, वह रूआंसा हो गया मानो रो देगा। ‘फिर काहे सरेन्डर कर रहे हैं? कहीं प्रशासन तथा शासन की कठोर घेरेबन्दी के कारण तो नही!ं’ ‘जी नहीं, उसके कारण नहीं, कारण बिगनी को बेटा है। जिस दिन बिगनी पुलिस एनकाउन्टर में मारी गई थी, उस दिन संतोष जी बिगनी के ही साथ थे, वे लोग पुलिस से घिर गये थे पर उन्हें पता नहीं था कि उन्हें घेर लिया गया है। उसी समय एक फायर हुआ जिसे बिगनी ने देख लिया, निशाना संतोष जी पर ही साधा गया था, बिगनी संतोष जी के सामने आ गई और उसे गोली लग गईं। पुलिस के घेरे से बचते हुए संतोष जी बिगनी को उठा कर किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहते थे पर बिगनी ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया...कृ ‘गुरू जी आप किसी तरह भागिए और खुद को बचाइए आप रहेंगे तो संगठन बचा रहेगा, आप नहीं रहेंगे तो संगठन बिखर जायेगा। बिगनी का क्या है, बिगनी को तो आप ही ने बनाया है, आप रहेंगे तो फिर कोई बिगनी बन जायेगी, पर गुरूजी कोई नहीं बन पायेगा। हां मेरा एक काम कर दीजिएगा, राजू को पढ़वा दीजिएगा तथा उसे जंगल की जंग का नायक मत बनने दीजिएगा। जंगल की जंग से बाहर रहेगा तो कम से कम जिन्दा तो रहेगा और यहां क्या है, जाने कौन सी गोली कब उसकी सांसें छीन ले, अब राजू आपके हवाले है।’ किसी तरह इतना बोल पाई बिगनी। राजू को बिगनी ने बहुत पहले ही जंगल से दूर भेज दिया था तथा वह बिगनी के फूफा के यहां पढ़ रहा था। बिगनी के फूफा का घर जंगल की जंग से बाहर था। बिगनी के एनकाउन्टर के बाद भी सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। संतोष जी राजू की पढ़ाई लिखाई का सारा खर्च बिगनी के फूफा के पास नियमित रूप से भिजवा दिया करते थे। पर अचानक एक दिन बिगनी के फूफा संतोष जी से मिले और राजू की बिमारी के बारे में बताये कि वह बी.एच.यू. अस्पताल में भरती है तथा उसे हार्ट की बिमारी हो गई हैकृ संगठन का सारा काम छोड़ कर संतोष जी राजू को देखने के लिए अस्पताल गये। डाक्टरों से मिले, डाक्टरों ने इलाज का कुल खर्चा तीन चार लाख रुपयों का बताया। तीन चार लाख रुपये कम तो होते नहीं, बिगनी के फूफा बेचारे कैसे इकठ्ठा करते? संतोष जी अस्पताल से लौट कर रूपयों के इन्तजाम में लग गये, संगठन के पास रूपये नहीं थे। बाहर के साथी संगठनों की भी आर्थिक स्थिति खराब थी जिनसे वे मदत ले पाते। सभी संगठनों के राजस्व श्रोत बन्द हो चुके थे। लगातार साल भर से संगठन की आय में घटोत्तरी हो रही थी। पुलिस की सतर्कता के कारण संगठन का सारा आर्थिक आधार खतम हो चुका था। वैसे भी चार लाख रूपया कम तो होता नहींकृविवश होकर संतोष जी ने समर्पण का निर्णय लिया। ‘समर्पण कर देने पर पॉच लाख का इनाम तो मिल ही जायेगा, इनाम देने में सरकारें घोखा नहीं करतीं।’ संतोष ने मन बना लिया कि किसी भी तरह से राजू को बचाना है चाहे उसके लिए समर्पण करने जैसा कठिन निर्णय ही क्यों न लेना पड़े। समर्पण करने से कठिन निर्णय संतोष के लिए क्या हो सकता था आखिर? जान की बाजी लगा कर जिस संगठन को उसने खड़ा किया, उसके बताये रास्ते पर चलते हुए साथियों ने बिना हिचक कुर्बानियां दीं, उसे वह खुद छोड़ रहा है।कृ समर्पण करना भी आसान तो होता नहीं, समर्पण एक तरफ, दूसरी तरफ पुलिस की गोली, समर्पण भी हो जाये और इनाम भी न मिले। इसके लिए संतोष जी को जोगाड़ बनाना पड़ा। संतोष जी ने क्षेत्रा के मंत्राी जी से सीधे संपर्क बनाया..कृ मंत्राी तो चाहता ही था कि संतोष या तो एनकाउन्टर में मार गिराया जाये या सरेन्डर कर दे। सरेन्डर सुनते ही मंत्राी खिलखिला उठा फिर क्या था उसने अधिकारियों को सहेज दिया और सरेन्डर की तारीख तय हो गई। ं‘कब सरेन्डर करना है संतोष को?’ ‘तेइस मार्च को जिला मुख्यालय पर सरेन्डर करेंगे संतोष जी। उस समय आला अफसरों के साथ मंत्राी जी भी रहेंगे। उस दिन आपको भी मुख्यालय पर रहना होगा, इनाम वाला पॉच लाख का चेक आपको ही दिया जाएगा। अपने समर्पण पत्रा में संतोष जी आपको नामित कर चुके हैं। अनजान ने मनीश को वह पत्रा भी दिखाया। पत्रा संक्षिप्त था पर था दर्द भरा। पत्रा पढ़ते ही मनीश चकरा गया...कृकृकृ उसमें लिखा था... कृकृ ‘मनीश तथा कुमुद के समझाने बुझाने पर वह वामउग्रवाद का रास्ता छोड़ कर मुख्यधारा में वापस आना चाहता है।’ बिगनी के लड़के से मनीश कुमुद के साथ अस्पताल में मिल आया था तथा बिगनी के फूफा को अपने पास से दस हजार रूपया भी दे दिया था। ‘आप घबड़इएगा नहीं राजू का आपरेष्शन जल्दी हो जायेगा।’ मनीश नहीं चाहता था कि वह संतोष से मिले पर पत्रा पढ़ लेने के बाद कुमुद तथा मनीश दोनों उससे मिलने के लिए परेशान हो गये। दिक्कत थी कि समय ही नहीं था, तेइस तारीख सिर्फ दो दिन बाद ही थी, इस समय जाने कहां हो संतोष।कृउससे मिल कर बताना जरूरी था कि बिगनी के लड़के के हार्ट के आपरेशन के लिए रुपयों का इन्तजाम हो जाएगा। वह तथा कुमुद दोनों मिल कर रुपयों का इन्तजाम कर लेंगे, लाख रुपयों से ऊपर के तो कुमुद के पास गहने ही थे तथा मनीश के खाते में भी दो लाख रुपये थे, अस्पताल में कुल रुपये इकठ्ठे तो लगेंगे नहीं, पर संतोष से कैसे मुलाकात हो, संतोष तो मंत्राी के घर पर निगरानी में था, एक तरह से आवासीय अरेस्ट। मंत्राी संतोष को छोड़ेगा भी नहीं। मनीश तथा कुमुद दोनों अन्त तक संतोष से नहीं मिल पाये और... तेईस तारीख आ गई, तारीखें तो आ ही जाती हैं। कोतवाली पर जश्न का माहौल था, कानफूसी हो रही थी कि कोई इनामी नक्सली आज समर्पण कर रहा है। खबरनवीस वहां जमे हुए थे, ऐसा लग रहा था कि कुछ नया तथा अप्रत्याशित होने वाला है। खैर अप्रत्याशित तो था हीकृकरीब बारहे बजे दिन के आसपास संतोष की स्कार्पियों कोतवाली परिसर में दाखिल हुई। गाड़ी में से सधे हुए मिलिटेन्ट की तरह तीन नौजवान असलहों के साथ उतरे और सीधे मंच की तरफ बढ़ गये जैसे उन्हें पहले से ही पता हो कि कहां जाना है और क्या करना है। मंच पर क्षेत्रा का मंत्राी उपस्थित था, उसके चेहरे की चमक उस समय देखने लायक थी। उसने सगर्व बताया कि संतोष जी के सरेन्डर के लिए उसे क्या क्या नहीं करना पड़ा। वह दूसरे नक्सलियों का समर्पण कराने के लिए प्रयास आगे भी करता रहेगा तथा एक दिन पूरे जनपद को नक्सलमुक्त तथा भयमुक्त बना कर रहेगा। आने वाले दिनों में यह जो जंगलदंश के नाम चल रही जंगल की जंग है, कहानी बन जायेगी। खूब खूब तालियां बजीं उस समय लगा कि संतोष हस देगा पर उसने खुद को रोक लिया। वहां कैसे कहता...कृकृ ‘जब तक तेरे जैसे लोग मंत्राी बनते रहेंगे जंगल की जंग नहीं खतम होने वाली, तेरे जैसे लोग ही तो नक्सली बनाते हैं।’ संतोष के साथ के दूसरे नक्सलियों के नाम गिनाकर मंत्राी ने संक्षिप्त भाषण दिया जिसका आशय था कि हर नक्सली को मुख्यधारा में वापस आने का मौका दिया जायेगा। उसी नीति के तहत आज संतोष तथा इनके साथी समर्पण कर रहे हैं। संतोष पर पॉच लाख का इनाम रखा गया है जो उनके कहने के अनुसार प्राघ्यापक मनीश जी को चेक के रूप में दिया जा रहा है। जाबांज एस.पी. ने पत्राकारों को आश्वस्त किया कि जनपद के दूसरे नक्सली शीघ्र ही पकड़ लिए जायेंगे या तो मार गिराए जायेंगे। कुछ ही देर में सरेन्डर का कार्यक्रम समाप्त हो गया। मनीश चेक लेकर घर आ गया। मनीश के घर के सामने अनजान पहले से ही खड़ा था...कृ अनजान के साथ ही कुमुद तथा मनीश को बी.एच.यू. अस्पताल के लिए निकलना था। वे अस्पताल पहुंच गये। दूसरे दिन राजू का आपरेशन किया गया। अस्पताल का सारा खर्च मनीश ने अपने पास से चुकता किया। संतोष के इनाम वाला चेक राजू के फूफा के लिए जस के तस बचाकर रख लिया। राजू का आपरेशन सफल हो गया। उसे पेसमेकर लगाया गया। कुछ दिनों बाद राजू को अस्पताल से छोड़ दिया गया। अब वह स्वस्थ था। मनीश ने बिगनी के फूफा को बताया कि राजू के इलाज के लिए संतोष ने सरेन्डर कर दिया है उसके एवज में पॉच लाख का सरकारी चेक मिला है जो उसके नाम से है।कृ ‘चेक अभी तक वैसे ही है उसने उसे एकाउन्ट में लगाया नहीं है। अब राजू ठीक हो गया है, चेक को बैंक में लगा देना चाहिए, कुछ दिन में चेक का क्लीयरेन्स हो जायेगा। वह रूपया मुझे नहीं रखना है आप राजू की परिवरिश कर रहे हैं, वह रुपया मैं आपको दे दूंगा, उसे आपको रखना होगा।’ ‘जी नहीं वह रुपया मुझे नहीं रखना, उस रुपया को आप ही रखें तथा राजू की परिवरिश में खर्च करें। आपके यहां राजू को पढ़ने लिखने का माहौल मिलेगा। मेरे यहां तो पढ़ने लिखने का माहौल ही नहीं है, न ही अच्छे स्कूल हैं। बिगनी के फूफा ने संतोष के चेक का रुपया लेने से इनकार कर दिया और राजू को मनीश के हवाले कर दिया। बिगनी का फूफा था तो गंवार जैसा पर उसका दिमाग गंवार जैसा नहीं था। उसने मनीश व कुमुद को राजी कर लिया कि राजू उनके पास रह कर ही पढ़ेगा। पढ़ लिख कर जब अपने पैरों पर खड़ा हो सकने लायक बन जायेगा फिर वह खुद तय कर लेगा कि उसे कहां तथा किसके साथ रहना है। बिगनी का फूफा राजू को मनीश के घर छोड़ कर अपने गॉव चला गया। संतोष भी यही चाहता था कि राजू उनके साथ रहे। राजू मनीश के घर पर रहने लगा कुछ ही दिनों में वह मनीश तथा कुमुद की ऑखों का तारा बन गया, वैसे भी कुमुद अपना प्रतिरूप गढ़ना नहीं चाहती थी। बिना प्रतिरूप गढ़े ही उसे राजू के रूप में मन की मुराद मिल गई थी। कुमुद को लगता कि राजू के रूप में बिगनी उसके सामने है और पूछ रही है...कृ ‘का हाल चाल है बहिन जी?’ बाहरी नहीं समझ सकते थे कि राजू उन दोनों का बेटा नहीं है, लोग उन्हें ही राजू का मॉ, बाप समझते हैं। संतोष भी राजू का हालअहवाल मनीश से अक्सर लिया करता था। संतोष पर कई तरह के अपराधिक मुकदमे चला दिए गये थे, उनमें से कुछ तो गवाह न होने तथा चार्जशीट की कानूनी कमी के कारण अपने आप समाप्त हो चुके थे। फिर भी उसके ऊपर गंभीर किस्म के दो मुकदमे थे जो चल रहे थे पर उनमें भी न तो गवाह थे और न ही पक्के सबूत थे। संतोष के बारे में एक खबर और थी कि वह जेल से ही अगला चुनाव लड़ने की तैयारी में है। सरेन्डर कराने वाले मंत्राी ने अपनी पारटी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भी संतोष को दे चुका है। उसने इस बारे में मनीश को बताया भी था। वैसे भी संतोष वाले राजनीतिक समय से हाल का उपभोक्तावादी व बाजारवादी राजनीतिक समय काफी बदल चुका है। वामधारा के जो लोग संसदीय राजनीति वाली लाइन का विरोध किया करते थे वे वाममार्गी संसदीय लाइन को भारतीय राजनीति के लिए उपयोगी ही नहीं अनिवार्य भी मानने लगे हैं। इसी संसदीय लाइन को कबूल कर उसके संगठन के लोगों ने भी एक राजनीतिक दल बना लिया है तथा आगामी चुनाव में वे अपने प्रत्याशी भी उतारने की तैयारी कर रहे हैं। बहरहाल अभी प्रदेश के चुनाव होने में तीन साल की देरी है। यह देखना अचरज भरा होगा कि वामउग्रवादी धारा के लोग सत्याग्रह, घेराव तथा असहयोग की जमीन पर अपना पैर किस तरह से जमा पाते हैं हिन्सा तथा प्रतिहिन्सा त्याग कर? समय बीत रहा था, बीतते बीतते कई साल गुजर गये। कमुद तथा मनीश दोनों राजू के साथ खुश खुश थे। कुमद तथा मनीश के रिश्ते की सालगिरह के अवसर पर मनीश ने राजू को दिल्ली से बुलाया था।कृराजू ही सालगिरह की तैयारी किया करता था, वह नहीं रहेगा फिर कैसे होगी सालगिरह की तैयारी? ‘बेटे आ जाना तुम्हें तारीख तो ख्याल है नऽ’ ‘हां ममा! भला उसे मैं कैसे भूल सकता हूॅ’ ‘हां जरूर आऊंगा पापा! फिर उसने कुमद से कहा था... ‘ममा तूं काहे परेशान रहती है मेरे लिए, यह कैसे हो सकता है कि मैं न आऊं, मुझे तो आना ही है। मैं दमयंती आन्टी के साथ आ रहा हूॅ।’ राजू जे.एन.यू. में शोध छात्रा था। राजू दिल्ली में दमयंती के साथ ही रहता है, दमयंती ने उसे हास्टल में नहीं रहने दिया। आलोकनाथ जी के निधन के बाद दमयन्ती दिल्ली लौट गई। उसने वही एक कालेज ज्वाइन कर लिया। सालगिरह के तीन दिन पहले मनीश ने राजू को फोन किया और पूछा...कृ ‘किस ट्रेन से आ रहे हो बेटे, तुमलोग?’कृ ‘मैं तो नहीं आ रहा पापा, दमयंती आंटी ‘काशी विश्वनाथ’ से जा रही हैं’ तूं क्यों नहीं आ रहा बेटे? पूछा मनीश ने कुमुद भी चौंक गई...‘काहे नहीं आ रहा राजू?’ राजू ने मनीश को घर न आने का कारण जो बताया वह कुमुद को ही नहीं मनीश को भी चौंकाने वाला था...कृ ‘तो क्या तुम छात्रा आन्दोलन के कारण घर नहीं आ रहे?’ पूछा मनीश ने ‘हां पापा, छात्रों के आन्दोलन को छोड़कर मैं घर नहीं आ सकता। मालूम है मौजूदा सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर करीब करीब करीबअघोषित प्रतिबंध लगा चुकी है और आप तो जानते ही हैं कि सरकारों की विनम्रता ही जनता की पूंजी होती है। जनता अपनी तकलीफ सहिष्णु सरकार से ही बता पाती है, असहिष्णु तथा संवेदनहीन सरकार से नहीं। असहिष्णु सरकार को सचेतन व विनम्र बनाने के लिए जनप्रतिरोध अनिवार्य है पापा! आप तो जानते ही हैं पापा कि आजकल अभिव्यक्ति पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया ह,ैकृकेवल देखो, व सुनो की सरकार है, देखो व सुनो, पर बोलो नहीं कुछ ऐसी ही।कृ आपसे और ममा से तो मैंने यही सीखा है कि अन्याय का प्रतिरोध करना सबसे बड़ा मानव धर्म है। हम छात्रा, सरकार की असहिष्णुता के प्रतिरोध में अहिंसक आन्दोलन चला रहे हैं, जन सरोकार वाले ऐसे आन्दोलन को छोड़कर भला घर मैं कैसे वापस आ सकता हूॅ।’ ‘प्लीज पापा! हमें क्षमा कीजिएगा, हम नहीं आ पा रहे हैं, साल गिरह के अवसर पर आप दोनों को मेरी शुभकामनायें हैं, पापा!’ मनीश को लगा कि राजू ‘बड़ा हो गया है’ उसे नहीं समझाया जा सकता। उसने हसते हुए कुमद से कहा...कृ ‘राजू बड़ा हो गया है’ कुमुद बोल उठी....कृ ‘पर हम तो छोटे हैं, हम नहीं चाहते कि राजू इतना बड़ा हो जाये कि आन्दोलन में कूद जाये’ राजू तो बिगनी की इच्छा के खिलाफ जा रहा है। बिगनी चाहती थी कि राजू समाज या जंगल का रखवाला न बने, छोटा बन कर समाज में रहे। वैसे बड़ा बन सकने के विकल्प तो दो ही हैं, नक्सली बनो या नेता। नेता बनो तो गाली खाओ, नक्सली बनो तो गोली खाओकृसो काहे के लिए बड़ा बनना? पर हम क्या कर सकते हैं? हमने तो राजू को अपना लड़का माना, लड़के से बढ़कर उसकी परिवरिश किया, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए जे.एन.यू. भेजा, सोचा कि कोई अधिकारी वगैरह बन जायेगा पर वह तो आन्दोलनकारी बन रहा है। हम कुछ नहीं कर सकते इस बाबत, उसे केवल समझा ही तो सकते हैं। लौट कर आयेगा फिर हम लोग उसे समझायेंगे पर वह हम लोगों के समझाने को हारे, थके और टूटे हुए आदमी का सुभाषित मान लेगा। पर कौन समझाये मनीश तथा कुमुद को कि ‘यह उपन्यास पढ़ना जैसे जरूरी नहीं, राजू अफसर बने यह भी जरूरी नहीं’ वह समझदार है, थोपे हुए निर्णय पर वह क्यों चलेगा? इतनी समझ तो आ ही गई होगी उसमें कि वह अपने भविष्य के बारे में उचित फैसला ले सके। किसी दूसरे के फैसले पर वह क्यों चले आखिर? एक दिन ‘मनीश ने संतोष से पूछा था कि राजू छात्राआन्दोलन की तरफ जा रहा है. क्या किया जाये? संतोष ने बहुत ही सहजता से मनीश को समझाया था...कृ ‘कुछ नहीं करना है, छात्राआन्दोलन की तरफ राजू जा रहा तो जाने दो’ कुदरती तरीके से समय की चालों को समझना उसके लिए जरूरी है। समय की जटिलता समझने के लिए तुमने व कुमुद ने राजू को पर्याप्त अवसर दिया है, वह समय के साथ सन्तुलन बना सकनेे में समर्थ है। यही लोकमूल्यबोधी शिक्षा है, तुम तो जानते ही हो कि लोकमूल्यबोधी शिक्षा कभी भी किसी को मनुष्यता विरोधी नहीं होने दे सकती। यकीन करो राजू पर। वह कभी भी मानवद्रोही नहीं हो सकता। उसे पढ़ने, खुद को गढ़ने तथा समय के साथ बढ़ने दो।’ ऐसा ही तो बिगनी भी सोचती थी राजू के बारे में।’ संतोष के समझाने के बाद मनीश व कुमुद ने मान लिया था राजू के बारे में वह समय की चालों को समझते हुए अपने भविष्य को गढेगा उसे किसी सुभाषित की जरूरत नहीं। राजू जो कर रहा है उसे करने दो वह खुद को समय के साथ संतुलित कर लेगा। उनका काम था राजू को समझदार बनाना वे अपना काम कर चुके हैं। अचानक कुमुद को बिगनी का ख्याल आया... क्षमा करना बिगनी हम राजू को आन्दोलन वगैरह करने से नहीं रोक पा रहे हैं। वह नायक बनने पर तुला हुआ है, अभी नहीं बताया जा सकता कि वह जंगल का नायक बनेगा या कथित मुख्यधारा वाले समाज का पर कुछ न कुछ बनेगा जरूर। वह समाज की जटिलताओं को समझने लायक बन चुका है। csw98svazkqtqt66tqlf8jtyk7mwt3m